Post – 2015-11-30

गए वक्तों के हैं ये लोग इन्हें कुछ न कहो

“प्यारे भाई, तूने कल तो नेहरू को रसातल में पहुँचा दिया, मगर यह तो बताओ, हिन्दुस्तान में एक आला दिमाग तू ही पैदा हुआ है जिसे इतना कुछ दीख गया, पर वह न दीखा, जिसके कारण लोग नेहरू की पूजा करते थे। वे सभी लोग, जिनमे विद्वान, कवि, कलाविद, यहाँ तक कि विरोधी दलों के लोग भी थे, नेहरू का आशीर्वाद पाने को लालायित रहते थे। जानते हो, तुम्हारे वाजपेयी को नेहरू का एक आशीर्वचन मिल गया तो वह संघ और जनसंघ और भाजपा में रहते हुए भी उससे ऊपर उठा अनुभव करते थे। तुमने इतने महान युग पुरुष को कूड़ेदान में डाल दिया और खाक से एक पुतले को उठाकर सातवें आसमान पर चढ़ा दिया।”

“खाक के पुतले तो हम सभी हैं, भाई। अगर तुम मानते हो नेहरू खाक के पुतले नहीं थे तो इससे कठोर टिप्पणी क्या हो सकती है। सातवें आसमान की बात तो करो ही नहीं, उसका भूगोल तो इतना गड़बड़ है कि वह भूतल और रसातल अर्थात् अंडरवल्र्ड तक में फर्क नहीं कर पाता। तुम जिनके साथ हो वे समझते थे और उसका उपयोग भी करते थे। आज भी करते हैं। उनकी राजनीति ही अंडर हैंड और अंडरवर्ल्ड के भरोसे चलती है।

“तुम पहले यह बताओ कि नेहरू क्या उतने गए बीते थे जितना तुमने दिखा दिया?”

“नहीं भाई, कुछ खास तरह की योग्यताएँ कुछ खास तरह की अयोग्यताएँ पैदा करती हैं। नेहरू कवि मनस्क थे। साहित्यिक मिजाज था। कुछ शायरों से प्रधानमन्त्री होने के बाद भी उनका संबन्ध दोस्ताना था। जोश के साथ तो सुनते हैं तू-मैं वाली आत्मीयता थी। इस निकटता के बाद भी असुरक्षा की भावना जोश की चेतना में घुली हुई थी और नेहरू के लाख मनाने के बाद भी वह पाकिस्तान चले गए। सुनते हैं वहाँ उस सर्वहारा के पक्ष में शायरी करने वाले को सरकार ने सौ रिक्से दिलवा दिए। ‘शायरे इन्क़लाब! अब उसी शोषण पर पलो’, और वह अपनी बेहुरमती पर रोते भी रहे पलते भी रहे और हो सकता है भारत में गुज़ारे दिनों को याद भी करते रहे हों। लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होंगे।“

“खैर भारतीय मुसलमान के मन से असुरक्षा की भावना को दूर किया ही नहीं जा सकता। वह उसने अपनी ही चूक से पैदा की और कोई दोष न भी दे तो उसकी चेतना से मुक्त होना संभव नहीं। हम जिन दुखद समृतियों से मुक्त होना चाहते हैं उन्हें भी भुला तो नहीं पाते और यदि भुला बैठे तो वे अवचेतन में ग्रन्थि बन कर और भी उपद्रवकारी रूप ले लेती हैं। तुम्हें याद होगा, क्रिकेट मैचों पर उन दिनों पाकिस्तान के जीतने पर मुस्लिम दर्शक अधिक तालियाँ बजाते थे। ‘हँस के लिया है पाकिस्तान लड़ कर लेंगे हिन्दुस्तान’ के नारे भी तभी अधिक लगते थे। खून की नदियां बहा देंगे की धमकियां भी तभी अधिक आती थीं और इनके अनुपात में ही असुरक्षा भी बढ़ती जाती थी. कहो, नेहरू के दौर में मुसलमान भारत में अधिक असुरक्षित अनुभव करता था। ताजी ताजी यादें थीं।
फिर जब पता चला कि पाकिस्तान जाने वालों की हालत तो और बुरी है, कि पाकिस्तान को अपना देश मान कर वहाँ जाने वाले आज तक मुहाजिर या शरणार्थी की बने रह गए हैं, कि जिस उर्दू को अपनी जबान मान कर पाकिस्तान बनाया, उसकी सरकारी जबान कहने को उर्दू हुआ करे, काम काम अंग्रेजी में ही होता है, कि उर्दू मुहाजिरों की ज़बान है, पंजाबी अपनी, सिंधी अपनी, बलूची अपनी, और सिराइकी अपनी जबान को अधिक प्यार करता है, फैज़ भी आखिरी दिनों में उर्दू छोड़ पंजाबी में लिख कर पुराना पाप धोने लगे थे, उर्दू के ज़ेर जब्र और ऐन गै़न का निर्वाह न कर पाने के कारण मुहाजिर दूसरों को जिस हिकारत से देखते हैं उससे बिदक कर वे उर्दू से चिढ़ते हैं, कि सिन्धी मुसलमान जीये सिन्ध देश के नारे लगाता है, जिन्दाबाद नहीं, जीये, और वतन या मुल्क नहीं देश, और फिर जब पता चला कि अल्पमत में होते हुए भी वे वोट बैंक बन कर सभी को नचा सकते हैं और मनचाही रियायतें पा सकते हैं या पाने के ख्वाब देख सकते हैं, तब धीरे धीरे असुरक्षा की भावना कुछ कम हुई और आत्मविश्वास बढ़ा। लेकिन हाल के उद्गारों से लगा गया नहीं है और जिनकी राजनीति उनकी असुरक्षा पर ही पनपती रही है वे सभी दल असुरक्षा आई असुरक्षा आई का नारा लगाने लगे है.”

“मैं तुमसे नेहरू पर बात करने को कह रहा हूँ और तुम कहाँ बहक गए?”

“मैं नेहरू पर ही बात कर रहा हूँ। नेहरू ने इस असुरक्षा भाव को और बढ़ाया था और यह भ्रम पैदा करने में सफल हुए थे कि मुसलमान उन्हीं के कारण सुरक्षित हैं इसलिए मुस्लिम वोट बैंक, दलित वोट बैंक तैया र करने में तो सफलता पाई ही थी, उनके नाम के साथ पंडित को बोल्ड अक्षरों और बोल्ड आवाज में लगाते हुए एक ब्राह्मण लाबी या ब्राह्मण वोट बैंक तैयार हुआ था। हिन्दुओं में शिक्षा की दृष्टि से ब्राह्मण सदा से आगे रहे हैं और पद और अवसर का अनुपात से अधिक लाभ उन्हें ही मिला है। इन सबसे लिए नेहरू हारिल की लकड़ी बन गए थे।

“अपनी प्रतिभा, अभिरुचि, कलाप्रेम, साहित्यकारों और प्रबुद्ध भारतीयों से अच्छे संबंध, पत्रकारों के बीच अपनी लोक प्रियता आदि के कारण वह प्रचार के सभी स्रोतों के लिए शिखर-पुरुष थे, और फिर एक नया भारत बनाने का उनका अपना सपना भी था जो ससाधनिक कम और प्रसाधनिक, कहो कास्मेटिक, अधिक था। कुछ उम्दा इमारतें, नई संस्थाएँ, पर वे भारत की जमीनी आवश्यकताओं को देखते कम नहीं थी। फिर उनका उनके जीवन काल में कोई विकल्प तो बन नही पाया, जिसकी प्रशासनिक क्षमता से उनकी तुलना की जा सके। पटेल अधिक समय तक जीवित न रहे, और दूसरे व्यक्ति जो हम जैसे बहुतों की नजर में नेहरू से अधिक योग्य प्रधान मंत्री सिद्ध हो सकते थे, रफी अहमद किदवई, उनको भी अवसर तो उन परिस्थितियों में मिल ही नहीं सकता था, फिर उनका निधन भी हो गया। जहाँ प्रचार के सभी साधन उपलब्ध हों और बैंक के इतने खाते मतदाताओं के बीच हों, वहाँ उनकी पूजा तो होनी ही थी।

“परन्तु कलाप्रेमी अच्छे प्रशासक नहीं सिद्ध हुए हैं। निकट की मिसाल बहादुरशाह जफर और वाजिद अली शाह और दारा शुकोह हैं और कुछ दूर के भोजराज और भर्तृहरि। भर्तृहरि को तो वैराग्य ही लेना पड़ गया था। कल्पना विलास यथार्थ को भी काल्पनिक बना देता है और वे जमीनी समस्याओं के हवाई समाधान तलाशने लगते हैं।“

“तुमको यह क्यों नहीं दिखाई देता कि स्टील उत्पादन के बड़े कारखानेे, विद्युत आपूर्ति के बैेराज और डैम और आधुनिकीकरण की पहल नेहरू ने की।”

“इस पर बहस हो सकती है कि बड़े उद्योंगो की जगह छोटे उद्योगों और छोटे संयन्त्रों के विकास से मानव संसाधनों का भरपूर उपयोग करने के बाद अतिरिक्त ऊर्जा और साधनों की जरूरत के अनुसार आगे बढ़ना अच्छा रहा होता, या राष्ट्रीय पूँजीवाद को विकास का भरपूर अवसर दे कर, समाजवादी सपने को कुछ समय तक स्थगित रखना । इसकी योग्यता नहीं, परन्तु उनके किये का लाभ सन्तोषजनक न रहा। दूसरे, हमसे पिछड़े और अल्पविकसित अधिरचना वाले देशों की तुलना में बात कर रहा हूँ। परन्तु एक जमीनी सचाई पर आओ।”

वह प्रश्नाकुल आँखों से मेरी ओर देखने लगा.

“नेहरू के समय में आरंभ से ले कर अन्न की समस्या रही जो आरंभ के वर्षों में बहुत विकट थी। वास्तविक से अधिक कृत्रिम और उससे निपटने के लिए कोटा-परमिट-सप्लाई विभागों की बदइन्तजामी से जिसे आपूर्ति विभाग सौंपे जाने के बाद किदवई ने जादू की छड़ी से खत्म कर दिया था। परन्तु नेहरू कृषि उत्पाद की दिशा में कोई जमीनी कदम उठाने में विफल रहे। अमेरिका शान्ति-सहयोग योजना के पी. एल. 480 के तहत घटिया गेहूँ की आपूर्ति कर रहा था। इस गेहूँ में गाजर घास (बवदहतमेे हतंेे) के बीज भी मिले होते थे जिसके दाने बिखर जाने पर यह दूसरी वनस्पतियों, यहाँ तक कि घास पर भी इतनी भारी पड़ती है कि खेती को बर्वाद कर दे। अमेरिकी तन्त्र अपना बाजार तैयार करने के लिए हमारी कृषि को ही नष्ट करने पर तुला था। अमेरिकी विशेषज्ञ सलाह देते थे कि भारत खाद्यान्न के मामले में कभी आत्मनिर्भर नहीं हो सकता इसलिए उसे अमेरिका से अच्छे संबन्ध बना कर रखना चाहिए। शास्त्री ने सत्ता सँभाली तो पाकिस्तानी आक्रमण का भी सामना करना पड़ा। सैन्य तैयारी भी लंगड़ी लूली ही थी, परन्तु पाकिस्तान के लिए भारी थी। अमेरिकी टैंक भी ढेर हो गए। इसके साथ ही उन्होंने जै जवान जै किसान का नारा दिया अर्थात् सैन्य और कृषि क्षेत्र पर समुचित ध्यान दिया और देखते देखते भारत कई गुना जनसंख्या के होते हुए भी अन्न के मामले में सरप्लस हो गया।

परन्तु जिस चीज की नेहरू से लेकर बाद तक कमी रही वह थी राष्ट्र निष्ठा. आत्मनिष्ठा की प्रबलती और राष्ट्र निष्ठा का अभाव। सब कुछ अपनी मुट्ठी में करने की झक में बहुत कुछ बर्वाद कर देने और देश को विपन्न बनाए रखने की नैतिक गिरावट। इस सरप्लस उत्पादन के लिए किसानों को समुचित मूल्य दिए बिना इतना अधिक खरीद लेना कि उसका भंडारण तक न किया जा सके, उसे सड़ा कर औने पौने भाव पर शराब कंपनियों को बेच दिया जाय और फिर कृत्रिम अभाव पैदा करके उससे दूने मूल्य पर खाद्यान्न का आयात करते हुए कमीशन खाया जाय।”

“तुम झूठा आरोप लगा रहे हो।“

”हो सकता है हिन्दू में प्रकाशित एक समाचार कथा की इन पंक्तियों से तुम्हें बात समझ में आ जायः
Hindu, Jul 20, 2007
Wheat import
“The Government was importing wheat at $ 317 – $330 a tonne in July 2007, while Indian farmers were only paid Rs.8,500 a tonne, which is less than $200 a tonne. And it is not the case that Indian farmers are not growing enough wheat to feed the people of India. This is a decision that will aggravate the food insecurity of the poor in India and undermine the country’s food sovereignty, is being presented as a step that will protect our food security.”
“The high cost of wheat import makes no political sense, because it threatens our food sovereignty. It makes no economic sense because there is no domestic scarcity and the imported wheat is more costlier than domestic wheat. And it makes no sense in terms of health and nutrition because the imported wheat is of inferior quality. Instead of importing high-cost, low-quality wheat the Government should be procuring wheat domestically to secure farmers’ livelihood, national food security and the food rights of the poor to safe and affordable food,” she said.
राष्ट्र निष्ठा की जो कमी विरल अपवाद को छोड़ कर पूरे कांग्रेसी और गैर कांग्रेसी प्रशासनों के दौरान बनी रही, जो ही ‘सब- कुछ-मेरे-लिए, ‘मर गया देश, जिन्दा रहे हम’ वाली मानसिकता की जननी बनी, और जिसके कारण ही राष्ट्र का नाम आते ही तुम्हें कँपकँपी आ जाती है, उसे दूर करने वाला नेतृत्व तुम्हें पहली बार मिल रहा है और इसमें ही अडंगे लगा कर तुम पहली वाली दशा में लौटने को आतुर हो।

Post – 2015-11-29

“हाँ, अब शुरू करो अपना मोदीनामा ।“

“मै ऐसा कुछ नहीं बता सकता जो तुम्हे पहले से मालूम नहीं। सिर्फ यह याद दिला सकता हूँ कि तुम्हारा प्रचार-तंत्र उसके किए पर परदा डालता रहा और काल्पनिक या मनोवैज्ञानिक मुद्दों को अनावश्यक तूल इसलिए देता रहा है कि लोगों का ध्यान उधर से हटाया जा सके। हैरानी इस बात की है कि तुम जैसे पढ़े लिखे लोग भी इतने उदासीन हो चुके हैं कि उनकी याद दिलाओ तो उसे प्रशस्तिगान कहने लगते हैं। देखो पहले भी कह चुका हूँ मोदी का जिक्र तो हमारी बहसों में आएगा ही।

“एक बात और बता दूँ, मोदी स्वतंत्र भारत का सबसे महान प्रधान मंत्री है.”

