Post – 2016-03-31

हिन्‍दी का भविष्‍य (19)

“दूसरी रुकावट भारतीय भाषाओं के लेखक हैं। इन्हें अपनी भाषाओं पर गर्व है, पर विश्वा स नहीं। थोड़ा-बहुत विश्वास संस्कृत पर है जो अज्ञान पर आधारित है क्यों कि वे स्वयं संस्कृत जानते नहीं। इसलिए संस्कृ त के प्रसंग में प्रशंसा सहमते हुए और निन्दा गरजते हुए करते हैं। अंग्रेजी पर विश्वास है पर अपने अंग्रेजी ज्ञान पर विश्वास नहीं है क्योंकि भाषा ज्ञान नहीं अभ्याेस की चीज है जो अपने भाषा-परिवेश में ही संभव होता है। अंग्रेजी में प्रार्थनापत्र से आगे की कोई चीज पूरे विश्वास से नहीं लिख सकते, फिर भी अंग्रेजी को कुछ प्रयत्न से समझ लेते है, और ज्ञान का एक मात्र श्रोत अंग्रेजी में उपलब्धं सामग्री को मानते हैं इसलिए अंग्रेजी अधिक आयास से और अपनी भाषा में उपलब्ध सामग्री को सदभावनावश पढ़ते हैं। ‘’

’’तुम अपना परिचय दे रहे हो या भारतीय लेखकों, पत्रकारों और अध्यापकों की बात कर रहे हो।‘’

मैंने उसके फिकरे पर ध्या न ही नहीं दिया, ‘’अपनी भाषा में लिखे ज्ञान साहित्य को वे बिना पढ़े ही यह जान लेते हैं कि इसका स्तर उसी विषय पर अंग्रेजी में लिखी किसी पुस्तक या लेख की तुलना में घट कर होगा और अधिक संभावना यह है कि अंग्रेजी से ही यहॉं-वहॉं से कुछ झटक कर सजा दिया गया हो, इसलिए उसे यदि पढ़ना भी पड़ा तो कृपा भाव से पढ़ते हैं।

उनका विश्वा स है कि यदि सचमुच कोई आधिकारिक काम होता तो अंग्रेजी में लिखा गया होता और इसलिए यदि स्वयं कोई शोध या ‘आधिकारिक’ लेखन करना होता है तो अंग्रेजी का उस स्तयर का ज्ञान प्राप्त‍ करने के लिए संघर्ष करते हैं जिसके बाद अपनी बात उस भाषा में कह सकें। उसके किसी पत्र या प‍त्रिका में नामोल्लेेख तक को भारतीय भाषा में अपने लेखन से अधिक महत्व देते हैं। दूसरे शब्दों में ये अपनी भाषा से अधिक सम्मान अंग्रेजी का करते हैं और यदि अंग्रेजी का महत्व कम करने या उसे ऐच्छिक विषय बनाने की बात आए तो उसका सीधे विरोध न भी करें तो विरोध करने वालों के पीछे भीड़ बन कर खड़े हो जाऍंगे।‘’

‘’जिसे तुम अपराध की तरह पेश कर रहे हो वह एक सचाई है। ऐसे लोगों को खड़ा कर दो जा अपनी भाषा या उसके साथ किसी अन्य भारतीय भाषा को भी जानते हैं, परन्तु अंग्रेजी का मात्र कामचलाउू ज्ञान रखते हों, और तुम्हें फर्क समझ में आ जाएगा।‘’

’’अंग्रेजी में जो सचमुच सहजता से लिख बोल लेते हैं वे ऐसे लोग हैं जिनकी घरेलू बोल चाल की भाषा अंग्रेजी रही है। हम उसके गुण-दोष पर नहीं जाऍंगे, परन्तु अंग्रेजी के प्रति गहन आसक्ति के कारण वे अपने परिवेश की भाषा को बोल तो लेते हैं, परन्तु लिखने में या व्याख्यान देने में उन्‍हें उसी तरह की कठिनाई होती है जो भारतीय भाषाओं के अभ्यस्त लोगों को अंग्रेजी लिखने बोलने में होती है। दोनों इसमें असहज अनुभव करते हैं, इसीलिए मैंने कहा था, भाषा ज्ञान की चीज से अधिक व्यवहार की चीज है।

’’अब जो तुलना तुम ले कर बैठ गए अग्रेजी से अपरिचित या अल्पपरिचित परन्तु भारतीय भाषाओं तक का ज्ञान रखने वालों के बीच तुलना का, वह आभासिक है। यह अंग्रेजी के दबदबे के कारण है, विषय की समझ के कारण नहीं है। नफीस अंग्रेजी में धाराप्रवाह बोलने और लिखने वाले अधिक समझदार होते हैं यह बात तुम तभी कह सकते हो यदि इतिहास या भाषा पर किसी अंग्रेजी में दक्ष इतिहासकार को मेरी स्थापनाओं को खंडन करते दिखा सको। पूरी मंडली रही है उनकी, सभी संस्थांओं पर अधिकार रहा है उनका, इसके लिए कवायद भी करते रहे परन्तु ऐसा हो नहीं पाया और इसके बाद भी उनका नाम फारसी सलाम करते हुए ही लेने की आदत बनी हुई है लोगों म वे अंग्रेजी जानते हैं, अपना विषय नहीं जानते।”

‘’पहली बार तुम्हेंब इस तरह अहंकार पूर्वक और वह भी अपने बारे में बात करते हुए सुन रहा हूँ। सुन कर भी विश्वास नहीं होता कि तुम होश हवास में हो या कुछ खा-पी लिया है और उसके असर में ऐसी बातें कर रहे हो।‘’

‘’तुम अपनी ओर से समझदारी की बात करते हो तो भी तुम्हारी असलियत का पता चल जाता है। अरे भई, मैं अपनी बात नहीं कर रहा था, मैं यह बता रहा था कि अंग्रेजी ज्ञान पर भरोसा करने के कारण आधा समय तो ये लोग पराई भाषा पर स्वभच्छ अधिकार पाने पर खर्च कर देते हैं और फिर इतने श्रम से सीखी गई भाषा में जो कुछ भी लिखा गया है उसको गटक जाते हैं, उसका आलोचनात्मक पाठ तक नहीं करते और इसलिए अंग्रेजी का ज्ञान विषय के अटपटे और जपाट ज्ञान का रूप ले लेता है। जिसे पराई भाषा के प्रति ऐसी आसक्ति नहीं है वह अपने विषय की समझ और ज्ञान के कारण ही अपनी जगह बना सकता है। अंग्रेजी के आधिकारिक ज्ञान का अभाव जॉंचने-परखने और अधिक गहराई में उतरने को प्रेरित करता है। अपना उदाहरण इसलिए कि जब प्रमाण की बात आएगी तो अपने अनुभव और टकराव और सभी अयोग्यताओं और सुविधाओं से वंचित मुझ अकिंचन के एक प्रहार से सर्वसाधन संपन्नों के दाँतों में धूल झाड़ कर खड़े होने के बाद भी मानो कुछ हुआ ही नहीं, किरकिरी की याद तो दिलानी ही पड़ेगी। यह तो पूछना ही पड़ेगा कि अंग्रेजों से ले कर अंग्रेजी दॉं विद्वानों का इतिहास चार पॉंच हजार साल से पीछे नहीं जा पा रहा था और अपनी बोलियों की समझ रखने वाले एक अदना ने उसे दस हजार साल और स्यांत् उससे भी पीछे अकेले पहुँचा दिया और जब यह दुस्साेहस किया था तो पुरातत्व तक से कोई रोशनी नहीं मिल रही थी, पुरातत्व बाद में आया, गुणसूत्रों के विश्लेपषण बाद में आए। 1985 में लिखित और 87 में प्रकाशित अपनी पुस्तक में एकमात्र ज्ञात स्थल मेह्रगढ़ के बारे में लिखा था कि यह भारतीय इतिहास के पन्ने पर हाशिए की लिखावट है, इसका प्रसार क्षेत्र भारत में है और आहार संग्रह के चरण से बाद के नागर चरण तक के विकास का एक खाका प्रस्तुृत किया था और वह इसलिए कि अंग्रेजी ज्ञान की भाषा है, इस भ्रम का शिकार नहीं हुआ था।‘’

‘’वह सब तो ठीक है यार, लेकिन फिर भी अगर तुम अपने बारे में चुप रहते तो क् अच्छा नहीं होता।‘’

‘’होता, यदि उस सच को दबाने या उससे ध्यान हटाने की कोशिश लगातार किसी न किसी रूप में जारी न रहती और उसे कहने वाला कोई दूसरा होता तो। तुम सच को व्याक्त करते हो उसकी रक्षा के लिए, यदि उसे किसी शरारत के तहत अनसुनी करने का प्रयत्न हो रहा हो तो थप्पड़ मार कर भी उसकी ओर ध्या न दिलाना होता हैा तुम अपने तर्क का विस्तार करते हुए कह सकते हो हिन्दी तुम्हारी अपनी भाषा है, इसकी शक्ति और उपादेयता की बात करना भी आत्मासक्ति है। तुमने मेरा ध्यान विषय से हटा दिया। मैं केवल यह याद दिला रहा था कि हमारे मन में कहीं गहरे यह भाव जमा हुआ है कि अंग्रेजी के अभाव में हम ज्ञानशून्य हो जायेंगे, जब कि हमने यह पाया कि अंग्रेजी पर भरोसा करने के कारण हम ज्ञानशून्य नहीं तो ज्ञानजड़ बने हुए हैं।”

“तुमने जो उदाहरण दिया वह अपवाद भी तो हो सकता है। क्या यह नहीं मानोगे कि हमारी भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान संपदा नगण्य है।‘’

’’किसी का दिया हुआ ज्ञान उसके काम का होता है, हमारे काम का नहीं। यदि ज्ञानसंपदा नगण्यं है तो उसका उत्पादन करना होगा और उसमें अंग्रेजी बाधक बनी रहेगी। भारतीय भाषाओं के साहित्यकार हों या पत्रकार या अध्यापक ये सभी पढ़ते अंग्रेजी में, सोचते घालमेल भाषा में हैं, बोलते हिंग्लिश जिसमें बीच बीच में इंडिश का पुट होता है जो शब्दों तक सीमित नहीं होता, वाक्यो और उद्धरणों को विरामचिऩ्हों की तरह प्रयोग में लाते है, और लिखते अपनी भाषा में हैं, और लिखते समय भाषा की पवित्रता का इतना ध्यान रखते हैं कि अपने ही सोच के हिन्दीतर शब्दों का हिन्दी् में अनुवाद करना जरूरी समझते हैं। इसलिए अंग्रेजी से वंचित होने की कल्पना से उन्हे डर लगेगा ही । वे जुआकड़यों की तरह दिवा-स्वप्न देखते हैं और लुटेरों की जमात का हिस्सा बनते चले जाते हैं जैसे अधिक पानी से तर धरती की लोनी फूल कर ऊपर चली आती है और उर्वर भूमि को ऊसर क्षेत्र में बदल देती है वैसे ही समाज के अघाए हुए, दूर से चमकने वाले, फूले हुए ये लोग किसी भी तरह की पहल की क्षमता खो चुके होते हैं। पता भी है, तुम भी इसी तबके में आते हो।”

“और तुम?”

