Post – 2020-07-31

#शब्दवेध(92)

विश्वामित्र की सृष्टि
विश्वामित्र के महत्व को घटाने का ऐसा प्रयत्न ब्राह्मणों द्वारा किया गया और उसी तुलना में वशिष्ठ के महत्व को चार चांद लगाने का प्रयत्न किया गया उसकी तुलना बुद्ध और अशोक के अवमूल्यन से ही की जा सकती है और बहुत संभव है कि यह सारा प्रयत्न बौद्ध मत की लोकप्रियता और बौद्ध धर्म को मिले राजकीय संरक्षण के प्रतिशोध में किया गया हो।

वह कन्नौज के राजा गाधि के पुत्र नहीं हो सकते थे। वैदिक काल में जिसके वह ऋषि हैं कन्नौज की कोई प्रतिष्ठा न थी। वह असुर परंपरा से जुड़े थे जिनका कृषि कर्म और यज्ञ में विश्वास न था । इस परंपरा में भृगु, अंगिरा, जमदग्नि आदि आते हैं जिनकी ख्याति उनकी तकनीकी दक्षता के कारण थी। अपनी एक ऋचा में वह अपने को गर्व से भरतकुलीन होने और युद्ध में उत्साह पूर्वक भाग लेने का दावा करते हैं। सुदास स्वयं भरतवंशी हैं – इम इन्द्र भरतस्य पुत्रा अपपित्व चिकितुर्न प्रप्रित्वम् । हिन्वन्ति अश्वं अरणं न नित्यं, ज्यावाजं परि नयन्ति आजौ ।। ऋ. 3.53.24, इसी आधार पर इनको क्षत्रिय और राजवंशी माना गया लगता है। गाधि गाथी या गाथा बद्ध प्राचीन इतिहास की रक्षा करने वाली परंपरा या जिसे बाद में व्यास परंपरा कहां गया, उसके प्रतिनिधि हैं।

विश्वामित्र को सही सही किसी भाषाई, जातीय या नस्लवादी दायरे में रखकर समझने में मुझे कठिनाई होती है। परंतु यह समझने में कम कठिनाई होती है कि उनके व्यक्तित्व और चरित्र को गर्हित बनाने के लिए समस्त प्रयासों के बावजूद उनका व्यक्तित्व दूसरों से अलग दिखाई देता है। पहले उनके साथ हुए अन्याय की बात कर ले। ऋग्वेद में हमें उन परिस्थितियों का पता नहीं चलता जिनमें उन्हें सुदास के पुरोहित के पद से हटाकर निर्वासित किया गया, परंतु सुदास के पुरोधा बनने के बाद, सत्ता और लोभ से विरत, एकांत साधना करने वाले, विश्वामित्र को राज शक्ति का प्रयोग करते हुए अपमानित करने का प्रयत्न स्वयं वशिष्ठ ने किया था, न कि राजा विश्वामित्र ने वशिष्ठ का अपमान किया था।

ऋग्वेद के अनुसार एक भयंकर दुर्भिक्ष में वामदेव गोतम को प्राणरक्षा के लिए खान-पान की वर्जना (व्रत या टैबू) का विचार त्याग कर कुत्ते की अँतड़ियाँ पका कर खानी पड़ी थीं। इसके अतिरिक्त उन्हें एक अन्य अपमान झेलना पड़ा था और वह था अपनी आँखों के आगे अपनी पत्नी का शीलभंग। कवि वामदेव का कहना है, “मैं सभी देवों की गुहार लगाता रहा परन्तु सब व्यर्थ गया, अन्ततः इन्द्र ने ही कृपा की और सुख के दिन लौटे:
अवर्त्या शुनि आन्त्राणि पेचे न देवेषु विविदे मर्डितारम् ।
अपश्यं जायाममहीयमानामधा मे श्येनो मध्वा जभार ।।4.18.13

महाभारत में इस कदाचरण को विश्वामित्र के सिर मढ़ कर पेश किया गया, और इसे अधिक गर्हित बनाने के लिए चांडाल की रसोई में(पक्वणे) घुस कर चोरी करते और पकड़े जाते दिखाया गया। परन्तु रोचक यह है कि यहाँ चांडाल उन्हें ब्राह्मण ही कह कर संबोधित करता है, (दुष्कृती ब्राह्मणं सन्तं यस्त्वाहम उपालभे। महा. 12.139.77) कहें लोकमानस को क्षुब्ध करने वाला कोई भी प्रसंग हो, जैसे हरिश्चंद्र का सपने में दान देना और उनका पालन करने के उस दुर्गति से गुजरना जिससे सभी परिचित हैं, विश्वामित्र के सिर मढ़ा जाता रहा। इस कहानी का वैदिक रूप बिल्कुल अलग था, इसमें विश्वामित्र की भूमिका उद्धारक की थी।

हम इस तरह की कहानियों में आए हुए बदलाव के पीछे काम करने वाली मानसिकता पर कुछ नहीं कहना चाहते जो ब्राह्मणों के दिमाग में आज तक बनी रह गई हैं, याद केवल यह दिलाना चाहते हैं चरित्रहनन इतने प्रयासों के बाद भी उसी में से उनकी महिमा का भी परिचय मिलता है जिसकी समकक्षता में कोई दूसरा ठहर नहीं सकता और वशिष्ठ के महिमामंडन के बाद भी उनके उसी महिमा गान से उनकी कुटिलता प्रकट हो जाती है जिसकी ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। उनकी गाय नंदिनी की महिमा, वह गो-ब्राह्मण साम्य, बौद्ध धर्म के योजनाबद्ध विरोध का दस्तावेज है। उदाहरण के लिए विश्वामित्र को पराजित करने के लिए नंदिनी के गोबर,मूत, फेन सभी से जो सृष्टि कराई गई है:

असृजत् पह्लवान् पुच्छात सकृतः शबराल् कशान्।
मूत्रतः च अपसृजत् चापि यवनान् क्रोधमूर्छिताः।
पुंड्रान् किरातान् द्रविडान् सिंहलान् बर्बरान् तथा।।
तथैव दरदान् म्लेच्छान् फेनात् ससर्ज ह।।1. 165.35-36
उससे मौर्य साम्राज्य के उच्छेदन में ब्राह्मणों की छिपी साठ-गांठ की झलक मिलती है जिसकी एक ओर तो खुली घोषणा : ब्रह्मक्षत्रे च विहिते ब्रह्मतेजो विशिष्यते ।। महा. 1.155. 27; धिग् बलं क्षत्रिय बलं ब्रह्मतेजो बलं बलम् । बलाबलं विनिश्चत्य तप एव परं बलम् ।1.165.42 की जाती रही। यदि तप ही सर्वोपरि है तो विश्वामित्र तपस्या के लिए जाने जाते रहे हैं और वशिष्ठ अपने पौरोहित्य के लिए।

यहां हम उस संघर्ष की याद दिलाना चाहते हैं जिसमें एक ओर वैदिक काल में आविष्कारकों, कलाकारों और कुशल कर्मियों की महिमा का गान है तो दूसरी ओर ब्राह्मणों के बीच सम्मान की प्रतिस्पर्धा चल रही है जिसकी एक झलक – गृणाना जमदग्निवत् स्तुवाना च वसिष्ठवत् ।। 7.96.3 में मिलती है । एक ओर नए आविष्कार, नई सूझ और दक्षता है तो दूसरी ओर कर्मकांड पर एकाधिकार जहां कोई नवीनता नहीं है। जिसका कोई प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ समाज को प्राप्त नहीं हो रहा था इसलिए असुर परंपरा से आए हुए तकनीकी पक्ष में असाधारण योग्यता रखने वाले लोगों और पहले से कृषि संपदा पर और बाद में संपदा के दूसरे सभी रूपों पर एकाधिकार करने वाले लोगों के बीच प्रतिस्पर्धा चल रही थी जिसकी प्रकृति का पूरा अनुमान करने की स्थिति में हम नहीं है।

इसे आज की भाषा में वर्ग संघर्ष के न सही, वर्ग हित के तनाव के रूप में समझने का प्रयत्न करें तो बात आसानी से सामने आ जाएगी। एक ओर ब्रह्मा के नजदीक पहुंचने वाले 3 सिरों वाले, सभी प्रकार के भोगों में लिप्त रहते हैं दूसरी ओर व्यापारियों के हित का प्रतिनिधित्व करने वाले इंद्र उनका गला काट देते हैं।

हम यह याद दिलाना चाहते हैं भारतीय स्रोतों का अध्ययन तुलनात्मक ढंग से करने के बाद ही हम उनके स्रोत और उन में की गई विकृतियों को समझ सकते हैं। वशिष्ठ विश्वामित्र का द्वन्द्व ब्राह्मण क्का्तरष द्वन्द्व नहीं है, ब्राह्मणत्व के दावेदार दो प्रतिस्पर्धियों की है, जिनमें से एक प्राचीन कृषि व्यवस्था से जुड़ा हुआ है दूसरा कृषि विरोधी पूर्व परंपरा का जिसके उत्तराधिकारी दक्षक्रतु या कुशलकर्मी हैं जिसके तकनीकी योगदान के बिना भारतीय सभ्यता अपनी उस ऊंचाई पर नहीं पहुंच सकती थी, जिस पर पहुंची थी। एक का गहरा लगाव कर्मकांड से है, इसके प्रधान देवता यज्ञ या विष्णु हैं। दूसरे का साधना, प्रौद्योगिकी और दक्षता पर है। यदि विश्वामित्र और वशिष्ठ में कोई निर्णायक भेद था तो इसमें विश्वामित्र साधना और मंत्र शक्ति में विश्वास रखते थे । शेष कथा के विषय में सूचना का अभाव है ।

