Post – 2017-03-31

हम महान हैं यह कहते ही आप तुच्छ हो जाते हैं. हम महान थे, इसे कहने से अच्छा है हम अपना खाता खोलकर हिसाब सामने रख दें, वही तय करे जब हम वहां थे तो दूसरे कहाँ थे. हम स्वयम न बताएं कि हमने किससे क्या लिया और किसने हमसे क्या पाया, अपितु यह सवाल करें कि जिसे उसने हमें दिया उसे उसने कैसे पैदा किया या किससे पाया और ऐसा ही हिसाब हम स्वयम पेश करें कि हमने उसे कितने लंबे समय में किन चरणों से गुजरते हुए उस पूर्णता तक पहुंचाया जिस पर वे दूसरों तक पहुंचीं, या यदि उन्हें हमने नहीं सिरजा, फिर भी दूसरों को दिया तो उसे हमने किससे पाया था तो इतिहास की असंख्य गुत्थियों का हल निकल आये.

सत्ता के भूखे भाषा के तथ्यों, विचारों का उपयोग ध्वंसक रूप में करते हैं, परंतु वे अपने अस्त्र का प्रभावकारी उपयोग करने के लिए ज्ञान और विज्ञान को नए रूप में परिभाषित भी करते हैं –
जो तुम मानते थे वह विश्वास था,
जो तुम जानते थे वह गलत था,
जो हम कहते है वह सत्य है.
जो इसे नहीं मानता वह या तो पिछड़े दिमाग का है, या देशप्रेम से कातर है या अनभिज्ञ है,
और इन तीनो स्थितियों में से किसी में विश्वसनीय नहीं है इसलिए अंतिम प्रमाण हमारा कथन है.

हम जानते हैं और इसके लिए उनके कृतज्ञ अनुभव करते हैं कि उन्होने जाबाज़ बौद्धिकों का एक ऐसा अखिल यूरोपीय दस्ता तैयार किया जो अपना सर्वस्व लुटाकर भी यूरोपीय वर्चस्व के लिए कुछ भी कर सकता था, और किया भी इस निष्ठां और समर्पण भाव से कि हम उसके सामने नतशिर रह जाते हैं.

इस कर्म में उन्होंने जिस चीज़ को नष्ट किया वह था ज्ञानशास्त्र. इसके कारण उनकी कृतियाँ मनोविकृतियों का दस्तावेज बन गईं. पर गौर करें तो वे अपने जहाज के साथ एक कप्तान की गरिमा के साथ नहीं डूबे, जहाज को डूबने दिया और स्वयम चूहों की तरह अपने को बचाने के लिए उछल कूद मचाते रहे. तुलनात्मक और ऐतिहासिक भाषाविज्ञान पहले विज्ञानं से शास्त्र बना और फिर भी वे अपने को भाषा विज्ञानी के रूप में प्रस्तुत करते रहे जब कि उनकी सारी मसन्यताएँ संदिग्ध करार दे दी गई थीं.

हम जानते हैं कि आरम्भ किसी भी जैव, पार्थिव, या सामाजिक सत्ता का हो वह सूक्ष्म होता है और अपने विकास के क्रम में वह रूपांतरित भी होता है और इतना विराट हो जाता है कि जहाँ हम इसे स्पष्ट देख पाते है वहां भी इस परिवर्तन पर चकित ही रहते हैं. यह लार्वा के तितली बनने की क्रिया हो या बट बीज के महाकार बनने का. एक सूझ के अविष्कार और फिर उनकी शृंखला बनने का क्रम हो या आंदोलन और क्रन्तिकारी परिवर्तन का.

इतने सारे यूरोपीय विद्वानों में से क्या किसी की समझ में यह सच नहीं आया जो इतनी मगजमार किताबें लिख चुके थे फिर भी यूरोप में पहुंची किसी भाषा के कल्पित रूप को होल्डाल बना कर पेश करते रहे और इस सचाई को भूल गए कि कोई आरम्भ सर्व समावेश से नहीं होता, यह उसकी परिणति होती है. वे संस्कृतोपम यूरोपीय भाषाओँ के बीच पूर्व-पर का निरूपण करते और समस्या से भागते रहे और फिर भी हम उन्हें सर चढ़ाये रहे और आज भी चढ़ाये हुए हैं.

Post – 2017-03-31


कभी अकेले मुक्ति न मिलती यदि यह है तो सबके साथ

स्वतन्त्रता पश्चिमी अवधारणा है. इसके मूल में है गुलामी की प्रथा. यह प्रथा भारत में न थी या थी तो इसका रूप भिन्न था. वहां समाज फ़्रीबॉर्न और स्लेव में यूनानी काल से ही बंटा था. हमारे यहां फ़्रीबॉर्न की अवधारणा सम्भव न थी क्योंकि यहां जन्म ही गत जीवन के कर्म के बंधनों के साथ होता है. ऊपर से मनुष्य अपने मनोविकारों के अधीन होता है जिनसे संघर्ष करते हुए वह आत्मविजय प्राप्त करता है और निस्पृह भाव से कर्म करते हुए कर्मफल को भस्म करके मुक्ति/ मोक्ष/ निर्वाण पाने का प्रयत्न करता है.

स्वतंत्रता वस्तु नही है, जिसे एक बार में कोई भी मूल्य देकर पाया और आगे हस्तांतरित किया जा सकता है, और इस दृष्टि से फ़्रीबॉर्न और स्लेव का विभाजन सतही है और है इतिहास की चीज. गुलाम रखनेवाला स्वामी हो सकता है, स्वतंत्रत नहीं. गुलामों को कोड़े लगाने के लिए भी प्रायः गुलाम रखे जाते थे. कोड़े मारने वाला गुलाम विद्रोह की आग जिलाए रखने वाले विवश गुलाम से अधिक गुलाम हुआ करता था और इसी तर्क से उसका स्वामी भी सरकश तो माना जा सकता है स्वतंत्र नहीं.

यह अनवरत जागरूकता की मांग करता है. असाधारण सम्वेदनशीलता और मानवीयता की मांग करता है. जो मनमानी करने को स्वतन्त्रता मानता है वह चेतना के स्तर पर गुलाम है. स्वतन्त्र व्यक्ति नियमों, विधानों, आप्त मर्यादाओं का सम्मान और निर्वाह करता है, उन्हें तोड़ता और बदलता नहीं है. मेरी बात शायद अटपटी लगे इसलिए उस मनीषी के विचार रखता हूँ जिसकी दृष्टि बहुत साफ थी और जिसने एक साथ गुलामों और उनके मालिकों दोनों को स्वतन्त्र बनाने के लिए इतिहास का अनन्य युद्ध लड़ा था.
1- Those who deny freedom to others, deserve it not for themselves.
2- Freedom is the last, best hope of earth.
3- As I would not be a slave, so I would not be a master. This expresses my idea of democracy.
4- In giving freedom to the slave, we assure freedom to the free – honorable alike in what we give, and what we preserve.

किसी व्यक्ति की हैसियत, आर्थिक, पदीय, या बौद्धिक कारणों से जितनी ही ऊँची है कानून का पालन करने की जिम्मेदारी उसकी उतनी ही बढ़ जाती है और नियमों को तोड़ने पर उसे उससे अधिक कठोर दंड मिलना चाहिए जो प्राचीन विधानों में था, परन्तु दण्डनीय आचरण करने वाला व्यक्ति अपने को स्वतंत्र कैसे कह सकता है. जो व्यक्ति झूठ बोलता है, करों की चोरी करता है, मिलावट करता है, कामचोरी करता है, जो किसी भी कारण से डरता हो, सच का सामना न कर सकता है वह स्वतन्त्र नहीं हो सकता.

