Post – 2016-10-31

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्‍टर – 23

‘कल तुम कुछ आवेश में थे । अच्‍छा ही रहा, यह तो पता चल गया कि तुम साम्‍यवाद से नफरत करते हो।”

”साम्‍यवाद से नहीं, वह तो मानवता की सर्वोच्‍च आकांक्षा है। मैं उस हड़बड़ी की आलोचना करता हूंं जिसमें सामंती व्‍यवस्‍था और मध्‍यकालीन सोच वाले समाज में जहां पूजीवाद आना था, वहांं साम्‍यवाद लाद दिया गया और उसे ताकत के बल पर जिन्‍दा रखा गया, क्‍योंकि यह स्‍वाभाविक विकास न था। उसी की वह परिणति या वे परिणतियां हो सकती थीं जिन्‍हें हम अपने को साम्‍यवादी कहने वाले देशों और संगठनों में पाते हैं। मैं भारतीय मार्क्‍सवादियों की समझ पर भी तरस खाता हूं कि वे आज तक इस चूक को नहीं समझ पाए और भक्तिभाव से पुराने नारे दुहराते हुए क्रान्ति के सपने देखते रहे। क्रान्ति एक स्‍वाभाविक प्रक्रिया है, गृहयुद्ध नहीं,जिसमें बहुतों की हत्‍या करके बाकी लोगों को जिन्‍दा आैर सुखी रखने का रास्‍ता निकाला जाता है। इस मामले में मार्क्‍स और ऐंगेल्‍स को भी मैं सही नहीं मानता। कम्‍युनिस्‍ट मैनिफेस्‍टो में भी यह जल्‍दबाजी देखी जा सकती है।”

”यार इतना बड़ा विद्वान तो मैंने देखा ही न था जो मार्क्‍स को भी गलत सिद्ध करदे, ऐंगेल्‍स को भी, सारे मार्क्‍सवादी चिन्‍तकों को चुटकी में धूल चटा दे। मेरी किस्‍मत है कि तुम मुझे मिल गए।”

”किस्मत तो है पर मूर्ख भाग्‍य के अवसरों को भी बर्वाद कर देते हैं । उनका लाभ नहीं उठा पाते। मैं कोई नई बात नहीं कह रहा हूं। साम्‍यवाद पूंजीवाद के बाद का चरण है। पूंजीवाद विश्‍वपूंजीवाद बन जाय तब उसका चरण पूरा होगा जैसे सामन्‍तवाद अलग अलग रूपों में ही सही व्‍यवस्‍था में रूप में नहीं तो मूल्‍यों के रूप में पूरी दुनिया में फैल चुका था।

”पूंजीवादी विकास के लिए बहुत बड़ा बाजार चाहिए। एक छोटे से देश को संपन्‍न बनाने के लिए उससे द‍सगुने बड़े बाजार की जरूरत हाेती है। विश्‍वव्‍यापी होने पर किसी के पास वह बाजार नहीं रह जाता। लेन देन ही बचा रह जाता है। बड़े पैमाने पर उत्‍पादन फेल कर जाता है। मकान बना कर बेचने की अन्‍धाधुन्‍ध होड़ में बिल्‍डरों ने इतने अधिक मकान बनाने के प्रोजेक्‍ट ले लिए कि जिसका पैसा आ चुका था उसे भी पूरा नहीं कर सके और जहां लगाया वहां भी काम पूरा नहीं और फालतू मकानों की संख्‍या इतनी हो गई कि कोई लेने वाला नहीं। परेशानी यह कि दाम गिराएं तो जिन्‍होंने पैसा पुराने रेट पर दिया है वे सर चढ़ जाएंगे। अन्‍धाधुन्‍ध गाडि़यों की खरीद ने सड़कों को इस तरह भर दिया कि सायकिल से चलने वाला मोटरगाड़ी से चलने वाले से आगे निकल जाता है। तुम अरब की गाड़ी खरीद लो, चलना तो उसे उसी सड़क पर है जो भर चुकी है और आगे इतनी भर जाएगी कि लोग हैसियत दिखाने के लिए गाडि़यां खरीदेंगे और पैदल चलेंगे। किसी भी चीज का अपनी हद से गुजरना ही अपनी दवा भी बनना होगा है। पूंजीवाद आए, अपनी हदें पार करे फिर स्‍वत: अपनी दवा बन जाय।

”जब बड़े पैमाने पर उत्‍पादन फेल करता है तब छोटी मशीनों और सीमित उत्‍पादनों और जोेे भी संसाधन बचे हैं उनके समझदारी से उपयोग की विवशता पैदा होती है जिससे कौशल का वह विस्‍तार होता है जिसमें आदमी कम श्रम से अपनी जरूरत की चीजें या कहो आपसी जरूरत की चीजें पैदा करके अदल बदल कर सकता है और इस तरह वे छोटी इकाइयां या कम्‍यून स्‍वत: बनने की स्थिति आती है जिससे कम्‍युनिज्‍म कह सकते हैं।

”ऐतिहासिक चरण वह होता है जिसके आने को रोका ही नहीं जा सकता, क्‍योंकि उससे पीछे की व्‍यवस्‍था फेल कर चुकी रहती है। यही बात मैं मोदी के उदाहरण से समझाता हूं तो तुम्‍हारी समझ में नहीं आती। उस नि:सत्‍व व्‍यवस्‍था को कोई मारता नहीं, वह अपनी मौत मरती है। तुम मार्क्‍स और एंगेल्‍स को देवता बनाना चाहते हो, मैं मार्क्‍स को जान सकता हूंं और उन्‍होंने जो देखा समझा था उससे बाद के प्रयोगों और विफलताओं को जानता हूं इसलिए मैं उनकी कमियां निकाल सकता हूं। पर तुम मेरे समझाने के बाद भी उन कमियों को समझ नहीं सकते क्‍योंकि मार्क्‍सवाद तुम्‍हारे लिए मजहब है और मेरे लिए दर्शन। जानना चाहोगे कि मुझमें तुममें अन्‍तर क्‍या है ?”

”बताओ, वह भी जान लूंगा।”

”जिन बातों को मैं कह रहा हूं उनमें से सभी नहीं तो अधिकांश बातें तुम भी कई बार लक्ष्‍य करते होगे, लेकिन तुम डरते हो कि इतने बड़े दार्शनिकों और अधिकारी विद्वानों ने जो नहीं माना उसे कहूं तो लोग मुझे मूर्ख समझेंगे, इसलिए जिस कमी को लक्ष्‍य करते हो उसे कहने का साहस नहीं जुटा पाते। मैं मूर्ख कहे जाने का खतरा उठा कर अपनी बात कहता हूं। यह साहस ही मुझे चिन्‍तक बनाता है और इसी की कमी तुम्‍हें भक्‍त बनाए रखती है इसलिए मैं समझाऊं तो भी तुममें वह साहस नहीं पैदा हो सकता जिससे सही बात को स्‍वीकार किया जाता है। यह ऐसी चीज है जो बाहर से लादी नहीं जाती, भीतर से पैदा होती है और जिनमें होती है उनका स्‍वभाव बन जाती है।

”समाजवाद की कल्‍पना बहुत पुरानी है। जिस चरण पर यह था, उसे सतयुग के रूप में याद किया जाता है। इसमें गिरावट आर्थिक कारणो से आई और जानते हो यह व्‍याख्‍या कहां आई है ? पुराणों में जिनका तुम उपहास करते हो। कुछ लोगों ने आगे बढ़ कर पहल की और निजी संपत्ति का आरंभ हुआ, यह अन्‍तर सभ्‍यता के साथ बढ़ता गया क्‍योंकि पहल की क्षमता के साथ संपत्ति का अन्‍तर बढ़ता गया इससे यह भ्रम हो सकता है कि सभ्‍यता के लिए विषमता जरूरी है जब कि विषमता समाप्‍त होने पर ही हम सही अर्थ में सभ्‍य हो सकते हैं। विषम समाज शक्‍ल में एक जैसे मनुष्‍यों, परन्‍तु वास्‍तव में दो तरह के जानवरों का समाज होता है – एक हिंस्र, दूसरा हिंसा का शिकार। जंगल का चरित्र बदल जाता है, जंगल का कानून काम करता है। इसके छोटे पैमाने से ले कर बड़े पैमान तक, खटपट से ले कर महायुद्ध तक अनन्‍त रूप हो सकते हैं और तब तक बने रहेंगे जब तक यह विषमता बनी रहेगी, लिंग की, वर्ण की, धन की, रंग की ।”

”यही तो हम भी कहते हैं, फिर इसमें इतनी पैंतरेबाजी क्‍यों ?”

