Post – 2020-05-08

#शब्दवेध(30)

जब तक साँस तब तक आस। हमारा सुख सौभाग्य, जीवन और मृत्यु या विनाश से जुड़ गया हमारी साँस का चलना या बंद हो जाना। श्वास ही प्राण है, साँस का जाना प्राण चला जाना, इक्सपायर (expire) प्राणान्त। यह इंस्पायर (inspire)- प्राण भरना, प्रोत्साहित करना, का विलोम है ।

भो. में एक शब्द है सांसति जिसके लिए हिं. में ‘नाकों दम होना/करना’ प्रयोग में आता है पर सांसति में कष्ट का भाव प्रधान है जब कि नाकों दम में आजिजी का। सांसति का संबंध साँस से (साँस निकलने निकलने को होना) है, इस ओर पहले ध्यान नहीं गया था।

स्वस्ति इसके ठीक विपरीत कुशल और कल्याण का द्योतक है, और इसकी कामना प्रस्थान करने वाले के लिए निरापद मार्ग – पंथा स्वस्ति – से और इसके लिए सभी देवों की अनुकंपा और मार्ग में पड़ने वाले सभी तत्वों के कल्याणकारी होने का कामना से आरंभ हुआ।

स्वस्तिक के साथ शुभ-लाभ लिखा इसलिए मिलता है कि अज्ञात या अल्पज्ञात क्षेत्रों की ये यात्राएँ व्यापारिक गतिविधियों के चलते होती थीं। स्वस्तिक का चिन्ह पहिए का प्रतीकांकन है जिसमें पहले सीधी रेखा में मुड़ी रेखा किंचित् वर्तुल होती थी न कि बाहर की ओर तनी हुई। हड़प्पा सभ्यता के संदर्भ में पिराक, मोहेंजोदड़ो, हड़प्पा, कोटदीजी से मिले स्वस्तिकों में विशेषतः कोटदीजी से प्राप्त मुद्राएँ (जोनाथन मार्क केनोयर, इंडस सील्स, ऐंश्येंट सिंध, ऐनुअल जर्नल ऑफ रिसर्च, खंड 9, 2006-7, 7-30) इस विकास रेखा को समझने में सहायक हो सकती हैं, यद्यपि यह दावा हमारा है, केनोयर का नहीं। वह भारत पर ‘आक्रमण’ करने वालों के साथ पहिए के हिमायती हो सकते हैं, यद्यपि इस विषय पर वह कूटनीतिक दूरी बना कर बात करते हैं।

स्वस्ति की व्याख्या संस्कृतज्ञ सु-अस्ति के रूप में करेंगे जो अर्थ के अनुकूल ही है, पर वे श्वसन की ध्वनि की उपेक्षा करके सु-असन करने से पहले रुक कर सोचेंगे । श्वसन साँस (सस/संस) का संस्कृतीकरण है जिसके तीन रूप हो जाते हैं, 1. शंस (शंसा, प्रशंसा, प्रशस्ति), 3. शस् -काटना, मारना, (शसति – वध करता है, काटता है; विस्तृत करता है -प्रशस्त), शसन – घायल करना, आहत करना और 3. श्वसन, श्वास, विश्वास। शस् के खंडित करने, विच्छिन्न करना से एक ओर शस्त्र निकलता है तो दूसरी ओर शास्त्र। और यह अलग से याद दिलाने की जरूरत नहीं कि शास्ता भी इसी से निकला है।

मैं जिस पद्धति से भाषा के स्वभाव को समझना चाहता हूँ वह परंपरागत व्युत्पत्ति से अलग है, उसके कोशों में दिए गए अर्थ को अकाट्य मानता हूँ, क्योंकि ये अर्थ उन्हें लोक-व्यवहार से मिले हैं इसलिए उन्होंने वहाँ भी उसकी रक्षा की है, जहाँ उनके द्वारा अपनाई गई पद्धति से उनका अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता या अर्थ का अनर्थ (पूत- 1. पवित्र, 2, सड़ा हुआ) हो जाता है।

विद्वान इसकी अनदेखी कर जाते हैं जब कि नियम में अपवाद के लिए स्थान नहीं। गुरुत्व का नियम है तो वह सभी पर समान रूप से लागू होगा। यदि विकल्प का विधान है तो वह नियम नहीं हुआ, प्रवृत्ति हुई जो कुछ दूर तक साथ देगा और फिर बेकार हो जाएगा। अनर्थ प्रवृत्ति को नियम मान बैठने और उसी से संतोष कर लेने के कारण होता है। अपवाद इस बात का प्रमाण है कि नियम की तलाश नही हो सकी है। इसलिए कोशगत अर्थ का सम्मान करते हुए हम उनकी व्युत्पत्ति को लंगड़ा और वास्तविकता से दूर पाते हुए वैयाकरणों द्वारा पूरे तामझाम – एक आद्यभाषा, उसके विघटन या उसमें कालक्रम में आए विकारों से शाखाओं, प्रशाखाओं से एक विशद भाषा-परिवार के सिद्धान्त, मूलभाषा की धातुमाला और उससे पैदा हुए शब्द और अर्थ – को खारिज करके, विकास के सिद्धांत के अनुरूप और वैदिक भाषाविमर्श के भी अनुरूप पाकर हम इतने विश्वास से वाचिक अनुकार के अनुसार अपनी व्याख्या करते हैं कि श्रुतिलब्ध नाद का वाचिक प्रतिनाद ही भाषा है। कहें, हम पहली बार भाषा के उस नियम के अनुसार व्याख्या का भरोसा रख कर यह विवेचन कर रहे हैं। इसे दुहराने की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि लातिन या गाथिक या केल्टिक मूल से सजात शब्दों की या कल्पित पीआइई प्रतिरूपों को भी जहाँ गलत पाते हैं वहाँ उसे नकारने का दुस्साहस करते हैं और इसलिए हमारे प्रस्तावों को इनकी अंतःसंगित के आधार पर परखने का प्रयत्न करें।

सामान्य विश्राम या निद्रा के समय को छोड़ दें तो सक्रियता और श्रम के अनुरूप हमारे साँस की गति और ध्वनि में भी अंतर आता है और इसी तरह हमारे नासारंध्रों की बनावट, उनकी अवरुद्धता आदि के अनुरूप ध्वनि में अंतर आता है जिनके सभी प्रभेदों को लक्ष्य तक नहीं किया जा सकता और जिनको लक्ष्य करके उनके अनुवाचन किए गए हैं उनके कारण, उनकी अपनी भाषा की ध्वनि सीमा के कारण अनुवाचन होने के बाद भी उनमें पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है फिर भी यह पहचान बनी रहती है कि यह नासिका से उत्पन्न ध्वनि का अनुवाचन है और यही बिना किसी व्याख्या के इसकी लोकप्रियता और अर्थसंचार में सहायक होता है। जिसे एक बोली में ससन (>श्वसन) कहा जाता है उसे दूसरी में ब्रीदिंग, एक में सन/सुन कहा जाता है वहाँ द्सरी में साउंड और सोनम् । इनके स्रोत और इसलिए भाव आसानी से पहचान में आ जाते हैं और अंतिम सुन>सोनम् किसी एक से दूसरे में प्रवेश का सूचक भी।

हम यह पाते हैं कि श्वसन के लिए समान सजात शब्द शृंखला में संस/ संस अधिक पुराना है इसका आधार यह नहीं कि बोलियों से लेकर हिंदी तक में साँस प्रचलित है, बल्कि संस्कृत में भी हिंसक आशय के दोनों शस और शंस में भी यही रूप बना रह गया है। केवल साँस लेने के मामले में इसका रूप श्वसन हो गया। परंतु अंग्रेजी में भी श्वसन में हृदयाघात की स्थिति में श्वासरोध पैदा होने पर इसे तत्काल कुछ उपायों से जारी करने के लिए अं. में रि-ससि-टेट (resuscitate) में भी यह झलकता है। सस्पायर – आह भरना, साँस लेना (Suspire [L. suspirare]- to sigh, to breath). सस का लातिन में सामान्यतः ,सब्स subs> sub अवर-, अध- सूचक उपसर्ग माना गया है, पर sublime- aloft, lifted on high, suscitate – to exite, to rouse पर अर्थ बदल जाता है, रिससिटेट में सस प्राणवायु का पुनः संचार अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।

