Post – 2017-09-30

किसको दुश्मन कहें सगा किसको

मकान बड़ा था, परन्तु जितना बड़ा था उससे अधिक रहस्यमय लगता था। यह बिना किसी विभाजन रेखा के दो भागों में बंटा था। इन्हें हम अलंग कहते थे। इसका दृश्य भाग धुंधला और शेष डरावनी संभावनाओं वाले अंधकार और सन्नाटे से भरा लगता, जिसमें अकेले घुसने की न मुझे जरूरत पड़ सकती थी, न घुसने का साहस कर सकता था। इसका सबसे रहस्यमय और सबसे अंधेरा कोना था, दक्खिन-पच्छिम कोने की कोठरी जिसमें लगभग जीवन से निर्वासित की तरह बुटुका काकी रहती थीं। वह सबकी काकी थीं, बाबा की भी, सच कहें तो बाबा लोगों की ही। वह हमारे परदादा छत्तर बाबा के सबसे छोटे भाई नैपाल ठकुराई की पत्नी थीं जिनके एक बेटी तो हुई थी, बेटा कोई नहीं। वह होकर भी न होने जैसी जिन्दगी जी रही थीं। मेरी दादी की मौत कब हुई इसे न किसी ने बताया न पूछने का साहस हुआ। छोटी दादी की मौत मेरे जन्म के कुछ ही बाद हुआ होगा क्योंकि उनकी अन्तिम संतान, जगदीश काका थे जो मुझसे छह महीने ही बड़े थे और आगे की कक्षाओं में मेरे सहपाठी थे। जैसे बुटुका काकी सबकी काकी थीं वैसे ही जगदीश काका मेरे और अपने सभी सहपाठियों के काका बनने वाले थे।

उस तीस पैंतीस फुट लंबाई के बिना खिड़की-रोशनदान के सुरंग जैसे अंधेरे आठ कमरों वाले घर में दो महिलाओं का राज था। माई काकी से पद में बड़ी थी, इसलिए वह भैयाजी ’ब कह कर माई के गोड भी लगती थीं और अनुभव और उम्र में बड़ी थीं इसलिए माई को दबाकर रखने के तरीके भी निकालती रहती थी जिसमे उसे अपमानित करने के तरीके भी शामिल थे, परन्तु औपचारिक व्यवहार इतना सम्मानजनक कि शिकायत करने वाला जिससे शिकायत करे उसकी ही नज़र में गिर जाये।

भैया और दीदी को मां की याद थी और अपनी माँ का स्थान लेनेवाली स्त्री को स्वीकार करने को तैयार न थे। ऊपर से माई के व्यवहार में, प्रकृति प्रेरित, सपत्नघातिनी वाले तत्व तो थे ही, इसलिए उन्होंने विद्रोह सा कर दिया था। मेरी स्थिति दूसरी थी।

शिशुओं के चेतना जगत में असंभव और प्रतिलोम भी इतने विश्वसनीय रूप में घटित होते हैं कि बड़े होने पर हम उस अनुभव और उसके अतार्किक सत्य को, एक भिन्न भाषा में, अधिक विश्वास से, व्यक्त करने वाले तंत्र को समझ ही नहीं पाते और उसकी याद दिलाई जाय तो ठहाका भरने लगते हैं। हम स्वप्नतंत्र की अकाट्य प्रामाणिकता के पीछे काम करने वाले तर्कातीत दबाव को नहीं समझ सकते और यह तो समझ ही नहीं सकते कि मूर्खता के कितने आयाम और सत्य के साक्षात्कार के कितने अकल्पित द्वार होते हैं।

मै मानता था, और भैया और दीदी के समझाने के बाद भी मानता था कि माँ मरी नहीं है। मुझसे ओझल हो गई है। जीवन के साथ इसकी समाप्ति से अधिक क्रूरता की मैं कल्पना नही कर सकता था, इसलिए पहले ही साक्षात्कार में वह मेरा नाम आदि पूछती, उससे पहले ही मैंने स्वयं पूछा था, ‘तू कहाँ चलि गइल रहलू, हमसे कौनो भूल हो गइल रहल का?’

मैं कह चुका हूं, इस प्रश्न से वह विगलित हो गई थी और आगे कोई प्रश्न न कर सकी थी. उसने मेरा स्पर्श किया था, स्पर्श याद है, कहाँ, माथे पर या गाल पर या चिबुक पर या पीठ पर यह याद नहीं फिर भी यह याद रहा कि उसमें ममता थी, जो मेरे इस विश्वास को दृढ कर रहा था कि मेरी अपनी माँ ही लौट कर आई है. भैया या दीदी को भी मुझसे पहले इसी तरह अलग अलग बुलाया गया था. न कभी इस पर बात हुई, न यह जाना कि उनका अनुभव क्या था. मै प्रथम शक्ति परीक्षण में अपनी मैभा, विमाता, पर विजय पाकर, उसके मातृभाव को जगा कर लौटा था. भैया और दीदी युद्ध ठान कर लौटे थे।

