Post – 2018-03-31

संवाद, विवाद और विचार

एक मित्र ने यह पूछा, आप तो किसी भी समस्या पर निष्पक्ष होकर, पूरी गंभीरता से लिखते हैं, फिर भी जब कुछ लोग उल्टे-सीधे प्रश्न करते हैं तो आपको कैसा लगता है ? उनके प्रश्न का उत्तर तो मैंने यथास्थान दे दिया पर लगा इस पर दूसरों के लिए भी अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने की जरूरत है।

समाज की पहली शर्त है कि आप किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए बहस करें न कि अपनी विद्वत्ता या भाषा का कमाल या विदग्धता के प्रदर्शन के लिए। Facebook को मैं बहुत महत्वपूर्ण मंच मांगता हूं । ऐसा मंच इससे पहले न था, न इसकी मैंने कल्पना की थी । किसी बड़ी से बड़ी गोष्ठी में सभी को अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिलता। समय की सीमा होती है। पाठक भी ऊबने के बाद भी फंसे रहते हैं।

Facebook के साथ इन दोनों में से कोई सीमा नहीं होती। किसी भी समय पर, किसी भी विषय पर, एक साथ कितने भी लोग अपने विचार प्रकट कर सकते हैं और इस बात की चिंता किए बिना प्रकट कर सकते हैं कि उनके पाठक उसे ग्रहण करते हैं या नहीं। यदि विचारों में कोई सार है, यह समस्या सार्थक है तो, कुछ लोग पसंद करने वाले मिल ही जाते हैं.। परंतु Facebook की एक सीमा यह है इसमें श्रोता नहीं होते, मित्रों की एक मंडली होती है जिनकी संख्या रूचि और रुझान के अनुसार बढ़ती जाती है और यदि किन्ही कारणों से Facebook मंच पर मान्यताओं के शिविर बन जाते हैं तो सहमति और असहमति के दायरे पहले से ही निर्धारित हो जाते हैं, विचार अपना सारतत्व खो देता हैऔर मत विभाजन की स्थिति आ जाती है ।

मुझे लगता है इसके कारण इतने महत्वपूर्ण और दुर्लभ मंच का भी हम सही उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। लोग लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए चुटकुले बाजियां, हल्की टिप्पणियां, अनुचित आरोप, सचेत रूप में तथ्यों की लीपापोती करते रहते हैं जिससे उनका भले मनोरंजन होता हो, पाठकों का बहुत समय व्यर्थ चला जाता है . यदि इसे राष्ट्रीय बौद्धिक ऊर्जा के सदुपयोग या दुरुपयोग के रूप में देखा जाए तो दुरुपयोग का पलड़ा भारी रहेगा।

मुझे Facebook उन विषयों को उठाने और उन पर कुछ कहने का अवसर मिला है जिन के विषय में मैं सोचता था अपने जीवनकाल में उनको उठा भी पाऊंगा या नहीं। इतिहास, भाषा, समाज, संस्कृति, धर्म से जुड़े हुए सवालों के विषय में मुझे असंतोष रहा है कि इनकी बुनियादी जानकारी तक उन लोगों के पास नहीं है जो इस के अधिकारी विद्वान होने का दावा करते हैं। रुचि की विविधता और मेरी अपनी अपेक्षा के अनुसार तैयारी का जो स्तर होना चाहिए उस पर अपने को पूरा न पा कर पाकर लगातार दुविधा की स्थिति बनी रही। परंतु यह विश्वास अधिकारी कहे जाने वाले लोगों से मेरी समझ अधिक अच्छी है, मैं बिना किसी आशंका और दुविधा के अपने मंतव्य, मेरी ज्ञान सीमा में आने वाली जानकारी और प्रमाण और औचित्य के साथ रखने का साहस फेसबुक के कारण ही जुटा सका हूं और अपेक्षा करता हूं कि मेरी कमियां दूसरों की आलोचना के द्वारा दूर हों, जिससे मेरी मान्यता भले गलत हो जाए पर उस विषय पर सामाजिक समझ अवश्य पहले से ही अधिक अच्छी होती चले।

इस बुनियादी समझ के कारण मुझे असहमतियों की प्रतीक्षा रहती है। यदि किसी ने किसी कमी की ओर ध्यान दिलाया या कोई ऐसा पहलू विचारार्थ प्रस्तुत किया जो मुझसे छूट गया था तो मैं उसका उपकार मानता हूं और इसे स्वीकार भी करता हूं। ।समय-समय पर मैं इसके लिए आग्रह करता हूं । इसके दो कारण हैं पहला यह कि मेरी सोच अपने समय के दूसरे सभी विद्वानों से अलग है और यह उन सभी विषयों में है जिनमें मैं कभी कभी हस्तक्षेप करता हूं।

अकेला आदमी अपने को कितना भी सही समझे कुछ चीजों को छोड़ ही जाता है । वह किन्हीं न किन्हीं अंतर्विरोधों का शिकार हो सकता है और इसका उसे आभास तक नहीं हो सकता। यदि मेरी चिंता अपने को सही सिद्ध करने की होती तो संभव है मुझे ऐसी आलोचनाओं से असुविधा अवश्य होती ।

कभी-कभी मैं विनोद में कहता हूं, मैं कभी पराजित नहीं हो सकता। मुझे पराजित करने की कोशिश करने वाले स्वयं पराजित हो जाते हैं। जिसे जीतना न हो वह पराजित कैसे हो सकता है। मैं उसकी सही बातों को सम्मान के साथ स्वीकार कर लेता हूं। अपने पहले के विचार को उसके अनुसार सुधार या बदल लेता हूं।इसमें यदि जीत जैसी कोई वस्तु है तो आलोचना करने वाले के साथ मेरी अपनी भी जीत होती है। यह कोई नई सोच नहीं है। इसे मैंने आज से 50 साल पहले बहुत स्पष्ट रूप में महाभिषग में लिखा थाः

“पराजित तुम कभी नहीं हुए अश्वघोष! बंधु, तुमने जीवन में सर्वत्र विजय ही पाई और जिसे तुम पराजय कह रहे हो वही तो तुम्हारी परम विजय है, मित्र। सत्य के सन्मुख, धर्म के सन्मुख, विनय के सम्मुख विजय से बड़ी पराजय और समर्पण से बड़ी विजय क्या होगी? जहां समर्पण ही परम विजय है वहां समर्पित होकर तुम पराजित कैसे हो सकते हो ?”