”क्‍योंकि तुम इसकी तैयारी के लिए समय नहीं देते, तैयारी का अवसर तक नहीं देते। तुम कहते हो औरत को पुरुष की बराबरी पर लाओ। मैं कहता हूं कोई किसी को बराबरी पर ला ही नहीं सकता, इसके लिए अपनी संभावनाओं में उसे प्रयत्‍न करना है जो बराबरी चाहता है।

”तुम पश्चिम की नकल करते हो, पश्चिम में स्‍त्री को अधिक छूट मिली है, पर बराबरी नहीं। वह छूट फ्यूडल ढांचा टूटने और पूंजीवादी दबाव बढ़ने के कारण मिला है जिसमें विश्‍वयुद्ध ने भी कुछ मदद की। विविध क्षेत्रों में काम करने वाले मर्द मोर्चे पर चले गए तो उन कामों को संभालने के लिए जनबल की आवश्‍यकता ने स्‍त्री को एक बड़ा अवसर दिया। तुम उसकी नकल करते हो हमें भी चांद चाहिए। मिलेगा पर अपनी समस्‍याओं के साथ जो पहले से अधिक खतरनाक होंगी।

”सामन्‍ती व्‍यवस्‍था में एक झटके में उतनी छूट नहीं मिल सकती। पूंजीवादी विकास की नेमतें तुम सामंती व्‍यवस्‍था में तलाशोगे तो खाप पंचायतों और इज्‍जत के लिए अपनों की ही हत्‍या जैसे समाचार भी मिलेंगे। पूंजीवाद केवल पूंजी तक सीमित नहीं रहता, वह एक व्‍यवस्‍था है और पहले की व्‍यवस्‍था को बदलता है। ठीक इसी तरह साम्‍यवाद पूंजीवादी व्‍यवस्‍था को तोड़ कर पूरी बराबरी की संभावना पैदा करेगा। तुमने देखा, इतने लंबे इतिहास में हाल में पहली बार दो आश्‍यर्चजनक बदलाव आए। पहली बार एक काला, राष्‍ट्रपति बना और दो कार्यकाल पूरे किए और पहली बार एक महिला राष्‍ट्रपति पद का उम्‍मीदवार बनी। बराबरी तो वहां भी नहीं रही है, उसकी सीमित संभावना पैदा हुई है।”

”तो तुम्‍हारा मानना है कि जब तक सामन्‍ती ढांचा समाप्‍त नहीं होता, पूंजीवाद नही आता, तब तक स्त्रियों को चारदीवारी में बन्‍द रहना चाहिए, दलितों के साथ अत्‍याचार होते रहना चाहिए ?”

”मैं कहता हूं कि अवसर की समानता के रास्‍ते में जो बाधाएं हैं उन्‍हें हटाया जाना चाहिए ताकि सभी अपना अधिकतम विकास कर सकें। इसकी गारंटी लोकतन्‍त्र ही दे देता है। परन्‍तु सामंती सोच इसमें भी प्रवेश कर जाती है क्‍योंकि अवरोध हटाए नहीं जाते। जब तक कीमती भाषा और मुफत की भाषा, दूसरों की या चन्‍द लोगों की भाषा और अपनी भाषा अर्थात सबकी भाषा का अन्‍तर शिक्षा, साहित्‍य, प्रशासन में रहेगा, बराबरी नहीं पाई जा सकती। ऊपर से कुछ वजीफे दिए जा सकते हैं जिनके साथ ईर्ष्‍या भी जुड़ी रहेगी और टकराव भी।

”जैसा ऊपर से लादे साम्‍यवाद के साथ हुआ, ऊपर से थोपी गई नारी स्‍वतन्‍त्रता और स्‍त्री पुरुष की समानता के मामले हुआ, इसमें शक्ति अधिक बर्वाद होगी, परिणाम अनुकूल न रहेंगे। प्रश्‍न अवरोधों को कम करने का है। बराबरी जैसी चीज नहीं होती, अपनी संभावनाओं तक पहुंचने के अवसर अवश्‍य होते हैं जो दिए नहीं जा रहे हैं।

”यह वर्णवाद के कारण है, पुरुषवादी सोच के कारण है, ऐसा तुम्‍हें नहीं लगता ?”

”लगता है, परन्‍तु इसे भी हथौड़े से या पुलिस के डंडे से खत्‍म नहीं किया जा सकता। अपनी संभावनाओं को जब व्‍यक्ति स्‍वयं हासिल करता है तो ये अवरोध अपने आप टूटते हैं। चुटकी बजाते यह नहीं होता। तुम चुटकी बजाते कर लेना चाहते हो और परिवर्तन की जगह उपद्रव का सामना करते हो। किसी के एहसान से मिला अवसर मनोबल को ऊंचा नहीं उठा पाता। भीतर कचोट बनी रहती है। इसलिए सर्वसुलभ भाषा मे शिक्षा सामाजिक बराबरी और आर्थिक उन्‍नयन की पहली शर्त है जिसके तुम विरोधी रहे हो फिर भी प्रगतिशील रहे हो और जिस संघ को तुम गाली देते हो उसने पहले भी इसे उठाया था आज भी उठा रहा है और वह तुम्‍हें देश के लिए अनिष्‍टकर लगता है। तुमने देखा, उसने घोषित किया है कि हमारी शाखाओं में मुसलमान भी आ सकते हैं। मात्र एक दो मुसलमानों के होने से ही अब यदि वे पहले अपने स्‍वयं सेवकों के मन में बौद्धिक के बहाने जहर भरते भी रहे हों तो नहीं भर सकते। इससे सन्‍देह दूर होगा। अपरिचय से भय पैदा होता है और भय से हिंसा की प्रवृत्ति।”

”‍फिर पहुंच गए तुम संघ पर। कमाल है, बात साम्‍यवाद से आरंभ करो तो भी तुम संघ पर पहुंचोगे जरूर।”

”इसलिए कि उसने अपने को नई परिस्थितियों के अनुसार समायोजित किया है। अपने को बदला है। वह फिटेस्‍ट नहीं है, पर तुमसे अधिक फिट है । वह अवसर की समानता की नींव डाल रहा है। अपनी भाषा के माध्‍यम से ही सारे काम काज के लिए अभियान चला रहा है और तुम समानता की बात करते हुए अंग्रेजी के हिमायती और स्‍वभाषा शिक्षा और अवसर के विरोधी रहे हो। उसकी करनी और कथनी में मुझे उससे कम दूरी दिखाई देती है जितनी तुम्‍हारे । और जाहिर है, इन्‍हीं कारणों से वह आगे बढ़ा है, तुम पीछे हटे हो और अपनी साख तक गंवाई है ।”

वह हंसने लगा, ‘संघ पर ही रुक गए । मोदी तो आया नहीं । तुम्‍हारा खाना कैसे हजम होगा।”

”हो सकता है इसमें मोदी की भी भूमिका हो । सबका साथ सबका विकास के इरादे का भी ।”

