Post – 2020-01-31

लिखना नहीं आता है तो लिखता है भला क्यों.
चुप रहने से परहेज, जियादा नहीं अच्छा।।

अर्थात् समीक्षा भारतीय मुसलमान’ की

समीक्षक निर्डरानन्द

इस समय मेरे सामने समीक्षा के लिए दो पुस्तकें हैं। समीक्षा मैं करता नहीं, पर किताब चुनौती दे कि ‘आ बैल मुझे मार’ तो मैं बैल की तरह नहीं, साँड़ की तरह सींग ताने, नथुने फनकारते, आँखें मिचमिचाते, झाग गिराते, अगला एक पाँव रौंदने को उठाए, मैं पड़ता हूँ।

हंसी इसलिए आ रही है, दावत दे बैल को दी गई और आप उसने ऐसा बंद करें शिकार को आंखें बंद करके देखते हैं, जब होश हवास में रहते ही नहीं है तो उसका मूल्यांकन कैसे करेंगे? आंखें आधी मींच कर देखेंगे तो दिखाई क्या पड़ेगा, लक्ष्य दिखाई नहीं दे रहा है तो निशाना कैसे लगेगा? और जो आप चुनौती देने की बात कर रहे हैं वह तो इस लेखक के स्वभाव में ही नहीं है। अपनी कमियां खुद बताता चलता है।

यहीं आप धोखा खा जाते हैं। लेखक मानता है कि भारत की किसी परिघटना समझने के लिए भारतीय संस्कृति को समझिए, तब इसकी भाषा समझ में आएगी, उसके बाद मुहावरे समझ में आएँगे, इरादे समझ में आएंगे और तब आपको पता चलेगा जो कहा जाता है उसका कोई मतलब नहीं होता, जो करना होता है उसे कहा नहीं जाता। यह लेखक उसी संस्कृति पक्षधर है। पक्का घाघ है। घाघ का मतलब मत पूछिएगा, मैं खुद ही बता देता हूँ, इसका अर्थ है गूढ़ ज्ञानी। इसका प्रयोग, घुन्ना, मतलब तो यहां भी ‘गहन-ज्ञान-वाला’ है, परंतु दोनों शब्दों का मतलब अपने मन का भाव दूसरों से छिपा कर रखने वाला है। बात साफ है, जिसके मन का भेद नहीं जान सकते उसकी बात पर विश्वास नहीं कर सकते। इसके कहे पर मत जाइए, इरादे भाँपिए।

इसने 3 हफ्ते पहले कहा था, कहा था, ‘किताब पढ़ने में मजा आ रहा है।’ क्या कोई शरीफ आदमी अपनी ही किताब की अपने ही मुंह से तारीफ करता है। और मौका देखिए। पुस्तक मेला लगा था, यह आदमी अपने लेखन को पसंद करने वाले लोगों को अपनी किताब खरीदने के लिए बहका रहा था। इसी बहकावे मैं आकर मैंने भी ₹300 प्रकाश की झोली में डाल दिए, बताया, लेखक की तारीफ पढ़ कर आया हूं, कमीशन अधिक दीजिएगा, जवाब मिला, साहब कमीशन तो बुक फेयर के रेट पर भी नहीं दे सकते, जैसे जब आप डॉक्टर के सलाह पर टेस्ट कराने जाते हैं. तो लैब आपसे जो फीस वसूल करता है, उसमें डॉक्टर का कमीशन भी जुड़ा रहता है, उसी तरह यदि आप लेखक के कहने पर आए हैं कमीशन लेखक के खाते में जुड़ गया। मेरे गुस्से के लिए यह क्या छोटी चुनौती थी।

आइए असली मुहावरे पर। मुहावरा ‘आ बैल मुझे मार’ इसलिए बना है लंगोटा लहराते हुए पहलवान ने अखाड़े का चक्कर लगाते चुनौतीयह सोच कर दे दी, कि उसे पता है बैल की हिम्मत नहीं जो सामने आ जाए। बैल सींग चलाना कभी का भूल चुका है, पिटने की आदत कब से उसे पसंद आ रही है, दिमाग से काम लेना पसंद ही नहीं करता, नहीं तो जुआठ से बाहर आने के बाद कभी भागने का तो प्रयास करता।

मैं संक्षेप में आपको यह बता दूं संक्षेप में बात करना मुझे इसलिए पसंद है कि मनुष्य का समय मूल्यवान होता है। सो साँड़ की समझ में क्या आता है, क्या नहीं, वह क्या देखता है या नहीं, वह होश हवास में रहता है या नहीं, इसके पीछे जीवविज्ञान और पशु-मनोवित्ज्ञा दोनों का एक साथ झमेला खड़ा होता है। इसलिए फिर संक्षेप में यह बताना पड़ रहा है सभी ऋषि, ऋषभ, वृषभ, गर्ग (साँड़) इसलिए माने जाते रहे हैं उनके विचार, आचार, व्यवहार, यहां तक कि कदाचार दूसरों के नियंत्रण से परे रहें। उन्हें क्या दिखाई देता रहा है यह तो हम नहीं जानते परंतु इस लेखक को क्या दिखाई देता है क्या नहीं दिखाई देता, इसका सामना इस किताब को पढ़ते हुए मुझे इतनी बार हुआ कि जी में आया लेखक सामने पड़ जाए तो उसकी छुट्टी, प्रकाशक सामने पड़ जाए तो उसकी छुट्टी, और आज की एक बात बता दूँ कि मेरे सामने इस किताब की तारीफ करने वाला कोई मिल गया तो उसकी भी छुट्टी और में जैसे निंदा कर रहा हूं, या करने की तैयारी कर चुका हूं वैसा करने का साहस किसी दूसरे ने किया तो उसका कीमा बना कर उसी को परोस दूँ।

गलती तो एक ही दिखाई दी लेकिन इतनी बार कि सोचा किताब लेकर जाऊं और लेखक या प्रकाशक में जो भी सामने पड़ जाए उसके मुंह पर मार दूँ। ये प्रूफ की गलतियां हैं, लेखक पहले से इसके लिए बदनाम है, कोई पोस्ट नहीं जिसमें वह ढेर सारी गलतियां न करता हो और उसे सही सही पढ़ने का बोझ पाठकों पर डालकर “संपादन कल करेंगे’ लिखकर पोस्ट न कर देता हो। अरे भाई संपादित रूप कल ही आना था तो संपादन करने के बाद पोस्ट करते। संपादन के बाद पढ़िए उसने क्या किया, उसमें भी गलतियाँ। गलतियां करने का आदी यह लेखक, दूसरों की गलतियां सुधारने की जिद क्यों पाल लेता है?