इसे मैंने मात्र एक कृति में दर्ज नहीं किया था अपितु अपितु अपने जीवन में उतारा था । यह मेरी अपनी जीवनदृष्टि है इसलिए मैं विरोधी विचारों को अनुद्विग्न भाव से सुनता और जहां वे सार्थक लगें उन्हें अपनाता रहा हूँ। अतः विरोध से मुझे कभी खिन्नता नहीं हो सकती।

परंतु राजनीतिक प्रश्नों पर प्रबुद्ध लोगों, यहां तक कि समाज का मार्गदर्शक होने का दम भरने वालों की भी दलगत राजनीति इतनी स्पष्ट है कि वे व्यावहारिक राजनीति करने वालों के स्तर पर उतर आते हैं। उनमें कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो केवल असमत नहीं होते, बौखला जाते हैं । कभी कभी अशिष्ट हो जाते हैं। उनका हस्तक्षेप अरुचिकर तो लगता है परंतु उत्साहवर्धक भी लगता है। इसका अर्थ है, हमारे विचारों और तर्कों का विरोधियों के पास कोई उत्तर नहीं है। उत्तेजना इसका प्रमाण है न कि मात्र गर्हित उक्ति। इससे जितना क्षोभ होता है उससे अधिक यह आश्वस्ति कर लगता है। गाली वैचारिक दृष्टि से कमजोर और पराजित लोगों का अंतिम ब्रह्मास्त्र है।

Post – 2018-03-31

संवाद, विवाद और विचार

एक मित्र ने यह पूछा, आप तो किसी भी समस्या पर निष्पक्ष होकर, पूरी गंभीरता से लिखते हैं, फिर भी जब कुछ लोग उल्टे-सीधे प्रश्न करते हैं तो आपको कैसा लगता है ? उनके प्रश्न का उत्तर तो मैंने यथास्थान दे दिया पर लगा इस पर दूसरों के लिए भी अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने की जरूरत है।

समाज की पहली शर्त है कि आप किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए बहस करें न कि अपनी विद्वत्ता या भाषा का कमाल या विदग्धता के प्रदर्शन के लिए। Facebook को मैं बहुत महत्वपूर्ण मंच मांगता हूं । ऐसा मंच इससे पहले न था, न इसकी मैंने कल्पना की थी । किसी बड़ी से बड़ी गोष्ठी में सभी को अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिलता। समय की सीमा होती है। पाठक भी ऊबने के बाद भी फंसे रहते हैं।

Facebook के साथ इन दोनों में से कोई सीमा नहीं होती। किसी भी समय पर, किसी भी विषय पर, एक साथ कितने भी लोग अपने विचार प्रकट कर सकते हैं और इस बात की चिंता किए बिना प्रकट कर सकते हैं कि उनके पाठक उसे ग्रहण करते हैं या नहीं। यदि विचारों में कोई सार है, यह समस्या सार्थक है तो, कुछ लोग पसंद करने वाले मिल ही जाते हैं.। परंतु Facebook की एक सीमा यह है इसमें श्रोता नहीं होते, मित्रों की एक मंडली होती है जिनकी संख्या रूचि और रुझान के अनुसार बढ़ती जाती है और यदि किन्ही कारणों से Facebook मंच पर मान्यताओं के शिविर बन जाते हैं तो सहमति और असहमति के दायरे पहले से ही निर्धारित हो जाते हैं, विचार अपना सारतत्व खो देता हैऔर मत विभाजन की स्थिति आ जाती है ।

मुझे लगता है इसके कारण इतने महत्वपूर्ण और दुर्लभ मंच का भी हम सही उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। लोग लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए चुटकुले बाजियां, हल्की टिप्पणियां, अनुचित आरोप, सचेत रूप में तथ्यों की लीपापोती करते रहते हैं जिससे उनका भले मनोरंजन होता हो, पाठकों का बहुत समय व्यर्थ चला जाता है . यदि इसे राष्ट्रीय बौद्धिक ऊर्जा के सदुपयोग या दुरुपयोग के रूप में देखा जाए तो दुरुपयोग का पलड़ा भारी रहेगा।

मुझे Facebook उन विषयों को उठाने और उन पर कुछ कहने का अवसर मिला है जिन के विषय में मैं सोचता था अपने जीवनकाल में उनको उठा भी पाऊंगा या नहीं। इतिहास, भाषा, समाज, संस्कृति, धर्म से जुड़े हुए सवालों के विषय में मुझे असंतोष रहा है कि इनकी बुनियादी जानकारी तक उन लोगों के पास नहीं है जो इस के अधिकारी विद्वान होने का दावा करते हैं। रुचि की विविधता और मेरी अपनी अपेक्षा के अनुसार तैयारी का जो स्तर होना चाहिए उस पर अपने को पूरा न पा कर पाकर लगातार दुविधा की स्थिति बनी रही। परंतु यह विश्वास अधिकारी कहे जाने वाले लोगों से मेरी समझ अधिक अच्छी है, मैं बिना किसी आशंका और दुविधा के अपने मंतव्य, मेरी ज्ञान सीमा में आने वाली जानकारी और प्रमाण और औचित्य के साथ रखने का साहस फेसबुक के कारण ही जुटा सका हूं और अपेक्षा करता हूं कि मेरी कमियां दूसरों की आलोचना के द्वारा दूर हों, जिससे मेरी मान्यता भले गलत हो जाए पर उस विषय पर सामाजिक समझ अवश्य पहले से ही अधिक अच्छी होती चले।

इस बुनियादी समझ के कारण मुझे असहमतियों की प्रतीक्षा रहती है। यदि किसी ने किसी कमी की ओर ध्यान दिलाया या कोई ऐसा पहलू विचारार्थ प्रस्तुत किया जो मुझसे छूट गया था तो मैं उसका उपकार मानता हूं और इसे स्वीकार भी करता हूं। ।समय-समय पर मैं इसके लिए आग्रह करता हूं । इसके दो कारण हैं पहला यह कि मेरी सोच अपने समय के दूसरे सभी विद्वानों से अलग है और यह उन सभी विषयों में है जिनमें मैं कभी कभी हस्तक्षेप करता हूं।

