Post – 2016-02-29

हिन्दी का भविष्य‍ (3)

‘’तुम क्या सचमुच मानते हो कि हमने हिन्दी को गढ़ने के बहाने उसका सत्या्नाश किया, या जैसी तुम्हारी आदत है, जो जी में आया बोल गए, बिना सोचे समझे कह बैठे थे?’’

उसने मुँह कुछ ऐसा बनाया हुआ था जिससे यह तय करना कठिन था कि वह सचमुच जिज्ञासा कर रहा था, या मस्खरी।

‘’तुमको फिराक साहब की आदत का पता है कि वह बात बे बात हिन्दी वालों का और हिन्दी कवियों का मजाक उड़ाया करते थे और जब तरल गरल में डूबने उतराने लगते थे तो बहुत बेहूदी बातें तक कर जाते थे। उनको संस्‍कृत निष्ठ हिन्‍दी समर्थकों से चिढ़ सी थी और इसे उन्होंने अपने को उर्दू का मुसलमानों से अधिक समर्थक होने के उत्सा‍ह में नहीं पैदा की थी, पर इसके दबाव में, खास कर जब दिमाग भी तरल हो जाता था, तब, बिना प्रसंग के उूल-जलूल बकने लगते थे। उन्हें अरबी-फारसी बहुल उर्दू से भी चिढ़ थी पर उर्दू लिखावट या अरबी फारसी की सनक का विरोध कभी नहीं किया, अरबी लिखावट का तो लिख कर समर्थन भी किया क्योंकि उसमें लिखने में उन्हेंं आसानी होती थी। शमशेर के साथ भी यही था।‘’

’’चलइ जोंक जिमि वक्र गति …’’ उसने ठहाका लगाया।

‘’अरे यार हम बात कर रहे हैं, गाय पर निबन्ध तो नहीं लिख रहे हैं कि उसमें गाय के गोबर तक का जिक्र आएगा, पर शेर का या अमीबा का जिक्र नहीं आ सकता। पहले धीरज से सुनो। गोरखपुर में एक मुशायरे में तुरीयावस्था में वह कुछ झूमते हुए मंच पर पहुँचे । जब उनके पढ़ने की बारी आई तो उन्होंने पुरुषोत्तम दास टंडन का नाम ले कर अपने अद्भुत अन्दाज में जिसमें मंच और मजलिस एक हो जाती थी, वह रुबाई पढ़ी:
‘माज़ी से /उनक दाम”ले थे/ माज़ी के/ दोस पर चढ़ने
अरे
माज़ी ने
उठा
उठा के
पटका
मजलिस की ओर से, ठहाके के साथ ‘सौ बार।‘
अब मुशायरे की ऐसी की तैसी,तरंग संस्कृ‘त शब्दों के मखौल पर पहुँच गई थी। अब उन्होने अपने ठहाकेदार अन्दाज में फर्माया, ‘प-श्चा-त्ता-प, जानते हो इसका मतलब, नहीं जानते। शाम को लहसन और मिर्च की चटनी खाओ, और अगले दिन जब फारिग होने जाओगे तो इसका मतलब समझ में आ जाएगा।‘

मैं नहीं कहता कि उन्‍हें बवासीर की शिकायत भी रही होगी, पर उनके अन्‍दाज का दूसरा आदमी तो खुशवन्‍त सिंह ही बचा रहा जो जब था था तो था, नहीं है तो नहीं है, क्‍योंकि उसने चौंकाया अधिक समझा और समझाया कम। ।

खैर, उसी दिन उन्होंने उसी तरंग में एक ऐसी बेहूदी बात कह दी जिस पर किसी अन्य स्थिति में एक ओर से मुसलमान जूते मारते दूसरी ओर से हिन्दूं।‘’

ऐसी कौन सी बात थी यार कि जूते मारने के सवाल पर साम्प्रदायिक सद्भाव पैदा हो जाय। यदि यह सच है तो लोगों को सद्भाव के विकास के लिए जूते मारने और बुद्धिजीवियों को जूते खाने की आदत डालनी चाहिए।‘

‘बहुत कम मौके होते हैं जब तुम अमर वचन बोलते हो। बुद्धिजीवी और तर्कवादी और जो जी में आये बोलने की आजादी के समर्थकों को इसका अभ्‍यास भी करना चाहिए ताकि चमड़ी जूते खाने की आदी हो जाय और उसमें मजा आने लगे।’

‘तुम बात करते हो या बकवास?’

’श्रोता पर निर्भर करता है, यदि बात समझने वाला मिला तो बात, यदि बक पंक्ति का सामना हुआ तो उनकी समझ में आने वाली भाषा, जिसे तुमने ठीक ही बकवास का नाम दिया। पहले सही श्रोता बनो, बीच बीच में उद्विग्न न हो जाया करो। बताता हूँ तुम्हें वह वाक्य जिससे सौमनस्य तो पैदा नहीं हो सकता परन्तुं सेक्यु लरिज्म की गलत समझ रखने वालों को दोनों जमातों के जूते अवश्य खाने पड़ सकते हैं, इसका अन्दाजा होता है। फिराक़ साहब टंडन जी पर अपनी रुबाई पर दाद और तरल गरल के दबाव से ऐसी तरंग में आ गए थे कि उन्होने अपनी गजलें और नज्में पढ़ने की जगह, बिना किसी प्रसंग के फर्माया, ‘एक ओर मुहम्मद साहब का चेहरा देखो, जैसे नूर टपक रहा हो, और दूसरी ओर तुलसी का चेहरा, जैसे राह चलते भैंस ने चोत कर दिया हो।‘

मजनू साहब नें, जो उर्दू के पाये के आलोचक थे और जिनकी कद्र फिराक साहब भी करते थे,, उन्हें अपने आगोश में लिया और उन्हें मंच से उतार कर बाहर ले गये। उनका इतना सम्मान था कि फिराक भी उनके आगे कोई तमाशा नहीं कर सकते थे।
‘मुसलमान उन्हें इसलिए पीटते कि मुहम्माद साहब मूर्तिपूजा के इतने विरोधी हो गए थे कि उनका चित्र बनाना, यहॉं तक कि कुरान या मस्जिद की पूजा करना तक इस्लाम में वर्जित है। उनके चेहरे से नूर बरसाने की कल्पना फिराक साहब के अवचेतन में मुहम्मद साहब की याद के साथ नानक जी के चित्र से आई हो सकती है, गो यह जरूरी नहीं। पर मूर्तिपूजा का भाव इसमें था और मुहम्मद साहब के काल्पनिक चित्रों को ले कर कई बवाल हो चुके हैं। तुलसीभक्त उन्हें जूते क्यों मारते इसकी व्याख्या की जरूरत नही।‘

’बदजायका हुआ मगर मकसद तो बता दो।’ उसने फिकरा ही जड़ दिया।

‘कलम कागज तो ले कर चलते नहीं, मोबाइल में नोट करते चलो:
’पहला यह कि फिराक साहब हिन्दू थे, मुसलमान नहीं। भाषा और लिपि का प्रश्न सुविधासंपन्न लोगों की अपनी सुविधा से जुड़ा था। तार्किक, वैज्ञानिक या व्याावहारिक औचित्य से नहीं। ’
दूसरा यह कि फिराक हिन्दी का सम्मान करते थे, हिन्दी उर्दू के बीच एक सेतु बनना चाहते थे, इसलिए उनको हिन्दी से प्रेम था, हिन्दी के आन्दोिलनकारियों से नहीं। उर्दू का कोई दूसरा शायर ‘हठधर्मियों’ जैसे शब्द का प्रयोग नहीं कर सकता था।
‘’तीसरा यह कि फिराक उर्दू, अंग्रेजी और हिन्दी के कवियों में सबसे उूँचा दर्जा तुलसी को देते थे। तुलसी के सामने दूसरे सभी कवि उन्‍हें ठिगने दिखाई देते थे, और उसी तुलसी के प्रति, उनके काव्य् के प्रति नहीं, उनका जो चित्र छपता है उसके प्रति उन्होंने इतनी गर्हित बात की जिसे होश में आने के बाद वह शर्मशार होते रहे होंगे या अपने को आत्मग्लाननि से बचाने के लिए कुछ तर्क कुतर्क गढ़ते रहे होंगे।
’’चौथा यह याद दिलाने के लिए कि अपनी बदहवाशी में भी व्यक्ति किसी सत्य को उद्घाटित करता है, उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। पश्चात्ताप जैसे प्रयोगों से उनकी चिढ़ इस बात को ले कर थी कि जब हिन्दी में पछतावा है और वह निम्नतम स्तर से ले कर उच्चतम स्तर तक समझा जाता है तो हिन्दी के अपने मिजाज को विकृत करते हुए उसे संस्कृत बनाने की क्या जरूरत है।

‘और अन्तिम यह सावधान करने के लिए कि किसी विचार को किसी महान व्यक्ति से जुड़ा देख कर उसे स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए। हमारा सहारा हमारी अपनी बुद्धि ही है, वह नहीं तो हम जड़ हैं। वह है, पर उसका प्रयोग किन्हीं लोगों के प्रति अतिश्रद्धा के कारण न किया तो हम जड़वत आचरण करते हैं। इसलिए हर हालत में हमें अपनी समझ, अपने दिमाग से काम लेना है, जो आप नहीं कर पा रहे हैं।‘’

’’मैं अन्तिमोत्तंर वचन बोलूँ तो झेल पाओगे? तुम्हारी पहुँच कितने छोटे दायरे में है। इसी को तुम पूरी दुनिया समझ रहे हो। सोचते हो इन फिकरेबाजियों से दुनिया बदल दोगे?’’

’’मैं ऐसा भ्रम नहीं पाल सकता, पर यह जरूर सोचता हूँ कि जिनका प्रचार और विचार के प्रसारण के सभी माध्यमों पर अधिकार है और जिसका उन्होंने वहशियाना प्रयोग किया है, वे अपने इसी कारनामे से हाशिये पर क्यों आ गए थे और अब वे भारतीय भूगोल से बाहर जाने का जश्न क्यों मना रहे है।‘

Post – 2016-02-28

ऐतिहासिक चरण के बीच विचरण

यदि तुम सचमुच मानते हो कि एक ऐसा ऐतिहासिक चरण आया है जिसमें हिन्दी का या जैसा तुम कहते हो भारतीय भाषाओं का भी वर्चस्व स्थापित हो सकता है, तो तुम्हें इसे साफ बताना चाहिए। तुम फिकरेबाजी में खो जाते हो और कहॉं से कहॉं चले जाते हो। उठ कर भागने का मन होता है, पर दुर्भाग्य यह कि फिर लौटना भी पड़ता है और टकराना भी पड़ता है। क्या तुम अपनी बात संक्षेप में नहीं रख सकते ?’’