इसकी कमियों पर बात करूंगा, जो लेखक को दिखाई नहीं दी थीं, प्रकाशक ने इसलिए छोड़ दी थीं कि इससे नेगेटिव प्रोपेगेंडा होगा और किताब भी खूब बिकेगी। प्रकाशक इसके लिए किसी हद तक जा सकता है। लगभग समान विषय पर लिखी अभय कुमार दुबे की पुस्तक में और कोई चारा न दिखाई दिया तो, प्रकाशक ने लेखक का परिचय को इस तरह बिगाड़ दिया है मानो उसकी हस्ती मिटा देना चाहता हो। जितना उल्टा-पल्टा पुस्तक वह भी बहुत अच्छी लगी और सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रकाशित भी। यह अभय कुमार दुबे के अब तक की विचाररेखा में आया एक परिवर्तन भी है जिससे उनसे आगे भी अधिक ऊंचाई पर पहुंचने की उम्मीद पैदा होती है।

इस पुस्तक की मात्र एक ही गलती पर ध्यान दीजिए, ,पृष्ठ 294, 285, 296, 297, 299, 302, 309, 311, 314, 318, 319, 327, 328, 355 356 367 369 380 382 388 389 410 और 414 पर बार-बार इलहाम को इस्लाम मुद्रित किया गया है।

इसका मतलब क्या होता है, मतलब यह होता है कि न तो उसे इल्हाम का पता है, न इस्लाम का, और नहीं कुरान का। “इलहाम खुदाई आदेश है। उसकी अवज्ञा नहीं की जा सकती। मनुष्य अपने दिमाग से यह तय नहीं कर सकता कि अल्लाह की निगाह में क्या सही है, क्या गलत। इंसान कितना भी बुद्धिमान हो उसका दिमाग उस ऊंचाई पर नहीं पहुंच सकता जिस पर अल्लाह का दिमाग है। इंसान गलतियां करता है अल्लाह कोई गलती नहीं करता। कुरान उन इलहामो (खुदाई आदेशों) का संग्रह है, इसलिए इलहाम गलत नहीं हो सकता, इल्हाम पहली बार इब्राहिम को हुए और अन्तिम बार मुहम्मद को, उसके बाद किसी दूसरे को न हुआ न हो सकता है। इसलिए मुहम्मद को हुए इल्हाम के आप्त प्रमाण वह स्वयं थे। उन्हें मिला इल्हाम गलत हो ही नहीं सकता जब कि इंसान गलतियां करने के लिए पैदा हुआ है और गलतियों से ही पैदा हुआ है। कुरान शरीफ में लिखी कोई इबारत गलत हो ही नहीं सकती।“ जो बात संक्षेप में इन कुछ वाक्यों में अधिक स्पष्टता से कही जा सकती थी, उसके लिए लेखक ने 431 पन्ने बर्वाद कर दिए। हँसिए, आप इशारा कर रहे हैं कि जब इतनी ही बात करनी थी तो मैंने इतनी लंबी भुमिका क्यों बाँधी और आप का इतना बहुमूल्य समय नष्ट क्यों किया?

मैं आपको लेखक की शैली से भी परिचित कराना चाहता था, वह इधर उधर की बातें करता हुआ आपको पहले बोर कर देता है और फिर जब आप थक जाते हैं तो जो भी उल्टा सीधा आपके दिमाग में घुसाना होता है घुसा देता है और आप उसे सही मान लेते हैं मैं उसी की शैली में उसका जवाब दे रहा था। बोलिए मैंने उसकी छुट्टी कर दी या नहीं।

और जब उसे चें बुलवा दिया तो आपको यह बताना भी अपना कर्तव्य समझता हूं इस पुस्तक में उसने किसी झोल झमेले से काम नहीं लिय़ा है और कोई भी कथन बिना निर्णायक साक्ष्य के नहीं है। इस्लाम और मुस्लिम समाज और भारतीय मुस्लिम राजनीति के विषय में इतने तटस्थ भाव से लिखी गई अभी तक ऐसी कोई पुस्तक नहीं थी जिसे आप संदर्भ पुस्तक के रूप में प्रयोग में ला सकें इसलिए ही यह एक मात्र त्रुटि इतनी असह्य लगती है और एसलिए इसके साथ एक शुद्धपत्र लगाए बिना पुस्तक की विक्री बंद कर देनी चाहिए और जो पुस्तकें बिक चुकी है उनमें पाठकों को ऊपर के पन् में सुधार कर लेना चाहिए।

लेखक ने लिखा है ‘मैं इस्लाम का अधिकारी विद्वान नहीं हूं, जानकारी परिश्रम करके कम समय में जुटाई जा सकती है परंतु अधिकार लंबे समय तक किसी समस्या से अंतर्विरोध उसे जूझते हुए किसी समाधान पर पहुंचने के बाद ही प्राप्त होता है अपनी जानकारी के लिए मैंने जिन स्रोतों पर निर्भर किया है, वे लगभग सभी इंटरनेट के माध्यम से ही सुलभ हो सके।

