Post – 2015-11-05

इतिहास के दावेदार

“तुम जानते हो, कुछ लोग तुम्हे मोदी का भक्त समझते हैं.”
“आगे ऐसा कोई आदमी टकर जाय तो उसे मेरा नाम बता देना. हो सकता है वह पहले से मेरा भक्त हो, न हुआ तो आगे हो जाएगा.”
“बुरा मत मानना. तुम मोदी की वकालत तो करते हो.”
“जो न्याय का साथ देगा वह अन्याय का विरोध करेगा. लेखक की पक्षधरता का यही अर्थ है. दुखी, उत्पीड़ित, अपमानित के प्रति सहानुभूति ही उसे उत्पीड़ित करने वाले का विरोध और सताए हुए का साथ देने को प्रेरित करती है. सत्य के प्रति निष्ठा उसे असत्य का विरोध करने को बाध्य करती है.”
“तुम, तुम…” वह गुस्से से हकलाने लगा.
मैंने कहा, “इस समय तुम मेरी बात समझ न पाओगे, इसलिए मैं तुम्हे एक दूसरे सताए हुए आदमी की पीड़ा सुनाता हूँ. उसका नाम था फ्रेडरिक नीत्शे. नाम सुना है उसका?”
“वही न जिसके दर्शन का नतीजा नाज़ीवाद था?”
“नाज़ीवाद उसके दर्शन पर प्रहार था. जीवित मिलता तो हिटलर सबसे पहले उसे गैस चैम्बर में भेजता, पर देखो उसका दुर्भाग्य कि तुम भी उसे नाज़ीवाद का जनक मानते हो. अफवाह में कितनी ताक़त होती है, इसका यह नमूना है.”
“क्या यह अफवाह है की उसने ही सुपरमैन याने अतिमानव की अवधारणा दी थी और उसके कारण हिटलर ने जितने यहूदियों को मौत के घाट उतारा उनसे अधिक जर्मन मूल के बीमार, अपंग, असहाय, कमज़ोर जनों को मौत के घाट उतारा था.
“सुपरमैन की अवधारणा एक अफवाह का विकृत रूप थी, लेकिन नाज़ियों ने जिस क्रूर, अनैतिक, जघन्य अतिमानव को अपना स्वप्न बनाया उसमे तो मानवता का ही सर्वनाश हो जाता. सामने आता एक शक्तिशाली नरपशु, जिसका कुछ सम्बन्ध विकासवाद की मूर्खतापूर्ण समझ से जोड़ा जा सकता है, पर सीधा जैव विकास से भी नही.
“विकासवाद से तो सम्बन्ध है ही. उसमें तो माइट इस राइट और सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट का सिद्धांत चलता ही है. कम से कम इसकी तो पूरी समझ थी नाज़ियों को.”
नही थी, भाई. फिटेस्ट का अर्थ आकार, शक्ति या बुद्धिबल में सबसे बड़ा नही है. समायोजन क्षमता में दूसरों से आगे है. इसका अर्थ है नई परिस्थियों के अनुसार अपने को ढालना. ऐसे गुणों का विकास जो हमें बचे रख सकें. इसमें अकड़ और अहंकार की तुलना में लोच और नम्रता अधिक समझदारी सिद्ध होती है. ऐसे ही प्राणियों को प्रकृति बचे रहने का अवसर देती है. डायनोसर ख़त्म हो जाते है तिलचट्टे बचे रह जाते हैं. इसे ही कविता की भाषा में नेचुरल सिलेक्शन या प्राकृतिक वरण कहा दार्शनिको ने. नाज़ियों में अहंकार था, अकड़ थी, इसलिए उन्हें तो प्रकृति के नियम से ही नष्ट होना था इससे पहले वे कितना विनाश कर गए या कर सकते थे यह दूसरी बात है.