मैं उनमें आता हूँ जो अल्प से अपार पाने और भोग के पीछे भागने के खतरों को जानते हैंऔर ऊसर क्षेत्र को उर्वरा भूमि में बदलने के लिए जीतोड़ कोशिश करते हुए तुमसे लगातार टकराते रहते हैं । पर वह आग जिसकी ऊर्जा से युगान्तर होता है, मेरे पास भी नहीं है वह उस दबे कुचले और उपेिक्षत तबकेां में है जो इन्सान बनने की छटपटाहट से गुजर रहे हैं, और ऊपर वाले तिरस्कार के साथ बार बार उन्हें नीचे धकेल देते है़, और जो लाचारी में अपने को समझा लेते हैं कि शायद यही हमारी नियति है, और इसलिए सपने उनके पास भी नहीं हैं। उन्हें तो यह विश्वास दिलाना तक कठिन है कि वे भी इन्सान हैं। जो आदमी ही नहीं बन पाए वे सपने नहीं देख सकते। सपने देखने के लिए जिस सुकून की जरूरत होती है वह सुकून छटपटाने वालों के पास नहीं हो सकता। उनके भविष्य के सपने पालने का काम वह कर सकता है जो यातनाओं से गुजरा हो और राहत के क्षणों मे भी उस आग को बचाए हुआ हो जिसकी धीमी आग में सपने पलते और आकार लेते हैं।”f

Post – 2016-03-28

हिन्दी का भविष्य‍ (18)

‘’यदि तुम सचमुच रुकावटों को समझना चाहते हो तो, सबसे बड़ी रुकावट तुम हो, तुम जैसे लोग जो हिन्दी के नाम से घबरा जाते हैं। हिन्दी में ढाई अक्षर हैं। इसे वे अठारह बना कर हिन्दीहिन्दूहिन्दुास्तान पढ़ते हैं और उनके सामने राष्ट्रवाद का खतरा दिखाई देने लगता है। ये फिकरे गढ़े किसने हैं, कब गढ़े यह भी तुम्हें भूल जाता है क्योंकि तुम उनमें ही गर्क हो गए इसलिए तब से आज तक तुम्हारी भूमिका तोड़ने और बिगाड़ने की रही है, अपने आप तक को तोड़ने और मिटाने की । तुमने जो कहा है ठीक उससे उलट काम किया है। दावा मजदूरों और गरीबों की भलाई का करते रहे और काम उपनिवेशवादियों का करते रहे; जो सपने दिखाते रहे हैं उन्हीं को रौंदने के कारनामे करते हैं। समझदार इतने कि इसका इल्म तक नहीं।‘’

मिटटी के घड़ों की तरह टकराते, और टूटते हुए लुढ़कते रहे हो और इसी को प्रगति कहते हो। दुर्गति की इतनी सुन्द र परिभाषा तो कहीं देखी ही नहीं। तुम दूसरों को फासिस्टग कहते हो और स्व्यं फासिज्मप और नाजिज्मद के औजारों का इस्ते माल करते आए हो। साधनों की पवित्रता पर विश्वािस न होने के कारण तुम भ्रष्ट से भ्रष्ट संगठनों से समझौता कर सकते हो और भ्रष्टहता में उनसे बहुत पीछे रहने के कारण उनसे जुड़ने पर भी उनकी दुम बन कर ही लहरा सकते हो।‘’

‘’फासिज्म और नाजिज्म़ में तुम क्या फर्क देखते हो?’’

‘’तुमने गलत सवाल किया। पूछना चाहिए था फासिज्म्, नाजिज्म और कम्युनिज्म में क्या समानताऍं देखते हो और इनमें क्या भिन्नताऍं हैं कि इनके तीन नाम हैं?’’

‘’अरे यार, चलो यही सही’’ उसने मजा लेते हुए कहा।

‘’समानता यह है ये तीनों पूँजीवाद और उसके विस्तार और उस क्रम में होने वाले कदाचार के प्रति विक्षोभ के तीन रूप हैं। तीनों न्याय और औचित्य की अवैज्ञानिक समझ पर आधारित है। अन्तर यह कि फासिज्म का बल राष्ट्रीय अनुशासन और सैन्यैकरण पर था। तुम्हें याद हो या न याद हो, हमारे समय में स्वतन्त्रता के बाद छात्रों में अनुशासन और सैन्यक करण का एक अभियान चलाया गया था। एक का नाम था प्रोविंशियत कैडेट कोर और दूसरे का नेशनल कैडेट कोर, जिन्हें हम PCC और NCC के नाम से जानते थे। प्रलोभन यह था कि यदि तुम़्हारे पास इसका प्रमाणपत्र होगा तो तुम्हें नौकरी में कुछ सहूलियत मिल जाएगी। मैं PCC में था, यार याददाश्तम इतनी कमजोर हो गई है कि इसका कोई और नाम रहा हो तो मैं इस सीमा तक अपने कथन में अदल-बदल कर लूँगा पर इस योजना और इसके पीछे की मानसिकता पर नहीं। मुझे इस बात की ग्लानि थी कि हमारे स्कूल में NCC का आयोजन क्यों न था। कारण NCC को सुविधाऍं अधिक दी जाती थीं जिनसे हमें ईर्ष्या थी । मुझे उस सर्टिफिकेट के लिए दो साल तक कवायद करनी पड़ी, उसे पास भी किया पर जीवन में उसका कोई उपयोग न हुआ। यह समय 1951-53 का है। नेहरू जिन्हों ने सुनते हैं मुसोलिनी से मिलने से इन्कार कर दिया था, उनके ही शासन में हमें मुसोलिनी के फासिस्ट आदर्शों के अनुसार प्रशिक्षित किया जा रहा था। पता नहीं मुसोलिनी ने अनुशासन और सैन्य‍ प्रशिक्षण के लिए किन्हीं प्रलोभनों का प्रयोग किया था या नहीं।‘’

‘’किया होगा, न किया हो तो दहशत का सहारा लिया गया होगा।‘’

’ठीक कहते हो। मैं तुम्हें केवल यह याद दिला रहा था कि इतिहास के विविध चरणों पर उन्हीं शब्दों और प्रत्येयों के अर्थ बदलते रहते है और एक ही समय में अलग अलग हितों से जुड़े लोगों के लिए भी अर्थ भिन्न भिन्न होते हैं। उसी मुसोलिनी से नेहरू ने मिलने से इन्कार कर दिया था। उसी से रवीन्द्रनाथ और गांधी मिलने पर अपने देश को एक अनुशासित देश में ढालने के लिए उससे प्रभावित हुए थे और नेहरू के समय में ही, स्वतन्त्राता के ठीक बाद हमारी शिक्षा प्रणाली छात्रों को फासिस्ट सॉंचे में ढाल रही थी। और इसी फासिज्म को दूसरे विश्व युद्ध के बाद एक गाली में बदल दिया गया। यह कम मजेदार तो नहीं कि आप फासिज्‍म से नफरत भी करते हैं और उसी पर चलने का प्रयत्‍न भी करते हैं।‘’

‘और नाजिज्म ।‘’

‘’करेले के बारे में एक मुहावरा है, एक तो करेला दूसरे नीम चढ़ा। फासिज्म जातीय संहार और अपने ही समाज के अरक्षणीय लोगों के संहार की क्रूरताओं को ढकने के लिए विचार, संचार और मनोरंजन के सभी साधनों पर एकाधिकार करके गलत को सच और सच को गलत सिद्ध करने की कवायद है और यदि गौर करो तो इप्टा के समय से ही मनोरंजन, संचार, विचार, साहित्य, कला सभी माध्यमों पर एकाधिकार सा करके उल्टे को सीधा बताने का काम तुमने लगातार किया है और उसी धौंस और आतंक के साथ किया है जिसके लिए तुम फासिज्मा को दोष देते हो।
‘’हिन्दी भाषी क्षेत्र में तुम्हारा प्रभाव सबसे अधिक रहा है और आज तक बना हुआ है, इसलिए तुम देशद्रोह को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सिद्ध कर लेते हो। यदि भारतीय भाषाओं में शिक्षा और उच्चतम अवसरों की उपलब्धता और अंग्रेजी को गौण स्थान देने की बात आए तो सबसे पहले तुम इसका विरोध करोगे। हिन्दी के नब्बे प्रतिशत साहित्यकार और पत्रकार तुम्हारे सम्मोहन में आज भी है इसलिए वे स्वयं जो अन्यथा हिन्दी का राग अलापते हैं, भारतीय भाषाओं का विरोध वे करेंगे या ऐसा करने में लज्‍जा अनुभव हो तो मैदान से पीछे अवश्य हट जाऍंगे, इसलिए कहता हूँ कि पहली और सबसे बड़ी रुकावट तुम स्वायं हो क्यों कि तुम्हारे हित अमेरिकी नवसाम्राज्यवाद से जुड़ चुके हैं और वह यह नहीं चाहेगा कि अंग्रेजी का वर्चस्व समाप्त हो।

Post – 2016-03-26

हिन्दी का भविष्य (17)

‘’तुम्हें उन रुकावटों का पता है जो तुम्हारे सपनों को धूल में मिला सकती है ?’’

‘’जिनका एक जमदूत सटे पास बैठा को उन्हें जानूँगा कैसे नहीं। मुझे रूकावटों का तो पता है ही, उस पस्तहिम्मती का भी पता है जिसमें सपने तक देखने का हौसला बुझ जाता है, उन दार्शनिकों का भी पता है जिन्हें किसी इमारत के ईंट गारे नहीं दिखाई देते पर उसकी तबाही से उड़ती धूल गर्द उनकी ऑंखों में भर जाती है और परेशान कर देती है। नि:सत्व समाज का महामन्त्र होता है, ‘हमारे करने से क्या होगा’ जिसे दुहराते हुए उसे चादर तान कर सोने की आदत पड़ जाती है।‘’

‘’तुमने तो समाज का बहुत निराशाजनक चित्र खींच दिया यार। कुछ तो सोचा होता कि इसी समाज के अंग तुम भी हो।‘’

‘’तुमने ठीक कहा, समाज शब्द सही नहीं है, समाज का नि:सत्व तबका कहना चाहिए था। किसी भी समाज के सभी तबके कभी नि:सत्व नहीं होते, परन्तु यदि सत्ता और साधन नि:सत्व तबके के पास सिमट आऍं तो जिनमें सत्व होता है वे घुट कर रह जाते हैं। उनकी उूर्जा लौ और प्रकाश देने की जगह धुँआ देने लगती है। उसकी बर्वादी निराशा को और बढ़ा देती है। जिनको यथास्थिति से संतोष है वे बदलाव का विरोध करते हैं, और जिन्हें बदलाव चाहिए वे अपनी बौखलाहट में उनके हाथ का खिलौना बन जाते हैं जो उस दबे कुचले तबके को अनन्त काल कें लिए गुलाम बनाए रखना चाहते हैं और इसके लिए उन्हीं की व्यर्थ जा रही आग का इस्तेमाल लुकाठे के रूप में करते हुए उनका घर जलाने का नाटक रचते हुए, जिन्होंने उन्हें वशवर्ती बना कर कभी रखा था और आज भी समानता का अधिकार नहीं देना चाहते उनका अपना ही घर जला देते हैं। इस आगजनी का उन पर कोई असर नहीं होता जिन्‍हें वे जला कर सुधारना चाहते है, उनके अपने भीतर यह समझ तक नहीं पैदा होती कि स्थिति में इच्छित बदलाव क्यों नही आता और कैसे लाया जा सकता है। उल्टें वे उनके चंगुल में फँस जाते हैं और उन प्रवृत्तियों को बढ़ावा देते हैं जो उनके भविष्य को अधिक अन्ध‍कारमय बनाती हैं। मैं इसका उत्तहरदायी उनको नहीं मानता। शिकारियों को न दोष दिया जा सकता है, न उपदेश। उन्‍हें अपने लक्ष्य पूरे करने हैं।‘’

‘’तुम बहकते बहुत हो, किनको शिकारी कह रहे हो, मैं भी तो जानूँ।‘’

‘’मैं बहकता नहीं हूँ, तुम अपने अनाप-शनाप सवालों से मुझे बहका देते हो। यदि शिकारियों की ओर चर्चा मुड़ी तो उन बाधाओं की बात अधूरी रह जाएगी जिनकी आशंका तुम मुझे दिखा रहे थे और जिनकी शक्ति और सीमा का पता मुझे है। इसलिए इस सवाल को अगली शृंखला तक स्थगित रहने दो जब मैं उस तबके को केन्द्र में रख कर अपनी समझ से, तुम्हें, और तुम जैसे दूसरे मित्रों को, अवगत कराने का प्रयत्न। करूँगा। इस समय तो इतनी ही बात तुम्हारी समझ में आ जाय तो मूढ़ कक्षा से अगली कक्षा में जाने का रास्ता खुल जाय जहॉं ज्ञान का ककहरा सीखा जाता है और विज्ञान तक की उड़ान भरी जाती है।‘’

