मैं बहुत क्षोभ, ग्लानि वेदना केॆ साथ इस पोस्ट को शेयर कर रहा हूं क्योकि अपने को इनसेक्योर मानने वाले मित्रों की तरह मैंं भी प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित को दोषी मानता था और मान बैठा था कि बीजेपी के हस्तक्षेप से अदालतों को प्रभावित कर के उन्हें निर्दोष सिद्ध किया जा रहा है। आज सुबह प्रज्ञा ठाकुर की यातना कथा पढ़ी थी, पुरोहित की कहानी यहां है। कोई इनको पढ़ कर यह तो बताए कि ये अपराधी थे जिससे मैं अपनी ग्लानि ,क्षोभ और वेदना से मुक्त हो सकूं।
Month: August 2017
Post – 2017-08-31
टेलीफोन क्लर्क
सुनने में यह नाम कुछ अजीब लगेगा। सही नाम टेलीफोन अटेंडेंट होता है। मेरे आग्रह के कारण शायद इसका नाम बदल कर टेलीफोन क्लर्क कर दिया गया। पहले इस पर पढ़े लिखे खलासी या ऐसे फायरमैन काम किया करते थे जो अपना दामन काला न करना चाहते थे फिर भी लौटते कालांकित होकर ही थे। हाल ही अटेंडेंट क्लर्क कहे जाने लगे थे।
• काम था ड्यूटी पर आने वाले क्रू के सदस्यों का नाम, आने का समय, शेड से रवाना होने का समय एक चार्ट पर इसके खानों में लिख कर हस्ताक्षर करना, वापस आने वाले क्रू का पहुँचने का टाइम लिखना. इन्हें sign on और sign off कहते थे। और उस पर्चे को उनका टिकेट कहा जाता था। यह टिकेट ट्रेन से engin के जुड़ने के बाद गार्ड के सुपुर्द हो जाता, जिसमें वह ट्रेन कि गति, विलम्ब आदि के बारे में ब्योरा लिखता। इसके बारे में हम अंत में चर्चा करेंगे। टेलीफोन क्लर्क के पास फ़ोन तो दो होते, एक स्थानीय और दूसरा सीधे पॉवर कंट्रोलर से जुडाः, पर फोन उठाने की नौबत बहुत कम आती।
• टेलीफोन क्लर्क का कमरा कभी बन्द न होता। कमरे में एक बड़ी सी मेज, उसके आगे एक बेंच दरवाजे से हटकर दीवारों से सटी दो बेंचें। मेज पर दोनों टेलीफोन, कलमदान और क्रू को जारी किए जाने वाले छपे टिकट।
पॉवर कंट्रोलर का फोन तब आता जब किसी ट्रेन इंजन रास्ते में फ़ेल हो गया हो या उसकी गति मंद पड़ गई हो या कोई एक्सीडेंट हो गया हो। एक्सीडेंट या इंजिन फेल्योर की स्थिति से निबटने के लिए एक क्रू प्रतीक्षा में बेंचों पर बैठा रहता। उसका इंजिन पूरी तरह तैयार पास ही खड़ा रहता। दूसरी बेंच पर जाने वाली ट्रेनों के स्टाफ को जगाने के लिए हरकारे बैठते जिन्हें कालमैन कहा जाता. स्टाफ को ट्रेन छूटने से दो घंटा पहले जगाना होता। सवारी गाड़ियों के क्रू और समय का पता कालमैनों को होता, मालगाड़ियों के समय चालक दल को बुलवाना टेलीफोन क्लर्क का काम होता। चालक दल अपने नियत समय पर पहुंच कर अपने इंजिन को तैयार करते. ट्रेन लेट होने पर वे वहीं बैठे प्रतीक्षा करते और यदि इतनी लेट हो जाती कि ड्यूटी पूरी हो जाय तो समय रहते दूसरे दल को बुलाना होता। सामान्यतः दो घंटे पहले से उनकी ड्यूटी आरम्भ हो जाती। किसी आपात स्थिति में वेटिंग क्रू के रवाना होते ही एक अन्य दल को प्रतीक्षा के लिए बुलाना होता। इसी तरह की स्थिति में एक कवि को लिखना पड़ा था ‘they also work who only stand and wait’ । क्योंकि प्रतीक्षा करते समय भी वे ड्यूटी पर होते।
एक काल मैन के किसी चालक दल को जगाने के लिए जाने के बाद किसी अन्य स्थिति में किसी अन्य दल को बुलाने के लिए दूसरा काल मैन होता। हमारी मेज के सामने की बेंच पर ड्यूटी पर रवाना होने वाले ड्राईवर या ड्यूटी बजा कर लौटे ड्राईवर साइन आन यासाइन आफ के लिए या कंप्लेंट बुक करने या कराने लिए बैठते। इस तरह आस पास खाली बैठे और समय काटने के लिए गपशप करते हुए वे हलके कोलाहल से कमरे को गुलज़ार रखते. पॉवर कंट्रोलर का दूसरा काम था अगले चौबीस घंटे में चलने वाली मालगाड़ियों की समय सारिणी सूचित करना जिसे टेलेफोन क्लर्क नोट करके सुपरवाईजर को खबर करवा देता ताकि वह उनके लिए इंजिन और स्टाफ आदि समय से तैयार रखे। यह सारणी शाम दस ग्यारह के लगभग मिलती।