मुझे कुछ समय लगा यह समझने में कि वह मेरी माँ है या कुछ और. वह कुछ और क्या होता है इसे समझने में भी उसने ही मदद की। वे इसे अपनी हथेली की रेखाओं से भी अच्छी तरह जानते थे। मुझे दो तटबंधों के बीच सही धारा का चुनाव करना था जिसमें जीवनयात्रा में व्यवधान दूर हो सकें, उन्हें अपने बचाव के लिए दूसरे को मिटाने के निर्णायक युद्ध में उतरना था। सभी सताए हुए थे और सभी अपने शत्रु को सताने का खेल खेल रहे थे और अपने उस विद्रोह के कारण दीदी और भैया काकी के हाथ लग गए थे और अपने व्यवहार से माई को उससे अधिक उत्पीडित कर रहे थे जितना वह उन्हें कर सकती थी।

अजीब स्थिति है। अत्याचारी पर अत्याचार हो रहा है। वह अपने अत्याचारियों के सामने निरुपाय है। वह उनका बदला उससे ले रहा है जो उससे अधिक निरुपाय है, उसी पर आश्रित है और उससे सहानुभूति रखता है। यह मैं था।

Post – 2017-09-29

स़च तो यह है मगर सच होने से क्या होता हे
वही होता है जो होकर भी नहीं होता है।।

सभी लोग दूसरों से कुछ अलग होते है। पहली नजर में एक जैसे लगने वाले परिवारों के सदस्यों को ध्यान से देखने पर वे दूसरों से काफी अलग और कुछ विचित्र लगते हैं। मेरे परिवार के साथ पाखंड का एक तत्व अलग से जुड़ गया था, इसलिए अनेक मामलों में यह दूसरों से अधिक विचित्र था। यह प्रेरक भी था और मारक भी, इसलिए इस विचित्रता पर हम गर्व करते थे। इसके कारण मेरी यातना कई गुना बढ़ गई थी। मेरे लिए मेरा घर अनाथालय से भी बुरा बन गया था और इसके बाद भी मैं इस पर बहुत बाद तक और, दूसरों से कुछ अधिक, गर्व करता था।

सामान्यतः दूसरे परिवारों में घरेलू कलह के कारण एक पुश्त के बाद बंटवारा हो जाता है। हमारा परिवार तीन पुश्तों से एक था और जब चूल्हे अलग हुए तो भी, खेती-बारी एक रही। पांच पुश्तों के बाद खेती भी बंट गई तब भी, आज सातवीं पुश्त चल रही और बाग-बगीचे बंटे नहीं हैं।
इसका शर्मनाक पक्ष यह कि जो लूटे सो खाए और सहयोग की गौरवपरंपरा की दुहाई देकर बंटवारे को असंभव बनाए और जो कमजोर या आलसी हो , वह दूसरे की नीयत की खोट और अपनी अकर्मण्यता को अपनी उदारता मान कर आत्मग्लानि से बचें और अपनों को समझाएं कि हम कितने उदार हैं और इस पर गर्व भी करने लगें और जिसकी खोट निकाल कर गर्व करें वह, उसे ही अपना चारित्रिक गुण मान कर उस पर गर्व करे, अपने को आश्वस्त करे और अपनों को उस पर गर्व करना सिखाए, परन्तु दूसरे को मूर्ख बनाने की सद्भावना गाथा की दुहाई देकर उसे मूर्ख बनाने की क्षमता पर भी गर्व करे और अपनों को गर्व करना सिखाए और इसकी एक अलग ‘गौरवशाली’ परम्परा कायम हो जाय।

अब एक का गर्हित दूसरे का गौरवशाली हो गया। कृपया यह न समझें कि मैं भारत का राजनैतिक इतिहास बखान रहा हूँ। सच मानें, मै अपने घर की, अपने भोगे हुए अनुभव की, और केवल अपनी, बात कर रहा हूं।

माँ जब तक जीवित थी परिवार बंटे होने पर भी, छोटी मोटी गलतियों पर आँख मूदने के बाद भी, न्याय की तुला काम कर रही थी। बाबा जब तक जीवित थे और खेती का काम पिता जी देख रहे थे और सहायक के रूप में अवध काका काम कर रहे थे, तक जिन्दा थी। हिसाब बराबर। क्योंकि जब पिताजी खेती की देखरेख कर रहे थे तब भी छोटे बाबा हर चीज की खोज खबर रखते थे और अपना समय छावनी पर ही बिताते थे। छोटे बाबा के जीवन काल में ही उनके सबसे बड़े पुत्र, रामचंद्र को सिपाही की नौकरी लग गई थी, इसलिए उनकी मृत्यु के बाद छोटे बाबा की संतानों में दूसरे अवध काका (अवधेश) उनके सहायक बन गए थे । इस तरह संतुलन बना रहा और ईमानदारी भी बनी रही। बाबा की मृत्यु के बाद पिता जी कुछ भौतिक कारणों से और कुछ आराम तलबा: हि देवाः के सिद्धांत से यह बहाना बना कर घर पर बैठ गए कि दरवाजे पर भी कोई होना चाहिए, और तराजू का दूसरा पलड़ा खाली हो गया और यहाँ से आरम्भ हुई वह चोरी और बेईमानी जिसे सहन करते हुए माई अपनी उदारता और उनकी कृपणता और तुच्छता के नमूने पेश करती हुई मेरी नजरों में भी महान होने का भ्रम पैदा करने लगी।

