Post – 2018-11-28

मैं आजकल जो लिख चुका हूं उसका संपादन कर रहा हूं। इस क्रम में कुछ बदलाव आते हैे। उनकी एक बानगी इस प्रकार हैः

अविश्वास की विरासत
भारत के पूरे इतिहास में, राजाओं, सामंतों, मठाधीशों के बीच लड़ाइयां होती रही हैं। कहें जिनके पास सत्ता या संपदा रही है वे उसका विस्तार भी चाहते थे और इसके चलते उनमें एक दूसरे से ठनती रही है। जनता या मतावलंबी आपस में लड़ने लगें यह इस्लाम के आने के बाद भी मुसलमानी शासन काल में भी कभी नहीं हुआ। यह अंग्रेजी कूटनीति की विरासत है जिससे स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नीतिगत बदलाव से मुक्ति पाई जा सकती थी, परंतु कुर्सी पर बैठने वाले बदले थे। नीति, नियम, न्याय, मिजाज और भाषा कुछ नहीं बदली। यदि बदलाव की सुगबुगाहट आरंभ हुई तो 1967 में अधिकाश राज्यों में कांगेस की हार के बाद। परंतु बांटो और राज करो की नीति पर अधिक निर्द्वंद्व होकर अमल जारी रखा गया। इस नीति से कांग्रेस को अपने वोट बैंक तैयार करने में ही मदद नहीं मिली, विरोधी दल यदि कभी सत्ता में आए तो उनके भीतर कनिष्ठों की महत्वाकांक्षाएं जगा कर इसी नीति से तोड़ने और सत्ता से बाहर करने और वापसी करने में भी सफलता मिली।
यदि हम ईस्ट इंडिया कंपनी की भेद नीति की तुलना कांग्रेस की भेदनीति से करें तो यह समझने में मदद मिलेगी कि कांग्रेस ने भारत की खोज में भले चूक की हो, कंपनी की तिकड़मों की खोज में कोई चूक नहीं की और इंदिरा जी के समय से जितनी कुशलता से इसका प्रयोग किया गया उतनी कुशलता से नेहरू जी भी नहीं कर पाए थे। परंतु यह भी याद रखना होगा कि शासक अपनी प्रशासनिक वैधता जिस अनुपात में खो चुका होता है, भेदनीति का प्रयोग उतना ही अधिक होता है। इसका एक ही उदाहरण काफी होगा।

कंपनी को लगान वसूली का अधिकार मिल चुका था पर बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला था। गद्दी पर नया नया बैठा युवक । पता चला फ्रांसीसी और अंग्रेज दोनों नवाब से इजाजत लिए बिना अपने किले बना रहे हैं । सिराजुद्दौला ने फर्मान जारी किया कि वे ऐसा नही कर सकते। फ्रांसीसियों ने आदेश का पालन किया पर अंग्रेजों ने जो पहले से ही शासन को खिलौना समझ रहे थे, अपना काम जारी रखा। सिराजुद्दौला ने इस बेअदबी पर उन पर हमला कर दिया। उनके किले को नष्ट कर दिया। अंग्रेज भाग खड़े हुए । पर उनके पास नौचालन का बल था इसलिए वे चालीस दिन तक बंगाल की खाड़ी में रुक कर मीरजाफर को फोड़ने और मद्रास से मदद आने का इंतजार करते रहे। इसके बाद दुबारा उन्होंने जब आक्रमण किया तो उनके सैन्यबल ने नहीं मीरजाफर और अमीचंद के विश्वासघात के चलते उसके अपने सैनिकों ने आक्रमणकारियों का साथ दे कर हराया था। सिराजुद्दौला को अंग्रेजों ने नहीं, मीर जाफर के बेटे मीर कासिम ने मारा था और फिर मीर जाफर का जो कुछ किया था वह केवल इतिहास का पाठ है। अंग्रेजों ने केवल प्लासी के निर्णायक युद्ध में विजय पाई थी। विजय भी कैसी – कहीं नहीं है कहीं भी नहीं लहू का निशान।
अब यदि इसकी तुलना कांग्रेस की हार, जनता शासन और चरण सिंह अथवा एक अन्य स्थिति में वी.पी. सिंह और चन्द्रशेखर की महत्वाकांक्षा से और ठीक आजकल लामबंद हो रहे विकल्पों पर ध्यान दें तो आगे कुछ कहने की आवश्यकता न होगी। इसका विस्तार करके परिवार-शासित प्रजातंत्र के भाग्य को समझा जा सकता है ।