वह हँसता रहा और मैं टी हाउस और काफी हाउस के उन दिनों को याद करके मुस्कराता रहा जब हमारी समझ से टॉंग को अल्लााताला ने चलने के लिए नहीं, खींचने के लिए बनाया था और हम उसके इरादे पर पानी नहीं फेरना चाहते थे इसलिए बकवास को बुद्धिमानी और सही सोच-विचार को बोरंबोर मानते थे। समय कट जाता था, तबीयत भी हल्की हो जाती थी, पर दिमाग पहले से अधिक खाली हो कर लौटता था, इसलिए सिर पर किसी तरह का बोझ होता ही नहीं था। इसी में एक पूरी पीढ़ी की बौद्धिक उूर्जा लोनी में बदल गई और सतह से उूपर दिखने की ललक में एक पीढ़ी इतिहास पर कब्‍जा करने की कोशिश में इतिहास से बाहर हाे गई।

वह कुछ कहने को तैयार दिखा, मैंने रोक दिया, ”यार बात बढ़ जाएगी। तुम्हें अपने पहले आलोचक सीताराम बारी की टिप्परणी सुनाउूँ । वह अनपढ़ थे। मेरे घर के छोटे मोटे काम कर दिया करते थे। कलकत्ते में नौकरी करने वाले अपने भाई को चिट्ठी लिखवाने आते थे। यह मेरे मिडिल स्कूल तक का समय था। वह बताते अमुक का सलाम, अमुक का सलाम और यह दर्जन के करीब पहुँच जाता। मैं उनकी बात सुन कर लिखता अमुक अमुक का सलाम। वह लंबा पँवारा लिखवाने के बाद लिखने को कहते थे, थोड़ा लिखना बहुत समझना, चिट्ठी को तार समझना और लौटती डाक से इतना रुपया भेज देना। वह उस पत्र को इत्मीनान के लिए कई लोगों से पढवा कर जानना चाहते थे कि उनकी बात सही सही लिखी गई है या नहीं और उनकी आलोचना जिससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ यह थी कि भगवान बाबू, आप की लोग इतनी तारीफ करते हैं, लेकिन आप को तो चिट्ठी भी लिखनी नहीं आती है।‘’

”तब उनका यह कथन मूर्खतापूर्ण लगता था, यह समझने में लंबा समय लगा कि सीताराम मेरी जानकारी में मेरे सबसे बड़े आलोचक थे और जिन नामों के साथ यादों और स्नेंहस्मरणों का पुनरावर्तन था, उनका संवेदनात्मक संचार कितना गहन होता है इसका ध्‍यान जगन्नाथ दास रत्नामकर के ‘हमको लिखो है कहा, हमको लिखो है कहा, हमको लिखो है कहा, कहन सबै लगीं, पढ़ने के समय भी नहीं आया। लंबा समय लगा। व्यर्थ प्रतीत होने वाली उक्तियों के मर्म को समझने में युग लग जाते हैं।

‘परन्तु इस समय मुझे अपने एकमात्र विश्ववसनीय आलोचक सीताराम बारी की याद इसलिए आई कि अनुभव से पता चला कि फेस बुक पर थोड़ा कहने पर लोग बहुत अधिक समझते हैं और अधिक कहने पर समझने की जरूरत ही नहीं समझते। अब शामत तुम्हा री है, एक ही विषय या पक्ष को टुकड़ों टुकड़ों में गिलहरी की तरह कुतरना और दुम लहराते भागना होगा।”

उसने ठहाका भरा, ‘’तुमने अपने लिए बहुत सही उपमा चुनी है।‘’

Post – 2016-03-25

हिन्दी का भविष्य (16)

‘’जब तुम हिन्दी‍ के भविष्य की बात करते हो तो लगता है तुम भारतीय भाषाओं पर हिन्दी को लादने की बात कर रहे हो। अन्तर नाक पकड़ने के तरीके में है, सीधे नहीं तो घुमा कर पकड़ लिया। इसलिए मेरे कई मित्र तो शीर्षक से ही इतना उततेजित हो जाते हैं कि तुम्हें पढ़े बिना ही अपनी कल्पना से जान और मान लेते हैं कि तुमने लिखा क्याे होगा। इससे तो अच्छा होता तुम संस्कृुत के भविष्य की बात करते जिस पर आज कल सरकार की भी कुछ दिलचस्पीे पैदा हुई है।‘’

‘’सरकारों में पढ़ लिखे लोग नहीं होते, नारे लगाने वाले लोग होते हैं। संस्कृत बीते हुए कल की भाषा है, और उस कल में भी वह किताबों की भाषा थी, सामाजिक व्;वहार की भाषा न थी। दैनिक व्यवहार में संस्कृत के विद्वान भी क्षेत्रीय बोलियों का ही व्यवहार करते थे, यह पहले भी निवेदन कर चुका हूँ। जो पूरे समाज के व्यवहार की भाषा न बन सके उसके अतीत में भी कभी उसका वर्तमान न था, आज के लिए तो वह केवल ग्रन्थ भाषा है और उसका बहुमूल्यं हजार साल पहले ही रचा जा चुका था। दूसरे शब्दों में कहें तो वह एक ऐसी भाषा है जिसका चलन एक छोटे से समुदाय में, जिस युग में, था, उसे हम भूल चुके हैं और चाहें तो भी उसकी कल्पना नहीं कर सकते। उसके बहुल रूप वैदिक की बारीकी से छानबीन करें तो उसका कामचलाउू चित्र गढ़ सकते हैं। जिस युग में इसका बाजार और कारोबार के लिए विविध भाषाऍं बोलने वालों द्वारा उपयोग होने लगा था, उस दौर में उस छोटी जमात को छोड़ कर दूसरे सभी अपनों के बीच अपनी बोली का व्यावहार करते थे जिसके कारण आज तक हमारी बोलियॉं जीवित हैं।

संपर्क साधने के लिए वे पूरे क्षेत्र में वैदिक काल की ही तरह किसी बोली को निर्विरोध स्वीकार कर लेते थे। कहें ज्ञात इतिहास में संस्कृत का वर्तमान न था और भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि क्या उसे इतना सरल बनाया जा सकता है कि उसमें वचन, लिंग और सन्धिरूपों की गतानुगतिकता न हो। ऐसा संभव नहीं है इसलिए संस्कृत में ग्रीक की तरह पुरानी ग्रीक जिसमें पुराना साहित्य है और नयी ग्रीक जो आज के व्यवहार की भाषा है, जैसा अन्तर संभव नहीं है। कोई इतना बड़ा रचनाकार संस्कृत का हुआ नहीं जो जयदेव से आगे बढ़ कर इस भाषा में क्रान्तिकारी परिवर्तन ला सके और संस्कृत को लोकग्राह्य और व्यहवहार्य बना सके। और यदि कोई ऐसा कर भी पाता तो भी वह संस्कृत उतनी सशक्त भाषा नहीं होती जितनी हिन्दी है।‘’

‘’यही तो मैं तुमसे उगलवाना चाहता था। तुमने जो मायाजाल फैला रखा था भारतीय भाषाओं के अभ्युदय का उसके पीछे हिन्दी को लादने की लालसा है, इसका शक मुझे बराबर बना रहा है और तुमने हिन्दी को संस्कृत से भी अधिक सशक्त मान कर मेरी आशंका की पुष्टि कर दी।‘’

‘’तुम्हारा दिमाग कभी ठीक हो ही नहीं सकता, क्योंकि ठीक होने के लिए पहले से उसका होना जरूरी है। मैंने एक बार कहा था न कि पार्टी कार्ड थमाते ही काडर का दिमाग उसकी सहमति से रखवा कर फ्रीज कर दिया जाता है और उसकी जगह एक प्रतिनादी यंत्र फिट कर दिया जाता है। जोर जितना भी डालो तुम्हारे दिमाग से वही बाहर आएगा जिसे पहले से भर दिया गया है।

‘’भाषा की सशक्तता यह कि हिन्‍दी संस्‍कृत का सब कुछ अपना सकती है, बोलियों की संपदा भी। हिन्‍दी का व्‍यवहार करने वाले जो छोटी मोटी गलतियॉं करते हैं, हिन्‍दी उनको सहन कर सकती और अपनी शैली का हिस्‍सा बना सकती है और यह किसी भाषा के ऐसे शब्‍दों को पचा सकती है जो व्‍यवहार का हिस्‍सा बन चुके हैं। संस्‍कृत में यह लोच नहीं थी, वह अकड़ी हुई भाषा है, पर हमारे सबसे समृद्ध स्रोतों में से एक है। परन्‍तु यदि भाषा की सशक्‍तता व्यावहारिकता का आधार होती तो अंग्रेजी हिन्दी से बीस तो पड़ेगी ही, उसे विस्थापित करने का प्रश्न ही न उठता। अखिल भारतीय स्तर पर अंग्रेजी जानने वाले हिन्दी जानने वालों की तुलना में कम न मिलेंगे।‘’

‘’यही तो हम कहते हैं, जब एक बार पूरे देश में शिक्षित समुदाय में अंग्रेजी व्यवहार की भाषा बन चुकी है तो उसे उखाड़ने पछाड़ने की जरूरत क्या, है ? यह तो रही मेरी पहली आपत्ति और दूसरी यह कि अखिल भारतीय संपर्क की जरूरत पूरी करने के लिए हिन्दी की जरूरत पड़ेगी यह तुम मान कर चल रहे हो, मतलब कहीं न कहीं हिन्दी साम्राज्य‍वाद की लालसा तुम्हारे भीतर काम कर रही है और इसे कोई स्वी कार नहीं करेगा। तुम्हारी सारी योजना यहीं धरी की धरी रह जाएगी।‘’

‘’तुम ठीक कहते हो, यदि कोई भी भाषा साम्राज्यवादी लालसा पाले तो उसका विरोध एक नैतिक दायित्व बन जाता है और इसीलिए मैंने कहा था, जिस चरण पर इसे सरकारी कामकाज की भाषा बनाने के विरोध में तमिल प्रतिरोध इतना उग्र हो गया था कि आवेश में कुछ ने आत्मदाह तक कर लिया, उस चरण पर इसके आसार भी थे। परन्तु हम हिन्दी को राजभाषा बनाने की बात नहीं कर रहे हैं। राजकीय हस्तक्षेप से भाषाओं का अहित अधिक होता है, हित कम। हम कहते हैं शिक्षा और उच्चतम अवसर तक पहुँचने का माध्यंम मातृभाषाऍं बनें और मातृभाषाओं की बात करते हुए मैं मातृबोलियों और भाषाओं में अन्तर करना जरूरी समझता हूँ। राजभाषाओं को उन राज्यों की मातृभाषा मानने में कोई हरज नहीं है। मुख्य भाषाऍं वे हों, संपर्क के लिए जो भी भाषा उचित समझी जाए वह गौड़ भाषा हो। उसका आधिकारिक नहीं कामचलाउू ज्ञान जरूरी हो। और वह भी सबके लिए नहीं।‘’

‘’मैं इस आधिकारिक, कामचलाउू और कामचलाउू रहित शिक्षाप्रणाली का रहस्या नहीं समझ पाया।‘’

‘’मैं तुम्हें समझाता हूँ, तुम समझना चाहो तो। माजरा 1977 के आसपास का है। जनता दल के हाथ में सत्ताा आई थी। सत्ता प्राप्ति तक का तरीका उन्हें मालूम था, सत्ता सँभाली कैसे जाती है, यह मालूम नहीं था। नादानी के साथ उत्साह और बड़बोलापन बढ़ जाता है और काम का स्थान बयानबाजी ले लेती है। हिन्दी को ले कर भी ऐसी ही बयानबाजी चल रही थी। जमीनी स्त र पर कुछ करने के लिए जो तैयारी चाहिए वह तो इच्छा मात्र से हो नहीं जाती, फिर भी आवेशपूर्ण बयानों से सुनने वाले विचलित तो होते ही हैं। उन्हीं दिनों भाषा के सवाल पर नंबूतिरिपाद ने एक परामर्श गोष्ठी बुलाई और प्रश्न पार्टी से जुड़ा न हो कर एक समस्या‍ से था, मैं जलेस से जुड़ा था, इसलिए मुझे भी उसमें उपस्थित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने अपनी चिन्ता जताते हुए समझाया कि लोग यह समझते हैं कि दक्षिण भारत के लोग अंग्रेजी अधिक आसानी से सीख जाते हैं, इसलिए वे अंग्रेजी के पक्ष में और हिन्दी के विरोध में हो जाते हैं, यह धारणा सही नहीं है। हिन्दीे को लादना ठीक नहीं है।‘’

‘’तुम्हारी याददाश्त की दाद देनी होगी कि लगभग चार दशक पहले की घटनाऍं और बयान तुम्हें हूबहू याद हैं।‘’ पता नहीं चला कि वह तारीफ कर रहा था या व्यंग्य।

‘’देखो, मैं ठीक उन्हीं शबदों या वाक्यों का प्रयोग नहीं कर रहा हूँ जो उस समय बोले गए थे, मैं उनके मर्म के आधार पर उनकी पुनर्रचना कर रहा हूँ। खैर, मैंने उनसे उस समय की समझ के अनुसार कुछ ऑंकड़ों के साथ अपनी बात रखी। मेरा तर्क निम्न प्रकार था:
(1) किसी भाषा को लादना या किसी लदी हुई भाषा को ढोना दोनो समान रूप में गलत है। मुख्‍य प्रश्न औचित्य का है।

(2) प्रश्न केन्द्रीय कामकाज की भाषा का है। उसको अंग्रेजी रखने से ही काम चलता है तो उन लोगों को जिनको केन्द्रीय नौकरियों में नहीं जाना है या जाने का अवसर नहीं मिलता उन्हें उस भाषा को जानने को बाध्य क्यों किया जाय?