’’मैं वही कर रहा हूँ, परन्तु तुम फास्ट फूड युग के लावारिस दावेदार हो, कहीं के नहीं, जिस देश और समाज के हो उसके भी नहीं, और यह नीयत की खोट के कारण नहीं है, उस जल्दबाजी के कारण है जिसमें तुम न अपनी भाषा को समझ पाते हो, न अपने अतीत को समझ पाते हो, न वर्तमान को समझ पाते हो, और हद यह कि पिटते हो तो अपनी दुर्गति को छिपाने के लिए हँसते हुए कराहते हो, बहुत मजा आ रहा है, और मारो, और मारो।‘’

मैंने सोचा था वह इस पर उग्र प्रतिक्रिया करेगा। वह भौचक था। उसने इतने ताबड़तोड़ प्रहार की उम्मीद ही न की थी। उसकी इस दुर्दशा से मैं स्वयं पसीज गया, कहा, ‘’मैंने तुम्हें लावारिस दावेदार कहा तो तुमको बुरा नहीं लगा। मैंने तो सोचा था तुम उत्तेजित होगे तो कुछ और मजा आएगा, मजा किरकिरा कर दिया तुमने । यह बताओ लावारिस का मतलब समझते हो?’’

’’तुम्हांरी तरह लल्लू हॅूं जो न समझूँगा? लावारिस का अर्थ है जिसका कोई वारिस न हो, जो अनाथ हो।‘’

’’तुमने ठीक समझा, पर इसका एक ही अर्थ समझा। देखो शब्दों की अपनी जैवशक्ति और जीवनी होती है, इसलिए वे प्राणियों की तरह व्यरवहार करते हैं। उनके कई तेवर होते है, एक करवट लेते हैं तो एक अर्थ निकलता है, और दूसरी करवट लेते हैं तो दूसरा और तन कर खड़े होते हैं तो तीसरा, और दबाव में आकर घुटने टेक देते हैं तो किताबी अर्थ होते हुए भी वे व्यर्थ हो जाते हैं। तुमने अपनी झटपटिया समझ में उसका एक ही अर्थ समझा, वारिस, अर्थात् गार्जियन, अर्थात अभिभावक। यह नहीं समझा कि यह शब्द विरासत से भी कुछ संबंध रखता है और विरासत का कुछ संबन्ध इतिहास से भी है जिसे तुमने योजनाबद्ध रूप में नष्ट किया है। इसका एक और अर्थ है, वह परंपरालब्ध संपदा जिसे समझने की तुमने योग्यता पैदा न की, योग्यता के अभाव में उससे नफरत करने लगे, उसे मिटाने का संकल्प ले लिया। और उसे मिटाने और अग्निसात करने से जो राख बची रह गई उसे भी माथे से लगाने की जगह, पॉवों से रौंदते रहे। मैंने देखा था वह दृश्य जिसमें झंडा उठाए तुम भी शामिल थे।‘’

क्या उसे अपनी जमीन पर खड़ा करने के लिए इतनी पिटाई की जरूरत थी? वह भड़का तो बोला नहीं, दहाड़ते हुए तन कर खड़ा हो गया, जिसका श्रव्य रूप था, ‘’तुम मूर्ख हो।‘’

”वह तो हो सकता हूँ, पर कोई कारण, कोई तर्क, कोई प्रमाण कि मैं अपने को समझा सकूँ कि मैं वह हूँ जो तुम मुझे मानते हो, और मेरे उन तर्कों, कारणों और प्रमाणों के होते हुए भी तुम अपने को वह नहीं मानते जो तुम्हें मैं मानता हूँ।‘’

’’वह कुछ सोचने लगा। सही बचाव न मिल रहा होगा, इसलिए देर हो रही थी। उसने एक मोटा सवाल उछाला, तुम राष्ट्रवादियों के साथ हो या हमारे साथ?’

’’मैं उस परिभाषा के साथ हूँ जिससे यह समझा जा सके कि नेशन और नेशनलिज्म की अर्थछटाऍ क्या हैं और कैसे वही नेशन या राष्ट्रू कांग्रेस के साथ जुड़कर अकुतोभय बन जाता है, और कैसे वही उसके वर्चस्व के विरोध में खड़े होने पर सर्वतोभय बन जाता है। तुम जिन शब्दों का अर्थ तक नहीं जानते, उनका नारों के रूप में प्रयोग करते हो। तुमने विरासत को नष्ट भी किया, बची संपदा के दावेदार भी बने और जिन जनों का हित करने के लिए प्रतिबद्ध थे उन्हें मछली की तरह छटपटाने को छोड़ गए। अंग्रेजी मुहावरे मे बात करें तो ‘हाई ऐंड ड्राई’ या तड़फत तड़प कर मरने के लिए छोड़ देना। तुम जिन लोफ पिकर चैनेलों के बल पर सही होने का प्रयत्न् करते हो, वे तुम्हारी बची खुची साख भी मिटा रहे हैं और अपनी साख भी गँवा रहे हैं। कहॉं थे कहॉं आ गए और यह जानने की कोशिश तक न की कि यह हुआ कैसे।‘’

’’असह्य हो तुम। कल बात करेंगे जब होश में आ जाओगे।‘’ वह उठा तो मेरे हाथ पकड़ कर रोकने के प्रयत्न के बाद भी मुझें झटकते हुए आगे बढ़ गया।

Post – 2016-02-27

हिन्दी का भविष्य (2)

”अक्षत तो यह रहा, फूल लाना भूल गया, चलेगा काम। ”

”चलेगा, तुमसे अच्छा फूल कहाँ मिलेगा, आओ, बैठो।”

”हॉं अब बताओ वह रहस्य की बात जिसका मुहूर्त आज के लिए निकला था और वह भी कर्मकांड के साथ।”

” जहॉं तक भाषा की समस्या है, इसके तीन ऐतिहासिक चरण हैं, पहला उन्नीसवीं शताब्दी का जब संपर्क भाषा के लिए एक राष्ट्रीय सहमति थी और साथ ही उसी के भीतर सेंध लगा कर सामाजिक विघटन के बीज बोए गए थे। दूसरा स्वतन्त्रता आन्दोलन का जिसमें स्वतन्त्र भारत की भाषा क्या होगी इस पर गांधी को छोड़कर किसी दूसरे की नजर नहीं थी परन्तुं गांधीवाद के दूसरे कार्यक्रमों की तरह इसे भी चलाया जा रहा था और इस विषय में किसी ने कोई आपत्ति नहीं जताई थी कि हिन्दी से इतर कोई भाषा स्वतन्त्र भारत की राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती है। जो कील अंग्रेजी कूटनीति ने गाड़ी थी उसमें उसके स्वरूप को ले कर कुछ माथापच्ची जारी थी और इसके चरित्र को बोलचाल के निकट की भाषा बनाने पर सहमति थी, जिसमें हिंदी उर्दू संस्कृात फारसी अरबी, तुर्की और इसलिए अंग्रेजी के भी बोलचाल में आए और भारत के आम लोगों द्वारा समझे जाने वाले शब्दों को स्थान दिया जाना था। यह व्यवहार की भाषा का आदर्श रूप था परन्तु इसके बाद उन लोगों को कोई मुद्दा नहीं बच जाता था जो अलगाव की राजनीति कर रहे थे इसलिए उन्होंने भाषा के स्थान पर लिपि को मुद्दा बनाया क्यों कि वे यह जानते थे कि सामान्य उपयोग के लिए अरबी लिपि स्वीकार नहीं की जा सकती, इसलिए मुसलिम समाज को अलगाने का यह एकमात्र आधार बन सकता है। ”

‘’ये कहानियॉं तुम कितनी बार दुहरा चुके हो याद है तुम्हेंं ?’’

‘’जानता हूँ। मैं यह याद दिला रहा था कि ये ऐतिहासिक मोड़ थे जिन पर वही हो सकता था जो हुआ। तर्क का, जनमत का, देशहित का, सौहार्द का असर नहीं हो सकता था। और यही उस खींच तान का भी असर होना था जो 1965 में हुआ। सच कहो तो हिन्दी को अंग्रेजी के स्थान पर प्रयोग में लाने के लिए जो वातावरण तैयार करना था उसमें हिन्दी के लिए काम करने वाले स्वयं बाधक बने। उन्होंने इसे एक चुनौती समझने के स्थान पर एक अवसर समझा, भुनाने पर उतारू रहे। यह मैं अपने अनुभवों से कह सकता हूँ कि हमने पहले अपनी भाषा को खोया और फिर उस अवसर को खोया जो इतिहास प्रदत्त नहीं था, संविधान प्रदत्त था, और इसलिए इतिहास के विपरीत था । कुछ लोग कहते हैं न कि गोर्बाचेव ने सोवियत संघ को नष्ट कर दिया और उनके विपरीत मैं मानता हूँ कि उसने सोवियत संघ को उस खास ऐतिहासिक चरण पर बचा लिया जब वह मरणासन्न था और सड़ने के लिए तैयार बैठा था। उसी तरह मैं यह मानता हूँ कि उस तमिल सिरफिरे ने हिन्दी को और प्रशासनिक तन्त्र को गिरावट से बचा लिया जो उस समय उस हिन्दी द्वारा अंग्रेजी को स्थानान्तरित होने से उत्पन्‍न होती।‘’

‘’पहले मुझे शक होता था लेकिन आज पक्कां विश्वास हो गया कि तुम्हारे दिमाग का कोई पुर्जा ढीला है। तुम ऐसा मानते थे तो तुम हिन्दी की चाकरी करने क्यों गए?’’

