हमारी यह धारणा कि स्वतंत्र भारत पर अपने वंश का कब्जा करने की योजना के साथ पूरे परिवार को, अपने आवास सहित सौप दिया था, जिन तथ्यों पर आधारित है उनमें से एक यह है। जब दूसरे आजादी के लिए बलिदान दे रहे थे, तब नेहरू परिवार उसमें इनवेस्ट कर रहा था। शासन हमारे ही वंश का चलेगा, उस परिवार की जिद का प्रधान कारण यह है।
Month: December 2019
Post – 2019-12-29
आगे से उन इतिहासकारों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात नहीं करनी चाहिए जिन्होंने राज्यपाल के भाषण में हस्तक्षेप किया।
Post – 2019-12-26
सुना उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रामलला की एक लाख मूर्तियाँ एक लाख घरों में बँटवायेंगे। राम की बहुत ऊँची प्रतिमा बनवाएँगे। वह कई करोड़ लोगों को यह बताएँगे कि वह अभी तक मुख्यमंत्री न बन पाए आज भी महन्थ ही रह गए हैं। वह राम का अपमान तो है ही अपने खिलाफ भी प्रचार है। राम की प्रतिमा पर चिड़िया बीट करें, और सच्ची श्रद्धा के अभाव में मूर्तियाँ खिलौने के काम आएँ और बेकारी से परेशान युवकों में यह सन्देश जाए कि वह जनता की समस्याओं पर ध्यान न देकर जन धन की बर्वादी कर रहे हैं, अपने विरुद्ध प्रचार है।
Post – 2019-12-24
मुझे दोनों से डर लगता है। जब सोनियानीत कांग्रेस सरकार कहती है देश की परिसंपत्तियों पर अल्पसंख्यकों का पहला अधिकार है, जब उसकी सरकार कहती है इतने लाख के बैंक लोन की सुविधा केवल मुसलमानों के लिए है, जब वह कहती है ऐसा कानून लाएगी, जिसमें विवाद की स्थिति में बहुसंख्यक को ही दोषी मानकर जांच की जाएगी, और अपने अहंकार में जब यह भूल जाती है कि उसने संविधान को सैनिटरी नौपकिन बना रखा है, और यह संदेश दे रही है कि यह राज और संविधान हमारा है और हम इसको मनचाहा उलट-पलट सकते हैं, और अपनी नासमझी में हिंदुओं को यह याद दिला रही होती है कि धर्म के आधार पर हुए बँटवारे में यह देश तुम्हारे हिस्से में आया था, इस पर पहला अधिकार तुम्हारा है, तब वे लोग कोई आन्दोलन क्यों नहीं खड़ा कर पाते जिनको अपने हिस्से आए देश से भी निर्वासित किया जा रहा होता है।
इनकी निष्क्रियता के बावजूद जब जनता इन्हें अवसर देती है तो संविधान की मर्यादा का निर्वाह करने के बाद भी इनके उन आश्वासनों की पूर्ति के प्रयास को जो देश के विभाजन के समय उन हिंदुओं को दिये गये थे जिन्हें यमराज को यह कह कर सौंप दिया गया था कि वे जब भी अपने प्रति अन्याय होते देखें, भारत में शरण ही नहीं ले सकते हैं अपितु भारत सें उन्हें आधारभूत सुविधाएँ भी दी जाएँगी जिससे वे सम्मान के साथ जी सकें। तब यह बचाव की मुद्रा में क्यों आ जाती है।
मुझे डर उन प्राथमिकताओं से भी लगता है जिसमें गगनचुंबी मूर्तियाँ बनाना आर्थिक समस्याओं से अधिक जरूरी बना दिया जाता है।
डर सशक्त प्रतिपक्ष के अभाव से भी लगता है और उपद्रवी प्रतिपक्ष से भी।
Post – 2019-12-23
उपसंहार
एक लंबे समय तक मुझे ऐसा लगता रहा कि पश्चिम हमसे ज्ञान विज्ञान और तकनीकी में बहुत आगे चला गया है, इसलिए उसके अधिकारी विद्वानों द्वारा किसी भी विषय का विवेचन उच्च कोटि का और अधिक भरोसे का है। सामान्यतः यही धारणा हमारे समाज में सर्वमान्य सी हो चुकी है।
परंतु अपने अध्ययन और विमर्श के दौरान मुझे इस बात से आघात लगा कि उसके बहु प्रचारित विद्वान भी प्रस्तुति में जितने भी सुथरे क्यों न दिखाई दें, विश्लेषण में न तो उतने गहन हैं, न इतने ईमानदार कि उनकी निष्पत्तियों पर भरोसा किया जा सके।
