Post – 2015-10-31

“मैं तुमसे दो टूक बात करना चाहता हूँ. तुम मोदी को क्या समझते हो?
“कागज़ का पुतला. उससे आगे कुछ नहीं. मैं तो अपने पाठकों तक को नहीं समझ पाता जिनके लिए लिखता हूँ, जिनके निकट पहुँचना चाहता हूँ.”
“तुम्हारी दलीलों से तो लगता है तुम मोदी के पास भी पहुँचना चाहते हो. पहुँच न पाओ यह दूसरी बात है.”
“कैसे?”
“जो मोदी की आलोचना करते हैं तुम उनके पीछे पड़ जाते हो.”
“एक नितांत व्यक्तिगत बात बताऊँ.” मैंने दबी ज़बान से कहा.
“वह कुछ बोला नहीं, मेरी ओर सवालिया निगाहों से देखता रहा.
“१९७४ में मैं एक पत्रिका मतदाता नंबर ०००००१ के नाम से में एक व्यंग्य कालम लिखता था. संपादक के जगजीवन बाबू से घरेलू सम्बन्ध थे, इसलिए पत्रिका उन्हें भी दे आता था. उन दिनों मैंने इंद्रा जी के संसदीय व्यवहार और अहंकार पर कुछ किश्तें लिखी थीं. बाबूजी ने कहा इस लेखक से मैं मिलना चाहता हूँ. उसने मुझे बताया तो मैंने कहा, जो वह मुझे दे सकते हैं वह मुझे चाहिए नहीं और जो वह मुझसे चाह सकते हैं वह मैं दे नहीं सकता. यह तब की बात है जब मेरी कोई लेखकीय हैसियत भी नहीं थी. मैं जो स्वतः लिखता हूँ वही कोई दूसरा किसी प्रलोभन से लिखवाना चाहे तो मैं नहीं लिखूँगा. सताए हुए के लिए लिख भी दूँ सत्ता से जुड़े व्यक्ति के लिए नही लिख सकता. यह है सत्ता के प्रति मेरा नज़रिया.
“मैं एक मामूली से पद पर काम करता था. पर उसे आदर्श मानता था. दो कारणों से. एक यह सोचकर कि साम्यवादी व्यवस्था हो तो जितना मुझे मिलता है उससे कुछ कम ही मेरे हिस्से में आएगा. दूसरे यह सोचकर कि लेखक को कभी आर्थिक दृष्टि से निश्चिन्त नहीं होना चाहिए अन्यथा वह समाज में रहते हुए भी समाज से कट जाता है और समाज से कटे हुए आदमी का लेखन सिर्फ समाज से कटे हुए लोगों के काम का रह जाता है.
“यह मेरी अपनी समझ रही है पर इसका डंका नहीं बजाता. इन दिनों कुछ निश्चिंतता की स्थिति है तो एक लेखक के रूप में झेंप सी महसूस होती है. रूमानी मुझे आहात न किया होता तो इसका ज़िक्र भी न करता ऐसे प्रसंगो को मैं आत्मीय लोगों और अपनी संतानो तक से गोपन ही रखता आया हूँ. क्योंकि अपने आत्मीयों तक के सामने अपने मुँह से अपने आन की बातें व्यक्ति को छोटा बनाती है और अपनी दुर्बलताओं की स्वीकृति से क़द ऊँचा होता है. खुदफरोशों को यह मामूली नियम भी पता नहीं होता. वे जितना अपने लिखे को बेंचते है, उससे अधिक अपने को बेंचते है.”
“खुदफरोश तो उन्हें तुम अपनी तिलमिलाहट में कह रहे हो. ज़िन्दगी आगे बढ़ने का नाम है, ऊपर चढ़ने का नाम है. लिखने का लक्ष्य है अधिक से अधिक लोगों के साथ अपनी अनुभूति, ज्ञान, विचार और विचारदृष्टि को बाँटना. यदि ऐसा कोई करता है तो इसमें बुराई क्या है.”
” बुराई है” मैंने कहा तो, परन्तु उसने मेरी बात पर ध्यान ही नहीं दिया. अपनी रौ में बोलता रहा, “तुम्हें पता है जिसे आज किताबों में प्रस्तावना लिखा जाता है, वह इंट्रोडक्शन का अनुवाद है? और जानते हो इसके लिए उससे पहले, किस शब्द का प्रयोग किया जाता था.” उसने मेरे उत्तर की प्रतीक्षा नहीं की. वह जानता था कि मुझ जैसे तीन अक्षर के बादशाह को यह रहस्य पता नहीं होगा. उसका सोचना गलत भी नहीं था. कुछ ज़ोर देकर बोला, ‘ ऐड्वरटिज़्मेंट. विज्ञापन.’ तुम्हें पता है तुम आत्मविज्ञापन को आत्मविक्रय और खुदफरोशी कह कर अपनी कबीलाई मानसिकता पर पर्दा डालना चाहते हो?
उसने अपनी टिप्पणी का उपसंहार करते हुए जड़ा, “जो अल्प से संतुष्ट होता है वह अधोगति को जाता है. जो बहु की दिशा में अग्रसर होता है, भूमा के महत्व को जानता है वही आधुनिक है.”
“तुम क्यों मान लेते हो कि मैं अपने को सही मानता हूँ. मैं अपने पक्ष को पूरी दृढ़ता से गलत सिद्ध किये जाने के आमन्त्रण के साथ, प्रस्तुत करता हूँ कि अकेले सोचने पर मुझे ऐसा लगता है. तुम मुझे गलत सिद्ध करो तो उसे भी लाभ हो जो अपने विचार और मंतव्य को रखते हुए तुम्हें गलत सिद्ध कर रहा है और तुम्हें सोचने को विवश कर रहा है. मेरा लक्ष्य अपने को सही सिद्ध करना नहीं है, मित्रों के सुन्न पड़े स्नायमण्डलो को उत्तेजित करना है जिनमें जान आने पर आदमी सोचना आरम्भ करता है.. यदि तुमने मुझे गलत सिद्ध कर दिया तो मेरा लक्ष्य पूरा हो गया.”
“अब तो मान लिया न की तुम गलत आरोप लगा रहे थे?”
“नहीं इतनी आसानी से कैसे मान लूँगा. जब अल्प से संतोष को तुम कबीलाई मानसिकता कह रहे थे तो मेरा उससे कोई विरोध नही था. पर जानते हो वह अल्प पैदा करने से बेचने तक का सारा काम उसी को करना पड़ता है क्योंकि वहाँ कार्य विभाजन नही है. कार्य बिभाजित समाज में हम अपना काम करें और विज्ञापन और वितरण का काम उसे सौंप दें जिसे उस का भार सौपा है तो वह अधिक अच्छा हो. जो श्रम आत्मविज्ञापन पर बर्वाद करते हैं वह अपने काम पर लगायें, उत्पादन पर लगायें तो अधिक अच्छा हो.”
“ठीक है. यह बात समझ में आती है, परन्तु यदि कोई आत्मविज्ञापन का काम भी संभाल लेता है तो तुम्हें इस पर आपत्ति क्यों हो.”
“क्योंकि इससे एक गलत प्रवृत्ति पैदा होती है. जुआड़ियों वाली, बाज़ी मार ले जाने वाली. बौद्धिक गरिमा की कीमत पर, शालीनता की कीमत पर. इससे बौद्धिक पर्यावरण दूषित होता है. छिछोरेपन का प्रसार होता है. इससे कुछ तात्कालिक लाभ हो भी जाय तो साख को बट्टा लगता है. दूरगामी परिणाम कुफलदायक होते हैं.”
बात तो सत्ता से शुरू हुई थी. तुम मानते हो बौद्धिक को सत्ता से नहीं जुड़ना चाहिए?
“मैं ऐसा नही मानता. साहित्य, कला और संस्कृति के ऐसे संस्थान हैं जिनसे जुड़ना भी सत्ता से जुड़ना ही होता है और इनका भार बौद्धिक ही संभालें तो अच्छा रहेगा. मैं यह अवश्य मानता हूँ कि इनसे जुड़ने वालों की अपनी सर्जनात्मकता अवरुद्ध होती है और इसलिए यदि कोई अपनी सर्जनात्मक क्षमता पर भरोसा करता है तो उसे इनसे जुड़ने से बचना चाहिए. यह सर्वोत्तम मेधा की जगह नही है. महत्वकांक्षी रचनाकार को सत्ता से बचना और अपनी समस्त ऊर्जा को अपने चुने हुए क्षेत्र को अर्पित करना चाहिए. अपनी पूर्णतम सम्भावना पर पहुँचने का प्रयत्न करना चाहिए. इसलिए संस्थानों से जुड़ने के लिए आतुर रहने वाले साहित्यकारों को या तो दोयम दर्ज़े का मानता हूँ या आत्महंता. परन्तु यदि सर्जनात्मकता चुक गई है, कोई मजे से दिन काटने के लिए सत्ता प्रतिष्ठानों से जुड़ना चाहता है तो किसी को उससे क्या आपत्ति हो सकती है? हाँ सत्ता में ऊंची पहुँच के कारण वह ऊँचा साहित्यकार या विचारक भी है यह मैं नहीं मानता. कुछ लोग इनसे इसलिए जुड़ते हैं कि इनके बिना उनकी लेखकीय हैसियत रह ही नही जायेगी. इन्हे मैं मज़माबाज़ लेखक मानता हूँ यह छिपाऊँगा नहीं.”
मोटी बात यह कि जो सत्ता में होता है उससे तुम्हे चिढ है.
“चिढ नही, चिढ नहीं होती. चिढ़ने का मतलब है तुम स्वयं हीनता से ग्रस्त हो. मैं उनका आदर करता हूँ.”
“फिर परहेज़ किस बात किस बात का?”
“जो सत्ता में होता है उससे मेरी दूरी बढ़ जाती है. पहले से जान पहचान हुई तो भी कम हो जाती है.”
“क्यों झेंप के कारण?”
“मेरा एक छोटा सा तर्क है. वही व्यक्ति जब सत्ता में होता है तो वह वही नही रह जाता, वह सत्ता प्लस वह आदमी हो जाता है. उससे मिलता था तो बराबरी के स्तर पर. अब जो कुछ वह पहले था उससे कुछ बड़ा और इसलिए मुझसे भी बड़ा होगया. उससे मिलना उससे छोटा बनकर ही हो सकता है. यह मेरे स्वाभाव में नहीं है. दैन्य नहीं साम्य. उम्र, ज्ञान, पद, अनुभव में छोटे लोगों से भी बराबरी के स्तर पर ही मिलता हूँ. तुम थोड़ा बहुत जानते भी हो. तुमने बात मोदी से आरम्भ की थी इसलिए इतना जान लो मैं उस प्रधान मंत्री से जिसका नाम मोदी है न तो निकटता रख सकता हूँ न उसे समझ सकता हूँ न समझना चाहता हूँ, न समझने की योग्यता रखता हूँ. यदि कुछ समझना चाहता हूँ तो केवल इतना कि वह अपने पद और दाइत्व का कितनी ईमानदारी से निर्वाह कर रहा है.”
“पर तुम्हारी बातें सुनकर तो मुझे बार बार यह अंदेशा होता है कि तुम उसका समर्थन कर रहे हो.”
“समर्थन के लिए व्यक्ति को समझना ज़रूरी नहीं. इतना ही पर्याप्त है कि उसका काम सही है या गलत.”
चलो यही सही. तो तुम मोदी को सही समझते हो. यही तो तुमसे उगलवाना चाहता था.”
उसने मेरे कंधे पर हाथ मारा और उठ कर खड़ा हो गया.

