Post – 2016-04-29

जियो और जीने दो (2)

‘तुम कल उत्साह में थे। मैं उसे कम नहीं करना चाहता था, और सच यह भी है कि जब तुम ऐसी उक्तियों को भी देशद्रोह मान कर मुझसे मेरी राय मांग रहे थे, तब मैं स्वयं भी दुचित्तेनपन का शिकार हो गया था, जिसमें लगता है ‘ऐसा होना तो नहीं चाहिए, लेकिन गलत तो नहीं लगता।‘ कुछ देर बाद समझ में आया कि तुम मेरी बात को या तो जानबूझ कर तोड़मरोड़ रहे थे या तुम्हें उसका वही आशय समझ में आया जो तुम्हारे मन्तव्य़ के अनुकूल था। देशद्रोह को परिभाषित करते हुए मैंने यह कहा था कि यदि व्यक्ति जानता है कि यह देश के अहित में है और इसके बाद भी उसे करता है तो वह देशद्रोह हुआ। तुम्हें याद है यह।

वह सहमत हो गया।

‘जो व्यक्ति या संस्था ’जियो और जीने दो’ को अपना सिद्धान्तसूत्र माने, सबके लिए एक आचरणीय आदर्श माने, उसी को तुमने अपने कुतर्क से गर्हित सिद्ध कर दिया। ऐसे विचारो और आदर्शो को एक संस्कार के रूप में अपनी चेतना का अंग बनाना होता है, इसके लिए अवसर की प्रतीक्षा नहीं की जाती और जिस तरह के अवसर की बात तुम कर रहे थे उसमें तो यह सचमुच आग में घी का काम करेगा। तुम तो परंपरागत भारतीय शिक्षाप्रणाली के व्यांपक फलक तक को भी नहीं समझ सके। यह पिता और परिवार से आरंभ हो कर पाठशालाओ, उपदेशकथाओं, समय समय पर ग्रन्थों के पारायण और संत्संगगोष्ठियों के रूप में एक महाशाख वृक्ष की तरह फैली थी जिससे अक्षर ज्ञान न रखनेवाले भी वंचित नहीं थे । इसे तो अंग्रेजी शिक्षाप्रणाली ने काट-पीट कर स्कूल तक सीमित करके एक ठूंठ में बदल दिया। जो उनकी शिक्षा प्रणाली थी उसको शिक्षा से अधिक अपना राजनीतिक अखाड़ा बना कर तुमने उसे भी नष्ट कर दिया इसलिए तुम कुतर्क को तर्क और अपने क्षेत्र के प्रति निष्ठा रखने को यथार्थ से पलायन कहो तो आश्चर्य की बात नहीं है। आश्चर्य तो मुझे इस बात पर है कि तुम्हारे मिजाज को जानते हुए मैं कैसे बहाव में आ गया था। और यदि मैं बहाव में आ सकता हूं तो उन भोले भाले लोगों को कैसे दोष दे सकता हूं जिन्हें तुम इसी तरह बहकाने में सफल हो जाते हो और वे अपने ही लक्ष्य के विपरीत काम ही नहीं करने लगते हैं, उस पर गर्व भी करने लगते हैं।

‘मुझे सोचना चाहिए था कि तुम लोग जो हिन्दू मूल्यों, मानों, संस्थाओं, इतिहास, वर्तमान और हितों के पीछे बहेलिये की तरह तीर ताने लगे रहते हो, तुम्हारे निशाने पर खुद को भी लाने के खतरे को भांप कर तुम्हारी साथ साथ आलोचना करता जाता तो बातचीत में भी ताज़गी रहती और घपला पैदा न होता, पर वह न कर सका। अब समझ में आया कि वे सभी लेखक, पत्रकार और संचार माध्यमों से जुड़े लोग जो अपनी उदारता या उजलत में तुम्हारी मूर्खतापूर्ण व्याख्याओं पर मुकर्रर इर्शाद चीखते फिरते हैं, जिससे भ्रम पैदा होता है कि वे भी तुम्हारे ही गिरोह के अंग हैं, वे भी मुझ जैसे ही लोग हो सकते हैं. उन्हें तुम्हारी अटपटी व्यंख्यायें इतनी मौलिक लगती हैं कि उनमें कविता का सा आनन्द आने लगता है। वे बोल कर, लिख कर, और दिखा कर अपनी नासमझी में केवल तालियां बजा रहे होते हैं, बिना यह समझे कि विचार कविता नहीं होता और कविता जैसा आनन्दे देने लगे तो विचार विचार नहीं रह गया है। इससे बचो.

‘जो सज्जन योगाभ्यास कर और करा रहे थे उनकी योजना केवल यह थी कि जब तक मन में द्वेष और कलुष है योगाभ्यास का लाभ नहीं मिल सकता। वे कायिक, मानसिक और वाचिक शुद्धि का पाठ पढ़ाते हैं और पढ़ने वाला तुम जैसा मिल जाय तो उसी पाठ से क्या पढ़ेगा इसका उदाहरण तुमने पेश कर दिया। तुमने सत्य, आत्माबोध और आरोग्य के एक आदर्श प्रयोग को हिन्दू बना दिया और फिर उसके शिकार के कोने तलाशने लगे और मेरे पास चले आए। इसके लाभ से शेष मानवता को वंचित रखने का इससे घटिया कोई प्रयत्न हो सकता है?

‘देखो, जिस स्कूल में मैंने शिशु कक्षा से ले कर चौथी तक की पढ़ाई की उसकी दीवारों पर कुछ सूत्र वाक्य लिखे थे जो आज तक मुझे याद हैं और प्रेरणा भी देते हैं। वे थे:
झूठ बोलना पाप है।
नर हो न निराश करो मन को।
सत्यमेव जयते ।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
वही मनुष्यर है कि जो मनुष्य के लिए मरे।

‘तुम्हारी समस्या यह नहीं है कि तुम बुरे लोग हो। समस्या यह है कि तुम समझने के लिए, सुधारने और बदलने के लिए कुछ नहीं करते, जो कुछ करते हो जीतने के लिए करते हो और इसलिए समस्याओं का समाधान नहीं करते। समस्यायें पैदा करते हो। कुछ समय के लिए जीतने का भ्रम पाल भी लो तो तुम अपने जीतने के क्षणों मे भी हार रहे होते हो।‘

अब वह अपने तेवर में आया, ’मैं कल भी सोच रह था कि तुम इतने खुले मन से मेरी बात मानते क्यों चले जा रहे हो। अब समझ में आया कि तुम चाहते क्या थे?‘

‘क्या चाहता था? क्या समझ में आया ?

’वह, क्या ‘तीर चलाया है! क्या निशाना है!’ कहते हुए एक ओर तो तुम मेरे निशाने से बचते रहे और अपनी इस धोखेबाजी से इस प्रतीक्षा में लगे रहे कि जब मेरा तरकश खाली हो जाय तो डंडा ले कर मुझ पर टूट पड़ो और .. यह ले, वह ले, नहले, दहले करते हुए मुझी से पूछो मजा आया।‘

‘सच मानो, मैंने किसी इरादे से कुछ छिपा कर तुम्हारी बातों को सच नहीं माना था। सहज मन से माना था। परन्तु मुझमें और तुममें एक अन्तर है। तुम लोग झटपट समझ कर आगे बढ़ जाते हो, जो करना है कर गुजरते हो, भले उससे तुम्हारा ही सत्यानाश हो। इस बीच जो सत्यानाश कर चुके हो उसकी जिम्‍मेदारी से बचने या उसे उचित या अपरिहार्य सिद्ध करने में ही सारी ऊर्जा चली जाती है. मैं पहले से कहता आया हूं कि जिरह करते हुए पढ़ो। अक्षरपाठी मत बनो सारग्राही बनो। यह काम कुछ समय मांगता है। इसके लिए तर्क-वितर्क की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके लिए अपने दरबे से बाहर आकर सोचना होता है। अपनी उजलत और गफलत के कारण तुम लोग तो उन शब्दों का अर्थ तक नहीं समझ पाते जिनका प्रयोग करते हो। हद है! राजद्रोह और देशद्रोह तक में फर्क नहीं कर पाते।‘

‘सुनूँ तो, यह फर्क क्या होता है भाई।‘

‘वही बता रहा हूं। जिस धारा पर हफतों चारों ओर बहस होती रही और अन्तत: कुछ फैसलों के हवाले से कहा गया कि यह सेडीशन का मामला नहीं है, और यह बताया जाता रहा कि वह धारा अंग्रेजों ने लगाई थी। मांग की जाती रही कि उसे हटा दिया जाना चाहिए, उसमें सचाई और नासमझी का तुल्य योग था। उस पूरी बहस में देशद्रोह और राजद्रोह में अन्तर करने वाला कोई लेख या बहस या व्याख्यान मेरी नजर में नहीं आया।

‘अंग्रेजों का अधिकार हमारे देश पर धौंस के बल पर बना रहा था। उन्हें, हमारे ऊपर राज करने का नैतिक अधिकार नहीं था। इसलिए उन्होंने अपने राज को सुरक्षित रखने के लिए सेडीशन या राजद्रोह को अपराध बनाया था। जो उनके राज का विरोध करते थे वे देशप्रेम के चलते विरोध करते थे और ऐसे किसी काम, विचार या प्रस्ताव की आलोचना करते थे जो देश और समाज के लिए अनिष्टकर प्रतीत होता था।

‘मैंने इसीलिए यह स्पष्ट किया था कि सत्ता में रहते हुए यदि कोई देश के अहित का काम करे, ऐसी योजनाओं को जो देशहित में हैं, जिन पर बड़ी रकम खर्च हो चुकी है, बन्द कर दे, तो वह राजसत्ता पर अधिकार जमाने के बावजूद, देशद्रोही और राष्ट्र्द्रोही है। इस अपकार्य में उसके सहायक, इसको जानते हुए इस पर चुप रह जाने वाले सभी राजभक्त है पर साथ ही देशद्रोही है, राजद्रोही नहीं। उसका समर्थन करने वाले, उससे लाभान्वित होने वाले राजभक्त थे, देशभक्त नहीं।

‘तुमको जब मैं देशद्रोही कहता हूं तो राजद्रोही नहीं कहता क्योंकि सत्‍ता से नूरा कुश्ती लड़ते हुए भी तुम लोग सदा सत्ता के साथ रहे हो।

‘ऐसी स्थिति भी आ सकती है जब कोई सरकार देशहित पर ध्या‍न दे रही हो और तुम उसका इस कारण विरोध करो कि उसके इन हितकर कार्यों को सफल होने दिया गया तो देश उसे पसन्द करने लगेगा और इस तरह के कामों का सिलसिला बना रहा हो सत्ता में तुम्हारी वापसी का रास्ता बन्द हो जाएगा और इसलिए तुम उसे उखाड़ने के लिए अवांछित और उपद्रवी कारनामे करो तो तुम एक साथ देशद्रोही भी हो सकते हो और राजद्रोही भी।‘

वह कुछ अनमना तो लगा परन्तु उसके पास इसका प्रतिवाद करने को कुछ था नहीं। कुछ देर की चुप्पी के बाद उसने कहा, ‘यह तो आधी बात हुई। उसी ‘जियो और जीने दो’ का मैंने वह पक्ष उजागर किया था जो खानपान की स्वतंत्रता से जुड़ा है। उस पर तुम्हारी क्या राय है?’

