Post – 2016-11-30

नजर अपनी अपनी

”तुम्‍हें वे बातें क्‍यों नहींं दिखाई देतीं जो हम सब को दिखाई देती हैं ।”

”यही सवाल मैं तुमसे करना चाहता हूं, तुम्‍हें वे बातें क्‍यों नहीं दिखाई देती हैं जो पूरे देश की जनता को दिखाई देती हैं, देश देशान्‍तर में दिखाई देती है, यहां तक दुश्‍मनों तक को दिखाई देती हैं।

“पहली बात यह कि जनता अज्ञानी और भावुक होती है । अज्ञान के कारण उसे किसी परिघटना के दूरगामी परिणामों का आभास नहीं होता। भावुक होने के कारण उसे सब्ज बाग दिखाकर बेवकूफ बनाया जा सकता है और हिटलर ने तो बनाया ही था ।”

“तुम्हें जर्मनी का इतिहास तो पता है, पर क्या उस देश का इतिहास भी मालूम है जिस देश की यह जनता है ?”

वह कुुछ सोच में पड़ गया, फिर संभला तो बोला, ”इसमें इतिहास जानने की क्‍या बात है। जनता को तो देख ही रहे है, वह शराब की एक थैली पर बिक जाती है।”

”इतिहास में जाने पर ही यह भी समझ पाओगे कि उसने एक थैली शराब पर बिकना कैसे और किससे सीखा। उसी से समझ पाओगे कि उसकी एक सोच थी जो युगों के ज्ञान और अनुभव से अर्जित थी। उसका जलप्रबन्‍धन तुम्‍हारे जलप्रबन्‍धन से अधिक अच्‍छा था। तुम्‍हारे विशेषज्ञों ने हड़बड़ी में पहले नलकूपों और फिर बोरवेलों से उसके उपस्‍तर का दोहन करके सुखा दिया और और फिर आपाधापी में बनाए गए तुम्‍हारे शौचालयों का गन्‍दा पानी उस सूखे को भरने के लिए नीचे उतरा ताे उपतल का जल ही विषाक्‍त हो गया। उसे विशेषज्ञाें की मदद की जरूरत थी पर ऐसे विशेषज्ञों की नहीं जो किताब से निकले और उन्‍हें गंवार समझ कर उनकी पुरानी तकनीकों में सुधार करने की जगह उन्‍हें विस्‍थापित करके घर बैठे उजाड़ कर रख दें । और राजनीति करने वाले विशेषज्ञों की तो उन्‍हें जरूरत हो ही नहीं सकती। राजनीति करने वाला विशेषज्ञ नोबेल लारिएट हो तो भी अपनी विशेषज्ञता को अपनी राजनीति को सही ठहराने के काम ही लाएगा। उसका मोटा ज्ञान कुछ मानी में तुम्‍हारे विशेषज्ञों से अधिक उपादेय है। उसने आपस में मिल जुल कर रहने का एक सलीका विकसित किया था, जिसे तुम्‍हारे अलीगढ़ के विद्वानों ने उसके ही सपूतों का मन फेर कर अपने घर से उजाड़ दिया। तुम्‍हारे राजनीति करने वालों ने सीधी कार्रवाई के प्रयोगों से उसमें नफरत भरी और उन्‍होंंने ही इस देश को तोड़ा जब कि उसे पता था कि देश बट भी गया तो भी हमें तो यहीं रहना है। सही कौन था ? वह या तुम ? उन्‍हीं विशेषज्ञों से घृणा की लीगी विरोसत को अपनी विरासत बना कर पूरे हिन्‍दू समाज, संस्‍कृति इतिहास से घृणा करने की ऐसी मानसिकता पैदा की कि तुम नफरत फैला कर समाज को बांटते हो और उस आदमी से डरते हो जो कहता है, हम लड़ते रहेंगे तो आगे कैसे बढ़ेंगे। तुम्‍हारे विशेषज्ञ इसे धोखाधड़ी बता कर उस सामुदायिक नफरत को अधिक तीखा बनाने की चिन्‍ता में रहते हैं, क्‍योंकि जैसा मैंं पहले भी कह आया हूं, तुम्‍हारे पास कभी कोई ठोस, सकारात्‍मक योजना रही ही नहीं, आज तो नया इंसान बनाएंगे के नाम पर नई नफरत फैलाएंगे ही बच रहा है।”

वह बहादुरी से सुनता रहा, और अकड़ा बैठा रहा, फिर कड़कते स्‍वर में बोला, ”तूम्‍हें पता है कितनी नफरत भरी है उन लोगों में जिनका तुम पक्ष ले रहे हो। नफरत से नफरत पैदा होती है । हम उसी नफरत से नफरत करते हैं ।”

”और उसे किसी भी कीमत पर जिन्‍दा रखना चाहते हो। जिनसे तुम्‍हें शिकायत है उनकी शिक्षा और समझ पर मुझे कभी भरोसा नहीं रहा । परन्‍तु उनकी एक पीड़ा भी रही है, वे यदि अपना दुख नहीं कह पाते तो वे जो सारे जमाने के दुख दर्द को बयान करने के लिए दुख का आविष्‍कार कर सकते हैं, उन्‍हें तो कभी उसके दुख को समझने और बयान करने का सोचना चाहिए था । उन्‍हें लगातार आहत किया गया है, वे अपनी प्रतिक्रिया विचार और विश्‍लेषण के माध्‍यम से नहींं प्रकट कर सकते, करें भी तो अभिव्‍यक्ति और संचार के सभी माध्‍यमों पर तुम्‍हारा अधिकार रहा है जिसमें तुमसे मेल खाने वाले विचाराें को छोड़ कर किसी अन्‍य विचार के लिए जगह ही न थी। जिसे अपनी शिकायत करने का भी अवसर न मिले उसकी प्रतिक्रिया तो घृणा और उद्वेग का रूप ले सकती है, परन्‍तु यही बात तुम पर तो लागू नहीं होती । क्‍या तुमने इस समस्‍या की जड़ों को समझने का कोई प्रयत्‍न आज तक किया है? नहीं । तुम इसकी राजनीति करते रहे हो, इसकी खेती करते रहे हो और आज भी वही कर रहे हो। जनता तुम्‍हारे ही लेखों और बयानों को सुन कर तुमसे उचाट खाती जा रही है और तुम जो कहते हो ठीक उसका उल्‍टा अर्थ लगाने की आदत डालने लगी है।”

”हवा में बात मत करो । उदाहरण या प्रमाण देते हुए बात करो।”

”उदाहरण एक हो तब तो गिनाऊं । उनकी तो एक शृंखला है और उनके अलावा तुम्‍हारे पास कुछ है ही नहीं । पर अभी एक ताजा उदाहरण दूं। एक चैनल है जो तुम्‍हारे प्रिय और तुम्‍हारी नजर में बहुत साहसिक और सत्‍यव्रत है। कल संयाेग वश उसे खोला तो वह एक विशेषज्ञ के माध्‍यम से यह समझाने की कोशिश कर रहा था कि यह जो बढ़े कर भार पर काला धन बैंक में जमा करके उसे सफेद करने का मौका दिया गया है वह तो कानूनी तौर पर ही गलत है। यदि अमुक तिथि से उसके लेन-देन काे बन्‍द को बन्‍द कर दिया गया तो फिर वह बैंक में जमा कैसे हो सकता है। उस पर ऐसे ही विशेषज्ञ बुलाए जाते हैं और उसी मक्‍कारी और भोलेपन से झूठ को सच बना कर पेश किया जाता है।”

”इसमें मुझे तो गलत कुछ नहीं लगता । तुम क्‍यों उद्विग्‍न हो गए ?”