जैसे जिंदगी में मौत के क्षण होते हैं जिनमे हम समय काट रहे होते हैं जी नही रहे होते – हमारे आलस्य के क्षण, बोरडम के क्षण, चकल्लस के क्षण – वैसे ही स्वतन्त्रता की भौतिक परिस्थितियां सुलभ होने के बाद भी, हम प्रायः विवश और गुलाम की तरह काम करते, सोचते, और जीते हैं.

किसी ऐसे देश में जिसे सैकड़ों साल तक गुलाम या पराधीन बन कर जीना पड़ा हो उसमे हम सब ऐसी शिथिलता के शिकार होते है जिसमे अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ता है. यह संघर्ष किसी बाहरी शक्ति से नहीं अपने आप से करना होता है.

पश्चिमी स्वतंत्रता हो या हमारी आत्मविजय, दोनों कठिन चुनौतियाँ तो है ही जब तक अपने तक या कुछ लोगों तक सीमित रहती हैं तब तक हम यह दावा राजनितिक रूप से स्वतन्त्र देश में भी नहीं कर सकते की हमारा समाज स्वतंत्र है. और ऐसे समाज में कोई अकेला स्वतंत्र होने का प्रयत्न करते हुए भी वयापक स्तर पर उस दैन्य से मुक्ति नहीं पा सकता जो गुलामी का सबसे दुखद तौक है.

व्यक्तिगत स्वतंत्रता सामाजिक चेतना में परिवर्तन के संघर्ष से अनिवार्य रूप से जुडी है. यदि यह है तो सबके साथ. और इसीलिए जब सुधी जनों को गुलामों की तरह सोचते, आचरण करते देखते हैं तो उन्हें टोकने को भी बाध्य होना पड़ता है.
इसका एक ही उपाय है,उन्हें याद दिलाना उत्तिष्ठ, जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत.

Post – 2017-03-30

समझ के फेर से भयो है हेरफेर ऐसो

काशीनाथ विश्वनाथ राजवाडे ने संस्कृत भाषेचा उलगडा या संस्कृत भाषा के रहस्यों का उद्घाटन में अष्टाध्यायी के सूत्रों के विश्लेषण के आधार पर लगभग पन्द्रह हजार पहले प्रचलित एक बोली के लक्षणों का पता लगाया था जो नितान्त अविकसित थी और जिसे उन्होंने रानटी या जंगली भाषा की संज्ञा दी थी। इसके अगले विकास को उन्होंने अतिजुनाट या अत्यन्त प्राचीन भाषा का नाम दिया था, और फिर उसके विकसित रूप को जुनाट या प्राचीन भाषा की संज्ञा दी।

ठीक इतने ही पहले, यूरोप के अनेक भाषाविज्ञानियों ने भारोपीय भाषा के पूर्वरूपों की तलाश करते हुए एक भाषा की कल्पना की जिसे उन्होंने लगभग समस्त भाषा परिवारों की जननी सिद्ध किया और इसे हमारी भाषा या नोस्त्रातिक लैंग्वेज का नाम दिया।

पश्चिमी जगत में विचारों का कारोबार और इसलिए उनका विज्ञापन उसी जोरशोर से होता है जैसे सौख्य प्रसाधनों और दूसरे बिकाउू सामानों का और उनके संचारमाध्यमों में लगभग किसी से पीछे न रह जाने की चिन्ता में उन्हें जल्द से जल्द झपटने की उसी तरह की होड़ मचती है जैसे हमारे संचारमाध्यमों में सनसनी पैदा करने वाली उटपटांग घटनाओं और कथनों की ‘देखिए इसे सबसे पहले हम आपको बता रहे हैं, कहीं जाइयेगा नहीं, ब्रेक के बाद हम फिर लौटते हैं, आपको एक एक पल के डवलपमेंट की खबर हम देंगे’ के चीत्कार के साथ मचती है। हमारे विद्वान इनको झटककर लल्दी से पेश्तर, जितना हाथ लग सकता है, जुटा कर दूसरों से आगे और अद्यतन जानकारी से लैस सिद्ध करने पर जुट जाते हैं और भारतीय भाषाओं में भी उन अपरीक्षित या वाहियात विचारों की पैठ हो जाती है। कुछ समय बाद पता चलता है कि वह कनस्तर का संगीत था जो अब एक मत से बेसुरा मान लिया गया है। मेरे कहने पर यह बात किसी की समझ में नहीं आएगी इसलिए जिनकी बात मानने की आदत पड़ चुकी है उनके शब्दों में ही देखें:

The Nostratic hypothesis has received much attention not only in professional academic circles but in the popular press as well and have been featured in Atlantic Monthly, Nature, Science, Scientific American, US News and World Report, The New York Times and in BBC and PBS television documentaries. Yet, despite all the ink spilt and all the buzz generated by this hypothesis, it remains outside consensus, in the sense that linguists who do not work on this hypothesis rarely accept it.
Jul 6, 2011 by Asya Pereltsvaig

इसके बाद भी हमारा बुद्धिव्यवसायी इस बात पर लज्जित नहीं होता कि जिसे उछाल कर वह सिर चढ़ा था उसके कूडे़दान में फेंक दिये लाने के बाद उसे भी कूड़ेदान में फेंकने के दिन आ गए हैं। वह बातें गढ़ सकता है, विचार पैदा नहीं कर सकता। वह अपने बचाव में कह सकता है कि जब उस विचार के कूड़ेदान में फेंक दिए जाने के बाद पश्चिम उस पर लज्जित नहीं अनुभव करता तो वह लज्जित क्यों अनुभव करे। वह अपनों से उूपर उठने और मालिकों की निगाह में आने के लिए पश्चिम का छायापुरुष बन कर रह गया है । यह गुलामों से भी अधम स्थिति है। गुलाम व्यक्ति परिस्थितिजन्य विवषताओं के कारण होता है, छायापुरुष वह अपनी महत्वाकांक्षाओं के कारण होता है। गुलाम विद्रोह कर सकता है। छायाएं और छायापुरुष विद्रोह नहीं करते। गुलाम अपनी अधोगति पर ग्लानि अनुभव करता है, छायापुरुष गुलामों के लिए भी गर्हित अवस्था में पहुंच कर छायापुरुषता पर अभिमान करता है। भारत जब पराधीन था तो उसमें पष्चिमी दबाव की पहचान भी थी और उसके विरुद्ध विद्रोह भी था। उसके बाद हमने उस दबाव को अनुभव करना और उससे विद्रोह करने का आत्मबल खो दिया और उस दौर से बुरी अवस्था में पहुंच कर उन्हीं मूल्यों, मानों, ओर सरोकारों के वितरक बन गए जिनके विरुद्ध तब विद्रोह किया जाता था। क्या कोई बता सकता है कि हमारी बौद्धिक गुलामी कब और क्यों आरंभ हुई और किनके कारण और उनसे हम कब मुक्ति पाएंगे और कैसे?