मोहम्मद साहब के लिए लेखक ने विशेषणहीन नाम का ही प्रयोग किया है, जबकि मुसलमानों में विशेषण की एक लंबी श्रृंखला के बाद ही मोहम्मद का नाम लेने की परंपरा है जिससे अलग जाना मुस्लिम पाठकों को नागवार लग सकता है, लेखक ने स्पष्टीकरण देते हुए लिखा है ‘अपने पहले आलेख में मैंने मोहम्मद के साथ सर्वत्र साहब लगाया था। विशेषण छोटे आदमी को बड़ा और बड़े आदमी को छोटा बनाते हैं। राम श्रीराम या रामजी से बड़े हैं गांधी, महात्मा गांधी और गांधी जी से बड़े भी हैं, विशेषण हट जाने के बाद हमारी आत्मा के अधिक निकट भी, अधिक व्यापक भी। यह सोचकर साहब विशेषण हटा दिया।

Post – 2020-01-30

मरने के बाद नर्क और स्वर्ग की कल्पना की गई है, जीते जी सभी सुविधाओं के बीच यंत्रणालोक में पहुंच जाने की व्यग्रता को क्या आ जाए? यहीं कुछ है जो मुझे अपनी आँच में सेंक कर दूसरों से बहुत अलग टेढ़ा टबरा पर अधिक ठोस बनाता है।

उसके बाद जिन्होंने आजादी की मांग की उनको खा जाएगा, और वह यह नहीं चाहता है हम तुमसे क्नु को क्नो gnos nose knowse knasa उसका प्रयोग क्रिया के रूप में हुआ जिसका भाव यही पर अनुवाद संभव नहीं। इस प्रयोग में परिचय न दूँ, तो आपका ध्यान शायद ही उस गंभीर समस्या की ओर जाए।
गार्गी के सभी प्रश्नों का उत्तर देने के बाद जब याज्ञवल्क्य ने, अंततः कहा, ‘सब कुछ ब्रह्मलोक में समाहित है’, तो भी गार्गी संतुष्ट न हुई। उसने फिर पूछ दिया, ‘ब्रह्मलोक किस में समाहित है?’ उत्तर में याज्ञवल्क्य चिढ़ गए, सोचा होगा, सब कुछ को समाहित करने वाले से परे क्या बचता है जिसे बताया जाए ? यह तो फालतू सवाल है, जिसका कोई अंत ही नहीं।
मैं अपनी बात ठीक से कह नहीं पाता, इसका एक कारण यह है कि मुझे यह भ्रम बना रहता है, कि मैं जिन से बात कर रहा हूं, उनको किसी चीज का पता ही नहीं। यदि हर बात को मैं स्वयं न समझाऊं तो उनके पल्ले या तो कुछ पड़ेगा नहीं, या कुछ का कुछ समझ बैठेंगे।
अब इसी अतिप्रश्न को लीजिए। आपने पढ़ भी लिया। मैंने बता दिया की इसका प्रयोग पहली बार याज्ञवल्क्य ने किया था, फिर मेरी समझ में आता है, आप याज्ञवल्क्य को भी कहां जानते हैं, यह तो सिर्फ नाम हुआ, जानना तो हुआ ही नहीं। मन में लोभ पैदा होता है, इसे भी बताता चलूँ।
यह समस्या इतिहास में दो ही लोगों के सामने आई, पहली बार महर्षि पतंजलि के सामने, और दूसरी बात, आप देख ही रहे हैं, बताऊँ न बताऊँ के चक्कर से इस फिक्र में पड़ गया कि इसका कोई अंत भी तो नहीं है।
पतंजलि ने कहा, एक शब्द को भी जानने चलें, तो इतना फैलता जाएगा कि सब कुछ उसी से जुड़ जाएँ, लोक परलोक की सारी कामनाएँ पूरी हो जाएँ- एकः शब्दः सम्यक् ज्ञातः साधु प्रयुक्तः स्वर्गे च लोके च कामधुक् भवति।
उन्हें लोग महर्षि इसलिए कहते हैं कि वह संक्षेप में, इसका हवाला दे कर आगे बढ़ गए। उन्हें यह शऊर था अपनी बात पूरी करनी हो, तो इसकी चिंता न करें कि पूरी बात समझा कर ही दम लेंगे। सभी अच्छा वक्ता इस नियम को जानते हैं, कि कहना क्या है इसकी जानकारी से अधिक जरूरी यह जानना है कि क्या नहीं कहना है। बस यही छोटी सी शर्त मुझे नहीं मंजूर, इसलिए सब कुछ कहने की कोशिश में जो कहना जरूरी था वही छूट जाता है।

मैं सोचता हूं, मैंने जो कहा, वह सुनने वाले की समझ में पूरी तरह आई ही नहीं, तो आगे कैसे बढ़ा जा सकता है। दूसरों को पूरी तरह समझाने के चक्कर में मैं कोई बात पूरी कर ही नहीं पाता, और एक बार जिस बात को कह चुका हूं, बार-बार उसी पर लौटता हूं। मेरे से कुछ भी पता ही नहीं, क्योंकि कहने के बाद भी अधूरा रह जाता है।
मैं बात याज्ञवल्क्य की कह रहा था, आप जानते यह हैं, कि वह वेदांत आंदोलन के अग्रदूत थे। वेद आरण्यक उपनिषद में उनका उल्लेख है, शतपथ ब्राह्मण की रचना भी उन्होंने ही की थी, वह चाहते थे कि आज के बाद कोई भी व्यक्ति 20 का सेवन न करें, ईमानदार इतनी थे, कि किसी नाभिक मौके पर, यह स्वीकार किए बिना नहीं रहते थे कि मैं अपने को इससे रोक नहीं पाता। उन्होंने जो कसम दी थी, उसे सोच कर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे, खैर, कसम भी नहीं दी थी, उन्होंने इतनी जोरदार शब्दों में यह समझाया था यह जो गोरू-बैल हैं, एक एक हो जाए हुए आहार से सब का पेट भरता है, इसलिए जो इनका भक्षण करता है वह उतना ही गलत काम करता है जैसे कोई अपनी मां के गर्भ में पड़ी अपनी संतान की ही हत्या कर दे, (ते देवा अब्रुवन् बत् धेनु अनुडहौ वा इदं सर्वं बिभृतः …यो धेनु अनुडहयोः अशनीयात् अन्तगतिः इव तं अद्भुतं अभिजनितोः जायायैः गर्भं निरवधीत इति। )
इतनी तमाचामार शैली में दूसरों को झिड़क दिया, तो फिर वही अतिप्रश्न वह स्वयं क्यों खाते थे ? और खाते भी थे तो ठीक इस नाजुक मौके पर सबके सामने, बिना किसी दबाव और उकसावे के यह कबूल करने की जरूरत क्या थी कि वह स्वयं अपने को रोक नहीं पाते थे (तत् उह उवाच याज्ञवल्क्यः अश्नामि एव अहं, अंसलं च इत् भवति। शतपथ ब्रा. 3.1.2.21)।
इस अति प्रश्न उत्तर पाने के लिए मेरे बाबा की सहायता लेनी होगी।