”इसलिए कि वह झूठ बोल रहा था। यह बार बार दुहराया जाता रहा कि इसके बाद केवल बैंक में ही उन्‍हें जमा किया जा सकता है। इसकी मियाद 31 दिसंबर रखी गई थी। हमें यह एसएमएस भेजा गया था कि जल्‍दबाजी की कोई बात नहीं, आप अपना पैसा 31 दिसंबर तक जमा करा सकते हैं। जो इसका लाभ नहीं उठाते या जिनके पास भारी मात्रा में कालाधन है उन पर छापे आदि पड़ेंगे। जेटली ने नोट जलाने की घटनाओं पर टिप्‍पणी की थी कि उन्‍हेंं जलाने की जगह अतिरिक्‍त कर भार झेल कर बैंक में जमा करना चाहिए । इसलिए जहां सार्वजनिक लेन-देन में यह मात्र कागज का टुकड़ा रह गया था, वहीं बैंक के दरवाजे बन्‍द न थे। वह विशेषज्ञ इस तथ्‍य पर परदा डाल रहा था और अपने चैनल के श्रोताओं को समझाने की जगह उनके कान भर रहा था।

”एक दूसरी चीज थी, काले धन वालों के सामने सरकार के झुकने और काले को सफेद करने में उनकी मदद करना। सरकार का लक्ष्‍य क्‍या था, क्‍यों था, और ये कदम क्‍यों उठाए गए इसकी एक भी तटस्‍थ व्‍याख्‍या तुम्‍हारे विशेषज्ञों ने नहीं की।”

”उन्‍होंने नहीं की तो तुम्‍हीं कर के दिखा देा ।”

”दिखाने का प्रयास तो कर सकता हूं पर यह विश्‍वास नहीं कि तुम देख कर भी उसे स्‍वीकार कर पाओगे। सरकार का सपना था देश का आर्थिक रूपान्‍तरण। भूमि सीमित है, उसे बढ़ाया नहीं जा सकता। उल्‍टे विविध कारणों से कृषिभूमि पहले से घटनी है और अब तक अपनाए गए तरीकों से किसानों की दशा और बुरी होती जानी है। आज तो विमुद्रीकरण के प्रयोग में पचास साठ दुखद मौतों को तुम दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी मान रहे हो पर तब किसान गलत नीतियों के कारण हजारों की संख्‍या में आत्‍महत्‍या कर रहे थे। वे आत्‍महत्‍यायें रुकी हैं तो उसके पीछे कोई कारण भी होगा। खैर, उनको उबारने और देश को खाद्य आपूर्ति के मामले में आत्‍मनिर्भर बनाए रखने के लिए एक आवश्‍यकता थी, खेती को अधिक वैज्ञानिक बना कर प्रति एकड़ उपज को बढ़ाना, दूसरा था अनुपूरक आय से जो कौशल और औजारों के विकास और परिष्‍कार से उत्‍पादक श्रम और स्‍वामित्‍व को प्रोत्‍साहन दे कर ही संभव है । ये सपने जब तक सत्‍ता हासिल नहीं हुई थी तब तब उस विपुल संपत्ति की वापसी से पूरे होते दिखाई दे रहे थे, जो भ्रष्‍ट और लूटपाट में जुटी हुई सरकार की अनिच्‍छा के कारण वापस नहीं आ रहा था।”

”तो इन्‍होंने वादा करने के बाद भी उसकी वापसी क्‍यों नहीं की ?”

”सत्‍ता में आने के बाद पता चला कि इसके कुछ अवसर गंवाए जा चुके हैं और आज यह काम आनन फानन में नहीं हो सकता क्‍योंकि उसमें कानूनी और कूटनीतिक पहलू जुड़े हैं, जिस दिशा में सरकार संभवत: काम कर रही होगी।
विकास के वे सपने कैसे पूरे हों अब चिन्‍ता के केन्‍द्र में यह प्रश्‍न था। एक था मानीटरी फंड का ऋण, वह सरकार को स्‍वीकार न था। दूसरा था, उन देशों काे जिनसे हम आयात करते हैं भारत में ही अपना कारोबार खड़ा करके उत्‍पादन करने का निमंत्रण और इस तरह रोजगार और कौशल का विस्‍तार । भारतीय प्रशासनिक पर्यावरण आज भी न स्‍वच्‍छ हो पाया है, न आकर्षक । एक अन्तिम विकल्‍प जो विदेशों में पड़े काले धन की वापसी से जुड़ा हुआ था, वह था अपने ही देश में पड़े काले धन काे चलन में लाने की बाध्‍यता उत्‍पन्‍न करना और इस दिशा में सरकार पिछले साल से लगातार प्रोत्‍साहन देती रही । यह इतनी बड़ी राशि है कि विकास के लिए आर्थिक संसाधन इसके चलन में आने से ही पूरे हो जाते हैं। वित्‍तविभाग का काम आय पर कर वसूलना है, छिपे आय पर अधिक कर वसूलना है, इसके बाद उसने किस साधन से वह धन कमाया है, नैतिक है या अनैतिक इसकी खोज खबर विधि और व्‍यवस्‍था का है । यह समझाने की जगह तुम लोग जनता की तकलीफ को चुन चुन कर दिखाते और अपने माध्‍यमों का प्रयोग उसे भड़काने के लिए करते रहे । किसी भी तरह यह प्रयास विफल हाे जाय यह तुम्‍हारी योजना है क्‍योंकि इसकी सफलता के बाद तुम्‍हारा सफाया निश्चित है, यह तो अपने दुख और असुविधा के बीच जनता ने बता ही दिया है और इससे तुम्‍हें घबराहट होने लगी है। उस घबराहट में हिन्‍दुस्‍तान तो दिखाई नहीं देता, जर्मनी और हिटलर दिखाई देने लगते हैं।”

”भाषण पूरा हो गया ?”

”मैं भाषण नहीं दे रहा था, तुमको समझा रहा था कि तुम्‍हारा बचा रहना देश के हित में है, परन्‍तु तुम्‍हें बचाने का काम भी तुम्‍हारा है । पहले अपने प्रति ईमानदार बनो, फिर समाज और देश के प्रति ईमानदार और निष्‍ठावान । यह साख तुमने गंवा दी है । विकल्‍पहीनता की स्थिति तुम तैयार करते रहे हो । लाचारी में आत्‍महत्‍या करने वाले किसानों को तो नयी आश्‍वस्ति और उपचारों से मोदी ने बचा लिया, पर तुम्‍हें आत्‍महत्‍या से बचाने की वह कोशिश भी करे तो ऐसी नौबत न आने पाए इसलिए तुम उससे भी पहले आत्‍म‍हत्‍या कर लोगे।”

वह हंसने लगा, ”तुम्‍हें कहीं कुछ गलत नहीं दिखाई देता है ?”

”‍दिखाई देता है । उसकी मैं तालिका बना सकता हूं, इतनी गलतियां । मैं तो स्‍वयं अपने वाक्‍य तक में गलतियां कर बैठता हूं, दिन में इतनी गलतियां करता हूं कि गिनाऊं तो दो चार मिनट लग जाय । पर मैं गलतियां करने के बाद उनकी ओर ध्‍यान जाने पर उन्‍हें सुधारने का प्रयत्‍न करता हूं । तुमसे पूछा जाय तुमने सही क्‍या किया है तो घबरा जाओगे, गलतियों का इतिहास ऐसा कि सुधारने चलो तो मिट जाओगे, इसलिए तुम अपनी गलतियों को समझ नहीं पाते, दूसरों की गलतियों को भुनाने का प्रयास करते हो, सुधारने की फिक्र नहीं ।

Post – 2016-11-28

”यार तुम तो कह रहे थे हिन्‍दुओं में मेरे जितने मित्र हैं उससे कम मुसलमानों में नहीं हैं । पर जब तुम ‘बच के रहना रे बाबा, बच के रहना रे’ पर उतर आए तब समझ में आया तुम कितने पाखंडी हो । तुम्‍हें अपना कहा याद है या नहीं ।”

”याद क्‍यों न रहेगा, मैं तो सहस्राब्दियों पीछे की काम की बातें तक याद रहता हूं।यह बताओ तुम मेरे मित्र हो या नहीं । और मैं तुम्‍हारे विचारों और मान्‍यताओं से बच कर अपने मत पर कायम रहता हूं या नहीं । सावधानी और जहां बराव जरूरी हो वहां बराव, बुनियादी ईमानदारी से जुड़े प्रश्‍न है। पाखंड से तुम अपने को धोखे में रख सकते हो, दूसरे का मनोरंजन कर सकते हो, परन्‍तु उसका विश्‍वास नहीं जीत सकते। जब तुम अपने कथन और व्‍यवहार से यह सिद्ध करते हो कि तुम ईमानदार हो तभी अगले का विश्‍वास तुम पर जम पाता है जो मित्रता की पहली शर्त है ।”