भोजपुरी में विशेषतः महिलाओं की भाषा में एक प्रयोग चलता है संसि देना या न देना। यह प्रयोग बहुत रोचक है, सामग्री वही है और यदि वह अपेक्षा से कम उतरती है तो संसि नहीं देती और उससे अधिक की पूर्ति करती है तो संसि देती है। यहाँ संसि – जीवट, बृद्धि, का सूचक है। संस का अंग्रेजी के सेंस (sense- faculty of receiving sensation, inward feeling> – सेंसेट( sensate) , सेंसेशन sensation, सेंसिबल sensible, सेन्सर ( sensor) आदि से संबंध लक्ष्य किया जा सकता है, अंतर केवल प्राणन का संवेदन और संज्ञान की दिशा में अर्थविस्तार का लगता है। सुन – (तु. श्वन – श्वान> शून- कुत्ता), अंग्रेजी के सोन- और इससे जुड़ी शब्दावली – सोनोरस, सोनेंट, सोनेट (गीत), सोनोग्राफी आदि । सुनना ऐसी दशा में श्रवण का तद्भव नहीं उससे पुराना श्ब्द सिद्ध होता है।

साँस लेना/पाना – अब जाकर तनिक साँस मिली है, ब्रीदिग ( breathing space), साँस फूलना, साँस चढ़ना, साँस लेने की फुरसत न होना, नीचे की साँस नीचे ऊपर की साँस ऊपर रह जाना जैसे मुहावरे बोलियों में ही चलते हैं। इन्हें संस्कृत में स्थान नहीं मिला। हिंदी तक अपने प्रसार क्षेत्र के मुहावरों और लोकोक्तियों को अपनाने में संकोच करती और संस्कृतापेक्षी बनी रहती है जिसका एस कारण यह भी हो सकता है कि कौरवी ही संस्कृत की जन्मभूमि रही है।
साँस और श्वास में कितनी दूरी है?
उतनी ही जितनी पूरबी और कौरवी में, जिसकी प्रकृति पू
श्वास और नि-श्वास में, नि-श्वास और उत्-श्वास (उछ्वास > उसाँस)/ प्र-श्वास में, श्वास और वि-श्वास में, श्वास और *आ-श्वास> आ-श्वास-न में, कितनी दूरी है?
उतनी ही जितनी प्राकृत भाषा और कृत्रिम भाषा में। कृत्रिम जीवन के साथ हमारी नैसर्गिक क्षमताएँ घटती जाती हैं, और जो सहज था वह लंबी शिक्षा के बाद भी उतना स्वाभाविक नहीं रह जाता जितना कृत्रिमता अभाव में। इसका सबसे अच्छा उदाहरण मनुष्य की तैरने की निसर्गजात क्षमता (इंस्टिंक्ट) का लोप और उसे अर्जित करने के लिए अपेक्षित अभ्यास है। हम यह तक भूल जाते हैं कि किसी प्राचीन चरण पर यह क्षमता हममें विद्यमान थी। ऊपर के शब्दों का प्रयोग करते समय हममें से कितनों को याद रहता है कि ये शब्द हमारे साँस लेने से उत्पन्न ध्वनि के अनुवाचन (वाणी से उसके उच्चार का ) है ।

एक और अंतर आता है। अपने (उपसर्जित) उपसर्गों की सहायता से वाले, स्व-नियंत्रित शब्दों को वह किसी आशय से जोड़ सकता है। शब्द और अर्थ की वह अभेद्यता समाप्त हो जाती हो जिसे कालिदास ने वागर्थाविव संपृक्तौ या तुलसी ने गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न कहा है। यही वह कारण है जिससे उपसर्जित शब्दों में अप्रत्याशित या अनियमित अर्थ का आरोपण हो जाता है जिसे “उपर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते” में सूत्रबद्ध किया गया है। ध्यान रहे कि ऐसा प्रत्ययों के साथ नहीं होता क्योंकि प्रत्यय का प्रयोग नैसर्गिक भाषा से आया हुआ है।

Post – 2020-05-07

शब्दवेध(29)

मनुष्य का दूसरा अंग जिससे ध्वनि उत्पन्न होती है, नासिका है। इससे सोते जागते और श्वास नली की अवस्था के अनुसार कई तरह की ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं। सस, सन, नस, नक सामान्य श्वसन के पुराने वाचिक अनुकार प्रतीत होते हैं जिनसे नासा, नासिका, नाक O.E.nosu, E. nose, Swedish nos, L.nāsus, Lith. nosis, और दूसरी यूरोपीय भाषाओं के इनसे मिलते-जुलते naso, nes, nase, आदि शब्द निकले हैं। साँस लेने की सामान्य क्रिया के लिए शब्द कुछ बाद में गढ़े गए साँस <>श्वास, साँस लेने की क्रिया ससन> श्वसन। स्वन – ध्वनि, आवाज. E. sono-, sone- unit of sound, sound, sonic, sonorous आदि की व्युत्पत्ति इसी से हुई है। सं. श्वान – आवाज करने वाला जानवर । अंग्रेजी में श्वन का प्रतिरूप sound हुआ तो कुत्ते का, विशेषतः शिकारी कुत्ते का इसी के अनुरूप हाउंड hound हो गया। इसका हाउंड <>हुंड भोजपुरी में भेड़िये के लिए प्रयुक्त हुँड़ार की याद दिलाता है। क्या आवाज या ऊँची आवाज के लिए कभी हुंड का प्रयोग होता था जिससे हुंडकार> ‘हुंकार’, हूयते>हवन, (आ-)ह्वान आदि निकले हैं?

हुंकार वन्य अवस्था में किसी व्यक्ति के भटक जाने पर उसे दिशा और स्थिति का अनुमान कराने के लिए पुकार का अवशेष है जिसमें ऊँचाई के कारण गर्जना का भाव था इसलिए इसने आक्रमण से पहले समवेत रणनाद का रूप ले लिया, पर प्राथमिक आशय अदृश्य और अनुपस्थित को बुलाने का था और यही आशय हुंड > हवन, ह्वान, और इसके प्रतिरूप *पुंड-कार – पुकार का भी रहा हो सकता है जिससे सबसे ऊँची आवाज करने वाले शंख को पौंड्र (पौंड्रं दध्मौ प्रतापवान) संज्ञा हुई।

हुंडकार> हुंकार के दो पक्ष थे। एक आह्वान करने वाले का और दूसरा यदि भटके हुआ व्यक्ति श्रव्य दायरे में हुआ और उसने उसे सुन लिया तो उसे भी प्रतिनाद से उसकी पुष्टि करनी होती थी।

मैं नहीं जानता कितने देशों में साहित्यानुराग के वे रूप पाए जाते हैं, मेरी जानकारी के नृतत्वविदों ने इस पर प्रकाश नहीं डाला है, जिनमें कालयापन के लिए पुरातन घटनाओं के जैसे भी विवरण उन तक पहुँचे होते थे उनके कथन, गायन, और सोने से पहले कहानी सुनने-सुनाने का चलन रहा हो, पर भारत में यह था। कहानी सुनाने वाले के प्रत्युत्तर में सुनने वाले को हुँकारी भरनी होती थी। यह इस बात को सुनिश्चित करता था कि कहानी सुनने वाला ध्यान से सुन रहा है। अभी जगा हुआ है। यह हुँकारी ही हाँ की जननी है। इस हाँ के विरोधी अर्थ थे। एक से हम परिचित हैं, दूसरा किसी संभावित दुर्घटना को रोकने के लिए वर्जनापरक आशय था। बोलियों में आज भी इसका प्रयोग होता है, ‘हाँ हाँ, ऐसा मत करो।’ पक्ष और विपक्ष दोनों का भाव उसी शब्द में आने का यही कारण लगता है। जो भी हो हुंड, हुंकार, हुँकारी और हाँ सजात शब्द हैं यह मानना निरापद है।

हुंड में वही दोहरा भाव है, सुदूर स्थित अदृश्य स्वजन का आह्वान और उसे सुनने का सत्यापन। प्राचीन भारतीय बैंक प्रणाली में प्रचलित हुंडी का हमें दूसरा कोई स्रोत दिखाई नहीं देता। इतना ही नहीं, यदि स्वर-व्यंजन-विन्यास पर ध्यान दें तो हुंड, गुंड, घुंड, रुंड, सुंड, भुंड और इनके अवर आशय के हुंडी, गुंडी, घुंडी, *रुंडी, सुंडी, भुंडी, तथा हंड गंड, घंड, रंड, संड, भंड -एक ही भाषाई स्तर से आए हुए शब्द हैं जिनमें से कुछ को ही संस्कृत में स्थान मिल पाया था। कारण संस्कृत को एक स्वल्पजनसाध्य या कूट भाषा में बदल कर उस खुलेपन का निषेध कर दिया गया जो सामान्य व्यवहार की भाषा में होता है। इन दो कारणों से – एक तो जैसा हम पीछे (25) में स्पष्ट कर आए हैं भाषा की समग्र संपदा बहुत विशद होती है और उसके समूचे साहित्य में उसका एक क्षुद्र अंश ही आ पाता है, और दूसरे पाणिनीय संस्कृत के बाद ब्राह्मणों तक सीमित, क्लिष्ट और संहित पदों से अधिकाधिक कठिन बनते जाने के कारण संकुचित संचार की भाषा बन कर अपनी उस बोली से भी अधिक विपन्न भाषा बन कर रह गई जिससे इसका विकास हुआ था और इस विपन्नता को वह पुरानी पूंजी के बीच जोड़-तोड़ करके यांत्रिक रीति से पूरी करती रही।