इसके पीछे उनकी वर्चस्व की कामना है जिसके कारण वे सोच समझकर अपने लक्ष्य से मेल न खाने वाले तथ्यों को दरकिनार कर देते हैं, और असंभव को भी संभव बनाने का प्रयत्न करते हैं। जो भूमिका किसी वाद में एक कुशल वकील की होता है वही भूमिका ऐसे विद्वानों की होती है जो सूचना, ज्ञान और प्रविधि का रणनीतिक उपयोग करते हुए वर्चस्व प्राप्त करना या वर्चस्व की रक्षा करना चाहते हैं।
पहले मुझे यह भ्रम था कि यदि तर्क और प्रमाण के साथ किसी उलझी समस्या का समाधान कर दिया जाए तो वह सत्यान्वेषण का दावा करने वाले विद्वानों के बीच मान्य हो जाएगी। समझने में बहुत लंबा समय लगा कि वे अन्वेषी नहीं है, अंतिम सत्य पहुंचे हुए लोग हैं और उसकी पुष्टि के लिए केवल ऐसे अर्धसत्य जुटा रहे हैं जिनसे उनके मंतव्य की पुष्टि हो सके।
इसके लिए हम पश्चिम के नस्लवाद को दोष नहीं दे सकते, हमारे अपने समाज में ब्राह्मणों ने ज्ञान और संचार के साधनों का हजारों साल से ऐसा ही इस्तेमाल किया है। उनके विचारों का खंडन करने के बाद भी वे खंडन करने वाले को कोस कर, गालियां देकर, बदनाम करके, उसे विचार क्षेत्र से हटाने का प्रयत्न करते रहे हैं। पूरी तरह लाचार हो जाने के बाद हारे हुए मन से उसकी कुछ बातों को स्वीकार करके, अपनी पुरानी जिद को किसी दूसरे बहाने से कायम रखने की कोशिश करते रहे हैं।
ज्ञान पर एकाधिकार, दूसरों को जानने और सोचने के झमेले से मुक्त करना ऐसे वर्चस्व की नींव में होता है। यदि हम ब्राह्मणवाद के हथकंडों को समझते हैं, तो हम पश्चिमी वर्चस्व की चिंता को भी समझ सकते हैं।
वर्चस्ववादी उनके लिए भी सोचने का काम करता है जिनको वह अपने से हीन बनाए रखना चाहता है। ‘तुम नहीं जानते कि तुम क्या हो, हमें सब मालूम है. हम बताएँगे, तुम क्या हो, क्यों हो और क्या हो सकते हो।’ दुनिया के पिछड़े हुए देशों के पिछड़ेपन को शाश्वत बनाए रखने के लिए आज पश्चिम वही भूमिका निभा रहा है, जिसे ब्राह्मणों ने हजारों साल भारत में अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए निभाया था।
पश्चिमी जगत की ब्राह्मणवादी भूमिका के कारण, शेष दुनिया के सभी लोग दबे और सताए हुए लोगों की कोटि में आ चुके हैं। वे शिक्षा और ज्ञान के अधिकार के बल पर ही अपनी अस्मिता की रक्षा कर सकते हैं। पश्चिम की प्रभुता से बाहर निकलने का केवल एक रास्ता है, पश्चिमी ज्ञान पर भरोसा न करना, परंतु उनके द्वारा जुटाई गई सूचनाओं का विवेक के साथ उपयोग करना, उनके द्वारा दर दरकिनार की गई या ताड़ मरोड़ कर नष्ट की गई सूचनाओं का उद्धार करना और स्वयं अपने निष्कर्ष निकालना. न कि उनके निष्कर्षों से सहमत होना।
यह तभी हो सकता है, जब हम अपनी योग्यता का प्रमाण पत्र उनसे हासिल करने का मोह त्याग दें। पश्चिमी देशों में ख्याति प्राप्त करने वाले, उनकी योजना के सेवक बनकर ही ख्याति प्राप्त कर सकते हैं। प्रकारांतर से वे अपने ही देश के दुश्मन हैं। यह पहचान बहुत स्पष्ट होनी चाहिए।
केवल यह सिद्ध करके कि उनके अपने विचारों में अंतर्विरोध हैं, उनमें से कोई भी प्रकृत न्याय पर खरा नहीं उतरता, कि वे स्वयं जरूरत पड़ने पर अपनी स्थापनाओं को बदलते रहते हैं, और हमारे विचारों में कोई असंगति नहीं है, हम उन्हें कुछ समय के लिए कायल कर सकते हैं।