अकेला आदमी अपने को कितना भी सही समझे कुछ चीजों को छोड़ ही जाता है । वह किन्हीं न किन्हीं अंतर्विरोधों का शिकार हो सकता है और इसका उसे आभास तक नहीं हो सकता। यदि मेरी चिंता अपने को सही सिद्ध करने की होती तो संभव है मुझे ऐसी आलोचनाओं से असुविधा अवश्य होती ।

कभी-कभी मैं विनोद में कहता हूं, मैं कभी पराजित नहीं हो सकता। मुझे पराजित करने की कोशिश करने वाले स्वयं पराजित हो जाते हैं। जिसे जीतना न हो वह पराजित कैसे हो सकता है। मैं उसकी सही बातों को सम्मान के साथ स्वीकार कर लेता हूं। अपने पहले के विचार को उसके अनुसार सुधार या बदल लेता हूं।इसमें यदि जीत जैसी कोई वस्तु है तो आलोचना करने वाले के साथ मेरी अपनी भी जीत होती है। यह कोई नई सोच नहीं है। इसे मैंने आज से 50 साल पहले बहुत स्पष्ट रूप में महाभिषग में लिखा थाः

“पराजित तुम कभी नहीं हुए अश्वघोष! बंधु, तुमने जीवन में सर्वत्र विजय ही पाई और जिसे तुम पराजय कह रहे हो वही तो तुम्हारी परम विजय है, मित्र। सत्य के सन्मुख, धर्म के सन्मुख, विनय के सम्मुख विजय से बड़ी पराजय और समर्पण से बड़ी विजय क्या होगी? जहां समर्पण ही परम विजय है वहां समर्पित होकर तुम पराजित कैसे हो सकते हो ?”

इसे मैंने मात्र एक कृति में दर्ज नहीं किया था अपितु अपितु अपने जीवन में उतारा था । यह मेरी अपनी जीवनदृष्टि है इसलिए मैं विरोधी विचारों को अनुद्विग्न भाव से सुनता और जहां वे सार्थक लगें उन्हें अपनाता रहा हूँ। अतः विरोध से मुझे कभी खिन्नता नहीं हो सकती।

परंतु राजनीतिक प्रश्नों पर प्रबुद्ध लोगों, यहां तक कि समाज का मार्गदर्शक होने का दम भरने वालों की भी दलगत राजनीति इतनी स्पष्ट है कि वे व्यावहारिक राजनीति करने वालों के स्तर पर उतर आते हैं। उनमें कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो केवल असमत नहीं होते, बौखला जाते हैं । कभी कभी अशिष्ट हो जाते हैं। उनका हस्तक्षेप अरुचिकर तो लगता है परंतु उत्साहवर्धक भी लगता है। इसका अर्थ है, हमारे विचारों और तर्कों का विरोधियों के पास कोई उत्तर नहीं है। उत्तेजना इसका प्रमाण है न कि मात्र गर्हित उक्ति। इससे जितना क्षोभ होता है उससे अधिक यह आश्वस्ति कर लगता है। गाली वैचारिक दृष्टि से कमजोर और पराजित लोगों का अंतिम ब्रह्मास्त्र है।

Post – 2018-03-31

संवाद, विवाद और विचार

एक मित्र ने यह पूछा, आप तो किसी भी समस्या पर निष्पक्ष होकर, पूरी गंभीरता से लिखते हैं, फिर भी जब कुछ लोग उल्टे-सीधे प्रश्न करते हैं तो आपको कैसा लगता है ? उनके प्रश्न का उत्तर तो मैंने यथास्थान दे दिया पर लगा इस पर दूसरों के लिए भी अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने की जरूरत है।

समाज की पहली शर्त है कि आप किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए बहस करें न कि अपनी विद्वत्ता या भाषा का कमाल या विदग्धता के प्रदर्शन के लिए। Facebook को मैं बहुत महत्वपूर्ण मंच मांगता हूं । ऐसा मंच इससे पहले न था, न इसकी मैंने कल्पना की थी । किसी बड़ी से बड़ी गोष्ठी में सभी को अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिलता। समय की सीमा होती है। पाठक भी ऊबने के बाद भी फंसे रहते हैं।

Facebook के साथ इन दोनों में से कोई सीमा नहीं होती। किसी भी समय पर, किसी भी विषय पर, एक साथ कितने भी लोग अपने विचार प्रकट कर सकते हैं और इस बात की चिंता किए बिना प्रकट कर सकते हैं कि उनके पाठक उसे ग्रहण करते हैं या नहीं। यदि विचारों में कोई सार है, यह समस्या सार्थक है तो, कुछ लोग पसंद करने वाले मिल ही जाते हैं.। परंतु Facebook की एक सीमा यह है इसमें श्रोता नहीं होते, मित्रों की एक मंडली होती है जिनकी संख्या रूचि और रुझान के अनुसार बढ़ती जाती है और यदि किन्ही कारणों से Facebook मंच पर मान्यताओं के शिविर बन जाते हैं तो सहमति और असहमति के दायरे पहले से ही निर्धारित हो जाते हैं, विचार अपना सारतत्व खो देता हैऔर मत विभाजन की स्थिति आ जाती है ।

मुझे लगता है इसके कारण इतने महत्वपूर्ण और दुर्लभ मंच का भी हम सही उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। लोग लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए चुटकुले बाजियां, हल्की टिप्पणियां, अनुचित आरोप, सचेत रूप में तथ्यों की लीपापोती करते रहते हैं जिससे उनका भले मनोरंजन होता हो, पाठकों का बहुत समय व्यर्थ चला जाता है . यदि इसे राष्ट्रीय बौद्धिक ऊर्जा के सदुपयोग या दुरुपयोग के रूप में देखा जाए तो दुरुपयोग का पलड़ा भारी रहेगा।

मुझे Facebook उन विषयों को उठाने और उन पर कुछ कहने का अवसर मिला है जिन के विषय में मैं सोचता था अपने जीवनकाल में उनको उठा भी पाऊंगा या नहीं। इतिहास, भाषा, समाज, संस्कृति, धर्म से जुड़े हुए सवालों के विषय में मुझे असंतोष रहा है कि इनकी बुनियादी जानकारी तक उन लोगों के पास नहीं है जो इस के अधिकारी विद्वान होने का दावा करते हैं। रुचि की विविधता और मेरी अपनी अपेक्षा के अनुसार तैयारी का जो स्तर होना चाहिए उस पर अपने को पूरा न पा कर पाकर लगातार दुविधा की स्थिति बनी रही। परंतु यह विश्वास अधिकारी कहे जाने वाले लोगों से मेरी समझ अधिक अच्छी है, मैं बिना किसी आशंका और दुविधा के अपने मंतव्य, मेरी ज्ञान सीमा में आने वाली जानकारी और प्रमाण और औचित्य के साथ रखने का साहस फेसबुक के कारण ही जुटा सका हूं और अपेक्षा करता हूं कि मेरी कमियां दूसरों की आलोचना के द्वारा दूर हों, जिससे मेरी मान्यता भले गलत हो जाए पर उस विषय पर सामाजिक समझ अवश्य पहले से ही अधिक अच्छी होती चले।

