Post – 2019-03-31

#बहकी_बहकी_बातें
आत्मराग (2)

ज्ञान की महिमा से सभी परिचित है, अज्ञान की महिमा को मेरे अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं जानता। पहली बार बताने जा रहा हूं इसलिए इसके बाद इसके जानकारों की संख्या कुछ बढ़ जाएगी।

ज्ञानी ज्ञान के बल पर बहुत कुछ कर और बना सकता है अज्ञानी को कुछ करने की जरूरत ही नहीं होती। जो कुछ करना है, जानकर लोग उसके साथ करते हैं। उसको बस आराम ही आराम है, कटने, छंटने, कुटने-पिसने के बाद भी परम शांति।

अज्ञानी को किसी का डर नहीं लगता, ज्ञानी हर चीज से डरता है, अपने बनाए हुए ईश्वर और उसके बनाए हुए पिस्सू से ले कर डायनोसर तक से – जो है उससे और जो था उससे भी।

डर ज्ञान के साथ पैदा हुआ, और डर से पैदा हुई कायरता।

ज्ञानी जिससे डरता है उसे मिटाने का तरीका निकाल लेता है और, क्योंकि, वह हर चीज से डरता है, इसलिए ज्ञानी लोग एक न एक दिन हर चीज को मिटा देंगे । अगली प्रलय प्रकृति के प्रकोप के कारण नहीं होगी, मनुष्य के ज्ञान के अनियंत्रित विस्फोट के कारण होगी जिसके सामने प्रकृति स्वयं लाचार होगी।

यह ऐसी प्रलय होगी जिसमें जीवधारी नष्ट होंगे और पंचभूत दूषित, फिर भी वे बचे रहेंगे। होमोफेबर (अतिज्ञानी मनुष्य)का स्थान रोबोफेबर ले लेगा।

रोबोफेबर पर प्रदूषण से लेकर अन्न, पानी, हवा, किसी के अभाव का कोई असर नहीं होगा, जिनके कारण ही अतिज्ञानी मनुष्य का विनाश होना तय है।

सारांश यह कि ज्ञान एक अवस्था में मूर्खता में बदल जाता जाता है और अज्ञान सबसे बड़ी समझदारी सिद्ध होता है।

आप जानते हैं ज्ञान और समझ में क्या अंतर है? ज्ञान में असंगति, विसंगति, अंतर्विरोध सभी हो सकते हैं, समझ में इनके लिए जगह नहीं। ज्ञान बोझ है, इसे ढोना पड़ता है, समझ वाहन, और वाहन भी ऐसा जिसके लिए रख घोड़े की जरूरत नहीं होती। ज्ञानी यह कह सकता है और कहता रहा है कि उस जमाने में जब घोड़े की पीठ पर सवारी नहीं की जाती थी उसे रथ में जोता जाता जाता था, रथ लिए उन पर अपने गोरू-बछरू लादे हिन्दूकुश को पार कर सकते थे, समझदार की समझ में यह नहीं आएगा। ज्ञानी को अपनी परेशानी समझाएगा तो कहेगा, बात ठीक है, परंतु किताबों में लिखा है और इतनी सारी किताबों में लिखा है तो मानना तो पड़ता ही है।

ज्ञान का विस्तार करना जितना जरूरी है, अज्ञान को बचा कर रखना उससे कम जरूरी नहीं।

जब मैं कहता हूं कि ज्ञान से डर पैदा होता है और डर से कायरता और साथ कहता हूं मैं किसी से डरता नहीं – उपेक्षा, अपमान, और बहिष्कार से भी नहीं डरता तो अपने बारे में यह कहने की जरूरत नहीं रह जाती कि मेरी पूंजी क्या है और मैं अज्ञान के भी बचाए रखने के लिए इतना चिंतित क्यों रहता हूं।

मामला इतना इकहरा भी नहीं है। ज्ञानी लोग जिसे नहीं जानना चाहते हैं उसे जानने की कोशिश मैं करता हूं, जान कितना पाता हूं यह नहीं कह सकता। और जब मैं नहीं कह सकता तो ज्ञानी जन कैसे कह सकते हैं, जिनकी उस विषय में रूचि ही नहीं। इससे मुझे अपने बारे में जो भी चाहूं सोचने और मानने की छूट मिल जाती है, जैसे यह कि इतिहास, भाषा, सभ्यता विमर्श पर जिसने मुझे ध्यान से नहीं पढ़ा वह इनमें से किसी को समझ ही नहीं सकता और जो इनको नहीं समझ सकता वह अपने आप को भी नहीं समझ सकता।

जो अपने आप तक को नहीं समझता वह अपने समाज को कैसे समझ पाएगा? उसे आप क्या कहेंगे यह बताना मेरा काम नहीं क्योंकि आप को आप जहां से दुनिया को देखते हैं वहां से क्या दिखाई देता है, क्या ओझल रह जाता है और जो कुछ दिखाई देता है वह कैसा दिखाई देता है यह आप ही जानते हैं और उसका जितना बताना और जितना छिपाना चाहते हैं, उसमें मेरा कोई दखल नहीं।