इसे कुछ विस्तार से समझना जरूरी है। विलियम जोंस ने यह माना था कि भाषा, देव शास्त्र, दर्शन, साहित्य और विज्ञान सभी के मामले में यूनान और भारत में इतनी समानताएं हैं कि ये सभी किसी एक स्रोत से से ही आई हुई हो सकती हैं। वह जानते थे कि भारत यूनान से प्राचीन सिद्ध होगा और उस दशा में यह स्वतः सिद्ध होगा यूनान में भाषा और संस्कृति भारत से ही गई है, उन्हें एक प्राचीनतर अवस्था की कल्पना करनी पड़ी, जिससे भारतीय दाय को नकारा जा सके।
इसके आगे विद्वानों ने किसी अन्य देश से, किसी लुप्त भाषा से मानक भाषाओं के जन्म की बात तो स्वीकार कर ली, परंतु सभ्यता के उत्कर्ष, दर्शन, विज्ञान और साहित्य की विरासत को मनमाने ढंग से मानते और नकारते रहे। वे अपने को सभ्य कहने वाले जनों को एक जाति में बदल कर असभ्य भारत में सभ्यता का प्रसार करने वाला सिद्ध करने लगे।
उनके दुर्भाग्य से भारत में एक ऐसी सभ्यता का पुरातत्व सामने आ गया जो हर दृष्टि से वैदिक सभ्यता के अनुकूल था जो इस बात का प्रमाण था कि अपने को सभ्य करने वाले सभ्यता की ऊंचाई पर पहुंचे हुए लोग थे और जिससे यह सिद्ध होता था कि वे यहीं के निवासी थे। सभ्यता का प्रसार भारत से हुआ था।
अब उस पूरी सभ्यता को ही अभारतीय सिद्ध करने के प्रयत्न किए जाने लगे। यह बताया जाने लगा कि वह सभ्यता अज्ञात कारणों से नष्ट हो गई थी और उसके नष्ट होने के बाद सभ्यता का प्रसार करने वालों का भारत में प्रवेश हुआ।
एक विशाल क्षेत्र में फैली सभ्यता के एकाएक नष्ट हो जाने की बात समझ में नहीं आ रही थी तो सभ्यता का प्रसार करने वाले उन्हीं आर्यों को दुर्दांत सभ्यता-द्रोही सिद्ध करके उसका विनाश करने वाला सिद्ध किया जाने लगा।
लेकिन भारत तो जबसे इसका इतिहास ज्ञात हैसभ्यता की ऊँचाई पर पहुंचा सिद्ध होता है। अब उन्हीं सभ्यताद्रोहियों को सि सभ्यता का प्रसार करने वाला भी सिद्ध किया जाने लगा।
कोई अपराधी भी इतनी बार अपने बयान नहीं बदलता जिस तरह के बयान इन विद्वानों के द्वारा बदले जाते रहे। कोई मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति इस हद तक बयान बदलने वालों की बात पर विश्वास नहीं कर सकता। हमारा पढ़ा-लिखा समाज इतना समझदार था कि उसने ऐसे हर बयान को सही मान लिया।
इतिहास की गलत व्याख्या हमारी चेतना को नष्ट करने का पुरातन तरीका है। जिसे हम वैज्ञानिक इतिहास कहते हैं वह एक ख्याल है। ऐसा इतिहास अभी लिखा नहीं गया। हमारे वर्तमान की अधिकांश समस्याएं इतिहास की गलत समझ से पैदा होती हैं। सूचना के अभाव में हमें इतिहास का जो आधा अधूरा ज्ञान होता है, वह उतना अनिष्टकर नहीं होता जितना सचाई को जानने के बाद, किसी लाभ के लिए उसे तोड़ मरोड़ कर पेश करने से उत्पन्न भ्रम से होता है।
इसलिए हमें पश्चिमी सूचनाओं का बारीकी से अध्ययन करते हुए, उनका स्वयं विश्लेषण करते हुए अपने निष्कर्ष पर आना होगा । सही इतिहास दूषित इतिहास से पैदा हुई व्याधियों का एकमात्र उपचार है।
Post – 2019-12-22
CAA का विरोध वे ही कर रहे हैं जो कल तक रोहिंग्या को मानवीयता के नाम पर नागरिकता देने के लिए हंगामा कर रहे थे। अवैध घुसपैठियों के हिमायती वैध शरणार्थियों को नागरिकता देने का विरोध कर रहे हैं। इनको कहाँ से क्या मिलता है जिससे इनकी खोपड़ी उल्टी हो जाती है।
Post – 2019-12-21
#इतिहास_की_जानकारी और #इतिहास_का_बोध (40)
भारोपीय भाषा का मिथक