“नेहरू से भी बड़ा?” वह हंसने लगा.

“नेहरू ने देश को तोड़ा, पटेल ने देश को जोड़ा. शास्त्री को मौक़ा मिला होता तो बिखराव को रोकते. यह काम दूसरे किसी के वश का नहीं था. मोदी में जोड़ने की दृष्टि भी है, संकल्प भी है और इस दिशा मैं उसने पहल भी की है. नेहरू को न तो देश ने समझा न ही नेहरू ने इस देश को समझा. नेहरू जिसके सगे लगते थे उसका भी उन्होंने अहित ही किया. अपनी जिस बेटी को वह इतना प्यार करते थे उसका घर परिवार इस महत्वाकांक्षा के चलते की भारत का राज नेहरू परिवार से बाहर न जाने पाये, तबाह कर दिया. दामाद फ़्रस्ट्रेशन में शराबी और शिथिल कटिबन्ध बना दिन काटता रहा और असमय कालकवलित हो गया. जिस उत्तर प्रदेश के थे वह उनके पूरे शासन काल में उपेक्षित रहा और उनकी करनी से ही वह भूभाग जो युगों से देश का ह्रदय या heartland माना जाता था वह गोबर पट्टी में बदल गया. जिस कश्मीर से उनका नाभि नाल जुड़ा था उसकी सारी समस्याएं उनकी पैदा की हुई हैं, जिस पंडित कुल के थे उनकी दुर्गति के हज़ार किस्से हैं पर उन्हें सुनने वाला कोई नही. पहली बार उधर निगाह गई है तो मोदी की. जिस शेख अब्दुल्ला से उनका भाई जैसा प्रेम था उनको अपनी किन्ही नीतियों से इतना खफा कर दिया कि उनका मन सरहद के पार भागने लगा था. उसे संभालने की जगह सीधे जेल मैं डाल दिया और एक कूटनीतिक समस्या को घर फूँक तमाशा बना कर रख दिया. अपने को उदार दिखाने के लिए एल्विन वेरियर को आदिवासी कल्याण योजनाओं का काम सौप कर और नागालैंड में ईसाइयत के प्रचार की खुली छूट देकर उ से नागालैंड से बागी देश बना दिया और पूरे उत्तर पूर्व को इतना भारत विमुख बना दिया कि उसे फ़ौज़ से नियंत्रित किया जाने लगा. लोकतंत्र के उपासक ने केरल में चुनी हुई नंबूदरी सरकार को इसलिए गिरा दिया कि इससे कम्युनिज्म रुक जाएगा. तिब्बत बफर देश था जिसकी स्वायत्तता की रक्षा का भार भारत पर था. उस पर बिपदा आई तो दुबक कर बैठ गए और साम्राज्यवादी मंसूबों वाले एक बड़े देश को सीधे अपने सर पर लाद लिया और फिर नानएलाइंड आंदोलन आ अग्रणी नेता बनने की झक में सामरिक तैयारी की जरूरत ही न समझी। अस्त्रागारों में सोलर कुकर बनते रहे। खुफिया तन्त्र इतना कमजोर कि पता ही नहीं चला कि चीन की तैयारी क्या है। लोहिया ने चीन की यात्रा से लौटने के बाद आगाह किया था कि इससे भारत को खतरा हो सकता है, परन्तु आप चीनियों को अफीम के नशे में धुत रहने वाली कौम मान कर अपने गरूर में खोये रहे। शानितपथ और न्यायमार्ग के नामकरण से ही मान बैठे कि अब राष्ट्र मंडल बन जाने के बाद युद्ध की समस्या सदा के लिए समाप्त हो गई और विश्व संस्था जो करेगी न्याय ही करेगी कूट व्यवहार नहीं। बिना अपनी सामरिक तैयारी की पडताल किए पहले ही उकसावे पर युद्ध की घोषणा कर दी। बिना रसद, और असले के, बिना गर्म पोशाकबूट, और क़ायदे के बूट के लड़ते हुए हमारे निहत्थे, ठण्ड में ठिठरते, भूखे- प्यासे जवानो का कत्ले आम करा दिया और इसी सदमे में अपनी जान गवाँ दी.. ऐसे किताबी और आत्म ग्रस्त और देशघातक प्रधानमन्त्री की तुलना तुम मोदी से करने की सोच ही नही सकते.

नेहरू को किंवदन्तियों ने पतंग की तरह आसमान में टांग रखा था: बड़े बाप का बेटा, बड़े नाज़ों से पला, जिसके कपड़े इंग्लॅण्ड के धोबी नहीं धो पाते थे, पेरिस में धुलते थे, जेल में भी दूसरों से अधिक सुविधाओं से दिन काटने के बावजूद सबसे अधिक कष्ट झेलने वाले नेता जैसी कहानियों ने उसे देश का लाडला बना रखा था. दुनियादारी में वह लाडलों जैसा ही नादान भी था. होशियारी बस एक कि राज खानदान से बाहर न जाने पाये., उनकी भव्य काया और सौंदर्य ने, जिस पर वह खुद भी रीझे रहते थे, उनके सलीके और सुरूचिपूर्ण पोशाक आदि ने उनके व्यक्तित्व को इस तरह मंडित कर रखा था कि रखा था कि तुम नेहरू के आभामंडल को ही नेहरू मान बैठते हो. इस चायवाले के बेटे के पास सम्मोहित करने लायक कुछ नही, सब कुछ मिटटी की तरह मटियाला, फिर भी इसने उस मिट्टी की महक को पहचाना है और आध्यात्मिक शान्ति के लिए भटकते हुए उस मेरुदण्ड को भी समझा है जिसने इस देश को हज़ारों साल से तन कर खड़ा रहने की शक्ति दी है.”

वह खीझ रहा था, यह तो उसके चहरे से ही ज़ाहिर था, उसने मेरा कहा गौर से सुना भी न होगा. बोलने चला तो हकलाने लगा, “तुतुम्हे तो चारण होना चाहिए था.”

मैंने उसकी और ध्यान ही न दिया, “और सुनो, एक दिन मैंने कहा था कि इस देश के विभाजन और इसकी समस्याओं के लिए तुम्हारी पार्टी ज़िम्मेदार है, वह आधा सच था. पूरा सच यह है कि इसके विभाजन और उससे जुडी असंख्य त्रासदियों के लिए केवल दो आदमियों की प्रधान मंत्री बनने की महत्वाकांक्षएं जिम्मेदार थीं. और जानते हो, दोनों सेक्युलर मिज़ाज के थे. जिन्ना और नेहरू. गांधी जी इस रहस्य को समझ गए थे. कहा था, देश का बटवारा मेरी लाश पर होगा इसलिए अंतिम प्रयास किया था विभाजन की त्रासदी से बचने कि लिए जिन्ना को प्रधानमंत्री पद दे दिया जाय. परन्तु यह नेहरू थे जो अपनी महत्वाकांक्षा का त्याग करने को तैयार नहीं हुए थे. गांधी उसी दिन जीवित लाश बन गए थे. उपेक्षित, त्यक्त, विरक्त. ज़िंदगी को प्रार्थना के माध्यम से ढोते हुए. जब विभाजन कि दस्तावेज़ तैयार हो रहे थे तब उसकी आंच से बचने कि लिए नोआखाली चले गए थे कि कौन जाने कोई सिरफिरा उनकी जान ही लेले और वह अपनी उस प्रतिज्ञा पर खरे उतरें कि विभाजन उनकी लाश पर ही हुआ. नाथूराम ने तो अपनी विक्षिप्तता में उन्हें सद्गति दी थी, उनकी वह इच्छा पूरी की थी जो नोआखाली में पूरी न हो पाई थी. उन्हें सद्गति दी थी, जैसे कोई पुत्र पिता को चिताग्नि देता और कपाल क्रिया करता है.”

“इतना बोर तुमने इससे पहले कभी नहीं किया होगा.” वह पछता रहा होगा कि कहाँ से नेहरू का प्रसंग छेड़ बैठा.

“मैं भी देख रहा था. कई बार तुम इधर उधर देखने लगते थे कि आसपास कोई ईंट पत्थर है या नही, पर सच मानो मुझे बहुत मज़ा आरहा था. मैं कहना यह चाहता था कि यह भारत का पहला राजनेता है जिसने सोचा, गोलियों से किसी को अपना बना कर नही रखा जा सकता. अपना बनाने के लिए उनके हित को अपना हित मानना होता है. इन अकड़े हुए क्षेत्रों और जनों को विकास की दिशा में आगे बढ़ाकर, प्रगति का सहभागी बनाकर, उन्नति के अवसर देकर ही अपना बनाया जा सकता है. यह सोच पूर्वोत्तर से लेकर कश्मीर तक है. यह इलेक्शन का नारा नही था, इस पर अमल की कोशिश शुरू हो चुकी है. यही उसके नारे सबका साथ सबका विकास में भी है. नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका से अपनापे में भी. यह आदमी नारा गढ़ना भी जानता है, नारे को हक़ीक़त में बदलना भी जनता है और यह भी जानता है कौन क्यों विकास और अपनापे का विरोध कर रहा है.”

उससे रहा नहीं गया तो उठते हुए बोला, “इति भगवान सिंह विरचित मोदीनाम्ने चाटुग्रन्थे प्रथम: अध्यायः”
11/29/2015 4:23:22 PM

Post – 2015-11-28

गतं न शोचामि कृतं न मन्ये

“बोलो कब शुरू हो रहा है तुम्हारा ‘अपने अपने मोदी?’”

“आजकल पूरे देश में एक ही काम हो रहा है। मोदी नामा का वाचन। कोटि कोटि कंठों से। अपनी अपनी भाषा में, जप भी, अजपा जाप भी। तुम भी वही करते हो। मोदी के तो तुमने इतने रूप बना दिये है कि मैं लिखने भी चलू तो अपने अपने मोदी नहीं, ‘सबके मोदी सबके पास’ लिखना पड़ेगा।“

“ठीक है यही लिख मारो, पर उस रूप को भी जरूर रखना जिससे लोग असुरक्षित अनुभव करते हैं।“

“लिखूँगा जरूर और यह भी लिखूँगा कि असुरक्षित कहने वालों ने इतिहास में असुरक्षा की भावना जगा कर, क्या क्या गुल खिलाए हैं।“

“दंगे भड़काए हैं, तुम एक बार कह चुके हो।“

“मैं कहता हूँ, इस बार भी यही चाहते हैं। तुमने शर्बत खालसा का आयोजन नहीं देखा। यह उस आदमी का लड़का कर रहा है जिसके बाप की करनी के कारण उस उपद्रव को बढ़ावा मिला था जिसमें हिन्दुओं को बसों से उतार कर कतार में खडा करके मारा जाता रहा। आइ एस आई के तर्ज पर। जिसके उग्र रूप धारण कर लिया और राज्य के लिए खतरा बन गया तो हरमिन्दर साहब पर हमला और कत्लेआम हुआ। जिसकी अगली कड़ी उसकी दादी की हत्या थी जिसमें पता नहीं किनका किनका हाथ था और फिर 1984 का वह नृशंस और राज्य प्रायोजित हत्याकांड हुआ था। नासमझ इतिहास भूल जाते हैं और उसे दुहराते रहते हैं। समझदार इतिहास की गलतियों से सीख कर उससे बाहर आ जाते हैं और गलतियों से बचते हैं। तुम जिसके साथ खड़े हो वह शर्बत खालसा कराने वाला है, और मैं जिसके साथ हूँ वह इतिहास की चूक से बाहर आने वाला और गलतियों से बचने के लिए असाधारण धैर्य का परिचय देने वाला किरात है। किरातार्जुनीयम् पढ़ा है तुमने?“

“संस्कृत पढ़ी ही नहीं तो पढ़ता क्या। नाम जरूर सुना है सामान्य ज्ञान बढ़ाने के चलते।“

“मुझे भी कहानी तो भूल गई है पर वह मुद्रा याद है। अर्जुन किरात पर वाणों से लगातार प्रहार करते हैं पर उसका कुछ बिगड़ता ही नहीं। अन्त में थक कर अर्जुन समर्पण कर देते हैं और तो किरात वेशधारी शिव अपने वास्तविक रूप में प्रकट होते हैं और अर्जुन की वीरता से प्रसन्न हो कर उन्हें पा शुपत अस्त्र देते हैं जिसका प्रयोग महाभारत में भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण के विरुद्ध किया जाता है।