Post – 2020-01-29

यह समय संयम, दृढ़ता और जो काम प्रशासन का है उसे उस पर छोड़ कर, वहाँ उसके समर्थन में खड़े होने का है, जहाँ वह अपने दायित्व में चूक नहीं करता, और जहाँ चूक करता है वहाँ उसका विरोध करने का है। लोकतंत्र में एक ही कारगर गोली है मताधिकार। जिसे बोलने तक का शऊर नहीं वह किसी समस्या का समाधान कैसे करेगा? वह समस्या पैदा करेगा। दल कोई भी हो, उसे यह संदेश दिया जाना चाहिए।

Post – 2020-01-29

नेताओं, नेता बनने के लिए प्रयत्नशील नौजवानों के मूर्खतापूर्ण और गैरजिम्मेदाराना बयानों को छापना बंद कर दे, (जैसे सदनों के स्पीकर रेकार्ड से बाहर कर देते हैं) इन्हें पुलिस और संबद्ध दलों के लिए छोड़ दें, पर इन पर नजर रखें, और उनके द्वारा की गई कार्रवाई के साथ, और कोई कार्रवाई न होने पर अपराध, पुलिस या दल की चुप्पी या टालमटोल की पूरी कहानी और उनकी भूमिका के साथ, उन्हें भी सह-अपराधी बताते हुए कच्चा चिट्ठा खोलने की आपसी सहमति बनाएँ तो इस प्रवृत्ति को बहुत नीचे लाया जा सकता है। जब तक ऐसा नहीं करते तब तक वे सहअपराधी हैं।

Post – 2020-01-28

कुछ_तो_अपनी_भी_कहो (3)
“अतिप्रश्न मत कर गार्गी, कहीं तेरा सिर न फट जाय!” याज्ञवल्क्य

मुझे बोलना नहीं आता, इसका एक कारण यह भी है कि जब बोलना सीख रहा था, उसी समय प्रश्नों ने मुझे घेरना शुरू कर दिया।

यह अकेला मेरे साथ नहीं, सभी शिशुओं के साथ होता है। संसार उसके सामने आश्चर्य के रूप में उपस्थित होता है। परंतु उनके प्रश्नों का उत्तर मिलता जाता, आश्चर्यलोक सिकुड़ते-सिकुड़ते कार्य-कारण की शृंखला बन कर शून्य में बदल जाता है और वे उस अधोगति को पहुंच जाते हैं जिसमें जिसका कार्य कारण समझ में नहीं आता, जिसका सही उत्तर नहीं मिलता, उस पर भी आश्चर्य नहीं कर पाते। इन्हें वे इसलिए मान लेते हैं कि उनसे समझदार बहुत सारे लोग इन बातों को मानते हैं, या मानते चले आए हैं, इसलिए वे ठीक ही होंगे।

यह खतरनाक स्थिति है, एक तरह की आंशिक मौत।

जानता हूं, मैं अपनी बात कह चुका हूं, परंतु यह बात आप तक नहीं पहुंची, और लिहाज से आप में से कई लोग, यह मान लेंगे कि मैंने कहा है तो ठीक ही होगा।

मैं मानने वालों से डरता हूँ। मानने वालों के बीच रहना, अर्धमृत-अर्धजीवित लोगों के बीच रहना है।

यह मुर्दों के बीच रहने से भी बुरा है।

मुर्दाें में सड़ाँध आने के साथ ही, आप वहाँ से अलग हो जाएँगे। समझते देर न लगेगी कि यहाँ रहा तो जिंदा न रहूँगा।

मान्यताओं के शिकार, अर्धजीवित लोगों के साथ, लंबे समय तक, रहने के बाद भी आप को यह पता नहीं चलता कि आप अपने आश्चर्य लोक से बाहर जाकर, प्रश्नों की दुनिया से बाहर जाकर, स्वयं आधे मर चुके हैं।

ऐसा विचारधारा के कारण हो, या परंपरा की लाज, कुल-रीति के निर्वाह की लालसा के कारण, या जिन्हें आप प्यार करते हैं, जिन का सम्मान करते हैं, उनका निरादर न हो जाए, इस लिहाज से वैसा मानो या बन जाओ का चलन, आदमी को जिंदा नहीं रहने देता। इसलिए, यदि पीछे के पन्नों को पलटें तो, आपको पता चलेगा, मैंने कितनी बार यह याद दिलाया है कि मेरी किसी बात को मत मानो। नकारो भी मत। इनको परखो और सभी निर्णय अपनी ज्ञान सीमा में, जो सही लगता है, उसके अनुसार करो।

लगता होगा, मैं इस तरह अपनी नम्रता का प्रदर्शन करते हुए आपकी नजरों में कुछ ऊपर उठना चाहता हूँ। आप अपनी सीमा में सोचें, यह उसी आग्रह की कड़ी है जिसमें आप से अपनी नजर से देखने और अपने दिमाग से सोचने को कहता हूँ। आप से शिकायत तो हो ही नहीं सकती।

शिकायत अपने आप से मेरी यही है, कि जो बात करनी चाहिए, उसे छोड़कर ऐसी बातें करने लगता हूं, जिनको कहता तो हूं, पर समझा नहीं पाता। सही मुहावरे तलाशने तक में देर लगाता हूँ।

अर्धमृत का अर्थ मैं आपको समझा पाया? नहीं न!

