Post – 2015-11-14

इतिहास की गति

“तुम वकील बहुत अच्छे हो सकते थे। सही पेशे का चुनाव करना चाहिए था। मालामाल हो जाते।“
“पेशा करता तो मालामाल तो हो जाता, पर यह क्यों सोच लिया कि सबसे अच्छी चीज पेशा करना और मालामाल होना है।“
उसे छकाने में मुझे बहुत मजा आता है। फतह करने को एक ही चीज है, एक दूसरे का दिल जो जिद के कारण न उसका मेरे हाथ आएगा न मेरा उसके, फिर भी खेल जारी रहेगा। मुझे ही पूछना पड़ा, ‘‘तुमको वकालत वाली बात क्यों सूझी?”
‘‘तुम्हीं ने तो कहा था, मैं जालिम के पक्ष में खड़ा हो रहा हूँ और उसे मजलूम सिद्ध करके रहूँगा और सिद्ध भी कर दिया । मैं खुद कायल हो गया, फिर याद आया तुमने बाबरी के ध्वंस को किस तरह आँखों से ओझल कर दिया। कमाल है न?”
‘‘अगर मैं कहता कि बाबरी मस्जिद कांग्रेस ने गिरवाई, उनको तो मुफत का बदनाम कर दिया, तो तुम्हारी समझ में आता? नादान लोगों को वे ही बातें बताई जाती हैं जो उनकी समझ में आ सकें।“
‘‘तुम कुछ भी कह दोगे मैं मान लूँगा?’’
‘‘नहीं मानोगे, यह पहले से जानता हूँ। सही बात को मानने के लिए भी समझ, यानी सही गलत में फर्क करने की तमीज, चाहिए। हाँ इसमें थोड़ा हाथ तुम लोगों का भी था।’’
‘‘और तुम्हारा?’’
‘‘मैंने बचाने की एक छोटी सी कोशिश की थी, कामयाब नहीं हुआ। गो मैं यह मानता था कि वहाँ पहले कोई मन्दिर था।’’
‘‘और फिर भी तुम चाहते थे, मस्जिद गिराई न जाय?”
‘‘इसलिए कि प्राचीन भारतीय न्यायविचार के अनुसार उसे नहीं गिराया जाना चाहिए था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नियमों के अनुसार उसकी रक्षा की जिम्मेदारी भारत सरकार की था और उसको किसी तरह की क्षति कानून का उल्लंघन था। और हिन्दू रीति के अनुसार उसे गिरा कर मन्दिर बनाने का औचित्य नहीं था। और इस मस्जिद में उस प्राचीन भारतीय वास्तुशिल्प का एक अघ्याय बचा हुआ था जिसका पता इसे ध्वस्त करने वालों को नहीं था। होता भी तो उसका सम्मान नहीं करते।’’
‘‘वह जो तुम पुरानी न्याय विचार की बात कर रहे थे और हिन्दू रीति वगैरह, की बात?’’
‘‘मुझे अधिकारी मान कर मत चलो। जानकारी की बात कर सकता हूँ। हमारे शास्त्रों में क्षेत्राधिकार के विषय में यह विधान रहा है कि अमुक अमुक स्थलों पर किसी व्यक्ति का अधिकार कितने समय तक रहता है। यदि दूसरा ज़बरदस्ती उस पर कब्जा करले तो इतने समय के भीतर उस पर अपने अधिकार का दावा ठोंका जा सकता है। यदि उसके भीतर ऐसा नहीं हो सका तो वह स्थान उसका हो जाएगा, जिसने कब्जा जमा लिया है। यह पंचतन्त्र की एक कहानी में आया है और यह हमारे समय में प्रचलित कालातीत मामलों या टाइम बार्ड मामलों जैसा है। रहा रीति का तो टूटी हुई प्रतिमा या टूटा हुआ देवालय पूजा के योग्य नहीं रख जाता। प्रतिमा बनने से पहले पत्थर था, पत्थर तराश कर प्रतिमा बनने तक भी वह एक कृति था, उसमें जब देव की कल्पना करते हुए उसकी प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है तब वह देवता हो जाता । यही बात देवालय का है। एक बार जो भग्न हो गया उस मन्दिर को बनाना तो संभव नही।’’
‘‘इसमें प्राचीन वास्तुशिल्प के सुरक्षित रहने की बात?”
‘‘कानेरी की गुफाएँ तुमने देखी हों तो उनमें एक पुराना प्रेक्षागृह या नाट्यशाला है। उसकी सबसे बड़ी वि शेषता है उसकी ध्वनि व्यवस्था जिसमें एक कोने की मामूली फुसफुसाहट भी दूसरे कोने तक साफ सुनी जा सकती है। ध्वनिप्रसार की यही व्यवस्था बाबरी मस्जिद में काम में लाई गई थी। इस दृष्टि से यह एक असाधारण विरासत थी जिसकी क्षतिपूर्ति वहाँ कुछ भी बना कर नहीं की जा सकती। परन्तु न तो मस्जिद को बचाने वालों ने कभी इन पहलुओं को उठाया न उस स्थान को वापस माँगने वालों को इसका ज्ञान था। दोनों के आग्रह धार्मिक थे और इसकी ओट में धर्मभावना नहीं शुद्ध राजनीतिक लाभ था।’’
‘‘राजनीतिक लाभ के लिए धर्म का इस्तेमाल धर्म का अपमान है, धर्म को भुनाने या बेच खाने का रूप।’’
मै उससे सहमत था, पर साथ ही जोड़ा, ‘‘पर भाजपा को तो उसमें झोंक दिया गया। यह आग तो कांग्रेस ने लगाई थी और वि श्वास नहीं करोगे, स्वतन्त्र भारत में सबसे पहले इसे नेहरू ने शुरू किया था और वह भी आचार्य नरेन्द्र देव जैसे आदमी को हराने के लिए जिनका वह व्यक्तिगत रूप में आदर भी करते थे, परन्तु वह समाजवादी थे और समाजवादियों से उन दिनों कुछ भय बना हुआ था, इसलिए नेहरू ने इसको इस्तेमाल किया।“
‘‘आचार्य जी हार गए थे?’’
‘‘हारना ही था। और फिर राजीव गांधी ने हिन्दू जनमत को अपनी ओर करने के लिए जो कुछ किया वह तो सबकी जारकारी में है। ऐसी हालत में, एक ऐसा दल जिसका एक मात्र आधार हिन्दू संस्कृति और सम्मान की रक्षा था, यदि सचेत हुआ कि यह तो हमें ही अपने घर से बेदखल किया जा रहा है और अयो ध्या के साथ काशी मथुरा को भी समेट लिया तो यह तो उसकी विवशता थी। आत्मरक्षात्मक कदम। उनकी अपनी योजना इसे गिराने की नही थी, इस मुद्दे को लम्बे समय तक उठाते हुए, मुस्लिम समुदाय को अनुदार सिद्ध करते हुए हिन्दुओं का समर्थन जुटाने की थी. इसे गिराकर स्वयं को उग्र और अनुदार सिद्ध करने की नही थी. इस दुर्घटना से उनका पासा पलट गया। वे धमकी नहीं दे रहे थे, मुस्लिम समुदाय से याचना कर रहे थे। याचना का सम्मान करते हुए यदि इन तीनों स्थलों को सौंप दिया जाता तो मन्दिर की राजनीति खत्म हो जाती। इसमें मुस्लिम समुदाय की छवि उज्ज्वल होती। इस्लाम में बुतपरस्ती निषिद्ध है इसलिए कुरान की पुस्तक या मस्जिद की पूजा नहीं की जाती, नमाज कहीं भी अदा की जा सकती है। कुरान की आयतों का, न कि पोथी का महत्व है, इसलिए जो कट्टर मुस्लिम दे श हैं उनमें भी लोकनिर्माण के कार्यों में अवरोध पैदा करने वाली मस्जिदों को कई बार गिराया गया है। मुस्लिम समुदाय इस पर सहमत होता भी नजर आ रहा था. बाबरी को तो उन्होंने पहले से ही छोड़ दिया था। समुदाय के रूप में वे वे इतने संवेदनहीन भी नहीं थे कि हिन्दू भावना का आदर न करते, परन्तु उकसावे की जो भूमिका पहले ब्रितानी हुक्मरान की थी उसे उत्तराधिकार में तुमने ले लिया था। इस बार उकसाने भड़काने का काम तुमने किया. तुमने धार्मिक भावना को भावना को इतना उग्र कर दिया और इसे मुस्लिम अस्मिता से जोड़ दिया, कयोंकि सांम्प्रदायिक आग भड़काने और बुझाने के अलावा तुम्हारे पास कोई मुद्दा बच ही नही गया है। उनको लाचार हो कर तुम्हारा साथ देना पडा और जब मस्जिद का पतन हुआ तो आहत धर्म-भावना नहीं जातीय अस्मिता हुई, जिसे लेकर मुसलिम समुदाय में गहरा मलाल था, और अब भी है । यह नौबत तुम्हारी वजह से आई थी। भीड़ वि श्व हिन्दू परिषद की थी। आज तक मेरे लिए यह रहस्य है कि गिराने की योजना और उसकी जैसी-तैसी तैयारी किसकी थी। पर यह उस दौर के दृश्य माध्यमों से प्रकट था कि इस सूचना से स्वयं आडवा नी हैरान हो गए थे और फिर ‘चलो छुट्टी हुई वाली मुस्कराहट उनके होठों पर उसी भावभंगिमा के साथ आई थी।
मैंने जो कहा वह सब कहानी है। सबाल्टर्न या इतरेतर इतिहास मान लो। कुछ गलत लगे तो सुधार भी लेना। इसके परिणामो को तो जानते ही हो। कहने का मतलब तोड़-फोड़ उनकी योजना में नहीं थी। भीड़ और भावना का लाभ उठाना चाहते थे। कांग्रेस सरकार ने इसे किसी भी हस्तक्षेप के बिना हो जाने दिया। अब सही अपराधी तय करने चलो तो मुश्किल में पड़ जाओगे।
परन्तु यह जो गोचर है वह उन असंख्य शक्तियों का क्षुद्र अंश है जिनकी दृश्य अदृश्य सक्रियता और संपुंजन से कोई परिघटना मंचित होती है। इस महानाट्य का सूत्रधार इतिहास या कालदेव की अदृश्य योजना है। यदि तुम जानना चाहोगे तो कभी बताउूंगा कि उनमें से कोई भी एक कम हो जाता तो यह घटना घटती ही नहीं या किसी अन्य रूप में घटती। जैसे हमारे म स्तिष्क के क्षुद्र अंश को ही हम जानते हैं जब कि हम जो कुछ करते हैं उसमें उस अवचेतन की भी भूमिका होती है जिसने हमारे मस्तिष्क के अधिकतम क्षेत्र को घेर रखा है पर हम उनकी भूमिका को सही सही जान नहीं सकते, उसी तरह कुछ इतिहास की घटनाओं के साथ भी होता है। हमारे निर्णय और योजनाए धरी की धरी रह जाती हैं और जो घटित होता है वह अक्सर अप्रत्याशित होता है। इसे इतिहास की गति कहो या नियति।
11/13/2015 3:52:35 PM