वह फंस गया था ।

Post – 2016-11-28

मनुष्‍य के पास कितना दिमाग होता है । यह बात मैं शिक्षा और ज्ञान में अग्रणी लोगों को ध्‍यान में रख कर कह रहा हूं कि निन्‍यानबे प्रतिशत लोग बौद्धिक आलस्‍य के कारण या साहस के अभाव के कारण या मन में घर कर गए राग या उचाट के कारण अपने दिमाग का इस्‍तेमाल नहीं कर पाते। वे केवल अपने खेमे के साथ होते हैं। ऐसा न होता तो बुद्धिजीवियों की सोच और भाषा राजनीति की भाषा के इतने करीब न पहुंच जाती जिसमें भाषा और विचार की शुचिता नष्‍ट हो जाती है। वे यह भी समझने का प्रयत्‍न करते कि वे जो कुछ कर या कह रहे हैं उसका लाभ किसे मिल रहा है। इसके लिए अपनी जमात से बाहर निकल कर देखने और समझने का प्रयत्‍न करते और तार्किक विश्‍लषण करते हुए किसी परिघटना के चरित्र को समझने में मदद करते ।
वर्तमान की सबसे ज्‍वलंत घटना को लें जिसके कुछ खेदजनक अनुभव लगभग सभी को हुए हैं। मैं स्‍वयं अस्‍पताल में भरती हुआ, अग्रिम राशि दस हजार की एटीएम से जमा हुआ। गनीमत रही कि दवा के काउंटर पर पुराने नोट लिये जाते रहे इसलिए उस पर असुविधा न हुई । चार पांच हजार का खर्च पुराने नोटों से चल गया। छुट्टी के समय अस्‍पताल पुराने नोट लेने को तैयार नहीं। बैंक मे चेक भेजा, जिस भी मुश्किल से वह व्‍यक्ति पहुंचा, बैंक को हस्‍ताक्षर में फर्क दिखा, वह वापस लौट आया। तेईस चौबीस हजार का भुगतान किसी के पेटीएम से किया तो बाहर निकले। जिस दिन केवल वरिष्‍ठ नागरिकों के लिए बैंक खुला तो बीमारी में ही किसी तरह पहुंचा पर लंबी लाइन जिसमें एक दो बूढ़ों को छोड़ कर सभी नौजवान अपने घर के वरिष्‍ठ नागरिकों के आधारकार्ड आदि के साथ लाइन में। मैंने लाख समझाने की कोशिश की कि मुझे जाने दो, ये वरिष्‍ठ नहीं हैं, यह व्‍यवस्‍था अशक्‍तता को ध्‍यान में रख कर की गई है, मैं बीमार भी हूं। दो तीन बार के प्रयास के बाद उसने मुझे घुसने दिया। सीधे बैंक मैनेजर के पास पहुंचा और कुछ पैसा निकालने का प्रस्‍ताव रखा तो उसने मेरे खाते में चार लाख जमा देख कर कहा, आप चौबीस हजार से अधिक नहीं निकाल सकते। मैं तो दस पन्‍द्रह की उम्‍मीद में गया था। लाटरी खुल गई। दस हजार के सौ के नोट और चौदह हजार के लिए सात नोट । मैं आदतन जेब में रखने लगा तो उसने जोर दिया, इन्‍हें गिन लीजिए। मैंने कहा आपने गिन लिए ठीक ही होगा। उसने फिर जोर दिया, नहीं गिनिए तब जाइये। गिना और बाहर निकल आया।
लाइन आज भी लग रही है। मैं चार लाख की सेविंग में पड़ी रकम की एफडी कराने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाया। इससे पहले चार लाख्‍ा एफडी में डाला था, उसका सर्टिफिकेट लाने का साहस नहीं। यह दूसरे बैंक में मैच्‍योर एफडी का पैसा है जिस पर एक महीने का व्‍याज नहीं मिलेगा। असुविधा के अनेक रूप हैं। परन्‍तु इसकी जानकारी होते हुए भी मैं इसका समर्थक हूं और समर्थक है वह भुक्‍तभोगी समाज जो गांवों तक कई तरह के कष्‍ट भोग रहा है। पहली बात यह कि एक बार यह फैसला हो गया तो इसे अब वापस नहीं लिया जा सकता। परिणाम जो भी हो। जनता के मन में इतना ही आक्रोश काले धन के विरुद्ध था इसलिए उसका भी संकल्‍प है कि कष्‍ट जितना भी झेलना पड़े, इसके बिना देश को बचाया नहीं जा सकता था। इतने बड़े पैमाने पर लिया गया कोई कदम दोषों से पूर्णत: मुक्‍त नहीं हो सकता परन्‍तु यह जल्‍दबाजी में उठाया गया कदम नहीं है । इससे पहले कालाबाजारियों को खुला अवसर दिया गया था कि वे इतना अतिरिक्‍त कर देकर अपना काला धन सफेद कर सकते हैं। जो छोटी औकात के पर अधिक समझदार थे, उन्‍होंने उसका लाभ उठाया। यह चेतावनी दी गई कि समय इतना और बढ़ाया जा रहा है इसका लाभ उठाएं, अन्‍यथा हम अधिक कठोर कदम उठाएंगे। घाघ लोगों को इस बात का अनुमान तक न हुआ कि वह कठोर कदम हो क्‍या सकता है । और अन्‍त में यह कदम जिसकी तैयारी लंबे समय से चल रही थी, घोषित हो गया।

इसे जल्‍दबाजी में उठाया गया कदम नहीं कहा जा सकता। फिर भी अति उत्साह में उठाया गया बहुत बड़ा कदम तो माना ही जा सकता है जिसकी विराटता का पूर्वानुमान न हो सका और इसकी चिन्ता मोदी को भी अनुभव हो रही है । यह अभियान घर के भीतर छिपे हुए गद्दारों और जमाखोरेो और उनकी कृपापर पलने वालेबुद्धिजीवियों और समाचार चैनलों के विरुद्धहै इसलिए इसे समग्र राष्ट्र का सहयोग नहीं मिल सकता । जनता कष्ट झेल रही है, इसे झेलने की एक सीमा है । उपचार उस सीमा के भीतर हो जाए यह शुभ होगा। इसकी चिन्‍ता मोदी के कुशीनगर के मंच से उनकी बाडी लैंग्‍ेवज में भी दिखी और उस सुझाव में भी कि सभी लोग अपने मोबाइल से नेटबैंकिंग करने लगें ।

इसने सबसे बड़ा काम यह किया कि देख को दोफाड़ कर दिया। हैव्स और हैवनाट्स की इस लड़ाई में अपने क्रान्तिकारी तेवर दिखाने वालों के भी चेहरों की रंगत बदल गई और वे जमाखोरों, और कालाबाजारियों के साथ खड़े हो गए अौर उस जनता की असुविधाओं का बहाना लेकर आर्तनाद करने लगे जो कहती है हम पर जो भी बीते झेलेंगे पर यह रोग खत्‍म होना ही चाहिए। इसमें जनता की विजय हो यह हमारी आकांक्षा ही हो सकती है । काले धन की समाप्ति असंख्‍य व्‍याधियों की समाप्ति है है। एक नये भारत का जन्‍म जो अपने जन्‍म के सा‍थ ही कालाधन और कालाबाजारी के साथ आरंभ हुआ था। उसे मैंने देखा था इसे देखने की आकांक्षा है।

Post – 2016-11-28

मनुष्‍य के पास कितना दिमाग होता है । यह बात मैं शिक्षा और ज्ञान में अग्रणी लोगों को ध्‍यान में रख कर कह रहा हूं कि निन्‍यानबे प्रतिशत लोग बौद्धिक आलस्‍य के कारण या साहस के अभाव के कारण या मन में घर कर गए राग या उचाट के कारण अपने दिमाग का इस्‍तेमाल नहीं कर पाते। वे केवल अपने खेमे के साथ होते हैं। ऐसा न होता तो बुद्धिजीवियों की सोच और भाषा राजनीति की भाषा के इतने करीब न पहुंच जाती जिसमें भाषा और विचार की शुचिता नष्‍ट हो जाती है। वे यह भी समझने का प्रयत्‍न करते कि वे जो कुछ कर या कह रहे हैं उसका लाभ किसे मिल रहा है। इसके लिए अपनी जमात से बाहर निकल कर देखने और समझने का प्रयत्‍न करते और तार्किक विश्‍लषण करते हुए किसी परिघटना के चरित्र को समझने में मदद करते ।