हम अपनी चर्चा लिपि के विकास पर कर रहे हैं और इस क्रम में विश्वामित्र की भूमिका के विषय में जो सूचनाएं हमें उपलब्ध है, या जिनके भरोसे हम यह प्रस्ताव रखने का साहस कर रहे हैं उसे बिंदुवार रखना उपयोगी होगा।

1, विश्वामित्र के विषय में यह किंबदंती है कि उन्होंने ब्रह्मा की सृष्टि के समानांतर एक अपनी सृष्टि की और इसमें कुछ भी न छूटा। इसका एक ही अर्थ है कि विश्वामित्र ने भाषा का आविष्कार किया। भाषा वस्तु जगत की प्रतीकात्मक उपस्थित है। परंतु यह संभव नहीं । इसलिए इसका दूसरा विकल्प बचता है उन्होंने अंकन की ऐसी प्रणाली का आविष्कार किया जिससे श्रव्य भाषा को दृश्य भाषा में बदला जा सके। अर्थात् उन्होंने लेखन का आविष्कार किया। परंतु लेखन की परंपरा बहुत लंबी और उलझी हुई है। विश्वामित्र स्वयं कहते हैं कि उन्हें लिपि का ज्ञान, या ससर्परी लिपि का ज्ञान जमदग्नि ने कराया था ( ससर्परी या जमदग्नि दत्ता)। ऐसी स्थिति में वह लिपि के आविष्कारक भी नहीं हो सकते.

2. इसके साथ ही हमें यह भी मालूम है कि कि यद्यपि ब्राह्मी, लीनियर बी , और सामी लिपयों के चिन्हों में गहरी समानता है, इनको परस्पर अनुप्रेरित करने वाले किसी सूत्र का पता न था, या जैसा हम देख आए हैं. था तो उनकी उपेक्षा करते हुए एक नकली निर्वात तैयार किया गया।

3. जिस तीसरे तथ्य से हम परिचित हैंं, वह यह कि सैंधव लिपि के चिन्हों की संख्या किसी अन्य समकालीन लिपि को देखते हुए बहुत कम है परंतु ब्राह्मी की अपेक्षाओं को देखते हुए बहुत अधिक है। यही स्थिति लीनियर बी की ब्राह्मी और सैंधव लिपि के सन्दर्भ में । बहुमिश्र (कंपोजिट) सैंधव लिपि को जिसमें कुछ चिन्ह मात्रिक रूप ले चुके थे, शब्दलेखों, भावलेखोंं के अनुपात में अधिक होने के कारण, इनका सरलीकरण करते हुए मात्रिक (सिलैबिक) रूप प्रदान किया था, जिससे वस्तु, उसकी संज्ञा और लिखित रूप का अंतर समाप्त हो गया था और यही उनकी कीर्ति का आधार था।
4. यहाँ उस परंपरा पर भी ध्यान देना होगा जो अधिक प्राचीन न होते हुए भी हमारे लिए तो प्राचीन है ही। ललितविस्तर में बोधिकत्व के शालाप्रवेश से पहले से ही 64 प्रकार की लेखन विधियों का ज्ञान था, उसमें उनको अक्षर ज्ञान कराने वाले गुरु के रूप में विश्वामित्र का उल्लेख है जो गौतम बुद्ध के बाल रूप को देखकर, चमत्कृत होकर उनके चरणों पर गिर गए थे। अर्थात बहुत बाद की परंपरा तक इस बात का स्मरण हमारे जातीय मानस में था कु लिपि के विकास में विश्वामित्र का विशेष स्थान है।

Post – 2020-07-29

#शब्दवेध(91)

सैंधव लिपि का पाठ

लीनियर-बी का आधार क्या है इसे समझने के लिए जरूरी है कि हम सैंधव लिपि की प्रकृति को समझें।

इस लिपि के पाठ की तीन चुनौतियाँ हैं। पहली यह कि इसकी भाषा क्या है? दूसरी, इसके अभिलेखों का अर्थ क्या है,और; तीसरी, यह कि इनका उपयोग किन रूपों या प्रयोजनों से किया जाता था।

जिन दिनों आर्य आक्रमण की कहानियां लोकप्रिय थीं, और उनके पीछे की राजनीति प्रकट हो कर भी अदृश्य रह जाती थी, उन दिनों भले इसके एक भी अभिलेख सही पाठ संभव न हो सका हो, इसकी भाषा द्रविड़ मान ली जाती थी। पढ़ने वाला अपनी पूरी अक्ल लगा कर भाषा द्रविड़ सिद्ध करना चाहता था और भाषा संस्कृत सिद्ध होती थी।

इसे एक दो उदाहरणों से अधिक स्पष्टता से समझा जा सकता है। इरावदन महादेवन भाषा को तमिल सिद्ध करने के लिए आजीवन प्रयत्नशील रहे। उस अंकन का, जिसमे नीचे मानव आकृति है और जिसके सिर पर एक पात्र की आकृति बनी है, पाठ सुझाया सातिवाहन। सातिवाहन या शालिवाहन दक्षिण भारत का ऐतिहासिक काल का राजवंश था, इसलिए उन्हें इसमें द्रविड भाषा की संभावना दिखाई दी। अपने एक दूसरे लेख में (1985 `The Cult Objects on Unicorn Seals: A Sacred Filter ?’ ) उन्होंने एशृंग वृष के शरीर पर अंकित चिन्हों की विस्तृत व्याख्या करते हुए उन्हें सोम सवन से संबद्ध दिखाया। मैंने कई साल बाद टोका कि इससे तो आप इसे वैदिक सिद्ध कर रहे हैं, तो उनका उत्तर था उसे अब नकार दिया है। द्रविड़ पाठ के दूसरे उद्भट आंदोलनकारी ऐस्को पार्पोला ने स्वस्तिक पर लगे अनुस्वार चिन्ह ( ँ) का पाठ ‘ॐस्वस्ति’ के रूप में किया। ऐसे शेखचिल्लीपन पर हँसी आएगी, पर इनको गंभीरता से लिया जाता रहा है और इस विडंबना पर भी ध्यान नहीं दिया जाता रहा कि इसके बाद भी दावा क्या किया जा रहा है और प्रमाण क्या कहते हैं।

दि वेदिक हड़प्पन्स में (1995: 385-395) में यह प्रमाणित किया था कि इनकी भाषा वैदिक है, क्योंकि, 1. जो कुछ कलाकारों ने चित्रों में अंकित किया है ठीक उसे ही वैदिक कवियों ने शब्दचित्रों में उतनी ही मार्मिकता के साथ अंकित किया है; 2. ऋग्वेद में जिन देवों का मूर्तन वन्य पशुओं के रूप में हुआ है, उन्हीं का चित्रण मुहरों पर पाया जाता है; 3. देवों का स्मरण रक्षा और मार्गदर्शन के लिए किया गया है, पालतू पशु जो स्वयं मनुष्य के वश में हैं, या मादा जिसकी रक्षा का भार पुरुष पर है (अनवद्या पतिजुष्टेव नारी) इसमें समर्थ नहीं इसलिए न तो बिल्ली, गधे/घोड़े का मुहरों पर अंकन है, न गाय का। सभी पशु नर हैं, वन्य हैं और अज और मेष भी इतने ओजस्वी हैं कि उनकी प्रजाति का ध्यान बाद में आता है, उनकी आक्रामकता या शक्ति पर पहले। यह रोचक है कि वृष/वृषभ के चित्रण हैं, बैल के या गाय के नहीं जिनसे किसी देव की तुलना नहीं की गई है। एक अपवाद हाथी का हो सकता था, पर ऋग्वेद का हस्ती जंगली है – मृगो न हस्ती तविषीमुषाणः सिंहो न भीम आयुधानि बिभ्रत् ।। 4.16.14 । ध्यान दें तो आयुध लिए सिंह की कल्पना अटपटी है, पर सैंधव अंकनों में ऐसा अंकन भी है, (इसका ध्यान पहले न था, इसकी स्मृति है, संप्रति जाँच नहीं कर पाया)

अभिलेखों का पाठ करने में सबसे बड़ी बाधा यह कि इनके निर्वचन में अन्य दुरूह लिपियों के पाठ के जो तरीके हैं उनसे ही मदद ली जाती रही है और भारतीय परंपरा की उपेक्षा की जाती रही है।

