Post – 2020-05-31

#शब्दवेध(50)
द्रवों के नाम

पय

पय जल के लिए प्रयुक्त प, पी, पू आदि में से पी का बदला रूप है। संधि में तो इ,उ के य, व में बदलने के नियम से हम परिचित हैं, परन्तु स्वतंत्र रूप में भी ऐसे परिवर्तन होते रहते हैं, इसकी ओर हमारा ध्यान नहीं जाता। इसमें संदेह नहीं कि ‘पय’ का अर्थ पानी था, जिसका क्रमशः दूध के लिए प्रयोग होने लगा। पशुपालन वैसे भी मनुष्य के जीवन में कृषि के बाद आरंभ हुआ (रेनफ्रू)। ऋग्वेद में लगभग सौ बार पय शब्द आया है, पर दो तीन संदर्भों को छोड़ कर, जहाँ आशय जल से है – 1. द्यौर्न भूमिः पयसा पुपूतनि; 2. गावेव शुभ्रे मातरा रिहाणे विपाट्छुतुद्री पयसा जवेते – सभी हवाले दूध के हैं । आज पय का प्रयोग केवल दूध के लिए होता है।

क्षीर
क्षीर जिस क्षरण की कड़ी से जुड़ा है उसका अर्थ प्रवाह होता है – 1.अध क्षरन्ति सिन्धवो न सृष्टाः, 2. मधु क्षरन्ति सिन्धवः, नदियाँ मंद गति से प्रवाहित होती हैं। प्रवाह जल और वायु का ही हो सकता था,(क्षरन्नापः न ‘जल की तरह प्रवाहित ) इसलिए यह कहने की आवश्यकता नहीं कि नीर की ही तरह क्षीर भी जल के लिए ही प्रयोग में आता था, परन्तु क्षीर का प्रयोग ऋग्वेद में केवल दो बार हुआ है और दोनों बार दूध के लिए ही हुआ है। एक पहेली में ऐसी गाय का हवाला है जिसके सिर से दूध दुहा जाता है -शीर्ष्णः क्षीरं दुह्रते गावो अस्य और दूसरी बार सरस्वती के माध्यम से होने वाले लाभ को दूध, घी, मधु और जल के दोहन – तस्मै सरस्वती दुहे क्षीर सर्पिर्मधूदकम् – के रूप में चित्रित किया गया है। क्षीर और खीर में तो नहीं, खीरा में अवश्य जल की छाया बची रह गई है।

पुरीष
पुरीष का अर्थ जल था। ऋग्वेद में जल के आशय में ही इसका प्रयोग बार-बार देखने में आता है – ‘यया वणिग् वंकुः आपा पुरीषम्’ 5.45.6 में ‘पुरीषं पुरं उदकम्’ सा.; अन्यत्र ऋ.10.27.23 में भी यही अर्थ है। सरयू के विषय में प्रार्थना की गई है कि वह रास्ते में बाधक न बने और सुजला के लिए पुरीषिणी विशेषण का प्रयोग हुआ है – मा वः परि ष्ठात् सरयुः पुरीषिणी, 5.53.9, मरुतों को समुद्र से जल को लेकर वर्षा कराने का श्रेय देते हुए उनको ‘पुराषिन्’ कहा गया है- उदीरयथा मरुतः समुद्रतो यूयं वृष्टिं वर्षयथा पुरीषिणः। कुल सात बार आए इन हवालों में एक बार भी जल से इतर कोई अर्थ नहीं किया गया है।

पुरीष का अर्थ करते हुए सायण पुर का अर्थ जल बताते हुए भी इस बात पर ध्यान नहीं देते कि पुरीष ‘पुर’ और ‘इष’, जिनका पृथक् अर्थ जल है, के योग से बना शब्द है, क्योंकि यह पहलू भारतीय वैयाकरणों की चिंता-धारा में स्थान पा ही न सकता था। वे एक धातु से एकाधिकशब्दों की व्युत्पत्ति तो संभव मानते थे, पर न तो यह मान सकते थे कि एक ही आशय के दो शब्द मिल कर एक शब्द बन सकते हैं, न यह कि एक शब्द के निर्माण में दो धातुओं का योगदान हो सकता है।

जो भी हो सं. साहित्य से जल का पक्ष ही गायब है। आप्टे के संस्कृत अंग्रेजी कोश में इसका अर्थ निम्न प्रकार है: 1. feces, excrement, ordure, 2. rubbish, dirt. यह परिवर्तन कब घटित हुआ इसका पता नहीं चलता पर आज यह शब्द प्रयोगबाह्य हो गया है । शिक्षित जनों में जो इससे परिचित हैं वे केवल गन्दगी, विष्टा, और दुर्गन्ध वाले पक्ष से ही परिचित ,हैं और यह जान कर वे विचलित हो जाएँगे कि इसका शाब्दिक अर्थ जल है और इसका प्रयोग पहले जल के लिए ही होता था।

गरल
गरल का अर्थ भो. की एक क्रिया से ही स्पष्ट हो सकता है। यह है ‘गारल’। ध्वनि में इससे निकट पड़ने वाला एक अकर्मक क्रिया रूप है ‘ओगरल’ जमीन से पानी का स्वतः ऊपर निकलना। कुएँ और पोखरे की खुदाई में पानी ऊपर आने लगता है उसे ओगरल (ओगरना – सं. उद्गिरण) कहते है. गारने में किसी सरस लता को हल्के कुचल कर ऐंठ कर रस गारना या लता बाहर निकालना पड़ता है। कोल्हू, और उससे पहले ओखली के आविष्कार से पहले गन्ने का रस इसी तरह निकाला जाता था। उसे सिल (दृषद) पर रख कर पत्थर (उपल) से हल्के कूटा और फिर दोनों हाथों से, मुट्टी में लेकर, दसों उँगलियों से ऐंठ कर (एतं मृजन्ति मर्ज्यं पवमाना दश ) रस निकाला जाता था।

खुदाई में पानी का पतली धाराएँ फूटती हैं, उन्हें सोती कहते है। यह है किसी द्रव के बाहर निकलने – सवन – की क्रिया। सोती का सं.करण स्रोत के रूप में हुआ पर सोम या गन्ने के रस के संदर्भ में सवन बाद में भी जारी रहा। सवन की पुरानी रीत बदल गई, गन्ने की गेड़ियाँ बना ओखली में कूट कर रस गारा जाने लगा, फिर ओखली का वह रूप आया जिसे कहा ओखली ही जाता रहा, पर इसने पत्थर के पुराने कोल्हू का रूप लिया, सोमपूजन के लिए जिसके प्रतीकांकन को लिंगपूजा मान लिया गया जिसके विस्तार में कभी सोम रस पर लिखने का समय मिला तो ही जाना संभव होगा। यह एक उलझी हुई समस्या है। यहाँ इतना ही कि रस निकालने के लिए सवन (विश्वा इत् ता ते सवनेषु प्रवाच्या ) और सोतन (यत्र ग्रावा पृथुबुध्न ऊर्ध्वो भवति सोतवे ) ही चलता रहा और बाद में वाष्पन की युक्ति से रस चुआने के लिए आसवन का प्रयोग होता है, सव प्र-सव के लिए ही प्रचलित है। प्रसव क्रिया है और आसव संज्ञा। क्रिया बनाने के लिए इसमें -न जोड़ना होता है, पर सव>सुव मे उस प्रत्यय के बाद भी संज्ञा रूप सुवन ही बनता है। सवित रस को सुत कहते थे, प्रसूत को सुत।

इस शब्दक्रीड़ा में इसलिए उतरना पड़ा कि गारल, गिरल, गरल, बिगरल की क्रीड़ा को समझना आसान हो जाए जिनमें गरल को छोड़ कर शेष सभी का ‘-ल’ को ‘-ना’ में और अंतिम मामले में ‘-र-’ का भी ‘-ड़-’ में बदल कर हिंदी में प्रयोग होता है।

सामान्य जल के लिए गरल का प्रयोग सोम का तरह लाक्षणिक रूप में भले होता रहा हो, पर यह किसी वनस्पति से निकले रस के लिए ही प्रयोग में आ सकता था। यद्यपि मेरी जानकारी के वैदिक साहित्य में गारने और गिरने की क्रिया और गरल का पेय के रूप में प्रयोग नहीं मिलता। केवल एक बार डुबाने (निगलने) के अर्थ में ‘गरन्’ (न मा गरन् नद्यो मातृतमा) का प्रयोग देखने में आता है, जो इससे असंबद्ध है।

