Post – 2018-04-30

धन-संपत्ति के रूप (2)

संपत्ति
संपत्ति के विषय में एक समय में यह सोचता था कि इसका नामकरण पत्ती के गिरने से उत्पन्न ध्वनि के अनुकरण का परिणाम है। उसी का अर्थ विस्तार सभी वनस्पतियों के लिए हुआ है और उसका अर्थोत्कर्ष संपदा के रूप में हुआ । पत्ती, पत्र, पत्तल, पात्र, पाट, पॉटरी, पैटर्न, पोटली, की श्रृंखला के विषय में मैं आज भी यह मानता हूं इसमें इनमें पत्ती और उससे बने हुए आदिम पात्रों का हाथ है और ऐसा उसी प्राकृतिक परिवेश में संभव है जहां बर्फ नहीं पड़ती थी इसलिए बड़ी पत्तियों वाले पेड़ों की बहुतायत थी और ऐसे पत्ते सुलभ थे जिन पर किसी चीज को रखकर खाया जा सके। भारत में यह सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बन कि आज भी जीवित है। किसी अन्य देश के विषय में ऐसी जानकारी हमें उपलब्ध नहीं है। इसके पीछे संभव है मेरे पूर्वाग्रह काम करते रहे हों, परंतु पत्तल, पात्र, पॉट, पतीला और पोटरी का ध्वनिगत और अर्थगत अनुक्रम जितना निर्णायक है उतना निर्णायक प्रमाण एक भी भारोपीय भाषा दार्शनिकों ने आज तक नहीं दिया ौर तिनकों को पहाड़ बना कर अपनी मनमानी लादते रहे।

परंतु संपत्ति के विषय में मेरे विचारों में कुछ परिवर्तन आया है। मैं यह तो मानता हूं की पत पानी की बूंद की आवाज है और जल की पत संज्ञा का आधार यही है । सभी वनस्पतियों में रस या आर्द्रता पाई जाती है इसलिए उनका जातीय नामकरण जल के इस गुण के कारण हुआ है। परंतु ऐसी स्थिति में तो पत्ती का भी अर्थ बदल जाएगा। पत्ती जिसमे रस पाया जाता है, न कि वह जिसके गिरने से पत् की आवाज होती है। ऋग्वेद की भाषा में कहें तो को ददर्श प्रथमं संज्ञमानं । कुछ मामलों में संदेह का बना रह जाना भी तार्किक विचार की सीमा में आता है।

अर्थ
अर्थ का अर्थ है किसी लता या वनस्पति को निचोड़कर बाहर निकाला हुआ रस या सारतत्व । यह पहले समस्त खाद्य और पेय के लिए और फिर संपदा के दूसरे सभी रूपों के लिए व्यवहार में आने लगा, परंतु जब हम शब्द का अर्थ कहते हैं तो प्राचीन भाव जागृत हो जाता है, भले हम मूल अर्थ ग्रहण करने की जगह रूढ़ आशय से ही अपना काम चलाते हों। जब हम शब्दों के मूल अर्थ का साक्षात्कार करते हैं या जिस अनुपात में यह संभव होता है उस अनुपात में भाषा एक जीवंत सत्ता बनकर उपस्थित होती है, न कि वर्तनी उच्चारण और भाव का जमाकडा।

ऋग्वेद के समय तक अर्थ और अर्थी – अर्थकामी धन और धनकामना का आशय में चलन में थेः
अर्थमिद् वा उ अर्थिन आ जाया युवते पतिम् ।
रोचक है ऐसे स्थानों पर ऋग्वेद ग्रिफिथ ने अर्थ का अनर्थ करते हुए विश कर दिया है जिससे उन्नत अर्थव्यवस्था का आभास न मिले।

द्रव्य/द्रविण
द्रव्य और द्रविण में द्र/ द्रव इतना स्पष्ट है कि किसी व्याख्या की अपेक्षा नहीं रखता। ऋग्वेद से अपने परिचय के आरंभिक दिनों में मैंने द्रव और द्रविण (विश्वं दिवि यदु द्रविणं यत् पृथिव्याम् ) को धातु गलाने की वैदिक विद्या का प्रमाण मान लिया था। विद्या का पता तो उन्हें था इसके प्रमाण भी ऋग्वेद में है। धातु गलाने वाले को द्रवी कहा भी गया है (विजेहमानः परशुर्न जिह्वां द्रविर्न द्रावयति दारु धक्षत् । । 6.3.4) परन्तु मैने कुछ चूक की थी, यह आभास अब हुआ है। ऋग्वेद में द्रविण धन के विविध रूपों का द्योतक प्रतीत होता है (अस्मे रयिं विश्ववारं समिन्वास्मे विश्वानि द्रविणानि धेहि ।। 5.4.7) और इसलिए इसकी आकांक्षा भी बार-बार व्यक्त की गई है, इसका मूल आशय रस से भरे हुए खाद्य पदार्थों के लिए ही रहा लगता है।
द्रवित होना पसीजने का पर्याय है ही।

रेक्ण
रेक्ण का प्रयोग ऋग्वेद के बाद मेरे देखने में नहीं आया, ऋग्वेद में भी इसका प्रयोग अधिक नहीं हुआ है (ददी रेक्णस्तन्वे ददिर्वसु ददिर्वाजेषु पुरुहूत वाजिना) परंतु अंग्रेजी के रिच, रिचेज, को इसका सजात मान सकते है। हम इसे रेचन से व्युत्पन्न मान सकते हैं जिसका अर्थ जल है।

नृम्ण
नृम्ण का प्रयोग भी वैदिक काल के बाद शायद ही हुआ हो। इसे मैं मनुष्य द्वारा अपने सामर्थ्य उत्पादित धन के रूप में ग्रहण करना चाहता हूं परंतु साथ ही यह नहीं भूल पाता कि नर का अर्थ भी जल है । नर, नारा, नीर, नूर एक ही श्रृंखला के शब्द हैं यद्यपि नर का पुरुष के आशय में प्रयोग होते रहने के कारण जल वाला अर्थ हमारे लिए अपरिचित है। नूर तो फारसी में भी प्रकाश या कांति के आशय में ही बचा रह गया लगता है।

हिरण्य
चालू व्याख्या में हम कह सकते हैं की यह वह मूल्यवान धातु है जिसकी खोज जाती है, पर हर, हरि, हिर सभी जल के ही पर्याय हैं। हीरा या हीरक में भी इसे देखा जा सकता है।

स्वर्ण
स्वः का अर्थ जल है, इसका प्रयोग सूर्य के लिए भी देखा जा सकता है (तपन्अति शत्रुं स्वः न भूमा) अर्ण के विषय में यहां कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। अतः यह जल के लिए प्रयुक्त दो शब्दों से बना हुआ पद है।

कंचन/ कनक
कंचन में भी प्रयुक्त कन् और चन दोनों शब्द जलवाची हैं। कनक में भी कन् की उपस्थिति देखी जा सकती है।

रजत
रजत में भी रज शब्द से हम पहले परिचित हो चुके हैं जिसका एक अर्थ है जल है और दूसरा उसके गुणों वाला श्वेत रंग का चमकने वाला पदार्थ और इसी आशय में इसका प्रयोग चांदी के लिए ऋग्वेद में हुआ है और आज भी होता है।

चंद्र
चंद्र के विषय में यह पहले का आए हैं इसमें चन् और द्र, दो जलार्थक शब्दों का प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद में चंद्रम का प्रयोग लगभग उसी अनुपात में हुआ है जिस अनुपात में हिरण्य का। परंतु इसको भ्रमवश चंद्रमा के आशय में ही ग्रहण किया जाता रहा। मैंने पहली बार इसके बहुवचन रूप तालिका बद्ध करके तुलना करते हुए हमने सुझाया कि चांदी चंद्रम से ही व्युत्पन्न है और वैदिक काल में चांदी का बहुत प्रचुरता से प्रयोग हुआ करता था। वास्तव में रजत शब्द का प्रयोग ईरान से आगे की भाषाओं में अधिक पाया जाता है। तमिल में शब्द के आरंभ में रकार होने पर उच्चारण की सुकरता के लिए अकार का सहारा लिया जाता है और इसलिए अर्जेंटम रजत की देन है।

Post – 2018-04-30

धन-संपत्ति के रूप (2)

संपत्ति
संपत्ति के विषय में एक समय में यह सोचता था कि इसका नामकरण पत्ती के गिरने से उत्पन्न ध्वनि के अनुकरण का परिणाम है। उसी का अर्थ विस्तार सभी वनस्पतियों के लिए हुआ है और उसका अर्थोत्कर्ष संपदा के रूप में हुआ । पत्ती, पत्र, पत्तल, पात्र, पाट, पॉटरी, पैटर्न, पोटली, की श्रृंखला के विषय में मैं आज भी यह मानता हूं इसमें इनमें पत्ती और उससे बने हुए आदिम पात्रों का हाथ है और ऐसा उसी प्राकृतिक परिवेश में संभव है जहां बर्फ नहीं पड़ती थी इसलिए बड़ी पत्तियों वाले पेड़ों की बहुतायत थी और ऐसे पत्ते सुलभ थे जिन पर किसी चीज को रखकर खाया जा सके। भारत में यह सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बन कि आज भी जीवित है। किसी अन्य देश के विषय में ऐसी जानकारी हमें उपलब्ध नहीं है। इसके पीछे संभव है मेरे पूर्वाग्रह काम करते रहे हों, परंतु पत्तल, पात्र, पॉट, पतीला और पोटरी का ध्वनिगत और अर्थगत अनुक्रम जितना निर्णायक है उतना निर्णायक प्रमाण एक भी भारोपीय भाषा दार्शनिकों ने आज तक नहीं दिया ौर तिनकों को पहाड़ बना कर अपनी मनमानी लादते रहे।

परंतु संपत्ति के विषय में मेरे विचारों में कुछ परिवर्तन आया है। मैं यह तो मानता हूं की पत पानी की बूंद की आवाज है और जल की पत संज्ञा का आधार यही है । सभी वनस्पतियों में रस या आर्द्रता पाई जाती है इसलिए उनका जातीय नामकरण जल के इस गुण के कारण हुआ है। परंतु ऐसी स्थिति में तो पत्ती का भी अर्थ बदल जाएगा। पत्ती जिसमे रस पाया जाता है, न कि वह जिसके गिरने से पत् की आवाज होती है। ऋग्वेद की भाषा में कहें तो को ददर्श प्रथमं संज्ञमानं । कुछ मामलों में संदेह का बना रह जाना भी तार्किक विचार की सीमा में आता है।

अर्थ
अर्थ का अर्थ है किसी लता या वनस्पति को निचोड़कर बाहर निकाला हुआ रस या सारतत्व । यह पहले समस्त खाद्य और पेय के लिए और फिर संपदा के दूसरे सभी रूपों के लिए व्यवहार में आने लगा, परंतु जब हम शब्द का अर्थ कहते हैं तो प्राचीन भाव जागृत हो जाता है, भले हम मूल अर्थ ग्रहण करने की जगह रूढ़ आशय से ही अपना काम चलाते हों। जब हम शब्दों के मूल अर्थ का साक्षात्कार करते हैं या जिस अनुपात में यह संभव होता है उस अनुपात में भाषा एक जीवंत सत्ता बनकर उपस्थित होती है, न कि वर्तनी उच्चारण और भाव का जमाकडा।

ऋग्वेद के समय तक अर्थ और अर्थी – अर्थकामी धन और धनकामना का आशय में चलन में थेः
अर्थमिद् वा उ अर्थिन आ जाया युवते पतिम् ।
रोचक है ऐसे स्थानों पर ऋग्वेद ग्रिफिथ ने अर्थ का अनर्थ करते हुए विश कर दिया है जिससे उन्नत अर्थव्यवस्था का आभास न मिले।