कुछ सवालों के जवाब आपको तलाशने होंगे, उनके परिणाम मुझे बताने होंगे जिससे मेरी समझ भी सही हो, पर इसके लिए आप को यह भी समझना होगा कि काशीनाथ विश्वनाथ राजवाडे क्यों उपेक्षित रह गए। उनमें एक स्वतन्त्र व्यक्ति का स्वाभिमान था। उन्होंने अपना लेखन मुख्यतः अपनी मातृभाषा मराठी में किया। उनके बाद पैदा हुए किशोरीदास बाजपेयी जो राजवाडे को नहीं जानते थे, उन्होंने अपने तरीके से संस्कृत की जातक कथा को जिस तरह आदिम से परिष्कृत और मानक के रूप में स्थापित और बोलियों को संस्कृत से भी अधिक प्राचीन सिद्ध किया वह सरकारी भाषाविज्ञानियों के लिए समस्या बनी रही। इन दोनों की ओर दो कारणों से ध्यान नहीं दिया गया। पहला यह कि वे भाषाविकास की प्रक्रिया के मर्मज्ञ थे जिसका पश्चिमी जगत को ज्ञान तो था, पर वह इस पर परदा डाल कर रखता था। दूसरे इस कारण कि इनका काम अपनी भाषाओं में था और हमने अपनी भाषाओं को कभी इतना सम्मान भी नहीं दिया कि उनमें आने वाले किसी नए विचार का अवलोकन तक कर सकें। मुझे भाषा की समस्याओं को समझते पैंतीस चालीस साल हो चुके थे पर राजवाडे जी के काम का परिचय न था।

रामविलास जी के अवदान – भाषा और समाज- का उसके प्रकाशन के तीस साल बाद तक पता न था। रामविलास जी से परिचय अजय तिवारी ने कराया, और राजवाडे से उससे पांच साल बाद स्वर्गीय राजमल बोरा जी ने जो अकाल कवलित हो गएने परिचित कराया। उन्होंने पुस्तक की एक छायाप्रति मुझे सुलभ कराई और मैं अभिभूत हो गया। प्रकाशकों से बात की कि वे उसका हिन्दी अनुवाद प्रकाशित कराएं, विलंब होते देखकर कुछ अधिकारी व्यक्तियों से अनुरोध किया और अन्ततः पुस्तक का अनुवाद सुना एन.बी.टी ने प्रकाशित किया पर इसकी जानकारी मिलने पर जब पुस्तक मेले में उसे प्राप्त करना चाहा तो पता चला वह प्रकाशित तो हुई है, मेले में उसकी प्रतियां नहीं लाई गई हैं। मैं यह नहीं जानता कि इसके अनुवाद और प्रकाशन के पीछे मेरे आग्रह का कितना हाथ था पर उसके प्रकाशन के बाद भी सही विज्ञापन एन.बी.टी द्वारा भी न दिए जाने के पीछे मेरा कोई हाथ नहीं है। हमारे बुद्धिजीवी दासता में सबसे आगे हैं और यह वेदना छलक कर एक समानान्तर पोस्ट के रूप में बाहर आ गई। मैं अपने को लेखक बनाने के लिए नहीं, लिखता, परिस्थितियों के दंश को झेल न पाने और इनसे बाहर आने में आपके सहयोग की आकांक्षा के दबाव में ऐसा करना पड़ता है।

परन्तु पश्चिम के कचरे को भी हमारे यशस्कामी आगें बढ़ कर बटोरते हैं परन्तु उस अनुशासन से जुड़े लोग पाश्चात्य अनुशासन में उसको स्थान मिलने तक संयम से काम लेते हैं इसलिए उन्होंने नोस्त्रातिक की बात तो दूर, तुलनात्मक भाषाविज्ञान को ही दरकिनार कर दिया। यह उनके लिए काजल की कोठरी है। कल हम इन दोनों की आलोचना और मूल्यांकन करेंगे।

Post – 2017-03-30

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गुलामों की तीन किस्में होती हैं. भौतिक पराधीनता जन्य, मानसिक अकर्मण्यता जन्य, आत्मिक या आस्थाजन्य. सभी के कुछ सर्वनिष्ठ लक्षण है : १.आत्मबल का ह्रास, २.श्रम, पहल और विवेक की कमी, ३. अल्प से अधिकतम की सिद्धि का प्रयत्न, ४. तीसरे लक्षण के कारण बेईमानी, छल, विश्वासघात और कमीनेपन का सहारा, और इसे ढकने के लिए दोमुंहापन – सामने कुछ, पीठ पीछे कुछ. ५. आरामतलबी, कामचोरी, हरामखोरी.६. पांचवें की क्षतिपूर्ति के लिए बड़बोलापन, लफ्फाजी, दम्भप्रदर्शन. ७. धैर्य और साहस की कमी और इसकी क्षतिपूर्ति के लिए दुस्साहस के ऐसे कारनामे जिनकी कोई सामान्य व्यक्ति करने की सोच न सके उसे परिणाम की चिंता किये बिना कर गुजरने के कारनामे या अपने मालिक द्वारा इस्तेमाल कर लिए जाने पर अविरोध. ८. अपना भाग्य बदलने की बेचैनी पर इसका फैसला या अधिकार किसी अन्य को – वह राजनीतिक दल हो या धर्मसंस्था या दूसरा कोई संगठन- सौंप कर मुक्ति पाने की प्रवृत्ति.
आप इन श्रेणियों के अनुसार अपना मूल्यांकन यह जानने के लिए करें कि आप कितने स्वतंत्र हैं और कितने ग़ुलाम. चालाकी मूल्यांकन में भी की जा सकती है क्योंकि गुलाम बुद्धिमानी का उपयोग चालाकी के साथ या उसी रूप में करने का आदी होता है.

Post – 2017-03-29

1. यदि तुम किसी गुलाम को यह समझाओ कि तुम गुलाम हो, तो वह तुम्हारी हत्या कर देगा। पहला कारण यह कि तुम ‘सद्भावना की आड़ में’ अपने को आजाद कह रहे हो, उसे गुलाम। निरन्तर अपमान सहते सहते हतचेत और आत्माभिमान शून्य दंभी होने के कारण वह आत्मालोचन करके अपनी स्थिति सुधारने की जगह आपके कथन के पीछे छिपे इरादे तलाश करेगा, और उत्थान की चिन्ता करने की जगह अपने सम्मान की हानि की चिन्ता करेगा, तुम्हारे कथन को एक गाली समझेगा और सोचने और प्रतिवाद करने तक की क्षमता खो चुकने के कारण वह पशुबल का सहारा लेगा और आप अभी जो थे, उसके सक्रिय होते ही वह न रह जाएंगे।

Post – 2017-03-26

कविता को कवि की आपबीती से आगे जाकर मानवीय मेलोड्रामं के रूप में देखें तभी इसका आनन्द लिया जा सकता है:

जवानी के भी दिन कितने बुरे थे
जिसे देखा उसी पर मिट मरे थे
पिटे कब कब न इसका जिक्र छेड़ो
हमारे जख्म कल तक भी हरे थे।