हमने इस लेखमाला की 17वीं किश्त मैं लिखा था, “तुलनात्मक भाषाविज्ञान के जनक डच विद्वान बॉक्सहॉर्न (Marcus Zuerius van Boxhorn) थे जिन्होंने 1653 में ही जर्मन, रोमांस, ग्रीक, बाल्टिक, स्लाविक, केल्टिक और ईरानी की जननी के रूप में किसी एक ही आद्य-भाषा की परिकल्पना की थी। उसे जननी भाषा कहा जाए या अन्य भाषाओं पर छा जाने वाली अधिभाषा (सुपर स्टेटभाषा) यह विवाद का विषय हो सकता है। उन्होंने यह श्रेय सीथियन को दिया था। इसमें कुछ इकहरापन था। इसमें यह मानकर चला गया था कि जिन क्षेत्रों की भाषाओं की बात की जा रही है वे जनशून्य थे और एक भाषा इतने रूप लेकर उन उन देशों में पहुंच गई, जब कि वास्तविकता यह कि एक समृद्ध भाषा, उन्नत जीवन स्तर, और उत्पादन पद्धति अपना चुके लोगों ने नए क्षेत्रों की तलाश में उन प्रदेशों में प्रवेश किया जिनमें आखेटजीवी जनों का निवास था तो उन्होंने इनके तोर तरीको से प्रभावित हो कर आर्य भाषा और जीवनशैली अपनाई। उनकी अपनी भाषा की रंगत से इस एक ही भाषा ने अलग अलग बोलियों का रूप लिया।
यदि बॉक्सहॉर्न ने सीथियन की जगह मध्य एशिया की भाषा कहा होता, या यदि वह संस्कृत से परिचित रहे होते और इसका नाम लिया होता तो यह अधिक ठीक रहा होता। जोंस का विचार था की गोथ और हिंदू एक ही भाषा बोलते थे, I constantly assume that the Goths and the Hindus originally had the same language, gave the same appellations to the stars and planets, adored the same false deities, performed the same bloody sacrifices and professed the same reward and punishment after death. (8th Annivarsary Discourse) और उन्होंने रोमन और ग्रीक को इथोपिया और लेवंत के संस्कृत के प्रभाव में उत्पन्न भाषाएं माना था। उन्होंने फ्रीजियन पर भी भारतीय प्रभाव स्वीकार किया था और फ्रीजियन लघु एशिया के पश्चिमी भाग में बसे थे।(वही)।
इस लंबी चर्चा के अंत में हम उसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं जिस पर आज से 367 साल पहले बॉक्सहार्न और 250 पहले कुछ भटकते हुए विलियम जॉन्स पहुंचे थे। एक की नजर मद्धेशिया पर गई थी और दूसरे की लघु एशिया और लेवान की ओर। ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। जोन्स के शब्दों में रोमन और ग्रीक इन आव्रजकों की संतान (progeny of these migrants) हैं, जिसे कुछ सुधार कर कह सकते है कि ग्रीक और रोमन का सुपर स्ट्रेट संस्कृत का है, और इनकी आपसी भिन्नताएँ उनके अधस्तर अर्थात उनकी आंचलिक बोलियों के कारण है। यूरोप के भाषाई चित्र को वर्तमान रूप देने में दो केंद्रों का हाथ है। एक मध्येशिया और दूसरा एशिया माइनर जिसमें, इथोपिया में बसे भारतीय जनों की भूमिका भी मानी जा सकती है।
यदि हम इथोपिया को भी एक कारक मान लें तो इन तीनों में प्रमुख भाषा तत्कालीन बोलचाल की वैदिक है क्योंकि संस्कृत के जिस रूप से हम परिचित हैं वह अभी अस्तित्व में नहीं आई थी। इसमें अग्रणी भूमिका वैदिक स्वामी वर्ग की है जिनके संरक्षण में विविध पेशों से जुड़े हुए लोगों की अपनी बोलियाँ थीं । इसमें किसी तरह का संदेह नहीं है की एशिया माइनर और लेवंत में भारतीय भाषा बोलने वाले मध्य एशिया से पहुंचे थे। वे घोड़ों फँसाने, पालतू बनाने, और प्रशिक्षित करने और परिवहन के काम में लाने में दक्ष थे और अपनी इस योग्यता के कारण ही एशिया माइनर में अपनी धाक जमाने में सफल हुए थे।