द्रव्य/द्रविण
द्रव्य और द्रविण में द्र/ द्रव इतना स्पष्ट है कि किसी व्याख्या की अपेक्षा नहीं रखता। ऋग्वेद से अपने परिचय के आरंभिक दिनों में मैंने द्रव और द्रविण (विश्वं दिवि यदु द्रविणं यत् पृथिव्याम् ) को धातु गलाने की वैदिक विद्या का प्रमाण मान लिया था। विद्या का पता तो उन्हें था इसके प्रमाण भी ऋग्वेद में है। धातु गलाने वाले को द्रवी कहा भी गया है (विजेहमानः परशुर्न जिह्वां द्रविर्न द्रावयति दारु धक्षत् । । 6.3.4) परन्तु मैने कुछ चूक की थी, यह आभास अब हुआ है। ऋग्वेद में द्रविण धन के विविध रूपों का द्योतक प्रतीत होता है (अस्मे रयिं विश्ववारं समिन्वास्मे विश्वानि द्रविणानि धेहि ।। 5.4.7) और इसलिए इसकी आकांक्षा भी बार-बार व्यक्त की गई है, इसका मूल आशय रस से भरे हुए खाद्य पदार्थों के लिए ही रहा लगता है।
द्रवित होना पसीजने का पर्याय है ही।

रेक्ण
रेक्ण का प्रयोग ऋग्वेद के बाद मेरे देखने में नहीं आया, ऋग्वेद में भी इसका प्रयोग अधिक नहीं हुआ है (ददी रेक्णस्तन्वे ददिर्वसु ददिर्वाजेषु पुरुहूत वाजिना) परंतु अंग्रेजी के रिच, रिचेज, को इसका सजात मान सकते है। हम इसे रेचन से व्युत्पन्न मान सकते हैं जिसका अर्थ जल है।

नृम्ण
नृम्ण का प्रयोग भी वैदिक काल के बाद शायद ही हुआ हो। इसे मैं मनुष्य द्वारा अपने सामर्थ्य उत्पादित धन के रूप में ग्रहण करना चाहता हूं परंतु साथ ही यह नहीं भूल पाता कि नर का अर्थ भी जल है । नर, नारा, नीर, नूर एक ही श्रृंखला के शब्द हैं यद्यपि नर का पुरुष के आशय में प्रयोग होते रहने के कारण जल वाला अर्थ हमारे लिए अपरिचित है। नूर तो फारसी में भी प्रकाश या कांति के आशय में ही बचा रह गया लगता है।

हिरण्य
चालू व्याख्या में हम कह सकते हैं की यह वह मूल्यवान धातु है जिसकी खोज जाती है, पर हर, हरि, हिर सभी जल के ही पर्याय हैं। हीरा या हीरक में भी इसे देखा जा सकता है।

स्वर्ण
स्वः का अर्थ जल है, इसका प्रयोग सूर्य के लिए भी देखा जा सकता है (तपन्अति शत्रुं स्वः न भूमा) अर्ण के विषय में यहां कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। अतः यह जल के लिए प्रयुक्त दो शब्दों से बना हुआ पद है।

कंचन/ कनक
कंचन में भी प्रयुक्त कन् और चन दोनों शब्द जलवाची हैं। कनक में भी कन् की उपस्थिति देखी जा सकती है।

रजत
रजत में भी रज शब्द से हम पहले परिचित हो चुके हैं जिसका एक अर्थ है जल है और दूसरा उसके गुणों वाला श्वेत रंग का चमकने वाला पदार्थ और इसी आशय में इसका प्रयोग चांदी के लिए ऋग्वेद में हुआ है और आज भी होता है।

चंद्र
चंद्र के विषय में यह पहले का आए हैं इसमें चन् और द्र, दो जलार्थक शब्दों का प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद में चंद्रम का प्रयोग लगभग उसी अनुपात में हुआ है जिस अनुपात में हिरण्य का। परंतु इसको भ्रमवश चंद्रमा के आशय में ही ग्रहण किया जाता रहा। मैंने पहली बार इसके बहुवचन रूप तालिका बद्ध करके तुलना करते हुए हमने सुझाया कि चांदी चंद्रम से ही व्युत्पन्न है और वैदिक काल में चांदी का बहुत प्रचुरता से प्रयोग हुआ करता था। वास्तव में रजत शब्द का प्रयोग ईरान से आगे की भाषाओं में अधिक पाया जाता है। तमिल में शब्द के आरंभ में रकार होने पर उच्चारण की सुकरता के लिए अकार का सहारा लिया जाता है और इसलिए अर्जेंटम रजत की देन है।

Post – 2018-04-30

धन-संपत्ति के रूप (2)

संपत्ति
संपत्ति के विषय में एक समय में यह सोचता था कि इसका नामकरण पत्ती के गिरने से उत्पन्न ध्वनि के अनुकरण का परिणाम है। उसी का अर्थ विस्तार सभी वनस्पतियों के लिए हुआ है और उसका अर्थोत्कर्ष संपदा के रूप में हुआ । पत्ती, पत्र, पत्तल, पात्र, पाट, पॉटरी, पैटर्न, पोटली, की श्रृंखला के विषय में मैं आज भी यह मानता हूं इसमें इनमें पत्ती और उससे बने हुए आदिम पात्रों का हाथ है और ऐसा उसी प्राकृतिक परिवेश में संभव है जहां बर्फ नहीं पड़ती थी इसलिए बड़ी पत्तियों वाले पेड़ों की बहुतायत थी और ऐसे पत्ते सुलभ थे जिन पर किसी चीज को रखकर खाया जा सके। भारत में यह सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बन कि आज भी जीवित है। किसी अन्य देश के विषय में ऐसी जानकारी हमें उपलब्ध नहीं है। इसके पीछे संभव है मेरे पूर्वाग्रह काम करते रहे हों, परंतु पत्तल, पात्र, पॉट, पतीला और पोटरी का ध्वनिगत और अर्थगत अनुक्रम जितना निर्णायक है उतना निर्णायक प्रमाण एक भी भारोपीय भाषा दार्शनिकों ने आज तक नहीं दिया ौर तिनकों को पहाड़ बना कर अपनी मनमानी लादते रहे।

परंतु संपत्ति के विषय में मेरे विचारों में कुछ परिवर्तन आया है। मैं यह तो मानता हूं की पत पानी की बूंद की आवाज है और जल की पत संज्ञा का आधार यही है । सभी वनस्पतियों में रस या आर्द्रता पाई जाती है इसलिए उनका जातीय नामकरण जल के इस गुण के कारण हुआ है। परंतु ऐसी स्थिति में तो पत्ती का भी अर्थ बदल जाएगा। पत्ती जिसमे रस पाया जाता है, न कि वह जिसके गिरने से पत् की आवाज होती है। ऋग्वेद की भाषा में कहें तो को ददर्श प्रथमं संज्ञमानं । कुछ मामलों में संदेह का बना रह जाना भी तार्किक विचार की सीमा में आता है।

अर्थ
अर्थ का अर्थ है किसी लता या वनस्पति को निचोड़कर बाहर निकाला हुआ रस या सारतत्व । यह पहले समस्त खाद्य और पेय के लिए और फिर संपदा के दूसरे सभी रूपों के लिए व्यवहार में आने लगा, परंतु जब हम शब्द का अर्थ कहते हैं तो प्राचीन भाव जागृत हो जाता है, भले हम मूल अर्थ ग्रहण करने की जगह रूढ़ आशय से ही अपना काम चलाते हों। जब हम शब्दों के मूल अर्थ का साक्षात्कार करते हैं या जिस अनुपात में यह संभव होता है उस अनुपात में भाषा एक जीवंत सत्ता बनकर उपस्थित होती है, न कि वर्तनी उच्चारण और भाव का जमाकडा।

ऋग्वेद के समय तक अर्थ और अर्थी – अर्थकामी धन और धनकामना का आशय में चलन में थेः
अर्थमिद् वा उ अर्थिन आ जाया युवते पतिम् ।
रोचक है ऐसे स्थानों पर ऋग्वेद ग्रिफिथ ने अर्थ का अनर्थ करते हुए विश कर दिया है जिससे उन्नत अर्थव्यवस्था का आभास न मिले।

द्रव्य/द्रविण
द्रव्य और द्रविण में द्र/ द्रव इतना स्पष्ट है कि किसी व्याख्या की अपेक्षा नहीं रखता। ऋग्वेद से अपने परिचय के आरंभिक दिनों में मैंने द्रव और द्रविण (विश्वं दिवि यदु द्रविणं यत् पृथिव्याम् ) को धातु गलाने की वैदिक विद्या का प्रमाण मान लिया था। विद्या का पता तो उन्हें था इसके प्रमाण भी ऋग्वेद में है। धातु गलाने वाले को द्रवी कहा भी गया है (विजेहमानः परशुर्न जिह्वां द्रविर्न द्रावयति दारु धक्षत् । । 6.3.4) परन्तु मैने कुछ चूक की थी, यह आभास अब हुआ है। ऋग्वेद में द्रविण धन के विविध रूपों का द्योतक प्रतीत होता है (अस्मे रयिं विश्ववारं समिन्वास्मे विश्वानि द्रविणानि धेहि ।। 5.4.7) और इसलिए इसकी आकांक्षा भी बार-बार व्यक्त की गई है, इसका मूल आशय रस से भरे हुए खाद्य पदार्थों के लिए ही रहा लगता है।
द्रवित होना पसीजने का पर्याय है ही।

रेक्ण
रेक्ण का प्रयोग ऋग्वेद के बाद मेरे देखने में नहीं आया, ऋग्वेद में भी इसका प्रयोग अधिक नहीं हुआ है (ददी रेक्णस्तन्वे ददिर्वसु ददिर्वाजेषु पुरुहूत वाजिना) परंतु अंग्रेजी के रिच, रिचेज, को इसका सजात मान सकते है। हम इसे रेचन से व्युत्पन्न मान सकते हैं जिसका अर्थ जल है।

नृम्ण
नृम्ण का प्रयोग भी वैदिक काल के बाद शायद ही हुआ हो। इसे मैं मनुष्य द्वारा अपने सामर्थ्य उत्पादित धन के रूप में ग्रहण करना चाहता हूं परंतु साथ ही यह नहीं भूल पाता कि नर का अर्थ भी जल है । नर, नारा, नीर, नूर एक ही श्रृंखला के शब्द हैं यद्यपि नर का पुरुष के आशय में प्रयोग होते रहने के कारण जल वाला अर्थ हमारे लिए अपरिचित है। नूर तो फारसी में भी प्रकाश या कांति के आशय में ही बचा रह गया लगता है।

हिरण्य
चालू व्याख्या में हम कह सकते हैं की यह वह मूल्यवान धातु है जिसकी खोज जाती है, पर हर, हरि, हिर सभी जल के ही पर्याय हैं। हीरा या हीरक में भी इसे देखा जा सकता है।

स्वर्ण
स्वः का अर्थ जल है, इसका प्रयोग सूर्य के लिए भी देखा जा सकता है (तपन्अति शत्रुं स्वः न भूमा) अर्ण के विषय में यहां कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। अतः यह जल के लिए प्रयुक्त दो शब्दों से बना हुआ पद है।

कंचन/ कनक
कंचन में भी प्रयुक्त कन् और चन दोनों शब्द जलवाची हैं। कनक में भी कन् की उपस्थिति देखी जा सकती है।

रजत
रजत में भी रज शब्द से हम पहले परिचित हो चुके हैं जिसका एक अर्थ है जल है और दूसरा उसके गुणों वाला श्वेत रंग का चमकने वाला पदार्थ और इसी आशय में इसका प्रयोग चांदी के लिए ऋग्वेद में हुआ है और आज भी होता है।