परन्तु यदि आप उन्हें मूर्ख कहना चाहें तो मुझे आपत्ति होगी, क्योंकि उनके भेजे में अलमारियां भरी हैं, अलमारियों में किताबें भरी हैं, किताबों में ज्ञान भरा है और उस ज्ञान में ऊपर उठने और दूसरों से अलग दिखने की लालसा भरी है। यदि कुछ नहीं भरा है तो वह है सिर्फ समझ।

हमारा बुद्धिजीवी इसी विडंबना के कारण समुद्र के भीतर समुद्रफेन बन कर प्रसन्न है। उसे यह पता नहीं उसने क्या खोकर क्या पाया है।

ज्ञानी कम से कम लागत से अधिक से अधिक पाने की कोशिश करता और सफल होने के लिए जितना गिरना जरूरी है उतना गिरने को तैयार रहता है और झट खड़ा हो कर चारों ओर आंख दौड़ाता है कि उसको गिरते हुए किसी ने देख तो नहीं लिया। किसी पर शक हुआ तो उसका सफाया कर देता है, तलवार से नहीं उपहास से जिससे देखने वाला कुछ कहे भी तो लोगों को हंसी आए।

वह जिस समाज को समझ नहीं सकता उसे भी सुधारने का बोझ उसी के ऊपर है। सुधारने का सबसे अच्छा तरीका उपहास करना है, सिखाने का सबसे सही तरीका गालियां देना और अपमानित करना है।

उसका लिखा इतिहास पढ़िए। उसमें इतिहास नहीं मिलेगा, धिक्कार और फटकार मिलेगी। समाजशास्त्र पढ़िए, उसमें हमारा समाज नहुीं मिलेगा; हमें पराधीन बनाने वालों ने कम से कम बलप्रयोग से हमारे समाज को अधिक से अधिक तोड़-फोड़ कर आपस में टकराने के लिए जिस तरह की बोरियों में कसा था वे बोरिया मिलेंगी, उन पर जो ठप्पा लगाया था वह ठप्पा मिलेगा।

समाज बेचारा क्या कर सकता है? समुद्र झाग का क्या बिगाड़ सकता है? अधिक से अधिक इंकार में सर हिला सकता था। उसने वही किया। मनोविच्छिन्न समाज, उसका रीयल सेल्फ और फाल्स सेल्फ कैसे पैदा होता है जिसमें एक दूसरे का निषेध करता है, इसकी प्रयोगशाला भी भारत को ही होना था!

समुद्रफेन को आकाश की ओर उछालने से अधिक जरूरी है समुद्र की महिमा और मर्यादा को बचाए रखना। (क्या आप ने सुना ज्ञानी मनुष्यों की करतूत के कारण मूंगे की कितनी शृंखलाएं और कितने तरह के जीव, जन्तु और मछलियां किस दशा को पहुंच गई हैं?)