’इस पर कल बात करेंगे, क्योंकि यह बहुत पेचीदा सवाल है।‘

’तुम भाग कर बचना चाहते हो।‘

’कल तक यही मान कर खुश रहो।‘

Post – 2016-04-28

जियो और जीने दो

‘यार, जियो और जीने दो’ के इस सूत्र को मैंने सुना तो कई बार है, पर इसका मतलब समझ में नहीं आया। तुम जानते हो?’

’वाक्य तो बहुत सीधा है, इसके एक एक शब्द का अर्थ दूध पीते बच्चे को भी मालूम होगा। तुम क्यों परेशान हो गए।‘

’तुम्हारी वजह से। तुमने जिस दिन याद दिलाया कि शब्दों का मतलब ठीक वही नहीं होता जो कोश में लिखा मिलता है तभी से अब जिस भी वाक्य को सुनता हूं उसका एक नया अर्थ निकलने लगता है।‘

‘मतलब तुम निकाल ही चुके हो। मुझसे क्यों पूछ रहे थे, तुम्हें तो मुझे बताना चाहिए। ’

‘उधर देखो, एक सज्जन योग का प्रशिक्षण दे रहे हैं और दो डंडों के सहारे एक इश्ताहार लगा रखा है ‘जियो और जीने दो।‘ मैंने पढ़ा तो सोचने लगा हमसे कई गुना लंबी सांसे लेते हुए जिधर जी आया अंग प्रत्यंग घुमाते हुए आसन कर रहे हैं। कोई रोकने वाला नहीं। कभी रोका भी नहीं। फिर यह विज्ञापन क्यों ? इसका अर्थ क्या है? तभी मुझे इसका यह अर्थ समझ में आया कि ‘कुछ लोग हैं वे न शान्ति से रहते हैं, न दूसरों को शान्ति से जीने देते हैं।‘ और तब यही वाक्य एक ललकार में बदल गया ‘तुम लोग हमें शान्ति से नही जीने देते इसलिए हम अपने को जिन्‍दा रखने के लिए तुम्हें रास्ते से हटाने को बाध्य हैं। और अब शान्ति, ध्यान और समरसता का यह आयोजन मानसिक रूप से अशान्ति का सन्दे्श देने वाले एक आयोजन में बदला दिखाई देने लगा। इसीलिए तुमसे पूछा कि जो मैंने सोचा वह तुम्हें भी ठीक लगता है या नहीं।‘

यह पहला मौका था जब मैं उसकी सूझ और सोच पर हैरान हो कर उसे इतने सम्मान से देख रहा था। कुछ कहते न बन रहा था, क्योंकि आदत उसकी खिंचाई करने की है और उसका कोई कोण नजर नहीं आ रहा था। कुछ संभला तो तारीफ न करते हुए भी समर्थन तो करना ही था। मैंने पूछा, गणित जानते हो?’

वह मुस्कराने लगा। कुछ बोला नहीं।

बोलना मुझे ही पड़ा, ‘जब तुम सवाल हल कर लेते हो तो तुम्हें पूरा विश्वास होता है कि सवाल हल हो गया। किसी के समर्थन की जरूरत नहीं होती। तुम्हें मेरे समर्थन की जरूरत नहीं है।‘

उसे मुझसे इस उत्तर की आशा नहीं थी। वह सोच बैठा था कि किसी न किसी कोने से टांग अड़ाउूंगा अवश्य। यह सुन कर वह गदगद हो गया और पहले से कुछ अधिक उत्साह में आ गया।

‘फिर मुझे मूल सूत्र का सरल और शिरोधार्य अर्थ समझ में आया, ‘जियो, जिन परिस्थितियों में हो उनमें जीने के लिए जो भी आवश्यक और सुलभ है उसे खा सकते हो तो खा कर जिन्दा रहो और हमे जो रुचता पचता है, हमारी पहुंच में है हमें खा पी कर जीने दो। तुमको यह किसी सिरे से गलत लगता है?’

मैंने पूछा, यह बताओ, तुम सरस्वती की पूजा कब और कैसे करते हो?’

वह समझ नहीं पाया। पूजा करता हो तब तो। मैंने कहा, ‘कभी कभी सरस्वती देवी पूजा पाठ न कर पाने वाले गधों की जबान पर भी आ बैठती हैं और वे उपदेश करने लगते हैं। दध्यंग अथर्वा की जबान पर इसी तरह विराजमान हुई होंगी।‘

वह बैठे बिठाए ही उछल पड़ा और मैंने संभाला न होता तो सीधे नाक के बल गिरता। पर तभी उसे शक हो गया कि मैं उसे चंग पर चढ़ा कर नीचे तो नहीं गिराना चाहता हूं। वह चौकन्ना होता सा लगा । यह शब्द मेरे ध्यान में आया और उसे नीचा दिखाने का कोई मौका मिल नहीं रहा था इसलिए पूछ बैठा, ‘चौकन्ना का मतलब जानते हो?’

ऐसे सवाल की कोई तुक न थी फिर भी कहीं वह निरुत्तर न रह जाय इसलिए उसने कहा, ‘चार कान वाला, अर्थात अपनी श्रवण क्षमता से दूना, अर्थात् अत्यधिक सावधान।‘

इतनी लंबी प्रतीक्षा के बाद मुझे अपनी हीनताग्रन्थि से बाहर निकल कर यह बताने का मौका मिला कि मैं भी कुछ हूं। मैंने कहा, ‘किसी खतरे का क्षीण अन्देेशा होने पर जानवर चौंक कर अपने कान खड़े कर लेते हैं और सारा ध्यान उसे भांपने पर लगा देते हैं। चौंक कर कान खड़ा करने की इस क्रिया से निकला है यह चौकन्ना शब्द, दूसरों का कान काट कर अपने कान में जोड़ने की शल्‍य क्रिया से नहीं।‘

वह मित्र होते हुए भी करबद्ध हो गया, ‘यह तो मेरे ध्याेन में आ ही नहीं सकता था।‘

मेरे अहं की तुष्टि हुई कि मैंने यह भी मान लिया कि कम्युानिस्ट उतने सिरफिरे नहीं होते हैं जो मैं अपनी गणित से उन्हें मान चुका था।

लगता है वह आज पूरी तैयारी करके, किसी से सलाह करके आया था इसलिए उसका एक-एक कदम बहुत नपे तुले ढंग से पड़ रहा था। उसने पूछा, ‘यह बताओ, खानपान के सवाल पर जो विवाद छिंडा, उसमें असाधारण संयम का परिचय देते हुए मोदी स्वयं चुप रहे। न बोलने वालों को रोक सके न झेले जाने वालों को दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंक सके । इसका रहस्य तुम्हें पता है?’

यह भी पहला ही मौका था जब मुझे स्वीकार करना पड़ रहा था कि कुछ बातें मुझे भी नहीं मालूम।‘ उसने कहा मालूम तो तुम्हें है पर कहने का साहस नहीं है। बुरा मत मानो तुम जिनके साथ हो वे सेवर दिमाग के लोग हैं और उनकी संगत में तुम्हारा दिमाग भी सेवर हो चुका है। सेवर का मतलब जानते हो? नहीं जानते तो कोई क्षति नहीं। मैं बताता हूं। अंग्रेजी में इसे हाफ बेक्ड कहते हैं।‘

उसे दबोचने का एक नया मौका मिल गया, ‘हाफ बेक्ड् नहीं, अंडर फायर्ड। यह जानो कि अधपके के लिए वस्तु भेद से अलग अलग विशेषणों का प्रयोग होता है।‘
वह इतनी विनम्रता से मेरी बात से सहमत हो गया कि मुझे आश्चर्य हुआ। परन्तु उसे तो अपने विचार के लिए मेरे मन को पिघलाना था। वह अपनी योजना पर अचूक काम कर रहा था। उसने मुझे घेरा तब मुझे उसकी व्यूह रचना का आभास हुआ। उसने कहा, जानते हो मोदी की चुप्पी के पीछे का सच?’

मैं चुप उसे निहारता रहा।

वह बोला, ‘इसलिए कि मोदी गुजरात के दस साल तक मुख्य मंत्री रहे। अपनी राज्य सीमा से बाहर गुजरात अपने पशुधन की श्रेष्ठता के कारण जाना जाता रहा है। गुजराती गाय, गुजराती भैंस, गुजराती सांड, गुजराती बकरी ।‘

मुझे टोकने का छोटा सा अवसरफिर मिला, ‘भैंस हरयाणवी और बकरी राजस्थानी अर्थात् उसके बांगर क्षेत्र की बागड़ा छेर।‘

वह मेरे इस विचार से भी पूरी तरह सहमत हो गया, पर बोला, ‘तुमको पता है मोदी ने निर्वाचन अभियान के दौर में एक झूठ बोला था, श्वेत क्रान्ति के स्थान पर कांग्रेस राज में लालक्रान्ति को बढ़ावा मिला है। मैं याददाश्त से बोल रहा हूं शब्दों में कुछ हेर फेर हो तो बताना। पर वह जानते थे कि उसी गुजरात में जिसे श्वेत क्रान्ति या अधिकतम दूध उत्पा‍दन का श्रेय है उसी में अंतरराष्ट्रीय स्तर को छूने वाले बूचड़खाने भी बने हैं, और उसी से सबसे अधिक गाेमांस का निर्यात होता रहा है और आज भी हो रहा है।’

मैं पुन्‍: चौंक कर देखने लगा तो बोला, ‘मोदी की अन्तरात्मा का आदर करता हूं। इस एक कथन के अतिरिक्त उस आदमी ने कोई दूसरी चूक नहीं की। पर इस मामले में उसके अपनों के बीच उसके विरोधी ही भरे थे। ‘

उसकी भूमिका का लक्ष्य मेरी समझ में नहीं आया तो कहा, ‘दुर्बोध बातों के लिए तुम मुझे दोष देते रहे हो, अब तुम स्वयं उनका सहारा ले रहे हो।‘

उसने कहा, ‘मैं तो तुम्हारी सीख ही तुम पर आजमा रहा हूं। तुमने कहा भावना का भी एक अर्थशास्त्र होता है और इसे हम कम्युनिस्टों ने नहीं समझा तो मैं तुमसे सहमत हो गया था। इसका पालन जिन्हें हम भाववादी कहते आए थे उन्होंने हमसे अधिक दृढ़ता से किया है इसे भी मान लिया। इस अर्थशास्त्रीय नैतिकता को भी समझ गया जिसका कांटा लाभ के अनुपात के साथ बदलता रहता है। सच यह है कि आज का अर्थशास्त्र उन्हीं शाश्वत नियमों पर चल रहा है जिसका हवाला शतपथ ब्राह्मण को याद करते हुए तुमने दिया है।

‘मोदी को मैं इस बात का श्रेय देता हूं कि उस एक विचलन के अतिरिक्त मुझे अपने प्रयत्न के बाद भी कोई दूसरा नमूना न मिला कि उसे गलत मान लूं। वह अपने वायदे निभाने के लिए देश की नींद जागता और देश की नीद सोता है और देश के उज्‍वल भविष्य के सपने देखता है।‘’

मैं उसके मा‍नसिक परिवर्तन पर स्वयं इतना चकित था कि उसे अपने विचारों में बदलाव लाने के लिए धन्यवाद तक न दे सका कि वह बोल पड़ा, मोदी को मालूम है कि श्वेत क्रान्ति रक्त क्रान्ति से जुड़ी हुई हैा अर्थशास्त्र पूछता है गाय से बछड़ा पैदा न होने का कोई तरीका हो तो उसे देश को बताओं। बछड़ों का कोई भी उपयोग उस व्यवस्था में रह गया हो तो बताओ जिसमें खेती हल आधरित न रह कर ट्रैक्‍टर आधारित हो गई है। जिस गुजरात से दूध दूसरे राज्यों को निर्यात होता है, उसमें बछडों का क्या होता है, यह तो पता लगाओ। इन बछड़़ों को बचाने का आर्त नाद शतपथ में मिलता है, उस समय की अर्थव्‍यवस्‍था के कारण। आज तुम मुझसे पूछो कि इन बछड़ों को किसने मारा तो उत्तर होगा हल आधारित खेती से ट्रैक्टैर आधारित खेती में बदलाव ने। इस प्रक्रिया को उलट सको तो हम तुम्हारे साथ है, इस विवशता को स्वीकार कर सको तो भी हम तुम्हारे साथ है?