Post – 2015-10-30

“तुमसे बात करता हूँ घबराहट होती है.” लीजिये. यह बात भी वह हंसकर कह रहा था.
“क्यों?” मैंने भी हँसते हुए ही पूछा.
“तुम बहुत निराशाजनक चित्र खींचते हो.”
“मुझे तुम भूल जाओ. मान लो मैंने जो कुछ कहा वह बकवास है. क्या इससे तुंम्हारी घबराहट दूर हो जायेगी?”
“दूर तो नहीं होगी, क्योंकि हालत अच्छे नहीं हैं. परन्तु क्या हर चीज़ के लिए हम ज़िम्मेदार हैं?”
“हमारा जो बुरा हाल है, वह बुरे समाज के कारण है या बुरे नेतृत्व के कारण?”
“ज़ाहिर है बुरे नेतृत्व के कारण.” वह तपाक से बोला.
इस देश का बौद्धिक नेतृत्व वामपंथियों के हाथ में रहा है या दक्षिण पंथियों के हाथ में?
वह सकपकाया फिर संभल कर बोला, “तुम कहना क्या चाहते हो?”
“मैं कुछ कहना चाहता ही नहीं. मैं तो तुमसे जानना चाह रहा हूँ. बताना तो तुम्हे है.”
“सवालों के माध्यम से भी बहुत कुछ कह दिया जाता है.”
“कहा तो जाता है. इसे भी मैं सवाल के रूप में ही पूछूँगा, क्या ये सवाल पहले तुम्हारे मन में कभी उठे? उठे तो उनका उत्तर क्या मिला? क्या सवाल उठे और उनसे तुम घबरा गए और उन्हें टाल गए? मुझे भी बताओ. नही उठे तो इनसे कतराते क्यों रहे? और अब जब मैं इन्हे उठा रहा हूँ तो इनसे घबरा कर मुझे ही दोष क्यों देना चाह रहे हो? घबराहट और निराशा से बाहर आने का रास्ता तो इनका जवाब तलाशने से ही मिलेगा.”
“तुम मेरी खिंचाई कर रहे हो.”
“खिंचाई ही मान लो. तुम जिस गड्ढे में पड़ गए हो उसमें से तुम्हें खींच कर ही बाहर लाया जा सकता है. मैं उतना पढ़ा-लिखा नहीं हूँ जितने तुम हो. समझने का समय भी तुम पढ़ने-लिखने पर ही लगाते रहे हो. लेकिन सवालों का जवाब न वहाँ से मिलता है, न तुम दे पाते हो, क्योंकि न तो सवाल करते हुए पढ़ा, न सवाल करते हुए सुना और न बाद में सवालों की ओर रुख किया. और अब पूछ रहा हूँ तो कहते हो खिंचाई कर रहा हूँ.”
वह अकुंठ भाव से हंसा.
“अच्छा अब एक दूसरे पहलू पर नज़र डालो. यदि हालात ख़राब हैं तो पहले ख़राब थे और अब अधिक खराब होते जा रहे है या पहले अच्छे थे और अब खराब होने लगे है या पहले जैसे थे उससे अच्छे हो रहे हैं परन्तु उस गति से अच्छे नही हो रहे हैं जिस गति से करने का आश्वासन दिया था?”
वह इधर उधर देखने लगा. उसके चहरे पर तनाव था. एक क्षण के मौन के बाद बोला, “मैं अपनी बात क्यों करूँ. तुम देख नहीं रहे हो इतने सारे लेखक, बुद्धिजीवी, कलाकार, वैज्ञानिक कितने क्षुब्ध हैं?
“क्या तुम मानते हो कि लम्बे अरसे से इन सभी को यह सिखाया जाता रहा है कि हर चीज़ की राजनीति होती है. हर चीअ के पीछे राजनीति होती है, राजनीति से बचने वालों की भी अपनी राजनीति होती है परन्तु वह इतनी गर्हित होती है कि वे उसका नाम तक नही ले सकते, इसलिए राजनीतिकरण का विरोध करते हैं, इसलिए सभी को अपना काम छोड़कर राजनीति करनी चाहिए. पार्टीजन होना चाहिए. प्रतिबद्ध होना चाहिए. और ये सभी अपने विषय के अधिकारी कम और राजनितिक दलों के बँधुआ अधिक रहे हैं.”
वह चुप रहा.
मैंने अपनी बात जारी रखी, “कुछ दिन पहले उन सभी राजनीतिक दलों ने एक साथ मिलकर जिस को पराजित करने की कोशिश की उनका सफाया होगया. कारण तुम्हे तलाशना है पर उनके नेता चीख कर कोसते हैं, अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए कोसते हैं, पर उनकी आवाज़ कहीं पहुंचती ही नही. उनसे लगे बंधे बुद्धिजीवी भी उनके पिस जाने के दिन से ही बौखलाए हुए अट पट बकते और एक दूसरे को दाद देते रहे हैं. इसका कोई असर ही नही होता था फिर एक को सूझा क्यों न इनाम पर खेल कर दिखा दे और उसने एक गलत आरोप लगाकर वह इनाम लौटा दिया जो उसने खासा जतन कर के जुटाया था.”
“तुम इतनी दुर्भाग्यपूर्ण घटना को ग़लत आरोप कह रहे हो?”
“करुणा उपजाने की कला ब्लैकमेल करने वाले ही जानते है. प्रसंग जितना ही दारुण होगा, भावुकता जगाने में उतना ही प्रभावकारी होगा.”
वह भड़क उठा. “तुम इसे ब्लैकमेल कह रहे हो? ये इतने सारे लोग ब्लैकमेलर हैं?”
“ब्लैकमेलर नही रुग्ण. भ्रष्टाचार के सहभागी.”
“बताओगे इसमें भ्रष्टाचार कहाँ है?”
“देखो चाणक्य ने कर के मामले में भ्रष्टाचार के चालीस तरीके गिनाये हैं. उनमे से एक है
पूर्वसिद्धम् पश्चादवतारितम् , इसका भावानुवाद हुआ ‘पहले की घटना को बाद में दिखाना. प्रसंग दाभोलकर.
दूसरा है, अल्प सिद्धम बहुकृतम्, “अर्थात तिल का ताड बना देना. प्रसंग वाल्मीकीय रामायण पर आधारित लेखमाला का विरोध.
तीसरा बहुसिद्धम् अल्पक्रितम् ताड़ का तिल बना देना. अर्थात सीता की रसोई में रामलला के प्रवेश कराने के लिए ताला खोलने से लेकर, अकाली दल को रस्ते से हटाने के लिए भिंडरवाले के उदय और संतीकरण, तलवार लिए संसद में प्रवेश,, उग्रवाद के सुनियोजित विस्तार, हिन्दुओं के निर्मम संहार, कश्मीरी हिन्दुओं के निर्वासन,, हरमिंदर साहिब में रक्तपात, १९८४ के नरसंहार, हिन्दू वोट बैंक के लिए मेरठ मलियाना, कासिमपुरा, से लेकर भागलपुर, रांची तक पूर्वनियोजित और सरकारी पहल से रक्तपात, भोपाल गैस के अपराधियों की सुरक्षा और उसपर नीरो को मात देनेवाला बाँसुरीवदन. तब इस पर चुप इसलिए नही न थे की तब सोये हुए थे, इसलिए जब जागो तभी सवेरा, सोए लोग बांसुरी नहीं बजाते. बाँसुरी इस लिए बजा रहे थे कि किसी का ध्यान इन अपराधों की और न जाय. वे खिदमतगार अपराधियों की कोटि में थे. अब मर्मान्तक चीत्कार इसलिए कि उनकी अधोगति के साथ इनके सुनहले दिन चले गए. कहते हैं, ‘अपने अच्छे दिनों की जगह हमें बुरे दिन ही लौटा दो क्योंकि वे देश के लिए बुरे दिन रहे हों हमारी तो चांदी थी.’.
चौथा ‘अन्यत सिद्धम अन्यत कृतं, अर्थात इधर का उधर दिखा देना, एक अपराध हुआ कांग्रेस के काल में, दूसरा घटा कांग्रेस के राज में, समाजवादी दल के राज में, उनका कूड़ा भी टीमहारे सर छींटे आ रहे हैं दिल्ली पर. दिल्ली पर भी नही प्रधान मंत्री पर. उस बेचारे के पास इतनी समझ नही कि वह आपकी मनोकामना पूरी करते हुए उन राज्यों में इमरजेंसी लगा दे. आप सोचते है तो यही सुझा देते कि जिन राज्यों में ऐसा हो रहा है उनको बर्खास्त करो हम तुम्हारे साथ है.
“तुमने उस पैटर्न पर गौर किया जिस पर यह बीमारी फ़ैल रही है?”
“तुम इसे बीमारी कहते हो? प्रतिरोध को बीमारी मानते हो?
“प्रतिरोध होता तो उसमे आतुरता नही होती, न इस तरह धीरे धीरे फैलता. यह बौद्धिक स्वाइन फ्लू है. इससे बचो. परहेज़ करो तो बच गए नही तो गए.”
वह चुप रहा पर संतुष्ट नही दीख रहा था.
खिन्नता में चुप मैं भी था. फिर दुखी स्वर में कहा, “बौद्धिकों का चिंतक से गुर्राने वाले गिरोह में बदलते जाना कितना दुर्भायपूर्ण है. तुम चुप रह कर भी सुरक्षित नहीं हो. लेखकों का, अध्यापकों का, कलाकारों का सम्मान समाज में पहले ही घट चुका है. विश्वास भी घाट रहा है. मैं भी हूँ तो एक लेखक ही. यदि समाज का विश्वास घटेगा तो मैं बचा रहूँगा क्या. किसी देश या समाज के एक या कुछ लोगों के आचरण से देखने वालों पर जो प्रभाव पड़ता है उससे दूसरे भी बच तो नहीं पाते. ये स्थितियों का विश्लेषण करते, जो ही एक बौद्धिक का काम है तो समझ बढ़ती. ये तो सिर्फ गुर्रा रहे हैं.”
तो तुम चाहते हो जो हो रहा है होने दें. चुप बैठ जाएँ.
“नही मैं कहता हूँ अन्याय और झूठ के खिलाफ लड़ो. पर अपने हथियार से. विश्लेषण से. विश्लेषण का मतलब तो जानते हो न. चीर फाड़. चीज़ों को सही सन्दर्भ, सही अनुपात, कार्य, कारण और परिणाम को दिखाते हुए रखना. बौद्धिक का मोर्चा यही है. यदि वह इसे भूल कर घालमेल करने लगे तो वह स्वयं अत्याचारियों में शामिल हो जाएगा.”
“यदि दूसरे ऐसा नहीं कर रहे हैं तो तुम क्यों नहीं करते.”
“वही तो कर रहा हूँ.”