हम गरल के रस आशय से अपरिचित हैं। साहित्य में इसका केवल हलाहल या जानलेवा जहर के आशय में ही प्रयोग होता है और भो. में तो गरल और विष दोनों का प्रयोग नहीं होता, होता है ‘माहुर’ का। विष का बस्साइल, बिस्साइन – बदबू करना और बदबूदार के अर्थ में प्रयोग होता भी है, पर गरल के साथ वह भी नहीं। नदी नामों में गर्रा, गरगरा> घाघरा / घग्घर में जल का पुराना अर्थ बचा है और संभवतः गौर. गौरी, गोरा, के जनन में भी इसकी भूमिका हो।

Post – 2020-05-30

#शब्दवेध(49)

द्रवों के नाम
अमृत
अमृत का मूल अर्थ पानी है। सच कहें तो अमृत त. तन्नी (तण्+नीर)= पानी-पानी =ठंढा पानी, पानी, की तरह अम् +ऋत – पानी+पानी के योग से शीतल जल, तृप्तिदायक जल के लिए प्रयोग में आता रहा, और फिर प्यास से विकल व्यक्ति के प्राणरक्षक पेय के रूप में और इस तरह मृत्यु से रक्षा करने वाले, अमरता प्रदान करने वाले एक काल्पनिक पेय के रूप में लोकप्रिय हुआ- पानी मे ही अमृत है, पानी में ही भेषज है (अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेषजम्)। अं. का एंब्रोशिया (ambrosia) अमृत से ही व्युत्पन्न है, ऐसा अं. कोश मेे मिलता है, परंतु यह अम्बरीष – अंबर +इष = दिव्य जल, का प्रतिरूप प्रतीत होता है जो हमारे साहित्य में भी एक पौराणिक नाम के रूप मे ही बचा है। ऋग्वेद के रचना काल तक मृत्यु-निवारक पेय बनने की यह यात्रा लगभग पूरी हो चुकी थी। इक्के दुक्के प्रयोग ही ऐसे हैं जिन्हें सामान्य जल के लिए ग्रहण किया जा सके (वृष्टिं वां राधो अमृतत्वं ईमहे) ।

अम से ही आम/आम्र (रसाल),अम्ब[1], अंबु, (अम्मा?) की उत्पत्ति हुई है। नदी नामों मे अकेली आमी का नाम याद आता है। अमृत की तरह ही अम और ऋत भी ऋग्वेद के समय तक नए आशयों में प्रयोग में आने लगे थे, परंतु आर्त – प्यास से विकल, दीन, याचक; आर्तव -ऋतुकाल, मासिक स्राव, रेतस्, री/ऋ- गति सूचक, रीति – मार्ग, परंपरा आदि में रित/ऋत का पुराना भाव बना रह गया। ऐसा लगता है कि पहले बरसात के लिए ही रितु/ऋतु का प्रयोग होता था, फिर वृष- दिव्य जल, रेतस् के लिए प्रयोग में आने लगा, तो ऋतु के स्थान पर वर्षा ऋतु पड़ा और ऋतु का तीन मौसमों और फिर छह और अधिमास को लेकर सात षड्-ऋतुओं और सप्त ऋतुओं के लिए प्रयोग होने लगा।

वर्षा के लिए किया जाने वाला यज्ञ भी सही समय पर वर्षा न होने पर इस मौसम में ही कराया जाता था जो ऋत्विज (ऋतु+इज=यज्ञ) में बाद में भी बचा रहा। अंबर का अर्थ आकाश नहीं, बादल है – जल बरसाने वाला – है और इसलिए वस्त्र के लिए और अं. Umbra छाया, umbrage छाया, umbrella छतरी में इसका प्रयोग सर्वथा समीचीन है। ऋग्वेद में अम – बल (आशु अश्वा अमवद् वहन्त), प्रवाह ( अमश्चरति रोरुवत् – प्रवाह गर्जना करता हुआ चलता है), अमा – घर > (भो. अमाइल, समाइल), आम- कच्चा आदि आशयों में प्रयोग में आया है। भो. का अम्मत – खट्टा अमृत की देन है या कच्चे आम की खटास से निकला है, यह विचारणीय है , पर आम स्वयं अम से निकला है, इस विषय में कोई संदेह नहीं। ऋ. में अमति के प्रसंगानुसार कई अर्थ हैं – 1. रूप, 2. प्रकाश, 3. अभाव, 4. बुद्धहीनता, 5. तृप्ति. पानी के अभाव में, किसी धातु के सहारे इन आशयों तक नहीं पहुँचा जा सकता।

पीयूष
पीयूष का सीधा अर्थ जल है और इस दृष्टि से यह पीतु का सजात और समानार्थी है। प, पा, पी सभी का अर्थ पानी है, पीन/पीवर – पानी से फूला हुआ, मोटा; पीत – पिए हुआ आदि को देखते हुए लगता है पीयूष में भी पी-जल, उश – जल, कामना (उशना; उशती – जायेव पत्य उशती सुवासा), का योग है। इसका पहला अर्थोत्कर्ष हुआ तो इसका अर्थ दूध हुआ और दूसरे के साथ यह अमृत का पर्याय बन गया।

रस
रस – पानी (रसो वै सः), जिसके साथ माधुर्य का भाव जुड़ गया तो अर्थ हो गया स्वादु > मीठा ( रसना- रसास्वादन करने वाली इन्द्रिय); रसाल – आम। आगे चल कर यह रस – रसायन, (chemical; chemistry), भावगम्य आस्वाद, आनंद (साहित्य का रस या वाणी द्वारा प्राप्य मग्नता या तन्मयता, जिसे समाधि के आनंद के रूप में पहचाना गया (इमां त इन्द्र सुष्टुतिं विप्र इयर्ति धीतिभिः; तयोरिद् घृतवत् पयो विप्रा रिहन्ति धीतिभिः ।
गन्धर्वस्य ध्रुवे पदे ) और आज यह पानी से लेकर अन्य सभी आशयों में संदर्भ के अनुसार प्रयोग में आता है।

मधु
रस की तरह अनेक दूसरे शब्द हैं जो पहले जल के द्योतक थे, बाद में मधुरता आदि के लिए व्यवहार में आने लगे। मधु का प्रयोग कब से शहद के लिए होता आ रहा है, यह हमें पता नहीं। ऋग्वेद के समय तक इसका एक सीधा अर्थ किया जा सकता था – तृप्तिकर, प्रीतिकर। इसका प्रयोग ( 1) पानी (दुहान ऊधः दिव्यं मधु प्रियं), (2). महुआ (मधूक) मधुबन, (महुआनी), (3) शहद (माक्षिक मधु), (4) सोमरस और उसके विपाक (सृजामि सोम्यं मधु), (5) अनुद्वेगकर (मधु वाता ऋतायत – वायु मंद गति से प्रवाहित हो’; मधु नक्तमुतोषसो मधुमत् पार्थिवं रजः । मधु द्यौरस्तु नः पिता। रात और दिन, धरा धाम और पालक द्युलोक अनुकूल रहें ) (6) सुस्वाद (माध्वीः नः सन्तु ओषधीः अन्नादि सुस्वाद हों ); (7) दूध (इन्द्रो मधु संभृतमुस्रियायां- इंद्र ने गायों को मधुपूरित किया)। मधु मत् (*मथ, मद, मध, मन, मह संवर्ग) से निकला है – जिनमें प्रत्येक का अर्थ जल है। माहुर उसी तरह मधुर का प्रतिलोम है जैसे अम्मत अमृत का।

मूत
मूत का प्रयोग (मूत्र) के लिए होता है। कुछ लोग मानेंगे कि मूत मूत्र का अपभ्रंश है। सच यह है कि अपने शुद्ध रूप में यह मूत था जो जीमूत – जीवनदायी जल में बचा रह गया है। संस्कृतीकरण के क्रम में इसका रूपगत और अर्थगत ह्रास हुआ। सच यह है कि पा, पी, पू, पे की तरह म (मकर), मा(मास), मी(मीन), मू (मूत) का अर्थ पानी था। मू-त्र(तर) संभव है जलपरक शब्दों का युग्म हो।