वह उत्‍साह में अस्थिर हो गया। संभला तो दो प्रश्न कर बैठा:
1. तुमने ही कहा था कि जो लोग सुनियोजित रूप में कोई ऐसा काम करते हैं जिससे राष्ट्रीय जन-धन की हानि हो वे राष्ट्रद्रोही हैं। अब तुम बताओं, अकारण, हमारी चेतना को प्रभावित करने वाले, शान्ति और व्यव्था ही के लिए संकट पैदा करने वाले उन लोगों को राष्ट्रद्रोही कहना ठीक होगा या नहीं जो करते सब कुछ निरामिष लगने वाला ही है पर उसके परिणाम विषप्रचार में सहायक होते हैं और उनके अलक्ष्‍य ताप का जब भी उन्मोचन होता है, वह अनिष्टकारी ही होता है।‘
यह भी पहला ही अवसर था जब मैंने नरम पड़ते हुए उससे कहा, ‘सभी प्रश्नों का उत्तर क्या इतना रटा-रटाया होता है कि अगले ने प्रश्न किया और आप ने गोली मारने वाली तेजी से जवाब दे दिया।‘

‘कल बात करेंगे। उसने बड़े आत्मविश्वास से कहा और उठ कर चला तो रोज की ही तरह पर मुझे लगा आज वह कुछ अकड़ता हुआ चल रहा है।

Post – 2016-04-27

अधूरापन अधूरा ही नहीं है

‘यह बताओ, तुम भाषा के पीछे हाथ धो कर क्यों पड़ गए हो?’

‘भाषा के पीछे तो मूर्ख पड़ते हैं और उसका सत्यानाश करके रख देते हैं, मैं तो उसके सम्‍मुख नतमस्तक होने वालों में हूं वह भी इस स्तुति के साथ कि तेरा ध्यान करने के बाद पता चलता है तू कितनी गहन और अपरिसीम है। ज्ञात होने का भ्रम पैदा करते हुए अपने उस सत्य को छिपाए रखती है कि तू अज्ञेय है। यदि पीछे पड़ने का मुहावरा तुम्हें बहुत पसन्द है तो मैं कहूंगा मैं उन अनाड़िुयों के पीछे हाथ धो कर नहीं, चाबुक ले कर पड़ना चाहता हूं जो अपने अहंकार में समझते हैं वे शब्दों को जब चाहेंगे, जैसे चाहेंगे, मोड़ देंगे और जो अर्थ निकालना चाहेंगे, निकाल लेंगे।‘

’मान गए भाई, तुम देववादी परंपरा के शिलीभूत नमूने हो जिसमें किसी भी चीज को देवता बनाए बिना अपने उपयोग का समझा ही नहीं जाता इसलिए … ‘ वह कुछ सोच में पड गया। वाक्य का अन्त कैसे करे यह उसकी समझ में नहीं आ रहा था।

मैंने उसे दबिश में ले लिया, ‘जानते हो तुम्हारा वाक्य क्यों पूरा नहीं हो रहा है। इसलिए कि तुम्हारी मति मारी गई है। मार्क्सवादी बनते हो और आस्था और भक्ति का अर्थशास्त्र तक का पता नहीं, जब कि मार्क्स के पैदा होने से पांच हजार साल पहले से भारत को यह पता था। वह अपने उपयोग की चीजों का इतना ध्यान रखता था, उनका इतना जतन करता था, इस तरह संभाल कर रखता था, इतना सम्मांन करता था कि देखने वाले को उनमें देवत्व का भ्रम हो। तुम्हें पता है ऋग्‍वेद में धनुष, बाण, दुन्दुभी जैसी चीजों को भी देवता बताया गया है। उस परंपरा का विस्तार उस आचरण में होता रहा है जिसमें आज भी बनिया अपनी खाता बही की, बटखरों की, क्षत्रिय अपने हथियार की, लेखनजीवी अपने कलम और दावात की पूजा करता रहा है। और मा, धरती, नदी, पर्वत, वृक्ष सभी की पूजा करते हुए उनसे मिले अपने लाभ और सुरक्षा को गीत बना कर दुहराता है जिसे स्तुतिगान कहते है। और यदि तुम जानना चाहो कि अपने दूध से हमारा भरण पोषण करने वाले जानवरों में अकेले गाय की पूजा क्यों की जाती रही है तो तुम्हे शतपथ ब्राह्मण की वह इबारत दुबारा ध्यान से पढ़नी पडेगी जिसमें कहा गया है कि इसके ही बच्चों को बैल बना कर जोता जाता है जिससे अनाज उत्पन्न होता है और जिससे हमारा भरण पोषण होता है, इसलिए जो इनके मांस भक्षण की बात करता है वह अपनी भावी पीढि़यों के लिए अन्न संकट पैदा करते हुए ऐसा जघन्य काम करता है मानो वह अपनी ही अजन्मी पीढ़ियों को खा रहा हो।

‘कितने हजार साल पीछे चले गए हो, इसका पता है।‘

’जिन्हे जगत गति व्यापती ही नहीं वे न अतीत को समझ सकते हैं न वर्तमान को न आगत को, वर्ना तुम अपने झंडे, अपने राष्ट्र गान, अपने संविधान के प्रति सम्मान की भावना के पीछे काम करने वाले तर्क को समझ पाते। तुम्हें केवल यह पता चला कि मैं बीते हुए युगों के साथ हूं पर यह पता नहीं चला कि उसी के कारण मैं वर्तमान के साथ भी हूं। तुम न अतीत का सम्‍मान कर सके, न उसे समझ सके, न यह देख सके कि वर्तमान की वर्तमानता में भी अतीत विद्यमान है और जिस दिन वह न रहा पूरा मानव समाज उस इमारत की तरह बैठ जाएगा जिसकी नींव धंस गई हो या अपनी सही जगह से हट गई हो।‘

’तुम नहीं मानते कि बातें कुछ वायवीय हो रही हैं। क्या इस पर हम कल बात न करें।‘

मैंने तो पहले दिन से ही यह मान लिया था कि तुमको जमीनी सचाई वायवीय लगती है और वायवीय या कल्पनाप्रसूत तुम्‍हारे लिए यथार्थ बन जाता है। फिर भी कल तक का समय चाहिए तो उसे कौन रोक सकता है। रोकूं तो भी उठ कर चल दोगे।‘

Post – 2016-04-26

भाषा का संकट: विचार का संकट

‘ऐसा विचित्र दौर आ गया है कि लोग अपने संगठन के नाम में भारत, राष्ट्र जोड़ लेते हैं और दुनिया को बताते फिरते हैं कि देश और समाज की चिन्ता उन्हें ही है और जो उनसे असहमत हैं वे सभी राष्ट्राद्रोही हैं।‘

कल की लताड़ का जवाब तैयार करके आया था, ‘अधिनायकवाद यहीं से आरंभ होता है। खतरे यहीं से पैदा होते हैं जब एक छोटी सी जमात, मेरा मतलब पूरे देश को देखते एक छोटी सी जमात, सत्ता में आ कर ऐसे काम करने लगती है, जिसमें उससे असहमत होना तक कठिन हो जाता है। तुमने कभी यह भी सोचा है।‘ वह सचमुच गंभीर था।

‘यदि में कहूं कि यह तुम्हारा भ्रम है, इसका कोई आधार नहीं, तो तुम ऐसे टु‍कड़े जोड़ कर एक कोलाज तैयार करोगे जिसमें वह देश, समाज और पूरी मानवता के लिए खतरा दिखाई देने लगेगा। ठीक इसके विपरीत ऐसे ही टुकड़े जोड़ कर एक दूसरा कोलाज कोई दूसरा तैयार करे जिसमें वह अनन्य और अप्रतिम लगे तो वह भी कम विश्वासनीय न होगा। इन व्‍यक्तियों और संगठनों से सहानुभूति रखने वालों की संख्या करोड़ों में है और इसलिए दोनों कोलाजों के प्रशंसक और कुछ कतरनें अपनी ओर से जोड़ने वाले लाखों आसानी से मिल जाएंगे। ऐसी स्थिति में निर्णय दो चतुर कलाकारों की कारसाजी की तो की जा सकती है परन्तु दोनों के कोलाज देखने वाले निष्पक्ष लोग भी भ्रमित हो जाएंगे, पर भरोसा किसी पर नहीं कर सकेंगे। विश्‍वास का संकट अवश्‍य पेदा हो जाएगा। इससे विचारेतर तरकीबों और तिकड़मों के लिए गुंजाइश पैदा होगी। पक्षधरता के ये दोनों रूप नासमझी का ही विस्तार करेंगे। गुण-दोष का सही मूल्यांकन करने के लिए हमें ठोस, तटस्थ और वैज्ञानिक मूल्यांकन चाहिए। इसका कोई उपाय हो, और उसका कभी सहारा लिया हो तो वह बताओ।‘

वह कुछ सोच में पड़ गया, फिर बोला, ‘समस्याओं का सर्वमान्‍य हल नहीं हुआ करता। तुम लाख कोशिश करो दोनों को अच्छा और बुरा कहने वाले तो मिल ही जाएंगे। सर्वस्वीकार्य सच और फैसले तो तानाशाहों के ही होते हैं।‘

’ठीक ऐसी ही बहस तानाशाही पर हो, असंख्य लोग उसी व्यक्ति को आदर्श लोकवादी मानें और दूसरे उसे ही तानाशाह तो यहां भी वही स्थिति पैदा हो जाएगी।‘

’होगी, लेकिन…’ वह कुछ कहना चाह रहा था पर अपने को उसने रोक लिया।

’ऐसी स्थिति में हमें किसी की आलोचना करने का अधिकार नहीं रह जाता। कोई चीज न तो सही रह जाती है, न गलत। तुम्हारा अपना विश्वास ही निर्णायक बना रहता है और विश्वास विचार में बाधक होता है, कई बार विचारद्रोही होता है, यह तुम जानते हो। इसलिए हमें किसी विषय पर राय देने से बचते हुए जो कार्यक्षेत्र अपने लिए चुना है उसी की सीमाओं में रह कर निष्ठा और समर्पण भाव से काम करना चाहिए और दूसरों को बुलावा नहीं भेजना चाहिए कि अपना काम छोड़ कर आओ और हमारे काम में हाथ बटाओ, अपितु यदि वे ऐसा करने को विचलित अनुभव करें तो उन्हें समझाना चाहिए कि अपने क्षेत्र का काम पूरे समर्पणभाव से करो जिससे उसकी संभव उूंचाइयों को छू सको। इससे कम से कम उस क्षेत्र का तो भला होगा और सभी ऐसा करने लगें तो सभी क्षेत्रों का उत्थान होगा और इस‍ तरह पूरे देश और समाज का उत्थान होगा।