Post – 2015-10-29

रितु आए फल होय

“आजकल तुम कम्युनिस्ट पार्टी के पीछे हाथ धोकर पड़े हो. सांडों के बारे में सुना था वे लाल कपड़ा देखकर भड़कते हैं, पर तुम तो लाल सलाम सुन कर भी भड़क जाते हो.
“मैं भडकता नही, अपनी व्यथा उजागर करता हू.”
“बात वही हुई. अपने पर काबू नही रख पाते. मेरी सलाह मानोगे?
मैं कुछ बोले बिना ही उसकी और देखने लगा.
“मेरे साथ शाहदरा तक चलोगे?”
“तुम्हारे साथ तो नरक में भी जाने को तैयार हूँ, कब चलना है.”
“जब भी तुम्हे फुर्सत हो. वहाँ मेरे एक अच्छे दोस्त रहते हैं. वह तुम्हारी मदद कर सकते हैं?”
“मुझे किसकी मदद की ज़रूरत? मैं अकेला ही एक अक्षौहिणी के लिए काफी हूँ.”
“तुम नही समझोगे. मानोगे भी नहीं. अकेले तो पड़ ही जाते हैं ऐसे में लोग. हालत थोड़ी और बिगड़ती है तो जिस तिस पर पत्थर भी मारने लगते हैं.”
अब मैं समझा, “तो तुम कल का बदला ले रहे थे? थोड़ी गलती मुझसे हुई भी थी. मुझे सही विशेषण का प्रयोग नही करना चाहिए था. सही नाम ले भी नही सकता था. लेकिन देखो तो भेड़ें भी गडरिये के मोड़ने पर मुड़ने में कुछ समय लेती हैं. पर तुम्हारी पार्टी में तो एक बोल पर ही सब के सब मुड़ जाते हैं. भेड़ों का झुण्ड कहता तो तुम और आहत हुए होते और पागलखाने की जगह कत्लगाह में खींच ले जाते. है न?
” मानता हूं कुछ कमियां होती हैं कम्यनिस्ट पार्टियों में भी, मगर कमियां ही देखोगे या अच्छाइयों पर भी ध्यान दोगे?”
“अच्छाई तो हो ही नहीं सकती. लेढ़ा. जानते हो इसका मतलब. नहीं जानते हो. कटहल के फल का जो बतिया होता है वह टूट कर गिर जाता है उसे लेढ़ा कहते हैं. उसी तरह जैसे आम की अमौरी टूट कर गिर जाती है…
उसने टोका, “हमारे यहाँ उसे अमिया कहते हैं.”
“अमिया को हमारे यहां टिकोरा कहते है. उसका तो फिर भी कुछ उपयोग है, मैं उस अवस्था से पहले की बात कर रहा हूँ, अमौरी की. मैंने आज तक न तो किसी को इनमे कोई गुण तलाशते देखा न इनका उपयोग करते देखा. जानवर भी इन्हे सूंघ कर छोड देते है. वैसा ही है तुम्हारा यह कम्युनिस्ट आंदोलन. इसमें न तो कोई अच्छाई पैदा हो सकती थी, न ही पैदा हो सकती है. सड़ने से थोड़ी बदबू भले फैल जाय और उसे खुशबू का जनवादीकरण कह कर भले अच्छे अच्छों को लम्बे समय तक भरमा लिया जाय. पर हुई तो वह भी बर्वादी ही. असमय भ्रूणपात से किस बात की उम्मीद करते हो. यह एक दुर्घटना है. दुर्भाग्यपूर्ण है. इसने असंख्य अनमोल रत्नों को भ्रमित कर दिया पर जो कुछ हुआ वह या तो विनाशकारी रहा या व्यवधानकारी. कल्याणकारी तो कुछ दीखता ही नहीं.”
वह चुप सुनता रहा.
“देखो. तुम लोगों ने बिदेसी पढ़ाई कुछ ज़्यादा की है जो हमारे खास काम की नही है. देसी ज्ञान भी बटोरा होता तो उस इबारत पर भी ध्यान गया होता जो अनपढ़ों की भी ज़बान पर रहता है.
“धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय. माली सींचे सौ घड़ा रितु आए फल होय.”
तुम जनबल से, पूरी ताक़त झोंक कर जो चाहते हो कर जाने का सपना देखते हो. भविष्य को भुजबल से खींच कर आगे लाना चाहते हो. इतने सारे लोग सक्रिय होंगे तो कुछ न कुछ तो होगा ही पर वह इच्छित फल देगा यह सम्भव ही नही. जब बहुत अधिक ऊर्जा का उन्मोचन होगा, इतनी कि जिसको नियंत्रित करने का तंत्र हमारे हाथ में न हो, तो वह अनिवार्यतः विनाशकारी होगा, चाहे वह उन्मोचन प्राकृतिक हो या मानवकृत. वह भूचाल हो, महा प्लावन हो, सुनामी हो, अंधड़ हो, एटम बम हो या पलीता. उससे होगा उत्पात या उपद्रव ही.”
“कहते जाओ. रुक क्यों गए? मैं सुन रहा हूँ.” उसने अनुत्तप्त स्वर में कहा.
“रुक गया इन शब्दों के मूल आशय पर ध्यान चला गया था इसलिए. उत्पात, छलांग लगा कर ऊपर आ जाना. उपद्रव फूटकर ऊपर उछल जाना. तो मैं सोचने लगा जिसे क्रांति कहा जाता रहा है वह है तो उत्पात या उपद्रव ही. तुम्हारा क्या ख़याल है?”
मैंने प्रश्न तो किया था पर उत्तर पाने के लिए नही, उसकीं खीझ का मज़ा लेने के लिए, इसलिए बिना रुके आगे बढ़ गया, “और देखो, अनियंत्रित भावावेश का भी उन्मोचन होता है तो उससे भी उपद्रव ही होता है भले उसे मानववादी तेवर अपना कर उचित ठहराने का नाटक किया जय. खैर, तुम खुद देखो, हड़ताल, प्रदर्शन गांधी ने भी किये थे परन्तु उसमे उतना ही धैर्य और अनुशाशन भी था. गांधी की हड़ताल को तुमने कहाँ पहुँचा दिया. पहली बार कलकत्ते में इस हड़ताल का रूप देखा तो मेरे होश उड़ गए. लोग उन्हीं बसों को आग लगा रहे हैं जिनमें उन्हें चलना है. उन्ही ट्रामों के शीसे तोड़ रहे हैं जिनसे उन्हें चलना है. जाड़े के दिन थे और कलकत्ते में भी जाड़ा तो पड़ता ही है. बिलवा मंगल की कहानी याद आई जो उसी डाल को काट रहा था जिस पर वह बैठा था. तुमलोगों को वह कहानी याद नही आती होगी, इसलिए तुम बिल्वमंगल ही बने रहे, कालिदास बन ही नही सके. कितने कल कारखाने नष्ट किये, कितनों को बेकार किया, कभी हिसाब लगाया? भारत को अपनी ज़रूरत के सामान खुद बनाने लायक नही रखा, बाजार उपनिवेशवादियों ने अपने लिए बनाया था. तुमने बाजार से आगे बढ़ने ही नही दिया. घड़ी से लेकर कर टक्सी-तमंचा तक बाहर से आरहा है. आयात हो रहा है. हमारे पैसे से दूसरों का घर भर रहा है, दूसरों को रोज़गार मिल रहा है और तुम मर्दुमशुमारी करते हो इतने किसानों ने आत्महत्या कर ली. यह तुम्हारी समझ की दें है. अंग्रेज़ी राज में भी नहीं सूना था किसानों को आत्महया करते. तुम्हारे बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहेहोंगे पर जहां हमारे बच्च जाते हैं वहां पढ़ाई नहीं होती. तुमने उन्हें यूनियनबाज़ी सीखा दी….” मैं सचमुच उत्तेजित हो रहा था. अपने को नियंत्रित करने के लिए चुप हो गया.
कुछ संभला तो स्वर को धीमा करते हुए कहा, “अंग्रेज़ों ने हमारे उद्योग धंधों को नष्ट करके इसे बाजार बनाया था. तुमने अपनी सनक में उद्योग धंधों को नष्ट करके उससे भी बदतर बाजार बना दिया. हमारी गुलामी आर्थिक थी – ‘पर धन बिदेस चलि जात यहै अति ख्वारी.’ तुम्हारी कृपा से आर्थिक गुलामी बढ़ी है. पहले गरीबी थी पर क़र्ज़ का बोझ नही था. अब क़र्ज़ का बोझ भी है और जानते हो मॉनेटरी फण्ड का जो पैसा क़र्ज़ के रूप मंस लिया जाता है वह उन देशों का है जिनका पूंजीवादी विकास हुआ. तुम हम जिन उपकरणों और सुविधाओं का भोग कर रहे हैं वह उनके यहाँ से आयात हो रहा है.”
बहुत देर बाद उसने ज़बान खोली, “यह बताओ, हिस्ट्री-विस्ट्री पर काम करते हो यह तो सुना था, लेकिन तुम अर्थशास्त्री कब से हो गये.
हिस्ट्री विस्ट्री पर काम नही करता रहा हूँ इतिहास पर काम करता हूँ जिसे तुम तब तक नही पढ़ पाते जब तक वह हिस्ट्री न बने, अंग्रेज़ी में न आजाय. इसलिए तुमने पढ़ा नही है, सुना है. पूरा सुना भी नहीं होगा नहीं तो कथाएं और अंतर्कथाएँ सुननी पडती. रही अर्थशास्त्री बनाने की बात तो यह जानने के लिए अर्थशास्त्री होने की ज़रूरत नही पडती कि लाखों किसानों ने आत्महत्या की और तुम्हारे पास उसकी कोई समझ थी न सही व्याख्या. तुम्हारी कृपा से हमने ज्ञान का भी ऐसा सत्यानाश किया है कि अब कोई विदेशी इस पर शोध करेगा तो हमें पता चलेगा किसान आत्महत्या करने के शौकीन कैसे हो गए. तुम्हारे अध्यापक तो अपने विषय को छोड़कर राजनीति करते रहे.
तुम्हारी पार्टियों को जहां भी मौक़ा मिला है यही किया है.
“एक बात और सुन लो. जानता हूँ सुन कर भी मानोगे नही. अभी कुछ दिन पहले एक दुधमुंहे मित्र ने पूछ दिया ‘इतनी बड़ी-बड़ी बातें करते हो, तुम्हारे साथ कितने लोग हैं. हैसियत क्या है तुम्हारी?’ तो लगा बात तो ठीक ही है. किसी बात के प्रभावशाली होने के लिए वक्ता का प्रभावशाली होना एक ज़रूरी शर्त तो है ही, इसलिए उसके माध्यम से इसे कहना चाहूँगा जिसे तुमने तो ज़रूर पढ़ा होगा. पढ़ा होगा पर समझा नही होगा.”
वह हंसने लगा.
“तुम लोग पढ़ते इतना अधिक हो कि समझने की फुर्सत ही नही होती यह सोच कर तो कहा ही, इसलिए भी कहा कि इससे न रूसियों ने सबक सीखा न तुमने. जिसकी बात कर रहा हूँ उसका नाम है टॉलस्टॉय.
युद्ध और शांति पढ़ा है न. पढ़ा है तो उसके अंतिम पन्नों में, वह उपन्यास का हिस्सा भी नही है. उसका उत्तरकाण्ड है. एपिलोग. टॉलस्टॉय का वह दार्शनिक विवेचन याद करो जिसमें वह नैपोलियन को महाकाल के हाथ का एक क्षुद्र खिलौना सिद्ध करते है.
मैंने कहा पास ही तो चलना है . चलो दिखाता हूं. मैंने ‘वॉर एंड पीस’ का एपिलोग उसके सामने रख दिया और उसमें से एक ख़ास पन्ने के कुछ वाक्यों को जिन्हे अंडरलाइन कर रखा था ध्यान से देखने को कहा और पूछा क्या तुम्हे पता था की लेनिन टॉलस्टॉय की कृतियों से क्यों डरते थे. कई लोग कई कारण गिनाएंगे, पर मुझे लगता है युद्ध और शांति के उत्तरकाण्ड के कारण.” एक वाक्य अंग्रेज़ी तर्जुमे में इस तरह है:
Power is the collective will of the masses, vested by expressed or tacit consent in their chosen leader.
और मैं कहना चाहूँगा कि तानाशाह सबसे कमज़ोर और डरा हुआ प्राणी होता है. उसे अपने अंगरक्षकों तक से डर लगता है, आईने से भी डर लगता है.
और दूसरा वाक्य:
Through his reason man observes himself, but only through consciousness does he know himself.
“आत्मनिरीक्षण करो. अपने को जानो. अपनी पार्टी को भी. अभी तो तुम्हे यह भी पता नहीं कि तुम खड़े कहाँ हो.. चाय चलेगी.”

Post – 2015-10-28

तरस खाते हुए

“तुमने मुझे कल बहुत विचलित कर दिया.” यह कहते हुए भी वह परेशान लग रहा था.
“मैं जानता हूँ. जो कुछ मैंने कहा उसे सोचते हुए मैं भी परेशान हो जाता हूँ. परन्तु आत्मनिरीक्षण तो करना ही होगा.”
“”आत्म आत्मनिरीक्षण या आत्मालोचन ?”
“नही, आत्मालोचन नहीं, वह अपमानजनक काम है. इसका कायानुवाद है, ‘कमीने अपने दिमाग से काम लेता है? सबके सामने कान पकड़ और कबूल कर कि तुझसे गलती हुई है.’ पार्टी का आकर्षण इसके घोषित लक्ष्यों के कारण इतना प्रबल था कि लोग सोचते चलो बाहर निकाले जाने से अच्छा है कान पकड़ लो.
“कान अपना है, पकड़ेंगे भी तो उमेठ कर तो नही. जिसका शब्दानुवाद होगा, ‘थोड़ी गलती हुई लगती है.’
‘थोड़ी! फिर और गहराई से आत्मालोचन करो’, जिसका कायानुवाद करें तो होगा, ‘कान भी पकड़ा तो इतने धीरे से. अब सिर्फ कान पकड़ने से काम नहीं चलेगा. अब कान पकड़ कर नाक भी रगड़नी पड़ेगी.’
समग्र मानवता को मानवीय गरिमा प्रदान करने के सत्कार्य में सहयोगी बने रहने के लिए स्वाभिमानी और ज्ञानी सदस्यों को भी यह शर्त स्वीकार्य हो जाती थी. जॉर्ज लुकाच जैसे व्यक्ति, राहुल सांकृत्यायन जैसे व्यक्ति, रणदिवे जैसे व्यक्ति, पूरन चन्द्र जोशी जैसे व्यक्ति. मैं सबको तो जानता भी नही. पी.सी. जोशी की तो जान बची पर सम्मान नही. सुना उन्हें मछुआ बाजार के पेशे से एक कुजड़ा कामरेड को सौंप दिया गया था जो उन्हें गालियां देकर जनभाषा सिखाया करता था. ये वही जोशी है जिनके चुम्बकीय आकर्षण से कवियों, कलाकारों, नाटककारों और फिल्मी हस्तियों का इप्टा से जुड़ाव हुआ था जिसके गुन गाते हुए अनेक कलाप्रेमी छोह में आत्म मुग्ध हो जाते हैं. कला और साहित्य के लिए पार्टी में कितनी इज़्ज़त थी इसका एक पैमाना यह तो हो ही सकता है.”
“तुम पार्टी से कब जुड़े थे?”
“पार्टी से कभी जुड़ा भी नहीं न कभी जुड़ने की इच्छा हुई. डर लगता था.”
“डर किस बात का?”
“भेजा निकाल लिये जाने का.”
“कभी तो तुक की बात तो किया करो.”
“तुमने दंड स्वरूप हाथ काटने, आँख निकालने, ज़बान काटने के वहशी तरीकों की बात तो सुनी होगी परन्तु सम्मान स्वरूप भेजा निकाल लिये जाने और उसकी जगह ठीक उसी आकार का प्रतिनादी यन्त्र फिट किए जाने के बारे में शायद ही सुना हो. यह इतने कुशल तरीके से किया जाता है कि आदमी को पता ही नहीं चलता. तुम्हे भी पता नहीं चला होगा. लेकिन र्काड होल्डर बनाने के साथ ही यह क्रिया संपन्न कर दी जाती है। सुनने में तुम्हे विचित्र लगेगा, विश्वास भी न होगा, लेकिन जब मैने इसका नमूना देखा तो सन्न रह गया.”
वह खीझभरी मुस्कराहट बिखेरता रहा.
“इसका पहली बार दर्शन स्टालिन के मरने और ख्रुश्चेव के सत्ता संभालने के साथ हुआ था. अभी कल तक स्टालिन मानव देवता की तरह पूजा जाता था, उसका एक एक शब्द अकाट्य प्रमाण, कहीं कोई मतभेद नही और एक दिन में ही वह पूरी तरह खारिज. मैं कम्युनिस्ट नहीं था पर दोस्त तो वे ही थे. इतने सारे समझदार, सुपठित, वाक्कुशल लोग एक झटके में एक सिरे से दूसरे सिरे तक बदल गए और उतने ही कौशल से अपने तर्क गढ़ने लगे जिससे कल तक स्टालिन के विचारों को लेकर गढ़ लेते थे. दूसरा मौक़ा आपात काल के समय कामरेड डांगे के हटते और राजेश्वर राव के सत्ता संभालने के साथ देखा. मैं दहशत में मगर कामरेड लोग कल तक जितने वाचाल थे उतने ही वाचाल आज भी लेकिन पलटी मार कर. समझ में नहीं आता था, माज़रा क्या है फिर यह अदृश्य शल्य चिकित्सा की बात सूझी. पार्टी से सहमता तो पहले से था. इसके बाद डर लगाने लगा. और जानते हो लोग किस बात से डर कर आत्मालोचन के लिए तैयार हो जाते हैं?”
“जब इतना बता दिया तो वह भी बता दो.”
“लोग सोचते हैं यदि लाइन से तनिक भी इधर उधर हुए तो कहा जाएगा, कार्ड वापस करो और अपना भेजा ले जाओ.’ लोग जानते हैं अब इतने अरसे तक फ्रीज़ रहने के बाद वह किसी काम का रह नहीं गया होगा, इसलिए प्रतिनादी यन्त्र से सोचने का भरम पैदा करते और बोलने का काम लेते हैं. इसीलिए कहता हूँ एक मार्क्सवादी के लिए आत्मनिरीक्षण ही पर्याप्त है. आत्मालोचन की नौबत नहीं आनी चाहिए.”
तुम्हारे मन में कम्युनिस्टों के प्रति इतनी घृणा है, यह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था.
“घृणा उनका औज़ार है जिनके पास जवाब नहीं होता. जो सोचते है वे घृणा नही करते. वे पता लगाते हैं कि ऐसा क्यों हुआ, मैं कम्युनिस्टों से घृणा नहीं कर सकता. कम्युनिस्ट पार्टी के मानव गरिमा और समानता के सम्मोहक नारे से आकर्षित होकर इतनी महान, निष्काम, विभूतियाँ इससे जुड़ती रही हैं कि उनके त्याग को देखते उनके चरण चूमने का मन हो और उनकी व्यर्थता की कल्पना करके उनसे बच कर रहने का संकल्प पैदा हो. मैं तो प्रेरणा के लिए भी उधर ही देखता रहा हूँ और विडम्बना के लिए भी उधर ही देखता हूँ.
“तुम्हारे मन में कम्युनिस्ट पार्टी से एलर्जी कब पैदा हुई, यह बताओगे.”
“कम्युनिस्ट पार्टी से नही, हिंसा से एलर्जी है मुझे. शैशव से ही हिंसा, उत्पीड़न और त्रास झेलता रहा. अपमान इतना झेलना पड़ा कि अपमानित होने का डर भी समाप्त हो गया. उस पीड़ा ने ही मुझे दृष्टि दी और उसी ने मुझे तपाया. उसी ने मुझे दूसरों से अलग बनाया क्योंकि एक ही कारण होने पर भी पीड़ा का रूप एक जैसा नही होता. उसी ने मुझमे वह जिज्ञासा पैदा की, कि ऐसा क्यों होरहा है. मेरी चूक क्या है. मैं अकेले कोने में छिप कर घंटों रोता रहता था कि कोई मुझे रोता देख कर मुझ पर तरस न खा बैठे. दूसरा कोई पूछता तुम्हारी मैभा तुम से कैसा व्यवहार करती है तो उसकी तारीफ़ इस तरह करता कि जानने वाले उपमा देते मैभा हो तो ऎसी. मैं दुःख सह सकता हूँ दैन्य नही. स्वाभिमान इतना और अपमान का भय नहीं. अपमान करने वालों को भी क्षमा कर देता हूँ, बदले में अपमानित करने का विचार तक नही आता.”
मेरी कहानी सुनते हुए वह भी भावुक हो गया था फिर भी उसने याद दिलाया, “मैं पार्टी के बारे में जानना चाहता था.”
“मैं हिंसा को अन्याय का प्रमाण मानता हूँ. मैं किसी भी बहाने की जाने वाली हिंसा को त्याज्य मानता हूँ. हिंसा करने वालों को भी. पर घृणा उनसे भी नही करता.”
“हिंसा को रोकने के लिए हिंसा को सही नही मानते.”
हिंसा से हिंसा को रोका नहीं जा सकता. उसका विस्तार किया जा सकता है. हिंसा के प्रति वितृष्णा को कम किया जा सकता है. हिंसा की आदत डाली जा सकती है. और वही किया गया है.
“तुम कहते हो हिंसा को सहन करते हुए अपने को अपमानित किया जाना चाहिए.”
“मैं जो कहा रहा हूँ उसे समझने की योग्यता का तुममे अभाव है क्योंकि तुम स्वयं हिंसा की आदत डाल चुके हो. मैं पहले कह चुलका हूँ की हथियार से अधिक ताक़तवर है विचार. विचार की पुरानी सीमाओं को संचार की उन्नत प्रणाली ने तोड़ दिया हैं. आज के युग में भी विचार की शक्ति का उपयोग न किया जाय, विचार को नष्ट करके अन्याय को जारी रखने वालों के हाथ संचार और सूचना के साधनों को छोड़ दिया जाय तो इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण क्या होगा.”
“तुम यह नहीं मानोगे कि हथियार के बल पर ही अपने ही देश के सत्तर प्रतिशत लोगों को दबा कर, यहां तक कि अस्पृश्य बनाकर रखा गया.”
“हथियार के बल पर नही, उसके लिए एक विचारतंत्र विकसित किया गया, उसका एक प्रसारतंत्र विकसित किया गया. उस विचारतंत्र और प्रचारतंत्र को नियंत्रित करने वालों ने लोगों को अपने पाँवों पर नाक रगड़ने के लिए बाध्य ही नही कर दिया उस पर गर्व करना तक सिखा दिया. उनको भी जिनके हाथ में हथियार था. उसके पास छड़ी तक न थी. पर वाचाल और उद्दंड मूर्खो की संगठित सेनाओं का नाम है कम्यूनिस्ट पार्टियां. उनको समझाने की योग्यता तो मुझमें भी नहीं है. वे बोलते भी हैं तो हल्ला बोलते है. बोलना तक नहीं आता.”
अब आगे वह न कुछ सुन सकता था, न मैं कहने की स्थिति में था. दोनों साथ उठा खड़े हुए.