Post – 2017-09-27

जिनकी रुचि बीएचयू कांड में अभी बनी रह गई हो वे मेकिंग इंडिया में अजित सिंह की रिपोर्ट पढ़ें। मैं अपनी कहानी तक सीमित रहना चाहता हूं।

Post – 2017-09-26

बतंगड़

एक ऐसे दौर में जब समाचारपत्र विज्ञापन पत्र बन गए हैं, दृश्य माध्यम सनासनी पैदा करने के लिए जघन्यतम अपराध कर सकते हों ( तहलका के माध्यम से फर्नांडीज का जालसाजी पूर्वक चरित्र हनन, एक गरीब बच्चे को शराब पिला कर और ५० देकर मध्य प्रदेश की शिक्षामंत्री के पाँव पड़ने को तैयार करना और उसके ऐसा करने पर उनका पाँव झटकना और इसका विडिओ बनाना, दिल्ली की एक स्कूल की एक शिक्षिका के खिलाफ जघन्य आरोप लगाते हुए उसका जीवन नरक बना देना और फिर इनका राज खुलना, एक प्रसिद्ध चैनेल के द्वारा संवेदनशील सैनिक एअरपोर्ट की रेकी करना, एक अन्य का अपनी प्रचारर्शक्ति से अरविन्द केजरीवाल को भगत सिंह बनाने का आश्वासन देते हुए एंकर द्वारा उनके घुटनों को हाथ लगाना, अभी BHU प्रकरण में यह आरोप कि एक चैनेल अपने साथ गाड़ी में भर कर लड़कियों को ले गया और उनके बयान दर्ज किए, और वाचाल लड़कियों के एक दल का मुंह छिपाकर शिकायती बयान देना और उनके आधार पर कहानी बनाना – दृश्य माध्यमों के अपराधीकरण की बात करते हुए मेरी जहन में हैं) बुद्धिजीवियों का अपरिवर्तनीय दृढ़ता से किसी एक राजनीतिक समझ से जुडा रहना और आनन फानन कुछ भी करने को दौड़ पड़ना, विश्वसनीय सूचना और विचार के ऐसे गहराते संकट की और संकेत करता जिसमे पूरे समाज के अर्धविक्षिप्त होते जाने की संभावना प्रबल होती जा रही है.
ऐसे में फेसबुक का पूरी ईमानदारी से, अपनी सर्वोत्तम जानकारी के तथ्यो, प्रमाणों के साथ रखते हुए विचारों का आदान प्रदान करें तो स्वयं एक संचार और विचार मंच तैयार कर सकते हैं। बात करें, बतंगड़ से बचें। बात में तथ्य, तर्क, प्रमाण पेश करते हैं, उनके साथ छेड़छाड़ नहीं करते, निष्कर्ष उनसे निकलता है। बतंगड़ में आप अभियोग लगाते, नई या पुरानी गालियां देते हैं, भड़ांस निकालते हैं और बहुत सारी लफ्फाजी के बाद भी कुछ कह नही पाते।

आप के आग्रह और पूर्वाग्रह हो सकते हैं. वे लंबी छानबीन का बाद निश्चित किए हुए विचार होते हैं। सबके अपने होते हैं, वे तब दुराग्रह बन जाते है जब आप उनसे भिन्न विचारों, प्रमाणों को सुनने को तैयार नहीं होते।

सच है मैं मोदी को इतिहासपुरुष मानता हूं, आप को जब तक ऐसा न लगे, न मानें। बहस का विषय यह नहीं है। सहमत लोगों के बीच तो विचार की जरूरत ही नहीं।

Post – 2017-09-25

शिखंडी आन्दोलन

मुझे बीएचयू की छात्राओं की मांग इतनी उचित और इतनी व्यावहारिक लग रही थी कि आश्चर्य इस पर हो रहा था कोई कुलपति किसी भी विचारधारा का क्यों न हो, उनको अस्वीकार कैसे कर सकता है। उल्टे उपकुलपति ने परिसर में माग रखने वाली लड़कियों को दंडित करने के लिए पुलिस को बुला लिया। ऐसे कुलपति को तत्काल निकाल दिया जाना चाहिए, यह मेरा मत था इसलिए आश्चर्य इस पर भी हो रहा था कि ऐसा क्यों नहीं किया गया।