‘ तमिल की एक सूक्ति है, यदि पूरा देश समृद्ध हो तो किसी को कोई कमी न रह जाय – नाडेंगम् वाझ़गा केडोन्रुममिल्लै। हम अन्यान्य क्षेत्रों में अपनी उूर्जा बर्वाद करके समूचे देश की उूर्जा की तबाही करते हैं और तब पूरा देश तबाह होता है।

‘उसी सूक्ति का उल्टा पाठ बनता है कि यदि पूरा देश ही बर्वाद हो रहा हो तो कोई सुख और शान्ति से नहीं रह पाता। तब बहुसंख्यक जन अपनी रोटी तक कमा नहीं पाते, उनकी ओर रोटी हिकारत से फेंकी जाती है और गर्व से बताया जाता है कि देखो हमने तुम्हारी ओर इतनी रोटियां फेंकी। मुझ जैसा पहले कोई हुआ था। मजा तब कि वह रोटी भी उसके बिचौलिये छीन कर उन्हेंं दूसरों को बेचने लगें। ऐसे मे यदि कोई आए और कहे रोटी कमाने की संभावनाएं पैदा करो ताकि फेंकी हुई रोटी खानी न पड़े, परन्तु जब तक ऐसी नौबत नहीं आ जाती मैं ऐसी व्यवस्थाक करता हूं कि रोटी तुम तक पहुंचे अवश्य , बिचौलियों की झोली में न चली जाय, तो भी दोनों के साथ बहुत सारे लोग खड़े हो सकते हैं पर क्या सही और गलत का निर्णय भी आधा आधा रह जाएगा। ऐसी स्थितियां होती हैं जिसमें सही और गलत का निर्णय बहुत साफ होता है और यह तय करना भी आसान होता है कि जो गलत के साथ है, बीच की रोटी अपने झोले में डालने वालों की जमात में हैं वे सही हैं या वे जो सही के साथ खड़े होने की कोशिश में गलत लोगों के धक्के झेलते हुए अपने पांवों को टिकाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।‘

’तुमने भाषा और विचार के सवाल को रोटी पर पहुंचा दिया।‘

‘तुम भी नहीं मानोगे कि विचार और रोटी में बहुत गहरा संबंध है। तुम तो मार्क्सुवादी हो यार, हमारे यहां के तो भाववादी तक मानते रहे हैं कि जैसा अन्न वैसा मन और यह भी कि भूखे भजन न होंहि गोपाला।‘

’तुम पक्के घालमेलाचार्य हो। अपने क्षेत्र के काम वाले प्रस्ताव पर आओ। पहले तो क्षेत्रों का इतना तराशा हुआ बटवारा नहीं होता जितना तुम छुरे की धार से कर लेते हो । एक प्रमुख क्षेत्र से जुडे़ अनेक अनुसंगी क्षेत्र होते हैं। फिर सोचने विचारने का काम भी तो सभी को करना पड़ता है और जिनका क्षेत्र ही सूचना, ज्ञान और विचार है वे अपना काम कैसे छोड़ देंगे। और उन्हें जो चीज गलत लगती है उसे गलत तो कहेंगे ही।‘

’यही तो कह रहा हूँ कि वे जो अनेक काम दूसरे कारणों से करते हैं उनको अपने प्रधान काम की कीमत पर नहीं करना चाहिए। उसी से उनका अपना कार्यक्षेत्र निर्धारित होता है। इस क्षेत्र को उन्होंने स्वयं चुना है और इसलिए ही इसे समर्पित भाव से, निष्ठापूर्वक करना चाहिए, जो वे नहीं कर रहे हैं। वे सोचने की जगह नारेबाजी कर रहे है, दंगे को विचार की स्वतन्त्रता बता रहे हैं। वे जिसे तानाशाह बता रहे हैं या जिससे तानाशाही का खतरा दिखा रहे हैं उसको निहत्थे हो कर भी ललकार रहे हैं, और वह कुछ नहीं करता और उन्हें और अपने को कानून के हवाले कर देता है। वे उस कानून को भी नहीं मानते। तानाशाह तानाशाह भले न हो तानाशाही का हौवा पैदा करके गुंडागर्दी करने वाले और गुंडागर्दी को क्रान्तिकारी पहल बताने वाले तो है।‘

’बहस तो फिर इस पर भी होगी कि जिसे तुम गुंडागर्दी कह रहे हो वह गुंडागर्दी है या नहीं।‘

’बहस करने पर तो फिर वही विभाजन हो जाएगा कि इतने लोगों के लिए यह गुंडागर्दी है इतनों के लिए क्रान्तिकारी उन्मेष। इसलिए गुंडागर्दी को परिभाषित करना होगा। यदि तुम कहते हो जिनका काम सोचना है, विचार करना है, किसी निर्णय पर पहुंचना है वे जिस कृत्य का समर्थन कर रहे हैं उसको परिभाषित करने तक की योग्यता उनमें नहीं है तो मैं कहूंगा इसका कारण यह है कि वे अपने क्षेत्र का काम सच्चे मन से नहीं करते रहे। अपने को धोखे में रखते रहे है।

‘उसे परिभाषित करने के स्थान पर तुम जो काम बहुत सारे लोगों को गुंडागर्दी लगती है उसका समर्थन करते हुए बताते हो गुंडागर्दी आजादी से जुड़ी हुई समस्या है इसलिए उन्हें ऐसा करने से रोका नहीं जा सकता।

‘मैं कहता हूं सोचने, विचारने, शिक्षित करने वाले लोगों के बिना कोई समाज सनक जाएगा, वे ही हमें राह दिखाते है, पर तभी जब वे अपना काम करना जानते हों। जो इसे जानते हैं वे कितने भी बुद्धिमान हों, उनको जो सही या गलत लगा, उसे सही या गलत मान कर ऐक्शन में नहीं आ जाते हैं। विचार की एक प्रक्रिया होती है जिससे गुजर कर, उसके पक्ष-विपक्ष को जानने के बाद वे किन्हीं ऐसे औजारों का प्रयोग करते हैं जिससे सही निर्णय पर पहुंचा जा सके। जब तुम कह रहे थे कि किसी भी प्रश्न पर दो तरह के विचार तो होगे ही, केवल तानाशाह ही अपने विचार और आदेश को सही मानता है, तब तुम एक बदहवास की तरह बात कर रहे थे। तानाशाह न तो सही होता है न हो सकता है, क्योंकि वह विचार और विचारकों से डरता है। विचारों का हनन करता और अपनी आलोचना करने वालों को रास्ते से हटा देता है।‘

’ठीक कहते हो, जैसा अब होने लगा है। देखा नहीं, विश्वव हिन्दी सम्मेलन के बारे में इस सरकार के एक मंत्री ने क्या कहा था। आज विचारकों और साहित्यकारों की कितनी बेकद्री है।‘

’मैं चाहता था तुम समस्या पर बात करते, पर लगता है तुम उन चिन्दियों को जुटाने लगे जिनसे अपना कोलाज बनाते हो और झूम उठते हो, जब कि एक तटस्थ व्यक्ति को यह दिखाई देता है कि बोलने, अपशब्द बोलने तक की आजादी, सीधे बिना कोई कारण बताए अपने कल्पित तानाशाह को मिटाने के नारे लगाने वालों तक को बोलने की जितनी आजादी इस समय है वैसी इतिहास में कभी थी ही नहीं। आजादी सोचने की भी है, पर उस ओर तुम्हारा ध्यान नहीं जाता, इसलिए वह बदहवासी है जिसमें तुम्हारा सच तुम्हें सत्य् की पराकाष्ठा प्रतीत होता है और उससे असहमति जघन्य प्रतीत होती और ऐसों को तुम मिटा देना चाहते हो, जो तुमसे भिन्न विचार रखते हैं। इसे छिपाते भी नहीं, खुल कर कहते हो, इसका इन्तजाम भी करते हो। अब तानाशाह और लोकवादी का फैसला करो। तानाशाह तुम सिद्ध होते हो अपनी ही परिभाषा से,, अपने ही किए और कहे से और इस तानाशाही का चश्का तुम्हें पड़ गया है या नहीं। वह अकेला आदमी जो इस तानाशाही को खत्म करना चाहता है पर लोकवादी औजारों से ही, सबको साथ लेकर, सबके विकास का सपना देखता है, उसे तुमने तानाशाह बना रखा है। समझ और नीयत की ऐसी खोट कहीं मिलेगी।‘

कुछ न सूझा तो वह अपना सिर खुजलाने लगा। यह उसकी आदत है, यह मैं बता आया हूं।

मैंने कहा, ‘देखो भाषा का संकट विचार के संकट से पैदा होता है, और विचार का संकट तब पैदा होता है जब तुम अपने विश्वास को ही विचार मानने लगते हो और उसके लिए घास तिनके जोड़ने लगते हो। ऐसे लोग केवल वैचारिक और वाचिक संकट ही नहीं पैदा करते, स्वयं अपने देश और समाज के लिए संकट बन जाते हैं।‘

अब कहीं उसकी जान में जान आई, ‘संकट मान ही चुके हो, मिटा दो। छुट्टी मिल जाएगी।‘

’जो खुद अपने को मिटाने का पक्का इन्तजाम करता जा रहा हो उसे मिटाने का पाप कौन लेगा यार।‘

Post – 2016-04-26

मैंने अपनी कल की पोस्‍ट का संपादन अभी अभी किया है। जिन मित्रों ने पोस्‍ट पढ़ लिया है वे अन्तिम अंश को जो 000 के निशान के आगे जोड़ा गया है अवश्‍य पढ़ें।

Post – 2016-04-25

भाषा और परिभाषा

जानते हो, जो मुंह में आए उसे बोल जाने वाले को क्या कहते हैं? बकवास करने वाला!

‘तुम नहीं जानते कि मामूली से अर्थभेद से बात कहां से कहां पहुंच जाती है। जो मुंह में आया बोल जाने वाले को बकवास करने वाला नहीं कहते, मुंहफट कहते हैं। बकवास करने वाता उसे कहते हैं जो निराधार या तर्कहीन बातें करता है। अभी हमारी एक मित्र मणिका मोहिनी ने ज्‍वालामुखी का प्रयोग किया था। इसका मै दो ही अर्थ जानता हूं, एक में मुंहजला कहा जाता है और दूसरे में बीड़ी-सिगरेट पीने वाला। सोच समझ कर बोला करो। अभी हमारे एक मित्र शब्दकोश पढ़ने की आदत के बारे में बात कर रहे थे। अच्छी आदत है, मैं इस माने में डी एच लारेंस को अपना गुरु मानता हूं । आल्डस हक्सले ने उसके पत्रों का एक संकलन प्रकाशित किया था जिसमें अपने एक पत्र में उसने अपने प्रकाशन एजेंट से पूछा था कि मैंने अमुक स्‍थल पर अमुक शब्द‍ का अमुक आशय से प्रयोग किया है बताना ठीक तो है।

‘शायद अपने उसी पत्र में उसने लिखा था कि यदि मुझे इस बात का पूरा ज्ञान होता कि कौन सा अक्षर किसके बाद आता है तो डिक्शनरी देखने में जितना समय लगाया है उसमें कुछ सालों की बचत हो गई होती।‘इसका मतलब जानते हो तुम?’