(3) इस देश में इतने बच्चे प्राथमिक कक्षाओं में दाखिला लेते हैं, इतने माध्यमिक तक पहुँचते हैं, और केवल इतने उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। उच्‍चतम स्तर तक पहुँचने की जिनकी आकांक्षा, अर्हता, या पात्रता तक नहीं होती और जिन्हें जिन्दगी भर अपनी भाषा के सहारे ही काम करना होता है उनके ज्ञानार्जन के बहुमूल्य वर्षों को एक ऐसी भाषा सीखने पर क्यों बर्वाद किया जाय जिसका वे कभी उपयोग नहीं करेंगे और जिस बाध्य‍ता के कारण वे उतना कुछ सीखने से वंचित रह जाते है जिसे उन्हें एक ऐसी भाषा को सीखने पर बर्वाद करना पड़ा जिसका उनके लिए कोई उपयोग नहीं है।

(4) यह देश की जरूरत नहीं है कि अमुक भाषा में काम हो, यह केन्द्रीय सरकार की जरूरत है कि जिस भाषा में वह केन्द्र का काम कराना चाहती है, उसमें काम हो। इसका सीधा समाधान यह है कि योग्यता का आधार ज्ञान और प्रतिभा हो। इसकी परख उनकी भाषाओं के माध्यम से हो। इसका भी कोटा हो तो कोई हरज नहीं, परन्तु चयन का आधार कोई ऐसी भाषा न हो जो उनकी अपनी न हो। चयन के बाद जैसे दूसरी शाखाओं में लोगों को प्रशिक्षण पर रखा जाता है, केन्द्री य सेवाओं में चुने गए सभी लोगों को दो साल की शिक्षा उस भाषा की दी जाय जिसमें सरकार अपना कामकाज कराना चाहती है। इसके बाद मैंने यह सुझाया था कि इससे पूरे राष्ट्र की उूर्जा, धन, साधन की कितनी बचत होगी। और उस बचे हुए धन से शिक्षा के विस्ता र में कितना संसाधन उपलब्ध हो सकता है।

‘’अंग्रेजी के बचाव में एक दूसरा तर्क जो दिया जाता है, वह है, अनुसंधान का। हमारी सन्दर्भ भाषा अंग्रेजी है, पहले संस्कृत हुआ करती थी। जब संस्कृत होती थी तब किसी भी विद्रोही परंपरा के दार्शनिक उत्था‍न के साथ संस्कृंत उस भाषा पर हावी हो जाती थी जिससे यह विद्रोह पनपा था। परन्तु यह एक भ्रम है कि अंग्रेजी विश्व भाषा है। अनुसंधान के लिए हमें दूसरी अनगिनत भाषाओं की जरूरत है। उनकी शिक्षा देने वाली संस्थाओं को प्रोत्सानहित करना और विश्व ज्ञान संपदा के सम्मुख अवरोध बनी अंग्रेजी से मुक्ति पाना, अल्प व्ययसाध्य होगा और अपार लाभ दायी होगा, इसलिए जो लोग अनुसंधान आदि का मंसूबा रखते हैं उन्हेंं इंटरमीडिएट के बाद अपनी चुनी हुई भाषा और उसकी ज्ञानसंपदा हासिल करने में किसी तरह का अवरोध न होना चाहिए। उन्हें सिखाने वाले शिक्षण और अनुसंधान के केन्द्र होने चाहिए।‘’

‘’तुम इस तरह की हॉंकते हुए बोर नहीं होते ? कमाल का स्टै्मिना है। मैं तो फेंट होते होते बचा।‘’ उसको आगे कुछ सुनना ही न था। मैं मिन्नत करता रह गया कि अभी तो भाषा के आधिकारिक ज्ञान, काम चलाउू ज्ञान और उससे मुक्त शिक्षा के मसले आए ही नहीं, पर उसने मेरी मिन्नत पर ध्यान ही न दिया।

Post – 2016-03-23

हिन्दीे का भविष्य (15)

‘’दिल पर हाथ रख कर बोलो, क्या तुम सचमुच मानते हो कि अंग्रेजी का स्थान भारतीय भाषाऍं लेने वाली हैं।‘’

“मैं ऐसा नहीं मानता कि मौसम अनुकूल हो तो खेत अपने आप लहलहा उठते है। उसके लिए पहले से कई स्तरों पर तैयारी करनी होती है, प्रयत्न करना होता। जमीन तैयार करने से ले कर सही समय पर बोआई और देख भाल करनी होती है। कुछ न करो तो मौसम की कृपा से जो उर्वरता बढ़ी है उससे झाड़-झंखाड़ उग आते है, जंगल की वापसी हो जाती है। जंगल के कानून काम करने लगते हैं। उत्पादक लुंचक में बदल जाता है और अपनी अपनी मनमानी करने की पशुता को प्रभुता समझने लगता है और आदमी व्यक्ति के रूप में और देश और समाज के रूप में कमजोर और विपन्न होता चला जाता है?”

‘’हमारे साथ यही हुआ है, यही हो रहा है।‘’

मैं हैरान उसका मुँह देखने लगा। यह इतनी आसानी से मेरी बात समझ कैसे गया और समझ भी गया तो मान कैसे गया। ‘’इस तरह घूर क्यों रहे हो, मैंने कुछ गलत कहा।‘’ उसने मुझे ललकारते हुए से स्वर में कहा।

‘’तुमने शत प्रतिशत सही कहा, मैं तो इस बात पर हैरान था कि तुम भी कभी कभी सोचते हो और पार्टी से पूछे बिना अपनी बात कह भी लेते हो। पर जानते हो यह क्यों हुआ है ?’’

वह मेरा मुँ‍ह तकने लगा, कारण उसे नहीं मालूम था। मैंने जबाव देने की जगह प्रश्‍न कर दिया, आदमी और जानवर में फर्क क्‍या है, जानते हो ? शहर, बस्तीे और जंगल में फर्क क्या है जानते हो?’’

नहीं जानता था, क्योंकि अब भी जिज्ञासा से मुझे ही ताक रहा था। मैंने कहा, ”आदमी के पास भाषा होती है, जानवर के पास आवाज जो मिमियाहट, टर्राहट और सरसराहट से ले कर दहाड़ तक पहुँचती है। शहर के लोगो के पास कहने को भाषा होती है परंतु वे जो कहते हैं उसका मतलब वही नहीं होता जो उनके शब्‍दों से प्रकट होता है, इसलिए उनके पास शोर होता है भाषा नहीं होती। बस्ती के लोग जब व्यंजना में बात करते हैं तब भी उनके मन का भाव आईने की तरह साफ समझ में आता है। जंगल में दहाड़ सुनाई देती है, और भय पैदा होता है, पर इससे अधिक कुछ समझ में नहीं आता कि हम जंगल में हैं और किसी भी समय जान पर बन आ सकती है।‘’

तुम हर चीज को इतना फैला देते हो कि शक होता है तुम्हारा दिमाग सही है या नहीं, सीधे नहीं कह सकते ?’’

‘’तुम्हारा उल्लू खींचने में मजा आता है यार, उसे कैसे छोड़ दू और दूसरों को यह समझाने का भी एक मजा है कि देखो, यह मेरा दोस्त तो है पर यह न समझ लेना कि मेरा दोस्त होने के कारण इसके पास धेले की अक्ल भी है।

”अब रही सीधी बात तो यह समझों कि हमारे पास भाषा थी, अब भाषा नहीं रह गई है। एक भाषा लादी हुई जिसे हम सभी समरसता से सीख और समझ नहीं सकते इसलिए वह भाषा से अधिक दहाड़ है, कुछ कहने के लिए नहीं, आतंकित करने के लिए कि मैं अमुक भाव की अंग्रेजी जानता हूँ, वह अमुक मोल की और … आगे तुम कल्प ना से काम ले सकते हो, अक्ल नहीं है तो भी कल्पना तो होगी। अंग्रेजी इंग्लैं ड, कनाडा, अमेरिका, आस्‍ट्रेलिया आदि में कुछ बदले नामों और गुणों के साथ एक भाषा है, भूतपूर्व उपनिवेशों में एक दहाड्। इस दहाड़ की प्रतिध्वनि यह कि वह चला गया, पर उसकी जबान तो हमारे पास है, तुम तब उसके गुलाम थे, अब मेरे। न पहले उसका तुमसे और हमसे सीधा संचार था न हमारा तुमसे आज सीधा संचार है। हम विचार के लिए नहीं दहाड़ के लिए हैं और रहना चाहते हैं। इसलिए अंग्रेजी जानने वाले भारतीय संदर्भ में एक तरह के पशु हैं और जो अंग्रेजी ज्ञान से वंचित हैं, केवल अपनी भाषा के ज्ञान तक सीमित होने को बाध्य है या अभिमान बस अपनी भाषा पर करते हैं, अपनी बोली पर करता है और दोनों का फर्क समझता है, फिर भी हमने स्वतन्त्रता दिवस के बाद से…’’

मैं अपना वाक्य पूरा करता उससे पहले ही वह बोल उठा, ‘‘स्वतन्त्र ता दिवस की जगह स्वतन्त्रता प्राप्ति भी तो कह सकते थे।‘’

‘’कहता, अगर स्वतंत्रता को सभी ने स्वतन्त्रता माना होता । उसी दिन से लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि यह आजादी झूठी है और वह रट आज तक जारी है। मैं इस रट के साथ हूँ पर रट लगाने वालों के साथ नहीं, क्योंकि वे अपने को बेच कर आजादी का नारा बुलन्द कर रहे है। बिके हुओं की आजादी मोलभाव करने की आजादी होती है, समाज को उसकी बेडि़यों से मुक्ति देने वाली नहीं। इसे जहाँ पहचाना जाना चाहिए था वहॉं पहचाना नहीं गया। प्रश्ऩ यह नहीं है कि हम आजाद नहीं है, प्रश्न यह है कि हम जंगल को आदर्श मानते हैं और जंगल की आजादी चाहते हैं क्योंकि स्वतंत्रता शब्‍दों में आई, कमीनेपन, धोखाधड़ी और माले गनीमत के रूप में प्रकट हुई और उसी रूप में बनी रही और इसे बनाये रखा उस भाषा ने जो विचार की भाषा नहीं, श्रेष्ठता की दहाड़ की भाषा है। अंग्रेजी से वंचित जनों की भाषा को संचार से बाहर कर दिया गया या ऐसा हीन दर्जा दे दिया गया जिसमें भाषा भाषा न रह कर मिमियाहट बन जाती है। भाषा व्यर्थ हो गई है इसलिए बात बात पर लोग ऐक्शान में आ जाते है। शब्द संचार अवरुद्ध हो गया है इसलिए बल प्रयोग ने भाषा को स्थानान्तरित कर दिया है। अपनी भाषा के तिरस्कार के बाद समाज गूँगा हो जाता है। उसके पास आवाज होती है शब्द नहीं होते। शब्द कोशों में होते हैं और सजीव लगते हैं, हम अपने शब्दों के अनुसार आचरण नहीं करते इसलिए वे मर जाते हैं। शब्‍द अपनी क्रिया के द्वारा जीवित रहते हैं। संज्ञा का क्रिया से संबंध कटते ही भाषा मर जाती है। उसका स्थान पाशविक शक्ति प्रदर्शन ले लेता है।‘’