Post – 2017-03-26

वर्चस्व, द्विभाषिता और विलय की समस्या
वे कौन सी परिस्थितियां हो सकती हैं, जिनमें अनेक प्रतिस्पर्धी बोलियों के बीच किसी एक ने, दूसरी बोलियों से अधिक लोकप्रियता प्राप्त कर ली, और इसलिए पहले वह जिनकी बोली नहीं थी, वे भी उसे समझने और सीखने का प्रयत्न करने लगे? आदिम चरण पर जहां सभी बराबरी पर रही होंगी और उनको प्रभावित करने वाली संस्थाओं -राज्य, धर्म, व्यापार – का भी अभाव रहा होगा, किसी एक बोली की प्रधानता का कारण उस समुदाय के किसी मामले में दूसरों से आगे बढ़ जाने के कारण हुआ और इसे एक भाषाविज्ञानी(कोलिन रेन्फ्रू) ने कृषि विद्या में अग्रता माना है। कृषि और स्थायी निवास के मामले में सबसे पहले जिन स्थलों को सबसे पुराना पाया गया था वे सभी पश्चिम एशिया के उस क्षेत्र में पाए जाते हैं जिसे मोटे तौर पर उर्वर अर्धचन्द्र की संज्ञा दी गई। बाद की खोजों से जिन स्थलों का पता चला उनमें भारत के प्राचीन स्थल सामने आए और इसके बाद जैरिज ने यह निष्कर्ष निकाला कि पहला किसान भारतीय था और खेती धान की खेती से आरंभ हुई थी।
धान की खेती में अपनी अग्रता का दावा चीन भी करता रहा है, परन्तु हम उस झगड़े में न पड़ेंगे। हमारे लिए महत्वपूर्ण यह है कि यदि कृषि में अग्रता के कारण उसकी विद्या के साथ भाषा का प्रसार हुआ तो भारोपीय अन्तर्कि्रया के क्षेत्र में यह अग्रता अब भारत के पक्ष में जाती है।
इसके पक्ष में कुछ और बातें हैं जिनको जातीय स्मृति पर आधारित माना जा सकता है। इन्हें हम निम्न रूप में पाते हैंः
1. भारत का यह दावा है कि खेती का आरंभ इसी ने किया, किसी अन्य से ग्रहण नहीं किया, पर साथ ही यह भी स्वीकार किया गया है कि गन्धर्व या गंधार क्षेत्र यव की खेती में अधिक समृ) है। आज गंधार कंधार की याद से जुड़ा है परन्तु पहले यह पश्चिमी पंजाब और उससे आगे का क्षेत्र माना जाता था।
2. कृषिकर्म को याजिकीय शब्दावली में यज्ञ के माना गया है। यज्ञ का अर्थ उत्पादन होता है और इसके अर्थ की व्याप्ति बहुत अधिक है। इसमे प्रजावृद्धि से लेकर सभी प्रकार के उत्पाादन आ जाते हैं । परन्तु जिस यज्ञ सेे असुरों का विरोध था वह कृषिकर्म ही माना जा सकता है ।यज्ञ को स्थापित(संस्थित) करने, और फिर यज्ञ को कुछ और आगे बढ़ाने या(तन्वन), और फिर इसके विस्तार(विष्टार) का आशय हम क्रमशरू स्थायी कृषि, फिर उस क्षेत्र से आगे बढ़ कर नई भूमि को अधिकार में लेना और इसके बाद दूसरों को भी कृषिकर्म में प्रवृत्त होने को प्रेरित करना मानते हैं।
3. यज्ञ को संस्थित करने की समस्या का बहुत विस्तार से और अनेक स्रोतों में अनेक रूपों में जिक्र किया गया है। इसमें असुरों का आहार संचयी या नोट खसोट कर खाने वाला(स्वे स्वे आस्येषु जुह्वतश्चेरुः, शतपथ, 5.1.1.1) और निकम्मा(अकर्मा दस्यु अभि नो ) बताया गया है और सुरों को उत्पादक, दृढ़निश्चयी और उद्यमी। कृषिकर्म को देवों ने आरंभ किया, उन्होंने धरती परन्तु अपनी से बाज न आए। कृषिकर्म के सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण सूचना यह है कि जो वन्य(प्रघास) रूप में उपलब्ध अन्न थे उन्हीं के उत्पादन से खेती का आरंभ हुआ। ये विवरण कृषि के आदिम प्रयोगों के पाच सात हजार साल बाद के हैं इसलिए इनमें व्रीहि और यव को वरुण प्राघास कहा गया है। वरुण का इस सन्दर्भ में आशय यह लगता है कि पहले इन घासों को तैयार होने से पहले नोचने चोथने पर रोक लगी, इसका वारण किया गया, और फिर बाद में स्वयं इनका उत्पादन आरंभ हुआ; काठक सं. 25.4.10)। जिनको इसका लाभ मिला, उन्होंने पाया कि इससे शरीर अधिक पुष्ट और नीरोग होता है – वरुण प्रघास से अनमीव और अकिल्बिष सन्ताने पैदा होने लगी।
4. इस अनमीव या नीरोग और अकिल्बिष या निष्पाप उत्पादन प;ति के कारर्ण इसके प्रसार के अभियान को आर्यव्रत कहा गया जिसके विश्व में प्रचारित करने की कथा भाषा के प्रचार से जुड़ी है । यह ज्ञान इस सदाशयता से इसलिए प्रसारित किया जा रहा था कि यदि हैवानियत में पड़े जनों ने उत्पादन आरंभ कर दिया तो लूट पाट बन्द हो जाएगी और उनका अपना संकट समाप्त हो जाएगा।
5. जिन लोगों ने खेती आरंभ की उनको देव या बरम कहा गया, और वह आदिम भाषा इन देवों के बीच ही प्रचलित थी, इसी क्रम में विकसित हुई और संभवतः दूसरों ने इसे देववाणी नाम दिया। देववाणी इस तर्क से संस्कृत और वैदिक की पूर्ववर्ती भले हो, इन दोनों से अलग थी और इसके भी विकास के कई चरण थे जिसके बाद यह संस्कृत बनी।
6. हमारी जातीय परंपरा में यह सूचना मिलती है कि देवों को अपने नये उपक्रम के कारण विवशता में इधर उधर भागना पड़ा और पश्चिमी परंपरा में जो भी जातीय स्मृति के आधार पर बहुत बाद में लिखी गई, कहा गया है कि पहले आदम देवों के लोक में रहते थे जो फलदार वृक्षों और वनस्पतियों से भरपूर था, जलधाराओं से भरापूरा था और वह वहां से निकाले जाने पर धरती पर उतरे। इसमें अरबों में सुरक्षित परंपरा में आदम गन्दुम खाने के अपराध में वहां से निकाले गए थे, या कहें खेती उनके निष्कासन का कारण बनी थी। पश्चिमी परंपरा में ईदन गार्डन या उल्लास और समृद्धि का उद्यान पूर्व में कहीं था। दोनों परंपराओं में यह अप्रत्याशित साम्य निर्णायक प्रमाण बन जाता है।
7. खेती देवों ने आरंभ की, कृषिकर्म में उनकी भूमिका प्रधान थी इसकी पुष्टि करने वाला एक उल्लेख यह भी है कि इन्द्र पहले जोत के मालिक थे और मरुद्गण कीनाश थे – इन्द्रः आसीत् सीरपतिः शतक्रतु कीनाशः आसन् मरुतः सुदानव । इसमें यह इंगित है कि बहुत प्राचीन अवस्था में भूमि पर अधिकार करने वाला एक स्वामिवर्ग अस्तित्व में आ गया था और उसने कृषिश्रम दूसरों पर लाद दिया था।
अब इन सूचनाओं के आधार पर हम तय कर सकते हैं कि वह आदि क्षेत्र कौन सा था जिसे भारोपीय की आदिम जननी का क्षेत्र माना जा सकता है।
बताया यह गया है कि चारों ओर से दुत्कारे भगाये जाने के बाद देव पूर्वोत्तर की दिशा में पहुंचे और वहां उनको असुरों के उपद्रव का सामना नहीं करना पड़ा इसलिए वहीं उन्होंने यज्ञ को संस्थित किया। इस कारण इस दिशा के दो नाम है। यहां पहुंचने पर असुर देवों को पराजित नहीं कर सके इसलिए इसका नाम अपराजिता दिशा है और इस दिशा में ही उन्हें ऐश्वर्य मिला, इसलिए इसका दूसरा नाम ईशानी है। परन्तु यह तय किये बिना कि इस बात का उल्लेख करने वाली कृतियां कहां रची गई हैं, उससे पूर्वोत्तर की दिशा और स्थान का निश्चय नहीं किया जा सकता।
यहां पहुंच कर भाषाविज्ञान की अपनी भूमिका आती है। सबसे पहले ग्रियर्सन ने इस बात को लक्ष्य किया था कि पूरबी हिन्दी में भारोपीय की प्राचीनतम ध्वनि घोष महाप्राण सर्वाधिक सुरक्षित हैं। सुनीति बाबू ने इसको दुहराते हुए इस पर आश्चर्य जताया था कि यह हुआ कैसे हो सकता है। कारण, वह स्वयं भी आर्यों के बाहर से आने के मत से सहमत थे। ऐसी स्थिति में पंजाब से होकर पूर्वोत्तर भारत आनेवालों की बोली की ध्वनिमाला में यह ध्वनि कहां से आ गई जब कि पंजाबी में यह पाई नहीं जाती। रामविलास जी ने आगरा इंस्टीट्यूट में उपलब्ध सामग्री के आधार पर इसका विशद तुलनात्मक अध्ययन सभी भारतीय भाषाओं को लेकर किया था और यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया था कि इस क्षेत्र से उत्तर दक्षिण, पूरब पश्चिम किसी भी दिशा में बढ़ें तो ये ध्वनियां या तो क्षीण पड़ती जाती हैं, या लुप्त मिलती हैं।
