मैंने रात पोस्ट किए गए लेख काे अभी अभी संपादित किया। पता नहीं कैसे अक्षर पोस्ट करते समय इधर के उधर हो जाते हैं, और नए अनलिखे अक्षर जुड़ जाते हैं। जिन मित्रों ने प्रूफ की गलतियों सहित इसका पाठ किया उनसे क्षमा याचना।
Month: December 2015
Post – 2015-12-30
अस्पृ श्यता – 8
तुम्हारी अधिकांश बातें हवाई होती हैं। प्रमाण कहीं है इसका कि कारीगरों के घरों पर डाका डाला जाता था और मालमता उठा लिया जाता था? प्रमाण है इसका कि राजपूतों को पीट-पीट कर गर्हित काम करने को विवश किया गया?
कभी कभी चुप्पी एक दहशतनाक बयान बन जाती है। यदि तुम गौर करो तो पाओगे, पूरे मध्य काल में मानव यातना को ले कर एक सन्नाटा फैला है। सिर्फ दो ऐसे कवि हैं जिन्हों ने आम जनता की त्रासदी को मुखर किया। नानक देव के दो कथनों का हवाला बाबर के अत्या चार के विषय में है, परन्तु उसके बाद वह भी लगभग खामोश है। दूसरे हैं तुलसीदास। जैसे उर्दू के शायरों ने इश्क की आड़ में सत्ता के विरोध में अपनी आवाज उठाई, उसी तरह तुलसी दास कलिकाल की ओट लेकर अपने समय की पीड़ा को असाधारण साहस से मुखर करते हैं। उनकी वे कविताऍं तो मुझे याद नहीं, पर कुछ शब्द लगातार गूँजते रहते है – ‘जीविका विहीन सीद्यमान’ जनों की व्यथा, ‘कहॉं जाईं का करीं’ वाली विवशता और ‘बेचत बेटा बेटकी’ जैसी अकिंचनता, ‘आगि बड़वागि तें बड़ी है अागि पेट की’, क्षुधार्त जनों की पीड़ा, और अकाल और दुहरे शासन की पीड़ा की अभिव्यक्ति तुलसी दास को छोड़कर किसी अन्य कवि में नहीं मिलेगी। न किसी सन्त कवि में न किसी अन्य भक्त कवि में, और संभव है किसी लोककवि में भी न मिले, क्योंकि आतंक इतना गहरा था कि लोग एकान्त में भी किसी से सरकार की शिकायत नहीं कर सकते थे। तुलसीदास को तुम लोग तो प्रतिक्रियावादी कवि मानते हो और कबीर को क्रान्तिकारी बना देते हो, परन्तु कबीर, रैदास सब में सामाजिक भेदभाव की पीड़ा और उससे विद्रोह तो मिलेगा, परन्तु लोक की वेदना का, जिसके सबसे बड़े भुक्तभोगी सामाजिक भेदभाव के सताए हुए लोग ही होते थे,] एकमात्र साहसी और एक तरह से क्रान्तिकारी कवि तुलसीदास ही है। जानते हो कबीर और तुलसी में क्या अन्तर है।
वह सिर पीटने लगा, परन्तु मैंने उसकी ओर ध्यान न दिया, ‘‘कबीर आन्दोलनकारी है; तुलसी दार्शनिक कवि । लेकिन सीखा उन्होंने कबीर से भी है, जिसकी आलोचना करते हैं।
‘’यदि हमारे आज के लेखक तुलसीदास को भी समझ पाते तो वे अमेरिका के लिए हिन्दी में साहित्य नहीं लिखते जिसे भाषा सीमा के कारण अमेरिका समझ नहीं सकता और पराई संवेदना और शिल्प के कारण वह तुम्हारे लोगों के काम का नहीं रह जाता। वह तुम्हारा साहित्य समझ नहीं पाता इसलिए तुम उसे कहते तो नहीं हो, पर गँवार समझते हो और वह तुम्हें अछूत समझता है। और वह जो कुछ संस्कृत में ही लिखा जा सकता था, उसे जन भाषा में लिखने और लोक हित को सर्वोपरि रखने का आग्रह करता है वह कवि जो संस्कृत में, जिस मस्ती से लिखता था, उसी मस्ती में लिखता तो वह संस्कृत भारतीय संविधान में राष्ट्रभाषा के स्थान पर होती और उसका क्षेत्रीय अस्मिताओं के कारण विरोध भी न होता, उसके भाषादर्शन को समझो।‘’
उसके धीरज का बाँध टूट गया, ‘‘तुलसी की एक पंक्ति तो मुझे भी याद है, चलइ जोंक जिमि वक्र गति…’’ विषय कोई हो, तुम इतनी टेढ़ी टबरी चाल चलते हो कि जहाँ पहुँचना है उससे पहले ही थक कर कहते हो जहाँ के लिए निकले थे, वहाँ तो पहुँचे ही नहीं। अब कल। सीधी चाल चलते तो कबके पहुँच गए होते।‘’
‘’जिसे तुम कुचाल समझ रहे हो उसे इस रूप में भी समझ सकते हो कि बच्चे को कड़वी दवा पिलाने से पहले बहलाना भी पड़ता है और फिर झटके से उसके मुँह में वह दवा। सीधे दवा पिला दो तो उगल देगा, किए कराए पर पानी फिर जाएगा। बुरा मत मानो, जो लोग तुम लोगों को दुष्ट कहते हैं वे तुमसे भी नादान हैं। तुम शिशु सुलभ मानसिकता के, सारे अच्छे अच्छे सपने देखने वाले और सचाई को खयालों में बदल कर खयालों से लड़ने वाले प्यारे लोग हो। शमशेर बहादुर सिंह की उस आत्मालोचना पर कभी ध्यान दिया है। न दिया हो तो अब देनाः
हम अपने खयाल को सनम समझे थे
अपने को खयाल से भी कम समझे थे।
होना ही था समझना था कहाँ शमशेर
होना भी वह कहाँ था जो हम समझे थे।
‘’शमशेर क्रान्तदर्शी कवि थे। जिस सचाई पर वह आज से चालीस साल पहले पहुँच चुके थे उस तक तुम आज तब नहीं पहुँचे। और मेरे साथ भी ऐसे मित्र हैं जो प्रवीण तोगड़िया और साक्षी महाराज की लकीर पर चल कर भारत का भविष्य सुधारना चाहते हैं, उन्हीं की भाषा बोलते हैं। वे भी न समझ पाएँगे कि इतिहास में उतरना पारे को भस्म में बदलने की साधना है, वर्ना उसमें इतना जहर भरा हुआ है कि उसको पी गए तो काम से गए। बहलाने और विश्वास दिलाने की जरूरत उन्हें भी पड़ती है।‘’
‘’तुम अपना जहर तो उगलो, मैं हम तो हलाहल पीने वालों में हैं।‘’
‘’तो सीधी बात यह है कि भारतीय इतिहास का सबसे बर्बर दौर मध्यकाल था, परन्तु उस दौर के कुकृत्यों के लिए यदि उन अपराधियों की सन्तानों को दोष दिया जाय तो गलत होगा। अपनी समझ से वे कोई गलत काम कर भी नहीं रहे थे। वे सन्तानें यदि उस अपराध को छिपा कर दुनिया को यह बताना चाहें कि कुछ गलत हुआ ही नहीं, सब कुछ ठीक था, तो वे उन कुकृत्यों पर परदा डाल रही हैं और उनके दल में न होते हुए भी सह अपराधी हैं। मार्क्सेवादी इतिहास लेखन की आड़ में यही किया और चॉंदी से मुँह भर कर कराया गया। उन कुकृत्यों पर परदा डाला गया और उसको और कारगर बनाने के लिए प्राचीन भारत के इतिहास की कमियों को समझने में भी चूक की गई इसलिए कमियों का आविष्कार करके उन्हें बीभत्स बनाया गया और समूचा ध्यान उधर केन्द्रित करने का प्रयास किया गया। मार्क्सावादी इतिहासकार अलीगढ़ के जिन इतिहासकारों को कम्युनल बताते रहे हैं, उन्होंने उन कुकृत्यों को सच्चे मन से स्वीकार किया और इसलिए उसकी कोई अवांछित प्रतिक्रिया नहीं हुई। हमारे उपन्यासकार ख्वाजा बदीउज्जमा ने अपने उपन्यास सभापर्व में बड़ी वस्तुपरकता से इस्लाम के इतिहास को पेश किया, गो किया भी तो एक हिन्दू की जबानी, कुछ सावधानी बरतनी जरूरी समझी होगी, परन्तु इससे मन स्वच्छ होता है। अपने पुरखों के सुकृत्यों पर गर्व करने के साथ यदि हम उनके कुकृत्यों को सहज भाव से स्वीकार करें तो यह एक तरह का प्रायश्चित्त होता है और इससे मनोमालिन्य घटता है। उनके कुकर्मो पर पर्दा डालें और उनसे ध्यान विचलित करने के लिए दूसरों की कमियों का आविष्कार करें या सामान्य व्यावहार को गर्हणा के साथ प्रस्तुत करें तो यह मनोमालिन्य को बढ़ाता है। मार्क्सरवादी इतिहास के नाम पर यही किया गया और उसका लाभ उनको मिला जिनकों वे अपमानित करना और मिटा देना चाहते थे।
‘’तुम प्रमाणों की बात कर रहे थे। इतना पढ़ा लिखा होता तो इन पर ही भरोसा कर लिया होता। मैं भी पहले सूफियों को मंसूर की तरह इस्लामी कट्टरता का विरोधी और मानवीय प्रेम का उपासक ही समझता था। पता ही नहीं था कि मंसूर के साथ जो हुआ उससे ये बच क्यों गए। उस समझौते की तलाश तो बाद में करनी पड़ी जिसमें सूफीमत इस्लाम का नूरा पहलवान बन गया। लेकिन एक बात है। तुमको जोतिसी होना चाहिए।‘’
वह मुस्कराने लगा तो कहना पड़ा, ‘‘तुमने जो भविष्यवाणी की थी कि बात आज भी अधूरी रह जाएगी, लगता है, वह गलत नहीं थी।‘’
‘’हत्तेरे की।‘’
‘’पर इसके बाद कल मैं तुम्हें उस मध्यकालीन दरिंदगी की बातें बताउूँगा तो तुम झेल भी पाओगे और हमारे पीछे खड़े भाई उसे पचा भी पाऍंगे।‘’
Post – 2015-12-30
i started writing this book on Face book to generate rationality, not emotional fever. we must not hide facts, face facts, but control passionate outbursts.