’इसमें मतलब जानने की कौन सी बात आ गई? हर चीज का तमाशा बनाते हो तुम?’

’तुम जिन पहलुओं को तमाशा मान कर छोड़ देते हो उनकी गहराई में जाओ तो लोक परलोक दोनों सुधर जाएंगे। इसका मतलब यह है कि लारेंस बहुत संवेदनशील और सतर्क लेखक था। स्कूल टीचर था, यह जानते ही होगे। इसका मतलब है वह अपनी रौ में अपनी रचना लिख जाता था और फिर उसकी बहुत बारीकी से जॉंच करता था कि जिन शब्दों का प्रयोग उसने किया है वे ठीक वही आशय देते हैं या नहीं । उस काल में अंग्रेजी में थिसेरस, जिसके लिए अरविन्द कुमार ने समान्तर कोश का प्रयोग किया, या तो नहीं था, या भरोसे का नहीं था। उसे एक ही शब्द के पर्यायों को कोश से देखना होता, उनकी जो परिभाषा या व्या ख्या उसमें दी गई है उसे समझना होता, और फिर उन पर्यायों में से एक एक को जांच कर देखना होता कि कोई शब्द उसके इच्छित आशय के अनुरूप है या नहीं।

‘अब समझ में आया, उसने अतिरंजित रूप में ही सही, कोश से सहायता लेने के लिए इतने लंबे समय का उल्लेख क्यों किया था और इतनी सावधानी स्वयं बरतने के बाद भी उसने अपने एजेंट से किसी विशेष प्रयोग के बारे में क्यों आस्‍वस्‍त होना चाहा था कि वह सर्वथा उपयुक्त है या नहीं।

‘इसे कहते हैं अपनी भाषा का सम्मान। इसे कहते हैं अपनी जनभावना का सम्माान। इसे कहते हैं अपने विचार का सम्मान और इसे कहते हैं अपने विचारदर्शन का सम्मान ।

‘तुम लोगों ने अपने अजदाद तक का सम्मान करना छोड़ दिया। क्योंकि वे हिन्दू थे और तुम्हा‍री तरह उससे आगे नहीं बढ़ सके थे जहां हिन्दुत्‍व को हिकारत में बदल दिया जाता है, इसलिए तुम न अपनी भाषा का सम्मान कर सकते थे न अपनी भावनाओं का जिनका तुम इजहार करके अपनी दूकानदारी चलाते हो। तुम उस दर्शन को भी न तो समझ पाए न ही उसका सम्मान कर सके, क्योंकि भारतीय कम्युनिज्म एक रोमानी अभियान था जिसमें नवाबों की जिन्दगी जीने वाले, अपनी कविता और वक्तंव्य में सर्वहारा की पीड़ा और गुस्से को छौंक के रूप में इस्तेमाल करते थे और महफिल लूट कर घर चले जाते थे और खुशी में एक और पेग चढ़ा कर क्रान्ति के सपनों में खो जाते थे। परन्तु यह एक ऐसी सुहानी क्रान्ति थी जिसके न आने का उन्हें पूरा विश्वास था।

‘जानते हो मुझे यह खयाल इतने ठोस रूप में क्यों आया? फैज की कुत्तेे कविता याद आ गई थी। पूरी कविता तो मुझे याद नहीं, पर उसमें आए कुछ शब्दबन्ध जहन में हांट करते हैं, ये छोटी सी घुड़की ये डर जाने वाले, ये फाकों से मर जाने वाले, कोई इनको अहसासे जिल्लत दिला दे। कोई इनकी सोई हुई दुम हिला दे । ये आकाओं की हड्डियां तक चबा लें। आदि।

तुम गौर करो, जिनकी हड्डियां उन्हें चबानी थी, उनमें तो अपनी नवाबी जीवन शैली वाले फैज भी थे, बन्ने भाई भी थे और दूसरे हजरात भी थे। फिर यदि वे क्रान्ति को एक संभावना मानते थे तो उन्हें अपनी जीवनशैली बदलने का खयाल क्यों न आया? वे जानते थे, क्रान्ति एक लफ्ज है संभावना नहीं, यह लफ्फाजी के लिए बना है और आकाओं की हड्डियां चबाने वालों की जुर्रत नहीं कि वे किसी के दुम हिलाने से भी हमारी हड्डियां चबा सकें।‘

वह कुछ कहने के लिए तिलमिलाया तो पर सही वाक्य की तलाश न कर सका इसलिए चुप रह गया।

मेरा इरादा उसे दुख पहुंचाने का न था। मैंने बात आगे बढ़ाई, ‘अच्छे लेखक के पास और कुछ हो या न हो, शब्दकोश जरूर होना चाहिए जिससे तनिक भी शक होने पर वह अपना संदेह दूर कर सके। और इतना सब जानने मानने के बाद भी कई बार आदतन कुछ गलत प्रयोग सभी से हो ही जाते है। कोशाधिकारी शलाका पुरुष मेरी जानकारी में एक ही हुए हैं: पंडित रामावतार शर्मा, जो कहते थे कोई भाषा सीखनी क्या मुश्किल है, उसका व्याकरण और कोश रट जाओ, भाषा पर अधिकार हो गया। वह नलिन विलोचन शर्मा के पिता थे।

‘पर भाषा पर भी इतना जोर मत दो कि भाषाज्ञान साधन से साध्य में बदल जाए। न जानें कितनी भाषाओं के अधिकारी होते हुए भी वह एक चमत्कार बन कर ही रह गए। उनका उतना भी योगदान नजर नहीं आता जितना नलिन जी का, जो इस माने में अपने पिता के चरण रज से बड़े नहीं हो सकते थे।

‘पर भाषा, वह कोई भी हो, खास कर जनभाषा, वह संगीत की अनन्य उूंचाई पर पहुंची होती है। कविता में वह संगीत नहीं होता जो गद्य में होता है इसलिए जो कलाकार दर्जनों भाषाओं में गाना गा लेते है, उनमें से किसी के गद्य का एक वाक्य भी सही नहीं बोल पाते।‘

’तुम कह रहे थे कि जो शब्दों का सूक्ष्म अर्थभेद नहीं जानते वे बात को कहां से कहां पहुंचा देते हैं और मैंने पाया लोग सूक्ष्म अर्थभेद जानने के कारण किसी बात को कहां से कहां पहुंचा कर ही संतुष्ट नहीं होते, इस ताक में भी रहते है कि उसे वहां से और कहां कहां पहुंचाया जा सकता है।‘

इतनी देर के बाद उसका वह वाक्य पूरा हो सका जिसके लिए वह तिलतिलाया तो था पर चुप रह गया था। हम दोनों का अट्टहास एक साथ फूटा । अट्टहास थमा तो मैंने हंसते हुए ही कहा, ‘मैं जानता था तुम मुझ पर हमला करने के लिए पैंतरा बदल रहे हो, इसलिए तुम्हारा वाक्य पूरा होते ही उल्टे तुम्हारे उूपर दबिश बना ली। अब बताओ तुम बकवास कह कर भूमिका किस बात की बना रहे थे।‘

‘तुमने अपनी रौ में यह घोषित कर दिया कि भाजपा छोड़ दूसरे सभी दल और नेता राष्ट्राद्रोही हैं और यह भी नहीं सोचा कि स्वयं अदालत ने यह मान लिया है कि अन्य जो भी अपराध हो अलगाववादी बातें करना या नारे लगाना, जुलूस निकालना राष्ट्रहद्रोह में नहीं आता। इसके बाद भी तुम वही बातें दुहरा कर अदालत की अवमानना नहीं कर रहे थे। मैं तुम्हारे भले के लिए समझा रहा था कि जो जी में आया वही बोल जाने के खतरे भी हैं।‘

’तुमने किसी फैसले को ध्यान से पढ़ा ही नहीं, इसे क्यों पढ़ते। अदालतों का फैसला पुलिस और राज्य के लिए मान्य होता है, लोक के लिए नहीं। अदालत के फैसले में यह ध्यान रखा जाता है कि अमुक धारा में जिसे अपराध माना गया है उसकी परिभाषा में अमुक कृत्य आता है या नहीं, आता भी है तो उसके लिए पुलिस को जो सबूत जुटाने थे वे जुटाए गए या नहीं, यदि वे जुटाए गए तो लचर है या निर्णायक, जो गवाह पेश होने थे उन्होंने अपना बयान बदल तो नहीं लिया, इसलिए हर फैसला बहुत सारे बन्धनों या विवशताओं में जकड़े हुए जज का होता है।

‘जो स्वतंन्त्र नहीं है, जिसके हाथ कानून की धारा और कानून की सहायता करने वाली पुलिस की साख से बंधे हैं जो इतनी गिरी हुई है कि बहुत सारे लोग खमियाजा भुगत लेते है, पर पुलिस के पास नहीं फटकते और उूपर से कानूनी फैसलों में व्यक्तिगत घटक भी काम करते हैं और उनकी मान्यता इस हद तक सन्दिग्ध हो सकती है कि कोई कानून जानने वाला ही यह कहे कि न्यायाधीशों में इतने प्रतिशत भ्रष्ट हैं, रिश्वत लेते हैं तो उसका खंडन करने वाले तक सामने नहीं आते। पुलिस कानून से बंधी है, जज कानून और पुलिस की साक्ष्य जुटाने की क्षमता और ईमानदारी से बंधा है, पर लोक वह है जिसके हित के लिए कानून बनाए और बदले जाते हैं। वह जहां गलत लगता है वहां भी सर्वोपरि है। कहें जज राज्य और पुलिस से उूपर होता है, लोक उनसे और न्यायपालिका से भी उूपर होता है। जहां वह जानता है अपराध किसने किया था, वहां उसके विश्वास में इस बात से अन्तंर नहीं पड़ता कि अदालत को संतुष्ट करने वाले पर्याप्त प्रमाण दिए गए या नहीं, और अपराधी को सिद्धदोष पाया गया या नहीं। हमारा विधानांग जनता को न्याय दिलाने के लिए नहीं, अन्‍यायियों को संरक्षण देने के लिए बनाया गया है। न्याय में विलंब के लिए बनाया गया है जिसमें न्‍याय आता भी है तो वह कार्यान्वित नहीं हो पाता।’

‘000
‘इसलिए राष्‍ट्रद्रोह की मेरी कसौटी है कोई काम राष्‍ट्र के हित में है या अहित में। अहित में है तो वह सोच विचार कर किया गया है या किसी चूक से हाे गया है। यदि सोच विचार कर राष्‍ट्र के अनिष्‍ट का काम किया गया है तो वह राष्‍ट्रद्रोह है। यदि किसी जनकल्‍याणकारी याेजना को जिस पर भारी धनराशि खर्च की जा चुकी है कोई राजनीतिक कारणों से रोक देता है तो भले वह सत्‍ता में हो उसका यह कार्य राष्‍ट्रद्रोह है। यदि कोई ऐसी संस्‍था को चलने नहीं देता जो देशहित के काम करती है तो वह राष्‍ट्रद्रोह है। यदि कोई किसी भी तरह का उपद्रव करता या कराता है जिससे देश के धन, जन और संसाधनों की हानि होती है तो वह देश द्रोह है।’

वह हंसने लगा, ‘तब तो कोई ऐसा व्‍यक्ति ही न बचेगा जो राष्‍ट्रद्रोही न हो।’

‘तभी तो कहा था, जिधर देखता हूं उधर तू ही तू है। देश को आत्‍मद्रोही बनाने की योजना पर ही तो तुम इतने लंबे समय से अपनी यूनियनबाजी के माध्‍यम से काम करते रहे हो ओर आज भी अपने हित के लिए संगठित होने के अधिकार और संगठित हो कर उपद्रव करने की छूट में फर्क नहीं कर पाते। अदालत को कोई कानून न मिलेगा जो यह फर्क बता सके पर लोगों को यह फर्क पता होता है और वे तुम्‍हारे ऐसे कारनामों को भी देश और समाज के लिलए अनिष्‍टकर पाते हैं अत: राष्‍ट्रद्रोह मानते हैं।”

Post – 2016-04-25

जिधर देखते हैं उधर तू ही तू है

‘क्या तुम अनुप्रास प्रेम के कारण कमीनेपन को कमाल की ऊंचाइयों तक पहुंचाने की बात कर रहे थे या इसमें कोई सोच और सूझ भी थी.’