आश्चर्य इस मांग के लिए चुने गए मौके पर भी हो रहा था जो मोदी बनारस के लिए जो चौदह उपहार देने गए थे उससे ध्यान हटाने के लिए ऐसा हंगामा खड़ा करने के प्रयोजन से आयोजित किया गया लगता था, कि समाचार चैनेलों का सारा जोर और शोर इसी पर केन्द्रित हो जाय। आधी रात के समय धरना और दोनों प्रवेश द्वारों को बन्द कर देना अहिंसक होते हुए भी उपद्रवी योजना प्रतीत हो रही थी इसलिए मैं उलझन में था कि इसका भीतरी सच क्या है? बाद में जब तोड़ फोड़, आगजनी की और पेट्रोल बम फोड़ने की वारदात हुई तो राजनीतिक षड्यन्त्र का चरित्र उजागर हो गया।
पर आश्चर्यों में परम आशचर्य यह एकता सिंह है जिसने कथित रूप से आरंभ में इसका नेतृत्व किया था। उसका मोहभंग और यह आरोप कि इसे जेएनयू, दिवि, इलाहाबाद से गए हुए छात्रों छात्राओं ने हाईजैक कर लिया । एक चैनल मनचाही रपट तैयार करने के लिए ट्यूटर्ड लड़कियों को अलग गाड़ी में भर कर ले कर गया था और उनका बयान लेकर रपट बनाई।

समाचार चैनलों का सुर एक झटके में ऐसा बदला था जैसे उनको खरीद लिया गया हो।

अब इसके तीन पक्ष चिन्ता पैदा करते हैं। पहला, इसके पीछे काम करने वाला पैसा । अयोध्या में प्रदर्शन के लिए अर्जुन सिंह ने सहमत को भारी रकम दी थी। यहां इतनी संस्थाएं और चैनल खरीदे गए।
दूसरा है समाचार चैनलों का आपराधिक चरित्र जो सुपारी किलर का हो चला है।
तीसरा है विरोध की राजनीति का अपराधीकरण। जो लड़के छेड़छाड़ के दोषी थे, वे आन्दोलनकारियों में शामिल थे और उन्हें गिरफतार भी किया गया।
जो लोग आन्दोलन से बहुत उत्साहित थे उन्हें एकता सिंह की पहचान करते हुए इन आशंकाओं का निराकरण करना चाहिए।

Post – 2017-09-25

माँ का जाना (३)

मैं वापस नहीं लौटना चाहता था। जहां बैठा था। वहां से हटना भी नहीं चाहता था। यह बताना भी नहीं चाह्ता था कि क्यों मुझे वहीं बैठे रहना है। जलाने की तो मैं कल्पना ही नहीं कर सकता था। अगर इसे सोचना कहा जा सके तो, मैं सोचता था कि जब लोग माँ को नदी में डुबायेंगे तो वह उसी तरह अफनायेंगी जैसे नहाते समय सि र पर एक साथ पानी डालने पर, साँस लेने में रुकावट से, मैं अफनाता था और तब बाबा को दया आजायेगी और वे उन्हें लेकर उसी तरह लौटेंगे जैसे लेकर गए थे। मैं लौटने वालों के साथ माँ के लौटने की प्रतीक्षा कर रहा था।

मैं कई तरह की असम्भव प्रतीत होने वाली संभावनाओं के बीच माँ को जीवित पाना चाहता था और इसे किसी को समझा नही सकता था। दीदी को भी नहीं। मेरे पास अपने मन की बात कहने की भाषा भी नहीं थी। भाषा होती भी तो अपनी भावनाओं की पवित्रता के सम्मान के लिए, जिसे मै समझता था, किसी दूसरे को इसलिए नहीं समझा सकता था कि यदि उसने, उस पर संदेह प्रकट किया तो वह गलत नहीं होगा, उसके संदेह के साथ ही उसकी पवित्रता भंग हो जायेगी। गलत होना मुझे सह्य था, पवित्रता का भंग नहीं सह सकता था। यह अपराध मेरे अपनों के द्वारा भी हो सकता था। मेरी अपनी दीदी के द्वारा भी। यदि उसने कोई शंका जताई तो उस पवित्रता के साथ ही मेरा वर्तमान और भविष्य का सपना टूट जाएगा। दीदी मुझे घसीट कर वापस ले जाना चाहती थी और मैं उठने और चलने को तैयार न था। यह बताने को भी तैयार न था कि क्यों अपनी जिद पर अड़ा हूँ।