Post – 2015-12-29
अस्पृश्यता – 7
तुम क्या समझते हो, फॉंसी की सजा बनी रहनी चाहिए या… ‘’
वह चुप लगा गया, और देखिए कि उसकी अनकही बात मेरी समझ में भी आ गई। ”जो मनुष्य के रूप में मर चुका है और जिसके जीवित रहने से मनुष्यता को खतरा है, उसके एक प्राणी के रूप में भी मर जाने पर क्लेश नहीं होना चाहिए। हॉं तरीका मानवीय हो, उसकी हत्या को यन्त्रणा से मुक्त रखा जाय, यह जरूरी है। फॉंसी पर लटकाना यातनावध है और इसलिए जल्लाद को भी हम गर्हित समझते हैं, जब कि वह किसी जज के आदेश का पालन कर रहा होता है और जज के बारे में हमारे मन में आदर होता है और जज उस कानून का पालन कर रहा होता है जिसे बनाने वाले यातनावध का आनन्द लेते थे। हमारे आलसी सांसदों को उस कानून को बदलने और कोई अन्य मानवीय तरीका निकालने की सूझी ही नहीं, इसलिए जजों को अब मृत्यु दंड को आजीवन कारावास में बदलने यानी पिजड़े में बन्द करके रखने का एक मात्र उपाय दिखाई देता है।”
”और अस्पृश्यता के विषय में तुम्हारा क्या खयाल है? यह भी तो दंड का ही एक रूप रहा है।”
यह बताओ तुम्हारी उम्र क्या है, अस्सी पूरे हुए या नहीं।
वह हँसने लगा, ”हो गए, जानते तो हो। पर उम्र की बात कहॉं से आ गई?”
‘’पहले मैं सोचता था कि कम से कम अस्सी पर पहुँच कर तो बालिग हो ही जाओगे, निराशा ही हाथ लगी। फिर भी तुम हर बात को अधूरा ही क्यों समझते हो? मैंने कहा था, अस्प़ृश्यता का केवल एक पक्ष आदिम दंडविधान से जुड़ा था। अब वह दंडविधान बदल गया उसका स्थान नए दंडविधान ने ले लिया, अत: उसकी कोई उपयोगिता नहीं, उसे समाप्त हो जाना चाहिए अन्यथा खाप पंचायतों जैसे कानून से टकराने वाले फैसले समानान्तर जारी रहेंगे।
‘इसका दूसरा पक्ष आत्मरक् षा से है, आरोग्य से है, इसको समाप्त नहीं किया जा सकता।
‘एक तीसरा खानपान से है जिसका चरित्र बहुत उलझा हुआ है और आदिम टैबू या निषेध से जुड़ा है। आगे चल कर यह अर्थतान्त्रिक हो गया। परन्तु इस विषय में हमारा पुराना व्यवहार अधिक सुलझा रहा है। कोई किसी तरह का खानपान करे, यदि वह हमारे लिए निषिद्ध आहार करता है तो उसके साथ हम खान पान का संबन्ध नहीं रखेंगे, उनके साथ हमारा संपर्क लगाव और बराव का समायोजित रूप होगा। पंडित विद्यानिवास मिश्र का नाम सुना है?’
‘उनका नाम कैसे न जानूँगा, तुम्हारी संगत के बाद भी मेरा सामान्य ज्ञान उतना खराब नहीं है, लेकिन वह कहॉं से आ टपके?’
‘वह पंक्तिपावन, सरजूपारीण ब्राहण थे और पावनता का एक प्रमाण यह था कि इन्होंने बौद्धमत के दबाव में भी जब दूसरे सभी ब्राह्मण अपना मांसाहार प्रेम त्याग कर शाकाहारी हो रहे थे, और इस हद तक शाकाहारी हो गए कि प्याज और लहसन तक से परहेज करने लगे, इन्होंने उसके सामने घुटने नहीं टेके। हाँ समझौता इन्होंने भी किया। इनका आमिष आहार मत्स्याहार तक सीमित रह गया था। परन्तु विद्यानिवास जी इस हद तक आमिष द्रोही थे कि वह किसी दूसरे के वर्तन में पानी तक नहीं पीते थे। अपना चॉंदी का गिलास साथ रखते थे। वह पंप का पानी भी नहीं पीते थे, क्योंकि उसका वाशर चमड़े का होता है। इसके साथ ही वह अपने टीका, चोटी, उपवीत ही नहीं दिशाशूल तक का ध्यान रखते थे, इस निजी शुचिता और मान्यता के कारण असुविधा का सामना तो करते थे पर किसी के लिए असुविधा पेश नहीं करते थे। दूसरों से किसी तरह का द्रोह या दुराव नहीं । भारत में लोग उनकी खिल्ली उड़ाते थे, परन्तु यहॉं के आधुनिक लोग जिस अमेरिका की नकल करते हैं, उसके आधुनिक उनका इस बात के बावजूद बहुत सम्मान करते थे। अमेरिका में अज्ञेय जी से अधिक सम्मान विद्यानिवास जी का था, यह पता है।
”किसी व्यक्ति या विचारधारा को यह मानने का अधिकार नहीं कि वह आदर्श है और जो उसके अनुसार नहीं चलता वह दुष्ट, हीन या पिछड़ा हुआ है।‘
वह मेरी बात से सहमत था।
‘जानते हो खानपान विषयक अस्पृश्यता ने आत्मसम्मान और आत्मररक्षा के सबसे प्रभावकारी हथियार का काम किया है। तुम उस दिन कह रहे थे कि अस्पृश्यता का हमारे समाज को बहुत भारी मूल्य चुकाना पड़ा है, वह तो कुछ दूर तक सच है, पर ‘खट्टा-खट्टा-मेरा; मीठा-मीठा-तेरा, अब तो मान जा प्यारे’ वाले इतिहास में जो कुछ पढ़ाया जाता रहा है वह मेरी समझ में नहीं आता। अस्पृश्यता से तंग आ कर अधिकांश अस्पृश्य हिन्दू जातियों ने इस्लाम कबूल कर लिया या ईसाइयत अपना ली यह यदि सच है तो चमार, धोबी, पासी, धरिकार, निषाद आदि जातियों को इस्लाम में जगह मिल जानी चाहिए थी। इनकी तुलना में बुनकर, जिनकी सामाजिक स्थिति इतनी खराब न थी, पूरे-के- पूरे मुसलमान हो गए और कमाल की बात यह कि मुसलमान होने के बाद भी हिन्दू मुहावरों में बात करते रहे, यह समस्या पर पुनर्विचार करने की मॉंग करता है।‘
‘पुनर्विचार करते हुए तुम कहॉं तक पहुँचे हो यह तो समझूँ। कहीं यह न कह देना कि इनको भी मार पीट कर मुसलमान बनाया गया। तुमने जो लाइन पकड़ी है उसमें यह असंभव नहीं।‘
‘मैं कुछ कहूँ या नहीं, तुमने स्वयं कह दिया। जानते हो न, जबर्दस्त नकार स्वीकार का बहुत खरा रूप होता है। तुम्हारे दिमाग में भी विकल्प के रूप में यही संभावना नजर आई। खैर कभी किसी पूरी जाति को चुन चुन कर मारा जाय और धर्मपरिवर्तन कराया जाय यह उससे भी हास्यास्पद है जितना अस्पृश्यता से तंग आ कर धर्मान्तरित होना। जो विकल्प, मुझे दिखाई देता है उसका कुछ आभास तुलसी दास ने अवश्य दिया है कि सत्ता के मद या समर्थन से कुछ तत्व घरों में घुस कर सिल पत्थर तक तोड़ देते थे। बुनकर के पास सूत और कपड़ा तो होता ही था, यदि जजिया के दौरों में या अन्यथा भी कुछ न मिला तो कच्चा-पक्का माल ही उठाने की नौबत आ जाय तो कुछ दिनों के बाद तंग आकर उनका घुटने टेक देना स्वाभाविक लगता है। ढाके की मलमल की तारीफ तो दुनिया करती थी, बुनकरी का कारोबार किन्हीं कारणों से, जिनमें से एक मणिपुर आदि से उसकी निकटता भी हो सकती है, जहॉं किसी पैमाने पर रेशम के वस्त्र बहुत पहले से बनते थे, इसलिए बारीक से बारीक धागे की प्रेरणा का वह स्रोत रहा हो सकता है। खैर मलमल के उद्योग में पूर्वी बंगाल अग्रणी था और अधिकांश घरों में बुनकरी होती थी। जिन परिस्थितियों की मैं कल्पना करता हूँ उनमें उनके धर्मान्तरण के कारण आज का बांग्लादेश मुस्लिम बहुल होने को बाध्य था। किसी सूफी चमत्कारी का प्रभाव भी इससे जुड़ा हो सकता है। बहुत कुछ रहस्यमय है।