वर्तमान की सबसे ज्‍वलंत घटना को लें जिसके कुछ खेदजनक अनुभव लगभग सभी को हुए हैं। मैं स्‍वयं अस्‍पताल में भरती हुआ, अग्रिम राशि दस हजार की एटीएम से जमा हुआ। गनीमत रही कि दवा के काउंटर पर पुराने नोट लिये जाते रहे इसलिए उस पर असुविधा न हुई । चार पांच हजार का खर्च पुराने नोटों से चल गया। छुट्टी के समय अस्‍पताल पुराने नोट लेने को तैयार नहीं। बैंक मे चेक भेजा, जिस भी मुश्किल से वह व्‍यक्ति पहुंचा, बैंक को हस्‍ताक्षर में फर्क दिखा, वह वापस लौट आया। तेईस चौबीस हजार का भुगतान किसी के पेटीएम से किया तो बाहर निकले। जिस दिन केवल वरिष्‍ठ नागरिकों के लिए बैंक खुला तो बीमारी में ही किसी तरह पहुंचा पर लंबी लाइन जिसमें एक दो बूढ़ों को छोड़ कर सभी नौजवान अपने घर के वरिष्‍ठ नागरिकों के आधारकार्ड आदि के साथ लाइन में। मैंने लाख समझाने की कोशिश की कि मुझे जाने दो, ये वरिष्‍ठ नहीं हैं, यह व्‍यवस्‍था अशक्‍तता को ध्‍यान में रख कर की गई है, मैं बीमार भी हूं। दो तीन बार के प्रयास के बाद उसने मुझे घुसने दिया। सीधे बैंक मैनेजर के पास पहुंचा और कुछ पैसा निकालने का प्रस्‍ताव रखा तो उसने मेरे खाते में चार लाख जमा देख कर कहा, आप चौबीस हजार से अधिक नहीं निकाल सकते। मैं तो दस पन्‍द्रह की उम्‍मीद में गया था। लाटरी खुल गई। दस हजार के सौ के नोट और चौदह हजार के लिए सात नोट । मैं आदतन जेब में रखने लगा तो उसने जोर दिया, इन्‍हें गिन लीजिए। मैंने कहा आपने गिन लिए ठीक ही होगा। उसने फिर जोर दिया, नहीं गिनिए तब जाइये। गिना और बाहर निकल आया।

लाइन आज भी लग रही है। मैं चार लाख की सेविंग में पड़ी रकम की एफडी कराने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाया। इससे पहले चार लाख्‍ा एफडी में डाला था, उसका सर्टिफिकेट लाने का साहस नहीं। असुविधा के अनेक रूप हैं। परन्‍तु इसकी जानकारी होते हुए भी मैं इसका समर्थक हूं और समर्थक है वह भुक्‍तभोगी समाज जो गांवों तक कई तरह के कष्‍ट भोग रहा है। पहली बात यह कि एक बार यह फैसला हो गया तो इसे अब वापस नहीं लिया जा सकता। परिणाम जो भी हो। जनता के मन में इतना ही आक्रोश काले धन के विरुद्ध था इसलिए उसका भी संकल्‍प है कि कष्‍ट जितना भी झेलना पड़े, इसके बिना देश को बचाया नहीं जा सकता था। इतने बड़े पैमाने पर लिया गया कोई कदम दोषों से पूर्णत: मुक्‍त नहीं हो सकता परन्‍तु यह जल्‍दबाजी में उठाया गया कदम नहीं है । इससे पहले कालाबाजारियों को खुला अवसर दिया गया था कि वे इतना अतिरिक्‍त कर देकर अपना काला धन सफेद कर सकते हैं। जो छोटी औकात के पर अधिक समझदार थे, उन्‍होंने उसका लाभ उठाया। यह चेतावनी दी गई कि समय इतना और बढ़ाया जा रहा है इसका लाभ उठाएं, अन्‍यथा हम अधिक कठोर कदम उठाएंगे। घाघ लोगों को इस बात का अनुमान तक न हुआ कि वह कठोर कदम हो क्‍या सकता है । और अन्‍त में यह कदम जिसकी तैयारी लंबे समय से चल रही थी घोषित हो गया। इसे जल्‍दबाजी में उठाया गया कदम नहीं कहा जा सकता। फिर भी अति उत्साह में उठाया गया बहुत बड़ा कदम तो माना ही जा सकता है िजसकी िवराटता पूर्वानुमान न हो सका और इसकी चिन्ता मोदी को भी अनुभव हो रही है । यह अभियान घर के भीतर छिपे हुए गद्दारों और जमाखोरेो और उनकी कृपापर पलने वालेबुद्धिजीवियों और समाचार चैनलों के िवरुद्धहै इसलिए इसे समग्र राष्ट्र का सहयोग नहीं मिल सकता । जनता कष्ट झेल रही है और इसका उपचार जल्द होना चाहिए ।

इसने सबसे बड़ा काम यह किया कि देख को दोफाड़ कर दिया। हैव्स और हैवनाट्स की इस लड़ाई में अपने को उज्‍जवल चरित्र का दिखाने वालों के भी चेहरों की रंगत बदल गई और वे जमाखोरों, और कालाबाजारियों के साथ खड़े हो गए अौर उस जनता की असुविधाओं का बहाना लेकर आर्तनाद करने लगे जो कहती है हम पर जो भी बीते झेलेंगे पर यह रोग खत्‍म होना ही चाहिए।ह

Post – 2016-11-27

विविधता की अन्‍तर्निर्भरता (2)

हम जब किसी ऐसे मजहब की बात सोचते हैं जो उस मजहब से भिन्‍न मत मानने वालों के संहार की बात करता है, तो यह भूल जाते हैं कि हमारे यहां असुरों का संहार करने के लिए ही भगवान को अवतार लेना पड़ता रहा है। बाद में उन्‍हीं असुरों का हमारे समाज में ऐसा समावेश हो गया कि ब्राह्मणवाद को पहले से अधिक दृढ़ता से उन्‍होंने पुराणों, महाकाव्‍यों और स्‍मृतियों के माध्‍यम से स्‍थापित किया। यह दूसरी बात है कि ब्राह्मणों ने इसके बाद भी उन्‍हें अपने समकक्ष न तो माना न अपने में मिलाया। वे स्‍वयं अपे ब्राह्मण होने का दावा करते रहे । चारणों और भाटों की गणना इन्‍हीं में आती है।

अपने विशेष पर्यावरणवादी दर्शन के कारण असुरों में पिछड़ापन था, उसी के अनुरूप कट्टरता थी, पर साथ ही शिल्‍प और कौशल में निपुणता भी थी, जिसके व्‍यौरे में यहां जाना ठीक नहीं। हां, यह याद दिलाना जरूरी है कि यदि ब्राह्मणत्‍व के लिए प्रयत्‍नशील असुरों ने रूढि़वादिता का इतने सशक्‍त रूप में पोषण न किया होता तो वर्णव्‍यवस्‍था श्रमविभाजन के रूप में तो रह सकती थी, जन्‍मना या जाति बन कर न रहती, जिस रूप में आज तक बनी रह गई है। गाथी या गाथाकार कुश्‍ािक के पु्त्र कौशिक या विश्‍वामित्र के ब्राह्मणत्‍व प्राप्ति के लिए घोर साधना की कहानियां भी इसी को प्रतीकबद्ध करती हैं।