पूरबी हिन्दी उसी क्षेत्र की भाषा को संज्ञा दी गई थी जिसे भोजपुरी कहते हैं। सुनीति बाबू ने बहुत पहले हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा होने का बहुत तर्कपूर्ण समर्थन किया था, परन्तु उनके इस सुझाव के कारण कि यदि इसकी लिपि रोमन कर दी जाय तो इसकी सर्वग्राह्यता बढ़ जाएगी और भोजपुरी को हिन्दी की बोलीध्भाषा कहने पर हिन्दी क्षेत्र के हिन्दी प्रेमियों ने उन्हें अपनी नजर से उतार दिया था। इससे उनका चित्त भी खिन्न हुआ था। आज फिर जब भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में जगह देने की मांग राजनीतिज्ञों द्वारा की जाने लगी है तो यह विवाद के केन्द्र में आ गई है।
हम पीछे ऐशानी दिशा के जिस कोने में कृषि के निर्बाध चल पाने और उससे अर्जित संगठित बल के बाद उसके कुछ आगे बढ़ने की बात कर रहे थे वह नारायणी के किनारे का वह क्षेत्र प्रतीत होता है जिसका संबंध बाल्मीकि से भी जोड़ा जाता है। मेरे पास एंसा सोचने का दो आधार है। एक तो यह कि और शालिग्राम की बटिया जो शिव और विष्णु दोनों की प्रतीक मानी जाती है, वह दक्षिण भारत तक इसी क्षेत्र की होती है।
धान की भूसी अलग करने का तरीका यह था कि छिल्के को नाखून से(नखैर्निर्भिद्य) अलगकिया जाता था और बाद में किसी शिला पर नही की धारा में घिस कर सुडौल हुए पत्थर से हल्के दबाव के साथ अलग किया जाता था और नीले पत्थर की बटिया इस दृष्टि से अधिक उपयोगी मानी जानी रही लगती है। पुराने उपयोगी साधनों को बाद में पूजा जाने लगा । यही शालिग्राम की पूजा का तार्किक आधार लगता है। बटिकाश्म होने के कारण इसका शिव के रूप में और नारायणी की धारा से उपलब्ध होने के कारण नारायण के रूप में इसकी पूजा होने लगी होगी । भुने हुए धान को दल कर उसका खीला अलग करके उस चूर्ण को ही पहले सत्तू के रूप में खाया जाता था जिससे सत्तू की पुरानी संज्ञा शालिचूर्ण का संबन्ध है।
यदि हमारा अनुमान सही है तो हम समझ सकते हैं कि कभी कभी सांस्कृतिक प्रतीकों का इतिहास भी बहुत दीर्घ होता है और भाषा को समझने में इनकी भी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
देववाणी
देववाणी को सामान्यतः संस्कृत का पर्याय मान लिया जाता है और इसकी मनोरंजक व्याख्याएं की जाती हैं। इनमें से एक यह कि संस्कृत भाषा में स्तुतियाँ हैं इसलिए इसका यह नाम पड़ा। एक कल्पना यह भी हो सकती है कि यह सृष्टि के पहले से विद्यमान है, परम पुरुष ने वेदों के ज्ञान के बल पर ही सृष्टि की अतः इसका यह नाम पड़ा। इस के आधार पर भाषाविज्ञानी एमेनो(Emeneau½) ने आर्यों के भारत पर आक्रमण का साबुत भी तैयार कर लिया। इसे उनके ही शब्दों में पढ़ें%
There seems to be no reason to distrust the arguments for it, in spite of the traditional Hindu ignorance of any such invasion, their doctrine that Sanskrit is the language of gods, and the somewhat schauvinistic clinging to the old tradition even to day by some Indian scholars. Sanskrit, “the language of the gods,” I shall therefore assume to have been a language brought from the Near East or the western world by the nomadic bands. Language and linguistic Area : Essays by Murray B. Emeneau, Selection and Introduction by Anwar S. Dill. Standard University press 1980, p.85
इस तरह के अर्थ करने वाले सभी लोग प्राचीन साहित्य के पंडित रहे हैं। उन्होंने उन कृतियों को भी पढ़ा होगा जिनमे इन बातों का बहुत निर्णायक स्वर में उल्लेख है किः
1. कृषि का आरम्भ देवों ने किया(अन्नं वै कृषिः, एतद्वै देवाः संस्करिष्यन्तः, शतपथ ब्रा.7.2.2.7 (इन्द्रः आसीत् सीरपतिः शतक्रतु, कीनाश% आसन् मरुतः सुदानव, तंः आसन् मरुतः सुदादव, तैत्तिरीय, 2.4.8.7) असुर उनके उपजाए धान्यों को नोचते, चुराते रहे(ये वनेषु मलिम्लवरू स्तेनास्तस्करा वनेः …)
2. देव और असुर इसी लोक में थे(देवा वा असुर अस्मिन्नेव लोकेषु आसन्)
3. देव संख्या में कम थे असुर बहुत अधिक थे (कनियसा इव हि देवा ज्यायसो असुराः, शतपथ ब्रा. 14.4.1.1)
4. ये दोनों एक ही प्रजापति की संतानें थे, (देवाश्च असुराश्च उभये प्रजापत्याः, शतपथ ब्रा. 1.2.4.8; 1.2.5.1 )।
5. दोनों के बीच घोर प्रतिस्पर्धा थी, वह स्पर्धा इसी धरती पर चलती रही(देवाश्च असुराश्च अस्मिन् लोके आसन्, काठक सं., 11.4.9; देवासुरा वा एषु लोकेषु समयतन्त, ऐतरेय, 22.6 )।
6. देव पहले आदमी थे(मत्र्या ह वा अग्रे देवा आसुः, शतपथ ब्रा. 11.2.3.6)।
7. देवों ने असुरों को पराजित कर दिया। उन्हें यह विजय शस्त्र के बल पर नहीं मिली , अपितु शाकमेध(कृषिकर्म) से मिली ।
8. बहुत पहले देव और मनुष्य साथ साथ रहते थे(उभये ह वा इदमग्रे सहासुर्देवाष्च मनुष्याष्च, शतपथ ब्रा. 6.8.1.4)।
9. जो पहले पैदा हुए वे देव थे; जो बाद में पैदा हुए वे मनुष्य कहे गए(प्राचीनजनना वै देवाः प्रतीचीन जनना मनुष्याः, शतपथ ब्रा. 7.4.2.40)।
8. बाद में देव कृषि उत्पाद पर अपना अधिकार कायम रखते हुए कृषि के श्रमभार से मुक्त हो गए। कारण यह लगता है की असुरों में से कुछ ने किन्ही विवशताओं में स्वयम भी खेती में काम करने का चुनाव किया। जिस क्षुधा निवारण के लिए देवोँ ने खेती आरम्भ की थी वह असुरों में प्रविष्ट हो गई(क्षुधं प्राहिण्वन् तां देवाः प्रतिश्रुत्यैः ओदनमपचन त्सा देवेषु लोकमवित्ता पुनरसुरान् प्राविशत, ततो देवाभवन…)
9. पहले जो काम वे करते थे अब मनुष्य करते हैं।(यथा देवानां चरणं तद्वा अनु मनुष्याणाम्, 1.3.1.1)उन्होंने जो जो जिस तरह किया था उसी तरह मनुष्य करने लगे।(देव विषाम वै कल्पमानाम मनुष्य विशाम अनुकल्पते) ।
10. इसमें बहुत लंबा समय लगा। युगों का अंतर है । देवयुग के बाद मनुष्य का युग आया। मनुष्य युग देवयुग से अधिक प्रबु) था(विप्रासो मानुषा युगा ),
11. जिन्होंने पहल की अर्थात जो पहले पैदा हुए वे देव थे और जिन्होंने उनके अनुकरण में कृषि को अपनाया, अर्थात जो जो बाद में आये वे मनुष्य हैं।(देवाश्च वा असुराश्च समवदेव यज्ञ अकुर्वत यदेव देवा अकुर्वत तदेव असुर अकुर्वत)।
12. देव युग में बकरा और गधा ही पालतू बनाये जा सके थे, मानव युग में गोपालन आरम्भ हुआ इसलिए देव जिस घृत का सेवन करते थे वह अजा से प्राप्त होता था और आज्य था मानव गव्य का प्रयोग करते हैं /आज्यं देवानां सुरभिः, ऐतरेय ब्रा. 1.3/; एतद्वै जुष्टं देवानां यदाज्यम्, शतपथ ब्रा. 1.7.2.10।
13. परन्तु वास्तविक स्वामी देव हैं इसलिए देवों का हिस्सा उनके पास पहुंचा देने के बाद ही मनुष्य कृषि उत्पाद का सेवन कर सकता है।
14. देवयुग सतयुग अर्थात आहार अन्वेषण और आखेट की अवस्था से आगे था परंतु मानुष युग से पीछे था। इसका भूमि को जोतने या खंरोच लगाने का औजार अर या अल जिससे आर्य और आरी और अरि तीनो शब्द निकले है एक नुकीला डण्डा था। फिर यह तलवार नुमा डण्डे में बदला जिसे स्फ्य की संज्ञा दी गई और लगता है उनकी अंतिम पहुँच सींग तक हो पाई थी(विषाणया भूमिं उपहन्ति उपकृषे )।
हम यह निवेदन करना चाहते हैं की अपने विकास के स्तर के अनुरूप ही रानटी या जंगली तो नहीं परन्तु उससे कुछ ही आगे बढ़ी देववाणी थी जिसका विकास कई चरणों के बाद संस्कृत में हुआ। भाषा और समाज का परस्पर और अपने इतिहास से क्या रिश्ता है इसे समझने में इससे कुछ मदद मिल सके तो मेरा लिखना सार्थक है।