फिर समझाता हूं। आपने अपनी संवेदनशील त्वचा पर लगातार किसी चीज का रगड़ होते रहने के बाद, वहां घट्ठे पड़े देखे होंगें, जिनमें रक्त संचार बंद हो जाता है, वेदना की अनुभूति नहीं होती, परंतु उसके दबाव से जीवित अंश में वेदना होती है।

एक ही घटक को लगातार सुनते रहने, देखते रहने या सहते रहने से अपनी संवेदनाएं मर जाती है, जैसे चमड़ी में घट्ठे पड़ते हैं, वैसे ही दिमाग में भी घट्ठे पड़ जाते हैं। उनसे हम समझौता कर लेते हैं। कोई पहली बार उन्हें देखकर चकित हो जाए, उद्वेलित हो जाए, तो हमें लगता है, ज्ञानी गुरु मिल गया।

‘ज्ञानी गुरु’ के अपने दिमाग के भी घट्ठे हो सकते हैं, जिनके कारण सापेक्ष रूप में एक का ज्ञानी दूसरे का ज्ञानी हो सकता है। यह मानने वाले कि गुलामों में आत्मा नहीं होती इसलिए उन्हें कोई भी यातना दो, कोई कष्ट नहीं होता, लिंचिंग करने वाले, वर्ण-व्यवस्था के अन्याय से विक्षिप्त हो सकते सकते हैं, और दोनों समुदाय अपने को दूसरे से बड़े मान सकते हैं। अंतिम निर्णय इस बात पर रह जाता है कि तलवार किसके हाथ में है ? अपनी बात कौन बनवा सकता है? बात दिमाग की हो तो तलवारों के भी कई रूप होते हैं।

ईश्वर यदि कहीं जिंदा बचा हो तो आपकी रक्षा करे और मेरे इन तलवारों की व्याख्या में उतरने से पहले आकाशवाणी करा दे, “मत सुनो उसकी, खुद जो कहता है, कहना क्या है समझ नहीं आता।”

और मुझे हाथ जोड़ कर खड़ा होना पड़े, “आप जो भी हों, हैं दुरुस्त मगर, मुझसे चुप भी रहा नहीं जाता।”

सोचिए। इतनी बड़ी भूमिका सिर्फ यह कहने के लिए, कि मैं, माई के सामने, पहली बार, एक अतिप्रश्न बन कर खड़ा हुआ। वह उत्तर भी जानती थी, परंतु अतिप्रश्न का उत्तर नहीं होता, पता हो, देने चलो तो उत्तर देने से पहले सिर फट जाएगा। इसकी जिद नहीं पालनी चाहिए।

मुझे आज तक मां के मरने का तो नहीं, सजे सँवरे सिंदूर-तिलकित-अनावृत-भाल दरवाजे पर टिकटी पर रखे शव का दृश्य याद है, और वह उद्वेलन भी जिसमें चाहता था, दौड़ूं और उस उसके साथ, अंतिम बार के लिए सो जाऊँ, अब फिर कभी, सो नहीं पाऊंगा, और साथ ही यह जानता था कि यह संभव नहीं है। शब्दों से अलग मनोभावों की, स्पर्श, गंध और स्वाद की भी स्मृतियाँ होती हैं, यह किसी को समझा नहीं सकता। अतिभाषिक को भाषा के माद्यम से समझाया नहीं जा सकता, पर होती हैं और अधिक टिकाऊ होती हैं, यह दावा कर सकता हूँ।

यदि पुराना घर टूटा न होता, बाद में कोई चीज सड़ी-गली नहीं होती तो मैं बता सकता था कि ओसारे की किस खँभिया को अपनी बाँहों में भींचे, जैसे वही माँ हो, अपलक उसे देख रहा था। दुख से नहीं, आश्चर्य से, उस दिव्य सौंदर्य से अभिभूत, जो इससे पहले कभी देखा ही न था। उसके इस साहस पर चकित, कि वह किसी की चिंता किए बिना, सबके सामने सोई पड़ी थी और इस लालसा और तड़प और बोध के बीच भीतर से दो फाँक कि दौड़ कर जाऊँ उसके पास अंतिम बार के लिए लिपट कर सो जाऊँ और यह कि ऐसा संभव नहीं है।

पहली बार दुख की अनुभूति, छटपटाहट बन कर, विस्फोट के रूप में, तब प्रकट हुई थी जब उनकी टिकटी को कंधे पर उठाकर लोग चल पड़े थे, और मैं, उस वय में पीछे दौड़ पड़ा था और नोहर की मां ने अपने मरियल हाथों में मुझे इतनी जोर से पकड़ लिया था, कि वह मुझे एक राक्षसी के रूप में याद आती रही।

मैं जानता था, मां मर चुकी है, लोगों ने उसे जला भी दिया। फिर भी जब बताया गया कि पिताजी मां को लेने गए हैं तो पीछे की सारी बातें भूल गईं। लगा सच होगा।

माई ने दीदी को, भैया को, एक-एक करके देखने को बुलाया था। जब मेरी बारी आई तो मैंने अनजाने ही अतिप्रश्न कर दिया, जिसकी इबारत भूल गई पर शब्दानुवाद संभव है, “मुझसे क्या चूक हुई थी? तुम रूठ कर कहां चली गई थीं?”
कुछ नहीं याद! कुछ नहीं याद, सिवाय इसके कि संवेद्य संचार के उस क्षण ने माई को चूर-चूर कर दिया था। कोई जवाब नहीं। उसने मेरे माथे पर द्रवित भाव से अपना हाथ रखा था। और महामाया ने आगे चलकर उसके उस हाथ को ही तोड़ दिया था, “यही तो है जिसमें तेरी वह प्रतिस्पर्धी जीवित है, जिसे मिटा कर ही तू जीवित रह सकती है।”

Post – 2020-01-28

उन्हें कुछ और दीखे है, मुझे कुछ और दीखे है
बताओ तो मेरे चश्मे का नंबर ठीक कब होगा ?