यह इतिहास इस बात का प्रमाण है कि भारतीय ब्राह्मणवाद किसी को अपने में मिलाता नहीं, जब कि दूसरे मजहब, जिनमें भारत के जैन और बौद्ध मत भी आते हैं, वे दूसरोंं को अपने उदाहरणों और विचारों से प्रभावित करने के लिए प्रयत्‍नशील रहे हैं । इस्‍लाम, ईसाइयत के साथ इसके लिए शक्ति के प्रयोग को उचित माना जाता रहा, क्‍योंकि उन देशों में वैचारिक संघर्ष का इतिहास उतना पुराना नहीं आैर इस्‍लाम में तो लगता है वह कुछ समय के लिए पैदा हुआ और उसके बाद जीवित न रह सका ।

इस दृष्टि से देखें ताे इस्‍लाम सबसे बन्‍द दिमाग का मजहब है जो आज भी उस निर्णायक चरण पर न पहुंचा जिस पर यूरोप उसकी प्रेरणा से पन्‍द्रहवी-सोलहवीं शताब्‍दी में पहुंच गया था। बुद्धिजीवी समाज का सबसे बड़ा कवच कट्टरपन्थियों की ज्ञान के प्रति उदासीनता और ‘किताब’ के भीतर ही समस्‍त ज्ञान को समाहित मानने की प्रवृत्ति है । यूरोप ने इसके लिए संघर्ष छेड़ा। मार्टिन लूथर ने बाइबिल का विरोध नहींं किया, परन्‍तु यह दावा किया कि उसे मानने से पहले हमें स्‍वयं यह जानने का अधिकार है कि उसमें लिखा क्‍या है। कैथोलिकों के लिए यह भी उनकी सत्‍ता को चुनौती थी। अब उनके फरमान नहीं चल सकते थे, लोगों को स्‍वयं जानने और निर्णय करने का अधिकार मिल रहा था।

कोपरनिकस के 1514 में प्रकाशित कमेंटे‍रियस का तो ईसाई कट्टरपंथियों को पता ही नहीं चलने पाया, पर उनकी अगली पुस्‍तक दे रेवोल्‍युशनिबस ऑर्बियम कोएलेस्टियम के बार में उनकी मृत्‍यु के बाद अरस्‍तूवादियों के विरोध के कारण उनकी जानकारी में आया। इसमें उन्‍होंने उन्‍होंने कुछ विस्‍तार से यह प्रतिपादित किया था कि सूरज, तारे और ग्रह धरती की परिक्रमा नहीं करते हैं अपितु वास्‍तविकता इससे उलट है । पोप को इससे सबसे बड़ा खतरा यह मालूम हुआ कि इससे प्रोटेस्‍टैंटों को बल मिलेगा। कोपरनिकस की मृत्‍यु 1543 में हुई और तब तक उसकी पुस्‍तकें कुछ सजग पाठकों तक ही पहुंच पाई थीं।

गैलीलियो कोपरनिकस से प्रभावित था और जब उसे अपने निजी अनुसंधान से भी इसकी पुष्टि होते देखी तो उसने स्‍वयं अपने मत का प्रतिपादन लातिन की जगह इतालवी में किया जो तब विज्ञान की भाषा न थी और इसलिए उसके विचारों का जल्‍द ही विश्‍वविद्यालय से बाहर भी प्रचार होने लगा। इससे अरस्‍तूवादी दार्शनिकों को सबसे अधिक आपत्ति हुई और उन्‍होंने संगठित हो कर कोपर्निकस के विचारों को प्रतिबन्धित करने का प्रस्‍ताव रखा और कोपरनिकस की दूसरी पुस्‍तक पर प्रतिबन्‍ध लग गया। इसके बाद गैलीलियो पोप को यह समझाने पहुंचे कि बाइ‍बिल विज्ञान की पुस्‍तक नहीं है और जहां इसका वैज्ञानिक सचाई से विरोध दिखाई देता है वहां यह रूपकीय मात्र है। चर्च इससे सन्‍तुष्‍ट नहीं हुआ क्‍योंकि उसे विज्ञान से अधिक प्रोटेस्‍टैंटों को होने वाले लाभ का डर था। और इसने 1616 में कोप‍रनिकस की मान्‍यता को गलत और वर्जित करार दिया और गैलीलियो को चेतावनी दी कि वह न तो इसका कभी हवाला देगा, न ही इसे सही ठहराएगा। गैलीलियों ने उस समय इस शर्त को मान लिया। अागे उन्‍होंने फिर अपने एक मित्र के पोप बनने पर उसे अपनी बात समझाने का प्रयत्‍न किया तो उसने उनको कोप‍रनिकस की मान्‍यता का खंडन करने और बाइबिल को सही ठहराने वाली पुस्‍तक लिखने का जिम्‍मा सौंप दिया। गैलीलियो ने बड़ी चतुराई से इसमें पुन: कोपरनिकस के सिद्धान्‍त का प्रतिपादन करते हुए यह दिखाया कि यह बाइबिल से अनमेल नहीं है। इसका खुलासा होने पर उन्‍हें यातनावध का सामना तो नहीं करना पड़ा परन्‍तु आजीवन अपने घर में कैद रखा गया। यहां से आरंभ होता है यूरोप का वैज्ञानिक युग और उसकी महिमा का स्‍तूप है अब तक की उसकी उपलब्धियां जिसका अंशग्राही आज का समस्‍त विश्‍व है।

इस्‍लाम में आज ऐसे वैज्ञानिक हैं जो विज्ञान की अद्यतन ऊंचाइयों पर पहुंचने का दावा कर सकें, परन्‍तु उन्‍होंने मुल्‍लावाद और कुरआन के अन्‍तर्विरोधों की आलोचना करने तक का साहस नहीं जुटाया। उसके बुद्धिजीवियों ने कभी अपने समाज को दरबाबन्‍द दिमाग से बाहर निकालने का प्रयत्‍न नहीं किया। वे अपनी मौन सहमति या सहनशीलता से मुल्‍लावाद की जड़ें मजबूत करते रहे। अपने को सेक्‍युलर बताने वाले बुद्धिजीवियों ने, जैसा हम कहते आए हैं, लीग की भूमिका निभाते हुए लगातार हिन्‍दू समाज की कमियों का आविष्‍कार करने तक का कष्‍ठ उठा कर इसकी भर्त्‍सना की, परन्‍तु इस्‍लाम की जड़ता और मध्‍यकालीनता पर कभी कोई टिप्‍पणी नहीं की। यदि किसी ने ऐसा दुस्‍साहस किया तो उसकी दशा तसलीमा नसरीन जैसी हो गई जिसके कद सेे इस्‍लामी देश ही नहीं सहमते, अमेरिका और नोबेल का चुनाव करने वाले भी सहमते हैं अन्‍यथा यदि किसी मुस्लिम लेखक को नोबेल मिलना था तो वह मलाला को नहीं तसलीमा नसरीन को मिलना था। पुरस्‍कार के बिना भी वह न्‍याय, मानवतावाद और सत्‍यनिष्‍ठा के लिए बड़ी से बड़ी असुविधा का सामना करने को अडिग भाव से तत्‍पर रहने के कारण दूसरों से अलग और ऊपर दिखाई देती है।

तसलीमा ने स्त्रियों के प्रति अन्‍याय, अल्‍पसंख्‍यकों के प्रति अन्‍याय को बहुत संयत भाषा में मुखर किया था चाहे वह अन्‍याय बांग्‍लादेश में अल्‍पमत के विरोध में हो या भारत में । आश्‍चर्य है कि तसली‍मा के लिए भाजपा के पास सहानुभूति है परन्‍तु कम्‍युनिस्‍टों आदि के पास नहीं । वे उसका नाम तक लेने से परहेज करते हैं । इसका कारण क्‍या यह है कि वे न केवल इस्‍लामी बन्‍दमानसिकता, दारुलहर्ब को चुपचाप दारुल इस्‍लाम बनाने की उसकी योजना के मौन समर्थक बने रहते हैं।