‘’बताने चलूँ तो आत्मश्लाघा होगी, और तुम्हारी समझ में इससे अधिक कुछ न आएगा। परन्तु उस खास चरण पर मैं भी समझता था कि शास्त्री जी ने एक सिरफिरे के आत्मदाह और इस विद्रोह के विस्तार से आतंकित होकर जो यह निर्णय लिया कि जब तक दक्षिण के लोग अंग्रेजी को अपदस्थ करने के लिए तैयार नहीं होते तब तक कोई हिन्दी या अंग्रेजी जिस भी भाषा में काम करना चाहे उसके लिए स्वतन्त्र है, गलत है। उस समय मुझे आघात लगा था। मैं हिन्दी की चाकरी करते हुए इस बात के लिए प्रयत्नशील था कि हिन्दी में कामकाज हो और इसके लिए अपनी जान लड़ाने के लिए तैयार था। बेकारी के लम्बे और तकलीफदेह दौर के बाद और बड़ी मुश्किल से मिली इन नौकरी को भी एक बार छोड़ने को तैयार हो गया था, परन्तु ़सचाई यह है कि मैं तब तक जानता ही न था कि भाषा क्या होती है, भाषा कैसे फैलती-फलती-फूलती है, और मैं ऐतिहासिक औचित्य के विरुद्ध काम कर रहा था इसलिए पूरी भारत सरकार भी सिर के बल खड़ी हो जाती तो हिन्दी को व्यवहार्य नहीं बना सकती थी और यदि बना देती तो ऐसी अन्तर्ग्रन्थियॉं पैदा होतीं जिनके दुष्परिणाम का हम अनुमान तक नहीं कर सकते। जो प्रयोग में आया ही नहीं उसके दुष्परिणाम को समझना कठिन है, पर उसके घटकों की व्याख्या करें तो वह समझ में आ जाएगी।‘’

’’क्यां तुम अपने कथन को प्रभावशाली बनाने के लिए उलटबॉंसियों में बात नहीं कर रहे हो?’

’’उलटबॉंसी का मतलब जानते हो?’’

“जानूँगा क्योंा नहीं, चमत्कार पैदा करने के लिए उलटी पलटी बातें करना।‘’

’’उलटबॉसी का अर्थ है अब तक तुम उल्टे सिरे से बॉंसुरी बजा रहे थे, शब्दों का उल्टा अर्थ ले रहे थे, जिससे शोर और नासमझी पैदा हो रही थी, विचार और सही समझ नहीं। इसे सही सिरे से पकड़ो और सही सिरे से फूँक मारो तो संगीत भी पैदा होग, समझ भी और यह पढ़े-अनपढ़ सभी की समझ में आजाएगा और एक वैचारिक क्रान्ति पैदा हो जाएगी।‘’

“यार तुम कह रहे हो तो दोस्ती के लिए मान लेता हूँ पर इस तरह की व्यापख्या तो दूसरे किसी ने की ही नहीं।‘’
‘’की भी हो तो क्या तुम सर्वज्ञ हो। कहो, यह तो पहली बार जान रहा हूँ।‘’

’’तुम्हारी आदत है, बाल की खाल निकालने की। पुरानी बीमारी है, छूटेगी कुछ देर से। पर यह बताओ, उसे सधुक्कवड़ी भाषा क्यों कहते हैं?’’

’’इसलिए कि तुम जैसे नासमझ यह समझ नहीं पाते कि अ ब से कितनी दूरी पर मिलता है। सधुक्कड़ी का मतलब बिल्कु़ल अलग है। इसका अर्थ है वह भाषा जिसमें कई भाषाओं का घालमेल हो गया हो, क्योंकि साधु सन्त अपने मत का प्रचार करते हुए कई भाषाक्षेत्रों में विचरण करते थे और यह मैं बता चुका हूँ कि यह पैदल यात्रा, एक ही गॉंव या उससे सटे गॉंव में कई दिनों, कभी कभी महीनों के निवास के कारण वे स्थानीय भाषा में अपनी बात कहने लगते थे और उनकी वचनावली में एकाधिक बोलियों के तत्व मिल जाते थे। इसके लिए शायद शुक्ल जी ने पहली बार इस सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग किया था और वह तब से अब तक चालू है। सन्तों और सूफियों की भाषा में यह भेदक अन्तर है। सूफियों की भाषा उस अंचल विशेष की भाषा है और सन्तों की भाषा एक विशाल क्षेत्र के कतिपय प्रभावों से बनी भाषा है। सन्तों के बोध क्षेत्र में भारतीय परंपरा और इतिहास का बोध तो है ही, ज्ञानपरंपरा का सार भी है, इसलिए इसमें एक क्लाकसिक ऊँवाई है, सूफियों के काव्य में लोकचेतना और संवेदना की अभिव्यक्ति है जो भाषा और विचार दोनों दृष्टियों से एक सीमित परिधि में सिकुड़ कर रह जाती है। ‘’

“’यह कहॉं लिखा है? किसने कहा है ऐसा?’’

‘’यदि तुम्हािरी तरह ग्रन्थीे होता तो ग्रन्थ से आगे बढ़ ही न पाता, न ऐसा कुछ कह पाता जिसे अपना विचार कह सकूँ। तुम्हारे जैसा फूलचन्द बन कर रह जाता जो अक्षत तो लाते हैं पर यह तक नहीं जानते कि इसमें टूटे चावल भी मिले हुए हैं। अक्षत का मतलब जानते हो? यह उस युग का शब्द है जब वन्य नीवार के छिल्के नाखून से उतार कर चावल निकाला जाता था। जब कूटने के औजार तक विकसित नहीं हुए थे। अक्षत उस युग की सबसे बड़ी निधि है। इतने श्रम से अर्जित और संचित । इससे बड़ी कोई निधि हो सकती थी किसी के पास किसी को देने के लिए? इसका निर्वाह रीतिविधानों में बहुत बाद तक किया जाता रहा। पता नहीं किस संहिता का वाक्य है, स तु कृष्णानां व्री‍हीणां नखै निर्भिद्य नैर्ऋतं चरुं श्रपयति। तुम सोचते हो अक्षत चावल ही तो है। रीतिविधान को त्याग दें तो हम आधुनिक हो जाऍंगे। पहले अपनी भाषा, अपने समाज, अपने इतिहास को समझो और तब शायद पता चले कि इनको जारी रखने से हमारी प्रगति का रास्ता बन्द नहीं होता, पर समझ का रास्ता अवश्य बन्द हो जाता है।‘’

’’अब जिधर तुम बहक गए हो, उधर से मोड़ कर सही रास्तेा पर लाने के लिए चौबीस घंटे का समय तो चाहिए ही। चलूँ।‘’ ’

’चलो, घरवाली कोस रही होगी, पर यह ध्यान रखो कि तुम जब अपनी भाषा के उन शब्दों तक को नहीं समझते जिनका आए दिन बोलचाल में व्यवहार करते हो, तो तुम किस भाषा को राजकाज की भाषा बनाने पर तुले थे और उससे भाषा और देश का अनर्थ होता या नही?”

Post – 2016-02-26

हिन्दी का भविष्य (1)

‘’राजनीति के चने चबाना सबके बस की बात नहीं। जिन्होंने पूरी जिन्दगी लगा दी उनके भी दॉंत टूट जाते हैं, तुम तो न इसकी खबर रखते हो, न इसमें भाग लिया, तुम्हें यह डरावना लगेगा । तुम जिसको समझते हो उसी पर बात किया करो।‘’

’’समझता तो मैं किसी को नहीं हूँ। और राजनीति को तो समझ ही नहीं सकता क्योंकि इसमें गलत कुछ होता ही नहीं; सही कुछ हो ही नहीं सकता। अपनी अपनी जगह पर सभी इतने सही होते हैं कि मिटने के कगार पर भी सही खड़े रहते हैं।‘’

तुमने ठीक समझा इसलिए अपनी दुनिया में ही रहो, परधर्म भयावह होता है। तुम वह जो इतनी लम्बी भूमिका बना रहे थे हिन्दी के भविष्य के बारे में उसकी नींव खोद कर ही इमारत बनी समझ बैठे और जाने कहॉं कहॉ घूम आए । लौट कर देखा भी‍ कि नींव बची हुई है या नहीं।‘’

‘’मैं हिन्दी के भविष्य के बारे में नहीं, भारत के भविष्य के बारे में, भारत के सभी भाषाभाषियों के बारे में बात कर रहा था । और मैं राजभाषा की बात भी नहीं कर रहा था, कागज पर तो वह है ही। कोई हिन्दी में ही लिखे पढ़े तो उस पर कोई रोक नहीं है। मैं शिक्षा की बात कर रहा था। उस बौद्धिक पराधीनता से उबरने की और आन्तरिक उपनिवेशों से मुक्ति पाने की बात कर रहा था जिसकी एक परिणति संपर्क की भाषा और केन्द्रीय राजकाज की भाषा से जुड़ जाता है। यह कोई नई बात भी नहीं है, परन्तु इसके लिए कभी ईमानदारी से प्रयत्न नहीं किया गया।‘’

’’तो तुम समझते हो इस बीच ईमानदारी की इतनी बृद्धि हुई है कि जो पहले संभव नहीं था अब संभव हो सकता है।‘’ उसने अपने जुमले का पूरा मजा लेने के लिए मेरी पीठ पर एक धौल भी जमा दिया।

’’देखो, ईमानदारी का भी एक समय होता है, परिस्थितियॉं होती हैं, और इसके लिए अपेक्षित मनोबल भी जरूरी होता है और ये सभी एक दूसरे से जुड़़े होते हैं।‘’

’’तुम्हें कहना चाहिए था कि ईमानदारी से बात करने का एक मुहूरत भी होता है इसलिए जोतिसी से पूछ कर ही सही बात बोली जा सकती है।‘’

’’ठीक कहा तुमने। मुहूरत भी होता है परन्तु इसके लिए जोतिसी की जरूरत नहीं होती, सिर्फ ऑंखों में जोत की और दिमाग में होस की जरूरत होती है। इसे ही सही ऐतिहासिक चरण कहते हैं। जब मैं साम्यवाद की आलोचना करते हुए कह रहा था कि यह अपने सही समय की प्रतीक्षा नहीं कर सका, इसे उससे पहले ही लाने का प्रयत्न किया गया इसलिए यह रुग्ण पैदा हुआ,यह एक तरह का भ्रूणपात था। इसे पूँजीवाद के चुक जाने, अपनी ही थकान से लुढ़क जाने तक की प्रतीक्षा करनी चाहिए थी तब यही कह रहा था।

