Post – 2020-06-30

मेंने हँस कर जो बुलाया तो बुरा मान गए
बुरा फिर भी नहीं माना तो परेशान से हैं।।

Post – 2020-06-29

#शब्दवेध(73)
भाषाविज्ञानी इन्द्रजाल

*प्रवाह-गति-स्थिरता, खाद्य-पेय-घ्राण, आनंद-विषाद, प्रकाश-रंगीनी-अंधकार, ज्ञान-अज्ञान, पांडित्य- मूढ़ता, पवित्रता-कलुष. सत्य-असत्य, पुण्य-पाप, सम्मान-अपमान, सुख-दुख, संपत्ति-विपन्नता, ऊपर-नीचे, सभी नीरव भावों, दशाओं, क्रियाओं, उनकी विशेषताओं और सर्गों-प्रत्ययो, अनुलग्नकों का नामकरण जल की वास्तविक और कल्पित ध्वनियों से हुआ है। इस बात को हम कई बार कई रूपों में दुहराते और इसके प्रमाण प्रस्तुत करते आए हैं। यदि इन सभी के लिए शब्द जल से निकले हैं तो शेष बचता क्या है? कुछ थोड़े शब्द जिनका पशु पक्षियों के नामकरण में एक सीमित भूमिका है।

बोलने वाले या किसी न किसी तरह की ध्वनि उत्पन्न करने वाले पशुओं- पक्षियों का नामकरण उनकी ध्वनि के आधार पर नहीं किया गया। उदाहरण के लिए गो, अज, गज, बाघ (व्याघ्र), मर्कट, रीछ आदि के नामकरण के पीछे भी उनके द्वारा उत्पन्न किसी ध्वनि का हाथ नहीं है अपितु उनका नामकरण भी जलपरक शब्दों से हुआ है। जीव जंतुओं द्वारा उत्पन्न ध्वनियों के अनुनादन पर बहुत कम शब्द पाए जाते हैं। इसलिए अनुनाद के आधार पर भाषा की उत्पत्ति और विकास को समझने वालों को निराशा का सामना करना पड़ा है और अपनी हताशा में वे असंख्य अंधी गलियों में अपना सर टकराने के बाद निराश होकर इस नतीजे पर पहुंचे भाषा की उत्पत्ति के सवाल पर विचार करना भाषा विज्ञान की समस्या नहीं है।

सचाई यह है कि भाषाविज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण समस्या उसी तरह भाषा की उत्पत्ति को समझना है जैसे किसी चिकित्सक के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि कोई व्याधि कब और कैसे पैदा हुई। इसे समझने के लिए रोग निदान विज्ञान की जरूरत पड़ी और उसकी रिपोर्टों के आधार पर ही चिकित्सक अपने निर्णय कर सकता है।

यदि भाषा विज्ञानी अपने इस दायित्व से भागता है और फिर भी अपनी शाखा को वह विज्ञान कहता है तो उसे न तो इस फरेब को विज्ञान कहा जा सकता है, न सत्य के अन्वेषण के लिए समर्पित शास्त्र। मैं निवेदन यह करना चाहता हूं कि तुलनात्मक और ऐतिहासिक भाषा विज्ञान के रूप में कुछ समय के लिए प्रतिष्ठा अर्जित करने वाले अध्ययन को इसकी सीमाओं को देखकर सस्युर ने ही भाषा विज्ञान की सभा से बाहर निकाल दिया था। इसे पहले भाषा शास्त्र के जिस नाम से पुकारा जाता था उसी नाम से दुबारा पुकारा जाने लगा, परंतु मैं इसके वर्तमान रूप में इसे भाषाशास्त्र की गरिमा से भी वंचित मानता हूं। इसके लिए सही नाम भाषाई इंद्रजाल है। पहले निश्चित रूप से यह भाषा शास्त्र की संज्ञा का अधिकारी था, परंतु पश्चिमी वर्चस्व की कामना, औपनिवेशिक हितों की रक्षा, और ग्रंथि के रूप में सक्रिय रंगभेद ने इसे उस गरिमा से भी नीचे उतार दिया। जालसाजी, दर जालसाजी. दर जालसाजी। हैरानी होती है यह सोच कर कि इतने घटिया काम के लिए इतनी महान विभूतियों ने इतनी निष्ठा से इतने लंबे समय तक काम कैसे किया जिनमें से कोई ऐसा नहीं जिसका शिष्य बनने में मुझे गर्व का अनुभव न होता।

अपनी ज्ञान सीमा में कितना हास्यास्पद लगता है, ऐसी विभूतियों का उपहास करना। परंतु उसी ज्ञान सीमा में कितने हास्यास्पद वे लगते हैं जो यह जानते और मानते हुए कि जिसे वे बुनियाद मानते हैं उसकी खोज वे दो सौ साल के अथक परिश्रम के बाद भी नहीं कर सके और चोटी को ही बुनियाद मानने को बाध्य होकर उसी के आधार पर इतनी तन्मयता से अपने विवेचन और विश्लेषण करते आ रहे हैं। बात यहीं समाप्त नहीं होती। इस प्रयत्न में वे लगातार इस बात के लिए प्रयत्नशील रहे हैं कि इस भाषा की बुनियाद यूरोप से बाहर नहीं जानी चाहिए और इसलिए सचेत रूप में भारत की उपेक्षा करते रहे हैं भारतीय साक्ष्यों की उपेक्षा करते हैं, नकली साक्ष्य गढ़ते रहे हैं और उन साक्ष्यों वरीयता देते रहे हैं जिससे इस वर्चस्व को आंच न आने पाए। मेरे लिए आश्चर्य की बात यह रही है इतने पूर्वाग्रहों के बाद, इतनी तल्लीनता से, इतने सारे विद्वान, इतने लंबे समय तक काम कैसे करते रहे। यह आश्चर्य मुझे उनके विज्ञान को भाषा का इंद्रजाल मानने का एक और कारण प्रदान करता है।

इस विषय पर मेरा अब तक का लेखन तथ्य संकलन का रहा है। यह अध्ययन का सबसे रूखा, सबसे थकाने और उबाने वाला काम होता है, परंतु इसी से वह अविचल शिलाधार तैयार होता है जिस पर बुलंदियां खड़ी होती हैं और जिन्हें भूचाल भी डाँवाडोल नहीं कर पाते।

अगला आश्चर्य मुझे इस बात का रहा है कि चालीस-पचास और कई बार इससे भी अधिक मित्रों ने इस बेस्वाद पाठमाला को इस तल्लीनता से पढ़ा जिसकी मुझे कदापि आशा न थी। आंकड़े उन सभी पहलुओं से पेश किए जा सकते हैं जिनका हमने पहले वाक्य में उल्लेख किया है, परंतु इतनी लंबी यात्रा मेरे लिए संभव नहीं और दूसरों के लिए काम्य न होगी। और कल हम यह दावा पूरे विश्वास के साथ कर सकते हैं कि हमारी भाषा का वह संस्कृत हो या बोलियां, कोई ऐसा अक्षर-युग्म न होगा जिसका अर्थ जल न होता हो। अर, इर, उर, एर, ओर, और, अल, इल, उल, एल, ओल, औल, कर, खर, गर, घर, चर, छर, जर, झर,टर, ठर, डर, ढर, तर, थर, दर, धर, नर, पर, फर, बर, भर, सर, हर, कल, खल, गल, घल, चल, छल, जल, झल, टल, ठल, डल, ढल, तल, थल, दल, धल, नल, पल, फल, बल, भल, मल, सल, हल सभी का एक अर्थ जल है। इस खेल को आगे बढ़ाते हुए इन वर्गीय ध्वनियों के आद्य अक्षर को इकारयुक्त, उकारयुक्त बना लिया जाए तो परिणाम वही रहेगा। इनके अन्त्य रकार या लकार के स्थान पर इन्हें स/ष/शकारान्त बना दिया जाय, अक्षरों का क्रम उलट दिया जाय(पल>लप, पर>रप), मध्य स्वर का लोप कर दिया जाय (प्ल/प्र) तो भी अन्य अर्थों के साथ जल का एक आशय बना रहेगा। दूसरे अक्षरों के साथ युग्म बनाने पर भी निराशा नहीं होती।

इसका अर्थ बताने पर, वह अर्थ समझ में आने के बाद भी आप के गले उतर न पाएगा, क्योंकि दासता के लंबे अनुभव और अधिक चालाक लोगों द्वारा दासमूल्यों को आत्मसात् करते हुए अवसर तलाश करते हुए अविरोध समर्पण ने इस विश्वास को कि हमारे किए कोई युगान्तरकारी काम हो ही नहीं सकता सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय बना दिया है, जिसमें इसकी अवज्ञा करने वालों का उपहास बौद्धिक दायित्व बन जाता है।

मैं जिस तथ्य को रेखांकित करना चाहता हूँ वह यह कि जल में उत्पन्न जैव द्रव्य (प्रोटोप्लाज्मा) से समस्त जीव जगत की उत्पत्ति हुई है, डार्विन के इस सिद्धान्त की समकक्षता नहीं तो उससे निकटता रखने वाली है यह खोज कि समग्र भाषा की उत्पत्ति अपने परिवेशीय नैसर्गिक नाद के अनहद संगीत से हुआ था और भारोपीय भाषाओं की उत्पत्ति और विकास जलबहुल परिवेश में हआ था इसलिए इसमें जल से उत्पन्न नाद की भूमिका सर्वोपरि थी। साक्ष्य इतने आ चुके कि आप इस सिद्धान्त से असमत नहीं हो सकते, पर क्या यह मान सकते हैं कि आपके सामने डार्विन के बाद का दूसरा इतिहास पुरुष उपस्थित है? नहीं न! मैं आप सबकी ओर से शीशे के सामने खड़ा हो कर स्वयं तालियाँ बजाने को बाध्य हूँ।

Post – 2020-06-28

#शब्दभेद(72)

क्या कोई यह सोच सकता है कि जिस मनोभाव त्रास के लिए सं. में तृषा से संज्ञा पाई उसी के लिए अं, ने पिपासा से। पस- जल, पेश – रूप, सौदर्य; पसीना > प्रस्वेद; पोस/पोष- आहार, पशु – त. गाय, पश/ स्पश – लोगों के आचरण पर नजर रखने वाले। यदि इसे पुलिस, या पुरवासियों की गतिविधियों पर नजर रखने का संकेत माना जाए तो ऋग्वेद में पुलिस पंरबंधन का सबसे पुराना साक्ष्य मिलता है। इसी पस से passion – the suffering on the Cross and death of Christ, suffering a painful body ailment, strong feeling or agitation of the mind, L. passus – to suffer. passive – suffering, acted upon not active, (see also. pass, passage, passenger,

तृष्णा –
जिस तृ से तृषा निकली है (पानी से प्यास का निकलना तो जल बिच मरत पियासा वाली दशा हुई), त्रास और संत्रास निकला है उसी से जल की उत्कट कामना – तृष्णा। उसी से तर्पण, तरसना, तरसाना और तृप्ति। इसी से अंग्रेजी का thirst- uneasiness caused by want of drink. > 2, eager desire for anything.