यह कोई अप्रत्याशित घटना न थी। आए दिन हमारा पाला ऐसे बच्चों से पड़ता है जो किसी बात की जिद ठान लेते हैं और उन्हें समझाने में हमारे सभी तर्क, यहाँ तक कि पुचकारने फुसलाने के नुस्खे भी बेकार हो जाते है। हम मानते हैं कि बच्चे, बच्चा होने के कारण, हमारी बात नहीं समझते। यह नहीं सोचते कि हम अपने बचपन को खो बैठने के कारण, बच्चों के विचारों को, जो मनोभावों और विचारों की अविभाजित अवस्था की संपदा होते हैं और जिसे हम बौद्धिक विकास के क्रम में खो चुके होते हैं, इसलिए वे हमारी समझ में नहीं आते। इसे परखने के लिए शोध होना चाहिए कि सही होने के लिए बुद्धि और भावना और नैसर्गिक क्षमताओं का सही अनुपात क्या होना चाहिए? मनुष्य के मनुष्य बने रहने और पशु और यन्त्र बनने के बीच की कोई चीज बनने के बीच की दूरियां कितनी बढ़ी हैं या कम हुई हैं?

दीदी अपनी जिद पर अड़ी थी कि मुझे तुरत लौटना होगा और मै इस जिद पर अड़ा था कि वहां से हटना नहीं है। इसलिए जब वश न चला तो उसने मुझे मेरे विरोध के बाद भी गोदी में उठा लिया।

विवशता के भी कुछ लाभ हैं, ऐसे ही दासता के भी होंगे। मुझे वापसी में पैदल नही चलना पड़ा । वे कब लौटे इसका पता न चला। वापसी गोदी में ही हुई हो पर इतनी लम्बी यात्रा और प्रतीक्षा के बाद मै इतना थक गया था कि जब वे लौटे तो उसका कोई दृश्य नहीं । मैं थकान से सो गया होऊंगा।

उसके बाद एक शून्य है जिसमें जो घटित हुआ होगा उसकी कोई छाप या निशान नहीं। इस बात का भी नहीं कि उसका ब्रह्मभोज हुआ था। इसका तो हो ही नहीं सकता कि उसके महाभोज के बाद उसकी वर्षी भी इसलिए कर दी गई थी कि घर में कोई रोटी देनेवाला न था। शुभम् शीघ्रम् के न्याय से वे जल्द से जल्द अपनी जरूरतें पूरी करना चाहते थे और मैं अपने सपने पूरा करना चाहता था। दोनों की अपेक्षाओं की संधिभूमि थी माई, जो मेरे तो माँ की वापसी थी और प्रकृति के यंत्र के रूप सपत्न घातिनी थी जिसे प्रकृति ने अपने नियम से बनाया था और जिसे मानवीय व्यवस्था से आजीवन लड़ना पड़ा और जो जीत कर भी हारती रही और हारते हुए भी जानती रही कि वह किसी दूसरे से नहीं अपने से हार रही है।

सभी के लिए मेरी माँ मर गई। केवल मेरे लिए वह जिन्दा थी और पहले से अधिक जिंदा माई के कारण रही, उसकी यातना के कारण । मेरी रचनाओं में, ‘महाभिषग’ और ‘अपने अपने राम’ में ही नहीं मेरी अन्य कृतियों में भी रहस्यमय तरीके से माँ जिंदा है। पर मैंने अपनी पीड़ा से ग्रस्त होकर विमाता की पीड़ा को भुलाया नहीं, वह भी इन में जीवित है। आश्चर्य इस बात पर अवश्य है कि अपनी पीड़ा से ऊपर उठ कर मुझे पीड़ित करनेवाली की पीड़ा का बोध मुझमें इतनी कम आयु में कैसे पैदा हो गया था। यह किसी विशेष प्रतिभा के कारण न था यह विश्वास के साथ कह सकता हूं?

Post – 2017-09-24

मुझे खेद है कि ‘पोस्ट कार्ड’ में सुप्रतीक के मोदी के जन्म दिन पर उनके इस कथन को कि मोदी अपनी मौत के एक साल करीब पहुँच गए, मोदी की ह्त्या की योजना के रूप में पेश किया जा रहा है. मैं स्वयं अपने हर जन्म दिन पर कहता हूँ मैं अपनी मृत्यु के एक साल और करीब पहुँच गया और काम अभी इतने करने को बाकी है. इस तरह की भोंडी व्याख्या होती रही तो हास्य, व्यंग्य, विनोद के लिए जगह न बचेगी. मैंं सुप्रतीक को नहीं जानता, उनकी राजनीति को नहीं जानता, पर उनके साथ खड़ा होकर चाहता हूँ उनके खिलाफ जो कार्रवाई की जाय वह मेरे खिलाफ भी हो. वेदिक कवियों के खिलाफ भी हो जो उषा को जिंदगी का एक एक दिन कम करनेवाली कह कर भी याद करते हैं.