टेलीफोन क्लर्क का एक काम बहुत टेढ़ा था और कुछ दूर तक खतरनाक भी. यह था साइन ऑफ़ करनेवाले अनपढ़ ड्राईवरों के मरम्मत रजिस्टर (complaint book) में इंजिन के विभिन्न पुर्जों में आई खराबी दर्ज करना जिसे फिटर और इंजिनियर ठीक करते। ए ग्रेड ड्राईवर पढ़े लिखे थे. पहले ए ग्रेड फायरमैन अंग्रेज ही हो सकते थे। वे ही ए ग्रेड ड्राईवर होते, मेल और एक्सप्रेस ट्रेनें वे ही चलाते। संभव है पहले सभी सवारी गाड़ियों पर वे ही चलाते रहे हों। भारतीय खलासी भर्ती होते रहे हों और अपनी योग्यता के बल पर उनमें से कुछ मेल और एक्सप्रेस गाड़ियों के खलासी और fireman बन कर सी ग्रेड ड्राईवर बन कर मॉल गाड़ियां और फिर पैसेंजर गाड़िया चलाते रहे हो। अब उनके चले जाने के बाद विरल अपवादों को छोडकर सभी पर भारतीय थे। जो अपवाद थे उनमें एक तो वह फोरमैन था जिसे सबक सिखाने के बाद मैं गोरखपुर आ सका था, गोरखपुर शेड में रोज़ेरियो और लाज़रस नाम के दो ए ग्रेड ड्राईवर थे और हेडक्वार्टर में चीफ मेकनिकल इंजीनियर था। ये सभी इसलिए रुक गए थे कि इंग्लैंड में कोई काम मिले या नहीं इसलिए पूरा लाभ लेकर चलें। दोनों मेरे सामने ही रिटायर हो कर लन्दन रवाना हुए।
सार यह कि मेल और एक्सप्रेस ट्रेने 4-12 की shift में नही आती थी और फिर भी सबसे अधिक गाड़ियां इसी बीच प्रधान स्टेशनों पर इसी बीच पहुंचती और इस बीच ही छूटती है. पूर्वोत्तर रेल का मुख्यालय गोरखपुर इसका अपवाद कैसे हो सकता था। इसका सबसे बड़ा नुक्सान यह था कि साइन on करने वालों की तुलना में ही sign off करने वालों की संख्या भी इसी में अधिक थी। उन्होंने हिंदी तकनीकी शब्दावली निर्माताओं से पहले ही व्यावहारिक हिंदी कोश का निर्माण आरम्भ कर दिया था. और किया हिन्दी का उपकार करने के लिए न था, सनचार की बाध्यता के कारण किया था. अब तो बहुत कुछ भूल गया पर जो याद है उसका नमूना देखना जरूरी है:
स्टे प्लेट – ताना प्लेट
हेडबोर्ड – हैदर बोर्ड
अब तो याद ही नहीं कि वे बारदू, मक्खी, आदि का प्रयोग किन पुर्जों के लिए करते थे। इसकी खूबसूरती यह थी कि सभी इसे समझते थे, इसी रूप में लिख दें, जो लिखना पड़ता था, और यह सामान्य पदावली इतनी स्वीकार्य थी कि मरम्मत हो जाती थी।
शाम चार से बारह की पारी में जितनी ट्रेनें निकलतीं या पहुंचती उतनी बाक़ी दोनों पारियों में मिला कर भी न निकलती थीं, इसलिए उनमें कुछ आराम था। इस व्यस्तता के कारण चार-बारह की पारी किसी को पसंद न थी जब कि मैं केवल इस पारी में स्थाई रह कर ही पढाई कर सकता था। इसलिए जब मैंने अपने जोडीदारों से यह प्रस्ताव रखा कि मैं इसमें स्थाई रहना चाहता हूँ, वे आपस में अपनी पारी बदलते रहें तो वे तैयार हो गए और मैंने इसे औपचारिक रूप देने के लिए फोरमैन को अवगत करा दिया। मुश्किलें मुश्किलों को झेलने से हल होती हैं। रास्ता उनके बीच से भी निकलता है।
Post – 2017-08-31
डा श्रीगोपाल काबरा के अहा! जिन्दगी के अगस्त २०१७ में प्रकाशित लेख से। बीआरडी कालेज व्यापक भ्रष्टता से ग्रस्त रहा है यह तथ्य तो जांच के बाद आया पर इसके कारण ही वयापक गन्दगी के लिए कुख्या रहा जिसे लेकर योगी पहले से अपनी चिन्ता जता रहे थे। क्या इसके कारण हास्पिटल परिसर स्वय. असाधय विषाणुओं का केन्द्र बन गया है जो मौतों पर ननियंत्रण नहूीं हो पा रहा।
Post – 2017-08-29
रेलवे की चाकरी
(और नियति का सामना)
मैंने इस प्रसंग को तो इसलिए उठाया था कि विगत दिनों हुए ट्रेन हादसों पर आई प्रतिक्रियाओं, आरोपों और व्याख्याओं से अपना असंतोष व्यक्त कर सकूँ और ऐसा करने से पहले आप को यह विश्वास दिला सकूँ कि मैं इस पर अपना अभिमत रखने का अधिकारी व्यक्ति हूँ। इसे बयान करने के क्रम में नियति और उसके खेल की चर्चा आ गई जिसे अधूरा छोड़ना एक गलत प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देने जैसा लगेगा, इसलिए थोड़ा आत्मराग भी जरूरी लगा।
….