विष
विष (इष/ विष) का पुराना अर्थ जल था। इसका मूल वही है जो विष्णु, विषुव – फैलने वाला, फैला हुआ – में देखने में आता है। अंतर केवल यह है कि विष्णु में यह आग का प्रसार है और इसलिए आग, यज्ञ, सूर्य के लिए इसका प्रयोग मिलता है, विष के मामले में यह प्रसार जल के फैलाव या बहाव का है। ऋग्वेद के समय तक इसका प्रयोग मुख्यतः हलाहल (यहाँ भी जल परक हल की आवर्तिता है) के लिए होने लगा था। केवल एक दो बार जल के लिए देखने में आता है। हम नहीं जानते कि इसे विकृत (सड़े या सड़ाँध वाले) इष या जल के औचित्य से बदबूदार और प्राणघाती द्रव्य से संबद्ध किया गया या नहीं। यह अवश्य जानते हैं कि विष्ठा के लिए भी इसी से संज्ञा निकली। इसके बाद भी पूरबी में तटीय स्थानों के कतिपय नाम – बिसवनिया, बिस्टौली, बिसुनपुर के समानान्तर मिलते हैं। बिष्ट उपाधि के साथ विष्णु वाले तेजस्विता का हाथ दिखाई देता है।
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[1] अंबा, अंबे (द्वि.व.), अंबालिका (*बहु.व.), तीनों अर्थ उसी तरह नदी है जैसे सनक, सनातन, सनन्दन तीनों का अर्थ काल। भीष्मपितामह के गंगा से उत्पत्ति की ऐतिहासिकता की तरह उनके अपहरण की कथा भी काल्पनिक लगती है।

Post – 2020-05-29

#शब्दवेध(48)
सभी द्रव पानी हैं

जब रंग, प्रकाश और आग पानी हो सकते है तो सभी द्रव पानी हों, यहाँ तक कि सभी आर्द्र पदार्थ पानी हों, इसमें हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए। परेशानी यह सोच कर होती है कि भाषा का काम है फर्क करना- विष और अमृत दोनों को पानी तो नहीं कहा जा सकता।
यह सही है कि विशेष शब्दों को इनके लिए रूढ़ कर दिया गया, परंतु उसके बाद इनका प्रयोग पानी के लिए तो नहीं होना चाहिए था। ऐसा है, पर क्यों है, इसे समझना, भाषा की कुछ बुनियादी समस्याओं को समझने जैसा है। यह वाक् (language), व्यावहारिक भाषा या जबान(vernacular), तकनीकी भाषा (jargon), वाणी (ideolect) के जटिल संबंधों की समस्या है। यह, सच कहें तो, भाषा की समस्या न हो कर पारस्परिक संपर्क में आने वाले समुदायों की समस्या है जो एक ही भाषा नहीं बोलते फिर भी आर्थिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक कारणों से न्यूनाधिक जुड़े रहते हैं और जहाँ एक ही भाषा बोलते दिखाई देते हैं वहाँ भी सामाजिक हैसियत, आर्थिक औकात, पेशे, रुचि यहाँ तक कि वय और लैंगिकता के आधार पर अलग अलग भाषाएं बोलते हैं
इस लिए बहुत सारे परिवर्तन उनके अपने दायरे में होते हैं जिनसे शेष समाज अछूता रह जाता है। इनमें कुछ, जिनमें जान होती है, धीरे धीरे छन कर, सभी स्तरों तक पहुँचते और स्वीकार कर लिए जाते है परंतु यह यात्रा अधूरी रह जाती है। इसका उल्लेख मात्र यह स्पष्ट करने के लिए किया कि साहित्यिक भाषा, यहाँ तक कि संस्कृत जैसी नियंत्रित और निखोट मान ली जाने वाली भाषा तक में रूपावली से ले कर लिंग आदि के अनियमित प्रयोग क्यों होते रहे, इसे भी इस तर्क से ही समझा जा सकता है। हम इस जटिल विषय की पड़ताल में नहीं जाएँगे। हमारा उद्देश्य केवल इतने से सिद्ध हो जाता है कि अनियमितताओं का भी अपना तर्क होता है।

पानी के कितने पर्याय हो सकते हैं इसकी गणना असंभव है। भाषा कहती है, ‘मैं मनुष्यों आवेगो और विचारों से भर देती है, मेरा प्रवेश धरती और आकाश सभी में है – अहं जनाय समदं कृणोमि अहं द्यावापृथिवी आ विवेश और ‘मेरी उत्पत्ति जल से है’ -मम योनिः अप्सु अन्तः समुद्रे। समस्त नाम, जल के नाम। परंतु द्रव पदार्थों की गणना संभव है और समस्या यहां भेद और अभेद की है। विशिष्ट कार्यों और वस्तुओं में रूढ हो जाने के बाद भी उन शब्दों के जल वाचक बने रहने में है।

नून का प्रयोग लवण के लिए होने के बाद जल के लिए या किसी ऐसे भाव और विचार जिससे जल की याद आए, इसका प्रयोग नहीं होना चाहिए. परंतु होता है जैसे नमक के लिए राम रस का प्रयोग होता है। देवरिया जिले में एक स्थान का नाम नूनखार है- अर्थात् वह स्थान जहाँ का पानी खारा है। दूसरे भी कई शब्द है जिनमें नून का भाव पानी में बचा रह गया है ।

घी <> घृत –
ऋग्वेद में सामान्यतः घी के लिए घृत का प्रयोग देखने में आता है. परंतु साथ ही जल के लिए इसका प्रयोग होता है। इस दुहरे प्रयोग का ध्यान रखते हुए धातुकारों ने ‘घृ’ का अर्थ किया (क्षरण) वह जो छलकता है, बहता है। पश्चिमी अनुवादक नियमित रूप से ‘घी’ ही करते हैं जिसे (अव स्मयन्त विद्युतः पृथिव्यां यदी घृतं मरुतः प्रुष्णुवन्ति ।। 1.168.8 के अनुवाद में देखा जा सकता है। कृषि के अनुरूप वर्षा का बहुत मार्मिक चित्रण किया गया है, जब मरुद्गण धरती को सिंचित कर रहे हैं, बिजलियां धरती की ओर नीचे देखती हुई हँस रही हैं। ग्रिफिथ महोदय का अनुवाद है: the lightnings laugh upon the earth beneath them, what time the Maruts scatter forth their fatness, शब्द अनुवाद में कोई चूक नहीं, कोई यह नहीं कह सकता कि से वैदिक भाषा नहीं आती, संदर्भ की चिंता नहीं, इससे यदि अनुवाद में अटपटी लगती है तो यही उनका उद्देश्य था, परंतु साथ ही यह भी स्वीकार करना होगा सायण के अनुवाद की कमियों को पहचानते हुए अनेक स्थलों पर उन्होंने अधिक सही अनुवाद किया है।

तेल
तेल के विषय में एक बहुत गलत धारणा पाई जाती है कि यह पहले तिल से निकाला गया इसलिए इसे तेल की संज्ञा मिली । ज्ञानमंडल के कोश में इसका अर्थ दिया गया है बीज, वनस्पतियों आदि से निकलने या विशेष उपाय द्वारा निकाला जाने वाला तरल पदार्थ इसलिए उसमें तैल का अर्थ आ गया है तिल को पेर कर निकाला हुआ तेल। यह अर्थ गलत है क्योंकि तिल का अर्थ ही था, जल। ल-कार प्रियता के कारण तिर का तिल हो गया, और नम भूमि के लिए तिल्विल (तिलु नम + इल – धरती – तिल्विल) = सिंचित भूमि। भद्रे क्षेत्रे निमिता तिल्विले वा … 5-62-7 में स्थूणायूपयष्टिरवस्थित -जिससे खूँटी-खूँट् निकाले जा चुके हैं ऐसे सुथरे नम खेत में।
हम भी बचपन में बरसात के बाद पानी में डूबे हुए भाग से पानी हटने के बाद जमीन के नीचे से जगह-जगह पानी ऊपर निकलता था उसे तेलगगरा कहते थे। नदी के या पानी के पास की कतिपय बस्तियों के नाम तिल से आरंभ होते हैं जैसे तिलसर।

Post – 2020-05-28

हम भी सच को ही सच समझते थे
पर जमाना वह कुछ अलग सा था।।

Post – 2020-05-28

#शब्दवेध(47)
रंगों के लिए है शब्द?