खैर, नीत्शे तो बहुत सात्विक और साधक स्वभाव का था. उसके आदर्श बहुत ऊँच थे लेकिन एक बार सुपरमैन की अफवाह से उसका नाम जुड़ जाने के बाद यह इस तरह प्रचारित हुआ कि टॉलस्टॉय ने भी उसे रुग्ण मानसिकता का मान लिया. जानते हो न नीत्शे के विषय में उनका कथन:
Nietzsche was stupid and abnormal.
“एब्नार्मल तो कह सकते हो उसे. पर उसकी सनक एक निर्भीक, आत्मविश्वासी साधक की थी और एक अफवाह ने उसको कहा से कहाँ पहुंचा दिया. इतिहास के पादलखाने में.”
“तुम बार बार किस अफवाह की बात कर रहे हो? साफ़ क्यों नहीं बताते?”
देखो, नीत्शे ने महामानव की कल्पना की थी जो उच्च मानवीय गुणों से लैस हो. उसका मानना था की कोई भी व्यक्ति श्रम, अध्यवसाय, सुनियोजित और अडिग कर्मठता के बल पर असाधारण ऊंचाई तक पहुँच सकता है. इसे तुम उसकी संभावनाओं का शिखर कह सकते हो. वह स्वयं अपने विषय में ऐसा ही ख्याल रखता था. याद करो चोटियों से चोटियों पर पाँव रखते हुए चलने का मुहावरा. और जानते हो अपने बारे में इस नाचीज़ का भी ख़याल कुछ ऐसा ही है. एक शेर अर्ज़ करूँ.”
“फँस गए हैं तो सुनना ही पडेगा.”
‘आसमानों पर कदम रखता हुआ चलता है.
तुमने भगवान को देखा कभी आते जाते.’
शेर तो सचमुच किसी सिरफिरे का ही लगता है पर खुद अपने ही मुंह मियां मिट्ठू बनना.
दर्पोक्तियाँ एक चीत्कार होती है, अपने न समझे जाने की अकुलाहट की अभिव्यक्ति जो अकेले पड़ जाने के बाद भी आत्मबल को ज़िंदा रखती है. यही अकुलाहट नीत्शे में भी थी. जानते हो वह कहता था मुझे समझने वाले तीसरी सहस्राब्दी में पैदा होंगे. अपनी बराबरी का किसी को गिनता ही न था. उसकी कुछ दर्पोक्तियां सुनाऊँ. अंग्रज़ी में ही सुनाऊंगा :
It seems to me that to take a book of mine into his hands is one of the rarest distinctions that anyone can confer upon himself.
“रहने दो यार तुम उसकी बात नहीं कर रहे, उसके बहाने अपनी बात कर रहे हो.”
ज़र्रानवाज़ी के लिए शुक्रिया.
“तो नीत्शे जिनको महामानव मानता था वह उन जैसे लोग थे जिनके प्रति उसके मन में अपार श्रद्धा थी. ये थे गैलिआनी, गेटे, मोंटेन, हेनरी बेली. पहले पहल तो वह शोपेन्हावर का अँधा भक्त था. उसी में माधयम से भारतीय दर्शन से भी प्रेरित. दस स्पेक जरथुस्त्र उसी प्रभाव की रचना है.”
“क्या उसका परिवार नाज़ी विचारों का नही था?”.
तुम शायद उसकी बहन एलिज़ाबेथ नीत्शे की बात कर रहे हो जिससे वह नफरत करता था क्योंकि वह यहूदियों से घृणा कराती थी, नाज़ी संगठन से जुडी थी और हिटलर का हाथ पकड़ा था. नीत्शे उसे “vengeful anti-semitic goose” कहता था.
“फिर वह अतिमानव वाली अवधारणा उसके नाम से कैसे जुडी? तुम बार बार जिस अफवाह की बात कर रहे थे वह क्या है?”
“बात दर असल ये है की एक पत्रिका के कार्टून में उसकी पुस्तक Ubermenschen अर्थात अद्वितीय के अंग्रेजी अनुवादकों ने Ubermensch शीर्षक दे दिया और आज की भाषा में कहें तो यह वायरल हो गया. कार्टून यह रहा.