कितनी जुगत से मैंने गोरखपुर में पोस्टिंग कराई थी। कुछ हफ्ते ही बीते थे कि जिस विधान को उलट कर गोरखपुर पहुंचा था, उसे याद आया कि हमारी तो नियुक्ति ही ओवरटाइम और माइलेज के लटके पड़े काम को निबटाने के लिए हुई थी जिसके कागज पत्र गोंडा लोकोशेड में हैं। मुझे उलटे पाँव गोंडा के लोको शेड जाने का परवाना थमा दिया गया। साल बर्वाद हो चुका था ।
अगला सत्र आरम्भ होने में छह महीने बाकी थे। सोचा चलो तब तक दिन काटते हैं और फैसला तो DME आफिस से ही होना है। पास रह कर कोई सूरत निकालेंगे।
पहुंचे, कुछ दिन रनिंग रूम में काटे, फिर ठिकाने का जुगाड़ हुआ। गोंडा के लोको ऑफिस में उन सड़ रहे काग़जों के लिये जगह थी, पर हमारी उस टीम के बैठने की जगह न थी जिसका सृजन ही उस कार्यभार को कम करने के लिए हुआ था जिसके कारण पुराने ओवर टाइम और माइलेज के भुगतान केआदेश के बाद भी न हो रहे थे।
हमे जो बुलन्दी बख्शी गईवह सातवें आसमान से तीन आसमान कम थी,यानी, पानी की टंकी के नीचे धरती से तीन मंजिल ऊपर। वहाँ तक चढ़ने के लिए लोहे की तिकोनी घुमावदार सीढीयां। टेबल के नाम पर एक बड़ा सा बिलिअर्ड टेबल। उसे घेर कर छह कुर्सियां । सामने टेबुल के ऊपर रखे पुराने रिकॉर्ड जिन पर स्टेशनों के नाम, उनकी दूरी और चालक दल (क्रू)के सदस्यों के नाम। क्रू या दल में होते थे ड्राईवर, फायरमैन और खलासी। ड्राईवर और फायरमैन के ग्रेड थे ए.बी.सी., जो क्रमश: मेल और एक्सप्रेस ट्रेनें, दूसरी सवारी गाड़ियां और माल गाड़ियां चलाते। सबकी दरें अलग। स्टेशनों के नाम संकेतों में। मिसाल के लिए Lnj का मतलब लखनऊ जंक्शन और Lko का मतलब लखनऊ सिटी। पहला उत्तर रेलवे का, दूसरा पूर्वोत्तर रेलवे का, नियुक्ति करने वालों ने अनजाने ही बहुत बुद्धिमानी का फैसला लिया था। इतने टेढ़े काम को निपटाने के लिए सचमुच सबसे प्रतिभाशाली युवकों की ही ज़रूरत थी, यद्यपि ये युवक भी काम की महिमा के अनुरूप न थे।
मैं नहीं जानता मेरे स्वभाव में कब और कैसे यह दुर्गुण आया, पर यह बात मेरी समझ में बहुत छोटी उम्र में आगई थी कि यदि शत्रु प्रबल है तो उससे पंगा न लो, उसे ललकारो मत, परन्तु उसकी अवज्ञा करने की जुगत करो। उसे बाध्य करो कि वह तुम पर आाघात करे जिससे तुम उसे अत्याचारी सिद्ध कर सको। इसे गांधी जी के असहयोग आन्दोलन से प्रेरित नहीं मान सकता क्योंकि जिस उम्र में मैंने इसे अपना हथियार बनाया़ उसमें गाधी का नाम अवश्य सुना होगा, पर असहयोग शब्द न तो सुना था न सुनता तो उसका अर्थ समझ सकता था।
……….