परन्तु यह याद दिलाना जरूरी है कि भारतीय भाषाओं में बोलियों से ले कर भिन्न परिवारों में परिगणित भाषाओं में संगत शब्दों से जो तार दिखाई देता है उससे एक ध्वनि संकुल से जुड़े अर्थ संकुल को समझना आसान होता है। यूरोपीय बोलियों और भाषाओं में निचला स्तर नहीं मिलता इसलिए कड़ी नहीं जुड़ पाती। शब्द और अर्थ आकाश पतित से लगते हैं। tree की व्युत्पत्ति daru से दिखाई गई है, होने को तो दारू भी होता तो आपत्ति न थी पर तरु के रहते दारु से संबंध कुछ हट कर है। दारु का timber, से और इसमें आए टिम का तिम/टिम से वही नाता है जो tree से तृ/तर का। टिंबर timber- wood suitable for building or carpentry. OE. zimmer – building – room के साथ संबंध दिखाना जरूरी तो है पर समझा पाना आसान नहीं क्योंकि हम जो कुछ कह आए हैं उसे बार बार दुहराना संभव नहीं। आवास के लिए प्रयुक्त शब्दों का अर्थ छाया न हो कर आकाश, प्रकाश आदि होता है इसे बक ने लक्ष्य किया था पर यह समझना संभव न था कि कुहरे और बादलों के घटाटोप से ले कर प्रकाश तक सभी जल के गुण हैं।

कृपा
कर – जल, भो. करमोना – भिगोना> कृ=जल> करंभ – दही में मिला सत्तू: करंक- कमंडलु, >कृपा, करुणा, कृमि – E. creek- small inlet or bay, creed- (L. credo), credence- belief, trust; credit- , creep- to move with the belly on or close to the ground, , crime- a violation of law, crisp – having a wavy surface, crib – a manger or fodder receptacle।

दया

ती/दी- 1. जल, 2. मीठा, 3.प्रकाश, 4. आग। तिल जिसमें आर्द्रता हो। तेल – द्रव, जल >तेल जिसे ‘शुद्धता-प्रेमी’ तैल लिख दिया करते हैं, जब कि इसका अर्थ है ‘तेल का’। ऋ. मेंं दया का अर्थ देना लगता है – महो धनानि दयमान ओजसा विश्वा धनान्योजसा । दिल्ली के नामकरण को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जाती रही हैं। हमें ऐसा लगता है इसका नामकरण नदी के तट पर होने के कारण दिल्ली पड़ा। हम पहले कह आए हैं तटीय नामों में अधिकांश जलवाची शब्दों से आरंभ होते हैं। नदी नाम तो जलपरक होने को बाध्य हैं ही।

लोभ – रप/रिप/रुप,लप/ लिप/ लुप, रभ/ रिभ//लभ/लिभ/लुभ – जल, लाभ-०जल की प्राप्ति, भो. लभेरल -फेटल। ऋ. में लभ, लिभ, लुभ, लोभ में से किसी का प्रयोग नहीं हुआ है। रभ(चोदयेन्द्र राये रभस्वतः; गोरभसम् – गो पय बलं), ऋभु, रेभ (मधुच्छन्दो भनति रेभ इष्टौ), को प्रयोग देखने में आता है। इसका अर्थ है इस समय तक रभ आदि का स्थान नहीं लिया था। लकार प्रेमी समुदाय वैदिक समाज में मिला भी था तो पार्श्विक महत्व का था। सायण की व्ययाख्या यज्ञ और कर्मकांड से प्रेरित थी इसलिए वह व्यावसायिक और वाणिज्यिक गतिविधियों की अपव्याख्या करते हैं। हम जानते हैं कि रभ ने ही लभ का रूप लिया है यद्यपि रभ कुछ शब्दों में (प्रा-रब्ध), आरभ/आरंभ, बाद में भी बचा रह गया, पर लभ और लाभ इसी के रूपभेद हैं। रभ, रभस् का प्रयोग गति (दधानः शुक्रा रभसा वपूंषि, सा. वेगवन्ति), शक्ति (अन्नै रभसं दृशानम् । सा.- बलं), कांति(रभसासो अंजयः), वृष्टि, (स्तनयदमा रभसा उदोजसः । सा. वृष्ट्यर्थं उद्युंजाना), ध्वनन (अभि सं रभन्ते – शब्दं कुर्वते), लाभ (तन्नु वोचाम रभसाय जन्मने) आदि आशयों में हुआ है जो जल की विशेषताएँ हैं।

उल्लास

के लिए आ उपसर्ग के साथ लस्/रस
उत्(जल)+रस/रास> लस/लास>

आह्लाद
(हर/ह्र/हल/ह्ल – जल, ह्रद- जलाशय >ह्लाद – तरंगित/ उद्वेलित होने का भाव) >आह्लाद,

आसक्ति
सक/सख/सग/संग/संघ/ सह/सच =साथ (साक, सखा, संगति, संघाती, संहति, सचिव, सचा), सेक/सेचन, सिक्त/सिंचित; सक्ति-लगन, आसक्ति – गहन लगाव।

विरक्ति
(राग – रक/ रग/रज – जल, राग -०लालिमा, मधुर नाद, प्रेम, पर रंग – रंज, बां. राग) रक्ति- आसक्ति; विरक्ति- रक्तिहीनता, विराग भाव।

उपेक्षा
इष-1.जल, 2. रस, 3. चमक आदि; >E. eye, ice, ease, etc.; अक्षि, ईक्षण, वीक्षण, इच्छा, E. vision, wish, wise आदि। ईक्षा- देखना, उपेक्षा – अवहेलना।

Post – 2020-06-28

क्यों न मैं अपने मुरीदों पर जान दे देता
कोई खंजर था सँभाले
कोई सलीब लिए।।

Post – 2020-06-27

#उपस्थिति

आज फिर पोस्ट पूरी न कर पाया। गैर हाजरी से बचने के लिए उसी वर्ष की कुछ और कविताएं। कविताएं कविता नहीं हैं अपने समय की कविता की आलोचना हैं:

कविता लिखने का समय

जब सारी दुनिया सो जाएगी
वह कविता लिखेगा
कविता में लिखेगा
सारी दुनिया के सो जाने की बात।
वह लिखेगा कुछ नहीं
कविता भी नहीं –
अंधकार से टपकेगी कविता
अंधेरे में खो जाने के लिए।
वह उसे टपकने देगा
सोए हुए लोगों की नींदों में
उनकी नींद को सपनों से भरने के लिए
उनके सपनों को सन्नाटे से भरने के लिए
जिसमें उनका सांस लेना तक
शोर की तरह बरसेगा उनके दिमाग पर
और विद्रोह की तरह सुनाई देगा।
उन्हें
जो चाहते हैं लोग इस तरह सोएँ
कि दुनिया में शांति रहे
उस शांति में वे रहें
अपना ही शिश्न-उदर बन कर
जो बढ़ता जाए अपार
करता जाए
उनके अपनों को भी नंगा
बनाता अरक्षणीय,
तोड़ता जाए मर्यादाओं के सेतुबंध।

वर्चस्व कामी की न मां न ममता
न मातृभूमि
न बहन होती है न स्वजन।
देश एक नक्शा होता है
दूसरे नक्शों के लिए जगह बनाता
अपने विस्तार के लिए।
—————–

सोचता हुआ आदमी

अकेला होता है
सोचता हुआ आदमी
विचारों की सहमति के विरुद्ध
सहमति की सत्ता के विरुद्ध
विरोधों के कुरुक्षेत्र के विरुद्ध
किसी न किसी से बँधकर रहने के विरुद्ध
अकेला होता है
सोचता हुआ आदमी।

हां हां और ना ना के विरुद्ध
अपना छोटा क्यों लिए
एक साथ
अनेक मोर्चों पर
लड़ता
आहत होता रहता है
सोचता हुआ आदमी।

दो पाटों के बीच नहीं पिसता
सात पाटों की रगड़ झेलता
पाटों के दाँत तोड़ता
बाहर आता है
सोचता हुआ आदमी
कुछ गर्म कुछ श्रांत
छिल्के और आँखे बचाए हुए।

सोचता हुआ आदमी
निपट अकेला होता है
अपने सिर पर सातों आसमान लादे
और कितना हल्का
कितना मुक्त
इस पूरे दबाव में।

सोचते हुए आदमी को
मिटा देना चाहते हैं
मानने वाले लोग।
सोचते हुए आदमी को
उखाड़ देना चाहते हैं
जड़ों से भी जड़
जमे हुए लोग।

तलाशती हैं संगीनें
सोचते हुए आदमी को
फिर भी सोचता है
आतंक में
आतंक बना।
21.4.97

———————–

युद्ध

जहां युद्ध नहीं होता
युद्ध की तैयारियां होती हैं
जब गोली नहीं चल रही होती है
तब भी बन रही होती हैं गोलियां
कभी खत्म नहीं होता युद्ध
शांति का जाप करने वाले ही उकसाते हैं हत्यारों को
ब्रह्मकुंड ही बनाए जाते हैं रक्तकुंड।

शांति वहां नहीं होती जहां उड़ाए जाते हैं कबूतर
होती है मसान में रोने वालों के विदा हो जाने के बाद
जब बाकी रह जाती है मुर्दे की राख
जीवन में कहीं नहीं है शांति
जगत में कहीं नहीं है शांति
जंगल कहीं खत्म नहीं होता
कभी खत्म नहीं होता जंगल
कट जाने के बाद
बची रहती हैं उसकी जड़ें जंगल उगाने को
बचे रहते हैं उसके बीज
दरिंदों के भेजे में।
15.7.97

Post – 2020-06-26

#शब्दवेध(71)