Ubermensch

“एक बात और, एलिज़ाबेथ भी नाज़ी दल में उसके मरने के बहुत बाद में पहुंची थी. अपने अंतिम दिनों में नीत्शे ने अपनी माँ से भी मिलने से इंकार कर दिया था. पर अफवाहों की ताक़त तर्क और प्रमाणों पर भारी पड़ती है. लोगों को इनमे रस आने लगता है. ये रुकने का नाम नहीं लेतीं.
नीत्शे नस्लवाद का कटु आलोचक था. उसकी मान्यता थी की व्यक्ति की उच्चतम संभावनाएं उसी में छिपी हैं – थिंग-इन-इटसेल्फ – उसका प्रिय मुहावरा था. उसका मानना था कि महत्वकांक्षी व्यक्ति को अथक भाव से छोटी छोटी चीज़ों पर काम करते हुए उनमे पूर्ण सिद्धि प्राप्त करनी चाहिए और फिर उन अनुभवों को संयोजित करते हुए महान कृति प्रस्तुत करनी चाहिए.”
“तुमने तो पूरी तस्वीर ही उलट दी.”
“ऐसा कोई इरादा नहीं था पर एक बात जानते हो उसकी सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा माली बनने की थी. ऐसे आदमी को निराधार दुष्प्रचार के कारण कैसी अपकीर्ति से गुज़रना पड़ा.
“एक दूसरी कहानी इसमें जोड़ें: वाल्तेयर को तो जानते ही हो.
“वाल्तेयर कहाँ से आ घुसा नीत्शे में.”
“सुनो तो सही. एक आदमी के ऊपर गंभीर आरोप लगा. उसको फांसी दे दी गई. बाद में वाल्तेयर को अपनी खोज से पता चला की वह निरपराध था. वाल्तेयर ने अपने प्रमाणों के साथ मुक़दमे की फिर से सुनवाई करवाई. लोगो को अजीब लग रहा था. उसे फांसी तो बहुत पहले दी जा चुकी थी. अब मुक़दमे से कोई फायदा? वाल्तेयर ने कहाँ मैं उसके प्राण तो नहीं बचा सकता पर उसके नाम को उस अपयश से तो बचा सकता हूँ. मुक़दमा तो जीतना ही था.”
“तो यह होती है एक बौद्धिक की भूमिका. जिन पर अफवाहों और दुष्प्रचारों से प्रहार किया जा रहा हो उसके साथ खड़ा होना भी अन्याय के खिलाफ लड़ना ही है.”
“क्या इतने थोड़े से लोगों की नज़र से गुज़रने वाला यह लेख नीत्शे को उस कलंक से बचा पायेगा?” “भरोसा तो नही है पर हम अफवाहों के दबाव में न आकर प्रत्येक अभियोग और आरोप के प्रमाणों की मांग और जांच तो कर ही सकते है. नीत्शे की भविष्यवाणी ग़लत तो नहीं लगती. आखिर ये इबारतें हम तीसरी सहस्राब्दी में ही तो लिख और पढ़ रहे हैं. (THE CONSOLATIONS OF PHILOSOPHY by Alain de Botton)

Post – 2015-11-04

इतिहास के दावेदार

“तुम जानते हो, कुछ लोग तुम्हे मोदी का भक्त समझते हैं.”
“आगे ऐसा कोई आदमी टकर जाय तो उसे मेरा नाम बता देना. हो सकता है वह पहले से मेरा भक्त हो, न हुआ तो आगे हो जाएगा.”
“बुरा मत मानना. तुम मोदी की वकालत तो करते हो.”
“जो न्याय का साथ देगा वह अन्याय का विरोध करेगा. लेखक की पक्षधरता का यही अर्थ है. दुखी, उत्पीड़ित, अपमानित के प्रति सहानुभूति ही उसे उत्पीड़ित करने वाले का विरोध और सताए हुए का साथ देने को प्रेरित करती है. सत्य के प्रति निष्ठा उसे असत्य का विरोध करने को बाध्य करती है.”