है तो, पर नहीं भी है, क्योंकि रंगों के इतने भेद हैं कि सभी के लिए सही संज्ञा का प्रयोग किया जाए तो एक अलग कोश बन जाए, इसलिए अपनी मुश्किल को आसान बनाने के लिए मनुष्य विविध रंगीन वस्तुओ और फूलों के नाम जोड़ कर बहुत प्राचीन काल से रंगो के लिए संज्ञाएँ गढ़ता आया है – रुपहला, सुनहला, तामई, लोहित, मटमैला, धूमिल, केसरी, गेरुआ, हल्दिया (हरित/हारिद्र), गुलाबी, धानी (+ रंग) और ऐसे सभी नामों के विषय में यह कहा जा सकता है कि ये जल की ध्वनि पर आधारित नही हैं।

परंतु जिनके रंग को संज्ञा बनाया गया है उनसे स्वयं भी कोई ध्वनि पैदा नहीं होती। हमारे सुझाए गए नियम के अनुसार वे अपनी संज्ञा के लिए जल की किसी ध्वनि पर आधारित होने को बाध्य है। गुलाब (गुल +आब) का नाम तो ऐसा कि हम इसे पानी का फूल कह सकते हैं। धान, धन, (धान्य, धन्य), तन (तने – धनाय, सा.) का पानी से क्या संबंध है इसे इसी बात से समझा जा सकता है जल को धनों का धन ( धनंधनम्), और वृष्टिदाता इन्द्र को महाधन कहा गया है। आप-जल >अप्न धन।

अनाजों में धान धन का पर्याय इसलिए हो गया कि देवों ने धान की खेती से कृषि आरंभ की थी। पलाश – पत्तों वाला, के आदि में आया पल>प्ल, अं. पूल (pool) जलवाची है। उसे यह संज्ञा संभवतः उसकी पत्तियों की उपयोगिता समझ में आने के बाद मिली। पर रंग के लिए पलाश का प्रयोग नहीं होता। उसके फूल का अलग नाम टेसू है, पर अभी इससे मिलता-जुलता जलवाची नाम नहीं सूझ रहा। धातुओं में सभी का नाम जलपरक है।

सभी धातुओं में चमक होती है, सभी एक निश्चित तापमान पर पिघल कर पानी हो सकती हैं, कारण कुछ भी हो पर अर्थ, द्रव, सु-अर्ण, रज-त, लहू-लोह, तम – पानी, >तामा/ताँबा/ताम्र, कन्-पानी+चन-पानी=कंचन, काच, कांस्य, रंगों के लिए जो पुराने नाम : नीर-जल >नील> नीड(नेस्ट) छाया; पीतु-जल> पीत>पीतल, पीला, अर/अरु-जल >अरुण, अरुष; सर/हर/सरि/हरि- जल, नदी > हरा, हरित (पीला, हरा, भूरा); बभ्रु वर्ण के विकास के कई चरण हैं – पूः >पूर/पुर/प्रू (आपप्रुषी)> पूर्ण के समानान्तर महाप्राण प्रेमी बोलियाें में फुर> फुल्ल, full/ fill, फ्रू >fruit, भर/भुर/भूरि,भ्र, भृशं,आदि। इसी क्रम में भ्रूभ्रू> बभ्रु का और इसके अधिक पुराने रूप से भूरा का नामकरण हुआ लगता है। काला, कृष्ण पर हम पहले चर्चा कर आए हैं।
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प्रकाश के लिए शब्द
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पाणिनि के धातु पाठ की कुछ धातुएँ हमारे लिए बहुत उपयोगी हैं, ‘चंचु गत्यर्थाः, 190. ३००, चक तृप्तौ, 783. ३०१, चक तृप्तौ प्रतिघाते च, 93. ३०२, चकाशृ दीप्तौ, 1074. इसका बोलियों के अनुरूप पाठ करें ताे इसमें चंचल के लिए चंचु, छक कर खाने पीने के लिए चक, छकने, छकाने और छक्का छुड़ाने के लिए एक अलग चक की और देखने (चक्षु/ चक्षण), चकराने, चकित होने के लिए एक अन्य चक धातु की कल्पना की गई है जो वर्णविपर्यय के कच>कश>काच/काश का रूप ले सकती थी।

उनकी समस्या लिखित या मानक भाषा में उपलब्ध समान मूल और अर्थ वाले घटकों का निर्धारण था। ध्वनियों की स्वायत्तता की ओर उनका ध्यान गया ही न था। हमारे लिए अंतिम सूत्र का महत्व यह है कि काश का अर्थ वही है जो प्र- उपसर्ग के बिना समझ में न आता, पर पहले व्यवहार में था, यह ला. cos-metic और cos-mos, सजावट और जगमगाहट से प्रकट है । मूल कस/ करस > कर्स जलवाची पद के पीछे वही तर्क था जो सरकर, सरकना, शर्करा, अं.शर्क (shirk) के पीछे । इससे बोलियों का कसना, कसौटी, कसक फा. कश -*जल> कश्ती, कशमकश, कशिश, कोशिश, कशीदा आदि व्युत्पन्न हैं। करस >कर्ष> कष (निकष), कृशानु>कृष >कृष्ण का रूप लेता है। कश/ काश जलर्थक से प्रकाश का रूप लेता है, पर यह हैरान करने वाली बात है कि उपसर्ग के बिना अनेक शब्दों का प्रयोग ही नहीं होता (भा, वदन्ती, तीक आदि भी इन्हीं में आते हैं)।

भा
वर्गीय ध्वनियों में अंतर प्राय: अर्थभेदक नहीं है।इसका कारण यह है कि आरंभ में एक ही शब्द को अलग-अलग बोलियों के लोग पारस्परिक संपर्क में आने के बाद प्रायः अपनी सीमा में सुनते और बोलते थे, यह हम पहले भी कह आए हैं। लंबे समय के बाद जब दूसरों की ध्वनियों को अधिक सटीक रूप में बोलने का अभ्यास उन्हें हो गया और उनकी ध्वनि माला विस्तृत हो गई तो उसके बाद जो शब्द गढ़े गए उनमें अर्थ भेदकता दिखाई देती । इसलिए सघोष महाप्राण ध्वनियों वाले शब्दों का अघोष अल्पप्राण प्रतिरूप मिलता है तो वह अलग शब्द नहीं है, एक अलग बोली बोलने वालों के द्वारा उच्चरित वही शब्द है।

जो बात भा, भी, भू से स्पष्ट नहीं होती वह पा, पी पू से समझ में आ सकती है। पा – पानी, पाला – तुहिन, त. पाल्, ते. पालु – दूध, हिं. पालन, पालि, पालना; त. पार्- देख, भो. कान पारना [1], पावस-बरसात, भो, पलानी – छानी/छप्पर, झोंपड़ी। अब हम भा- *पानी, > भाप, भो. भास- दलदल, भासना- दलदल में धँसना, भाँति- प्रतिबिंब, प्रतिरूप, भा- प्रकाश, भानु- सूर्य, भान प्रतीति, (आ-/प्र-/स- भा), भाषा आदि पर दृष्टिपात कर सकते हैं।

ज्योति
जोति/ जोत[2], ज्योति में विशेष अंतर नहीं है। जोत और जोति अधिक नियमित और अधिक पुराने हैं। जैस जूर्णि – लपट, जार, जरा, जराना – जिनकाे सं. ज्वाला ज्वलन बना लेती है। भो. पूर्वरूप ही जल, ज्वाला और ज्योति> की विकासरेखा को अधिक स्पष्ट करती है। भो. जूरल – उपलब्ध होना,(जो जुटना, जुड़ना, जोड़ना में कुछ धुँधला रह जाता। भो. जुड़ाइल – ठंढा होना, जूड़ी, जाड़ा इस शब्द समूह के जल से संबंध को प्रकट करता वहीं इसको जलाने, सुखाने, निर्जीव करने के लिए झूर, *झु/झू-आग, (झोंसल, झुँझलाइल, झुराइल) कौरवी प्रभाव में महाप्राणन खो कर जू, जरा, जार, जूर्णि बना। द्युति के प्रभाव में जोति ने ज्योति का रूप लिया।