त्रास/संत्रास
दुख की वह अवस्था जो डरावना रूप ले ले। इस शब्द का प्रचलन साठ के दशक में पश्चिम के ताजातरीन लेखन की बराबरी पर आने के प्रयत्न में अस्तित्ववादी लेखन की नकल, अस्तित्ववादी दर्शन की तकनीकी शब्दावली के सुनामी के साथ बढ़ा था। ज्ञानमंडल के कोश में संत्रास – भय, आतंक; संत्रस्त- बहुत डरा हुआ, भय से काँपता हुआ; तथा संत्राण – रक्षण, उद्धार शामिल है।

त्रास शब्द बहुत पुराना है यह तो त्रसदस्यु- येभिस्तृक्षिं वृषणा त्रासदस्यवं महे क्षत्राय जिन्वथः ।। 8.22.7 , त्रसदस्युः पौरुकुत्सः , याभिर्नरा त्रसदस्युमावतं कृतव्ये धने ।

उस व्यथा और तड़प का न तो कोशों से पता चलता है, न काव्योक्तियों से, जो शब्दों में छिपी हुई है।

त्रास तृषा से निकला शब्द है, परंतु यह तृषा उस जलवायु की हो सकती है जिसमें वर्ष के कुछ महीनों में प्रचंड गर्मी पड़ती है और प्रतिवर्ष हजारों लोग लू (सन स्ट्रोक) और घाम (डिहाइड्रेशन) से मरते हैं। पानी के अभाव में मरणासन्न होने की कहानियां और आर्तनाद हमारी भाषा और साहित्य की, हमारे संस्कार और शिष्टाचार की विशेषता है। उसने मुझे पानी को भी न पूछा यह मुहावरा भारत में ही चल सकता है। आप किसी के यहां पहुंचते हैं तो बातचीत आरंभ हो इससे पहले ही चाय पानी का इंतजाम हो जाता है पर ऐसा क्यों भारत में होता है अर्घ्य (माथा धोने) और पाद्य (पाँव धोने) और नैवेद्य / मधु पार्क जैसे शब्द किसी दूसरी संस्कृति के व्यक्ति को समझ में आने पर भी चित्र के रूप में उपस्थित नहीं हो सकते। यह केवल भारत में होता था।

आने वाला व्यक्ति प्यासा होगा ही। सबसे पहले उसे पानी दो। पानी भी संकट पैदा कर सकता है।

खुसरो की जीवनी में एक प्रसंग आता है जिसमें शत्रु ने उसे युद्धबंदी बना लिया। प्रसंग याद नहीं आता। पर जब वे उसे ले कर चले तो रास्ते में हुआ यह कि कहीं पानी नहीं मिला। प्यास से विकल अवस्था में वे एक नदी के पास पहुंचे। सभी ने झटपट पानी पी लिया, और परिणाम यह कि हूक ऐसी उठी कि उनमें से अधिकांश तड़प कर मर गए। खुसरो कहते हैं, मुझे तो मालूम था, मैं तो हिंदुस्तानी था। मैंने पहले हाथ धोया सिर धोया फिर एक छोटी सी घूँट ली और फिर पानी पीकर उनको उसी हालत में छोड़कर भाग खड़ा हुआ।

पानी पीने से पहले हाथ धोने और मुंह में बिना कुछ डालें खाली पेट पानी पीने से होने वाले नुकसान की इसी समस्या का आज तक, परंपरा को समझे बिना भी, निर्वाह होता चला आ रहा है ।

यह परंपरा यदि केवल भारत में है औरत त्रास शब्द उसी डरावने पन के साथ यूरोप तक फैला हुआ है तो आप समझ सकते हैं कि :
1 शब्द का और उस भाषा का जिसमें इस शब्द का महत्व है उद्भव कहां हुआ हो सकता है;
2. इतिहास का सच इतने कौनो में छिपा रहता है कि सच को मिटाने वाले यह नहीं जानते कि वह कहीं से भी सामने आकर उनकी सारी योजना को ध्वस्त कर सकता है।

असाधारण वेदना, दहशत पैदा करने वाला अनुभव (terror/ horror/ torture) या उसकी संभावना के लिए जल से निकले इस शब्द का क्या संबंध है इसे प्राण रक्षा के लिए की जाने वाली गुहार, त्राहि माम्, पाहि माम् जो एस ओ एस (SOS – save our soul) का सबसे पुराना रूप है, से समझा जा सकता है और बेकली की उग्रता को व्यक्त करने के लिए जिन शब्दों का प्रयोग होता है वे इस पर मुहर लगाएँगे।

त्रास, संत्रास, त्राण में साझा अक्षर ‘त्रा’ है जो तृ/तर से निकला है। इसी से
तरसना – 1. पानी पीने की उत्कट इच्छा, 2. किसी भी वांक्षित वस्तु की अतृप्त लालसा;
तरणि- 1. जल राशि/धारा को पार करा कराने वाली; 2. रक्षक।[1]
त्राण/परित्राण – रक्षा/ हर तरह से रक्षा, आदि शब्द निकले हैं।
परंतु स्वय ‘त्रा’ तर>तृ (त्रि/त्रु) जल की क्षीण प्रवाह की ध्वनियाँ हैं यह हम जानते हैं जिनका जल के लिए प्रयोग किया गया और जिनसे
तृषा – प्यास,
तृप्ति – प्यास का पूरी तरह बुझने का संबंध है। तृषा अपने उग्रतम रूप में
त्रास / संत्रास बन जाती है। इसका अगला चरण है इसका जानलेवा हो जाना। मरणासन्न जिसके घावों से शरीर का बहुत सारा रक्त निकल गया है, अपने सारे दुखों को भूल कर, क्षीण स्वर में कहता है, ‘पानी!’ तो इसके दो अर्थ होते हैं:
1. दूसरे सभी कष्टों से अधिक उग्र है तृषार्तता;
‘2, पानी पिलाओ,’ त्राहि। इसका ही अर्थविस्तार है “मेरे प्राण बचाओ’ जो अपने विशिष्ट संदर्भ से अलग होकर ‘बचाओ’, और ‘रक्षा करो’ का व्यापक अर्थ ग्रहण कर लेता है और
त्राण, परित्राण/ त्राता
में देखने में आता है, और मूल ‘त्र’ में लौट कर भी त्राण और त्राता का आशय प्रकट करता है। रक्षा का भाव अंसत्र – कंधे की रक्षा करने वाला; पदत्र या पादत्राण, शिरस्त्राण/सरोपा, यजत्र आदि में दिखाई देता है।

इस ‘त्र/तर’ का एक दूसरा भाव वह पद है जिसे गंतव्य कह सकते हैं। एक नाली जैसे प्रवाह से उठती आवाज और एक बूंद जो किसी पत्ती पर गिर कर ढरकती है, जिसका अंतरण पसीने की बूँदो के लिए भी हो सकता है। तर ढरकना भी है और वह जगह भी जहां इसे गिरना है। एक के भाे, तरे> सं./हिं. तले, ढलान (तराई),, स्थान -त. तरै/धरा बना। इन दोनों का भेद भो. ‘धइल बा’ और ‘राखल बा’ में मिलता है। अर्थात स्थान पा जाना और संकटमुक्त हो जाना, सुरक्षित हो जाना में बुनियादी समानता है इसके कारण स्थान या स्थिति सूचक पदों के अर्थ को समझने में पंडितों से भी चूक होती है।

अंसत्र का अर्थ कंधे की रक्षा करने वाला है या कंधे पर रखा या टिका हुआ (हथियार – अंसेषु वः ऋष्टयः पत्सु खादयः), यह अंतर उलझन पैदा करता है। यत्र, तत्र , सर्वत्र, कुत्र, आदि में ( में स्थानवाची (locative) भाव है, जो E. टेरा terra, teritory, terestrial आदि में देखने में आता है। terrific, terror आदि में जल के अभाव से उत्पन्न संताप या त्रास का भाव है।

ऋ. में तस्य त्राता भवसि तस्य सखा . या त्राध्वं नो देवा निजुरो वृकस्य त्राध्वं कर्तादवपदों यजत्राः, त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रं हवे-हवे सुहवं शूरमिन्द्रम् , में रक्षा का भाव मुखर है. पर यत्र, कुत्र, तत्र आदि में स्थानीयता का।

यह कुछ उलझाने वाली बात है कि पानी पिलाओ वाले स्पष्ट आशय में त्रा का स्थान पा ने ले लिया: पाहि पिलाओ । इंद्र ये प्रथम सवन के सोम तुम्हारे लिए पेरे गए है, पहले की तरह आज इन नई वंदनाओं के साथ आ कर इनका पान करो – पिबा वर्धस्व तव घा सुतास इन्द्र सोमासः प्रथमा उतेमे । यथापिबः पूर्व्याँ इन्द्र सोमाँ एवा पाहि पन्यो अद्या नवीयान् ।। 3.36.3
और पाहि – प्राण रक्षा करो :
आजीवन मेरी भली भाँति रक्षा करना, पाहि सदमिद् विश्वायुः ।। 1.27.3; अग्निदेव, हिंसक राक्षसों, हेगामा करनेवाले धूर्तों से बचाना… – पाहि नो अग्ने रक्षसः पाहि धूर्तेरराव्णः । पाहि रीषत उत वा जिघांसतो बृहद्भानो यविष्ठ्य ।। 1.36.15

यातना की पराकाष्ठा के लिए प्रयोग में आने वाले शब्द जल के अभाव, प्राणघाती पिपासा के द्योतक हैं:
तड़पना < त. तण्, सं. तड़ = जल; तड़ाग = जलाशय। टाँड़ा - लकड़ी खा कर पुरानी धरन आदि को खोखला कर देने वाला एक कीड़ा। ताड़ना - भाँपना ; >ताड़ना देना – तातना देना, > प्रतारणा।
छटपटाना < छर, छट - जल: छटा - हरियाली, प्राकृतिक सौंदर्य। आकुल/ विकल/ बेकल < कलकल= जल प्रवाह का नाद; कल -1. जल, 2. सुंदर, 3.कलश - जलपात्र; 4. क्लेश, 5. कलुष -दाग।

Post – 2020-06-25

आज की पोस्ट अधूरी रह गई, इसलिए पिछले नब्बे के दशक की कुछ इबारतें जिन्हें रोक न पाता था, पर कवितानुमा कुछ बनाने में रुचि न थी। इतिहास से बेदखल लोग अपने बचाव में कहते, वह तो साहित्यकार हैं। साहित्य उपन्यासों तक सीमित था। कवि बनने की कोशिश बदनामी को चार दाग लगाने जैसा था। फिर भी एक अलग फाइल मे टाँक कर छोड़ देता था। यह समझने मे देर लगी कि जिसके दबाव से बच नहीं सकता वही तो मेरी मूल प्रकृति थी। अनगढ़ खुरदरा पाठ:

#यदि_न_हुई_कविता

यदि न हुई कविता
मैं तो हूँ
आग और पसीने के साथ
अपने शब्दों में
शिखा सा लुप-दुप
बदहवास मौसम में।
————————-

कुछ भी न करते हुए

जरूरी काम है
कुछ न करना
किसी की प्रतीक्षा तक नहीं
और व्यस्त रहना
सिर्फ होकर ही
अपने को शव की तरह ढोने की चिंता तक से मुक्त
कुछ भी न होने से अलग
विराट के एक पुर्जे सा।
————————————

जरूरी कामच

जरूरी काम है
केवल अपने बारे में इस तरह सोचना
कि सोच को कोई कोना तक न दिखे
सिवाय अपने अक्स के
जिसमें गुम हो जाएँ आप
और फिर भी कौंधते रहें
विचार पुंज की तरह।
———-

एक साथ

बहुत कुछ होता है
एक साथ
इस दुनिया में

बहुत से लोग हँसते हैं
एक साथ
एक दूसरे पर।

बहुत से लोग सोचते हैं
कितना बुरा है समय
ऐसा तो कभी न था।

बहुत से लोग भरते हैं आहें
किसी न किसी के लिए
किसी न किसी बात पर।

बहुत से लोग सोचते हैं
काश, एक दूसरे को काटते
बाँटते बिखरे हुए लोग
धरती को धरती
इंसान को इंसान
हवा और धूप को
हवा और धूप
पानी को निर्मल बनाने के संकल्प से जुड़ते
दुनिया वही नहीं रहती जो वह है।
————-

यदि सुबह हुई

सुबह होगी तो वह जगेगा।
यदि सुबह हुई तो वह जगेगा।
सोता रहेगा
सुबह होने तक।

यदि सुबह न होने पाई
तो सोता रहेगा
रात की पूरी लंबाई में पाँव ताने
सूरज को पावों से ढकेलता।
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1 नवंबर 1984
हवा सुर्ख है
रक्तकणों को सोख रहे हैं
ओषजन के कण
जमीन पर जगह जगह खून के धब्बे।
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कविता में अकाल

अकाल से अधिक भयानक लगता है
कविता में अकाल
पर इतना यातना-विहीन
कि आहों के बीच
कर उठें आप वाह! वाह!
मरहवा! मुकर्रर इर्शाद!
कुछ यूँ कि पड़ता रहे अकाल
कविता के अकाल से बचाने के लिए।
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वसन्त
जैसे कठफोड़वा बनाता है कोटर
चोंच के ठक् ठक् से
किसान बनाता है अमोले का थाला
जैसे लोहार तपाता लोहे को पीटने से पहले
जैसे बढ़ई मिलाता है चूल
जैसे कवि गलाता है सपने
दुनिया बदलने के लिए
ताप और श्रम और धैर्य के ऊर्ध्वकोण पर
कोई है जिसके इशारे पर
सर्दी की मार से दुबक कर
अपने भीतर चला जाता है पेड़
अपने को तलाशता अपने गाढ़े रस में
और सहसा फूट पड़ता है आँखों में बन कर प्रहार
चतुरंग उदासी पर
वसंत भी कविता है
कविर्मनीषी की।
———————-

दिल्ली

इतने सारे जंगल हैं
दिल्ली के भीतर
हर जंगल के साथ
एक दिल्ली
अपनी भव्यता में ध्वस्त

निशाचर दिन में भटकते हैं दिल्ली में
इतने हैं अदृश्य अंधकार
दिल्ली की रोशनी में
सड़क फुटपाथ पर भी मिल जाएगा जंगल

लोग कितने भाग्यवान हैं
जंगल के लिए जंगल नहीं जाना पड़ता
जंगल ही आ जाता है
अपने जंतुओं के साथ।
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फुटपाथ पर सोने वाले

मैं अँधेरे की हँसी हूँ, मै उजाले की लकीर
अँधेरे के आसमानों में मेरा परवाज है
मेरे होने से हुआ करती हैं कुछ बर्वादियाँ
मेरे होने से ही दुनिया खुशनुमा कुछ आज है
मेरी सुगबुग से मचल जाते हैं तूफानों के पर
मेरे उठने से बदलते जुल्म के अंदाज हैं।
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Post – 2020-06-24

#शब्दवेध(70)

दुम रह गई मगर

विचारणीय समस्या यह थी कि क्या अंग्रेजी का एंगर शब्द भी जल से उत्पन्न ध्वनि से संबंध रखता है, और उसी पर विचार करना रह गया। जैसा कि हमने देखा यह शब्द अंगिरा से निकला है। अंगिरा और अग्नि – अंग से
व्युत्पन्न हैं। अक/ अग/अंक/अंग – इन सभी का मूल अर्थ या एक अर्थ जल है (देखें 36) । अंग्रेजी में अ का उच्चारण ऐ के रूप में होता है और इस तरह अंगिरा ईरान में पहुँच कर अंग्र बना और अं. में ऐंग्र > ऐंग्री। ऐंगर हो गया।

क्रोध का आशय इससे जुड़े उत्तर पद – मन्यु – से आया। भारतीय सन्दर्भ में काम के प्रति उत्साह धनात्मक है। इसी भूमिका में बृहस्पति को भी दिखाया गया है – बृहस्पतिः वि चकर्ता रवेण। बृहस्पति उनका ही विशेषण प्रतीत होता है। उन्हें देवपुत्र या द्युलोक की संतान कहा गया है – दिवस्पुत्रा अंगिरसा भवेम। ईरान में, मध्येशिया में जहां से चल कर जरदुस्त्र – जरद्वस्त्र (केसरिया वस्त्र) धारण करने वाले – ईरान पहुँचे थे, उनकी खनिज संपदा का उनके विरोध के बाद भी किस तरह दोहन किया जा रहा था यह पणियों की कथा में स्पष्ट तो है ही, अफगानिस्तान, ईरान, मध्येशिया में हड़प्पा सभ्यता के सर्वमान्य उपनिवेशों, इनके आर्यकरण सभी से प्रकट है। ईरान में कुरुओं का प्रभुत्व – कैखुशरू (कविश्रवस्)।(. According to Avesta, Kay Khosrow had a son called Āxrūra. The latter refers to Kaei Husravah in the Avesta, and Sushravas in the Vedas.)
Xerxes (romanized: Xšaya-ṛšā; c. 518 – August 465 BC), commonly known as Xerxes the Great, was the fourth King of Kings of the Achaemenid Empire, ruling from 486 to 465 BC. He was the son and successor of Darius the Great ( r .Died‎: ‎August 465 BC (aged approximately 53)

मन्यु
मन्यु का चलन नहीं है। -मन (श्रीमन्), -मन्य(विद्वन्मन्य), -मान- (माननीय, श्रीमान और -मान्य- (मान्यवर, सर्वमान्य) का चलन बढ़ना और इनका अर्थभेद इसका कारण हो सकता है। पहले क्रोध के आशय में इसका प्रयोग अधिक होता था। इन्द्र को मन्युमानों में सर्वोपरि, मन्युमत्तम, कहा गया। उन्हें सचमुच गुस्सा आ जाए तो … यदा सत्यं कृणुते मन्युमिन्द्रो। मनुहार या मन्यु-निवारण, खुश करना, खुशामद, जो मर्यादा खोने पर चाटुकारिता का रूप ले लेता है, और देवी देवताओं से इच्छित परिणाम पाने के लिए रिश्वत की पेशकश – मनौती बन जाता है, फिर भी प्रचलन में रहे। मन की उत्पत्ति जल से है यह पहले दिखाया जा चुका है।

क्रोध
क्या क्रोध संज्ञा का पानी से नाता हो सकता है? कर्. कुर, कृ का हो सकता है तो निराश होने की जरूरत नहीं। कृ के साथ दो विरोधी आशय जुड़ते हैं, एक है काटना, जो कृमि, कृत्ति – कटा हुआ, उतारा हुआ अर्थात् चमड़ा, जो कृत्तिवास – चर्म वस्त्र पहनने वाले (अजी, मृगछाला या बाघंबर धारी)। इनका इतिहास इतना ही कि विगत हिमयुग में ये मध्येशिया से आए और मुख्यतः पर्वतीय अंचलों में बसे यक्ष और किरात थे । इसी से कृधु – कटा हुआ, छोटा, (कृधुकर्ण – कनकटा)। इसका दूसरा भाव कर्म है – कृति, कृती, क्रिया। एक तीसरा आशय है जिसमें जल/आर्द्रता का भाव स्पष्ट है – कृपा, करुणा, यद्यपि कृपण – ०जल न बरसाने वाला बादल, कंजूस भी इसी के नकारात्मक भाव से निकला है। कृ के उस विशेष उच्चारण से जिसमें यह क्रु का रूप ले लेता है कृपा का अगला विलोम क्रूर, क्रुध, क्रोध बनता है ( सिंहं न क्रुद्धमभितः परि ष्ठुः; मा ते हेति तविषीं चुक्रुधाम । पिघलती बरफ से खौलते पानी, सूखे से आर्द्रता के सभी भाव जल में समाहित हैं। देखें, E. growling, grudge – to look upon with envy: to give or allow unwillingly; grumble – to murmur with discomfort, to growl; grutch- to grudge, a grudge.