इस बुनियादी समझ के कारण मुझे असहमतियों की प्रतीक्षा रहती है। यदि किसी ने किसी कमी की ओर ध्यान दिलाया या कोई ऐसा पहलू विचारार्थ प्रस्तुत किया जो मुझसे छूट गया था तो मैं उसका उपकार मानता हूं और इसे स्वीकार भी करता हूं। ।समय-समय पर मैं इसके लिए आग्रह करता हूं । इसके दो कारण हैं पहला यह कि मेरी सोच अपने समय के दूसरे सभी विद्वानों से अलग है और यह उन सभी विषयों में है जिनमें मैं कभी कभी हस्तक्षेप करता हूं।

अकेला आदमी अपने को कितना भी सही समझे कुछ चीजों को छोड़ ही जाता है । वह किन्हीं न किन्हीं अंतर्विरोधों का शिकार हो सकता है और इसका उसे आभास तक नहीं हो सकता। यदि मेरी चिंता अपने को सही सिद्ध करने की होती तो संभव है मुझे ऐसी आलोचनाओं से असुविधा अवश्य होती ।

कभी-कभी मैं विनोद में कहता हूं, मैं कभी पराजित नहीं हो सकता। मुझे पराजित करने की कोशिश करने वाले स्वयं पराजित हो जाते हैं। जिसे जीतना न हो वह पराजित कैसे हो सकता है। मैं उसकी सही बातों को सम्मान के साथ स्वीकार कर लेता हूं। अपने पहले के विचार को उसके अनुसार सुधार या बदल लेता हूं।इसमें यदि जीत जैसी कोई वस्तु है तो आलोचना करने वाले के साथ मेरी अपनी भी जीत होती है। यह कोई नई सोच नहीं है। इसे मैंने आज से 50 साल पहले बहुत स्पष्ट रूप में महाभिषग में लिखा थाः

“पराजित तुम कभी नहीं हुए अश्वघोष! बंधु, तुमने जीवन में सर्वत्र विजय ही पाई और जिसे तुम पराजय कह रहे हो वही तो तुम्हारी परम विजय है, मित्र। सत्य के सन्मुख, धर्म के सन्मुख, विनय के सम्मुख विजय से बड़ी पराजय और समर्पण से बड़ी विजय क्या होगी? जहां समर्पण ही परम विजय है वहां समर्पित होकर तुम पराजित कैसे हो सकते हो ?”

इसे मैंने मात्र एक कृति में दर्ज नहीं किया था अपितु अपितु अपने जीवन में उतारा था । यह मेरी अपनी जीवनदृष्टि है इसलिए मैं विरोधी विचारों को अनुद्विग्न भाव से सुनता और जहां वे सार्थक लगें उन्हें अपनाता रहा हूँ। अतः विरोध से मुझे कभी खिन्नता नहीं हो सकती।

परंतु राजनीतिक प्रश्नों पर प्रबुद्ध लोगों, यहां तक कि समाज का मार्गदर्शक होने का दम भरने वालों की भी दलगत राजनीति इतनी स्पष्ट है कि वे व्यावहारिक राजनीति करने वालों के स्तर पर उतर आते हैं। उनमें कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो केवल असमत नहीं होते, बौखला जाते हैं । कभी कभी अशिष्ट हो जाते हैं। उनका हस्तक्षेप अरुचिकर तो लगता है परंतु उत्साहवर्धक भी लगता है। इसका अर्थ है, हमारे विचारों और तर्कों का विरोधियों के पास कोई उत्तर नहीं है। उत्तेजना इसका प्रमाण है न कि मात्र गर्हित उक्ति। इससे जितना क्षोभ होता है उससे अधिक यह आश्वस्ति कर लगता है। गाली वैचारिक दृष्टि से कमजोर और पराजित लोगों का अंतिम ब्रह्मास्त्र है।

Post – 2018-03-30

जल की पवित्रता और मलिनता

आज जब विज्ञान के सामी मजहबों से टकराव के बाद विज्ञान ने यह घोषित कर दिया कि ईश्वर नहीं है या उसके साहित्य प्रेमियों ने अपने शब्दों में कहा कि ईश्वर मर चुका है, तब भी हिंदुओं के ईश्वर पर कोई आंच नहीं आई, क्योंकि इन्होंने बहुत पहले से यह तय कर रखा था परम सत्ता इंद्रियातीत है, ज्ञानातीत है। विज्ञान ने उसे ध्यानातीत तो माना नहीं। योग की सिद्धियों की तरह की तरह ब्रह्म की भारतीय अवधारणा तक विज्ञान की पहुंच न हो सकती थी ना हो पाई और नहीं वह उसका खंडन कर सकता है जो भारतीय तत्व चिंतक बहुत प्राचीन काल से कहते और मानते आए हैं।

अपने अनुभव के आधार पर मैं ईश्वर में विश्वास करता हूं परंतु मानता हूं ब्रह्म और माया के द्वन्द्व मैं ब्रह्मा माया के सम्मुख लगभग असहाय अनुभव करता है, भूत और चित के बीच भूत ही प्रधान है और चित उसके वशीभूत।

मेरा भौतिकवाद चित के निषेध पर नहीं, भूत के प्राधान्य पर आधारित है। यह मेरा निजी विचार है और न तो किसी अन्य के प्रमाण पर आधारित है, न ही मैं दूसरों को इसका कायल बनाना चाहता हूं। इसीलिए मैंने एक बार विनोद में कहा था की पश्चिम में ईश्वर की मौत हो भी जाए तो भारत में उसकी मौत नहीं हो सकती क्योंकि यहां ब्रह्मांड में जो कुछ है उसी को को ब्रह्म मान लिया जाता है. इसीलिए अलग और दूर बैठी किसी सत्ता की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। या पड़ती है ऐसी सत्ता से जिसे विज्ञान भी नकार नहीं सकता, जैसे जल। आपो वै सः। जो हुआ और होने वाला है सब वही है, पुरुष एव इदं सर्वं यत् भूतं यत च भव्यम्। ऐसे ब्रह्म का अंत तो सृष्टि के अंत के साथ ही हो सकता है और उसके बाद भी वह जब शून्य में संकुचित हो जाएगी, शून्य भी तब तक ब्रह्म बना रहेगा जब तक अगली सृष्टि आरंभ नहीं हो जाती ।