‘तुम्हाुरा जवाब नहीं। बंगाल में लोगों ने स्वेच्छा से इस्लाम कबूल किया था, अल्लाहोपनिषद वहीं लिखा गया था। तुम्हें पता है।‘
‘तुम्ही कह रहे हो कि अल्लाहोपनिषद लिखने वाला अस्पृश्य नहीं रहा हो सकता। तुम्ही कह रहे हो कि किन्हीं परिस्थितियों में वह एक मध्यमार्ग निकाल कर किसी प्रकोप से अपने को और अपने पुराने रीति और विश्वास को बचाए रखने की कोशिश कर रहा था। कोसंबी ने सत्य नारायण व्रत कथा का स्रोत भी बंगाल के सत पीर से तलाशने की कोशिश की, पर यह हिन्दुओं में क्यों अधिक प्रचलित हुआ, इसकी अन्तर्स्तु उस बृहत्तहर भारत की क्यों है जिसमें मसाले के देशों से भारतीय व्यापार होता था और यहॉं से उस मसाले का निर्यात यूरोप तक होता था। मेरी समझ से कथा पुरानी थी और उसको भी पीर से समायोजित करके अपनी जान और ईमान बचाने का एक प्रयत्न हुआ हो सकता है। बंगाल पर आधिपत्य कायम करने वाले सूबेदार बहुत क्रूर थे और उनका दमन करने वाले उनसे भी अधिक क्रूर, क्यों कि वहॉ राजस्थान की तरह प्रतिरोधी शक्तियाँ न थी।‘
‘तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है। हर चीज में बिना समझे बूझे टॉंग अड़ाते हो।‘
‘तुम्हारी इस बात से सहमत हूँ और चाहता हूँ समझ बूझ कर कोई ऐसा इतिहास लिखो जो समझ में आए। तब इतिहास रटने की चीज नहीं रह जाएगा, सुलझी पहेली की तरह ऑंखों के आगे उपस्थित हो जाएगा। मैं केवल यह जानता हूँ कि इस्लाम कबूल करने वालों में राजकीय सेवा में लगने वाले, जजिया आदि से तंग आने वालों में कुछ और विविध कारणों से दंड स्वरूप गोमांस आदि खिलाए जाने पर अपराध बोध से स्वयंको अपने घर परिवार से अलग हो जाने वाले ऊँची जातियों के लोग और चमत्कार में विश्वास करने वाले जनसाधारण जो सूफियों के जाल में फॅसे, अधिक थे।
‘तुम तो उस सूफिज्म को भी कलंकित करने पर आ गए जो प्रेम, भाईचारे और सद्भावना का प्रतीक है। तुमसे क्या बात करें।
‘छोड़ो इसे, मैं खुद अँधेरे में हूँ तो तुम्हें क्या समझाऊँगा, पर प्रेम सद्भावना आदि बड़े भ्रामक शब्द है, जब तक यह न समझ में आए कि किससे, किसका, और क्यों । तुम्हारी घरवाली से कोई पड़ोसी प्रेम करने लगे, या तुम्हारे बच्चे को कोई दूसरा फुसला बहका कर तुमसे विमुख करने लगे तो इनकी अर्थछाया बदल जाएगी। मतलब तो इस्लाम का भी प्रेम ही होता है, यह तुम जानते हो। अरे, तुम नाराज हो कर उठ खड़े हुए अभी तो विषय पर आए ही नहीं।‘
‘ऐसी बातें सुनता रहा तो मेरा भी दिमाग खराब हो जाएगा। धैर्य की भी एक सीमा होती है।‘
Post – 2015-12-28
अस्पृश्यता – ६
“तुम कभी अमेरिका गए हो।” आज वह कुछ पूछता इससे पहले मैंने ही पूछ लिया।
“तुम जा रहे हो? अमेरिका की बात कैसे आ गई? आज तो कहीं गए बिना ही सारी दुनिया को घर बैठे देख लो। अमेरिका जाने की क्या ज़रूरत है।
मतलब नहीं गए हो। कोई बात नही, तुम उस रोज कह रहे थे राज थापर की ‘मेमोयर्स’ तुमने भी पढ़ रखी है। अमरीका के काले लोगों के बारे में उसमें जो टुकड़ा है उसकी याद है?
‘तुम जानते हो मुझे इसकी याद क्यों आई?’
‘याद तुम्हें आई और कारण मैं बताउूं?’
‘मैं सोच रहा था कि राज को इतनी सुविधा थी फिर भी उन्होंने वह तो देखा ही नहीं जो देखना चाहिए था। अमेरिका के मूल निवासी जो नाम मात्र को बचे रह गए थे, उनमें से किसी को देखा होता। किसी से पूछा होता कि तुम अपना इतिहास अपने बच्चों को क्यों नहीं पढ़ाते? पूछा होता तुमने उन सभ्यताओं को कहाँ दफ्न कर दिया जिनकी कुछ उपलब्धिश्यां तुम्हारे उस काल से आगे थीं जब तुम उन्हें मिटा रहे थे? पूछा होता तुम इतने कायर क्यों हो कि उनको विश्वासघात करके, उनकी आदतें बिगाड़ कर, उनमें बीमारियाँ फैला कर मारते रहे और पूरी आबादी का सफाया कर दिया और जो किसी चमत्कार से बचे रह गए उनके माध्यम से उनकी संस्कृति, उनकी भाषा की रक्षा के प्रयत्न करते हुए दुनिया को यह दिखा रहे हो कि हम सम्यता और मानवता को बचाने की कितनी कोशिश कर रहे हैं। पूछा होता विनाश के कगार पर खड़े पशुओं के लिए अभयारण्य बनाने की तर्ज पर तुमने उनके संरक्षित क्षेत्र में दखल देना तो छोड़ दिया, परन्तु उनमें नशे के कारोबार को खुली छूट दे कर तुम उनकी संस्कृति को बचा रहे हो या अधिक विकृत कर रहे हो। चलो, राज किसी शोधयात्रा पर नहीं गई थीं, इसलिए अपनी सीमाओं में उन्होंने जो देखा और जिस दृढ़ता से प्रस्तुत किया उसके कारण मेरे मन में उनके प्रति बहुत सम्मान है।‘
‘जब मैंने पढ़ा था तो विश्वांस नहीं हुआ था। कहीं यह सन्देह था कि अतिरंजना से काम लिया गया । जब अपनी आँखों कुछ चेहरों को, कुछ बच्चों को, वे पता नहीं कहॉं से उस पार्क में बच्चों के खेल के लिए बने कोने में आ जाते थे, देखा तो विश्वास नहीं हुआ कि कितनी वेदना दिन रात झेलते हुए, कितना गुस्सां अपने मन में दबाए हुए, वे आज तक उस संपन्नता के बीच जी रहे हैं और क्यों वह गुस्सा प्राय: अपराध बन कर भड़क उठता है? उतने बुझे हुए चेहरे जिन्हें देख कर कल्पना ही न हो कि वे कभी हँसते भी होंगे, या हँसते होंगे तो कैसे लगते होंगे। केवल एक काला आदमी जो किसी अच्छे पद पर रहा होगा, एक पुस्तकालय में दिखा था जिसके चेहरे पर चमक भी थी और हाव भाव में आत्मविश्वास भी था। यह स्थिति आज भी है।
‘’एक विख्यात संगीतकार की जीवनी पढ़ रहा था, तो पता चला यातनावध की नौबत आज भी आ जाती है, सांप्रदायिक दंगे कुछ राज्यों में भड़कते ही रहते हैं और कोई जगह जहॉं केवल उनकी आबादी हो गोरों के लिए सुरक्षित नहीं मानी जाती न गोरों के बीच वे सुरक्षित अनुभव करते हैं।‘
‘अपने यहाँ क्यों नहीं देखते तुम?‘
‘देख कर ही कह रहा हूँ। यहॉं जुगों से चला आया सामाजिक स्तरभेद है, आर्थिक विषमता और विपन्नता है अशिक्षा है, और इन सब के बीच भी उन लोगों में भी हँसी, मजाक, चुहल होती रहती है. चेहरे पर उदासी के क्षणों में भी वह बुझा बुझा सा भाव नहीं मिलता। तभी मैं कह रहा था कि मनुष्य अपने जीवन में युगों को जीता है केवल वर्तमान क्षण को नहीं। वह दासता समाप्त हो कर भी अन्तर्दाह के रूप में बनी रह गई। उसे हमारे समाज में सामाजिक स्तर भेद और विपन्नताह से पीडि़त जनों में भी नहीं देखा।‘
‘वही देखना बाकी रह गया है?‘
‘मैं तुम्हें वेल्डान जानसन जो बहुत बड़े संगीतकार बने और जो एक काली मॉं से एक गोरे बाप की सन्तान थे, और रंग-रूप बाप का पाया था, उनकी जीवनी के कुछ अंश सुनाना चाहूँगा:
”कोई चारा तो है नहीं सुनना ही पड़ेगा.’