आक्रोश
ऐसा लग सकता है कि क्रोध की तरह आक्रोश भी साधे जल से निकला हो सकता है पर इसमें एक पेंच है। इसका मूल कोस रहा लगता है जो भो. कोसना में सुरक्षित है, सं. में कौरवी प्रभाव से कोस > क्रोश बन गया पर इसका एक दूसरा रूप घोष में स्वरलोप नहीं हुआ। कोस का मूल अर्थ था ऊँची आवाज में गुहार। नीरव वातावरण में यह आवाज जितनी दूरी तक पहुंच सकती थी उसको कोस कहते थे जिसने मानक रूप ले लिया। सं. में इसने भी क्रोश का रूप लिया। ऊँची आवाज में पुकारने के आशय में ही इसका प्रयोग ऋग्वेद में देखने आता है – उत स्मैनं वस्त्रमथिं न तायुमनु क्रोशन्ति क्षितयो भरेषु । घुड़दौड़ के मुकाबलों में इसे (दधिक्रा) को उसी तरह भागा भागा की आवाज लगाते हैं जैसे घाट से कपड़ा उठा कर चंपत होने वाले उठाईगीर के पीछे आवाज लगाते हैं।
अं. क्राइ, (cry); कर्स (curse) इससे ही निकले लगते हैं। crash – a noise of things breaking or being crushed by falling; collapse; lapse; crush आदि की अलग व्याख्या जरूरी है। कोस, कोश, कोष को जल से उत्पन्न ध्वनि से जोड़ना आसान है क्योंकि को/गो=जल> ईश्वर। क्रोश को जल धाराओं के प्रचंडवेग और भंजनकारी रूप को मूर्तिमान करने वाले इस वर्णन को देखें : एता अर्षन्त्ति अललाभवन्ती ऋतावरी इव संक्रोशमानाः । एता वि पृच्छ किमिदं भनन्ति कं आपो अद्रिं परिधिं रुजन्ति ।। 4.18.6 हमारा काम ग्रिफिथ के अनुवाद से चल जाएगा – With lively motion onward flow these waters, the Holy Ones, shouting, as “twere, together. Ask them to. tell thee what the floods are saying, what girdling rock the waters burst asunder.

आमर्ष
जिस मृष मूल में आ उपसर्ग के योग से आमर्ष बना है उसका अर्थ ‘भूलना’ किया गया है। दाता तेरे मैत्री को हम कभी न भूलें – न ते भोजस्य सख्यं मृषन्ता। भो. में इसके लिए अमरख अमरखाइल का प्रयोग होता है। अम्, अंब, अबु = जल । E. morose- sour tempered पर इस दृष्टि से विचार किया जा सकता है कि आमर्ष के मर्ष और morose के morse का जल से संबंध है या नहीं। जल के मन्द प्रवाह के नाद या उससे निकटता रखने वाले किसी भी शब्दातीत नाद को murmur से व्यक्त करते हैं। भारतीय चुनाव सरसर, हरहर, कलकल, खलखल आदि का है। चर्चा को फैलने से बचाने के लिए यह मान लेने में ही कल्याण है कि मृ<मर, की ध्वनि जल के मंद प्रवाह से और वायु के मंद प्रवाह में किशलयों की रगड़ से पैदा होती है। यह भी रोचक है कि जहाँ जल और वायु के उसी प्रवाह को हिंदी में सरसर, रसरस और किशलयों से उत्पन्न ध्वनि के लिए मरमर पसंद था तो अंग्रेजी में हम किशलयों की ध्वनि के लिए रसल (०रसर)। क्षोभ क्षोभ, खलबली, खौलते या प्रखर प्रवाह से चक्राकार उफनते जल की इतनी स्पष्ट और लोक भाषाओं में इतना व्यवहृत (भो. खदबदाइल, खदकल> खभिलाइल, खोभल – अपर को क्षुब्ध करना, चुभोना) कि इस पर लंबी चर्चा जरूरी नहीं व्यग्र होने, व्यग्र करने के आशय में इसका प्रयोग वैदिक काल से ही होता आ रहा है – आशुः शिशानो वृषभः न भीमो घनाघनो क्षोभणश्चर्षणीनाम् । संक्रन्दनोऽनिमिष एकवीरः शतं सेना अजयत्साकमिन्दः ।। 10.103.1 (SWIFT, rapidly striking, like a bull who sharpens his horns, terrific, stirring up the people;/With eyes that close not, bellowing, Sole Hero, Indra. subdued at once a hundred armies.) सूअरों के संकरे दरबे को जिसमें वे बेचैन रहने को बाध्य हैं, भो. में खोभार कहते हैं और यदि सं. से अधिक प्रेम हो तो आप इसे क्षोभागार कह सकते हैं, सूअरों को कोई आपत्ति न होगी।

व्यथा
का अर्थ है आंतरिक उद्वेग (न ते व्यथा मा च मूढ़ भावो) और कायिक पीड़ा (शिरोव्यथा, उदर व्यथा) । ऋग्वेद के रचनाकाल में कभी एक बहुत भयंकर भूचाल आया था। सिंधु की धारा में एक इतना ऊँचा अवरोध पैदा हो गया था कि उससे एक विशाल सरोवर बन गया था। ढोलावीरा का दुर्गप्राचीर फट कर टेढ़ा हो गया था। इसके झटके लबे समय तक झटके आते रहे थे। इसी से घबराकर फिनीशियनों ने भारत के अपने तटीय आवास को छोड़कर कैस्पियन तट कर पहुँच गए गए थे। इससे पैदा हुए उपद्रव और भागम भाग का सुंदर चित्र ऋग्वेद में हुआ लगता है, यद्यपि इसका श्रेय इन्द्र को दिया गया है “यः पृथिवीं व्यथमानामदृंहद् यः पर्वतान् प्रकुपिताँ अरम्णात् । यो अन्तरिक्षं विममे वरीयो यो द्यामस्तभ्नात् स जनास इन्द्रः ।। 2.12.2”. ( He who fixed fast and firm the earth that staggered, and set at rest the agitated mountains, Who measured out the air’s wide middle region and gave the heaven support, He, men, is Indra.)
यह भूचाल बहुत व्यापक था और अनुमानतः 2500 ईस्वी पूर्व आया था, ऋग्वेद के रचनाकाल के निर्धारण में निर्णायक महत्व रखता है।

Post – 2020-06-23

भाष्य

कल पादटिप्पणी में कहा था *”इसमें प्रयुक्त कतिपय शब्दों की व्याख्या कल।” ्व्याख्या भाष्य बन गई तो लंबाई तो बढ़ेगी ही। धीरज हो तो पढ़ लें। परंतु यह भाष्य भी अन्य पुरुष में ही संभव है।

1. लोकछवि और आत्म छवि की दूरी

थोड़ी बहुत शिकायत तो सभी को रहती है, परंतु कुछ का असंतोष दर्पोक्तियों में व्यक्त होता है। दर्पोक्तियों के लिए सबसे अधिक बदनाम मिर्जा गालिब हैं। मीर भी कुछ कम न थे। फिराक का शेर
आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हम-असरो
जब भी उन को ध्यान आएगा तुम ने ‘फ़िराक़’ को देखा है। सुना होगा।

तुलसी अपने बारे में ऊंचे स्वर में बात नहीं करते। विपर्यय से काम लेते हैं : कबित बिबेक एक नहीं मोरे. साँच कहहुँ लिखि कागद कोरे, परंतु इस साँच का एक पक्ष यह है कि वह अपनी पादुका से अपनी अवहेलना करने वालों का मुँह तोड़ देते हैं। खल उपदेस होइ हित मोरा।

अपनी उपलब्धि पर अनन्य विश्वास और किसी भी कारण से साहित्य और ज्ञान के मठाधीश द्वारा अपनी उपेक्षा या अवमूल्यन का परिणाम है वह क्षोभ जो दर्पोक्ति का रूप ले लेता है। यह दंभ का प्रकाशन नहीं, एक तरह की क्षतिपूर्ति है जो उसे टूटने से बचा लेती है। इसमें अतिरंजित कुछ नहीं होता, सत्य का उसके सही अनुपात में प्रकाशन मात्र होता है। वक्रता सत्य की माँग होती है।

2. आश्चर्यवत पश्यति कश्चिदेनं

यह भी एक दर्पोक्ति ही है। इबारत गीता के दूसरे अध्याय की है । बात आत्मा के संदर्भ में की गई है, कोई इसे देखकर चकित रह जाता है, दूसरा इसे विस्मयकारी बताता है। कोई सुनकर मानने को बाध्य होता है कि यह आश्चर्यजनक है, परन्तु इसके बाद भी, कोई इसे जान नहीं पाता।
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रुणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ।। गीता 2.२९।।

आध्यात्मिक बहस है तो कुछ तो गलत होगी ही, अन्यथा आत्मा को देखने की बात न की जाती। देखा तो किसी आदमी को ही जा सकता है, और उसे तलाश कर मैंने हाजिर कर दिया था, पर आप को विश्वास नहीं होगा कि धरती के आश्चर्यों में एक आश्चर्य यह भी है। आप की तो छोड़िए, उसे स्वयं इसका पता न था। मैंने उसे बताया तो आश्चर्य से मेरा मुँह देखता रह गया।

3. किमाश्चर्यं अनाश्चर्यं तन्मे ब्रूहि परंतप।

मैं समझाता हूँ।

जो आपके ज्ञान और अनुभव के भीतर या उसके अनुरूप होता है, यदि वह कठिन हो तो भी आश्चर्यजनक नहीं लगता। यदि, झूठ, फरेब, अभिचार या पाखंड हो तो वह अटपटा या विचित्र तो लग सकता है पर आश्चर्यवत नहीं लग सकता। आश्चर्यजनक केवल वह होता है जो सत्य होता है, जिसके होने या घटित होने पर आप संदेह नहीं कर पाते और जो आप के ज्ञात नियमों या ज्ञान के स्तर से ऊपर होता है इसलिए जिसे देखते हुए भी आप मान नहीं पाते।

विज्ञान के छात्र कुछ ऐसे प्रयोगों को प्रदर्शनियों में दिखाया करते थे जिनके पीछे काम करने वाले सिद्धान्तों से अनभिज्ञ लोग चकित रह जाते थे, देखते हैं यह सच है फिर भी मान नहीं पाते। यही हाल उसके साथ है। जिन प्रमाणों को लोग झुठलाने की कोशिश के बाद भी न झुठला पाते हैं न खंडन कर पाते हैं, उनको भी मान नहीं पाते। इसलिए यदि कोई उससे कहे कि तुम्हारी उपेक्षा हुई है तो वह इसे मान नहीं पाता। उल्टे पूछता है, ‘विज्ञान के साधारण नियमों से अनभिज्ञ लोग जिन प्रयोगों को देख कर आश्चर्यचकित रह जाते हैं क्या उन पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि वे उन प्रयोगों का प्रदर्शन करने वालों की उपेक्षा कर रहे हैं?’ प्रश्न उपेक्षा का नहीं, हिंदी जगत, सच कहो तो भारतीय समाज के बौद्धिक स्तर का है। औपनिवेशिक मानसिकता जन्य आत्मबल के गिरे हुए स्तर का है। जिसकी पुस्तक किसी भी पाठ्यक्रम में या अनुमोदित संदर्भ ग्रन्थों में न होते हुए भी अपने पृथुल आकार के बाद भी दसेक संस्करण/पुनर्मुद्रण देख चुकी हो और जिसकी माँग बराबर बनी हुई हो वह अपनी उपेक्षा की शिकायत कैसे कर सकता है? इसी स्थिति में किसी दूसरे इतिहासकार को रख कर देख लो।’

मैं तो चुप हो गया, पर बात समझ में आ गई हो यह जरूरी नहीं। कहोगे अधिवक्ता होने के नाते बढ़ा कर बात कर रहा हूँ, इसलिए मैं तुम से ही जिरह करके अपनी बात समझाने का प्रयत्न करूँगा।

अब तुम बताओ हमारे कालेजों, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों में कितने ऐसे सत्यान्वेषी हैं जो उपाधि बटोरने के बाद किसी शोधकार्य की ओर रुख भी करते हैं? कितने हैं जिनका किया और कराया काम किसी काम का होता है?