नया गणित : परसों एबीपी का शाहीनबागोत्तर सर्वे आ रहा थाः –
कांग्रेस 25% बीजेपी 70%, अन्य 5% . विश्लेषक ने कबूल किया – मोदी की लोकप्रियता कम नहीं हुई है। मुझे आकड़ा यूँ नजर आया- भारत के कुल मुस्लिम+ई. मत+कां संग. से जुड़े+कां. मुखी सेकु. = 25%, अन्य सभी दलों के साथ – 5% और इन अपवादों को छोड़ दें तो पूरा का पूरा हिन्दू भाजपा के साथ। समस्त मुस्लिम, ईसाई कांग्रेस एक साथ। दूसरे ‘मुस्लिम मेरा/मैं मुस्लिम का’ महाराग गाने वाले सेकु. के साथ कोई मुसलमान नहीं। आईसीयू में आक्सीजन की नली के भरोसे साँस लेते दूसरी सारे विपक्षी दलों की सांस की नली ही अलग।- इसके भावी चुनावी परिणाम को प्रश्न ही रहने दें।

दूसरे कोण से कितनों को मँहगाई की चिंता, कितनों को बेरोजगारी की पीड़ा, कितनों को सुरक्षा की। पहले दोनों में बहुत ऊंची दर, वि. खतरे की फिक्र शायद .4 या 4% अर्थात निम्नतम। विश्लेषक को काफी राहत मिली। मुझे उल्टा दीखा- मँहगाई+बेरोजगारी से चिंता के बाद भी सारे हिंदू नमो के साथ क्योकि उसके होते ही हम सुरक्षित रह सकते हैं क्योंकि उधर से निश्चिंत। इतना गहरा और अशोध्य विभाजन, जात पांत के सारे समीकरण को फेल करके हिंदू के हिंदू हो जाने के पीछे शाहीनबागादय: की दहशत है या नहीं। ताकत दिखाने वाले अपनी ताकत की मार खुद झेल रहे हैं या नहीं?
हो सकता है मुझे देखने ही न आता हो।

Post – 2020-01-28

आज जो सामने है उससे परेशान तो हूँ
कल को जो सामने आएगा उससे डरता हूँ।

Post – 2020-01-26

बात अपनी भी कहो, अहले वतन चाहते हैं (2)

घर में कोई रोटी पानी देने वाला और बच्चों की देख-रेख करने वाला होता तो, पिताजी ने विवाह भी न किया होता। वह अपने लिए नहीं, बच्चों के लिए ऐसा कर रहे थे। उन्होंने अपनी महिमा बताते हुए यही कहा था, जब कि उनकी उम्र 30 या 34 रही होगी, (कभी सुना था उनकी जन्म-तिथि 1904 थी, बाद में जब पत्रा-पंचांग स्वयं देखने लगे थे 1899 या 1901 बताते थे।) यह जानना कि जिस व्यक्ति से किसी बालिका का विवाह हो रहा है, वह विधुर तो है ही; उसकी संतानें भी हैं, किसी ऐसे समाज या स्थिति में जहाँ निर्णय उसके हाथ में न हो, कम दाहक नहीं होता, परंतु यह सूचना कि वह सन्यासी जी के घर में उनके सन्यास-पूर्व की संतानों की दाई बन कर जा रही है उस मर्मान्तक आघात से कम तो न होगी, जिसके लिए ‘कलेजा फटने’ का मुहावरा गढ़ा गया है।

दीदी या भाई साहब की शिकायत पर, बाबा माई को फटकार लगाने से पहले उनसे यह भी नहीं पूछते कि तुम्हारे साथ क्या अन्याय हुआ है ? पूछने की जरूरत ही नहीं थी। वे सारी कहानियाँ जो मैने सुनी थी, उन्हें वे भी जानते रहे होंगे। [ उनका कंठ-स्वर बहुत मधुर था, उनसे भी मधुर स्वर उनके ही समवयस्क दूधनाथ सिंह का था। दोनों बुढ़ापे में भी रामायण का तल्लीनता-भरे कंठ से युगल पाठ करते तो दरवाजे पर श्रोताओं की भीड़ लग जाती। रामायण दोनों को लगभग कंठस्थ था। मेरे जीवन को धन्य करने वाली स्मृतियों में एक दो बार वह युगलपाठ, एक बार रामकिंकर उपाध्याय का प्रवचन, नामवर जी का कोलकाता का भाषण, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिस्स में बीटी रणदिवे का भाषण और मैं पिया तेरी तू माने या न माने पर लता जी के स्वर के साथ पन्नालाल घोष का बाँसुरी वादन है। एक उम्र काटने के लिए इतनी दौलत काफी है।] सो मानस के रावण का मन्दोदरी पर व्यंग्य – नारि सुभाऊ सत्य कबि कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं। साहस, अनृत, चपलता, माया। भय, अबिबेक, असौच, अदाया। – कैसे न याद आ जाता होगा। फिर अपने जीवन में ऐसे जाने कितने किस्से सुने होंगे, जहाँ महिलाओं की, और खास करके विमाताओं की, नृशंसता के इतने और आँखों के सामने अहकते हुए आँसू बहाता कोई बच्चा, फिर संदेह की कोई गुंजाइश रह जाती है जो जिरह करें। उनकी फटकार सुनते हुए वह यह भी नहीं कह सकती थी कि उसने क्या किया, क्यों किया या किया भी था या नहीं, उसकी गलती थी भी या नहीं । बोल कर भी नहीं, और रो कर भी नहीं।

जवाब देना, यहाँ तक कि यह तक कहना कि वह बेकसूर है, मुँहजोरी थी। स्त्री का रोना तो तन कर जवाब देने से भी बड़ा अपराध था। इसे तिरियाचरित्तर कहा जाता था। अर्थ सर्वविदित था, स्रोत अल्पविदित था। पर – ‘त्रियाचरित्रं पुरुषस्य भाग्यं दैवो न जानाति कुतो मनुष्यः’ का पहला शब्द बोलने से ही पूरे का अर्थसंचार हो जाता था।