Post – 2019-03-31

आत्मगाथा

आपने इस बात पर गौर किया है कि मशीन एक ओर तो हमारी शक्ति का विस्तार कर दी गई है और दूसरी ओर इंसानों की जगह कम करती चली गई है; मनुष्य की ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों और यहां तक कि उसके दिमाग को कमजोर करती चली गई। पहले आदमी दौड़ता था, अब पहिया दौड़ता है, पहेली मनुष्य सोचता था आज कंप्यूटर सोचता है। पहले आंख देखती थी, आज कैमरा देखता है। मशीन पर हमारी निर्भरता अनुपात में हम पहले से कमजोर और दयनीय होते चले गए है। पहले आदमी लड़ता था अब आदमी को बचाने के लिए रोबो रोबो से लड़ने जा रहे हैं। मशीन आदमी के काम को छीनती जा रही है। मशीन के बढ़ने के साथ आदमी हाशिए पर खिसकता चला गया है। आदमी को काम नहीं मिल रहा है, और मशीन का काम फैलता जा रहा है।
हमारा इरादा बिल्कुल नहीं था कि हम एक ऐसे दौर में, एक ऐसी समस्या पर विचार करें, जिसमें निर्वाचन आयोग की नजर पड़े तो वह जवाब तलब कर ले कि आचार संहिता के लागू होने के बाद तुम ऐसा लेख कैसे लिख सकते हो, जिसका लाभ वह राजनीतिक दल उठा सकता है जिससे जवाब तलब किया जा रहा है, उसके राज में पहले के काम धंधे इतने कम हो गए हैं। दलील दूं कि अपनी ही तर्क श्रृंखला के चपेट में आकर इस समस्या से टकरा गया कि एक ऐसे देश में रोजगार की समस्या का समाधान कोई नहीं कर सकता, जिसमें हर 10 साल में एक नया देश पैदा हो जा रहा हो।
कोई देश अपनी समस्त मानव ऊर्जा का उपयोग न कर सके वह निकम्मों और बेरोजगारों की जमात तैयार करने से अपने को रोक नहीं सकता। जो देश ऐसे कामों के लिए जिन्हें मनुष्य विक्रम और कौशल से पूरा कर सकता, मशीन का सहारा लेता है, वह अपने देश के इंसानों का पेट भरने की जगह मशीनों का पेट भर रहा है, मशीनों के मालिक का
मशीनीकरण के बढ़ने के साथ-साथ संगठित क्षेत्र में एक एक मशीन कई कई आदमियों को बेकार करती चली जाएगी। जब कि असंगठित क्षेत्र में अच्छी मशीनों और औजारों के साथ एक एक आदमी कई गुना काम कर सकता है। किसी काम को करने के लिए जितने लोग जरूरी है से अधिक लोग लगाए जाएं तो काम पहले से कम होता है,
हर काम में विलंब तो होता ही है, और फिर होकर भी नहीं होता है, भ्रष्टाचार भी पैदा होता है। अब कोई काम नहीं करता है, जिसका काम है उसे गरज हो तो करा ले। लोग यह मान बैठते हैं कोई काम बिना लिए दिए हो ही नहीं सकता । लेना एक आदत बन जाती है देना एक लाचारी।
He explains this growth by two forces: (1) “An official wants to multiply subordinates, not rivals” and (2) “Officials make work for each other.” He notes that the number employed in a bureaucracy rose by 5–7% per year “irrespective of any variation in the amount of work (if any) to be done”.
मैं इसे एक निजी अनुभव से स्पष्ट करना चाहूंगा। मैंने सरकारी नौकरी डाक-तार महानिदेशालय में वरिष्ठ अनुसंधान सहायक के रूप मेंं आरंभ की। वहां एक वरिष्ठ अनुसंधान सहायक पहले से काम कर रहे थे। उनके साथ एक सहायक अनुसंधान सहायक था। हिंदी को सरकारी कामकाज में लागू करने के लिए पोस्ट ऑफिस मैनुअल, टेलीग्राफ गाइड हिंदी अनुवाद भी होना था। ओवरटाइम खटने के बाद भी काम संभल नहीं पा रहा था। संभालने का एक ही उपाय था कि वरिष्ठ अनुसंधान सहायक का एक और पोस्ट तैयार हो। पद तैयार किया गया और उस पर ता रूप में उसकी नियुक्ति भी हो गई। यह पद यूपीएससी से भरना था। इसी पर मेरा चयन हुआ था। विभागीय विशेषज्ञ पहले से वचनबद्ध थे, परंतु उनकी एक न चली। उन्होंने वरीयता क्रम पर उसे दूसरे नंबर पर रखवाने में सफलता पाई। यूपीएससी का चुना हुआ व्यक्ति यदि किन्हीं कारणों से नियत तिथि तक पदभार ग्रहण नहीं करता तो वह उस पद पर नियमित हो जाता। ग्रहण करने पर उसे निचले पद पर लौटना था। मेरे उपस्थित होने पर स्वागत की जगह मातम का जो दृश्य उपस्थित हुआ, उसके वर्णन का कोई लाभ नहीं। आनन फानन में सीनियर रिसर्च असिस्टेंट का एक नया पद सृजित किया गया, उस पर नियुक्ति के लिए प्रतीक्षा सूची में दूसरे व्यक्ति को रखने की व्यवस्था की गई, और उसे संजीवनी मिल गई। जो काम इतने दिनों से संभल नहीं रहा था और जिसके लिए यह पद तैयार किया गया था, मुझे दिया गया। मैंने 2 महीने के भीतर अनुवाद करके असिस्टेंट डायरेक्टर जनरल, हिंदी के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया ।
से बचा न हीं जा सकता और आगे बढ़ते हुए सभी को रोजगार नहीं दिया जा सकता। लोगों को अपना रोजगार स्वयं तलाशना होगा, जैसे आज भी असंगठित क्षेत्र के लोग अपना काम तलाशते और उसकी योग्यता पैदा करते हैं। तभी उनकी समझ में आएगा जनसंख्या को नियंत्रित करने में उनकी क्या भूमिका हो सकती है। कोई शासक

Post – 2019-03-29

बहकी बहकी बातें
आत्मराग

संगीत कारों को इस राग का पता नहीं परंतु दुनिया के सभी रागों और रागिनियों में सभी से मधुर है यह राग। इसे गाना सज्जनों को शोभा नहीं देता, सुनना सभी को प्रिय लगता है । सज्जन होता तो मैं भी इसे न अलापता। परंतु सज्जन बने रहने के लिए जरूरी है कि आपको यह राग समय असमय दूसरों से सुनने को मिलता रहे। आप को सज्जन या दुर्जन बनाने में आप से अधिक आसपास के लोगों की भूमिका होती है जो आपको समय रहते पहचान लेते हैं।जहां कोई पहचान है ही नहीं, आपकी शादी में नाचने वाले न मिलें और नाचने गाने वालों को खरीदने के लिए साधन भी न हो तो खुद ही नाच लेना चाहिए। ऐसा मौका सूना कदापि नहीं जाना चाहिए, नहीं तो लोग समझेंगे या आप अपनी जोड़ी को भगा कर ले जा रहे हैं। पुलिस अलग परेशान करेगी।