Post – 2015-10-27

Dynamics of history
“तुम क्या सचमुच मानते हो कि पूँजीवाद के बाद साम्यवाद का दौर आएगा?”
“आना तो चाहिए.”
“यह चाहिए कहाँ से घुस आया. कल तो तुम बहुत आश्वस्त लग रहे थे.”
“बात यह है की पूंजीवाद के उठान के बीच ही साम्यवाद के प्रयोग ने वह विकृति पैदा पर दी जो कच्चे फोड़े को चीरा देने से पैदा होती है. इसने विषाक्तता को बढ़ा दिया. हमारे प्रतिरोध-तंत्र को उन विषाणुओं से लड़ने का अवसर देना चाहिए था. इस बीच भी अदृश्य खून-खराबा होता. असंख्य श्वेत कोशिकाएं शहीद होतीं. उनकी बलि मवाद बन कर फोड़े को विस्फोटक बना देती उन्हें युद्धभूमि से बाहर निकाल लेते. नए योद्धाओं को मोर्चा संभालने को खुला मैदान मिल जाता तो हमें कुछ खास करना ही नहीं पड़ता. विजय हासिल हो जाती. सूखते समय थोड़ा मरहम ही काफी होता. असमय हस्तक्षेप अतिरिक्त आयास की मांग करता है और यही इस बात की पूर्वसूचना भी है कि परिणाम भी सुखद न होंगे.
“तुम अगर सोशियोलॉजी को पैथोलॉजी में घोल कर समझाना चाहोगे तो मैं तो समझने से रहा,”
“देखो, उपमाएँ और दृष्टान्त विचार को मूर्त कर देते हैं; ये वास्तविकता को समझने में मदद तो करते है परन्तु वास्तविकता के स्थानापन्न नही होते हैं. वे वास्तविकता के किसी एक लक्षण या पक्ष पर प्रकाश डालते हैं, उनका भी स्थान नहीं ले सकते. विचार और विचार-प्रक्रिया में इतने वक्र हैं कि किसी एक से छूटे तो किसी और में बंध गए. यदि तुम पूँजीवाद को व्याधि मानते हो तो इसके चरित्र को समझ नहीं पाओगे.”
“खुद उलटी बातें करते हो और पकड़ में आने पर पैंतरा बदलने लगते हो. पूंजीवाद व्याधि नही है तो क्या है? सारे समाज की दौलत चन्द लुटेरों के हाथ में सिमट आना, क्या तुम इसे समाज के हित में मानते हो?”
“देखो मैं खुद उलझन में हूँ. समझ में नही आ रहा की अपनी बात कैसे रखूँ. मैं पहले उस तथ्य को रखूँ जिस पर कोई मतभेद नहीं. अर्थात पूंजीवाद सामंती व्यवस्था का अगला चरण है और इसलिए एक प्रगतिशील चरण है.”
“ठीक है.”
“अगर प्रगतिशील चरण है तो उतनी प्रगति तो हो लेने दो जितनी उसके बूते की है. उससे पहले ही उसपर हमला करोगे तो उस प्रगति में भी बाधा डालोगे. तुम्हारी अधिकतम शक्ति बाधा पहुँचाने पर व्यय होगी। एक ही छलांग में दो छलांगों की दूरी पार करना चाहोगे तो या तो अपनी टाँग तोड़ लोगे या मुँह के बल गिरोगे। सही चरण पर उसी ऊर्जा को लगाने पर जो कुछ तुम्हें हासिल हो सकता था उससे बहुत कम हासिल होगा और जिस रूप में हासिल होगा वह अकालकावलित हो जाएगा।
“एक बात और, यदि तुम मानते हो पूँजीवाद की प्रगतिशील भूमिका है और उसमे तुम व्यवधान डालते हो तो तुम प्रगतिवादी हुए या प्रतिक्रियावादी?
“यदि तुम मानते हो कि उसका चरण है तो उसे चलने देते. तुम्हारे पास तो न चरण थे न यह तुम्हारा चरण था.”
“इतना बड़ा काडर है हमारा, इतने सारे साहित्यकार पत्रकार और फिर भी कहते हो हमारे पास चरण नहीं.”
“चरण तब होते जब जनमानस में तुम्हारी पैठ होती. तुम्हारी पूरी पैठ तो उन मज़दूरों तक में नहीं हो पाई. तुम्हारा चरण तब होता जब तुम्हारे भीतर सर्जनात्मकता होती. तुमने केवल विघटनकारी की भूमिका निभाई है.”
“तुम लोगों से तुम्हारा मतलब किससे है? मार्क्सिस्टों से?”
“नहीं, कम्युनिस्टों से. मार्क्सिस्ट तो जैसा कहा अकेला मैं हूँ. तुम तो दूसरे की बारात में अपना दूल्हा लेकर पहुँच गए थे कि दुल्हन हमें चाहिए. तुम लोगों में तो वक़्त की नाज़ुकी तक की पहचान नही. वक़्त की नाज़ुकी का मतलब इतिहासबोध, कालबोध. मतलब वह चीज़ जिसके कारण मार्क्सवाद में द्वंद्वात्मक के पहले ऐतिहासिक विशेषण लगा है. यार तुम लोग उतावली में अपना नाम तक भूल गए.”
“क्रांति ऐसे ही कर के दिखा दी.”
“क्रांति तुमने नही की थी, तुमने क्रांति पर डाका डाला था. धोखाधड़ी से हथिया लिया था इसे. रूसी क्रांति का इतिहास फिर से पढ़ो. एक बात सुन लो। कालबोध कम्युनिष्टों का बहुत गड़बड़ है। जिसे तुम फरवरी क्रान्ति कहते हो वह मार्च में हुई थी और जिसे अक्तूबर क्रान्ति कहते हो वह नवम्बर में। तुम लोग इतने पिछड़े दिमाग के हो कि उन्नीसवीं सदी में भी पुराने जूलियन कैलेंडर से कालगणना कर रहे थे फिर समय के साथ कैसे चल सकते हो।“
“देखो, यह पता तुम्हे भी है कि पूंजीवाद जितना विकराल रूप धारण करता जा रहा था, उसमे उसे तबाही का अधिक समय देना भी समझदारी नही थी.”
“विकराल रूप धारण करता जा रहा था, अर्थात उसमें बहुत ऊर्जा बची हुई थी.
“खैर मैं केवल यह कह रहा था कि यदि पूंजीवाद अपने प्रचंड रूप में आचुका था तो पूंजीवादी प्रतिस्पर्धा में एक दूसरे को लड़ कट कर कमज़ोर होने या मिटने देना चाहिए था.”
“इतिहास के घटित हो जाने के बाद एक बच्चा भी ज्ञानी बन कर बड़े बड़ों की गलतियां निकाल सकता है तुम तो फिर भी कुछ पढ़े लिखे हो. साम्यवाद की वापसी के नाम पर तुम उसे कोसने का बहाना तलाश कर रहे थे.”
“नहीं यह याद दिला रहा था कि तुम पर सत्ता का भूत सवार था और इसलिए जिसे सिद्धांत के रूप में जान रहे थे उसकी भी अनदेखी कर रहे थे.
तुम्हारा मतलब?
“मतलब यह है कि सैद्धांतिकी के रूप में तुम जानते और दूसरों को समझाते आ रहे थे की कोई सभ्यता अपनी तकनीकी पराकाष्ठा पर पहुँच कर ठहर जाती है. उसके बाद उसकी सर्जनात्मकता चुक जाती है और उसका पतन होने लगता है. यही वह समय है जिस पर कोई दूसरी सभ्यता उस पर हावी हो जाती है. तुम्हे देखना था कि पूँजीवाद अपनी तकनीकी दक्षता भी बढ़ाता जा रहा है और तकनीक में सुधर भी कर रहा है और उसमें इतनी सृजनात्मकता बची हुई है की प्रतिक्षण असंख्य नए अविष्कार हो रहे है. यह दुनिया को बहुत कुछ देने, बहुत कुछ हासिल करने और अकूत उचाइयां छूने की स्थिति में है इसलिएन इसके साथ छेड़छाड़ नही की जा सकती. की गई तो संकट में हम स्वयं पड़ जाएंगे. इसके बाद भी, इस सच्चाई को जानते हुए भी यह खतरनाक दखलंदाज़ी की गई जिसका परिणाम था …”
यार छोड़ो तुमने मेरा मूड खराब कर दिया. इस पर कल बात करेंगे.