बांटो और राज करो का अनिवार्य सिद्धांत यह है कि जो कमजोर है उसको इतना समर्थन दो कि वह भौतिक, नैतिक, सामरिक जिस भी दृष्टि या जिन भी दृष्टियों से कमजोर पड़ता है, उन दृष्टियों से सबल या प्रबल के मुकाबले को तैयार हो सके। इसके लिए कुछ प्रकट और परोक्ष रिआयतें और सुविधाएं देनी होती हैं। इनमें से एक होती है गुनाहमाफी। इसका ही एक रूप है, अल्पसंख्यक के संख्याबल की कमी को दुस्साहस से पूरा करना। इसकी सूत्रबद्धता जिन रूपोंमें दिखाई देती है उनमें से एक का पाठ है – ‘अल्पसंख्यक की सांप्रदायिकता सांप्रदायिकता नहीं होती।’ इसका विस्तार – ‘अल्पसंख्यक का अपराध अपराध नहीं होता’ को रोक लिया जाता है। इसका प्रवाह इस रूप में होता है कि अल्पसंख्यक के साथ अधिसंख्यक के सभी व्यवहार अल्पसंख्यक पर अत्याचार होते हैं। इसका निष्कर्ष दबा रह जाता है या कहें उस कानून के पारित होने पर सामने आने वाला जिसमें किसी हिन्दू और अल्पसंख्यक के बीच विवाद की स्थिति उत्पन्न होने पर जांच से पहले ही हिन्दू को अपराधी मान कर कार्रवाई की जाएगी। पर साहित्य में यही मुखरित होता है।

उर्दू की, विशेषकर स्वाधीनता के बाद की, कविता का एक बड़ा हिस्सा हिंदुओं के प्रति शिकायतों और सताए जाने की पीड़ा का इजहार है। मुशायरों में ऐसी कविता को कुछ खास पसंद किया जाता है। ये सचाई को उलट कर पेश करती हैं, आत्मप्रक्षेपण होती हैं। जो शिकायत उन्हें हिंदुओं से है, वहीं अधिक सटीक रूप में हिंदुओं को उनसे रही है। जिम्मेदार दोनों हैं परंतु दूसरे को जिम्मेदार ठहरा कर अपने अपराधबोध को कम करना चाहते हैं। अदायगी की नफासत पर दाद दिए बिना रहा नहीं जाता। मिसाल के लिए, ‘ ये नए मिजाज का शह्र है, जरा फासले से मिला करो।’ पद्य में जो नया लगता है, गद्य में वह पुराना है। मुस्लिम समुदाय इसी पर अमल करता रहा है। एक ओर से भाई-भाई की रट लगती रही, तो दूसरी ओर फासले बना कर रहने की चेतावनी दी जाती रही है, मिले तो मिटे, विलीन हुए।

जिस कवि की ये पंक्तियां हैं उसी की एक कविता के अनुसार हिंदू मरने के बाद जला दिया जाता है, उसकी राख बहा दी जाती है, जो नदी से होकर समुद्र में चली जाती है, मुसलमान मरने के बाद भी इसी जमीन में दफ्न होता, इसी मिट्टी में मिल जाता है, इस पर मुसलमान का हक हिंदू से अधिक है। जबान की चुस्ती की दाद देते हुए भी यदि इसके पीछे काम करने वाली चेतना पर ध्यान दें , और फिर वैसी ही चुस्ती का परिचय देते हुए यदि कोई कहे कि “हां, मुसलमान जिसे जीते जी अपनी मां नहीं मानता वही धरती जीते जी भी उसका पालन करती है और मरने पर भी अपने अंक में संभाल लेती है। कुपुत्रो जायेत, क्वचिदपि कुमाता न भवति। हिंदू जीते जी उसकी सेवा और पूजा करता है, मरने के बाद भी उस पर भार नहीं बनता।” तो चुस्ती का स्तर तो वही रहेगा, परंतु आनंद लेने वालों की संख्या में कमी आ जाएगी और माहौल कुछ गरम हो जाएगा, क्योंकि हम एक तरह की चुस्तजबानी को अपने रसबोध का हिस्सा बना चुके हैं। . दूसरा रस भंग करता और कर्कश प्रतीत होता है। भदेस लगता है। ठीक उसी तरह जैसे आइक्नोक्लास्ट, बुतशिकन, मूर्तिभंजक को इस्लामी और ईसाई मूल्य-व्यवस्था आत्मसात करने के कारण यह गिनाना भी चाहें कि किस बुतशिकन ने कितनी प्रतिमाओं का ध्वंस किया तो इसे भी आपराधिक संकीर्णता का प्रमाण मान लिया जाएगा।