’’ दूसरे काले बच्चों और बच्चियों को वे और अधिक हिकारत से देखते थे। कुछ लड़के अक्सर उन्हें निगर कहते थे। कई बार स्कूल से घर लौटते समय लड़कों का एक झुंड हमारे पीछे लग जाता और फिकरे कसता ‘निग्गर निग्गूर नेवर डाई, ब्लैक फेस ऐंड शाइनी आई।‘ द बायोग्रैफी आफ एन एक्सक-कलर्ड मैन, पृ. 25
’जब स्कूल की छुट्टी होती, मैं बदहोश सा हो जाता। कुछ एक गोरे लड़के ताने मारते, ‘ओए, तू निग्गर है और मैंने कुछ काले लड़कों को यह कहते सुना कि हमें पता था यह भी काला है।‘ 28
’मैंने अपना सिर उसकी (मॉं की गोदी में धसा दिया और बोल पड़ा मां क्या मैं निगर हूँ. मैं उसका चेहरा तो नहीं देख सकता था, पर महसूस किया कि उसने अपना हाथ मेरे सिर पर रख दिया है। 36
’और यह संघर्ष कैसे पहलू बदलता रहा। पहले लड़ाई इस बात को ले कर थी कि क्याा नीग्रो के पास आत्मा होती है । क्या उसे इन्सान कहा जा सकता है। बाद में बदल कर यह हो गई कि क्या उसमें इतनी भी अक्ल होती है कि वह अक्षर ज्ञान और जोड़ घटाना तक सीख सके और आज यह उसकी सामाजिक पहचान की लड़ाई का रूप ले चुकी है। 130
कालों की अपनी प्रतिक्रिया के बारे में वह लिखते हैं-
’उनके मन में सभी गोरों के प्रति एक दबी हुई घृणा है और अपनी जान की वे कोई कीमत नहीं समझते । मैंने कई बार उनके मुँह से सुना है मैं नरक में जाने के लिए तैयार हूँ, लेकिन जो भी गोरा सामने आ गया उसकी तो छुट्टी कर ही दूँगा। 133
मुझे पक्का विश्वास है कि दक्षिण के गोरों के पास, सिर्फ अपनी आज की खुशी के लिए नहीं बल्कि भावी सुरक्षा के लिए भी सबसे जरूरी काम है कालों की संख्या कम करना। … उनकी संख्या् को गोली मार कर या आग में झोंक कर कम नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे इतन हताश हैं कि उनको जितनी भी यातना दे कर मारो, उनकी नफरत और गिरावट को कम करने में असरदार नहीं हो सकती। इस श्रेणी के काले गोरी चमडी़ वालों की हर चीज से नफरत करते हैं और गोरे उन्हें बिगड़ैल खच्चर समझते हैं जिससे काम लिया जा सकता है, पीटा जा सकता है और अगर वह दुलत्ती मारता है तो उसकी जान ली जा सकती है. 134-35 (पन्नोंअ की संख्या किंडिल बुक की है न कि मद्रित पुस्तक की)।
तुम्हारे पास तो पूरी किताब है, पढ़ते जाओ, पर यह पवांरा सुना क्यों रहे हो?
इसलिए कि यह बता सकूँ कि यह कहानी उस अमेरिका की है, जिसने दासता से मुक्ति के लिए एक लंबा संघर्ष किया। जिसमें हैरिएट बीचर स्टोैव जैसे साहित्यसकार शामिल थे, थियोडोर पार्कर जैसे धर्मोपदेश शामिल थे, लायड गैरिसन जैसे जुझारू पत्रकार शामिल थे और जिसने इसके लिए एक ग़ृहयुद्ध लड़ा, जिसके संविधान में समानता को स्थान मिला, जिसमें इतने लंबे समय से सामाजिक सुरक्षा प्रदान की गई है। अनुसूचित जनों और जातियों के लिए यह सुरक्षा हमारे यहॉं अमेरिका के संविधान की नकल पर ही दिया गया लगता है, फिर भी डेढ़ सौ साल बीतने के बाद भी, रंगभेद कानूनी तौर पर समाप्त करने के बाद भी क्या कोई सुधार हुआ? मैं कहना चाह रहा था कि कानून सामाजिक न्याय दिलाने की द़ृष्टि से कितना पंगु है।
तुम चाहते हो जो जैसा है वैसा ही चलने दिया जाय ?
नहीं मैं कहना चाहता हूँ कि यह काम कला और साहित्यद का है। बौद्धिक का है। उसका काम जो अपनी जगह से खिसक कर राजनीति करने लग गया। लेकिन जिस विषय पर बात करने चला था वह तो रह ही गया। अमेरिका का गोरा अमेरिकी काले को अपनी कहानियों और विचारों में जगह नहीं देता. वे अपनी लड़ाई अलग लड़ते हैं. कटुता और अलगाव तो पैदा होगा और बना रहेगा ही. लेकिन जिस विषय पर बात करने चला था वह तो रह ही गया। कल सही।
Post – 2015-12-26
अस्पृश्यता – 5
‘’असली समस्या तो वर्ण के जाति में बदलने की है।‘’
‘’वर्ण जाति में बदलता तब तो जातियाँ होतीं भी तो, चार होतीं। एक एक में कई कई सौ तो न होतीं। विचित्र है एक ही वर्ण में इतनी सारी जातियॉं और उनमें भी ठीक उसी तरह का नीच उूँच का भाव जैसे वर्णक्रम में और उनके काम काज भी एक जैसे, नहीं तो यह मान लेते कि बाकी का विभाजन पेशे के कारण हुआ। कमाल है, कि जो सच्चा ब्राह्मण है, अग्नि के समान है, जिसका खाया और भोगा हुआ ठीक उसी तरह पितृलोक में पहुँचता है जैसे यज्ञ में अग्नि को समर्पित देवभाग देवों तक पहुँचता है, जिस की संज्ञा महापात्र और महाब्राह्मण की है और वही ब्राह्मणों में अस्पृश्यवत नीचे गिना जाता है ।
“यह तो संसर्ग दोष हुआ, यह तुम पहले कह चुके हो।“
“जातियों की समझ से ही हम यह समझ सकते हैं कि हमारा समाज कैसे बना है और हमारी भाषाऍं कितनी बोलियों को रचा-पचा कर अपने वर्तमान रूप में आई हैं।“
“तुम फिर घालमेल करोगे। मुझे सिर्फ यह बताओ कि यदि वर्ण का जातियों से संबंध नहीं है तो ये अस्तित्व में आईं कैसे और आईं तो इनमें स्थिरता कैसे आ गई कि किसी जाति में जन्मत लेने मात्र से कोई व्यक्ति वही काम करने को बाध्य हो जाय?”
‘’जातियाँ वर्ण से असंबद्ध हैं, यह नहीं कह सकते । यह भी नहीं कह सकते कि इनमें गतिशीलता का सर्वथा अभाव था । देखो जब कोई व्यहक्ति कोई काम करता है तो हम यह कह सकते हैं कि यह काम इस कारण हुआ। परन्तु जब ऐतिहासिक परिघटना होती है तो उसमें कई घटक, कई बार, कई कालों के, एक साथ जुड़ते चले जाते हैं और इससे अक्सेर एक चक्र बन जाता है। हम इनके लिए किसी एक को कारण नहीं मान सकते। ’
‘’ठीक है। यह तुमने एक बार पहले भी कहा था।‘’
किसानी की ओर बढ़ने वाला जत्थाए अधिक से अधिक कितना बड़ा रहा होगा ? निकला तो वह आहारसंग्रही समाज से ही था] जिसका आकार पचीस-तीस से अधिक हुआ तो खाद्य संकट आ जाय।‘’
‘’इतने थोड़े से लोगों ने दुनिया बदल कर रख दी?’’