लेखन के मामले में भारत में एक साथ दो प्रवृत्तियां पाई जाती हैं: पाठ को सर्वग्राह्य और अल्पजनग्राह्य बनाने की विरोधी प्रवृत्तियाँ। दूसरी के पाठ के लिए गुरु या मर्मज्ञ लोगों की सहायता – ‘बिन गुरु होय न ज्ञान’ – अनिवार्य था। इसके कारण लेखन के सांप्रदायिक रूप बन गए थे, जिनके अपने कूटाक्षरों या गूढ़ार्थी शब्दों को किसी दूसरे संप्रदाय का कूटविद भी नहीं जान सकता था। सांप्रदायिक भाषा में जानबूझकर शब्दों के अर्थ छिपाने और बदलने के प्रयत्न के पीछे मठाधीशों के एकाधिकार की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता। स्वामी शंकरानंद ने बड़े इन अभिलेखों का पाठ न किया हो परंतु उन्होंने भारत में प्रचलित भाषा के गुह्य प्रयोगों की ओर ध्यान दिलाया था जिस की ओर दूसरे अध्येताओं को भी ध्यान देना चाहिए। यह गोपन अराजकता का रूप ले लेता था। ललितविस्तर में बुद्ध पाठशाला में प्रवेश से पहले जिन 64 लिपियों का ज्ञान प्राप्त कर चुके थे उनमें अनेक कल्पना प्रसूत (सर्वसारसंग्रहणी, सर्वभूतरुतग्रहणी, सर्वौषधिनिष्यन्दा) हैं, कुछ ब्राह्मी के क्षेत्रीय रूप (ब्राह्मी, अंगिका, वंगिका, मागध, मांगल्य, द्राविड़, किरात, हूण, दाक्षिण्य, पूर्वविदेह, दरद, खाष्य (खश जनों की) , चीन, आदि) हैं ; कुछ कंठस्थ करने के लिए अपनाई जाने वाली विधियाँ (अनुलोम, विलोम, )हैं, परन्तु उनमें कुछ प्रयत्नपूर्वक कूटभाषा बनाने और संप्रदायों के गूढ़ाक्षरों वाली लिपियाँ (अवमूर्ध, शास्त्रावर्त, गणनावर्त, मध्याहारिणी, भी हैं। परंतु इनसे कूटविधियों का न सही नाम पता चल सकता है न उनके विविध रूप।

सैंधव लिपि मे भी शब्दाक्षरों का प्रयोग होता था यह तो स्वस्ति के प्रयोग से ही प्रमाणित है। हमारी आज की लिपि माला से इतर ॐ, स्वस्ति, श्रीश्री6, या श्रीश्री108, जैसे प्रयोग लेखन में किए जाते हैं, या, कम से कम, परंपरावादी लोगों द्वारा किए जाते हैं। सैंधव लिपि में इनकी संख्या अधिक थी यह समझना आसान है। इनके पीछे श्रद्धा, गोपन, रीति निर्वाह और ज्ञान पर नियंत्रण जैसे अनेक कारण रहे हो सकते हैं। शब्द के स्थान पर अंकों का प्रयोग, अंकों के लिए शब्दों का प्रयोग रीतिकाल तक की कूटोक्तियो में देखने में आता है। ऐसा इसलिए भी सोचना होता है कि ऋग्वेद में गोपन और गूढ़ता पर (अपगूळ्हं गुहाहितम् ; गुहा नामानि दधिरे पराणि) पर विशेष बल दिया गया है। एक ही शब्द या चिन्ह के प्रसंगानुसार अनेक अर्थ हो सकते थे । हम इनके विस्तार में भी नहीं जाएंगे। हम केवल स्वस्ति चिन्ह के अर्थभेद पर ध्यान दे सकते हैं।

स्वस्ति पाठ
आज भी बहुत सारे हिंदू घरों के द्वार पर, विशेषतः बनियों के घरों या बहीखाते में स्वस्तिक का चिन्ह बना तो मिलेगा ही, उसके साथ, शुभ, लाभ भी लिखा मिलेगा। अर्थात् यहाँ इसका अर्थ शुभ और लाभ है : ऋग्वेद कालीन भाषा में कहें तो शुभ, ‘क्षेम’ है और लाभ, ‘योग’ – पाहि क्षेमे उत योगे वरं नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः।

स्वस्तिक का चिन्ह चक्र प्रवर्तन (अपि पन्थामगन्महि स्वस्तिगामनेहसम् ।) का सबसे पुराना रूप है। , स्वस्तिक आगे बढ़ते हुए पहिए का प्रतीकात्मक अंकन है, जिसका एक अर्थ है चरैवेति चरैवेति। मूलाधार है वह चिन्ह (+) जिसका प्रयोग (धन) अर्थात ‘योग’ के लिए आज तक होता आया है। ये चक्र के अरों के प्रतीक हैं। चार ही अरे क्यों, जब कि वैदिक चक्र में बारह अरों का उल्लेख है? इसलिए यह धर्म चक्र प्रवर्तन नहीं था, अर्थचक्र प्रवर्तन था । सारी दुनिया की दौलत वे लोग बटोरना चाहते थे (सहस्रिण उप नो माहि वाजान्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः , 7.26.5; आ विश्वतः पाञ्चजन्येन राया यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः, 7.72.5)। जिनकी आकांक्षा का मूर्तिमान रूप यह चक्र है इसलिए चारों दिशाओं में निर्बाध पहुंचने का प्रतीकांकन (विश्वानि दुर्गा पिपृतं तिरो नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ।। 7.60.12; सुगा नो विश्वा सुपथानि सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ।। 7.62.6), चार अरों, चारों दिशाओं में गमन और उस यात्रा के निर्बाध होने का प्रतीक पहिए की परिधि का आपस में न मिल पाना, या प्रगति का निर्बाध रहना है । जैसे संकट में पड़ा हुआ या संकट की संभावना से डरा हुआ व्यक्ति सुरक्षा के उपाय करता है जिसमें सभी देवों की मनौती भी होती है (स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु, 1.89.6; शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो विष्णुरुरुक्रमः ।। 1.90.9); ऐसी ही चिंता यात्रा पर प्रस्थान करने वाले व्यापारियों की मौसम ( मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ।। मधु नक्तमुतोषसो मधुमत् पार्थिवं रजः । मधु द्यौरस्तु नः पिता ।। मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्यः । माध्वीर्गावो भवन्तु नः ।। 1.90.6-8) से लेकर गलत रास्ते पर जाने से बचाने और आपदा में सुरक्षा करने से संबंधित (स्वस्ति नो पथ्यासु धन्वसु स्वस्त्यप्सु वृजने स्वर्वति ।) हुआ करती थी। हमारा निवेदन मात्र यह है कि स्वस्तिक चिन्ह वही है, पर विविध संदर्भों मेे उसके अर्थ अलग हो जाते थे और इस पहलू की ओर यथेष्ट ध्यान नहीं दिया गया।

Post – 2020-07-27

#शब्दवेध (90)
साधो कौन राह ह्वै जाई

जैसे चलते चलते आप किसी चौराहे पर पहुंच जाएं जहाँ सभी रास्ते बाहर से आकर मिलते न हों, आपके ही रास्ते से शाखाओं की तरह फूट रहे हों, और आप जड़ों से आए रस संचार की तरह सभी शाखाओं पर एक साथ फैलना चाहें। वृक्ष के लिए जो काम इतना आसान है, हमारी अपनी काया में प्राणसंचार और रक्त संचार के लिए इतना अनायास है कि वह होता है और हम उसे जान भी नहीं पाते, वही मन के लिए, अभिव्यक्ति के लिए उतना ही असंभव है। हम सभी रास्तों पर एक साथ चल नहीं सकते, न पावों से, न भाषा से। चलने का मोह है तो एक पर कुछ दूर चल कर, वापस उसी बिंदु पर आना होगा । इस असमंजस में, मैंने कल अपनी पोस्ट लिखी ही नहीं। सभी रास्ते, मेरे उससे पहले की पोस्ट से ही निकले थे। आज सोचा कुछ दूर चल कर वापस आकर दूसरे पर चलने का अभ्यास करें तो शायद आगे का रास्ता आसानी से खुल जाए।
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इतिहास क्या है

मैंने कार के इतिहास दर्शन को अवैज्ञानिक इसलिए माना था कि वैज्ञानिक इतिहास सापेक्ष नहीं होता, उसकी स्वायत्तता होती है। यह स्वायत्तता उसे अपने आंतरिक नियमों से मिलती है जिसके अभाव में मैंने उनकी तुलना में हंटिंगटन को रखा था। दोनों में समानता यह है कि वे इतिहास का उपयोग करना चाहते हैं पर उसे समझना नहीं चाहते। समझने की चिंता से विज्ञान पैदा होता है, उपयोग करने की उत्कंठा से पाक शास्त्र पैदा होता है, जिसमें, जो भोज्य है उसे है ग्राह्य बनाने के लिए नमक मिर्च मसाले अपनी ओर से मिलाने होते हैं, या पहले से उपलब्ध होने, उनकी लत पड़ जाने, के कारण जरूरी मान लिये जाते हैं। परिणाम पर ध्यान देने वाले इतिहास को समझते नहीं, कम से कम श्रम और लागत से अधिक से अधिक लाभ उठाने की चिंता में खान-पान से लेकर, तरह के सामान बनाने और विचार तक में मिलावट के कारोबार करने वालों की तरह जल्द से जल्द ऊंचाई पर पहुंचने की कोशिश के कारण ज्ञान से लेकर आचार तक की सभी मर्यादाओं को तोड़ते हैं। वेअपनी ही प्रतिज्ञा पर सही नहीं उतर पाते, परिणाम पर ध्यान देने वाले किसी अपेक्षा की पूर्ति नहीं कर सकते।

वे राज्य का विरोध करेंगे और सत्ता की राजनीति की बात करेंगे, मानवता की बात करेंगे, और मानवता की समझ को पंगु कर देंगे। वे सर्वहारा क्रांति की बात करेंगे, वर्गशत्रु को मिटाने की बात करेंगे और पहले वर्ग शत्रु के नाम पर अपने निर्णय से असहमत होने वालों को उत्पीड़ित करेंगे, उनकी हत्या करेंगे, और फिर उसी सर्वहारा को इतना व्यग्र कर देंगे, कि थोड़ी सी भी राहत मिलने के बाद उनकी मूर्तियों को तोड़ दे उनके नाम के शहरों के नाम बदल दे, और यह सिद्ध कर दे कि वे मानवता के हत्यारे थे तो उनके मानववाद का दानववाद से अलग करना कठिन हो जाता है।

मैं, एक समय में, जब केवल पढ़ने का दौर था कार का प्रशंसक था। जुमलों के मोह का शिकार था। मैं किसी भी विषय को उस पर लिखने से पहले समझ नहीं पाता। लेखन वह कसौटी है जिसकी अंतःसंगति के निर्वाह में असंगत प्रतीत होने वाली मान्यताएं छँट कर अलग हो जाती है। सत्य सामने आ जाता है, परंतु तभी जब आप अपने को सही सिद्ध करने के लिए प्रमाण नहीं जुटा रहे होते हैं, प्रमाण जो कुछ कहते हैं उनके समक्ष नतशिर हो जाते हैं। इतिहास का अपने समय या जरूरत के लिए इस्तेमाल करने वाले इसका ध्यान नहीं रख पाते। वे इतिहास की वैज्ञानिकता को नष्ट करते हैं, और इतिहास की गलत समझ उनको नष्ट कर देती है और वे भौचक्के रह जाते हैं हमारी अपेक्षाओं के विपरीत, प्रयत्न के विपरीत यह परिणाम आया कहां से?