ये मध्य एशिया में कहां से पहुंचे थे इसका निर्णय करना कठिन नहीं है सिंधी और अंध्रक पशुपालन में अग्रणी थे जिनके संरक्षक स्वामि वर्ग की मुख्य दिलचस्पी खनिज भंडारों नें थी। सिंधियों की छाप सिंताश्ता पर है तो अंध्रकों की एंद्रोनोवो पर । परंतु एंड्रोनोवो से यह भी प्रकट है कि पहले वे कहीं अन्यत्र भी बसे हुए थे। संभव है सिंधी और आंध्र दोनों एक ही क्षेत्र में कार्यरत रहे हो। इनकी संस्कृति को हम कुर्गान, सिंताशता-ऐन्द्रोनोवो समवाय कह सकते हैं। इनका सीधा प्रसार लिथुआनी, लैटवियन, स्लाव. गॉथ और केल्टिक पर दिखाई देता है। अपने समय की सीमाओं में बाक्सहार्न ने यूरोप की सभी भाषाओं का संबंध इस भाषाई परिवेश से ही नहीं जोड़ा था, बल्कि यह कल्पना भी की थी कि उसी से यूरोप सभी भाषाएँ और यहां तक कि ईरानी भाषा भी निकली है।
उनके मंतव्य में मामूली सुधार किया जा सकता है। इस पर हम बाद में आएंगे। जहां तक भाषाविज्ञान का प्रश्न है तुलनात्मक भाषा विज्ञान के जनक वही सिद्ध होते हैं। विलियम जोंस को बहुत सारी भाषाओं का ज्ञान था, परंतु बॉक्स हार्न की तुलना में वह कुछ पीछे रह जाते हैं। ऐसा लगता है कि वह बहुभाषाविद होते हुए भी अपने भाषाज्ञान का कूटनीतिक उपयोग कर रहे थे। यदि ईमानदार होते तो उन भाषाओं की परिधि में रह कर समाधान तलाशते, जिनमें उन्होंने ऐसी समानताओं को लक्ष्य किया था जो उन्हें सहजात प्रतीत होती थी, जिसका अर्थ था कि किन्ही परिस्थितियों में किसी एक ही भाषा का प्रसार उस विशाल क्षेत्र पर हुआ था, जिसे हम भारोपीय के नाम से जानते हैं।
ब्रिटेन के ग्लासगो विश्वविद्यालय के प्रख्यात दार्शनिक और भाषाविद डूगल्ड स्टीवर्ट ने एक भाषा से उत्पन्न संतानों की मान्यता को चुनौती देते हुए कहा था कि एक जननी भाषा की संतानों में इस तरह के संबंध नहीं हो सकते जो भाषा विज्ञानियों द्वारा सुझाया जा रहा है। इस तरह की समानता केवल तभी हो सकती है जब एक ही भाषा दूसरे क्षेत्र में प्रचलित हुई हो। यह दूसरी बात है कि उन्होंने यह मानते हुए कि भारत का यूरोप से कभी कोई संबंध दिखाई नहीं देता जबकि सिकंदर ने भारत तक के भूभाग पर अधिकार किया था, इसलिए यह माना कि भारत के धूर्त ब्राह्मणों ने ग्रीक की नकल पर एक नई भाषा गढ़कर तैयार कर ली है, उनकी झक को दरकिनार कर दें, तो पूरा भाषाई चित्र उपस्थित हो जाता है।
इसका सीधा निष्कर्ष यह कि भाषाओं का वंश नहीं होता। उनकी जैव सत्ता नहीं है, वे सामाजिक निर्मिति हैं। जो नियम सामाजिक संस्थाओं पर लागू होते हैं वे ही नियम भाषाओं पर लागू होता है। इसलिए भाषापरिवार की अवधारणा गलत है, भाषा समुदाय या भाषाई भूगोल अधिक सही अवधारणा है।
यही कारण है कि पिछले 200 साल से लगातार उस जननी भाषा की खोज करते हुए विद्वानों के हाथ कुछ न लगा। वे उसे गढ़ कर तैयार करने लगे। इस क्रम में हमारे हाथ कुछ भी न लगा हो ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। परंतु वह भाषाई आनुवंशिकी के रूप में नहीं है। तुलनात्मक अध्ययन में उसकी उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। परंतु आदिम भाषाओं की खोज और उनके विघटन से पैदा हुए परिवारों की अवधारणा वास्तविकता से बहुत दूर है।
पश्चिमी समाज को प्रमाणों से किसी किसी ऐसी सचाई का कायल नहीं किया जा सकता जिससे उसके सनातन वर्चस्व को चुनौती मिलती हो। इसलिए उनके द्वारा फैलाए गए जंजाल से बाहर निकलने की जिम्मेदारी हमारे अपने इतिहासकारों की थी। कारण कोई भी हो, वे अपने कर्तव्य के निर्वाह में विफल रहे और उन पाश्चात्य विद्वानों से अपने अपनी योग्यता का सनद हासिल करने के लिए उत्सुक रहे जिससे भारतीय समाज को अपनी असाधारणता से आतंकित कर के ऊंची कुर्सियां प्राप्त सकें। गुलामी लादी भी जाती है, गुलामी चुनी भी जाती है। लादी हुई गुलामी को फेंकने के बाद, हमने मानसिक गुलामी को स्वयं आगे बढ़कर स्वीकार किया।