‘यदि इसका भाष्य करना पड़े तो मैं समझूंगा मैं एक ऐसे समाज से रू-ब-रू हूँ जो अपनी चेतना और संवेदना खो चुका है और पैना लगाने पर ही चेतता है और जल्दी जल्दी आगे बढ़ता है और फिर थथमथा जाता है जैसे पैने की आदत पड़ गई हो.’

उसके चहरे की भंगिमा से लगा उसकी समझ में बात नहीं आयी.

मैंने पूछ, ‘पैना का मतलब जानते हो?’

बोला, ‘जानता हूँ, जानूंगा क्यों नहीं : नुकीला, तेज़, धारदार.’

मैंने कहा, ‘ ये तो विशेषण हुए. मैं संज्ञा की बात कर रहा था. अंग्रेजी में जिसे गोड कहते हैं वह । इसके कई रूप होते हैं. जिसको स्त्रीलिंग में पशुसाधनी (सटाकी) कह सकते हो और पुल्लिंग में अंकुश, प्रतोद, अष्ट्रा आदि. हाथी, घोड़े, और बैल के लिए उसके नाम और बनावट और उपादान में अंतर होता है।

ये सारे उपकरण, घोड़े के लिए कशा भी वैदिक काल से चले आ रहे हैं। पशु सम्पदा के मामले में भी बहुत समृद्ध था वैदिक समाज. यह गाय चराने वाला जत्था नहीं था। भेड़, बकरी,, गाय-बैल, ऊंट, गधा, घोडा, भैंस और हाथी तक पालने और उपयोग में लाने वाले समाज को कमीनों ने अपने को अधिक सभ्य सिद्ध करने के लिए असभ्य , बर्बर और दरिन्दा सिद्ध करने की ठान ली थी और इसी इतिहास से तुम्हारी अतीत और वर्तमान की समझ पैदा हुई थी इसलिए इसमें अनुप्रास दिखाई दिया, यथार्थ नहीं, जिसके उदाहरण जिधर भी निगाह डालो मिल जाते हैं। अपने इस झूठ को वे तब भी दुाहराते रहे जब मैंने जीवन के एक एक पक्ष को लेकर यह प्रमाणित कर दिया वैदिक समाज अपने समय की अन्य सभी सभ्यताओं से अधिक विकसित और प्रबुद्ध था और इसमें, वर्गभेद, वर्णभेद, पितृ प्रधानता आ चुकी थी. पर सत्ता के साधनों और संस्थाओं पर अखण्ड अधिकार के बल पर उजागर हो चुके सच को दबाने और झूठ को इतिहास का सत्य बनाने पर लगातार जुटे रहे और आज भी किसी न किसी बहाने इसे दुबारा चर्चा में लाने की कोशिश करते हैं। तुमने भी सुना होगा वैदिक समाज की तुलना आइएस करने वाले को । अपने इसी कमाल के बल पर वह आज भी तुम्हारे सिर चढ़़ कर बोलने लगता है। ऐसे लोगों के लिए राही मासूम रज़ा के आधा गांव की भाषा में जो सही शब्द बनाता है उसके उच्चारण के साथ मेरी ज़बान ऐंठ जायेगी. इसलिए घुमा कर कहना पड़ा, कमीनेपन को कमाल की ऊंचाइयों तक पहुंचाने का सच.’

‘कमाल की आत्मविचलन है यार, बात वर्तमाम की हो रही थी और तुम पांच हज़ार साल गहरा गोता लगाकर उसे समझने और उसकी आड़ में अपने को सही साबित करने की कोशिश में जुट गए।‘

’मैंने इतिहास को ध्यान में रख कर नहीं कहा था यह वाक्य । इतिहास की ओर तो तुम्हारी नासमझी के कारण जाना पड़ा और उस इतिहास से वह पैने वाली बात तो धरी ही रह गई। ऋग्वेद में पैने को अष्ट्रा् कहा गया है। यह बांस या लकड़ी का चिकना सा डंडा होता है जो बैलगाड़ी हांकने वाले के हाथ में होता है और बैल जब सुस्त् पड़ जाते हैं या आगे बढ़ने से कतराने लगते हैं तब इसका इस्तेमाल उसे करना पड़ता है, पर यह न बताउूंगा कि कहां, नहीं तो बुरा मान जाओगे। उसी प्रसंग में यह याद आ गया कि कितने हजार साल से यह काम में आ रहा है और फिर क्षोभ में उस सन्दर्भ में जारी रखी जाने वाली कमीनगी का कमाल भी याद आ गया।

‘कल जब बात कर रहा था तो जल संकट के सन्दर्भ में याद आया दस पन्द्रह साल पुरानी नदियों को जोड़ने की वह योजना, जिसकी व्यावहारिकता पर वाजपेयी सरकार ने काम करना आरंभ किया था और उनको इसके आरंभ का श्रेय मिलता इसलिए उसके बाद इस पर काम ही बन्द कर दिया गया और वह धन जो देश के विकास पर लगना था विदेश भेजा जाने लगा।

‘बाजपेयी ने सड़क मार्ग से पूरे देश को जोड़ने और यातायात की सुविधा बढ़ाने की योजना पर तेजी से काम करना आरंभ किया था और इसके सपने में वह इतने गदगद हो गए थे कि कार्यकाल पूरा करने से पहले ही चुनाव करा बैठे और एक तकनीकी तिकड़म के चलते परदे के पीछे चले गए। उसके बाद उस योजना को रोक दिया गया। हजारों करोड़ का धन जो उस पर खर्च हो चुका था वह बेकार कर दिया गया क्योंकि उसका श्रेय भाजपा सरकार को मिलता।

‘आज भी आए दिन यही किया जा रहा है कि हमने नहीं किया और तुम्हें कुछ करने न देंगे और खुलेआम विघटनकारी तत्वों को शक्ति और साधन देकर खुराफात के लिए उकसाया जा रहा है। जाटों को उकसा कर जो उपद्रव कराया गया था उसे किसने इसे भड़काया था यह तो संचार माध्यमों को भी पता चल गया था परन्तु उसके पीछे कांग्रेस का हाथ था इसलिए उसकी एक बार चर्चा हो कर उससे सभी चैनेलों ने आख फेर ली थी। इसकी तुलना किसी छोटी से छोटी घटना से करो जिसकी आड़ में मोदी को घेरा जा सकता हो तो उसे कितने विस्तार से, कितने दिनों तक, कितने बहानों से,चर्चा के केन्द्रा में रखा जाता है, यह उदाहरण दे कर समझाने की चीज नहीं है। यह किसी एक कार्य या घटना से जुड़ी पीड़ा नहीं थी। यह एक राष्ट्रीरय व्यातधि का रूप ले चुका है। जिधर निगाह डालो नमूने मिल जाते हैं।‘

‘मेरी एक बात मानोगे। मान लो। तुम अपनी बेल्ट लाइन बता दो, कल मैं तुम्हाारे लिए एक निकर बनवा कर लाता हूं, अरे, अब तो निकर से काम चलेगा नहीं, दुनिया के सामने नंगे हो गए तो फुल पैंट की सूझी, चलो वही सही। यह मेरी तरफ से भेट रही परसों से तुम जो कमी रह गई है वह भी पूरी कर दो। शाखा में जाना शुरू कर दो।

‘सभी जानते हैं तुम्हा।रे पास हराम का बहुत सारा पैसा है जिसे तुम कहीं भी बहा सकते हो। लेकिन लोगों को तुम्‍हारी सिलाई पैंटों और फुलपैंटों की जरूरत नहीं पड़ रही है। तुम्‍हारी देशद्रोही गतिविधियों और देशद्रोहियों को शहीद बनाने की तुम्हा री कोशिशों से बिदक कर लाखों लोग तुमसे किनारा कसते जा रहे हैं और शाखा तक न भी पहुंचे पर उनकी सोच तक पहुंचने लगे हैं वर्ना संघ को अपने स्वयंसेवकों की संख्या में तेजी से हो रही बृद्धि डंके की बात चोट पर न बतानी पड़‍ती और तुम्हें चोर की मां की तरह छिप कर रोना न पड़ता।
अब तो अपने उजड़े घर में रोने वाला भी तू है और उनके भरे मजमे के बीच ढोल बजाने वाला भी तू है। सभी को साथ बुला रहे हो मिल कर रोने के लिए कि शायद उस स्‍यापे पर ही जनता पिघल जाय। यह क्‍या अकेले उनके करने के वश का काम था। अपना काम छोड़ कर उनका ही काम तुम अरसे से करते आ रहे हो। तुम्‍हारा काम तो तमाम होना ही था।

Post – 2016-04-23

अंतहीन दुख

‘देखो, कल मैं तुम्हारी स्थिति देख कर चुप कर गया था, पर यह समझ लो कि रचनाकार के पास कोई ऐसा अधिकार नहीं होता जिससे दूसरों को वंचित रखा गया हो। हां, उसके पास एक चीज दूसरों से अधिक होती है। यह है कर्तव्य की चेतना, उत्तरदायित्व का बोझ! इसके निर्वाह की क्षमता से ही यह सिद्ध होता है कि उसकी हैसियत क्या है। इसे उलट कर भी कह सकते हैं, ज्यों-ज्यों सर्जक की हैसियत उूंची होती जाती है उसका दायित्व-बोध बढ़ता जाता है और इसके चलते वह स्वयं अपने अधिकारों का भी अधिक संयम से प्रयोग करता है मानो उसके पास अधिकार हों ही नहीं, कर्तव्‍य ही कर्तव्‍य हो। यही उसे सत्ता के लिए संघर्ष करने या सत्ता से जुड़ने वालों की, अपने ‘अधिकारों’ के विस्तार की विक्षिप्तता में अपने दायित्व को भूल चुके लोगों की तुलना में अधिक बड़ा बनाता है और इसी के कारण वह राजनीति से आगे मशाल लेकर चलने वाला पथप्रदर्शक होता है न कि उसके पीछे चलने वाली भिखारियों की टोली में से एक जो राजनीतिक पक्षधरता और राजनीति की गलाजत के चलते सांस्कृतिक अनाथों की स्थिति में पहुंच गया हे और इसके लिए जिम्मेजदार तुम हो। तुम्हें बताउूं कि अधिकारों की मांग भी भिखारियों का कशकोल लेकर चलने जैसा ही है, अन्यथा अधिकार मांगे नहीं जाते, न पिनक में जो सूझ गया उसे पाने के लिए हड़बोंग करने से पाए जाते हैं। उनकी रक्षा की जाती है और इसके लिए उन अवरोधों की सही पहचान जरूरी होती है और इसकी स्पष्ट मांग की जाती है और ऐसा संभव न होने पर ही इसे पाने के तरीकों की खोज करनी होती है।