इस पर उसने मुँह तो बनाया पर बोला कुछ नहीं। मैंने अपनी बात जारी रखी, ‘’समय से पहले प्रयत्न अधिक करना होता है, फिर भी विश्वास नहीं होता कि ऐसा हो ही जाएगा इसलिए लोग मरे मन से औपचारिकता का निर्वाह करते हैं और फिर वह भी खत्म हो जाती है। सही समय आने पर परिस्थितियों के दबाव में परिणाम सुनिश्चित और सुलभ्य लगता है इसलिए लोगों में उत्साह का संचार हो जाता है, आत्मविश्वास बढ़ जाता है और वे कृतसंकल्प हो कर काम कर सकते है। इतना ही नहीं, वे जानते हैं कि यदि वे ऐसा नहीं कर सके तो सड़ने और मिटने के अतिरिक्त कोई दूसरा चारा नहीं रह जाएगा। फिर भी यह सवाल तो पैदा होगा ही कि क्या इतना जीवट बचा है इस देश में जिसके मानमर्दन के उपायों को गौरव गाथा की तरह दुहराया जाता रहा है।‘’

’’एक कदम आगे, दो कदम पीछे, एक कदम आगे, दो कदम पीछे, बढ़े चलो बहादुरो बहादुरो बढ़े चलो, और इहो देखलो कि अगर तुम चलने से इन्कार कर दिए तो मंजिल को ही चल कर तुम्हारे पास आना पड़ेगा जैसे ऋतुकाल आने पर डाल को हिलाओ न भी तो पके हुए फल को गुरुत्वा‍कर्षण के जोर से नीचे आना ही पड़़ेगा। यही कहना चाहते हो तुम ?’’

’’मैंने कुछ और कहा था, परन्तु उसे ग्रहण करने की योग्यता तुममे नहीं है। मैंने यह भी कहा था कि यदि पके हुए फल को अपने आप इतिहास के नियम से अपने मुँह में आने की आशा करोगे तो तुम भूखों मर जाओगे और वह गिरा हुआ फल भी सड़ जाएगा और दोनो से केवल दुर्गन्ध फैलेगी। इसलिए सही ऐतिहासिक चरण पर संकल्प और सक्रियता का अभाव और इस संकल्प और सक्रियता को जगाने वाले नेतृत्व का अभाव उस भविष्य की ओर ले जाता है जहॉं आप तब तक सुरक्षित है जब तक आप पर आपके पालनहार देशों की अनुकंपा बनी हुई है। जिस दिन यह कम हुई आप मिटने लगेंगे और या चुक गई तो आप एक झटके में मिट जाऍंगे।‘

’’मुझे तो हैरानी यह होती है कि तुम तो मेरी ही बात दुहरा रहे हो और मुझे गलत भी साबित कर रहे हो। अरे भाई जब हम आगे बढ़ते हुए भी दूसरे एशियाई देशों की तुलना में पिछड़ते जा रहे हैं तो एक कदम आगे दो कदम पीछे का मुहावरा क्या
गलत है? और तुम जो ठहराव या यथास्थिति को भावी उपलब्धि मान रहे हो, भावी से मिलन होगा का गाना गा रहे हो, वह भी तो किसी राजकुमार के नेतृत्व में ही होना है। वह तो गायब है फिर ले दे कर वही सॉंप और सीढ़ी का खेल। सच कहो तो वह भी नहीं, उसमें चढ़ाई होती तो है, यहाँ तो परिभाषाऍं बदल कर मान लिया जाता है कि कैलाश के शिखर पर पहुँच गए। तुमने ही अपनी किताब में लिखा था, ‘छोटे नरक से बड़े नरक की यात्रा छोटे स्वर्ग से बड़े स्वर्ग की यात्रा से अधिक शानदार होती है।‘ तुम बता चुके कि स्थिति नारकीय है। क्या तुम छोटे नरक को बड़े नरक में बदल कर जश्न मनाना चाहते हो?’’

’’तुम्हारे रहते मैं ऐसा क्यों चाहूँगा। तुम बेरोजगार हो जाओगे। मैं चाहता हॅू कि तुम मेरे कहे का अर्थ तो समझो। उतना ही तुम्हें विद्वान बनाने और रोजी रोजगार दिलाने के लिए काफी है, क्योंकि तुम को मेरे दो कदम पीछे का अर्थ तक नहीं मालूम। एक कदम आगे बढ़ने का मतलब है जो मिला है उसे अपने मानसिक उपापचय तन्त्र में डाल देना जहॉं गल-पच कर वे नई उूर्जा का उत्पादन कर सकें। नजर हो तो तुम्हें उस बुनियाद का परिचय मिलेगा जहॉं परिभाषाऍं बदल जाती है। तुम तो उन सुन्दरियों जैसे हो जो स्वाद पर काबू न रख पाने के कारण जो रुचा उसे खा तो लेती हैं पर इस चिन्ता से कातर हो कर कि इससे तो उनका वजन बढ़ जाएगा, शक्ल बेडौल हो जाएगी, उल्टी करने की आदत डाल लेती हैं और मनोरोगियों की कतार में खड़ी पाई जाती हैं। आज नहीं समझ पाओगे, समझाऊँ तो भी, कल फूल अच्छत ले कर आना तब बताऊँगा कि संभावना की किरण कहॉं से उदित हो सकती है और उसको अवसर देना हमारे सकल उत्थान के लिए कितना जरूरी है।
२६/०२/१६

Post – 2016-02-25

ये बौखलाहट भरे दिन हैं। उससे भी अधिक रहस्यमय गतिविधियों के दिन। फेसबुक पर विवेक मिश्र ने एक बहुत अच्छा विश्लेषण किया है जिसे दूसरों को भी पढ़ना चाहिए। उनके अनुसार पिछले लोकसभा चुनाव में जिन जिन श्रेणियों के मतदाओं का पहले की अपेक्षा अधिक समर्थन मोदी को मिला था उनको चिन्हित करके उनके बीच संवेदना भड़काने वाले मुद्दे तलाश कर लोगों को भड़काया जा रहा है।

यह सच है पर इसके साथ यह भी याद रखना होगा कि कांग्रेस के किसी नेता में इतनी चतुरता नहीं है जो इतना सुनियोजित और बहुआयामी और बहुरंगी उपद्रव आयोजित कर सके। यह सुपठित देशभक्तों की पार्टी रही है और इन्दिरा जी के समय तक राष्ट्रीय गरिमा के प्रश्न पर इसके शिखर बिन्दु पर भी कोई समझौता कभी सहन नहीं किया गया। इसके शिखर पर इटालियन इफेक्ट के बाद से सभी तरह के समझौते आरंभ हुए यहॉं तक कि भोपाल गैस त्रासदी के साथ समझौता तक जो आज इस चरम पर पहुँच गया है जिसे बदहवाही से अलग कोई नाम नहीं दिया जा सकता।

यह राष्ट्रीय बदहवासी नहीं है, कांग्रेस नेतृत्व की बदहवाही है जो सान्निपातिक लक्षणों से युक्त है, कथनी में भी करनी में भी, परन्तु इसे पीछे से नियन्त्रित करने वाली ताकत पूरे होस हवास में है – शीतयुद्ध के सीआइए और केजीबी की तरह। शीतयुद्ध सोवियतसंघ के बिखराव और उसके निराले समाजवाद की थकान से उत्पादन में गिरावट और आर्थिक कमजोरी के बाद से शीत-ताप-युद्ध में बदल कर नए रूप में जारी है और अब प्रतिरोधी शक्ति के अभाव में अधिक आक्रामक हो चला है। इसके निशाने पर वही शेष दुनिया है और वेस्ट के नाम पर केवल अमेरिका जो गोरे देशों को जब तक कोई बड़ी अड़चन न पैदा हो जाय, छेड़ने वाला नहीं है।
अभिव्यिक्ति की स्वतन्त्रता का पुराना राग आज भी उसके अफवाहों की सूची में है जिसका उपयोग उसने आपात काल में भी किया था और आज भी कर रहा है जब किसी को कुछ भी कहने की आजादी मिल चुकी है। मैंने ऐसी कविता पढ़ी है जिसमें देश के प्रधानमन्त्री तक को सूअर कहा गया है। संसद के लिए सूअरेर बाड़ा बहुत पहले भी पोस्टरों और पर्चों में देखा जा चुका है। आपातकाल के प्रति अपनी घोर असहमति के बाद भी और इन्द्रा जी के तानाशाही रवैये के विरुद्ध स्वयं छद्मनाम से लिखने के बाद भी मैं उनके इस अभियोग को, जिस पर तब विश्वाास नहीं करता था, आज पूरी तरह नकार नहीं पाता कि इसके पीछे अमेरिकी हाथ भी था भले इसका तत्कालीन संघ को और दूसरे आन्दोलनकारियों को स्वयं भी गुमान न रहा हो।

अमेरिकी ऐजेन्सियों के काम करने का तरीका इतना चतुराई भरा है कि सीधे उनके उकसावे तक का सामना न करना पड़े और आप को लगे आप स्वंयं अपने निर्णय से ऐसा कर रहे हैं। इसमें आज उसका सबसे कारगर हथियार ईसाई मिशनरी हैं जिनके एक भिन्न मजहब होने के कारण नहीं अपितु अमेरिका पोषित होने के कारण है एक खतरनाक उपस्थिति मानता हूँ। सोनिया जी के प्रभुत्‍व के अन्तर्गत उसे जितने रूपों में और जितना बढ़ावा मिला, संचार माध्यमों
में किस तरह उसके रास्ते बनाए गए, उसका शतांश भी सतह पर उजागर नहीं है यदि है तो केवल कतिपय सर्वविदित क्षेत्रों में उसका धमान्तरण का अभियान। गांधी परिवार आज नामत: जो भी हो धर्म: क्या है यह छिपा नहीं है इसलिए राहुल गांधी ही ऐसे व्य क्ति हो सकते थे जो अपनी नासमझी में यह कह कर कि भारत को टेररिज्मि से उतना खतरा नहीं है, जितना हिन्दुतइज्म से और वह भी विदेशी जमीन पर, उस सचाई को उजागर कर दें जिस पर परदा डाला गया था।