भारत हिन्‍दू देश है इसे नेहरू और सेक्‍युलरिस्‍ट जितने निर्णायक स्‍वर में घोषित करते रहे हैं, उतना हिन्‍दू संगठनों ने भी नहीं किया। कामन सिविल कोड के प्रश्‍न पर बाबा साहेब के आग्रह को देखते हुए नेहरू ने कहते हैं उनकी सार्वजनिक भर्त्‍सना की थी जिससे आहत हो कर उन्‍होंने मंत्रिपद से त्‍यागपत्र दे दिया था। प्रश्‍न सीधा था कि केवल हिन्‍दुओं के लिए कानून बनाने का अधिकार तुम्‍हें किसने दे दिया, यदि पूरे देश के लिए वही कानून नहीं बना सकते तो। सेक्‍युलरिस्‍ट केवल हिन्‍दू समाज में व्‍याप्‍त कुरीतियों के चरित्र और इतिहास को समझे बिना अपमानजनक भाषा में और बिना किसी सन्‍दर्भ के प्रहार करते रहे। प्रकारान्‍तर से हिन्‍दू ही उनके लिए पूरा भारत था। हिन्‍दुत्‍व के राजनीतिक उत्थान में अपने इस योगदान को वे स्‍वयं भूल कर अतीत से ले कर वर्तमान तक के हिन्‍दू समाज को कोसते और अपमानित करते रहे।

जहां सेक्‍युलरिज्‍म के नाम पर ही योजनाबद्ध रूप में समाज के दो प्रधान और मुखर त‍बकों को अलग करने के प्रयत्‍न लगातार होते रहे हों, वहां हम किस एकता की बात कर सकते हैं। अत: जो है, जिन भी कारणों से, जिनके भी समर्थन से जो रूप वह लेता जा रहा है उसे समझना और उससे होने वाली हानि से अपने को बचाने की युक्ति निकालना सहअस्तित्‍व की पहली शर्त बन जाती है। समझदारी न कि एकता की भावना हमें टकराव से बचा सकती है। एक ऐसा समाज जो किसी भी गैर मुस्लिम को अपने समान मानने को तैयार ही न हो, पूरा इंसान तक मानने को तैयार न हो, जो सहयोग तक से डरता हो कि इसके चलते उसका विरोध कम न हो जाय और उसका पृथक अस्तित्‍व खतरे में न पड़ जाय, उससे सावधान रहते हुए कार्यसाधक संबंधों के माध्‍यम से समरसता को बनाए रखना एकमात्र सही उपाय हो सकता है। ऐसी स्थिति तब तक बनी रहनी है जब तक उस समाज में बुद्धिजीवी वर्ग का उदय नहीं हो जाता जो आत्‍मनिरीक्षण करने में समर्थ हो और वे खतरे उठा सके जिसे तसलीमा नसरीन ने उठाए हैं। पुरुषों से इसकी अपेक्षा नहीं है, महिलाओं के अधिकाधिक आधुनिक शिक्षा संपन्‍न होने के क्रम में यह शक्ति मुस्लिम समाज के भीतर पैदा हो सके तो हो। आज तो बच के रहना रे बाबा, बच के रहना रे ।

Post – 2016-11-26

विविधता की अन्‍तर्निर्भरता (1)

स्‍वतंत्रता आन्‍दोलन को सशक्‍त बनाए रखने के लिए भारत के लिए सभी समुदायों को इससे जोड़ने की जरूरत अनुभव हुई और विविधता में एकता का मुहावरा बहुत आकर्षक लगा। यह मुहावरा भ्रामक है । इससे भारतीय समुदायों के चरित्र का सही परिचय नहीं मिलता। मुहावरा हमने नहीं संभवत: रिजली ने पहली बार हमारे समाज के लिए प्रयोग किया था। अवधारणा पुरानी बताई जाती है । इसकी एक परिभाषा के अनुसार :
Unity in diversity is a concept of “unity without uniformity and diversity without fragmentation” that shifts focus from unity based on a mere tolerance of physical, cultural, linguistic, social, religious, political, ideological and/or psychological differences towards a more complex unity based on an understanding.

जब आप नेशनल इंटीग्रेशन की बात करते हैं तो प्रकारान्‍तर से यूनीफार्मिटी या एकरूपता की बात करते हैं जिसमें भिन्‍न और विरोधाभासी के लिए जगह नहीं रह जाती । बहुलता का निषेध किया जाता है। कुछ विचित्र लगा कि बहुलता में एकता के सन्‍दर्भ में विकीपीडिया में जिन देशोंं को याद किया गया है उनमे कनाडा, इंडोनेशिया आदि जैसे देश तो आते हैं, भारत नहीं आता। क्‍या इसकेे पीछे एक कारण यह हो सकता है कि हम उस एकता का निर्णायक अवसरों पर निर्वाह नहीं कर सके और एकता से अधिक fragmentation या टुकड़े करने पर अधिक ध्‍यान दिया । क्या इसका कारण यह नहीं है कि हमने सभी बहानों से – भौतिक, सांस्‍कृतिक, भाषार्ई, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, विचारधारात्‍मक, और मनोवैज्ञानिक तरीकों तकाजों से ऐसा जब भी अवसर मिला करने का प्रयत्‍न किया और कई बार परीक्षा की घडि़यों से गुजरते हुए किया । ये सभी प्रवृत्तियां नई हैं, फिर वह कौन सी चीज है जो इसके बावजूद इसमें एकात्‍म्‍य का भाव इतनी प्रबल बनाए रखती है कि विघटन के ये सारे प्रयत्‍न चेतना को प्रभावित नहीं करते शैक्ष स्‍तर पर ही टिके रह जाते हैं । परन्‍तु हाल के दिनों में आत्‍मघात के जो प्रयत्‍न हुए हैं, जाहिर है वे सेक्‍युलरिज्‍म के नाम पर हुए हैं, उनसे जितनी क्षति सुशिक्षित और शिक्षित वर्ग को हुआ है वह इतिहास में अपूर्व है ।

भारतीय सन्‍दर्भ में एकता किंचित् भ्रामक शब्‍द है । यह बहुलता का सहअस्तित्‍व है जो हमारा आदर्श किसी श्रेष्‍ठतम फूल तक सं‍कुचित नहीं कर देता, अपितु असंख्‍य रंगों, गंधों, निर्गन्‍धों को भी पुष्‍पोद्यान का हिस्‍सा बना देता है और हमारी चेतना के केन्‍द्र में कोई एक पौधा या वृक्ष नहीं रह जाता अपितु समग्र उद्यान आ जाता है।

भारत की बहुलता और बहुतों के भीतर अनेक समानताओं की रहस्‍यमय उपस्थिति इसे अधिक रोचक और रहस्‍यमय बनाती है । समानताओं का यह हाल है कि जिसने भी किसी क्षेत्र का गहराई से अध्‍ययन किया उसे ऐसा लगा कि जो प्रथम दृष्टि में आंचलिक प्रतीत होता है वह सार्वदेशिक है अौर यह सार्वदेशिकता भारतीय उपमहाद्वीव में ही सिमट कर रह जाती है। उदाहरण के लिए भाषा का अध्‍ययन करते हुए इमेनो को भारत एक भाषावैज्ञानिक क्षेत्र मानना पड़ा। इमेनो से भी पीछे जा कर मुझे उस स्‍तर की उपस्थिति दिखाई दी जिसमें सब कुछ सबका बन जाता है। इसकी जड़ें सुदूर इतिहास में जाती हैं परन्‍तु इतिहास को इतना पंगु बना कर रखने और समझने का प्रयत्‍न किया जाता रहा और साथ ही साथ प्राचीनता का उपहास किया जाता रहा कि इन पंक्तियों के लेखक को छोड़ कर किसी को यह गुमान तक नहीं हुआ कि यह गहराई पन्‍द्रह बीस हजार साल पीछे तक जाती हैै और इसको तकनीकी के विकास और भाषा के माध्‍यम से प्रमाणित किया जा सकता है। परिदृश्‍य के इस अभाव के कारण, मेरी जानकारी में ऐसा कोई देसी या विदेशी अध्‍येता नहीं दिखाई देता जो यह समझ सका हो कि शान्ति की कामना जो भारतीय चेतना में निर्णायक महत्‍व रखती है वह कितने रक्‍तपातों और अन्‍तर्घातों का परिणाम है।

Post – 2016-11-26

वह पूछते हैं तुमने मुहब्‍बत में क्‍या किए ।
हम जिनकी राह में खड़े रुस्‍वा हुआ किए ।।