द्युति
द्युति का कहानी भिन्न है। यह ती – जल से व्युत्पन्न है। ती, तर, तिर, तृ के जलवाची होने पर कोई संदेह नही। यह ते. तिय्यन – मीठा, भो. तेवना – भोजन को सुस्वाद बनाने के लिए कोई खाद्य या पेय में भी लक्ष्य किया जा सकता है। त. में तिकऴ़ – चमक, द्युति, तिट्टम् – सटीकता, समतलता; तिट्टि – खिड़की; ती – आग, ताप, बुराई । यह ती, दी, धी, तेव (तेवर), देव और संस्कृतीकरण से द्यु, द्यौस, (>धौंस), (प्र)तीक, तिथि, टीक, टिकोरा, सटीक, टीका, ठीक, ठेका आदि की एक विशाल शब्दावली का जनन करता है और इसकी कुछ शब्दावली पूरे भारोपीय क्षेत्र में फैलती है, इस झमेले में न पड़ेंगे। य़हाँ तक कि यह भी तय करना नहीं चाहेंगे कि मूल तमिल का ‘ती’ है या भो. का ‘धी’, धिकवल – गर्म करना, पर यह याद दिला सकते हैे कि धिक्कार का मतलब ‘आग लगे’, ‘भाड़ में जा’ है।

दूसरे सभी पर्यायों का भी यही हाल है।_
___________________
[1] इसमें त. कान< कन/कण् और पार-देखना का भो. में समावेश के बाद एक नया रूप, जिसका प्रयोग तो होता है पर बिंब नहीं उभर पाता। [2] हम अपनी व्याख्या में उन मामलों में जिनमें यह निश्चित है कि कुरुक्षेत्र में आने वाले उन वस्तुओं/ संकल्पनाओं से अनभिज्ञ नहीं रहे होंगे भोजपुरी के पूर्व रूपों को अधिक भरोसे का मानते हैं। जोति, जोन्ही, जोहल, जूरल, झुराइल, झूर, चान, अँजोर, अँजोरिया, अन्हरिया, उज्जर, उजियार उजास। जैसे ऋग्वेद के हवाले जहाँ सुलभ हुए वहाँ नाम लेकर इसलिए देते हैं कि वह प्राचीनतम कृति है और उसमें हमें लिखित शब्दों के प्राचीनतम ही नहीं अपितु कभी कभी संक्रमणकालीन रूप भी मिल जाते हैं, उसी तरह भो. का विशेष उल्लेख इसलिए महत्व रखता है कि भारोपीय का आद्य रूप उसी में संरक्षित है। भाषा के इतिहास की तलाश करने वाला इसकी उपेक्षा नहीं कर सकता।

Post – 2020-05-27

भगदड़ के लिए उकसा कर बेसँभाल भीड़ को्, दुर्गति में भी, जीवट के यत्किंचित अविस्मरणीय कारनामे दिखाते दे्ख् तालियाँ बजाते हुए ‘क्या खूब रही! क्या खूब रही!! करने वालों की बेरहमी और इरादे हमें अधिक चकित करते हैं। क्या उन्होंने उनके जीवट को काम की अमानवीय शर्तों पर, अगले दिन तक जीने के लिए, मौत से लोहा लेते और इसके बाद भी बिरहा, कजरी, फाग गाते महाकाल के सिर पर खड़े होकर अट्टहास करते देखा ही न था? मेरा मन उनके इस रहस भोलेपन पर ताली बजाने और क्या खूब रही! क्या खूब रही!! करनेे का होता है ।

Post – 2020-05-26

#शब्दवेध(46)
अंधेरे के लिए शब्द नही

अंधकार
अकेला यह शब्द है जिस पर कुछ भरोसा किया जा सकता था, परंतु यह भी अँधेरे के लिए रूढ़ है। इसका अर्थ अँधेरा नहीं होता। अंध/ अंधस का अर्थ है रस, सोमरस। ऋग्वेद में अंध शब्द का इस आशय में 24 बार प्रयोग हुआ है:
इन्द्रो यद्वृत्रमवधीत् नदीवृतं उब्जन् अर्णांसि जर्हृषाणो अन्धसा ।। 1.52.2 (इन्द्र ने अंधस् की मस्ती में आकर जलप्रवाह को अवरुद्ध करने वाले वृत्र का वध करके जल धाराओं को मुक्त किया
सीदता बर्हि: उरु वो सदस्कृतं मादयध्वं मरुतो मध्वो अन्धसः ।। 1.85.6 ( मरुद्गण, आपके आसन के लिए चटाई बिछा दी गई है आप उस पर विराजमान हों और सोमरस के पान से मस्त हों।)
पिबतं मध्वो अन्धसः पूर्वपेयं हि वां हितम् । इन्द्र त्वा वृषभं वयं सुते सोमे हवामहे । 1.135.4 (सोमपान पर तुम्हारा प्रथम अधिकार है, वृष्टिकारी इन्द्र तुझे हम अपने आसवित सोम के पान के लिए बुला रहे हैं) , आदि।

परंतु ऐसा नहीं है कि उस समय अंधे को अंधा नहीं कहा जाता रहा हो। आपसी सहयोग से अंधे और लंगड़े के पहाड़ पार करने की कहानी, जिसे आपने बचपन में कई बार सुना और बच्चों को यदा-कदा सुनाया होगा, वह ऋग्वेद के समय में भी सुनी सुनाई जाती थी, यह दूसरी बात है कि इसे आपसी सूझ का परिणाम न मान कर देव कृपा से प्रेरित बताया जाता था:
याभिः शचीभिः वृषणा परावृजं प्रान्धं श्रोणं चक्षस एतवे कृथः । 1.112.8 जिस दूरदर्शिता से दूर देश में गए असहाय अंधे और लंगड़े को यात्रा में समर्थ बनाया था।’ दो बार और दोहराया गया है।
नीचा सन्तमुदनयः परावृजं प्रान्धं श्रोणं श्रवयन् त्सास्युक्थ्यः ।। 2.13.12
प्रान्धं श्रोणं च तारिषद्विवक्षसे ।।10.25.11

अश्विनी कुमार अपनी चिकित्सा से अंधे की आँखों की रोशनी लौटा देते है, क्षीणकाय को हृष्टपुष्ट कर देते हैं,टूटी हड्डी जोड़ सकते हैं (अन्धस्य चिन्नासत्या कृशस्य चिद्युवामिदाहुर्भिषजा रुतस्य चित्, ऋ. 10.39.3)। वैदिक जन मनाते हैं कि उनके शत्रुओं को कुछ दिखाई न दे और उनकी अपनी रातें भी जगमग रहें (अन्धेनामित्रास्तमसा सचन्तां सुज्योतिषः अक्तवः तान् अभि ष्युः, 10.89.15) अंधेरी से प्रकाश की ओर ले चलने की चिंता करने वाले अंधेरे का अर्थ न जानते हों, यह संभव है ही नहीं। अंतर केवल यह कि उन्हें भूला नहीं है कि अंध का अर्थ पानी हुआ करता था, रस/सोमरस हो सकता है, और अंधकार तो है ही।