Post – 2017-03-26

भाषा, इतिहास और भारतीय चिन्तन

इतिहास की पहुंच लेखन के आविष्कार की अवस्थाओं तक है, पुरातत्व प्रकृति के साथ मनुष्य के प्रभावकारी हस्तक्षेप से पहले नहीं जाता, परन्तु भाषा की पहुंच मानवजाति की उस आदिम अवस्था तक है जब मनुष्य अपनी रीढ़ सीधी कर रहा था। अतः भाषा हमारे अतीत के अन्वेषण को जिस प्राचीनता तक पहुंचा सकती है, वहां तक भूगर्भविज्ञान की पहुंच तो मानी जा सकती है, साहित्य और पुरातत्व की नहीं।
भाषा-पुरातत्व की सबसे अधिक भारत में है और इसकी सही समझ भारत की बोलियों और वैदिक की जानकारी के बिना असंभव है। भारत की लगभग सभी भाषाओं और बोलियों के निर्माण में, किसी न किसी अनुपात में, सभी का योगदान है। यह तथ्य हमारी सामाजिकता और जातीयता की निर्माण प्रक्रिया को समझने में तो सहायक है ही, इतिहास और नृतत्व की दूसरी समस्याओं को समझने में भी सहायक है।
इतिहास की जो सबसे बड़ी समस्या इंडोयूरोपियन को लेकर खड़ी की गई और उसके नकली पूर्वरूपों की कल्पना की गई उसे भी हम भारतीय भाषाई परिवेष में ही हल कर सकते हैं। यहां हम इसको घुटनों चलतेे, बढ़ते, जवान और प्रौढ़ होते देख सकते है जिसके बाद मानक संचार भाषा बनती है, और फिर विषेष परिस्थितियों में उसका प्रसार पूरे भारोपीय क्षेत्र में होता है।
अन्यत्र इसके प्रभुत्व के कारण उन देशों और क्षेत्रों की भाषाएं दब कर रह गई। अधिक सही यह कहना होगा कि उनकी स्थानीय भाषाओं/बोलियों के प्रभाव से ही उस संचार भाषा के इतने भिन्न रूप हो गए कि एक की विचित्रता को ठीक उसकी पड़ोस की भाषा की सहायता से नहीं समझ सकते पर संस्कृत के सहारे समझ सकते हैं।
यह नियम भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर की भाषाओं पर ही लागू नहीं होता, भारत में भी हम आधुनिक और मध्यकालीन भाषाओं की भिन्नताओं को इसी नियम से समझ सकते हैं। परन्तु भारत में जहां हम आधुनिक भाषाओं और बोलियों की विषेषताओं को समझ कर संस्कृत की निर्माण प्रक्रिया को समझ सकते हैं, वहां भारत से बाहर की कोई भाषा इसमें मददगार नहीं सि) होती। इसका कारण यह है कि वहां यह भाषा परिपक्व चरण के बाद पहुंची थी। पहुंचने के दो रास्तों के कारण उनमें कुछ अन्तर अवष्य है जिसे सतेम और केंटुम के रूप में चिन्हित किया गया था। कुछ मामलों में उनमें किसी में भी कुछ ऐसे प्राचीन लक्षण या प्रयोग पाए जा सकते हैं, जो संस्कृत में नहीं मिलते पर भारतीय बोलियों से उनकी पुष्टि होती है। और रोचक बात यह कि ये तत्व तथाकथित आर्यभाषा के नहीं हैं। आस्त्रिक और द्रविड़ के हैं। अतः जिन लोगों के माध्यम से उस भाषा का युरोप तक प्रसार हुआ था उसमें अपने निजी दायरे में दूसरी बोलियां बोलने वाले भी थे।
इसके रहस्य का उद्घाटन करने की तैयारी और योग्यता मुझमें नहीं है, फिर भी एक उदाहरण से मैं अपनी आषंका को प्रकट करना चाहूंगा। तमिल ओन्र का मतलब है सबसे छोटी संख्या। यह उस अवस्था की कल्पना है जब शून्य की कल्पना न हुई थी, इसलिए इसके दो अर्थ थे, एक तो सबसे छोटी संख्या और दूसरे कम । यह स्वयं ओम से कोई संबंध रखती है या नहीं यह भी अनुसंधान का विषय है। परन्तु कम के आषय में ऊन का प्रयोग और इसकी ओन्र से निकटता उलझन पैदा करती है। कंबन रामायण में ओन्रे ओन्नुम ओन्मैयान – वह एक है, एक मात्र है और एकमय है में ओन्र और ओं की अवधारणा में निकटता प्रकट करता है। सं. ओं – सबसे छोटा ;आदि रूप)ए ऊन – कम, और यूरोपीय भाषाओं मे यूनस ;यूनिट, यूनियन, यूनाइट)भी बचा रहा और उसका वह रूप भी जो द्रविड़ में बनता है अर्थात् वन।