आत्मराग है अपने बारे में बात करना; अपने काम के बारे में बात करना; अपनों के बारे में बात करना; अपने जैसों के बारे में बात करना और क्योंकि आप मुझसे बात करते हैं, आपके बारे में भी बात करना। यह उस दशा में यदि जरूरी हो जाता है, जब आप हों कुछ और लोग आपको कुछ का कुछ समझ रहे हों। पहचान के लिए प्रतीक्षा की जा सकती है, परंतु ग़लतफ़हमी यदि समय रहते दूर नहीं की गई तो लेने के देने पड़ सकते हैं। आ जाएं दोस्ती का प्रस्ताव लेकर और अगला आपको दुश्मन समझ कर गोली मार दे; या हों दुश्मन पिस्टल लेकर अगले की जान मारने जाएं और वो आप को दोस्त समझकर हंसता हुआ और आप को गले लगा ले और आप सचमुच उसके दोस्त बन जाएं और आपको अपने दुश्मन से हाथ धोना पड़ जाए। आप हों सितार वादक (भले अच्छा सितार न बजाते हों) और आपको डफाली समझ लिया जाए, हाथ में डफली पकड़ा दी जाए और बजाने का आग्रह इतना बढ़ जाए कि आप उस पर दो-चार हाथ जमा भी दें। दुर्गति के असंख्य रूप होते हैं, उन्हीं में एक गलत पहचान भी है।

मैं अध्यापन करना चाहता था। अनुसंधान करने चला तो एक ज्योतिषी ने बताया आपका अनुसंधान पूरा हो ही नहीं सकता। योग ऐसा है तुम्हारे जीवन में अनुसंधान का अवसर बाद में मिलेगा। विश्वास नहीं करता था, आज भी नहीं करता, परंतु मेरा हाथ देख कर मेरे घर, परिवार, वर्तमान और भविष्य के बारे में उस ज्योतिषी ने जितनी बातें बताई थीं वे सभी सही निकलीं। यह ज्योतिषी थे रीतिकाल के विख्यात आलोचक और गोरखपुर विश्वविद्यालय के आदि विभागाध्यक्ष पंडित रमाशंकर शुक्ल रसाल। जिसे अपने अनुभव में अकाट्य पाया उस पर कभी भरोसा नहीं कर सका, क्योंकि उसका तार्किक आधार मेरी समझ में नहीं आया।

मुझे पूर्वानुभूति होती है। जागृत अवस्था में भी और सपने में भी। मैं इसकी संकेत भाषा को जानता हूं, परंतु किसी को समझाऊं तो हास्य रस की सृष्टि होगी। परिणाम का अनुमान करने के बाद भी आचरण इस तरह करता हूं मानो इसका कोई मतलब नहीं । इसमें समय और धन की जो क्षति होती है उससे बचा जा सकता था। परंतु तब इतनी बड़ी क्षति होती है जिस की पूर्ति अन्य तरीके से हो ही नहीं सकती।

इसके बाद भी चेतना में यह बहुत गहरे समाया हुआ हे कि जो अवश्यंभावी है उसे साधारण प्रयत्न से बदला नहीं जा सकता। इस नियतिवाद ने मुझे निकम्मा भाग्यवादी नहीं बनाया अपितु कठिन परिश्रम से नियति को बदलने का निश्चय पैदा किया किया। हानि-लाभ, यश-अपयश, भय और अपमान की चिंता से मुक्त होकर जो जैसा दिख रहा है वैसा कहने, जो न्याय संगत है उस पर यथाशक्ति अडिग रहने का संकल्प और साहस पैदा किया। जो कुछ मैंने किया वह किए बिना रह ही नहीं सकता था, वह मुझसे हुआ, इस विश्वास ने नम्र भी बनाया, और इतना दृढ़ भी कि अहंकारी होने का भ्रम पैदा हो जाय।

पेशा अध्यापन ही पसंद था। सरकारी नौकरी में जितनी पराधीनता होती है, उसमें स्वतंत्र चिंतन हो ही नहीं सकता। अच्छा अधिकारी अहंकारी हो सकता है स्वाभिमानी नहीं। यह सोच कर कुछ भी करने को तैयार था परंतु सरकारी नौकरी नहीं। वैदिक गणना के अनुसार डेढ़ युग तक जिंदा रहने के लिए जितने तरह के पापड़ बेले जा सकते हैं, उतने तरह के पापड़ बेलता हुआ प्रतीक्षा करता रहा आज नहीं तो कल, अध्यापन का काम मिल जाएगा, इसलिए सरकारी नौकरी से बचता रहा । आप जिससे बचना चाहेंगे उससे टकराने से बच नहीं सकते। साइकिल चलाना सीखने के क्रम में अर्जित इस शाश्वत सत्य के दबाव में 35 की उम्र में सरकारी नौकरी के अंतिम अवसर को लपकना पड़ा।

काम से काम रखने वालों की बीच काम पूरा करने के बाद भी बचे समय का उपयोग पढ़ने लिखने में करने वाले से शिकायत काम टालते रहने वालों की ऐसे आदमी से शिकायत स्वाभाविक है कि इनका मन काम में लगता ही नहीं। पढ़ने लिखने वालों से दूर, किताबों और पुस्तकालयों से दूर, अपनी जुगत से आधी अधूरी सामग्री से जुटाई गई सूचनाओं के आधार पर जो संभव हुआ वह किया। इसलिए मुझे न अपने किसी काम से संतोष हुआ, न कोई काम पूरा हुआ। पिछले काम के अधूरेपन को पूरा करने के सिलसिले में एक शोध के बाद दूसरा चलता रहा जो आज भी जारी है।