पहली बार उस पर मेरा प्रभाव पड़ा, ‘’यार इस तरह तो पहले सोचा ही न था।‘’

इस उम्र में भी विद्या बालन हावी हो गई, कहा, ‘’नहीं सोचा था तो अब सोचो।‘’
होली में यह भी संभव है, क्या कीजे।

Post – 2016-03-23

मेरे टाइम लाइन पर किसी भी व्‍यक्ति, दल, विचारधारा के विषय में अशिष्‍ट या अशालीन भाषा में कोई टिप्‍प्‍ाणी न करे। ऐसा करके आप मुझे अपमानित करते हैं उन्‍हें नहीं।

Post – 2016-03-22

. हिन्दी का भविष्य (१४)

“देखो, तुम स्वप्नजीवी हो। जागते हुए भी सपने देखते रहते हो। यह नहीं समझ पाते कि गणित के िनयम समाजशास्त्र में फेल कर जाते हैं।”

“सूत्र साहित्य का अध्ययन कर रहे हो शायद । अपने कथन का भाष्य करो तो कुछ पल्ले भी पड़े।”

“तुम यह नहीं देख पाते कि दुनिया को ईश्वर नहीं चलाता, उँगलियों पर गिने जाने वाले कुछ लोग चलाते हैं, जिन्होंने किसी न किसी फितरत से संपत्ति के साधनों पर कब्जा कर रखा है और वे तुम जैसे बुद्धिजीवियों को खरीदने के तरीके जानते हैं।”

“जो बिकना ही न चाहे उसे कौन खरीद सकता है, यार! जिसे धन, पद, प्रतिष्ठा किसी का लोभ न हो उसे खरीदने वाला तो अभी न पैदा हुआ, न आगे होगा।”

उसने जोर का ठहाका लगाया, “जो बिकने को तैयार रहते हैं, यहाँ तक कि जो गले में ‘फार सेल’ की तख्ती लटकाए घूमते हैं, उनको गाहक भी आसानी से नहीं मिलते यह तो बेकारों की कतार की लंबाई से ही समझ सकते हो। जो बिकना नहीं चाहता उस पर खरीदने वालों की खास नजर रहती है। वह जो दुर्लभ है वह उनके पास होना चाहिए। वह तो अमोलक हीरा है। जो दाम से नहीं खरीदा जा सकता उसे दान से खरीद लेंगे, संदान से खरीद लेंगे।‘’

‘’कम्युमनिस्टा हो, श्रमदान को संदान बोल रहे हो शायद।‘’

‘’श्रमदान नही संदान ही बोल रहा हूँ। संदान का मतलब कहीं मुक्तहस्त
दान न समझ लेना, इसका मतलब जानवर को कब्जे में करने की वह रसरी है जिससे वह छूटना चाहे तो तड़प उठे। इसे हिन्दी में नकेल कहते हैं और जानते हो गले की रस्सी से. पॉंव छानने के फन्दे और मुँह बॉंधने की जाबी और पूँछ के नीचे की रस्सी इन सभी का इन्तजाम उनके लिए है जो दाम से काबू में नहीं आते। समझ में आया, जिन्हें दाम की तलाश होती है वे इंसान होते हैं, और जो दाम की ताकत को नहीं जानते वे इन्सानों से उूपर उठने की कोशिश में इंसान नहीं रह जाते, कुछ और हो जाते है और उन्हें दान के संदान से काबू किया जाता है।
“जानते हो, अपने को अनमोल और सभी तरह की बोलियों से उूपर समझने वालों को पैसे वाले सचमुच बिना मोल खरीद लेते हैं। उसके अहं की तुष्टि करके, उसके आगे माथा रगड़ कर। आप महान हो जी, कहते हुए वे सोचते हैं पर बोलते नहीं, उल्लू अलग से क्योंकि सब को कुछ न कुछ चाहिए, आप सेतमेत बिकने को तैयार, पर बाजार से दूर अकड़े बैठे हो।‘’

मैं चाकचिक्य भाव से उसे निहार रहा था। इसकी जिह्वा पर क्याे सचमुच सरस्व ती विराजमान हो गई हैं। वह अपनी रौ में था। मेरी ओर उसका ध्याान ही नहीं था। वह इस समय पूरे जमाने से बातें कर रहा था।

‘’वे कुछ नहीं करेंगे। तुम्हारे सामने सिर रगड़ कर चले जाएंगे। तुम समझोगे तुम्हारा कुछ बना बिगड़ा ही नहीं और पूरी दुनिया को पता हो जाएगा कि तुम्हारा उपयोग कर लिया गया। और सुनो, जिस समय वह तुम्हारे सामने माथा रगड़ रहा था उस समय यदि तुमने उसे इससे विरत करने के लिए उसके सिर पर पॉंवों से ठोकर भी मार देते तो भी अपने को बिकने से बचा नहीं सकते थे। वह तुम्हारी इस चोट पर मुस्कदराता हुआ, भगवन आपके पॉवों को चोट तो न आई, कहता हुआ तुम्हारा दासानुदासवत उपयोग करने में सक्षम हो जाता। बुद्धिजीवियों के साथ सदा से यही हुआ है। खरीदने वालों के सामने दुनिया का बड़ा से बड़ा बुद्धिजीवी दिमाग से कोरा साबित होता है। ”

मुझे हैरानी हो रही थी कि नारे लगाने वाला यह आदमी सोचने कब से लगा। भीतर से खुश था कि मेरी संगत का इतना असर तो हुआ। पूछा, “तुमने एक झटके में इतनी लम्बी छलांग लगाई है कि मैं तो सोच कर हैरान हूँ कि तुम्हारा दिमाग सही हुआ कैसे? पार्टी से नाता तोड़ लिया क्या?”

“पार्टी से नाता क्यों तोड़ूँगा। तुम्हारी तरह ढुलमुल हूँ ? कल एक शास्त्री जी मिल गए थे। बड़े गुस्से में थे। तुम लोगों को बहुत गालियाँ दे रहे थे।”

“तुम लोगों का मतलब ?”

“क्षत्रियों को । और तुमको तो खास तौर से। तुम्हीं ने ‘अपने अपने राम ‘ लिखा है न। उसे पढ़ कर इतने उत्तेजित थे कि कभी चेहरा लाल होता, कभी सॉंवला पड़ जाता और सच मानो, कभी इतना काला कि लगता वह जल कर कोयले में बदल गए हैं। कह रहे थे हमारी कमाई हुई जमीन पर बाहुबल से कब्‍जा करके इन्होंने हजारों साल से हमें लगातार बेवकूफ बनाया, दर दर का भिखारी बना कर छोड़ दिया और ताली बजाते रहे, क्या त्याग, क्या तपस्या।, ‘चरणों की धूल मिल जाय वही माथे लगा लें’, और हमारे पुरखे अपने ही मुख से ‘बाभन को धन केवल भिक्षा’ और ‘ न वै ब्राह्मणाय श्री रमते’ गाते हुए झूमते दर दर की ठोकरें खाते रहे। हम अपने को ज्ञानी मान कर खुश थे जब कि हमारा उपयोग वे कर रहे थे जिन्होंने लाठी के बल पर जमीन पर कब्जा् कर लिया था। सोचते हम थे, काम उनके आता था।

‘’उन्हीं का कहना था कि सोचने वाला सबसे बड़ा बेवकूफ होता है। वह चाहे आइंस्टााइन ही क्यों न हो। बम का फार्मूला उसका सोचा हुआ, इस्तेमाल करने वाले उसका और उसके फार्मूले का इस्तेमाल कर ले गए और वह चीखता ही रह गया, मैंने इसके लिए तो नहीं दिया था यह मन्त्र । अब तुम बताओ, जो इस्तेमाल कर लिया जाता है वह ज्यादे समझदार हुआ या वह जो उसका इस्तेमाल कर लेता है। इसलिए वह कह रहे थे विचार से काम मत लो, हथियार उठाओ।‘’

‘’और फिर भी तुम इतने मूर्ख निकले कि हथियार लिए बिना ही चले आए। हथियार उठाने वालों को हमारे यहॉं क्या कहा जाता रहा है जानते हो। उद्दंड। शास्त्री जी का विचार तुम्हें इसलिए पसन्द आ गया कि तुम लोग भी उद्दंड हो। पर पूरी दुनिया में फेल इसलिए भी हो गए कि डंडा हवा और पानी को तोड़ नहीं सकता और वे इसे भी तोड़ने चल पड़े थे।

”जिसे तुम क्रान्ति कहते हो उसे हमारे यहॉं उपद्रव कहा जाता रहा है और कारण मैंने बहुत पहले बता दिया था कि यदि एक साथ किसी भी प्रकार की अपार उूर्जा का उृत्सर्जन हो जिसे नियन्त्रित करने की युक्ति का विकास नहीं किया गया है तो वह विनाशकारी होगी, वह उपद्रव का ही एक रूप होगी। जिसे तुम एक झटके में उूपर उठना या भाग्य परिवर्तन कहते हो, उसे हमारे यहॉं उद्वेग कहा जाता रहा है। इसके लिए जो क्रिया की जाती थी उसे उत्पापत कहा जाता था। तुम मुझे किसी सपने से जगाना चाहते थे या जागना, सोचना विचारना व्यर्थ है, यह समझा कर सो जाने और बिना कुछ किए सपनों में खोने की लोरी सुना रहे थे ?’’

आज वह जोश से भरा था। हार मानने की तो उसकी आदत ही न थी। बोला, ‘’देखो, तुम जो यह सोचते हो कि किसी दिन तुम्हारी योजना किसी व्यक्ति या दल की समझ में आ जाएगी और वह इसको एक बड़ा मुद्दा मान कर आन्दोलन छेड़ देगी और तुम्हारा सपना सचाई में बदल जाएगा, तो यह समझो कि सताए हुए लोगों के संख्याबल से इतिहास बदल सकता तो कम से कम सभी लोकतांत्रिक देशों में समाजवाद तो आ ही गया होता। आया कहीं ?’’