“अन्तर केवल यह है कि इस बार बाण चलाने वालों में पूरा प्रचारतन्त्र शामिल है जिसने उतने भयानक आयोजन को आया-गया कर दिया पर सीधा हमला न बना तो असुरक्षा के माहौल को खड़ा करके छायायुद्ध करने लगे – रामायण में आता है ‘कूट योद्धा हि राक्षसाः।‘ जानते हो जिस दिन मैंने कहा सभी वैज्ञानिकों का दृष्टिकोण वैज्ञानिक और तार्किक नही होता उसी दिन मेरे पास हिन्दू के मालिक एन. राम का भी एक ट्विटर आया था, जिसमें उन्होंने एक वैज्ञानिक का इंटरव्यू ट्वीट किया था। इतना अच्छा इंटर व्यू, प्रश्न करने वाले का अन्दाज, उच्चारण, प्रश्नों का चुनाव इतना उम्दा कि एक-एक वाक्य मेरी समझ में भी आ रहा था, जब कि टीवी चैनलों की हिन्दी तक मेरी समझ में नहीं आती। और उतना ही नपा तुला सुविचारित उत्तर उस वैज्ञानिक का जो अखाड़े में उतर आया था और बता रहा था कि ठीक इस मौके पर वह दंगल में क्यों शामिल हो गया। लम्बे अरसे तक वह सन्तुलित, तटस्थ और एक वैज्ञानिक के अपने सरोकारों के साथ बोलता रहा, बस अन्त में जब उसने कोसम्बी को वैज्ञानिक इतिहासकार और उससे पहले के लेखन और सामग्री को पौराणिक वगैरह बताया तब पता चला, वह धुले दिमाग का वैज्ञानिक है, और जिन विषयों का ज्ञान नहीं है, उन पर भी बोल सकता है, क्योंकि वह अपने पढ़े को अन्तिम सत्य मान कर आगे पढ़ना-समझना बन्द कर चुका है। ठीक यही स्थिति एन. राम और उनके हिन्दू की भी है। पहले से ही एक पोजिशन ले कर उसी को सही साबित करने के लिए आतुर पत्रकार हो, पत्र का मालिक हो या वैज्ञानिक हो, वह केवल वही देखेगा जो उसकी पोजिशन को सही साबित करे। वह पढ़ता नहीं है अपने काम की चीज की तलाश करता है। उसका विकास रुद्ध हो चुका है। सोचना देखना बन्द। जाने और माने के अनुरूप तथ्यों और आँकड़ों की तोड़-मरोड ही उसके लिए चिन्तन बन जाता है। इंटरव्यू के अन्त तक पहुँचते-पहुँचते एन राम और उस वैज्ञानिक पर हँसी आने लगी।“

“सभी अखबारों की अपनी एक नीति होती है। इसमें हँसने की क्या बात है, यार।“

“यदि पत्र पक्षधर है तो दूसरे पक्ष की पीड़ा को नहीं समझ सकता। वह अपनी कीर्तन मंडली के लिए ही ग्राह्य हो सकता है। उसके भी ज्ञान का विस्तार नहीं कर सकता। इतिहासकार और जिम्मेदार पत्रकार की भूमिका न्यायाधीश की होती है। जहाँ किसी तकाजे से, यहाँ तक कि देशप्रेम या या राष्ट्र प्रेम के तकाजे से भी इसमें समझौता किया जाता है, उसकी विश्वसनीयता घटती है। वह यदि किसी राजनीति से परोक्ष रूप से भी जुडा हुआ है तो धीरे-धीर उसका भोंपू बनता चला जाता है। मुझे हँसी हिन्दू के एक निष्पक्ष और साहसी पत्र से भोंपू बनते चले जाने की नियति पर आ रही थी, जिससे बेखबर एन. राम अपने ट्विटर में मुस्कराते नज़र आ रहे थे। बोफोर्स की दलाली उजागर करके धाक जमाने वाला उस जत्थे के साथ ताली बजा रहा है जो ‘लाज शरम तज दीनी रे तोसे नैना मिलाइके’ गाता झूमता रहा और मस्ती में बेपर्दा हो गया. इतिहास में कैसे कैसे समीकरण बनते हैं!”

वह हँसने लगा, “लाज शरम तज दीनी नहीं है. छाप तिलक सब छीनी है.”

“वही बात है। तुम्हारी बात भी सही। छाप-तिलक का भी फरक मिट गया है नही तो इतने झंडो और डंडों का मेल कैसे होता। सभी सुर मिला कर वही कौवाली क्यों गाने लगते।

“आपात काल के दौर में, बोफर की हेराफेरी के समय हिन्दू ने, जो निडरता दिखाई थी, उससे उसकी विश्वसनीयता बढ़ी थी। उसके बाद लगता है सनसनी पैदा करते रहने का चश्का सा लग गया। सेकुलरिज्म के नाम पर मुस्लिम लीग वाली मानसिकता के लोगों का प्रवेश हिन्दू में उसी तरह हो गया जैसे एक निर्णायक मोड़ पर कम्युनिस्ट आंदोलन में हुआ था जिसकी चर्चा तुमसे कर चुका हूँ। लीग के प्रोग्राम को सेकुलरिज्म का नाम देकर आगे बढ़ाने में हिन्दू की भूमिका सबसे प्रधान रही है। कम्युनिस्ट पार्टी ने तो अपनी भूल मान भी ली हिन्दू की समझ तक में यह बात नहीं आई है।

“ये असुरक्षित अनुभव करने वाले लोग अपनी पुरानी बेवकूफियों से डरे हुए हैं। मोदी ने तो ठीक वही नीति अपनाई जो ‘अपने-अपने राम’ में राम की है – गतं न शोचामि कृतं न मन्ये। आगे बदले की कार्रवाई करते भी नहीं हैं। सभी अपने किये से डरे उन्हें मिटाने का प्रयत्न करते हैं और अपने ही कुकर्मों से अपना अनिष्ट करते हैं. तुमने ‘अपने-अपने राम’ की ठीक याद दिलाई यार। इस ओर तो मेरा ध्यान ही नही गया था।

“तो तुम समझते हो सब कुछ ठीक चल रहा है।“

“अभी तो किक लगा है, इंजन चालू हुआ है, चल-रहा का सवाल कहाँ से पैदा हो गया । ठीक चल रहा है नहीं, ठीक दिशा में चल रहा है। अगर अकेला आदमी भय, आतंक, फूट और पिछड़े पन से देश को मुक्ति दिलाने के लिए ऐसा प्रयत्न कर रहा हो जिसे भगीरथ प्रयत्न कहा जाता है, गलत कह दिया, इसे तो तुम समझ ही नहीं सकते, हरकूलियन प्रयत्न कहूँ तो समझ जाओगे, हां तो, हरकूलियन प्रयत्न कर रहा हो और दूसरे सारे लोग रस्सी बल्ला ले कर उसके पाँव फँसाने और पीछे खींचने में लगे हों, ओर इसके बाद भी वह खड़ा ही नहीं, आगे बढ़ता हुआ दीख रहा हो, तो इतना ही बहुत बड़ी उपलब्धि है। परन्तु उसने इतनी बाधाओं के बीच जितना कुछ कर दिखाया वह किसी दूसरे से सम्भव हुआ ही नही. किसी को सूझा तक नहीं.”

“मैं भी तो सुनूँ।“

“मिनटों में खत्म होने वाली बात तो है नहीं, इसे कल के लिए रखो।“
11/28/2015 9:32:32 AM

Post – 2015-11-26

कैसे कैसे मोदी

तुम नाहक उस पर नाराज हो गए थे। वह कहीं नहीं जा रहा है। और लोग कहते हैं और वह भी मानता है कि वह ठीक कह रहा था।
मैं भी जानता था कि वह कहीं नहीं जाएगा, क्योंकि दुनिया में मुसलमानों का केवल एक ही देश है भारत।

मैं भी जानता था कि वह ठीक कह रहा था। वही नहीं उस जैसे सारे मुसलमान, असुरक्षित अनुभव कर रहे हैं और तब तक असुरक्षित अनुभव करते रहेंगे जब तक इस्लाम के नाम पर नृषंसता खत्म नहीं होती। उस पर उनका नियन्त्रण नहीं है इसलिए आज दुनिया के सारे शान्तिप्रेमी मुसलमान अपने भीतर ग्लानि अनुभव कर रहे हैं कि लोग भले प्रकट करें या न करें, हमें शक की नजर से देख रहे हैं। वह भी उन्हीं शान्तिप्रेमी मुसलमानों में से एक है।

तुमने यह क्या कह दिया कि दुनिया में मुसलमानों का केवल एक ही देश है, भारत। संघ वालों से पूछ लिया करो ?

संघ वाले भी मानते हैं कि मुसलमान केवल भारत में सुरक्षित हैं। सभी तरह के मुसलमान। पाकिस्तान और बांग्ला देश मुस्लिम देश नहीं हैं, वे सुन्नी देश हैं । उनमें शिया मुसलमानों के लिए जगह नहीं। ईरान मुसलमानों का देश नहीं शिया लोगों का देश है उसमें सुन्नी सम्मान से नहीं रह सकते। दूसरे मुस्लिम देषों का भी यही हाल है। यदि शिया सुन्नी दोनो रहते है तो दोनों एक दूसरे के पीछे पड़े रहते हैं। अकेला भारत है जिसमें सभी प्रकार के मुसलमान, सभी धर्मो के लोग रहते हैं और यह उन सबका अपना देश है। क्योंकि यह हिन्दू देश है. इसमें सनातनी और पोंगापंथी भी रह सकते हैं क्योंकि इसकी यह उदारता और सहिष्णुता हमने भारी मूल्य देकर अर्जित की है. इस कीमती विरासत को हम प्राणों से भी अधिक प्यार करते हैं इतने जख्म खाने के बाद भी। इतनी लानत-मलामत के बाद भी। इसे तुम समझ नही सकते. जो इतिहास तुम पढ़ते और गढ़ते रहे हो उसमें इसी को नष्ट किया जाता रहा. संघ वाले वहाँ गलती करते हैं जहाँ कहते हैं वन्दे मातरम कहना होगा। इस कहना होगा में अपेक्षा नहीं उद्दंडता है, और यह उतना ही नागवार है जितना कोई मुझसे कहे कि चन्दन लगाना ही होगा, या जनेऊ पहनना ही होगा।
मोदी इसी संकीर्ण संघ-चेतना से आगे बढ़ कर राष्ट्रीयता की नई परिभाषा रच रहा है। जाति-धर्म से ऊपर एक ऐसी महिमामय राष्ट्रीय चेतना का निर्माण जिसकी कल्पना इससे पहले किसी ने की नहीं। जो इतना उदात्त लगता है और मोदी के संघ से संबन्ध के कारण इतना अविश्वसनीय लगता है कि इसके प्रमाण सामने होने पर भी तुम विश्वास नहीं कर पाते। यदि विश्वास करते हैं तो संघ वाले, विश्व हिन्दू परिषद वाले, रामनामी ओढ़ कर राजनीति के स्वाद के लिए लालायित लोग जो जो तुमसे अधिक बौखलाए हुए हैं. घबरा कर ऐसे मौकों पर ऐसे वचन बोलते रहते हैं जिससे मोदी के मंसूबों पर पानी फिर जाय। यदि विघटनवादी हिन्दुत्व न रहा तो उनका अस्तित्व मिट जायेगा।

तुम मुझसे इतने सवाल करते हो, क्या तुम बता सकते हो ब्राह्मणवाद और हिंदुत्व में क्या अंतर है?

क्या ब्राह्मण हिन्दू नही होता?

हिंदुत्व में ब्राह्मण के लिए भी जगह है, इस्लाम के लिए भी जगह है, ईसाइयत आदि के लिए भी जगह है, परन्तु ब्राह्मणवाद में, इस्लाम में, ईसाइयत में हिन्दुत्वा के लिए जगह नहीं है। ये सभी इंसान को बाँटते हैं. तीन कनौजिया तरह चूल्हा वाली कहावत सुनी है न. मजहबी लोग इंसानियत को तोड़ते हैं। हिंदुत्व जोड़ता. वसुधैव कुटुम्बकम हिन्दुत्वा का मूल मंत्र है. ब्राह्मणो अस्य मुखमासीत् ब्राह्मणवाद का मंत्र है. मोदी की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं है कि वह चाय वाले का बेटा है बल्कि यह कि उसने ब्राह्मणवाद की पीड़ा को भी अनुभव किया है। एक छोटी सी भूल के बाद उसने लगातार जोड़ने वाला काम किया है. वह उस जोड़ने वाले हिंदुत्व का वाहक है, संघ की चेतना में ब्राह्मणवाद है. मोदी इससे आगे जाना चाहता है, संघ उसे पीछे खींचना चाहता है. संघ और दूसरे अजगलस्तनों का नारा रहा है मंदिर यहीं बनाएंगे, मोदी का देवालय से अधिक ज़रूरी शौचालय है।

यह सब झाँसा देने के लिए है भाई. तुम मुखौटे को असली चेहरा मान बैठे हो. हमें तुम जो कहते हो वह नहीं दिखाई देता, कुछ और दिखाई देता है.