मैं राइटर नहीं फाइटर हूं। टूटी तलवार भांजता हुआ तोपों का मुंह मोड़ने की कोशिश करता अपने समय का Don Quixote. परंतु इस हास्यास्पद व्यंग्य का यथार्थ यह भी है कि कागजी तोपों के मुंह मोड़े ही नहीं तोड़े भी जा सकते हैं।

आज के विपक्षी दलों को इस बात का श्रेय दिया जा सकता है कि भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग की विभूतियां उन्हीं में से किसी न किसी के खूंटे से बंधी हैं। इस खूंटाबंदी को संस्कृत भाषा से परहेज के बावजूद एक सुसंस्कृत नाम दिया गया था जिसे प्रतिबद्धता कहते हैं। अंग्रेजी में इसे कमिटमेंट कहते हैें। मुझ जैसे अंग्रेजी की राहचलती जानकारी रखने वाले इसका मतलब लगाते है “गलती पर गलती करते रहने का और किसी गलती को गलती न मानने का संकल्प।” अपने कारनामों से इन्होंने कभी यह संदेह तक पैदा नहीं होने दिया कि इस अर्थ में कहीं कोई खोट है। मुझे ऐसे बुद्धिजीवियों की तोपों का ही सामना करना पड़ा।

ये बुद्धिजीवी गुलामी के मूल्यों में पले-बढ़े और उन्हीं की बदौलत अपनी कुर्सियों पर चढ़े होने के कारण भारतीय समाज को और स्वतंत्र भारत की अपेक्षाओं को समझ ही नहीं सकते, उन्हें पूरा करना तो दूर रहा। वे आज भी औपनिवेशिक मुहावरों में सोचते और बात करते हैं।

अन्य बातों में असहमति के बावजूद वे सभी एक बात पर सहमत रहे हैं वे मानवसमुद्र के मंथन से उत्पन्न झाग हैं, इसलिए समाज से ऊपर हैं। समाज का कर्तव्य है कि वह उन्हें शिरोधार्य करे। समाज के प्रति उनका कोई कर्तव्य नहीं है। उसे समझना भी जरूरी नहीं क्योंकि उसमें युगों पुरानी तरह तरह की विकृतियां भरी हुई हैं। समुद्र को चाहिए कि वह झाग बन जाये।

Post – 2019-03-28

बहकी बहकी बातें

इस देश में लगभग सभी ऐसे दलों को कभी न कभी सत्ता से वंचित रहना पड़ा है परंतु वंचित होने पर दूसरे किसी दल में उस तरह की विक्षिप्तता नहीं दिखाई दी जिस तरह की कांग्रेस ने बिना किसी अपवाद के बार-बार दिखाई।
यह विक्षिप्तता पूरी पार्टी की नहीं, केवल एक परिवार की रही है और आज भी है। इस परिवार ने सत्ता में बने रहने के लिए, या सत्ता से वंचित होते ही बेसब्र होकर इसे हथियाने के लिए जितने जघन्य तरीके अपनाए वैसे तरीके दूसरे किसी दल की कल्पना में भी नहीं आ सकते थे।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक मत के अंतर से भी लिए गए निर्णयों का आदर करते हुए उसे सर माथे लिया और और जीतने वाले को वैधानिक सीमा में रह कर पूरे समय निर्बाध काम करने दिया जाता है। कांग्रेस के अन्य नेताओं सहित सभी अन्य दलों ने इसका पालन किया है। केवल यही वंश है जो निरंतर उपद्रव करता है और उसे काम नहीं करने देता है।
इसका मूल कारण यह है कि इसका मिजाज लोकतान्त्रिक नहीं शाही थी और है। उसका यह विश्वास रहा है की आजादी तो हमारे खानदान ने हासिल की फिर देश का शासन दूसरे किसी के हाथ में कैसे जा सकता है? यह बोध इसमें इतना प्रबल कैसे हो गया, इसकी जांच कभी की नहीं गई।
राजाओं और नवाबों विरासत के मुकदमे जीतने वाले और अपनी व्यक्तिगत जीवन मे भी नवाबी मिजाज के मोतीलाल का अपने पूरे परिवार को स्वतंत्रता आंदोलन में झोंक देने का निर्णय, किसी पब्लिक लिमिटेड कंपनी के अधिक से अधिक शेयर अपने कब्जे में रखने जैसी व्यावसायिक सूझ से मेल खाता लगता है।
इसे कुछ खोल कर कहें तो, जब दूसरे लोग देश को औपनिवेशिक दासता से मुक्त कराने की लड़ाई लड़ रहे थे, नेहरू अपनी सल्तनत कायम करने की लड़ाई लड़ रहे थे।
अपने प्रवेश के बाद कांग्रेस के भीतर नेहरू का दूसरे नेताओं के साथ व्यवहार, पत्राचार, संवाद, उनकी आत्मकथा में अपनी भावी भूमिका की तैयारी, चाणक्य छद्म नाम से मॉडर्न रिव्यू में अपने बारे में लिखा उनका निबंध, अपने को प्यार करने वालों पर भी मौके वे मौके झुंझला कर कभी धक्का दे देना, थप्पड़ मार देना, डंडा ले कर पिल पड़ना, सभी से उनके मिजाज और इरादे का आभास मिलेगा।
राम मनोहर लोहिया पहले राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने इस रहस्य को सीमित रूप में समझा; मोदी पहले राजनेता हैं जिन्होंने वंशवाद का नाम दिया और यह समझा कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए वंशवाद का खात्मा जरूरी है और उसे साकार करने की दिशा में प्रयत्नशील रहे।
वंशवाद के विषय में यह भ्रम है कि यदि किसी राजनेता की संतान राजनीति में हो उसे वंशवाद कहा जाएगा । वास्तव में यह वंशवादियों के मीरासियों द्वारा उनके बचाव में तैयार की गई दलील है। वंशवाद तब आता है जब किसी नेता की अपनी पार्टी की ऊपर नियंत्रण इतना मजबूत हो जाता है कि वह सत्ता को अपनी खानदानी विरासत बना लेता है और अपने दल में योग्य व्यक्तियों के होते हुए, अपने परिवार के अयोग्य व्यक्ति को भी उत्तराधिकारी बनाने में सफल होता है और दल के दूसरे सदस्य इसे मानने को बाध्य होते हैं और यदि विरोध प्रकट किया तो बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। कांग्रेस के बाद इसके उदाहरण उत्तर प्रदेश और बिहार में देखने को मिले।
विपक्षी दलों में अखिल भारतीय प्रसार की और अनुभवी तथा योग्य नेताओं की दृष्टि से सबसे भरोसे की पार्टी कांग्रेस ही है। एक सशक्त विपक्ष की उपस्थिति लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। परन्तु मोदी के द्वारा इसका चरित्र उजागर किए जाने के बाद भी वंशवादी दुराग्रह से मुक्ति नहीं पाई गई। नेतृत्व वंश के बाहर नहीं जाने दिया गया।
लोप के कगार की ओर खिसकते जाने की चिंता से कातर सभी दलों ने एक बार महागठबंधन बना कर मोदी को हराने की कसमें खाई थीं। इसके बाद भी इस वंशवादी हठ के कारण कांग्रेसियों सहित दूसरे सभी, यहां तक कि परिवार के भीतर भी यह समझ पैदा हो जाने के बाद कि बंदा नाकारा है उसे ही आगे रखने का प्रयत्न जारी है। परिवार ने जाहिर कर दिया कि हमारी नजर विपक्ष की सफलता से अधिक अपनी सल्तनत पर है। भीतर की सचाई बाहर आ जाने के बाद गठबंधन भी बिखर गया और सुल्तानी का सपना देखने वाले को कोई अपने साथ रखने को तैयार नहीं।
यदि मोदी ने वंशवाद समाप्त करने का व्रत लिया था तो यथार्थतः वह पूरा हो गया। यदि वंश को बचाने के लिए कांग्रेस के खात्मे की नौबत आए तो इसके लिए कांग्रेस का नेतृत्व स्वयं जिम्मेदार है।