Post – 2015-11-12

edited text.
फिर बीता ज़माना याद आया

“तुम एक बार कहते हो इतिहास को समझे बिना वर्तमान को जाना ही नहीं जा सकता, दूसरी बार कहते हो, इतिहास को वर्तमान में खींच कर मत लाओ। क्या यह उल्टी बात नहीं है?”
“उल्टी इसलिए लगती है कि तुम्हारी खोपड़ी उल्टी है। मैं कहता हूँ इतिहास को जानो, इतिहास को जिओ मत। जीने के लिए वर्तमान ही काफी है। इतिहास सीख लेने के लिए है, वर्तमान जीने के लिए है। भविष्य इन दोनों की सामग्री जोड़ कर सपने देखने के लिए है और तुम जैसे लोग जो इनके बीच-घाल मेल करते हैं, या इन तीनों में से किसी एक से भागते-बचते हैं, वे भाड़ में जाने के लिए हैं।”
“मैं भी इतिहास से सीख लेकर ही कह रहा हूँ, क्या तुम एक ऐसे दल को जिसने बाबरी का ध्वंस किया हो, गुजरात का नरसंहार किया हो, जिसके पास स्वयंसेवकों की इतनी बड़ी फ़ौज़ हो और जिसे रोज कवायद कराकर लड़ने के लिए तैयार रखा जाता हो, उसे तुम शान्तिप्रेमी मान सकते हो? छोड़ दो उस किताब को जो १९३९ में लिखी गई थी, मगर क्या तुम्हें नहीं मालूम कि हिट्लर की जीवनी सबसे अधिक वे ही पढ़ते हैं। उनका गणवेष, सलाम करने का तरीका सब नाजियों से लिया हुआ है। और उनकी मूँछ, खैर सबकी नहीं, पर आडवानी जी की तितली कट मूछ तो सीधे हिटलर से ली गई है यार!”
“तुमने तो इतनी चीजों का घोल बर्तमान में भी बना दिया कि समझ में नहीं आता कहाँ से शुरू करूँ। फिर भी मेरी कद-काठी देख रहे हो न। स्वभाव भी देख रहे हो। यदि मैं तन कर कहूँ मैं शेर हूँ, मुझे मामूली मत समझना, तो डरावना मान लोगे?”
वह हँसने लगा, ‘‘मानूँगा क्यों नहीं, सिंह तो तुम्हारे नाम के साथ ही लगा हुआ है।’’
हँसी में मैं भी शामिल हो गया, ‘‘अब तो कहने को कुछ बाकी रहा ही नहीं। मैं अपनी जबान में बोलूँगा तो तुम्हारी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाएगी।’’
‘‘वह तो तुम आदमी की जबान में बोलते हो तब भी गुम हो जाती है। यह तो उन विरल मौकों में से एक है जब मैंने तुम्हारी सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी है, और बगलें झाँक रहे हो।’’
मैंने पैंतरा बदल दिया, “तुमने इतने सारे सवाल एक साथ उछाल दिए कि मैं सचमुच चक्कर में पड़ गया, इसलिए अब तुमसे ही पूछता हूँ, ‘‘संघ को समर्थन देने वाले कौन हैं? मतलब उसका सपोर्ट बेस क्या है?”
‘‘बनिया-व्यापारी।”
‘‘जब दंगे-फसाद होते हैं तो किसकी दूकानें और असबाब लूटे और जलाए जाते हैं?’’
‘‘जाहिर है जिसकी दूकानें और माल असबाब होंगे उन्हीं के ।’’
‘‘कर्फ्यू लगता है तो किसका कारोबार सबसे अधिक प्रभावित होता है?”
अब वह चौंका, ‘‘तुम साबित क्या करना चाहते हो?’’
‘‘साबित करना यह चाहता हूँ कि यह हाथ जितना भी भाँजे, दंगे फसाद नहीं चाहेगा। इससे पहले भी जैन मत हो या बौद्धमत इनको सबसे जबर्दस्त समर्थन व्यापारियों से ही मिला, क्योंकि वे चाहते थे कि यदि सभी लोग शान्ति का मन्त्र सीख लें तो लूट पाट बन्द हो जाय, वे अपना कारोबार शान्ति से कर सकें और इसलिए कई बार तो उन्होंने अपनी समस्त संपदा इन मतों को दान दे कर स्वयं भी वैराग्य ले लिया और इन मतों में दीक्षित हो गए। इतिहास से इतिहास की आत्मा को ग्रहण करो, उसकी स्पिरिट को ग्रहण करो, उसका चोंगा लबादा नहीं। उसमें तो बार-बार बदलाव होते रहते हैं और जहां कोई किसी दूसरे जैसा होना चाहता है वह उसकी भँड़ैती तो कर सकता है, हो नहीं पाता. शेर की खाल ओढ़ कर शेर दिखने वाले गधे की कहानी तक नहीं पढ़ी तुमने तो। धन्य हो। मार्क्स ने इतिहास की पुनरावृत्ति पर जो कुछ कहा है वह तो याद रखते.’’
लगा बात उसकी समझ में कुछ-कुछ आ रही है।
मैंने वातावरण को कुछ और हल्का बनाने के लिए कहा, ‘‘बुद्ध के बाद यह पहला तो संघ बना यार और तुम इसे भी कोसते रहते हो।’’ और फिर अपनी बात पर आ गया, ‘‘देखो जब बनिया-व्यापारी दंगा फसाद पसन्द नहीं करता तो उसकी पार्टी कैसे चाहेगी। तुमने सुना नही पंजाब में उग्रवादी उभार के दौर में उग्रवदियों ने कई बार संघ की शाखाओं को ही निशाना बना लिया। चलती बसों से सवारियों को उतार कर हिन्दुओं को अलग करके उन्हें गोलियों से भूनते रहे, शादी व्याह में लोग जुटे हुए हैं, एके फार्टीसेवन से निरीह लोगों पर गोलियाँ बरसने लगीं। इतने सारे उकसावों के बाद भी उन्होंने कभी सिक्खों को निशाना बनाया? कम से कम जहाँ हिन्दू बहुमत था, वहाँ तो बना सकते थे। ऐसा नहीं किया, क्योंकि उन्होंने यह होश-हवास कभी नहीं खोया कि कुछ बिगड़े दिमाग के लोगों के लिए पूरी जाति या समुदाय को न तो दोषी माना जा सकता है न ही उपद्रव से हमारा भला होना है, जब कि जैसे-को-तैसा के मुहावरे में इस तरह की प्रतिक्रिया भी किसी उत्तेजक क्षण में पहली क्रिया की तार्किक परिणति ही होती। उल्टे इन्होंने 1984 के दंगों में सिक्खों को जहाँ बचा सकते थे बचाया। बाद में अपराधियों को दंडित करने की माँग में अकाली दल के साथ खड़े हुए। और जानते हो जिस अकाली दल को हाशिये पर डालने के लिए राजीव गांधी ने उग्रवाद को सहारा दिया था, भिंडरांवाले को संत बताया था वही सिक्खों का सही प्रतिनिधि और हितैषी है इसे उन्होंने उस भयानक दौर में भी समझा था, उनकी घ्राणशक्ति तुमसे अच्छी है।“
‘‘तब फिर…” वह एक भूलभुलैया में फँस गया था।
‘‘देखो, संघ का जन्म उस दौर में आत्मरक्षा के लिए हुआ था जब आये दिन साम्प्रदायिक दंगे हो जाते थे। सरकारी तन्त्र दंगों को उकसाता था, दंगाइयों को छूट देता था, इसलिए जान माल का सबसे अधिक नुकसान हिन्दुओं को ही झेलना पड़ता था। इस किंकर्तव्यता की स्थिति में जब कुछ नहीं सूझ रहा था तब हेडगेवार ने इस संगठन की परिकल्पना की थी और नाना जी ने जो संभवतः इसके प्राथमिक सदस्यों में थे, एक बार गर्व करते हुए कहा था, कि संघ की स्थापना के बाद जब मुसलमानों ने हमला बोला तो हम डट कर खड़े हो गए और उन्हें भाग जाना पड़ा। उनको भगा देना इनकी सबसे बड़ी सफलता थी।”
‘‘तुम तो हर चीज को उलट-पलट देते हो। कहीं कोई बात छूट रही है, नहीं तो आज तक तो ऐसा किसी ने कहा ही नहीं।“
‘‘उलटता-पलटता कुछ नहीं हूँ। दूसरे इतिहास के घटकों को राजनीति के ईधन के रूप में देखते हैं और मैं ठहरा मार्क्सवादी इतिहासकार, अकेला मार्क्सवादी यह भी दुहरा दूँ, समय की नब्ज पर हाथ रखने वाला, इसलिए मैं किसी परिघटना के आर्थिक आधार पर पहले नजर डालता हूँ।
‘‘अब तुम्हें यह भी समझ में आ जाना चाहिए कि बात-बात पर उत्तेजित हो जाने वाली जमातें व्यापारिक कारोबार में पिछड़ी भी होती हैं, और न हों तो भी पिछड़ जाएँगी। इसलिए किसी मुसलमान दूकानदार के पास बैठो या हिन्दू बनिये के पास, जबान दोनों की बड़ी सलीस मिलेगी। मीठी, दिल जीतने वाली।
“और अब इसी से यह भी समझ सकते हो कि संघियों का आइ क्यू भले तेज हो, उनमें पढ़े लिखों के लिए न तो आदर है न पढ़ाई लिखाई पर जोर। बल्कि इसे हतोत्साहित किया जाता है।”
‘‘यह क्यों?”
“क्योंकि छोटा बनिया जानता है कि दूकान सँभालने के लिए ज्यादा पढ़ना-लिखना ठीक नहीं। उसके बाद लड़के का दिमाग दूकान-व्यापार में लगेगा नहीं, नौकरी चाकरी पसन्द करने लगेगा और जितना कमाएगा उससे दस गुना वह अपनी कामचलाऊ पढ़ाई से अपने कारोबार से कमा लेगा। पैसा हो तो एक क्या चार पढ़े लिखों को उनकी फीस देकर अपनी सेवा में लगा सकता है।
“लेकिन….” मैं एक मिनट के लिए उसे ताड़ने के लिए रुका. वह सुन रहा था.
“लेकिन छोटी से छोटी बात पर जब वह किसी पढ़े लिखे के सामने दीन भाव से खड़ा होता है तो उसको जो हीनता अनुभव होती है वही संघ से जुड़े बुद्धिजीवियों को विद्वानों के सामने अनुभव होती है।
“उनकी दुर्दशा का रहस्य यही है कि जहाँ वे बेकसूर रहते हैं वहाँ भी तुम उनकी लानत-मलामत करने लगते हो और वे बेचारे अपमान झेलते हुए भी मीठा बोलते रहते हैं कि कभी तो तुम भी यह बात समझ ही जाओगे.”
“तुम विचारों की असहमति पर जान मारने की धमकियाँ देने वालों को, यहाँ तक कि जान मारने वालों को मीठा बोलने वाला कहोग?’’
‘‘पहले यह पड़ताल तो करो कि उनमें से कितने संघ से संबन्ध रखते हैं और कितने छुट्टा संगठनों से या चुटकी बजाते एक संगठन बना कर उनके मुखिया बन जाते हैं।”
‘‘अच्छा यह बताओ, साफ-साफ बताना, तुम्हीं कह रहे थे कि छोटे बनियों की पार्टी है, वे पढ़े लिखे होते नहीं, छोटा बनिया सोचता है फीस दे कर पढ़े लिखों से काम करा लेंगे। और तुमने यह भी कहा था तुम उनके पक्ष में खड़े हो रहे हो, साफ साफ बताना, इसके लिए फीस कितनी मिली है?’’
‘‘चोरों उचक्कों को यह राज नहीं बताया जाता।” मैंने कहा, और दोनों ने एक साथ ठहाका लगाया।