दिखाई तक देगा भी नहीं। पैरानोइया को हिन्दी में क्या कहेंगे, याद नहीं, इसकी परिभाषा तुम किसी डिक्शनरी में देख लेना। जैसे कोई व्यक्ति पैरानाएड होता है वैसे ही लम्बे प्रचार और आत्मनिर्देशन से पूरा समाज या उसका बहुत बड़ा हिस्सा इसका शिकार हो जाता है। जो साधारण से साधारण आदमी को दिखाई देता है वह तक उसे दिखाई नहीं देता। इसकी सबसे ताजी मिसाल बेंगलूरु के एक कालेज की छात्राओं के बीच उपस्थित राहुल गाँधी थे। वह पूछते हैं अमुक काम तुम्हें दिखाई देता है, वे एक स्वर से कहती हैं, ‘हाँ’। वह कहते हैं मुझे दिखाई नहीं देता। फिर सोचते हैं दुबारा पूछ देखूँ, फिर जवाब मिलता है, हाँ दिखाई देता है। वह कहते हैं मुझे दिखाई नहीं देता। बच्चियाँ थी, जी में आया भी हो कि कह दें किसी मनोचिकित्सक के पास जाना था, यहाँ क्यों चले आए। अब तुम समझे तुम्हें कुछ क्यों दिखाई नहीं देता।

मुझसे बुरी हालत तो तुम्हारी है, इतने सारे लोग लगातार असुरक्षा देख रहे हैं, और वह तुम्हें दिखाई देता ही नहीं।

पहली बात यह कि वे देख कुछ नहीं रहे हैं, उन्हें भ्रम हो रहा है। जो देख रहे हैं वह दृष्टिभ्रम है, श्रुतिभ्रम है, हैल्यूसिनेशन है, क्योंकि एक को वह कहीं दिखाई दे रहा है दूसरे को कहीं। वे लगातार बोल रहे हैं और काफी ऊँची आवाज में बोल रहे हैं और कहते हैं बोलने की आजादी छिन गई है, हाल इमर्जेंसी से बदतर हो गए हैं। ये सभी पैरानोइया के ही लक्षण है। और पूछो कि आप चाहते क्या हो तो यह तक बता नहीं सकते। क्योंकि उन्हें किसी घटना से असुरक्षा नहीं अनुभव हो रही है। मोदी से असुरक्षा अनुभव हो रही है। यह तो कह नहीं सकते कि मोदी को सत्ता से हटा दो तो हमारी असुरक्षा मिट जाएगी।
और जानते हो इसका कारण क्या है? कारण यह है कि मोदी ऐसे काम कर रहा है जो किसी कि कल्पना तक में नहीं आया था. वे दर गए हैं कि यदि इसे पुरे पांच साल भी बेरोक टॉक काम करने को मिल गया तो हमारे दिन सदा के लिए लड़ जाएंगे.

तुम कहते हो वह बोले, पहले तुम तो बोलो कि तुम क्या चाहते हो। कह नहीं सकते और इसीलिए तुम इतने लोग इतने स्वरों में बोलते हुए भी केवल गुर्रा रहे हो । कह कुछ नहीं पा रहे। इंसानियत का स्तर इतना नीचे तुमने गिराया है मोदी तुम्हें भी ऊपर उठाना चाहता है। विश्व स्तर का मानव बनाना चाहता है जो अभी तुम बन नहीं पाए हो।

तुमने अपने अपने राम लिखा। अपने अपने मोदी क्यों नहीं लिख मारते।

इस पर शाम को बात करेंगे.

Post – 2015-11-24

जायें तो जायें कहां
तुमने तो मुझे सचमुच डरा दिया यार। पर तुम क्या चाहते हो हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें और जो कुछ उल्टा सीधा होता है उसे टुकुर टुकर देखते रहें?

यह तो कर ही रहे हो, बस इसमें एक चीज और जुड़ गया है बार-बार खतरे और असुरक्षा की आवाज बुलन्द करके असुरक्षा का विस्तार करना।

असुरक्षा हम बढ़ा रहे हैं? तुम कहते हो हम बढ़ा रहे हैं, असुरक्षा। इतने सारे लोग, इतने सारे क्षेत्रों के, जिनका हमारी पार्टी से कभी सम्बन्ध नहीं रहा चिन्ताग्रस्त होते चले जा रहे हैं, और तुम कहते हो असुरक्षा हम बढ़ा रहे हैं।

“मुझे मुस्लिम लीग के उभार के बाद उसके पीछे से चलने वाली ताकतों की याद आ रही थी जो खास तौर से होली और मुहर्रम के आस पास इशारा करते थे और ‘इस्लाम खतरे में’ के नारे लगने शुरू हो जाते थे और फिर इस्लाम को खतरे से बचाने के लिए दबे सताए लोग जान को हथेली पर ले कर बाहर निकल पड़ते थे और लोग जान बचने के लिए इधर उधर भागने लगते थे । कहीं छुपके से किए इशारे पर, अपनी रोटी सेंकने वालों की शह पर, लगाई गई आग का नीचे तक विस्तार और सबसे अधिक निचले स्तर का हाथ और गर्दन । खुराफात किसी की; हाथ और जान-माल किन्ही औरों का।“

“पर इस तरह के अफवाहों से सु शिक्षित और साहित्य, कला और विज्ञान से जुड़े लोग तो प्रभावित नहीं होते थे।“

मैं हँसने लगा, “यार सबसे अधिक यही लोग प्रभावित होते हैं जो इमोशन की फसल उगाने और काटने के तरीकों में माहिर होते हैं, ‘‘मुसलमानों में खूँ बाकी नहीं है” इसी का दूसरा संस्करण था। उसी अफवाह को, उसी फुसफुसाहट को आवेश की ऊँचाई पर पहुँचा कर नक्कारे की आवाज बना दिया जाता था। सचाई यह कि मुसलमानों में खून था, वह ब दहवासी नहीं थी जो ऐसे बयानों से पैदा कर दी जाती थी। और सोचो ऐसे कवि को अक़्ल के धनी लो गों के बीच भी दार्शनिक कवि कहा जाने लगा था। अभी हाल ही में जिस सिंघल जी का निधन हुआ, वह वैज्ञानिक थे, मुरली मनाहर जो शी भौतिकशास्त्री है जिनके बारे में लाल बहादुर वर्मा ने कहा था उनके फीजिक्स पर मेटाफीजिक्स हावी हो गया, संघ के पूर्व सर चालक रज्जू भैया भी संभवतः भौतिकशास्त्री ही थे। हिटलर तो चित्रकार या वास्तुकार था शायद और बालासाहब तो चित्रकार थे ही। तुम्हें ऐसे अनपढ़ मिल जाएँगे जिनका दृष्टिकोण वैज्ञानिक हो, जो चीजों में फर्क करना जानते हों, उन को बिना किसी भावुकता के परखते हों। ज्ञान और विज्ञान जिस कठाले में जा कर रच पच जाते हैं वह है हमारी ज्ञानव्यवस्था। इसलिए आवेशपूर्ण कथन, समर्थन, सहयोग सब आविष्ट मानसिकता की उपज होते हैं, वह प्रेताविष्ट हों यह जरूरी नहीं, प्रेत वे स्वयं पैदा कर सकते हैं, अपनी संचित उूर्जा से। जब मैं कह रहा था कि भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में आवेश अधिक था, तार्किकता कम, वस्तुपरकता लगभग गायब तो यह भी कह रहा था कि ये मार्क्सवादी हो ही नहीं सकते। कुछ ढोंगियों को तुमने रामनामी ओढ़ कर हर तरह के कुकर्म करते देखा हो गा । कुछ सदाचारी भी होते हैं यह भी मानना होगा। अनुपात तय करना मेरे वश में नहीं। उसी तरह ये मार्क्सनामी ओढ़े लोग मार्क्सवादी हों यह जरूरी नहीं। देखना यह चाहिए कि वे तर्क, विवेक, गुणदोष विचार का ध्यान रखते हैं या नारेबाजी में शामिल हो जाते है, ‘सड़ी गली सरकार को एक धक्का और दो’ दुहराने से कोई मार्क्सवादी हो जाता है क्या? ‘जो हक है हमारा हम लेंगे, उससे न जरा भी कम लेंगे’ दुहराने से हक मिलता है क्या? यह भीड़ जुटाने और मजमाबाजी करने के डमरू हैं। डमरू आज भी बज रहा है। अरे कल तो इसमें हमारा सबसे आला डमरूबाज शामिल हो गया। चारों ओर से यही सुनने में आ रहा है कि असुरक्षा बढ़ गई है तो उसकी बीवी को लगा असुरक्षा बढ़ गई होगी इसलिए निकल भागने के लिए एक बिल कहीं बाहर को बनाना चाहिए। अब तक उसको ऐसा नहीं लगा था, बीवी ने कहा तो कान्तासम्मित ही कहा होगा, अब उसे भी असुरक्षा अनुभव होने लगी। अफवाहें इसी तरह फैलती और खतरनाक आयाम लेती हैं, इसलिए हर बार पूछो, क्या हुआ, कहाँ हुआ, उसे तौलो, क्वांटिफाई करो और देखो किसी चीज को अनुपात से बढ़ा कर तिल का ताड तो नहीं बनाया गया है। इसे कहेंगे मार्क्सवादी सोच और मार्क्सवादी समझ और इसके बाद तुम्हारा मार्क्सवादी कार्यभार आरंभ होता है इस अफवाह और बदहवासी के खिलाफ लड़ने का। अकेले पड़ जाओ तो भी लड़ो तर्क देते और प्रतिवाद की तार्किक माँग करते हुए। तुम यह नहीं कर रहे हो। हाथ पर हाथ धरे नारेबाजों के साथ नारेबाजी कर रहे हो। मैं अकेला तुमसे भी लड़ रहा हूँ और उनसे भी और तुम मुझसे भी डरने लगते हो। है न! डरो मत, लड़ो। नफरत मत फैलाओ, नफरत के कारणों की व्याख्या करो, नफरत उस व्यख्या से ही दूर हो जाएगी।“

“इतनी ऊँची हाँकते हो? अकेले के वश का काम है यह?”

हमारा दुर्भाग्य या सौभाग्य यह है कि हम बौद्धिक हैं। सोचने, समझने और लिखने के सारे काम अकेले ही किए जाते हैं। दूसरों पर नजर रख कर सोचोगे, लिखोगे तो जिन पर नजर रखोगे उनका तुम्हारी चेतना में प्रच्छन्न प्रवेश हो जाएगा। तुम्हारे विचार में मलिनता आ जाएगी। ऐसा विचार खुद अपनी दीवार तैयार करके, उससे टकरा कर लौट कर तुम्हारे पास आ जाता है। तुम्हारे विचार अपनी पूरी ईमानदारी से दूसरों तक पहुँचे, वे यदि सहमत हों तो, उनके कथन-लेखन के माध्यम से वे दूसरों तक पहुँचें। इस तरह बनता है वह महावृत्त जिसमें व्यक्ति के रूप में अकेले होते हुए भी तुम विचारों के स्तर पर एक बड़े समुदाय के साथ होते हो जो भीड़ बन कर तुम्हारे साथ खड़े नहीं होते, अपनी अपनी जगह पर मुस्तैदी से खड़े होते हैं। जो तुम्हारी बात नहीं मानते हैं, तुम्हारे विचारों और अपने विचारों के टकराव से जो चमक पैदा होती है उसे मशाल बनाते हैं इसलिए वे तुम्हारे अनुयायी नहीं होते, विचार बन्धु होते है जिनके अपने विचार है। तुम जब पार्टी के साथ होते हो, पार्टीजन होते हो, तो तुम्हारे पास विचार नहीं होते। तुम मान लेते हो पार्टी के पास विचार हो सकते हैं, और तुम उसकी लाइन पकड़ लेते हो। लाइन का एक मतलब मछली मारने की कँटिया भी होता है । तो लग्गी उसके हाथ में और मछली की तरह लाइन में फंसे तुम। तुम हो कर भी होते ही नहीं, सिवाय एक छटपटाहट के ।“

आज वह चुपचाप सुन रहा था।

“गणित जानते हो। भीड़ में लोग कहने को जुड़ते हैं, पर दर असल गुणित होते हैं। आवेग के कारण यदि बौद्धिकता आधी भी रह गई तो उन असंख्य लोगों के जुडने के कारण आधा असंख्य आधों से गुणित होता हुआ उस शून्य के निकट पहुँच जाता है जिसमें विवेक रह ही नहीं जाता, इसे मास हिस्टीरिया कहते हैं। लोग जब कहते हैं कि संख्या इतनी बढ़ गई तो मैं गणितज्ञों से पूछता हूँ, गणित मेरी कमजोर है इसलिए, कि विवेक का स्तर नैनोमीटर से तय करके बताओ भाई।

करने को तुम्हें बस यह है कि तुम अपने को सच्चा मार्क्सवादी सिद्ध करो। और उस नौटंकीवाले छोरे से मुलाकात हो तो उसे भी समझाना कि कलाकार तू बड़ा है, ठान ले तो आदमी से चूहा बन कर भी दिखा सकता है, परन्तु आदमी के रूप में तू खासा अच्छा लगता है। कि चूहा बन कर जीने का चुनाव करने से बेहतर है, आदमी बन कर जी। तुझे कुछ होने का नहीं, तू जितना सुरक्षित है उतना अपनी प्लस जेड सेक्योरिटी के बाद भी देश का प्रधानमंत्री तक सुरक्षित नहीं है जिस पर पत्थर फेंकने वालों में तू भी शामिल हो गया, पर यह नहीं जानता कि उसकी गलती क्या है, तेरी जोरू को भले पता हो कि उसकी गलती क्या है।
11/24/2015 12:24:49 PM

Post – 2015-11-23

हुए तुम दोस्त जिनके दुश्मन उनका आसमाँ क्यों हो

“भारतीय कम्युनिस्टों की सबसे बड़ी कमी यह है कि वे संजीदा नहीं रहे हैं, न अपने काम के प्रति, न अपने दल के प्रति, न देश के प्रति न ही मानवता के प्रति। वे रोमानी रहे हैं, आवेश में अपनी पहचान तक भूल जाते रहे हैं। “ मैंने सुबह की छूटी कड़ी को जोड़ते हुए कहा।

“और क्या सोचते हो तुम?”

” जिसे भी हाथ लगाया वह काम से गया। मैं सोचजा हूं इतना अशुभ हाथ क्या कम्युनिज्म का ही होना था जो मानवता की उदात्ततम आकांक्षा है?”

“और क्या सोचते हो तुम?”