चंद्र
चंद्र के विषय में यह पहले का आए हैं इसमें चन् और द्र, दो जलार्थक शब्दों का प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद में चंद्रम का प्रयोग लगभग उसी अनुपात में हुआ है जिस अनुपात में हिरण्य का। परंतु इसको भ्रमवश चंद्रमा के आशय में ही ग्रहण किया जाता रहा। मैंने पहली बार इसके बहुवचन रूप तालिका बद्ध करके तुलना करते हुए हमने सुझाया कि चांदी चंद्रम से ही व्युत्पन्न है और वैदिक काल में चांदी का बहुत प्रचुरता से प्रयोग हुआ करता था। वास्तव में रजत शब्द का प्रयोग ईरान से आगे की भाषाओं में अधिक पाया जाता है। तमिल में शब्द के आरंभ में रकार होने पर उच्चारण की सुकरता के लिए अकार का सहारा लिया जाता है और इसलिए अर्जेंटम रजत की देन है।

Post – 2018-04-30

सवाल विश्वसनीयता का है

आज भारत के सभी दल आसन्न भविष्य में सत्ता हासिल करने के लिए नहीं , अपितु भाजपा को सत्ता से वंचित करने के लिए, किसी भी तरह का जोड़-तोड़ करने और गर्हित से गर्हित हथकंडा अपनाने को तैयार हैं और इसके बाद भी उन्हें भरोसा नहीं कि वे ऐसा करने में सफल होंगे। इससे तीन बातें स्वतः सिद्ध हैः
1. वे दिशाहीन हें, उनमें सत्ता की भूख तो है, पर आगे का कोई ठोस कार्यक्रम नही है;
२. सभी मानते हैं की उनमें से कोई अकेला मोदी के नेतृत्व वाले भाजपा का सामना नहीं कर सकता और सभी मिलकर भी उसके बराबर नहीं है और

३. यह कि पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के लगातार कोसने के बाद भी जनसाधारण के बीच भाजपा की साख इन सभी की अपेक्षा अधिक बनी हुई है, अन्यथा इनके निराश होने की कोई वजह वजह न थी।

ऐसी स्थिति में समस्या सत्ता हासिल करने की नहीं है, अपितु विश्वसनीयता अर्जित करने की है। मोदी को तीन बार ऐसे निर्णय लेने पड़े जो किसी व्यक्ति और प्रशासन की विश्वसनीयता को समाप्त कर सकते थे:
१. विमुद्रीकरण का प्रयोग स्वयं ही जोखिम भरा प्रयोग था, क्योंकि इससे पहले यदि किसी देश ने ऐसा प्रयोग किया था तो सत्ता पलट गई थी । विपक्ष और राजनीतिक दलों से लगाव रखने वाले पत्रकार और बुद्धिजीवी इस उम्मीद में थे कि यहां भी ऐसा हो सकता है और इसलिए उन्होंने अपना सारा जोर लगा दिया था। सभी संचारमाध्यम मोदी की कटु आलोचना कर रहे थे और इस प्रयोग से जनता को होने वाली कठिनाइयों का हृदयविदारक चित्र प्रस्तुत कर रहे थे। कई बार संचार माध्यमों का प्रयोग लोगों को उकसाने के लिए किया गया। सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश ने अपनी सीमा तोड़कर बयान दिया, राष्ट्रपति ने भी दबी जुबान से अपनी निराशा प्रकट की।

यह कोई नहीं कह सकता कि सार्वजनिक जीवन पर, छोटे काम-धंधों पर और कुछ दूर तक बड़े उद्योगों पर भी तत्समय या उसके बाद तक इसका प्रभाव कष्टकर नहीं रहा। इसके बावजूद जो बुद्धिजीवी मोदी की निंदा करने के लिए मुहावरों का अनुसंधान करते रहते थे, उन्हें भी यह देख कर आश्चर्य हुआ, कि इतना सब कुछ सहने ने के बाद भी जनता मे मोदी की विश्वसनीयता कम नहीं हुई।

२. जीएसटी दूसरा प्रयोग था जिससे अर्थव्यवस्था ही नहीं कुछ समय के लिए कर की उगाही में भी निराशाजनक परिणाम देखने को मिले । इसके बाद भी इससे प्रभावित व्यापारियों के बीच भी मोदी की विश्वसनीयता पर आंच नहीं आई, या आई तो इतनी कम कि उसका निर्णायक प्रभाव नहीं पड़ा।

३. विदेशनीति में एक और सबको साथ लेने के व्यक्तिगत और कूटनीतिक प्रयत्न जिनमे बरती गई उदारता को देश के लिए अहितकर बताया जाता रहा और दूसरी और सामरिक तैयारी जिसे भी मोदी की युयुत्सु प्रकृति का प्रमाण माना गया जब की विभिन्न कारणों से उनकी सफलता मोदी को एक दूरदर्शी राजविद सिद्ध किया.

कतिपय नकली मुद्दे उठा कर जाटों को, पाटीदारों को, दलितों को, मुसलमानों को भड़काने ओर अलगाने के प्रयत्न किए गए। विक्षोभ को, अपवित्र साधनों का प्रयोग करते हुए, इस सीमा तक पहुंचाया गया कि पूरे देश में अराजकता फैल जाए।

बुद्धिजीवियों ने या तो मुखर होकर अराजक तत्वों का साथ दिया, या चुप्पी साध ली। उन्हें कभी ऐसे अशोभन तरीकों की निंदा करते हुए नहीं पाया गया। घबराहट के कारण हडबडी में पाखंड और धूर्ततापूर्ण प्रदर्शनों का जाने कितनी बार प्रयोग किया गया और इसमें विदेशी परामर्शदाताओं तक का भी सहयोग लिया गया।

कई बार जनता की नजर में देशद्रोह प्रतीत होने वाले प्रदर्शन और आयोजन किए गए,। बुद्धिजीवियों द्वारा उनकी हिमायत की गई। ऎसी स्थिति में जहां हिंदुत्व को बदनाम करने के लिए अशोभन तरीके से भगवा ध्वज का प्रदर्शनीय प्रयोग हुआ या गोरक्षा के नाम पर पशु तस्करों की प्रतारणा और लूटपाट की घटनाएं घटी और समस्या की संवेदनशीलता को देखते हुए भाजपा सरकारों ने भी ठंडा रवैया अपनाया, और अपराधियों को दंडित करने में विलंब या संकोच किया, वहां पर दूसरी पाखंडपूर्ण गतिविधियों के कारण, कम से कम हिंदू समाज में, यह विश्वास पैदा नहीं हो सका कि इन सब के पीछे कांग्रेस का हाथ नहीं है ।

प्रशासन की विफलता सिद्ध करने के लिए रेलवे के न जाने कितने एक्सीडेंट कराए गए, जिनमें मानव हस्तक्षेप को छुपाया नहीं जा सकता था, और इन दुर्घटनाओं पर उनके प्रति सहानुभूति प्रकट करने की जगह प्रशासन की खिल्ली उड़ाई जाती रही।

मुसलमानों में नितान्त मामूली और काल्पनिक आधार पर ( सोचिए, दो दो बीवियां रखने वाला एक हीरो तीसरी की तैयारी कर रहा है और उसकी पत्नी अपनी असुरक्षा का सवाल उठाती है तो वह इसे मुसलमानों के मन में असुरक्षा की भावना का सवाल बना देता है), कभी-कभी शातिराना ढंग से,असंतोष भड़काने के प्रयत्न किए गए ( JNU का IS से जुड़ाव रखने वाला एक लड़का ABVP नेता को पीटने के बाद चुपके से गायब हो जाता है और बहुत बाद में उसकी असलियत पता चलती है पर उसकी मां को लेकर इस तरह के इशारे करते हुए बयान दिए जाते हैं मानो सरकार ने उसे जानबूझकर गायब कराया हो) , जबकि उसकी तुलना में अधिक जघन्य और संख्या में गणनातीत त्रासदियों के प्रति संचार माध्यम और बुद्धिजीवियों द्वारा लकवाग्रस्त उपेक्षा का प्रमाण दिया गया।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शत्रु देशों के साथ छिपी सांठगांठ के प्रमाण दिए गए और सैन्य बलों के मनोबल को गिराने वाले बयान दिए जाते रहे, आहत और हताहत सैनिकों के प्रति संवेदनहीनता प्रदर्शित की जाती रही, और इस पर भी बुद्धिजीवी चुप रहे।

मोदी और भाजपा का विरोध करने वालों ने विरल अपवादों को छोड़कर तार्किक विश्लेषण का सहारा नहीं लिया, केवल मखौल उड़ाते रहे और विमर्श का स्तर नीचे गिरा कर आरोप प्रत्यारोप करते रहे, जो उनकी घृणा तो प्रकट करता था, परंतु समझदारी को नहीं । जिन क्षेत्रों में भारत की सफलता और नेतृत्व शक्ति, दुनिया में पहली बार आशा जगा रही थी, उनमें ऐसे बुद्धिजीवियों को कुछ दिखता ही नहीं या सब कुछ उलटा दिखाई दिया।

जिस बात को मोदी ने अपने पिछले चुनाव में केंद्रीय मुद्दा बनाया था अर्थात कांग्रेस पार्टी नहीं है वह एक वंश का राज्य है उसे उस वंश ने निर्लज्जता पूर्वक स्वीकार और प्रमाणित किया।

कांग्रेस के शासन की वापसी का सपना देखने वालों ने यह दोहराते हुए कि भाजपा ने कांग्रेस के ही कार्यक्रमों को कार्यान्वित किया, एक साथ दो बातें प्रमाणित की। पहला यह कि वर्तमान शासन उन योजनाओं को क्रियान्वित करने की क्षमता रखता है जिनके कांग्रेस केवल सपने देखती थी और कमीशन तय न हो पाने के कारण जो लटके रह जाते थे और दूसरे भाजपा की नीतियां राष्ट्रीय हित हैं। यदि किसी चीज में कमी है तो वह है उच्चतम स्तर से संचालित होने वाला भ्रष्टाचार।

ऐसी स्थिति में सामान्य जन को लगता है कि वे लोग जो कांग्रेस के शासन की वापसी के लिए बेचैन है, केवल भ्रष्टाचार के लिए कांग्रेस की वापसी चाहते हैं क्योंकि किसी अन्य बदलाव का संकेत उनके अब तक के बयानों या कार्यक्रम में उन्हें दिखाई दे रहा है?