मैं प्रथम चरण की बात कर रहा हूँ, जब यह सूझ किसी स्त्री या पुरुष के दिमाग में आई होगी और उसने अपने जत्थे के लोगों को इसके लाभ नुकसान समझा कर इसे किसी भी कीमत पर कर गुजरने के लिए तैयार कर लिया होगा। अब हम चाहें तो इस जत्थे की जो भाषा थी उसी को आदि आर्यभाषा मान सकते हैं।
एक बार आग लगने के बाद वह कितने क्षेत्र को साफ कर देगी इस पर तो आग लगाने वालों का नियन्त्राण होता नहीं था। वे आग लगा कर वहाँ से खिसक लेते। यह पता ही न चलता कि आग किसी ने लगाई है या दावाग्नि थी। महीनों बाद वे लौट कर उसके जितने हिस्से में कुछ उगा और सींच सकते थे उसे उगाते। जब इसका रहस्य पता चला तब इनको दूसरे सभी मिल कर भगा देते, दु:साहस के लिए दंडित भी करते । ब्राह्मण तो आज तक एक वर्ण है इसलिए यदि बरमपुर, बभनान, बभनौली जैसे नाम मिलें भी तो उनसे कोई मदद नहीं मिलती। परन्तु देवास, देवघर, देवस्थहली, देवली, जैसे नाम जब ऐसे क्षेत्रों में मिलते हैं जो तथाकथित आदिवासियों का निवास रहा है और उपाधि के रूप में देव, देउआ, जैसे प्रयोग दूर दराज तक मिलते हैं तो उनका यह दावा सच प्रतीत होता है कि वे उत्तेर दक्षिण पूरब पच्छिम भागते रहे कि कहीं यज्ञ को स्थाापित कर सकें पर उन्हें हर जगह से भगाया जाता रहा । यज्ञ का मतलब तो जानते हो न।’’
^^जानूँगा क्यों नहीं, अभी वह तेलंगाना का मुख्यहमन्त्री अपने राज्य में भूख से मरने वालों को बचाने के लिए जाने कितने करोड़ खर्च करके पता नहीं कौन सा यज्ञ करा रहा है।**
^^यज्ञ का अर्थ होता है उत्पा दन*। आहार जुगाने की जगह, वन्य प्रघासों को स्वयं पैदा करना। जिस तरह का यज्ञ यह मुख्य मन्त्री करा रहा है, वह उत्पादन की प्रतीकपूजा या नकल है और यह कई हजार साल बाद आरम्भ हुआ, परन्तु इसके पीछे एक सोच भी थी और एक चालाकी भी और इसी से पैदा हुआ उस पुराने ब्राह्मण की जगह वह कर्मकांडी ब्राह्मण जो खेत की जगह वेदी पर फसल उगाने लगा और हल की मूठ पकड़ने तक को, उत्पाादन के किसी भी काम को, अपने लिए अकरणीय मानने लगा – अश्रमेण शरीरस्य् कुर्यात् धनसंचयम्। परन्तुत इसे एक क्षीण याद इस बात की बनी रही कि जंगल की सफाई करके खेती योग्ये ब्राह्मणों ने या देवों ने बनाया था इसलिए ये अपने को भूदेव भी कहते रहे और इस बात का दावा भी करते रहे कि समस्त धरती अर्थात् कृषि भूमि का स्वामी ब्राह्मण है और उसी की कृपा से सारी दुनिया को आहार और वस्त्र मिलता है। यूँ तो मैंने मनु (मनु. 1.100-101) के इस कथन का अपने अपने राम में उपहास किया है, परन्तुा उसका ऐतिहासिक आधार यही है। अरे यार तुम्हें कभी हरबंस मुखिया मिल जायँ तो उन्हें कह देना अपने फ्यूडलिज्म वाले लेख में जिसे उन्होंने किसी संस्क़ृतज्ञ के सहारे भूछिद्रन्याप समझ लिया है, वह भूमि छेदन्याय है। भूछिद्रन्याय पातालसोख पानी वाले कुँए जैसे अक्षय दानी के लिए प्रयोग में आता है और यह जमीन को खोद कर खेती योग्य बनाने वाले के जमीन पर अधिकार का मामला है।
‘’बीच बीच में तुम अपना ज्ञान बघारने लगते हो। विषय पर तो टिके रहो।’’
‘’तो यदि यज्ञ उत्पादन है, उसी के कारण ब्राह्मण ब्राह्मण बना, भूदेव बना, तो आज के देव और ब्राह्मण तो वे हैं जिन्हें तुम शूद्र मानते हो, क्योंकि उत्पादन और संभरण के सारे काम उन्होंने सँभाल रखे हैं और तुम उन असुरों की तरह उत्पादन करने वालों को उत्पीोडि़त करते रहे।
‘खैर, देव कहीं टिक कर अपना काम करना चाहते थे। आरंभ में उनको न यह सूझा कि कोई दूसरा काम करे और वे आराम करें, न उन्होंने किसी को अपना सेवक बनाया। टिक कर खेती करने का सुयोग कहीं पूर्वोत्तंर में मिला। ठीक किस अंचल में स्पाष्ट नहीं है, पर अनुमानत: यह पश्चिमी बिहार और पूर्वी उत्तंर प्रदेश के उत्तर में कहीं आज के नेपाल में था। जहाँ भी यह था इसे देवभूमि कहा गया। इसके साथ स्था्यी आवास और स्थांयी खेती आरंभ हुई। उनकी अगली आकांक्षा थी कि कृषिकर्मियों की संख्या् बढ़े जिससे उनकी शक्ति बढ़े, इसे यज्ञ का तन्वन और यज्ञविस्तािर कहा गया है। यह प्रयत्न बहुत बाद तक चलता रहा। मूल सरोकार शान्ति से रहने का था। यदि दूसरे जन भी खेती और पशुपालन और अर्थार्जन पर ध्यान दें तो वे लूट-पाट बन्द कर देंगे और उनकी खेती-बारी और व्यापार बिना किसी खतरे के चल सकेगा। किसानी और बागबानी के लाभ वे दूसरों को भी समझाते। इसी को वे आर्यव्रत कहते थे, जो आर्या व्रता: विसृजन्तक: अधिक्षमि, या कृण्वकन्त: विश्वरमार्यम् में उद्घोषित है। उनका लक्ष्य सभी को आर्य बनाने का था किसी को शूद्र बना कर रखने का नहीं था। इसलिए जो आगे नहीं बढ़ सके, स्वयं खेती करने को पातक मानते रहे, बाद में उन्हीं खेतिहरों की सेवा में दूसरे प्रलोभनों से सारे काम करते रहे।‘’
‘’मुझे तो लगता है खेती को पातक मानने वाली मानसिकता कहीं बुद्ध तक में चली आई थी।‘’
‘’कभी कभी तो तुम ठीक सोच ही लेते हो,पर उधर मुड़ेंगे तो फिर भटक जाएँगे।‘’
‘’जिन कामों को उद्योगविद्या से जुड़ा काम कहते हैं और जो शूद्रों के द्वारा किया जाता रहा वह भी खेती के पातक से बचते हुए भी किसानों से अनाज पाने की लालसा से प्रेरित था, किसी ने उनको इस बात के लिए बाध्य नहीं किया।
जिसे हम वैदिक समाज कहते हैं, या आर्य जन कहते हैं, उसमें खेती अपनाने के साथ दूसरे बहुत से जन मिलते गए, परन्तुन खेती का आरंभ जिन्हों ने किया था उनसे ही इसकी विद्या सीखनी थी इसलिए उनकी भाषा प्रधान बनती चली गई और दूसरे जनों की भाषाओं के शब्द और दूसरे तत्व उसमें मिलते गए। हमारे ज्ञात इतिहास में शाक्यों के किसानी अपना कर क्षत्रिय बनने का उदाहरण सामने है। शाक्य में शक गणों की छाया दिखाई देगी। यह साकेत, साकल, सक्सर जैसे नामों भी मिलेगा। इसी तरहए काशी, कुशीनारा से लेकर कश्मीर तक के नामों से पता चलेगा कि कस/खस खसिया की पहाडि़यों तक सीमित नहीं थे, इनका क्षत्रियों और दूसरे जनों में उत्थानन हुआ। कोलिय जिनकी युवती से सिद्धार्थ ने विवाह किया था, उसके मूल को कोल जनों में तलाश सकते हो। लिच्छ।