दलितो और मुसलमानों को जोड़ने, स्त्री- अधिकारों की ऐसी भूख कि आज तक उनको शनि की छाया से डर लगता था आज वह उनके मन्दिर में पुरुषों से समानता के आधार पर प्रवेश की मॉंग करने के लिए आन्दोलन के लिए भीड़ जुटाने में सफल हो गई और वह भी वे महिलाएँ जिनकी आधुनिक वेशभूषा से स्वत: प्रकट हो कि इनका मन्दिर या किसी देवता में विश्वास ही नहीं होगा। स्वा मीनारायण संप्रदाय में ब्रह्मचर्या पर इतना जोर है कि जब उनके मन्दिर में उसके साधु प्रवेश करते हैं, उसमें किसी स्त्री का प्रवेश नहीं हो सकता। मैं अपनी पत्नी के साथ मन्दिर देखने गया था और पाया महिलाऍं बाहर प्रतीक्षा कर रही हैं। पत्नी को भी प्रतीक्षा करनी पड़ी यद्यपि मैं यह देखने के लिए बढ़ गया कि उनका परिधान और उपासना की रीति क्या है। वे कुछ परिक्रमाऍं करते हैं परन्तु उनके उत्तरीय को लहराता हुआ छोर भी किसी स्त्री से छू जाए तो उन्हें कड़ाके की ठंड में भी दुबारा स्नान करना पड़ेगा। पर आन्दोलन इस बात का कि पुरुष यदि जा सकते हैं तो हम क्यों नहीं। विचित्र मॉंगें जो इससे पहले कभी उठाई नहीं गईं, एक झटके में इस उम्मीाद में उठाई गईं कि इसमें शासन हस्ततक्षेप करेगा क्योंकि दोनों राज्यों में भाजपा का शासन है जिसका रवैया परंपरावादी होगा और उन्हें शासन पर हमला करने का मौका मिल जाएगा और फिर भाजपा को मनुवादी अत: ब्राह्मणवादी ठहरा कर शेष जातियों को उससे अलग और वर्णवादी असमानता का शिकार दिखा कर उन्हें लामबन्दण करने, ईसाई-मुस्लिम-दलित एकता के नाम पर उनको हिन्दू् समाज से अलगाने में मदद मिलेगी। यदि आपने ‘लाखों भारतीयों की आकांक्षाओं का प्रतीक’ फारवर्ड प्रेस के अंक देखे हों तो इस योजना को समझने में आसानी होगी। इसके संपादक हैं डॉ. सिल्विया फर्नांडीस जिनकी संपादकीय योग्योता का मैं प्रशंसक हूँ और कार्ययोजना को सामाजिक सौमनस्य के विपरीत पाता हूँ। समझ की खोट हो सकती है। राजनीतिक पैंतरेबाजी की समझ मुझमें बिल्कुल नहीं है, उस नाले में कभी उतरा ही नहीं जो स्वच्छ हो तो पतित पावन बन कर आसमुद्र प्रवाहित होता है और मलिन हो तो परनाले में बदल कर पतित पावनियों से ले कर समुद्र तक को मैला कर देता है। औपनिवेशिक चंगुल से निकले सभी देशों की राजनीति परनालों की राजनीति क्यों बन गई यह नवमुक्त देशों को मिलकर सोचना चाहिए।

यदि मेरे ये विचार आपको मूर्खतापूर्ण लगें तो आपके समर्थन में हाथ उठाने वालाें में मैं पहला स्थान पाना चाहूँगा क्योंकि जब तब मुझे लगता है कि जो दूसरे सभी मानते हैं या लगभग सभी मानते हैं उसे मैं क्यों नहीं मान पाता । मूर्ख नहीं, सिरफिरा ही सही। कुछ तो गड़बड़ है। परन्तु मेरी चेतावनियॉं बाद में सच बनती रहीं और मेरी व्यााख्यायें जिस झूठ का पर्दाफाश कर सकीं और उनकी फसल उगाने वाले सर्वप्रभुता संपन्न विद्वानों को झुकने को बाध्य कर सकीं, वे पुन: मुझे दुस्साहसी बना देती हैं, इसलिए कहना पड़ता है कि जो मेरी गलतियों को साक्ष्य , प्रमाण, तर्क और औचित्य के साथ उजागर नहीं कर सकते, संचारमाध्यवमों के बल पर ऐसा करना चाहते हैं, उनका जवाब उन परिणामों से मिलता है जो आप के पास थे पर जिन्हें आप दबाते रहे, जैसे इशरत जहॉं के बारे में आप को अमेरिकी जॉंच एजेन्सी से पता था कि वह एक आत्मघाती हमलावर थी और आप उसे निर्दोष बताते रहे। आप आतंकवादियों के साथ तब से खड़े हैं जब से यह सूचना मिली और आपने आतंकवादियों का। इसलिए गलती करने की अधिकतम संभावना के बाद भी, समझदार कहे जाने वाले लोगों द्वारा गलत करार दिए जाने या उपेक्षा किए जाने के बाद भी मुझे यह भ्रम है कि मै बावरा नहीं हूँ, बौद्धिक परिवेश ही बावला हो गया है। मुझे उसकी जरूरत नहीं, उसे मेरी जरूरत है और बावलेपन का हाल यह कि वह इसे जानता तक नहीं इसलिए वह मेरे पास नहीं आएगा, मुझे ही उसके पास जाना होगा। उसकी गालियॉं सुनने के बाद भी, उसकी झिड़कियॉं खाने के बाद भी। उसका आघात सहने के बाद भी। जो होश में नहीं, उसे दोष कैसे दिया जा सकता है।

समसामयिक ‘राज-नीति’ में भागीदारी और समझदारी के अभाव में मैं इतिहास को देखता हूँ। सद्दाम के ईराक को किसने हरबा हथियार दिए थे जिसमें रासायनिक और परमाणु हथियार भी थे। उसे कुर्दों को उत्पीडि़त करने के लिए किसने उकसाया था। इराकी शिया समुदाय के प्रति घृणा यदि पहले उग्र थी तो हमारी जानकारी में नहीं आई थी। कुवैत र्ईराक के भूभाग के तेल भंडारों को भी दोहन कर ले रहा है इसलिए उसे उससे क्षतिपूर्ति मॉगने का अधिकार है और यदि वह न माने तो उसे बाध्य करने का अधिकार है। यह ईराक में अमेरिका की तत्कालीन महिला राजदूत के बयानों से प्रकट था परन्तुे उसे मास मीडिया से जल्द ही हटा लिया गया। कुवैत पर आक्रमण के दौरान अमेरिकी प्रसार माध्यमों से यह विज्ञापित किया जाना कि कल वह तेल के कुओं में आग लगा देगा, अगले दिन आग लग जाती थी, प्रचारित किया जाता वह तेल के टैंकरों को क्षति पहुँचाएगा। अगले दिन तेल के टैंकरों को नष्ट कर दिया जाता। तेल से प्रभावित समुद्र से साइबेरियन पक्षी निकाल कर उनकी सुध लेने वालों के चित्र दिखाए जाते, जिनकी करुण कथा में मनुष्यों का उत्पी ड़न छिप जाता। उसी समय दहशत में मैंने सोचा था आज इन पर बीत रही है कल हमारी बारी है। हंटिंगटन की पुस्तक पढ़ी न थी पर यह पता था यह पश्चिम और उसके नायक अमेरिका और शेष जगत – The West and the Rest का संग्राम है और यह नए रूपों में उभर रहा है जिसके दावपेच तक हमें नहीं मालूम। परमगति के आमुख की ये पंक्तियॉं ‘’सूचना, नव्य- न्‍याय-दर्शन और प्रहारशक्ति का यह सम्मिलित प्रदर्शन देख कर संसार मुग्‍ध था और मैं डर रहा था कि यह किसी दिन किसी के साथ भी हो सकता है। इसकी तैयारियॉं हमारे विरुद्ध भी कई ओर से चल रही हैं।‘

तब जो तैयारी थी वह अब कार्ययोजना बन कर सामने आ रही है इसलिए जरूरी है पड़ोसी की नाराजगी को भी समझें और हम सभी को जो अपना शिकार बना कर ठीक उन्हीं तरीकों से तीसरी दुनिया को अपने लिए खाली कराने के तरीके सोच रहा है उसे कुछ अधिक ध्या न से समझें। राहुल की अक्ल के बारे में लोगों को पता है, शक्ल ऐसी कि कुँवारियॉं क्या विवाहिताऍं तक फिदा हो जायँ, सेहत ऐसी कि लगे यह जिमनास्ट बनना चाहता था या राजनेता, पर इरादे ऐसे कि लगे इसको किसी शातिर ने शिकार बनाया है। राहुल और कांग्रेस पर गुस्साा उतारने की जरूरत नहीं, न मुसलमानों पर। ये अपने अपने कारणों से किसी बड़े बहेलिये के निशाने पर आ गए हैं।

अब अपने इतिहास में जाऍं। इस ऐक्शन प्लान के पहले प्रयोग जिसे अतिसमझदारों ने निर्भया कांड का नाम दे दिया, के उपलक्ष्य में पुलिस से पूर्व अनुमति के बिना आयोजित एक कार्यक्रम में एक विशाल रैली का आयोजन जिसमें पुलिस को वाटर कैनन तक का प्रयोग करना पड़ा, बुलेट प्रूफ का प्रयोग करना पड़ा। इसका संचालन जहॉं से और जैसे हो रहा था उसका पता किसी और को न था और उसका यह भोलापन ही मुझे संत्रस्त कर रहा था । मेरी नासमझी है, पर अन्ना के आन्दोलन की मैं सराहना नहीं कर सका और उनका इस्तेमाल करने वालों ने उन्हें जहॉं पहुँचा दिया वह उसी के काबिल थे। उन्हें किनारे डालने वालों ने विजय के बाद भी राजपथ से सटे, गणतन्त्र दिवस से ठीक पहले जो नाटक इस आशा में किया कि इसे दमन करने के लिए गोली चलेगी, राजपथ को देश हित से विचलन को कोई नया नाम देना होगा उसे तत्‍कालीन गृहमन्‍त्री की सूझ से विफल कर दिया गया और अनशन एक दिन एक रात में ही, खत्‍म हाे गया। भारत को असंतुलित बनाने के जितने संभव तरीके हें, वे सभी उठाए जा रहे हैं। गांधी परिवार का दुर्भाग्य है कि उसने साेच लिया कि वंश हमारा ही चलेगा। परन्तु इस महत्वाकांक्षा के कारण वे स्वयंं असमंजस में हो सकते हैं- भारत में ही कहीं हमको जगह मिल पाएगी क्या् या विदेश जाना होगा जहॉं सुनते हैं बहुत बड़ी कंपनी में इतना अधिक पैसा लगाया गया है कि उसकी शर्त पूरा करने के लिए वहॉं की नागरिकता लेनी पड़ी। मैं ईश्‍वर से प्राथर्ना करता हूँ कि इस चिट्ठठे का एक एक शब्‍द गलत हो और इसे मेरी नासमझी माना जाय।