जिसे हम नियति कहते हैं वह एक अपूर्ण या दोषपूर्ण व्यवस्था का जिसके कुछ पहलू उजागर और दूसरे ओझल होते हैं पर इनसे ऐसा दबाव पैदा होता है जिसके कारण विविध प्रकार के अन्याय होते हैं, परन्तु कोई अन्यायी नही होता। दोषमुक्त होने के प्रयत्न में भो अपूर्ण व्यवस्था होती है और सबको सह्य या न्यायपूर्ण लगती है, इसलिए हम उससे टकराने चलें तो पूरा समाज हमें अपराधी सिद्ध कर देगा,जब कि हम स्वयं उससे होने वाले अत्याचार के मारे हुए हैं।
उसकी शक्ति उसके अत्याचार करने की ताकत में नही है, इस मूल्यव्यवस्था में है जिसमें उसका अत्याचार उचित और तुम्हारी न्याय की मांग उपद्रव प्रतीत होती है । उससे जो सीधे टकराएगा वह सचमुच चूर चूर हो जाएगा ।
नियति के तीन पहलू है। प्राकृतिक जिसे दैव कहा जाता रहा है जिसमें बाढ़, सूखा, भूचाल, सुनामी, महामारी आदि आते है जिनके सामने हम अवश अनुभव करते है, जिनमें धैर्य और साहस बचाया जा सके इतना ही बहुत है।
दूसरा व्यवस्था : समाज व्यवस्था, अर्थतन्त्र और राजतन्त्र और इनके नियम, विधान, परम्पराएं और संस्थाएं हैं, जिनके समक्ष भी हम अकेले विद्रोह करें तो भी अपराधी सिद्ध कर दिए जायं. इनके लिए बड़े आंदोलनों की जरूरत होती है जो सफल हो जायं यह जरूरी नही, इसलिए इनमें समायोजित होते हुए अपने लिए कुछ राहत तलाशते हुए अपने लक्ष्य की और बढ़ा जा सकता है, और इसी का प्रयत्न करने की बात मेरी जहन में थी।
इस लोकोशेड में जिस स्थिति का सामना करना पड़ा, वह जिन भी सीमाओं के कारण था, इसे झेलना अपमानजनक था, अन्याय की पराकाष्ठा थी, इसलिए मैंने पहले दिन ही तय किया कि मै काम करूंगा ही नहीं, और किसी ने जवाब तलब किया तो उसे समझाऊंगा कि मै सही कर रहा हूँ। इसकी अंतिम परिणति होगी चाकरी से निकाला जाना। अगले सत्र तक गोरखपुर वापस न होने की स्थिति में वह निर्णय तो मुझे करना ही था।
यह काम चार लोगों दे दल का था। एक पुराने रिकार्ड का पाठ करता. बाकी तीन क्रमश: ड्राईवर, फायरमन और खलासी के माइलेज और टाइम का हिसाब तैयार करते। मैंने अपना फैसला सुना दिया। कहा, तुम नौकरी करने आए हो इसलिए जितना कर सको करो. मैं कुछ न करूंगा।
मैं जूनियर इंस्टिट्यूट के पुस्तकालय से अंग्रेजी के उपन्यास लाता, दिन भर उन्हें ही पढता। मैने अपने को समझा लिया था कि गोरखपुर में रहना मेरा अधिकार था। वह छिन गया तो बिना टिकिट हफ्ते के अंत में वहां जाने और मित्रों के साथ गुजारने का हक था। शनिवार को 2 डाउन से जो गोंडा से एक बजे रवाना होती, ड्राइवर को खबर करके सवार होता, तीन बजे गोरखपुर, सोमवार को नौ बजे गोरखपुर से छूटनेवाली. 9अप से चलता। साढ़े ग्यारह बजे गोंडा और पटरियां पार कर, अपने दफ्तर में।
एक बार इसी तरह वापस लौटा तो देखा हाजिरी रजिस्टर में मेरे नाम के आगे क्रास लगा है। मैंने उसे काटा, नीचे हस्ताक्षर किया, समय लिखा ८ बजे। लोको फोरमैन ने खुद पाया था कि मैं आठ बजे उपस्थित नहीं हूँ। पता लगाया, काम की प्रगति न के बराबर। मेरे विद्रोह का कुछ असर मेरे साथियों पर भी पडा ही था। अब तो जवाब तलब होना ही था।
आरोप न. १ हाजरी रजिस्टर में tampering.
२. काम में शिथिलता।
मैं इसी स्थिति की प्रतीक्षा कर रहा था! मैंने जवाब दिया, tampering तब होती जब मै क्रास को मिटाने का प्रयत्न करता. क्रॉस गलत लगा था। मैं समय का पाबंद हूँ। दफ्तर के दूसरे लोग, यहाँ तक कि फोरमैन खुद देर से आते है। मैं आया तो द्फतर खुला न था, इसलिए हाजिरी रजिस्टर में हस्ताक्षर न कर सका। ऊपर अपने कमरे में चला गया और काम करता रहा। सोचा बाद में उपस्कथिति दर्ज कर दूंगा। बाद में पाया कि क्रास लगा है, इसलिए उसे काट कर नीचे हस्ताक्षर किया.
अब इसके बाद मेरे आरोप थे: हम लोग सभी ग्रेजुएट हैं, दफ्तर के दूसरे सभी सदस्य और स्वयं फोरमैन अल्प शिक्षित हैं इसलिए हमारे साथ जान बूझ कर ऎसी परिस्थितियाँ पैदा की गई हैं कि हम काम न कर सकें। हमें अलग बैठाया गया और किसी अनुभवी व्यक्ति को हमारे मार्गदर्शन के लिए न लगाया गया। हम योग्य हैं , पर दफतर के काम का ज्ञान या अनुभव नहीं है। रेल स्टेशनों के लिए जिन कूटाक्षरों का प्रयोग किया गयां है उनका अर्थ तक हमें नहीं मालूम, न इसकेलिए कोई पुस्तिका या रजिस्टर उपलब्ध कराया गया है। हमें संशय होने पर इन खतरनाक सीढियों से तीन मंजिल की ऊंचाई उतर कर नीचे आना पड़ता है और जिस तिस से पूछना पड़ता है और यदि किसी को फुर्सत हुई और उसने मदद कर दी तो उसकी कृपा मानते हैं, क्योंकि इसकी जिम्मेदारी किसी पर नहीं डाली गई है। परन्तु इतनी विषम परिस्थितियों में भी हमने कुछ काम इसलिए किया है कि हम कर्तव्यनिष्ठ और अनुशासित लोग हैं।
अब इसके बाद मैंने फोरमैन से यह स्पष्ट करने का अनुरोध किया कि हमारे साथ इतना असयोगपूर्ण, विद्वेषपूर्ण व्यवहार क्यों
किया गया? हमारी प्रतिभा की बर्वादी क्यों की जा रही है? और अब परेशान करने के ये नए तरीके क्यों अपनाए जा रहे हैं?