‘’नहीं आया, न जैसा मैंने कहा, अपने चरण से पहले आ सकता है। आएगा, जब पूँजीवाद अपनी सर्जनात्मकता खो देगा, भीतर से खोखला हो जाएगा, वह केवल उत्पीड़न का साधन बन जाएगा। उसके बाद भी जिनके हाथ में हथियार हैं जो हथियार के ही कारोबार को सबसे अच्छा व्यापार समझते हैं, वे हथियार के बल पर दूसरों का विनाश करते हुए पूँजीवाद को बचाना चाहेंगे, पर सब कुछ बेकार जाएगा। जब संस्था या व्यवस्था भीतर से निसत्व हो जाती है तो हथियार बनाने वाले हाथ बेजान हो जाते हैं, हथियार उठाने वाला हाथ और दिमाग सुन्न हो जाता है।

‘’जहॉं तक भाषा का प्रश्न है, अंग्रेजी की सर्जनात्मकता चुक गई है, इसने ऐसा एक भी दिमाग नहीं पैदा किया जो अपनी मात़ृषाओं के माध्यम से शिक्षित होते हुए पुरानी शिक्षा प्रणाली के हमारे चिन्तकों की समकक्षता में आ सकें। हमें ज्ञान, विज्ञान, समाजदर्शन, साहित्य सभी क्षेत्रों में दृष्टान्त के लिए उस जमाने के लोगों को याद करना होता है। क्यों ? क्योंकि अंग्रेजी के वर्चस्व् वाली इस शिक्षाप्रणाली ने हमें भीतर से नि:सत्व कर दिया है। अब यदि तुम्हेंं नोबेल मिलता है तो यह प्रमाणित करने के लिए कि भारत एक पिछड़ा देश है जिसमें बाल मजदूरों से काम लिया जाता है इसलिए वहॉं का माल आयात करना बालकों के प्रति क्रूरता को बढ़ावा देना है। पाकिस्तान को इसलिए कि यह दिखाया जा सके कि वहॉं लड़कियों को शिक्षा से वंचित करने के लिए किस सीमा तक क्रूरता बरती जाती है, किसी महान आविष्कार या चिन्तन या अनुपम उपलब्धि के लिए नहीं।”

‘’बड़े गावदी हो यार। क्या तुम इस सचाई से भी इन्का्र करते हो कि भारत में आज तक बाल श्रम जारी है और पाकिस्ता्न में स्त्रियों की शिक्षा को हतोत्साहित किया जाता है?‘’

‘’इन्कार नहीं करता, बल्कि यह बताता हूँ कि यह भी अंग्रेजी में शिक्षा का ही परिणाम है। यह शिक्षा उन कोनों, दरबों, स्तरों तक पहुँच नहीं सकती जिनमें सड़ने वाले लोग अपने बच्चों को पढ़ाऍं तो भी पढ़ा नहीं सकते इसलिए मैदान में उतरते ही जंग हार जाते हैं। वे जानते हैं कि इस देश में जहॉं अंग्रेजी का वर्चस्व है, वे लाख जतन करे, शिक्षा में आगे नहीं बढ़ सकते। अन्त में जिन्दा रहने के लिए वही काम करना पड़ेगा जो अब तक करते आए हैं। पाकिस्तान की बात अलग है और पूरे पाकिस्तान में यह स्थिति नहीं है। मैं उसके बारे में इतना कम जानता हूँ कि कुछ कहना नासमझी होगी, फिर भी इस सन्देश को पढ़ना कठिन नहीं है कि इन दोनों का साहस और त्यााग से, दृढ़ संकल्पन से जितना भी संबंध हो, असाधारण बौद्धिक उत्कर्ष से कदापि नहीं। उल्टे यह बौद्धिक खालीपन का दस्तावेज है और इसके पीछे है अंग्रेजी की वरीयता जिसने हमें बड़े सपने देखने तक से वंचित कर रखा है।

‘’तुम अपनी जिस महरी की बात कर रहे थे, उसकी तड़प को देखो। वह बिना कुछ बोले चीख रही थी कि हमें अपनी संतानों को अपनी दशा में नहीं रखना है। इसके लिए हम कुछ भी कर सकते हैं। और फिर इस माध्य म के कारण उसकी थकान और पराजय की कल्पना करो। अंग्रेजी के साथ वह ऐतिहासिक चरण आ गया है जहॉं इसने उपनिवेशों या कहो उन देशों के लिए अपनी नि:सारता प्रमाणित कर दी है कि इससे देश का वर्तमान बदहाली की दिशा में बढता आया है और भविष्य में यह इस शिक्षा और ज्ञान व्यवस्थाा के बल पर चल नहीं सकता । वह निर्वात उसने अपने आप तैयार किया है और आवश्यकता इसे भरने वाली एक पहल की है। 22.3.2016

Post – 2016-03-19

हिन्दी का भविष्य (१३)

“तुम भाषा पर बात करते हुए सभ्यता पर पहुँच जाते हो, सभ्यता से उछल कर धर्म चर्चा करने लगते हो, तुमसे किसी बात पर चर्चा की जा सकती है?”

“बातचीत भी अगर क्लास लेक्चर की तरह होने लगे तब तो परीक्षा प्रणाली पर भी विचार करना होगा । तुम्हें तो यह भी भूल गया कि इस भटकाव की जिम्मेदारी भी तुम्हीं पर आती है। तुमने अंग्रेजी के विस्तारवाद की हिमायत करते हुए स्वयं मेरे किसी अन्य सन्दर्भ में ट्वायन्बी के जुमले जड़ दिए और वह भी यह भूलते हुए कि वहीं पणिक्कर के हवाले से मैंने इस सर्वग्रासी विस्तार की निस्सारता को भी रेखांकित किया था।
मुझे बीच बीच में तुम्हें यह याद दिलाना भी जरूरी लगता है कि विदेशी भाषा तो हमारे काम की है ही नहीं, उसमें उपलब्ध ज्ञान-भंडार भी हमारे काम का नहीं होता। यह भी याद दिलाना चाहता था कि जो समाज अपनी भाषा में काम नहीं करता, वह अपने ज्ञान का उत्पादन भी नहीं कर सकता। वह याचक बना रहेगा और इसी पर गर्व करेगा। साथ ही यह भी कि परायी भाषा में तुम्हारे द्वारा उत्पादित ज्ञान भी घटिया स्तर का होता है, क्योंकि परायी भाषा को साधने में ही तुम्हारी अपार बौद्धिक ऊर्जा बर्वाद हो जाती है और तुम यह आतंक पैदा करने में भले सफल हो जाओ कि ज्ञान का अकूत भंडार जिस भाषा में भरा पड़ा है उस तक सीधी पहुँच के कारण तुम्हारी जानकारी भी उनसे अच्छी होगी जो उस भाषा को धड़ल्ले से बोल और लिख नहीं पाते, परन्तु तुम्हारी दुर्गति का हाल होगा कि तुम यह तक नहीं जान पाओगे कि तुम्हारी मातृभाषा में क्या लिखा जा रहा है या दूसरी भारतीय भाषाओं में क्या लिखा जा रहा है। उसे जानने के लिए तुम उसके अंग्रेजी में अनूदित होने की घड़ी तक प्रतीक्षा करोगे। तुम्हारी यह जानने में कोई रुचि शायद ही रह जाय कि तुम्हारे देशज ज्ञानमंडार में पहले से क्या सुलभ है, या तुम्हारे आसपास के लोग कैसे रहते हैं, क्या सोचते हैं, किन समस्याओं का सामना कर रहे हैं । और अंग्रेजी में जो कुछ तुमने पढ़ा है और जिसके गरूर में तुम्हारी गर्दन की अकड़ से सर्वाइकल स्पांडेलाइसिस का भरम होने लगता है वह उस साहित्य और ज्ञानसंपदा का अहोअहोवादी पाठ होगा जो दिमाग को काठगोदाग बना देता है पर मन्थन का कठाला नहीं।
यह उन कारणों में से एक है कि पाश्चात्य मान्यताओं को बदलने या समृद्ध करने में हमारा कोई योगदान नहीं है। अंग्रेजी में लिखने वाले भारतीय लेखक या बिलायती काट की रचना अपनी भाषा में करने वाले लेखक भारत में अंग्रेजी के बाजार भाव के कारण कीमती ही नहीं, कभी कभी दुर्लभ होने तक का भरम भले पैदा कर लें, पर जिस भाषा में वे लिखते हैं उन देशों में उनको अपने काम का समझ कर रियायत दी जाती है, महत्व नहीं।
पुरस्कारों पर मत जाना, ये उपयोगी मान कर दिए गए चारे हैं, जो पालतू बनाए रखने के लिए बहुत सूझ-बूझ से दिए जाते हैं और इनके पीछे कई तरह के सन्देश होते हैं और उन संदेशों की कई तरह की अन्तसर्ध्वंनियॉं होती हैं जिनका विविध स्तरों पर कूटनीतिक से लेकर हाय बेचारे ऐसे हैं, इतने जाहिल, इतने पिछड़े इतने भ्रष्ट और इनका एक उपयोग मिशनरी फंडिंग के लिए भी होता है। इन बेचारों के उद्धार के लिए कुछ करना जरूरी है और जो उद्धार में जुटे हुए हैं उनकी मॉंगे पूरी करना ईसाइयत के लिए न सही मानवीयता के लिए जरूरी है।
वे केवल सामाजिक नृतत्व के उन पहलुओं को उभारते हुए लिखी गई साहित्‍य सर्जना या पत्रकारिता होती है जिसे पिछड़ेपन और गिरावट से अलग कुछ दिखाई नहीं देता। यदि अधिक उत्तेजक वर्तमान में नहीं मिलता तो अतीत से निकाल कर बताओ कि कभी ये इतने गर्हित थे और इसे समय काटने के लिए शिथिल क्षणों में पढ़ने वाले मान लेंगे कि ये आज भी ऐसे हैं। इससे यूरोपीय श्रेष्‍ठताबोध को खूराक मिलती है और आप को अकूत सराहना जो एक कृति के रूप में उसे नहीं मिल सकती।
सती प्रथा कब की खत्म हो गई और उसके प्रति श्रद्धा निवेदन तक को अपराध बना दिया गया, पर फायर बननी चाहिए, इसलिए भारतीय भाषा में नहीं अंग्रेजी में बननी चाहिए। देवदासी प्रथा उसी का पाठान्तर था और ये दोनों उस बंगाल से जुड़ी थीं जो कई मामलों में आत्मनिरीक्षण करने से कतराता रहा है, पर वाटर बननी चाहिए, क्योंकि पश्चिम में इसका बाजार है, सत्कांर है और भारत में भी अंग्रेजी दिमाग वालों को इस पर आपत्ति करने वाले जाहिल लगने लगते हैं।

आज जब सभी मतों, संप्रदायों, वर्णों और जातियों के विपन्न और तिरस्कृत लोगों को यह चेतने का समय है कि जहॉं प्राणरक्षा तक समस्या है वहॉं अंग्रेजी सीखना उनके लिए असंभव है और इसलिए उनको उस भाषा की अस्मिता के लिए लड़ना है, उसके सशक्तीवकरण के लिए एकजुट होना है जिसके बिना उनके आगे के रास्ते टुकड़े बीनने और गिनने से आगे नहीं जा सकते। चालाक लोग जघन्य तरीकों से इतिहास में से कहानियों के एकलब्य और शंबूक और संविधान के आने के साथ ही अभिलेखागार की वस्तु बना दिए गए ग्रन्थों को उन तबकों के मेधावी तरुणों को ऑंखों के सामने आग के अक्षरों में पेश करते हुए उनकी उूर्जा को नष्टं करने और पूरे समाज को पीछे ले जाने वाले उपद्रवों का हिस्साे बनाने में सफल होते हैं और हमारे बुद्धिजीवियों के बौद्धिक बधियाकरण का यह हाल कि वे इन्हें क्रान्तिकारी कदम बताने के तरीके और तर्कजाल तैयार करने लगते है – मंच से ले कर मचिया तक इस्तेिमाल किए जा रहे जज्बातती छोकरों को अपराधी सिद्ध करने या बचाने के पक्ष विपक्ष में बहस करते दिखाई देते हैं। बौद्धिक बधियाकरण के ऐसे आश्चर्यजनक नमूने हमारे समाज में इसलिए उजागर हो रहे हैं क्योंकि इसका सोचने का नाटक करने वाला और विचारों का प्रचार करने वाला तन्त्र अंग्ररेजी जानता है पर अपने देश को नहीं जानता, अपने आप को नहीं जानता, उन खतरों को नहीं जानता जिनसे खेलने के लिए भी उनकी पहचान जरूरी है। यह इस बात का भी मानदंड हो सकता है कि अंगरेजी हमें समझदार बनाती है या हितबद्ध
और दुर्भाग्य से शिक्षा और ज्ञान की भाषा अंग्रेजी बना दी जाने के कारण, इन स्रोतों पर पलने और इनसे ही अभिज्ञ होने वाले अपनी शिथिलता में मान लेते हैं कि जब इतने समझदार लोग ऐसा कहते हैं तो ठीक ही कहते होंगे। इस दबाव में अनपढ़ नहीं आता और इसलिए परीक्षा की घडि़यों में वह इन बधिया विचारकों को चकित करते हुए अपने निर्णय देता है और तब इनकी समझ में आता है कि वे गलत थे, अनपढ़ भारत सही था।