अंध उसी समूह में आता है जिसमें अत/ अद, इत/इद, उत/उद, अंत/अंद, इंत/ इंद, उंद, अंध, इंध, ऊध आदि। इन सबका एक अर्थ जल है, पर इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें अनेक से व्याकरणिक पद बने हैं। अत/ अतर -पानी, अतरौली, अतरौली, अतरौलिया – तटीय स्थान नाम (यद्यप् अलीगढ़ में स्थित अतरौली गंगा की वर्तमान धारा से काफी दूर है) अत/ आत- उसके आगे/बाद; अतः – इसलिए, अत/अद् -पीना/खाना, अत्रि- खानेवाले, अद्य-खाद्य, अत्र (त्र< तर- 1.जल, 2. स्थान, 3. तुलनात्मक प्रत्यय (सं., फा. -तर, अं. अर), 4. स्थानवाचक - यहाँ, और 5. अन्द> अन्ध> अन्न), आदि- आरंभ, इत्यादि – इति-अंत+आदि= समस्त > आदि=इत्यादि), अंत – निकट, भीतर (अंतर/ अन्तः>अंदर)[1]। हम इसकी विस्तृत समीक्षा में नहीं जाएंगे क्योंकि यह संस्कृत के विकास में जिस संक्रमण का सूचक है, उस पर जितनी गंभीर चर्चा जरूरी है वह फेसबुक के मंच के संभव नहीं है जहां लोग मैत्री के आधार पर सहमति या मौन असहमति जताते हैं, कितनों ने धैर्यपूर्वक कई बार पढ़ कर साझा और ग्रहण किया यह पता नहीं चल पाता।

हम अंधकार के पर्याय बात करते हुए जिस तथ्य को रेखांकित करना चाहते हैं, वह यह कि जल की किसी ध्वनि के वाचिक अनुवाद से ही अंधकार को संज्ञा मिली। यहां यह अवश्य स्मरण कराना चाहते हैं कि तमिल में अंद का प्रयोग स्थानवाची विशेषण के लिए होता है जिसका बोलचाल में ‘अ’-कार ही रह जाता है – अन्दम् ( अ-) – वह. इसे अंतम, अंधम् कुछ भी पढ़ा जा सकता है। इसलिए संस्कृत के अंधे के लिए एक अलग शब्द ‘अन्धन् -चलता है।

रात/रात्रि
रात के साथ रत, रत्न- चमकीले पत्थर, रातना – लाल होना, रतनार – ललौंहा, रत्ती – गुंजा, (लाल रंग का एक छोटा सा फल जिसे इसी नाम के बाट के भार की समानता के कारण संज्ञा दी गई) के साथ रख कर समझें। यह समझने में कठिनाई न होगी कि इस नामकरण का आधार अँधेरा नहीं अपितु रात के आसमान की जगमगाहट है। ऋग्वेद में रात की जगमगाहट का एक बहुत मनोरम चित्रण है- पितरों ने जैसे किसी काली घोड़ी को मोतियों से सजा दिया हो (अभि श्यावं न कृशनेभिरश्वं नक्षत्रेभिः पितरो द्यामपिंशन् । ) रात के नामकरण के पीछे यही जगमगाहट है। परंतु हमारी समस्या तो रात को जलपरक सिद्ध करने की है।यह री- टपकना, बहना, उफनना (रीयते) से संबंध रखता है जिसमें गति और प्रवाह भी आते हैं, रीति, रति, रा (राति- दान), रात समाहित हैं। अन्तरिक्षे पथिभि- ईयमानो न नि विशते कतमच्चनाहः । अपां सखा प्रथमजाः ऋतावा क्व स्विज्जातो कुत आबभूव, 10.168.3 (वायुदेव अंतरिक्ष के मार्ग से प्रवाहित होते है, कभी एक दिन के लिए भी कहीं ठहरते नहीं हैं, जल के मित्र हैं, अपने व्रत से अडिग हैं, सर्व-प्रथम उत्पन्न हुए, वे कहां से पैदा हुए, किधर से आए?)[2]।

रजनी
रजनी के विषय में किसी संदेह की आवश्यकता नहीं कि यह रज-जल, रज्जु (तुलना करें, रस>रश्मि>रसरी>रस्सी से), राज, रजत से और फिर रात की जगमगाहट की याद दिलाता है। जब इस शब्द का अर्थ समझ में आ जाएगा, तब अं, ला, रायल और इनके लातिन पूर्वरूपों का भी अर्आथ समझ में आ जाएगा।

नक्त
नक- जल (नक्र- जलचर), नक्श – नख-शिख, रूप, नक्शा, नक्षत्र, E. night, Ger. nacht, L. nox, G. nyx को एक साथ रखकर देखें, किसी व्याख्या की आवश्यकता न पड़ेगी। यहाँ तक कि यह समझ में आ जाने के बाद कि र और ल ही में अभेद नहीं है, न और ल में भी अभेद है, भाषा की कई पहेलियाँ सुलझ जाएँगी। तभी आप नाइट की जगमगाहट और लाइट, डिलाइट ब्लाइट और साइट के और सं. नक्ष, लक्ष, लख, बिलख, लाक्षा (लाख) की आपसी कडी को समझ सकेंगे।

मसि
मसि का अर्थ है स्याही – कालिमा युक्त। इसका दूसरा नाम है रोशनाई, प्रकाशित करने वाली। हिंदी में जिसके लिए लिपि का प्रयोग होता है, उसके लिए एक और शब्द का प्रयोग होता था, ‘दिपि’’ – प्रदर्शित करने वाला। इसी तर्क से ऋग्वेद में लिखित वाणी को सूर्या या सू्र्य की दुहिता कहा गया, परंतु उसमें उलझने का यह सही स्थान नहीं है। ङाँ यह याद दिलाने का सही समय तो है ही कि जब हम दाढी-मूँछ आने के लिए मसें भींगने का मुहावरा प्रयोग में लाते हैं, तो मस के साथ मास/माह<> मस/मह= चंद्रमा की याद रहती है या नहीं। मह, मघ, मेह, मेघ और जल के संबंधों को समझने के लिए जाहिर है, कुछ अध्ययन जरूरी हो सकता है। मह का अर्थ जल है और जब आप किसी को महान कहते हैं तो उसे जलवान अर्थात् द्रव्यवान भी कहते हैं, इसका आप को पता न रहा हो तो अब हो जाना चाहिए।

डार्क(dark)/ ब्लैक(black)/ग्लूम (gloom)
यदि हम अंधकार के अंग्रेजी पर्यायों पर विचार करें तो वहां पर भी वही तर्क लागू होता दिखाई देगा। सं. द्र>द्रु>द्रप्स > ड्रा (draw), ड्राप(drop), ड्रिंक (drink), ड्राइव(drive), के बीच के संबंधों को समझने का प्रयत्न करें, ब्लीक (bleak) >< ब्लीच(bleech) , ब्लैक(black)<ब्लैंक(blank), फ्लो(flow)/ब्लो(blow, - ब्लॉट blot, को और ग्लूम (gloom) को ग्लो (glow), ब्लूम(bloom) को ब्लो(blow)/फ्लो(flow), सैड(sad) को सैट- (satisfaction) से मिलाकर समझें तो पता चलेगा यह तर्क भारतीय बोलियों से आरंभ हो कर यूरोप तक काम करता रहा। __________________________________ [1] यह भाषा के में एक बहुत निर्णायक मोड़ को दर्शाता है। पहले यहाँ के लिए ई का, समीप और निम्न के ईं/इत/इंत/इत्र का बीच और ऊपर के लिए ऊ/ऊँ/ऊत्र और दूरस्थ के लिए अ/आ/आँत/अत्र का प्रयोग होता था। इसकी हल्का आभास ऋग्वेद से और द्रविड़ मानी जाने वाली बोली कुऱुख में मिलता है। सं. भी इससे पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई। ऋ. में ईं/ईम् - भो. ई, हिं इ(-स/-धर), कु. इतरम्- यहाँ में, सं. इतःततः> इतस्ततः के इतः में में इसे लक्ष्य किया जा सकता है। होना इसे भी इतःअतः चाहिए था, जैसा कु. के अतरम् में अं के अदर में मिलता है। परंतु इस संक्रमण के कारण ‘ई’ का स्थान ‘अ’ ने ले लिया। अ का स्थान कुछ समय के लिए ई ने ग्रहण किया( फा. इंतहा, इन्तकाल) फिर ‘त’ ने (सं. तत, ततः, अं. दैट that, there) में देखा जा सकता है। इत्र-अत्र अब अत्र-तत्र हो गया। अंत का भो. अन्ते, हि. सं. अन्त में ‘अ’ की दूरता बनी रही। वैदिक अन्त- निकट, अन्तेवासी आदि में निकटता का सूचक बन गया।
[2] इस ऋचा को नासदीय सूक्त के संदर्भ में ही समझा जा सकता है।