उत्तर छोटा सा है।

इतिहास की नासमझी से। पर यह छोटा सा उत्तर उनकी समझ में नहीं आ सकता क्योंकि आरत के चित रहत न चेतू। पुनि पुनि कहई आपनै हेतू।

मैं इसे दो उद्धरणों से स्पष्ट करना चाहूंगा।
Carr divided facts into two categories, “facts of the past”, that is historical information that historians deem unimportant, and “historical facts”, information that the historians have decided is important. Carr contended that historians quite arbitrarily determine which of the “facts of the past” to turn into “historical facts” according to their own biases and agendas. Wikipedia.

इसकी व्याख्या जिस रूप में हो सकती है और जिस रूप में की जाती रही है वह है कि अतीत से सभी तथ्य एंतिहासिक उपयोग के नहीं होते, केवल वे होते हैं जिनका कोई इतिहासकार उपयोग करना चाहता है और यहीं से इतिहास की जानकारी के स्थान पर तथ्यों के मनमाने उपयोग का रास्ता खुलता है जो कम के कम भारत का इतिहास लिखने वाले मार्क्सवादी इतिहासकारकों की सबसे बड़ी व्याधि सिद्ध हुई, उनकी कब्र भी सिद्ध हुई।

दूसरे:

The Soviet Impact on the Western World, (1946) में, कार का तर्क था “The trend away from individualism and towards totalitarianism is everywhere unmistakable”,
और 1956, में Carr did not comment on the Soviet suppression of the Hungarian Uprising while at the same time condemning the Suez War.

मैं अपने इस निष्कर्ष पर केवल दूसरों के विचारों को पढ़ने के बाद नहीं पहुंचा हूं अपितु भारत में इस सिद्धांत सोचने लिखने और चलने वाले संगठनों और दलों को उनकी उस परिणति पर पहुंचते देखने के बाद और स्वयं अपने इतिहास लेखन में उस इतिहास दर्शन की सीमाओं को समझने के बाद पहुंचा। आज भी कम्युनिस्ट संगठन और दल उनकी एकहरी सोच से मुक्त नहीं हो पाए हैं।
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सरस्वती-सिन्धु लिपि

सरस्वती-सिन्धु को हड़प्पा सभ्यता की संज्ञा देने वालों को यह पता था कि जिसे परिपक्व हड़प्पा कहा जाता है या जिसके लिए नागर चरण का प्रयोग किया जाता है वह सभ्यता के ठहराव का काल था जिसके बाद गिरावट ही शेष रह जाती है। इस चरण में व्यापारिक क्षेत्र विस्तार और उपनिवेशों की संख्या में वृद्धि को छोड़कर किसी तरह का नया विकास नहीं हुआ। इसके निर्माण का दौर इसका सारस्वत चरण है। यही कारण है कि ऋग्वेद के प्राचीन मंडल सरस्वती को प्रधानता देते हैं और उनमें सिंधु शब्द का प्रयोग नदी के अर्थ में अधिक है विशेष नदी के आशय में इसे हम नए मंडलों में पत्र नए मंडल सेंधव चरण की देन हैं।
अमेरिकी पुरातत्व विदों का परिपक्व हड़प्पा काल के संबंध में यही विचार है परंतु पूर्ववर्ती चरण को लेकर वह लंबे समय तक सांकेतिक रूप में यश जाते रहे हैं की सभ्यता के तत्व पश्चिम से आए हो सकते हैं इसलिए सारस्वत चरण की उपलब्धियों की ओर ध्यान सचेत रूप में नहीं दिया उनमें कोई वैदिक साहित्य का पता भी नहीं था इसलिए हम यह आरोप भी नहीं लगा सकते कि उन्होंने ऐसा जानबूझकर किया परंतु सभ्यता के विकास की दिशा को समझने में उनके इस संभ्रम की वजह से उलझन अवश्य पैदा हुई।
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सिंधु लिपि और ब्राह्मी
जिस लिपि के लिए सेंधव लिपि का प्रयोग होता आया है उसका विकास प्राचीन मंडलों के समय तक हो चुका था। उसके लिए वे किसी शब्द का प्रयोग करते थे या नहीं यह हम नहीं जानते परंतु इतना अवश्य जानते हैं कि टंक लिपि के विषय में एक लोक विश्वास है ब्रह्मा हमारे माथे पर हमारा भाग्य जन्म से पहले ही लिख देते हैं- यद् धात्रा निज भाग्यपट्ट लिखितं स्तोकं महद् वा फलं। ब्रह्मा की इस लिखावट को सभी पढ़ नहीं सकते। भाग्यपट्ट पर लेखन का यह रूपक सरस्वती-सिन्धु कालीन लेखपट्टिका पर अंकन से इतना मेल खाता है यह सोचकर हैरानी होती है ऋवेद में ब्राह्मी शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है, यद्यपि ब्रह्मा शब्द का प्रयोग मंत्र के लिए कथन के लिए, व्याख्याता के लिए अनेक बार हुआ है। संभव है इसे सूर्या आता जाता रहा हो (सूर्यां यो ब्रह्मा विद्यात्) ऐसा मानने का सबसे बड़ा कारण यह है कि ऋग्वेद में लिखित वाणी के लिए ‘सूर्यस्य दुहिता’ का प्रयोग हुआ है। यही दृश्य वाणी, अज्ञान और अंधकार को मिटाने वाली उषा के समान बताई गई है (सूर्यायाः पश्य रूपाणि तानि ब्रह्मा तु शुन्धति।) और ऐसे स्थलों पर इससे पूर्व लिपि के जानकार व्यक्ति को भी ब्रह्मा कहा जाता था। वाणी स्वयं अपना परिचय देते हुए कहती है कि मैं जिसे चाहती हूं उसे ब्रह्मा, ऋषि, चिंतक बना देती हूं (यं कामये तंतमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ।। 10.125.5) इसके आधार पर दावे के साथ तो नहीं कहा जा सकता कि यहां ब्रह्मा का अर्थ लेखक या लिखित पाठ को करने में सक्षम व्यक्ति है परंतु इसकी संभावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता।

सरस्वती सिंधु लिपि के वाचन में तत्काल में जो कठिनाई आती थी इसलिए थी के मात्रिक हो चुकी थी, स्वर के विकारी चिन्ह व्यंजन से जुड़ते थे, परंतु साथ साथ शब्द प्रतीकों, भाव प्रतीको का भी प्रयोग होता था जिसमें चिन्ह वही होते हुए संदर्भ के अनुसार उसके अर्थ बदल सकते थे। लिपि को समझने के प्रयत्न में कई साल तक श्रम करता रहा कुछ भी स्पष्ट नहीं दिखाई दिया और मैंने उस पर अधिक समय लगाना उचित नहीं समझा। परंतु इसका यह लाभ अवश्य है मैं दूसरों द्वारा इसके निर्वाचन के दावों की सीमाओं को समझ सकता हूँ और बिचार, सुझाव पर तर्क और प्रमाण प्रस्तुत कर सकता हूं और करता आया हूँ । (जारी)

Post – 2020-07-26

आज अपनी न कहूँ मैं तो बुरा मत मानो
तुम सुनाओ, जबान ही न, मेरे कान भी हैं।

Post – 2020-07-25

#शब्दवेध(89)
अपने को दुहराना

इसे आप एक दोष कह सकते हैं। चाहें तो इसे सबसे बड़ा गुण भी कह सकते हैं। प्रत्येक रचनाकार और महान दार्शनिक के पास केवल एक जीवन सत्य होता है, केवल एक इबारत होती है, और उसकी समग्र रचनाएं उसी की आवृत्ति, उसी का भाष्य होती हैं और यह भाष्य उसके लाख प्रयत्नों के बाद भी अधूरा ही रह जाता है।

हमें इस सीमा के बाद भी अनगिनत सवालों के जवाब इस एक वाक्य से निकालना होता है। यही हमें द्रष्टा बनाता है, यही हमें स्रष्टा बनाता है, यही हमें क्रांतदर्शी बनाता है। आरंभ से लेकर आज तक मेरा सारा लेखन एक ही इबारत को बार-बार कई रूपों, विधाओं और अनुशासनों में दुहराने की कथा है। इस सत्य का एक क्षीण बोध मुझे सदा रहा है, परंतु इसकी इतनी तीखी अनुभूति इससे पहले कभी न हुई थी जब मैंने अपनी एक पुरानी रचना महाभिषग के पन्ने पलटते हुए एक उद्धरण की तलाश आरंभ की जो मेरे तलाश के बाद भी अभी तक सामने नहीं आई। मैं इतिहास की वैज्ञानिकता के सवाल को आगे विस्तार देना चाहता था और अपना लेख कुछ इस प्रकार आरंभ किया था:

“मेरे पास सभी सवालों के जवाब नहीं हैं। कुछ के जो जवाब हैं, वे अंतिम सत्य नहीं हैं। मेरे लिए सत्य उपलब्ध तथ्यों का निष्कर्ष है । कोई नया तथ्य सामने आने पर इस निष्कर्ष में मामूली, या भारी, परिवर्तन हो सकता है। यही किसी अध्ययन दृष्टि को वैज्ञानिक बनाता है। प्रमाण बोलते हैं, हम नहीं, फैसला करते हैं प्रमाण ही। हमारी भूमिका उनकी दृश्य भाषा को श्रव्य भाषा में रूपांतरित करने तक सीमित होती है।

प्रमाण अपनी दृश्य भाषा में सच तभी व्यक्त कर पाएंगे जब हमारी ओर से हस्तक्षेप, या उनके किसी पक्ष का किसी तरह का पटाक्षेप न हो। यदि ऐसी तटस्थता संभव न हो, या यांत्रिक प्रतीत हो तो, कम से कम, ऐसा हस्तक्षेप न हो जो प्रमाण विरुद्ध हो और औचित्य की सीमा लाँघता हो।

इसी कारण किसी इतर से, वह कितनी भी श्लाघ्य क्यों न हो, आसक्ति इतिहास की वैज्ञानिकता में बाधक है। यही कारण है कि किसी विचारधारा, आंदोलन, या आस्था से जुड़ा हुआ व्यक्ति, वैज्ञानिक सत्य पर नहीं पहुंच सकता। ….इसी प्रसंग में मुझे गौतम बुद्ध के कालामों के बीच दिए गए उपदेश की याद आई और मुझे लगा इसे मैंने अपने उपन्यास महा अभिषेक में उद्धृत कर रखा है। इसी आशा में उसे उतना आरंभ किया, जल्दबाजी में खोज न पाया परंतु नजर में आया वह मेरे लिए भी विश्व में की बात है कि मैं किसी दूसरे पर लिखता नहीं, अपने पर लिखता हूं, अपने को लिखता हूं, अपना विस्तार करता हूं और वही विश्व दृष्टि का रूप ले लेता है।

मूल पाठ के लिए मुझे विकिपीडिया का सहारा लेना पड़ा। पाठ निम्न प्रकार है:

इति खो, कालामा, यं तं अवोचुंह एथ तुम्हे, कालामा, मा अनुस्सवेन, मा परम्पराय, मा इतिकिराय, मा पिटकसम्पदानेन, मा तक्कहेतु, मा नयहेतु, मा आकार परिवितक्केन , मा दिट्ठिनिज्झानक्खन्तिया, मा भब्बरूपताय, मा समणो नो गरूति।
यदा तुम्हे, कालामा, अत्तनाव जानेय्याथ – इमे धम्मा कुसला, इमे धम्मा सावज्जा, इमे धम्मा विञ्ञुगरहिता, इमे धम्मा समत्ता समादिन्ना अहिताय दुक्खाय संवत्तन्तीsति, अथ तुम्हे, कालामा, पजहेय्याथ।
(हे कालामाओ ! ये सब मैने तुमको बताया है, किन्तु तुम इसे स्वीकार करो, इसलिए नहीं कि वह एक अनुविवरण है, इसलिए नहीं कि एक परम्परा है, इसलिए नहीं कि पहले ऐसे कहा गया है, इसलिए नहीं कि यह धर्मग्रन्थ में है। यह विवाद के लिए नहीं, एक विशेष प्रणाली के लिए नहीं, सावधानी से सोचविचार के लिए नहीं, असत्य धारणाओं को सहन करने के लिए नहीं, इसलिए नहीं कि वह अनुकूल मालूम होता है, इसलिए नहीं कि तुम्हारा गुरु एक प्रमाण है,
किन्तु तुम स्वयं यदि यह समझते हो कि ये धर्म (धारणाएँ) शुभ हैं, निर्दोष हैं, बुद्धिमान लोग इन धर्मों की प्रशंसा करते हैं, इन धर्मों को ग्रहण करने पर यह कल्याण और सुख देंगे, तब तुम्हें इन्हें स्वीकर करना चाहिए।)

परंतु मेरी खोज ने मेरी कृतियों के भीतर से मुझे जिस रूप में खोजा उसकी बानगी निम्न अंशों में (महाभिषग,1973, उद्धृत पन्ने सस्ता साहित्य मंडल से प्रकाशित संस्करण के हैं) मिल जाएगी:

आनंद, प्रत्येक प्रवाद के पीछे सत्य का एक स्वल्प अंश अवश्य होता है, और सत्य का यह बीजांश ही सत्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है अन्य विषयों में संदेह उत्पन्न होने पर उस क्षीण अंश की पुष्टि होते ही शेष काल्पनिक अंश को भी वही प्रामाणिकता मिल जाती है जो उस सत्य अंश को। 67
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मानस के विकास के अभाव में भी शिक्षा आदि के द्वारा बुद्धि का विकास संभव है। अनुभव से बुद्धि का विकास संभव है परंतु इस तरह की बुद्धि का उपयोग क्या होता है? उन्हीं मलिन आचारों को तर्क द्वारा उचित ठहरा कर अपने लिए एक दुर्ग खड़ा करना ….85
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…मुझे उनके प्रति क्रोध नहीं जगा था, आनंद। हंसी भी नहीं आई थी । करुणा जगी थी। सोचा था मैंने, ब्राह्मण तूने इतना शास्त्र ज्ञान अपने को अधिक बालिश बनाने के लिए अर्जित किया। तूने भुजंग की भांति दूध को भी विष बनाकर ही ग्रहण किया, ब्राह्मण। 86

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आशु आशु अधीर करता है। त्वरणशीलता मन की चंचलता, संयम के अभाव, मन की अपरिपक्वता का नाम है। जो पक्के विचार का है, वह वस्तुओं, गुणों, और कर्मों के फूल, फल, और परिणाम की और कालों को जानता है। 90

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धर्म इंद्रजाल नहीं है, आनंद, कि एक क्षण में समस्त लोक में फैल जाए। यह गति है। पथ है। इसे चलकर ही जानना होगा। धीरे-धीरे फैलेगा और सिकुड़ेगा भी, पर लुप्त नहीं होगा। 91

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जो अतिरिक्त संग्रह कर चुके हैं, वे अपने पास पिशाच की सी शक्ति संचित कर चुके हैं । उसी से वे लोक को तोड़ रहे हैं अहंकार प्रदर्शन करते हुए पैशाचिक हंसी हँस रहे हैं और वह आनंद, जो सब कुछ से वंचित हैं, वह कीड़ों मकोड़ों की अवस्था में पड़े हुए हैं । उनमें कुछ ऐसे हैं जो संग्रहशीलो के उपकरण बने हुए हैं। 93

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धर्म अति का नहीं है। सम का है धर्म। वह वक्र नहीं है। ऋजु का है धर्म। … मध्यम है उसका मार्ग। मध्यमा है उसकी गति । 94
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यदि सभी विमाताएं क्रूर होती हैं, राक्षसियों जैसा व्यवहार करने लगती हैं, उन्हीं सौतेली संतान से, वह दोष किसका है इसमें? यदि वही बालिका किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह करें जो कुमार है तो क्या उसे अपनी संतानों के साथ राक्षसी व्यवहार करते पाया जाता है? राक्षसी बनाई जाने वाली विमाता अपनी संतान के प्रति निष्ठुर होती है? वह तो देवी होती है अपनी संतान के लिए । हर कुमारी मैं देवी बनने की वही क्षमता होती है पर उसे उसकी इच्छा के विपरीत एक विशेष परिस्थिति में डालकर, उसे एक विशेष दूषण का आंखेट बनाया जाता है और पुनः उसे ही दोष दिया जाता है । यह कहां का न्याय है किसी को विष के घट में डुबो दिया जाए, विश्व का प्रकोप उसकी शिरा उपशिरा में हो जाए और जब उसके प्रभाव में वह उन्मत्त जैसा आचरण करने लगे तो उसका उपहास और निंदा की जाए। 97-98
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मैं सोचने लगा, यदि आत्मपीड़न ही धर्म है, सुख से अपने को वंचित करना ही घर्म है तब स्वर्ग की अभिलाषा ही क्यों? स्वर्ग जहां भोग ही भोग है, सुख ही सुख है, वाह तू अधर्म बीज हुआ।155
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उसी दिन मैंने जाना, आनंद, कि धरती से ऊपर केवल हिमाद्रि के ऊंचे शृंग ही नहीं हैं, कैलाश की चोटी एकमात्र ऊंची भूमि नहीं। सामान्य धरातल से कैलाश की ऊंची भूमिका के मध्य दूसरे भी ऊँचे स्थल पडते हैं। कुछ नहीं से कुछ सार्थक है, कुछ से अधिक श्रेयस्कर है और अधिक से चरम की गति होनी चाहिए। “ 159-160
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तो, आनंद , मैंने स्पष्ट देखा कि जन्म से कोई वृषल नहीं होता। जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता। कर्म से वृषल होता है और कर्म से ब्राह्मण होता है। …191
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आजीवक उपल ने उन्हें प्रसन्न, परिशुद्ध और पर्यवदातवर्ण देख, पूछा था, “ किसको गुरु मानकर तू प्रव्रजित दुआ? कौन तेरा शास्ता है?” तो शास्ता ने उत्तर दिया था, “ मैं स्वयं ही अपना गुरु बना और स्वयं ही अपना शास्ता। सभी धर्मों को निकट से देखा सभी का क्रम क्रम से अभ्यास किया । सभी धर्मो में निर्लिप्त सर्वत्यागी अर्हत हूँ।…” 201
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“विनय के कारण, लज्जा के कारण, भय के कारण, अपने उपलब्ध को गुप्त रखना अविनय है, अधर्म है, आनंद। यदि तुम अपनी काया से जुड़े नहीं हो, राग से लिप्त नहीं हो, तो अपने जाने हुए को अपनी काया और मन से क्यों जोड़ोगे? ऐसे ही तो अहंकार होगा।” 201
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Post – 2020-07-24