Post – 2017-09-24

मां का जाना (2)

हमारा घर आकार में बड़ा था। कभी इसमें तीन संयुक्त परिवार रहते थे। उनकी महिलाओं की चारपाइयां गर्मियों में आंगन में लग जाती थी। आंगन को घेर केर ओसारा और फिर कमरे जिनमें कही कोई खिड़की न थी। वे लंबाई में इतने बड़े थे कि दिन में भी अँधेरा रहता। घुसने पर सुरंग जैसे लगते। अग्नि कोण पर जो कमरा था उसके दरवाजे के सामने तिकोनी दीवार थी, जिसे कोनसिला कहते थे। इसके कारण इसके भीतर अँधेरा इतना गहरा होता कि दिन में भी चिराग लेकर घुसने की जरूरत हो।

रहस्यलोक जैसे इस अंधेरे कमरे में ही प्रसूति ज्वर से माँ की मृत्यु हुई थी। मैं उस कमरे में न जा सकता था, न किसी ने यह बताया था कि हुआ क्या है। मेरे परिवार में कोई दूसरी महिला न थी पर ऐसे अवसर पर पास पड़ोस की महिलाएं भी जुट जाती थी। रोना धोना मचा होगा जिसकी याद नहीं। घर में एक ऐसी भीड़ की याद बहुत सारी परछाइयों और आवाजो-फुसफुसाहटों के आपस में घुलकर अदृश्य और अश्र्य हो जाने की अविश्वसनीय सी याद है। उसे नहलाने, सजाने, के बाद बाहर लाया गया होगा और उस बीच मैं भी उसी में कहीं टकराता बचता डोलता रहा होऊंगा। यह भी मात्र संभावना के रूप में ही याद आता है। पहला ठोस चित्र तब का है जब वह बाहर आकाश की और शिर किये सोई पड़ी थी। मुझे याद आता है की पहली बार मुझे माँ पर गर्व अनुभव हो रहा था कि उसके कारण घर के भीतर और बाहर इतने सारे लोग एकत्र थे और इस गर्व में उसकी तारीफ़ में वे आपस में जो कुछ एक दूसरे से कह रहे थे उसकी भी भूमिका रही हो सकती है। यहाँ जो तस्वीर उभरती है उसमें कई तरह के घालमेल है। बाहर एकत्र भीड़ में बहुत से लोग बंगले के दासे और कुर्सी पर बैठे दिखाई देते है जो बंगला तब तक बना ही नही था। शायद इसमें छोटे बाबा के मरने के समय की भीड़ का दृश्य शामिल हो गया है, पर यह समझ में आने के बाद भी तस्वीर नहीं बदलती। एक दूसरी गड़बड़ी यह कि मां टिकठी नुमा किसी चीज पर सोई दिखाई देती है न कि उल्टी चारपाई पर और दूसरी और बढई दरवाजे से हट कर हरे बांस को काटछांट कर टिकठी बनाने में लगा दिखाई देता है।

मरना क्या होता है मुझे यह मालूम न था, जो कुछ समझ में आया था वह यह की यह एक गहरी नींद है जिससे कोई फिर नहीं जगता। मा को रंगीन साड़ी में सजाया गया था, दुल्हन की तरह। सुहागिन रहते मरने के सौभाग्य के कारण। मांग सिंदूर से इस तरह भरी थी कि काफी सिंदूर चेहरे पर बिखर गया था। आंखें बंद थीं। मुखाकृति फिर भी नही उभरती, पर वह अपरूप (सौंदर्य को भी लज्जित करने वाली सुंदरता से उत्फुल्ल) सुंदर लग रही थी। प्रसूति गृह में जाने से पहले मैं उसके साथ ही सोता रहा हूँगा। इस बीच कहा सोता था, यह याद नहीं। मै एक उससे निकट ओसारे का एक खंभिया अपनी बांहों में लपेटे अपलक उसे ही देख रहा था। यह बोध था कि अब मैं उसके पास कभी न सो पाऊँगा, इसलिए बीच बीच में हुड़क उठती कि जाकर उससे लिपट कर सो जाऊं, पर एक बोध था कि ऐसा करना गलत होगा। इस समझ के साथ इस आवेग को रोकना कितना व्यथित करता था इसकी याद नही, पर मैं अभी तक एक स्थगित वेदना में निर्वेद द्रष्टा बना जो हो रहा था उसे देख रहा था। पर जब माँ की अर्थी उठाई गई और दरवाजे पर एकत्र लोग उसके साथ उठ खड़े हुए तो एकाएक ऐसी व्यग्रता पैदा हुई जिसे विक्षिप्तता का दौरा कहा जाय तो गलत होगा। इस दृश्य में जो कुछ विस्मृत है उसका चित्र नहीं है, पर व्याख्या है। मै चीखता हुआ दौड़ा, ‘माई के संगे हमहूँ जाब’। और एक बुढ़िया ने मुझे पीछे से इतनी कठोरता से पकड़ लिया कि मैं अपनी पूरी ताकत लगा कर भी उसकी पकड़ से छोट न पाया। यह नोहर की मां थी।