“सोचता हूं प्रवेश का मुहूर्त गलत हो गया। यजमान भी निखट्टू और पुरोधा भी अनाड़ी, न वेदी का मान ठीक न समिधा का प्रबन्ध, मन्त्र रचे ही न गये पाठ क्या होता। उद्गाता मिले सिरफिरे, खुद ही मनमाने मन्त्र बना कर गाने लगे। यह महायज्ञ संपादित कैसे होता यार?”
जाहिर है मैं उसे खिझा रहा था। इसमें उस अन्याय का बदला लेने का दबा भाव भी रहा हो सकता है जो मुझे झेलना पड़ा था और जिससे तंग आकर मैंने पक्षधरता के आदर्श को सम्मान तो दिया पर दूसरे पाले में खड़ा हो कर जिरह करने लगा।

“तुम इतने पश्चगामी हो चुके हो कि मन्त्र-तन्त्र और यज्ञ-याग की दुनिया में जा कर आज की दुनिया को समझने का प्रयत्न कर रहे हो?”

“नहीं, तुमने अपनी नासमझी में अपनी इतनी दुर्गति की कि उसे बयान करने के लिए कई हजार पीछे लौटने पर ही तुम्हारे यथार्थ को बयान करने का प्रतीकविधान और रूपक मिल पाया।

“तुम्हारी समझ का यह हाल कि देखा रूस में रक्त क्रान्ति हुई तो क्रान्ति की बात तो भूल गए। याद रह गया रक्त पात। रक्त बहाने पर खुश होने लगे। हिंसा और उपद्रव को हथियार बनाने की सोचने लगे। तुम्हें राज थापर की किताब से एक और अंश की याद दिलाऊँ । विभाजन के दौर में खून खराबा मचा हुआ था। इससे पीड़ित राज ने जब कामरेड डांगे से दुखड़ा रोया तो जानते हो उनका उत्तर क्या था? राज के शब्दों में ही सुनोः
Dange looked at me impassively, with almost a gleam of secret delight. ‘Don’t worry, Raj,’ he said. ‘Let our people taste blood, let them learn how to draw it. It will make the coming revolution easier.’ 43

“तो यह थी तुम्हारी क्रान्ति की समझ और यह था मानवीय संवेदना का रूप। यह था देश प्रेम और पीड़ितों दुखियारों का पक्ष। डांगे के ही कार्यकाल में आपात काल आया था और उन्होंने ही उसका समर्थन किया था, यह जानते ही हो।

“भाई रूस में जनता और सेना के बीच की दीवार बहुत पतली थी। युद्ध छिड़ने पर अपने लबादे, घोड़े, जीन और बन्दूक के साथ जनता के बीच से नौजवानों को लामबन्द होना पड़ता था। कहो जनता हथियारबन्द थी और उसके आक्रोश को सैन्य बल से दबाया नहीं जा सकता था। सेना ने विद्रोहियों पर गोली चलाने से इन्कार कर दिया था, यह तुम जानते हो। तुम्हारे यहाँ गाँधी जैसा अहिंसक का रोना यह था कि अंग्रेजों ने हमसे हथियार छीन कर हमें नामर्द बना दिया। इस निहत्थी जनता को तुम क्रान्ति में उतारना चाहते थे और उतारा तो बलि का बकरा बना दिया। आज तक यह मुगालता दूर नहीं हुआ। मेरा एक प्यारा सा कवि था, मुझसे दस पन्द्रह साल छोटा था। तेजस्वी। उसकी कविता की एक पंक्ति याद आ रही है, ‘‘जवाब दर सवाल है कि इन्कलाब चाहिए।’ कविता में, साहित्य में इन्कलाब न हो तो कविता कविता नहीं, साहित्य साहित्य नही। इन्कलाब के राग मजदूरों के नारों में आज भी मिलेंगे। बस इसी रूमानियत ने अक्ल पर परदा डाल दिया। जागते हुए भी सपने दिखाई देने लगे, जमीनी सचाई आँखों से ओझल हो गई।

“गाँधी ने इस देश को पहचाना था और इसके सही हथियार को पहचाना था। वह था सत्यव्रत और सत्याग्रह। अहिंसात्मक प्रतिरोध। इसने औरंगजेब जैसे दुराग्रही को झुकाकर रख दिया था।”

“यार, कब हुए गाँधी और उनसे कितने पहले हुआ औरंगजेब।”

“मैं जानता हूँ दोनों के काल का अन्तर, पर तुम नहीं जानते कि सत्याग्रह इस देश का बहुत पुराना हथियार है और इसने बादशाहों को झुकने पर मजबूर किया है। इसकी रीढ़ है अपमान सह कर भी सत्य के साथ खड़ा होना। बल्कि अपमान को अमृत और सम्मान को विष समझना। तुम तो पढ़ते लिखते ही रहे हो और मनुस्मृति को तो अंगीठी जलाने का रद्दी कागज ही समझते हो, पर उसी मनुस्मृति में यह भी लिखा है,
सम्मानात् ब्राह्मणो नित्यं उद्विजेत् विषात् इव। अमृतस्येव च आकांक्षेत् अवमानस्य सर्वदा।। 2.163

“तो यदि इतिहास की गहरी समझ होती तो अपने आयुधागार में से सबसे प्रभावी आयुध निकाला होता।

“तुम अपने इतिहास को नहीं जानते इसलिए इस देश की जनता को भी न तो जान सके न प्यार कर सके। उसे हिन्दू मुसलमान बना कर देखते रहे और उनकी उपेक्षा करते रहे जो इन दायरों को धता बता कर अपने रीति-रिवाज और सम्मान के साथ शताब्दियों से इस देश में रहे हैं और अपने लिए इससे अच्छा देश किसी अन्य देश को मानते ही नही। तुम लोग अपने को प्यार करते रहे। यश और लाभ की चिन्ता में अपने को बेचते हुए, अपने अतीत को बेचते हुए, अपने बाप दादों को बेचते हुए।

“दूसरे देशों से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की विशेषता यह है कि उनमें एक कम्युनिस्ट पार्टी है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कई धड़े हैं और उनमें से प्रत्येक दूसरों को गलत मानता है और मैं सभी से सहमत हो जाता हूँ लेकिन सिर्फ इस बात पर।”

“कभी तो गंभीरता से बात किया करो।”

“मखौल नहीं कर रहा हूँ। एक विशेषता और है भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों की कि ये उन देशों की जानकारी रखते हैं जिनसे मदद मिलती रही है, अपने देश और समाज को नहीं जानते न इससे प्यार करते हैं। जब कि दूसरे देशों की कम्युनिस्ट पार्टियाँ अपने देश को दूसरे देशों से अधिक जानती हैं और अपने देश को प्यार भी करती हैं।”

“क्या बेतुकी बात करते हो!”

“प्यार करने के लिए समाज को समझने की जरूरत होती है और समाज को समझने के लिए इतिहास को जानना जरूरी होता है क्योंकि हम अपने पूरे इतिहास को जीते हैं, केवल वर्तमान को नहीं, यह मैं कह आया हूँ।

“तुम इतिहास को नहीं जानते। उसे जानने के लिए जिन भाषाओं का ज्ञान जरूरी है उन्हें भी तुमने किनारे लगा दिया। नादानी में तुम अपने इतिहास से डरते हो इसलिए तुम्हें अपना समाज भी डरावना लगता है। डरावने इतिहास से बचने के लिए तुम इतिहास गढ़ते हो और गढ़े हुए इतिहास में समाज को कस कर रखना चाहते हो। यह हो नहीं पाता और तुम्हारे इतिहास और इतिहासबोध की धज्जियाँ उड़ जाती हैं। फिर तुम समाज को अपनी इच्छा के अनुसार बनाना चाहते हो और उसे समझने का काम तब तक के लिए स्थगित कर देते हो, जब तक वह तुम्हारे मनचाहे रूप में बन कर तैयार न हो जाय। वह बनने की जगह बिगड़ता चला जाता है। इतिहास की समझ स्थगित होती चली जाती है। तुम समस्याओं के भूत खड़े करते हो और उनसे लड़ते हो और समस्याये उग्र होती चली जाती हैं। तुमने प्रगतिशीलता के नाम पर प्रतिगामी शक्तियों से लड़ने के लिए उन्हें उभारा और अब वे तुम्हारे ऊपर ही भारी पड़ रही हैं। तुमने यह सोचा ही नहीं कि हमारी प्रगतिशीलता की समझ सही है या गलत। सही है तो उल्टे परिणाम क्यों आ रहे हैं?

“अर्थ व्यवस्था की तुम्हारी समझ यह कि पूँजीवाद के आने से पहले ही तुमने उससे लड़ाई मोल ले ली। राष्ट्रीय पूँजीवाद को विकसित ही नहीं होने दिया। इन सब बातों की जानकारी जैसी होनी चाहिए वह तो है नहीं पर इतनी मोटी बात समझ में आती है कि जिन हथकंडों के कारण कल कारखाने ही बन्द होने लगें, कहें मजदूरों की संख्या और ताकत बढ़ने के स्थान पर घटने लगे, वह उसी मजदूर वर्ग के साथ विष्वासघात हुआ जिसको एकत्र पाकर लगा कि इनके बल पर क्रान्ति की जा सकती है। नतीजा आर्थिक और औद्योगिक दृष्टि से आत्मनिर्भर बनने के स्थान पर हम पुनः बाजार बनते चले गए। राष्ट्रीय पूँजी का पलायन होने लगा। मर गया देश ज़िंदा रह गया इंक़लाब ज़िंदाबाद का नारा जिनकी आवाज़ बुलंद करने वालों की बोलती बंद होती जा रही है.
11/23/2015 9:30:07 PM

Post – 2015-11-23

यही जाना कि कुछ न जाना हाय

‘मैं तुमसे फिर वही सवाल करता हूँ क्या तुम्हें कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में कुछ अता पता है, या जो जी में आया बक जाते हो।’

‘पार्टी के बारे में तो तब पता होता जब पार्टी के भीतर रहा होता। उसकी नौबत नहीं आई। जो पार्टियाँ भारतीय दृश्यपट पर थीं उनमें सबसे अधिक सुथरी पार्टी या कहो भ्रष्टाचार से मुक्त, सदाशयी पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ही लगती रही। इसलिए दूसरों की अपेक्षा इसके प्रति लगाव था।‘

फिर यह लगाव कम कैसे हुआ?

“कम नहीं हुआ, मोहभंग सा हुआ।
1983 में मैंने हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य के दोनों भाग लिखे थे। इसके प्रकाशन में चार साल का जो विलम्ब हुआ वह आइसीएचआर की राजनीति के चलते हुआ। प्रकाशन के बाद आलोचना करने की जगह इसे दबाने, जिज्ञासा करने वालों को बहकाने का प्रयत्न जिस बड़े और सुनियोजित रूप में किया गया उसने मोहभंग पैदा किया और फिर एक एक चीज की जाँच करने चला तो लगा यहाँ तो कोई काम सही तरीके से किया ही नहीं गया और प्राचीन इतिहास को योजनाबद्ध रूप में कुत्सित बनाने का प्रयत्न लाभ के लोभ में किया गया। 1995 में अंग्रेजी में दि वेदिक हड़प्पन्स के प्रकाशन के बाद जब वह देश विदेश में आयोजित सेमिनारों में चर्चा में आई उसके बाद आर्य आक्रमण और आर्यो के बाहर से आने की मान्यताओं को गलत मान कर पुनर्विचार आरंभ हुआ परन्तु उसमें भी जितनी खींचतान अपने को मार्क्सवादी कहने वाले भारतीय इतिहासकारों ने किया वह विस्मयकारी था।’’

“बस इतनी सी बात पर तुमने पूरी पार्टी को, उसके सारे किये कराये पर पानी फेर दिया? आत्मरति की हद है!”

“यह इतनी सी या उतनी सी बात नहीं होती। इसे चक्षुखोलक अंजन कहते हैं। आई ओपेनर। लम्बे समय तक तुम बिना सोचे-विचारे मान्यताओं के बहाव में बहते और उसी के भीतर उछल-कूद करते चले जाते हो और फिर किसी झटके से जब आँख खुलती है तो पाते हो यहाँ तो कुछ भी ठीक नहीं है। यह मैं कोई नई बात नहीं कह रहा हूँ यह भी मार्क्स कहीं कह गए हैं। प्रसंग मुझे याद नहीं पर उन्होंने उसके सर्वत्र होने के सन्दर्भ में कही है, शायद शोशण के बारे में, कि वह तत्व हमारे चारों ओर होता है और पहले हमारा ध्यान उधर नहीं गया रहता है और फिर जब ध्यान जाता है तो हैरानी होती है कि मैंने इससे पहले इसे देखा क्यों नहीं।“

‘‘सिर्फ तुम्हें दिखाई दे रही है?’’

‘‘ठीक कहते हो, जो अपना पूरा जीवन उसी में लगा चुके हों, सट्टा बाजार की भाषा में अपनी सारी जमापूँजी दाव पर लगा चुके हों वे इस आघात से बचने के लिए देख कर भी मानने से इन्कार कर देंगे और आगे भी आँख बन्द किए रहेंगे।“

‘‘क्या-क्या दिखाई दिया तुम्हें, समझूँ तो।’’

‘‘पहली चीज तो वही जिसे मार्क्स और ऐंगेल्स भी अपनी हड़बड़ी के कारण नहीं देख सके थे कि एक नई व्यवस्था इतनी कमजोर नहीं होती कि उसे उभार के समय ही उखाड़ फेंका जाय। कम्युनिस्ट मैंनिफेस्टो को दुबारा देखो। उन्होंने पूँजीवाद को सार्वभौम मान लिया। और इसलिए मान लिया अब उसके ऊपर प्रहार करके इसे हटाया और नई साम्यवादी व्यवस्था को लाया जा सकता है। गलती करने वाले वह अकेले नहीं थे। दूसरी सोच वाले भी थे। पूँजीवाद के खात्मे के लिए बाहर से प्रयत्न की जरूरत नहीं थी, उसके भीतर से जर्जर होने की प्रतीक्षा और उसके लिए तैयारी की जरूरत थी। वह नहीं की गई। पहले महायुद्ध में अजेय रूस को बर्वादी पर लाकर स्वतः वह विक्षोभ पैदा कर दिया जिसका लाभ उठा कर सत्ता परिवर्तन कर दिया गया। परन्तु इसमें मेनशेविक जो मानते थे कि अभी साम्यवाद का चरण नहीं आया है, लोकतांत्रिक व्यवस्था और पूँजीवादी विकास का मार्ग उचित रहेगा, अधिक सही थे और मार्क्सवाद की उनकी समझ लेनिन से अच्छी थी। प्रतिस्पर्धी पूँजीवादी शक्ति के रूप में रूस के उभार के बाद वि श्व पूँजीवाद का परिदृश्य क्या होता इसकी हम आज कल्पना नहीं कर सकते।“

‘‘मान लो यह सच ही हो तो क्या इतिहास में लौट कर गलतियाँ सुधारी जाती हैं?”