Post – 2015-10-26

क्षमा याचना सहित

“मैं मार्क्स के इस कथन से कभी सहमत नहीं हुआ कि ‘आज तक दार्शनिक जगत की व्याख्या करते आए हैं; जरूरत इसे बदलने की है।‘ इसमें यह निहित है कि सोच-विचार से बदलाव नहीं आता, केवल बाहुबल से ही ऐसा संभव है। इसकी अंतर्ध्वनि यह है कि दार्शनिकों को विश्व व्यवस्था को लेकर अब अधिक माथापच्ची बंद कर देनी चाहिए। उस विषय में जो अंतिम बात सोची जा सकती है वह सोच ली गयी है और तुम्हारे सामने है. समस्या केवल दार्शनिक की नहीं है, सभी बुद्धिजीवियों, कलाकारों की है। बुद्धि और कला से जुड़े सभी लोग अपनी कला और प्रतिभा को इसी ध्येय को समर्पित कर दें. उनका मूल्यांकन भी इसी आधार पर हो. सत्ता परिवर्तन के बाद ऎसी कोई बात न तो कही जाय न रचना के माध्यम से व्यक्त की जाय जिसमें जो कुछ भी हो रहा है उसकी आलोचना हो. यह धर्मतांत्रिक व्यवस्थाओं की ईशनिंदा के सम्मान दंडनीय होगा. जहां इस दिशा में संघर्ष किया जा रहा हो वहाँ पार्टी नेतृत्व की आलोचना न की जाय, न ही ऐसा कुछ कहा और किया जाय जो पार्टी की नीतियों के विरुद्ध या उससे हटकर हो. ऐसा करना निंदनीय होगा, क्योंकि दंडविधान अपने हाथ में नहीं है. सभी गतिविधिया राजनीति से परिचालित और उसी को समर्पित हैं. इससे एक पूर्वनिर्दिष्ट, संकुचित, एकायामी और बंजर सोच, बंजर कला, बंजर साहित्य पैदा होता है जो अपने स्वायत्त क्षेत्र को छोड़ कर ऐसे क्षेत्र का काम करने का भ्रम पालता है जो उसके माध्यम से हो ही नहीं सकता। इससे मार्क्स अंतिम दार्शनिक बन जाते है। दर्शन का काम व्याख्या करना नहीं, दुनिया को बदलना है। दुनिया को बदलने का कार्यक्रम मार्क्स ने दे ही दिया, अतः भावी दार्शनिकों को उसी का भाष्य और प्रचार करना है।“
“तुम्हारा अपना नजरिया एकायामी और गलत और किसी छद्म राजनीति से प्रेरित नहीं है?”
“मैं कभी अन्तिम सत्य नहीं बोलता। जितनी बार सोचता हू पिछली बात में कुछ सुधार करना पड़ता है, किसी विशेष क्षण में मैं केवल अपने जाने और समझे हुए का केवल वह कह पाता हू जो उस समय ध्यान में आता है। कुछ छूट गया तो उसी अनुपात में पूरा निष्कर्ष प्रभावित होगा। गलत भी हो सकता है. सही होने की कोशिश में बोलने वालों के पास अपना कुछ कहने को होता ही नहीं। मैं प्रयत्न करता हूँ कि मेरा विचार इकहरा न हो. इसका एक ही तरीका है – अन्य संभावनाओं की ओर ध्यान देना, दूसरे के पक्ष को समझने का प्रयत्न करना। मै बहस जीतने के लिए बात नहीं करता, गलत सिद्ध होने के लिए तैयार हो कर, उस विषय या समस्या की जो समझ है, उसे रखने का प्रयत्न करता हूँ। उसके बाद भी इकहरापन बना रहे तो दुहरा हो जाने से अच्छा है।“
“मैं अभियोग नहीं लगा रहा था, पर बात इतनी अटपटी लग रही है कि ऐसा सन्देह हुआ। तुम अपनी बात कहो।“
“जब दर्शन कार्ययोजना में बदल जाता है तो वह धर्म का रूप ले लेता है, जो पहले के धर्मो और विचार-दृष्टियों का निषेध करता है। उसका अंतिम दार्शनिक, कार्यदर्शन का प्रणेता हो जाता है। पूरे समाज को अपने दर्शन या विश्वदृष्टि को अमल में लाने और पूरी दुनिया में फैलाने का काम अपने अनुगामियों को सौंप कर वह मसीहा बन जाता है। विश्वविजय उस दर्शन को लादने के लिए होगा, प्रशासन उस दर्शन से चलेगा। लोक कितने नेक या बद है, प्रशंसा और पुरस्कार के पात्र हैं या निंदा और दंड के, यह उनकी उस दर्शन के प्रति निष्ठा से तय होगा। इसका कठोरता से पालन कराने के लिए एक तानाशाह मुल्लातंत्र पैदा होगा जो सही गलत का निर्णय करेगा। ऐसा कुछ भी कहने या करने की स्वतंत्रता किसी को नहीं दी जाएगी जो दर्शन की आधारभूत मान्यताओं से अनमेल हो। इसलिए समय बदलेगा, दर्शन के बुनियादी सूत्र नहीं। यह ठीक इसी रूप में प्रतिपादित हुआ हो या नहीं, परंतु इस स्थापना में यह निहित था। आगे चल कर हुआ भी वही। हम कह सकते हैं मार्क्सवाद दुनिया का सबसे नया, अनीश्वरवादी, पदार्थवादी धर्म है जिसकी मूल प्रकृति सामी है।
“”समी क्यों? ”
“क्योंकि सामी मत अपने प्रसार के लिए हिंसा का सहारा लेते रहे हैं. दूसरे सामी मत विचार से डरते रहे हैं. देखो हिंसा का सहारा लेने वाला विचार से डरता है. इसलिए हथियार और विचार में कौन अधिक ताक़तवर है यह भी तुम समझ सकते हो और विचार को मार्क्स ने धता बता दिया. दुनिया के किसी कोने में, कहीं भी यदि में में भिन्न व्यवस्था या भिन्न विचार बचा रहा तो वह इसके लिए खतरा है. इसलिए इसे पूर्ण विश्वविजय चाहिए. इतना ही नही इसी दर से वे पुराने ग्रंथों एंड ग्रंथागारों को नष्ट करते रहे. उनके मूर्त रूपों को नष्ट करते रहे. वे इतने से संतुष्ट नहीं हो पाते की यदि हमारा विचार श्रेष्ठ है तो उसे दूसरे स्वतः मान लेंगे. उसके सही होने पर उन्हें भरोसा नही. इसलिए वे उन्हें विश्वास कहते हैं. साम्यवाद भी एक विश्वास है.”
“तुम इस बात पर ध्यान नही दोगे कि यह तुम्हारा विचारक नही तुम्हारे भीतर का हिन्दू बोल रहा है?”
“हो सकता है वह भी बोल रहा हो, क्योंकि हिन्दू धर्म है विश्वास नहीं. वह विचार से डरता नहीं और अपने अस्तित्व के लिए उसे दूसरे विचारों को मिटाने की लाचारी नहीं अनुभव होती. हिन्दू शब्द को तो तुमने गाली बना रखा है उसे समझोगे कैसे.”
उसकी हालत देखते बनती थी.
“कार्ल मार्क्स इसलिए बहुत सफल, पर अपनी सफलता के अनुरूप बडे़, दार्शनिक नहीं सिद्ध होते, मास अपील वाले दार्शनिक अवश्य सिद्ध होते है। वह अपने उत्साह में विचार की क्रांतिकारी भूमिका को नहीं समझ पाये। उनकी सभी प्रतिज्ञाएँ गलत सिद्ध हुईं। उन्होंने अपनी सैद्धांतिकी की कमियों के अनुरूप एक गलत विश्वदृष्टि को श्लाघ्य बनाया। इसलिए मार्क्स सपाट चिंतक लगते हैं, न तो दार्शनिक के रूप में तत्वदर्शी, न आंदोलनकारी के रूप में दूरदर्शी।
“दूसरे दर्शनों से मार्क्सवाद का अंतर यह है कि उन्हें आप समझ सकते हैं, मार्क्सवाद को काम करते देख सकते हैं। कार्ययोजना के कारण ही यह दर्शन नहीं रह जाता, मज़हब बन जाता है। दर्शन आपकी अन्तश्चेतना में बदलाव लाते हैं और यह बड़े नामालूम ढंग से हमारे आचरण को बदलता है और इस तरह बिना हमारे लक्ष्य किए उनकी पहुँच की सीमा में बदलाव आते हैं। मज़हब सीधे हस्तक्षेप करता है और बदलाव के लिए बाध्य करता है। बाध्य करने के लिए जब हिंसा का सहारा नहीं ले पता तो छल और फरेब का सहारा लेता है।“
“उसने सिर पकड़ लिया। यार तुम जा किधर रहे हो? तुमने मार्क्स को किनारे लगा दिया और फिर भी अपने को मार्क्सवादी कहते हो। इससे बड़ा ढोंग क्या हो सकता है. “
“मेरी बात को समझने की कोशिश करो। राइट ब्रदर्स ने एक जोगाड़ किया। वह उड़ चला। वे असाधारण मेधा के व्यक्ति थे परन्तु उसी आधार पर उनको वैज्ञानिक नहीं मान लोगे। वे थे तो सायकिल ठीक करने वाले ही। उनके पास एक विजन था। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि उड़ने का यन्त्र मात्र स्वप्न नहीं है. यह संभव है. यह छोटी बात नहीं है और यह बड़े से बड़े इंजीनियर के वश का नहीं था. आगे चल कर उससे दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई । उनके उडनयंत्र की कमियों को दूर करते हुए विमान अंतरिक्ष यान तक पहुँच गया, लगातार कमियों को लक्ष्य करता और उन्हें दूर करता. जो इतिहास और समाजशास्त्र को विज्ञान की श्रेणी में लेन को लालायित रहे हैं उन्हें विज्ञान से कुछ सीखना था पर उन्होंने तो इतिहास को भी धर्मशास्त्र बना दिया.
“ हम मार्क्स से दृष्टि ले सकते हैं और उन भूलों से बच सकते हैं जो मार्क्स से हुईं। मैं मार्क्सवादी इसी अर्थ में हूँ। उन भूलों के कारण मार्क्सवाद का भट्टा बैठ गया। उनसे बच कर देखो तो उसकी अपार संभावनाएँ हैं क्योंकि पूँजीवादी विनाश से बचाने की ताकत केवल मार्क्सवाद में ही है। यहाँ मैं केवल उन गलतियों को समझना ओर समझाना चाहता हूँ जिनसे उबरने का प्रयत्न जरूरी है।
“देखो सभी धर्म मानवकल्याण केा ही लक्ष्य बना कर चले हैं। ईश्वरवादी और अनीश्वरवादी या आत्मवादी और भौतिकवादी होने से उनका मूल चरि त्र नहीं बदल जाता, ध्येय अवश्य बदल जाता है। स्वर्ग जाने के स्थान पर धरती पर ही स्वर्ग उतारने की लालसा प्रेरक हो जाती है, परंतु जो उतरे उससे ही पता चलेगा कि यह स्वर्ग है या नरक। कम्युनिज्म पर अपनी टिप्पणी का अंत करते हुए हाब्सबाम लिखते हैं, ‘‘मैं इस सर्वे पर दो बातें कह कर इसे समाप्त करूँगा। पहला कि इस्लाम ने अपने पहले सौ साल में जितने बड़े भूभाग पर विजय पाई थी उससे भी तेजी से, इसने उससे भी बड़े भूभाग पर विजय पाई, फिर भी इस विशाल क्षेत्र पर इसका कितना सतही असर पड़ा।… कम्युनिज्म अवाम के धर्मान्तरण पर आधारित नहीं था अपितु लेनिन के शब्दों में हरावल दस्ते या अपने काडर पर आधारित धर्म था।… सभी शासक कम्युनिस्ट दल अपने चुनाव और परिभाषा से अभिजन अल्पमत थे।… फिर कम्युनिज्म सारतः एक विश्वास की चीज था जिसमें वर्तमान का मूल्य एक अपरिभाषित भविष्य का साधन बनने में था।…”
“तो तुम मुझे हाब्सबाम पिला रहे थे।“
“मैं हाब्सबाम से केवल इस सीमा तक सहमत हू कि मार्क्सवाद दर्शन से धर्म में परिवर्तित हो गया और उसमें धर्म की अनेक खामियाँ आ गईं, पर हाब्सबाम मार्क्सवादी नहीं हैं। मैं हूँ। हॉब्सबॉम की टिप्पणी में मार्क्सवाद के धर्म में बदल जाने की पहचान तो है पर यह समझने की कोशिश नही है कि यह दर्शन से धर्म बना कैसे. हॉब्सबॉम साम्यवाद क़े पतन को रेखांकित करते हैं पर पतन क़े सबसे प्रधान कारण को लक्ष्य नही कर पाते न ही अपने ऐतहासिक चरण पर इसकी अनिवार्यता का पूर्वाभास पाते है. इतिहास क़े अंत की बात करने वाले इतिहास की गतिकी को नहीं समझ पाते क्योंकि उनके पास इतिहास दृष्टि है ही नही. जो इतिहास में जितनी ही गहराई में जाएगा वह इतिहास की गतिकी को उतने ही कुहामुक्त रूप में समझ पायेगा. मुझे यह भ्रम है कि मैंने वेदों से भी आठ दस हज़ार साल पहले क़े अतीत को समझा है.”
“तुम्हारे अलावा दूसरा कोई.”
“दिखाई नही देता. हो सकता है कल पैदा हो.”
वह ठठाकर हँसा.