कांग्रेस के लूटपाट के दौर में पत्रकारों शिक्षकों और बुद्धिजीवियों को भी तरह तरह से लाभान्वित किया जाता था ताकि वे चुप रहे या उसका समर्थन करें इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। इसके विरल अपवाद वे पत्रकार और बुद्धिजीवी हो सकते हैं जिनका लगाव ऐसे दलों से रहा है जो आज अपनी साख गंवाकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। बुद्धिजीवियों की साख भी उसी तरह डाव पर उन्कीलग अतिसक्रियता के कारण लगती गई है पर उनको इसकी चिंता तक नहीं ।

मैं यहां वर्तमान शासन सफलताओं या उपलब्धियों की गिनती कराना नहीं चाहता परंतु यह दुखद है कि जो दल और बुद्धिजीवी विविध कारणों से अपनी विश्वसनीयता खोते गए हैं, या खोई हुई विश्वसनीयता हासिल नहीं कर सके हैं, उन्हें उस दिशा में प्रयत्नशील तक नहीं देखा जा रहा है। ऊपर गिनाए गए उनके सारे प्रयत्न रही सही विश्वसनीयता को भी खत्म करने के लाजवाब प्रयोग तो कहें जा सकते हैं पर जनता से बीच अपनी विश्वसनीयता पैदा करने के प्रयोग नहीं माने जा सकते।

पहले भी मोदी को सफलता का नहीं राजनीतिक क्षेत्र में पैदा हुई रिक्तता का लाभ मिला था. विगत वर्षों में यह रिक्तता बढी है, न कि कम हुई है। इसका लाभ तो मोदी को और भाजपा को मिलना ही है।

व्यावहारिक राजनीति मैं धूर्तता और षड्यंत्र के बल पर कुछ भी हासिल किया जा सकता है और पहले भी हासिल किया गया है, इसलिए हम चुनाव की गणित में अपनी बात नहीं रख सकते। जाति धर्म और पैसे का ऐसा सदुपयोग हो सकता है कि सत्ता भाजपा के हाथ से चली जाए। किसी दल की लंबे समय तक उपस्थिति और शिक्षा और संस्कृति के मामले में उसकी नीतियां और व्यवहार जितने भी असंतोषजनक क्यों न हों, मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा जीतकर तो कमजोर हो सकती है पर यदि हार हो ही गई तो दोबारा उसका और मजबूत बनकर सत्ता में आना निश्चित है।

Post – 2018-04-30

सवाल विश्वसनीयता का है

आज भारत के सभी दल आसन्न भविष्य में सत्ता हासिल करने के लिए नहीं , अपितु भाजपा को सत्ता से वंचित करने के लिए, किसी भी तरह का जोड़-तोड़ करने और गर्हित से गर्हित हथकंडा अपनाने को तैयार हैं और इसके बाद भी उन्हें भरोसा नहीं कि वे ऐसा करने में सफल होंगे। इससे तीन बातें स्वतः सिद्ध हैः
1. वे दिशाहीन हें, उनमें सत्ता की भूख तो है, पर आगे का कोई ठोस कार्यक्रम नही है;
२. सभी मानते हैं की उनमें से कोई अकेला मोदी के नेतृत्व वाले भाजपा का सामना नहीं कर सकता और सभी मिलकर भी उसके बराबर नहीं है और

३. यह कि पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के लगातार कोसने के बाद भी जनसाधारण के बीच भाजपा की साख इन सभी की अपेक्षा अधिक बनी हुई है, अन्यथा इनके निराश होने की कोई वजह वजह न थी।

ऐसी स्थिति में समस्या सत्ता हासिल करने की नहीं है, अपितु विश्वसनीयता अर्जित करने की है। मोदी को तीन बार ऐसे निर्णय लेने पड़े जो किसी व्यक्ति और प्रशासन की विश्वसनीयता को समाप्त कर सकते थे:
१. विमुद्रीकरण का प्रयोग स्वयं ही जोखिम भरा प्रयोग था, क्योंकि इससे पहले यदि किसी देश ने ऐसा प्रयोग किया था तो सत्ता पलट गई थी । विपक्ष और राजनीतिक दलों से लगाव रखने वाले पत्रकार और बुद्धिजीवी इस उम्मीद में थे कि यहां भी ऐसा हो सकता है और इसलिए उन्होंने अपना सारा जोर लगा दिया था। सभी संचारमाध्यम मोदी की कटु आलोचना कर रहे थे और इस प्रयोग से जनता को होने वाली कठिनाइयों का हृदयविदारक चित्र प्रस्तुत कर रहे थे। कई बार संचार माध्यमों का प्रयोग लोगों को उकसाने के लिए किया गया। सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश ने अपनी सीमा तोड़कर बयान दिया, राष्ट्रपति ने भी दबी जुबान से अपनी निराशा प्रकट की।

यह कोई नहीं कह सकता कि सार्वजनिक जीवन पर, छोटे काम-धंधों पर और कुछ दूर तक बड़े उद्योगों पर भी तत्समय या उसके बाद तक इसका प्रभाव कष्टकर नहीं रहा। इसके बावजूद जो बुद्धिजीवी मोदी की निंदा करने के लिए मुहावरों का अनुसंधान करते रहते थे, उन्हें भी यह देख कर आश्चर्य हुआ, कि इतना सब कुछ सहने ने के बाद भी जनता मे मोदी की विश्वसनीयता कम नहीं हुई।

२. जीएसटी दूसरा प्रयोग था जिससे अर्थव्यवस्था ही नहीं कुछ समय के लिए कर की उगाही में भी निराशाजनक परिणाम देखने को मिले । इसके बाद भी इससे प्रभावित व्यापारियों के बीच भी मोदी की विश्वसनीयता पर आंच नहीं आई, या आई तो इतनी कम कि उसका निर्णायक प्रभाव नहीं पड़ा।

३. विदेशनीति में एक और सबको साथ लेने के व्यक्तिगत और कूटनीतिक प्रयत्न जिनमे बरती गई उदारता को देश के लिए अहितकर बताया जाता रहा और दूसरी और सामरिक तैयारी जिसे भी मोदी की युयुत्सु प्रकृति का प्रमाण माना गया जब की विभिन्न कारणों से उनकी सफलता मोदी को एक दूरदर्शी राजविद सिद्ध किया.

कतिपय नकली मुद्दे उठा कर जाटों को, पाटीदारों को, दलितों को, मुसलमानों को भड़काने ओर अलगाने के प्रयत्न किए गए। विक्षोभ को, अपवित्र साधनों का प्रयोग करते हुए, इस सीमा तक पहुंचाया गया कि पूरे देश में अराजकता फैल जाए।

बुद्धिजीवियों ने या तो मुखर होकर अराजक तत्वों का साथ दिया, या चुप्पी साध ली। उन्हें कभी ऐसे अशोभन तरीकों की निंदा करते हुए नहीं पाया गया। घबराहट के कारण हडबडी में पाखंड और धूर्ततापूर्ण प्रदर्शनों का जाने कितनी बार प्रयोग किया गया और इसमें विदेशी परामर्शदाताओं तक का भी सहयोग लिया गया।

कई बार जनता की नजर में देशद्रोह प्रतीत होने वाले प्रदर्शन और आयोजन किए गए,। बुद्धिजीवियों द्वारा उनकी हिमायत की गई। ऎसी स्थिति में जहां हिंदुत्व को बदनाम करने के लिए अशोभन तरीके से भगवा ध्वज का प्रदर्शनीय प्रयोग हुआ या गोरक्षा के नाम पर पशु तस्करों की प्रतारणा और लूटपाट की घटनाएं घटी और समस्या की संवेदनशीलता को देखते हुए भाजपा सरकारों ने भी ठंडा रवैया अपनाया, और अपराधियों को दंडित करने में विलंब या संकोच किया, वहां पर दूसरी पाखंडपूर्ण गतिविधियों के कारण, कम से कम हिंदू समाज में, यह विश्वास पैदा नहीं हो सका कि इन सब के पीछे कांग्रेस का हाथ नहीं है ।

प्रशासन की विफलता सिद्ध करने के लिए रेलवे के न जाने कितने एक्सीडेंट कराए गए, जिनमें मानव हस्तक्षेप को छुपाया नहीं जा सकता था, और इन दुर्घटनाओं पर उनके प्रति सहानुभूति प्रकट करने की जगह प्रशासन की खिल्ली उड़ाई जाती रही।

मुसलमानों में नितान्त मामूली और काल्पनिक आधार पर ( सोचिए, दो दो बीवियां रखने वाला एक हीरो तीसरी की तैयारी कर रहा है और उसकी पत्नी अपनी असुरक्षा का सवाल उठाती है तो वह इसे मुसलमानों के मन में असुरक्षा की भावना का सवाल बना देता है), कभी-कभी शातिराना ढंग से,असंतोष भड़काने के प्रयत्न किए गए ( JNU का IS से जुड़ाव रखने वाला एक लड़का ABVP नेता को पीटने के बाद चुपके से गायब हो जाता है और बहुत बाद में उसकी असलियत पता चलती है पर उसकी मां को लेकर इस तरह के इशारे करते हुए बयान दिए जाते हैं मानो सरकार ने उसे जानबूझकर गायब कराया हो) , जबकि उसकी तुलना में अधिक जघन्य और संख्या में गणनातीत त्रासदियों के प्रति संचार माध्यम और बुद्धिजीवियों द्वारा लकवाग्रस्त उपेक्षा का प्रमाण दिया गया।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शत्रु देशों के साथ छिपी सांठगांठ के प्रमाण दिए गए और सैन्य बलों के मनोबल को गिराने वाले बयान दिए जाते रहे, आहत और हताहत सैनिकों के प्रति संवेदनहीनता प्रदर्शित की जाती रही, और इस पर भी बुद्धिजीवी चुप रहे।

मोदी और भाजपा का विरोध करने वालों ने विरल अपवादों को छोड़कर तार्किक विश्लेषण का सहारा नहीं लिया, केवल मखौल उड़ाते रहे और विमर्श का स्तर नीचे गिरा कर आरोप प्रत्यारोप करते रहे, जो उनकी घृणा तो प्रकट करता था, परंतु समझदारी को नहीं । जिन क्षेत्रों में भारत की सफलता और नेतृत्व शक्ति, दुनिया में पहली बार आशा जगा रही थी, उनमें ऐसे बुद्धिजीवियों को कुछ दिखता ही नहीं या सब कुछ उलटा दिखाई दिया।

जिस बात को मोदी ने अपने पिछले चुनाव में केंद्रीय मुद्दा बनाया था अर्थात कांग्रेस पार्टी नहीं है वह एक वंश का राज्य है उसे उस वंश ने निर्लज्जता पूर्वक स्वीकार और प्रमाणित किया।

कांग्रेस के शासन की वापसी का सपना देखने वालों ने यह दोहराते हुए कि भाजपा ने कांग्रेस के ही कार्यक्रमों को कार्यान्वित किया, एक साथ दो बातें प्रमाणित की। पहला यह कि वर्तमान शासन उन योजनाओं को क्रियान्वित करने की क्षमता रखता है जिनके कांग्रेस केवल सपने देखती थी और कमीशन तय न हो पाने के कारण जो लटके रह जाते थे और दूसरे भाजपा की नीतियां राष्ट्रीय हित हैं। यदि किसी चीज में कमी है तो वह है उच्चतम स्तर से संचालित होने वाला भ्रष्टाचार।

ऐसी स्थिति में सामान्य जन को लगता है कि वे लोग जो कांग्रेस के शासन की वापसी के लिए बेचैन है, केवल भ्रष्टाचार के लिए कांग्रेस की वापसी चाहते हैं क्योंकि किसी अन्य बदलाव का संकेत उनके अब तक के बयानों या कार्यक्रम में उन्हें दिखाई दे रहा है?