‘तुम्हें तो वह नजारा याद भी न होगा, शायद देखा भी न हो, जब लोगों की नींद गली या सड़क से आने वाली ‘दे अल्ला के नाम तुझको मौला रक्खे’ की करुण ध्वननि से टूटती थी। संभव है तुमने देखा भी न हो, क्योंकि नेहरू ने देश का सिर उूंचा करने और दरिद्रता दूर करने के लिए भीख मांगने और देने काे अपराध बना दिया था और उसके बाद वह सांस्कृंतिक विरासत ही खत्म हो गई। मैंने उससे प्रभावकारी संगीत देखा ही नहीं जिसमें यह पता होता था कि यह खासी कमाई कर लेता है, इसके बाद भी लोगों का दिल पसीज जाता था, और वे उस कलात्मक आर्तध्वनि पर निछावर हो कर पैसा धेला उधर फेंक ही देते थे। यदि याद हो तो याद होगा कि यह एक युगलबन्दी हुआ करती थी। पता नहीं इसे युगलबन्दीे कहा जा सकता है या नहीं। वे दो का दल बना कर चलते। एक ठेलानुमा चौकी पर अपंग बन कर बैठा हुआ और आर्त स्वर में कहता, ‘दे अल्ला के नाम’ और दूसरा उसको ठेलता हुआ, लगभग थका हुआ, एक एक कदम अब-गिरा-कि-तब की अदायगी से बढ़ाता हुआ, थके ही नहीं मरे सुर में टेक लगाता हुआ, ‘तुझको मौला रक्खे। पर आवाज इतनी साफ कि बहरे को भी सुनाई दे जाय। ‘ लोग जानते हुए कि यह नाटक है, उसे देखने से बचने के लिए कुछ दे बैठते थे। मैंने इससे प्रभावशाली स्ट्रीट ड्रामा आज तक नहीं देखा, और नुक्कड़ नाटकों के अभिनेता उनके पांवों की धूल बराबर भी नहीं लगे।

‘मैं तुम्हारा ध्यान दो चीजों की ओर दिलाना चाहूँगा। मध्यकाल ने सामान्य जनों को अपनी लूट खसोट से यतीमों की जमात में तो बदल दिया परन्तु उसने यतीमी को उस कलात्मक उूंचाई पर भी पहुंचा दिया जिसमें लोगों का दिन कलादर्शन से आरंभ होता था और आंसू पोंछते समाप्त होता था। आज इस मुहावरे को कुछ बदल दिया गया है, दे अल्ला के नाम को बदल कर दे कल्‍ला के नाम कर दिया गया है और तुझको मौला रखे की जगह तुझको माल्या रखे, पर माल्या‍ को उसके प्रतीक में ग्रहण करो, पुरुष रूप् में नहीं। उस तरह जैसे एक जमाने में टाटा बिड़ला का अर्थ पूंजीवाद हुआ करता था जो आज अडानी और अंबानी हो गया है, मैं इसमें घालमेल तन्‍त्र को स्‍थान देते हुए माल्या को केन्द्रं में रखना चाहता हूं।‘

अब तक वह बिना किसी प्रतिवाद के सुनता रहा और सहसा प्रश्न कर बैठा, ‘कल रात नींद अच्छी तरह आई थी।’

इतने सारगर्भित भाषण के बाद उसके इस प्रश्न ने नीचे की जमीन ही खिसका दी।

इस उद्रेक बिन्दु पर जिसमें मैं स्वयं भी तर-ब-तर था इस प्रश्न की तुक न थी! मैंने हैरानी से देखा तो बोला, ‘कल जहां खत्म किया था आज वहीं से शुरू हो गए। रात में सपने भी इसी के देखते रहे होगे। कोई दूसरा विषय नहीं सूझता तुमको।‘

‘ऐसे हवालों से तुमको घबराहट होती है यह जानता तो था, पर सोचा ही नहीं। कल भी तुम रो पड़े थे, यह भूल गया था मुझे। पर मैं मजा लेने के लिए बात नहीं करता, बदमजगी पैदा न हो इसका ध्यान अवश्य रखता हूं। कल तुम्हें आंसू किस बात पर आ गए थे, बताओगे?‘

‘जब तुमने किसानों के महत्व की बात की तो मुझे सहसा आत्महत्या करने वाले किसानों की याद हो आई। फिर आज के सूखे की ओर ध्यान गया । फिर अपनी प्यास बुझाने के लिए बूंद बूंद पानी के लिए तरसते लोगों की कतार याद आई और अपने को उनकी स्थिति में रखने की कोशिश की तो लगा आंखों के आगे अंधेरा छा गया है। कुछ समय लगा यह समझने में कि आंखे डबडबा आई हैं इसलिए ऐसा लग रहा है फिर आंखें पोंछने लगा।‘

विचार भी भौतिक यथार्थ को बदल सकते हैं, अन्यथा उसके इस कथन के साथ मुझे गले में कुछ अटकता सा न लगता और फिर हृदय में वह हूक न अनुभव होती कि सांस लेना भारी पड़ जाता। इसके बाद न उसका साहस मुझे देखने का हो रहा था न मेरा उसे जैसे किसी न किसी रूप में हम भी इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं। मौसम वसन्त का है, वृक्ष किशलयों से लदे चमक रहे थे पर उधर दृष्टि गई तो उन पर एक काली पर्त सी जमी दिखाई दी। आंखें शून्‍य में जा टिकी थीं। स्थिति असह्य हो गई तो मैंने कहा, ‘चलो एक चक्कर लगा लें।‘

वह बिना बोले ही उठ खड़ा हुआ। अपने सामान्य व्यवहार के विपरीत हम साथ चलते हुए भी चुपचाप चलते रहे और लौट कर बैठे तो भी कुछ समय तक अबोला रहा। फिर एक कराह की तरह मेरे मुंह से निकला, ‘हमने कमीनेपन को कमाल की उूंचाई पर पहुंचा दिया है।‘
उसे खटका तो, पर न आगे उसने कोई सवाल किया न मेरा कुछ कहने को जी हुआ।

Post – 2016-04-22

लेखक भी आदमी होता है

‘जानते हो आज मैंने एक बहुत बड़ी खोज की। लेखक भी आदमी होता है।‘ मैंने उसे छेड़ने के लिए कहा।

आश्चर्य का अभिनय करते हुए उसने कहा, ‘इतनी ऐतिहासिक खोज तुमने कैसे कर डाली यार। मैं तो सोचता था इतनी उूंची खोज करने में तुम्हारी पूरी जिन्दगी लग जाएगी और तुम्हारे विरुद में तुम्हारे समाधि लेख पर यह पंक्ति लिखी होगी और उसके उूपर मोटे अक्षरो में लिखा होगा लाइफ एचीवमेंट ऑफ भगवान सिंह ! नथिंग मोर, नथिंग लेस। यार अंग्रेजी में एपिटाफ का रोब कुछ अधिक पड़ता है। मैं ध्यान रखूंगा लिखवाना तो मुझे ही पड़ेगा।’‘

वह हंसा तो उसके अट्टहास में, लाज बचाने के लिए, मैं भी शामिल हो गया!

हंसी थमी तो वह बोला, ‘मैं तो जमाने से कहता आ रहा हूं कि तुम कोई बात सलीके से रख ही नहीं सकते! यदि मुझे कहना होता तो कहता, ‘लेखक दूसरे आदमियों से कुछ अधिक आदमी होता है और आदमीयत की यह अधिकता ही उसके भीतर दबाव डालती है तो उसकी अभिव्यक्ति कला का रूप ले लेती है और वह कलाकार बन जाता है।‘

बात यह भी पते की थी, दाद देने की लाचारी थी, बोला ‘साल में एक बार तुम भी इतनी पते की बात कह जाते हो कि मैं चकित रह जाता हूं कि पत्थर में यह फूल कैसे खिल उठा! खैर उससे अगली खोज यह कि छोटा लेखक अपने को समाज से बड़ा समझता है और बड़ा लेखक अपने को समाज से छोटा समझता है।‘

‘’यह उतनी मूर्खतापूर्ण् बात तो न हुई फिर भी इसका रहस्य क्या है?’

’गलती हमारे पुरखों की है। उन्हों ने कहा तो कुछ सोच कर ही होगा, क्योंकि कवि का उनका अर्थ था तत्वदर्शी, लेकिन अपने जीवन की पहली तुकबन्दी करते ही, यदि संस्कृत का ज्ञान न हुआ तो भी, पहला आभास जो किसी तुक्कड़ को होता है वह यह कि तुक का बैठ जाना कविता है और तुक बैठाने वाला कवि और फिर तो उसके कानों में ‘कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू’ का संगीत गूंजने लगता है।

‘तुम्हें एक मजेदार आपबीती सुनाउूं।‘

वह उत्सुकता में मेरी ओर मुड़ गया।

’मैं दूसरी कक्षा में पहुँचा तो या उससे पहले ही एक तुकबन्दीु कर बैठा। अब तो इतना ही याद है कि दूसरी कक्षा में मुझे दो साल लगाने पड़े थे और उसका कुछ संबंध इस तुकबंदी से है। इसकी पहली पंक्ति रामनेति नामक एक प्रतिभाशाली छात्र की थी। वह उस समय मिडल स्‍कल की सातवीं कक्षा का छात्र था। बड़े भाई साहब ने उसकी तारीफ यह बताते हुए की कि इसकी तारीफ उसके हेडमास्टर रामसुरंजन सिंह ने स्वयं की थी। पंक्ति थी ‘अर्जुन के हाथ में था धनुष बाण किसी दिन’ आगे की पंक्तियां क्या थीं यह याद नहीं। अपनी तुकबन्दी में आगे की पंक्तियां मैने चुुपके से जोड़ीं,
‘मारा था भीष्म बीर काे दस बाण किसी दिन।
अर्जुन का प्यारा लड़का अभिमन्यु किसी दिन।
रण में मरा था बालक वह बीर किसी दिन।

और जब मैंने इसे झिझकते हुए लोगों को सुनाया तो बात फैल गई और मैं चुपके चुपके इस बात का कायल हो गया कि परमात्मा ने मुझे कवि बनाया है। यह विश्वास पक्का तब हुआ जब उसी साल स्कूल जाते समय रास्ते में पड़ने वाले एक बरसाती नाले में मैं फिसल कर गिर गया और सराबोर हो कर वापस लौट आया, पर किसी से यह कहने का साहस नहीं कि मेरे साथ क्या दुर्घटना घटी है। विमाता से सहानुभूति की आशा न थी, और बाबा से कहने का साहस इसलिए नहीं कि उस दिन बहन के यहॉं बहुरावत भेजने के लिए मिठाइयां बन रही थीं जिसके लिए दो हलवाई नियुक्त थे। संकोच यह कि कहीं बाबा यह न समझ लें कि मैं मिठाई के लोभ में अपने को जान बूझ कर भिगो कर लौट आया हूँ। बात आत्मसम्मांन की थी इसलिए दासे पर एक कोने में चुपचाप बैठा प्रतीक्षा करता रहा कि कपड़ा सूख जाय और बरसाती हवा का कमाल कि मै बीमार पड़ा तो महीनों के लिए। यदि यह मियादी बुखार था तो कई मियादी बुखारों के बराबर, पर दवा के नाम पर तुलसी का काढ़ा, नीम की ढेंपी का काढ़ा। वैद्यनाथ की जूड़ी ताप शीशियां। विस्तर से उठ नहीं पाता था। बुखार उतरा तब तक शरीर अस्थिशेष रह गया था, पेट बाहर को फूल आया था, बाल झड़ गए थे और रात में आंखों से कुछ दीखता नहीं था।‘

’यह पवांरा ले कर क्यों बैठ गए तुम?’