जहाँ तक भारतीय बोलियों में अंग्रेजी के शब्दों के प्रवेश की बात है, वह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। यदि अंग्रेजी शिक्षा को भारतीय भाषाओं से अधिक महत्व दिया जाएगा, लोग शैशव से ही अपनी संतान को शिक्षित करने के नाम पर उसके शब्द, अंक आदि सिखाने और एक खास अर्थ में उन्हें उत्पीड़ित करने लगेंगे और उनकी प्रतिभा का विकास करने की जगह उनको रट्टू तोता बनाना आरम्भ करेंगे। शिशु को सबसे पहले नाते रिश्ते के लोगों से पाला पड़ता है अतः ऐसे परिवारों में और उनके माध्यम से दूसरों के बीच भी इनकी स्वीकार्यता बढ़ेगी। यही क्रम संख्या और दिनों, महीनों के नाम के मामले में बना रहेगा। ज्ञान या शिक्षा की भाषा बदलते ही स्थिति उलट जाएगी। कहो, यह अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव के कारण नहीं है, अपितु हमारे द्वारा स्वयं अपनी भाषाओं की उपेक्षा के कारण है।

पहली बात यह समझो कि अंग्रेजी से मुझे कोई दुराव नहीं है, प्रश्न है कि क्या हम उसे पूरे देश की बोलचाल की, सामान्य व्‍यवहार की भाषा बना सकते हैं। नहीं। भाषा का निर्णय समाज का विपन्न वर्ग करता है। बाजार की भाषा न कि पंडितों की भाषा को किसी क्षेत्र की भाषा माना जाता है। यदि किसी चमत्कार वश समस्त भारतीयों का आर्थिक स्तर ऐसा होता कि वे सभी उन कारोबारी शिक्षा संस्थानों में समान स्तर पर भरती हो कर अंग्रेजी सीख पाते और आर्थिक स्तरों के अनुसार अंग्रेजियॉं न होतीं, बिकाउू माल की सड़ी गली से लेकर ताजी और बासी और खरी और खोटी के अनगिनत स्टाल न लगे होते, तो अंग्रेजी से अभिभूत यह देश कभी का समग्रत: अंग्रेजी भाषी बन चुका होता । भारतीय भाषाओं को विपन्नों ने बचा रखा है, संपन्न लोग तो उसे कभी के छोड़ चुके हैं।
रहीम का वह दोहा याद है
सर सूखे पंछी उड़ें औरे सरहिं समाहिं।
दीन मीन बिनु पंख के कहु रहीम कित जाहिं।
पंख वाले उड़ कर अंग्रेजी के सरोवर में बहुत पहले से बिहार करने पहुँचने लगे थे। याद है बिग बी अर्थात् तेल बेचने वाले बच्चन के पिता छोटे बी अर्थात् हरिवंशराय ने जो हर हिन्‍दी भाषी की जबान पर चढ़ना चाहते थे, अपनी संतानों को अंगेजी के हवाले कर दिया और इतने बड़े कवि के इस चुनाव ने पैदा किया तेलमालिश करने वाला पैसे का भूखा कलाबिक्रयी, जो काम हिन्दीे के कवि छोटे बी अर्थात् हरिवंशराय बच्चेन कभी नहीं कर सकते थे। हिन्दी ने हमें एक स्वा्भिमानी कवि दिया था और अंग्रेजी ने उसकी संतान को कलाकार तो बनाया पर तेलमालिश करने की गिरावट तक पहुँचा दिया।

हमें अपना सम्मान तो चाहिए ही, यह समझ भी होनी चाहिए कि भाषा को एक अर्थशास्त्रीय मिट्टी, खाद और पानी ही नहीं पर्यावरण भी अपेक्षित होता है। नागरिकों की सभी विशिष्टाताओं से निरपेक्ष समानता का गीत गाने और अवसर की समानता का दम भरने के लिए सभी को एक भाषा सुलभ कराओ, वह अंग्रेजी ही क्यों न हो, मुझे आपत्ति नहीं। इसके लिए आर्थिक समीकरण या अभावग्रस्त,, स्वा्वलम्बी और सुविधासम्पनन्न के आर्थिक भेद को मिटाना होगा। वह तुम कर नहीं सकते इसलिए अल्पतम समाधान यह है कि हमारी भाषाओं की खोई हुई गरिमा को बहाल करो, इनके ज्ञान और अवसर की पराकाष्ठाओ तक पहुँचने का रास्ता खोलो, जो अंग्रेजी के वर्चस्ब के रहते संभव नहीं और यह अंग्रेजीप्रेस और उससे हितबद्ध लोग है जो हमारे ओजस्वी तरुणों को वर्तमान से उठा कर इतिहास में फेक दे रहे हैं और वे इस साजिश को समझ तक नहीं पा रहे है। लम्बी है भ्रम की रात मगर रात ही तो है।

Post – 2016-03-16

हिन्दी का भविष्य (१२)

“तुम केवल उतनी बात समझते और याद रखते हो जिससे तुम अपनी मान्यता पर अड़े रह सको। मैंने जब ट्वाएन्बी की बात की थी तो यह भी कहा था कि वह ईसाइयत से आसक्त थे और इसके कारण उनका सभ्यता-विमर्श गड़बड़ हो गया, यह आलोचना उनके महाग्रन्थ के प्रकाशन के बाद ही आने लगी थी। उनकी पहली नासमझी तो यह थी कि वह धर्म को सभ्यता मान बैठे और उन धर्मों की जीवन्तता की बात करने लगे जो अपने विस्तार के लिए हिंसा का सहारा लेते रहे हैं और जिनका कोई दार्शनिक आधार नहीं ह़ै इसलिए जो विश्वास या फेथ पर आधारित हैं। हिंसा और अतर्क्यता दोनों सभ्यता द्रोही हैं और इसलिए हिन्दू धर्म में आत्मनिरीक्षण, समायोजन, परिवर्तन और पुनराविष्कार की इतनी क्षमता है कि आए दिन नई व्‍याख्‍यायें और आन्‍दोलन जगह पाते रहते हैं। बिना किसी के साथ छेड़छाड़ किए भी यह इतना शक्तिशाली लगता है कि इसके संपर्क में आने वाले सामी विश्वास के लोगों को घबराहट होती है कि यह हमारी मूल्य व्यवस्था को बदल कर पूरा का पूरा हजम कर जाएगा। यह दहशत ही इस बात का प्रमाण है कि मूल्यव्यवस्था के मामले में ये सभी हिन्दुत्व के सामने अपने को लचर पाते रहे हैं और इसलिए उन्होंने आत्मरक्षा के लिए प्रतिलोम मूल्यों का सहारा लिया है। हिन्दू गाता है ईश्वर अल्ला‍ तेरे नाम सबको सम्मति दे भगवान। वह अपने सर्वोपरि को दूसरे मत के सर्वोपरि देव के समकक्ष मान कर उसका भी सम्मान करता है, और यह दूसरे के मन मे बेचैनी पैदा करता है, क्योंकि यह उसके कट्टर विश्‍वास ‘ला इलाह इल अल्लाह’ या अल्लाह के अतिरिक्त कोई सर्वोच्च सत्ता है ही नहीं। फिर अल्लाह से इतर ईश्वर कैसे हो सकता है। अल्लाह, या गॉड या याह़ू अपने कबीलों के सरदार के रूप में कल्पित किए गए, क्योंकि वे उस विश्वास से जुड़े कबीलों के परमेश्वर हैं जिनके अमल में दूसरे मानव समुदाय नहीं आते, जिनकी अंतिम कसौटी अन्धविश्वास है, न कि नैतिक आधार, जिस दशा में किसी भी धर्म या विश्वास का असाधारण प्रतिभाशाली या सदाचारी या लोकोपकारी व्‍यक्ति सम्मान का अधिकारी हो पाता। इसी तर्क से ‘ला इलाह इल अल्लाह’ में अंधविश्वास रखने वाले मुहम्मद अली ने अल्ला ईश्वर तेरे नाम का पाठ पढ़ाने वाले गॉंधी को गिरे से गिरे हुए मुस्लिम से हेय बताया था और इस पर आपत्ति करने वालों को गांधी जी ने रोक दिया था। वह जानते थे कि एक सच्चा मुसलमान होने के नाते वह इसके अतिरिक्त कुछ कह ही नहीं सकते थे। मुसलमान मुसलमान होने के कारण अपनी सारी बुराइयों के बाद भी अल्लाह का बन्दा है, जो उस अल्लाह में यकीन नहीं करते और इसलिए इस कबीलाई सल्तनत से बाहर हैं और इसलिए शैतान के असर में हैं, और अपनी समस्त अच्छाइयों के बाद भी गांधी शैतान के असर में होने के कारण अल्लाह के गुनहगार बन्दे की बराबरी पर कैसे आ सकते थे।

” यहाँ यह याद दिला दें कि मुहम्मद अली और शौकत अली अनपढ़ धर्मान्ध नहीं थे। नेहरू, गॉंधी आदि की तरह उन्होंने भी विलायत में शिक्षा प्राप्त की थी और प्रभावशाली इतने थे कि कहते हैं उनके कहने पर ही मुहम्मंद हबीब ने इतिहास की ओर रुख किया था क्योंकि इसी के माध्यम से कौमों के दिमाग को काबू में रखा जा सकता और इच्छित दिशा में चलाया जा सकता है और केवल परिस्थिति जन्य प्रमाण के आधार पर हम इस नतीजे पर पहुँच सके कि उन्‍होंने ही बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से निष्कासित और तुनुक मिजाज कोसंबी को गणित के क्षेत्र से इतिहास की ओर मोड़ने और ब्राह्मणवाद के विरोध की आड़ में ब्राह्मणों पर, प्राचीन भारत के इतिहास पर, जड़ें खोदने वाली लगन से, काम करने को प्रेरित किया था।

यहॉं मैं जिस बात को रेखांकित करना चाहता हूँ, वह यह कि इन उदाहरणों से हम समझ सकते हैं कि असाधारण पांडित्य भी धार्मिक या मतवादी पूर्वाग्रहों से हमारे विश्‍लेषण को मुक्त नहीं कर पाता और जिस दहशत में उन्नीेसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में मिशनरियों ने हंगामा मचाया था कि कंपनी के अधिकारी हिन्दू होते जो रहे हैं और जिसके कारण कुछ, मिसाल के लिए ऋग्वेद के अनुवादक एच.एच. विल्सन, के प्रति संदेह इतना गहरा था कि यह प्रचारित किया जाता था कि वह कहने को ईसाई है परन्तु हिन्दू हो चुका है और छिपा कर जनेउू पहनता है।

ऐसे अंग्रेज उस समय थे जो हिन्दू मूल्यों और शास्त्रों से परिचित होने के बाद ईसाई प्रचारकों को गाली देते हुए कहते थे कि यह समाज हम से अधिक सुसंस्कृत रहा है और यह अपने मूल्यों के मामले में आज भी हमसे आगे है और इसे ईसाइयत की जरूरत नहीं। मैक्नााटेन ने इन प्रचारकों के लिए these ignorant and bigoted missionaries के विशेषण का प्रयोग किया था। आत्मरक्षा की चिन्ता और अपनी श्रेष्ठता को कायम रखने की जिद से इन मिशनरियों की रपटों को ही आधार बना कर और देश देशान्तर से नमूने जुटा कर उस अग्रता को नकारने के दृढ़ संकल्प के साथ जेम्स मिल ने अपना इतिहास लिखा था और ट्वाएन्बी भले उनसे ढाई सौ साल बाद के इतिहासकार हों, दोनों का मिजाज एक है और ट्वाएन्बी अपने बृहदाकार ग्रन्थ के बाद भी भारतीय इतिहास के मामले में जेम्स, मिल के सामने छोटे दिखाई देते हैं और इसलिए मिल से कुछ कम विक्षिप्त, परन्तु अपने निष्कर्षो में निहायत सतही।‘’