तुम गलत समझ रहे हो, शुक्ल जी, रामकुमार जी, धीरेन्द्र जी, द्विवेदी जी, और रामविलास जी की अवज्ञा तो मैं कर ही नहीं सकता। पर इनमें भी चिन्तन की दिशा किसने बदली है?

“नहीं यह उलझाने वाला सवाल नहीं। दो टूक सवाल है। किसने औपनिवेशिक चौखटे के भीतर रह कर काम किया है और किसने उसे तोड़ कर बाहर आने का प्रयत्न किया है?”

“मैंने राहुल जी का नाम तो लिया ही न था, ज्ञान के मठों पर बैठे लोगों की ही बात कर रहा था, पर तुम ठीक कह रहे हो। इस कसौटी पर तो रामविलास शर्मा को छोड़ कर इनमें कोई नाम खरा नहीं उतरेगा, राहुल जी भी नहीं।

“वह तो है। आलोचना रामविलास जी की बहुत हुई। गलतियाँ भी निकाली गई हैं। पर एक बात तो मानोगे ही, भटकता चलने वाला है, कदमताल mark time करने वाला नहीं। ले दे कर एक आदमी मिलता है। नहीं गलती हुई, एक और, पंडित किशोरी दास बाजपेयी।”

“अब अगले सवाल पर आओ। हिंदी क्षेत्र में ही नहीं पूरे देश में, दो तीन सौ साल के इतिहास में, है कोई ऐसा व्यक्ति जिसे अध्ययन, अध्यापन और ज्ञान की किसी संस्था में घुसने ही न दिया गया हो, पैंतीस साल तक टक्कर मारने के बाद हार कर अंतिम बोगी से सरकारी चाकरी पकडनी पड़ी हो और फिर भी जिसने अपनी सारी ऊर्जा शोधकार्य में ही लगाई हो ? वह भी इस कटु सत्य के होते कि पढ़ने-लिखने की आदत को वहाँ इस बात का प्माण माना जाता है कि इनका जी अपने काम में नहीं लगता।“

“मैदान साफ दिखाई दे रहा है- एक को छोड़ दूसरा कोई नहीं। एको सः द्वितीयो नास्ति।”

“अब इसमें एक और नुक्ता जोड़ लो। ऐसे लोग मिल जाएँगे जो रोज एक कविता लिख लेते हों। ऐसे भी मिल जाएँगे जो एक कहानी रोज लिख लेते हों। ईलियट दफ्तर के काम की तरह, दफ्तर में बैठ कर लिखता था। हेमिंग्वे एक दर्जन पेंसिलें गढ़ कर तैयार कर लेता था, खड़े खड़े लिखता। बारहों जब घिस जातीं तो दिन का काम पूरा। अब तुम अपनी जानकारी के क्षेत्र में किसी ऐसे आदमी का पता करो जो रोज एक शोध लेख पेश कर देता रहा हो। कोई मिल जाय तो बताना।”

4. नैपोलियन का शब्दकोश

“नैपोनियन के कोश में असंभव शब्द नहीं था, यह मुहावरा तब भी चलता है जब नैपोलियन को हार का मुँह देखना पड़ा था और संखिये की मौत मरना पड़ा था, क्योंकि वह अंग्रेजों का शत्रु होकर भी यूरोपियन था। राजा था। पिटा भले वह इसलिए हो कि अंग्रेजों जितना कमीना नहीं था। पहली बार उसने युद्ध में भी नैतिकता के निर्वाह की हिमायत की थी और निर्वाह किया था और इन कमीनों ने युद्ध में उसके साथ क्या किया था यह तो पता नहीं, पर युद्धबंदी बना लेने के बाद उन मर्यादाओं का उल्लंघन करते हुए निपट एकान्त द्वीप में रख कर सता सता कर, संखिया मिला आहार देकर, मारा था।”

“ठीक कहते हो, कुछ बहक गया, आदत दूसरा स्वभाव जो ठहरी। कह यह रहा था कि बहुत मामूली हैसियत के अनगिनत लोग तुम्हें ऐसे मिल जाएँगे जिनके जीवनकोश में असंभव शब्द सचमुच नहीं मिलता, परन्तु मानसिक दासता से ग्रस्त यह देश न उनको पहचान पाता है न उचित सम्मान दे पाता है, उनके काम को देख कर भी विश्वास नहीं कर पाता कि ऐसा संभव था, कि ऐसा कोई भारतीय भी कर सकता था, कि समस्त साधनों से वंचित किए जाने के बाद भी कर सकता था। आश्चर्यवत् तं पश्यन्ति मूढ़ाः । मूढ़ता की पराकाष्ठा यह कि उसकी विपन्नता को ही इस बात का प्रमाण मान लेते हैं कि यदि उसने सचमुच कोई महान काम किया होता तो इतना फटेहाल क्यों रहता।”

“नहीं, मैं हवा में बात नहीं कर रहा हूँ। बहकना अलग बात है, पर बात ठोस प्रमाण के बिना कभी नहीं करता। हर कथन ठोस प्रमाणों पर आधारित होता है। यही मेरी शक्ति है, यही मेरा कवच। भारत भारतरत्न के तमगे बाँटता है, पर रत्न की पहचान तक नहीं कर पाता। यह तक नहीं जानता कि रत्न कितनी दुर्भेद्य शिलाओं के भीतर छिपा रहता है। वह पुराना मुहावरा तक भूल गया है कि रत्न अपनी चमक दिखाने के लिए नाजिरों की तलाश नहीं करता, उन्हें उसकी तलाश करनी पड़ती है – न रत्नमन्विष्यति मृग्यते हि तत्।

“तुमने दशरथ माझी का नाम सुना है?”

“नहीं सुना तो मुझे कोई हैरानी नहीं। कोहिनूर का नाम जरूर सुना होगा, क्योंकि उसे न जानने पर तुम्हारे सामान्य ज्ञान के नंबर कट जाते। पर पत्थर किस ताप से गुजरने के बाद कोहिनूर बनता है यह तो तुम्हारे जौहरियों तक को पता नहीं, उनकी समझ में तो केवल इतना आता है कि इसके आगे जवाहर है और पीछे लाल है इसलिए जब दोनों मिल गए ताे बनेगा तो कोहिनूर ही। महानता और नम्रता का संगम देखना हो तो उसको देखो। उसने खुद रोका, ‘मुझे कोहिनूर नहीं बनना, बना तो महारानी के मुकुट की चमक कम हो जाएगी, मैं भारत रत्न बन कर ही संतुष्ट हूँ’ और उसने खुद अपनी कलम से अपना नाम प्रस्तावित करके अपने को भारत रत्न बना लिया। निस्पृहता, त्याग और बलिदान की कोई दूसरी ऐसी मिसाल मिल सके तो बताना।”

“मैं बकवास नहीं कर रहा हूँ, बार बार कहे गए अपने ही कथन को दुहरा रहा हूँ, कि सत्य अपने कण कण में व्याप्त होता है, पत्थर पर कहीं चोट करो उससे सत्य की चिनगारियाँ फूटेंगी। नकली रत्न चमकते रहें इसके लिए हीरों को उपेक्षा की परतों से दबा दिया जाता है। दशरथ माझी ने कहानियों तक में जिसे असंभव माना गया है वह कर दिखाया। पहाड़ तोड़ कर रास्ता तैयार किया, उपेक्षा, उपहास और साधनहीनता को झेलते हुए, “केवल एक हथौड़ा और छेनी लेकर अकेले ही 360 फुट लंबे 30 फुट चौड़े और 25 फुट ऊँचे पहाड़ को काट कर एक सड़क बना डाली। 22 वर्षों के परिश्रम के बाद, दशरथ के बनायी सड़क ने अतरी और वजीरगंज ब्लाक की दूरी को 55 किमी से 15 किलोमीटर कर दिया।”

“नहीं, जानकारी मेरे मुअक्किल की भी अच्छी नहीं है, होती तो उनके जीवन काल में उनके चरणस्पर्श अवश्य करता। उसे तो यह पता तक न था कि उसके कोई अग्रज हो चुके हैं। वे उम्र में उससे दो साल बड़े थे, उन्होंने वास्तविक पहाड़ तोड़ा था। जिस राज्य में उनके इस खुले आश्चर्य को देखने का ताब न रह गया वहाँ के गिरे हुए मनोबल में लालुओं, राबडियों का खानदान की ध्वजाएँ लहराएँ और वहां के लोग पेट भरने के लिए देस-परदेस में अपमान झेलते हुए, नारकीय परिस्थितियों में रहते हुए, गालियों को अपने नाम का पर्याय मानते हुए दिन काटें और घर-घरनी की याद में तड़पते हुए बिरह के गीत गाते रहें, इससे अलग कोई चारा क्या है। इसने तो मानव निर्मित मान्यताओं के पहाड़ गिराए हैं।उनको ध्वस्त देख कर भी ‘मेरी राजनीति का सच यह, उनकी राजनीति सा सच यह, राजनीति से बाहर सच गोल’ वाले देश में कोई इसे संभव न मानें, आश्चर्य में भकुआया इस बात की प्रतीक्षा करता रह जाए कि कहीं से कोई जादू आए, मान्यताओं के मलबे में नई जान फूँके और उसकी राजनीति में नई जान आ जाए, तो उसे हैरानी न होगी। सुना न कल कोई कह रहा था सभ्यता के जीन डिकोड हो गए है, मलबे फिर पहाड़ बनने जा रहे हैं, कोई रोक सके तो रोक ले!”