#शब्दवेध(88)

इतिहास की वैज्ञानिकता

हम कल इस तथ्य को रेखांकित करना चाहते थे कि वैज्ञानिक इतिहास लिखा जाना संभव भी है और जरूरी भी, क्योंकि यही उन विकृतियों का एकमात्र उपचार है, जिससे पूरी मानवता ग्रस्त है। ऐसा इतिहास मानव सभ्यता का इतिहास ही हो सकता है, न कि प्रतापी राजाओं और देशों और जातियों के प्रताप का।

वैज्ञानिक इतिहास की बात करने वाले नहीं जानते कि वैज्ञानिक इतिहास होता क्या है। इसका जिक्र आने पर वे यह मान लेते हैं कि इतिहास के मामले में न तो वह वस्तुपरकता और तटस्थता अपनाई जा सकती है जो प्राकृत विज्ञानों में संभव है, न ही उस तरह के प्रयोग किए जा सकते है। सच तो यह है कि इतिहास स्वयं वह प्रयोगशाला है जिसमे एकल मनुष्य से लेकर मानव समुदायों के आचरण के परिणाम दर्ज हैं। इतिहास प्रक्रिया है, परिणति नही। जहाँ एक परिघटना का अन्त दिखाई देता है वहीं और उसके भीतर से ही दूसरे का आरंभ हो जाता है; जो कार्य है, वह कारण के बदल जाता है।

इसमें हस्तक्षेप संभव नहीं। हुआ तो कुछ न दीखेगा, न समझ में आएगा। आप केवल वह देखेंगे जिसे देखना चाहते हैं, मनोगत को देखने के लिए इतिहास पर नजर डालने की जरूरत नहीं। आज तक इतिहास का इसी रूप में ‘अध्ययन’ किया गया है। नतीजा सामने है, समाज विज्ञान की बात करने वाले स्वयं कहते हैं कि इतिहास विज्ञान की समकक्षता में नहीं आ सकता। यदि नहीं आ सकता तो विज्ञान मत कहो। कथा कह लो, इतिवृत्त कह लो।

इस दुहरी समझ के पीछे इतिहास की मनमानी व्याख्या करते हुए, इसकी वैज्ञानिक साख का इस्तेमाल करने की चालाकी दिखाई देती है न कि इसकी वैज्ञानिकता की रक्षा की चिंता। इसका राग अलापने वालों ने इसके स्रोतों के साथ जितनी छेड़छाड़ की है उतनी मध्यकालीन मूर्ति, मंदिर, शिक्षाकेंद्रों और ग्रंथागार को नष्ट-ध्वस्त और भस्म करने वालों ने ही किया होगा।

मार्क्सवादी इतिहास को समझना नहीं, इसे अपनी योजना के अनुसार तोड़-मरोड़ कर इस्तेमाल करना चाहते हैं, और करते रहे हैं। इतने कम समय में उनके व्यर्थ, उत्पीड़क और मानवद्रोही हो जाने का कारण यह नासमझी ही है और यही मार्क्सवादी इतिहास लेखन में असंगतियों और अंतर्विरोधों का भी कारण है।

यह मार्क्सवादी इतिहासकारों के ही बस की बात है कि आपात काल के दौर में सोवियत संघ के इतिहासकार भारत का एक नया इतिहास लिखते हैं और आपात काल की समाप्ति के बाद उसे वापस ले लेते हैं। वे कहते रहे पूँजीवाद संकट के दौर से गुजर रहा है, भविष्य कम्यूनिज्म का है, और संकटग्रस्त कम्युनिज्म हो गया, पूँजीवाद उसकी व्यर्थता के कारण संजीवनी पा गया।

मार्क्सवादियो की सबसे बड़ी विडंबना यह कि वे मार्क्सवादी नहीं थे। मार्क्सवाद उनका चेहरा नहीं मुखौटा था, असली चेहरा फासिज्म का था जो इनकी भाषा में गाली था। यदि उन्होंने इतिहास के उपयोगितावादी अध्ययन को इतिहास का आदर्श अध्ययन माना होता तो मार्क्सवादी प्रभाव में आने के बाद, मैं स्वयं, वैज्ञानिकता का उपहास करते हुए, ऐसे अध्ययन का कायल हो चुका होता, और इतिहास में वैज्ञानिकता की माँग को अकादमिक पाखंड मानते हुए इसका उपहास करता और उन निष्कर्षों पर नहीं पहुँचता जिनसे मार्क्सवादियों से मेरा मोहभंग हो गया। मेरा मोहभंग उन्हें उन्हीं की कसौटी पर गलत सिद्ध होने से हुआ।

अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए उन्होंने न केवल विचार को नष्ट किया, अपितु विचार के माध्यम, भाषा को, निर्णायक महत्व के शब्दों का अर्थ उलट कर नष्ट कर दिया और आज का साहित्यकार, पत्रकार, बुद्धिजीवी अपने ही समाज के समक्ष बे-आवाज भौचक खड़ा है ताे इसके अपराधी वे हैं। यदि ज्ञान और कर्म के क्षेत्र में कतिपय अपवादों को छोड़कर कोई अपना काम नही कर रहा है तो इसकी शिक्षा उन्होंने दी, सब कुछ छोड़ कर राजनीति करो और वह भी गंभीर राजनीतिक विमर्श न बन कर सतही सत्ताबुभुक्षु राजनीति ही बनी रहे।

यह कितनी शर्मनाक बात है कि जिस सोवियत संघ के इशारे पर भारतीय कम्युनिस्ट अपना रुख बदलते रहते थे, उसकी नजर में वे उपयोगी मूर्ख थे। यह मेरा आरोप नहीं बल्कि केजीबी के एक एजेंट के इंटरव्यू का अंश है :
In an interview with G. Edward Griffin in 1984, former KGB informant Yuri Bezmenov had exposed the insidious operations of the Soviet Union and how the Communist apparatus viciously overtakes the conscience of a country.
He began his interview by revealing that people who towed the Soviet foreign policy, in their home country, were elevated to positions of power through media and manipulation of public opinion. However, those who refused to do so were either subjected to character assassination or killed.Recounting his time in India, the KGB informant revealed how he was shocked to discover the list of known pro-soviet journalists in India who were doomed to die. He said that even though those journalists were idealistically leftists, yet the KGB wanted them dead as ‘they knew too much’. Benzmenov emphasised, “Once the useful idiots (leftists), who idealistically believe in the beauty of Soviet socialism or Communism, get disillusioned, they become the worst enemies.”
The former KGB informant reiterated there are no grassroots revolutions but one engineered by a professional, organised group. He revealed that the Awami League party leaders were trained in Moscow, Crimea, and Tashkent.

तथाकथित मार्क्सवादियों के भारतीय जनक कोसंंबी माने जाते हैं और उनकी अपनी इतिहास दृष्टि के जनक ई.एच. कार हैं जिनके What is History को विस्तार से उद्धृत करते हुए वह अपना What is History लिखते हैं । कार आजीवन एक कूटनीतिविद रहे, कई देशों में ब्रिटेन के राजदूत रहे। उनकी इतिहासदार्शनिक के रूप में ख्याति Clash of Civilizations के लेखक हंटिंगटन के समकक्ष ही ठहरती है। उतने ही झटके से दोनों लोगों की नजर में चढ़े थे।

कार की समझ से अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के चिंतक (The Twenty Year’s Crisis, July 1939) दो तरह के होते हैं एक यथार्थवादी (realists) और दूसरे खयाली utopians. यदि हम कहें नेहरू दूसरी कोटि के चिंतक थे तो भारतीय मार्क्सवादी बुरा मान जाएँगे क्योंकि वे नेहरू से हर मामले में मीलों आगे थे। भारतीय मार्क्सवादी इतिहास वैज्ञानिक हो ही नहीं सकता था। उसी में कालपत्र लिखा जा सकता था, उसी में इतिहास की एक संस्था का कई बार प्रधान बनने और मनचाहा इतिहास लिखवाने के लिए संस्था का धन और मान अर्थलोलुप इतिहासकारों के हवाले करने के बल पर एक व्यक्ति इतिहास का निर्माता हो सकता था ( The Making of History: Essays Presented to Irfan Habib) और उसी के सारे इतहासकार जुट मिल कर एक अदना जिज्ञासु के सवालों के सामने ढेर हो सकते थे।