परंतु यहां यह तत्ववादी मीमांसा इसलिए ध्यान में आ गई कि भाषा की उत्पत्ति पर विचार करते हुए मुझे लगा मनुष्य महाप्रकृति के समक्ष इतना लाचार प्रतीत होता है है कि अपनी भावनाओं क्रियाओं और भौतिक उपादानों के लिए सही और अर्थ विच्छेदक शब्दों का निर्माण तक नहीं कर सका। भले नादजगत प्रकृति का था, परंतु उसमें से चुनाव तो मनुष्य को ही करना था। नहीं कर सका।

यदि उसका वश चलता है तो उसने कम से कम नितांत प्रिय और अप्रिय, पवित्र और अपवित्र, मित्र और शत्रु, परस्पर विरोधी गुणों और क्रियाओं के लिए एक ही संज्ञा का चुनाव न किया होता। भाषा का आविष्कार संकेत प्रणाली की सीमाओं के कारण निश्चित अर्थ संचार करने के लिए गया था। यदि कथन का सही अर्थ ही पता ही न चले, उसका उल्टा अर्थ भी लगाया जा सके, तो वह अपनी भूमिका का निर्वाह नहीं कर पाती। अब इसी संदर्भ में शब्दों की पड़ताल करेंगे यथासंभव का समाधान करने का भी प्रयत्न करेंगे।

इन शब्दों पर ध्यान देंः पा = जल, पी =जल, पान कर, पेय = जल, पीतु= जल, और दूसरी ओर पित्त, एक ओर पुरीष जिसका अर्थ मल होता है और दूसरी तरफ पुरीषिणी – सुजला। पय = जल, पूय= पीब, मवाद, पू= जल, पुड़ि – सुराही, मशक, पुट = पानी, पानी का छींटा, पुटक = कमल, पुटिया = छोटी मछली, पुटकी= मोटरी, पुण्य – जल पिला कर प्यासे को तृप्त करना, लोकहित, पुत> पूत>पुत्त> पुत्र = संतान, पुताई = लिपाई, पुत्ती – कंद से फूटने वाला अंकुर ,
(निरन्तर व्यवधान के कारण अपूर्ण)

Post – 2018-03-30

जल की पवित्रता और मलिनता

आज जब विज्ञान के सामी मजहबों से टकराव के बाद विज्ञान ने यह घोषित कर दिया कि ईश्वर नहीं है या उसके साहित्य प्रेमियों ने अपने शब्दों में कहा कि ईश्वर मर चुका है, तब भी हिंदुओं के ईश्वर पर कोई आंच नहीं आई, क्योंकि इन्होंने बहुत पहले से यह तय कर रखा था परम सत्ता इंद्रियातीत है, ज्ञानातीत है। विज्ञान ने उसे ध्यानातीत तो माना नहीं। योग की सिद्धियों की तरह की तरह ब्रह्म की भारतीय अवधारणा तक विज्ञान की पहुंच न हो सकती थी ना हो पाई और नहीं वह उसका खंडन कर सकता है जो भारतीय तत्व चिंतक बहुत प्राचीन काल से कहते और मानते आए हैं।

अपने अनुभव के आधार पर मैं ईश्वर में विश्वास करता हूं परंतु मानता हूं ब्रह्म और माया के द्वन्द्व मैं ब्रह्मा माया के सम्मुख लगभग असहाय अनुभव करता है, भूत और चित के बीच भूत ही प्रधान है और चित उसके वशीभूत।

मेरा भौतिकवाद चित के निषेध पर नहीं, भूत के प्राधान्य पर आधारित है। यह मेरा निजी विचार है और न तो किसी अन्य के प्रमाण पर आधारित है, न ही मैं दूसरों को इसका कायल बनाना चाहता हूं। इसीलिए मैंने एक बार विनोद में कहा था की पश्चिम में ईश्वर की मौत हो भी जाए तो भारत में उसकी मौत नहीं हो सकती क्योंकि यहां ब्रह्मांड में जो कुछ है उसी को को ब्रह्म मान लिया जाता है. इसीलिए अलग और दूर बैठी किसी सत्ता की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। या पड़ती है ऐसी सत्ता से जिसे विज्ञान भी नकार नहीं सकता, जैसे जल। आपो वै सः। जो हुआ और होने वाला है सब वही है, पुरुष एव इदं सर्वं यत् भूतं यत च भव्यम्। ऐसे ब्रह्म का अंत तो सृष्टि के अंत के साथ ही हो सकता है और उसके बाद भी वह जब शून्य में संकुचित हो जाएगी, शून्य भी तब तक ब्रह्म बना रहेगा जब तक अगली सृष्टि आरंभ नहीं हो जाती ।

परंतु यहां यह तत्ववादी मीमांसा इसलिए ध्यान में आ गई कि भाषा की उत्पत्ति पर विचार करते हुए मुझे लगा मनुष्य महाप्रकृति के समक्ष इतना लाचार प्रतीत होता है है कि अपनी भावनाओं क्रियाओं और भौतिक उपादानों के लिए सही और अर्थ विच्छेदक शब्दों का निर्माण तक नहीं कर सका। भले नादजगत प्रकृति का था, परंतु उसमें से चुनाव तो मनुष्य को ही करना था। नहीं कर सका।

यदि उसका वश चलता है तो उसने कम से कम नितांत प्रिय और अप्रिय, पवित्र और अपवित्र, मित्र और शत्रु, परस्पर विरोधी गुणों और क्रियाओं के लिए एक ही संज्ञा का चुनाव न किया होता। भाषा का आविष्कार संकेत प्रणाली की सीमाओं के कारण निश्चित अर्थ संचार करने के लिए गया था। यदि कथन का सही अर्थ ही पता ही न चले, उसका उल्टा अर्थ भी लगाया जा सके, तो वह अपनी भूमिका का निर्वाह नहीं कर पाती। अब इसी संदर्भ में शब्दों की पड़ताल करेंगे यथासंभव का समाधान करने का भी प्रयत्न करेंगे।