सूचना के स्रोतों का अभाव हमारे देश में है। उनके यहाँ सब कुछ उपलब्ध है, पुस्तकालयों की जो सुविधा पश्चिमी जगत में है, उसकी हम कल्पना नहीं कर सकते। पुस्तकालय का कोई सदस्य दुनिया की कोई किताब पढ़ना चाहता हो तो वह उसकी मांग पर पूरे देश में जहां कहीं भी हो, वहां से मंगा कर उसे सूचित किया जाएगा। अनुसंधान की प्रविधि उनकी हमसे बहुत उन्नत है, इसकी आदत छोटी कक्षाओं से ही डाला जाता है जो उनके संस्कार का हिस्सा बन जाता है। हमने साधनों के अभाव में काफी जानकारी विकीपीडिया के माध्यम से जुटाई है, जिसका अर्थ है ये जानकारियाँ सार्वजनिक हैं। फिर भी उसी विकीपीडिया पर हम आज भी आर्य और भारोपीय और उनके आदिम निवास पर लेख पा सकते हैं जिससे लगे कि इतिहास का कूड़ा और इतिहास का सच एक साथ एक ही भाव बिक रहा है और लोग अपनी अपनी पसंद का इतिहास खरीद कर अद्यतन जानकारी का दावा कर रहे हैं।
Post – 2019-12-19
तात्कालिक लाभ दूरगामी अहित में बदलने जा रहा है। इसकी चिंता जिन्हें होनी चाहिए उन्हें ही नहीं है। लोकतंत्र और संविधान और न्यायतंत्र को भीड़तंत्र के हवाले कौन कर रहा है? अपने ही बनाए कानून का उल्लंघन कौन कर रहा है? न्यायिक विकल्प की उपेक्षा कौन कर रहा है? तानाशाही को कौन आमंत्रित कर रहा है?
Post – 2019-12-19
हमारी समझ में नहीं आता लोग चाहते क्या हैं।
Post – 2019-12-18
#इतिहास_की_जानकारी और #इतिहास_का_बोध(39)
सच को दबाया जा सकती है पर मिटाया नहीं जा सकता
मितन्नियों को कीलक लिपि में मितैनी, हनीगलबात, खनीगलबात, नहरीन आदि कई रूपों में अंकित किया गया है या कहें दूसरे उन्हें अपनी समझ से अलग-अलग नामों से पुकारते थे। परंतु वे अपने को कुरु/उरु कहते थे।[1] हनीगलबात/खनीगलबात से लगता है पहले उनकी विशेष रुचि खनिज भंडारों में थी और पशुपालन में रुचि रखने वाले समुदायों को संरक्षण भी इन्हीं से मिलता था।
[1] Mitanni (/mɪˈtæni/; Hittite cuneiform KUR URUMi-ta-an-ni; Mittani Mi-it-ta-ni), also called Hanigalbat (Hanigalbat, Khanigalbat, cuneiform Ḫa-ni-gal-bat) in Assyrian or Naharin in Egyptian texts, was a Hurrian-speaking state in northern Syria and southeast Anatolia from c. 1500 to 1300 BC.
मितन्नी नाम मिस्री के लोगों ने इस आधार पर दिया था, कि वे अपने मित्र देश से संपर्क साधे रहते थे। यह सीधे भारत से या सिन्तास्ता या पुंत के माध्यम से उनके संबंध का द्योतक है। हित्तियों से इनका तनाव रहता था जिसे दूर करने के लिए हित्ती राजा सुप्रियम् [क] (Suppiluliuma) और मितन्नी राजा सातिवाज (Shattiwaza) के बीच एक संधि लगभग. 1380 BC में हुई थी, जिसमें साक्षी के रूप में वैदिक देवों (मित्र, वरुण, इन्द्र और नासत्या) का नाम आया था। इसका उल्लेख हम पहले कर आए हैं। हित्तियों से उनकी प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी।