Post – 2015-10-25

“तुमने मार्क्स के चिंतन को यूरोकेन्द्री क्यों कहा, यह समझ में नहीं आया.”
“तुम जानते हो एक बार चेगुआरा नेहरू से मिलने आए थे और गांधी की तारीफ़ कर रहे थे. उस समय एक महिला पत्रकार ने उनका इंटरव्यू लिया था, जिसमें उसने पूछा था कि यदि आप को गांधी सही लगते हैं तो आपने हिंसा का रास्ता क्यों अपनाया. उनका उत्तर था, “यूरोप में अहिंसा की वैसी परम्परा नही है. यहाँ आंदोलन से परिवर्तन लाया जा सकता है. पश्चिम में सभी तरह के परिवर्तन हिंसा के बल पर ही हुए है.” मुझे उस पत्रकार का नाम तक याद नहीं, न यह याद है कि उसने किस पत्र में इसे प्रकाशित कराया था, इसलिए शब्द भी कुछ इधर-उधर हो सकते हैं, परन्तु यूरोप और मध्य-एशिया में ही नहीं, खाड़ी देशों में भी परिवर्तन, हिंसा के माध्यम से ही होते रहे हैं. भारत और चीन में बलप्रयोग के परिणाम आशाजनक नही रहे हैं, जबकि विचारों से धर्मपरिवर्तन तक होता रहा है जिसे बचाने के लिए लोग जान तक दे देते हैं. मार्क्स का परिवर्तन के लिए हिंसा का समर्थन यूरोपीय मानसिकता के अनुरूप था और इसकी कार्यकारिता भी वहीं तक सीमित थी. लेकिन मेरा अध्ययन इस मामले में बहुत कामचलाऊ है. ज़रूरी नहीं तुम भी इसे ठीक मानो.
“दूसरी बात यह कि उन्होंने पूंजीवादी व्यवस्था से, उसी के मज़दूरों को एकजुट करके क्रांति का सपना देखा. पूंजीवादी विकास तो केवल यूरोप में ही हुआ था. शेष संसार के लिए उनके पास कोई योजना ही न थी. वे कृत्क्रांति यूरोप के लिए कच्चा माल भेजने वाले हे रह जाते.”
“अरे भाई साम्यवाद का मतलब..”
“मैंने कहा न मेरा किताबी ज्ञान बहुत कम है, इसलिए किताबों में जो कुछ बताया और दिखाया जाता है उसको भी नहीं समझ पाता. मैं अपनी बात अपनी ज्ञानसीमा और अनुभवसीमा में कह रहा हूँ.”
“पर उनकी सबसे बड़ी गलती थी इतहास की गतिकी को न समझ पाना. वह मान बैठे कि पूंजीवाद सामंतवाद के बाद की या उसकी अगली अवस्था है.”
“तुम क्या समझते हो? अगली अवस्था नहीं है?”
“वह तो ठीक है परन्तु वह इसे भी नहीं समझ पाए।“
“तुम्हारा दिमाग तो ठीक है न!”
“बाद में तय करेंगे। परन्तु, इसका ध्यान तो उन्हें रखना चाहिए था कि अगर यह इतिहास का एक चरण है और साम्यवाद इससे बाद का चरण है तो इस चरण को अपने चरम तक पहुँचने का अवसर तो देना है. आनन-फानन में उसे गिराकर उसकी जगह लेने के लिए तो न तैयार हो जाते। सच कहो तो उत्पीड़ित मानवता के प्रति उनकी गहरी सहानुभूति थी जिसके कारण वह अपना धैर्य खो बैठे और इस अधीरता ने उन्हें इतिहास की गतिकी को समझने में बाधा पहुँचाई.”
“पूंजीवाद औद्योगिक क्रांति की उपज है. बड़े पैमाने पर उत्पादन की संतान है. बडे पैमाने पर उत्पादन अर्थात् फालतू उत्पादन, उसके लिए बाजार चाहिए, जिसे कहते हैं, अपने कब्जे का बाजार, कैप्टिव मार्केट या उपनिवेश। इसके बाद भी इससे बेकारी पैदा होती ही है। एक छोटे से देश को पूर्जीवादी राह पर चलने पर बहुत सारे देशों का कच्चा माल, धन, और वहाँ भी बेकारी का प्रसार अनिवार्य है। यह समाजवादी चरण की अपेक्षाओं के अनुरूप नही है।
उत्पादन का यही तरीका समाजवाद ने भी अपना लिया इसलिए यह सामंती व्यवस्था को तो बदल सकता था, पूँजीवाद का मुकाबला नहीं कर सकता था, मुकाबला करने चलता तो स्वयं पूजीवादी तन्त्र अपनाना होता। कहें पूंजीवादी व्यवस्था के तन्त्र को तो उन्होंने बहुत अच्छी तरह समझा परन्तु साम्यवदी व्यवस्था में उन्हें समतामूलक वितरण ही समझ में आया पूँजीवाद के भी जीवट को तो समझा ही नही. जिस समय कोई व्यवस्था अपने उत्कर्ष पर हो उस समय उससे टक्कर लिया ही नहीं जा सकता, यह बात मार्क्स को भी मालूम थी, इसलिए साम्यवाद का एक तकियाकलाम रहा है कि पूंजीवाद अपने संकट के दौर से गुज़र रहा है, जब कि उसकी जीवंतता और जिजीविषा ऎसी कि जिस मज़दूर वर्ग के बल पर क्रांति होनी थी, उसे उसने पूँजीवादी लूट में छोटा साझेदार बनाकर पचा लिया. क्रांति कर चुके देश को भीतर से तोड़ दिया.”
“भई, वह तो गोर्बाचेव की नासमझी के कारण…”
मैंने उसके हस्तक्षेप पर ध्यान ही नहीं दिया या दिया तो गोर्बाचेव के नाम तक, ‘गोर्बाचेव ने तो उसे अधोगति से बचा लिया। वह उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में और उच्चतर जीवन की पूँजीवाद प्रसारित पूर्ति में विफल होने और अपनी पहल खोने के कारण बहुत पहले ही जमीन पर आ चुका था। तुम जानते हो, मेरा बेटा रूस में पड़ने गया था। मेरे सपनों के देश में। मेरे जोगाड़ से नहीं, स्वयं रूसी कोर्स ज्वाइन करने और अपनी प्रतिभा के बल पर अपनी अध्यापिका की नजर में आने के कारण। उसे वहाँ शिक्षा के लिए चुना गया तो वह नाच रहा था, जब कि वह फार्मेसी में ग्रैजुएट हो चुका था। उसने उसकी परवाह ही न की। पहले साल के बाद एक अप्रिय सूचना पर वह लौटा तो उसने जो कुछ बताया वह हैरान करने वाला था। वहाँ, अध्यापक तक उपहार पाना पसन्द करते हैं और इसे बुरा नहीं माना जाता। उसके साथ के रूसी लड़के कहते तुम लोग बन क्यों नहीं बनाते। बम बनाने का मतलब था परीक्षा से पहले हाथ पाँव आदि पर दर्ज करके और छिप कर उससे मदद लेना। वे बताते कि पढ़ें या न पढ़ें काम तो उन्हें मिल ही जाएगा। और अमेरिका के प्रति इतना आकर्षण कि घटिया से घटिया जीन मुँह माँगे दामों पर खरीदने को तैयार। नतीजा यह कि पढ़ने गए बहुत सारे बच्चे बिजनेस करने लगे। इस त्रासदी का और मामूली चीजों के लिए लगने वाली क्यू का जिक्र राज थापर ने अपने संस्मरण में भी किया है। मेरे बेटे के छह साल बर्वाद हो गए और वापसी के समय गोर्बाचेव के कारण जो स्थिति पैदा हुई उसमें यह पता करना तक मुश्किल था कि वह है कहाँ, आएगा भी या नहीं। तो गोर्बाचेव किसी का ऐजेंट नहीं था, उसने सड़ रही व्यवस्था को मिटने से बचाया। अमेरिकी एजेंट तो उसके बाद और उस फितरत के बल पर आया, जो गोर्बाचेव को हटाने के लिए अबोले जाहिर कर दिया गया कि अब अमेरिका को तुम्हारी जरूरत नहीं है।“
“अगले को पूँजीवाद की और मोड़ दिया.”
“अगला कौन?”
“क्या तुम्हे माओ का देश दिखाई नही देता या चाइनार प्रेजिडेंट आमादेर प्रेजिडेंट सुनाई नहीं पड़ता? सच कहें तो समय से पहले पूंजीवाद से हस्तक्षेप ने पूंजीवाद की शक्ति को बढ़ा दिया.”
“वह कैसे?”
“औद्योगिक क्रांति और पूंजीवादी लोभ के समक्ष मज़दूर असहाय अमानवीय जिन्दगी जी रहे थे जिसका चित्रण अप्टन सिन्क्लेयर के उपन्यास जंगल में हुआ है।. पूरे यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति को लेकर भारी विक्षोभ था. सामंती व्यवस्था में भी वे उतनी अमानवीय स्थिति में न थे जितने उदीयमान पूंजीवादी व्यवस्था में. परन्तु एक भारी अन्तर यह था कि सामन्ती व्यवस्था में वे भूस्वामी से बधे हुए थे, बिखरे हुए थे,. वे एक साथ मिल कर शक्तिपुंज नहीं बन सकते थे जब कि पूंजीवादी व्यवस्था में वे एकजुट होकर अपने मालिक पर दबाव डाल सकते थे. इसी को लक्ष्य कर के मार्क्स ने सोचा कि इतिहास में मनुष्य समता के सपने तो जाने कब से देखता आया था पर उसे सचाई में बदलने के लिए सताए हुए लोगों की जो एकजुटता पहले संभव नहीं थी. आज वह सम्भव है. इसी को उन्होंने इतिहास का सार-सत्य समझ लिया और इसी के बल पर उन्होंने मान लिया कि अब पूंजीवाद की समाप्ति का और उस पुराने सपने को पूरा करने का सही अवसर आ गया है. संगठित जनता सत्ता परिवर्तन कर सकती है इसका विश्वास फ्रांस की क्रांतियों से हो ही चुका था.”
“इसमें गलती कहाँ थी भाई.”
“गलती यहाँ लगती है कि विचारों से तो लोग पहले भी समता की वकालत करते रहे, पर यह सम्भव नहीं हुआ था. इसलिए परिवर्तन में विचार की भूमिका को नगण्य मान लिया.” घोषित कर दिया कि दार्शनिक विश्व की व्याख्या करते आए हैं, अब समय आ गया है उसे बदलने का, जब कि यह समय अधिक मनोयोग से समस्या पर विचार करने का था। विचार की हत्या करके खून बहाया जा सकता है, इच्छित परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। मार्क्स का यह वाक्य जितना प्रेरक और सम्मोहक है, उतना ही भ्रामक और भटकानेवाला भी.”
वह हँसने लगा, “अच्छा कल बात करेंगे.”