वह ताली बजाने लगा।

Post – 2016-10-30

”तुमने तुलसीदास की वह पंक्ति पढ़ी है, जिसमें मनुष्‍य के गुणगान को वह भाषा का अपमान मानते है, ‘कीन्‍हें मानुष जन गुणगाना, सिर धुनि गिरा लागि पछताना।’ मतलब जहां तक याद आता है कुछ ऐसा ही।
मैं समझ गया वह किस बात की भूमिका बना रहा है इसलिए पहले ही हमला बोल दिया ‘तुम किसी को पढ़ और समझ नहीं सकते । साहित्‍य की स्‍वायत्‍तता में तुम्‍हारा विश्‍वास ही नहीं, इसलिए तुम उसमें अपने हथियार तलाश सकते हो, उसका मर्म ग्रहण नहीं कर सकते।’
”हथियार ही सही । समस्‍त साहित्‍य किसी विकृति या अन्‍याय के विरुद्ध हथियार ही होता है । साहित्‍यकार, अच्‍छा साहित्‍यकार किसी व्‍यक्ति की प्रशंसा नहीं कर सकता। वह सत्‍ता में हो तब तो और भी नहीं। राजा की प्रशंसा वन्‍दीजन करते हैं या चारण। यह मामूली समझ तो तुम्‍हारे पास होगी।”
मैं साहित्‍य नहीं लिखता । अपने समय का इतिहास लिखता हूं। मेरी पुस्‍तक का नाम है ‘इतिहास का वर्तमान’ । इसे तुम ‘वर्तमान का इतिहास’ भी कह सकते हो , ‘हमारा वर्तमान और भविष्‍य’ भी कह सकते हो, क्‍योंकि इसमें वर्तमान में जो कुछ हो रहा है वही नहीं, जो हुआ था और जिसके कारण हो रहा है इसकी कोशिश भी है, जो हाेना चाहिए और उसमें उपस्थित होने वाली बाधाओं के बीच जितना कुछ हो पाएगा इसका अनुमान भी है। इतिहास वर्तमान के सन्‍दर्भ में ही अपनी सार्थकता रखता है । वर्तमान में किसी जाति या समाज के मनोबल को ध्‍वस्‍त करके अपने दबाव में रखने के लिए उसके इतिहास को नष्‍ट किया जाता है, और ‘रखने के लिए’ में यह भी निहित है कि उसके भविष्‍य को नियन्त्रित करने के लिए ऐसा किया जाता है। इसलिए अतीत, वर्तमान और भविष्‍य ये इतिहास में भी होते है। इतिहासकार के दायित्‍व की सबसे सटीक व्‍याख्‍या हमारे राष्‍ट्रकवि ने की है, हम कौन थे ? क्‍या हो गए हैं ? और क्‍या होंगे अभी? और इतिहास तुम जानते हो देवता का नहीं होता, मनुष्‍य का होता है, इतिहासकार मनुष्‍य से अलग जा कर इतिहास नहीं लिख सकता।”
”इसमें इतना और जोड़ लो कि इतिहास राजाओं का नहीं होता, राजाओं का गुणगान तो हो ही नहीं सकता ।”
”तुममें धैर्य होता तो समझ पाते कि मैंने इतिहास के निर्माता का ही पक्ष लिया । वह जीता नहीं है, एक रिक्‍तता को भरने के लिए इस खास मोड़ पर इतिहास ने उसका चयन किया है और आज तक उसका कोई विकल्‍प नहीं दिखाई देता। तुम उस खास चरण पर उसे असंवैधानिक और अलाेकतान्त्रिक और अनैतिक हथकंडे इस्‍तेमाल करके उसे आने से रोकते रहे। इतिहास ने तुम्‍हारी चीख पुकार को अनसुनी करते हुए उसके लिए रास्‍ता बनाया। तुम उन्‍हीं हथकंडों से एक ऐसे समय में उसको हटाना चाहते हो जब उसका कोई विकल्‍प नहीं है। इसका मतलब है तुम अराजकता पैदा करना चाहते हो या देश पर हजारों अरब का बोझ और अकूत मानव दिवसों की बर्वादी लादना चाहते हो क्‍योंकि यदि किसी योजना से इस सरकार को गिरा भी दिया जाय और दुबारा चुनाव कराया जाय तो भी इसी को चुन कर आना है; दूसरा विकल्‍प तैयार ही नहीं है अौर इस बार इसे आना भी अधिक बड़े बहुमत से है, यह तुम जानते हो।
”तुम जिस तन्‍त्र के हामी हो वह एक पतनोन्‍मुख तन्‍त्र है, उसे मामूली सी छूट दे कर खरीदा जा सकता है यह किसिंगर ने चीन के साथ एक सौदेबाजी में चुटकी बजा कर साबित कर दिया। पैसे की हवस भौतिकवादियाें को किस सीमा तक गिरा सकती है इसकी सबसे बीभत्‍स मिसाल तुम वहां देख सकते हो। मैंने किसी की वाल पर एक फोटो देखी थी जो हृदय को दहला देने वाली थी। विश्‍वास नहीं हुआ तो पता लगाना चाहा कि यह चित्र और इससे जुड़ी कहानी सच्‍ची है या नहीं तो और भी डरावने दृश्‍य सामने आये। जानते हो, लावारिश मानव शवो का मांस चीनी खाते भी है और उनका निर्यात भी करते हैं। उनके सैनिक मोर्चे पर मरें तो शायद उनके परिजनों को पता भी न चल सके कि वे मोर्चे पर मारे गए। जो देश इतना संवेदनशून्‍य और भौतिकवाद को भी पाशिविकता तक पहुंचा रहा हो उसकी अर्थव्‍यवस्‍था की तुम तारीफ करते हो। वह नरमांस भक्षण का अभ्‍यास ही नहीं कर रहा है, इसका निर्यात कर रहा है।
‘केवल हंगामा मचा कर तुमलोग समाज को जिस दिशा में ले जाना चाहते हो मैं उससे चिन्तित हूं। यह वही दिशा है। आज वह दुनिया का सबसे अमानवीय तन्‍त्र है जिसकी अर्थव्‍यवस्‍था को उदाहृत करते हुए एक राजनीति का समर्थक लेखक कह रहा था, चीन की अर्थव्‍यस्‍था जितनी सशक्‍त है उतनी उन्‍नति करके तो दिखाओ।
चीन की अर्थव्‍यवस्‍था अपने दम पर नही, अमेरिका के समर्थन पर टिकी है। वह उस पर इतना निर्भर हो चुका है कि अमेरिका जिस दिन भी चाहे वह उसे कंगाल बना सकता है। भारत का वह कुछ बिगाड़ नहीं सकता। जानते हो ओबामा ने ऐपल के प्रधान, जिसका नाम मैं अक्‍सर भूल जाता हूं, उससे अपनी देसी समस्‍या को देखते हुए अनुरोध किया था कि इसका उत्‍पादन वह चीन में न करके अमेरिका में करे। उसने मना कर दिया था क्‍योंकि चीन का श्रमिक सबसे अधिक सस्‍ता था। उतना सस्‍ता भारत का श्रमिक भी नहीं। अब दोनों देशों के श्रमिकों की तुलनात्‍मक स्थिति को समझ सकते हो। यह मोदी का काल नहीं है, इससे पहले भी हमारी अर्थव्‍यवस्‍था कम चमकीली और अधिक मजबूत थी। आज कुछ अधिक मजबूत है। चिदंबरम आलोचना करते समय कहते हैं, पहले से कुछ ही अच्‍छी हुई है, पर उतनी अच्‍छी नहीं जिसका आश्‍वासन दिया गया था।
”जो सबसे बुरा पक्ष है उसमें भी यह पहले से अच्‍छा है और बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें अपूर्व और चीन और अमेरिका में अर्थशास्‍त्री तक इसे अनुकरणीय मानते है परन्‍तु यह तुम्‍हें दिखाई नहीं देता।
”मैंने उसकी वकालत करना इसलिए स्‍वीकार किया कि वह राजा नहीं जनता का सर्वोच्‍च प्रतिनिधि है। वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुन कर आया है और उसे काम करने की छूट दी जानी चाहिए जब कि पुराने ऐसे शासकों की सेवा में जुटे और उनके द्वारा उपकृत या ऐसी विचारधाराओं से जुड़े जिनकी असलियत चीन बयान करता है, लोग हैं जो उसे काम करने ही नहीं देखा चाहते कि सफल हो गया तो उसका भविष्‍य में आने का रास्‍ता बन्‍ द हो जाएगा। ईश्‍वर ने उस खास मौके पर उनकी सुनने की ताकत कम कर दी और बोलने की ताकत कई गुना कर दी, समझने की ताकत की कीमत पर। मुझे तुमसे सहानुभूति है।”

Post – 2016-10-30

जो लफ्ज ‘मुहब्‍बत’ था, एक हर्फ में सिमटा है
‘तू’ है तो मुहब्‍बत है, ‘तू’ है तो जमाना है ।
मैं तनहा बहुत खुश था, मैं तनहा बहुत कुछ था
खुद को तलाशता हूं जबसे तुझे जाना है ।
मरता था कभी तुझ पर देखो अभी जिन्‍दा हूं
मरने का तमाशा भी जीने का बहाना है ।
तुमको न समझ पाया हैरान नहीं इस पर
खुद अपने को देखो तो कुछ देर से जाना है ।

Post – 2016-10-29

हम तुम्‍हें देख न पाएंगे मगर देखेंगे
ऐ मेरे ख्‍वाब तुम्‍हें आंख भर कर देखेंगे
तुम तो आगत हो मेरे
तुम हो विश्‍वास मगर
तुमको जब हम न रहेंगे तो लोग देखेंगे।

Post – 2016-10-29

जिन्‍दगी नाम है दुश्‍वारियों का सदमों का
सुकून चाहिए मरने का इन्‍तजाम करो ।
बहुत मुश्किल नहीं, आसान नहीं है फिर भी
किसी के सिर मढ़ो इल्‍जाम राम राम करो।

Post – 2016-10-29

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्‍टर – 21

कई बार कई कारणों से सन्‍देह पैदा होता है कि क्‍या मोदी का सबका साथ सबका विकास मात्र एक नारा है, जिसका उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए किया जाना है?

मुझे दूसरे नेताओं से मोदी का यह फर्क दिखाई देता है कि दूसरों की चुनावी भाषा और बाद की भाषा और कामों में प्राय: असंगति होती है, मोदी ने अपने बयान नहीं बदले और उन सभी वादों को क्रियान्वित करने का प्रयास किया। उनके परिणाम अनुकूल ही हों यह जरूरी नहीं।

मैं परिणाम से अधिक प्रयत्‍न को महत्‍व देता हूं। इसलिए यह भी उनका खाेखला वादा नही लगता, फिर भी जिस संगठन के समर्थन की उन्‍हें जरूरत पड़ती है उसके सभी लोगों की सोच वही नहीं है जो मोदी की। कुछ घोर मुस्लिम द्रोही हैं, दूसरे सन्‍देहवादी। बहुत कम लोग ऐसे हैं जो मोदी की योग्‍यता और लक्ष्‍य में विश्‍वास करते हैं। यह बात उन मुखर लोगों तक सीमित है जिनके विचारों को हम सूचना के विविध माध्‍यमों से जान पाते हैं।

सामान्‍य लोग, जिनकी समझ पर सरकारों के भाग्‍य का फैसला होता है, क्‍या सोचते या मानते हैं, इसे जानने का हमारे पास कोई उपाय नहीं, क्‍योंकि हम भी उनसे सीधा संपर्क नहीं रखते या जिन कारणों से उनके संपर्क में आते हैं वह कार्यसाधक होता है जिसमेंं उनके विचार जानने का अवसर नहीं मिलता। जिसे हम जनमत कहते हैं, उसकी रुझान का दावा हम नहीं कर सकते। पर यह विश्‍वास कर सकते हैं कि वह विघटन और उपद्रव पसन्‍द नहीं करता, और प्रगति के लिए शान्ति और व्‍यवस्‍था को जरूरी मानता है। दूसरी असुविधाओं के बारे में वह तभी किसी को जिम्‍मेदार मानता है जब वह किसी के कारण होता दिखाई देता है।

हम यह मान कर चलें कि मोदी समाज को इसलिए जोड़ना चाहते हैं कि इसमें उनका भी लाभ है और समाज का भी। जहां दोनों पक्षों के हितों में टकराव न हो वहां कथन और कार्य की विश्‍वसनीयता बढ़ जाती है।