अब यह रेकार्ड पर आ गया । मेरी हाजिरी के दुस्साहसिक झूठ को छोड़ कर बाकी सारे आरोप इतने अकाट्य थे जिन को नकारा नहीं जा सकता था इसलिए यह आरोप गलत होते हुए भी स्वतः अकाट्य बन जाता था। अब वह मेरे खिलाफ कोई कार्नरवाई नहीं कर सकता था। हमारे पूरे दल पर उसका कोई नियंत्रण न रह गया था। हम ऊपर बैठ कर काम करें या ताश खेलें और वह निरीक्षण करने आए और उसके सामने खेल में व्यस्त रहें, समय से बाद में आएं या पहले चले जाएं, हमारे सवालों का जवाब दिए बिना वह नया मेमो तक नहीं दे सकता था। मेरे जवाब की चर्चा पूरे दफ्तर में। अब वे ही मजे हुए लोग जो सचमुच हमें नए नए छोकरे वाली नजर से देखते थे इतनी इज्जत से पेश आने लगे कि हमें भी हैरानी होने लगी। लेकिन इसका सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि अभी तक अकेले मैं डीएमई दफतरके चक्कर काटता था कि नए सत्र से पहले मेरी तैनाती गोरखपुर में कर दें अब मेरा फोरमैन दौड़ लगाने लगा कि वे किसी तरह मुझसे उसे मुक्ति दिलाएं। हुआ यह कि अगली बार जब मै पर्सनल में यह पता लगाने पहुंचा कि कोई सूरत निकली या नहीं. तो पता चला कि टेलीफोन क्लर्क की एक पोस्ट खाली है। पारी का चक्कर है। क्या उस पर जाना मंजूर है।
मुझे तीन बार मंजूर नहीं कहना पड़ा। अगले दिन मैं गोरखपुर के लिए सामान समेट रहा था।
Post – 2017-08-28
कितना दुखद है कि चीन को समझना पडा कि उसका सामना एक अधिक समर्थ कूटविद से हो रहा है और सारी बन्दर भभकियों के बाद, आर्थिक घाटा सह कर, उसे भारत की शर्त माननी पड़ी। लानत है ऎसी कूटनीति को जिसमें वह सही साबित हो जाय जिसे हम गलत मानते और साबित करते है!
जिसकी जानकारी और नीति से वह बाबा जेल दर जेल भोगने को मजबूर हुआ, जिसे कांग्रेस ने अंडे की तरह बचा कर रखा था।
नमन उन बहादुर लड़कियों को, जान पर खेल कर सच को उजागर करने वाले उस पत्रकार को जैसा आज कोई है या नहीं, यह पता लगाना होगा, नमन केन्द्रीय जाच ब्यूरो को, जिसने अधिकतम दंड की जिद बनाए रखी, उस अदालत को जिसने इसका सम्मान किया, और नमन तो नहीं पर ‘हाँ ठीक ही लगता है’ उस निज़ाम को जिसमें यह संभव हुआ।
यार इसे बदलो, यह देश के हित में नहीं है। महागठबंधन करो और नतीजा सामने होगा।
Post – 2017-08-27
रेलवे की चाकरी
मुझे नियतिवादी बनाने में जिन घतानाक्रमों की भूमिका है उनमें से एक है रेलवे की चाकरी.
बीएचयु से वापसी एक राहत थी। दो तीन दिनों में ही पता चल गया कि कोई न कोई अंशकालीन काम तलाश पाना आसान नहीं। वह साल खराब गया। उसी साल पूर्वोत्तर रेलवे के एक विज्ञापन ने आश बंधा दी।
क्लर्कों की भरती की जिस परीक्षा में मैं बैठा उसमें १२०० सफल प्रत्याशियों में मेरा स्थान दूसरा था। जिन प्रथम आठ को सबसे पहले नियुक्तिपत्र मिला उनमे मुझे होना ही था। परन्तु यह नियुक्ति उस दफ्तर में थी जिसका मांगपत्र सबसे पुराना था। मेरे दुर्भाग्य से यह था मकैनिकल इंजीनियरी का विभाग था जिसका मुख्य कार्यालय गोरखपुर में, जिला कार्यालय गोंडा में था और प्रभागीय कार्यालय लखनऊ में था।
गोरखपुर गोंडा के जिला कार्यालय से संचालित होता था। नियुक्तिपत्र वहीं से आया था। वहा चिकित्सा जाँच के बाद जब नियुक्ति के लिए पहुँचा और बताया कि मैंने पढाई का खर्च निकालने के लिए नौकरी चाही थी, तो पता चला गोरखपुर में कोई पद है ही नहीं। गोंडा रहकर पढ़ाई संभव नही थी इसलिए मैंने बताया कि ऎसी दशा में मैं पद स्वीकार नही कर सकता। जवाब मिला अब तो आप सेवा से मुक्त त्यागपत्र देकर ही हो सकते हैं। मैंने आव देखा न ताव, त्यागपत्र लिख कर सौंप दिया। यह उनके लिए हैरानी की बात थी, क्योंकि रेलवे की नौकरी दुर्लभ सी चीज समझी जाती थी। जिला इंजिनियर के स्टेनो ने समझाया, इसे अपने पास रखो। यह तो कभी कर सकते हो. इतनी जल्दी क्या है? जाओ पहले अपने घर के लोगों से, दोस्तों से राय मशविरा कर लो। उसने त्यागपत्र फाड़ दिया।