ऋग्वेद, संस्कृत, बोलियां और आधुनिक भाषाएं
यह विचित्र लगेगा कि ऋग्वेदिक भाषा संस्कृत की तुलना में भारतीय बोलियों के अधिक समीप है और आधुनिक भाषाएं अपनी बोलियों की तुलना में संस्कृत के अधिक निकट हैं। यही त्रासदी पालि और प्राकृत के साथ भी घटित हुई थी। वे महिमा और स्वीकार्यता की तलाष में संस्कृतमय होती हुई सामान्य व्यवहार से विदा हो गईं।
इतिहास की वे समस्यायें जो भाषावैज्ञानिक आधार पर खड़ी की गईं और जिनको अपने अनुकूल परिणाम के लिए भाषाविज्ञान को ही तोड़ मरोड़ कर उसके सांस्कृतिक सारतत्व को नष्ट कर दिया गया । उन्हें भारतीय भाषासंपदा के सही विवेचन और उस पूर्ववर्ती अवस्था की खोज से ही दूर किया जा सकता है जिसकी ओर अभी तक किसी का ध्यान इसलिए नहीं गया कि हमने नए विचार और अनुसंधान के काम को पाश्चात्य जगत पर छोड़ दिया है। उनसे अनमेल पड़ने वाली या उनके द्वारा उपेक्षित दिशाओं में काम करने को न अपने वश का मानते हैं, न जरूरी समझते है। इसे बदल कर कहें तो पहल के मामले ने पश्चिम ने पहले उपनिवेष रह चुके देशों मे अधिक सक्रियता इस इरादे से दिखाई है कि वह इनको अपनी दबोच से बाहर न निकलने दे।

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भाषा का मूलाधार
भाषा श्रुत ध्वनियों का उच्चारण है। जो सुन नहीं पाते, वे बोल नहीं पाते। इसका आरंभ अपने परिवेश की ध्वनियों से हुआ। जिस वस्तु या क्रिया से कोई ध्वनि उत्पन्न होती है, वही उसकी संज्ञा हो गई । इसे बहुत पहले यास्क के भी पूर्ववर्ती उपमन्यु ने सुझाया था । सभी विद्वान मानते हैं कि हमारी भाषाओं के बहुत से शब्द अनुनादी हैं । जिस प्राणी या वस्तु से जो ध्वनि निकली वही, या उसे जिस रूप में हमारी श्रवणेन्द्रियों द्वारा ग्रहण किया गया उसका उच्चारण ही उसकी संज्ञा हो गई।
सवाल वहां पैदा हुआ जब उनका सामना वस्तुजगत और भावजगत की ऐसी सत्ताओं से हुआ जिनसे स्वतः कोई ध्वनि पैदा होती ही नहीं। एक और कठिनाई यह कि इस तरह तो हमें केवल कुछ संज्ञाएं और क्रियायें ही मिल सकती थीं। भाषा का इतना जटिल ढांचा तो तैयार हो ही नहीं सकता था। इसलिए उन्होंने हार कर मान लिया हमारी भाषा के केवल कुछ शब्द ही अनुनादी हैं, शेष भाषा की उत्पत्ति रहस्यमय है।
हम पाते हैं कि कुछ शब्दों और क्रियाओं का ही नहीं समूची भाषा का विकास प्रकृति में उपलब्ध ध्वनियों से हुआ है। नाद के प्रथम चरण पर वस्तु-क्रिया-ध्वनि का संबंध पारदर्षी रहता है, उस ध्वनि का आर्थी और रूपगत विकास उससे सीधे नहीं जुड़ पाता। पत् पत्ते के गिरने की ध्वनि है और इससे पत्ते को यह संज्ञा मिली हो सकती है। पर वह क्रिया, अर्थात् पतन, पातक से न ध्वनि निकलेगी न उसका अनुनादी संबंध दिखाई देगा। यह दूरी पत्तल, पटल, पाटल, पट, पाट, पात्र, पाटरी के साथ अदृष्य होती चली जाएगी। यह पहचान भारत में हो सकती है जहां, पत् की ध्वनि और यह शब्दषृंखला जीवित है, अंग्रेजी या यूरोप की भाषाओं में इस माला के एक दो मनके, जैसे पेटल, पाटरी, मिल जाएंगे जिनका ध्वनि से संबंध न जोड़ा जा सकेगा। इसी तरह पद् पांव रखने से उत्पन्न ध्वनि से जुड़ी शब्द षृंखला को लें – पद, पदाति, पथ, पथ्या, पाथेय, पादप, पदाति, पथ्य, पद- कविता का चरण, पद्य आदि में पारदर्षिता मिलेगी। यूरोपीय संन्दर्भ में, मिसाल के लिए अंग्रेजी में फुट, पेडेस्ट्रियन, पेडिल, में इसका क्षीण आभास मिलेगा। इनके संबंध को अनुनादी मूल से हट कर ध्वनिनियमों से समझने की विवषता पैदा होगी, जब कि ऐसा कोई नियम होता ही नहीं, प्रवृत्तियां होती हैं और इनका तर्क भी अनुनादी स्रोत को समझने के बाद ही स्पष्ट हो सकता है।
भाषा अव्यक्त को व्यक्त करने का काम करती है और अनुपस्थित को उपस्थित करने, अघटित को अपने माध्यम से घटित कराने की क्षमता रखती है और इस तरह यह एक समानान्तर सृष्टि है।
भारतीय चिन्तन में जल से ही समग्र सृष्टि हुई वही क्षर और अक्षर है और उसी वाणी की उत्पत्ति हुई । ऋग्वेद के भाषाचिन्तक ने सबसे पहले इसे अनुभव किया था। इसमें महाशक्तिशाली वाणी, वागम्भृणी, कहती है कि इस द्यौस् पितर अर्थात् समस्त ब्रह्मांड को मैंने जना है, मेरी योनि या मेरी उत्पत्ति स्थान समुद्र के गर्भ में, पानी में है, अहं सुवे पितरं अस्य मूर्धनि, मम योनिः अप्सु अन्तः समुद्रे । वाणी की उत्पत्ति जल की विविध ध्वनियों से। इसकी एक विचित्र व्याख्या ऐतरेय ब्राह्मण में हैः वाग्वै समुद्रो न वै वाग्क्षीयते न समुद्रः क्षीयते ;ऐत. 1.23)। यह वाणी की अनन्तता का स्वीकार तो है ।