इन शब्दों पर ध्यान देंः पा = जल, पी =जल, पान कर, पेय = जल, पीतु= जल, और दूसरी ओर पित्त, एक ओर पुरीष जिसका अर्थ मल होता है और दूसरी तरफ पुरीषिणी – सुजला। पय = जल, पूय= पीब, मवाद, पू= जल, पुड़ि – सुराही, मशक, पुट = पानी, पानी का छींटा, पुटक = कमल, पुटिया = छोटी मछली, पुटकी= मोटरी, पुण्य – जल पिला कर प्यासे को तृप्त करना, लोकहित, पुत> पूत>पुत्त> पुत्र = संतान, पुताई = लिपाई, पुत्ती – कंद से फूटने वाला अंकुर ,
(निरन्तर व्यवधान के कारण अपूर्ण)

Post – 2018-03-30

जल की पवित्रता और मलिनता

आज जब विज्ञान के सामी मजहबों से टकराव के बाद विज्ञान ने यह घोषित कर दिया कि ईश्वर नहीं है या उसके साहित्य प्रेमियों ने अपने शब्दों में कहा कि ईश्वर मर चुका है, तब भी हिंदुओं के ईश्वर पर कोई आंच नहीं आई, क्योंकि इन्होंने बहुत पहले से यह तय कर रखा था परम सत्ता इंद्रियातीत है, ज्ञानातीत है। विज्ञान ने उसे ध्यानातीत तो माना नहीं। योग की सिद्धियों की तरह की तरह ब्रह्म की भारतीय अवधारणा तक विज्ञान की पहुंच न हो सकती थी ना हो पाई और नहीं वह उसका खंडन कर सकता है जो भारतीय तत्व चिंतक बहुत प्राचीन काल से कहते और मानते आए हैं।

अपने अनुभव के आधार पर मैं ईश्वर में विश्वास करता हूं परंतु मानता हूं ब्रह्म और माया के द्वन्द्व मैं ब्रह्मा माया के सम्मुख लगभग असहाय अनुभव करता है, भूत और चित के बीच भूत ही प्रधान है और चित उसके वशीभूत।

मेरा भौतिकवाद चित के निषेध पर नहीं, भूत के प्राधान्य पर आधारित है। यह मेरा निजी विचार है और न तो किसी अन्य के प्रमाण पर आधारित है, न ही मैं दूसरों को इसका कायल बनाना चाहता हूं। इसीलिए मैंने एक बार विनोद में कहा था की पश्चिम में ईश्वर की मौत हो भी जाए तो भारत में उसकी मौत नहीं हो सकती क्योंकि यहां ब्रह्मांड में जो कुछ है उसी को को ब्रह्म मान लिया जाता है. इसीलिए अलग और दूर बैठी किसी सत्ता की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। या पड़ती है ऐसी सत्ता से जिसे विज्ञान भी नकार नहीं सकता, जैसे जल। आपो वै सः। जो हुआ और होने वाला है सब वही है, पुरुष एव इदं सर्वं यत् भूतं यत च भव्यम्। ऐसे ब्रह्म का अंत तो सृष्टि के अंत के साथ ही हो सकता है और उसके बाद भी वह जब शून्य में संकुचित हो जाएगी, शून्य भी तब तक ब्रह्म बना रहेगा जब तक अगली सृष्टि आरंभ नहीं हो जाती ।

परंतु यहां यह तत्ववादी मीमांसा इसलिए ध्यान में आ गई कि भाषा की उत्पत्ति पर विचार करते हुए मुझे लगा मनुष्य महाप्रकृति के समक्ष इतना लाचार प्रतीत होता है है कि अपनी भावनाओं क्रियाओं और भौतिक उपादानों के लिए सही और अर्थ विच्छेदक शब्दों का निर्माण तक नहीं कर सका। भले नादजगत प्रकृति का था, परंतु उसमें से चुनाव तो मनुष्य को ही करना था। नहीं कर सका।

यदि उसका वश चलता है तो उसने कम से कम नितांत प्रिय और अप्रिय, पवित्र और अपवित्र, मित्र और शत्रु, परस्पर विरोधी गुणों और क्रियाओं के लिए एक ही संज्ञा का चुनाव न किया होता। भाषा का आविष्कार संकेत प्रणाली की सीमाओं के कारण निश्चित अर्थ संचार करने के लिए गया था। यदि कथन का सही अर्थ ही पता ही न चले, उसका उल्टा अर्थ भी लगाया जा सके, तो वह अपनी भूमिका का निर्वाह नहीं कर पाती। अब इसी संदर्भ में शब्दों की पड़ताल करेंगे यथासंभव का समाधान करने का भी प्रयत्न करेंगे।

इन शब्दों पर ध्यान देंः पा = जल, पी =जल, पान कर, पेय = जल, पीतु= जल, और दूसरी ओर पित्त, एक ओर पुरीष जिसका अर्थ मल होता है और दूसरी तरफ पुरीषिणी – सुजला। पय = जल, पूय= पीब, मवाद, पू= जल, पुड़ि – सुराही, मशक, पुट = पानी, पानी का छींटा, पुटक = कमल, पुटिया = छोटी मछली, पुटकी= मोटरी, पुण्य – जल पिला कर प्यासे को तृप्त करना, लोकहित, पुत> पूत>पुत्त> पुत्र = संतान, पुताई = लिपाई, पुत्ती – कंद से फूटने वाला अंकुर ,
(निरन्तर व्यवधान के कारण अपूर्ण)