औरतें बीमार नहीं पड़ती थीं, नकल पसारती थीं। जब तक यह तय हो कि नकल नहीं पसारा था, सचमुच बीमार थी, समस्या इतनी उग्र हो चुकी रहती कि बच गई तो और न रही तो भाग्य का खेल कहा जाता था। उन दिनों पुरुष कम गलतियां करता था, अधिकांश गलतियां नहीं हुआ करती थी, भाग्य का लेख हुआ करती थीं। और बड़ा बुजुर्ग तो सुप्रीमकोर्ट होता ही था। माई को उससे कठोर आचार संहिता का निर्वाह करना पड़ता था जिसका मुझे करना पड़ता था। जब बोलना ही वर्जित हो, तो बोल क्या पाओगे? इसलिए जब से महिलाओं ने बोलने की छूट पाई, उन्हें किसी ने चुप देखा ही नहीं, वे बोलने के लिए तो बोलती ही हैं, चुप रहने के लिए भी बोलती हैं, अपने समय का अपने हिस्से का तो बोलती ही हैं, पिछली अनगिनत पीढ़ियों का बकाया पूरा करने के लिए भी बोलती हैं।

यह तय करने में मुझे समय लगा कि बड़ों के सामने किसी अन्याय के विरुद्ध बोलना चाहिए या नहीं, और यह तय पाया कि अन्याय अपने प्रति हो तो चुप रहना होगा पर किसी अन्य के प्रति अत्याचार का विरोध तो करना ही होगा। बहुत बाद में जब लोको शेड में काम करना हुआ और स्टीम रिलीज कॉक की भूमिका समझ में आई तो लगा कि दूसरों के प्रति अन्याय का विरोध स्वयं मेरे प्रति होते आए अन्याय से संचित आंतरिक दबाव को कम करने का भी एक रास्ता था।मेरा हस्तक्षेप एक झटके के साथ हुआ जिसकी दूसरों को आशा न थी। अब किसी अन्याय पर चुप रह जाना मुझे अपना अपमान लगता है, परंतु स्वयं मेरे प्रति अन्याय हो तो लगता है इससे मेरा कुछ नहीं बिगड़ता ।

गांव का एक सुशिक्षित परिवार था। उसके मकान को डिप्टी साहब की कोठी कहा जाता था। सदस्यों में सभी एक गांव की नजर से सुशिक्षित और ऊंचे पदों पर विराजमान थे। एक सज्जन जो पद से रीजनल इंस्पेक्टर के पद पर पहुंचे थे, उनके परिवार का वहां एक दूसरे सजातीय एडीएम के परिवार से आत्मीय संबंध हुआ, जो स्वाभाविक था. और उनके लड़के का परिचय उस परिवार की अपनी समवयस्क की लड़की से हुआ। यह परिचय आकर्षण की परिणति तक पहुँच गया था।

जब इस महान अपराध का पता चला तो लड़की के पिता ने उपचार का प्रस्ताव रखा। लड़की ने इंकार कर दिया दिया। लड़के से कहा गया क्या गर्भवती लड़की से शादी करेगा। उसने कहा, उसी से और किसी से नहीं। दोनों परिवारों ने अपमान का घूँट पीते हुए, समय सीमा में विवाह कर दिया। संतान पेट में लिए बहू ने ससुर गृह में प्रवेश किया। गांव बड़ा था। उनका घर हमारे घर से लगभग 1 किलोमीटर दूर था। परंतु गांव तो अपना ही था। लोग किसी के भी गलत काम से डरते थे । वे उसी पूरे गांव की इज्जत के लिए डरते थे, इसलिए समस्या भले किसी एक परिवार की हो, चिंतित पूरा का पूरा गांव होता था। उस बहू का अपने घर में जिस तरह अपमान किया जाता था उसकी कहानियां हमें मालूम थीं। किशोर वय की कोई एक परिभाषा तो नहीं हो सकती, परंतु ऐसे किशोरों की संख्या बहुत अधिक होती है जो अपने विवेक से काम करने की जिद ठान लेते हैं।

मेरे घर में एक नई नई सी बैठक बनी थी उसमें एक बैठक जो खुले जंगलों और 4 दरवाजों और ऊँचे पलंग के साथ इसलिए बंद रहता था कि उसके बगल में एक खुली दालान थी जो उससे भी बड़ी थी, जिसमें एक के साथ एक 8-10 चारपाइयाँ बिछ सकती थीं और 4- 5 सदा बिछी रहती थी। गर्मी के दिनों में समय काटने के लिए दोपहर के बाद लोग एकत्र होते बैठकर ताश खेलते और समसामयिक ग्रामीण घटनाओं पर चर्चा करते।

उस दिन इसी को लेकर एक से एक भर्त्सना वाक्य उछाले जा रहे थे। मैं सटी तिनदुआरी में दरवाजे बंद किए लेटा हुआ। उम्र तेरह चौदह की हो चली पर इतने नाज़ुक सवाल पर बड़ों के बीच एक बच्चे का मर्यादा के सवाल पर बोलना। मैंने पल्ले हटाए, बाहर निकला और, “यदि एक गलती के बाद उसने एक पाप किया होता तो आप लोगों की नजर में वह ठीक था। लड़की और लड़के दोनों ने तय किया कि गलती हुई सो हुई, इसकी जिम्मेदारी लेंगे, पर आगे कोई पाप नहीं होने देंगे तो बुरे हो गए? इस पर तो उनकी तारीफ करनी चाहिए।” सोचिए मैं अपने पिता जी और उनकी उम्र के लोगों को झिड़क रहा था। उल्टी गंगा। दो ने झिड़कना शुरू किया तो पिता जी मेरे साथ हो गए, “ठीक तो कहता है।” सब की जबान बंद।