Post – 2020-06-22

आश्चर्यवत पश्यति कश्चिदेनम्

मैं उस व्यक्ति को जानता हूँ जिसे कोई नहीं जानता। यूँ तो कोई किसी को नहीं जानता, क्योंकि सभी की आत्मछवि और लोकछवि में अंतर होता है, पर अन्तर इतना अधिक नहीं होता कि पहचान ही गायब हो जाए। उसके मामले में यह अंतर इतना बड़ा है कि वह अपनी ओर देखता है तो दुनिया पर हँसता है और दुनिया पर नजर डालता है तो अपने पर हँसता है। उस पर कोई हँस नहीं पाता। उसका नाम लेते ही लोगों को अपनी सारी ताकत अपनी हँसी रोकने पर लगानी पड़ती है।

पहली बार जब नैपोलियन से उसका सामना हुआ तो सारी दुनिया की जमा भीड़ के सामने नैपोलियन घोड़े की पीठ पर सवार, हाथ में डिक्शनरी उठाए, डींग हाँक रहा था, “मैने अपने कोश से‘असंभव’ शब्द को गायब कर दिया।” दुनिया हक्का-बक्का! और तभी वह तन कर खड़ा हुआ, “यार, तू इस उम्र में आकर यह काम कर पाया। मैंने तो यह काम नव साल की उम्र में कर दिखाया था।

आप विश्वास नहीं करेंगे, नैपोलियन के हाथ से वह कोश छूट कर नीचे गिर गया। उसे उठाने के लिए वह घोड़े से कूदा तो घोड़ा भाग खड़ा हुआ और फिर तो नैपोलियन उस पन्ने से ही गायब, जिससे निकल कर वह डींग हाँक रहा था।

पहली पास कर चुका था। नौ साल का रहा होगा, कि एक तुकबंदी कर डाली, और इसका असर कुछ ऐसा कि उसके ठीक बाद इतना बीमार कि तीन महीने तक बरसात की सीलन और ऊमस में एक अँधेरे कमरे में पड़ा रहा। चारपाई से उठने की ताकत न रही। सभी निराश, पर अकेला वह जानता था कि वह मर नहीं सकता। यदि मारना होता तो ईश्वर ने उसे कवि नहीं बनाया होता।

अनावृष्टि का प्रकोप हुआ। पता चला यदि ताड़पत्र पर एक लाख बार ‘राम’ लिख कर कुएँ में डाल दो तो वृष्टि को कोई टाल नहीं सकता। पर यह काम करेगा कौन? कोई नहीं तो वह करेगा। कलम पकड़ने का शऊर नहीं पर अगले दिन पासी से ताड़ के गोंफे कटवा कर बोरा सीने के सुए की नोक से राम राम लिखना शुरू। लिखते लिखते हाथ थक गए तो मान लिया एक लाख पूरा हो गया होगा।

यह कुछ बाद की बात है। उस जमाने में हर ताड़, पीपल या घने पेड़ पर कोई न कोई नट या प्रेत। एक नई खोज का पता चता कि यदि कोई पानी में खड़ा हो कर सौ दिन तक आधे घंटे उगते सूर्य को अपलक देखता रहे तो आँखों में इतना तेज आ जाए कि उसके देखने से भूत भस्म हो जाय। अगले दिन से बिना किसी को बताए पास की गंगरी में कमर तक के पानी में खड़ा हो कर साधना आरंभ। यदि कातिक में सिंचाई के लिए पानी का इस्तेमाल न कर लिया गया होता तो अंधा हो जाता। अब दिये की रोशनी में आँखों से आँसू इस तरह बहते कि कुछ देख न पाता। धूप में आँखें बंद हो जातीं और नीद आ जाती। पर यह निश्चय कि जो काम कोई न कर सकता उसे वह करेगा स्वभाव का हिस्सा है।

बात समझ में न आई होगी। मैं समझाता हूँ।

उसका शैशव इतनी यातना और उपेक्षा में बीता था जिसे याद करता है तो आँखें बन्द हो जाती। भरे परिवार के बीच निपट अकेला, उपेक्षित। पर उदास दिखना उसे आत्मदैन्य प्रतीत होता। इतना गंदा कि सोचता परमात्मा ने हाथ मक्खियाँ उड़ाने के लिए बनाए हैं। उस उम्र में भी फुर्सत कम मिलती, पर जब मिलती तो एकान्त में सबसे छिप कर रोता- आँसू बह रहे हैं, दिवंगत माँ की याद में अहकती साँसों की दीर्घता बढ़ती जा रही है, छाती भाथी की तरह धौंकती, अब फटी कि तब। नाक आँखों से होड़ लेने लगती, बहना तो हमें भी आता है । कुछ देर बाद निढाल हो कर सो जाता, या यदि इसी बीच किसी काम की गुहार लगती तो झट बहोंरियों से आँसू पोंछ कर हँसता हुआ बाहर निकलता कि किसी को आभास भी न हो कि वह रो रहा था। बचपन में उसे रोते हुए किसी ने नहीं देखा; बचपन की याद में जिंदगी भर रोता रहा – इक जरा छेंड़िए फिर देखिए क्या होता है। अपने नरक में तिलमिलाते हए उससे बाहर निकलने के संघर्ष से पैदा हुआ था वह लावा, जो फूटता है तो वज्रसार मान्यताएँ छिन्न-भिन्न हो जाती हैं। मैने देखा है, आप ने न देखा होगा। यही है इसका तिलिस्म, कुछ को दीखता ही नहीं, शेष को दीखता है सिर पीट लेते हैं पर विश्वास नहीं कर पाते।

वह दर्जनों किताबें लिख चुका है, पर लिखने से कतराता है क्योंकि जानने के नाम पर केवल इतना जानता है कि उस किसी विषय की अच्छी जानकारी नहीं है, जो है वह भी व्यवस्थित नहीं, और मजा यह कि मानविकी कि किसी भी शाखा के विश्व के जिन मूर्धन्य विद्वानों को ज्ञान का भंडार मानता उन्हें गाँठ के पूरे और आँख के अंधे मानता है। हँसिए मत, उससे बात कीजिए, हँसी बंद हो जाएगी। मेरे साथ यही हुआ था।
छेड़ बैठा, “तुम्हें संस्कृत आती है?”
“पढ़ लेता हूँ, बोल नहीं पाता।”
“फिर भी वेद की ऐसी हाँकते हो कि वेद के प्रकांड विद्वान उधिया जाएँ।”
चुप हुआ तो लगा चुप हो गया, पर कुछ देर बाद बोला, “वे संस्कृत जानते थे जिसका जन्म वेद को समझने की कोशिश में और अपने बटुए में बंद करने की लालसा से हुआ था। न आज तक वेद को समझ पाए, न संस्कृत को
भाषा बनने दिया।”

“और तुम?

“मैं उस बोली को जानता हूँ जिनसे वैदिक पैदा हुई, उस संचलन को जानता हूँ जिससे वैदिक अस्तित्व में आई, उस भाषा को जानता हूँ जिसके प्रभाव से संस्कृतीकरण आरंभ हुआ, उन परिवर्तनों को जानता हूँ जो घटित हुए, उस क्रिया-व्यापार को जानता हूँ जिसके चलते यूरोप तक इसका प्रसार हुआ, उन्हें इनमें से किसी का ज्ञान नहीं। मुझे इनमें से किसी को इतनी अच्छी जानकारी नहीं कि उसे ज्ञान कहा जा सके।”

“और फिर भी हर विषय में टाँग अड़ाते रहते हो।”

“टाग हो तो अड़ाऊँ। विषय में रुचि रखने वालों और ज्ञाताओं की तलाश करता रहता हूँ, याचक भाव से अनुरोध करता हूँ कि वे उस विषय पर काम करें, मैं अपनी सामग्री देने और उनकी आयु कुछ भी हो, उनका सहायक बनने को तैयार हूँ, पर जब कोई मेरे प्रस्ताव को समझ नहीं पाता तो लाचारी में …और जो तुम टाँग अड़ाने की बात करते हो, जो स्वयं विज्ञापित करता रहता है कि उसे किसी विषय का अच्छा ज्ञान नहीं, कि कहीं लोग उसे विषय का ज्ञाता न मान बैठें, जिसकी टाँग पहले से टूटी हो, वह टाँग कैसे अड़ाएगा?
“ज्ञान शक्ति देता है, गति देता है, पर दृष्टि नहीं देता। वह अन्तर्विरोधों की पहचान से पैदा होती है। उनकी रगड़ से ही वह चिनगारी पैदा होती है जिसे ज्ञान के ईंधन से मशाल या सर्जनात्मक ताप में बदला जा सकता है। तुमने ऋग्वेद में आई अंधे और पंगु की कहानी कभी न कभी तो पढ़ी ही होगी। मैं ज्ञान का गट्ठर लादे भटकते, ठोकर खाते, परस्पर टकराते अंधों में से किसी एक को समझाना चाहता रहा कि इस गट्ठर को फेंक कर मुझे कंधे पर बैठा ले तो दोनों आसानी से पर्वत पार कर सकते हैं। खोजे एक न मिला।”

‘मैंने उपहास भरे स्वर में कहा, “और फिर तुम्हें टाँगे निकल आईं और उन्हे लोगों के रास्ते में अड़ाने लगे कि उनमें से कोई उन्हें फिर तोड़ दे।”

“तुम ज्ञानियों से अधिक गधे हो, क्योंकि तुम उनकी महिमा से आविष्ट हो। एक बार कह दिया कि मैंने किसी विषय में टाँग नहीं अड़ाई फिर भी बात समझ में न आई। मैंने सोच की दिशा बदली है। उस सत्य को हाथ में उठा कर दिखाने लगा, ‘जिधर तुम तलाश कर रहे थे उधर वह चीज थी ही नहीं, फिर मिलती कैसे।वह दूर भी नहीं थी, पास ही थी, दिखाई दे रही थी। लाचारी में मुझे जैसे तैसे घिसटते हुए उस तक पहुँचना पड़ा, उठाकर दिखाना पड़ा। मैने उन्हें ध्वस्त नहीं किया, वे व्यर्थ हो गए।

“मेरा कोई काम प्रस्तुति के मामलो में संतोषजनक नहीं पर कोई ऐसा नहीं जो युगान्तरकारी न हो। यह मामूली सी बात समझने की योग्यता हिंदी के ही नहीं, भारत के किसी बुद्धिजीवी में नहीं।”

अब मेरे लिए ठहाका लग ने के अलावा कोई चारा न बचा था। उसने बुरा नहीं माना। मुस्कराता रहा।

2

“अच्छा यह बताओ तुम्हारी सबसे प्रिय कृति कौन सी है?”