मोदी के खुले विरोध में वे हैं जो स्‍वयं दावा करते हैं कि वे देश को तोड़ना चाहते हैं। इनमें प्रमुख वाम दल रहे हैं । इनका लक्ष्‍य था आरंभ से ही यह था कि देश को ऐसे छोटे स्‍वायत्‍त टुकड़ों में बांटा जाय जिनको आधार बना कर सशस्‍त्रक्रान्ति संभव हो सके और जो ऐसे हों कि आवश्‍यकता पड़ने पर कम्‍युनिस्‍ट देशों से असला हासिल किया जा सके। जल्‍द ही इन्‍होंने मुस्लिम लीग की कार्ययोजना को अपने कार्यक्रम का हिस्‍सा बना लिया और देश के विभाजन का समर्थन किया। नक्‍सल नक्‍सलबाड़ी के तंग हिस्‍से में उपद्रव करके उसे शेष बंगाल से काट कर उत्‍तरी बंगाल में कम्‍युनिस्‍ट राज्‍य स्‍थापित करके धीरे धीरे पूरे देश में क्रान्ति लाना चाहते थे। यही लक्ष्‍य उससे पैदा हुए दूसरे संगठनों का था और वे अपने प्रभाव क्षेत्र को देश से अलग काटने और उसका विस्‍तार करने की योजन पर काम करते है। वे विश्‍व व्‍यवस्‍था के ऐसे ‘महान’ कार्यक्रम पर काम करते रहे जिसमें राष्‍ट्रीय भावना और देशहित, संकीर्ण और बाधक प्रतीत होता था। मुस्लिम पान इस्‍लामिज्‍म से इस मामले में उनका विचार-साम्‍य था। रहने को घर नहीं है सारा जहां हमारा। तोड़ने की इस नीति के कारण ही राष्‍ट्रवाद को वे जर्मन राष्‍ट्रवाद कह कर इस पर प्रहार करते रहे जब कि दूसरे संकीर्ण संगठनों का समर्थन तक करते रहे।

संघ की कुछ सीमाएं तो जगजाहिर हैं। यह भी लीग की तरह विलगाववादी रहा है जिसका रणनीतिक महत्‍व जो भी हो, सांस्‍कृतिक महत्‍व शून्‍य है। रक्षा के लिए हमें सेना और पुलिस का भी सहारा लेना पड़ता है, परन्‍तु इनका सांस्‍कृतिक मूल्‍य नहीं होता। इसलिए कोई बुद्धिजीवी या संस्‍कृतिकर्मी ऐसे संगठन के साथ नहीं हो सकता या रहे तो इससे उसका लेखन प्रभावित होता है और वह अपनी क्षमता के लिए शक्‍य शिखर तक नहीं पहुंच पाता। परन्‍तु इस संगठन को दहशतनाक बताने के पीछे यह तथ्‍य भी रहा है कि यह अकेला मुखर संगठन है जो राष्‍ट्रनिष्‍ठा और देशप्रेम का राग अलापता है जो उस वामपंथी विश्‍ववाद के प्रतिकूल है जिसका विश्‍ववाद देशद्रोह की सीमा तक जा सकता है।

कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ने यदि लीग की योजना पर काम करते हुए यह सोचा हो कि इससे उसका जनाधार बढ़ेगा तो वह गलत सिद्ध हुआ। इस्‍लामी कट्टरता का साथ देने वालों को इस बात का ध्‍यान न रहा कि इस्‍लाम का पूरा ढांचा ही अल्‍लाह में और उसके पैगंबर में विश्‍वास पर टिका है, इसलिए यह किसी अनीश्‍वरवादी संगठन का साथ नहीं दे सकता। अत: लीगियों ने कम्‍युनिस्‍टों का इस्‍तेमाल कर लिया, वे लीगियों तक को अपने साथ नहीं ला सके। उनको मिलना हुआ तो वे कांग्रेस में जा मिले क्‍योंकि सत्‍ता में जगह बनाने का वही आसन्‍न रास्‍ता था।

उसकी आलोचना यदि संघ तक सीमित रहती तो इस पर कोई आपत्ति न होती, क्‍योंकि यह हिन्‍दू समाज केे हितों तक सीमित था जिसमें मुसलिम समुदाय का अहित भी अपना हित लगता था । लीग से एकात्‍म्‍य स्‍थापित कर लेने के बाद इनकी दिलचस्‍पी मुस्लिम हितों तक सीमित रह जाने और हिन्‍दू अहित को भी अपना हित मानने की प्रवृत्ति कम्‍युनिस्‍ट पार्टी में प्रवेश कर गई।

इस ओर किसी की दृष्टि न गई, क्‍योंकि बुद्धिजीवी वर्ग और प्रचार तन्‍त्र पर उसका एकाधिकार सा होता गया था और उनसे भिन्‍न विचार रखने वाले हाशिये पर डाल दिए गए थे। इसने हिन्‍दू विरोध को सक्‍युलरिज्‍म का पर्याय बना दिया और हिन्‍दू समाज, संस्‍कृति अौ इतिहास की उपेक्षा ही नहीं करती रही अपितु इनके प्रति घृणा का भी प्रचार और अपव्‍याख्‍या से उसका ध्‍वंस भी करती रही। इसकी घृणा हिन्‍दू से बढ़ते हुए हिन्‍दी, हिन्‍दुस्‍तान तक पहुंच गई।

साहित्‍य, कला और संस्‍कृति से जुड़ी प्रतिभाओं को यह भ्रम रहा कि वे शोषण के विरुद्ध और शोषितों के पक्ष में संघर्षशील एक दल के साथ है और इसलिए इस भितरघात पर किसी का ध्‍यान नहीं गया और इस कार्ययोजना को उन्‍होंने भी आत्‍मसात कर लिया। भारत तेरे टुकड़े होगे, या भारत की बर्वादी तक जंग चलाने वालों से इसका साथ वह तार्किक परिणति है जिससे पहले उनका असली चेहरा उजागर नहीं हुआ था। कारण अपनी विफलताओं के कारण वे उस हताशा तक नहीं पहुंचे थे जिसमें अपना अन्‍त निकट दिखाई देने लगता है। अन्‍त काल निज रूप दिखावा और वह भी यह भूलते हुए कि ‘उघरे अन्‍त न होंगि निबाहू ।’

यदि भारत की बर्वादी के साथ कांग्रेस और कम्‍युनिस्‍ट संगठन खड़े हैं तो शाषितों की पीड़ा से विकल हो कर वाम के पक्ष में खड़े होने वालों काे पुनर्विचार करना होगा कि वे देश की बर्वादी करने वालों के साथ खड़े हो सकते हैं ? इसकी संस्‍थाओं को नष्‍ट करने वालों के साथ खड़े हो सकते? देश के टुकड़े करने वालों के साथ खड़े हो सकते है ? और क्‍या वे देश की जनता के साथ्‍ा खड़ा होने से इन्‍कार कर सकते हैं, क्‍योकि देश की जनता देश के टुकड़े और देश की बर्वादी नही पसन्‍द कर सकती, इतना उन्‍हें भी पता है। पहले चुनाव बहुत भ्रामक था- कूट योद्धा हि राक्षसा:। आज चुनाव बहुत सीधा और साफ है और यह किसी का आरोप नहीं है, उनके अपने मुंह से निकला बयान है, उस बयान के समर्थन में खड़े होने वालों की गवाही है।

भारत के टुकड़े हो नहीं रहे हैं किये जा रहे हैं और किये जाते रहे हैं। सांप्रदायिक घृणा काे जारी रखना आज उनके अस्तित्‍व से जुड़ चुका है क्‍योंकि उनके पास दूसरा कोई कार्यक्रम नहीं है।

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मोदी जिस संगठन से जुड़े हैं उसके अधिकांश लोगों के मन में वैसा ही जहर है यह फेसबुक के माध्‍यम से जाना जा सकता है। मिल जुल कर रहने के पिछले प्रयत्‍नों की विफलता को वे इसका प्रमाण मानते हैं। सचाई यह है मिल जुल कर रहने का सिलसिला तो हमारी अपनी समाजव्‍यवस्‍था में ही नहीं है। चुनौती प्रेम से रहने की नहीं है, समझदारी से रहने की है। समझदारी से अपने साथ वैर भाव रखने वालों के साथ भी रहा जा सकता है और इस बात का ध्‍यान रखा जा सकता है कि दूसरा हमें हानि न पहुंचाने पाए । इससे पहले स्‍वयं देखना होगा कि हमारे किसी कार्य, व्‍यवहार या कथन से उसे हानि न पहुंचे । यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो तोड़ने वालों में आप की भी गिनती होनी चाहिए ।

मनुष्‍य जंगलों से बाहर निकला है जहां उसे असंख्‍य ऐसे जानवरों, कीटो पतंगों के बीच रहना पड़ता था जो उसके शत्रु थे या जो उसे हानि पहुंचा सकते थे। वह सबसे कमजोर प्राणी भी था। दांत, नख, पंजे सभी उन जानवरों से कमजोर जिनको इनमें से कोई हथियार मिला था। न कोई विष न दंश की शक्ति। प्राणिजगत के सबसे कमजोर जानवर ने शक्ति की कमी को युक्ति और समझ से पूरा करते हुए इतनी शक्ति प्राप्‍त कर ली कि शेर को भी यदि पता चल जाय कि यहां आदमी घात में बैठा है तो सामने नहीं आता। उसने अनगिनत हिंस्र और शक्तिशाली पशुओं काे अपना मित्र बना लिया। यदि उसी की संतान कहे कि वह किसी मानव समुदाय के साथ एेसा संबन्‍ध कायम नहीं कर सकता तो वह अपने पूर्वजों का अपमान करता है।