हम अर्थ विकास के साथ सांस्कृतिक विकास को भी लेना चाहें तो विवेचन संगत होते हुए भी सँभाल से बाहर चला जाएगा, इसलिए उससे बच कर चलना एक बाध्यता है। परंतु कभीकदा इसका प्रलोभन भारी पड़ता है। भटक कर दूर चले गए जत्थे के सदस्य को बुलाने के लिए किए जाने वाले हुंडकार/ हुंकार या पुकार को वह सुन लेता था तो प्रतिनाद करता था, परन्तु यदि वह भटक कर श्रव्य सीमा से दूर चला गया हो और उसका जवाब न मिले तब संकेत के लिए आग जला कर धुँआ पैदा किया जाता था जिसे देख कर वह सही दिशा और दूरी का अनुमान कर सकता था। बाद में कृषिकर्म से विरत होने पर भी भू संपदा पर अधिकार जताने वाले उसके कर्मकांडीय आयोजन यज्ञ में देवों को बुलाने के लिए हवन या आह्वान के लिए उच्चस्वर से पाठ के साथ अग्नि से अधिकाधिक धूम पैदा करके उन्हें बुलाने के विधान में इसी की प्रतीकात्मक पुनरावृत्ति थी –
आदिन्वसि वनिनो धूमकेतुनाऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव ।। 1.94.10
घृतेन त्वा अवर्धयन् अग्न आहुत धूमस्ते केतुः अभवद् दिवि श्रितः ।। 5.11.3

विकास की दृष्टि से इन दोनों चरणों में हजारों साल का अंतर है परंतु ज्ञान परंपरा में ये दूरियाँ मिट जाती हैं। इतना ही नहीं इनका विस्तार भी होता है। समुद्र में स्थल से दूर और दिशाबोध खो बैठने की दशा में भारतीय नाविकों ने निकटतम स्थल का पता लगाने के लिए कौवे को छोड़ने और उसके किसी दिशा में उड़ जाने को नौवहन में मार्गदर्शक के रूप में प्रयोग किया। कौवा पालतू होने के कारण अपने स्वामी के घर पर आ बैठता और उछल कूद करता था जिससे दूर गए प्रियजनों की वापसी का सूचक सगुन विचार का संबंध है। इसका बहुत जीवंत चित्रण ऋग्वेद के दो सूक्तों में है
कनिक्रदज्जनुषं प्रब्रुवाण इयर्ति वाचमरितेव नावम् ।
सुमंगलश्च शकुने भवासि मा त्वा का चिदभिभा विश्व्या विदत् ।। 2.42.1
अव क्रन्द दक्षिणतो गृहाणां सुमंगलो भद्रवादी शकुन्ते । …
आवदन्स्त्वं शकुने भद्रमा वद तूष्णीमासीनः सुमतिं चिकिद्धि नः ।
यदुत्पतन् वदसि कर्करिर्यथा बृहद्वदेम विदथे सुवीरा ।। 2.43.3

परंतु यदि कौए को चक्कर लगाने के बाद किसी दिशा में किनारा दिखाई नहीं देता था, वह जहाज पर वापस लौट आता था, तो स्वजनों को अपने संकट की सूचना देने के लिए वे कबूतर को छोड़ते, क्योंकि इसकी उड़ान बहुत लंबी होती है। कबूतर के पहुँचने और आवाज करने को इसीलिए आपदा का सूचक माना जाता था। इसका भी ऐसा ही हवाला ऋग्वेद में आया है:
देवाः कपोत इषितो यदिच्छन्दूतो निऋर्त्या इदमाजगाम ।
तस्मा अर्चाम कृणवाम निष्कृतिं शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे ।। 10.165.1
संभवतः इसके पीछे यह भावना भी रही हो कि कुछ प्रतीक्षा के बाद यदि वे न लौटें तो उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाय।
जिस ध्वनि शब्द का हम लगातार प्रयोग करते आ रहे हैं उसका संबंध भी श्वन से ही है साथ ही स्वर का भी जनक यही है।

एक विचित्र बात यह कि तमिऴ में मूक्कु का अर्थ नाक है और नाक्कु का अर्थ जिह्ना, कुत्ते के लिए नाय् का प्रयोग होता है।

Post – 2020-05-06

#शब्दवेध(28)

पहले यह निवेदन कर आए हैं भाषा के विकास में जल की भूमिका सबसे प्रधान है। यह अधूरा कथन है। पूरा सच यह है कि जल से कम भूमिका वायु की नहीं है। यह प्राकृतिक परिवेश पर निर्भर करता है। जिन भूभागों में वर्षा नहीं होती अथवा नाम मात्र होती है नैसर्गिक ध्वनियों का परिवेश जल की विविध क्रियाओं से उत्पन्न नाद की भूमिका नगण्य होगी, वहाँ तो वायु की विविध गतियों से उत्पन्न ध्वनियों का बाहुल्य होगा और इसके विपरीत जहां केवल हिमपात होगा वहां हिम और वायु की विविध गतियों से गिरने या प्रवाहित होने से उत्पन्न ध्वनियों की भूमिका प्रधान होगी।

इसलिए जब हम जल को वाणी की जन्मस्थली ( (मम योनिः अस्ति अन्तः समुद्रे) की बात करते हैं तो यह केवल उन्हीं बोलियों और भाषाओं पर लागू होता है जिनका उद्भव और विकास आर्द्रता बहुल भूभाग में हुआ है।

बोली के लिए प्रयोग में आने वाले ऐसे शब्दों की कमी नहीं है जो जल की क्रियाओं से उत्पन्न ध्वनि के अनुकरण पर निर्भर हैं। बदबदाना, बुदबुदाना, भदभदाना उबलते हुए पानी, यी तरल खाद्य के उबलने से अधिक स्पष्ट रूप में सुना जाता है, और अस्फुट ओष्ठ चालन से उत्पन्न ध्वनि से इसका काल्पनिक साम्य मान कर अस्पष्ट भाषण और फिर स्पष्ट कथन – वदति (1. बजता है, (>वाद्य यंत्र), 2. कहता है, (वाद, वादी, विवाद, संवाद), वंदति (गाते या बजाते हुए कीर्तिगान, स्तुति) , वदंत/ वदन्ती > भदंत, भंते)। इसकी तुलना बंध> से करने पर हम पाते हैं कि पहली शृंखला इसकी तुलना मे कमजोर है और इसलिए त्याज्य हो सकती है, परन्तु भाषा में अनेक वार दो शब्दोंं के उच्चारण की समीपता के कारण अर्थ की छाया भी क्रियाशील होती है, इसका भी ध्यान रखना होगा ।

खौलना, क्षोभ, भो. खभिलाना – आकुल होकर शोक निवेदन या एकान्त आत्मविलाप का पारस्परिक संबंध अधिक स्पष्ट है। परंतु ऐसे दुखी व्यक्ति के प्रति स्नेह प्रदर्शन के लिए छोहाइल (छोहाना) के पीछे शोभन+खभिलाना की साझी भूमिका हो सकती है।

ओटो श्रेडर (Otto Schrader 1883, [Language comparison and ancient history. Linguistic-historical contributions to the investigation of Indo-European antiquity.] (1st ed. Jena: Costenoble), पहली बार उस परिवेश का निर्धारण करने से लिए विविध भारोपीय भाषाओं की सांस्कृतिक शब्दावली का संग्रह किया था और उसमें वह जिन निष्कर्षों पर पहुँचे थे उनमें से कुछ निम्न प्रकार हैं :
मूल निवास में साल के कुछ महीनों में बहुत अधिक बरसात होती थी;
साल के कुछ महीनों में प्रचंड गर्मी पड़ती थी;
वे नौचालन से पूरी तरह परिचित थे;
वे करघे से सूती (लिनन) और ऊनी वस्त्र बुनना जानते थे। ऊनी वस्त्र करघे से नहीं गूँथ और कूट कर बनाते थे।
हम उनके द्वारा गिनाई गई दूसरी विशेषताओं को छोड़ सकते हैं परन्तु पूरे भारोपीय क्षेत्र में भारत को छोड़ कर दूसरा कोई भूभाग नहीं था जो इन अपेक्षाओं की पूर्ति कर सके। इसके बाद भी उन्होंने संभावित क्षेत्र बाल्टिक प्रदेश को माना क्योंकि जर्मन विद्वान कितना भी बड़ा धुरन्धर हो वह जर्मन पूर्वाग्रहों से बाहर निकल ही नहीं सकता था।

हम यहाँ मूल-निवास की चर्चा नहीं कर रहे हैं। उसका समाधान हो चुका है। इसकी याद इस लिए आई कि प्राणघाती लू और तृषार्तता का भी हमारी शब्द रचना में प्रभावी भूमिका है, इसकी अनद्खी नहीं की जानी चाहिए।