Post – 2016-02-23

आमुख-विमुख
आज फरवरी की 22वीं तिथि है। जिस समय मैं ये पंक्तियॉं लिख रहा हूँ, उस समय टीवी पर जाट आरक्षण को ले कर हुई हिंसा और आगजनी से पूरा हरयाणा दहक चुका है। जले हुए पार्को, टोल बूथो, मालों, दूकानो, कारो, बसो, मालगाडि़यों के दृश्य चैनलों से दिखाए जा रहे हैं और यह आगजनी एक दाह बन कर मुझे और मुझ जैसे करोड़ों लोगों को शर्म, अपमान और ग्लानि से अभिभूत कर रही है। यह किसका प्रदेश’ है ? जाटों का ? इसे कौन तबाह कर रहा है? स्वयं जाट ? इसका अगुआ कौन है? कोई नहीं ? यह किसी मॉंग को लेकर किया जा रहा आन्दोलन है, या आरक्षण की आड़ में भड़काया गया दंगा? इसे किसने भड़काया है और भड़काता जा रहा है और मुँह दिखाने का साहस तक नहीं कर पाता ? क्या वह भी जाट ही है? अपने घर को ही बर्वाद करने के किस्से जिस विक्षिप्त मानसिकता को प्रकट करते हैं, वह जाटों के बारे में इतनी सच हो सकती है कि हजारों लाखों में कोई होश हवास में न मिले? क्या जाटों की असाधारण समझदारी के जो किस्‍से लोग विनोदवश सुनाया करते थे, उनको सच सिद्ध करने की ठान कर ऐसा किया जा रहा ? जब तक उन असाधारण प्रतिभा के मित्रों की याद बनी हुई है, पूरी जाति को ले कर इस तरह की याद आना भी शर्मनाक है, परन्तु वे मनस्वी, लोग किस कोने में छिप गए हैं जो जाट पहचान से जुड़े अनर्थ पर हस्तक्षेप तक नहीं कर पाते।
सच यह है कि एक जाति के रूप में जाटों की छवि को ही नष्ट करने का खेल खेलने वाला कोई और है जो उस परदे के पीछे लगे परदे में कहीं छिपा होगा। कारण यह अकेले एक कारण से एक राज्य में नहीं हो रहा है, अखिल भारतीय स्तर पर असंख्य झूठे और धूर्ततापूर्ण बहानों से किया गया और किया जा रहा है और जब से उसकी भ्रष्टता, कुनबापरस्ती और ढोंग के कारण भीतर से खोखली हो चुकी कांग्रेस को मतदाताओं ने अस्वीकार करने का मन बना लिया तभी से इसकी तैयारी और प्रयोग चल रहे थे कि यदि सत्ता हमारी मुट्ठी में न रही तो संसद, लोकतन्त्र यहॉं तक कि इस देश को नष्ट कर देगे, परन्तु झुकेंगे नहीं ।

पूरा देश विस्मय में था कि युवराज एकाएक संसद का सत्र छोड़ कर कहॉं गायब हुआ और इतने रहस्यमय ढंग से क्यों गायब हुआ कि लोग अटकलें लगा रहे हैं वह है कहॉं? कब लौटेगा? क्या कर रहा है? राजमहल के बहुमुख बहुत कुरेदने पर ताली बजाते हुए गाते थे, ‘लौटेगा भई लौटेगा’, राजा भैया लौटेगा, राजा बन कर लौटेगा’ केवल, यह नहीं बता रहे थे कि कहॉं है और कब लौटेगा और बाद में पता चला वह किसी रहस्य मय राजनीति की ट्रेनिंग पर गया था और क्या सीख समझ कर आया इसका कभी खुलासा नहीं हुआ। उसका आत्मविश्वास का स्तर अवश्य पहले से बढ़ा मिला और वह बाद की पराजयों से भी कम नहीं हुआ और आज तक बना हुआ है।

क्या वह उसी की ट्रेनिंग का असर है जो इतने व्यापक रूप में दिखाई दे रहा है? संसद नहीं चलने पाएगी, संसद जिस प्रयोजन से बनी है, उसकी जरूरत हमें नहीं, वह हमारी शर्तो पर चल सकती है और विपक्ष के दावेदारी के बाद भी संसद हम चलाऍंगे जनता के प्रतिनिधि नहीं। देश पर हमारा शासन नहीं तो हम इसे नष्ट कर देंगे। हम इस देश के जन्मजात शासक हैं और जो कुछ है हमसे ही है।

मुझे इस समय अपनी ही एक कृति की जिसे मैंने चम्पू (गद्य पद्य मिश्रित) शैली में लिखा था, कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं जो 1997 में लिखी गई थी पर इस चिन्ता में लिखी गई थी कि आगे होने वाला क्या है:-

खूँबहा किसने लिया खून बहाया किसका।
क़त्ल जिसने भी किया कत्ल कराया किसका।।
किससे मिल कर के किया किसके इशारे पर किया ।
किसको क्या सब्ज दिखा किसके सहारे पर किया ।।
फिर भी कहते रहे सब कुछ है हमीं से, हमसे ।
और कहते रहे घटकर है यह आलम हमसे ।।

लिक्खोे भूगोल नया, लिक्खो इतिहास नया।
लिक्खोे इस तरह कि लोगों को विश्वास नया ।।
जो भला है वह भला मेरे खानदान से है।
कुछ बुरा भी है हुआ, देखिए किस शान से है ।।

झूठ पर झूठ के अम्बारर लगा कर रख दो।
जो बदनुमा है उसे दूसरों के सर रख दो ।।
कहीं नहीं हैं कहीं भी नहीं लहू के निशान।
न दस्तो पा में ने टोपी में न अचकन में कहीं ।
न ही उस भूल में जो फूल बनी लिपटी रही ।
सोच में भी नहीं, देखो कहीं जहन में नहीं ।।

उचक उचक के यही तर्ज गुनगुनाते हुए ।
बदल के शब्द वही नीतियॉं चलाते हुए ।।
लगे कि देश यह आजाद है गुलाम भी है।
कि वही राज छुपा गो है सरेआम भी है ।।

बोली बानी में वही, चुश्त जबानी में वही ।
गौर से देखिए तो फिर कई मानी में वही ।। …

ताज किनको मिला और ताजिए किनके निकले।
पाई आजादी पर किस भाव पर और किनके भाव
सिर कलम किनके हुए किसकी शहादत ठहरी
लाभ किसका हुआ किन लोगों के नुकसान के बाद ।
फिर भी समझाया कि यह मेरी इनायत ठहरी ।

जाहिर है जब इसे लिख रहा था तब कोई यह सोच भी नहीं सकता था कि नेहरू की चेतना में वंशवाद और आत्मराग और सत्ता के लिए देश और समाज का किसी तरह का सत्यानाश स्‍वीकार्य था। इसके खुलासे के लिए चौथी पीढ़ी तक प्रतीक्षा करनी पड़ी जब कांग्रेस के अपने ही एक पत्र ने उसका इतिहास और अन्त:-सत्य उगल दिया। गनीमत है कि जिस समय मैं अपना यह आमुख लिखते हुए विमुख लोगों को भी संबोधित कर रहा हूँ मेरा मित्र यहॉं नहीं है, वर्ना पूछता, तुम स्वयं बुद्धिजीवियों को राजनीति से दूर रहने को और अपना काम करने को कहते हो और खुद भी राजनीति में घुस गए और जैसी कि मेरी आदत है मुझे कहना पड़ता, ‘तुम मूर्ख हो इसलिए राजनीति की समझ, उसके बौद्धिक विमर्श और नारेबाजी, मजमेबाजी और हथियाने वाली सक्रिय राजनीति में फर्क ही नहीं कर पाते तो दोष किसका है?

इतना भारी नुकसान हुआ है कि लोग बयान दे रहे हैं कि रोहतक नगर बनने से पहले यह जो कुछ था उसमें पहुँच गया है। सुनते हैं आइंस्टाहइन ने कभी कहा था कि यदि तीसरा विश्व युद्ध हुआ तो उसके बाद के युद्ध पत्थर के हथियारों से होंगे। उसकी याद आ रही है। परन्तु आइंस्टाइन को भी पता नहीं था कि तीसरा विश्व युद्ध हथियारों से नहीं अफवाहों और सूचनातन्त्र के विनाश के माध्याम से लड़ा जाएगा जिसमें सूचना के स्रोत भी अफवाहों के प्रसार में सहायक की भूमिका ऐसे तेवर से देंगे कि लगे झूठ ही सच है और सच ही झूठ। फिर उसी पुस्त क की याद-

सच की महिमा बहुत है सच बिन मोल बिकाय।
लागे लंगी झूठ की मुँह के बल भहराय ।।
सच के बल हरिचन्द से सेवा डोम कराय।
उूपर से सुत का मरन, घरनी रही बिकाय ।।
अनृतमेव जयते रे बन्दे अनृत अमृत की खान।
अनृतानृत के जोर से यह चल रहा जहान ।। २३/०२/१६
अपू्र्ण