Post – 2015-10-24

मार्क्सवादियों से तुम्हारी चिढ़ मार्क्स तक पहुँच जाती है. तुमने कल कहा, मार्क्सवादी इतिहास-विश्लेषण मार्क्स को भी माफ़ नहीं कर सकता.
इसमें चिढ़ने जैसी कोई बात नहीं. न मैंने कोई नई बात कही. मार्क्सवाद मार्क्सभक्ति नहीं है, विश्लेषण की एक पद्धति है. यह एक दर्शन है. इसकी शक्ति को समझने में स्वयं मार्क्स से भी भूल हुई.
क्या कहते हो? मार्क्स से भी भूल हुई?
ठीक कहता हूँ. और यह बहुत अनर्थकारी भूल थी. इसने दुनिया को झकझोरा अधिक बदला कम और इतिहास की दिशा को ग़लत मोड़ दे दिया.
मैं यह सोचकर रुका कि इस पर वह कुछ न कुछ बोलेगा ज़रूर, परन्तु वह किसी तरह विचलित नही दीखा, “बोलते जाओ मैं सुन रहा हूँ.”
“कई बार लगता है मैं पूरा मार्क्सवादी भी नही हूँ, कम से कम उस अर्थ में नहीं जिसमें, रक्त क्रान्ति के सपने देखे जाते हैं। मैं केवल उसके उस दार्शनिक सूत्र को ही अपने लिए पर्याप्त मानता हूँ, जिसे ऐतिहासिक और द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद कहा जाता है। भौतिकवाद की भी मेरी परिभाषा कुछ अलग है। मैं निपट पदार्थवादी नहीं अपितु पुद्गलवादी हूँ। चिन्मय भूतवादी। उन्नीसवीं शताब्दी के पदार्थवाद में विश्वास नहीं करता, जिसमें परमाणु जड़ है जिससे चित खमीर की तरह पैदा होता है अपितु बीसवीं शताब्दी के भूतवाद में जिसमे जिसमें अणु की सरचना में ही ऊर्ज या इलेक्ट्रान समाहित है और जिसमें ऊर्जा द्रव्य में और द्रव्य ऊर्जा में रूपांतरित हो सकता है. मार्क्स अपने समय के वैज्ञानिक विकास को देखते अद्यतन थे पर उनके चिंतन में यह तो नही कि आगे के मार्क्सवादी अपने समय के वैज्ञानिक विकासों से मुंह फेर कर उनके समय पर ही ठहरे रहेंगे. पश्चगामिता या प्रतिगामिता इसे ही कहते हैं, जिससे बाद के मार्क्सवादी उबर नहीं पाये.
“और इस तरह मैं मार्क्स को भी विचारक के रूप में यथावत स्वीकार नही कर पाता. तहाँ तक उनकी ऐतिहासिकता की बात है, मैं वहाँ भी उनसे टकराता हूँ. मार्क्स इतिहास की गतिकी और दिशा को समझने में भी चूके. इतिहास की समझ के बिना समाज और व्यवस्था को बदला नहीं जा सकता, इसलिए ऐसे सभी लोग जो सामाजिक परिवर्तन के लिए कृतसंकल्प होते हैं, वे इतिहास के गलियारे में जाते अवश्य हैं. उन्हें स्वयं इतिहास की खोज भी करनी होती है और व्याख्या भी करनी होती है.”
“क्यों, इसकी क्या ज़रूरत? हमें बदलना है जो सामने दिखाई दे रहा है. जो वर्तमान है, और समझ रहे हैं इतिहास को. इसी से तो बचना है. पुरातनपन्थिता और प्रतिगामिता से.”
“यही तो चूक हुई या मूर्खता हुई हमारे मार्क्सवादियों से. पुरातन को समझना पुरातनपन्थिता नहीं है, पुरातन को जीने का प्रयास करना, उससे चिपके रहा जाना पुरातनपन्थिता है. ऐसे मार्क्सवादियों से इतिहास का भी सत्यानाश हुआ और वर्तमान का भी. तुम्हे चिकित्सा करने से पहले रोग का निदान करना होता है. केस हिस्ट्री में जाना होता है. इसके बिना ही दवा पर जुट जाओगे और उनसे सलाह लेकर दवा करोगे, जिन्होंने न बीमार को देखा न बीमारी के बारे में जानते हैं तो वही हाल होगा जो हमारे देश का और मार्क्सवादी दलों का हुआ. दवा बीमार और डॉक्टर दोनों की हालत बिगाड़ गई.”
“बात कुछ कुछ समझ में आरही है.”
“जो काम बीमार की केस हिस्ट्री करती है वही समाज के मामले में इतिहास करता है. मार्क्स इस विषय में सतर्क थे. अपने तई वह और ऐंगेल्स दोनों इतिहास और नृतत्व में गहरी रूचि रखते थे. उनके अध्ययन की व्यापकता चकित करती है. परन्तु वह काफी नही था. इतिहास सामाजिक शक्तियों और उन व्यक्तियों की जिनके माध्यम से यह सक्रिय होती है और जिन तरीकों से इसे हासिल किया जाता है इनको समझने की एक प्रयोगशाला है. परन्तु भौतिक विज्ञानों में भी जहाँ असंख्य शक्तियाँ किसी परिणाम को प्रभावित करती हैं उनमे भविष्य या परिणाम का पूर्वकथन प्रायः गलत होता है. जैसे कुछ समय पहले तक मौसम विज्ञान में होता रहा है. काफी हद तक यही अनिश्चितता चिकित्सा में भी बनी रहती है. इसलिए डाक्टर ‘कोशिश करता है.’ इतिहास का अध्ययन प्रॉक्सी से नहीं होता. हो ही नही सकता. इतिहास की समझ के मामले में इसीलिए उनसे भी चूक हुई और हीगेल से भी हुई थी. कई बार लगता है दोनों ही इतिहास का आशावादी या भविष्यवादी और सच कहो तो यूरोकेन्द्री अध्ययन कर रहे थे. मार्क्स ने तो भारत विषयक धारणा जेम्स मिल के इतिहास से ही बनाई थी जिसका विवेचन इतना नस्लवादी और कुतर्कपूर्ण है की ऑक्सफ़ोर्ड में आई.सी.ऐस. की तैयारी कर रहे प्रत्याशियों से, जिनको वह किताब पढ़ाई जाती थी, मैक्सम्युलर ने कहा था कि यदि तुम भारत को जेम्स मिल को पढ़ कर समझना चाहते हो तो समझ ही नही सकते. कोसंबी उन्हें सबसे प्रामाणिक मानते थे. ग़नीमत यह कि मार्क्स के ओरिएण्टल डेस्पॉटिज़्म की मान्यता की आलोचना कोसंबी ने प्राचीन भारत के सन्दर्भ में किया तो इरफ़ान हबीब ने मध्यकाल के विषय में. ऎसी स्थिति में जब कोई मार्क्स या एंगेल्स को प्रमाण के रूप में अपने को सही साबित करने के लिए उद्धृत करता है तो मुझे उसकी व्याख्या पर संदेह होता है. व्याख्या सही हो तो उसे किसी नज़ीर की ज़रूरत नहीं होती.”
“तुम किसकी बात कर रहे हो?”
“एक दो हों तब तो नाम लें. यह बता दूँ कि रामविलास जी और नामवर जी भी फँस जाने पर ऐसा ही करते हैं. जो भी हो न तो मार्क्स का इतिहास का ज्ञान भरोसे का है न उनकी इतिहास की व्याख्या. वह इतिहास से सीधे टकराये ही नही. जिन के माध्यम से उन्होंने इतिहास को समझा वे बेदाग़ नही थे.”
“तुम यह क्यों भूल जाते हो कि किन दारुण परिस्थियों में, कितने अभावों और दबावों में, उन्हें कितना काम करना पड़ा और उन्हें समस्त दुखी और उत्पीड़ित मानवता से कितनी सहानुभूति थी.”
“यहीं तो उनके समक्ष नतशिर हो जाता हूँ. उनकी ज्ञान-साधना और लोक-मंगल-कामना को तपस्या मानता हूँ और उनको ऋषि. और यह मत समझो कि उन्हें ऋषि कहकर उनका मान बढ़ा रहा हूँ. उन्हें ऋषि कहकर यह समझने में तुम्हारी मदद कर रहा हूँ कि ऋषि केवल वैदिक भारत में ही नही होते थे. तब तुम्हे यदि सप्तर्षि दिखाई देते थे तो आज शतर्षि मंडल मिल जाएँगे. हाँ साथ ही यह भी समझा रहा हूँ कि ऋषियों का कहा है, इसलिए ही कोई बात मान्य नहीं हो जाती.”
वह सहमत हो गया. बोला “दाग़ तो चाँद में भी है.”
मैंने कहा, “तुम्हारे मुंह घी-सक्कर ” पर आप जानते हैं, वहाँ न घी था न सक्कर, सिर्फ मुहावरा था और उस मुहावरे क़े साथ ही मुझे चाँद पर एक तुकबंदी याद आ गयी और मैंने सोचा उसे सुनाने का यही सही मौक़ा है, फिर भी पूछा, चाँद पर कुछ इबारतें मैंने भी लिखी हैं सुनना चाहोगे. अपनी ही असावधानी से मेरे चंगुल में आ चुका था वह और मैंने आव देखा न ताव, अपनी तुकबंदी को पूरी बुलंदी और फारसी अदायगी से पेश करने लगा.
चाँद में शीशे तो हैं रोडे हैं कुछ पत्थर भी हैं.
गौर से फिर देखिये कुछ आशिक़ों के घर भी हैं.
शांति कुछ ऎसी कि सन्नाटे से जी घबरा उठे
यह ग़नीमत जानिए कुछ आशिकों के सर भी हैं.
यूँ तो बसने के लिए आदम हैं आदम-ज़ाद है
और उनके ठीकरे हैं बोरिया बिस्तर भी हैं.
चाँद की कुछ रोशनी पड़ती ज़मीं पर है ज़रूर
अपने साये चाँद के भीतर भी हैं बाहर भी हैं.

Post – 2015-10-23

“कोई बात पूरी नही होती,” उसने भूमिका बनाते हुए कहा.
“अधूरापन ही विचार को ज़िंदा रखता है,” मैंने भी फ़िक़रा जड़ा.
उसने मेरे फ़िक़रे पर ध्यान नहीं दिया. अपने में खोया बोलता रहा, “कल मैं तुम्हारे उस वाक्य पर सोचता रहा, ‘सभ्यता का चरित्र वैश्विक है, इसलिए भारत में जो कुछ है वह पूरी मानवता का है.’ सभ्यता का चरित्र तो समझ में आया, परन्तु उतने प्राचीन चरण पर भारत में जो उत्कर्ष देखने में आता है, वह पूरी मानवता का है, यह जुमला समझ में नहीं आया और आया भी तो इस रूप में कि भारतीय सभ्यता के उत्थान में सुमेरिआ, मेसोपोटामिया और मिस्र का योगदान है. परन्तु उस दशा में यह बात समझ में नही आई, कि सभ्यता के प्रेरक घटकों का प्रवाह भारत से उन देशों की ओर था.”
ख़ुशी हुई कि पहली बार वह सचमुच गम्भीर था. मैंने कहा, “देखो, मैं केवल यह नहीं कह रहा था कि ऋग्वेदिक भाषा और संस्कृति का प्रवाह भारत से उन सभ्यताओं और असभ्य समाजों की ओर था, अपितु यह भी कि सभ्यता का जन्म भारत में हुआ और इसकी पहल से सुमेरी सभ्यता का, सुमेरी की प्रेरणा से मेसोपोटामियाई और मिस्री सभ्यता का उत्थान हुआ, परन्तु यदि कल इस बात को इतने खुले शब्दों में कहता तो तुम मेरी बात सुने बिना उठकर चल देते. तुम सोचते, इतनी भारतमुग्धता तो किसी मनोविक्षिप्त में ही हो सकती है. उससे सर क्यों मारना? आज तुम सुनने की मानसिकता में हो तो थोड़ा खुल गया.”
“अटपटा लग रहा है फिर भी इसे मान लें तो जो भारत का है, वह पूरी मानवता का कैसे हो गया? कहना तुम यह चाहते हो, कि भारत भूमि में ही कुछ ख़ास है, ‘गायन्ति देवाः किल गीतिकानि धन्यास्तु ते भारत भूमिभागे’ वाले स्वर में’.” उसका चेहरा कुछ तमक आया था, फिर भी वह अपने को नियंत्रित करने का प्रयत्न कर रहा था.
“उस स्वर में तो नहीं, पर कुछ खास है, यह तो है ही. दुनिया के सभी क्षेत्रों में कुछ ख़ास है, और भारत में कुछ अधिक खास है.”
“क्या बकते हो तुम!” नियंत्रण की भी एक हद होती है. भाप का दबाव बढ़ जाने पर तो बॉयलर फट जाते हैं.
मैंने उसकी उत्तेजना का मज़ा लेते हुए उसे और कंफ्यूज करना चाहा, “सभ्यता के विकास में आपदाओं की भी एक भूमिका है. वे चाहे प्राकृतिक प्रकोप के कारण हों या मनुष्य की लापरवाही, उद्दंडता, कृपणता, निर्ममता, अज्ञान, कायरता, या सदाशयता से पैदा हों.”
इच्छित प्रभाव पड़ा. उसका पारा नीचे आ गया. हैरान होकर मुझे देखने लगा. इस हैरानी में प्रश्नाकुलता भी थी.
“भारत को प्रकृति ने रेगस्तान क्यों न बनाया जिसमे तेल के कुओं से पिघला हुआ सोना निकलता. रेगिस्तान तो अपने हिस्से आया पर उसमें तेल के कुंएं ही नदारद. दुख तो हुआ होगा इस पर . सीलन इतनी और गरमी इतनी कि लकड़ी में ही नहीं, आदमी के दिमाग में भी फफूंद लग जाती और वह सोचता नहीं दुहराता है. इस देश और हवा में उत्तर, सच कहें पश्चिमोत्तर से, और अंतिम सत्य यह कि सीधे यूरोप या उसके निकटस्थ क्षेत्र या दिशा से ऊर्जा लिए आने वाले कुछ ही समय में यहाँ की जलवायु के कारण खलास हो जाते रहे हैं, इसे आप मानते रहे हैं और इस पर आपसे बहस करूँ भी तो समय की बर्वादी ही होगी, इसलिए इस पर चुप रह जाता हूँ. मगर आप उस त्रासदी के समय इसकी महिमा को तो जानिए. यह हिमयुग की गहराती त्रासदी में पूरी दुनिया में सबसे उत्तम शरणस्थल था, या नही?
वह भौचक मुझे देखता रहा.
“अच्छा यह बताओ, यदि तुम्हें परिभाषित करना हो तो भारत को किसका देश कहोगे?”
वह मेरी और देखता रहा, फिर बोला, ‘तुम चाहते हो मैं इसे हिन्दुओं का देश कहूँ.”
“तुम निरे गावदी हो यार. कल्पना शक्ति है ही नही. दिमाग पर ज़ोर तो डालो. उसने दिमाग पर काफी ज़ोर डाला, पर उसमे से निकला, “तुम्ही बताओ.”
“मैं इसे मेलों का देश कहूँगा. जितने बड़े और जितने मेले, और जितने विचित्र मेल यहां लगते हैं, दुनिया में कहीं नहीं लगते. ठीक कहा?”
उसने हामी में सर हिलाया.
“पर एक मेला इतना बड़ा लगा था जिससे बड़ा मेला न कभी लगा न लगना चाहिए, और मज़े की बात उस मेले को मुझसे पहले न किसी ने देखा, न मेरी मदद के बिना देख सकता है.”
“समझा कर बताओ यार.”
“यह मेला विगत हिमयुग के गहराने के कारन लगा था, जब उत्तर के घबराए हुए लोग और जानवर सूरज की दिशा में और समुद्र की दिशा में पलायन करने लगे थे. उस आपदा में भारतीय भूभाग श्रीलंका से बहुत आगे तक फैला था. समुद्र काफी पीछे खिसक गया था.
“इस मेले के जुटान में ही हज़ारों साल लग गए थे. उत्तर की पर्वत श्रृंखला उत्तर की हवाओं के लिए दीवार थी. विशाल तट रेखा थी, वर्षा का औसत बहुत गिर गया था, पहले की आबादी पर आने वालों का बोझ. सूखे से खाद्य सामग्री का अभाव. ज़िंदा रहने के लिए भीषण मार-काट. अपने जत्थे को बचाने के लिए, और सम्भव है पेट भरने के लिए भी, नरहत्या तक को तैयार. तुम्हारी कपाल-कुण्डला, रक्तपायी काली उसी युग की प्रतीक है. कैलाश की चोटी पर विराजने वाला शिव जो हाथी का चमड़ा पहनता है, उन साइबेरियाई आगंतुकों का प्रतीक है. धरती का संतुलन बनाए रखने के लिए महागजों या दिग्गजों की कल्पना में मैमथों और मॅस्टोडानों की छाप है. ग़रज़ कि दूर उत्तर से लेकर बीच के और आसपास के अमंख्य मानव जत्थों का आगमन और रेलपेल. परन्तु अपनी विभिन्न परिस्थितियों में ज़िंदा रहने के लिए इन्होने जो तरकीबे निकल रखी थी उनका भी आगमन और लेन-देन भी होना ही था. समुद्र-मंथन कभी हुआ था और उससे क्या निकला था यह तो पता नहीं, परन्तु यह जो महामानव समुद्र मंथन इस भूभाग में हुआ था, उससे निकला था वह अमृत, जिसे चाइल्ड ने कृत्रिम उत्पादन और कृषि क्रांति कहा था और अपनी सतही और किंचित यूरोकेन्द्री दृष्टि के कारण अपने ‘निकट-पूर्व’ में केंद्रित मान लिया था. वह क्रांति इस भूभाग में हुई थी और राहत का दौर या उष्म काल के साथ दूर-दूर तक फैली थी. इसी की दूसरी अभिव्यक्ति स्थाई निवास, ग्राम, नगर और नगर संस्कृति का उदय भी इस देश में हुआ परन्तु इसमें विश्व मानवता की भागीदारी थी. अब हुई बात साफ़?”
वह हक्का बक्का, “इसके भी प्रमाण हैं?”
“होंगे क्यों नहीं. उसी महामंथन से इतिहास को बचाये रखने की अनेकानेक युक्तियाँ भी तैयार हुईं और हमने अपने इतिहास को ही नहीं उन युक्तियों क भी बचाए रखा. जो इसे नही समझ पाता वह न इतिहास को समझ सकता है, न अपने समाज को, न ही वर्तमान को. और ऐसा उचक्का यदि समाज को बदलने चलेगा तो समाज को, इसके मूल्यों, मानों, इतिहास और वर्तमान, सभी को झुलस कर रख देगा. मार्क्सवाद के नाम पर अनाड़ियों ने यही किया.”
“तुम तो अपने को खुद मार्क्सवादी कहते हो.”
“मैं मार्क्सवादी हूँ, पर अनाड़ी तो नही. दुर्भाग्य से इस देश में मैं अकेला मार्क्सवादी हूँ. दूसरे या तो भाववादी हैं या मोल-भव-वादी. मार्क्सवादी इतिहास-विश्लेषण मार्क्स को भी माफ़ नहीं कर सकता. इन पेशेवर सौदागरों की खबर तो लेगा ही. मैं अकेला पड़ जाता हूँ और मेरे सबसे बड़े दुश्मन अपने को मार्क्सवादी कह कर तमाशे खड़े करने वाले ही हैं.”