इसके बाद कितनी बार कितने खतरे उठाए हैं और कितनी तरह के और कभी कभी तो देखने में निरे किताबी कि जो उनके गवाह रहे हैं उनमें से कुछ को लगता होगा, लगा भी, कि यह आदमी सिरफिरा तो नहीं। स्वभाव से खड़जंगी तो नहीं।

परन्तु मैं सोच कर कुछ करता ही नहीं। (दिमाग हो तब तो सोचूँ, या किताबों का ज्ञान हो, विद्वज्जनों के साथ वैचारिक विमर्श हो तो, पर इसके लिए अकादमिक परिवेश, अध्ययन और ज्ञान के लिए आदर और पुस्तकालय की समीपता ही नहीं, घर पर मनचाही पुस्तक लाने की और यथेच्छ अपने पास रखने की सुविधा भी होनी चाहिए थी, {नामवर जी के बारे में, उनके शिष्य मार्क्सवादी छात्रों का आरोप यह था कि वह अच्छी किताबों को आते ही अपने नाम से जारी करा लेते थे और पूरे साल अपने पास रखते थे कि कोई दूसरा उनकी जानकारी न पा सके [इन पट्ठों को जो सीपीएम से जुड़ाव रखते, इसलिए वही ऐसे पट्ठों को पैदा कर सकती है, परन्तु मेरा खयाल है, जो गलत भी हो सकता है, यह रोमिला थापर आयोजित और उनकी काम-दिलाऊ-संपर्क-साधना-जनित गुरुत्वशक्ति से आकर्षित मार्क्सवादी छात्रों का दल था जिसे रोमिलाथापर ने जेएनयू की प्रतिभा प्रतिस्पर्धा में नामवर सिंह की प्रतिभा और बढ़ते प्रभामंडल से आतंकित हो कर अपनी कुटिलता से तैयार किया था।] उनका कथन कि नामवर जी कुछ किताबें आते ही अपने नाम जारी करा लेते थे और पूरे साल अपने पास रख लेते थे, सही होना चाहिए। मैंने यह जताने के लिए कि एक अध्यापक को पुस्तकालय की पुस्तकें अपने समय और सुविधा के अनुसार कितने लंबे समय तक रखने की छूट थी जो दौड़ धूप के बाद भी मुझे न थी। जिस अधूरी बात का वे प्रचार करते थे उसका पूरा सच यह कि वे किताबें नामवर जी के अनुरोध से ही मँगाई गई होती थीं।

नामवर जी में अपने को कुछ समझने वालों से पंगा लेते हुए उनको सतह पर लाने की प्रबल लालसा थी। इसी से प्रेरित वह चतुरता से रोमिला जी से इनकी चर्चा करते थे और वह इनके सम्मुख अपने को हेय अनुभव करती हुई जब लाइब्रेरी से वही किताबें अपने नाम लेने पहुँचतीं तो पता चलता कि अभी वे किताबें नामवर जी ने लौटाईं ही नहीं और इसका भी दुष्प्रचार वह अपने गिर्द मँडराने वाले नामवर जी के छात्रों से करके उनके प्रति दुर्भावना पैदा करते हुए वह उन्हें सीपीआई के लोगों को घटिया सिद्ध करते हुए इन्हें सीपीएम की दिशा में मोड़ती थीं, जब कि स्वयं न तो कम्युनिस्ट थीं, न ही इसका दावा करती थीं।

मैं ऐसे छात्रों से नामवर जी के पक्ष में बोलता, वे इसीलिए इसे छेंड़ते भी थे। मेरा प्रतिवाद गुण-दोष-परक होता था, पर अपने ही छात्रों से नामवर जी की मलामत से भीतरी तुष्टि होती थी क्योंकि नामवर जी ने उन्हीं हथकंडों का प्रयोग रामविलास जी के विरुद्ध किया था और इसकी हानि मुझे भी हुई थी। }

मैं न केवल इन सुविधाओं से वंचित था अपितु जिस परिवेश में काम करता था उसमें इसे दोष माना जाता था और चरित्रपंजी में यह दर्ज किया जा सकता था कि यह तो किताबें पढ़ते रहते हैं, काम में मन ही नहीं लगता। पर नाराज ऊपरी अधिकारियों को भी उसका साहस न हुआ, क्योंकि मेरी मेज पर कोई फाइल रुकती ही न थी, आरोप लिखित रूप में लगाने वाला मारा जाता।)

मेैं यह बताना चाहता था कि जब ज्ञान भी नहीं, साधन भी नहीं, मेधा भी नहीं – मैं नम्रता वश नहीं, दूसरे विचारकों की सापेक्षता में अपनी अवरता की बात कर रहा हूँ – मेरी वह कौन सी पूँजी है, जिस पर मुझे इतना विश्वास है कि मैं दूसरे सभी बुद्धिजीवियों को तुच्छ मानता हूँ और वे सभी एक साथ खड़े हो जाए, अपने समूचे ज्ञानतंत्र, दुष्प्रचारतंत्र और प्रहारशक्ति के साथ तो भी मुझे विचलित नहीं कर सकते, तो वह मेरे बचपन की वही यातना है जिसे कभी न भूला और उसका विस्तार – परदुख कातरता। मैं सोचता नहीं, जानता नहीं, अब भोगता नहीं, न चाहता हूँ कि दुबारा किसी को भोगना पड़े, इसलिए मरजीवड़ा के से दुस्साहस से, सताए और यातना भोग रहे, संकटग्रस्त और अन्याय के शिकार लोगों के साथ खड़ा हो जाता हूँ। मेरे शैशव और बचपन की पीडा और उसकी यादें मेरी एकमात्र पूँजी है और वही मुझे द्रष्टा बनाती है, बुद्ध की तरह, किसी तपस्वी की तरह।

Post – 2020-01-26

‘क्यों कहा? किसने कहा?’
‘कल वो संसार में थे’
बता रहें हैं कई
‘आज अखबार में थे।।’

Post – 2020-01-26

दरो दीवार वही
घर का आकार वही
कल तलक हम थे यहीं
ढूँढ़िए होंगे कहीं।।