लंबे समय तक दबाव में रहने को बाध्य मनुष्य दासता के मूल्यों को अपना लेता है। इस स्वीकार्यता से अपने आप सांस्कृतिक स्वामि-सेवक भाव पैदा हो जाता है। स्वामिमन्य समुदाय की भाषा में दासता से समायोजित मनुष्य के लिए गालियों तक का प्रयोग संप्रेषण के प्रभाव को बढ़ाता है, इसलिए श्लाघ्य नहीं तो सह्य माना जाता है, जब कि दूसरे का यह पूछना तक विद्रोह प्रतीत होता है कि ‘हुजूर आप ने मुझे गाली किस खता के लिए दी?’ तो इसे भी अशिष्टता, यहां तक कि विद्रोह मान लिया जाता है और उसी रूप में उससे निपटा जाता है। सामाजिक स्तरभेद से ‘ऊंची’ जातियों के, अपने से ‘नीची’ जातियों के साथ व्यवहार की भाषा से इसे आसानी से समझा जा सकता है। ठीक ऐसा ही भेद अनेक दूसरे कारणों से पैदा होता या बना रहता है।

जिन समाजों में सामाजिक स्तरभेद, लैंगिक श्रेष्ठता-कनिष्ठता का भाव नहीं है, या सिद्धांततः मान्य नहीं है, भले व्यवहारतः देखा जाता है, वे अपने काे उन समुदायों से ऊंचा मानते हैं जिनमें यह है। जो जातियां शासक रह चुकी हैं या शासक हैं वे खुल कर इसे कहें या न कहें, अपने को शासितों से ऊंचा मानती हैं और शासितों की चेतना में भी यह बोध बना रहता है। कला, विज्ञान, दर्शन, क्रीड़ा, आदि के क्षेत्र में आगे बढ़े और इस बढ़त को बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील क्षेत्र, देश या समुदाय और इन दृष्टियों पिछड़ जाने वाले क्षेत्रों, देशों, समुदायों की चेतना में भी इसे विद्यमान पाया जा सकता है। ये भाव लोकतंत्र-विरोधी हैं और लोकतंत्र के मजबूत होने के साथ कमजोर पड़ते हैं, फिर भी कई अवसरों पर प्रच्छन्न या प्रकट रूप में दिखाई पड़ जाते हैं, इसलिए हमारे सामाजिक संबंधों में एक झिझक या दुराव बना रहता है।

हिंदू और मुस्लिम संबंधों में इसके कई रंग समय समय पर देखने को मिलते हैं और हमारे व्यक्तिगत या सामाजिक आचरण को प्रभावित करते हैं । अपने ही समाज के पिछड़े तबकों के साथ विविध संदर्भों उसके आगे बढ़े तबकों के व्यवहार में इसका चरित्र अलग होता है और पूरे समाज के दूसरे समाज से व्यवहार में अलग। कोई हिंदू या मुसलमान होने के नाते ही किसी का भरोसा नहीं जीत लेता, फिर भी यदि किन्हीं परिस्थितियों हमें किसी व्यक्ति के विषय में और कुछ न पता हो, केवल मजहब का पता हो और चुनाव हमारे हाथ में हो तो नब्बे प्रतिशत मामलों में हमारा निर्णय अपने मजहब, क्षेत्र, जाति, आर्थिक स्तर, आदि के पक्ष में होगा। यह छोटे दायरे से लेकर बड़े दायरे तक, अपने और पराए के जुड़ाव और दुराव के तार मकड़जाल बनाता जाता है, अन्य से सभी स्तरों पर क्रिया प्रतिक्रिया करता है।