अज्ञान और अंधकार से डर पैदा होता । अपरिचय से अविश्‍वास पैदा होता है। एक मोटी समझ है कि जिनके साथ हमें रहना है उनके साथ टकराव का रास्‍ता न अपना कर बनाव का रास्‍ता अपनाये। यह अपनी शक्ति का सही दिशा में उपयोग करने की और अपनी स्थिति को सुधारने की पहली शर्त है। हमें अपने से प्रश्‍न करना चाहिए कि क्‍या हमने इस दिशा में कोई पहल की है या काम किया है।

अब तक जो भी प्रयोग हुए वे दिखावटी थे । शब्‍दों का खेल। उनसे विश्‍वास पैदा नहीं होता। विश्‍वास और सदभाव अर्थव्‍यवस्‍था में साझीदारी से पैदा होता है। पशुओं की जरूरतों का हम ध्‍यान रखते हैं तो वे हमारी जरूरत पर काम आते है। यह भी आर्थिक संबंध ही है जो पशु और मनुष्‍य काे सहभागी बना देता है, भेडि़ये को पालतू कुत्‍तों में बदल देता है। रामलीला हिन्‍दुओं का पर्व। रावण, मेघनाद, कुंभकर्ण के पुतले मुसलमान बनाते हैं। जो कपड़े हम पहनते थे उसे बुनने, सिलने का काम मुसलमान करते थे। ये संबंध अधिक गहरे और एक दूसरे को जोड़ कर रखने वाले हैं । मोदी ईश्‍वर अल्‍ला तेरे नाम गा कर सन्‍मति पैदा करने का इरादा नहीं रखता। वह विकास को अग्रता दे कर सन्‍मति पैदा करने का सपना देखता है। वह जोड़ने के महामन्‍त्र को जानता है और तोड़ने वालों से बचाते हुए पर आवश्‍यकता होने पर शक्ति का भी प्रयोग करते हुए उसे इस दिशा में बढ़ना है। अपने जाहिलों और काहिलों से भी लड़ना है उसे और देश को तोड़ कर अपने को जिन्‍दा रखने वाले खुराफातियों और देशघातियों से भी लड़ना है।

Post – 2016-10-28

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्‍टर – 20

‘तुम कहते हो ”विचार की भाषा गद्य है, आवेग और विश्‍वास की भाषा कविता ।” और मानते हो पद्य में भी गद्य लिखा जा सकता है तो यह तो मानते ही होगे कि गद्य में भी कविता लिखी जा सकती है। तुम्‍हारी कल की पोस्‍ट ऐसी ही कविता थी। कई बार पढ़ी हुई, लगा अब चुक गए हो। कहने को कुछ बचा ही नहीं।’ मेरे दोस्‍त ने मिलते ही आडे हाथों ले लिया।

बात तो सही थी शाम को गद्य लिखा जाय तो वह कविता में बदल सकता है । देरे से लिखा था।

‘तुम्‍हारे साथ परेशानी क्‍या है ? तुम्‍हें पता है यह इंशा अल्‍ला वाली शिकायत तुमने दूसरी बार दुहराई थी। अच्‍छे लेखक अपने को दुहराते नहीं हैं।’

‘सिर्फ दूसरी बार न । जानते हो यह पीड़ा मुझे मर्माहत करती है कि भारत की बर्वादी का नारा लगाने वाले मंच पर उस दल के लाेग उपस्थित हों जो भारत को समाजवाद का स्‍वर्ग बनाना चाहते थे और भ्रमवश इस को उनका प्राथमिक उद्देश्‍य मानकर मैं भी उनसे सहानुभूति रखता रहा हूं। आत्‍मग्‍लानि होती है यह सोच कर कि भारत में मुस्लिम लीग ने अपना नाम बदल कर कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों के नाम अपना लिए हैं जिनमें …’

उसने बीच में ही लपक लिया, ‘यह बात तुम पांचवीं बार कह रहे हो…’

मैंने उसे हंसते हुए काटा, ‘अच्‍छे लेखक कोई बात पांच बार तो दुहरा ही नहीं सकते। यही न ? देखो, मैं अच्‍छा लेखक नहीं बनना चाहता । सच्‍चा लेखक बनना चाहता हूं । अपनी बात को कई तरीकों से तब तक दुहराता रहना चाहता हूं जब तक लोगों की उदासीनता न भंग हो।’

‘सच्‍चे लेखक किसी पर जो भी जी आए आरोप नहीं लगाया करते ।’

सच कहो तो यही मैं याद दिलाना चाह रहा था कि तुम लोग अपने प्रत्‍येक कार्य और व्‍यवहार से मेरे आरोप को सही सिद्ध करते रहते हो । बात तो मैं तीन तलाक की कर रहा था, उससे जुड़ी पीड़ा और अपमान की, उसकी दहशत में पत्नियों का मूक गुलामों में अपने को ढाल कर सुरक्षित होने जद्दोजहद की जिसमें किसी भी मुस्लिम परिवार को देख कर लगे कि सब कुछ संगीत के सुरों की तरह सधा हुआ है और समायोजित है, पर उससे जुड़ी आज्ञाकारिता के पीछे काम करने वाली असहायता का आभास तक न हो, पर इसके बाद भी बहुतेरे मामलों में वह नौबत आकर ही रहती है और तब उस यातना, अकेलेपन, और अपमान का कोई अन्‍त नहीं रहता। हम इसे बदल नहीं सकते पर इस पीड़ा के निवारण की कामना
तो कर सकते हैं।

परन्‍तु बिन्‍दा करात जैसी नेता जो महिलाओं के सवाल पर इतनी संवेदनशील हैं, उनको यह कहते पा कर मैं हैरान रह गया कि पहले हिन्‍दू समाज के विषमता मूलक सभी दोषों को दूर करके महिलाओं को पूर्ण समानता का अधिकार देने वाले कानून बना कर लागू कर लिया जाय, तभी मुस्लिम महिलाओं के लिए न्‍याय की बात उठाई जाय, मैं हैरान रह गया। मैं उन्‍हें जानता हूं, यह उनका विचार नहीं हो सकता, यह उस नीति का हिस्‍सा लगा जिसमें मुल्‍लाओं की भाषा में उनसे भी आगे बढ़ कर कम्‍युनिस्‍ट पार्टियां बोलने लगीं और उसे आज तक बोलती आ रही हैं।

लीग और मुल्‍लातन्‍त्र में केवल पुरुष आदमी है, महिला इन्‍सान है ही नहीं। इसने मुझे क्षुब्‍ध किया था और क्षोभ भी तो आवेग ही है, काफी प्रबल भी और इसलिए कुछ कवित्‍व तो गद्य में भी आ ही जाएगा।

मैं उस बुद्धिजीवी वर्ग के साथ खड़ा नहीं हूं जिसकेे अलावा मेरा कोई घर नहीं, कोई अपना नहीं। सबसे बड़ा दंड, प्राणदंड से कुछ ही घटकर होता है निर्वासन । और उसका चुनाव, स्‍वयं करना पड़े, आत्‍मनिर्वासित होना पड़े इसकी पीड़ा को तुम नहीं समझ सकते परन्‍तु अन्‍तरात्‍मा की रक्षा के लिए पूरी धरती का त्‍याग किया जा सकता है, आत्‍मार्थे पृथिवीं त्‍यजेत् । यह त्‍याग फूलों सजी सेज नही होती, कांटों का ताज भी नहीं, यह चेतना में धंसे कांटों का दंश होता है जो बार बार उभरता है। मुझे यह पीड़ा होती है कि यदि तुम ‘भारत की बर्बादी तक जँग रहेगी, जंग रहेगी।’ कहने वालों के साथ हो, पहले पाकिस्‍तान बनाने वालों के साथ खड़े हुए और आज पाकिस्‍तान जिन्‍दाबाद कहने वालों के साथ हो तो हमारे बुद्धिजीवी किसके साथ है । जेएनयू के बुद्धिजीवियों ने तो बता दिया कि वे भाजपा को सत्‍ता से हटाने के लिए उन्‍हीं के साथ हैं।

पीड़ा होती है कि भारत को बचाने का काम उस विचारधारा के जिम्‍मे आ पड़ा है जिसे मैं मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया में बनी और उल्‍टे सिरे से उन्‍हीं की भाषा बोलने वाली मान कर कल तक मैं इतना परहेज करता था कि उससे स‍हमति रखने वालों का या तो उपहास करता था, या राजनीति से अलग विषयों पर ही बात करता था। कितना विचित्र है यह मोहभंग । यदि तुम सचमुच पहले दिन से तोड़ने का काम कर रहे हो और आज भी तोड़ने वालों के साथ हो तो बुद्धिजीवियों को एक संकल्‍पपत्र प्रकाशित करके यह बताना चाहिए कि वह संघ और भाजपा के ही विरुद्ध नहीं है भारत के विरुद्ध हैं और भारत के दुश्‍मनों के साथ हैं। वे दुश्‍मन बदलते रहते हैं, पर दुश्‍मन कोई भी हो, उसकेे साथ खड़े होने का इरादा कभी नहीं बदलते ।’

वह हंसने लगा, ‘अरे यार, वह तो शब्‍दों का खेल था, जिसके पीछे था गुस्‍सा। उसी को ले कर तुमने माला जपनी शुरू कर दी। बच्‍चे उत्‍साह में बहुत कुछ कह देते हैं, लोग गालियां देते समय कैसे कैसे रिश्‍तेे बना लेते हैं, उन्‍हें सचाई मान लो तो छुट्टी हो गई।’