Post – 2018-03-30

भाजपा या उनकी आलोचना से पीड़ित हो कर एक मित्र ने गांधी के चेलों जैसा कोई संबोधन करते हुए अपना उत्तर दिया है। मेरा दुर्भाग्य की चेला तो मै अपने गुरुजनों का भी नहीं बना, पर जिस सम्मान भाव के कारण किसी को किसी का चेला कह दिया जाता है, उससे अधिक सम्मान भाव मेरे मन में गांधी के लिए, यह मानते हुए भी कि उन्होंने बहुत भयंकर गलतियां की हैं, है। मेरे मित्रों, पाठकों और प्रशंसकों में खासी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो, संघ से जुड़ाव रखते हैं और भाजपा के प्रति हल्की आलोचनात्मक दृष्टि रखते हुए भी, उसके प्रबल समर्थकों में हैं। वे यह भी जानते हैं कि मैं गांधी को बीसवीं शताब्दी का आश्चर्य मानता हूं। आश्चर्य पैदा करने की ताकत उनकी महिमा में नहीं है उनकी साधारणता में है । साधारण होना कितना चुनौती भरा हो सकता है, यह गांधी को पढ़ने और जानने के बाद ही पता चलता है । मैंने जब-जब गांधी को पढ़ा है, कुछ भी,, कहीं से भी, तो उससे पहले मेरी जो हैसियत थी उसके बाद उससे ऊंची हुई है। इसलिए मैं अपने मित्रों को यह सलाह देता हूं कि वे और कुछ नहीं सत्य के प्रयोग को ध्यान से, घबराहट में नहीं, वितृष्णा पूर्वक नहीं, मन का संतुलन खोए बिना शांति से, धीरे-धीरे पढ़ें और उसके बाद बताएं कि क्या उन पर कोई असर हुआ । यदि उन्होंने पढ़ रखा है, तो अवश्य बताएं कि वह पढ़ चुके हैं। मैं ऐसे लोगों की संख्या जानना चाहता हूं जिन पर गांधी पढ़ने के बाद भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

Post – 2018-03-30

भाजपा या उनकी आलोचना से पीड़ित हो कर एक मित्र ने गांधी के चेलों जैसा कोई संबोधन करते हुए अपना उत्तर दिया है। मेरा दुर्भाग्य की चेला तो मै अपने गुरुजनों का भी नहीं बना, पर जिस सम्मान भाव के कारण किसी को किसी का चेला कह दिया जाता है, उससे अधिक सम्मान भाव मेरे मन में गांधी के लिए, यह मानते हुए भी कि उन्होंने बहुत भयंकर गलतियां की हैं, है। मेरे मित्रों, पाठकों और प्रशंसकों में खासी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो, संघ से जुड़ाव रखते हैं और भाजपा के प्रति हल्की आलोचनात्मक दृष्टि रखते हुए भी, उसके प्रबल समर्थकों में हैं। वे यह भी जानते हैं कि मैं गांधी को बीसवीं शताब्दी का आश्चर्य मानता हूं। आश्चर्य पैदा करने की ताकत उनकी महिमा में नहीं है उनकी साधारणता में है । साधारण होना कितना चुनौती भरा हो सकता है, यह गांधी को पढ़ने और जानने के बाद ही पता चलता है । मैंने जब-जब गांधी को पढ़ा है, कुछ भी,, कहीं से भी, तो उससे पहले मेरी जो हैसियत थी उसके बाद उससे ऊंची हुई है। इसलिए मैं अपने मित्रों को यह सलाह देता हूं कि वे और कुछ नहीं सत्य के प्रयोग को ध्यान से, घबराहट में नहीं, वितृष्णा पूर्वक नहीं, मन का संतुलन खोए बिना शांति से, धीरे-धीरे पढ़ें और उसके बाद बताएं कि क्या उन पर कोई असर हुआ । यदि उन्होंने पढ़ रखा है, तो अवश्य बताएं कि वह पढ़ चुके हैं। मैं ऐसे लोगों की संख्या जानना चाहता हूं जिन पर गांधी पढ़ने के बाद भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

Post – 2018-03-30

भाजपा या उनकी आलोचना से पीड़ित हो कर एक मित्र ने गांधी के चेलों जैसा कोई संबोधन करते हुए अपना उत्तर दिया है। मेरा दुर्भाग्य की चेला तो मै अपने गुरुजनों का भी नहीं बना, पर जिस सम्मान भाव के कारण किसी को किसी का चेला कह दिया जाता है, उससे अधिक सम्मान भाव मेरे मन में गांधी के लिए, यह मानते हुए भी कि उन्होंने बहुत भयंकर गलतियां की हैं, है। मेरे मित्रों, पाठकों और प्रशंसकों में खासी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो, संघ से जुड़ाव रखते हैं और भाजपा के प्रति हल्की आलोचनात्मक दृष्टि रखते हुए भी, उसके प्रबल समर्थकों में हैं। वे यह भी जानते हैं कि मैं गांधी को बीसवीं शताब्दी का आश्चर्य मानता हूं। आश्चर्य पैदा करने की ताकत उनकी महिमा में नहीं है उनकी साधारणता में है । साधारण होना कितना चुनौती भरा हो सकता है, यह गांधी को पढ़ने और जानने के बाद ही पता चलता है । मैंने जब-जब गांधी को पढ़ा है, कुछ भी,, कहीं से भी, तो उससे पहले मेरी जो हैसियत थी उसके बाद उससे ऊंची हुई है। इसलिए मैं अपने मित्रों को यह सलाह देता हूं कि वे और कुछ नहीं सत्य के प्रयोग को ध्यान से, घबराहट में नहीं, वितृष्णा पूर्वक नहीं, मन का संतुलन खोए बिना शांति से, धीरे-धीरे पढ़ें और उसके बाद बताएं कि क्या उन पर कोई असर हुआ । यदि उन्होंने पढ़ रखा है, तो अवश्य बताएं कि वह पढ़ चुके हैं। मैं ऐसे लोगों की संख्या जानना चाहता हूं जिन पर गांधी पढ़ने के बाद भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

Post – 2018-03-29

जल ज्वाला का जनक है
असंपादित

आग और पानी का विरोध है। आग को पानी से बुझाया जाता है। परंतु यदि कोई ऐसी संकल्पना हो जिसमें जल से समस्त सृष्टि की उत्पत्ति मानी गई हो, उसमें तो पानी और आग में विरोध हो ही नहीं सकता। आग की उत्पत्ति होनी तो जलसे ही है। स्रष्टा स्वयं जल है – रसो वै सः । उसी के मन में कामना पैदा हुई, वह एक से अनेक हो जाए, अनेक रूपों में प्रकट हो जाए। आपो वै सः। सो अकामयत एकोहं, बहु स्याम, बहुधा स्याम। उसी का परिणाम यह सृष्टि। इसमें सबसे प्रधान तत्व अग्नि का है। अग्नि को जल का पोता कहा गया है, अपां नपात । जल का पुत्र बादल और बादल का पुत्र विद्युत । जल में ही अग्नि का निवास है। उसी से उसका जन्म हुआ है और उसी से वह बुझ जाता है। रात के अंधेरे में भी पानी इसलिए चमकता है कि अग्नि उसी में सो जाता है। यह तो रहीं शास्त्रों में लिखी हुई बातें।