प्रचार के साधनों और संगठनों से अस्मिता के सीधे और चक्राकार सूत्रों में से किसी को निर्णायक महत्व देकर इतर सूत्रों से काट कर अलग ही नहीं किया जा सकता है अपितु शत्रुता में बदला जा सकता है। दुनिया के मजदूर एक हैं तो मजदूर को अपने ही देश के विरुद्ध खड़ा किया जा सकता है। मजदूर दल अपने उपनिवेश को मुक्त करने को तैयार हो सकता है। क्रांति का सपना देखने वाला क्रांति में सहायक शत्रु देश के साथ, और अपने देश का शत्रु हो सकता है। अस्पृश्यता का शिकार अपनी धर्म सीमा तोड़ कर दूसरे अस्पृश्यता या इससे मिलती जुलती कुरीतियों का सामना करने वालों को अपना सगा मान सकता है। ये संबंध परख-नली में नहीं चलते इसलिए खिंचाव और तनाव के दूसरे धागे इन निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं। यदि अस्पृश्यता से मुक्त होने का दावा करने वालों में अस्पृश्यता के चलन का प्रमाण मिलता है तो निर्णय बदल जाता है और टकराव और जुड़ाव का रूप बदल जाता है। मनुष्य यंत्र-चालित नहीं है इसलिए ये परिवर्तन सभी में एक समान नहीं होते। अपनत्व के भ्रामक रूप वास्तविक से तरंग न्याय से उठते-गिरते जल-धारा से बंधे, तलहटी के उठान-गिराव से अनुकूलित और वायुवेग से ऊंचाई और दिशा से प्रभावित होते रहते हैं।

हम इनमें से किसी को सही या गलत ठहराना नहीं चाहते। हम केवल यह कहना चाहते हैं कि जनांदोलन अपना काम सही ढंग से नहीं कर पाता है तो अपने लिए समस्याएं ही नहीं खड़ी करता है, अपना जनाधार भी गंवा देता है। मुस्लिम लीग मुसलमानों की पार्टी नहीं थी, वह मुस्लिम अमीरों की पार्टी थी। उसका निकट का संबंध अमीर हिंदुओं की पार्टी हिंदू महासभा से था और इनका अपनापा नवाबों और राजाओं से। ये सभी देश की स्वतंत्रता स्वतंत्रता के विरुद्ध, अंग्रेजी राज्य और सामंती व्यवस्था को बनाए रखने के लिए, काम कर रहे थे। जनवादी दलों द्वारा इसे इस रूप में प्रचारित किया जाना चाहिए था, कि मुसलमानों और हिंदुओं की दासता से मुक्ति के रास्ते में उनके शत्रु हिंदू या मुसलमान नहीं है, गुलामी को स्थाई बनाने वाले हैं। उनके बीच समझौता है, इसलिए मुस्लिम लीग को अपना शत्रु हिंदू महासभा और संघ में कभी दिखाई न दिया। उसका शत्रु वह काग्रेस थी जो दोनों को मिला कर रखना चाहती थी, जिसके सामने समाजवाद का चित्र तो बहुत साफ नहीं, परंतु जिससे जमीदारों, राजाओं, नवाबों और विदेशी शासकों को खतरा था। वे हिंदू, मुसलमान और ईसाई होते हुए भी साथ थे। देश और समाज को तोड़ने को, सांप्रदायिक भावनाएं भड़का कर, संदेह, घृणा और हिंसा का विस्तार करने को अपना हथियार उन्होंने बनाया था। मजदूरों और मजबूरों की पार्टी से अधिक सही समझ उस जनता को थी जिसने 1940 तक न तो मुस्लिम लीग का साथ दिया था, न हिंदू महासभा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का। मजदूरों और मजबूरों की पार्टी ने मजदूरों और मजबूरों का साथ छोड़ कर रईसों की राजनीति करने वाले और देश को बांटने वाले मुस्लिम लीग का साथ दिया।

क्रांति का नारा देने वालों ने भ्रांति के पथ का विस्तार किया और स्वतंत्रता को हिंदुओं के राज की स्थापना के रूप में देखने वालों का साथ देते हुए देश को सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, भौगोलिक और मनोवैज्ञानिक सभी दृष्टियों से खंडित किया। मजदूरों और मजबूरों की पार्टी ने रईसों की पार्टी का साथ क्यों दिया और वैचारिक स्तर पर अशिक्षित जनता से भी पिछड़ी क्यों सिद्ध हुई, इसे उसने तब भी समझने और समझाने का प्रयत्न नहीं किया जब उसने स्वीकार किया कि यह उसकी भूल थी। अपनी भूल समझ में आने के बाद भी उसने अपना रास्ता नहीं बदला। प्रगतिशीलता का नारा लगाने वालों ने नव स्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय पूंजीवादी विकास का विरोध करते हुए एक ओर तो सामन्ती व्यवस्था का साथ दिया और दूसरी ओर भारत के उद्योग धंधों को, रोजगार के अवसरों को नष्ट करते हुए औद्योगिक देश से विश्वपूंजीवाद का बाजार बना दिया और फिर भी इनमें से किसी की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं।