Post – 2020-05-24

#शब्दवेध(45)
अंधेरे के लिए शब्द नहीं
तम/तमस/तमिस्र
अंधेरे के लिए तम का प्रयोग नासदीय सूक्त में भी हुआ है- पहले तम के भीतर तम छिपा हुआ था – तम आसीत तमसा गूढ़ं अग्रे। परंतु तमसा एक नदी का भी नाम था जिसे आजकल टोंस कहते हैं।[1] अब कुछ दूसरे शब्दों पर ध्यान दे सकते हैं जिनसे लालिमा, आवेश, उल्लास आदि का भाव प्रकट होता है – तामर- पानी, तूँबा/तुमड़ी – जलपात्र; *तमतम> टमटम- चलने वाला, वाहन: तमक- आवेश, तमतमाना, तामा > सं. ताम्र, तामझाम, तामरस- 1.कमल, 2.ताँबा, 3.सुवर्ण; तमस्विनी का एक अर्थ रात है तो दूसरा हल्दी। फा. तमाशा, अ. तमन्ना – आकांक्षा । पराकाष्ठा सूचक प्रत्यय -तम पर भी हमारी दृष्टि जानी चाहिए क्योंकि लघुता और महिमा सूचक सभी शब्द जल के पर्याय हैं। ध्यान तुलनात्मक -तर प्रत्यय पर भी जाना चाहिए, जो भी जलार्थक तर ही है। हमें लगता ‘तम’ और temp, temper, tempest, tame, timid, time, temporary, Tames आदि शब्दों के संबंध पर पर नए ढंग से विचार किया जा सकता है, परंतु हम इसका खतरा नहीं उठाएंगे।

हम पाते हैं कि तम मूलतः अंधकार का द्योतक नहीं था और इसको नकारात्मक आशय में प्रयोग में लाया जाने लगा और अनेक नकारात्मक भावों – तमोगुण, तामसी स्वभाव, तमोवृध- निशाचर, तंबू> tomb आदि से भी जब कि उसी के समानान्तर लोक व्यवहार में, उसी मूल से निकले के शब्द दूसरे आशयों में प्रयोग में आते रहे।
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[1] विरल अपवादों, जैसे अचिरावती- निरंतर धारा बदलने वाली, को छोड़कर, सभी नदियों के नाम का अर्थ है जलवाली, सुजला या प्रवहमान है, इसलिए नदियों के नाम के विश्लेषण से भी हम जल के पर्यायों को समझ सकते हैं। सामान्यतः इसका ध्यान विद्वान भी नहीं रख पाते। उदाहरण के लिए सुनीति बाबू की मान्यता थी कि गंगा का अर्थ नदी होता है और यह आस्त्रिक भाषा का है, मुझे उनको यह समझाने में कुछ समय लगा कि गंगा का अर्थ सुजला होता है, कि गं/कं का अर्थ जल है। समय इसलिए लगा कि उस समय मैं तटीय नामों के आधार कर अपना पक्ष रख रहा था। अधिक सटीक उदाहरणों- कं-ज= जलज; कनई, *गंगरा (गगरा), गगरी, गंगाल, की ओर हमारा भी ध्यान न था। आज भी गोमती, गोमल के साथ गाय का आशय जोड़ लिया जाता है, जब कि अर्थ है – जलवाली। गो का अपना नामकरण जल की गतिशीलता से प्रेरित है। गो हो या कम दोनों का अर्थ ‘चल’ है और इसलिए गोट और काउ का शाब्दिक अर्थ है चलने वाला, जैसे सर्प > सर्पेंट का अर्थ है सरकने वाला और ये भी सर- जल, > सरकना> सर्प, सरीसृप, सर्पेंट क्रम से उत्पन्न हैं।
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तिमिर
तिम – जल; तिमि – समुद्र, तिमिंगल – महामत्स्य; टीमटाम – सजावट, दिखावा; टिमटिमाना; टेम- दीपशिखा ।
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धूम/ धाम/ धुँआ/ धुंध/ धुँधला
धू-धू कर आग जलना, धूमधाम से कोई उत्सव मनाना संदेह पैदा करता है कि धूम शब्द कालिमा का द्योतक रहा हो सकता है। शब्द जिस चीज के लिए टैग के रूप में प्रयोग में आता है, उसके रंग का शब्द पर आरोपण करने के कारण हम अपने को आश्वस्त कर लेते हैं कि इसका शाब्दिक अर्थ काला होगा। परंतु ऋग्वेद में ललौहे धुँए का भी उल्लेख है (अच्छा द्यां अरुषो धूम एति, Aloft to heaven thy ruddy smoke ascendeth, ग्रि.) धुँए का रंग सदा काला नहीं दिखता। कभी कभी सफेद भी लगता है। धाम का प्रयोग ऋ. में स्थान और निवास के लिए, पर अनेक बार तेज के लिए भी हुआ है – ‘पुरुहूतस्य धामभिः’ पुरुहूत इन्द्र के तेजों के साथ;’ धामसाचं अभिषाचं स्वर्विदम्’ स्वर्गीय तेजस्विता प्रदान करने और समस्त तेजो के साथ ‘सप्त धामभिः’ जैसे प्रयोग देखने में आते हैं।

यदि इस तरह की अनेकार्थता है तो धू/ धम् का स्रोत जल होना चाहिए। पहले मुझे कुछ सूझा नहीं। परन्तु यदि हमने जो नियम स्थिर किए हैं वे निरपवाद हैं तो कोई शब्द होगा अवश्य। तब मेरा ध्यान ‘धोना’ क्रिया पर, ‘धवल’ वर्ण पर तो जाना ही था। नदियों का एक पर्याय ‘धौती’ का ऋग्वेद में केवल एक बार प्रयोग हुआ है- ‘यो धौतीनां अहिहन् अरिणक् पथः-2.13.5 (‘धौतीनां चलन्तीनां नदीनाम्’ , सायण)।

अब धम् के वे अर्थ सामने आए जिनकी ओर पहले ध्यान नहीं गया था : (1) चालन (धमन्तो बाणं, ऋ. 1.85.10), बाण चलाते हुए; (वि सप्तरश्मिः अधमत् तमांसि, ऋ. 4.50.4), अपनी सातों रश्मियों से सभी प्रकार के अंधकारों को दूर भगा दिया (2) वध, (अभि दस्युं बकुरेणा धमन्तोरु ज्योतिश्चक्रथुरार्याय, ऋ. 1.117.21), अपने प्रज्वलित क्षेप्यास्त्र से रहजनों का वध करते हुए सौदागरों के लिए प्रकाश फैला दिया, (3) ध्वनित करना, (इन्द्रेषितां धमनिं पप्रथन् नि, ऋ 2.11.8), इन्द्र प्रेरित ध्वनि करते रहे – धमनिं – शब्दं कुर्वाणां, सायण;; (4) विदीर्ण करना, (भृमिं धमन्तो अप गा अवृण्वत्, ऋ. 2.34.1) भागते हुए बादलों को विदीर्ण करके जल को मुक्त किया; और (5) प्रवाह, (ये द्रप्सा इव रोदसी धमन्ति अनु वृष्टिभिः, उत्सं दुहन्तो अक्षितम्, 8.7.16), They who like fiery sparks with showers of rain blow through the heaven and earth, Milking the spring that never fails ग्रि.. और इस अंतिम तर्क से ही हमारी रक्तवाहिकाओं का नाम धमनी पड़ा है। यूँ तो शिराएँ भी वाहिकाएँ ही हैं, परंतु हम केवल धू और धम् के अर्थविकास पर विचार कर रहे हैं।

आप भले पैंट या पाजामा पहनते हों, कभी कभार धोती तो पहना होगा, न पहना हो तो कुछ पुरुषों-स्त्रियों को धोती पहने तो देखा होगा, पर संभव है इसके अर्थ पर विचार न किया हो। धोती में जल का नहीं आवरण, आवास की तरह लिबास, या निवास की तरह वस्त्र का भाव है। धू से धूम/धुन/ धुआँ ही नहीं धूप शब्द भी निकला है।