Post – 2015-11-12

फिर बीता ज़माना याद आया

“तुम एक बार कहते हो इतिहास को समझे बिना वर्तमान को जाना ही नहीं जा सकता, दूसरी बार कहते हो, इतिहास को वर्तमान में खींच कर मत लाओ। क्या यह उल्टी बात नहीं है?”
“उल्टी इसलिए लगती है कि तुम्हारी खोपड़ी उल्टी है। मैं कहता हूँ इतिहास को जानो, इतिहास को जिओ मत। जीने के लिए वर्तमान ही काफी है। इतिहास सीख लेने के लिए है, वर्तमान जीने के लिए है। भविष्य इन दोनों की सामग्री जोड़ कर सपने देखने के लिए है और तुम जैसे लोग जो इनके बीच घाल मेल करते हैं, या इन तीनों में से किसी एक से भागते-बचते हैं, वे भाड़ में जाने के लिए हैं।”
“मैं भी इतिहास से सीख लेकर ही कह रहा हूँ, क्या तुम एक ऐसे दल को जिसने बाबरी का ध्वंस किया हो, गुजरात का नरसंहार किया हो, जिसके पास स्वयंसेवकों की इतनी बड़ी फ़ौज़ हो और जिसे रोज कवायद कराकर लड़ने के लिए तैयार रखा जाता हो, उसे तुम शान्तिप्रेमी कैसे मान सकते हो? छोड़ दो उस किताब को जो १९३९ में लिखी गई थी, मगर क्या तुम्हें नहीं मालूम कि हिट्लर की जीवनी सबसे अधिक वे ही पढ़ते हैं। उनका गणवेष, सलाम करने का तरीका सब नाजियों से लिया हुआ है। और उनकी मूँछ, खैर सबकी नहीं, पर आडवानी जी की तितली कट मूछ तो सीधे हिटलर से ली गई है यार!”
“तुमने तो इतनी चीजों का घोल बर्तमान में भी बना दिया कि समझ में नहीं आता कहाँ से शुरू करूँ। फिर भी मेरी कद-काठी देख रहे हो न। स्वभाव भी देख रहे हो। यदि मैं तन कर कहूँ मैं शेर हूँ, मुझे मामूली मत समझना, तो डरावना मान लोगे?”
वह हँसने लगा, ‘‘मानूँगा क्यों नहीं, सिंह तो तुम्हारे नाम के साथ ही लगा हुआ है।’’
हँसी में मैं भी शामिल हो गया, ‘‘अब तो कहने को कुछ बाकी रहा ही नहीं। मैं अपनी जबान में बोलूँगा तो तुम्हारी सिट्टी पिट्टी गुम हो जाएगी।’’
‘‘वह तो तुम आदमी की जबान में बोलते हो तब भी गुम हो जाती है। यह तो उन विरल मौकों में से एक है जब मैंने तुम्हारी सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी है और बगलें झाँक रहे हो।’’
मैंने पैंतरा बदल दिया, तुमने इतने सारे सवाल एक साथ उछाल दिए कि मैं सचमुच चक्कर में पड़ गया, इसलिए अब तुमसे ही पूछता हूँ, ‘‘संघ को समर्थन देने वाले कौन हैं? मतलब उसका सपोर्ट बेस क्या है?”
‘‘बनिया-व्यापारी।”
‘‘जब दंगे-फसाद होते हैं तो किसकी दूकानें और असबाब लूटे और जलाए जाते हैं?’’
‘‘जाहिर है जिसकी दूकानेे और माल असबाब होंगे उन्हीं के ।’’
‘‘कर्फ्यू लगता है तो किसका कारोबार सबसे अधिक प्रभावित होता है?”
अब वह चौंका, ‘‘तुम साबित क्या करना चाहते हो?’’
‘‘साबित करना यह चाहता हूँ कि यह हाथ जितना भी भाँजे, दंगे फसाद नहीं चाहेगा। इससे पहले भी जैन मत हो या बौद्धमत इनको सबसे जबर्दस्त समर्थन व्यापारियों से ही मिला, क्योंकि वे चाहते थे कि यदि सभी लोग शान्ति का मन्त्र सीख लें तो लूट पाट बन्द हो जाय, वे अपना कारोबार शान्ति से कर सकें और इसलिए कई बार तो उन्होंने अपनी समस्त संपदा इन मतों को दान दे कर स्वयं भी वैराग्य ले लिया और इन मतों में दीक्षित हो गए। इतिहास से इतिहास की आत्मा को ग्रहण करो, उसकी स्पिरिट को ग्रहण करो, उसका चोंगा लबादा नहीं। उसमें तो बार बार बदलाव होते रहते हैं और जहां कोई किसी दूसरे जैसा होना चाहता है वह उसकी भँड़ैती तो कर सकता है, हो नहीं पाटा. शेर की खेल ओढ़ कर शेर दिखने वाले गधे की कहानी तक नहीं पढ़ी तुमने तो। धन्य हो। मार्क्स ने इतिहास की पुनरावृत्ती पर जो कुछ कहा है वह तो याद रखते.’’
लगा बात उसकी समझ में कुछ कुछ आ रही है।
मैंने वातावरण को कुछ और हल्का बनाने के लिए कहा, ‘‘बुद्ध के बाद यह पहला तो संघ बना यार और तुम इसे भी कोसते रहते हो।’’ और फिर अपनी बात पर आ गया, ‘‘देखो जब बनिया-व्यापारी दंगा फसाद पसन्द नहीं करता तो उसकी पार्टी कैसे चाहेगी। तुमने सुना नही पंजाब में उग्रवादी उभार के दौर में उग्रवदियों ने कई बार संघ की शाखाओं को ही निशाना बना लिया। चलती बसों से सवारियों को उतार कर हिन्दुओं को अलग करके उन्हें गोलियों से भूनते रहे, शादी व्याह में लोग जुटे हुए हैं, एके फाॅर्टीसेवन से निरीह लोगों पर गोलियाँ बरसने लगीं। इतने सारे उकसावों के बाद भी उन्होंने कभी सिक्खों को निशाना बनाया। कम से कम जहाँ हिन्दू बहुमत था वहाँ तो बना सकते थे। ऐसा नहीं किया, क्योंकि उन्होंने यह होश-हवास कभी नहीं खोया कि कुछ बिगड़े दिमाग के लोगों के लिए पूरी जाति या समुदाय को न तो दोषी माना जा सकता है न ही उपद्रव से हमारा भला होना है, जब कि जैसे को तैसा के मुहावरे में इस तरह की प्रतिक्रिया भी किसी उत्तेजक क्षण में पहली क्रिया की तार्किक परिणति ही होती। उल्टे इन्होंने 1984 के दंगों में सिक्खों को जहाँ बचा सकते थे बचाया। बाद में अपराधियों को दंडित करने की माँग में अकाली दल के साथ खड़े हुए। और जानते हो जिस अकाली दल को हाशिये पर डालने के लिए राजीव गांधी ने उग्रवाद को सहारा दिया था, भिंडरांवाले को संत बताया था वही सिक्खों का सही प्रतिनिधि और हितैषी है इसे उन्होंने उस भयानक दौर में भी समझा था, उनकी घ्राणशक्ति तुमसे अच्छी है।“
‘‘तब फिर…” वह एक भूलभुलैया में फँस गया था।
‘‘देखो, संघ का जन्म उस दौर में आत्मरक्षा के लिए हुआ था जब आये दिन साम्प्रदायिक दंगे हो जाते थे। सरकारी तन्त्र दंगों को उकसाता था, दंगाइयों को छूट देता था, इसलिए जान माल का सबसे अधिक नुकसान हिन्दुओं को ही झेलना पड़ता था। इस किंकर्तव्यता की स्थिति में जब कुछ नहीं सूझ रहा था तब हेडगेवार ने इस संगठन की परिकल्पना की थी और नाना जी ने जो संभवतः इसके प्राथमिक सदस्यों में थे, एक बार गर्व करते हुए कहा था, कि संघ की स्थापना के बाद जब मुसलमानों ने हमला बोला तो हम डट कर खड़े हो गए और उन्हें भाग जाना पड़ा। उनको भगा देना इनकी सबसे बड़ी सफलता थी।”
‘‘तुम तो हर चीज को उलट पलट देते हो। कहीं कोई बात छूट रही है, नहीं तो आज तक तो ऐसा किसी ने कहा ही नहीं।
‘‘उलटता-पलटता कुछ नहीं हूँ। दूसरे इतिहास के घटकों को राजनीति के ईधन के रूप में देखते हैं और मैं ठहरा मार्क्सवादी इतिहासकार, अकेला मार्क्सवादी यह भी दुहरा दूँ, समय की नब्ज पर हाथ रखने वाला, इसलिए मैं किसी परिघटना के आर्थिक आधार पर पहले नजर डालता हूँ।
‘‘अब तुम्हें यह भी समझ में आ जाना चाहिए कि बात बात पर उत्तेजित हो जाने वाली जमातें व्यापारिक कारोबार में पिछड़ी भी होती हैं, और न हों तो भी पिछड़ जाएँगी। इसलिए किसी मुसलमान दूकानदार के पास बैठो या हिन्दू बनिये के पास, जबान दोनों की बड़ी सलीस मिलेगी। मीठी, दिल जीतने वाली।
“और अब इसी से यह भी समझ सकते हो कि संघियों का आइ क्यू भले तेज हो, उनमें पढ़े लिखों के लिए न तो आदर है न पढ़ाई लिखाई पर जोर। बल्कि इसे हतोत्साहित किया जाता है।”
‘‘यह क्यों?”
“क्योंकि छोटा बनिया जानता है कि दूकान सँभालने के लिए ज्यादा पढ़ना-लिखना ठीक नहीं। उसके बाद लड़के का दिमाग दूकान-व्यापार में लगेगा नहीं, नौकरी चाकरी पसन्द करने लगेगा और जितना कमाएगा उससे दस गुना वह अपनी कामचलाऊ पढ़ाई से अपने कारोबार से कमा लेगा। पैसा हो तो एक क्या चार पढ़े लिखों को उसकी फीस देकर अपनी सेवा में लगा सकता है।
“लेकिन।
“लेकिन छोटी से छोटी बात पर जब वह किसी पढ़े लिखे के सामने दीन भाव से खड़ा होता है तो उसको जो हीनता अनुभव होती है वही संघ से जुड़े बुद्धिजीवियों को विद्वानों के सामने अनुभव होती है।
“उनकी दुर्दशा का रहस्य यही है कि जहाँ वे बेकसूर रहते हैं वहाँ भी तुम उनकी लानत मलामत करने लगते हो और वे बेचारे अपमान झेलते हुए भी मीठा बोलते रहते हैं कि कभी तो तुम भी यह बात समझ ही जाओगे.”
“तुमने विचारों की असहमति पर जान मारने की धमकियाँ देने वालों को, यहाँ तक कि जान मारने वालों को मीठा बोलने वाला कहोग?’’
‘‘पहले यह पड़ताल तो करो कि उनमें से कितने संघ से संबन्ध रखते हैं और कितने छुट्टा संगठनों से या चुटकी बजाते एक संगठन बना कर उनके मुखिया बन जाते हैं।”
‘‘अच्छा यह बताओ, साफ-साफ बताना, तुम्हीं कह रहे थे कि छोटे बनियों की पार्टी है, वे पढ़े लिखे होते नहीं, छोटा बनिया सोचता है फीस दे कर पढ़े लिखों से काम करा लेंगे। और तुमने यह भी कहा था तुम उनके पक्ष में खड़े हो रहे हो, साफ साफ बताना, इसके लिए फीस कितनी मिली है?’’
‘‘चोरों उचक्कों को यह राज नहीं बताया जाता।” मैंने कहा, और दोनों ने एक साथ ठहाका लगाया।

Post – 2015-11-11

काश पूछो की मुद्दआ क्या है

देश का हमने क्या अहित किया है इसका हिसाब तो कल लूँगा, परन्तु तुम करना क्या चाहते हो?
उस दहशत को, उस हिन्दू फोबिया को दूर करना जिसे अंग्रेजों ने मुस्लिम असुरक्षा की चिंता दिखाते हुए धार्मिक अलगाव को साम्प्रदायिक घृणा में बदल कर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित की और हमें लड़ाते हुए अपने हित साधते रहे और हुआ यह उसी देश में जिसमें बिल्ली और बन्दरबांट की कहानी हजार डेढ़ हजार साल पहले से अनपढ़ों तक की जबान पर थी। तुमने अपने चुनावी हितों के लिए हिन्दू फोबिया लगातार उभारते हुए जिन्दा रखा जो ही उन सामाजिक समस्याओं की जड़ है जिन्हें लेकर इतनी छटपटाहट दिखाई दे रही है। तुम किसी व्याधि को उकसाओगे भी और उसी से चिंतित भी रहोगे दोनों एक साथ तो नहीं हो सकता। इस दहशत को जितनी बेशर्मी से तुमने उभारा है उतनी बेशर्मी से अंग्रेजों ने भी नहीं किया था, क्योंकि उनमें प्रशासनिक परिपक्वता थी। मैं उस दहशत की जड़ों की पड़ताल करते हुए उसे दूर करने का प्रयत्न कर रहा हूँ । कर पाऊँगा या नहीं यह नहीं जानता।“
“तुम्हें आरएसएस दूध की धुली संस्था लगती है।“
“यार दूध की धुली चीज़ में तो बदबू आने लगेगी, अपने को भी मत धोना दूध से। पानी ही काफी है। धोने पखारने की नही, उसकी सीमाओं और संभावनाओं को नए सिरे से समझने की कोशिश करो। तुम मेरी बात सुनोगे भी या नहीं, नहीं जानता, क्योंकि यह एक दुष्चक्र का, एक विशस सर्कल का रूप ले चुका है जिसमें कोई अवलेप से मुक्त नहीं है।”
“उससे सावधान रहने, डरने की कोई आवष्यकता नहीं।“
“मैं जानता हूँ तुम और ऐसे करोड़ों लोग उस अवस्था में हैं जिसे पुराने लोग वशीकरण और उच्चाटन मन्त्रों का प्रभाव कहते थे. ये किसी एक के विविध रूपों में निरंतर निंदा अथवा प्रशंसा से उत्पन्न अवस्थाएँ हैं जिनमे जो कण में लगातार भरा गया है और उसे ग्रहण करने की अनुकूल परिस्थितियां भर्त्सना, उपेक्षा, तिरस्कार अथवा अनुमोदन, प्रशंसा और पुरष्कार द्वारा तैयार की जाती हैं उनमे कुछ बातों को सुनना तक सम्भव नहीं हो पता, समझना तो दूर की बात है, वही कुछ को उस नाम से जुड़ जाने के कारण हम मुग्ध भाव से स्वीकार कर लेते हैं. मुग्ध का अर्थ मूर्ख होता है यह तो जानते हो न।”
“नहीं जानता हूँ तो तुम्हे देख कर जान लूँगा।” उसने चुटकी ली।
“नहीं जान पाओगे. मैं आईना दिखाता भर हूँ पर आईना तो हूँ नहीं।” मैंने कुछ चिंतित दीखते हुए कहा, ”तुम धुले हुए मस्तिष्क के आदमी जो ठहरे।”
वह इसे अपनी प्रशंसा मान कर प्रसन्न हो गया, पर जब आगे कहा, “तुम्हारी ब्रैनवॉशिंग पूरी हो चुकी है। हमारी शिक्षा-प्रणाली जिनके हाथों में रही है, उन्होंने लम्बे समय से यही किया है।” तो उसकी हालत देखने लायक हो गई।
मैंने विषय को मोड़ दिया, “मैं जब अपने बच्चों के पास अमेरिका में था तो फुर्सत रहती थी इसलिए टीवी भी देखता था। वहाँ कुछ शिक्षा के बड़े रोचक कार्यक्रम देखने को मिले। एक था डर और घृणा से लड़ने पर। जिन जानवरो, कीड़ों मकोड़ों से हम डरते हैं या देख कर ही भन्ना उठते हैं उनको वे छोटे बच्चों की हथेली पर ही रख देते थे। वे कुछ नहीं करते। इससे ही साहस पैदा होने पर तुमने कई बार हिंस्र जानवरों को या साँपों को भी पालने, उनको अपने शरीर पर रेंगने देने के घरेलू दृश्य देखे होंगे।
“हाँ देखे तो हैं। परन्तु क्या वहाँ जानवरों को पिजड़े में रखने पर रोक नहीं हैं?”
“नहीं, उस तरह की मूर्खतापूर्ण रोक नहीं है जिस तरह की रोक उनकी ही नक़ल पर जानवरों के प्रति क्रूरता की नकली समझ के कारण हमारे यहाँ लगा दी गयी। जीव-जंतुओं के प्रति जिज्ञासा बढ़ती, प्रेम बढ़ता है, और उनसे दूर रहने पर निष्ठुरता न भी आये, उदासीनता और असुरक्षा का भाव तो पैदा होता ही है। अन्य सामानों की तरह जानवर भी बिकते हैं। जब चाहो खरीद कर ला सकते हो। पर उसके बाद उनकी देखभाल में असावधानी बरती गई तो उसकी जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है। शिकायत मिलने पर सजा भी मिलेगी। निकट परिचय से भय दूर हो जाता है। अपरिचय एक तरह का अन्धकार है और जैसे अँधेरे से डर लगता है कि पता नहीं उसके भीतर कहाँ क्या छिपा बैठा हो, उसी तरह अपरिचय की स्थिति में लगता है कि अगला पता नहीं कब धोखा देदे और क्या कर बैठे।“
वह सहमत हुआ, “हाँ यह बात तो है”
मैंने अपनी बात जारी रखी, “हम शत्रु देशों से भी अच्छे सम्बन्ध बनाने के लिए लगातार उनके साथ बात करते हैं, उनके दृष्टिकोण को समझने का प्रयत्न करते हैं और वही काम हम अपने ही समाज के भीतर नहीं कर सकते इससे दुर्भाग्यपूण बात क्या हो सकती है।“
“बात तो अपनी जगह सही लगती है।“ उसने अनमने ढंग से हामी भरी.
मैंने उसकी खबर लेते हुए जड़ा, “और इस अस्पृश्यता के जनक तुम हो। तुम से मतलब वह शिक्षा प्रणाली जिसने वैचारिक असहिष्णुता और अस्पृश्यता को पैदा किया, बढ़ावा दिया और खुद ही रोना रो रही है कि वैचारिक असहिष्णुता बढ़ रही है और दोष दूसरों के मत्थे डाल रही है। ‘कर के खुद क़त्ल अब वह खुद हमीं से पूछते हैं, ये काम किसने किया है, ये काम किसका है?”
वह अपनी से बाज तो आ नहीं सकता, “तुमने ‘वी आर अवर नेशनहुड डिफाइन्ड’ पढी है।”
“तुमने अपनी आँखों से कुछ देखा है?
“मैंने जो पूछा उसका जवाब तो दिया नहीं।”
“मैंने अभी हाल ही में पढ़ी है। तुम उसे पढ़ नहीं सकते क्योंकि तुम्हे पढ़ने भी नहीं आता. तुम फ़िक़रे तलाशते हो जो रोड़े पत्थर की जगह ज़बानी जंग में काम आ सकें।”
वह उत्सुकता से देखने लगा तो अपने स्वर को कुछ संयत करते हुए कहा, “देखो कोई लिखित या कथित बात हवा में नहीं होती। उसका एक सन्दर्भ होता है। उसका अर्थ और प्रभाव उस सन्दर्भ से ही निर्धारित होता है। तुमने शब्दों को देखा होगा, सन्दर्भ का ध्यान न रखा होगा। यह पुस्तक १९३९ में लिखी गई थी। उस समय बहुत काम लोग थे जो होश हवास में बातीं कर रहे थे। यह सिलसिला बहुत पहले शुरू हो गया था. १९२1 में ही जब खिलाफत आंदोलन के बाद पुस्कार में, अंग्रज़ों की कूटनीतिक चातुरी से मोपला विद्रोह का नज़राना मिला था, जिसमे हिन्दुओं को इतने बड़े पैमाने पर मारा गया था की गांधी जी तक ने कहा था उन्हें भी मारना चाहिए था। जब १९२३ में उसी मुहम्मद अली ने जिन्हे गांधी जी ने मुसलामानों का नेता माना था, कांग्रेस के मंच से कहा था, एक गिरा से गिरा हुआ मुसलमान गांधी से अच्छा होता है। जब इक़बाल जैसा शायर कहा रहा था, “न सँभलोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तान वालो, तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दस्तानों में’, इतना ही नहीं, ऎसी खून खौलाने वाली पंक्तियाँ तक कि “मुहब्बत का जुनूँ बाक़ी नहीं है, मुसलामानों में खूँ बाक़ी नहीं है।’ जब चौधरी रहमत अली का पाकिस्तान का खाका मुस्लिम लीग के ज़हन में उतर आया था और उत्तर प्रदेश की पहली सरकार को मुस्लिम लीग के अड़ंगों के कारण भंग होना पड़ा था और मुस्लिम लीग दंगे भडकाने वाले मुहावरों में धमकियां देने लगी थी और यह ऐलान करने लगी थी कि हिन्दुओं के साथ मिलकर मुसलमान रह ही नही सकते और कम्युनिस्ट पार्टी के मुस्लिम नेता दबे सुर में लीग के मुहावरे अपनाने लगे थे और उन्हें साथ रखने के लिए दूसरे भी रंग बदलने लगे थे। इतिहास को इतिहास में जाकर समझा जाता है, वर्तमान में घसीट कर नहीं। मैं इनमे से किसी को दोष नहीं देता, परन्तु तुम से भी यह चाहता हूँ कि कोई बात पूरे सन्दर्भ को सामने रख कर समझो और आज जब मैं इस समस्या के हल के लिए आज के सन्दर्भ में सवाल खड़े कर रहा हूँ तो जड़बुद्धि की तरह १९३९ के सन्दर्भ को मत रखो। वर्तमान से इतिहास में तुम लोग भागते हो, क्योंकि तुम वर्तमान का सामना नही कर सकते. बहुत अनर्थ किये हैं तुमने। अब उनसे बाहर निकलने के रास्ते तलाशने में मदद करो।