कांग्रेस के लूटपाट के दौर में पत्रकारों शिक्षकों और बुद्धिजीवियों को भी तरह तरह से लाभान्वित किया जाता था ताकि वे चुप रहे या उसका समर्थन करें इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। इसके विरल अपवाद वे पत्रकार और बुद्धिजीवी हो सकते हैं जिनका लगाव ऐसे दलों से रहा है जो आज अपनी साख गंवाकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। बुद्धिजीवियों की साख भी उसी तरह डाव पर उन्कीलग अतिसक्रियता के कारण लगती गई है पर उनको इसकी चिंता तक नहीं ।

मैं यहां वर्तमान शासन सफलताओं या उपलब्धियों की गिनती कराना नहीं चाहता परंतु यह दुखद है कि जो दल और बुद्धिजीवी विविध कारणों से अपनी विश्वसनीयता खोते गए हैं, या खोई हुई विश्वसनीयता हासिल नहीं कर सके हैं, उन्हें उस दिशा में प्रयत्नशील तक नहीं देखा जा रहा है। ऊपर गिनाए गए उनके सारे प्रयत्न रही सही विश्वसनीयता को भी खत्म करने के लाजवाब प्रयोग तो कहें जा सकते हैं पर जनता से बीच अपनी विश्वसनीयता पैदा करने के प्रयोग नहीं माने जा सकते।

पहले भी मोदी को सफलता का नहीं राजनीतिक क्षेत्र में पैदा हुई रिक्तता का लाभ मिला था. विगत वर्षों में यह रिक्तता बढी है, न कि कम हुई है। इसका लाभ तो मोदी को और भाजपा को मिलना ही है।

व्यावहारिक राजनीति मैं धूर्तता और षड्यंत्र के बल पर कुछ भी हासिल किया जा सकता है और पहले भी हासिल किया गया है, इसलिए हम चुनाव की गणित में अपनी बात नहीं रख सकते। जाति धर्म और पैसे का ऐसा सदुपयोग हो सकता है कि सत्ता भाजपा के हाथ से चली जाए। किसी दल की लंबे समय तक उपस्थिति और शिक्षा और संस्कृति के मामले में उसकी नीतियां और व्यवहार जितने भी असंतोषजनक क्यों न हों, मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा जीतकर तो कमजोर हो सकती है पर यदि हार हो ही गई तो दोबारा उसका और मजबूत बनकर सत्ता में आना निश्चित है।

Post – 2018-04-30

सवाल विश्वसनीयता का है

आज भारत के सभी दल आसन्न भविष्य में सत्ता हासिल करने के लिए नहीं , अपितु भाजपा को सत्ता से वंचित करने के लिए, किसी भी तरह का जोड़-तोड़ करने और गर्हित से गर्हित हथकंडा अपनाने को तैयार हैं और इसके बाद भी उन्हें भरोसा नहीं कि वे ऐसा करने में सफल होंगे। इससे तीन बातें स्वतः सिद्ध हैः
1. वे दिशाहीन हें, उनमें सत्ता की भूख तो है, पर आगे का कोई ठोस कार्यक्रम नही है;
२. सभी मानते हैं की उनमें से कोई अकेला मोदी के नेतृत्व वाले भाजपा का सामना नहीं कर सकता और सभी मिलकर भी उसके बराबर नहीं है और

३. यह कि पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के लगातार कोसने के बाद भी जनसाधारण के बीच भाजपा की साख इन सभी की अपेक्षा अधिक बनी हुई है, अन्यथा इनके निराश होने की कोई वजह वजह न थी।

ऐसी स्थिति में समस्या सत्ता हासिल करने की नहीं है, अपितु विश्वसनीयता अर्जित करने की है। मोदी को तीन बार ऐसे निर्णय लेने पड़े जो किसी व्यक्ति और प्रशासन की विश्वसनीयता को समाप्त कर सकते थे:
१. विमुद्रीकरण का प्रयोग स्वयं ही जोखिम भरा प्रयोग था, क्योंकि इससे पहले यदि किसी देश ने ऐसा प्रयोग किया था तो सत्ता पलट गई थी । विपक्ष और राजनीतिक दलों से लगाव रखने वाले पत्रकार और बुद्धिजीवी इस उम्मीद में थे कि यहां भी ऐसा हो सकता है और इसलिए उन्होंने अपना सारा जोर लगा दिया था। सभी संचारमाध्यम मोदी की कटु आलोचना कर रहे थे और इस प्रयोग से जनता को होने वाली कठिनाइयों का हृदयविदारक चित्र प्रस्तुत कर रहे थे। कई बार संचार माध्यमों का प्रयोग लोगों को उकसाने के लिए किया गया। सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश ने अपनी सीमा तोड़कर बयान दिया, राष्ट्रपति ने भी दबी जुबान से अपनी निराशा प्रकट की।

यह कोई नहीं कह सकता कि सार्वजनिक जीवन पर, छोटे काम-धंधों पर और कुछ दूर तक बड़े उद्योगों पर भी तत्समय या उसके बाद तक इसका प्रभाव कष्टकर नहीं रहा। इसके बावजूद जो बुद्धिजीवी मोदी की निंदा करने के लिए मुहावरों का अनुसंधान करते रहते थे, उन्हें भी यह देख कर आश्चर्य हुआ, कि इतना सब कुछ सहने ने के बाद भी जनता मे मोदी की विश्वसनीयता कम नहीं हुई।

२. जीएसटी दूसरा प्रयोग था जिससे अर्थव्यवस्था ही नहीं कुछ समय के लिए कर की उगाही में भी निराशाजनक परिणाम देखने को मिले । इसके बाद भी इससे प्रभावित व्यापारियों के बीच भी मोदी की विश्वसनीयता पर आंच नहीं आई, या आई तो इतनी कम कि उसका निर्णायक प्रभाव नहीं पड़ा।

३. विदेशनीति में एक और सबको साथ लेने के व्यक्तिगत और कूटनीतिक प्रयत्न जिनमे बरती गई उदारता को देश के लिए अहितकर बताया जाता रहा और दूसरी और सामरिक तैयारी जिसे भी मोदी की युयुत्सु प्रकृति का प्रमाण माना गया जब की विभिन्न कारणों से उनकी सफलता मोदी को एक दूरदर्शी राजविद सिद्ध किया.

कतिपय नकली मुद्दे उठा कर जाटों को, पाटीदारों को, दलितों को, मुसलमानों को भड़काने ओर अलगाने के प्रयत्न किए गए। विक्षोभ को, अपवित्र साधनों का प्रयोग करते हुए, इस सीमा तक पहुंचाया गया कि पूरे देश में अराजकता फैल जाए।

बुद्धिजीवियों ने या तो मुखर होकर अराजक तत्वों का साथ दिया, या चुप्पी साध ली। उन्हें कभी ऐसे अशोभन तरीकों की निंदा करते हुए नहीं पाया गया। घबराहट के कारण हडबडी में पाखंड और धूर्ततापूर्ण प्रदर्शनों का जाने कितनी बार प्रयोग किया गया और इसमें विदेशी परामर्शदाताओं तक का भी सहयोग लिया गया।

कई बार जनता की नजर में देशद्रोह प्रतीत होने वाले प्रदर्शन और आयोजन किए गए,। बुद्धिजीवियों द्वारा उनकी हिमायत की गई। ऎसी स्थिति में जहां हिंदुत्व को बदनाम करने के लिए अशोभन तरीके से भगवा ध्वज का प्रदर्शनीय प्रयोग हुआ या गोरक्षा के नाम पर पशु तस्करों की प्रतारणा और लूटपाट की घटनाएं घटी और समस्या की संवेदनशीलता को देखते हुए भाजपा सरकारों ने भी ठंडा रवैया अपनाया, और अपराधियों को दंडित करने में विलंब या संकोच किया, वहां पर दूसरी पाखंडपूर्ण गतिविधियों के कारण, कम से कम हिंदू समाज में, यह विश्वास पैदा नहीं हो सका कि इन सब के पीछे कांग्रेस का हाथ नहीं है ।

प्रशासन की विफलता सिद्ध करने के लिए रेलवे के न जाने कितने एक्सीडेंट कराए गए, जिनमें मानव हस्तक्षेप को छुपाया नहीं जा सकता था, और इन दुर्घटनाओं पर उनके प्रति सहानुभूति प्रकट करने की जगह प्रशासन की खिल्ली उड़ाई जाती रही।

मुसलमानों में नितान्त मामूली और काल्पनिक आधार पर ( सोचिए, दो दो बीवियां रखने वाला एक हीरो तीसरी की तैयारी कर रहा है और उसकी पत्नी अपनी असुरक्षा का सवाल उठाती है तो वह इसे मुसलमानों के मन में असुरक्षा की भावना का सवाल बना देता है), कभी-कभी शातिराना ढंग से,असंतोष भड़काने के प्रयत्न किए गए ( JNU का IS से जुड़ाव रखने वाला एक लड़का ABVP नेता को पीटने के बाद चुपके से गायब हो जाता है और बहुत बाद में उसकी असलियत पता चलती है पर उसकी मां को लेकर इस तरह के इशारे करते हुए बयान दिए जाते हैं मानो सरकार ने उसे जानबूझकर गायब कराया हो) , जबकि उसकी तुलना में अधिक जघन्य और संख्या में गणनातीत त्रासदियों के प्रति संचार माध्यम और बुद्धिजीवियों द्वारा लकवाग्रस्त उपेक्षा का प्रमाण दिया गया।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शत्रु देशों के साथ छिपी सांठगांठ के प्रमाण दिए गए और सैन्य बलों के मनोबल को गिराने वाले बयान दिए जाते रहे, आहत और हताहत सैनिकों के प्रति संवेदनहीनता प्रदर्शित की जाती रही, और इस पर भी बुद्धिजीवी चुप रहे।

मोदी और भाजपा का विरोध करने वालों ने विरल अपवादों को छोड़कर तार्किक विश्लेषण का सहारा नहीं लिया, केवल मखौल उड़ाते रहे और विमर्श का स्तर नीचे गिरा कर आरोप प्रत्यारोप करते रहे, जो उनकी घृणा तो प्रकट करता था, परंतु समझदारी को नहीं । जिन क्षेत्रों में भारत की सफलता और नेतृत्व शक्ति, दुनिया में पहली बार आशा जगा रही थी, उनमें ऐसे बुद्धिजीवियों को कुछ दिखता ही नहीं या सब कुछ उलटा दिखाई दिया।

जिस बात को मोदी ने अपने पिछले चुनाव में केंद्रीय मुद्दा बनाया था अर्थात कांग्रेस पार्टी नहीं है वह एक वंश का राज्य है उसे उस वंश ने निर्लज्जता पूर्वक स्वीकार और प्रमाणित किया।

कांग्रेस के शासन की वापसी का सपना देखने वालों ने यह दोहराते हुए कि भाजपा ने कांग्रेस के ही कार्यक्रमों को कार्यान्वित किया, एक साथ दो बातें प्रमाणित की। पहला यह कि वर्तमान शासन उन योजनाओं को क्रियान्वित करने की क्षमता रखता है जिनके कांग्रेस केवल सपने देखती थी और कमीशन तय न हो पाने के कारण जो लटके रह जाते थे और दूसरे भाजपा की नीतियां राष्ट्रीय हित हैं। यदि किसी चीज में कमी है तो वह है उच्चतम स्तर से संचालित होने वाला भ्रष्टाचार।

ऐसी स्थिति में सामान्य जन को लगता है कि वे लोग जो कांग्रेस के शासन की वापसी के लिए बेचैन है, केवल भ्रष्टाचार के लिए कांग्रेस की वापसी चाहते हैं क्योंकि किसी अन्य बदलाव का संकेत उनके अब तक के बयानों या कार्यक्रम में उन्हें दिखाई दे रहा है?