‘‘लौटना संभव ही नहीं। अभी जो शब्द मेरे मुँह से निकल चुके हैं, उनमें से एक अक्षर को भी
अनकहा नहीं किया जा सकता।’’

‘‘फिर?’’

‘‘उस इतिहास का वि श्लेषण किया जा सकता है कि हम यह समझ सकें कि हमसे और कौन कौन सी चूकें किन-किन कारणों से हुई हैं और उस समग्र समझ से आज की अपनी भूमिका तय कर सकें, न कि लाज बचाने के लिए आत्मनिरीक्षण से मुँह चुराते हुए, लकीर पीटते चलें, अपने को नेस्त नाबूद करने तक कबाड़ा करते चलें।”

‘‘तुम्ही से सुनना चाहता हूँ कौन कौन सी चूकें हमसे हुईं।“

‘‘देखो, विज्ञान का एक नियम है कि कि प्रकृति को समझ कर उसी में से अपने नियमों को तलाश कर उसे बदला जा सकता है। तुम्हें मार्क्स की वह इबारत याद न होगी जिसमें उन्होंने कहा था, कि एक समय आएगा जब भौतिक विज्ञानों को मानवविज्ञानों को समाहित कर लेना होगा, उसी तरह मानव विज्ञान भौतिक विज्ञान को आत्मसात् कर लेगा: जब एक ही विज्ञान रह जाएगा।
Natural science will in time incorporate into itself the science of man, just as the science of man will incorporate into itself natural science: there will be one science.
Marx, Private Property and Communism (1844)

“यह तो हुई भविष्य की बात, परन्तु जैसे भौतिक विज्ञान भूत तत्वों की समझ से उन्हें बदलता है, उसी तरह समाज की गहरी समझ से ही समाज को बदला जा सकता है और इसे समझने का सबसे सही तरीका है इतिहास को समझना, उसकी कारक शक्तियों की पहचान और उनसे अपने औजारों का निर्माण। यह किया ही नहीं गया।

“तुमने इतिहास को समझने की जगह, उसे गढ़ना आरंभ कर दिया। गढ़ना ही नहीं इस तरह विकृत करना कि सोच कर नैतिक और बौद्धिक गिरावट पर आश्चर्य होता है। परन्तु इस पर शाम को चर्चा करेंगे।

Post – 2015-11-22

यह दिल मांगे मोर

‘एक बात बताओ, जब तुम खुद मानते हो कि तुम्हारी किसी विशय अच्छी जानकारी नहीं है तो क्या तुम्हें पागल कुत्ते ने काट खाया है कि उस पर बोले बिना रह नहीं सकते? कम्युनिस्ट पार्टी और आन्दोलन के बारे में जब आधिकारिक ज्ञान नहीं है तो चुप रहना चाहिए था। तुम्हीं ने मुझे पढ़ाया था न, तावदेव शोभते मूर्खः यावद् किंचिन्नभाशयेत्। चुप रहते तो भरम तो बना रहा होता।’’ दोस्त है तो वैचारिक मतभेद के बाद भी सही सलाह तो देगा ही।
मैंने बिना हत्प्रभ हुए कहा, ‘‘पागल कुत्ते आसानी से पहचान में आ जाते हैं, लेकिन पागल आदमियों को समझने में समय लगता है। उनके काटों का पता लगाने में और भी लम्बा समय लगता है। इस लम्बे और मुश्किल काम को आसान बनाने के लिए यह बताते हुए बोलना ही पड़ता है।’’
‘‘फिर वही जलेबी बनाने की कला!’’
मैं तुम्हें एक सचाई बताना चाहता हूँ, जो सचाई से हट कर कहानी बनी और फिर भुला दी गई। एक किसान था। बड़ी किस्मत से उसे कोकाकोला का बोतल पीने को मिला। बोतल मुँह से लगा कर पीने की आदत न थी, इसलिए गिलास में तो ढालना ही था। ढालने का भी तरीका मालूम न था इसलिए उसके न चाहते भी कुछ छलक कर नीचे गिर ही जाना था। तुम होते तो कहते गिर गया तो गिर गया, उस पर पछताना क्या। पर वह बेचारा किसान इतनी अनमोल चीज बर्वाद हो गई। न चाहकर भी उधर देखने को विवश था। क्या देखता है कि चारों तरफ से चींटियाँ उसकी गन्ध से या जैसे भी उसके पास धिर आई हैं।“
“मीठी चीज हो, उसे चींटियाँ और मक्खियाँ न घेर लें तो उसे अपनी मिठास पर शर्म आएगी। यह तो होना ही था।“
“पर फिर देखा तो पाया वे चींटियाँ जो उसे चूसने पर लगी थीं मरी पड़ी है। हैसियत ऐसी नहीं, न ही यह व्यावहारिक था कि कोकाकोला, पेप्सीकोला या किसी अन्य कोला से कृमिनाशक का काम ले, फिर भी उसने सोचा कि इसमें पानी मिला कर देखें यह कृमियों का सफाया करता है या नहीं। वह घोल बढ़ाता गया और उस निर्णायक बिन्दु पर पहुँचा जहाँ से आगे उसका प्रभाव कम हो जाता था। उसने पाया यह तो कीटनाशकों से कई गुना सस्ता और कई गुना प्रभावकारी है, इसलिए कीटनाशक के रूप में उसका ही प्रयोग करता रहा। जब यह रहस्य सामने आया कि पेय द्रवों में कीटनाशक मनुष्य के लिए हानिकारक स्तर तक मिलाए जाते हैं तो किसी तरह वह सूचना और प्रसार के केन्द्र में आ गया और उसके बाद वह लुप्त ही हो गया। हम उसका नाम तक नहीं जानते। यह भी न स्वीकार करेंगे कि वह उस पाये का तो नहीं पर उस मिजाज का वैज्ञानिक था जिसके लिए हम जेम्स वैट और अल्वा एडिसन को याद करते हैं। वे उस अर्थव्यवस्था की उपज थे जिसको उन आविष्कारों और युक्तियों के लाभ की संभावनाएँ दीखती थीं और हमारा किसान उस अर्थव्यवस्था के विरोध में अपने प्रयोग और उसके परिणामों के साथ खड़ा था, और हम उसका नाम तक नहीं जानते। कितना शर्मनाक है।’’
‘शर्मनाक’ का प्रयोग मैंने जान बूझ कर उसको चोट पहुँचाने के लिए किया था, फिर उसने अपने को सँभालते हुए कुछ कहना चाहा। मैंने मौका ही न दिया। पूछा, इतने ज्ञानी हो, सीपीएमएल का मतलब जानते हो।
जानता हूँ पर मानता नहीं, इसका पूरा पाठ है कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सिस्ट लेनिनिस्ट।
मानता तो मैं भी नहीं परन्तु अपने प्राण निछावर करके भी समाज को बदलने का संकल्प लेने वाले मेधावी और अनमोल रतन तो उसे ही चुनते हैं? उनके उद्घोष से प्रभावित युवकों को इस शब्द का न तो अर्थ पता होता है न ही उस परिणाम का बोध जिसके तहत वे अपने अधिकार क्षेत्र को आगे बढ़ने ही नहीं देते। न शिक्षा, न स्वास्थ्य व्यवस्था, न आर्थिक विकास। इतना क्रूर नियन्त्रण और अपनी प्रजा का उत्पीड़न तो क्रूर शासकों ने भी नहीं किया होगा। फिर भी सपने के प्रति जीवन उत्सर्ग करने वालों की कतार जारी है।“
“यह बताओ, तुमने उनसे कभी पूछा कि सीपीएमएल को बदल कर उन्होंने सीपीएमएम क्यों नहीं किया। आखिर चाइनार प्रेजिडेंट आमादेर प्रेजीडेंट का नारा और पोस्टर तो वे ही लगा रहे थे?” ‘‘भई, लेनिन के सामने माओज्देदुंग तो उन्नीस ही पड़ेंगे न।“
‘‘मेरी जो समझ है उसमें माओ के सामने लेनिन छोटे पड़ते हैं। माओ वैज्ञानिक सोच रखते थे। जानते हो वैज्ञानिक युग कर आरंभ हुआ था या वैज्ञानिक विकास के लिए एक संस्था किस नारे के साथ स्थापित हुई थी। इसका नारा था प्रयोग। जो तुम सिद्धान्त से जानते हो, उसे परख कर देखो कि वह सही भी है या नहीं। सिद्धान्त और प्रयोग या व्यवहार के बीच से सत्य के अन्वेषण की प्रक्रिया यहाँ से आरंभ हुई। भौतिक विज्ञानों ने तो इसे अपना लिया, सामाजिक विज्ञानों ने इसे समझा ही नहीं। इसे समझने वाला एक मात्र दार्शनिक माओ थे जिसने कहा पैक्सिस अर्थात् सिद्धान्त और प्रयोग और परिणाम पर ध्यान दो। इसी के चलते उन्होंने सांस्कृतिक क्रान्ति की। इसे कई तरह से बदनाम करने की कोशिश की गई। परन्तु मैं यह जानना चाहता हूँ कि चाइनार प्रेजिडेंट आमादेर प्रेजीडेंट के नारे के साथ रंगभूमि में पधारने वालों ने कभी माओ को उचित सम्मान दिया? क्या उन्होंने अपने दल का नाम मार्क्सिस्ट लेनिनिस्ट इसलिए नहीं रखा कि ब्रिटेन में एक इसी नाम की पार्टी का जन्म हो चुका था, भले वे चाइनाज प्रेजीडेंट आमादेर प्रेजीडेंट को अपने लिए व्यर्थ मानते रहे हों।“
वह मेरी ओर अचरज से देखने लगा, ‘‘तुम यह सब कहाँ से इकट्ठा करते हो।’’
‘‘सूचना के विस्तार के साथ किताबी बातें किताबी लोगों के नियन्त्रण से बाहर चली गई हैं। जो दुर्लभ है वह दृष्टि। जरूरत है कागज की लेखी के साथ आंखिन देखी की। इससे धन्धेबाजों की दूकानें फीकी पड़ जाती है। वे तिलमिलाने लगते है। सच पर परदा सूचनाओं के ताने बाने से बुना होता है इसलिए कम सूचना रखने वाला भी अपनी नजर से काम लेने के कारण उन पर भारी पड़ता है और वे नारेबाजी करने लगते हैं। प्रेस उनके हाथ में है, प्रचारतन्त्र में वे घुसे हुए हैं इसलिए उनकी अनर्गल बातें भी सही लगती हैं। परन्तु यह बताओ, मार्क्स के बाद सबसे वैज्ञानिक सोच रखने वाले, सिद्धान्त को प्रयोग पर परखने वाले वैज्ञानिक चिन्तक का नाम उनकी श्रद्धा के बाद भी उनके धड़े के नाम में क्यों नहीं आया? लेनिन, माफ करना, मेरी किताबी जानकारी मामूली है, फिर भी दुस्साहस के कारण कहना चाहता हूँ कि माओ के सामने लेनिन नगण्य है और इस तथ्य को समझने में असमर्थ दल ने यह लौट कर देखने का कभी प्रयत्न न किया कि वह जो कर रहा है उसका परिणाम क्या हो रहा है।
‘‘तुमको एक अन्य क्रूर सचाई दिखा दें। तुम जानते हो, ये जो हमारी अर्थव्यवस्था, अर्थात् बाजार को काबू में रखते हैं, उनका अपना ज्ञान कितना है?’’
‘‘धेले का।’’
‘‘यही तुमसे सुनना चाहता था। फिर भी उनके नीचे असाधारण योग्यता वाले विद्वान काम करते हैं और वे उनकी परख से गुजरने को बाध्य होते हैं। वे उनकी योग्यता को जानते हैं, परन्तु उसकी कसौटी उसके परिणाम को मानते हैं। आप इतने ज्ञानी हो, पहले से अधिक, पर आप ने जो कुछ किया उससे पैदा क्या हुआ और उससे हमे लाभ क्या हुआ।,
“यही सवाल अपने विद्वानों से पूछने की हिम्मत जुटानी पड़ेगी कि अपने असाधारण पुस्तकीय ज्ञान के बावजूद तुमने जो व्यवस्था बनाई उसने हमें क्या दिया है, समाज को क्या दिया है और तुम्हें क्या देकर उसने हमें जो मिल सकता था, उससे हमें वंचित कर दिया है।“
“यार तुम रौ में आते हो तो समझ में नहीं आता कि कह क्या रहे हो।“
“ठीक है, समझाने के लिए मुझे फिर उसी पेय पर आना पड़ेगा जिसकी चर्चा एक बार आई और फिर सदा के लिए दब गई। क्यो? शोर मचाने वाले खरीद लिए गए। उसके बाद वह पेय एक नए ड्रग के साथ बाजार में आया और यह दिल माँगे मोर के विज्ञापन के साथ। अर्थात् उसमें कोई ऐसा तत्व मिला दिया गया है कि प्यास बुझाने के लिए आप उसे पीते हैं और उस रसायन के कारण प्यास और बढ़ जाती है। उसकी लत सी पड़ने लगती है फिर भी आपके जानकार लोग चुप हैं और इसके बाद यदि कोई किसान या भुक्तभोगी आवाज उठाए भी तो वह दब जाएगी। यह दिल माँगे मोर की तर्ज पर। हमें बिकाऊ विषेशज्ञों की जगह अपनी आँख से काम लेने वालों के साथ खड़ा होना है जिनके पास सही जुमले नहीं हैं कि वे अपने सच को बयान कर सकें और उनके विरुद्ध खड़ा करना है जो अपने बिकाऊ जुमले बाजी के सैलाब से उस अनुभूत सत्य को छिपा लेते हैं। मुझे गूँगों की आवाज बनने के लिए बताना पड़ता है कि मैं किसी विषय को जितना जानता हूँ उससे अधिक का दावा नहीं करता, परन्तु वे जितना जानते हैं उससे अधिक का ढिढोरा पीटते हैं और अपने जाने हुए का भी वह हिस्सा छिपा लेते हैं जो उनके स्वार्थ से अनमेल पड़ता है इसलिए समझ के स्तर पर काफी नीचे और हमारे लिए बेकार सिद्ध होते हैं. आज की नब्बे प्रतिशत समस्याओं की जड़ वे ही हैं, इसलिए अपनी सीमित जानकारी के बावजूद हस्तक्षेप करना पड़ता है. मेरी स्थिति उस किसान की सी है, जिसे ओझल कर दिया जाना है जिससे यह दिल मांगे मोर का बाजार बना रहे.”
“सत्य मेरे साथ है ढिढोरा उनके साथ. तुम भी उनके हे साथ हो भाई. मुझे अकेला पड़ना ही है.”
11/22/2015 8:15:07 AM