‘‍विस्‍तार होगा, संक्षेप में यह समझ लो कि विचार भी एक कार्य है, परन्‍तु जब तब वह व्‍यक्‍त नहीं होता वह सामाजिक रूप नहीं ले पाता, व्‍यक्‍त होते ही वह सामाजिक हो जाता है और उससे जो प्रभाव वातावरण पर, दूसरों की मानसिकता पर, दूसरों के कार्य पर पड़ता है, वह यदि अनिष्‍टकर है तो यह किसी अनिष्‍ट कार्य की तरह संज्ञेय अपराध है। व्‍यक्ति के मानह‍ानि की बात तुम्‍हारी समझ में आती है, पर देशहानि की बात तुम्‍हारी समझ में नहीं आती।

”तुम मेरे दो बार या पांच बार किसी चिन्‍ता को प्रकट करने पर याद दिलाने लगते हो, कि अच्‍छे लेखक ऐसा नहीं करते, तुम्‍हें याद है तुम कितने साल से‍ कितने कंठों से एक ही वाक्‍य को असंख्‍य बार दुहराते आए हो। सन्‍दर्भ कोई भी हो, कारण कितना भी छोटा क्‍यों न हो :
तानाशाही नहीं चलेगी – नहीं चलेगी । नहीं चलेगी ।।
गुंडागर्दी नहीं चलेगी – नहीं चलेगी। नही चलेगी।।
जो हमसे टकराएगा वह चूर चूर हो जाएगा ।।

‘तुम्‍हारे लिए कुछ नहीं बदलता। यही कहते रहे, यही लिखते रहे, यही करते रहे और अपनी भविष्‍यवाणी को सच करते रहे । वाचाल लोग सुनना भूल जाते हैं।

‘तुम केवल उन दिनों चैन से रहे जब सचमुच तानाशाही आ गई। आपात काल तुम्‍हारे अच्‍छे दिनों की वापसी थी और सभी संस्‍थाओं पर तुम्‍हारी तानाशाही की स्‍थापना का चरण था। जिन दिनों देश में लूट मची थी, तुम लुटेरों का साथ दे रहे थे। जब उस पर रोक लगी, पहली बार दादागीरी और निरंकुश शासन का खात्‍मा हो कर एक सच्‍चे अर्थो में लोकतान्त्रिक सरकार कायम हुई, लोकतांत्रिक तरीके से काम करने लगी तो तुम्हारे बुरे दिन आ गए।

मैं अपने उन मित्रों से उस चुनौती की बात करना चाहता था जिसके बारे में उनमें निराशा इतनी गहरी है कि वे ठीक विभाजनपूर्व के जिन्‍ना वाली भाषा में सोचते हैं कि हम मिलजुल कर नहीं रह सकते। मै उस चुनौती के सामने मोदी को खड़ा करके देखना चाहता था कि इतनी गहरी निराशा के बीच उनका प्रयत्‍न क्‍या होना है। तुमने उधर से विचलित कर दिया। उस पर कल सही ।

पर एक बात पर ध्‍यान दो, आज तक ब्‍यूरोक्रैसी को हर ऐरा गैरा जनप्रतिनिधि हुक्‍म देता फिरता घूम रहा था और उस दबाव में अपनी गरिमा खो कर वह भी भ्रष्‍टाचार में लिप्‍त हो गई थी। पहली बार एक ऐसा नेता आया है जो उससे अपनी आलोचना करने की बात कर रहा है। स्‍वतन्‍त्रता से काम करने की बात कर रहा है।
यह दूसरे बदलावों की तरह बहुत बड़ा बदलाव है और तुम इससे भी असुरक्षित अनुभव करोगे क्‍योंकि संसद में दागी प्रतिनिधियों की संख्‍या में होती जा रही वृद्धि और उन्‍हें मिले अतिरिक्‍त अधिकार जो कार्यकारिणी में दखल देते थे, अब चल नहीं पाएंगे। यह मात्र एक वाक्‍य नहीं है, एक आन्‍तरिक क्रान्ति है ।’

Post – 2016-10-27

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्‍टर – 19 (ख)
मेरा दोस्‍त रोज एक शेर छोड़ देता है। वह दहाड़ता है पर किसी को डर नहीं लगता! वह खुद ही डरे हुए शेर की आवाज में दहाड़ता है । शेर की भाषा में कहें तो:
नरेन्‍दर आ चुका है अब कयामत आने वाली है ।
हमारी और हम जैसों की शामत आने वाली है ।

शामत आ भी चुकी है! पर उस गरिमा के साथ नीचे भी नहीं जा सकते जैसे डूबते जहाज का कप्‍तान सभी मुसाफिरों को बचाने का उपाय करने के बाद जहाज के साथ नीचे चला जाता था।

मैंने पूछा, यह संगीत का फ्यूजन कहां से सीखा तुमने यार जिसमें दहाड़ और कराह दोनों एक साथ फूटती है।

अक्‍ल उसमें भले न हो, ईमानदारी पूरी है, बोला, फ्यूजन करता नहीं हूं, अपनी ओर से दहाड़ता हूं पर आवाज बाहर आते आते कन्फ्यूजन के कारण फ्यूजन अपने आप हो जाता है। अभी त‍क हमारी पार्टी ने यह तय नहीं किया कि हमें हाहाकार मचाना चाहिए या हुंकार भरना चाहिए ।

”अनिश्‍चय के इस दौर में दोनों काम एक साथ करके देखना चाहते हैं कि इन दोनों में कौन हमेंं बचा सकता है। तुम जानते हो हमारा पाला एक ऐसे आदमी से पड़ा है जो लोकतान्त्रिक तरीकेे से सत्‍ता में आया है । जनता लोकतन्‍त्र को अच्‍छा समझती है और हम लोकतन्‍त्र को बोर्जुआतन्‍त्र मानते हैं। हम जनता तक नहीं पहुंच पाते कि उसे समझा सकें कि यह धनी को अधिक धनी और गरीब को अधिक गरीब और असहाय बनाने का तन्‍त्र है। जनता से कटे होने के कारण उसे यह भी समझा नहीं पाते कि इसके हाथों में लोकतन्‍त्र खतरे में है। जनता उसका साथ देती है और हमारी आधी शक्ति जनता को कोसने में खर्च होती है और आधी इस चिन्‍ता में कि ‘जायें तो किधर जायें’ ।”

मैं उसकी साफगोई पर अपनी खुशी जाहिर ही करने वाला था कि उसने उस पर पानी फेरना चाहा, ‘तुम यही सुनना चाहते थे न!’ इतने दिनों के बाद मेरे घर पर आए हो तो तुम्‍हारेे स्‍वागत में इतना तो बनता ही था न।”

मैंने जितना मनोविज्ञान पढ़ा है उसमें यह पता नहीं कि इस अवस्‍था केे लिए कोई शब्‍द गढ़ा गया है या इसकी व्‍याख्‍या की गई है या नहीं, जिसमें सच तो इस दबाव में बोल जाता है कि उसके पास सच बोलने के सिवा कोई चारा नहीं रह जाता, पर अन्‍त में जब बोलने वाले को यह बोध होता है कि उसकी जिन्‍दगी भर के किए कराए पर इस ईमानदारी के कारण पानी फिर गया तो वह झट अपने बयान से मुकर भी जाता है।

मुझे उस पर क्रोध तो आ ही नहीं सकता, आता तो आज तक यह दोस्‍ती निभती ही नहीं , परन्‍तु दया भी नहीं आई। पूछ बैठा, ”तुम्‍हारी पार्टी में किसी ने मार्क्‍स को ध्‍यान से पढ़ा भी है।”

उसने मुझे इस नजर से देखा कि ‘य‍दि तुम मेरे घर में न बैठे होते तो मै तुम्‍हें कच्‍चा चबा जाता। तुम इतने जाहिल क्‍यों हो।’ वह जानता था, मार्क्‍सवाद का मेरा ज्ञान इतना कम है कि कोई पूछे कार्लमार्क्‍स सही है या कार्ल मार्क्‍स तो मैं ‘नाम में क्‍या रखा है’ कह कर इज्‍जत बचाने की कोशिश करूं। जहां तहां से मार्क्‍स की सूक्तियों को ही मैं मार्क्‍सवाद समझता हूूं और उसी से काम चलाता हूंं।

दूसरी ओर उसकी पार्टी में ऐसे धाकड़ पड़े हुए थे कि उनसे पूछा जाय मार्क्‍स ने कितनी किताबेंं लिखी तो उनकी सूची गिना दें। उनमें से यदि कोई पूछे कि क्‍या आपने इसे पढ़ा है तो जवाब दें, सीधा पाठ करके सुनाऊं या उल्‍टा। हद यह कि मैं उनको चुनौती दे रहा था।

उसको कुरोख देख कर ही मैं ताड़ गया कि वह क्‍या कहना चाहता है, पर दबाव में नहीं आया। कम जानने का सबसे बड़ा लाभ यही है कि आप जो जानते हैंं उस पर आपका विश्‍वास अडिग होता है। मैने मार्क्‍स की एक सूक्ति जड़ दी democracy is the road to socialism क्‍या इसे तुम्‍हारे उन विद्वानों ने कभी समझने की कोशिश की जो उनके लिखित साहित्‍य पर इतना अच्‍छा अधिकार कर चुके हैं कि उसका उल्‍टा सीधा कोई पाठ कर सकते हैं और अपनी जरूरत से मार्क्‍सवाद और साम्‍यवाद का उल्‍टा सीधा इस्‍तेमाल कर सकते हैं। वे किसके प्रति समर्पित हैं । देखो, उन्‍होंने मार्क्‍स को रटा है, समझा नहीं है। मार्क्‍सवादी इबारतों का इस्‍तेमाल करते रहे है और वह भी मार्क्‍स को चूूना लगाते हुए। मार्क्‍स ने कहा, सभी देशों के मजदूर एक हो जाओ, तूमने सभी देशों का अनुवाद पूरी दुनिया कर दिया जब कि उनका प्रयोजन था जिन देशों में पूंजीवाद है और मजदूर एक वर्ग बन गया है, उसे आपस में जुड़ कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहिए क्‍योंकि उसके पास खोने को कुछ नहीं है, सिवाय बन्‍धनों के और पाने को उच्‍चतम संभावना है।