Post – 2015-11-10

हम भी एक मोटी समझ रखते हैं

तुम अपने को मार्क्सवादी भी कहते हो और मार्क्सवादियों को ही अपना निशाना बनाते हो। तुम्हें विश्वासघाती माने या कुलघाती, चुनाव तुम पर छोड़ता हूँ। और कभी सोचा भी है कि हमारा साथ छोड कर एक ऐसी राजनीति का साथ दे रहे हो जो मार्क्सवाद विरोधी है सबसे अधिक गालियां मार्क्स को वे ही देते हैं. जातपांत को, कहो वर्णवाद को वही आगे बढ़ाते हैं. समाज को बांटने का काम उनका ही है, हम लोग तो समाज को जोड़ने का काम करते हैं और मुझे ही तुम्हारी उल्टी सीधी सुननी पड़ती है। गलत कह रहा हूं?”
“तुम गलत कह ही नहीं सकते। जिस दिन गलत कहने की हिम्मत जुटा लोगे उसी दिन आदमी की तरह बात करने लगोगे।“
“मैं आदमी की तरह बात नहीं कर रहा हूँ?”
“तुम माउथपीस की तरह बात कर रहे हो। जिसे तुम मार्क्सवाद विरोधी कह रहे हो वह तुम्हारी नहीं, उस मुस्लिम लीग का विरोध करता आया है, जिसकी प्रतिक्रिया में उसका जन्म हुआ था, और जिसका कार्यभार तुमने अपना लिया है।“
“तुम्हारे और उस संगठन के बीच कुछ गहरी समानताएँ हैं, यह तो जानते होगे?”
“हमारी उससे क्या समानता हो सकती है? हम तो उसे फूटी आँखों भी देखना नहीं चाहते।“
“गलत कह दिया। कहना चाहिए था कि हम तो अपनी आँख तक फोड़ सकते हैं कि उसे देखना न पड़े। गरज कि तुममें वह नफरत है जिसका आरोपण तुम उस पर करते हो। वे तुम्हारा विरोध करते हैं, तुमसे नफरत नहीं कर सकते, क्योंकि वे विचारो की भिन्नता और स्वतन्त्रता में विश्वास करते हैं तुम नहीं।“
“विचारों की स्वतन्त्रता ही पर तो उनका हमला है.
“विचारों की स्वतन्त्रता पर नहीं, गालियां देने की स्वतन्त्रता पर। हमला भो वे ज़बान से करते हैं कभी कभी वह तरीका भी अपना लेते हैं जो तुम हड़ताल के मौके पर काम में लाते रहे हो। ग़रज़ की इसे भी उन्होंने तुमसे सीखा।“
“और वह जो हत्याएं हुई हैं, जिन को लेकर माहौल गर्म है।“
“वे न उनके किसी सदस्य् द्वारा हुई हैं, न उनके शासित राज्य में।“
“किया तो किसी हिन्दू ने ही।“
“तो उसका विरोध भी तो हिन्दू ही कर रहे हैं। तुम हिन्दू नहीं हो क्या? विरोध करने से रोका क्या? देखो तुम किसी भी संगठन से जुड़े हिन्दू के अपकृत्य को उनके सर मढ़ रहे हो तो किसी भी संगठन से जुड़े हिन्दू के सुकृत के श्रेय से भी वंचित न करो और फर्क करना है तो होश हवास में रह कर करो। अपनी नफ़रत के कारन घालमेल मत करो।“
“विरोध का विरोध तो कर रहे हैं न?”
“विरोध का विरोध नहीं विरोध के तरीके का विरोध और वह भी तार्किक और न्यायोचित तरीके से। इस तरह का घालमेल वे नहीं करते, नफ़रत तुममे है तुम उसे फैलाते हो एक हिन्दू के किये के लिए उससे नफ़रत और फिर हिन्दू नाम जहां जहां दिखाई दिया उससे नफरत। वे ऐसा नही करते। ज़बान तक उनकी मीठी मिलेगी, किसी से अधिक शालीन, कड़वी है तो तुम्हारी. नफ़रत से भरी। तुम बिना गाली के बात ही नहीं करते. असहिष्णुता तुममे अधिक है।
“शिष्टाचार सीखना चाहो तो उनसे सीख सकते हो. वे कम पढ़े लिखे हैं. क़ायदे से अपना पक्ष नहीं रख पाते. तुम्हारे पास वाग्विदों की सेना है. तुम अपने गलत को भी सही साबित करते आये हो. पर सभ्य तुमसे अधिक वे हैं.”
“तुम्हे हो क्या गया है, यार?”
“मैंने कहा था न बौद्धिक का काम सताए हुए का पक्ष लेना है। मैं उनका पक्ष ले रहा हूँ. जवाब तुम्हे देना है। गालियां देने चलोगे तो वे तर्क से टकरा कर तुम्हारे ऊपर जा गिरेंगी. सत्य के पक्ष में हूँ इसलिए तुम्हारे वाग्विदों की पूरी फ़ौज़ को अकेले चुनौती देता हूँ। तर्क और प्रमाण के साथ आओ और मुझे गलत साबित करो। गलत साबित हो गया तो भी मेरी जीत होगी क्योंकि गलती समझ में आ जाएगी और सुधार कर लूँगा।”
“छोडो वह बात। तुम तैश में आगये हो। हाँ, समानता की क्या बात कर रहे थे तुम। वह बताओ।“
“तुम्हारी पार्टी का और उसका जन्म एक ही साल में हुआ था, 1925 में। एक ही ऐतिहासिक परिस्थिति से, एक ही विक्षोभ के भीतर से। दोनों में ऐसे लोग थे जो कांग्रेस से जुड़े रहे थे, इसलिए विदेशी शासन से मुक्ति चाहते थे और कुछ समय तक कांग्रेस के अधिवेशनों में भाग भी लेते रहे थे। दोनों ने कांग्रेस द्वारा तैयार की गई ज़मीन में अपनी अलग खेती शुरू की थी। दोनों जात-पांत विरोधी थे परन्तु देानों में सवर्ण ही लगातार हावी रहे।“
“नहीं, कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में ऐसा नहीं कह सकते।“
“मैं क्या कहूँगा। मेरे पास तो अध्ययन भी कम है, अक्ल भी कम। यह तो बाबा साहब ने अनुभव किया था।“
“बाबा साहब की वजह दूसरी थी। वह समझते थे कि दलित समाज की पेट की भूख उतनी ही प्रबल है जितनी आत्मा की भूख। उसे एक धर्मव्यवस्था चाहिए जिसमें वह इसकी पूर्ति कर सके। इसलिए उन्होंने सोच-विचार कर बौद्धमत को अपने अनुकूल पाया था। हमारे यहाँ ईश्वर के लिए जगह नहीं थी।“
“यह अर्धसत्य है। तुम्हारे संगठन में सभी नहीं तो लगभग-सभी कुलीन थे। दबे पिछड़ों को अपनी फ़ौज में भरती करना चाहते थे पर उनके साथ नहीं थे वर्ना बाबा साहेब को अपनी और लाने का प्रयत्न करते. समझाने का प्रयत्न करते की ऊंची जातियां ही नहीं उनका ईश्वर भी दलितों को दबा कर रखता है। नाम सर्वहारा का लो या अल्पहारा का, उनके सपने कुलीनतान्त्रिक थे। जीवनशैली अभिजनवादी थी। उनके निजी जीवन और सार्वजनिक चेहरे में सीधा विरोध था। कभी मौका मिले तो पढ़ना ध्यान से राज थापर की वह किताब। धुन्ध छँट जाएगी।“
वह हँसने लगा, “तुम समझते हो मैंने पढ़ा नहीं है।“
“पढ़ा तो हजम नहीं कर सके। उसकी किसी ने आलोचना भी नहीं की। रास नहीं आती थी तो उसे भूल भी गए। ऐसा न होता तो तुम भी मान लेते कि तुम्हारी पार्टी के खाने के दाँत और थे, दिखाने के दाँत और ।“
“तुम डिस्टार्ट कर रहे हो।“
“इसीलिए तो कह रहा हूँ कि जिस किताब को तुम भी पढ़ चुके हो, उसकी ही एक इबारत को देखो तो सहीः
I understood little of it myself moving naturally and effortlessly, almost sleepwalking, towards the communists, who were as much part of the social elite of Bombay at the time as anyone else. P. 6.
“आरएसएस मोटे तौर पर बाहर भीतर एक समान थी और इसलिए अधिक अरक्षित।“
“अरक्षित। तुम यह क्यों भूल जाते हो कि ब्रितानी शासन में उस पर कभी कोई रोक-टोक नहीं लगी जब कि हमारे संगठन को भूमिगत रहना पड़ता था।“
“वह इसलिए कि वे शान्तिप्रेमी थे, तुम उपद्रवी। उनकी जड़ें भारत में थीं, तुम्हारी बाहर। वे अपनी समझ से काम कर रहे थे। तुम दूसरों के सिखाने पर। सच तो यह है कि कम्युनिस्ट पार्टी के पीछे भी ब्रितानी बुद्धि ही काम कर रही थी। वहाँ जो भी पढ़ने जाता वह मुसलमान हुआ तो कट्टर लीगी बन कर आता था और हिन्दू हुआ तो कच्चा पक्का कम्युनिस्ट।
“हाँ, तो समानता की बात तो रही गई। दोनों को बहुत अनुशासित दल माना जाता रहा है जिसका अर्थ है दोनों से जुड़ने वाले सोचना बन्द कर देते हैं और फैसला मानने की आदत डाल लेते हैं। उनकी स्वतन्त्रता उसी सीमा तक रहती है जिस सीमा तक सिखाए को भूल जाने के कारण उसे दुहराते समय अपनी इबारतें गढ़ने को लाचार होते हैं।
“परन्तु दोनों में जो सबसे बड़ा अन्तर है वह यह कि वे खंडित मानवता की बात करते हैं और तुम महामानवता के सपने दिखाते हो इसलिए हमारे सर्वोत्तम प्रतिभा सम्पन्न तरुण तुम्हारी ओर आकर्षित होते रहे हैं, जब कि उनके साथ मोटी समझ के लोगों का समूह था। वे गूंगे थे तुम वाचाल।
“परन्तु देश का जितना अहित तुमने किया है उसका शतांश भी उन्होंने नहीं किया होगा।