Post – 2015-11-21

हर एक को ये गुमाँ है इधर को देखते हैं
“तुमने पूरे कम्युनिस्ट आन्दोलन का अवमूल्यन करके मुस्लिम लीग की बराबरी पर पहुँचा दिया? क्या यह उचित है?”
“नहीं। यह गलत है। यदि ऐसा लगता है तो मेरे कहने में कोई कमी रह गई।“
“अब ठीक है।“
“जब तुम किसी एक पक्ष पर बात कर रहे हो तो हर मौके पर उनके समग्र को रखते चलो तो कुछ समझ मे आएगा ही नहीं। इसलिए वैज्ञानिक प्रयोगों में समग्र में से एक एक तत्व को अलग करके, आइसोलेट करके, उन्हें समझना पड़ता है और फिर मूल्य निर्णय के समय सभी पक्षों पर विचार करते हुए निर्णय करना पड़ता है।
‘‘फिर भी हम पूरे विवेचन में अपने ही विचारों के दबाव में एक दिशा में बह जाते हैं और कुछ पहलू छूट जाते हैं, यह हमेशा, हर बार होता है। ऐसा मुझसे भी होता रहता है। धीरज से, बहुत सँभल कर, एक-एक शब्द तोल कर, सन्तुलित कथन करने वाले विरल होते हैं। इसे वे लम्बी साधना से प्राप्त करते हैं, और उनके कथन का जादू जैसा असर होता है। वह योग्यता अर्जित तो करना चाहता हूँ, कर नहीं पाया हूँ।
रही हमारे देश की कम्युनिस्ट पार्टी की बात, या क्रान्ति की बात। इसका विचार पूँजीवादी शोषण और दोहन के उस पैशाचिक चेहरे से घबरा कर उन बौद्धिक प्रतिक्रियाओं से हुआ था जिनमें विक्षाभ अधिक था दिशा स्पष्ट नहीं थी। दीपस्तंभ थीं विफल रूसी क्रान्तियाँ जिनके नारे सामन्ती तन्त्र पर वज्राघात थे परन्तु जिनका सबसे अधिक उपयोग पूँजीवादी औद्योगिक क्रान्ति ने किया। इसलिए विक्षोभ के कुछ रूपों में स्वतन्त्रता और समानता तक के अपहरण की बात थी जो फासिज्म बन कर उभरा। एनार्की का अनुवाद हम अराजकता कर देते हैं, जो गलत है। यह राजसत्ता से मुक्ति और अपना प्रबन्ध स्थानीय इकाइयों द्वारा करने और राज्य को कुछ अन्तर्देशीय गतिविधियों तक सीमित रखने की बात थी जो साम्यवाद में भी आया। सबसे खतरनाक रूप था विनाशवाद या निहिलिज्म, जो आत्मकेन्द्रिता का वह रूप है जिसमें ‘आप मरे जब परलै होय’ का मुहावरा निकला है, या जिससे जोश की वह जोशीली परन्तु सर्वनाशवादी पंक्तियाँ निकली थीं, ‘जिस खेत से दहकाँ को मयस्सर न हो रोटी, उस खेत के हर खोशए गन्दुम को जला दो।’
“विक्षुब्ध स्थितियों की प्रतिक्रियाएँ ऐसी ही होती हैं।“
भारतीय स्वतन्त्रता अभियान के तेज होने के साथ इसी तरह का विक्षोभ उस जमात में भी था जिन्हें डर था कि उनका वर्चस्व लोकतान्त्रिक व्यवस्था में छिन जाएगा, या शायद उनके साथ बदले की भावना से काम किया जाएगा और उनकी तौहीन होगी। इनका एक कोण जमीदारों और तालुकेदारों से जुड़ा था, जिनमें दोनों जमातों के लोग थे और जिनकी प्रेरणा से मुसलिम लीग और हिन्दू महासभा का जन्म हुआ था और जिनकी चिन्ताएँ इन दोनों संगठनों के व्यवहार में प्रकट थीं। इन सभी में ‘करें तो क्या करें और जाएँ तो जाएँ कहाँ’ वाली बेचैनी और दिशाहीनता थी। लीगी और हिन्दूमहासभाई चेतना के लोग कांग्रेस के भीतर भी थे, बाहर भी थे। इन सभी में अभिजनवादिता का तत्व प्रधान था। लोकतन्त्र में विश्वास कम था। सुयोग्य का शासन जाहिलों के शासन से अच्छा है का भाव था। इकबाल की वह पंक्ति ‘जमहूरियत एक तर्जे हुकूमत है कि जिसमें बन्दों को गिना करते हैं तोला नहीं करते।’ इसी दिशाहीनता की एक अभिव्यक्ति पाकिस्तान की माँग थी जिसकी नींव 1906 में ही पड़ गई थी और जिसके नामकरण का श्रेय रहमत अली को दिया जाता है। ये चिन्तित होने वाले लोग अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से आगे जा कर अपने समुदाय के हित से कातर लोग थे और इसलिए मेरी नजर में आदरणीय भी।“
“कम से कम अपने निजी स्वार्थ के लिए पूरे देश को बेच खाने वालों से तो अच्छे ही थे।“
“कम्युनिस्ट पार्टी स्थापना भी इसी दिशाहीनता के बीच से हुई थी जिसे प्रेरणा रूसी क्रान्ति की सफलता से मिली थी न कि मार्क्सवाद के अध्ययन और विवेचन तथा अपने देश और समाज में उसकी उपादेयता की समझ से। जन्म तिथियाँ भी दो बताई जाती हैं। एक के अनुसार 25 दिसम्बर 1925 को कानपुर में आयोजित प्रथम सम्मेलन में हुई थी जब कि दूसरी समझ के अनुसार उससे पाँच साल पहले ताशकन्द में दूसरे कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के कुछ ही बाद 17 अक्तूबर 1920 में। इस के स्थापक सदस्यों में एम.एन.राय, उनकी पत्नी एल्विन ट्रेंट राय, अबनी मुखर्जी और उनकी पत्नी रोजा फितिंगोफ, मुहम्मद अली (अहमद हसन), मोहम्मद सफीक़ सिद्दीक, रफीक अहमद, सुल्तान अहमद खान थे । कहते हैं ऐसे कई भारतीय कम्युनिस्ट ग्रुप विदेश में अन्यत्र भी गठित किए गए थे। इसमें दो बातें स्पष्ट हैं। एक तो इसके संस्थापक जमीन से उठे हुए लोग थे और भारतीय सचाई से उनका परिचय नहीं था। दूसरे ये रूसी क्रान्ति की सफलता से प्रेरित थे जिनके पास मार्क्सवाद क्रान्ति की कामना के बाद पहुँचा। मोटे तौर पर यही बात कानपुर अधिवेशन के विषय में भी कही जा सकती थी परन्तु इसका एक स्थानीय या देशज आधार भी था। रूस की क्रान्ति रूसी परिस्थितियों की उपज थी जिसमें जारशाही का विरोध था। भारतीय भूमि में ब्रितानी सत्ता का विरोध कांग्रेस कर रही थी। कम्युनिस्ट पार्टी का गठन उस सत्ता से टकराने की चिन्ता से न हुआ अपितु लोकतांत्रिक व्यवस्था की जगह रूस जैसा कुछ करने से हुआ था।
‘‘मोटी बात यह कि तुम मानते हो कम्युनिस्ट पार्टी कुछ उत्साही लोगों की बौद्धिक सन्तान थी, न कि भारतीय यथार्थ की उपज?’’
‘‘इससे भी आगे, मैं यह मानता हूँ कि यह ऐसे उत्साही लोगों की सन्तान थी जिनको भारतीय यथार्थ का ज्ञान भी नहीं था और उूपर से नीचे उतरना चाहते थे। मिसाल के लिए राय जो 1925 के अधिवेशन में भी प्रेरक बने थे अनुशीलन, युगान्तर आदि समूहों से संपर्क कायम करते हुए बंगाल में अपनी शाखा स्थापित करना चाहते थे जो मुजफ्फर अहमद के नेतृत्व में स्थापित हुई। इसी तरह पार्टी भारतीय राष्ट्रीय और मुक्ति चेतना पर आकाशबेलि की तरह फैल रही थी और अपनी जड़ें जमाने की जगह उस महाबृक्ष का रस चूसते हुए उसे कमजोर कर रही थी। इसलिए लम्बे समय तक इसमें दो तत्व हावी रहे एक विदेशी परामर्श, विदेशों पर निर्भरता और दूसरे किसी न किसी तरह व्यापक जनाधार की तलाश, जो विदेशी भाषा, सामन्ती जीवनशशैली और बौद्धिक स्नाबरी के रहते संभव ही न थी। इसी बीच किसी ‘दूरदर्शी’ ने यह सुझा दिया कि यदि द्विराष्ट्र सिद्धान्त को मान लिया जाय तो पूरा मुस्लिम जनमत हमारे साथ आ जाएगा और एक झटके मे एक व्यापक जनाधार मिल जाएगा। इसे लपक लिया गया और इसके परिणाम स्वरूप मुस्लिम लीग की सोच का प्रवेश कम्युनिस्ट पार्टी में हुआ, परन्तु इसका लाभ कम्युनिस्टों को नहीं, लीग को मिला।“
“यदि कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन न मिला होता तो जनमतसंग्रह के ठीक पहले का मुसलिम मतों का विभाजन के पक्ष में वह ध्रुवीकरण न होता और वह योजना ही फेल हो जाती।“
“चलो बहुत बाद में दबे सहमे सुर में माना गया कि हमसे चूक हो गई, परन्तु इसका अहसास होने के बाद भी क्या पार्टी का चरित्र बदला?
“ऊपर से नीचे उतरने के क्रम में आकाशबेलि वाली शैली में ही अपने क्रान्तिकारी आश्वासनों और विराट सपनों से प्रबुद्धवर्ग को -पत्रकारों, लेखकों, अभिनेताओं आदि को – जिनकी प्रचारशक्ति के बारे में किसी टिप्पणी की आवश्य कता नहीं, आकर्षित करने के आयोजन हुए जिनमें इप्टा आदि के नाम से हम इतने अभिभूत हो जाते हैं कि पता चले अमुक इप्टा से जुड़ा रहा या उसकी उपज है तो रक्तसंचार बढ़ जाता है। इसमें उस उग्रता को भी नरम बनाना पड़ा और नेहरू में भी क्रान्तिकारी पक्षधरता दिखाई देने लगी। इसमें सबसे अग्रणी भूमिका पी. सी. जोशी की थी। आल इंडिया प्रोग्रेसिव राइटर्स असोशिएशन की स्थापना भी 1935 में लंन्दन में हुई थी और इसमें भी जमीन की समझ से अधिक भावुकता का ही पुट था। सामाजिक स्तर पर प्रगति के नाम पर केवल हिन्दू समाज की विकृतियों को दूर करने के लिए इसके मूल्यों और सांस्कृतिक प्रतीकों का उपहास और भर्त्सना का सहारा लिया जाता रहा। हम प्रगति और परंपरा, रूढ़ि और परंपरा के भेद आदि पर चलने वाली बहसों को देखें तो यह देख कर हैरानी होती है कि ये सारी बहसें हिन्दू समाज तक सीमित थी। इसे हिन्दू देश बनाने का जितना काम दक्षिण पन्थियों ने न किया होगा उतना अपने को प्रगतिशील कहने वालों ने किया। दो तरह की नागरिकता, एक पर कानून लागू और दूसरे पर नहीं, यह करना भी दक्षिण पन्थियों के वश का नहीं था। इसकी परिणति सबसे बुरी हिन्दी प्रदेश में हुई जिसमें उर्दू और हिन्दी के बीच चुनाव उतना निर्णायक नहीं था जितना अरबी लिपि और नागरी लिपि के बीच का चुनाव। मुझे लगता है, मेरा अघ्ययन भी कम है और समझ भी सुथरी नहीं है, इस हिन्दी प्रतिरोध ने कम्युनिस्ट आन्दोलन को हिन्दी क्षेत्र में प्रवेश करने से रोका, इसकी भाषा को अंग्रेजी रहने दिया और इसी चिढ़ का परिणाम यह कि जिसे रामविलास जी हिन्दी प्रदेश कहते हैं, उसकी वैधता को स्वीकार न करने वाले इसे काउ बेल्ट कहने के बाद स्वीकार कर लेते हैं।“
मेरा अध्ययन अतीत इतिहास को ले कर चलता रहा है इसलिए इन सबकी एक मोटी ही जानकारी मुझे है अपना मत सामने रखते हुए भी डर लगता है कि कहीं मुझसे अपनी नासमझी के कारण कोई चूक न हो गई हो ।