भारतीय कम्‍युनिष्‍ट मार्क्‍स को समझ ही नहीं सकते थे। वे इस्‍तेमाल होने के लिए तैयार हो कर संगठन में आए थे। जो फल पर नजर रखते हैं उनका यही हाल होता है इसलिए कहा तो गीता ने है और तुम इसे धार्मिक विचार भी सिद्ध कर दोगे, पर विचार यह है कि परिणाम पर नहीं, कर्तव्‍य पर ध्‍यान केन्द्रित करो। परिणाम से तो कोई बच ही नहीं सकता। देव, अदेव सभी उसी से चालित हैृृ परिणाम की आकांक्षा से बचते हुए हम अपने कर्तव्‍य का निर्वाह करें तभी हम उस पात्रता को पा सकते हैं जिससे कर्म के साथ भोग और विलासिता का बन्‍धन नहीं, विवेक का प्रकाश मिलता है।

जिनसे तुम्‍हारा लगाव रहा है वे सभी अपने देश के प्रति ईमानदार न थे, अपने समाज के प्रति जिम्‍मेदार न थे, अपने भविष्‍य के प्रति सावधान न थे और जिस मानवतावाद केे शिखर तक पहुंचने की एक लंगड़ी कोशिश मार्क्‍सवाद है उसे तक नहीं समझते थे।’

वह खिन्‍न था, कुछ कहते न बन पड़ रहा था। पर जैसे आवेश मुझ पर भी हावी हो गया हो, मैंने अपनी रौ में था, ” तोते चिन्‍तन नहीं करते । यार तुम लोग तोते की आवाज में मार्क्‍सवाद का पाठ करते रहे, ‘सीधा उल्‍टा एक समाना’ गाते हुए।

तुम जानते हो तुमने मानवता के सबसे बड़े सपने को धर्मोन्‍मादियों की भेट चढ़ा दी और उस धर्म पर प्रहार करते रहे जिसमें सबके लिए जगह है और सबको अपने ढंग से जीने का अधिकार है और इसलिए जो उस अर्थ में मजहब है ही नहीं जिसमें वह अफीम या हेरोइन बनता है। इसमें विश्‍लेषण करने की छूट है जिसमें अनिष्‍टकर की शिनाख्‍त की जा सकती है और उसको दूर करने के प्रयत्‍न भी किए जा सकते हैं, पर चुटकी बजाते हुए न किसी महाव्‍याधि से मुक्ति दी जा सकती है न इसकी विकृतियों से। विकृतियां आज भी इस व्‍यवस्‍था में हैं। दूसरों क पास विश्‍वास है, ऐसा विश्‍वास जिसे जांचा तक नहीं जा सकता, जब कि इसके पास विवेक और वितर्क है, विवेचन है इसलिए यह विश्‍वास तो करता है पर उसकी जांच के लिए अवसर भी देता है। यही सही मार्क्‍सवादी तरीका हुआ।

”विचार की भाषा गद्य है, आवेग और विश्‍वास की भाषा कविता । पद्य नहीं जिसमें हमारा समूचा पुराना साहित्‍य लिखा गया या लिखने का प्रयत्‍न किया गया। वह तो एक छन्‍दबद्ध गद्य ही है क्‍योंकि उसमें विचार है, भावुकता का दबाव नहीं। शास्‍त्र नया हो या पुराना, उससे बाहर आना, अपनी नजर से देखना, यह एकमात्र उपाय है सत्‍य के साक्षात्‍कार का और सत्‍य का साक्षात्‍कार समस्‍याओं को समझने और उनका समाधान पाने की पहली कड़ी है। वह तुम लोगों में दिचााई ही नहीं देता। तुम्‍हारी नारेबाजी हो या कविता, ये दोनों उपद्रव की भूमिका तैयार करते हैं। अपने सम्‍मोहन से मुग्‍ध करके, विवेक को शून्‍य पर पहुंचा कर, अंध प्रतिक्रिया के लिए तैयार करके।

‘आवेग की भाषा में इसलिए आखिरी दहाड़ तुम्‍हारी है और आखिरी उपाय उन लोगों का जिनके लिए ‘मरता क्‍या न करता’ का मुहावरा गढ़ा गया था।

तुम कहते हो, ‘तुम जोड़ने की बात करते हो, तो हम तोड़ कर दिखा देंगे। हर जोड़ने वाले के खिलाफ पर हर जोड़तोड़ करने वाले के साथ खड़े दिखाई देंगे। जोड़ने का जो अर्थ तुम जानते हो, उसे हम जानते तो है, उसका अभ्‍यास नहीं करते। तुम्‍हारी गणित के अनुसार जो लोग जोड़ते जोड़ते इतना जोड़ चुके थे कि घर में रखने को जगह न मिले, इसलिए दूसरों के घरों में डालते रहे और उनसे रिरियाते रहे कि तुम चाहे इसे सूद पर चला कर मालामाल हो लो, पर हमारे वापस मांगने पर लौटा जरूर देना और यह बात तो किसी दूसरे को पता ही न चले कि हमारा जोड़ा हुआ तुम्‍हारे घर में डाला गया है। उनका साथ देने के कारण तुम तोड़ने वालों की फौज भी जुटा सकते हो और ऐसे ऐसे उपद्रव करा सकते हो कि उस दबाने की बाध्‍यता पैदा हो तो कानून और व्‍यवस्‍था की चिन्‍ता करने वालों को तुम तानाशाह मान सको और लोगों को यह याद दिला सको कि देखो, हमने पहले ही आगाह किया था न कि यह आया तो आपात काल बिना आपात काल की घोषणा के ही चला आएगा:

लौट कर आएगा आपात मगर अबकी बार ।
तुमको मालूम न होगा कि ये आपात ही है ।

यह आपात देश और समाज को जोड़ने के लिए आएगा। जोड़ने का नाम जपते हुए आएगा, इसलिए हमे देश को बचाने के लिए देश को तोड़ने के एक बड़े काम को अंजाम देते हुए शहीद होना है।’ भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्‍ला इंशा अल्‍ला।’
जनता तक तुम्‍हारी बात पहुंच नहीं पाती। उसके निकट तुम कभी गए ही नहीं, इसलिस वह तोड़ने वालों की हड्डियां तोड़ने पर उतारू हो जाती है। अदालत कहती है बन्‍द करो यह पिटाई। उसने तोड़ने का इरादा प्रकट किया है तोड़ा तो नहीं।’ अदालत जिसे बचा लेती है उसे भी जनता अपने ढंग से परखती है। लाभ किसे मिलता है, इसका ज्ञान तो जुआडि़यों तक को होता है। तुम्‍हारी हालत तो उनसे भी बुरा है। दाव ही गलत बदते हो कि तुम्‍हारा सत्‍यानाश करने के लिए किसी को बेईमानी करने तक की भी जरूरत नहीं पड़ती।

अपना काम करने वाला बहुतों का जवाब बिना बोले ही देता चलता है। मोदी को काम करना आता है, तुम्‍हें दुष्‍प्रचार करना आता है और वह कहता है जिसे जो काम आता है वह करे। तुमको अपनी मौत का सामान करना आता है और जन्‍म के बाद से ही आत्‍महत्‍या के मौके तलाशते आए हो। वह अवसर इस आदमी ने दिया और इसके लिए तुम्‍हें इसे धन्‍यवाद देना चाहिए।

Post – 2016-10-26

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्‍टर – 19 (क)

भारतीय मुस्लिम समाज कितने भीतरी खानों में बंटा हुआ है इसका सही ज्ञान मुझे नहीं है। जानने की जरूरत भी नहीं है। इतना ही जानना काफी है कि उनमें भारत में जितनी निर्वैतरता है उतनी ईराक, ईरान, पाकिस्‍तान, या किसी अन्‍य मुस्लिम देश में नहीं है। पाकिस्‍तान में सूफियों, शिया समुदाय के लोगों, उनकी मस्जिदों तक पर हमले होते रहते हैं और ये हमलावर बाहरी नहीं होते। हिन्‍दुस्‍तान में अर्थात् ब्रितानी काल के अखंड भारत में भी केवल एक बार और सबसे पहला दंगा लखनऊ में सुुन्नियों और शिया लोगों के बीच हुआ था। पर नफरत दोनों संप्रदायों में इतनी तीखी बनी रही कि एक बार मुहर्रम के जुलूस में एक शिया व्‍यापारी को उस आदमी की भूमिका में रख कर उसको धिक्‍कारते हुए तबर्रा पढ़ना आरंभ किया गया जिसनेे कर्बला के युद्ध में मुहम्‍मद साहब के धेवतों हसन और हुसैन काेे तड़पते हुए मरने को विवश किया था। यह भी लखनऊ की ही घटना है । यह कुछ वैसा ही था जैसा रामलीला में राम और रावण की भूमिकाओं में होता है। परन्‍तु यहां हुआ क्‍या कि आरंभ में उस पर नाटकीय अन्‍दाज में इस तरह कुछ ढेले फेंके जाते रहेे कि उधर जायं परन्‍तु अभिनेता तक न पहुंचेंं और उसे चोट न आए। यही पहले तय हुआ था, वर्ना था तो वह भी शिया ही। हो सकता है इस अभिनय के पीछे रामलीला का अनुकरण करने का भी प्रयत्‍न रहा हो। सब कुछ ठीक चलता रहा, वह हंसता मुस्‍कराता रहा, पर तबर्रा के आवेश में पीछे चलने वाले इतने आवेश में आ गए कि वे सचमुच उसे पत्‍थर मारने लगे और वह बेचारा अल्‍लाह, यदि कहीं हो, और उसके पास सीधे पहुंचा जा सकता हो, तो उसका प्‍यारा हो गया।