Post – 2018-11-20

मैं यह समझने के लिए कि ब्रिटिश राज में अपना राजनीतिक मत या समर्थन व्यक्त करने के लिए तिलक तक को कठोर दंड दिए गए, सावरकर को अमानवीय यातना दी गई, उन्हीं के लिए ‘बी’ क्लास की सुविधाएं कब और क्यों दी जाने लगी? गूगल से सूचना अटपटी मिली। क्या कोई इस विषय में तथ्य पेश कर सकता है?
पता हो तो जवाब दें, लाइक करके अपनी मिट्टी पलीद न करें।

Post – 2018-11-19

जो कुछ आप को सही लगता है वही दूसरे कहें तो आप आजीवन अपने में सिकुड़े रह जाएंगे। विरोधी विचार ही आत्मविस्तार का अवसर देते हैं।

Post – 2018-11-18

मैं कल क्रोध पर नहीं लिखना चाहता था। इन मनोवेगों पर विषय के अधिकारी लोगों द्वारा इतना लिखा गया है कि उसे देखते मेरा कुछ कहने का प्रयत्न अवांछित और बचकाना दोनो लग सकता है। मैं अपने भय पर और अपने को अच्छा हिन्दू सिद्ध करने के लिए ऐसे किसी व्यक्ति, कार्य, विचार या सुझाव पर प्रचंड रूप धारण करके, गर्हित से गर्हित भाषा का प्रयोग करके उसे अपमानित करने की प्रतियोगिता का नमूना देख कर असहिष्णुता की व्याधि से डरा हुआ था कि यदि देश ऐसे लोगों के हाथ में पड़ जाय तो वे इसकी क्या दशा करेंगे। पूरे हिन्दू समाज को ऐसे ही लोगों का जमघट बता कर इस पर लगातार हमला करने वाले सेकुलरिस्टों से मुझे जितना डर लगता है उससे अधिक डर इस जमात से लगा।

प्रसंग निम्न प्रकार है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी ने फैजाबाद शहर का नाम बदल कर अयोध्या कर दिया, फैजाबाद जिले का नाम अयोध्या हो गया। इलाहाबाद का नाम प्रयाग कर दिया। पुराने नामों को बदलने का लंबा इतिहास है और इसको यदि अपराध माना जाय तो कोई दल इससे मुक्त नहीं माना जाएगा। उन्होंने अयोध्या को पवित्र नगरी बनाने के लिए इसे मांस मदिरा से भी मुक्त कर दिया। इस पर एक व्यक्ति ने यह सुझाया कि मांस मदिरा का सेवन तो भगवान राम और सीता स्वयं भी करते थे। इसके समर्थन में उसने वाल्मीकीय रामायण से प्रमाण दिये थे। बिना किसी प्रसंग के यदि यही लेख लिखा गया होता तो मुझे स्वयं इस पर आपत्ति होती। परन्तु शासन द्वारा एक नगर को मांस मदिरा से मुक्त नगर घोषित किए जाने पर इस लेख को समय की मांग माना जाना चाहिए। उस लेखक ने पूरे लेख में भगवान राम या सीता के लिए किसी अमर्यादित शब्द का प्रयोग नहीं किया था।और उस पर अपनी प्रचंड प्रतिक्रिया में हिन्दुत्व के इन ठेके दारों ने अभद्रता की पराकाष्ठा पर पहुंचते हुए सभी मर्यादाए तोड़ दी थी। जिसे मैं अब तक सामी मानसिकता, असहिष्णुता कहते हुए निन्दनीय मानता रहा हूं उसका इतना निकृष्ट रूप हिन्दुत्व के रक्षकों में मिलेगा यह सोच कर मैं सहम गया था। विचार स्वातंत्र्य हिन्दुत्व का एकमात्र गुण है जिसके कारण
मैं हिन्दुत्व का समर्थन करता हूं, उसे ही नष्ट करने वाले मदिरा मांस का सेवन भले न करते हों वे पवित्रता के नशे में दिन रात बेहोश रहने वाले लोग तो हैं ही। इसी प्रसंह में मुझे क्रोध की आतमविनाशी भूमिका याद आई थी। यदि कोई विचार गलत लगता है तो उसका प्रतिवाद विचार के माध्यम से ही हो सकता है। गालियों का मतलब है आपके पास विचार है ही नहीं। यह भी स्मरण रहे कि वीर रस का स्थायीभाव धैर्य है, क्रोध नहीं।