Post – 2019-03-27

जहां मै गलत हूं बताइए
जहां खुद गलत हों सुधारिए
यही कायदा है लिहाज का
यही फायदा है कलाम का।।

Post – 2019-03-26

वल्चर कल्चर

नीतिकारों का मानना है कि एक खास किस्म के लोग तभी तक समझदार लगते हैं जब तक वे कुछ बोलते नहीं हैं। अपनी विशेष जानकारी के क्षेत्र के बाहर हम सभी लोग उसी कोटि में आते हैं। व्यवहारिक राजनीति की परिधि में मैं भी उसी कोटि में आता हूं। यही सोच कर राजनीतिक समस्याओं पर बात करते हुए भी अपने ऊपर नियंत्रण रखने की कोशिश करता हूं कि राजनीतिक सक्रियता के भयावह परधर्म से बचा रहूँ। परंतु मुहावरा है ‘खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है’ । इसलिए जब नोबेल का भारी तमगा लटकाए विशेषज्ञों को अधिकार बाह्य विषयों पर, विशेषकर व्यावहारिक राजनीति पर लिखते बोलते पढ़ता और सुनता हूं, नियंत्रण कमजोर पड़ जाता है। जानता हूं कि व्यावहारिक राजनीति सत्ता पाने का संग्राम है, और उस युग का संग्राम है जिस में भाग लेने वाले जघन्य से जघन्य हथियारों का प्रयोग कर सकते हैं क्योंकि उनके युद्ध और प्रेम में सभी तरह अपराध जायज हैं। परन्तु बुद्धिजीवी स्वयं अपने को और अपने समाज को और एक तरह से कहें पूरी दुनिया को अपराधों से बचाने का प्रयत्न करता है, जिनको सत्ता के लिए, अपने प्राप्य से अधिक पाने के लिए किया जाता है।

अतः बात आज भी मैं व्यावहारिक राजनीति की नहीं, सोचने समझने वालों की सत्ता की राजनीति में बढ़ती भागीदारी और इससे पैदा होने वाले मूल्यों के ह्रास और उसके परिणाम बौद्धिक, नैतिक और वैचारिक निर्वात की करूंगा जिसमें कबीलाई नैतिकता तक के लिए जगह नहीं रह जाती। उसमें भले सत्ता के लिए, सफलता के लिए, अपने वैध प्राप्य से अधिक पाने के लिए कुछ भी किया जा सकता हो।