Post – 2020-05-05

#शब्दवेध(27)
श्रुति

भाषा के लिए भारोपीय भाषाओं में कितने शब्द प्रयोग में आते हैं उसका हमें पता नही। भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों का भी पता नही। यहाँ तक कि संस्कृत की क्षत्रछाया में आने वाली बोलियों में प्रचलित शब्दों का भी ज्ञान नहीं। तथ्य संकलन किसी भी क्षेत्र से संबंधित हो, यह अपने आप में बहुत बड़ा काम है और इस दिशा में जिन साधनों, जितने समय और जैसी एकाग्रता की अपेक्षा है उसका मुझमें अभाव भी रहा है।

जिन तथ्यों की जानकारी मुझे है उसका भी पूरा उपयोग नहीं कर पाता। समय की सीमा के अतिरिक्त पाठकों के सिर दर्द की भी चिंता रहती है। संख्या बढ़ने से बोझ बढ़ता है; परिणाम में अंतर नही आता। परन्तु इस परिधि में भी, शब्दों के आपसी संबंध को समझना कम टेढ़ा और साहसिक काम नही है।

उदाहरण के लिए हम तमिऴ के चोल्/शोल् – बोलना; शोल् मोऴि – मुहावरा, लोकोक्ति, को लें। हमारी आज की जानकारी के अनुसार यह उन बोलियों में से किसी का शब्द है, जिसका विलय सं. और त. आदि में हुआ था। क्या शोल का हिं. शोर – ऊँची आवाज में बहुत से लोगों का एक साथ बोलना से; शोर का श्रव =बहुत से लोगों द्वारा कहे जाने (तु. नाम> नामी, सरनाम या नामवर आदि ) से, श्रवण – सुनना, सुनने की इन्द्रिय,, श्रुति, श्रव्य, श्रुत, अल्प- /बहु– श्रुत- वान/ -ज्ञ, श्रुधी से कोई संबंध है या नहीं और यदि है तो इसका इतिहास कितना पीछे जाता है।

यहाँ हम भाषा के अनुनादी सिद्धान्त के एक नियम की याद दिला दें कि जिन वस्तुओं और स्रोतों से कोई ध्वनि नहीं निकलती उनकी संज्ञा उनसे किसी भी दृष्टि निकटता, संबंध या विरोध प्रदर्शित करने वाले ऐसे स्रोतों से मिलती है जिनसे ध्वनि पैदा होती है, इसलिए कान और सुनने के समस्त कार्य व्यापार से लिए मौखिक उच्चार से संज्ञा मिलना स्वाभाविक ही था।

परन्तु क्या यह मुख से उत्पन्न किसी ध्वनि से व्युत्पन्न शब्द है? फिर बोलने के लिए इसका प्रयोग क्यों नहीं होता? सुनने के लिए ही क्याें। हम खींच तान से कुछ भी सिद्ध करने क्यों न लगें, सामान्यतः मुख से उच्चरित किसी ध्वनि को इसके निकट नहीं पाते।

जिस स्रोत से इससे मिलती जुलती ध्वनि निकलती प्रतीत होती है वह जल है जिससे चर/सर स्र/श्र/श्ल की ध्वनि निकलती कल्पित की गई है। सं. के आचार्य किसी भी स्रोत से उत्पन्न ध्वनि को, विशेषतः जिसका वाचिक आशय में प्रयोग हुआ हो, शब्दन/भाषण या कथन मानते रहे हैं यह अर्थपाठ से ऐसी धातुओं की विशाल संख्या से ही समझा जा सकता है। अतः शोर, शोल्, श्रव, श्रुत, श्रव, श्रवण, श्रावक सभी केे नाद का स्रोत जल – स्राव, स्रोत, सोता, श्रावण – बरसात का मौसम सभी का अनुनादी स्रोत जल है न कि मुख।

Post – 2020-05-04

#शब्दवेध(26)

भाषा के लिए प्रयोग में आने वाले दूसरे अनेक शब्द हैं- वाक् (>*वचन, बाँचल, वाशी (voce, voice, >vocal/ vocabulary, vocation> cf. calling- पेशा) – भाषा, कथ, कत्थ, कथनी/ कहनी (> कथन/कहन; कथा, कहानी) और आर्तभाव के कुछ कहना – भो. कहँरल,(*कद/खद/गद> (कदराना, कातर क्रदन/ क्रंदन, भो. *कलप/ सं. कल्प – आवाज>कलाप, कलापी, कलपल आदि।

इनमें से प्रत्येक पद ऐसा है जिसके एकाधिक उच्चारभेद थे और उनमें कौन सा सबसे पुराना है और किस बोली ने किससे इसे ग्रहण किया और अपनी ध्वनि-व्यवस्था में ढाल लिया और फिर सबके एक बृहद समाज का अंग बन जाने और सभी रूपों के साथ प्रचलित होने के बाद इनमें से कुछ नई व्यंजनाओं के लिए प्रयोग होने लगे, यह ध्यान देने योग्य है। जिन कालों में ये विकास हुए उनसे बहुत दूर होने के कारण पूरी सावधानी के बाद भी हमारे कुछ समीकरण गलत हो सकते हैं, यह मानने के लिए भी हमें तैयार रहना चाहिए।

भारतीय भाषाओं के विषय में दो विरोधाभासी विचार मिलते हैं। पहला यह कि इसमें अन्विता ऐबी द्वारा उद्धृत यूनेस्को के आकलन के अनुसार1600 बौलियाँ बोली जाती हैं, जब कि भारत सरकार के अनुसार यह 200 से कुछ ऊपर और सिल (समर स्कूल ऑफ लिंग्विस्टिक्स) के अनुसार 300 से कुछ अधिक बैठती है। हमारे लिए इनमें से कोई भी संख्या आश्चर्यजनक है। परन्तु इसका दूसरा पक्ष यह कि इनका विभेद पूर्वोत्तर के कबीलाई क्षेत्र में सर्वाधिक है जिसमें कबीलाई अभिमान और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन तथा प्रशासनिक एकाधिकार के अभाव के कारण बृहद सामाजिक संरचना और उसके कारण स्वाभाविक रूप में बोलियों के क्रमिक विलय से उन्नत भाषाओं का विकास नहीं हो सका, जब कि शेष भारत में उसके विपरीत कारणों से विविधताओं का क्रमिक लोप होने के कारण इनकी संख्या कम होती गई, इसके बाद भी इनकी संख्या काफी अधिक है।

परन्तु यहाँ भी यह नियम काम करता दिखाई देता है कि पिछड़ेपन के अनुपात में भिन्नता अधिक है और सामाजिक आर्थिक प्रगति के अनुपात में पारस्परिक संपर्क के लिए एकरूपता के समानान्तर स्थानीय रागात्मकता के कारण “ कोस कोस पर पानी बदले चार/आठ कोस पर बानी” मुहावरे का चलन है। संभवतः इसी के आधार पर युनेस्को के 2012 से पहले के किसी सर्वेक्षण में इनकी संख्या 1600 से अधिक पहुँचा दी गई थी – ज्ञान, विज्ञान और कूटनीति का विकास पश्चिम में साथ साथ हुआ है।

हमारे लिए महत्वपूर्ण यह है कि प्राचीनतर अवस्थाओं में बोलियों की संख्या अधिक रही है और सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक (जिसमें कला, साहित्य और मतवाद को भी लिया जा सकता है) के कारण वह निकटता आई है जिसके कारण बोलियों और भाषाओं के बीच पारिवारिकता का भ्रम पैदा होता है। इसकी त्वरा (डाइनैमिक्स) को न समझ पाने के कारण ‘प्रचंड’ भाषा विज्ञानियों ने सत्ता और प्रचार-साधनों पर एकाधिकार के बल पर वास्तविकता को उलट कर एक आद्य भाषा के विभेदन या ह्रास से पारस्परिक समानता रखने वाली बोलियों और मानक भाषाओं का जन्म लगातार दिखाया और भाषा शास्त्र के शिक्षित और प्रशिक्षित विद्वान और संस्थान (सिल और यूनेस्को भी) आज तक जिसे दुहराते आ रहे हैं ।

वे आदम की बोली या नोआ और उसकी संतानों की बोली को वास्तविकता मान कर अटकलबाजियाँ करते रहे। जिस संस्कृत के वर्चस्व को कम करने के लिए भाषाविज्ञान और भाषा-परिवार की उद्भावना की गई थी उसमें भी संस्कृत से सभी भाषाओं की उत्पत्ति का सिद्धांत प्रचलित था सो एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा।