वियों, मल्लों के साथ भी यही हुआ। जो जन स्वयं अपनी पुरानी वर्जनाओं से मुक्त हो कर खेती का सहारा ले कर आत्मोनिर्भर बन गए वे सभी क्षत्रिय बन गए। बन तो गए, पर अपनी पुरानी जनजातीय अस्मिता पर उन्हेव गर्व था। दूसरे भी उनको अपने बराबर नहीं मानते थे। इस तरह एक ही क्षत्रिय वर्ण में अनगिनत उपजातियाँ। इनके बीच एक दूसरे से श्रेष्ठ होने के दावे। यह दावा भी रक्त से संबंधित नहीं था। पुराने ब्राह्मण नये नये बने ब्राह्मणों को या शिक्षा आदि से जुड़े नये जनों को अपनी बराबरी का नहीं मान सकते थे। पहले तो उूपर उठने वालों को उस वर्ण का दावा स्वयं करना होता जिसे पुराने मानने को तैयार नहीं होते। फिर आर्थिक संपन्नाता बढ़ने पर उनकी लड़की को विवाह में स्वीेकार किया जाता, क्योंकि अनुलोम में लड़की अपने से हीन जाति की ही होनी चाहिए। इस तरह ये रिश्तेि बढ़ते और फिर यह भूल जाता कि वे कभी जनजातीय पृष्ठनभूमि से निकले थे। परन्तु अकाल आदि दुर्दिनों में किसी वर्ण के लोगों को यदि स्थानान्तकरित होना पड़ता तो उस क्षेत्र में उस वर्ण के जिन जातियों या उपजातियों के लोगों की संख्याू अधिक होती उन्हें श्रेष्ठ् मानना ही होता। वैश्यों में से कुछ के क्षत्रिय बनने के हवाले या ऐसे दावे कि वे पहले क्षत्रिय थे मिल जाऍंगे। बैसवाड़ा बैस क्षत्रियों का निवास है, गुप्त वंश के बारे में भी ऐसे मत हैं। मौर्यों के विषय में कहानियॉं हैं। नन्द भी इससे बचे नहीं । कहो यदि किसी ने बाहुबल से किसी क्षेत्र पर अधिकार कर लिया और अपने को क्षत्रिय घोषित कर दिया तो देर सवेर उसे क्षत्रिय मान लिया जाता था । एक तेली है, तेल पेरने का काम करता है इसलिए वह शूद्र है, वह तेल का व्या पार करने लगता है, या सुगन्धित तेल का कारोबार करता हुआ गंधी बन जाता है जो वह बनिया हो जाता है। परन्तु उनकी इस उूर्ध्व गति में बाधक ब्राह्मण नहीं बनता था, उसी वर्ण के पुराने लोग बनते थे। यदि वे संपन्न हैं और ब्राह्मण को दान दक्षिणा देते हैं तो वह बिना किसी अवरोध के उनके विवाह आदि के संस्का्र करा देगा। वह उनके उच्चणवर्ण में या अवर्ण समाज से वर्ण समाज में प्रवेश में सहायक ही रहा है, बाधक नहीं। आक्रमणकारियों ने भी यहाँ के वर्ण समाज में इसी तरह जगह बनाई। परन्तुह ब्राह्मण का यह आग्रह बराबर रहा है कि वर्णसमाज बना रहे क्योंकि इसके चलते ही सामान्य आर्थिक स्थिति में या विपन्नता की स्थिति में रहते हुए भी वह अपनी सामाजिक श्रेष्ठता कायम रख सकता था।
तो जातियों के वंशागत होने का एक प्रधान कारण अपनी जनजातीय पहचान को बचाए रखने की चिन्ता और दूसरों को इधर से उधर होने से रोकने की चिन्तात रही है। सभी जातियों की स्थिति यही रही है और निर्वासित होने, पराजित होने आदि की स्थितियों में वनगमन करने वालों ने जनजातीय जीवन अपना लिया, और अपने पूर्वजों के क्षत्रिय होने का दावा करते हैं। परन्तु कुछ भी ऐसा न था जो आसान था, कुछ भी ऐसा नहीं जो असाध्य था।
२६/१२/१५ १६:५१:४०
Post – 2015-12-25
अस्पृश्यता . 4
“अस्पृश्यता की सबसे अधिक पीड़ा उनको भोगनी पड़ी है, जिनके कारण यह दुनिया हमारे रहने लायक बनी रहती है।“
‘‘तुम किसके बारे में बात कर रहे हो?’’
‘‘उनके बारे में जिनको अपने नाम के साथ वाल्मीकि लगाना पड़ता है।’’
‘‘लगता है तुमसे कोई ज्यादती हो रही है।’’
वही सूनापन, वही अविश्वास और विस्मय का मिला जुला रूप जो उसकी आँखों में ऐसे मौकों पर झाँकने लगता है।
‘‘अभी नहीं समझ पाओगे। पहले यह बताओ दिल्ली से सटी एक छोटी सी जगह है दुमका।’’
‘‘फिर भागने लगे तुम। उसने जबान होठों पर फेरते हुए उनका गीलापन कम किया।’’
‘‘इसी तरह के दूसरे बहुत से नाम है, डुमरियागंज, डुमराँव, डुमरी, डोमिन गढ़ । और पीछे इतिहास में लौटो तो बुद्ध काल में डोम्भी गाम। मेरे गाँव के पास एक छोटी सी जगह है उसे डेमुसा कहते हैं। बाद में खयाल आया यह भी डुमसा ही रहा होगा। यह इसलिए याद दिला रहा था कि तुम्हें बता सकूँ कि यह एक बहूत प्रतापी गण था और बहुत दूर-दूर तक इनका प्रसार था। लेकिन आहार संग्रह और आखेट के चरण पर इन्हें किसी दूसरे जानवर का मारा हुआ शिकार किसी तरह हाथ लग गया या कोई मरा जानवर मिल गया तो उसका आहार करने में इनको न संकोच था। उसका शिकार किया या वह मरा मिल गया, फर्क क्या पड़ता है। कृषिजीवी समाज में व्याधि और रोग की चिन्ता प्रधान थी इसलिए वे ऐसा नहीं करते थे। अपने मृत पशुओं को वे उन्हें सौंप देते थे, उनके शिकार की जरूरत पूरी हो जाती थी।“
‘‘मैंने किसकी समस्या उठाई और तुमने किनकी कहानी सुनानी आरंभ कर दी।’’
‘‘मै यह याद दिला रहा था कि डोम राजा या डोमिन गढ़ जैसे पदों से ही नहीं, इनकी बिरादरी पंचायतों से भी, इनके लिए महरा और महरी के प्रयोग से भी इनके जनजातीय इतिहास की वैसी ही झलक मिलती है। परन्तु क्या कोई स्थान नाम भंगी या मेहतर या हेल्ला नाम से देखा या सुना है। कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है?’’
वह कुछ विस्मय और कुछ अनिच्छा से, आधे मन से मेरी बात सुन रहा था। देख अवश्य मेरी ही ओर रहा था।
मैंने कहा, ‘‘डोम या चमार पहले भर्त्सना में एक साथ प्रयोग में आते थे। परन्तु चमार चर्म उद्योग से जुड़ने के कारण एक व्यावसायिक नाम है और इस रूप में यह लोहार, बढ़ई, कुम्हार आदि की तरह एक पेशे का नाम या पेशे से जुड़ी जाति है। जब कि डोम पेशे का नहीं, कोलों, भीलों, संथालों की तरह एक जनजातीय संज्ञा है, जो अपनी पुरानी खानपान की रीति के कारण एक ऐसे पेशे से जुड़ी रही जिसे गर्हित माना जाता था ।
‘‘पर सफाई के पेशे के लिए हिन्दी सा संस्कृत में कोई संज्ञा नहीं मिलेगी। हाल में नया शब्द गढ़ा गया। मिलेगी केवल फारसी में मेहतर, फर्राश, झाड़ू बरदार, हेल्ला।’’
‘‘भंगी क्या फारसी शब्द है?’’
‘‘सुनो, पहले सुनो, मैं तुम्हारी किस गलती की बात कर रहा था। मुहावरा है ‘मार-मार कर भंगी बना देना।‘
‘‘हाँ, एक और अन्तर तुम्हें मिलेगा। चमार या डोम एक जन से निकले और एक जाति बने रहे, इनकी उपजातियाँ नहीं हैं, इनके उपनाम नहीं हैं। अपनी ओर से राम, या रैदास, हरिजन जैसे उपनाम अपनाते रहे हैं। वाल्मीकियों की दर्जन से अधिक उपजातियाँ हैं। उनमें अनेक का दावा है कि वे राजपूत हैं । वे शहरावत, रजावत, चैहान, तोमर, राजवंशी आदि उपनाम भी लगाते हैं। ये वे राजपूत हैं जिन्होंने असह्य यातनाओं को सहन करते हुए भी धर्मान्तरण स्वीकार नहीं किया, परन्तु भूख और यातना ने अन्ततः उनके मनोबल को तोड़ ही दिया और उस जघन्य काम को करने पर मजबूर कर दिया जिसकी वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे। इस अधोगति के बाद भी रहेंगे हिन्दू ही। धर्म नहीं बदलेंगे। विश्वास करने को जी नहीं करता, पर अविश्वास का कोई कारण नहीं दीखता।’’
‘‘तुम तो हर चीज को सांप्रदायिक रंग दे देते हो, और फिर भी आड़ मार्क्सवाद की लेते हो। मल निस्तारण का काम करने वालों में मुसलमान नहीं होते?’’