‘’तुम्हें सुनते हुए मैं सोच रहा था कि जैसे मुहम्मद अली पर इस्लाम, मिल और ट्वाएन्बी पर ईसाई पूर्वाग्रह उनके निर्णयों को प्रभावित कर रहे थे, उसी तरह हिन्दुत्व के प्रति तुम्हारी आसक्ति क्या तुम्हारे तर्कों, प्रमाणों और निष्कर्षों को प्रभावित न कर रही होगी।‘’

‘’तुमने तो अपने बारे में मेरी समझ ही बदल दी। पहले तुम्हें कमाल की चीज़ समझता था, तुम तो कमाल के आदमी निकले। फिर भी आधे अधूरे ही, क्योंकि तुमने मेरी इस आशंका को इतने बाद मुखर किया पर अहसमति का कारण और प्रमाण नहीं दिया। मैं इतने लंबे समय से यह संकेत देता आ रहा हूँ कि मेरी बात सुनने वाले अनुमोदन में सिर हिलाऍं तो मेरा विश्वास बढ़ता है, वे मेरी तारीफ करें तो अच्छा तो वह भी लगता है, पर उससे अधिक तारीफ तो मैं अपने लिखने के साथ या उस क्षण में ही कर लेता हूँ, इसलिए उससे केवल प्रसन्नता बढ़ती है मिलता कुछ नहीं है। केवल आलोचना, वह निन्दा के स्तर तक पहुँच जाए तो भी, हमें सजग बनाती है। मैं कितनी बार कह आया कि हमारे इस संवाद का आशय अपने को सही साबित करना नहीं अपितु तर्क और प्रमाण के साथ अपना पक्ष रखने की आदत डालने और अपने पाशविक आवेग को नियन्त्रित करने का है जिससे हम अपने को नियन्त्रित करते हुए स्वयं को और समाज को अधिक मानवीय बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकें। परन्तु जो मैं कहना चाहता था कि ‘हम दबोच में आ गए हैं और अगला हमें खा जाएगा’ वह गलत है, और उस पर तो बात हो ही नहीं पाई।‘’

‘’तुम जैसा आधे दिमाग का आदमी न कभी अपनी बात पूरी कर सकता है न ही दूसरे की बात पूरी तरह समझ सकता है। चलूँ?”

उसने मेरे उत्तर की प्रतीक्षा भी नहीं की और उठ खड़ा हुआ।

Post – 2016-03-15

हिन्दी का भविषय ११

“तुम हर चीज को ऐसा मजाक बना देते हो कि न हँसते बनता है न रोते बनता है।”

“क्यों, क्या हो गया कि हँसने और रोने के अलावा कोई तीसरी गति दिखाई नहीं दे रही?”

“तुम जब हिन्दी के रथ पर सवार होकर दिग्विजय पर निकले थे तो मैं सोच रहा अब बेचारी अंग्रेजी का क्या होगा? पर घर लौटा तो पाया मेरी महरी पत्नी से दो सौ ऐडवांस माँग रही है, उसे अपनी लड़की की अंग्रेजी स्कूल की फीस भरनी थी। समझ में आया अंग्रेजी का विजयरथ कहाँ तक पहुँच चुका है?”

“अंग्रेजी का तो जो होगा, होगा, पर तुम जैसों का क्या होगा उसके बिना, यह सोचता हूँ तो तकलीफ होती है। तुम्हें याद है हमारे एक बहुत प्यारे साहित्यकार थे, पिछले चुनाव से ठीक पहले उन्होंने घोषणा कर दी, ‘यदि अमुक प्रधानमंत्री बन गया तो वह इस देश में नहीं रहेंगे। सभी लोग जो उनसे प्यार करते थे घबरा गए कि अब उन जैसे ऊँचे दरजे के साहित्यकार को बचा कर रखा कैसे जाय, क्योंकि जीत तो वही व्यक्ति रहा था । दोनों में से किसी को टाला नहीं जा सकता था, न उनकी प्रतिज्ञा को, न इसकी जीत को। उन्हें किसी दूसरे देश से आमन्त्रहण नहीं मिला तो या शायद यह सोच कर कि जिस धरती पर ऐसा नालायक शासक बना बैठा हो उस धरती को ही छोड़ देना अपने चरित्र के अनुरूप है, उन्होंने धरती ही छोड़ दी। तुम भी इरादे के कम पक्के तो हो नहीं । कहीं यह घोषणा न कर देना कि अंग्रेजी न रही तो जान दे दोगे पर भारतीय भाषाओं की उन्नति नहीं झेल पाओगे । आखिर तुम्हारे हित भी तो अंग्रेजी और आन्तरिक उपिनवेशवाद से ही जुड़े हैं।”

“लगता है बहुत गहरी चोट लगी तुम्हें, मेरी सूचना से । इससे तुम इतने निष्ठुर हो गए कि एक मृत व्याक्ति का उपहास करने तक पर उतारू हो गए। पहले पता होता तो छिपा गया होता ।”

‘’देखो, जन्म और मृत्यु अटल है। मृत्यु पर मृत व्यक्ति के अभाव की पीड़ा और उसके साथ समवेदना हमारी मानवीयता को प्रकट करता है, परन्तु मर जाने के कारण समझदार या लगभग समझदार लोगों के वचन आप्त हो जाते हैं, या उनकी मूर्खताओं का भी महिमामंडन किया जाना चाहिए, यह मेरी समझ में नहीं आता। और यह तो बिल्कु ल समझ में नहीं आता कि कोई जीवित व्यक्ति अपने आचरण से उसी तरह की मूर्खता करता दिखाई दे और उसे बचाने का प्रयत्न न किया जाय, जो मैं तुम्हारे सन्दर्भ में कर रहा था।

“तुम्हें अपनी महरी की लड़की की फीस के पैसे दिखाई दिये पर वह कफन दिखाई नहीं दिया जिसकी बुनावट पूरी होने को आ गई है और उसका एक तार उसके फीस के पैसे का था?”

“मरने के दिन तो भारतीय भाषाओं के आ रहे हैं, भाई। तुम्हें पता है हमारी बोल-चाल की भाषा तक में अंग्रेजी के शब्द किस तरह भरते चले जा रहे हैं? लोग नाते रिश्ते के शब्दों तक में जिन्हें आधारभूत शब्दावली मे गिना जाता है अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करने लगे है – आंटी, अंकल, डैड, पापा, हस्बैंड, ब्रदर, सिस्टर, कजिन, नेफ्यू, सन, ग्रैंडसन- अपने आत्मीय शब्दों का स्थान लेते जा रहे हैं। यह हाल कमोबेस सभी भारतीय भाषाओं का है। लोग संवत, महीनों और दिनों के नाम और पहचान भूलते जा रहे है। सावन का महीना, भादों की रात, चैत की चाँदनी, जेठ की धूप, पूस का जाड़ा, माघ की ठिठुरन मुहावरों में बचे रह गए हैं, और एक दिन ये मुहावरे भी व्यर्थ मान लिए जाऍंगे। लोग महीनों का नाम जानते है पर यह नहीं जानते कि कौन सा महीना कब शुरू हुआ और आज कल कौन सा महीना चल रहा है। तुम्हारे पढ़े लिखे समाज का आधा से अधिक हिस्सा मानसिक रूप ईसाई मूल्यों से अनुकूलित हो चुका है और हिन्दू शब्द तक से घबराहट अनुभव करता है जैसे यह दिमागी पिछड़ेपन का ही नहीं बर्बरता का सूचक हो और इसी मे यदि किसी ने हौसला बढ़ाने के लिए नारा लगा दिया कि ‘गर्व से कहो मैं हिन्दू हूँ’ तो उस आधे शिक्षित समाज को जो आधा हिन्दू रह गया है, परन्तु पूरे हिन्दुत्व की रक्षा का दम भरते हुए दूसरों को लताड़ता है, सुनाई देता है ‘गर्व से कहो मैं बर्बर हूँ’।

“भाषाएँ, सभ्यताएँ, समाज किस तरह दबाव मे आते हैं और किस तरह अपने बचाव के लिए छटपटाते हैं और किस तरह अशक्त होते हैं और फिर मरणासन्न होते हैं उसका यह जीता जागता नमूना है । तुम्हें याद है, तुम्हीं ने एक दिन सभ्यताओं के टकराव पर ट्वायनबी के ऐन आइडिया आफ हिस्ट्री के दो सूत्र समझाए थे जिनमें पहला था कि हिन्दू सभ्यता परिपक्व सभ्यता है जिसका अर्थ था इसकी जिजीविषा चुक गई है। इसके विस्तार और विकास की संभावना समाप्तप्राय हैं और उसका संकेत था कि यह मरणासन्न है या उसकी कगार पर है। दूसरा यह था कि जब किसी दबंग सभ्य ता का सामना किसी दब्बू सभ्यता से होता है तो वह अपनी रक्षा के लिए रूढिवादिता का सहारा लेती है; फिर भी अपने को सँभाल नहीं पाती तो दबंग सभ्यता के सबसे निरापद प्रतीत होने वाले किसी तत्व को अपनाती है। परन्तु किसी सभ्य ता की एक आवयविकता होती है, उसका कोई तत्व जब दूसरी में प्रवेश करता है तो उसमें अपने मूल्यों और जीवनशैली के लिए स्थाान बनाता है और इस तरह उसे भीतर से तब तक तोड़ता चला जाता है जब तक वह पूरी तरह समाप्त न हो जाए । इन दोनों तर्कों से जो परिणाम सामने आता है उसको समझो और इस आशावाद से बचो, नहीं तो ‘हिन्दीे आ रही है, भारतीय भाषाऍं अपनी अस्मिता पहचान रही है और वर्चस्व के लिए जंग लड़ रही हैं’ कहते हुए तुम पागल हो जाओगे और मैं तुम्हारी मदद नहीं कर पाउूँगा और इसका अफसोस मुझे जिन्दगी भर बना रहेगा।‘’

‘’यार मुझे तो सूरदास की इस पंक्ति का अर्थ ही समझ में नहीं आता था, ‘दादुर बसत निकट कमलन के तनक न रस पहचानें’। आज पता चला कि इतने लंबे समय तक मेरे साथ रहते हुए भी तुम मूर्ख के मूर्ख कैसे रह गए। पहले अपने पर अफसोस होता था कि मैं अपनी बात ठीक से समझा नहीं पाता, अब उस विचारधारा पर होता है जिसने तुम्हें आदमी से दादुर बना दिया। टर्राने की आदत डाल दी पर समझने का कोना खाली कर दिया।‘’

‘’चकमा मत दो, तर्क और प्रमाण देते हुए बात किया करो। यह शर्त तुमने ही रखी थी, याद है।‘’

‘’तुम इतने विलम्बसे मेरी यह बात समझ सके कि पराभव के बोध के बाद ही अभ्युदय का संकल्प पैदा होता है। तुम तो गुप्त जी की उन पंक्तियों तक को भूल चुके हो, ‘हम कौन थे/ क्या हो गये हैं/ और क्या होंगे अभी। आओ विचारें/ आज मिल कर/ ये समस्यायें सभी।‘ तुम इतने गोबर-धन निकले कि अपनी उस पैरोडी तक को भूल गए जिससे आत्मबलिदािनयों की पीढियाँ पैदा हुई थीं।

सुनो, आस पास के लोग शिकायत करते हैं कि ये दोनों बूढ़े थकते भी नहीं है, बकवास इस अन्दाज से जारी रखते हैं मानो दर्शन बघार रहे हैं इसलिए आज की बात बन्द पर कल फैज की कुत्ते शीर्षक कविता कहीं मिले तो पढ़ना, खास कर उनकी ये पंक्तियॉं ‘कोई इनको अहसासे जिल्लत दिला दे/ कोई इनकी सोई हुई दुम हिला दे। बाकी की पंक्तियॉं वाहियात है और भावोच्छ्वास हैं इसलिए उनमें सकारात्मक कुछ न मिलेगा। परन्तु आशा की किरण इस अहसासे जिल्लत से ही फूटती है। अन्यायी व्युवस्था के कफन के धागे यहीं तैयार होते हैं जिसे मैं देख रहा हूँ तुम नहीं देख पाते।‘’