Post – 2015-11-09

कहीं नहीं हैं कहीं भी नहीं लहू के निशान

भई मैं तो यह देख कर दंग रह जाता हूँ कि मोदी को बचाने के लिए तुम सारा इल्जाम अपने माथे पर ले लेते हो, ऐसी वफादारी तो गुलामों में ही देखी जाती है।
मैं हँसने लगा,”मैंने कहा था न कितनी भी कोशिश करूँ, कोई नतीजा नहीं निकलना। यहाँ तक कि गालियों की भाषा में बात करने की आदत भी नहीं छुड़ा सकता।
यह बताओ, दंगे भड़काएँगे राजनीति करने वाले, भड़काने वाली भाषा में बात करेंगे राजनीति करने वाले और समाज में बढ़ती असहिष्णुता की जिम्मेदारी होगी साहित्यकारों और चिन्तकों की। इससे बेतुकी बात क्या हो सकती है?
दंगे भड़काने वाले शिक्षित हैं या अशिक्षित/”
“कहने को तो हैं शिक्षित ही।”
“कहने भर को शिक्षित रंगरूट निकालने वाली शिक्षा प्रणाली ने अपना काम सही किया?”
वह थोड़ा चकराया।
“यह उसी छात्र राजनीति का नतीजा है जिसमे छात्र अपना काम, अर्थात अध्ययन छोड़ कर राजनीति करते हैं। तुम कहते हो संसदीय प्रणाली के प्रशिक्षण के लिए छात्र राजनीति जरूरी है, और उस राजनीति के कारण वे बाहर निकल कर न संसद में संसदीय भाषा का प्रयोग करते हैं न बाहर शिष्ट व्यवहार। तुम स्वयं राजनीति करते हो और अपने छात्रों के भविष्य को विकृत करते हुए अपना काडर तैयार करते हो। इसमें पहली कमी बौद्धिक वर्ग के कारण आई है, शिक्षा प्रणाली को आन्दोलन-प्रणाली में बदलने से आई है या नहीं। उसी का उपयोग राजनीतिक करते हैं जो सदा से सत्ता के लिए हिंसा, झूठ, फरेब, चुगलखोरी का सहारा लेते हैं। हम अपने काम की जिम्मेदारी लें और अपनी जमीन पर खड़े हो कर अपनी लड़ाई लड़ें तो इस विकृति से बचा जा सकता है या नहीं? देखो, हमारा मोर्चा अधिक निर्णायक है, राजनीतिक भविष्य का निर्णय भी वही करता है।”
“ये जो अमुक स्वामी और अमुक साध्वी जहरीली बातें करती हैं वह हमने सिखाई हैं?”
“वे राजनीतिक भी नहीं हैं, समाज के सबसे गैर ज़िम्मेदार लोग हैं यह मैं दो दशक पहले बता चुका हूँ और इसके लिए भाजपा को चेतावनी भी दे चुका हूँ. वे न जीना जानते हैं, न अपना घर सम्भालना जानते हैं, न बोलना जानते हैं न सीधी राह चलना जानते हैं. मोदी ने उन्हें सिरे से किनारे दरकिनार किया है इसलिए बौखलाए ऊटपटांग बकते हैं. उन्हें दरकिनार किया जा सकता हैं पर तुम्हें?
“जहर तो तुमने उससे अधिक बोए हैं, पर इसका तुम्हें पता ही नहीं। उनके विषय में मैंने कुछ पंक्तियाँ तुम्हें पढ़ने को दी थीं। तुमने पढ़ा भी था पर भूल गए। आक्टोपस वाली उपमा तुम्हें याद है, न हो तो 17 अक्तूबर को उसे फेसबुक पर भी डाल दिया था। पृ.212 के अन्तिम पैराग्राफ को फिर से पढ़ो तो समझ में आ जाएगा कि बौद्धिक राजनीतिक से बहुत आगे तक देखता है। राजनीतिक उसके पीछे चले तो उसे लाभ होगा और साहित्यकार का गौरव भी बढ़ेगा। यही बात प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन में प्रेमचन्द ने अपने भाषण में कही थी, परन्तु तुम्हारी समझ उल्टी थी। वह लेखक को राजनीतिक के पीछे हाँकता रहा। परिणाम, साहित्य न समाज के काम का रहा, न चेतना के विकास में सहायक हो सका, न ही राजनीति को मदद पहुँचा सका, जो इसके वश का भी नहीं था। उल्टे प्रगतिषीलता की ऐसी विकृत समझ को बढ़ावा देता रहा जिससे जनभावना को ठेस पहुँचती रही। हम कभी इस दुर्भाग्यपूर्ण मोड़ पर चर्चा करेंगे जब कम्युनिस्ट पार्टी मुस्लिम लीग का मुखौटा बन गई और इसकी गतिविधियाँ मुस्लिम लीग की योजनाओं के अनुसार चलती रहीं और उसे इसका पता ही न चला। वास्तव में कम्युनिस्ट पार्टी का अन्त तो उसी समय हो गया था जब उसने मुस्लिम लीग से हाथ मिलाया और यह हाथ लगातार पर्दे के पीछे मिला ही रहा।“
“तुम कहाँ से इतनी वाहियात बातें ढूँढ़ लाते हो भाई।“
“मेरी जानकारी बहुत कम है, परन्तु इस बात को तो लगभग सभी कम्युनिस्ट जानते हैं कि उन्होंने धर्म के आधार पर राष्ट्रीयता की अवधारणा का समर्थन किया था और विभाजन के सवाल पर जनमतसंग्रह के समर्थक थे। यदि तुम्हें नहीं पता तो मैं एक कम्युनिस्ट कार्ड होल्डर राज थापर की कष्टकथा की कुछ पंक्तियों की ओर ध्यान दिला सकता हूँ:
Sleeping, walking, dreaming, I was tormented by the precipitous edge that Jinnah had brought to the country to. And when Mohan, communist and dedicated, produced a string of defences for the term, day in and day out, I found myself wanting to throw things at him and everyone else for not being able to see that self determination could not be based on religion; culture and religion were not synonymous terms….
… And of all people, Mohan, who then I though had devoured all the basic writings of Marxism, how could he hold, support and supply Jinnah with intellectual arguments he so urgently needed?
Raj Thapar: All These Years: A Memoir, Penguin Books, 1991, p. 8
“प्यारे भाई यह भूल तो तुम्हारी पार्टी मान भी चुकी है पर भूलें मान कर भूलें करते जाना जुम्हारी अदा में शामिल है।“
“मुहावरा है नाम में क्या रखा है। पर नाम में बहुत कुछ रखा है। सारे गोरखधन्धे अच्छे और पवित्र नामों की आड़ में ही किए जाते हैं। नाम है कम्युनिस्ट पार्टी, कार्यभार है मुस्लिम लीग का। मुस्लिम लीग तभी तक जिन्दा रह सकती है जब तब उसकी प्रतिरोधी कोई हिन्दू पार्टी हो। इसलिए हिन्दू साम्प्रदायिकता को साम्प्रदायिकता विरोध के नाम पर उत्तेजित करते रहना तुम्हारी जरूरत है और सांप्रदायिक तनाव और असहिष्णुता को बढाने में तुम्हारी भूमिका सबसे अधिक है। धर्मनिरपेक्षता मुस्लिम साम्प्रदायिकता का दूसरा नाम है जैसे खुराफातियों के कई उपनाम होते हैं उसी तरह। वर्ना आरएसएस तो कभी का किनारे लग गया होता। उसे नया जीवन तुम्हारी असहिष्णुता ने दिया है। उत्तेजना भड़काने का जितना सुनियोजित और सिलसिलेवार काम तुमने किया है वैसा तो किसी ने किया ही नहीं।
11/8/2015 10:41:09 PM