‘‘मैं जानता था, यह सवाल तुम जरूर पूछोगे और ठान रखा था कि तब मैं पूछूंगा, उनको अधोगति में क्या ब्राह्मणों के विधान ने पहुँचाया? पूछूंगा, मनुस्मृति में कोई ऐसा विधान है कि अमुक अपराध के दंड स्वरूप किसी को अमुक जाति में डाल दो या उससे अमुक काम कराओ।’’
‘‘मेरी ऐसी किताबें पढ़ने में कोई रुचि नहीं जो हमें दो या चार हजार साल पीछे ले जाती हैं। वे तुम्हें मुबारक हों। मैं तो यह जानता हूँ कि मलनिस्तारण करने वाले हिन्दुओं को डोम और भंगी कहा जाता था।’’
‘‘तुम ठीक कहते हो, पर ये उनके उपनाम नहीं हैं। इनका प्रयोग वे नहीं करते, दूसरे उनके लिए करते रहे हैं। मुझे लगता है, इसका इतिहास कुछ जटिल है। तुम भी इस पर विचार करना। उपनाम एक दिन में बदले या अपनाए जा सकते हैं, परन्तु उपजातियाँ एक झटके में नहीं बनाई जा सकतीं। इस पेशे में ऐसा कोई आकर्षण नहीं है कि इसे कोई स्वेच्छा से चुनता। फिर हमारे यहां क्रीतदास से भी कोई ऐसा काम न कराया जा सकता था जो उसकी मानवीय गरिमा के विपरीत हो। इसके अतिरिक्त हमारे यहाँ हिजाब की वह धारणा नहीं थी जो इस्लाम में थी।
“असूर्यंपश्या क्या फारसी का शब्द है?”
“यह राजाओं के अन्तःपुरों की कल्पना है। सामान्य व्यवहार में ऐसा न था।“
‘‘फिर यह भी देखो कि मुस्लिम सफाई कर्मियों को मेहतर और हेल्ला कहा जाता था। हेल्ला का मतलब जानते हो न?
जानता हूँ और उस मुहावरे को भी ‘टु हेल विद यू।’
‘‘नरक के रास्तों की तुम्हारी जानकारी ब्राह्मणों से भी अधिक अच्छी है। पर हेल्ला से मुझे लगता है कि पहली पार इसे पारसियों ने सिकन्दर की विजय के बाद सीखा होगा और ग्रीक अपने युद्ध बन्दियों को अमानवीय स्थितियों में रख कर अमानवीय कार्यो के लिए विवश करते रहे होंगे और फिर यह शब्द और यह प्रथा उनके बीच प्रचलित हुई होगी। भारतीय समाज में नगर भी बहुत बड़े नहीं होते थे और उनके बीच भी खाली जगहें होती थी जिनमें परदे के लिए कुछ सदाबहार झाड़ियाँ लगी होती थीं । यह बच्चों और महिलाओं के लिए संरक्षित होता था पुरुषों को पिबटने के लिए नगर या बस्ती से दूर मैदान जाना, जंगल जाना पड़ता था। निवास के ही किसी कोने में मलविसर्जन का भी प्रबन्ध हो यह उनकी शुचिता की अवधारणा के विपरीत था।
‘‘मैं यह याद दिलाना चाहता था कि पुरुष सूक्त पढ़ते ही जिन लोगों को यह इल्हाम हो जाता है कि ब्राह्मणों ने वर्ण व्यवस्था कायम की उन्हें यह मानना चाहिए कि कोई सूक्त लिख कर कोई न वर्णव्यवस्था कायम कर सकता था, न जाति व्यवस्था। इनका अपना जनजातीय आधार और जनजातीय स्रोत रहा है और शेष काम अर्थतन्त्र ने किया है। केवल अन्तिम यातना और उत्पीड़न के सहारे मध्यकाल में अस्तित्व में आया। इससे पहले मरे हुए कुत्ते बिल्ली को हटाने तक का काम ही सबसे गर्हित माना जाता था।
श्मशान आदि के कर्मियों और महापात्रता आदि को जो भी ब्राह्मणों के बनाए नहीं बना। ब्राह्मणों में सच्चे ब्राह्मण तो महापात्र ही हैं क्योंकि उन्हें अर्पित आहार से ले कर सुविधा के दूसरे सामान दूसरे लोक तक पहुँचते हैं, पर मृत्यु और श्मशान से जुड़े ब्राह्मण भी अस्पृश्यों जैसे ही निरादर के पात्र थे।
“क्या इस विकृति को समाप्त नहीं किया जा सकता?”
“किया जा सकता है यदि इसका संकल्प हो। हमारे नेतृत्व में अदूरदर्शी लोग हैं जो सोचते हैं कानून बना देने से काम पूरा हो गया। किसी को उसके जाति नाम से पुकारा नहीं जा सकता। परन्तु जलमल प्रबन्धन में अमानवीय कार्यो को समाप्त करने के लिए यन्त्रों और रोबोटों का प्रबन्ध तो किया जा सकता है। सफाई कर्मचारियों को वेतन अधिक दे कर उनको वर्दी और दस्ताने आदि दे कर उनकी स्थिति में सुधार तो किया जा सकता है। उनकी जीवनशैली में बदलाव तो लाया जा सकता है। उनके बीच जागरूकता तो लाई जा सकती है। जब तक गन्दगी के साथ किसी का सम्बन्ध रहेगा उसके साथ क्षद्म भेदभाव बना रहेगा। परन्तु दलित नेताओं की भी दिलचस्पी अपनी राजनीति के लिए दलितों का उपयोग करने तक सीमित है। टट्टी का अर्थ तो टाट ही होता है, मल नहीं, झाड़ा का अर्थ जंगल होता है, पाटी का अर्थ पोटरी होता है, शौच तो शद्धि है, पर जब शब्द तक अपना अर्थ बदल देते हैं तो आदमी के उससे जुड़े रहने पर दिखावा कुछ भी हो क्षद्म परहेज़ बना रहेगा।“
12/25/2015 10:29:33 AM
Post – 2015-12-24
कल
Post – 2015-12-23
अस्पृश्यता – 3
“तो तुम कहते हो स्मृतियों में जो विधान है उसके अनुसार दंडित करके किसी को हीन जाति में नहीं डाला जाता था, फिर इनके विधान का क्या मतलब?“
“यदि मैं कहूँ कि ये सामाजिक व्यवहार और समाज के विविध जनों की अपनी रीतियों, नीतियों, परम्पराओं को अभिलेखबद्ध करते हैं, एक तरह का सर्वेक्षण हैं तो तुमको अटपटा लगेगा, परन्तु आठ तरह के विवाह में क्या यह विधान है कि इनमें से किसी तरीके से विवाह किया जाना चाहिए। नहीं, वे उन रीतियों को दर्ज करते हैं जिनका आटविक समाज से ले कर सभ्य समाज तक में चलन था और कुछ को निन्दनीय मानते हैं, कुछ को श्रेयस्कर, परन्तु यदि उनमें से किसी भी रीति से कोई पति-पत्नी की हैसियत से रहता है तो उसकी संपत्ति या संतान के अधिकारों को मान्यता देनी होगी। तो विधान लोक व्यवहार से आ रहा है, स्मृतियाँ आदेशपरक नहीं है, या हैं तो अपराधों पर दंडविधान के मामले में । परन्तु ये वाद भी सामान्यतः धर्मपीठ या न्यायपीठ तक पहुँचते ही नहीं थे। निपटारा स्थानीय स्तर पर ही हो जाता था, स्वजातीय भी और अन्तर्जातीय भी।
‘’ब्राह्मण भी अपनी विरादरी पंचायतों से मुक्त न थे और यह संस्था आदिम समाज से चली आई थी। हमारे इतिहासकार जब कहते हैं कि शाक्यों में उनका अपना निर्वाचित राजा होता था और यह पद बदलता रहता था तब अधूरी सूचना देते हैं । सच यह है कि इन सभी बिरादरियों के अपने राजा या प्रधान होते थे जिन्हें राउत, या महतो या महरा (महाराज) आदि राजसूचक पदों से अभिहित किया जाता था और इनका निर्वाचन होता था. हमारे घरों की महिलायें इनके किसी सदस्य का नाम लेने के साथ उनका यह पदनाम अवश्य जोड़ती थीं। तो केवल शाक्यों के प्रत्येक सदस्य के साथ ही राजा नही जुड़ता था, प्रत्येक जन के प्रत्येक सदस्य को उनके प्रधान की पदवी के साथ याद किया जाता था भले वे सेवाकार्य में नियुक्त हों. पेशे से अलग यह कबीलाई गरिमा उनकी सामाजिक पहचान थी और इसका सम्मान सभी करते थे.