पर इस चित्र में जिस खाम्भिया से चिपका था उससे दरवाजे की दूरी आज की समझ से तीन मीटर तो रही होगी। मै ठीक उसके सामने, अर्थात् जहां खड़ा था उससे उतना अलग पकड़ा गया। याद से काम नहीं चलता पर पुनर्विचार से स्थिति समझ में आ जाती है। जिस खंभिया को पकड़े खड़ा था उससे नीचे कुर्सी थी और उससे दो फुट नीचे धरातल। दरवाजे के सामने सीढ़ियां बनी थी। सीधे कूदने का साहस न हुआ, पर दवाजे के सामने की सीढ़ियों से एक बच्चा भी उतर कसकता था। उतरने के लिए मैं उस ओर दौड़ा होऊंगा जिससे पहले भी उतरता रहा होऊंगा।

हुआ जो भी हो, मैं उस क्षण में आवेश में था। कोई भी व्यथा असह्य न थी। मेरे लिए मां निष्प्राण न थी और जो यातना उसे भोगनी पड़ सकती थी, उसे सहने के लिए ही तैयार न था, इसी में जीवन की सार्थकता प्रतीत हो रही थी। यह पता नही था कि मा के साथ क्या किया जाएगा पर यह पता था कि जो कुछ भी किया जाएगा वह अप्रिय होगा। मैंने अपनी कल्पना से जाना कि वे उसे राप्ती नदी की और ले गए है इसलिए उसे पानी में डुबो देंगे। लकड़ी के गट्ठर लेकर जाने वालों को देखा था, परन्तु यह विश्वास न था, न ही किसी ने कहा था, कि उसे जला दिया जायेगा, पर यह पता होता तो मैं उसके साथ जल कर जलने की यंत्रणा भोगने को तैयार था। यह मैं आधी कल्पना और आधी स्मृति के सहारे कह रहा हूँ। भावावेगों के भी अपने स्मृतिबिम्ब हो सकते हैं, पर स्मृति बिम्ब में भी मिलावट हो सकती है, इसे हम देख चुके हैं।

मैं नहीं जानता कब, कितनी देर बाद, जब सबका ध्यान मेरी और से हटा तो, मैं चुपके से निकल पड़ा और उस रास्ते पर चलने लगा जिससे माँ की अर्थी लेकर लोग गए थे। यह मेरे जीवन की सबसे लम्बी यात्रा थी। अपने मकान के सामने की दूरी पार कर जमुना सिंह के दरवाजे को पार करना, शहजादा सिंह का मकान पार करना, चुन्नी धरिकार के सामने से गुजरते हुए रामदास बढई के मकान के पास पहुंचना बस्ती के छोर पर पहुंचना। एक फर्लांग से भी कम की इस दूरी को कितने श्रम से पार किया था यह इतिहास में दर्ज होना चाहिए, पर होगा नही। मुसीबत यह कि इसके आगे जमीन चार पांच फुट नीची थी। किसी जलधारा के कगार जैसी स्थिति। मैं कुछ नहीं कर सकता था सिवाय दूर दिगंत तक निहारने के। उस समय की बेकली की कोई याद नहीं, पर इस निश्चय की याद है कि वहीं बैठा, गए हुए लोगों के लौटने की प्रतीक्षा करूंगा। मै रो नही रहा था. सूनी आँखों से क्षितिज तक आँखें गडाए किसी लौटने वाले की तलाश कर रहा था।

पता नहीं कितने समय बाद किसी का ध्यान इस और गया कि मैं गायब हूँ। पता नहीं कितनी देर बाद मुझे तलाशती दीदी वहा पहुँचीं। तब तक जानेवालों में से कोई लौटा न था ।

Post – 2017-09-23

ममता ने भारतीय सेक्यलरिज्म को केवल उदाहृत किया है। कोई अवरोध नहीं डाला। भाजपा का सौभाग्य है, बंगाल में सक्युलरिज्म ऐक्शन में है। सेक्युलरिस्ट चुप हैं। कल शिकायत करेंगे, हिन्दू कम्युनल हो रहा है । इसका देशव्यापी प्रभाव पड़ना है।

Post – 2017-09-22

मां का जाना (1)

असंख्य प्रयत्नों के बाद मां का कोई चित्र उकेर न पाने के बाद भी मैं उस अर्धसाकार अर्धनिराकार को बहुत प्यार करता, क्योंकि वही मेरा सर्वस्व थी। चाहें तो इसे विवशता कहें, चाहें तो प्यार, या प्यार से बहुत छोटे, पर अधिक पवित्र लगनेवाले आस्था, श्रद्धा, भक्ति का प्रयोग करें।