Post – 2015-10-22

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“तो तुम्हारा कहना है, दुनिया में जो कुछ अच्छा है वह सब भारत से गया हुआ है? भारत जगद्गुरु है?”
“मैं यह कहता हूँ की सभ्यता का चरित्र वैश्विक है, इसलिए भारत में जो कुछ है वह पूरी मानवता का है. और यह कहना चाहता हूँ कि इसे जितनी स्पष्टता से भारत ने समझा था, उतनी स्पष्टता से पूरे इतिहास में कभी किसी दूसरे ने नहीं समझा. आजतक.
“तुम तो पेंग भरते रहते हो. उछलते तो ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा’ गाने लगते हो और पीछे लौटते हो तो ‘न हमने कुछ कहा न हमने कुछ किया का राग’. पर अगले ही क्षण पेंग आगे और जैकारा शुरू.”
“गाने तुम गा रहे हो. जो समझते नही वे गाने गाते हैं. वह “सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्ताँ ” हो, या ” मो सम कौन कुटिल खल कामी हो.’ मैं तुम्हे सिर्फ इतना बता रहा हूँ की दूसरी सभ्यताओं के सपूतों ने अपने इतिहास को नकार दिया. उसका सत्यानाश कर दिया और हमारे ऊपर कटाक्ष करते रहे कि हमारे पास न इतिहास है, न इतिहास बोध, जब कि हम अकेले हैं जिन्होंने अपने इतिहास को बचाया और…”
“तुम कहो, हमने इतिहास को पूजा और उससे बाहर निकल ही नही सके, न ही निकलना चाहते है.”
“तुममे सुनने का धीरज तो होना चाहिए. हम अकेले हैं जिन्होंने इतिहास की गति और गतिकी को समझा और उसे सूत्रबद्ध किया. तुमने वह नीति वाक्य सुना है, ‘चक्रार पंक्तिरिव गच्छति भाग्य पंक्तिः’ जानते हो यह कितना पुराना है? नहीं जानते. यह ऋग्वेद से लिया हुआ है.”
“ऋग्वेद से?” उसे चौंकना ही था.
“हाँ, ऋग्वेद की इबारत अधिक स्पष्ट है, “ओ हि वर्तन्ते रथ्येव चक्रा अन्यम् अन्यम् उपगच्छन्ति राय: ‘ अरे ये धन-वैभव तो आज एक के पास है कल दूसरे के पास चला जाएगा. कहीं टिकता नहीं. पहिये के अरों की तरह घूमता रहता है. कभी एक अरा ऊपर आता है तो कभी दूसरा.’ पश्चिम ज्ञान और विज्ञान में सबसे अग्रणी होने का दावा करता है पर अहंकारवश इस सूत्र को जानते हुए भी समझने और मानने को तैयार नहीं होता. अपने या गोरी जाति के शाश्वत-वर्चस्व-सिंड्रोम से बहार निकल ही नही पाता.”
मैं सोच रहा था वह बीच में टोकेगा, परन्तु वह पहली बार ध्यान से सुन रहा था.
“जो इतिहास को जानता है, वह इतिहास से बंधता नहीं है. इसीलिए यह हज़ारों साल पहले से युगधर्म की बात करता आया है. जो कभी चलन में था, दूसरे युग या भिन्न देश में वर्ज्य हो सकता है. जो वर्ज्य था वह व्यवहार्य हो सकता है. परन्तु विश्व-गुरु-सिंड्रोम से यह भी ग्रस्त रहा है यह भी मानना होगा, क्योंकि सबसे पुराने विश्वविद्यालय यहीं थे, और उनमें पढने के लिए दूर-दूर से लोग खतरे उठाकर आया करते थे. ”
“जब तुम इतिहास को बचाने की बात कर रहे थे तब मैं सोच रहा था कि तुम्हें चीन क्यों भूल गया.”
“देखो, चीन पुराना देश है. उसकी संस्थाओं और उपलब्धियों को उस निषेधवादी विचार से नहीं गुजरना पड़ा जिस में धर्मोदय के साथ अपने ही इतिहास और अपने ही पुरखों को नकार ही नही दिया जाता है, उन्हें गर्हित, अंधकारपूर्ण ही नही बताया जाता है, अपितु उन्हें नारकीय यातना का पात्र तक मान लिया जाता है. उन्हें शैतान की गिरफ्त में मान लिया जाता है. और वह भी बुद्ध धर्म क़े संपर्क में आने क़े बाद भी.
“बुद्ध धर्म तो किसी को शैतान कहता नही.”
मैं मुस्कराता हुआ कुछ देर तक उसकी हैरानी का मज़ा लेता रहा. जब उसे खीझ होने लगी तो कहा, “देखो अभी तक तो तुम इस बात से घबराये हुए थे. मैं प्राचीन जगत के एक दौर की उपलब्धियों का ही श्रेय भारत को दे रहा हूँ तो तुम मानने को तैयार नही. परन्तु अब जब मैं कहने जा रहा हूँ कि दुनिया की अनेक बुराइयों की जड़ भी यहाँ तलाशी जा सकती है तो तुम झटपट मान लोगे, क्योंकि यही वह चीज़ है जिसे लोग बिना जाँचे परखे मान लेते हैं.”
“तुम यह क्यों सोचते हो की मैं क्या मानूँगा, क्या नहीं. मैंने तो सिर्फ इतना कहा कि बौद्धमत में”
“मत, मत कहो. धर्म कहो. पहली बार एक व्यापक और आज की शब्दावली में कहें तो सेक्युलर और वैज्ञानिक शब्द को बुद्ध ने संकीर्ण अर्थ में लेते हुए अपने मत को धर्म की संज्ञा दी.”
“चलो वही सही. पर मेरा प्रश्न..”
“आता हूँ उस पर. तुम यह तो मानोगे कि बौद्ध धर्म दुनिया का पहला मिशनरी धर्म है.”
वह आश्चर्य से मुझे देखने लगा तो, मैंने अपनी भूल सुधारी. मुझसे चूक हुई, पहला नहीं. मिशनरी धर्म जिसे तब धर्म नहीं, व्रत कहते थे और जो अपने आदर्श मूल्यों और मानों के प्रसार को समर्पित था, ऋग्वेद क़े समय में ही अस्तित्व में आ गया था. आखिर ‘सूर्यम दिवि रोहयन्त: सुदानव आर्या व्रता विसृजन्तः अधिक्षमि’ और ‘कृणवामो विश्वमार्यम’ क़े पीछे तो मिशनरी भावना ही है.
“और मिशनरी धर्मों का एक अनिवार्य लक्षण है अपनी धर्मसीमा से बाहर क़े लोगों क़े प्रति घृणा पैदा करके दूसरों को अपने धर्म में दीक्षित होने को बाध्य करना.”
“ऋग्वेद में भी है यह?”
“क्यों नहीं है. अनीन्द्र (इंद्रा को न माननेवाले), अदेवयूं (देवों को न मानने वाले), अन्यव्रत और अनार्य (आर्य जीवनपद्धति न अपनाने वाले) लोगों क़े प्रति घृणा तो ऋग्वेद में भी है. पूरे भारोपीय क्षेत्र में उससे पहले का कोई धर्म, विश्वास बचा दिखाई देता है.”
वह भौचक. संभलने में कुछ समय लगा, “परन्तु, बौद्धधर्म तो अहिंसा का प्रचारक है.”
“अहिंसक भी हिंसकों से घृणा कर सकते हैं न? जितनी अहिंसा को उचित मानते हैं उससे आगे बढ़ी अहिंसा से घृणा कर सकते हैं न. जिनमे हिंसा पूर्णतः वर्जित नहीं है उनका कुत्सित चित्रण कर सकते हैं न?”
“लगा उसे मेरी बात समझ में नही आ रही है. मैंने कहा, “यदि तुम देखो कि बुद्ध महावीर की कितनी निंदा करते हैं और महावीर बुद्ध को कितनी खोटी खरी सुनाते हैं तो दांतों टेल उंगली दबा लोगे. और यह जो बौद्ध साहित्या में मिलता है की यज्ञ में अनगिनत गायों की बलि दी जाती थी, वह बौद्धधर्म के कारण बंद हुआ, या बौद्ध मत में दीक्षित होने से पहले अशोक चांडाशोक था और अपने आठ भाइयों का वध कर दिया था और कलिंग युद्ध में लाखों का संहार हुआ था, या अंगुलिमाल नामक डाकू का हृदय परिवर्तन हुआ था इन्हे ज़रा सोचते समझते हुए पढ़ना चाहिए. कम-से-कम इतनी समझ तो होनी ही चहिये कटी उँगलियों की सड़ांध उसे पसंद न रही होगी. मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि अपने को स्वीकार्य बंनाने कि लिए मिशनरी धर्म दूसरे धर्मों, और अपने उदय से पहले के विचारों और लोगों की निंदा करने के लिए उनमें बुराइयों का आरोपण करते और प्रचलित बुराइयों की अतिरंजना करते है.”
“लेकिन सनातन धर्म में तो किसी को अपनाने की प्रवृत्ति ही नहीं रही है. वे तो अपने सीमित दायरे से बाहर के भूभागों को भी अशुद्ध मानते रहे है.”
“तब तक, जब तक उसे जीतकर, या उसके शासक को मनाकर, उसमें वर्णव्यवस्था लागू न कर दी जाय.”
“परन्तु भारत से बाहर तो वर्णव्यवस्था पाई नहीं जाती.”
“पाई नहीं जाती, क्योंकि प्रभाव क्षीण पड़ने के बाद वह मंद पड़ते-पड़ते लुप्त हो गई, परन्तु वर्णव्यवस्था का प्रसार भी किया गया था और ईरानियों, गालों, रोमनों आदि में लम्बे समय तक बनी रही. दस्तूर भी तो आखिर ब्राह्मण ही हैं न.”
उसे विश्वास नहीं हो रहा था तो मुझे मेधातिथि की टीका का एक अंश दुहराना पड़ा, “यदि कश्चिद् क्षत्रियादि जातीयो राजा साध्वाचरणो म्लेच्छान पराजयेत् चातुर्वर्ण्यं वासयेत्, म्लेच्छान च आर्यावर्त इव व्यवस्थापयेत् सो अपि स्यात् यज्निया:, यतो भूमि: न स्यात् दुष्टा संसर्गात् हि दुष्यति. (यदि कोई क्षत्रिय या किसी अन्य जाति का सदाचारी म्लेच्छों को पराजित करके वर्णव्यवस्था स्थापित करे तो वह क्षेत्र भी यज्ञ के उपयुक्त हो जाएगा, क्योंकि धरती स्वयं दूषित नहीं होती संसर्ग से दूषित होती है).
उसे सब कुछ नया नया सा लग रहा था. मैंने आगे जोड़ा, “तो यह जो मिशनरी धर्म की बीमारी है, जिसे सेमेटिक कह कर एक दरबे में दाल दिया जाता है, उसकी जड़ भी भारत ही है. यह वहां दो खेपों में पहुंची. पहला खेप वैदिक, दूसरा खेप बौद्ध.
और दूसरी बुराई जुआ और सट्टेबाज़ी. यहीं से निर्यात हुई
और तीसरी रेस-कोर्स. हाँ इसमें इतना और जोड़ दो कि रेस में पहले रासभ ही जोए जाते थे. आखिर रास, रासभ, रेस, रैश में ध्वनि साम्य तो है ही.