कई बार मैं उलझन में पड़ जाता हूं कि रामलीला के इतने लंबे इतिहास में ऐसा एक बार भी न हुआ कि रावण या कुंभकर्ण या मेघनाद की भूमिका करने वाले के प्रति लोगों की भावनाएं इतनी उग्र हो गई हो कि उनकी भूमिका निभाने वाले के प्रति किसी तरह का दुर्व्‍यवहार किया गया हो। भूमिका में उतरने वाले का बाल मन पर और अविकसित चेतना वाले लोगों के मन पर असर तो पड़ता है। मेरेे गांव की रामलीला में रावण की भूमिका सत्‍ता बाबा करते थे। अंगद की भूमिका मास्‍टर रघुराज सिंह करते थे। येे दोनों अपनी भूमिकाएं इतनी प्रभावशाली करते थे कि सत्‍ता बाबा को सामान्‍य रूप में देख कर भी डर लगता था। वह अच्‍छे आदमी हो सकते हैं यह तो कभी सोच ही न पाया, जब कि वह हमारे गांव के सबसे कलाप्रेमी व्‍यक्ति थे। बच्चे उनके अभिनय से प्रभावित भले हो जायं, उनके प्रति आवेश में भी अशोभन व्यवहार न करतहीं करते हैं ।मुस्लिम समाज में ऐसा क्‍यों हो गया। पहली बार ही सही। यह अभिनय आगे तो चला ही नहीं। स्‍वाभाविक निष्‍कर्ष निकलता है कि मुस्लिम समुदाय को संस्‍कारत: जज्‍बाती बनाया गया है।

अत: वह विवेक से काम ले ही नहीं सकता। उसका विवेक भी आवेग चालित होता है और अावेग की खेती उसके मुल्‍लों द्वारा मुसलमानों को अपनी भेंड बकरी बना कर रखने के लिए की जाती रही है। परन्‍तु यह उधार का माल है। ईसाइयत में भी ईसा को चरवाहा और अनुयायियों को भेड (शेफर्ड और शीप) के रूप में प्रस्‍तुत किया जाता रहा और पोपोंं, पादरियों ने अपने को शेफर्ड या भेंडिहार और अपने समाज को भेड़़ की भूमिका में रखना चाहा। धर्म के नाम पर अपने ही धर्म दायादों को गुलाम बनाने की पोपों, पादरियों और मुल्‍लाओं और मौलवियों की चाला‍‍की समझ में आती है, धर्मश्रद्धावश मुसलमानों का और उनसे भी पहले पोप साम्राज्‍य के बाद ईसाइयों का अपने को भेंड़ की तरह हांके जाने की बात और इस पर गर्व करने की बात मेरी समझ में नहीं आती।

सून्नियों के अपने भेडि़हार या मुल्‍ले हैं, शिया समुदाय के अपने। जिस समुदाय के असगर अली इंजीनियर प्रतिनिधि थे उसके प्रति सुना था, मेरा सारा ज्ञान ही सुनेे सुनाए का है, कि उनको भी असली मुसलमान, जिसकी परिभाषा से मैं परिचित नहीं हूं, पक्‍का मुसलमान नहीं मानते परन्‍तु उनके विचारों को भी उनके ही संप्रदाय के लोग खतरनाक मानते थे और उन पर कई जानलेवा हमले भी हो चुके थे। वह एक मुसलमान के रूप में सोचते थे अपने संप्रदाय के अनुसार नहीं। वह पूरे मुस्लिम समाज को बदलना चाहते थे और मुसलमानों के बारे में बनेे पूर्वाग्रह को तोड़ना चाहते थे और उससे आगे बढ़ कर मनुष्‍यता तक पहुंचना चाहते थे जिससे उनके संकट भी आरंभ होते थे और कार्यभार भी इतना बढ़ जाता था कि वह अपने ही लोगों को अपने विचारों का कायल नहीं करा पाते थे। मेरी स्थिति असगर अली इंजीनियर से भिन्‍न नहीं है। मेरे अपने ही समाज और संप्रदाय के लोग जिनसे मुझे बहुत प्रेम है, मुझसे इस तरह बिदकते है कि वश चले तो मेरी हत्‍या कर दें और फिर मैं सारी श्रेणियां तोड़ कर हिन्‍दू हो जाता हूं। मैं आश्‍वस्‍त क्‍यों हो जाता हूं कि हिन्‍दू ऐसा नहीं कर सकता जब कि एक हिन्‍दू को असंख्‍य बार इस लिए कोसा गया होगा कि उसने गांधी जी का वध किया था, ऐसा कर चुका है।

मुझे मोदी की उस समझ का पता नहीं जिसे हिन्‍दू समाज की विभाजनकारी आन्‍‍तरिक शक्तियों का तो पता है, फिर भी वह एक सेल्‍समैंन जैसे आत्‍मविश्‍वास से कहता है इन बहुधा विभाजित और बहुधा आत्‍मविनाशी समाजाें को जोड़ा जा सकता है। सबको साथ लिया जा सकता है, और सबकी सम्मिलित शक्ति से उन अवरोधों को पार किया जा सकता है जो हमें आदमी से भेड़ बनाने के लिए प्रयत्‍नशील हैं। क्‍या मैं अपने विचारों को मोदी पर आरोपित करके उसका गुणगान कर रहा हूं ? क्‍या मैं एक जटिल समस्‍या का सरलीकरण कर रहा हूं ?कम से कम वे जो अधिक जानते हैं और मुझसे अधिक समझते हैं, हमारे उद्धार में सहायक तो हो ही सकते हैं। मैं यह मानने को तैयार नहीं कि मोदी में इतनी दूरर्शिता हो सकती है कि वह ऐसी ऊंंची बातें सोच सकता है जिसकी मुझे आदत पड़ चुकी है, पर यह सोच कर बुरा लगता है कि जो कुछ मैं सोचता हूं वह पहले ही उसकी योजना का अंग बन चुका है। जैसा कल सन्‍देह हुआ पर विश्‍वास न हुआ। आइये मिल कर समझें इन समस्‍यओं को फिर तो मोदी इनमें बाधक बना तो मैं भी आप के साथ, गालियों, गोलियों और आरोपों के साथ खड़ा मिलूंगा। अभी तक यह भ्रम बना रह गया है कि वह पूरे भारतीय समाज को जाति धर्म के खानों से ऊपर उठा कर एक प्रगतिशील समाज बनाना चाहता है। इरादे बड़े हैं, समयकम और बाधाएं असंख्य ।

Post – 2016-10-26

मुझे कल किसी व्‍यक्तिगत काम से फरीदाबाद जाना पड़ा। शाम 8.30 पर लौटा। भूख प्‍यास मिटाने के बाद दिन की पोस्‍ट लिखी तो सन्‍दर्भ के रूप में एक फोटो जो एक सप्‍ताह पहले मेरे टाइम लाइन पर किसी ने मेल किया था और कल ही श्री सुरेश कुमार की एक फोटा मुझे अपने विषय के अनुरूप लगे। उन्‍हें सन्‍दर्भ के रूप में देना था पर फेसबुक में लेख के भीतर या नीचे ऐसा करना संभव नहीं इसलिए इसे ऊपर दिया। आज तीन मित्रों की प्रतिक्रियाओं से पता चला कि उसमें भारी काट छांट की गई थी अत: उसे हटा दिया। जिन लोगों ने इस ओर ध्‍यान दिलाया उनके प्रति आभार । पूरी सूची वीरेन्‍द्र यादव ने भी न दी। वह अपने ढंग से काट छांट करके एक सूची दे बैठे। ऐसा भविष्‍य में कम से कम मेरे टाइमलाइन पर न किया जाय। फोटो मैंने सेव करली थी और उससे उद्धृत किया था। अपनी गतिविधि की टोह लेने के बाद उस सज्‍जन को ब्‍लाक कर दूंगा। यदि भविष्‍य में किसी ने ऐसा किया तो उसे भी ब्‍लाक करने को बाध्‍य होऊंगा। हम एक बहुत पवित्र मंच का उपयोग कर रहे है जिसके माध्‍यम से अपने सुख दुख से लेकर सूचना और विचार साझा कर सकते हैं जिससे पारस्‍परिकता बढ़े और हमारे पारस्‍परिक ज्ञान और सोच में वृद्धि हो । इसकी रक्षा करना और अपनी रक्षा करना दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं। भविष्‍य में सभी इसका ध्‍यान रखें। एक मित्र ने पूरी लिस्‍ट पेश की थी। वे सारी प्रतिक्रियाएं और वह सूचना भी धुल गई । यदि वह पुन्: उसे मेरे वाल पर टैग कर दें तो लेख की अपेक्षा पूरी हो जाएगी।