Post – 2020-05-23

#शब्दवेध(44)
अंधेरे के लिए कोई शब्द नहीं

काला
काला उस शब्द समूह का हिस्सा है जिसमें कल – जल > कलश- जलपात्र, कलेवा- जलपान; > (cool, cold, OE.col Ger- kuul) कल (>क्ल), – पत्थर, ला. क्लैक्स; कलन- गणना (calculate -to count or reckon,< L.calx-stone), कल->सं. क्ल- जल, स. क्लेद> अ. clay; कला (calligraphy- a fine penmanship कलिया ( – kil, calamity)) काला (caligo- obscure, dim, dark; L. caligo- fog) ,कोइला, (coal, charcoal, O.Narv. kol, Ger. Kohle) कल्हारल – भूनना, (kiln- oven आँवा, भट्ठा; कृशानु ( Gr. kalein- to burn), कळ/ /कड़- पत्थर, निर्मम, ( callous – hardened, cruel,

Post – 2020-05-22

#शब्दवेध(43)
अंधेर तो यह है कि अंधेरे के लिए कोई शब्द ही नहीं

विश्वास नहीं होता? पहले मुझे भी नहीं हो सकता था। 50 साल पहले की बात है, कॉर्ल डार्लिंग बक (Carl D. Buck) द्वारा तैयार किया गया प्रमुख भारोपीय भाषाओं के कतिपय शब्दों के पर्यायवाची कोश (A Dictionary of Selected Synonyms in the Principal Indo-European Languages: A Contribution to the History of Ideas 1st Edition देख रहा था जिसमें प्रत्येक शब्द के सभी प्रमुख भाषाओं के पर्याय देकर उनको कुछ श्रेणी में बांटा गया है और फिर उनकी व्याख्या की गई है। उसमें मकान के लिए जो पर्याय थे सभी का अर्थ था प्रकाशित, जगमग। तब मुझे भी इससे हैरानी हुई थी, परंतु अचरज प्रकट करने के बाद, इसका समाधान उन्होंने इस रूप में निकाला है कि संभवत है आवास को आकाश के आवरण के रूप में कल्पित किया गया था और जगमगाते हुए आकाश से उनको मकान के लिए वे संकल्पनाएं सूझी हों। मैंने 1973 में प्रकाशित अपनी पुस्तक में इसका उपयोग करते हुए, उन पर्यायों की अपने ढंग से व्याख्या की थी। लेकिन तब मेरे मस्तिष्क में भी यह बात नहीं आई थी कि आवरण के किसी रूप के लिए कोई ऐसा स्वतंत्र शब्द ही नहीं है, जिससे केवल अदृश्यता का बोध हो। यहाँ तक कि रात के लिए भी नहीं। इनके जो भी पर्याय हैं उन सभी का अर्थ या तो प्रकाश/चमक या जल है। रंगो के लिए जो शब्द हैं उनमें सभी का एक अर्थ जल होता है। ऐसा इसलिए है कि न तो अंधकार से कोई आवाज पैदा होती है न ही प्रकाश से। सच कहे तो अंधकार भी काले रंग से अभिन्नता रखता है यद्यपि सही मानी में वह प्रकाश का अभाव है।

हम कह आए हैं कि शब्दों का अर्थ अकेले में नहीं खुलता । अकेले में तो रूढ़ार्थ समझ में आता है, – रूढ़ का अर्थ है उपर से लादा हुआ, जिसके लिए बिल्ला अं. टैग/लेबल का प्रयोग होता है। स्वयं हमारा नाम भी एक बिल्ला ही है। वह किसी का हो सकता है। कुछ संस्थाओं में वस्तु या व्यक्ति के लिए एक संख्या नियत कर दी जाती है, व्यक्ति के रूप में हम एक संख्या में बदल जाते हैं पर हम संख्या नही हैं। सो, रूढार्थ शब्दार्थ नहीं। हमारे लिए एक ही शब्द है, मनुष्य। शब्दार्थ जातिवाची होता है, व्यक्तिवाची संज्ञाएं मात्र टैग हैं। किसी का कोई नाम रखा जा सकता है, पर उससे उसके बारे में इससे अधिक किसी बात का पता नहीं चलता जब कि शब्द नामित के रूप, गुण, (स्व-भाव) का परिचय देता है और उसे हम बिना किसी की सहायता के पहचान लेते हैं।
अब हम अंधकार के पर्यायों पर विचार कर सकते हैं।

कृष्ण
कृष्ण का प्रयोग काले के लिए होता है। इसके साथ आप को कृशानु – आग – की याद आनी चाहिए। इसके आदि मे आए ‘कृश्/कृष् का अर्थ है अंकन, रेखन। इसका प्रयोग बहुत पहले से साल के दिन आदि की गणना के लिए होता आया था और निशान के रूप में खिची रेखा और दिन दोनोे के लिए वार के प्रयोग का यह एक कारण हो सकता है। खेती आरंभ होने पर नम जमीन में लकीर खींच कर, चिड़ियों से बचाने के लिए बीज इसमें डाल कर मिट्टी से ढक दिया जाता था। खेती के लिए इसी से कृषि संज्ञा मिली। कृष भी पानी के लिए प्रयुक्त कर/किर निकला है, (कर- करमोना- भिगोना, करमुआ – पानी में उगने वाला एक साग) । प्रकाश रश्मि के लिए कर और किरण जल के इस कर/ किर मूल से ही निकला है। इसी तर्क से आग के लिए कृशानु का प्रयोग हुआ। कर, कर्ष – खींचना जल की गति की देन है जो कृषि के साथ अधिक लोकप्रिय हुआ लगता है। कृष्ण के तीन अर्थ हैं – जला हुआ, कट या जल कर क्षीण (कृश) हो चुका; कोयले के रंग का या काला और तीसरा आकृष्ट या मोहित जिसकी आदत के कारण वह कुछ बदनाम भी है और स्वयं मोहन और मनमोहन भी हैं।

हमें अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए भाषा की आवश्यकता होती है, भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कला और साहित्य की आवश्यकता होती है, परंतु भाषा साहित्य और कला हमारे विचारों और भावनाओं को किस तरह नियंत्रित करते हैं इसकी ओर सामान्यतः हमारा ध्यान नहीं जाता। इसका एक उदाहरण राधा और कृष्ण का नाम और चरित्र है जिसकी कुछ चर्चा यहाँ संभव है।

राध शब्द का अर्थ है, ऋद्धि या संपन्नता लाने वाला (पैसा)। राध का प्रयोग ऋग्वेद में धन के लिए और हमारी समझ से ताँबे के उन पिंडों के लिए, और संभवतः उस रंग के लिए भी होता था, जिनके नमूने सिंधु-सरस्वती सभ्यता से मिले हैं। इसका प्रयोग इसीलिए बहुवचन में भी हुआ है – इन्द्रा वरुण वामहं हुवे चित्राय राधसे, हे इन्द्र और वरुण हम तुम दोनों की विविध प्रकार की संपदा के लिए गुहार लगाते हैं, या ‘करतां नः सुराधसः’ ‘में राध का प्रयोग धन के सामान्य अर्थ में हुआ है। ‘स नो राधांसि आ भर’, वह हमें संपदाओं से भर दे, ‘ राधांसि याद्वानाम् – यदुओं की संपदाएँ में बहुवचन का प्रयोग देखने में आता है, पर इससे यह संकेत नहीं मिलता कि बहुवचन प्रयोग ताम्रपिंडों के लिए ही हुआ है। मेसोपोतामिया में इन पिंडों का नाम स्खलित हो कर संभवतः रूड हो गया था। मैलरी (1989) का मानना है कि अं. रूड- कठोर और रेड – लाल दोनों इसी से निकले हैं। भारत में इसके रंग से साम्य के आधार पर हल्दी का एक पर्याय राधा पड़ा जिसका राधा के गोरेपन से संबंध है ।

धन सदा किसी के पास नही रहता, मानवीकृत रूप में लक्ष्मी चंचला होती है, इन्द्र के लिए ‘राधानां पते’ का प्रयोग, यादवों की राधाएँ (राधांसि याद्वावाम्) और इन्द्र के अवतार कृष्ण के साथ राधाओं/ गोपियों की लीलाएँ। इन सभी को मिला कर एक चित्र तैयार करें तो चीरहरण तक समझ में आ जाएगा क्योंकि धातु कोई हो, लेन-देन के प्रत्येक चरण पर उनकी शुद्धता की जाँच की जाती थी।