नैतिकता से शून्य राजनीति लुटेरों के बीच उनका ग्रास बनने से अपने को बचाने की चिंता का पर्याय बन जाती है। परंतु स्वतंत्रता के बाद से ही सत्ता पाने और मुट्ठी में बनाए रखने के लिए वे सभी हथकंडे प्रयोग में लाए गए जो आरंभ में किसी की समझ में नहीं आए परंतु जिनके कारण ही हम उस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में पहुंचे हैं जिसमें व्यावहारिक राजनीति वल्चर कल्चर में बदल चुकी है और इसका चरित्र इतना जगजाहिर है कि इस पर किसी भी रंग का पर्दा डालें, वह पारदर्शी हो जाएगा। एक जीवंत देश को उसके जीते जी ही शव मान कर प्रसन्न और उस पर चोंच मारते, एक दूसरे को हटाते हुए अपने हिस्से के लिए जगह जगह बनाने के लिए कूदते फांदते गिद्धों का जमावड़ा आंखों के सामने आ जाएगा।

इस बीभत्स यथार्थ की ओर ध्यान इसलिए गया कि हाल ही में मुझे उस व्यक्ति का एक साक्षात्कार देखने को मिला, जिसे लाखों लोग देख चुके हैं और संभव है आप में से भी बहुतों ने देखा हो । जिस बात ने मुझे आहत किया वह था हमारे समय के एक असाधारण प्रतिभाशाली युवक का अपनी सफलता के लिए गिद्धों की जमात में शामिल हो जाना। आज उसका दूसरा रूप एक मैसेज में मिला जिस पर मैं अपनी खिन्नता कुछ पहले प्रकट कर चुका हूं।

ऐसे लोग नैतिक दृष्टि से ही गिरे नहीं होते अपितु बौद्धिक दृष्टि से भी कोरे होते हैं। वे ऐसी मूर्खता करते हैं जिनके परिणाम उनकी इच्छा के विपरीत होते हैं। कौन नहीं जानता कि किसी को सिद्धदोष हुए बिना किसी अपराध का अपराधी कहना गाली है जो संज्ञेय अपराध है ? व्यवहारिक राजनीति अपराधियों का अभयारण्य है। उन्हें यदि पता हो कि दूसरे के अपराध से उनको फायदा हो रहा है तो वे उसके विरुद्ध वे कदम भी नहीं उठाएंगे जो विधान द्वारा उपलब्ध हैं। सिद्ध दोष हुए बिना चोर कहने वाले पर मानहानि का दावा करने पर मुंहफट व्यक्ति को जमानत लेनी होगी और उसके बाद दुबारा उसने कहा तो जमानत नहीं मिलेगी। वह जेल में होगा। इस विकल्प के होते हुए भी मोदी न केवल उसके विरुद्ध मानहानि का दावा नहीं करते, उल्टे स्वयं इस बात का प्रचार करते हैं कि देखो यह मुझे चोर कह रहा है। इसका लाभ उन्हें मिल रहा है और मिलेगा इसके बाद भी चोर कहने वाला अपनी आदत से बाज नहीं आता, न ऐसी ही पुरानी गलतियों से कोई सबक सीखता है।

चोर कहने वाले की समझ पर लोग पहले से तरस खाते आए हैं, जिससे उसके लिए उसका विशेषण उसकी संज्ञा बन चुका है। वह क्षम्य है। परंतु अपने को बुद्धिजीवी कहने वाले गाली गलौज में क्यों शामिल हो रहे हैं। मरने वाले का अंतिम हथियार मारने वाले को गाली देना और कोसना होता है। उसका प्रयोग करते हुए आप स्वयं किस परिणाम की घोषणा कर रहे हैं?

जिस तानाशाही को आप अनिष्टकर मानते हैं, उसको आमंत्रित करने के लिए क्या आप कोई कसर बाकी रहने दे रहे हैं?

परंतु इस बौद्धिक दुर्गति और नैतिक अधोगति की ओर, जैसा मैंने कहा, मेरा ध्यान प्रशांत किशोर के उस इंटरव्यू से गया, जिसमें वह व्यक्ति नैतिकता निरपेक्ष चरित्र दर्शाता हुआ यह दावा कर रहा था कि उसके कारण ही मोदी को 2014 में विजय मिली, फिर मोदी से अपनी चाहत के अनुसार कुछ पाने में विफल होने के बाद नए शिकार की तलाश की और नीतीश कुमार को विजय का भरोसा दिया और अपने इस कौशल की बल बिहार में भाजपा को सफल नहीं होने दिया। इसके बाद वह नीतीश को भी छोड़ कर पंजाब में अमरेन्द्र को विजयी बनाने के लिए सक्रिय हुआ और विजय दिलाई। आगे उनसे क्उछ खास मिलता न देख कर उन्हें छोड़ कर तृणमूल कांग्रेस से संपर्क साधा, लालू प्रसाद यादव से संपर्क साधा, शिवसेना से संपर्क साधा, राहुल गोधी और सोनिया गांधी से भी उसके अच्छे संबंध हैं। वह प्रतिभाशाली है इससे इंकार नहीं किया जा सकता। उसका इस सीमा तक रोबोटाइजेशन हो चुका है, कि नैतिकता, देश का कोई भविष्य, समाज का कल्याण उसकी निजी सफलता के आगे निरर्थक हो चुका है।