“उनकी पंचायतों का संचालन जिस गरिमा से होता था उसका दर्शन हमारी संसद या विधान सभाओं में इतने सुशिक्षित सदस्यों के होने के बावजूद या आज की पंचायतों में नहीं होता। इसे मैंने अपनी आँखों से देखा है। उनमें भी जो अभियुक्त अपनी बात सलीके से नहीं रख सकता था उसके पक्ष को प्रस्तुत करने वाले वकील या अधिवक्ता की भूमिका उनके बीच का ही कोई दूसरा व्यक्ति निभा सकता था। तुम जानते हो, वकील के लिए अधिवक्ता शब्द ऋग्वेद से लिया गया है – अधिवक्ता और उपवक्ता दोनों । हमारे इतिहासकार किताबों पर निर्भर थे, जीवन अनुभवों पर नहीं, इसलिए पालि ग्रन्थों में यदि शाक्यों के बारे में यह पढ़ा तो इसे उन्हीं तक सीमित मान लिया।
जो चीज़ भारतीय समाज को इतने ऊँच-नीच, तनाव और स्पर्धा के बाद भी एक दूसरे से अदृश्य रूप में बांधे हुआ है वह जातीय अवचेतन में घुसा यह बोध है कि हम सभी एक ही पृष्ठभूमि से निकले और समान दाय वाले लोग हैं. बिरादरी पंचायतें आज बहुत निर्बल हो गयी है. सामाजिक आर्थिक गतिशीलता के दबाव में वे प्रभावकारी हो भी नहीं सकती. परन्तु अस्पृश्यता का एक पक्ष उनके दंडविधान से जुड़ा रहा है.
एक दूसरे का सम्बन्ध आरोग्य से जुड़ा है. एक स्त्री ऋतुकाल में, प्रसूति काल में, अस्पृश्य रहेगी. किसी के परिवार में कोई मृत्यु हुई है, कारण का पता नहीं, कोई संक्रमण भी हो सकता है, इसलिए एक नियत अवधि तक उसका परिवार अस्पृश्य बना रहेगा, और उसके बाद ही सुरक्षित माना जायेगा और फिर साथ उठना बैठना खाना पीना समारोह के साथ आरम्भ होगा. जिस जूते को पहन कर आप जाने कहाँ से होकर आये हैं उन्हें उतार कर ही घर में प्रवेश करेंगे. इनमे से कुछ का ध्यान आई.सी.यू. में तो रखा ही जाता है. तुम्हारी जानकारी में सब है. मैं तो सिर्फ याद दिला रहा हूँ. इसी का विस्तार उन पेशों या कामों तक हुआ जहाँ स्वच्छता का निर्वाह संभव नहीं. निषाद अश्पृश्य नहीं हैं परन्तु मछियारी के काम से जुड़े स्थान, वस्त्र आदि से दुर्गन्ध आती है. बुनकर का काम भला चंगा है पर धागे में मांडी लगाने की विवशता और बरसात आदि के मौसम में सूखने के लिए डाले गए धागे से आती दुर्गन्ध और फिर इसका विस्तार ऐसे सभी पदार्थों तक, लहसन और प्याज तक जिनसे ‘दुर्गन्ध’ आती हो. हम स्वयं अपने गंदे हाथ से कुछ छू नही सकते. आजकल रोज विज्ञापन आता है कि किसी भी मलिन चीज़ का स्पर्श करने के बाद अपना हाथ अच्छी तरह धोएँ.
“इसका ही विस्तार कुछ कामों, पेशों, स्थानों – जैसे श्मशान, और वस्तुओं तक हुआ होगा?”
“ठीक कहते हो. पर इसका गर्हित पक्ष यह था कि इसे जन्म और जाति से जोड़ लिया गया. इसका भी कारण यह कि पहले परिवार के काम और पेशे के अतिरिक्त जीविका का दूसरा कोई रास्ता न था. परन्तु बाद के समय में, या स्नान आदि के बाद स्वच्छ कपड़ों में होने के बाद भी इसका व्यक्ति से जुड़ा रहना अमानवीय और दंडनीय दोनों है.”
“मूर्खतापूर्ण भी क्योंकि ऐसा कोई मलिन काम नहीं है जिसे एक मां अपने बच्चे या बीमार के लिए या हम स्वयं अपने आशौच में न करते हो। स्वच्छ होजाने के बाद इनका नाम या जाति से चिपके रहना कितना अतर्क्य है? परन्तु साथ ही कितने अतर्क्य हैं हमारे पूर्वग्रह। सबसे कठिन संघर्ष हमें उनके साथ ही करना होता है।“
“तुम्हारी जानकारी में खान पान से इसका कोई सम्बन्ध नहीं?”
“खान-पान से भी रहा है, परन्तु कुत्ते और बिल्ली आदि या कहो, मांसाहारी पशुओं का मांस खाने वालों के प्रति।“
“कुत्ते और बिल्ली का तो एक आर्थिक पक्ष भी रहा होगा। बिल्ली चूहों का शिकार करके और कुत्ता रखवाली के कारण हमारे सबसे उपयोगी पशुओं में था।“
“तुम ठीक कहते हो, शायद यही मुख्य कारण रहा होगा।”
“गो वध पर प्रतिबन्ध लगने के बाद सबसे उग्र प्रतिक्रिया गोमांस भक्षी जनों के प्रति हो गया जिसकी एक धुंधली तस्वीर हमारे सामने है.
“परन्तु एक बात जानते हो. खान-पान की अस्पृश्यता एक तरह का बराव है, इसका ऊँच-नीच से कोई सम्बन्ध नहीं. हमारे गांव में कोइरी, साग-सब्ज़ी उगाने वाले असामी कंठी धारी थे. वे हमारे घर में कच्चा खाना नहीं खाते, पक्का चलेगा. कच्चा याने पानी से पका, पक्का घी में तला. कारण क्षत्रिय परिवारों में सामिष आहार वर्जित नहीं है. वे भगत या निरामिष. चमारों में भी कुछ भगत हो जाते थे और उनका सामाजिक दर्जा कुछ बदल जाता था. हिन्दू ज़मींदारों और मुस्लिम ज़मींदारों में जहाँ शादी व्याह में आना जाना होता था वहाँ मुस्लिम आतिथेयी स्वयं अलग चूल्हे, ब्राह्मण रसोइये का प्रबंध करते थे. हमारे परिवार में मेरे दादा जी मांसाहारी थे. लगभग नित्य शाम को, वह स्वयं पकाते. जिस बर्तन में मांस पकता वह एक किनारे पड़ा रहता और इस बात का ध्यान रखा जाता कि दूसरे बरतन उससे छू न जाएँ. दूसरा बर्तन छू गया तो अपवित्र हो गया. अब उसे फिर पवित्र करने के लिए उसमें जौ रख कर गधे को खिलाना होगा। उसकी सांस से बर्तन पवित्र हो जाएगा। इतिहास कैसे-कैसे कोनों में बचा रहता है. देवों के वैद्य अश्विनीकुमार जो गर्दभी पुत्र माने जाते हैं उनके स्पर्श से और उनके श्वास से बरतन पवित्र हो गया. छूत मिट गयी.
“पक्के शाकाहारी ऐसे होटलों में खाना नहीं खाते जिनमे आमिष आहार बनता हो.”
“शाकाहार और मांसाहार में तुम किसे ठीक मानते हो?”
“भाई अपने लिए ठीक तो शाकाहार को ही मानता हूँ पर मांसाहार से परहेज़ को पिछड़ापन भी मानता हूँ. खानपान में वर्जनाएँ हमारी समायोजन क्षमता को कम करती हैं. वर्जना से मुक्ति आपको किसी भी परिस्थिति में जीने में सक्षम बनाती है. हमारी भारतीय चेतना अहिंसा प्रेमी है इसलिए जो मांसाहारी हैं वे भी शाकाहार को श्रेयस्कर मानते हैं.
“परन्तु खेती को हानि पहुंचाने वाले जानवरों का शिकार किये बिना कृषि का विकास नहीं हो सकता था, इसलिए खेतिहर समाज अमिषाहारी होने को बाध्य था. ब्राह्मण आग्रहपूर्वक मांसाहारी बने रहे इसका भी एक कारण यह हो सकता है, यद्यपि वे कृषिकर्म से ही नहीं श्रमकार्य से ही विरत हो गए थे. किसान खेती में उपयोगी जानवरों के वध के विरोधी थे. इसलिए ऋग्वेद में गाय को माँ माननेवाले किसान और वैश्य हैं जिनके देवप्रतीक मरुद्गण हैं. ब्राह्मण का तो न अमांसो मधुपर्कः स्यात.
12/23/2015 11:32:46 AM
Post – 2015-12-23
I have edited the horrible post of yesterday. Thanks to Pradip Parashar ji. My Hidni option is again ineffective.