अपने उत्कर्ष काल में इनका इतना दबदबा था कि मिस्र भी इनसे से खतरा अनुभव करता था, और इसके लिए उसको हित्ती राजा से संधि करना पड़ा था। हित्तियों के उत्कर्ष के दौर में उनसे मितन्नी और मिस्र दोनों को खतरा अनुभव होने लगा तो इनकी आपस में भी सन्धि हुई । इसका ही एक परिणाम था मिस्र के राजा अमेन्होतेप से त्वेषरथ की पुत्री तदुखेपा का विवाह संबंध, जिसके मरने के बाद यह अखनातेन की पत्नी बनी थी। अखनातेन के पिता ने बधू शुल्क के रूप में त्वेषरथ को उनकी और उनकी पुत्री की सोने की प्रतिमाएँ देने का वादा किया था, परंतु अखनातेन ने सोने के पत्तर चढ़ी लकड़ी की प्रतिमा भेजी थी, जिसकी शिकायत करते हुए त्वेषरथ ने कई पत्र लिखे थे। संभवतः अपनी पत्नी के असर में ही अखनातेन सूर्योपासक बना था।
चौदहवीं शताब्दी ई.पू. में इन्होंने फरात की सहायिका खाबर नदी के तट पर या उसकी किसी सहायिका वसु के किनारे वसुकन्नी Washukanni, संपदा की खान, नाम से राजधानी बनाई । Washukanni (also spelled Waššukanni or Vasukhani) was the capital of the Hurrian kingdom of Mitanni, from around 1500 BCE to the 13th century BCE. … Its etymology in Sanskrit, which was used by the Mitanni, is “Vasukhani”, वसुखानी, the “mine of wealth” as the Vasu are the gods who are wealth-givers. इनकी राजधानी पर दो बार संकट आया था। पहली बार हित्ती राजा सुप्रियम् की ओर से और दूसरी वार असीरियनों की ओर से जिसमें उन्हें हार का मुँह देखना पड़ा ।
हमने पहले [भारतीय परंपरा की खोज, 2011, पृ. 112-140] कुछ विस्तार से यह दिखाया है कि विदेशों मे वैदिक व्यापारियों के जो अड्डे थे उन्हें स्वर्ग कहा जाता था। परन्तु उस समय तक मेरा ध्यान उनके द्वारा सत्ता पर अधिकार की ओर नहीं गया था। उनकी बस्तियाँ सुरक्षा पर ध्यान देते हुए प्राकार वेष्ठित होने के कारण अलका (अलंकृत) कहलाती रही होंगी, अब यह सोचना पड़ता है कि इन्द्रलोक की अवधारणा वहाँ से आरंभ होती है जहाँ वे साम्राज्य स्थापित कर लेते हैं और उनकी राजधानी को ही इन्द्रपुरी, या कहा जानो लगा होगा। अपनी सत्ता पर संकट आने पर वे ही स्वदेश के साहसी राजाओं से सहायता की गुहार लगाते रहे होंगे।
इस दृष्टि से साकेत/ कोशल दूसरों का अपेक्षा अधिक प्रतापी प्रतीत होते है। इसका एक कारण यह है कि जिस दौर में अनातोलिया में भारतीय भाषा बोलने वालों का प्रवेश हुआ था, वह प्राकृतिक प्रकोप का दौर था। इसके कारण कुरु पांचाल और आगे का क्षेत्र दुर्भिक्ष की स्थिति में थे, जबकि कौशल पर इसका प्रभाव उतना नहीं था। हमने पीछे रघु की जिस विजय का हवाला दिया है, वह भी किसी ऐसे ही संकट से संबंध रखता हो सकता है। स्वयं दशरथ के साथ भी इंद्र की सहायता के लिए जाने की कहानियां जुड़ी हुई हैं। इन कहानियों से दशरथ और राम के काल-निर्धारण में कुछ मदद मिल सकती है।
उपनिवेश विस्तार में कुरुओं की पहल दिखाई देती है। मितन्नी के नामकरण में कीलक लिपि में लिए कुरु/उरु जैसा प्रयोग मिलता है।
पश्चिमी समाज धर्म का प्रसार भी केवल शस्त्र के बल पर करता रहा है। वह मानता रहा हैं, कि कोई भी परिवर्तन केवल शस्त्र बल से संभव है और इससे बाहर मार्क्स भी नहीं आ सके थे। इसलिए भाषा और संस्कृति के प्रसार के मामले में भी विजय को एक अनिवार्य घटक मानता रहा है। शस्त्र बल से लोगों को बंदी बनाया जा सकता है, उनकी चेतना को नहीं बदला जा सकता। उसके लिए सांस्कृतिक श्रेष्ठता की धाक जरूरी है।
अनातोलिया में पहुंचने वाले आर्यभाषी ठीक उसी चरण पर नहीं पहुंचे थे जिससे उनके अभिलेखीय प्रमाण मिलने लगते हैं, या कहें, जब से उनकी श्रेष्ठता सत्ता में परिवर्तित हो जाती है। पहले वे सिंतास्ता/आन्द्रोनोवो में जमे हुए थे। उनकी रुचि अश्व व्यापार में थी। अनातोलिया से उनका यह संपर्क लगभग 2000 ईसा पूर्व में आरंभ हुआ था। इस से पहले अनातोलिया का अर्थतंत्र असीरियनों के अधिकार में था। संभवतः उनका सारा कारोबार उनके माध्यम से चलता रहा। उनके तंत्र को समझते हुए, इन्होंने उनको प्रतिस्पर्धा में पछाड़ दिया ।