Post – 2016-11-26

यदि जनता ने अपना समर्थन ऐसे संगठन को दिया तो वे शत्रुदेशों से और उनके आतंकवादियों तक से हाथ मिला लेते हैं। इस देश को लूटने, बर्वाद करने वालों का साथ देते हैं, इस लूट और बर्वादी को रोकने का संकल्‍प लेने वाले दल का नंगा नाच करते हुए विरोध करते हैं। वे उस शिक्षाप्रणाली तक की आलोचना नहीं करते जिसमें आदमी को तंगनजर बनाया जाता है और आतंकवादी गतिविधियों की नींव की आलोचना तक सहन नहीं कर पाते ।

इस बीच बहुत कुछ हो रहा है जो इस देश की मानसिकता को बदलने, मध्‍यकालीन मानसिकता से बाहर लाने का प्रयत्‍न माना जा सकता है और हमारा बुद्धिजीवीवर्ग इसको रोकने, उसी मानसिकता में वापस लौटने के लिए छटपटा रहा है। बौद्धिक गतिविधियों से जुड़े समस्‍त पदों को छेक लेने के कारण क्‍या इसे हम अपनी सोच में आधुनिक, वैज्ञानिक और देशहित और विश्‍वहित के लिए समर्पित मान सकते हैं। यदि नहीं तो पहली जरूरत है, उसके कोरस का खटराग मानते हुए इसको अनसुना करना । एक बहुत साहसिक संग्राम चल रहा है। उसकी कुछ क

हमारे साथ संघर्ष वैचारिक संघर्ष के रूप में भी लगातार चलता रहा इसलिए इतने सारे टकरावों और घोर विरोध से ऊपर उठ कर शान्ति के महत्‍व को समझा गया और कलह में बर्वाद होने वाली ऊर्जा का सर्जनात्‍मक उपयोग संभव हुआ, जिसे भारत की असाधारण समृद्धि का श्रेय दिया जा सकता है।

Post – 2016-11-24

धार्मिक मनोबन्‍ध

हम एक हिन्दू के रूप में इस्लाम पर बात नहीं कर सकते । पक्षधर होने के बाद पक्षपात से नहीं बच सकते। पक्षपाती न्यायाधीश नहीं हो सकता और उसके तर्क में जितना भी पैनापन हो, वह गहरे उतर नहीं सकता। दूसरे पक्ष्‍ा के लिए यह मात्र शाेर है जिसे वह अनसुनी कर सकता है, उससे खिन्न अनुभव कर सकता है, पर उसका कायल नहीं हो सकता ।

जब मैं मुसलमानों के बारे में बात करता हूं तो यह मान कर नहीं कि वे अच्छे या बुरे हैं कि नहीं । हम इस बात को बार बार दुहराते आए हैं कि परिस्थितियों के समक्ष हमारी हैसियत निमित्त मात्र की रह जाती है । निमित्त कर्ता नहीं होता, कारिन्दा अवश्यक होता है। उत्तरदायित्व उन शक्तियों, विचारों, मान्यताओं, विश्वासों, दबावों और बाध्यताओं का होता है जिनसे हम ऊपर नहीं उठ सके । मैं जानता हूं, इस तरह के विचार, ठंडे लगने वाले विचार, ऐसे लोगों को कायरता प्रतीत हो सकते हैं जो कठोर उपायों के हामी हैं । जिनको शठे शाठ्यं समाचरेत, या टिट फार टैट जैसे मुहावरोंं से सभी अनर्गल आचरणों का हल मिल जाता है । यह उचित तो है, परन्‍तु यह रक्षा और व्‍यवस्‍था संभालने वालों का काम है कि वे अपराधी को दंडित करें। हम इसे अपने हाथ में लें तो ठीक वही काम करेंगे जिसके कारण उनसे हमारी चिढ़ है। उन्‍हें दंडित भले न कर पाएं परन्‍तु चेतना के स्‍तर पर उन जैसे बन अवश्‍य जाएंगे, भले कर कुछ न पाएं।

हमारा काम विवेचन करना है। हमारे लिए वह अच्‍छा या बुरा जैसा भी है, एक परिघटना है जिसकी अपनी समस्‍यायें है जिन्‍होंने उसे वैसा बनाया है। मुस्लिम समुदाय तब तक कुपढ़ और दरबाबन्‍द जहनियत का शिकार बने रहने को बाध्‍य है जब तक वह किताब में विश्‍वास करता है। कारण सारा ज्ञान और सामाजिक इथास उस किताब की किसी भी इबारत से टकराने के बाद व्‍यर्थ का हस्‍तक्षेप बन जाता है और इसलिए उसे त्‍याग देना पड़ता है। जब तक मुस्लिम बुद्धिजीवी किसी गलत कार्य या आचरण की आलोचना इस आधार पर करता है कि कुरान शरीफ में ऐसा नहीं ऐसा लिखा है, तब तक वह उसे अल किताब से बाहर निकालने का साहस नहीं कर पाता और हमारी समझ से लगभग सभी ‘उदार’ और ‘समझदार’ बुद्धिजीवी यही करते रहे हैं। अलबरूनी से ले कर असगर अली इंजीनियर सभी के साथ यह मनोबन्‍ध काम करता दिखाई देता है।
जिन्‍हें हम बहुत प्रगतिशील समझते हैं, उनमें भी कहीं न कहीं इसका दबाव देखा जा सकता है। मेरा अनुभव अधिक नहीं है, केवल एक बार ईगतपुर में एक संगोष्‍ठी के क्रम में दो दिन का साहचर्य अली सरदार जाफरी का मिला था। सान्‍ध्‍य पेय के क्रम में चर्चा कैसे आरंभ हुई यह तो याद नहीं, पर सरदार का यह कथन मुझे सत्‍य होते हुए भी विचित्र लगा था कि तुम्‍हारे पास कोई किताब नहीं है, उनके पास किताब है। जो अर्थ मैैैैंने ग्रहण किया वह यह कि यदि वे उस किताब के अनुसार आचरण करते हैं तो उन जैसों को उसे अनुचित ठहराने का कोई कारण नहीं रह जाता।

सामी मतों की एक साझी किताब है जिसमें उन्‍होंने अपने अनुसार कुछ जोड़ा और बदला है, जैसे ईसाइयत ने न्‍यू टेस्‍टामेंट और इस्‍लाम ने वे विचार जिनका उन्‍हें इलहाम हुआ था या जिन्‍हें अल्‍लाह ने एक फरिश्‍ते के माध्‍यम से उन तक पहुंचाया था।

पहली बात यह कि यह धारणा कि हिन्‍दुओं के पास किताब न थी और न ही है गलत है। वेद को ऐसा ही एक अनुंघनीय ग्रन्‍थ बनाया गया था। उसकेे सूक्‍तों को भी ऋषियों ने रचा नहींं था, साक्षात्‍कार किया था – साक्षात्‍कृत धर्माण: ऋषय: बभूवु: । या ऋषियों को द्रष्‍टा होने के कारण ऋषि कहा जाता है – ऋषि दर्शनात्। जैसे सृष्टि और स्रष्‍टा के विषय में कुरान और बाइबिल ने अपनी पुराकथाएं पुराने टेस्‍टामेंट से लीं, और इस पर कोई विवाद नहीं है, वैसे ही पुराने टेस्‍टामेंट के अनेक अंश ऋग्‍वेद से मेल खाते हैं, यद्यपि मनोबन्‍ध के कारण पहले किसी का ध्‍यान इस ओर नहीं गया।

मैं इसके तीन साम्‍यों की ओर ध्‍यान दिलाना चाहता हूूं। पहला यह कि भारत में सृष्टि और स्रष्‍टा को लेकर कई तरह के विचार प्रचलित थे, उनमें से एक था विकासवादी, दूसरा था यान्त्रिक, तीसरा था याजिकीय, चौथा कास्‍मोलोजिकल, और इन्‍हीं में एक था चामत्‍कारिक ।

सकृद्ध द्यौरजायत सकृद् भूमिरजायत ।
पृश्‍न्‍यादुग्धं सकृत्पयस्तदन्यो नानु जायते ।। 6.48.22
यह है एक झटके में, एक साथ धरती आकाश ही नहीं, सृष्टि के समस्‍त पदार्थों का, यहां तक कि गाय के थन में दूध का पैदा हो जाना और उसके बाद कुछ और न पैदा होना जो उसने कहा, प्रकाश हो और प्रकाश हो गया आदि का प्रेरक प्रतीत होता है।