उसके सभी दावे अर्धसत्य हैं। 1- मोदी की विजय का पूर्वाभास मनमोहन सिंह के रबर स्टैप बन जाने से उत्पन्न निर्वात और देश के संसाधनों पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का है जैसे अनेक कथनो से उत्पन्न हिन्दुत्व चेतना का परिणाम था। यदि वह नीतीश का सलाहकार बना तो लालू का पलड़ा भारी क्यों पड़ा? नीतीश जीते नहीं हारे। राज्य स्तर पर जहां मोदी से टक्कर न थी, वह बहुत बड़े नेता थे। पंजाब में ड्रग तस्करी में अकाली दल की संलिप्तता ने उसकी साख गिरा दी थी। उस निर्वात में अमरेन्द्र सिंह का संयत व्यवहार एक गारंटी था। कर्जमाफी का नाममात्र को असर पड़ा। आमआदमी नंगा होने लगी थी।

मरना इतना दुखद नहीं होता जितना अपनी आंखों के सामने अपनी अगली पीढ़ियों का नैतिक आत्मघात। निजी सफलता के लिए आदमी का जीते जी गिद्ध मे बदल जाना।

Post – 2019-03-26

मुझे किसी ने मेसेज के रूप में एक वीडियो भी भेजा जिसे कारीगरी से तैयार किया गया है। इस दुस्साहस के खिन्न हो कर मुझे यह कटु टिप्पणी करनी पड़ीः
जिस चोर को रंगे हाथ पकड़ा गया हो, वह उस व्यक्ति को जिस से डर कर खुले हाथ, सरकार को इशारों पर नचाने वाले चोर जान बजा कर भागने लगे और उन्हें वहां से भी पकड़ लाने वाले चौकीदार को चोर कहने लगे तो इसे जनता नहीं मानेगी पर यह पहचान लेगी कि चोरों और ठगों के गिरोह में कौन कौन शामिल हैं। कलाकारी जितनी ही जोरदार होगी, फरेब करने की उनके कौशल को ही प्रमाणित करेगी। जनता झांसे में नहीं आती, चेहरे पहचानती है। कमीनगी को भी उनकी भाषा से भांप लेती है।

Post – 2019-03-24

हँसते हँसते मर गया वह आदमी
दर्द अनगिन फिर भी बे-आवाज थे।
दोस्तों को इतना खुश देखा न था।
जितने खुश हँसने पर उसके आज थे।।

Post – 2019-03-23

अंग्रेजी में चौकीदार पर पहले भी एक लेख पढ़ा था। आज एक इंडियन एक्स्प्रेस में है। अंग्रेजी पढ़ने वाले क्या अपने यथार्थ से इतना कट जाते हैं कि उन शब्दों का अर्थ तक न समझ सकें जिन पर लिखने का लोभ संवरण नहीं कर पाते? दोनों ने इसको ‘गार्ड’ माना जो निजी या लगभग निजी रक्षक होता है । हिं- चौकीदार/ प्रहरी/ पहरुआ, दरवान/द्वारपाल, त्राता/ -त्रा/-त्र/ संतरी, रक्षी/रक्षक/रखवाला के आशयों में इनके स्रोत और भूमिका के कारण अंतर है। अंग्रेजी में भी गार्ड, कीपर, वाचमैन, सेंटिनेल, प्रोटेक्टर, सेवियर की अर्थछटाएं अलग हैे।
चौकीदार/वाचमैन का पद पुलिस में सबसे छोटा होता है और उसकी जिम्मेदारी सबसे अधिक होती है। पर इस जिम्मेदारी में रक्षा करने की जिम्मेदारी नहीं है। उसके लिए अपेक्षित साधन उसके पास नहीं होते। उसका काम समाज को/ रक्षकों को, असावधान लोगों को सचेत करना है। हथियार के नाम पर सीटी। ।
इसमें सार्वजनिकता का भाव है जो अन्य पर्यायों में नहीं है। इसका इतिहास बहुत पुराना है।
कोई व्यक्ति लंबे समय तक पूरी तरह चौकन्ना नहीं रह सकता, यदि बैठा है या आराम की स्थिति में है तो शिथिलता से बच नहीं सकता इसलिए प्रहरी को तीन घंटे के बाद छुट्टी मिल जाती थी। अपनी बारी पूरी होने पर वह घड़ियाल पर चोट करता जिससे प्रहार> प्रहर> प्रहरी शब्द निकले हैं।
प्रत्येक जागरूक और ईमानदार व्यक्ति, पत्रकार, लेखक, सूजना के अधिकार का प्रयोग करने वाला अपने लिए चौकीदार शब्द का प्रयोग करे या नहीं, होता तो है। जहां वह रक्षक (गार्ड) बन कर कानून को अपने हाथ में ले लेता है वहाँ जो समस्या पैदा होती है इसके कारण वह गुंडा समझा जाता है।

Post – 2019-03-22

दिल तो अपना था, गौर से देखा
अजनवी क्यों लगा करे है अब?
पल झपकते नजर लगी किसकी
दुश्मने जां बना फिरे है अब।।