Post – 2015-11-08

लेखक का दायित्व

“मैं कल उस व्यक्ति की या कहो उन व्यक्तियों को लेकर कयास भिड़ाता रहा जिनका नाम लिए बिना तुमने इशारे किए थे। तुम्हारी कथा का खलनायक अमुक तो नहीं?” उसने उसका नाम लेते हुए पूछा।
मैंने हँसते हुए जवाद दिया, नाम में क्या रखा है। मेरा लक्ष्य उसको आहत करना नहीं अपितु उन पहलुओं को रखना था, जिनसे घृणा की मनोव्याधि को समझा जा सके। परन्तु जिसे तुम खलनायक कह रहे हो, वह खलनायक नहीं एक मनोरोगी है। रोगी से सहानुभूति जताई जा सकती है उसकी व्यथा को बढ़ाया नहीं जा सकता। अपने को अपनी हैसियत से बड़ा दिखाने और बनने की आतुरता के कारण उसके व्यवहार में एक विकृति आ गई और इसके कारण उसका कई लोगों से झगड़ा हुआ, लोगों ने काफी हाउस की उस साप्ताहिक मिलन गोष्ठी से किनारा कसना शुरू कर दिया और अन्ततः आना बन्द कर दिया और फिर तो उसे भी आना बन्द करना ही था। बड़ा लेखक बनने और अपना सारा समय लेखन में लगाने के लिए उसने एक अच्छे खासे पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी और हस्र यह कि इस कुंठा में उसने आगे लिखना भी छोड़ दिया। यदि उस शनिवारी गोष्ठी को एक संस्था मानो तो एक व्यक्ति की अनपेक्षित महत्वाकांक्षा ने उस संस्था को नष्ट कर दिया। साथ ही उस पारिवारिकता को भी क्षति पहुँचाई जो लेखकों के बीच बनी हुई थी। इसलिए जब मैं कह रहा था कि अपनी यशलिप्सा की भूख में ये उस संस्था को ही नष्ट करने पर उतारू हैं तो मेरी नजर में वह गोष्ठी भी थी। मुझे लगता था कि वे ऐसा बिना सोचे समझे कर रहे हैं, पर कुछ विलम्ब से समझ में आया कि उनके पीछे दूसरी शक्तियाँ हैं और ये उनके इशारे पर काम कर रहे हैं तो क्षोभ भी हुआ। इनमें कोई ऐसा नहीं है जो सोच समझ कर देश में अराजकता फैलाना चाहे । चाह ही नहीं सकते, परन्तु जो कर रहे हैं वह सफल हो तो अराजकता ही फैलेगी। इसका भी बोध नहीं है। बौद्धिक स्तर यह है कि अपनी करनी के परिणामों तक का पता नहीं और लालसा यह कि सभी उनके बताए मार्ग पर चलें । इसकी विफलता से इनको जितनी ग्लानि होगी उसकी भी वे कल्पना नहीं कर सकते। यह होगी मोदी की उपेक्षा और चुप्पी के कारण और लम्बी कवायद के बाद इनकी थकान के कारण। इसीलिए ये मोदी की चुप्पी से डरते हैं, उसी को बार बार तोड़ने की चुनौती देते हैं।“
“देखो चुप्पी-उप्पी की बात न करो। कह तो वे भी सकते हैं कि हमारे सवालों का जवाब मोदी के पास नहीं है इसलिए उनकी बोलती बन्द है।“
“वे हौवा खड़ा कर सकते हैं, परन्तु कह नहीं सकते। अभी दो दिन पहले ही तो तुमने माना था कि उन्होंने कहा कुछ नहीं, आन्दोलन खड़ा कर दिया, आन्दोलन को उचित ठहराने के लिए जो मांगें रखीं वे भी पूरी हो गईं तो आन्दोलन का विस्तार कर दिया, परन्तु नई माँग क्या है यह बताया नहीं । क्या तुम नहीं मानते कि शोर मचा कर भी कुछ कहा नहीं जा सकता है, चुप रह कर भी बहुत कुछ कहा जा सकता है।
“तुम हाहाकार मचाते हो तो सौ डेढ़ सौ की ही भीड़ जुटा पाते हो, डंका बजाते हो कि अब हमारी संख्या इतनी हो गई। यह तक नहीं सोचते कि सवा अरब की जनसंख्या वाले देश में, इतनी प्रचंड समस्या पर, कितने कम लोग तुम्हारे साथ हैं। आम लोग साथ होते तो यह संख्या इतनी नगण्य न होती। तुम सैकड़ों से सन्तुष्ट हो, जब कि इसे कई करोड़ तक जाना चाहिए था। कांग्रेस को जिस बेरहमी से जनता ने नकारा था, क्या उसने तुम्हें उससे भी अधिक निष्ठुरता से हाशिए पर डाल दिया, क्योंकि तुम कभी उसके हुए ही नहीं। उसके लिए कुछ लिखा ही नहीं। तुम अपने लिए (आत्माभिव्यक्ति के नाम पर), गैरजिम्मेदारी से (लेखकीय स्वतन्त्रता के नाम पर) लिखते रहे और अपने मुखौटों की परिधि तक सिमटे रह गए। कुछ हजार या लाख के बीच। करोड़ तक भी नहीं पहुंच पाए। लिखा समाज को यह बताते हुए कि यह आपका, आपके लिए, आपके हिरावल दस्ते द्वारा लिखा साहित्य है और लिखते रहे अन्तर्राष्ट्रीय बाजार की अपेक्षाओं को ध्यान में रख कर विष्वविख्यात होने की ललक में अपनी ही साहित्य परंपरा, समाज और मूल्य दृष्टि से मुँह फेर कर। तुम्हें तो यह भी पता नहीं कि हमारा समाज क्या है, तुम्हारा अपना काम क्या है।“
“यदि पता नही, तो तुम्हीं बतादो।“
“लेखक का काम लिखना है। उसका हथियार कलम है, भाषा है। उसे जो करना है अपने हथियार से करना है। उसका काम है अपने कार्यक्षेत्र की सीमारेखा को पहचानना। लेखक का काम है चालू राजनीति से अगल रहना। अपनी स्वायत्तता और सम्मान की रक्षा करना। परन्तु सबसे जरूरी काम है अपने समाज को समझना और उसका विश्वास अर्जित करना।“
“लेखक राजनीति से दूर रहे, राजनीतिक समस्याओं से दूर रहे, छात्र राजनीति से दूर रहे, वह धर्मग्रन्थ पढ़े, यह कहना चाहते हो। पता है इसके बाद लेखक क्या बन जाएगा?”
“क्या बन जाएगा?”
अजागलस्तन, बकरी के गले की चूँची। और तुम राजनीति से दूर रहने की बात कैसे कर सकते हो। हर तीसरे वाक्य पर तो तुम्हें मोदी दिखाई देने लगता है?“
तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा है इसलिए कोई बात समझ ही नहीं पाते। राजनीतिक औजार और राजनीतिक समझ में अन्तर होता है। राजनीति पढ़ना, उसकी व्याख्या करना, अपने विवेचन में किसी को सही या गलत ठहराना, राजनीति नहीं बौद्धिक दायित्व है। और मोदी मेरे लिए एक पृष्ठभूमि है जिसमें ही आज की समस्याओं पर अपने समाज से अपने विचार बाँट सकता हूँ। यह नाम तो आगे भी आता रहेगा। हां वह जो धर्मशास्त्र पढने पढाने की बात कर रहे थे, उससे भी डरने की जरूरत नहीं। हमारे जैसे देश में तो धर्मशास्त्र एक विषय भी हो सकता है जिसमें सभी धर्मों-ग्रन्थों से परिचित कराया जा सके। धर्मग्रन्थ पढ़ने से धार्मिकता बढ़े यह जरूरी नहीं पर कट्टरता अवश्य कम हो सकती है। कट्टर लोग अपना धर्मग्रन्थ तक नहीं जानते, अपने साहित्य तक से परिचित नहीं होते। मैं यह काम किसी जुलूस में शामिल हो कर नहीं कर रहा हूँ, कलम से ही कर रहा हूँ।
“जैसे मैं अकेला मार्क्सवादी हूँ और दूसरों को भाववादी या अवसरवादी कम्युनिस्ट मानता हूँ, उसी तरह मैं अकेला ऐसा लेखक हूँ जो अपने समाज को समझना, उस तक पहुँचना चाहता है और पहुँचने के रास्ते निकालने के प्रयत्न में है, दूसरे सभी समाज से कटे और पश्चिमी समाज को अपने समाज पर आरोपित करके उसकी झिल्ली से समाज को देखना और समझना चाहते हैं इसलिए जो अपने को यथार्थवादी लेखक मानते हैं उन्हें भी भाववादी कलाबाज मानता हूँ।“
“मैं समझा नहीं अपने समाज को समझने से तुम्हारा मतलब क्या है?”
अपने समाज को समझने का पहला कदम है यह समझना कि समाज के अशिक्षित लोगों के पास भी अपना दिमाग होता है और वे उसी के काम लेते हैं। उनको बेवकूफ समझना और अपने को इतना चालाक समझना कि यहाँ-वहाँ की तमाम बातों का घालमेल करके उनके दिमाग में उतारा जा सकता है, परले दर्जे की मूर्खता है। समाज मिलावट से परहेज करता है।“
“चलो, और दूसरा?”
दूसरा यह कि हमारा समाज अपने देश में रहता है जिसकी अपनी कलादृष्टि, अपनी कला परंपरा, अपना इतिहास, अपना पुराण रहा है और वह जैसे अपनी जमीन से जुड़ा होता है वैसे ही इनसे भी जुड़ा होता है। इनको समझे बिना उसकी मनोरचना तक को नहीं समझा जा सकता जिस तक अपनी बात पहुँचानी है।“
“और कुछ?”
“बौद्धिक का काम है अपनी भूमिका को पहचानना।“
“भूमिका मतलब?”
“बौद्धिक की दो भूमिकाएँ हैं। एक रम्य और बोधगम्य शैली में समाजशिक्षा जिसे कान्तासम्मित उपदेश कहा गया है और दूसरा जो भी उसी से जुड़ा है, चिकित्सक की भूमिका। इन दोनों के माध्यम से ही वह लोकमंगल कर सकता है।“
“यदि समाज में असहिष्णुता का विस्तार हुआ है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार ने अपना काम नहीं किया। इसका अर्थ है, साहित्यकारों और कलाकारों ने लम्बे समय से अपना काम किया ही नहीं। यह जो तुम शोर मचाते हो कि अमुक की हत्या हो गई अमुक को धमकी दी गई अमुक के आयोजन में विघ्न डाला गया, उसके लिए तुम जिम्मेदार हो। सरकार नहीं। तुम खुद अपने निकम्मेपन को सरकारों पर डाल रहे हो और वह भी उस सरकार पर जो वहाँ है ही नहीं । ये जितनी हत्याये हुई हैं उनके लिए हम सभी जिम्मेदार हैं क्योंकि हम यह तक नहीं जानते कि अपने समाज से बात किस भाषा में और किस शैली में किन मर्यादाओं में रह कर की जाती है जिससे उसका ज्ञान बढ़े, वह सीखे, उत्तेजित न हो। उत्तेजना तुम फैलाओ और असहिष्णुता के विस्तार की जिम्मेदारी सरकार पर डाल दो यह ठीक नहीं। सरकार का काम अघटनीय के घटित हो जाने के बाद आता है और यदि वह उसमें शिथिल दीखे तभी उसको उसके लिए जिम्मेदार माना जा सकता है।
11/8/2015 11:51:39 AM

Post – 2015-11-07

घृणा की जड़ें

“तुम्हे जिस व्यक्ति में गुण ही गुण दिखाई देते हैं, उससे बहुत सारे लोग घृणा करते हैं, यह तो तुम भी मानते हो. फिर कुछ तो ऐसी बुराइयां होगी जिनके कारण घृणा करते हैं, तुम उसकी तारीफ करते हुए उन दुर्गुणो को क्यो भूल जाते हो। उनको सामने रख कर मूल्यांकन होना चाहिए न?”
“मूल्यांकन के लिए गुण-दोष विचार तो जरूरी है ही, परन्तु यह समझ भी जरूरी है कि गुण-दोष होता क्या है।“
“मतलब?”
“मतलब गुण-दोष सभी कालों और सभी समाजों में एक ही नहीं होते, ये समाज-सापेक्ष्य होते हैं. यही स्थिति सभी सामाजिक आदर्शों और मूल्यों की है. अब यदि हम इन सबकी समीक्षा में जाएं तो विषयान्तर होगा, परन्तु यह समझो कि कुछ सभ्यताओं में रक्त की शुद्धता का इतना प्रबल आग्रह था कि रक्तदोष से बचने के लिए वे सगी बहन से विवाह को उचित मानते थे। जैसे मिस्र के राजा लोग। फिर उसके कुछ दोष प्रतिरोध क्षमता में ह्रास आदि के रूप में प्रकट हुए तो इसमें कुछ सुधार कर के दूधबराव करते हुए अपनी बहनों से विवाह को अधिक अच्छा माना जाता रहा। मुस्लिम समाज ने इसे अपनाया परन्तु इसका धर्म से कोई संबन्ध नहीं है। श्रीलंका में और दक्षिण भारत में भी यह प्रचलित था. इसके प्रभाव से दक्षिण गए ब्राह्मणों ने समायोजन करते हुए अन्य प्राचीन विधान रखते हुए इतनी रियायत की कि ममेरी बहन से विवाह को श्रेयस्कर मानने लगे. दक्षिणभारतीय शास्त्रकारों के विधान में इसे स्वीकृति मिली तो अब विरल मामलों में उत्तर भारत में भी प्रचलित हुआ। ये सभी चाहें तो दूसरों में प्रचलित पद्धति को निन्दनीय मान सकते हैं. कबीर की वह उक्ति तो तुम्हें याद होगी ‘मुसलमान के पीर औलिया मुर्गा मुर्गी खाई, खाला केरी बेटी ब्याहैं घरहि में करें सगाई’. तो यहां निजी खान पान और विवाह की रीति को ही निन्दनीय ठकराया गया है. सामाजिक तालमेल में कमी हो तो इसी को सामाजिक घृणा में बदला जा सकता और उस समाज को गर्हित सिद्ध किया जा सकता है, जिसकी सामाजिक रीतियां तुम्हारी अपनी रीतियों से भिन्न पड़ती हों।
“तो पहली बात तो यह कि घृणा के लिए किसी व्यक्ति या समाज में किसी दोष का होना जरूरी नहीं, यहाँ तक कि उसके किसी गुण या श्रेष्ठता से चिढ़ घृणा का रूप ले सकती है और इसको बढ़ने दिया जाय तो यह हत्या और रक्तपात का रूप ले सकता है।“
“क्या बकते हो!”
“ऐसे किस्से तो तुमने सुने ही होंगे जिसमें एक छात्र अपने ही दोस्त की जान इसलिए ले बैठा क्योंकि वह अधिक मेधावी था या उसके रहते वह औवल नहीं आ सकता था।