Post – 2016-02-20

मित्रो मैं आज तुलसीदास की लेखक के दायित्व पर सबसे सरगर्भित टिप्पणी की और आप का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा :
भाषा भणिति भूति भल सोई सुरसरि सम सबकर हित होई. इसमें सबकर हित की साधना ही लेखक को सबका सेवक बना देती है. पाठक मित्रों ने आदेश दिया, ड्यूटी पर हाज़िर रहना है. प्रूफ वूफ का बहाना नहीं चलेगा. सो हुक्म तो बजाना ही पड़ेगा.
परन्तु यह याद दिलाते हुए कि हाल के दिनों में आई सार्विक गिरावट के कारण सुरसरि भी कलुषित हुई और भाषा और भणिति भी. अपनी अक्लमंदी में लेखक यह तक भूल गया कि जब वह सब कर हित को समर्पित होता है तो तानाशाह भी उससे डरते हैं, अपने रस्ते से सबसे पहले हटाते भी उसी को हैं पर हटा नही पाते क्योंकि वह जन-मन तक पहुँच चुका होता है. भाषा और भणिति की पवित्रता और लेखक और विचारक का गौरव और साहित्य की गरिमा तभी तक बनी रहती है. जब लेखक, कलाकार,विचारक ताज और सिंहासन से जुड़ना चाहता है तो उसे सत्ता में बैठे लोगों के चरण चूमने पड़ते हैं और उनकी अपनी कलाबाज़ी के कारण वे कलाबत्तू लगे मसखरों में तब्दील हो जाते है और भाषा और भणिति की सुरसरि विशालकाय नाले में बदल जाती है. हमारे हंगामेबाज लेखको, अध्यापकों, पत्रकारों को आत्ममंथन करना चाहिए और सत्ता की चरणधूलि बनकर इतराने की जगह जन गण को समर्पित होकर कम से कम भाषा और भणिति की सुरसरि की पवित्रता पर ध्यान देना चाहिए.

इसके साथ ही एक चिंतित करने वाली संभावना. क्या आप कोल्ड वॉर या शीतयुद्ध का अर्थ जानते हैं.आपमें से बहुत से लोग जानते होंगे, पर मैं नहीं जानता था. आज समझ में आया कि इसका अर्थ है अफवाह और दुष्प्रचार से शत्रु देश को उसके ही भीतर विक्षोभ और अराजकता पैदा कर के उसे अंतर्ध्वस्त कर देना. इस युद्ध में अपने खुफिया तंत्रों के माध्यम से अमेरिका और रूस दोनों तृतीय विश्व युद्ध लड़ते रहे और दुनिया के दूसरे देशों में अपनी पैठ के अनुसार अपनी जंग लड़ते रहे और हमारे लोग भी उसमें शामिल हुए. अमेरिका ने सोवियत संघ को ध्वस्त कर दिया. भारत में कम्युनिस्ट विचार दर्शन ने उसे टक्कर दी पर आज के दिन सारे मार्क्सवादी अमेरिका की गोद में चले गए हैं और तेवर सेकुलरिज्म, साम्यवाद का रखे हुए हैं. प्रसंगवश यह याद दिलादें कि हमारे यहां शीतयुद्ध के लिए ‘छाया युद्ध’ का प्रयोग किया जाता था.
खैर शीतयुद्ध तत्वतः द्रव्य युद्ध था. जो अधिकतम पैठ बना सकता था वह विजेता. यह बोध मुझे अपनी प्रकाश्य पुस्तक इतिहास का वर्तमान का प्रूफ पढ़ते हुए हुआ. उसमें एक उद्धरण है जिसे आपने पढ़ा होगा पर जब जिसने लिखा या उद्धृत किया उसे ही याद नही तो आप को क्यों होगा:
Give me a hundred million dollars and a thousand dedicated people, and I will guarantee to generate such a wave of democratic unrest among the masses–yes, even among the soldiers–of Stalin’s own empire, that all his problems for a long period of time to come will be internal. I can find the people. — Sidney Hook, 1949
अमेरिका पैसे की दौड़ मेँ आगे होना ही था, वह लूट का माल बांटता था, सोवियत संघ अपने लोगों का पेट काट कर दुनिया को समझाना चाहता था कि पूंजीवाद हथियार के बल पर पलने वाली व्यवस्था है और जब तक यह है, मनुष्य शांति से नहीं रह सकता. इसे इंसान को बेहतर इंसान बनाने की जगह उसे अति-सूचना -सम्पन्न शैतान बनाने या किसी ऐसे ही अनुभव से हमारी चेतना में यह भरा गया था कि भौतिक शक्तियों पर विजय पाने वाला राक्षस मनुष्यता के लिए कितना बड़ा खतरा है. अमेरिका के पास एक ही उद्योग है, आयुध परिष्कार और आयुध उत्पादन, यह उसकी ज़रूरत है कि वह शांति की बातें करे और युद्ध भड़काए. सोविएत संघ टूट गया, पर वह अकेला है जो मानवता की रक्षा कर सकता है. अमेरिका आतंकवाद की निंदा करेगा और उसे बढ़ाने के लिए पाकिस्तान को इमदाद भी देगा कि पाकिस्तान से आगे जाने के लिये भारत उसका हथियार खरीदे. मैं मोदी की इस सूझ के लिए दाद तो देना चाहता हूँ कि वह अमेरिका से अच्छे सम्बन्ध भी चाहते हैं, आत्मनिर्भर होने तक सामरिक तैयारी भी करना चाहते हैं पर अमेरिकी जाल में नहीं आना चाहते. विश्वास नहीं होता कि इतनी कूटनीतिक चतुरता इस चाय बेचने वाले के पास हो सकती है! परन्तु तभी ध्यान आता है यह समझ किताबी आदमी में नहीं हो सकती है जो आकाशवेलिवत फैलता हो और अपने ही समाज को निःसत्व करने के बाद स्‍वयं सूखता हो ।.
पर ध्‍यान दें उस उद्धरण पर, क्या अनायास हो जा रहे है एक संस्था से दूसरी तक पलीते की तरह विष्फोट. इसकी जांच होनी चाहिए. इस तंत्र को उजागर करना जरूरी है ऐसे आयोजनों पर सक्रियता एक राष्ट्रीय चिंता का विषय है.पैसे की गणिति को समझना हुंकार भरने से अधिक जरूरी है. कहॉं से आ रहा है वह पैसा, कैसे वितरित हो रहा है और किनके मन क्यों तेजी से बदल रहे हैं। अमेरिका जिसका देास्त होगा उसे बर्वाद करके अपना हित साधेगा- हुआ वह दोस्त जिसका उसका दुश्मन आसमॉं क्यों हो। अमेरिका नही, सोवियत संघ अपनी क्षीणशक्ति के बावजूद हमारा मित्र है परन्तु भारतीय मार्क्सवादी आरंभ से ही स्‍वार्थी रहे हैं और वे नाम के मार्क्सिस्‍ट थे और काम के मामले में पूंजीवादी हितों के अनुकूल रहे हैं । जांँचिये आज के दिन सभी नंगे मिलेंगे और देशद्रोह की सीमा तक जा कर अपने को सर्वोपरि बताने को उद्वेलित भी।

Post – 2016-02-19

मैं इन दिनों अक्‍तूबर 2015 से 31 दिसम्‍बर 2015 तक के फेस बुक पर पेश किए गए विचारों के पुस्‍तकाकार प्रकाशन इतिहास का वर्तमान का प्रूफ देख रहा हूँ। एक दो दिन व्‍यवधान का सामना करना पड सकता है।
पु्स्‍तक का प्रकाशन किताब घर प्रकाशन कर रहे हैं और हमारी समझ से वह इसे मार्च अन्‍त तक पाठकों के लिए सुलभ बना देंगे। अब तो आए दिन मुझे आराम है।

Post – 2016-02-18

अधोगति का दर्शन
‘अब आज तो हमें राष्ट्राभाषा की समस्या को समझना ही पड़ेगा।‘ बैठते ही उसने दागा, ‘रोज कन्नी काट जाते हो।‘
‘राष्ट्रभाषा कोई समस्या है ही नहीं! वह तो लोकस्वीकृत है. राष्ट्रभाषा संविधान से नहीं बनती, न कोई राष्ट्रपिता बनता है, न देशरत्न, न देशबंधु, न लोकमान्य, न गुरुदेव, न महामना…’

’न भगवान, जोड़ दो यार, क्या लगता है, जिस रौ में हो उसमें चल जाएगा।‘

’मैं जानता हूँ तुम इतने गिर चुके हो कि तुम्हें इस बात तक का पता नहीं तुम किसका और कितना अपमान कर रहे हो, और क्यों ! हद यह कि तुम विटी माने जाने के चक्कर में यह तक नहीं जानते कि इनके कारण ही लोग तुम्हें गैरजिम्मेदार या मूर्ख समझ सकते हैं और उसके बाद तुम दिखाई दोगे पर कोई देखेगा नही, रहोगे पर शिफर बन कर। जिसे मिटाना चाहते हो वह तुम्हारी भर्त्सना के कारण ही आसमान में उठता जाएगा, और तुम रसातल में पहुँचने की अर्जी दोगे तो जवाब मिलेगा, जगह खाली नहीं है! त्रिशंकु बन कर टँगे रहो! जगह होगी तो भर्ती कर लेंगे। आज तुम्हारी पार्टी का यही हाल है न और फिर भी नहीं चेत रहे। रामचन्द्रिका की वह पंक्ति तुम्हें याद है, ‘चेतना ही न रही चढि़ चित्त सो चाहत मूढ़ चिताहू चढ्यो रे।‘
’यार, मैंने तो विनोदवश बातों में रस लाने के लिए तुम्हें छेड़ा था और तुम इतने नाराज हो गए कि जिसे पुराने मुहावरे में सात पुश्तोंं की खबर लेना कहते थे, उस पर उतर आए।‘

’तुमने फ्रायड की साइकोलोजी आफ एरर्स पढ़ी है?’