Post – 2018-11-17

आदमी को क्रोध क्यों आता है
यह बहुत वाहियात सवाल है, कुछ कुछ अध्यात्म का कारोबार करते हुए, अपने वाग्जाल का शिकार होने वालों का दायरा बढ़ाते हुए, अपने को स्वयं संत, महात्मा, यहां तक कि भगवान बनाने वालों और अकूत संपदा का जुगाड़ करके राजनीति से लेकर समाज तक को विकृत करने वालों की कतार में खड़े होने की तैयारी का आभास देने वाला व्यर्थ प्रश्न। व्यर्थ इसलिए कि समझदार लोग जानते हैं कि प्रत्येक क्रोध करने वाला जानता है कि उसे कौन की बातें नापसंद हैं, जिन पर उसे क्रोध आता है। और पहले से इसका ध्यान न रखे तो भी वह समझता है कि उसे किस बात पर और क्यों क्रोध आया था। इस पर किसी तीसरे को प्रवचन करने की जरूरत नहीं।

क्रोध के पक्ष में कुछ दलीलें भी दी जा सकती हैं। यह काम, लोभ, द्वेष, पाखंड की तरह सर्वथा अनैतिक नहीं है। इसका एक नैतिक आधार है। जो गलत है, अन्याय है, असह्य है उस पर क्रोध तो आना ही चाहिए। यहीं से उसे मिटाने का संकल्प पैदा होता है। इसलिए जिसे क्रोध नहीं आता, वह या तो मृतप्राय है, या पाखंडी या पतित। इस नजरिए से क्रोध करना नैतिकता का प्रमाण बन जाता है। इसमें केवल यह जोड़ना शेष रह जाता है कि घृणा के पक्ष में यही तर्क दिया जा सकता है। अहंकार को भी आत्माभिमान कह कर बचाव तैयार किया जा सकता है। विरोधों के बीच करकंगन न्याय- सबसे अधिक निकटता होते हुए भी विरोधी ध्रुवों जैसी अधिकतम दूरी – भी होता है।

क्रोध के विषय में एक मजेदार प्रसंग याद आ गया। गांधी जी से एक व्यक्ति ने अपने क्रोधी स्वभाव की बात स्वीकार करते हुए उससे बचने का उपाय जानना चाहा। उन्होंने पूछा, आप को किस बात पर क्रोध आता है। उन्होंने बताया, लोग कोई काम ठीक करते ही नहीं। गांधी जी का सुझाव था, आप उस काम के लिए उन पर निर्भर न रहें, खुद कर लिया करें। गांधी जी के इस उत्तर से जो लोग असंतुष्ट हों उन्हें दुबारा इस समस्या पर सोचना चाहिए कि आप को क्रोध इसलिए आता है कि लोगों को सही सही काम करना चाहिए, पर आपके पास यह अधिकार होना चाहिए कि आपके पास कुर्सी तोड़ते हुए उसके सही या गलत होने का फैसला करने का अधिकार होना चाहिए। आप स्वयं निकम्मे हैे। काम करने वाले को क्रोध करने के लिए समय ही नहीं मिलता।

गांधी जी एेसा कह सकते थे क्योंकि उन्होंने गीता को अपना जीवनादर्श ही न बनाया था अपितु प्रयोग से उसे जीवन में आत्मसात कर लिया था। गीता एक ऐसे युग की रचना हैे जिसने अपने समय की तकनीकी सीमाओं के भीतर मनोविज्ञान के शिखर को पा लिया था और आज मनोविज्ञान अनेक दृष्टियों से उससे बहुत आगे निकलकर भी कुछ मामलों में उससे पीछे रह गया है।

उसमें जिन कारणों से शिथिल चिंतन मे क्रोध को उचित बताया जाता है उन्हीं कारणों से वर्जित आवेगों सें सबसे खतरनाक बताया गया है, इसकी जड़ों और परिणति को एक श्लोक में समेटा गया है। व्याख्या निम्न प्रकार हैः