तथ्य और अटकलबाजी के इस द्वन्द्व में आज तक अटकलबाजी की जीत होती आई है और वह भी विज्ञान के नाम पर। हमने 1973 में ही, (आज से लगभग पाँच दशक पहले) इसका खंडन किया था, पर हिंदी में ही नहीं, किसी गैर-यूरोपीय भाषा में प्रतिपादित किसी नई स्थापना को उस भाषा के लोग तक नहीं मानते, पूरी दुनिया यूरोप की किसी भाषा में प्रस्तुत नए लचर विचारों को, उनके प्रचार-कौशल और जमी हुई धाक के कारण, युगान्तरकारी मान कर स्वयं, अपने को अद्यतन जानकारी से लैस सिद्ध करने के लिए, उनका वितरक बन जाती है। आज भी हिंदी में लिखते समय यह अंदेशा तो बना ही रहता है कि इसे समझेंगे कितने और मानेगा कौन।

दूसरा तथ्य यह कि अपनी निजता की रक्षा के लिए प्रयत्नशील बोलियों के साथ ही, आहार की तलाश में, भिन्न बोलियों के परिवेश या पड़ोस में होने और उनके बृहत्तर घटकों मे समायोजित होने के कारण और अलग बनी रह गई भाषाएँ बोलने वालों के प्रत्यक्ष या परोक्ष संपर्क के कारण सभी के तत्व सभी में तलाशे जा सकते हैं जिसे आर्य-अनार्य आदि नकली पहचानों के आर-पार देखा जा सकता है और जिसकी नितांत सतही समझ के बल पर इमेनों ने तब के भारत को एक भाषाई क्षेत्र के रूप में पहचाना था और जिसके भुलावे में आकर माधव देशपांडे सिंधु-सरस्वती सभ्यता के समय एक प्रोटो इंडियन भाषा की कल्पना कर बैठे जिसका हवाला हम पहले दे आए हैं।

इस पृष्ठभूमि के बाद हम यह भी स्वीकार करें कि शब्दों का विवेचन करते समय इस उत्साह में कि फिर बात शब्द से ही क्यों न आरंभ की जाए, हमने भाषा की उत्पत्ति और विकास पर बात करने की दृष्टि से गलत आरंभ किया। मनुष्य विविध वस्तुओं, क्रियाओं, विशेषताओं, आदि लिए शब्दों का प्रयोग करते हुए भी चिंतन की उस ऊँचाई पर दसियों हजार साल बाद पहुँचा जब वह यह सोच सका कि जिस माध्यम से वह वह काम करता है उसका भी कोई नाम होना चाहिए और उसके विषय में भी जानकारी रखी जानी चाहिए और उसके भी बहुत बाद यह सोच सका कि इस जानकारी का भी अपना नाम होना चाहिए। भाषा का नाम आज भी प्रायः अंचलों के और अंचलों का नाम उनमें अधिक संख्या में बसने वाले जनों और भौगोलिक लक्षणों के आधार पर रखा जाता है और जनों को उनकी संज्ञा या तो उनके अभिमान को प्रकट करने वाले शब्दों से (होर- मनुष्य, बिरहोर – जंगल का मनुष्य, मुंडा- सर्वोपरि और आर्य- श्रेष्ठ) या उनके पड़ोसियों और शत्रुओं से मिला है।

जो भी हो भाषा के जिन पर्यायों को हम ऊपर गिना आए हैं उनके विषय में यह सोचना सरलीकरण होगा कि इन सभी का नामकरण मुख से निकलने वाली ध्वनियों में से किसी एक से हुआ होगा। उनमें से बहुत कम शब्द हैं जिनकी उत्पत्ति मुख की निसर्गजात ध्वनियों से हुआ है और कुछ का नादस्रोत एक ही नहीं दो कदम पीछे मिलेगा। उसके विवेचन को कल के लिए स्थगित रख सकते हैं।

Post – 2020-05-03

#शब्दवेध(25)

किसी भाषा की समग्र संपदा का अनुमान करना लगभग असंभव है यदि उसमें लिखित समस्त साहित्य, उसके समस्त कोष ग्रंथों को एकत्र कर लें तो भी उसका इतना बड़ा अंश बाकी रह जाएगा जो संभव है हमारी संचित सामग्री से भी अधिक पड़े। कारण, भाषा पूरे समाज की होती है और उसका समग्र किसी एक व्यक्ति, एक वर्ग या व्यक्तियों और वर्गों के समूह के पास नहीं हो सकता।[1] एक ही व्यक्ति को भाषा का जो ज्ञान है उसका बहुत बड़ा अंश उसकी स्मृति में नहीं आ सकता। इसलिए हम कितने भी प्रयत्न कर ले हमारे विवेचन से बहुत कुछ ऐसा छूट जाएगा जिसका भाषा की दृष्टि से बहुत अधिक महत्व है।
It is at once a social product of the faculty, of speech, and a collection of necessary conventions adopted by the social body to allow the exercise of this faculty by individuals. It is a whole in itself and a principle of classification. As soon as we give it the first place among the facts of speech we introduce a natural order in a whole which does not lend itself to any other classification.” La langue is further “the sum of the verbal images stored up in all the individuals, a treasure deposited by the practice of speaking in the members of a given community; a grammatical system, virtually existing in each brain, or more exactly in the brains of a body of individuals; for la langue is not complete in any one of them, it exists in perfection only in the mass.” F. de Saussure, Cours de Linguisiique GénIrale, pp 23 31

जब हम वण/वणिक/बनिया पर बात कर रहे थे तो उसके तोड़ने, वितरित करने वाले पक्ष पर हमारा ध्यान इतना केंद्रित हो गया कि उसका जोड़ने, गढ़ने और जुटाने वाला पक्ष हमारी दृष्टि से ओझल गया। भाषा में तोड़ने के लिए जो शब्द हैं वे ही जोड़ने, गढ़ने और बनाने के लिए भी प्रयोग में आते हैं, क्योंकि हम बिना किसी प्रयोजन के किसी चीज को तोड़ते, काटते, तराशते और घिसते नहीं हैं, बल्कि कुछ बनाने और जोड़ने के लिए यह कष्ट करते हैं। बनना, बनाना, बनावट – 1. निर्मिति; 2. कृत्रिमता; बुनना, बुनावट, बँधना, बाँधना, बंधु, वधू, बंधन, बंदा = बंधा हुआ, लाचार, समर्पित; वंदना (समर्पित भाव से निवेदन या याचना> वंदनीय, वन्द्य आदि का भी जनक वही वण<>बन है। यदि इसे समझने में कठिनाई हो रही हो तो आरती अर्थात् आर्त भाव से निवेदन पर ध्यान दे सकते हैं। निवेदन के साथ कामना की पूर्ति करने वाले को प्रसन्न करने के लिए पेश किए जाने वाले चढ़ावे से ही नैवेद्य का संबंध है और निवेदन भी वेदना का सम्यक प्रकाशन ही है।

हमारे शिष्ट व्यवहार में ऐसा बहुत कुछ है जिसे समादृत बना दिया गया है परन्तु वह आदिम अवस्था से आया हुआ है इसलिए जिसकी प्रकृति भिन्न थी; कुछ मामलों में अटपटा होते हुए भी आज की तुलना में अधिक तर्कसंगत भी थी। भगवान भक्तों (भागीदारों) को उनके कर्म के अनुसार फल देता है। पहले यह श्रम के अनुपात में था, व्यापारिक चरण पर लागत, जोखिम और श्रम के अनुरूप और भाववादी चरण पर श्रद्धाभाव या निष्ठा के अनुसार। यह परिवर्तन किसी एक क्षेत्र में नहीं हुआ था, ऐसा परिवर्तन सभी क्षेत्रों में हुआ। उनकी गिनती कराने चलें तो विषय विस्तार होगा। फिर भी संक्षेप में यह उल्लेख जरूरी लगता है कि भगवान या, धन का वितरण करने वाले (सनिता धनानां) के पास वह धन कहाँ से आता था, जिसका वह वितरण करता था। समूह के लोग जो भी शिकार करते, फल-कंद एकत्र करते उसे दल के सरदार के पास जमा करते थे और उसी का वितरण वह करता था। यह तरीका उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी तक अनेक पिछड़े समुदायों में तो
प्रचलित था ही, इस्लाम में मध्यकाल तक चलन में था। सिपाहियों को विजय पाने के बाद विजित समाज को खुल कर लूटने का अधिकार था, जिसे वे राजा या उसके सुल्तान/ बादशाह को सौंपते थे और वह उसका कुछ (पाँचवाँ) भाग अपने पास रख कर बाकी उन्हें लौटा देता था।

वैदिक काल में व्यापार वाणिज्य के दौर में विदेशों में जाने वाला माल बीच के पड़ावों और परिवहन की समस्या के कारण रास्ते में माल मिल जाता था और सभी का माल आपस में मिल गड्डमड्ड हो जाता था इसलिए भाग के देवता भग (अग्नि) के साक्ष्य में सभी को उनका हिस्सा मिलता था। सभी को अपने उचित हिस्से (देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते, 10.191.2) से संतोष करना होता था। वितरण करने वाले नेता का भी अपना देवभाग होता रहा होगा। आज भी मंदिर आदि के जो कुछ चढ़ाया जाता है उससे देवता का थोड़ा सा हिस्सा अपने पास रख कर शेष लौटा देता है।