’नहीं पढ़ी है तो अब पढ़ लूँगा। तू इतना गुस्सा क्यों हो गया, यह तो समझूँ ।‘

’गुस्सा नहीं हुआ था। तुझे नंगा देख लिया था और घबरा गया था। जानते हो फ्रायड का हमारे विश्वुबोध में सबसे बड़ा योगदान क्या है?
‘तुम नहीं जान पाओगे, मैं बताता हूँ। उसका योगदान है यह तत्वदर्शन कि जिसे हम चूक, विनोद, दिवास्वन और स्वप्न आदि कहते हैं, इनमें से कोई अकारण या निराधार नहीं हैं। सचेत रहने पर हम अपनी कमजोरियों और विकृतियों पर परदा डाल लेते हैं, आवेग की प्रखरता में हम, उस परदे को उतार फेंकते हैं और हमारी सचाई हमारे न चाहते हुए भी सामने आ जाती है। तुम विनोद नहीं कर रहे थे। हमारे राष्ट्रवादी नेताओं के नाम से ही तुम्हें व्यतग्रता अनुभव होने लगी थी और फिर वह वाक्य‍ तुम्हारी समझ से विनोद के लिए निकला था पर निकला किसी अन्य कारण से था। यह थी आत्मघृणा जो एक उच्च जीवनमूल्य के रूप में तुम्हा्रे अन्त र्मन में एक विकृत पाठ के द्वारा उतार दी गई है। और माफ करना, यह पाठ ही मुझे मेरे सामने नंगा कर गया। मेरी समझ इतनी कम क्यों है कि मैं उस व्यक्ति तक को पूरी तरह नहीं जानता जो झगड़ता तो रोज है पर संबन्धं चुंबक के विरोधी ध्रुवों जैसा ही प्रगाढ़ है ! आज पता चला कि तुम सम्मोहन में मिले आदेशों का पालन कर रहे हो।‘
पता नहीं क्या हुआ, मेरे भीतर एकाएक ऐसा गहरा सन्ताप भर आया कि लगा मैं अपना सन्तुलन खो बैठूँगा। कुछ कहा तो वह भी अनर्थकारी ही होगा। एक दहशत सी भर गई, एक अतीन्द्रिय कुहाच्छन्नता जिसमें ऑंखों के आगे अँधेरा छा गया। अपने को सँभालने की कोशिश की तो ऑंखें गीली हो गईं। अपने दैन्य को छिपाने के लिए मैं उठ खड़ा हुआ।
मेरी स्थिति उससे छिपी न रही, ‘क्या हुआ, एकाएक तुम्हें हो क्या गया। वह भी उठ खड़ा हुआ। मैंने कुछ कहा नहीं, हाथ से बरज दिया, अभी नहीं, अभी कुछ मत पूछो’ और अपने में खोया हुआ ट्रैक पर चहल कदमी करने लगा। वह भी मेरे साथ चलता रहा, चुपचाप, सहमा हुआ सा। पन्द्रतह बीस मिनट के बाद ही थकान सी लगने लगी। किनारे पड़े एक बेंच पर बैठा तो वह वह भी साथ बैठ गया। इस बीच अपने को सँभाल लिया था, इसका आभास उसे भी हुआ होगा। सहमे हुए स्वर में ही बोला, ‘तुम्हें एकाएक हो क्या गया था?’
‘मैं खुद नहीं जानता क्या हो हो गया था। एक विजली की कौंध के साथ जैसे बादलों का दरकना और अन्तमर्दाह से चीत्का‍र करना। एक पर एक कौंध। एक क्रम जो इससे पहले कभी न सोचा था न देखा था। घबरा गया था।‘
‘समझ में नहीं आया क्या् कह रहे हो।‘
‘जानते हो हमारा अवचेतना उस समय भी किसी रहस्यरमय तरीके से काम करता और हमारे चेतन के लिए अग्राह्य सूचनाओं को घोल फेंट कर अपने तरीके से समाधान निकालता रहता है जब हम चेतन स्तर पर किसी दूसरी समस्या से टकरा रहे होते हैं । मैं जब तुम्हें झिड़क रहा था उसी समय मुझे जेएनयू का वह फुटेज सामने आ गया जिसमें अफजल गुरु के जिन्दांबाद और भारत को तोड़ने के नारे लग रहे थे। एक क्षण के लिए यह आशंका उभरी, अपने ही देश के इतने सारे लोग ऐसा कैसे कर सकते है? तभी वे नारे सुनाई पड़ने लगे जिनमें ब्राह्मणवाद को कोसा जा रहा था। सजा कांग्रेस के शासनकाल में हुई थी, फॉंसी उसी दौर में दी गई थी, भले दस पन्द्रह साल लटकाने के बाद, फिर इसमें ब्राह्मणवाद कहॉं से आ गया? फिर याद आया कि फॉंसी भले जज ने दी थी और सारी अपीलें खारिज हो गई थी, फिर भी कांग्रेस उसे बचाना चाहती थी और यह भाजपा थी जो लगातार देशद्रोही को सजा देने की मॉंग कर रही थी। भाजपा को ब्राह्मणवाद बता कर इसी न्याय से उसकी फांसी से जोड़ कर कोसा जा रहा था। घबराहट हुई यह सोच कर कि कांग्रेस उसे इसलिए बचाना चाहती थी कि जिस संसद पर हमला हुआ था, उसका सत्र चल रहा था और कांग्रेस में प्रभावशाली स्तर पर इस बात की पीड़ा थी वह हमला बेकार क्यों हो गया। सफल हुआ होता तो भाजपा के सारे नेताओं का जिन्होंने कांग्रेस से सत्ता छीनी थी, सफाया हो गया होता और उसके दिन लौट आये होते। की सत्ता के लिए कांग्रेस आतंकवादी हमले तक से सहानुभूति रख सकती है. और इस कारण ही अफजल गुरु से उसकी सहानुभूति थी और इसके कारण कोई न कोई बहाना बना कर इसे बार बार टाल दिया जाता था। तभी याद आया हैडली के अमेरिकी खुफिया एजेंसी के सामने यह स्वीकार करने की घटना जिसमें उसने इशरत जहॉं को आत्माघाती हमलावर होने की बात स्वीकार की थी और यह जानकारी मिलने के बाद भी उसे निर्दोष बता कर उन अफसरों को अपराधी सिद्ध करने का प्रयत्न किया जा रहा था और इसमें कोई प्रयत्न बाकी नहीं रखा गया कि उन्हें दंडित किया जाय। इसके साथ ही राहुल का अफजल के समर्थन में और पुलिस कार्रवाई की आलोचना करने पहुँच जाना, तुम्हारे नेता येचुरी की पैंतरेबाजी, दिल्लीे में क्या नाम है जामिया के पास का वह मकान, याद आया बाटला हाउस, जिसमें दिल्लीै में आतंकवादी कार्रवाई करने के अपराधी छिपे थे और जिस इनकाउंटर में पुलिस का अफसर, शर्मा मारा गया था, उसमें शर्मा को ही अपराधी बनाने की साजिश और इसके साथ ही बेशर्मी से कांग्रेस के दौर में हुई लूट जो पूरी तरह रुक गई है, फिर भी इतने कम समय में इतनी बाधाओं के बावजूद इतने नये आयोजनों के बाद किसी को अच्छे दिन दिखाई नहीं दे रहे है और तकनीकी दलीलें दे कर प्रेस से लेकर भीडिया तक संचार के सभी साधनों द्वारा केवल छिद्रान्वेकषण और पुराने दिनों की वापसी का इन्तजार । ये सारी घटनाऍं एक पर एक उस तड़तड़ाहट की तरह जो बिजली गिरने के साथ कुछ पलो के लिए जारी रहती है इस तरह चेतना पर छा गईं की उसे सम्भालना मुश्किल हो गया. लगा मैं भीतर से फट जाऊँगा । उस समय तो मैं स्वयं इनको समझ नहीं पा रहा था कि उसमें कितनी घटनाओं की कौंध एक साथ पुंजीभूत हो गयी थी । ’कांग्रेस का हाथ आतंकवादियों से किस तर्क से मिला हुआ है समझ में नहीं आता। यह तो उनका ही गृहमन्त्रीे था जिससे उसी पार्टी के बड़े घराने का बदजबान मुखौटा कहा जाता है, आतंकवादियों के पक्ष में खड़ा हो कर जंग लड़ रहा था।
’और देखो, उसी समय एक नंगा यथार्थ सामने आया कि अपने सैंतालीस साल के इतिहास में यह इतना ओवररेटेड विश्व विद्यालय किसी भी क्षेत्र में एक भी असाधारण विद्वान पैदा नहीं कर सका। इसकी पैदावारों में वे आत्मघाती नेता जिन्होंने अपने कैरियर के लिए पार्टी का सत्यानाश कर दिया। यह मेरे सोच में पहले से था पर उस क्षण कौंध गया कि करात और येचुरी दोनों जेएनयू की ही उपज हैं। देश को नेतृत्व देने के लिए ज्योति दा के नाम पर सभी दल एकमत थे, इन्होंने ही उसमें बाधा डाली थी। इनके नेतृत्व में ही सीपीएम हाशिए पर आना शुरू हुई और इतनी बेजान हो चुकी है कि अपनी भ्रष्टता के कीर्तिमान स्थापित करने वाली कांग्रेस के साथ गठजोड़ की स्थिति में आ गई है और येचुरी ने जो अभी बयानबाजी की उसको ध्या‍न में रख कर ही कह रहा था ‘चेतना ही न रही चढि़ चित्त सो चाहत मूढ़ चिताहू चढ़्यो रे।‘ पार्टी की अंत्येष्टि का काम जेएनयू का उत्पाद ही करेगा।
‘शायद चिता शब्द और उसका दृश्य ही था जिसने चेतना को इस तरह झकझोरा कि यह सब एक झटके से सामने आ गया।
‘यह बताओ, तुम्हें पता था का इस तरह के आयोजन तीन साल से चल रहा था और कांग्रेस प्रशासन इस पर चुप्पीे साध कर इसे चलने दे रहा था और सेक्युलरिज्म के नाम पर इसी तरह की देशद्रोही गतिविधियॉं भाजपा शासित राज्यों को छोड़ कर सभी राज्यों में चलने दी जा रही हैं कि कही इससे मुस्लिम वोट बैंक खिसक न जाय। ये घटनाएँ पहले दबा दी जाती थीं. पहली बार भाजपा के शासन सँभालने के बाद से सुर्खियों में आती जा रही है।‘
‘‘मैं तो कहूँगा भाजपा स्वंयं इन सबको उछाल रही है हिन्दू वोट बैंक तैयार करने के लिए।‘
‘उठो, फूलहि फलहिं न बेत जदपि सुधा बरसहिं जलद… आगे कुछ कहने की जरूरत नहीं है।‘