लौटा और दो चार दिन बाद पहुंचा तो फिर वही जिद. अब उस भले आदमी ने पता लगा कर बताया। गोरखपुर में लोकोशेड में एक जगह खाली है। मै वहा के लिए नियुक्ति का आदेश ले कर लौटा।
गोरखपुर के सेंट एंड्रूज कालेज में प्रातःकालीन कक्षाओं में जो ७-९ के बीच लगती, आधे छात्र दफ्तरों में काम करने वाले होते थे । यहीं नौकरी करते हुए पढ़ पाना संभव था। चुने गए १२०० में से अकेले वे आठ जो योग्यता क्रम में सबसे ऊपर होने के पुरस्कार स्वरूप लोको के नरक में भेजे गए जहां उन्हें श्रमिक कानून के अनुसार आठ घंटे काम और दो घंटे आराम करना था । इन में से इक्के दुक्के को पदोन्नति का एकमात्र अवसर बुढापे तक बड़ा बाबू बनने का था। लेकिन हेराफेरी की गुंजायस ऐसी थी कि जितना दायें हाथ से कमाते थे उससे अधिक बांये से कमा लेते थे और उस नरक को भी स्वर्ग बना लेते थे।
उस विधाता ने जिसने स्वर्ग और नरक बनाए, मेरी सर्वोत्तम जानकारी के अनुसार, एक बार इनको बना लेने के बाद न तो इनके प्रबंध में कोई बदलाव किया न ही एक के निवासी को दूसरे में स्थानांतरित करने का प्रयत्न किया! कानून अपना काम करेगा और कानून सबसे ऊपर है, विधाता से भी ऊपर, यह व्यवस्था भी उसने उसी समय दे दी।
परन्तु जो इश्वर न कर सका उसे मनुष्य कर सकता है। जो विधाता न कर सकता था उसे विधायिका और विधायक कर सकते है। जो आचार से संभव न था वह व्यभिचार से संभव है। सोचिए (उल्लू के पट्ठो को कहें तो उनके पितरों का अपमान होगा और उल्लू कहें कहेंगे इससे बड़ा सम्मान क्या हो सकता है, यही अकेला पक्षी है जिसे भरोपीय पक्षी कहा जा सकता है इसी उल्लू को आउल में बचा कर रखा गया) इन दोनों को पार करने वाले उन विशेष श्रेणी के लोगों के बारे में जो आज भी विधाता को मनुष्य से ऊपर मान कर उसकी पूजा और नमन करते हैं पर उससे अधिक प्रतापी पड़ोसियों को भूल जाते है जो उसके किये और बनाए नियमों को मनमर्जी से बदल सकता है, क्या कहा जा सकता है । मनुष्य की महिमा का कमाल यह है कि वह स्वर्ग को नरक और नरक को स्वर्ग बना सकता है और इस धारणा को बदल सकता है कि नरक मे सभी यातना भोगते हैं और स्वर्ग में मजे ही मजे हैं। यह आदमी का कमाल है कि वह सुख और दुःख की परिभाषाएं बदल सकता है!
“बात समझ में नहीं आई।”
“मेरे समझाये बिना आ कैसे सकती है। मैं समझाता हूँ । स्वर्ग की एक मात्र नेमत कि उसमें पहुँचते ही बहुत सारी हूरें हैं. मान लिया गिल्मे भी हैं, मिल जाते हैं । पर वे तजुर्बेकार होने के साथ ही कुछ ऐसी व्याधियों के संक्रामक भी हैं जिनके इलाज के लिए वहाँ कोई अस्पताल नही. शराब की नदिया हैं, मिलाने को पानी भी नही, खाने का तो जिक्र ही नही. इन पियक्कड़ों की दुनिया में तुम जाते ही बीमार पड़ जाओगे. दूसरी और नर्क है. औरतों को मरने के बाद स्वर्ग जाने और उसका सुख पाने का इंतजाम मैंने स्वर्ग के किसी परिचय पत्र में नही देखा। जाहिर है सारी महिलाए नर्क में जाती हैं। विश्वास न हो तो नारी नरक की खान सूक्ति से समझो. अब नरक में जाने वालों का यदि सुख एक ही अंग तक सीमित है तो एक एक नरकवासी महिला के हिस्से में उससे अधिक हमउम्र, हमशक्ल पुरुष मिल जाते हैं जितनी हरें पुरुषों को स्वर्ग में नसीब नहीं। गणित मेरी कमजोर है है, स्वर्ग में गणित और मोटी समझ की जरूरत नहीं पड़ती और नर्क में गणित इतनी दुरुस्त कि उसे सीखना नहीं पड़ता, परन्तु नारी का स्वर्ग में प्रवेश वर्जित है और नर्क में उसे बसाने को पुरुषों का हरम मिल जाता है।
“ठोस उदाहरण देकर समझा नहो सकते?”