इसी तरह हमारे आचार में जो प्रशंसित चेष्टाएँ हैं वे युद्ध में समर्पण के प्रतीक हैं। आज भी पराजित सेना अपने हथियार डाल कर, दोनों हाथ ऊपर उठा कर, श्वेत ध्वज फहरा कर संकेत भाषा में यह संदेश देती है कि हम पूरी तरह आप की शरण में हैं, आप हमारे साथ जैसा चाहें व्यवहार कर सकते हैं, हम प्रतिरोध नहीं करेंगे।

ठीक वही भाव करबद्ध (इस शब्द का प्रयोग आज भी होता है) प्रणाम ( नमन या झुकना कि अगला चाहे तो उसकी गर्दन भी काट सकता है।) यह भाव वीरासन में भी है, पर जानुपात और दंडवत में यह अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है। हमारी तुलना में पश्चिम के अभिवादन में गरिमा अधिक है। मुष्टिपीडन (महाभा.) समानता के साथ सुख-दुख में सहभागी होने की हार्दिकता का द्योतक है, यद्यपि भारोपीय संपर्क क्षेत्र में भारतीय अभिवादन का भी प्रसार हुआ था, इसका कुछ संकेत लातिन में भाषा में बचा रह गया लगता है:
Caput-…head, cacipit..- of the head, .. in compound the root appears as cipit…A precipitate person is head-long, precipitation of a chemical solution means certain part of it falls headlong to the bottom….Margaret Schlaugh, The Gift of Tongues, London, 1949 p. 85.
चरवाही पर निर्भर दबंग समुदायों में यह चल नहीं पाया, जैसे वर्ण-व्यवस्था नहीं चल पाई जिसकी छाया प्राचीन ईरान, रोम, गॉथ सभी में लक्ष्य की गई है।

Post – 2020-05-02

#शब्दवेध(24)

कल मैंने सोचा भण पर चर्चा पूरी हो गई । आज आगे बढ़ना चाहा तो उसी शब्द ने रास्ता रोक लिया, “तुमने वणिक की बात की और बनिए को छोड़ दिया।”

कौरवी का वणिक पूर्वी में आया तो बनिया बन गया । मतलब तो यहां भी बांटने वाले से ही था। परदेस का माल लाकर देश में बांटने वाले कौरवी के वणिक को पूरबी में बनिक होना चाहिए था, पर पूरबी को पच्छिम का प्रत्यय ‘इक’ भी स्वीकार नहीं था। उसका अपना प्रत्यय ‘इया’ उसे इतना प्रिय था जहाँ इसके बिना काम चल सकता था, वहाँ भी लगा दिया करता था- राह>रहिया, चिरई> चिरइया – फिर वणिक को बनिया तो बनाना ही था।

कौरवी में बांटने के लिए वणन् होना चाहिए था, परंतु किसी दबाव में ‘ण’ अनुस्वार और अघोष ‘ट’ (ण्ट) में बदल गया, और वंटन बन गया। जिस तर्क से वण वर्ण = अलग करने वाला, अंतर प्रकट करने वाला बना था और वस्तुओं के रंग में अंतर को दिखाने के लिए प्रयोग में आने लगा था और फिर आगे चलकर ध्वनियों में अंतर को दिखाने के लिए प्रयोग में आया, उसी तर्क से इसका एक और रूप ‘वर्तन’ बना जिसमें तालव्य ‘न’ के सटे पास की (आसन्न) ध्वनि के प्रभाव से ‘ट’ बदल कर ‘त’ हो गया। वंटन और वर्तन के पीछे कौरवी क्षेत्र में प्रभावशाली रूप में उपस्थित पूरबियों का हाथ रहा हो सकता है। वे संपदा पर अधिकार जमाए थे, अपनी भाषा को बचाए रखने के आग्रही थे, पर संख्या में स्थानीय आबादी से कम होने के कारण उन परिवर्तनों को रोक पाने में असमर्थ थे, जिनको संस्कृतीकरण का पहला चरण कहा जा सकता है।

पूरबी प्रभाव में वंटन बाँटल बना जिसे कौरवी के -न/-इन प्रत्यय की तुलना में अपना -ल/-इल पसंद था। इसी तरह वर्तन – बरतल बना परंतु जिस साधन से तुला का आविष्कार होने से पहले शुष्क और द्रव दोनों को बाँटने का काम किया जाता था, उसका विकास कौरवी में हुआ था। यह पूरबी में कौरवी से लौटकर आया हुआ शब्द था।

भोजपुरी में बर्तन के लिए /बसना’/ ‘बासन’ का प्रयोग होता था। ‘बस’ का अर्थ था कोई चीज इसी को कौ. में वस्तु बनाया गया। कौरवी में य, र, व प्रेम इतना था कि यह उच्चारण को सुकर मनाने के लिए इनका अंतः-प्रत्यय के रूप में समावेश कर लेती थी, अतः पूरबी का ब>व हो गया और सभ्यता के उत्थान के साथ, इसके अर्थोत्कर्ष से प्रभावशाली शब्दावली का विकास हुआ।

बस का किसी चीज, किसी प्रकार के धन के लिए प्रयोग होता था, इसका अवशेष ऋग्वेद (वसां राजानं-ऋ.5.2.6, सभी संपदाओं के राजा को) में बचा रह गया है – यही ‘वस्तु’ का जनक बना। लेन-देन (exchange) मे उस चीज के बदले (मोल) में जो चीज दी जाती थी उसे भी ‘बसन‘ (ऋ. वस्न – मोल जो फा. में पहुँच कर वजन – अर्थात तौल – ‘उसकी बराबरी का’ – बन गया) ।

वह आधान जिसमें वस्तुएँ समेटी या रखी जा सके, बसना/ बासन = वर्तन>बरतन के रूप में भो. में प्रयोग में आता है, परंतु वर्तन और बसना में अर्थ उल्टा है। पूर्व से नए कछारों की तलाश में पश्चिम की ओर बढ़ते हुए कौरवी क्षेत्र में पहुँचने वाले जीवन यापन से आगे नहीं बढ़ पाए थे, इसलिए उनके लिए आधान या बासन समेटने सहेजने के लिए था, तोड़ने और विभाजित करने का भाव उसमें नहीं था, पर कुरु पांचाल से सिंध पर्यंत भूभाग में नगर सभ्यता, उद्योग, व्यापार का विकास हुआ इसलिए आधान (सोमधानी, सुराधानी, अपिधान) जैसे प्रयोग भी मिलते है , कोश (महान्तं कोशमुदचा नि षिञ्च) और क्रिवि (क्रिविर्न सेक आ गतं ) का उल्लेख है और पुरातत्व से इनके अनुरूप विशाल भंडारण पात्र भी पाए गए हैं, परंतु वर्तन पात्र से अधिक वितरण का मानक या माप का साधन बन गया था।

हड़प्पा के संदर्भ में ईंटों, बटखरों, स्नानागार और भांडागारों की माप तो की गई है परंतु मेरी सीमित जानकारी में एक तरह के पात्रों के आकार और मानक्रम का अध्ययन नहीं किया गया। इसका एक कारण यह है कि सभी पात्र टूटी-फूटी अवस्था में मिले और उनके सामने उनके सही टुकड़ों को तलाश कर पहले की शक्ल में ले आना ही प्रमुख चुनौती बनी रही न कि उनका मान और मानक्रम तय करना।

भोजपुरी में कोसा (कोश), तौला (तोला), भार (भर), भरुका जैसे प्रयोग, कुम्हार का पेशा तक, सभ्यता के प्रसार क्रम में कौरवी प्रेरित हैं, क्योंकि जिस चरण पर पूरब से पश्चिम की दिशा में प्रयाण किया उस समय तक वर्तन पकाने की कला किसी को मालूम ही न थी।

वस का प्रयोग पहनावे के लिए भी होता था जिसे ‘बसन’ में देखा जा सकता है। इसी का प्रयोग घोसले (वृक्षे न वसतिं वयः ।। ऋ.10.127.4)। आवृत करने, घेरने के आशय के प्रभाव से वस का दूसरा रूप ‘वसु’ – खनिज संपदा बन गया और खनिज पदार्थों का दैवीकरण वसुओं (वसवः) और वसुगण में हुआ। संभव है फा. ‘वसूली’ वस/वसु से ही व्युत्पन्न हो। अपनी क्षत्रछाया मे रखने या शरण (वसतिं जनानाम्, ऋ.5.2.6 – जनता के शरणदाता) और फिर बस्ती के लिए और नि-वास ‘बासा’ के लिए हुआ। बस > वस >वस्तु > वास्तविकता, वास्तु, वास्तुकार/-कला, -कृति; >वास – बसन, वासोवाय- बुनकर, >वस्त्र, बस> अलं/ बेसी= बहुत> बां. बेश = बहुत, अच्छा आदि पर ध्यान दें।

Post – 2020-05-02

There is a misgiving that language and speech behavior of a people could be controlled by linguists, denying autonomy of language and creative role of speakers, a fact that was recognised by Patanjali some 2200 years back.