मैं अपना व्यक्तिगत अनुभव सुनाता हूं । मेरा एक मित्र है जिसने दो तीन अच्छे उपन्यास लिखे हैं। वह मुझसे घृणा करता है मेरा जिक्र आए तो चुगली शुरू कर देगा. मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि धृणा मेरी समझ से हमारी आत्मिक सड़ाध से पैदा होती है। यह एक तरह का घाव है जो हमारे भीतर रिस रहा है और इसका मवाद जुगुप्सा और भाव या निन्दागान के रूप में बह कर बाहर निकल रहा है यह हमें ही गर्हित बना देता है परन्तु मवाद के बाहर निकलने के बाद जैसे थोड़ी राहत मिलती है उसी तरह की राहत निन्दकों को मिलती है मुझे उनपर क्रोध नहीं तरस आता है परन्तु मेरे प्रयत्न से वह घाव भरेगा नहीं और विषाक्त होगा।“
“तुम कोई दृष्टान्त देने जा रहे थे और लगे सिद्धान्त बघारने.”
“इस कहानी में कई पात्र हैं और उनकी बड़ी रोचक प्रतिक्रियाएं हैं. विष्णु प्रभाकर जी दिल्ली की हिन्दी अकादमी और साहित्य अकादमी दोनों में निर्णायक पोजीशन में थे। मैं आज तक उन पदों का नाम नहीं जानता कि उसे क्या कहा जाता है. दो मित्र साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए प्रयत्नशील, वे प्रयत्नपूर्वक प्रभाकर जी के आजू बाजू बैठते. एक संयत और शालीन परन्तु दूसरा मुखर ही नहीं अतिमुखर। विष्णु जी को आलोचकों में नामवर जी और कहानीकारों में राजेन्द्र यादबव से गहरी शिकायत थी कि इनके कारण उनको वह स्वीकृति नहीं मिली जिसके वह अधिकारी थे। यह एक पीड़ा थी जो जब तब आह की तरह उभर आती थी.
अतिमुखर प्रतिसपर्धी इन दोनों का किसी न किसी बहाने प्रसंग लाकर उनका नाम लेकर गालियाँ दिया करता था। विष्णु जी उससे अति प्रसन्न। मैं शनीचरी विजिटर था। जिस साल उसका प्रयत्न जोरों पर था उस साल दुर्भाग्य से हड़प्पा सम्यता और वैदिक साहित्य की चर्चा थी। अपनी अतृप्त यशलिप्सा के अतिरिक्त विष्णु जी में अनेक दुर्लभ गुण थे और मैं आवारा मसीहा के लेखक के रूप में उनका बहुत आदर करता था परन्तु उनके साहित्य अकादमियों से जुड़े होने के कारण मैं उन्हें अपनी पुस्तक उपहार स्वरूप भी नहीं देता था और उसी मेज पर बैठे हुए भी निर्णायक दूरी बनाए रखता था। रहबर जी से पता चला कि मेरी पुस्तक पुरस्कृत होने वाली थी और उसे विष्णु जी ने वीटो का प्रयोग करके रोक दिया और इसे दूसरे नम्बर की पुस्तक को दिया गया। सूचना मेरे लिए आश्चर्यजनक थी क्योंकि मुझे यह विश्वास ही न था कि वह कहीं प्रतिस्पर्धा तक में है। रहबर जी ने यह बात विष्णु जी से किसी कुढ़न के कारण तो नहीं कही इसलिए मैंने एक मित्र के साथ एकान्त में विष्णु जी से पूछा तो उन्होंने बताया कि बात सही है। मैंने मजा लेते हुए कहा, पहले मध्येशिया के इतिहास पर राहुल जी को और संस्कृति के चार अध्याय पर दिनकर जी को तो मिला था। उन्होंने कहा, मेरे रहते ऐसा नहीं होगा। मेरे संबन्ध न पहले निकटता के थे न इसके बाद दूरी के हुए, क्योंकि पुरस्कार को मैं महत्व देता ही नहीं। आगया तो ले भी लिया। उसके लिए किसी तरह का प्रयत्न या उसके न मिलने पर खिन्नता मुझे अपमानजनक अवश्य लगती रही।
हम सभी एक ही झुंड में बैठते थे चाहे मेजें दो तीन सटानी पड़ें। जिस व्यक्ति की बात कर रहा हूं वह पहले मेरे साथ बड़ी शिष्टता और शालीनता से पेश आता था। इसके बाद उस व्यक्ति के व्यवहार में एकाएक नाटकीय परिवर्तन हुआ. वह मुझे आते देख कर उपहास भरे स्वर में साथ बैठे मित्रों को मेरी ओर इंगित करता हँस कर कहता लो हड़प्पा से सीधे चले आ रहे हैं। उसकी ओर से उपहास का यह वाक्य मुझे विनोद वाक्य प्रतीत होता और मैं हँसता हुआ पास पहुँच कर सबसे हाथ मिलाता और बैठ जाता। कई बार के प्रयत्न के बाद जब उसे लगा कि मुझ पर उसकी कटूक्ति का कोई असर ही नहीं हो रहा है,
एक दिन अकारण, मेरी ओर मुड़ कर कुछ गरूर के साथ बोला, मेरी किताबें आप के सारे लेखन से भारी ही पड़ेगी। यह स्वर भी मुझे बुरा लगा और बिना किस प्रसंग के यह तुलना भी। मैंने हँसते हुए ही उत्तर दिया, देखो इसमें तो सन्देह ही नहीं तुम्हारा लेखन भारी पड़ेगा, नीचे दब जायेगा, पलड़ा तो हमारा ही उूपर रहेगा न। इस बात का मलाल रहा कि क्या इस पर केवल हँस कर नहीं रहा जा सकता था।
कुछ कहना मुझे छोटापन लगा।
इस समस्या के एक और आसंग की ओर तुम्हारा ध्यान दिला दूँ। एक दूसरे मित्र साथ बैठे काफी पी रहे थे. वह विष्णु जी को गालियाँ देने लगे। मैंने मना किया तो भंड़ककर और गालियाँ । कारण व्यक्तिगत न था, वह किसी विभाग में हिन्दी निदेशक के पद पर थे और एक दो बार विष्णु जी शिकायत कर चुके थे कि अरे भाई हमें तो आपके यहां कभी बुलाया ही नहीं जाता। वह सलाहकार समितियों में उपस्थिति चाहते थे . परन्तु यहां वह कारण भी न था। पुरस्कार की प्रतिस्पर्धा में कभी रहे नहीं। विष्णु जी अपनी प्रशंसा में पिछली घटनाएँ सुनाते रहते थे, यह बात बुरी लगती थी। इसका विरोध आमने सामने रह कर वह नही कर पाते थे इसलिए उनकी खिन्नता उग्र रूप लेकर बाहर निकल रही थी और गालियों का रूप ले ले रही थी।
उनकी गालियों का दौर पूरा हो गया तो मैंने कहा, हम सभी लिखते पढ़ते हैं। बिरादरी कहो या परिवार यही तो है अपना। मान लो इस परिवार के बूढ़े को अपनी कामना के अनुसार महत्व न मिलने की टीस बनी रह गई हो और वह ऐसी चीजों में रस लेने लगा हो, मान लो वह हमारा पिता या दादा हो, तो क्या हम उसे गालियाँ देंगे? इस पहलू की ओर ध्यान जाने पर वही आवेग ग्लानि में बदल गया। अब जो उनका नया व्यवहार प्रभाकर जी के साथ आरंभ हुआ तो विष्णुप्रभाकर उनके इतने मुरीद कि उन्होंने अपने खर्चे से एक आयोजन करके उनका जन्मदिन मनाया। स्वयं विष्णाु जी ने एक सात्विक जीवन जिया था और अपने को उच्च आदर्शों के अनुसार ढालते हुए आन के साथ जिन्दगी बिताई थी इसे तो कोई इन्कार कर ही नहीं सकता।
“तुम मुझे बोर क्यों कर रहे थे।“
“इसके बिना तुम्हारे सवाल का जवाब पूरा हो नहीं सकता था। देखो तो ये सभी बहुत अच्छे लोग हैं। परफेक्ट नहीं हैं, न कोई होता है। लेखक भी अच्छे आदमी भी अच्छे. उस मुंहजोर को भी बुरा कोई न कहेगा यद्यपि उसकी इस लत के कारण कई लोगों से उसके झगड़े हुए, एक बार पिटा भी और इस विफलता के बाद उसने रचनात्मक लेखन सदा के लिए छोड़ दिया। इस परिदृश्य में आकांक्षा, प्रयत्न, विफलता, ईष्या, अहंकार, हृदय परिवर्तन के सारे नमूने मिल जायेंगे और घृणा के दुष्परिणाम भी घृणा करने वाले को ही भोगने पड़ते हैं, इसका नमूना भी।
जरूरी नहीं कि जिससे घृणा किया जाता हो, दोष उसमें ही हो। वह निर्दोष ही होता है, यह भी नहीं।
11/7/2015 5:39:44 PM

Post – 2015-11-06

“आखिर तुम चाहते क्या हो?
“तुम सच जानना चाहते हो कि मैं क्या चाहता हूँ?”
“इसीलिये तो पूछ रहा हूँ वर्ना पूछता क्यों?”
“बता दूँ और तुम इस बात के क़ायल भी हो जाओ तो उसका पालन कर पाओगे?”
“पहले जवाब तो दो.”
“खैर मैं चाहता हूँ हम लोग अपना काम करें. दूसरों को अपना काम करने दें. इसे तुम इस तरह भी समझ सकते हो कि दूसरे अपना काम हमसे अच्छी तरह जानते हैं. उनका काम हम अपने हाथ में ले लें तो उनके काम में बाधा डालेंगे. हमारे पास न वह दक्षता है न साधन जो उन कामों के लिए ज़रूरी है. इसलिए हम उस काम को भोंडे ढंग से करेंगे. इससे देश और समाज को और अंततः हमें भी, क्षति पहुंचेगी.”
“तुम फिर गोलमटोल बातें करने लगे.”
“देखो हमारे देश शासन जिस तरह से चलता आया है उसमें जो सबसे बड़ी और गोचर गिरावट है वह यह कि लोग अपना काम नहीं करते. दूसरों का काम करने को झट तैयार हो जाते हैं, इससे उनके के अधिकारक्षेत्र का विस्तार होता है. इसका प्रधान कारण यह हो सकता है कि शासन अपना काम नहीं कर रहा था, पूरे देश पर कब्जा जमाने पर लगा हुआ था. संस्थाएं अपना काम नहीं कर रही थीं. जिनको काम कराना होता था वे उनसे काम करवाते थे. इस स्थिति को बदलना एक चुनौती है और यह एक दिन में पूरा नहीं होगा. आज भी स्थिति में बहुत कम सुधार हुआ है. निकम्मापन और भ्रष्टाचार का समानांतर विस्तार हुआ. राज्य के अंग भी अनंग होने की प्रक्रिया में आगये. उच्च संस्थाएं भी इस व्याधि से बची नहीं. न्यायपालिका का कार्यपालिका में हस्तक्षेप, विधायिका का कार्यपालिका में दखल कार्यपालिका का न्यायपालिका को अपने दबाव में रखने की कोशिश, मीडिया का सत्ता को दबाव में रखने की कोशिश, राजनेताओं का नाटक करना, अभिनेताओं का राजनेता बनने की कोशश, किसी से छिपी नहीं है. ऐसे में कार्यपालिका का चरमरा जाना और शांति व्यवस्था का उससे प्रभावित होना टाला ही नहीं जा सकता. इस बिगड़ी हालत के लिए जो मुख्य रूप से जिम्मेदार है उसका नाम लेना ज़रूरी नहीं, परन्तु उनके साथ खड़े हो कर उस व्यक्ति के खिलाफ लड़ना जिसने पहली बार लक्ष्य किया की समस्या सुशासन की है, आधुनिकीकरण की है, उस राष्ट्रिय पूंजी के अपने देश में निवेश की है जो विदेशों में लग रही है, वहां रोज़गार दे रही है, अपने देश के श्रमिकों की कार्यदक्षता बढ़ाने और उसे उन्नत औज़ारों से लैस करने की है, उस देश में आत्मविश्वास पैदा करने की हैं जिसका मनोबल और आत्मविश्वास इतना गिर चुका है की वह सोचता है कि उसके किये कुछ संभव ही नही, उन सामानों का उत्पादन देश में करने का वातावरण तैयार करने की है जिनकी खरीद में बड़े पैमाने पर कमीशन चलता और गंगोत्री से ही प्रशासन की गंगा प्रदूषित होकर भ्रष्टाचार के लिए नैतिक औचित्य देते हुए पूरे राष्ट्र की प्रतिरोध क्षमता को नष्ट कर चुकी है. विचित्र लगता है की वह व्यक्ति जो असाधारण दृढ़ता से अपने प्रत्येक वादे को पूरा करने के दुर्धर्ष संघर्ष में जुटा है उसको चुनौती दी जाती है कि हम तुम्हे काम नही करने देंगे, और फिर पूछा जाता है अब नतीजा तो दिखाओ.
“चाहता हूँ कुछ कहने या करने से पहले हम सोच लिया करें, समझ कर लिया करें कि क्या यह हमारा काम है? क्या यह ज़रूरी है? क्या हम इसे सही तरीके से कर पाएंगे, इसके परिणाम क्या होंगे? क्या इनमे से किसी बात से असहमत हो?
“नहीं यहां तक तो ठीक है.”
“फिर यह बताओ हम हैं कौन?”
“लिखने पढ़नेवाले, सोचने विचारने वाले लोग हैं.”
“हम अपना काम कर रहे हैं या सक्रिय राजनीति कर रहे है.”
“क्या हम अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन भी नही कर सकते?”
“कर सकते हैं. हम लिखने-पढने के अलावा भी बहुत से काम करते हैं. अधिकारों के लिए आंदोलन तो और भी ज़रूरी है. लेकिन एक छोटी सी कड़ी गायब है।“
“बताओ बताओ मैं भी तो जानूं.”
“मैं राजनीति से वाकिफ नहीं हूं, इसलिए पूछ रहा हूं. यह बताओ, पहले कोई मांग रखी जाती है और उसके पूरा न होने पर आन्दोलन किया जाता है या पहले आन्देलन शुरू कर दिया जाता है और उसके बाद मांग रखी जाती है?”
“हां यहां तो कुछ चूक हुई लगती है.”
“प्रथम ग्रासे मक्षिका पातः. चूक हुई लगती है, हुई नहीं?”
“चलो यही सही. आन्दोलन की मांगें पूरी हो गई, जश्न भी मना लिया कि अकादमी को बाध्य कर दिया. मांग पूरी होने के बाद आन्दोलन समाप्त हो जाता है या जारी रहता है?”
वह सिर खुजलाने लगा. सिर खुजलाने से भी विचार पैदा होते हैं. कुछ देर खुजलाने के बाद पैदा हो गया, “देखो इस आंदोलन में दो मुद्दे हैं. एक तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दूसरी है साम्प्रदायिक घृणा का प्रसार.”
“दो मत कहो, तीन कहो. क्योंकि इन दोनों का साहित्य अकादेमी से कोई सम्बन्ध नही है. आंदोलन अकादमी के खिलाफ शुरू हुआ था और अकादमी के भूल मानने पर उसकी अपेक्षाएं पूरी हो गईं.”
“हाँ तीन भी कह सकते हैं.”
“तो ये तीन आंदोलन थे जो जुड़ कर एक हो गए. देखो विकास के नियम में कुछ जीव टूट कर अपने विखंडन से एक से बहु हो जाते हैं. बहुतों को जुड़ कर एक बनने का नियम नहीं है. यह ह्रास का नियम हो सकता है जिसमे एक जीव दूसरे या कई पर आ गिरे और चपेट में कई की जान चली जाय, जैसे भगदड़ में या दूसरी दुर्घटनाओं में होता है.”
“वह फिर सिर खुजलाने लगा. इस बार उत्तर निकलने में देर हो रही थी. फिर भी निकल तो आया ही. “तुम कुतर्क कर रहे हो. एक ही आंदोलन में कई मांगे भी हो सकती है. कुछ के पूरा होने से आंशिक विजय प्राप्त होते है और बाकी के लिए आंदोलन जारी रहता है.”
“बात तो यह भी पते की है. यह बताओ किसी चरण पर यह बताया गया कि हमारी ये मांगें हैं और यह किया जाय तो आंदोलन समाप्त हो जाएगा?”
“किया नही गया है पर सरकार उन लोगों पर तो रोक लगा सकती है जो अनाप शनाप बक कर सामाजिक माहौल को बिगाड़ते हैं,”
“क्या यह उनकी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर हमला नहीं होगा?”
“अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का यह मतलब तो नहीं की कोई अपने भाषण से उत्तेजना फैलाता रहे. यह तो वैसे भी अपराध है.”
तुम ठीक कहते हो. देखो तुमने जवाब मांगा था और मैं उलटे तुमसे सवाल करता चला गया. जवाब तो देना ही होगा.
“देखो, मैं फिर दुहरा दूँ, हमारे सामने यह स्पष्ट होना चाहिए कि हम क्या कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं और इसका परिणाम क्या होगा। हमने अभी जो चर्चा की उससे साफ है कि सब कुछ बिना सोचे समझ बिना किसी योजना के बाजी मारने की जल्दी में, हम पीछे न रहा जांय की हड़बड़ी में शुरू हो गया. इसे आंदोलन नहीं हंगामा कहते हैं. बौद्धिकों को हंगामे बाज़ी शोभा नही देती. इसमें शामिल होने वालों में सबके अलग घाव हैं जो सोचते बिचारते उठ जाते हैं. मैंने बहुत पहले कहा था की बहुत पढ़ा लिखा आदमी वज्रा मूर्ख होता है क्योंकि वह किताबों में समाधान ढूँढता है, अर्थात दूसरों के विचारों से अधिक निर्देशित होता है. सचाई पर उसकी नज़र नही जाती. पर एक सुलझे दिमाग के अनपढ़ को सचाई का सामना करना पड़ता है. पढ़े लिखे आदमी को वह भी मूर्ख समझता है.
लेकिन एक बात इन सभी में पा सकते हो. ये सभी बहुत पहले से मोदी से नफ़रत करते हैं. उसे खतरनाक मानते हैं. घृणा करने वाला किसी को समझ नही सकता और यह समझ नहीं सकता की मोदी में जो दृष्टि, संकल्प, समर्पणभाव और सहिष्णुता है, वह भारत के किसी राजनेता में थी ही नहीं. ये. संख्या गिन रहे हैं. इंतज़ार कर रहे हैं. दबाव डाल रहे हैं और इस मुगालते में हैं की यह दबाव इतना बढ़ जाएगा की शासन कठोर से कठोर कदम उठाने के लिए विवश हो जाएगा और तब यह विस्फोटन जनक्षोभ में परिणत हो जायेगा और ऐसा निर्णायक दौर आरम्भ हो जाएगा कि शासन चरमरा जायेगा. सरकार गिर जाएगी और फिर से वह दौर आरम्भ हो जाएगा जिस में देश का जो भी हो इनकी बन आएगी.
सरकार गिरे या संभली रहे परन्तु ये अपनी ओर से अराजकता कि स्थिति पैदा कर रहे हैं और इसलिए उनका काम कर रहे हैं जिनको हमारे देश में अराजकता फ़ैलने से, शासन चरमराने से फायदा हो सकता है. वे इस देश में भी हो सकते हैं बाहर भी हो सकते है. एक बात तय है कि ये अपना काम नहीं कर रहे हैं और दूसरी यह कि ये अच्छा काम नहीं कर रहे हैं.