कांग्रेस के लूटपाट के दौर में पत्रकारों शिक्षकों और बुद्धिजीवियों को भी तरह तरह से लाभान्वित किया जाता था ताकि वे चुप रहे या उसका समर्थन करें इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। इसके विरल अपवाद वे पत्रकार और बुद्धिजीवी हो सकते हैं जिनका लगाव ऐसे दलों से रहा है जो आज अपनी साख गंवाकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। बुद्धिजीवियों की साख भी उसी तरह डाव पर उन्कीलग अतिसक्रियता के कारण लगती गई है पर उनको इसकी चिंता तक नहीं ।

मैं यहां वर्तमान शासन सफलताओं या उपलब्धियों की गिनती कराना नहीं चाहता परंतु यह दुखद है कि जो दल और बुद्धिजीवी विविध कारणों से अपनी विश्वसनीयता खोते गए हैं, या खोई हुई विश्वसनीयता हासिल नहीं कर सके हैं, उन्हें उस दिशा में प्रयत्नशील तक नहीं देखा जा रहा है। ऊपर गिनाए गए उनके सारे प्रयत्न रही सही विश्वसनीयता को भी खत्म करने के लाजवाब प्रयोग तो कहें जा सकते हैं पर जनता से बीच अपनी विश्वसनीयता पैदा करने के प्रयोग नहीं माने जा सकते।

पहले भी मोदी को सफलता का नहीं राजनीतिक क्षेत्र में पैदा हुई रिक्तता का लाभ मिला था. विगत वर्षों में यह रिक्तता बढी है, न कि कम हुई है। इसका लाभ तो मोदी को और भाजपा को मिलना ही है।

व्यावहारिक राजनीति मैं धूर्तता और षड्यंत्र के बल पर कुछ भी हासिल किया जा सकता है और पहले भी हासिल किया गया है, इसलिए हम चुनाव की गणित में अपनी बात नहीं रख सकते। जाति धर्म और पैसे का ऐसा सदुपयोग हो सकता है कि सत्ता भाजपा के हाथ से चली जाए। किसी दल की लंबे समय तक उपस्थिति और शिक्षा और संस्कृति के मामले में उसकी नीतियां और व्यवहार जितने भी असंतोषजनक क्यों न हों, मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा जीतकर तो कमजोर हो सकती है पर यदि हार हो ही गई तो दोबारा उसका और मजबूत बनकर सत्ता में आना निश्चित है।

Post – 2018-04-29

धन संपदा के रूप
संपादित

हम कहआए हैं कि धन के सभी रूपों के लिए संज्ञा जल के ही किसी पर्याय से मिली है, इसलिए मात्र दृष्टांत के लिए हम इनमें से जो हमारे ध्यान में आएंगे उन पर विचार करेंगे। सबसे पहले तो हम आप से ही आरंभ करें। मुझे विश्वास है कि आपको अपने नाम का अर्थ मालूम होगा पर क्या आप नाम का मतलब जानते हैं। हो सकता है कुछ लोग कहें नाम का अर्थ संज्ञा है परंतु उस दशा में भी मैं वही प्रश्न दोहराऊंगा। जाहिर है आप निरुत्तर हो जाएंगे, क्योंकि संज्ञा में दो शब्द ऐसे हैं जिनमें से प्रत्येक का अर्थ पानी है। सं/सम् जिसका प्रयोग उपसर्ग के रूप में हुआ है, का अर्थ जल है, यह हम पहले कह आए हैं, इसे आप समसना से समोसा तक में तलाश सकते हैं, और उपसर्ग के रूप में इसका सम्यक, अच्छी तरह या सर्वतो भावेन के आशय में प्रयोग किया गया है जो जल के अनुरूप है। ज्ञान के विषय में मैंने पहले कहा था कि यह क्न> ग्न> ज्न की की प्रक्रिया से गुजरकर ज्ञ बना है जिसका पुराना रूप अंग्रेजी के केन और क्नो (नो), लातिन के ग्नोस्, ग्रीक जिग्नोस्किएन जो जिज्ञासा के सर्वाधिक निकट है Old English cnāwan (earlier gecnāwan ) ‘recognize, identify’, of Germanic origin; from an Indo-European root shared by Latin ( g)noscere, Greek gignōskein, also by can1 and ken. और संस्कृत के वचक्नु – वाग्विद, और वाचक्नवी – वाग्विदा (वचक्नु सुता ?) मैं मिलता है।

यह प्रक्रिया आदि भारोपीय के प्रसार से पहले पूरी हो चुकी थी । क्न स्वतः कन् का प्रतिरूप है जिसका अर्थ जल, प्रकाश, दृष्टि, शीतलता, आंख, आंख की पुतली या कनीनिका आदि की विकास यात्रा पर हम पहले अपना अभिमत प्रकट कर आए हैं । संज्ञा की भांति ही नाम का भी अर्थ जल था, इसे पहली नजर में समझने के लिए आप को फारसी भाषा के नम और नमी पर नजर डालनी होगी।

अब हम ऋग्वेद की ओर लौट सकते हैं जो भाषा को समझने की दृष्टि से जादू का पिटारा है। सायणाचार्य ‘नाम’ के कई से अर्थ करते हैं और वह सभी अर्थ ‘अपस्’= जल के समान हैं। ऋ. 7.57.6 में वह ‘नामभिः’ का अर्थ “उदकैः” करते हैं, तो 3.38.4 मैं ‘नामा’ का अर्थ ”कर्म, शरीरं वा”, और 1.123.4 में ‘‘नमनं प्रह्वत्व (‘अर्थात् ढलान), उद्योगं, प्रकाशं’’, और 3.37.3 में ‘नामानि’ का अर्थ ‘’शक्रवज्रहस्तादीनि’’ करते हैं जो उनकी दुविधा को प्रकट करता है । जलार्थक नाम से यदि फारसी का ”नम बना, तो यह संस्कृत में ,नमन कंपन, निवेदन, नमस्कार, नम्रता आदि शब्दों का जनक बना। सायण के अनुसार: ‘नमते’ (6.24.8) “वशीभवति, नमयिष्णवः” (8.20.1) “नमनशीलाः, कम्पयितारः”; ‘नमसा’ (1.152.7) “नमस्कारोपलक्षितेन स्तोत्रेण”; ‘नमस्वत्’ (1.185.3) “अन्नवत्;”; ‘नमस्वान्’ (1.171.2) “अन्नवान्”, ‘नमोभिः ‘(3.25.3) “अन्नैः सहितात्”; नमोवृधं (3.43.3) “अन्नस्य वर्धकं”; ‘नमोवृधासः’ (7.21.9)” नमसा हविषा वर्धयितारो”, ‘नमे’ (3.39.6) “आनीतमकरोत”। इस नम से ही नम्बि/ नम्बु – आकांक्षा, आशा विश्वास और सम्मान का संबंध है जिसे आप पहली नजर में द्रविड़ का शब्द मान सकते हैं जबकि हम इसे अर्थोत्कर्ष कहना चाहेंगे। हिंदी में बहुत से शब्द हैं जो इस नाम से समझे जा सकते हैं, पर नाम, नामी, नमूना, नामूसी आदि का संबंध है जल के प्रकाश और ज्ञान वाले पक्ष से जुड़ा हुआ है। जिस भी व्यक्ति ने सबसे पहले पैसे के लिए नामा का प्रयोग किया था उसकी सूझ की दाद देनी होगी।

धन
धन, तन का ही प्रतिरूप है। ऋग्वेद में जल को सबसे बड़ा धन कहा गया है और जलदाता होने के कारण इंद्र को मघवा अथवा महाधनी कहा गया है। जल का दारुण अभाव होने पर हम समझ समझ सकते हैं कि पानी की एक एक बूंद का क्या मूल्य है। धन्य शब्द का शाब्दिक अर्थ है जल से भरपूर और धान्य का अर्थ है अन्न, यूं तो अन्न का अर्थ भी जल ही है। यह, अद् से निकला है जिसका एक अर्थ जल है और दूसरा खाना। हम पहले भी कह आए हैं कि सभी खाद्य और पेय पदार्थों का और इसी तर्क से सभी वनस्पतियों का नामकरण जल के आधार पर किया गया है, फिर भी इसे समय-समय पर याद दिलाना पड़ता है क्योंकि जरूरी नहीं कि आज की पोस्ट जो पढ़ रहे हैं उन्होंने उन पोस्टों को भी पढ़ा हो।

‘धान्य’ से ही निकला शब्द ‘धान’ है, और इसका प्रयोग भी पहले धान के लिए इस कारण रूढ हुआ कि भारत में कृषि का आरंभ धान की खेती से हुआ था, और उस क्षेत्र को छोड़ कर जब वे पश्चिम की ओर सारस्वत क्षेत्र में पहुंचे जहां जौ की पैदावार तो आसान थी, परंतु धान की खेती के लिए जितनी बरसात जरूरी थी वह यहां उपलब्ध नहीं थी, इसलिए, सत्तू के रूप में सालिचूर्ण का सेवन करने वाले अब जौ के सत्तू का प्रयोग करने लगे, इसलिए ‘धाना’ अर्थात भुने हुए धान के स्थान पर भुने हुए जौ को धाना कहने लगे।

अब हम सायणाचार्य द्वारा सुझाए गए धन से संबंधित है आशयों पर दृष्टिपात कर सकते हैंः
धनिनं (1.33.4) बहुधनोपेतं, (4.2.14) उदकवन्तः,
धनुतरौ (4.35.5) शीघ्रं गन्तृतरौ,
धनुत्रीः (3.31.16) प्रीणयित्री
धने (1.116.15) जेतव्ये विषयभूते सति
धन्व (2.38.7; 3.45.1) निर्जलप्रदेश, अरण्य, (5.7.7) निरुदकप्रदेशूपसकमतदमेेय धन्वच्युत (1.168.5) धन्व इति अन्तरिक्ष नाम
धन्वन् (1.135.9) धन्वनि उदकनिर्गमनापादानभूते अन्तरिक्षे अपि निरालम्बे, (1.116.4) धन्वनि जलवर्जिते प्रदेशे,
धन्वर्णसः (5.45.2) ‘धन्वतिर्गतिकर्मा’
धन्वाति (3.53.4) गच्छेत् धन्वानि (4.17.2) उदकरहितान्देशान्, (8.20.4)गमनशीलान्युदकानि,
धनवानि (6.62.2) मरुप्रदेशान्

Post – 2018-04-29

धन संपदा के रूप
संपादित

हम कहआए हैं कि धन के सभी रूपों के लिए संज्ञा जल के ही किसी पर्याय से मिली है, इसलिए मात्र दृष्टांत के लिए हम इनमें से जो हमारे ध्यान में आएंगे उन पर विचार करेंगे। सबसे पहले तो हम आप से ही आरंभ करें। मुझे विश्वास है कि आपको अपने नाम का अर्थ मालूम होगा पर क्या आप नाम का मतलब जानते हैं। हो सकता है कुछ लोग कहें नाम का अर्थ संज्ञा है परंतु उस दशा में भी मैं वही प्रश्न दोहराऊंगा। जाहिर है आप निरुत्तर हो जाएंगे, क्योंकि संज्ञा में दो शब्द ऐसे हैं जिनमें से प्रत्येक का अर्थ पानी है। सं/सम् जिसका प्रयोग उपसर्ग के रूप में हुआ है, का अर्थ जल है, यह हम पहले कह आए हैं, इसे आप समसना से समोसा तक में तलाश सकते हैं, और उपसर्ग के रूप में इसका सम्यक, अच्छी तरह या सर्वतो भावेन के आशय में प्रयोग किया गया है जो जल के अनुरूप है। ज्ञान के विषय में मैंने पहले कहा था कि यह क्न> ग्न> ज्न की की प्रक्रिया से गुजरकर ज्ञ बना है जिसका पुराना रूप अंग्रेजी के केन और क्नो (नो), लातिन के ग्नोस्, ग्रीक जिग्नोस्किएन जो जिज्ञासा के सर्वाधिक निकट है Old English cnāwan (earlier gecnāwan ) ‘recognize, identify’, of Germanic origin; from an Indo-European root shared by Latin ( g)noscere, Greek gignōskein, also by can1 and ken. और संस्कृत के वचक्नु – वाग्विद, और वाचक्नवी – वाग्विदा (वचक्नु सुता ?) मैं मिलता है।

यह प्रक्रिया आदि भारोपीय के प्रसार से पहले पूरी हो चुकी थी । क्न स्वतः कन् का प्रतिरूप है जिसका अर्थ जल, प्रकाश, दृष्टि, शीतलता, आंख, आंख की पुतली या कनीनिका आदि की विकास यात्रा पर हम पहले अपना अभिमत प्रकट कर आए हैं । संज्ञा की भांति ही नाम का भी अर्थ जल था, इसे पहली नजर में समझने के लिए आप को फारसी भाषा के नम और नमी पर नजर डालनी होगी।