‘यह बताने के लिए कि जब सभी लोग इस बात से निराश हो चुके थे कि मैं बचूंगा भी या नहीं, मैं बिस्तहर पर लेटा सोचता, ‘मैं मर नहीं सकता। यदि मारना ही होता तो परमात्मां ने मुझे कवि न बनाया होता।‘

‘वह तो ठीक है, पर इसकी यहां क्योंं जरूरत पड़ गई?’

‘यह बताने के लिए कि जब कोई साहित्यकार, पत्रकार, चित्रकार, यह याद दिलाता है कि वह दूसरे लोगों से उूपर है, उसकी जान अधिक कीमती है, दूसरे सभी यातना भोगते रहे, उसके सुख सुविधा का ध्यान रखा जाना चाहिए, तो मुझे लगता है बौद्धिक के रूप में वह बालिश रह गया है। उसकी मानवीय संवेदना समाप्‍त हो गई है। वह केवल अपने बारे में सोचता है, समाज के बारे में नहीं। ऐसे रचनाकार अपनों के अपने हैं, किसी और के अपने नहीं। वे यह तक नहीं जानते कि कविता के बिना भी समाज जीवित रह सकता है पर अनाज के बिना नहीं और उनकी महिमा उस अगण्य के से आती है जो खुद तो धूप और शीत की मार खाता है और दुनिया को रोटी खिलाता है।‘ मुझे अपनी रौ में यह ध्यान ही न रहा कि वह अपनी आंखें पोंछ रहा है।

Post – 2016-04-22

खाद की खेती करने वाले

तुम्हें सारे ठीकरे कम्युनिस्टों के सिर ही फोड़ने होते हैं।’

‘तुम अपने सिर की हिफाजत के लिए ठीकरे फोड़ने का नाम ले रहे हो, मेरा वश चले तो पत्थर फोड़ू और वो भी इतने बड़े जो मुझसे उठ न पाएंगे। कम्बख्‍तों ने देश और समाज का सत्यानाश करके रख दिया। कम्यु़निस्ट कहने से कोई कम्युनिस्ट हो जाता है। दुनिया में कहीं कम्युानिज्म स्थापित नहीं हुआ और यह जानते हुए जो ढकोसलेबाज अपने को कम्युनिसट कहते हैं वे गेरुआ पहन कर अपने को योगी, साधु, साध्वी , सन्यासी, संत कहने वाले कुकर्मियों से किस माने में अच्छे हैं? न रामनामी पहनने से कोई रामभक्त हो जाता है न मार्क्सनामी ओढ़ने से मार्क्सवादी। नाम नहीं, आचरण और गुण ही यह सिद्ध करते हैं कि कोई क्या‍ है। तुम्हे कितने प्रमाण चाहिए यह स्वीकार करने के लिए कि भारत में कम्युनिस्ट का मतलब मुस्लिम लीग की आत्मा, मानवतावादी मुखौटा और असंभव को संभव मानने और उस पर अपार राष्ट्रीय संसाधनों को बर्वाद करने वाला देशद्रोह होता है?‘

उसने जोरदार ठहाका लगाया, ‘फिर से कहना! फिर से कहना तो! अरे भई, इतने लंबे साथ के बाद भी मैं तो यह समझ ही नहीं पाया था कि तुम इतने प्रबल मूर्ख हो। अपने को मार्क्सवादी कहते हो, अब समझ में आया, दावे में कुछ नहीं रखा है। मार्क्सवाद एक दर्शन है, उसमें नादानों को घुसने की इजाजत नहीं है। नादानों का स्वाागत उनके यहां होता है जो सांस्कृ्तिक राष्ट्रवाद के जनक हैं और जो अबोध वय में ही बच्चों को झूठे बहानों से अपनी वाहिनी में भर्ती करके उनके दिमाग की धुलाई करने लगते हैं और सांस्कृतिक विस्फोटको में बदल देते हैं।‘

‘दुख होता है, यह सोच कर कि तुम जिन शब्दोंं का इस्तेमाल करते हो, उनको ईंट पत्थर मान कर किसी न किसी पर फेंकने का काम ही लेते हो। उनकी बनावट और आशय समझने की चिन्ता नहीं करते। तुमने ठीक कहा कि संघ में अबोध अवस्था में ही बच्चों को भरती करने की सूझ किसी तत्वदर्शी के मन में पैदा हुई थी। परन्तु वह उन्हें आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षित करना चाहता था जैसे आज कल सामाजिक अभद्रता के शिकार लड़कों और विशेषत- लड़कियों को आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षित किया जाने लगा है। वह उनमें सहभागिता और आत्मविश्वास पैदा करना चाहता था। जिनको तुमने स्वयं अबोध कहा, जिनके मस्तिष्क में कुछ है ही नहीं, उनकी धुलाई की जरूरत क्यों पड़ेगी? ब्रेनवाशिंग की जरूरत वहां पड़ती है जहां किसी विचार या उसके किसी इतर आकर्षक पक्ष से आकर्षित हो कर सुपठित लोग किसी संस्था में जाते हैं, उन्हें नया धर्म, विचारधारा, विश्वासधारा और यहां तक कि विनाशधारा कहो तो मुझे आपत्ति न होगी, क्योंंकि, अन्ततोगत्वा वे होती विनाशधाराएं ही हैं, जो सांस्कृरतिक आत्महत्या के लिए प्रोत्साहित और विवश करती हैं। दिमागी धुलाई की इनकी शर्तों पर ध्याेन दो:
1. पहले से जो जानते थे उसे मिटा दो;
2. जो तुम्हारे विश्वासबन्धु नहीं हैं उनको मिटा दो;
3. जो ज्ञान तुम्हारे विचारस्रोत से अनमेल हो उसे मिटा हो।
4. जिस ज्ञान से हमारी सिखाई बातों के निष्प्रभाव होने का खतरा हो उन्हें पढ़ो ही नहीं और इतना गर्हित बना दो कि उनकी ओर मुड़ने से लोग कतरायें।

और जो मॉग नहीं की जाती है, न बताई जाती है, वह यह कि:
5. नादानो, जब इतनी चीजों को मिटा ही चुके हो तो तुम्हें जीने का क्या अधिकार है, अपनी हस्ती को भी मिटा दो तब तुम्हें मर्तबा मिलेगा। और जानते हो, जादू इस तरह काम करता है कि लोग मर्तबा पाने के लिए अपनी हस्ती तक को मिटाने को तैयार हो जाते हैं पर यह नहीं जानते कि वह मर्तबा है क्या जो उस दुर्लभ अवसर को हमसे छीन लेता है जो किसी रहस्यजमय संयोग से हमें जीने, आनन्द लेने, और यदि समाज में कुछ बुराइयॉ हैं तो उन्हें मिटाने या कम करने का अवसर देती है।

‘जानते हो अपने जीवन को नकारने, अपने को अपमानित करने, अपने से घृणा करने पर गर्व करने की प्रवृत्ति का जातीय नाम क्या है ?’

उसे तो इसकी उम्मीद ही न थी। मेरा प्रतिवाद करने के लिए जिस तैयारी के साथ आया था उसके असले बेकार जा रहे थे। बेचारगी में बोला, ‘तुम्हीं बताओ।‘

‘सामी मत। और जैसा कि मैंने कहा था, सामी मतों का मूल भी, धर्मान्तरित करने वाले तन्त्र का जन्मस्थान भी, भारत ही है। कोसंबी ने ठीक ही कहा था कि बौद्ध धर्म धर्मान्तारण कराने वाला पहला धर्म था, पर यह नहीं समझाया था कि बौद्धमत ने सबसे पहले धर्म के उस वैज्ञानिक अर्थ को संकुचित करते हुए अपने को सही सिद्ध करने या मान्य बनाने के लिए प्रयोग किया और सत्य की दुहाई देने वाले इस मत का आरंभ ही धूर्तता से हुआ। तुम जानते हो न कि बौद्ध मत में भी बुद्ध की उत्पत्ति से पहले का इतिहास उनके पूर्वजन्मों तक सीमित है, शेष इतिहास लुप्त‍ है। दूसरे विचार और विश्वास उस सीमा तक ही इतिहास में जगह पाते हैं जिनसे बौद्धमत की श्रेष्ठता प्रमाणित हो। बौद्धमत और उसका अनुकरण करने वाले सामी मतों में अन्तर केवल यह है कि बौद्धमत में विचार के लिए जगह है, सामी मतों में इसके लिए जगह नहीं है। वे सभी अन्तिम सत्य पर पहुँचे हुए विश्वास है जिनमें तर्क, विमर्श या आत्मनिरीक्षण से परहेज किया जाता है। भारतीय कम्युनिज्म एक मजहब है, उसमें ये सभी लक्षण पाए जाते हैं। मार्क्सवाद एक दर्शन है, दर्शन होने के कारण ही उसमें भी विचार के लिए स्थान है, जब कि कम्युनिज्म सबसे नया सामी मत है और उसका अन्य सामी मतों से जो भी विरोध हो उसके सबसे बड़े शत्रु गैरसामी मत ही हैं और इसी तर्क से भारतीय कम्‍युनिज्म एक मजहब है समीक्षा से परे है। इसके सपनों से आकर्षित हो कर लोग इसके पास आते हैं और एक बार फंस जाने के बाद न उनके अपने सपने रह जाते है न ही अपने मंसूबे। सभी बलिपशु की तरह काम करते हैं और बलिपशु बनने के गौरव पर मंत्रमुग्ध रहते हैं।‘

वह कुछ नर्वस हो रहा था। नर्वसनेस की उस अवस्थ में पहुंचा लग रहा था जहां बेहोश होने की नौबत आ जाती है। मैंने उसकी सहायता के लिए उससे शिकायत की, ‘हम तो लेखकीय आचार संहिता पर बात करना चाहते थे। तुमने अंधी गली में उतार दिया। आज का दिन तो व्‍यर्थ गया ही।‘

व्यर्थ कुछ नहीं जाता मेरे दोस्त। सड़ी चीजें भी खाद बन कर फूलों के रूप में खिलती है। सड़े विचार भी अपनी सड़ांध से बचने के लिए नई चिन्ताधाराओं और विचारधाराओं को जन्मे देते है।जैसे तुम्हारी सड़ी गली मान्‍यताओं की खाद से कम्‍युृनिज्‍म ने जन्‍म लिया।‘

‘और उसने तुम्‍हें आदमी से खाद में बदल दिया।”’