Post – 2015-11-20

न समझे हैं न समझेंगे कभी हिन्दोस्ताँ वाले
छिपे दुबके रहेंगे अपने अपने आशियानों में।
कुलों में जातियों, फिरकों में मजहब के झमेलों में
फसाना बन कर रहना चाहते हैं वे फसानों में।।

अदायगी की दाद दी तो वह सिर पर सवार हो गया। बोला लो कुछ और सुनाता हूँ।
मैंने रोक दिया। धीरज की परीक्षा मत लो। है तो यह इक़बाल की पैरोडी ही न।
उसका उत्साह ठंडा पड़ गया। मानना पड़ा कि है तो पैरोडी ही, पर बताया कि उर्दू में पैरोडी को ऊँचा दर्जा हासिल है। लोग दूसरों के मिसरे ले कर अगला मिसरा ठोंक देते हैं और इसी से अपने को उसकी बराबरी का मान कर आईने के सामने अपनी पीठ थपथपाते हैं। फिर एकाएक छलांग लगाया, ‘यह बताओ, तुम्हें मुस्लिम लीग से ही घृणा क्यों है?’’
जी में आया एक जोर का मुक्का उसके मुँह पर, सीधे नाक पर, मारूँ और पूछूँ यह खयाल तुझे आया कहाँ से? पर सोचा मेरे मुक्के से इसका कुछ बिगड़े या न बिगड़े, उत्तेजित हो कर वह जो घूँसा जमाएगा, उससे मेरे होश हवास गुम हो जाएँगे। इसलिए समझदारी का आविष्कार करते हुए कहा, ‘‘क्या मैं यह नहीं कह आया हूँ कि जो जिससे घृणा करता है उसे समझ नहीं सकता?’’
उसके पास कोई जवाब नहीं था, चुप रहा, पर उस तरह की चुप्पी जिसका अर्थ होता है, उत्तर नहीं सूझ रहा है परन्तु मैं तुम्हारे विचार से सहमत नहीं हूँ।
‘‘मैं जानता था। सहमत होने या समझने के लिए भी कुछ समझ तो होनी चाहिए’’
‘‘पहेलियाँ मत बुझाओ।“
क्या तुम्हें पता है कि मुस्लिम लीग अंग्रेजों की चाल से ही नहीं, हमारी मूर्खता और बंगाली स्वार्थपरता से पैदा हुई थी। देखो यह मेरी समझ है। कोई दूसरा इसकी छानबीन करे तो इसमें गलतियाँ निकल सकती हैं।“
“मैं समझूँ तो, कि तुम कहना क्या चाहते हो।“
देखो, अंग्रेजों ने कलकत्ता को अपनी राजधानी बनाया। इसमें ही शिक्षा और अमलातन्त्र तैयार करने के अपने प्रयोग किए। अंग्रेजी राज के नीचे से एक बंगाली राज आरंभ हुआ। बंगाल एक बड़ा राज्य था। इसके भीतर बिहार का भी काफी हिस्सा आता था। असम और ओडिशा का भी समावेश इसी में था। इनकी शिक्षा की भाषा बंगला कर दी गई थी। अध्यापक, डाक्टर, वकील, सरकारी नौकर सब में बंगालियों का प्रभुत्व था और हालत यह की बंगालियों को लम्बे समय तक मुगालता रहा की वे एक सुपीरियर रेस हैं। उनके आचार व्यवहार में इसकी छाया आज तक बची मिलेगी। बंगाली आधिपत्यवाद के चलते ओड़िया, मैथिल, असमिया और पूर्वी बंगाल की भाषाओं को बांग्ला की बोलियाँ माना जाता था। स्थानीय लोग इससे असन्तुष्ट और कुंठित अनुभव करते थे, परन्तु यह आधिपत्य भाव बंगाल के उदार माने जाने वाले लोगों में भी था। ठीक उस समय जब कांग्रेस स्वायत्तता की माँग की दिशा में बढ़ रही प्रशा सनिक तकाजे की आड़ में साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने में ब्रिटिश कूटनीति को सफलता मिली। यदि कुछ परिपक्वता दिखाई जाती, इस प्र शासनिक विभाजन को प्र शासन की समस्या मान कर इसकी ओर ध्यान न दिया गया होता तो इसने दोफाँक बटवारे का रूप नहीं लिया होता। इसकी सबसे बड़ी विषेशता थी कि कांग्रेस के भीतर हो या बाहर सभी मुसलमान विभाजन के पक्ष में थे, और सभी हिन्दू इसके विरोध में। कहें मनोवैज्ञानिक आधार पर पाकिस्तान की नींव इसी समय पड़ गई थी जिससे वह सूत्र निकला था कि मुसलमान हिन्दुओं के साथ सुख-चैन से नहीं रह सकते। जिन्ना ने इसे अधिक तार्किक बना दिया। मोटे तौर पर तुम कह सकते हो, सभी मुसलमानों के भीतर मुस्लिम लीगी चेतना दबे या खुले रूप में बनी रही है, जब कि हिन्दुओं में इसने इतना स्पष्ट तेवर नहीं लिया फिर भी इससे बचा शायद ही कोई था।“
“तुम इसे बहुत इकहरा बना दे रहे हो।“
“हाँ इकहरा तो है, इकहरा इसलिए है कि हम इसके उजागर पक्ष को ले रहे हैं। चेतना के स्तर पर इसकी जड़ें बहुत पीछे तक, तुम कहना चाहो तो मध्यकाल तक, और आगे बढ़ना चाहो तो मुहम्मद साहब तक और उससे भी पीछे ले जाना चाहो तो ईसाइयत के विस्तार काल या उसके जन्म काल तक ले जा सकते हो। हम कोई निर्णय लेते समय कई युगों और युगान्तरों के सूत्रों से प्रभावित होते हैं। वे दिखाई नहीं देते पर उनका दबाब कम निर्णायक नहीं होता।“
“तुम्हारा जवाब नहीं भाई! भइस बिआनी मोहबा गढ़ में पढ़वा गिरा फरुख्खाबाद! लीग को लिए दिए पहुँच गए ईसाइयत के जन्म तक।“
“इसलिए कि मुस्लिम मनोरचना के निर्माण में सामी पृष्ठभूमि का बहुत बड़ा हाथ है परन्तु मुहम्मद साहब ने उस प्रभाव को मेरे अनुमान से ईसाइयों से अपनाया था और कुछ दूर तक उन्हें ही माडल बनाया था। यह जो हिजाब है, यानी बुरका का चलन ईसाई ननों से आया लगता है । जिस कबीले में मुहम्मद साहब का जन्म हुआ था वह तो मातृप्रधान था और जिन बद्दुओं के बीच उनका बचपन बीता था उसमें तो महिलाओं को बहुत स्वतन्त्रता थी। यह ईद, बकरीद, बुतपरस्ती का विरोध सब, नामकरण और माइथालोजी तक। जालीदार टोपी जो हाल में बड़ी लोकप्रिय हुई है पोप के सर पर भी दिखाई दे जायेगी। तो मुस्लिम मनोरचना में अस्मिता के ये जो सूत्र हैं बहुत दूर तक जाते हैं और समय समय पर बखेड़े इनके माध्यम से ही पैदा किए जाते रहे हैं।
“और बंगाल के जिस बटवारे की बात कर रहा हूँ वह भी सन 1904 में या 1905 में एकाएक नहीं आ गया। इसकी तैयार उन्नीसवीं शताब्दी में ही आरंभ हो गई थी।“
“विश्वास नहीं होता। तुम अक्सर अति पर चले जाते हो।“
“पहले सुनो। जान बीम्स ने जो बहुत अच्छा भाषाषास्त्री था और जिसने कंपैरेटिव ग्रामर आफ आर्यन लैंग्वेजेज लिखा था, उसकी मदद से या उकसावे से फकीर मोहन सेनापति ने ओडिया जागरण का मन्त्र फूँका और उसे एक अलग स्वतन्त्र पहचान दिलवाई। असमिया को अलग पहचान के लिए हेमचन्द्र बरुआ, शायद यही नाम था, वे संघर्ष से जुड़े थे। बंगालियों को यह जो अग्रता मिली थी वह कलकत्ता केन्द्रित थी इसलिए जैसे ओड़िया, असमिया और मैथिल भाषी नौकरियों और अन्य मामलों में उपेक्षित अनुभव करते थे उसी तरह पूर्वी बंगाल के लोग भी अपने को उपेक्षित अनुभव करते थे। पूर्वी बंगाल में मुसलिम आबादी अधिक थी, इसलिए प्रषासनिक सुविधा की आड़ में कहो, या सचमुच इस तकाजे से जब उसे बंगाल से अलग प्रान्त बनाने की घोशणा की गई तो पश्चिम बंगाल के हिन्दुओं ने इसे बंगभंग की संज्ञा दे कर हिंसक आन्दोलन आरंभ कर दिया। यह बंगभंग से अधिक उनके अपने वर्चस्व की लड़ाई थी। अब यहाँ से एक भौगोलिक विभाजन ने साम्प्रदायिक विभाजन का रूप ले लिया। 1905 में बंगाल का विभाजन हुआ था, 1906 में इसे हिन्दू मुस्लिम हितों का प्रश्न बना कर मुस्लिम लीग की स्थापना ढाका में हुई यद्यपि इसमें भाग लेने वाले 3000 प्रतिनिधियों में भारत के अमीर मुसलमानों के प्रतिनिधि ही थे।
मुस्लिम लीग की सबसे बड़ी दुर्बलता सर सैयद की उस आकांक्षा से पैदा हुई जो उन्होंने इंग्लैंड दर्शन के बाद, इंग्लैंड की हर दृष्टि से अग्रता देख कर उनके निकट आने की आकांक्षा में वैसे ही विश्वविद्यालय का सपना देखा और शिक्षा में मुस्लिम पिछड़ेपन को दूर करने के लिए शिक्षा का भार अंग्रेज प्रिंसिपल को दे दिया। जब कि मालवीय जी ने इस तरह की भूल नहीं की। संस्कृत कालेजो की बात अलग थी। वे सरकारी पहल पर खोले गए थे और सरकार ही उनके प्रिंसिपल की नियुक्ति करती थी। इसके माध्यम से वह संस्कृत विद्वानों में अपनी पसन्द का प्राचीन भारतीय इतिहास उतारती रही और इसलिए इन कालेजों के माध्यम से निकले संस्कृत विद्वान आर्य आक्रमणवादी बनते चले गए। शिक्षित मुस्लिम समाज की मनोरचना के निर्माण का काम उन्हें सौंप देना जो उस समाज का अपने लिए उपयोग करना चाहते थे, एक भारी भूल थी।
परन्तु भुलाया नहीं जाना चाहिए कि आरंभ में मुस्लिम लीग मुस्लिम हितों की चिन्ता करने के लिए बनी थी। स्वतन्त्रता आन्दोलन तेज होने के साथ इस संभावना से इसने दहशत का रूप लेना शुरू किया और फिर हिन्दू-द्रोह ही नहीं हिन्दू जान-माल और सम्मान को मिटाने की डरावनी मुहिम बनती चली गई। अलगाव को तीखा करने के हथकंडे अपनाने लगी जो कलकत्ता के दंगे में या सुहरावर्दी के डाइरेक्ट ऐक्शन में देखने में आया। यह जानते हुए कि दंगा इतना बड़ा रूप लेगा तो पहले हिन्दू भले अधिक मारे जाएँ अन्ततः मुसलमानों को ही भुगतना होगा। उस दंगे में हिन्दुओं से अधिक मुसलमान मारे गए थे। पर नफरत की नहीं तो दहशत की दीवार खड़ी करने के उद्देश्य में तो सफल हो ही गए। हैरानी की बात यह कि जिन्ना पाकिस्तान की माँग मनवाने के लिए डाइरेक्ट ऐक्शन की खुली धमकी दे रहे थे और नोआखाली आदि में जो हुआ उसने मुस्लिम लीग का चेहरा अधिक हिन्दूद्वेषी बना दिया ।
दुख की बात यह है कि इसी मुसलिम लीग की आत्मा का प्रवेश वामपन्थी आन्दोलन में हिन्दू समाज को विकृतियों का घर, इसके इतिहास को मलिताओं से ग्रस्त और हिन्दू सांस्कृतिक प्रतीकों को जहालत का प्रमाण बताते हुए, इन्हें दूर करने के नाम पर अभियान चलाए जाते रहे। जितना ही अधिक तेज आन्दोलन उतना ही अधिक गर्हित होता हुआ हिन्दू समाज। इसी के अनुरूप इतिहास लिखवाये जाते रहे, फिल्मों में इसे जगह जगह घुसाया जाता रहा, साहित्य में इसे प्रोत्साहन दिया जाता रहा और तर्कवाद के नाम पर बहुत कुछ ऐसा किया जाता रहा है जो न किया जाता तो पूरे देश का भला था। मुस्लिम हितों की चिन्ता करने वाली लीग को मैं उचित मानता हूँ और उसकी परिणति को देश और मुसलिमों सहित पूरे समाज के लिए अनिष्टकारी मानता हूँ।“