“वही कर रहा हूँ। जिसे भ्रष्टाचार कहा जाता है वह लोकाचार है। लोकाचार का मतलब किसी जगह समझाते हुए कहा गया है ‘जो तुझको है पसंद वही काम करेंगे. तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे. तुम कुछ नही बोलोगे तो खामोश रहेंगे. पर दिन में रात को मिलाके काम करेंगे। अर्थात यदि तुम अपना हिसाब नहीं समझ सकते तो हम बताएँगे कि जो था वह उससे कुछ कम था जो होना चाहिए था। अर्थात तुम्हारे माइलेज और ओवरटाइम जितने हैं उससे कम रह जायेंगे. इसलिए समझौता एक्प्रेस का जब किसी कौ खयाल भी आया तब यह दफ्तरों में धडाधड चलती थी और सिग्नल और झंडी की भी जरूरत न होती थी । होता यह था कि एक निर्णय के अनुसार अपने लिए नियत समय से बाद तक किसी भी कारण से काम करने वालों को ओवरटाइम मिलने का निर्णय लिया गया था। रनिंग स्टाफ को प्रति मील एक अल्पतम प्रोत्साहन राशि रखी गई थी. शेड में काम करने वाले क्लर्क रनिंग स्टाफ अर्थात ड्राईवर, फायरमैन खलासी के वेतन के अतिरिक्त इसका हिसाब रख कर उन्हें भुगतान का हिसाब लगाते। हिसाब को बढ़ा कर उसका आधा आध बांटने के लिए ये उन के पास स्वयम पहुंचते। जितना उचित होता उससे बढे हिसाब का आधा बंट जाता। दोनों खुश । काम आनन् फानन में। जो लोग सोचते है भ्रष्टाचार को मिटा दिया जाना चाहिए वे शिष्टाचार को मिटाना चाहते हैं। इश्वर करे वे स्वर्ग में जाय जहा हूरें तो हैं पर हॉस्पिटल तो दूर गायानाकोलोजिस्ट तक नही मिलते जिन्हें नरक भेजा जाता है वे समझौता एक्सप्रेस के मुसाफिर होते हैं ।“
“तुम अपनी बात तो बताते नहीं, तुम्हारी वहां जरूरत क्यों पड गई ।”
“माइलेज और ओवर टाइम की मांग छह साल पहले पूरी की गई थी, पर उस समय जो काम कर रहे थे वे अब पता नहीं कहाँ थे। यह काम तो वहां के स्टाफ से ही हो जाता, पर न कोई यह जान पाता कि उसका हिसाब किसके पास है न कुछ लेनेदेने देने की पहल कर सकता था। इस सूखे काम को पूरा करने के लिए आठ नए पदों की सृष्टि छह साल पहले हुई थी और इसे पूरा करने का काम हमारा था। इस यूनिट को गोंडा के लोको ओफ़ीस में रह कर पूरा करना था, जिनमें से अकेला मैं नैतिक दबाव बना कर गोरखपुर के शेड में भाग आया था।”
Post – 2017-08-27
पता नहीं वास्तविकता क्या है परन्तु सीबीआइ अदालत पहली बार बिना हस्तक्षेप के काम कर रही है, उसके अफसर बेझिझक सही कदम उठा रहे हैं और इसका श्रेय उस व्यक्ति को नही दिया जाता जो कहता है कानून अपना काम करेगा और अधिकारियों को कहता है आप बिना किसी दबाव के अपने निर्णय करें अर्थात राजनेता यदि कोई दबाव डालें तो उस दबाव में न आयें और वह होता दिखाई भी पड़ा रहा है जो दूसरे शासनों में नहीं दिखाई पडा. हो सकता है अच्छे दिन सचमुच इश्वर ने भेजे हैं जो उनके दिमाग सही काम करने लगे हों.
Post – 2017-08-27
नजर सही है तो एक सिम्त भी होगी उसकी
आप तो खुद को निहारे ही चले जाते हैं!