Post – 2020-05-01

#शब्दवेध(23)

अब इस वितंडावाद से मुक्त हो कर हम भाषा और इसके पर्यायों पर विचार कर सकते हैे। जरूरी नहीं कि सभी का सीधा संंबंध मुख से निकलने वाली किसी न किसी ध्वनि से हो, या जिस रूप में हम इन्हें संस्कृत ग्रंथों और धातुओं में पाते है वैसा रहा हो। इसकी संभावना अधिक है कि वह बोलियों में उपलब्ध सजात शब्द जैसा रहा हो यद्यपि बोलियों में भी सीमित प्रयोग के कारण उनकी प्रतिष्ठा इतना गिर गई हो कि वह उपयोगी से अधिक हास्यास्पद प्रतीत हो। शब्दों की सामाजिक हैसियत पर यहाँ चर्चा संभव नहीं, पर इतना याद रखा जा सकता है कि हम जहाँ, उसका अर्थ जानते हैं, यह भी पाते हैं कि किसी विशेष भाव को प्रकट करने के लिए वह अधिक सटीक है फिर भी हम कुछ अधिक ‘संभ्रांत’ पर्याय की तलाश करते हैं।

मुझे यह समझ में नहीं आता कि भण् ध्वनि काे वाग्यंत्र के किसी अस्पष्ट या स्पष्ट उच्चारण के अनुरूप माना जा सकता था। किसी पात्र के या खोखले भंगुर वस्तु के गिर कर टूटने से यह ध्वनि अवश्य पैदा हो सकती थी पर मनुष्य की वाणी के लिए – भणन, भणित, भणिति – का प्रयोग, या अर्थोत्कर्ष, चकित करता है।

किसी नाद का भण् को रूप में श्रवण और उच्चारण पूरबी बोलियों में संभव न था। ‘ण’ ध्वनि का उनमें अभाव है। कौरवी और बाँगड़ू में भी इसका उच्चारण संभव न था क्योंकि सघोष महाप्राण ध्वनि, भ’ का उनमें अभाव था। (हम संस्कृत के ऐसे सभी शब्दों काे जिनमें सघोष महाप्राण ध्वनियाँ पाई जाती हैं, उन्हें पूरबी से आया हुआ और शब्द भंडार में अपेक्षाकृत पुराना मान सकते हैं। यद्यपि भण् रूप लंबे समय तक कौरवी क्षेत्र में पहुंचने वाले पूर्वी जमातों के कौरवी ध्वनि माला से अवगत और कौरवी के पूर्वी ध्वनिमाला का अभ्यस्त हो जाने के बाद ही संभव था, परंतु उसके बाद भी सघोष महाप्राण ध्वनियों से बचने की जो प्रवृत्ति है (पू. घना > गहन; घन् > हन्) उसे देखते हुए यह मानना होगा यह शब्द पूर्वी से कौरवी में पूरबी से आया और इसका प्राचीन रूप भन् था , जो भनक, भान, (भानमती का अर्थ क्या डींग हाँकने वाली था?) भनभनाइल, भन्नाइल, भन्नाहट, आदि में आज भी बचा रह गया है।
भनभनाइल, भन्नाइल का समीकरण मक्खियों और मच्छरों की गूंज से होने के कारण इसमें अर्थह्रास आ गया, इसलिए मनुष्य की बड़बड़ाहट के लिए भुनभुनाइल, और मक्खियों के लिए भिनभिन्नाइल रूप को वरीयता मिलने लगी।

जो भी हो भण के कौरवी में प्रचलन के बाद भी, यह उसकी प्रकृति के अनुरूप नहीं था, इसलिए इस क्षेत्र में यह अधिक शब्दों का जनक नहीं बन सका परंतु इसका जिस रूप में अनुकूलन हुआ उससे भण् > बण > वण में बदला और दोनों में अभेद हो गया। इसे ही हम ‘वण् भण खंडने’ सूत्र में धातु के रूप में स्वीकृत पाते हैं। इसी नियम से भणिति – वाणी बन गई और इसमें एक नया अर्थ यांत्रिक भण् की ध्वनि के कारण जुड़ गया जो भान, भनक, आदि में नहीं था, जिनका प्रयोग उसमें वाणी के लिए होता था।

दूसरे शब्दों में कहें तो भणिति या वाणी का मुख से उच्चरित ध्वनियों से सीधा संबंध नहीं था, पर इनके पूर्वरूप -भन् का था। एक यांत्रिक ध्वनि के योग और समायोजन इन दोनों के आशय – कथन और विच्छेदन वाणी में समाहित हो गए। कहें, भन् की भूमिका में पहले (पूरबी में) इसका अर्थ व्यक्त करना ही रहा लगता है, परन्तु अब उसमें विखंडन और भीतरी मर्म को बारीकी से समझना जुड़ जाता है। विवेचन स्वतः हथियार बन जाता है। वण् में अलगाने, वितरण करने के आशय के कारण, आयात वस्तुओं के समाज में वितरित करने वाले वणिक कहे जाने लगते हैं, उनका पेशा – वाणिज्य कहा जाने लगता है। परन्तु भण् से वण् बनने के बीच बण रूप से बाण बनता है जिसका काम आघात पहुँचाना है। कौरवी क्षेत्र की र-कार प्रियता के फलस्वरूप यदि वण् में रकार के आगम से वर्ण बनता है जिससे वर्णन बनता है तो बाण के आघात की दिशा में व्रण – घाव बनता है। अब अक्षर के लिए प्रयुक्त वर्ण का शाब्दिक अर्थ होना चाहिए, वाचिक ध्वनियों का विश्लिष्ट या अलग- अलग किया रूप।
(पर हम जो लिखते हैं उसे स्थापना की जगह ऊहापोह (musing) मान कर पढ़ना हमारे लिए भी हितकर है और आप के लिए भी। दावे के साथ कुछ कहने की स्थिति में हम इस पड़ताल के बाद ही आ सकेंगे।)

Post – 2020-04-30

#शब्दवेध (22)
एक कदम आगे दो कदम पीछे

भाषाविज्ञान का विकास जिस यांत्रिक रूप में हुआ उसमें भाषा की उत्पत्ति के विषय में छान बीन बहुत की गई, परंतु मूलभूत सिद्धांतों का ध्यान नहीं रखा गया। यह तब और विचित्र लगता है जब हम पाते हैं कि येस्पर्सन (Otto Jesperson) जैसी विभूतियाँ इस दिशा में प्रयत्नशील थीं। उन्होंने स्वयं अपने द्वारा उठाई गई आपत्तियों में भी सतहीपन से काम लिया।

भाषा की उत्पत्ति की समस्या प्रखर होकर 19वीं शताब्दी में तब सामने आए जब यह माना जाने लगा समस्त विश्व आधुनिक संचार और यातायात के साधनों के माध्यम से एक दूसरे से इतना जुड़ चुका है कि विश्व में एक सर्वस्वीकार्य भाषा का प्रयोग करें तो एक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था कायम की जा सकती है। इसमें बाधक था विविध यूरोपीय देशों का अपना अहंकार और स्वार्थ। किसी दूसरे की भाषा को कोई अपने लिए स्वीकार्य नहीं मानता था। ऐसी स्थिति में कुछ विज्ञानियों के दिमाग में यह ख्याल आया कि यदि एक कृत्रिम भाषा ऐसी तैयार की जाए जिसमें वर्तमान भाषाओं की व्याकरण और उच्चारण संबंधी दुरूहताएं न हों, शब्द भंडार अधिकतम यूरोपीय भाषाओं के अनुरूप हो तो उसे संपर्क भाषा के रूप में सभी स्वीकार कर लेंगे और भविष्य में स्थापित होने वाली विश्व संस्था की भाषा वही होगी।

इस भाषा को गढ़ने के लिए उन्होंने इस समस्या पर बहुत गंभीरता से विचार करना आरंभ किया कि भाषा की उत्पत्ति हुई कैसे, जिससे वह उन्हीं सिद्धांतों का पालन करते हुए नई भाषा तैयार कर सकें। भाषा का आरंभ कैसे हुआ इसके लिए शिशुओं की भाषा सीखने पर जितना ध्यान दिया गया, वह पर्याप्त नहीं था। यह मानते हुए कि आदिम समाज की भाषा आरंभिक अवस्था के अधिक निकट है इसलिए वह उत्पत्ति को समझने में सहायक हो सकती है, परंतु इसे यथेष्ट नहीं पाया गया । प्राकृतिक ध्वनियों की नकल से भाषा की उत्पत्ति को समझने का प्रयास भी इसी क्रम में किया गया।