अब हम ऋग्वेद की ओर लौट सकते हैं जो भाषा को समझने की दृष्टि से जादू का पिटारा है। सायणाचार्य ‘नाम’ के कई से अर्थ करते हैं और वह सभी अर्थ ‘अपस्’= जल के समान हैं। ऋ. 7.57.6 में वह ‘नामभिः’ का अर्थ “उदकैः” करते हैं, तो 3.38.4 मैं ‘नामा’ का अर्थ ”कर्म, शरीरं वा”, और 1.123.4 में ‘‘नमनं प्रह्वत्व (‘अर्थात् ढलान), उद्योगं, प्रकाशं’’, और 3.37.3 में ‘नामानि’ का अर्थ ‘’शक्रवज्रहस्तादीनि’’ करते हैं जो उनकी दुविधा को प्रकट करता है । जलार्थक नाम से यदि फारसी का ”नम बना, तो यह संस्कृत में ,नमन कंपन, निवेदन, नमस्कार, नम्रता आदि शब्दों का जनक बना। सायण के अनुसार: ‘नमते’ (6.24.8) “वशीभवति, नमयिष्णवः” (8.20.1) “नमनशीलाः, कम्पयितारः”; ‘नमसा’ (1.152.7) “नमस्कारोपलक्षितेन स्तोत्रेण”; ‘नमस्वत्’ (1.185.3) “अन्नवत्;”; ‘नमस्वान्’ (1.171.2) “अन्नवान्”, ‘नमोभिः ‘(3.25.3) “अन्नैः सहितात्”; नमोवृधं (3.43.3) “अन्नस्य वर्धकं”; ‘नमोवृधासः’ (7.21.9)” नमसा हविषा वर्धयितारो”, ‘नमे’ (3.39.6) “आनीतमकरोत”। इस नम से ही नम्बि/ नम्बु – आकांक्षा, आशा विश्वास और सम्मान का संबंध है जिसे आप पहली नजर में द्रविड़ का शब्द मान सकते हैं जबकि हम इसे अर्थोत्कर्ष कहना चाहेंगे। हिंदी में बहुत से शब्द हैं जो इस नाम से समझे जा सकते हैं, पर नाम, नामी, नमूना, नामूसी आदि का संबंध है जल के प्रकाश और ज्ञान वाले पक्ष से जुड़ा हुआ है। जिस भी व्यक्ति ने सबसे पहले पैसे के लिए नामा का प्रयोग किया था उसकी सूझ की दाद देनी होगी।

धन
धन, तन का ही प्रतिरूप है। ऋग्वेद में जल को सबसे बड़ा धन कहा गया है और जलदाता होने के कारण इंद्र को मघवा अथवा महाधनी कहा गया है। जल का दारुण अभाव होने पर हम समझ समझ सकते हैं कि पानी की एक एक बूंद का क्या मूल्य है। धन्य शब्द का शाब्दिक अर्थ है जल से भरपूर और धान्य का अर्थ है अन्न, यूं तो अन्न का अर्थ भी जल ही है। यह, अद् से निकला है जिसका एक अर्थ जल है और दूसरा खाना। हम पहले भी कह आए हैं कि सभी खाद्य और पेय पदार्थों का और इसी तर्क से सभी वनस्पतियों का नामकरण जल के आधार पर किया गया है, फिर भी इसे समय-समय पर याद दिलाना पड़ता है क्योंकि जरूरी नहीं कि आज की पोस्ट जो पढ़ रहे हैं उन्होंने उन पोस्टों को भी पढ़ा हो।

‘धान्य’ से ही निकला शब्द ‘धान’ है, और इसका प्रयोग भी पहले धान के लिए इस कारण रूढ हुआ कि भारत में कृषि का आरंभ धान की खेती से हुआ था, और उस क्षेत्र को छोड़ कर जब वे पश्चिम की ओर सारस्वत क्षेत्र में पहुंचे जहां जौ की पैदावार तो आसान थी, परंतु धान की खेती के लिए जितनी बरसात जरूरी थी वह यहां उपलब्ध नहीं थी, इसलिए, सत्तू के रूप में सालिचूर्ण का सेवन करने वाले अब जौ के सत्तू का प्रयोग करने लगे, इसलिए ‘धाना’ अर्थात भुने हुए धान के स्थान पर भुने हुए जौ को धाना कहने लगे।

अब हम सायणाचार्य द्वारा सुझाए गए धन से संबंधित है आशयों पर दृष्टिपात कर सकते हैंः
धनिनं (1.33.4) बहुधनोपेतं, (4.2.14) उदकवन्तः,
धनुतरौ (4.35.5) शीघ्रं गन्तृतरौ,
धनुत्रीः (3.31.16) प्रीणयित्री
धने (1.116.15) जेतव्ये विषयभूते सति
धन्व (2.38.7; 3.45.1) निर्जलप्रदेश, अरण्य, (5.7.7) निरुदकप्रदेशूपसकमतदमेेय धन्वच्युत (1.168.5) धन्व इति अन्तरिक्ष नाम
धन्वन् (1.135.9) धन्वनि उदकनिर्गमनापादानभूते अन्तरिक्षे अपि निरालम्बे, (1.116.4) धन्वनि जलवर्जिते प्रदेशे,
धन्वर्णसः (5.45.2) ‘धन्वतिर्गतिकर्मा’
धन्वाति (3.53.4) गच्छेत् धन्वानि (4.17.2) उदकरहितान्देशान्, (8.20.4)गमनशीलान्युदकानि,
धनवानि (6.62.2) मरुप्रदेशान्

Post – 2018-04-29

धन संपदा के रूप
संपादित

हम कहआए हैं कि धन के सभी रूपों के लिए संज्ञा जल के ही किसी पर्याय से मिली है, इसलिए मात्र दृष्टांत के लिए हम इनमें से जो हमारे ध्यान में आएंगे उन पर विचार करेंगे। सबसे पहले तो हम आप से ही आरंभ करें। मुझे विश्वास है कि आपको अपने नाम का अर्थ मालूम होगा पर क्या आप नाम का मतलब जानते हैं। हो सकता है कुछ लोग कहें नाम का अर्थ संज्ञा है परंतु उस दशा में भी मैं वही प्रश्न दोहराऊंगा। जाहिर है आप निरुत्तर हो जाएंगे, क्योंकि संज्ञा में दो शब्द ऐसे हैं जिनमें से प्रत्येक का अर्थ पानी है। सं/सम् जिसका प्रयोग उपसर्ग के रूप में हुआ है, का अर्थ जल है, यह हम पहले कह आए हैं, इसे आप समसना से समोसा तक में तलाश सकते हैं, और उपसर्ग के रूप में इसका सम्यक, अच्छी तरह या सर्वतो भावेन के आशय में प्रयोग किया गया है जो जल के अनुरूप है। ज्ञान के विषय में मैंने पहले कहा था कि यह क्न> ग्न> ज्न की की प्रक्रिया से गुजरकर ज्ञ बना है जिसका पुराना रूप अंग्रेजी के केन और क्नो (नो), लातिन के ग्नोस्, ग्रीक जिग्नोस्किएन जो जिज्ञासा के सर्वाधिक निकट है Old English cnāwan (earlier gecnāwan ) ‘recognize, identify’, of Germanic origin; from an Indo-European root shared by Latin ( g)noscere, Greek gignōskein, also by can1 and ken. और संस्कृत के वचक्नु – वाग्विद, और वाचक्नवी – वाग्विदा (वचक्नु सुता ?) मैं मिलता है।

यह प्रक्रिया आदि भारोपीय के प्रसार से पहले पूरी हो चुकी थी । क्न स्वतः कन् का प्रतिरूप है जिसका अर्थ जल, प्रकाश, दृष्टि, शीतलता, आंख, आंख की पुतली या कनीनिका आदि की विकास यात्रा पर हम पहले अपना अभिमत प्रकट कर आए हैं । संज्ञा की भांति ही नाम का भी अर्थ जल था, इसे पहली नजर में समझने के लिए आप को फारसी भाषा के नम और नमी पर नजर डालनी होगी।

अब हम ऋग्वेद की ओर लौट सकते हैं जो भाषा को समझने की दृष्टि से जादू का पिटारा है। सायणाचार्य ‘नाम’ के कई से अर्थ करते हैं और वह सभी अर्थ ‘अपस्’= जल के समान हैं। ऋ. 7.57.6 में वह ‘नामभिः’ का अर्थ “उदकैः” करते हैं, तो 3.38.4 मैं ‘नामा’ का अर्थ ”कर्म, शरीरं वा”, और 1.123.4 में ‘‘नमनं प्रह्वत्व (‘अर्थात् ढलान), उद्योगं, प्रकाशं’’, और 3.37.3 में ‘नामानि’ का अर्थ ‘’शक्रवज्रहस्तादीनि’’ करते हैं जो उनकी दुविधा को प्रकट करता है । जलार्थक नाम से यदि फारसी का ”नम बना, तो यह संस्कृत में ,नमन कंपन, निवेदन, नमस्कार, नम्रता आदि शब्दों का जनक बना। सायण के अनुसार: ‘नमते’ (6.24.8) “वशीभवति, नमयिष्णवः” (8.20.1) “नमनशीलाः, कम्पयितारः”; ‘नमसा’ (1.152.7) “नमस्कारोपलक्षितेन स्तोत्रेण”; ‘नमस्वत्’ (1.185.3) “अन्नवत्;”; ‘नमस्वान्’ (1.171.2) “अन्नवान्”, ‘नमोभिः ‘(3.25.3) “अन्नैः सहितात्”; नमोवृधं (3.43.3) “अन्नस्य वर्धकं”; ‘नमोवृधासः’ (7.21.9)” नमसा हविषा वर्धयितारो”, ‘नमे’ (3.39.6) “आनीतमकरोत”। इस नम से ही नम्बि/ नम्बु – आकांक्षा, आशा विश्वास और सम्मान का संबंध है जिसे आप पहली नजर में द्रविड़ का शब्द मान सकते हैं जबकि हम इसे अर्थोत्कर्ष कहना चाहेंगे। हिंदी में बहुत से शब्द हैं जो इस नाम से समझे जा सकते हैं, पर नाम, नामी, नमूना, नामूसी आदि का संबंध है जल के प्रकाश और ज्ञान वाले पक्ष से जुड़ा हुआ है। जिस भी व्यक्ति ने सबसे पहले पैसे के लिए नामा का प्रयोग किया था उसकी सूझ की दाद देनी होगी।

धन
धन, तन का ही प्रतिरूप है। ऋग्वेद में जल को सबसे बड़ा धन कहा गया है और जलदाता होने के कारण इंद्र को मघवा अथवा महाधनी कहा गया है। जल का दारुण अभाव होने पर हम समझ समझ सकते हैं कि पानी की एक एक बूंद का क्या मूल्य है। धन्य शब्द का शाब्दिक अर्थ है जल से भरपूर और धान्य का अर्थ है अन्न, यूं तो अन्न का अर्थ भी जल ही है। यह, अद् से निकला है जिसका एक अर्थ जल है और दूसरा खाना। हम पहले भी कह आए हैं कि सभी खाद्य और पेय पदार्थों का और इसी तर्क से सभी वनस्पतियों का नामकरण जल के आधार पर किया गया है, फिर भी इसे समय-समय पर याद दिलाना पड़ता है क्योंकि जरूरी नहीं कि आज की पोस्ट जो पढ़ रहे हैं उन्होंने उन पोस्टों को भी पढ़ा हो।