एक दूसरी कथा जो इब्राहिम के द्वारा अपनी सन्‍तान की बलि की कथा के रूप में आई है ऋग्‍वेद में हरिश्‍चन्‍द्र द्वारा अपनी सन्‍तान, रोहिताश्‍व को वरुण देव को बलि देने की कथा के रूप में आई है, यद्यपि इसकी कथा कुछ लंबी और चालाकी भरी है जिसे शुन:शेप की कथा के रूप में पेश किया गया है, अर्थात् पुत्र की बलि देने के लिए प्रतिश्रुत हरिश्‍चन्‍द्र बहाने बनाते हुए बलि से बचते रहते हैं और अन्‍त में उसे वनवास के लिए भेज देते है। वरुण के प्रकोप से हरिश्‍चन्‍द्र को बेरी बेरी की बीमारी हो जाती है । इस सूचना के बाद रोहिताश्‍व लौटता है और अपनी जान बचाने के एक अकिंचन ब्राह्मण से बलिपशु बनने के लिए खरीद लेते है। बलिपशु के रूप में उसका वध होने की तैयारी पूरी होने पर वह सभी देवताओं से अपने प्राणरक्षा की याचना करता है और अन्‍तत: विश्‍वामित्र न केवल उसके प्राण की रक्षा कर लेते हैं, अपितु उसे अपना पुत्र भी बना लेते हैं।
इसी हरिश्‍चन्‍द्र की पौराणिक कथा हम सत्‍य हरिश्‍चन्‍द्र के रूप में एक भिन्‍न रूप में पाते हैं, परन्‍तु इसमें भी अन्‍त में विश्‍वामित्र उपस्थित हो कर परीक्षा में खरा उतरने के कारण मृत पुत्र को जीवित, डोम की दासता से मुक्‍त और पुराने राजपाट का स्‍वामी बना देते हैं जिसे उन्‍होंने दान स्‍वरूप ले लिया था।

कुछ विषयान्‍तर हो गया, परन्‍तु वेद को आप्‍त अौर अकाट्य और अनुभूत सत्‍य के वेद से अनमेल पड़ने पर वेद को मान्‍य बनाने के प्रयत्‍न किए गए परन्‍तु हमारे यहां तार्किक परंपरा आरंभ से ही इतनी प्रबल रही है कि कौत्‍स ने वेद की इतनी तीखी आलोचना की कि बाद के लिए कुत्‍सा शब्‍द का अर्थ ही बदल दिया गया और इसी से उन्‍हें जोड़ दिया गया। पहले चित् कित्, चेत , केत और कुत का अर्थ ज्ञानपरक था और कुत्‍सा का अर्थ भी ज्ञान हुआ करता था। हिन्‍दी और भोजपुरी में कूतना – आकलन आदि करना उसी पुराने अर्थ से जुड़े हैं, और इसीलिए मैं कहता हूं कि हमारी बोलियां संस्‍कृत की कमियों को भी सुधारने में सहायक हो सकती हैं।
वेद की आप्‍तता अब पहले जैसी अनुलंघनीय नहीं रह गई। गीता जिसका महत्व धर्मग्रन्‍थ जैसा है, वह भी वेद की अकाट्यता और असाधारण महत्‍व को नासमझों का आग्रह मानती है – ये इदं पुुष्पितं वाचं प्रवदन्ति अविपश्चित: । वेदवादरता पार्थ आन्‍यदस्‍तीति वादिन: । परन्‍तु दूसरी ओर जो वेद की आप्‍तता को स्‍थापित करने के लिए चिन्तित रहे है वे अपने क्षेत्र के प्रकांड विद्वान होते हुए भी, अन्‍यथा तर्कशील होते हुए भी अपने क्षेत्र में गलतियां करने को बाध्‍य हुए। इनमें यास्‍क, पाणिनि जैसी मेधा के व्‍यक्ति भी आते हैं और स्‍वामी दयानन्‍द जैसे तर्कशील और सन्‍देहवादी भी । इसलिए हमें समझना यह होगा कि कौन सी शक्तियां है जो अपने ही समाज को किसी ग्रन्‍थ में कैद करके रखना चाहती हैं और उनसे वह समाज कैसे मुक्ति पा सकता है।

जाहिर है हमारी इस मीमांसा का कोई लाभ मुस्लिम समुदाय को नहीं होगा। अधिक संभावना यह है कि वे इसे पढ़ने और समझने से इन्‍कार कर दें। परन्‍तु हमारे लिए उन मनोबन्‍धों की पड़ताल स्‍वयं अपने हित के लिए जरूरी है क्‍योंकि इसके बाद ही हम उस रणनीति का विकास कर सकते हैं जिसमें हम अविरोध की संभावनाओं को तलाश कर सकें।

Post – 2016-11-23

संचार की भाषा

हम जो कुछ जिस आशय से कहते हैं, वह श्रोता के द्वारा ठीक उसी आशय में ग्रहण नहीं होता । हम जिस विफलता की बात कर रहे हैं वह अभिमुखता, उदासीनता, या संशय, अहम्‍मन्‍यता, पूर्वाग्रह के कारण उत्‍पन्‍न होती है और इन सबसे अधिक उत्‍पन्‍न होती है साहस की कमी से जिसमें समस्‍या की पेचीदगियां तक सामने नहीं आ पाती। हम मारे डर या लिहाज के कुछ बातें कहने का साहस नहीं जुटा पाते, इसलिए या तो उन पर चुप रह जाते हैं या उसको ग्राह्य बनाने की चिन्‍ता में पड़ जाते हैं, इसलिए अभिव्‍यक्ति के स्‍तर पर ही संचार पंगु हो जाता है। अप्रियस्‍य च सत्‍यस्‍य वक्‍ता श्रोता च दुर्लभ:। यहां हम केवल इसके एक पक्ष को लेंगे ।

कल्‍पना कीजिए किन्‍हीं कारणों से ‘क’ ‘ख’ से बात करना चाहता है परन्‍तु ‘ख’ को बात करने की जरूरत नहीं है । ‘ख’ ‘क’ को अपनी समकक्षता का नहीं मानता । अब जिन भी परिस्थितियों में ‘क’ ‘ख’ से कुछ कहना चाहता है, वह अनुरोध या याचना तो बन सकता है, संवाद का रूप नहीं ले सकता। ‘ख’ इसे इस रूप में प्रकट नहीं करेगा, परन्‍तु उसके भावों पर ध्‍यान दें तो पता चल जायेगा कि वह आपकी बात सुन कर भी आप पर अहसान कर रहा है और जरूरी नहीं कि वह आपका ‘अनुरोध’ मान ले, या जिस रूप में माने वह आपकी आकांक्षा के अनुरूप हो ।

अब इतिहास पर लौट कर नजर डालें, क्‍या कोई चरण ऐसा दिखाई देता है जब मुसलिम समुदाय के उस वर्ग ने जो उसका बौद्धिक नेतृत्‍व करता है अपनी ओर से संवाद की आवश्‍यकता अनुभव की । अन्‍तर्मन से हिन्‍दू समाज को अपने समकक्ष मानते हुए अपने किसी कथन को सम्‍मान से सुनने का प्रयत्‍न किया ।

मुझे यह भ्रम है कि इसकी पहल यदि कभी किया गया तो हिन्‍दुअों की ओर से किया गया जिसका एक कथित अकथित उत्‍तर यह मिलता रहा कि उसकी शर्तों पर संवाद संभव है।

इससे सद्भावना के नाम पर हिन्‍दू समाज सदा गंवाता रहा है, और मुस्लिम समुदाय उसे झुकाने का प्रयत्‍न करता रहा पर अपने को तनिक भी बदलने को तैयार नहीं रहा है।

यह एक बहुत अहम प्रश्‍न है इसलिए इस पर स्‍वच्‍छता से, यदि प्रमाण हों तो उन्‍हें देते हुए मुझे गलत सिद्ध करने का प्रयत्‍न करें क्‍योंकि यह ‘मेरा मनवा तेरा मनवा कैसे एक होय रे’ की समस्‍या से जुड़ी समस्‍या है।