प्यार दुनिया का सबसे अधिक परिभाषित और सबसे कम समझा गया मनोव्यापार है। यह वह रसायन है जिसके स्पर्श से सत्य की, सौंदर्य की, पवित्रता की, महिमा की परिभाषाएं बदल जाती हैं । यदि नहीं बदलतीं तो वह कुछ और है, आसक्ति, कामातुरता, इच्छापूर्ति, जो विफलता में घृणा, द्वेष, आत्मघात और सर्वसंहार का भी रूप ले सकता है।

प्रेम अपने अभाव की पूर्ति का दूसरा नाम है और हम आजीवन अपने अभावों को दूर के और अपनी अपूर्णता को पूरा करने, का प्रयत्न करते हैं। विरोध का, प्रतिरोध का, हिंसा या प्रतिहिंसा का स्थान बचता ही नहीं। प्रिय की कमियों तक से लगाव पैदा हो जाता है। इसका सबसे स्पष्ट बोध जन्मभूमि से प्रेम में मिलता है जिसमें अनेक असुविधाओं के बाद भी अपने जन्म का भौगोलिक परिवेश ही समस्त सुख सुविधाओं से सज्जित देशों और स्थानों की तुलना में अधिक आत्मीय लगता है। तप्त रेगिस्तान से निकला आदमी भारत जैसे देश में भी खजूर के तले ठंडी ठंडी छाँव के सपने देखता है। भिन्न परिवेश से निकले लोगो को. पपीता, नारियल, खजूर, ताड़, के देश में पाम की जरूरत पड़ती है।

मां मरी तब मैं सवा तीन साल का था। मरना क्या होता है यह नहीं जानता था। उसकी मृत्यु प्रसूत ज्वर से हुई थी। प्रसव की ग्राम्य व्यवस्था ऐसी थी जिसमें शिशु और प्रसूता का मरना अधिक संभव था। बच जाना एक आश्चर्य। इसके बाद भी माताएं और शिशु प्रभु की लीला से प्राय: बच जाते थे । मैं दीदी और भैया और हमारे जन्म के समय मां का बच जाना उन्हीं आश्चर्यों में था और ऐसा ही आश्चर्य माई के साथ घटित हुआ था जिसकी एक संतान को छोड़ कर सभी बच्चे जीवित बच रहे थे और वह पिता जी की मृत्यु के चौदह साल बाद तक जीवित रही। दोनों की आयु में भी लगभग इतना ही अन्तर था।

इस व्यवस्था का पता भी मुझे तब चला जब माई के कभी आसन्न प्रसवा होने की स्थिति में धगरिन को बुलाने जाना पड़ा थ। वह चमाइन थी । वे सूअर पालते थे और उनकी बस्ती इतनी गन्दी थी कि दूर से ही बदबू आती थी। वे इन्हें जानवर कहते। गांव के झुंगे झाड़ी की सफाई इनके जानवरों के चरने से ही होती। उसके नहाने धोने और कपडों की सफाई और आदि की दशा उसके अनुरूप ही थी ।

वह प्रसव में सहायता करती, नार काटने के लिए हंसिये को निर्विष करने के लिए उसे लाल गर्म करती और उस तपते हंसिए की धार से नाल काटती और शिशु की सफाई करती । इसके अलावा वह दो काम और करती। पहला अन्त:स्राव में कमी होने पर पेट पर दबाव डालतीं जिनमें कुछ मामलों में प्रसूता और शिशु दोनों की जान चली जाती। दूसरा काम यह कि यदि मां को दूध न उतरता जो कुपोषण के कारण प्राय: होता, तो वे अपना दूध पिला देतीं और इसलिए हमसे कुछ बाद तक की पीढ़ी की उच्च मानी जाने वाली जातियों की सन्तानों को द्विमाता कहा जा जा सकता है। एक जन्मदात्री माँ, दूसरी धात्री माँ जिसको दुग्धपान कराने का प्रथम अवसर मिलता था, क्योंकि किसी गलतफहमी के चलते गाय, भैंस के प्रथम अमृतोपम दूध को अशुद्ध और अधिक पीने को हानिकर माना जाता था और माँ के प्रथम गाढे दूध को दुह कर बर्वाद कर दिया जाता था । देखें, इतनी देर बाद याद आया कि कुपोषण के कारण दूध न उतरने पर नहीं, इस विश्वास के कारण कि माँ का प्राकृत दूध शिशु के लिए हानिकर है, उसे पिलाया ही नहीं जाता था।

यदि हममें सचमुच मातृभक्ति होती तो स्वयं उच्च वर्णों को अस्पृश्यता के विरुद्ध अभियान चलाना था। गाय की पूजा करने वाले अपनी धगरी (नाभिरज्जु काटने और पहला स्तनपान करानेवाली मां) और उसकी संतानों के घर जलाते हैं।