“तुम, तुम…” वह गुस्से से हकलाने लगा.
मैंने कहा, “इस समय तुम मेरी बात समझ न पाओगे, इसलिए मैं तुम्हे एक दूसरे सताए हुए आदमी की पीड़ा सुनाता हूँ. उसका नाम था फ्रेडरिक नीत्शे. नाम सुना है उसका?”
“वही न जिसके दर्शन का नतीजा नाज़ीवाद था?”
“नाज़ीवाद उसके दर्शन पर प्रहार था. जीवित मिलता तो हिटलर सबसे पहले उसे गैस चैम्बर में भेजता, पर देखो उसका दुर्भाग्य कि तुम भी उसे नाज़ीवाद का जनक मानते हो. अफवाह में कितनी ताक़त होती है, इसका यह नमूना है.”
“क्या यह अफवाह है की उसने ही सुपरमैन याने अतिमानव की अवधारणा दी थी और उसके कारण हिटलर ने जितने यहूदियों को मौत के घाट उतारा उनसे अधिक जर्मन मूल के बीमार, अपंग, असहाय, कमज़ोर जनों को मौत के घाट उतारा था.
“सुपरमैन की अवधारणा एक अफवाह का विकृत रूप थी, लेकिन नाज़ियों ने जिस क्रूर, अनैतिक, जघन्य अतिमानव को अपना स्वप्न बनाया उसमे तो मानवता का ही सर्वनाश हो जाता. सामने आता एक शक्तिशाली नरपशु, जिसका कुछ सम्बन्ध विकासवाद की मूर्खतापूर्ण समझ से जोड़ा जा सकता है, पर सीधा जैव विकास से भी नही.
“विकासवाद से तो सम्बन्ध है ही. उसमें तो माइट इस राइट और सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट का सिद्धांत चलता ही है. कम से कम इसकी तो पूरी समझ थी नाज़ियों को.”
नही थी, भाई. फिटेस्ट का अर्थ आकार, शक्ति या बुद्धिबल में सबसे बड़ा नही है. समायोजन क्षमता में दूसरों से आगे है. इसका अर्थ है नई परिस्थियों के अनुसार अपने को ढालना. ऐसे गुणों का विकास जो हमें बचे रख सकें. इसमें अकड़ और अहंकार की तुलना में लोच और नम्रता अधिक समझदारी सिद्ध होती है. ऐसे ही प्राणियों को प्रकृति बचे रहने का अवसर देती है. डायनोसर ख़त्म हो जाते है तिलचट्टे बचे रह जाते हैं. इसे ही कविता की भाषा में नेचुरल सिलेक्शन या प्राकृतिक वरण कहा दार्शनिको ने. नाज़ियों में अहंकार था, अकड़ थी, इसलिए उन्हें तो प्रकृति के नियम से ही नष्ट होना था इससे पहले वे कितना विनाश कर गए या कर सकते थे यह दूसरी बात है.
खैर, नीत्शे तो बहुत सात्विक और साधक स्वभाव का था. उसके आदर्श बहुत ऊँच थे लेकिन एक बार सुपरमैन की अफवाह से उसका नाम जुड़ जाने के बाद यह इस तरह प्रचारित हुआ कि टॉलस्टॉय ने भी उसे रुग्ण मानसिकता का मान लिया. जानते हो न नीत्शे के विषय में उनका कथन:
Nietzsche was stupid and abnormal.
“एब्नार्मल तो कह सकते हो उसे. पर उसकी सनक एक निर्भीक, आत्मविश्वासी साधक की थी और एक अफवाह ने उसको कहा से कहाँ पहुंचा दिया. इतिहास के पादलखाने में.”
“तुम बार बार किस अफवाह की बात कर रहे हो? साफ़ क्यों नहीं बताते?”