मैं जिस बात पर ध्यान दिलाना चाहता हूं वह यह है कि अग्नि के लिए, रंगों के लिए, फूलों के लिए संज्ञा जल की ध्वनियों से मिली हैं इसलिए अनेक बार उसी शब्द का अर्थ जल होता है और उसी में मामूली अदल-बदल करके आग के लिए संज्ञा तैयार की जाती है, जैसे जल और ज्वाला। पश्चिमी व्याख्याकारों को तो यह भी पता नहीं चल सकता कि सन अर्थात सूर्य का जल से कोई संबंध हो सकता हैं हमारे यहां, गलती से ही सही, कभी यह माना जाता था कि सूर्य अपनी किरणो से धरती के जल को खींच लेता है जो वायु के सहारे सर्यलोक में पहुंचता हऐ और उसे ही इन्द्र बनकर सूर्य धरती पर बरसाते हैं। अर्थात सूर्य एक साथ आग का गोला भी है और महासमुद्र भी।

अंग्रेजी भाषा में भी स्नो, स्नेल, शब्द पाए जाते हैं। यह केवल भारत में है जहां स्न का सीधा अर्थ जमे हुए पानी से नहीं अपितु द्तरवि जलसे है जो हमें स्नान, स्नापित और द्रव होने के कारण स्नेह आदि मैं मिलता है। सूरज में रोशनी तो है पर आवाज नहीं संज्ञा उसी से प्राप्त करनी होती है जिसमें ध्वनि हो। भारतीय सूर्य में भी सूर् का अर्थ जल है यह बताने की आवश्यकता नहीं में हम सूर् की उपस्थिति इसलिए पाते हैं की पेय और खाद्य पदार्थों के लिए ध्वनि जल से ही मिलती है.।

अब हम रंगों पर विचार करें तो पाएंगे उसका एक अर्थ पानी के किसी रूप से मिला है तो दूसरा उस रंग या सौंदर्य से एक और राल या लार जिसका कोई परिचय सही परिचय आयुक्त लालायित में मिलता है तो दूसरी ओर लाल रंग, लाली, लालिमा, ललाम, ललाई । लालिमा और कांति के कारण ही इसका प्रयोग एक कीमती पत्थर के लिए किया जाता है जिसे लाल कहते हैं। बहुमूल्यता और दुर्लभता के कारण लाल लाड़ले पुत्र या प्रिय या समादृत व्यक्ति के लिए संबोधन बन जाता है। सच कहें तो लाडला लालला या लाल का आवर्ती उच्चारण है, स्नेह की प्रगाढ़ता का द्योतक है और लड़ैता लाल लड़ाई करने वाला लाल नहीं है दुलरुआ बेटा है जिसके स्नेहवश लालू, लल्लन, लल्लू, अनेक प्रभेद हो। रल्लन भी इसी का भेद प्रतीत होता है, जो उलट कर रलने -मिलने क्रिया का रुप ले लेता है। लल्लू में बाल सुलभता के कारण मूर्खता का आशय भी जुड़ जाता है ।

हरे या हरित में हर का अर्थ पानी होता है। यह सर का अवांतर रूप है और इसका भी अर्थ होता है जलाशय। सर और हर से सरि और हरि का उत्पादन हुआ यह बताने की आवश्यकता नहीं । हरिद्वार एक तरह से सरिद्वार है। हरित का हरा और सुनहला दोनों अर्थ कैसे हो गया, यह अभी मेरी समझ में भी नहीं आता।

श्वेत और स्वेद अंग्रेजी स्वेट में बहुत मैं बहुत मामूली अंतर है दोनों में प्रयुक्त स्व का अर्थ पानी है और इंद्र के लिए जब स्वर्जित् का प्रयोग होता है तो उसका अर्थ जल उत्पन्न करने वाला होता है। जित् का अर्थ जीतना नहीं, पैदा करना है। अंग्रेजी प्रयोग ब्रेड विनर में अर्जित करने का आशय बना हुआ है।

काले रंग के बारे में यहां कुछ कहने की आवश्यकता नहीं उस पर हम पहले अरे आप से चर्चा कर चुके हैं। परंतु कर्बुर या कबरा में प्रयुक्त कर का अर्थ जल है इसे तो इस बात से भी समझा जा सकता है कि कल का अर्थ जल है और र ल में अभेद है। परंतु अनुनादी शब्दों के प्रसंग में इस तरह के वर्ण परिवर्तनों से मदद नहीं लेनी चाहिए यह दोनों स्वतंत्र दुनिया ऐसी बहुत ही दुनिया है जिनमें मात्र 1 वर्ण का अंतर होता है, परंतु एक किसी दूसरे से निकली हुई नहीं होती और इसको संस्कृत के वैयाकरणों ने भी धातुपाठ तक में सम्मान दिया है।

कपिल या कपिश मैं इस सरलीकरण से काम नहीं लिया जाना चाहिए की काफी है या बंद करके प्रकृति लिए इसका उपयोग हुआ है स्थिति उल्टी है, होंठ की जिस क्रिया से अप ध्वनि निकलती है उसी को कप् गप् चप, सप भी सुना जा सकता है। इस कप से ही कुप्पी, कुआं, और समुद्र के लिए प्रयुक्त अकूपार में आए कूप का संबंध दिखाई पड़ता है। बंदर को अपना नाम पानी से मिला है बंदर के पर्याय से श्वेत रंग को। बंदर में आय वन को पानी के अर्थ में ग्राहकों किया जा सकता है परंतु है यह भ्रामक बंदर मटका नरक का भ्रम पैदा करने वाला प्राणी नर वानर। मानवेतर पर मानवाकार ।

पीत रंग के साथ पीतु-जल का स्मरण करने से काम चल जाएगा। इसी तरह नीले रंग के साथ नीर की याद आनी स्वाभाविक है।

इस संख्या को बढ़ाया जा सकता। हमारे लिए इतना ही पर्याप्त है इन सभी रंगों के साथ पानी का संबंधी इसलिए है कि रंगों में ध्वनि नहीं होती और सभी रंगों की प्रतिच्छाया पानी पर पड़ती है इस तरह दोनों के बीच नित्य संबंध है।