विज्ञान की ही नहीं वैज्ञानिक इतिहासबोध का भी सबसे पुराना परिचय बुद्ध में ही मिलता है, एक तो कालामों के बीच सत्यज्ञान का परिचय देते देते हुए राग और दबाव के सभी रूपों से मुक्त हो कर उभय कल्याणकारी निष्कर्ष पर पहुँचने का उपाय बताते हैं और दूसरा गणसंघ की एकता में दरार आए बिना उनके अजेय होने की बात करते हैं। उपयोग करने वालों ने तो उनका भी उसी तरह उपयोग कर लिया जैसे उनके समय से ढाई हजार साल बाद पैदा होने वाले आइंस्टाइन का।

मैं अपना दुश्मन स्वयं हूँ इसलिए मुझे किसी दुश्मन की जरूरत नहीं। लिखता हूँ शोध-निबंध और प्रसंगों को स्पष्ट करने के लिए ऐसे व्यौरों की ओर भटक जाता हूँ कि शोधनिबंध ललित निबंध बन जाता है। मैं स्थापित यह करना चाहता था कि इतिहास के नियमों का सम्मान न करने पर वह इतिहास नहीं रह जाता, वह विषवेलि का रूप ले लेता है और सभी के लिए अनिष्टकारी होता है जब कि वैज्ञानिक इतिहास इतिहास के नियमों का सम्मान करते हुए ही संभव है और इसका परिणाम (बोध) उभयकल्याण होता है। इसमें हार-जीत नहीं होती। जीतने वाले और हारने वाले कुछ खोते नहीं पाते हैं, सत्य के अधिक निकट पहुँचते हैं।

हम इसके बाद अपनी नजर में आए इतिहास के उन वैज्ञानिक सिद्धांतों में से कुछ की ओर ध्यान दिलाना चाहते हैं जिनका पालन करने में शिथिलता बरतने पर हम सही निर्णय पर पहुँच ही नही सकते। हम लिपि पर बात कर रहे थे और हमारा तर्क वही था कि जिसका विवेचन बुद्ध ने किया था कि अमुक के हुए बिना अमुक नहीं हो सकता। यदि अमुक न हो तो अमुक नहीं हो सकता। विकास की पिछली मंजिलों के बाद ही अगली मंजिल पर पहुँचा जा सकता है, यदि उन तक पहुँचना बाधित हो जाए या उसे रोक दिया जाए तो अगला चरण बाधित हो जाएगा।

अहमद हसन दानी अपने जीवनकाल में पूरे दक्षिण एशिया के सबसे कद्दावर पुरातत्वविद थे। बह संस्कृत जानते ही नहीं, उसमें बात भी कर सकते थे जो मेरे वश का नहीं। उन्होंने सिंधु-सरस्वती लिपि, ब्राह्मी और सामी लिपि के आपसी संबंधों की व्याख्या करते हुए ब्राह्मी की उत्पत्ति सामी के दर्शाने का प्रयत्न किया था जो फिनीशियन या तथाकथित अनातोलियन का पर्याय थी। पर वह यह भूल गए थे कि वर्णिक अवस्था alphabetic मात्रिक syllabic का जनक नहीं हो सकती थी, मात्रिक syllabic के बाद ही संभव थी। दानी से एक चूक हुई या अपने निर्णय मे बाधक पा कर उन्होंने इसकी अवज्ञा कर दी कि अमुक के बिना अमुक संभव ही नहीं। यह तथ्य था ग्रीक का सबसे पुराना प्रमाण माइसीनिया की लीनियर- बी में पाया जाना। लीनियर-बी मात्रिक लिपि थी और फिनीशियन लिपि इससे ही पैदा हुई थी:
Mycenaean language, the most ancient form of the Greek language that has been discovered. It was a chancellery language, used mainly for records and inventories of royal palaces and commercial establishments. Written in a syllabic script known as Linear B, it has been found mostly on clay tablets discovered at Knossos and Chania in Crete and at Pylos, Mycenae, Tiryns, and Thebes on the mainland, as well as in inscriptions on pots and jars from Thebes, Mycenae, and other cities that imported these vessels from Crete. Encyclopedia Britanica.
इसके कुछ दूसरे भी पक्ष हैं जिन पर यहाँ विचार नहीं किया जा सकता।

Post – 2020-07-22

भूमिका लेख बन गई शायद!

मैं उन कमजोर दिमाग के लोगों में अपनी गिनती कराने से नहीं डरता जो यह मानते हैं कि ज्ञान और विज्ञान की प्रकृति में भेद नहीं है, मात्रा का अंतर अवश्य है। जो मानते हैं, कोई शास्त्र ऐसा नहीं जिसमें निजी हस्तक्षेप से बच कर विज्ञान न बनाया जा सके। जो मानते हैं कि कोई ऐसा क्रिया-व्यापार नहीं है जिसके पीछे कार्य और कारण का नियम काम न करता हो, अर्थात् जिसका विज्ञान न हो। जो मानते हैं कि वे सभी इतिहासकार जो यह मानते हैं कि वैज्ञानिक इतिहास संभव नहीं है वे अपने को इतिहासकार कहने के अधिकारी नहीं हैं।

विज्ञान उन नियमों को पहचानने और पहचान के बाद उनका कठोरता से निर्वाह करने का नाम है जिनसे परिघटनाएं नियंत्रित होती हैं। बुद्ध ने आज से ढाई हजार साल पहले ही विज्ञान की परिभाषा सरलतम शब्दों में प्रस्तुत की थी:
यदि ऐसा है तो ऐसा होगा ; इसके पैदा होने पर यह (अवश्य) पैदा होता है।
ऐसा न हो तो ऐसा नहीं हो सकता ; इसे रोक दिया जाय ताे यह भी रुक जाता है।

इसी पर आधारित था गौतम बुद्ध का चार आर्य (अकाट्य) सत्यों का निरूपण जो इस तत्व दृष्टि पर निर्भर करता था कि ऐसा कुछ नहीं है जो शाश्वत हो। जो है उसका अंत होगा ही। इसी का आख्यान है :
1. दुख है।
2. दुख का कारण है ( क्योंकि कुछ भी अकारण नहीं हो सकता)।
3. दुख का अंत है ( क्योंकि कुछ भी शाश्वत नहीं है)।
4. दुख के अंत का उपाय है ।

और इस उपाय के लिए अष्टांग मार्ग का निरूपण किया था। हम बौद्ध धर्म पर बात नहीं कर रहे हैं, इसलिए इसके विस्तार में नहीं जाएंगे।

हम केवल यह निवेदन करना चाहते हैं कि जिस धर्म को धोखाधड़ी का पर्याय, ज्ञान, विज्ञान और प्रगति में बाधक माना जाता है, उसके नियमों का पालन किया जाए तो, उसे भी वैज्ञानिक बनाया जा सकता है। यदि धर्म धर्म के अनुकूल हो तो वह विज्ञान में बदल सकता है। इसे ही हम बुद्ध वह तत्वज्ञान कह सकते हैं, जिसके बाद वह दावा करते थे कि वह वेद-वेदान्त सभी की जानकारी रखते हैं पर किसी प्राचीन दार्शनिक या सैद्धांतिक परंपरा का पालन नहीं करते। वह जिस सत्य पर पहुंचे हैं वह किसी पूर्ववर्ती चिंतक के लिए अगम्य था। उनका कोई गुरु नहीं। वह आत्मदीप हो कर विचरण करते हैं। मानवता के इतिहास में यह उसी तरह की एक वैज्ञानिक खोज थी जैसे गुरुत्व शक्ति की खोज थी।

दूसरा पाठ यह है कि ज्ञान और विज्ञान को भी किसी तरह की लिप्सा होने पर उस तरह के धर्म में बदला जा सकता है जिसके लिए मार्क्सवादी साहित्य में भर्त्सना के अनगिनत पाठ पाए जाते हैं पर उसके पक्षधरों की समझ में यह मोटी बात नहीं आती कि वे मार्क्सवाद को वैसे धर्म में परिवर्तित कर चुके हैं।

महाभिषग लिखने की तैयारी करते हुए विज्ञान की परिभाषा से परिचित होने के बाद मैं कला और विज्ञान के बीच अंतर को भूल गया। कला अपने सर्वोत्तम रूप में तब प्रस्तुत होती है जब वह वैज्ञानिक नियमों का पालन करती है, विज्ञान वही सर्वजनग्राह्य होता है, जहां वह ज्ञान को कलात्मक रूप दे कर मानव मात्र के लिए उपयोगी सिद्ध होता है। अफलातून ने कहा था हर चीज की कसौटी मनुष्य है – man is the measure of everything। इसमें मामूली सुधार किया जा सकता है हर चीज की कसौटी मनुष्यता है। संभवतः अफलातून के मनुष्य में मनुष्यता भी निहित है।

अपनी पराकाष्ठा पहुँचने के बाद कला विज्ञान सभी की कसौटी केवल एक रह जाती है, वह मनुष्य मात्र के लिए उपादेय है या नहीं। यदि उसका होना कुछ लोगों के लिए लाभकर प्रतीत होता है और शेष के लिए अनिष्टकर तो , न तो वह कला है, न ही विज्ञान। अपने श्रेष्ठतम रूप में कला विज्ञान के नियमों का पालन करती है और विज्ञान कलात्मक होना चाहता है ।