क्रोध का कारण यह नहीं है कि गलत हुआ या हो रहा है, अपितु यह कि आप किसी परिणति से अधिक आसक्त होते हैं, चाहते हैं ऐसा किसी कीमत पर हो, पर प्रयत्न की अपेक्षा दूसरों से रखते हैे। इस आसक्ति के कारण आप में सम्मोह अर्थात विवेकहीनता की स्थिति आ जाती है। इससे दिमाग होते हुए भी काम करना बंद कर देता जिससे बुद्धि का नाश हो जाता है और इससे हमारा सर्वनाश हौ जाता है। श्लोक की तलाश करें पर यह न भूलें कि समरभूमि में भी, शत्रुनाश के संकल्प के बाद भी, क्रोध से बचने की सलाह दी जा रही है। आंदोलन में बदहवास इससे कुछ सीख सकते हैे और सीख सकते हैं गांधी के नाम से बिदकने वाले भी। वह अकेला हिंदू रहा है और मारा गया है।
संगात् भवति सम्मोहः, सम्मोहात स्मृतिविभ्रमः।
स्मृति भ्रंशात् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणस्यति।।

Post – 2018-11-16

LIBERATING INDIAN MIND -47
(we resume the old theme which we left due to pressing questions regarding our understanding of Indian Muslims)

Visitors from the East

New Testament begins with the circumstances leading to the birth of Christ. He is not the son of his father but of the God. Divine lineage to establish innate superiority of extraordinary figures has been a recurring theme in Indian literature right from the time of the Rigveda. Even tribal lores show this propensity. Agarias are the sons of Fire god. Angira is son of fire, Vasishtha and Agastya are sons of twine gods Mitra and Varuna, Manu is the son of Vivaswan, the sons of Dasharath including Ram are born out of a Yajna, the sons of Pandu with extraordinary merit and might are not from the biological father but from the Sun, Yama (Dharmaraj), Indra, Wind god, Ashvins etc. This appears to have cast its impact on Greek mythological figures as well as the birth of Christ himself:

“How the birth of Jesus Christ took place.

“His mother Mary was engaged to Joseph, but before they were married, she found out that he was going to have a baby by the Holy Spirit. Joseph was a man who always did what was right but he did not want to disgrace Mary publicly, so he made plans to break the engagement privately. While he was thinking about this, an angel of the Lord appeared to him In a dream and said, ‘Joseph descendant of David, do not be afraid to take Mary to be your wife for it is by the Holy Spirit that she was conceived. She will have a son and you will name him Jesus – because he will save the people from their sins.”

The ugly side of of this story is that in Christianity physical relationship was deemed to be a sin and it was this sin from which the Christ was spared. That is why I consider this birth to be concocted under the influence of a different culture which placed some merit with celibacy and imagined extraordinary birth of personalities depicted super mundane. Both these elements belong to Indian tradition. The one having a long history and the other given Importance in ascetic tradition, appropriated by Buddhism and Jainism as well.

If our guess is correct, Asia Minor should have been the melting pot of Indian thoughts and western ethos, each trying to overcome the other and in the process undergoing formal modifications without losing the essence. The conflict was not only between oriental and occidental, but also between the new strains and the old relics of the east, covering a long period of more than three thousand years, from 2000 BCE onward. Faint traces of those Impacts could be seen running down even to the present among the Kurds who secretly retained some of the features going back to the Vedic times. Recently such tribes had to suffer persecution at the hands of the Turks and others claiming over lordship of the entire Turkistan. It must not be missed that Kurdis, in that semitic surrounding, is an Indo-Aryan speech deformed beyond recognition. We must have some idea of who the Kurds are and how they have suffered, through some objective source:
“The Kurdish people are a heterogeneous ethnic group whose ethnic background comes from many regions including Iraqi Kurdistan, and parts of Iran, Turkey, and Syria. The Kurdish ethnic group includes many ancient ethnicities that have been absorbed into modern cultures including Iranian, Azerbaijani, Turkic and Arabic cultures. In this sense, the Kurdish culture shares commonalities with many other regional cultures, and celebrates a unique level of cultural equality and tolerance.
“In addition to political repression, the Kurds have also experienced cultural repression. In Turkey, Iran, Iraq and Syria, there were extensive campaigns at forced assimilation. Kurds were forbidden to speak Kurdish in public, they had to change their names to local ethnic names if they wanted a job or to enroll their children in school. Their books, music and clothing were considered contraband and they had to hide them in their homes. If authorities searched their homes and found anything Kurdish, they could be imprisoned, and many were. In recent years, both Iran and Turkey have relaxed their systemic cultural repression, while Iraqi Kurds have achieved autonomy.
“language belongs to the Indo-Iranian branch of the Indo-European language family, and was developed between 4,000 and 2,000 years ago.]
“Kurdish dialects are broken into three main groups: Northern Kurdish, Central Kurdish and Southern Kurdish.
Kurmanji: Northern Kurdish
“Northern Kurdish dialects, the most common of which is called Kurmanji, are spoken all over Kurdistan of Turkey, Syria, and in the Soviet Union, as well as in the extreme northern strips of Iranian and Iraqi Kurdistan (in Iraq it is known as “Behdini”). Kurmanji is spoken by slightly less than 3/4 of all Kurds (estimated at more than 15 million people), an estimated 65% of Kurds.[3] Kurmanji spoken in Turkey is written with the Latin alphabet, while Kurmanji spoken in the former Soviet Union is written with the Cyrillic alphabet.
“Speaking Kurmanji Kurdish in public and private was banned in Turkey from the 1920’s until 1991. It was literally illegal to speak the word “Kurd.” Therefore, there are less resources for learning Kurmanji Kurdish (which is more popular in Turkey) than the other Kurdish languages.
“Sorani: Central Kurdish Language
“The Central Kurdish dialect, called Sorani, is spoken by Kurds in parts of Iraq and Iran. Sorani is written with the Arabic script, and borrows the spelling of many words from Arabic, although the pronunciation differs.
“Sorani, while spoken by less than 1/4 of all Kurds, is the dialect with the most well-developed literary tradition in modern times, since an educational system in Sorani Kurdish was allowed to develop, in Iraq for a time, based on the dialect of Sulaymaniyah. Until recently, the use of Kurmanji was officially banned in all but the Soviet Union.” (The Kurdish Project)