‘धान्य’ से ही निकला शब्द ‘धान’ है, और इसका प्रयोग भी पहले धान के लिए इस कारण रूढ हुआ कि भारत में कृषि का आरंभ धान की खेती से हुआ था, और उस क्षेत्र को छोड़ कर जब वे पश्चिम की ओर सारस्वत क्षेत्र में पहुंचे जहां जौ की पैदावार तो आसान थी, परंतु धान की खेती के लिए जितनी बरसात जरूरी थी वह यहां उपलब्ध नहीं थी, इसलिए, सत्तू के रूप में सालिचूर्ण का सेवन करने वाले अब जौ के सत्तू का प्रयोग करने लगे, इसलिए ‘धाना’ अर्थात भुने हुए धान के स्थान पर भुने हुए जौ को धाना कहने लगे।

अब हम सायणाचार्य द्वारा सुझाए गए धन से संबंधित है आशयों पर दृष्टिपात कर सकते हैंः
धनिनं (1.33.4) बहुधनोपेतं, (4.2.14) उदकवन्तः,
धनुतरौ (4.35.5) शीघ्रं गन्तृतरौ,
धनुत्रीः (3.31.16) प्रीणयित्री
धने (1.116.15) जेतव्ये विषयभूते सति
धन्व (2.38.7; 3.45.1) निर्जलप्रदेश, अरण्य, (5.7.7) निरुदकप्रदेशूपसकमतदमेेय धन्वच्युत (1.168.5) धन्व इति अन्तरिक्ष नाम
धन्वन् (1.135.9) धन्वनि उदकनिर्गमनापादानभूते अन्तरिक्षे अपि निरालम्बे, (1.116.4) धन्वनि जलवर्जिते प्रदेशे,
धन्वर्णसः (5.45.2) ‘धन्वतिर्गतिकर्मा’
धन्वाति (3.53.4) गच्छेत् धन्वानि (4.17.2) उदकरहितान्देशान्, (8.20.4)गमनशीलान्युदकानि,
धनवानि (6.62.2) मरुप्रदेशान्

Post – 2018-04-28

प्रसन्नता से जुड़े कुछ और शब्द

मोद (आमोद, प्रमोद)

मोद का भारतीय जीवन में क्या महत्त्व है, इसे दुर्भाग्य से हम इसलिए नहीं पहचान पा रहे हैं कि इसका लाभ आज की राजनीति में मोदी को मिल सकता है, जिनको पीठ की और से देखने वालों को भारत में बुद्धिजीवी कहा जाता है। उनकी चिढ मोदक तक से है। हद तो यह कि हलवाई तक मोदक से चिढ कर इसे लड् डू कहने लगे हैं। मोदकप्रिय मुद मंगलदाता की महिमा के कारण मोदक पूरी तरह लुपत नहीं हो पाया है और न होने दिया जा सकता। यह दूसरी बात है कि मोद का आनन्द से कोई संबन्ध है यह बहुतों को उपसर्ग (आ-, प्र-) अथवा प्रत्यय (-इत) लगने के बाद ही पता चल पाता है।

मोद का अर्थ है, हरा भरा होना (यवो वृष्टीव मोदते, ऋ.2.5.6; ओषधीः प्रति मोदध्वं पुष्पवतीः प्रसूवरीः , 10.97.3); आनन्द, प्रसन्नता ( कीळन्तौ पुत्रै: नप्तृभिर् मोदमानौ स्वे गृहे , ऋ. 10.85.42 ) , तुष्टि (उपप्रक्षे वृषणो मोदमाना दिवस्पथा वध्वो यन्त्यच्छ,. 5.47.6), उल्लास (यत् पर्जन्य कनिक्रदत् स्तनयन् हंसि दुष्कृतः । प्रतीदं विश्वं मोदते यत् किं च पृथिव्यामधि ।,5.83.9); क्रीडा भाव ( स मोदते नसते साधते गिरा नेनिक्ते अप्सु यजते परीमणि , 9.71.3), किल्लोल करना, (मुमोद गर्भः वृषभः ककुद्मानस्रेमा वत्सः शिमीवाँ अरावीत्, 10.8.2)

ऋग्वेद में जिस मरणोत्तर आनन्दलोक की कल्पना की गई है उसमें इसे आप्तकामता के रूप में प्रस्तुत किया गया है (यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते । कामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दः परि स्रव, 9.113.11)

परंतु मोद जल की जिस संज्ञा से संबंध रखता है उसका प्रयोग प्रस्राव (urination) के लिए रूढ़ हो गया, जिसे जीमूत में पाकर ही हम समझ पाते हैं इसका पुराना अर्थ सामान्य जल था.

आह्लाद

आह्लाद ‘आ’ उपसर्ग है यह कहने की आवश्यकता नहीं है, परंतु यह उन शब्दों में है जिनके साथ उपसर्ग न लगा हो तो हम उन्हें तत्काल समझ ही नहीं सकते। इस विषय में मनोरंजक प्रसंग याद आता है। मैंने अपने एक लेख में ‘वदंती’ शब्द का प्रयोग किया था. संपादन के क्रम में इस पर हिंदी के एक बहुत समर्थ व्यक्ति की नजर पड़ी, उन्होंने मुझसे फोन पर जिज्ञासा की कि इसका अर्थ क्या है। हिंदी में इसका पहले शायद किसी ने भी प्रयोग न किया था। उन्होंने स्पष्ट किया के किंवदंती शब्द तो सुना था; वदंती के रूप में प्रयोग देखने में नहीं आया। वदंती का अर्थ है ख्याति या प्रसिद्धि, जब किवदंती संदिग्ध जनश्रुति है। फर्क मामूली है। ‘ किं’ के जुड़ने से संदिधता का भाव आजाता है। मूल शब्द के अभाव में केवल उपसर्ग से कोई शब्द नहीं बन सकता इतना तो सर्वविदित है, परंतु सही प्रयोग भी नया होने पर अटपटा प्रतीत होता है। वह जिस अनुशासन में दीक्षित थे उसमें प्रयोग की नवीनता से अधिक प्रामाणिकता पर बल दिया जाता है और इसलिए उनकी आशंका अपनी जगह पर सही थी, हमारे लिए सही होना सटीकता पर निर्भर था।

परंतु आह्लाद से उपसर्ग निकल जाने के बाद जो शब्द बचता है वह है ‘ह्लाद‘‘/‘ह्राद’ जिसका एक अर्थ ‘हार्दिक’ या हृदय से संबंधित व और दूसरा जल के भंडार या ‘ह्रद’ से संबंधित। अब ‘ह्रदय’, ‘ह्र्द’ और ‘आह्लाद’ तीनों के विषय में यह कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती कि इनकी उत्पत्ति जलवाची ‘हर’/’ह्र’ से हुई है. आप चाहे तो हार्दिक अनुरोध है का अनुवाद request with water कर सकते हैं, परं अपनी जिम्मेदारी पर । अंग्रेजी के heart और cord का हृदय से संबंध है, और हो सकता है hard, horror और horrid का भी हो (तु. पूत) ।

प्रसंगवश यह याद दिला दें कि ऋग्वेद में आह्लाद का प्रयोग तो नहीं हुआ है परंतु हार्द (अपस्पृण्वते सुहार्दम् – जो सुहृदयों या नेकदिल लोगों को भी ददूर भगाता है, 8.2.5) का प्रयोगहुआ है। हम जिस अर्थ मे हृदय छलनी कर देने का प्रयोग करते हैं, उस अर्थ में हृदयाविध (उतापवक्ता हृदयाविधश्चित्, 1.24.8 ); किसी के पास दिल न होने (बतो बतासि यम नैव ते मनो हृदयं चाविदाम, 10.10.13 – यमदेव, अफसोस है कि तुम इतने खस्ताहाल हो, न तो तुम्हें दिल मिला, न दिमाग) का हवाला है। दिल के कठोर (बज्जर कै छाती) होने और उस पर अपनी प्रेमपाती नुकीली टांकी से लिख कर सहानुभूति पैदा करने पर तो तीन ऋचाएं हैंः
परि तृन्धि पणीनां आरया हृदया कवे ।
अथ ईम् अस्मभ्यं रन्धय।
वि पूषन् आरया तुद पणेः इच्छ हृदि प्रियम् ।
अथ ईम् अस्मभ्यं रन्धय ।
आ रिख किकिरा कृणु पणीनां हृदया कवे ।
अथ ईम् अस्मभ्यं रन्धय ।। 6.53.5-7

छक कर या जी भर कर पीने का भी मुहावरा चलता था ( शं नो भव हृद आ पीत इन्दो पितेव सोम सूनवे सुशेवः ) साथ ही दिल जलाने का भी । जुए के पासे ठंढा होते हुए भी दिल जलाते है (शीताः सन्तो हृदयं निर्दहन्ति, 10.34.9) । शत्रुओं का दिल दहलाने (भियं दधाना हृदयेषु शत्रवो पराजितासो अप नि लयन्ताम्, 10.84.7), कलेजा चीरने (ताभिर्विध्य हृदये यातुधानान्) के मुहावरे भी प्रचलित थे। प्रेमिकाओं की निष्ठुरता के लिए उनके दिल की उपमा लकड़बग्घे से दी गई है (सालावृकाणां हृदयान्येत’ 10.95.15) और दिल मिला कर जी जान से मन चित्त लगा कर काम करने की इबारत तो कुछ लेगों को याद भी होगी (समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वो । समानमस्तु वो मनो यथा वो सुसहासति, 10.191.4)। हम अपनी भाषा में अनवरत परिवर्तन होते रहने के बाद भी हजारों साल के पुराने पदबंध और मुहावरे प्रयोग में लाते हैं यह सोच कर हैरानी होती है।

राग/ रंग/ रंज
राग में जल का साक्षात्कार आसानी से नहीं होता इसके लिए हमें ‘रा’, ‘रे’, ‘री’, ‘रै’, ’ऋ’ की शृंखला पर ध्यान देना होगा जिनमें से प्रत्येक का अर्थ जल है और उसी का प्रयोग धन, किरण, प्रकाश और दूसरे ग्रहों और नक्षत्रों के लिए किया गया है । लगभग इसी स्रोत से रज, राजा और रंज संबंध है। मान्यता है राग का प्रयोग आसक्ति के लिए किया जाता है, परंतु बंगाली में राग मनोमालिन्य के लिए प्रयोग में आता है। यह बात दूसरी है ’अनु-’ उपसर्ग लगने के बाद प्रेम का भाव वापस लौट आता है. ’रज’ के अनेक अर्थों में एक अर्थ जल भी है और रज, राज, रंज में चमक, निर्मलता, रंगीनी, विनोद आज के भाव कभी सांकेतिक और कभी मुक्त भाव से प्रकट होते है। रोचक बात यह है फारसी भाषा में संस्कृत का रंज ( रंजित – रंगा हुआ) रंग में बदल जाता है और राग रंज बन जाता है। इसका यह अर्थ है कि ’राग’ या ’रंग जाने का बहुत प्राचीन काल से लाक्षणिक आशय ग्रहण किया जाता रहा है, और इसलिए इसका प्रयोग मलिनता और आसक्ति दोनों के लिए किया जाता रहा है.

इस प्रसंग में विलियम जोंस की एक टिप्पणी याद आती है, जिसमें उन्होंने कहा था की फारसी भाषा का संस्कृत से वही संबंध है जो भारतीय प्राकृतों का है। उनकी यह टिप्पणी इस दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण हो जाती है कि उन्होंने संस्कृत की मूलभूमि ईरान सिद्ध करने का प्रयास किया था। यहां हम इतना ही संकेत करना चाहते हैं कि फारसी के बहुत से शब्द ऐसे हैं जो भारतीय भाषाओं की प्रकृति के उतने ही अनुरूप है जितने भारतीय बोलियों के शब्द। इनका बहिष्कार करना, हिंदी की प्रकृति को विकृत करने की कुचेष्टा ही कही जाएगी।