Post – 2020-07-21

शब्दवेध(87)
लिपि और लेखन के जनक

लंबे समय तक इस विषय में लगभग सहमति बनी रही कि वैदिक ऋषि लेखन कला से परिचित नहीं थे। भारतीय पंडितों की दृष्टि में वे मंत्रद्रष्टा थे, लेखक तो थे नहीं। वैसे मंत्रद्रष्टा सभी कवि और लेखक होते है, रचना लिखित रूप में उपस्थित नहीं होती। मनोलोक में उत्पन्न होती है और उसके बाद ही लिपिबद्ध होती है। मैक्समूलर ने वेद का पता चलते ही इसे मानवता के शैशव का काव्य घोषित कर दिया था। शिशु साक्षर तो हो नहीं सकता।

ज्ञान के क्षेत्र में सबसे ऊंची चोटी को आप इडियट पॉइंट (मूढ़ता का शिखर) कह सकते हैं जहां दो पक्षों के ज्ञानी और अभिमानी लोग अपनी महिमा सिद्ध करने के लिए आपस में हाथ मिलाते हैं, और एक ही कथन से उल्टे अर्थ निकाल लेते हैं। मैक्समूलर हिंदुओं को यह समझाना चाहते थे कि ईसाइयत उसी विश्वासधारा की प्रोढ़ावस्था है जिसका शैशव ऋग्वेद में पाया जाता है। ध्वनि यह कि हिंदुओं को परिपक्वता का परिचय देते हुए अपना धर्म छोड़कर ईसाई बन जाना चाहिए। अपनी असाधारण चालाकी में वह स्वयं बचकानी हरकत कर रहे थे, क्योंकि भारतीयों के लिए उसी कथन का अर्थ था कि अब पश्चिम के विद्वान भी इस बात के कायल हैं कि वेद प्राचीनतम हैं और दूसरी सभी सभ्यताएँ उनके समक्ष शिशुवत हैं इसलिए वेद की खोज हो जाने के बाद उन्हें वैदिक धर्म अपना लेना चाहिए। अकेले दयानन्द सरस्वती थे जो मैक्समूलर को वैदिक ज्ञान के मामले में मूर्ख समझते थे।

हमने अपने अध्ययन (1987; 1995) में वेद और वैदिक समाज के विषय में पूर्व और पश्चिम दोनों के नए पुराने सभी अध्येताओं को भटका हुआ पाया और जिसके विस्तार में जाने का अवकाश नहीं। पर जिस समस्या पर हम विचार कर रहे हैं उसके संदर्भ में हमने इस बात के निर्णायक प्रमाण दिए कि वैदिक काल से भी बहुत पीछे – वाणी को दृश्य अंकनों से व्यक्त करने कीचित्रलेखन तक जाने वाली, परंपरा थी और उन चरणों को सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से सुरक्षित रखने का प्रयत्न भी किया गया; कि वैदिक समाज लेखन से अपरिचित नहीं था, बल्कि वह टंकलिपि और हस्तलिपि दोनों मे दक्ष था। पहली के लिए धातु के नुकीले यंत्र का प्रयोग किया जाता था जिसे आरा कहा जाता था और दूसरे के लिए पंख के मूल का प्रयोग होता था जिसके कारण उसका एक नाम पक्ष्या भी था। मैंने इसके साथ ही यह भी निवेदन किया था वैदिक कवि अपनी रचनाओं को भी लिपिबद्ध करते थे, और चित्रलेखन से आरंभ होकर हड़प्पा काल के बाद के काल तक लेखन का चलन भारत से कभी समाप्त नहीं हुआ। हड़प्पा से ले कर ब्राह्मी के चलन तक लेखन के प्रचलन के संकेत प्राचीन कृतियों में मिलते हैं।

ब्राह्मी और सामी लिपिचिन्हों में समानता पाए जाने और सिंधु-सरस्वती लिपि से परिचय के बाद लगातार यह विवाद का विषय बना रहा है कि ब्राह्मी का उद्भव कैसे हुआ।
सिंधु-सरस्वती सभ्यता से परिचय से पहले से ही यह बलवती धारणा रही है कि ब्राह्मी लिपि सामी से निकली है।
An origin in Semitic scripts (usually the Aramaic or Phoenician alphabet) is accepted by all script scholars since the publications by Albrecht Weber (1856) and Georg Bühler’s On the origin of the Indian Brahma alphabet (1895). Bühler’s ideas have been particularly influential, though even by the 1895 date of his opus on the subject, he could identify no fewer than five competing theories of the origin, one positing an indigenous origin and the others deriving it from various Semitic models. (विकीपीडिया)।
कतिपय भारतीय विद्वान (गौरीशंकर हीराचंद ओझा, डी.सी. सरकार, चन्द्रबली पांडे) इसका प्रतिवाद करते रहे पर अहमद हसन दानी (Indian Paleography) ने लगभग निर्णायक रूप में यह प्रतिपादित कर दिया कि ब्राह्मी लिपि सामी से प्रेरित है।

पर दो समस्यायें दानी को भी उलझन में डाल रही थीं। एक तो यह कि सामी के सभी चिन्ह सिन्धु-सरस्वती लिपि के किसी न किसी चिन्ह से मिलते हैं। दूसरे सामी वर्णिक लिपि है, जबकि सिंधु-सरस्वती लिपि से लेकर भारत की आज तक की सभी लिपियाँ मात्रिक हैं। मात्रिक से वर्णिक लिपि निकल सकती है, इसके विपरीत विकासक्रम को उलटने जैसा है।

इसी संदर्भ में इथियोपिया में बसे भारतीयों की भूमिका निर्णायक हो जाती है। इनके विषय में हमारी जानकारी बहुत स्पष्ट नहीं रही है। हमें केवल इस बात का पता था मिस्र की रानी Hatshepsut (15वीं शताब्दी ई.पू.) ने दो जहाज इथियोपिया के व्यापारिक अड्डे (पुंत) को भेजे थे और उन पर जो माल लद कर मिस्र पहुंचा था उसका उद्गम स्थान भारत था – इनमें हाथीदाँत, चंदन, मोर, बन्दर, मसाले, गंधद्रव्य, गन्ना और इसके साथ ही कुछ कारीगर शामिल थे। इथियोपिया की लिपि के विषय मैं विलियम जोंस ने जो टिप्पणी की थी उसे मूल रूप में देना जरूरी है:
That the written Abyssinian language, which we call Ethiopick, is a dialect of old Chaldean, and a filter of Arabick and Hebrew, we know with certainty, not only from the great multitude of identical words, but (which is a far stronger proof) from the familiar grammatical arrangement of the several idioms: we know at the same time, that it is written, like all the Indian characters, from the left to the right, and that the vowels annexed, as in Devnagari, to the consonants; with which they form a syllabick system extremely clear and convenient, but disposed in a lefts artificial order than the system of letters now exhibited in the Sanskrit grammar; whence it may justly be inferred, that the order contrived by Panini and his disciples is comparatively modern; and I have no doubt, from a cursory examination of many old inscriptions on pillars and caves, which have obligingly been sent to me from all parts India, that Nagari and Ethiopic had a similar form. विलियम जोन्स, आठवां व्याख्यान, एशियाटिक रिसर्चेज, खंड 3, पृ. 4

इस पर हम अपनी ओर से केवल यह जोड़ना चाहेंगे कि मात्रिक लिपि सिंधु-सरस्वती लिपि, ब्राह्मी और उसके प्रभाव में विकसित भारत , तिब्बत, बर्मा, मलेशिया, जावा, सुमात्रा, कंबोज की लिपियों, ईरान की प्राचीन लिपियों को छोड़कर केवल सूडान (इथियोपिया में पाई जाती है) इसलिए इनको भारतीय लिपि का प्रसार मानने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं। इथियोपियो के फिनीशियनों के ही भूमध्य सागर तटीय बंधुओं ने कीलक लिपि के उस परिवेश में, उस लिपि का विकास किया था, जिसे सामी लिपि कहा जाता है, और जिसके चिन्ह ब्राह्मी से मिलते हैं।

इस संदर्भ में अमेरिकी नृतत्वविदा सुजान रेडालिया के लेख के एक अंश को पुनः समय और स्थान सीमा के कारण मूल में देने की बाध्यता है:
Linear Elamite was a writing system from ancient Persia, contemporary with Indus script, and resembling it strongly. There was a bilingual monument called the Table of the Lion in the Louvre museum, in Akkadian, a known writing system, and with the same text in Linear Elamite, still undeciphered.
Because of this bilingual monument, scholars gained knowledge of the sound values for a handful of Linear Elamite signs. Already having compiled a list of Indus script signs from examples of Indus seal photos at the website of Dr. Srinivasan Kalyanaraman, I compared Indus signs to Linear Elamite, and found matches; a broken line (na) and a triple S (shu). Then I compared Brahmi script to my Indus sign list, and was shocked to find more than a dozen similar or identical signs; a, o, ka, ga, da, dha, ja, nya, tha, ta, tha, pa, ba, ma, la, ya, and sa.(Cracking The Indus Script: A Potential Breakthrough: Suzanne Redalia.

हम उनके द्वारा तैयार किए और अपनी ओर से पठित लिपिचिन्हों की तालिका कापी पेस्ट करना चाहते थे पर उसकी अनुमति नहींं है।

अब हम जिस नतीजे पर पहुँचते हैं वह यह कि चीनी और तत्सम लिपियों के अतिरिक्त विश्व की सभी लिपियाँ वैदिक या सिंधु-सरस्वती लिपि से निकली हैं। यह हम नहीं, प्रमाण अपने अकाट्य स्वर में कहते हैं।

Post – 2020-07-20

सारी रोशनी, सारा श्रेय अपने और अपने खानदान पर केन्द्रित करने वालों ने इतना अँधेरा पैदा किया कि लोग अपने नायकों को पहचान तक नहीं पाये।