जल के नाद अर्थविस्तार और भाषा
जल से प्रकाष, अंधकार, ज्ञान, अज्ञान, पवित्रता और मलिनता, गति और स्थिति, तुच्छ और महत, खाद्य, पेय और इन्द्रिय ग्राह्य, सभी अनाजो, सभी आर्द्र पदार्थों, सभी जलभंडारों या धाराओं, पत्थर से लेकर जल तक की स्थितियों, गोपन और उदघाटन, धन के सभी रूपों, कामनाओं और वर्जनाओं के लिए शब्द निकले हैं। मोटे तौर पर कह सकते हैं, जिस भी उपादान, गुण, धर्म, क्रिया या सत्ता से स्वतः ध्वनि नहीं पैदा होती उनको अपनी संज्ञा जल के किसी पर्याय से मिली है और ये पर्याय जल से उत्पन्न अनन्त ध्वनियों से संबंधित हैं। मुझे बहुत संक्षेप में आपको अपनी बात समझाने में दिक्कत होगी, क्योंकि इसके लिए आप स्वयं पूरी तरह तैयार न होंगे। यह सोच ही आपको कुछ अटपटी लग सकती है। फिर भी एक दो उदाहरणों से अपनी बात स्पष्ट करने का प्रयत्न करूंगा।
पर्/प्र, पल्/प्ल का अर्थ पानी है। प्र-वण, प्लवन आदि से यह बात समझ में आ सकती है। परु/परि गांठ, आवर्त, पर्व – गांठ, पर्वत का एक अर्थ बादल है तो दूसरा पहाड़। यह प्र आगे, अधिक या विषेष को व्यजित करने वाला उपसर्ग बनता है, परं/परम – सर्वाधिक को ध्यक्त करने वाला उपसर्ग बनता है और इसी तरह परि सबको समाहित करने का आषय प्रकट करने वाला उपसर्ग बनता है। उपसर्गों के बारे में कहा जाता रहा है कि ये किन्ही शब्दों के घिसे हुए रूप हैं। हम पाते हैं, ये पूरे शब्द हैं और जल की ध्वनियों पर निर्भर हैं। अब इसी तरह दूसरे उपसर्गों की जांच की जा सकती है।
जल से प्रकाश का संबंध इस नाते जुड़ता है कि जल आदि दर्पण है। इस पर सभी रंग, रूप, लाल, नीली, पीला, हरा, काला सभी दिखाई देते हैं, और प्रकाश भी फूटता है। इसकी कोई न कोई संज्ञा सभी रंगों की द्योतक है। यही वह तर्क है जिसमें अक्तु का अंधकार, आवृत या रात तक अर्थ हो सकता है और ज्योति या प्रकाश भी। अग्नि के संबंध में ऋग्वेद में कहा गया है, इसका जन्म पानी से हुआ, समुद्रो अस्य योनिः । अद्भ्यो वा एष ;अग्निः) प्रथमाजगाम्, शतपथ ब्रा. 6.7.4.4 । बिजली पानी की ज्योति है: विद्युद्वा अपां ज्योतिः, शतपथ ब्रा. 7.5.2.49 ! अब हम किसी भी रंग को लें, उसके साथ एक जलवाची शब्द याद आ जाएगा। ज्वल के साथ जल का, लाल के साथ लाला का, नील के साथ नीर का, पीत के साथ पीतु का, हरित के साथ हरि का, अरुण/अरुष के साथ अर/अल/अरु का, इत्यादि।

भारतीय भाषाओं का अन्तर्गुफन
हम आग के लिए तमिल में परिरक्षित ‘ती’ और उसी में प्रयुक्त ‘ती’ अर्थात पानी, मीठापानी को लें। वह ती जिसका अर्थ आग भी है और मीठा पानी भी वह तमिल में वैदिक और संस्कृत की अपेक्षा अधिक सुरक्षित है। जैसे रस सरस या मीठा के लिए प्रयोग में आता है, उसी तरह ती भी मीठे पानी के लिए प्रयोग में आने लगा। यह तेलुगु में तिय्यन – मीठा या स्वादिष्ट का जनक है और भोजपुरी के तिउना/तेवना या वह स्वादिष्ट पदार्थ जिसके सहारे रूखे सूखे भोजन को गले के नीचे उतारा जा सके। अंग्रेजी में कैचअप जिस आशय में प्रयोग में आता है और हमारी अपनी भाषा में जिसको चटनी कहा जाता रहा है।
हम मान सकते थे कि ती – आग सं. दी का तमिल ध्वनिसीमा में ग्रहण है। संस्कृत में दी प्रकाश ज्ञान आदि के आशय में प्रयुक्त तो होता है, पर आग के अर्थ में मात्र व्यंजित होता है, दीपक, दीपन, देवन और परिदेवन या पश्चात्ताप के आशय में ती पहली नजर में दिखाई ही नहीं देता। पर तभी पता चलता है दिवस के साथ तिथि भी है। दाहकता के आशय में तेज भी है। जलन अनुभव करने के लिए तिलमिलाना भी है। कहने को कह सकते हैं कि आग के लिए संस्कृत में अग्नि है इसलिए यह मूलतः द्रविड़ शब्द हो सकता है, पर तभी तमिल नेरुप्पु – आग की याद आ जाती है जिससे यह उसका भी मूल शब्द नहीं रह जाता। पर किसी एक किसी वस्तु के लिए किसी शब्द को एकमात्र शब्द मान
हमने ‘ती’ ध्वनि के ‘दी’ , ‘धी’ में बदलते और यूरोपीय संदर्भ में ‘दी’ , ‘जी’ , ‘थी ‘ में बदलते देखा वह मूलतः किस भाषा का शब्द था जिसे दूसरों ने अपनाया यह तय करना भी आसान नहीं है। जिस तरह अघोष अल्पप्राण और अनुनासिक ध्वनियों वाला समुदाय है जिसमें घोष और महाप्राण ध्वनियां नहीं मिलतीं, उसी तरह संभवतः घोषमहाप्राण प्रेमी समुदाय में अघोष अल्पप्राण ध्वनियां न रही हों, इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। कहे ध्वनिमाला का निर्माण सामाजिक निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा है और यह इस बात का प्रमाण है कि रेस या नस्ल जैसी किसी चीज की भारत में कल्पना भी नहीं की जा सकती। शूद्र और ब्राह्मण में इस मामले में कोई फर्क नहीं किया जा सकता। अब हम पाते हैं कि बोलियों में मिलने वाले रूप दीखना, दीठि, दिठौना सं. दृष्यते, दृष्टि आदि के तद्भव नहीं रह जाते, ये मूल शब्द आषय और ध्वनिप्रकृति के अव्याहत प्रवाह को प्रकट करते हैं।
अब हम उस तीसरे भाषाई समूह को लें जिसका संस्कृत पर कम परन्तु बोलियों पर काफी प्रभाव पडा। यह वह समुदाय है जो दन्त्य ध्वनियों का मूर्धन्य उच्चारण करता था। उसने ठीक उन्हीं अर्थों में जिन शब्दों के तकार का टकारयुक्त उच्चारण किया वे तो बचे न रहे, क्योंकि प्रतिस्पर्धा में दो में से एक का ही ठहरना संभव था परन्तु जो नई व्यंजनाएं टकार के साथ आईं और जिनमें भी ताप, ज्ञान, प्रकाश आदि का भाव था उन पर दृष्टि डाली जा सकती है।
ये हैं टीक/स-टीक/ ठीक, टीका, टिकुली, टिकिया, टिकोरा, टिकठी, टीकुर – सूखी भूमि, जलमग्न क्षेत्र के आगे का भाग, टिकरी, टिमटिमाना, टिप्पणी, संभव है अंग्रेजी कम टिक के अनेक अर्थो में एक का स्रोत ठीक से हो, टिकरी – तवे की जगह सीधे आग पर सेंकी जाने वाली रोटी, भोज। टेम- दिए की लौ ।
इस तरह हम पाते हैं कि भारतीय भाषा परिधि में चार प्रभावशाली समुदाय बहुत प्राचीन काल से सक्रिय दिखाई देते हैं, एक जिसमें घोष महाप्राण का अभाव था, दूसरा, जिसमें इसके प्रति विशेष अनुराग था और तीसरा जिसके प्रभाव से मूर्धन्य ध्वनियों का प्रवेश हुआ और एक चैथा जो तालव्य ध्वनियों के प्रति विशेष रुझान रखता था। जिसके प्रभाव से चित, चित्र, चिता, चिति, चैत्य, चिंता, चिन, चिनचिनाना, चिनार, चिन्ह, आदि, का जनन हुआ।

Post – 2017-03-26

कविता को कवि की आपबीती से आगे जाकर मानवीय मेलोड्रामं के रूप में देखें तभी इसका आनन्द लिया जा सकता है:

जवानी के भी दिन कितने बुरे थे
जिसे देखा उसी पर मिट मरे थे
पिटे कब कब न इसका जिक्र छेड़ो
हमारे जख्म कल तक भी हरे थे।

Post – 2017-03-26

बुढापे की अलग अपनी अदा है
मुझे भी देखिए, कुछ कुछ पता है
अगर खुश हूं तो घबराते हैं साकिन
हुजूर यह आप को क्या हो गया है।