यह तो सर्वविदित है कि बहुत सारे शब्द जीव जंतुओं की आवाज की नकल हैं। परंतु यहां समस्या यह थी कि सभी भाषाओं में उन्हीं ध्वनियों की नकल अलग अलग की गई है। दूसरे इस नियम को हम कुछ ही शब्दों पर लागू पाते हैं। वह शब्दावली भी केवल संज्ञा तक सीमित है। भाषा का जटिल ढांचा जिसमें संज्ञा के साथ क्रिया, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया विशेषण, प्रत्यय, उपसर्ग, रुपावली, सभी का विकास शामिल है, उसकी व्याख्या प्राकृतिक ध्वनियों के माध्यम से संभव नहीं है। और सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि यदि भाषा का उद्भव प्राकृतिक ध्वनियों की नकल से हुई होती तो पूरे मानव समाज एक भाषा होनी चाहिए थी। दुनिया में इतनी भाषाएँ उस दशा में नहीं सकती थी।

इसलिए में से किसी की भूमिका को पूरी तरह नकारना संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने सोचा भाषा की उत्पत्ति और विकास में इन सभी की कुछ न कुछ भूमिका थी और इसलिए है सभी यूरोपीय भाषाओं से कुछ न कुछ लेते हुए उन्होंने जिस भाषा को कर तैयार किया वह मेरी जानकारी में, यूरो-केंद्रित होती हुई भी, दुनिया की सबसे सरल, सबसे नियमित, सबसे समृद्ध भाषा तैयार की जिसका नाम है एस्पैरांतो।[1]

[1] उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में ‘यूनिवर्सल लैंग्वेज तैयार करने पर अनेक विद्वान सक्रिय थे जिन्होंने उन्हें अलग अलग नाम दे रखे थे (डॉ. निकोलस- स्पोकिल Spokil ; स्पित्जर – पार्ला; बोलैक – ला लैंगू व्लूए la langue bleue), यामेनोव (Zamenhof) की एस्पेरांतो इन्हीं में से एक थी। इनमें से कोई दूसरे की गढ़ी भाषा को भाव देने को तैयार न था। (येस्पर्सन, सेलेक्टेड राइटिंग्स, एलेन ऐंड अनविन, 744-45)

इसमें ऐसे ही शब्दों को जो यूरोप के अधिकांश भाषाओं में प्रयोग में आते थे लातिन की सहायता से कुछ बदलते हुए स्वीकार कर लिया गया। ऐन आन्सर – रेस्पोंडो, आर्मी – आर्मेदो, आर्ट- आर्तो, ऐरेस्ट – ऐरेस्तो, बैक- दोर्सो, बिफोर – ऐंताऊ, बिलो – सब, कार्ड- कार्तो, फ्लड- इनुंदो, नेटिव – इंडिजेनो, द नेचर – ला नैचुरा इत्यादि। नए शब्द गढ़ते समय लातिन से निकटता का ध्यान रखा गया था – नेटिव कंट्री – पैत्रोलांदो। उच्चारण सभी ध्वनियों का स्पष्ट, खूल कर किया जाता था। इसमें वक्ता या लेखक अपनी जरूरत के अनुसार नई व्यंजनाओं के लिए आसानी से शब्द गढ़ सकता था। इन सभी विशेषताओं के बाद भी इसे विश्व राष्ट्र संघ से एक भाषा के रूप में स्वीकार किए जाने और कुछ देशों , जैसे शाहकालीन ईरान से राजकीय प्रोत्साहन मिलने के बाद और सर्वमान्य संपर्कभाषा की आवश्यकता अनुभव करते हुए भी, यह भाषा उपेक्षित ही रह गई ।

यह भाषा चल नहीं पाई। कारण क्या है। एक कारण तो यही कि व्यापारिक और राजनीतिक धाक बनाए रखने के लिए संपर्क भाषा के रूप में भी इसे कोई स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। परंतु इसके अतिरिक्त भाषा की उत्पत्ति और बनावट संबंध में भाषाविज्ञानियों की समझ भी गलत थी और वे अपने असाधारण श्रम के बाद भी जल्दबाजी में काम कर रहे थे। किसी पहलू की गहराई से छानबीन नहीं कर रहे थे इसलिए भाषा की प्रकृति को समझने में उनसे चूक हुई थी। (आज कंप्यूटर ने किसी भी भाषा को किसी भी भाषा में कामचलाने लायक अनुवाद प्रस्तुत करके इस समस्या का एक नया हल निकाल लिया है जिसमें सब कुछ बचा रह गया है और इसके बाद भी सभी से संपर्क संभव है।)

मनुष्य के काम करने के नियम अलग होते हैं। वह सांचों में ढाल कर एक जैसी वस्तुएं बना सकता है, अधिक सुथरी चीजें बना सकता है, परंतु एक भी नई चीज उत्पन्न नहीं कर सकता। -प्रकृति असंख्य चीजें उत्पन्न कर सकती है और कोई दो चीज- एक ही पेड़ की दो पत्तियां तक एक जैसी नहीं हो सकती, फिर भी उसकी हर रचना का एक आंतरिक नियम होता है जिससे वह परिचालित होती है। मनुष्य निर्मित किसी वस्तु में आंतरिक विकास की क्षमता नहीं होती इसलिए उसे बनाया जा सकता है, उपयोग किया जा सकता है, परंतु वह स्वयं किसी चीज को उत्पादित नहीं कर सकता, अपने जैसे को भी नहीं।

भाषा विज्ञानियों ने आषा की उत्पत्ति के विषय में एक सार्वभौमिक नियम को समझा होता और उसी पर काम करते रहते तो और कुछ करते या नहीं भाषा की उत्पत्ति और भाषाओं के अंतर्संबंध की बहुत मार्मिक व्याख्या कर सकते थे और उस व्याख्या से उन सभी विसंगतियों का निराकरण हो गया होता जो सतही समझ के कारण दिखाई दे रही थी।

भाषा का यह सिद्धांत है कि हम जैसा सुनते हैं वैसा ही बोलते हैं। जो सुन नहीं सकते, वह बोल नहीं सकते। गूंगा बच्चा बहरा होता है। बहरा होने के कारण वह उस नाद जगत से भी अप्रभावित रह जाता है जिसे सुनकर एक शिशु अपनी ओर से वैसा ही बोलने के प्रयत्न मे अपने एकांत में तरह-तरह की ध्वनियाँ निकालता है जिसे हम शिशु संगीत कह सकते हैं। इसी क्रम में उसके सुनने की क्षमता में भी विकास होता है और बोलने की क्षमता भी पैदा होती है। जिसे जेनरेटिव ग्रामर ने एक रहस्यवाद में बदल दिया, मनुष्य में निसर्ग जात भाषिक क्षमता की कल्पना कर ली, वह एकांत में परिवेश ही संगीत का यही अनुकरण है जिसके सध जाने पर कुछ ही सालों के भीतर एक शिशु का अपनी भाषा पर बहुत अच्छा अधिकार हो जाता है।

यदि उन्होंने आदिम भाषाओं में अनुकारी शब्दों और व्यंजनाओं के बारे में गहराई से सोचा होता तो पता चल जाता कि विकसित भाषाओं की तुलना में आदिम भाषाएं अधिक समृद्ध क्यों है, और इसी गति से यदि हम पीछे चलें तो उनकी पूरी भाषा की बनावट समझ में आ जाती, अनुकारी शब्दों की संख्या क्रमशः बढ़ते हुए समग्र भाषा अनुकारी ध्वनियों का संजाल बन जाती।
गूँगों की सीमाओं को जानते हुए भी उन्होंने उससे सही शिक्षा ग्रहण नहीं की।

भाषाओं की प्राथमिक निजी संपदा बहुत सीमित थी, और सबकी प्राकृतिक परिवेश के कारण, अथवा प्रयत्न की भिन्नता के कारण अथवा जावट के अतर के कारण, सभी में भिन्नताएँ थीं और जहां ऐसी भिन्नता न हो वहां भी एक ही प्राकृतिक नाद का कई रूपों में उच्चारण किया जाता है और किया जाता रहा। भाषा के विकास में सबसे प्रधान भूमिका वायु और जल की है ताप और शीत का है। ऐसे ही दूसरे अनेक कारण हैं जिनमें से सभी का न तो हम ध्यान रख सकते हैं नहीं हमें ज्ञान है, परंतु सभी की व्याख्या इसी एक नियम से हो जाती है। भाषा के सभी घटकों की उत्पत्ति प्राकृतिक नाद के अनुनादन से संभव है और भारोपीय भाषा के संदर्भ में इसका विवेचन हम अपने आगे की चर्चा में करते रहेंगे।