“ऋग्वेद, जिसे समझने की कोशिश में लगा रहता हूँ।”

“मैं कहूँ, तुम पाँच हजार गहरे कुँए से बाहर निकलना ही नहीं चाहते।”

“नादान के कहने का तरीका एक होता है, और समझदार का दूसरा। समझदार होते तो घटना, विचार और संवेदन में फर्क कर पाते और जानते समय बीतने के साथ घटित बीत जाता है, जीवंत विचार और संवेदन प्रायः सम्मोहक स्वप्न बने रहते हैं। सर्वे भवन्तु सुखिनः या केवलादी भवति केवलाघी पाँच हजार नीचे नहीं पहुँचता, पाँच हजार साल के ताप से तप्तकांचन बन कर चमकता और चुनौती बन कर खड़ा रहता है। नासदीय सूक्त पढ़ो और पता किसी और ने वर्णनातीत के वर्णन में सफलता पाई है?”

“चलो मान लिया, पर यह बताओ जिसे तुम जानते नहीं, अभी जानने की कोशिश में लगे हो उसके भी इतने बड़े ज्ञाता बन जाते हो कि जिन्हें सारी दुनिया अधिकारी विद्वान मानती है उनको भी गिनती में ही नहीं लेते। मधुसूदन ओझा, क्षेत्रेश चट्टोपाध्याय का नाम सुना है।”

“सुनो, मैं पिछले पचास साल से ऋग्वेद को समझने की कोशिश कर रहा हूँ। कंप्यूटर पर काम करने लगा तो दो बार लगभग पूरा ऋग्वेद अपने हाथों लिखा। दोनों बार वाइरस के प्रकोप से धुल गया, फिर तीसरी बार पूरा हुआ। फिर एक पाठ मंडलवार सायण भाष्य में आई व्याख्याओं और ग्रिफिथ के अनुवाद के साथ। एक कोश अलग से। विविध पक्षों से संबंधित उद्धरणों का संग्रह अलग से। यदि इन चिर वंदनीय महापुरुषों की समझ सही होती तो उन्हें पढ़ कर समझ लेता। इतना समय तो बर्वाद न होता। एक मोटी बात बताऊँ। तैत्तिरीय ब्रा. का कथन है, वैशयवर्ण ऋग्वेद से पैदा हुआ – ऋग्भ्यः जातं वैश्यं वर्ण आहुः, ऋग्वेद में जीवेम शरदः शतं की कामना प्रबल है, पर इसलिए कि शरद ऋतु वैश्य ऋतु है – शरत् वै वैश्यर्तुः; ऋग्वेद में स्थानों का नाम गायब, नदी नामों और यात्राओं की भरमार पर क्यों ? क्योंकि नदियां वारिपथ या आवागमन का मार्ग हैं, प्र ते अरदत् वरुण यातवे पथः। इसके बाद भी मुझसे पहले किसी ने ऋग्वेद को आर्थिक गतिविधियों को केन्द्र में रख कर समझने की कोशिश की? मेरी कोशिश भी एक सिद्धि है।”

मैंने हाथ जोड़ लिए, “भैया मान गया, पर ऋग्वेद से नीचे तो उतरो। यह बताओ हिंदी का कौन सा कवि पसंद है?”

“तुलसी।”

“गई भैंस पानी में। फिर चार सौ साल पीछे!”

“देखो, जिसे साहित्य और आलोचना के मानदंड समझना हो, काव्यभाषा ही नहीं गद्य भाषा के मर्म को समझना हो उसे तुलसी को अपने साहित्यिक पाठ्यक्रम की तरह आधा-घंटा एक घंटा मनोयोग से पढ़ना चाहिए। वह अकेले कवि हैं जो नासदीय सूक्त की ऊँचाई को छू पाते हैं।”

“समझा नहीं।”

“समझोगे भी नहीं क्योंकि तुमने दोनों में से किसी को पढ़ा ही नहीं। जैसे लोग ताजा भोजन पसंद करते हैं वैसे ही तुम ताजा, गर्मागर्म साहित्य पसंद करते हो, भले वह जहाँ से ऑर्डर दे कर मँगाया गया है वहाँ बासी पड़ गया हो। तुलसी जानते हैं ऊँचे से ऊँचे विचार को अशिक्षित और अल्पशिक्षित व्यक्ति तक पहुँचाया जा सकता है। संस्कृत साहित्य का समस्त वैभव उन्होंने जनभाषा में उतार कर रख दिया। अकेले वह हैं जो साहित्य की सामाजिक भूमिका और साहित्यकार के सामाजिक दायित्य को समझते और इसका आख्यान करते हैं। यह समझ तुलसी से पहले न थी, यह समझ हमारे समय में भी खो गई है।”

“तुम रौ में आते हो तो रुकते नहीं। साहित्य की सामाजिक भूमिका और साहित्यकार के सामाजिक दायित्व पर सबसे अधिक चर्चा हमारे समय में हुई है और तुम कहते हो…”

“इसे चर्चा नहीं, भोजपुरी में गलचउर कहते हैं, तुम इसे जुगाली कह सकते हो। चर्चा हो रही है और साक्षरता, प्रकाशन और प्रचार के उन्नत साधनों के दौर में भी आप का साहित्य साक्षरों तक नहीं पहुँच पाता जब कि तुलसी उस पिछड़े युग में भी निरक्षर जनों तक पहुँच सकते थे।”

मैंने चट जवाब दिया, “धार्मिकता के कारण।”

“हो सकता है यह भी एक कारण हो पर यह प्रधान नहीं है। प्रधान अंतर जातीय परंपरा, परंपरा से तुम्हें परेशानी हो तो समझो जातीय मिजाज, सामाजिक मनोरचना की पहचान खो जाना। आधुनिक बनने के उत्साह में हमारे मानस का औपनिवेशीकरण। आधुनिक शिक्षित वर्ग अपने ही समाज के अशिक्षिताें के बीच कुछ अलग, अजनबी सा बन कर रहने लगा। पहले का प्रकांड विद्वान भी उन्हीं में धँस कर रहता था फिर भी अधिक समादृत था। व्यंग्य यह कि रीतिकालीन कविता की पहुँच जहाँ तक थी वहाँ तक भी आधुनिक साहित्य की पहुँच न रह गई। यह एक गंभीर समस्या थी। कम से कम साहित्य के सामाजिक दायित्व की बात करने वालों को इस पर ध्यान देना चाहिए था, पर वे ऐसा न कर सके क्योंकि सबसे औपनिवेशिक दिमाग स्वयं उनका था और आज भी है। जीववध को पाप मानने वाले देश में हिंसा का दर्शन ले कर आए थे।”

“तुम तो हर चीज को उलट देते हो यार! यह बताओ जब तुम नौ साल की उम्र में ही इतने महान कवि बन गए थे कि काल भी तुम्हारा बाल बाँका नहीं कर सकता था तो कविता लिखना छोड़ क्यों दिया?”

“मेरी आठवीं तक की पढ़ाई गाँव में हुई। उसमें एक ‘भारती-सदन पुस्तकालय’ था जिसमें साहित्यरत्न तक की शिक्षा और परीक्षा का भी प्रबंध था। उसमें रीतिकाल तक का समग्र साहित्य था। कविता के नाम पर वही पढ़ता रहा। यह सोच कर कि एम.ए. तो हिंदी से करना ही है भानु जी का छंदप्रभाकर, जाने किसका अलंकार भेद, रस और नायक-नायिका भेद सब तैयार। उन्हीं में रहीम का बरवै नायिका भेद भी था।”

“क्या कहते हो तुम? रहीम और नायिकाभेद?”

“अवधी में था। सब भूल गया पर एक छंद याद है, ‘भोरहिं बोलि कोइलिया बढ़वति ताप। घड़ी एक भर अलिया रहु चुपचाप।’ साहित्य हमारी मनोरचना, कल्पना और संवेदना को नियंत्रित करता है और इसका नुकसान यह हुआ कि मेरी चेतना में शास्त्रीयता घर कर गई। खड़ी बोली की कविता से परिचय श्यामनारायण पांडे की हल्दीघाटी पढ़ कर। आठवीं के, 1948 के आरंभिक दौर की बात होगी। उससे इतना अभिभूत हुआ कि मैंने भी उसी नाम से एक खंडकाव्य रच बैठा। कथाबंध था कि एक पर्यटक हल्दीघाटा देखने जाता है और पूछता है कि हुआ क्या था? आरंभ कुछ यूँ था :
लिख बैठी है हल्दीघाटी तेरी अमर कहानी को।
रणकौशल की स्फूर्ति शौर्य औ’ साहस भरी जवानी को।

युद्ध क्षेत्र मेंं राणा का आवेश:
उस समर भूमि में प्रवहमान जो सतत रक्त की नाली थी
था आँखों में प्रतिबिंब वही, वह नहीं आँख की लाली थी।।

और अंत में विदा का क्षण:
हरित द्रुम वल्लरियों से भरी अरी मेरी सुरपुरी प्रणाम
अरी कंटक-कुंजों से भरी दरी जीवन सहचरी प्रणाम
अरवली चोटी से उत्तुंग द्रुतगता ओ निस्सरी प्रणाम!
मातृभू की छाती पर पड़ी मालती की शुभ लरी प्रणाम!
वह चौसठपेजी खंडकाव्य कब, कैसे खो गया यह पता न चला। रचनाएँ बहुत सी खोई हैं, पर केवल उसके खोने का दुख आज तक है। जो भी हो, जो काम कोई दूसरा कर सकता है वह मैं भी कर सकता हूँ का विश्वास और एक बड़ा कवि होने का अहसास इसके छह साल बाद तक बना रहा कि आजकल का वह कविता विशेषांक आया जिसमें पहली बार केदारनाथ सिंह की कविताएँ पढ़ीं तो लगा अपनी कल्पित ऊँचाई से एक झटके में नीचे फेंक दिया गया हूँ। असंभव शब्द मेरे कोश में पहली बार आया। फिर तो भवानी भाई, फूल लाया हूँ कमल के क्या करूँ इनका, रघुवीर सहाय, कीर्ति चौधरी कई नाम। लगा मैं कवि के रूप में व्यर्थ हो चुका हूँ। कविता से बाहर का रास्ता सामने था।” पहली बार उसने एक लंबी साँस ली, “फिर भी मेरी मूल प्रकृति कवि की ही है।”*

*इसमें प्रयुक्त कतिपय शब्दों की व्याख्या कल।