We may guess how deep and pervasive was the impact that suffered countless blows and yet tried to retain its intrinsic merits. The mythic accounts are in some situations more reliable if explained properly. Western biases prompted historians to ignore astronomical/astrological achievements of India. But this biblical episode related to birth of Christ tells us that even west Asian sources admitted astronomical advancement of India. It is for us to probe further whether the visitors could be Buddhist missionaries who thronged that area and created a spiritual climate under which Semitic religion had to be revised resulting into emergence of a modified religion, i.e. Christianity, or not?

Post – 2018-11-16

दासता किसी अन्य प्राणी में नहीं, केवल मनुष्यों में पाई जाती है, क्योंकि मनुष्य दूसरे सभी जानवरों से अधिक चालाक होता है। मनुष्यों में जो अधिक चालाक होते हैं, वे अधिक आसानी से गुलाम बनाए जा सकते हैं। बनाए जाते हैं। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह कि अधिक सुख और शक्ति की कामना मे वे स्वयं गुलाम बनने को तैयार, किसी मालिक या गाहक (वह गुनगाहक भी हो सकता है) की तलाश में रहते हैं। यदि वह न हो तो पैदा कर लेते हैं। ऐसे ही लोगों ने ईश्वर का आविष्कार किया और उसके सामने घुटने टेकते रहे। गुलामी के लिए ईश्वर का होना जरूरी नहीं, आप में अपने श्रम के अनुपात में अधिक पाने की आकांक्षा ही काफी है।

Post – 2018-11-14

जिसे हम इश्क कहते हैं पुराना रोग है शायद
जिसे हम हुस्न कहते हैं वो पहचाना नहीं जाता।
यह दुनिया जो बनाई हमने दोजख से ही बेहतर है
यह सच है, पर इसे भी देख लो माना नहीं जाता।
मुसीबत है कि अब भी हम तुम्हीं को प्यार करते है
गनीमत है तुम्हारा बाप अब थाना नहीं जाता।
यह अपनी जिंदगी होती, महज अपनी, तो मर जाते
यह मुश्तर्का है कितनों की, यही जाना नहीं जाता।
मुझे भगवान कह कर, कर दिया बदनाम लोगों ने
वगर्ना भीड़ में मुझको भी पहचाना नहीं जाता ।

Post – 2018-11-14

मैने यह लिंक मीटू के हंगामे के समय जो सन्देह प्रकट किया था उसकी पुष्टि के लिए साझा किया है। मैंने पदीय अधिकार का दुरुपयोग करते हुए महिलाओं का शीलभंग करने वालों की भर्त्सना के बावजूद यह आशंका दुहराई थी कि यह केरल की ननों के साथ पालरियों के घृणित व्यवहार और हत्या से ध्यान हटाने के लिए चलाया गया है और इसमें आपका इस्तेमाल किया जा रहा है। इन अन्यायों के प्रति सर्वाच्च न्यायालय के ईसाई न्यायाधीश तक नरम हैं और ठीक इस समय अपना दुखड़ा गा कर उन हत्यारों के साथ खड़े हो रहे हैं। आंदोलनबाजों के पास अक्ल नहीं होती।