दो बातें तय हैं जिन पर किसी को आपत्ति नहीं। एक यह कि अश्वपालन आर्यभाषा भाषियोंं ने किया। और यह कि अरायुक्त पहिए के आविष्कारक भी वे ही थे। जिस बात को ऐसी चर्चाओं मे स्थान नहीं दिया जाता, वह है यह तथ्य कि वेद में जिन रथों का उल्लेख है उनमें बैलों और गधों को जोता जाता था? अरायुक्त पहिए के आविष्कारक असुर या वरुण उपासक भार्गव थे। सिंताश्ता मद्येशिया में लंबे प्रतिरोध के बाद अश्वव्यापारियों के प्रभाव या अधिकार क्षेत्र में आने वाले भाग की पहचान बनी। इनमें पहल के दो रूप थे, एक पशु-व्यापार और दूसरा खनिज भंडारों का दोहन। दोनों का नियंत्रण नगरसेठों के हाथ में था जब कि कार्यभार विशेषों के हाथ में। रथ और घोड़े का पश्चिम एशिया में भार्य भाषियों के प्रवेश के साथ होता है, और इस मामले में इनकी अग्रता ही संख्या में कम होने के बाद भी इनके वर्चस्व का और फिर सत्ता पर अधिकार का कारण बनता है।
इतिहास का उल्टा पाठ पढ़ाने वालों ने भी स्वीकार किया है कि लघु एशिया पर प्रभुत्व कायम करने वाले मध्येशिया के ठीक उसी क्षेत्र (कुर्गान, सिन्ताशता / आन्द्रोनोवो ) से वहाँ पहुँचे थे जहाँ से उन्हें भारत की ओर बढ़ते हुए दिखाया जाता रहा है। वहीं अरायुक्त पहिए के सबसे पुराने अवशेष भी मिले हैं जो 2000 ई.पू. के हैं। भारत में ऋग्वेद के कवि अरायुक्त पहिए से परिचित थे। वे अपरिचित हो ही नहीं सकते थे क्याेकि ऋग्वेद तो पाँच सौ साल पुराने पहिए का अवशेष नहीं मिलता। जाहिर है कि पुरातत्व की अपनी सीमाएं हैं। वह साहित्यिक प्रमाणों का निषेध नही करता। साहित्यिक प्रमाण यह है कि लघु एशिया में पहुँचने वाले आर्य भाषा भाषी निश्चित रूप में मध्येशिया से वहाँ पहुँचे थे परन्तु मध्येशिया में वे कहाँ से पहुँचे थे, पूर्व से या पश्चिम से. भारत से या भारत की ओर बढ़े थे। इसका उत्तर हुर्री मे बचे रह गए घोड़ों के रंग के लिए बची रह गई शब्दावली है, जिसमे बभ्रु, पलित और पिंगल का प्रयोग हुआ है जो भारत से बाहर की किसी भाषा में नहीं पाया जाता। मितन्नी में योद्धा ले लिए मर्त्य का प्रयोग होती था जो वैदिक प्रयोग है। हम इन बातों का हवाला यह सिद्ध करने के लिए नहीं दे रहे हैं कि आर्यों का, या कहें आर्य भाषा भाषियों का मूल निवास भारत ही था। हम उस धांधली को सामने लाना चाहते हैं, जिसके चलते सब कुछ जानते हुए पर्दा डालने के लिए तरह-तरह की युक्तियां भिड़ाता रहा ।
ईरान में तो यह सखामणि (हख्मनी) कुरुवंशी थे, मितन्नी का मित्र नाम भले ही मिस्रियों ने दी हो पर अर्थ तो वही मित्रशिरोमणि है।
ल्युबोत्स्की ने 55 शब्द ऐसे छाँटे थे जिनको ध्वनिगत और रूपगत आधार पर संस्कृत और ईरानी में आरखने क् ियात किया गया है और जिसके आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि मध्य एशिया, बैक्ट्रिया मरगियाना समवाय की भाषा पंजाब में आज बोली जाने वाली भाषा से मेल खाती हैं और इसलिए हड़प्पा से इनका संबंध हो सकता है, पर इसे नकार दिया गया जब कि यह इस बात का प्रमाण है कि वैदिक बोलचाल की भाषा ही पड़प्पा की भाषा थी।
इसे अस्वीकार इसलिए कर दिया गया कि हड़प्पा से इस का कोई संबंध नही जब कि दबाने या किनारे डालने के बाद भी सचाई सामने आ ही जाती है।