बुरे काम का बुरा नतीजा

Post – 2015-11-05

भुलक्कड़पन

“यार, मुझे गलत मत समझो. तुम से बात करता हूँ तो सचमुच क़ायल हो जाता हूँ. पर जब रोज़ ब रोज़ विभिन्न क्षेत्रो के लोगों को एक स्वर में एक ही बात दुहराते देखता हूँ तो तुम्हारे ऊपर ही संदेह होने लगता है.”
“यह तो मनोचिकित्सा से जुड़ी समस्या है. इसका इलाज मेरे पास नहीं है. इसके लिए तुम चाहो तो किसी साईकेट्रिस्ट से सलाह ले सकते हो. लेकिन वह बेचारा भी भुलक्कड़पन, मिर्गी और अल्ज़ीमर के बीच अंतर तो बता सकता है, भुलक्कड़पन के भेद, प्रभेद और लक्षण तो बता सकता है, पर वह भी तुम्हारा इलाज़ नहीं कर सकता. जो मनोरोगी अपनी बीमारी पर ही गर्व करने लगे उसे कोई नहीं बचा सकता.
“तुम मेरी बात के क़ायल नहीं होते. सच यह है कि जब कोई उत्तर नहीं सूझता तो चुप लगा जाते हो. ऐसा न होता तो तुम अपनी मूर्खता को युगसत्य बनाने के लिए रोज़ वही बात किसी न किसी बहाने दुहराते नहीं.
“तुम भूलते नहीं हो तुम उन सवालों से घबरा जाते हो जो मैं उठा चुका हूँ और फिर भी अपने को सही साबित करना चाहते हो और इस उम्मीद में कोई बहाना लेकर आ जाते हो, कि मैं कोई न कोई ऎसी चूक करूँ जिससे तुम सही सिद्ध हो जाओ.
“यदि यही तुम्हारा लक्ष्य है, अपने को सही साबित करना, तो बताओ वह अपराध जिसे मैं करूँ तो तुम जीत जाओ. दोस्तों ने दोस्ती बचाने के किये कितनी क़ुर्बानियाँ दी हैं. यार आधी शताब्दी का साथ है, मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूँ. पर जान भी दे दूँ तो तुम बच सकोगे क्या. मैं बहुत मामूली आदमी हूँ. महाकाल के रथ के सामने एक तिनके से भी तुच्छ. काल ने तुम्हे व्यर्थ मान लिया है, चीत्कार करते हुए रसातल को जाना है तुम्हे. जिन संगठनों से जुड़े हो उनसे पूछो कब तक बचे रहेंगे. वे आश्वस्त हों की उनके दिन फिर सकते हैं तो मुझसे बहस करो. तुम्हारे लिए तो मैं ज़िन्दगी तक हार सकता हूँ बहस हारना तो बहुत छोटी बात है.”
“तुम तो बात बात पर भाषण देना शुरू कर देते हो. मैं तो यह देखकर हैरान था कि शाहरुख़ जैसे बड़े कलाकार को भी असुरक्षा अनुभव होने लगी है. जानते हो उसके कितने करोड़ फैन हैं? इस से आंदोलनकारियों की ताक़त कितनी बढ़ी है?”
“तुम फैन का मतलब जानते हो.”
“जानता हूँ. वे जो उस पर जान देते हैं.”
“फैन का मतलब होता है फैनेटिक. पागल. तुम ठीक कहते हो. वे पागलपन में जान दे सकते हैं पर यह नहीं समझ सकते कि कलाकारी और सोच-समझ दोनों एक ही चीज़ नही है.”.
“सवाल कला कि समझ का नही है. असुरक्षा की भावना का है.”
“असुरक्षा की भावना तो है. इतना पैसा जो है. असुरक्षा की भावना तो अम्बानी को भी है. दोनों ने जेडप्लस की सुरक्षा की मांग की थी. शायद कांग्रेस सरकार ने दे भी दी थी.”
“तुम दूसरी तरफ खींच रहे हो. मैं सामाजिक असुरक्षा की बात कर रहा हूँ.”
“समाज की समझ है शाहरुख़ को?”
“कमाल करते हो यार.”
“देखो वह अपनी फिल्मों में जो डायलॉग बोलता है वह किसी और का लिखा होता. तुम्हे पहले यह पता लगाना चाहिए था की यह डायलग किसका लिखा हुआ था.”
वह खीझ में हँसता है तो देखते ही बनता है.
“और सुनो. जहां तक समाज को समझने का सवाल है, वह समाज से इतनी दूर रहता है कि वह अपने उन सुरक्षा कर्मियों के भी हाल चाल नही जनता जो उसकी जान की रखवाली करते हैं. एक बात का और पता लगाना कि वह हिन्दी जानता है या नही. किसी ने बताया था कि वह जो डायलॉग बोलता है वह उसे रोमन अक्षरो में लिख कर दिए जाते हैं. इस मामले में ज़रूर वह सोनिया जी और राहुल जी की बाराबरी में आता है. उन्ही की तरह जनता से कटा हुआ और मजमेबाज़ी से खुश.”
उससे कुछ बोलते नहीं बन रहा था.
“और यह जो भावना वाली बात कर रहे हो न यह वह चीज़ है जो न हो तो आदमी रोबोट बन जाता हैं. लेकिन अधिक हो तो कोई पागलपन में जान लेने और देने पर उतारू हो जाता हैं.”
उसने कुछ कहना चाहा, मगर मैंने उसे बोलने ही नही दिया, “देखो जिनको आग भड़कानी होती है वे पहले भावना भड़काते हैं. और यह भावना भड़काने का खतरनाक खेल खेला जा रहा है. मैंने किसी दिन इन लेखकों को मज़माबाज कहा था. उन्हें इस बात पर ज़रूर खुशी होनी चाहिए कि करोडों जिसके पीछे पागल रहते हैं वह भी हमारे हाथ आगया. अब हमारी ताक़त बढ़ गई. पर उन्हें यह पता नहीं कि वे जो कह रहे हैं कि असुरक्षा बढ़ गई है वह किस जुमले का अनुवाद है क्योंकि ये उस भुलक्कड़पन के तुमसे बड़े रोगी है. ये अभी चार दिन पहले तक का इतिहास भूल जाते हैं. १९४७ से पहले असुरक्षा बढ़ गई है को “इस्लाम खतरे में” के रूप में प्रचारित किया जाता था और इस्लाम इतने खतरे में पड़ जाता था कि मरता क्या न करता वाली कहावत से प्रेरित होकर नारए तकबीर अल्लाहु अकबर करते हुए दंगे भड़का दिए जाते थे.
“और सुनो, जिनको इतिहास भूल जाता है वे भविष्य का भी सत्यानाश कर देते हैं. इन दोनों के बीच बहुत गहरा सम्बन्ध है. अभी मैं कल हे एम्नेसिआ यानी भुलक्कड़पन पर इंटरनेट पर ही एक शोध निबंध पढ़ रहा था. उसकी कुछ पंक्तियाँ मैं मूल में ही सुनाना चाहूंगा.
amnesia. Amnesia also refers to an inability to recall information that is stored in memory. In simple terms, amnesia is the loss of memory. ..
People with amnesia also find it hard to imagine the future, because our constructions of future scenarios are closely linked to our recollections of past experiences. Researchers from Washington University in St. Louis used advanced brain imaging techniques to show that remembering the past and envisioning the future may go hand-in-hand, with each process sparking strikingly similar patterns of activity within precisely the same broad network of brain regions.
“ये नहीं जानते कि ये किस आग को भड़काने पर तुले है. अगर जान बूझ कर ऐसा कर रहे हैं तो ये समाजद्रोही भी हैं और देशद्रोही भी. कल इन्हीं में से किसी सरफिर ने आरएसएस की तुलना इस्लामिक स्टेट से कर दी. इतने गैर ज़िम्मेदार हैं ये लोग.
“मुझे इनसे भी बड़ी चिंता इस बात कि है कि महामहिम भी इनकी चिंता में शामिल हो हो गए है. जल्दी-जल्दी उन्हें तीन बार चिंतित होना पड़ा बिना किसी नई अप्रिय घटना के घटे. व्यंजना में इसके अर्थ अनेक हैं पर एक अर्थ यह भी है कि उन्हें अपना अतीत तो याद है पर वर्तमान?
महामहिम की चिंता से सोनिया जी इतनी उत्साहित हैं की महामहिम के दर्शन करने पहुँच गईं. कांग्रेस और उसकी खुली लूट में शामिल लोगों का एक ही मक़सद है देश को पिछड़ा रखना, मध्यकालीन मानसिकता को प्रोत्साहन देना, विकास के मार्ग को अवरुद्ध करना और सत्ता से बाहर होने पर देश का बेड़ा गर्क करना. मैं मोदी की परिपक्वता का इसलिए क़ायल हूँ कि उन्हे पता है कि तुम भारत को पश्चिम एशिया बनाना चाहते हो और वह भारत को भारत बनाये रखने के लिए यहां के सबसे प्रभावशाली हथियार उपेक्षा और मौन का इतनी शालीनता से निर्वाह कर रहे हैं. वर्तमान को इतिहास की और नहीं भविष्य की और ले जाने के लिए प्राण-पण से प्रयत्न कर रहे हैं. इस मोदी को देश का आम आदमी जानता है, यहाँ का बुद्धिजीवी नहीं. यह मेरी समझ है. मैं किसी व्यक्ति के साथ नहीं देश और समाज के साथ हूँ और देश और समाज की चिंता जिनके लिए सर्वोपरि है उनके साथ हूँ. ज़रूरी नहीं कि तुम भी इसके क़ायल हो जाओ, परन्तु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में मेरा भी कुछ हिस्सा है यह तो मानोगे ही.
11/5/2015 6:27:40 AM