Post – 2017-08-26
दास्ताँ अपनी और जबां अपनी
जमीं से हैं जुड़े वे आसमाँ तक फैल जाते है
जो छाते आस्मां पर वे जमीं तक आ नहीं पाते
बहुत मुश्किल है अपने को समझना दोस्तों फिर भी
बुलंदी चाहनेवाले फलक तक जा नहीं पाते
मेरे दुर्भाग्य ने मुझे जो और जितना दिया, सौभाग्य के कारण उससे वंचित रह कर मैं रसगुल्ले का डिब्बा बन कर रह जाता जो इंसानों से अधिक चींटियों को आकर्षक लगता. इस फर्क को मैं जानता हूँ। इसने मुझे अपने दैन्य जन्य नम्रता के साथ ऎसी दृढ़ता प्रदान की जिसमें पाने और जुटाने की चिंता में लगे लोग ‘घर घर दोलत दीन ह्वै जन जन जाचत जाय’ वाले दैन्य से ग्रस्त लगते रहे। उनके पद, प्रताप और प्रभुता के प्रति कभी अवज्ञा का भाव न पैदा हुआ परन्तु स्वयं वैसा बनने की इच्छा न पैदा हुई। जिन विषम या मामूली स्थितियों में रहना पडा उनको लेकर कभी एकांत क्षणों में भी तकलीफ सहते हुए भी मनोबल में कमी न आई।
इसका एक परिणाम या कहें सेल्फ डिफेंस यह कि इसने मुझे नियतिवादी बना दिया। इन दुर्भाग्यों में से एक था बीए के बाद आर्थिक साधन के अभाव में आगे की पढाई की समस्या. इससे पहले मेरिट के वजीफे से काम चलता रहा। बीए से आगे उसकी संभावना न थी. सोचा बनारस में शायद ट्यूशन या कोई और साधन जुड़ जाएगा। वजीफे की बची हुई रकम मिली तो बनारस पहुँचे। वहां जिस अंग्रेजी साहित्य के कारण मेरा बीए का फर्स्ट क्लास मारा गया था, उसमें प्रवेश मिल रहा था. मैं अंग्रेजी में नही हिन्दी से एमे करने को कटिबद्ध था। उसी के लिए बीए में आगरा यूनिवर्सिटी के प्रतिबन्ध के कारण कि तीनो ऐच्छिक विषय साहित्य के नहीं हो सकते संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य के साथ दर्शन शास्त्र लिया था कि हिन्दी का आधार मजबूत रहे! दूसरे विषयों के कुल अंक ३०० में मुझे अच्छे अंक मिले पर अंग्रजी सामान्य और साहित्य के २५० अंकों में ५० प्रतिशत। शायद ये ५० प्रतिशत अंग्रेजी में दाखिले के लिए ठीक थे।
मैं अपने एक मित्र के साथ, जिसके भी अंग्रेजी में ५० प्रतिशत थे रजिस्ट्रार ऑफिस पहुँचा तो पता चला दाखिला बंद हो चुका है, फार्म तक नहीं मिल सकते. फिर भी यदि मेनन जी चाहें तो मिल सकता है. पता चला कि वह घर जा चुके हैं। पता लगाकर उनके घर पहुंचे तो पता चला वह अभी आये ही नहीं। लौटने लगे तो तहमद, चप्पल और आधी कमीज में एक पचास के आसपास के ठिगने से सज्जन तेजी से उस घर की और आते दीखे। उन्होंने ही जब पूछा कि हम कौन हैं तो पता चला यह वही मेनन हैं जिनकी तलाश में हम पहुंचे थे। यह जानकर कि हम गोरखपुर से आये हैं, पूछा, कहाँ ठहरे हो? खाना खा लिया ? हमें कहना पडा हम खाना खा चुके हैं। उन्होंने एक चिट पर लिख कर अनुमति दी की इन्हे दाखिला फार्म दे दिया जाय। देते हुए कहा, अगर कोई समस्या हो तो आ जाना मैं साथ चलूँगा। अंग्रेजी में मुझे दाखिला मिल रहा था पर मैं तो हिन्दी में एमे करना चाहता था। फार्म मिल गया था। द्विवेदी जी के पास पहुंचा। उस समय वह घर से अपनी क्लास के लिए जा रहे होंगे। आसपास छात्र गण मदमत्त गयंद के मद पर मदराते भृंग जैसे चल रहे थे और इसका बोध भी उन्हें था। इससे तुष्ट भी लग रहे थे। उनके बीच केदार जी भी थे। तब तक वह मुझसे और मैं उनसे परिचित थे। जब मैंने अपनी समस्या उनसे बताई तो उन्होंने द्विवेदी जी से बात की। उन्होंने कहा बीए में हिन्दी नही थी तो एमे हिंदी में दाखिला नही हो सकता। विश्व विद्यालय का नियम था। वह कुछ कर नहीं सकते थे।
केदार जी ने आकर बताया। मैं लौट आया । द्विवेदी जी के निर्णय में कुछ भी आपत्तिजनक न था परन्तु हमारे किशोर मन पर मेनन जी के छोटे से कद और व्यवहार की इस ऋजुता के कारण वह अपने कद के विपरीत आस्मां तक उठे लगे और उसकी तुलना में द्विवेदी जी का महिमामंडित गमन और कथन उनके उन्नत और बोझिल व्यक्तित्व के कारण कुछ ऐसा प्रभाव छौड गया कि जब भी उनके शिष्यों या प्रशंसकों से उनकी प्रशस्ति सुनता मेनन याद् आ जाते। यह फिक्सेशन सा बन गया और द्विवेदी जी से उनके किसी भी शिष्य की तुलना में अधिक प्रभावित होने के बाद भी, उनको मेनन जी जैसे ठिगने के सामने खडा कर देता हूं जिससे वह उनसे छोटे लगने लगते हैं। द्विवेदी जी अपनी आत्म छवि को लेकर बहुत सतर्क थे। इसने उन्हें अपनी महिमा से कम रहने दिया।
Post – 2017-08-25
वह हमें दैख न सकता है मगर
हम उसे देखते हैं, देखिये तो !
…
बीतेगी गम की रात मगर इस तरह नदीम
देखोगे मुझे पूछोगे यह आपही तो हैं?
—
क्यों पूछते है मेरा पता दुश्मने जान
क्यों आप छिपाते हैं यह बतलाइये तो
हम दूर है पर दूर भी इतने तो नही
शिकवे के लिए ही करीब आइए तो।।
….
मियाद अपनी पता है फिर भी
मौत से छेड़छाड़ करते हैं
जिनको ट्रोलिंग की सजा है मालूम
रपट करने में देर करते हैं ।
……
दोस्ती हो न निभ सके फिर भी
दुश्मनी भी तो कायदे की हो!