देखो, नीत्शे ने महामानव की कल्पना की थी जो उच्च मानवीय गुणों से लैस हो. उसका मानना था की कोई भी व्यक्ति श्रम, अध्यवसाय, सुनियोजित और अडिग कर्मठता के बल पर असाधारण ऊंचाई तक पहुँच सकता है. इसे तुम उसकी संभावनाओं का शिखर कह सकते हो. वह स्वयं अपने विषय में ऐसा ही ख्याल रखता था. याद करो चोटियों से चोटियों पर पाँव रखते हुए चलने का मुहावरा. और जानते हो अपने बारे में इस नाचीज़ का भी ख़याल कुछ ऐसा ही है. एक शेर अर्ज़ करूँ.”
“फँस गए हैं तो सुनना ही पडेगा.”
‘आसमानों पर कदम रखता हुआ चलता है.
तुमने भगवान को देखा कभी आते जाते.’
शेर तो सचमुच किसी सिरफिरे का ही लगता है पर खुद अपने ही मुंह मियां मिट्ठू बनना.
दर्पोक्तियाँ एक चीत्कार होती है, अपने न समझे जाने की अकुलाहट की अभिव्यक्ति जो अकेले पड़ जाने के बाद भी आत्मबल को ज़िंदा रखती है. यही अकुलाहट नीत्शे में भी थी. जानते हो वह कहता था मुझे समझने वाले तीसरी सहस्राब्दी में पैदा होंगे. अपनी बराबरी का किसी को गिनता ही न था. उसकी कुछ दर्पोक्तियां सुनाऊँ. अंग्रज़ी में ही सुनाऊंगा :
It seems to me that to take a book of mine into his hands is one of the rarest distinctions that anyone can confer upon himself.
“रहने दो यार तुम उसकी बात नहीं कर रहे, उसके बहाने अपनी बात कर रहे हो.”
ज़र्रानवाज़ी के लिए शुक्रिया.
“तो नीत्शे जिनको महामानव मानता था वह उन जैसे लोग थे जिनके प्रति उसके मन में अपार श्रद्धा थी. ये थे गैलिआनी, गेटे, मोंटेन, हेनरी बेली. पहले पहल तो वह शोपेन्हावर का अँधा भक्त था. उसी में माधयम से भारतीय दर्शन से भी प्रेरित. दस स्पेक जरथुस्त्र उसी प्रभाव की रचना है.”
“क्या उसका परिवार नाज़ी विचारों का नही था?”.
तुम शायद उसकी बहन एलिज़ाबेथ नीत्शे की बात कर रहे हो जिससे वह नफरत करता था क्योंकि वह यहूदियों से घृणा कराती थी, नाज़ी संगठन से जुडी थी और हिटलर का हाथ पकड़ा था. नीत्शे उसे “vengeful anti-semitic goose” कहता था.
“फिर वह अतिमानव वाली अवधारणा उसके नाम से कैसे जुडी? तुम बार बार जिस अफवाह की बात कर रहे थे वह क्या है?”
“बात दर असल ये है की एक पत्रिका के कार्टून में उसकी पुस्तक Ubermenschen अर्थात अद्वितीय के अंग्रेजी अनुवादकों ने Ubermensch शीर्षक दे दिया और आज की भाषा में कहें तो यह वायरल हो गया. कार्टून यह रहा.
Ubermensch

“एक बात और, एलिज़ाबेथ भी नाज़ी दल में उसके मरने के बहुत बाद में पहुंची थी. अपने अंतिम दिनों में नीत्शे ने अपनी माँ से भी मिलने से इंकार कर दिया था. पर अफवाहों की ताक़त तर्क और प्रमाणों पर भारी पड़ती है. लोगों को इनमे रस आने लगता है. ये रुकने का नाम नहीं लेतीं.
नीत्शे नस्लवाद का कटु आलोचक था. उसकी मान्यता थी की व्यक्ति की उच्चतम संभावनाएं उसी में छिपी हैं – थिंग-इन-इटसेल्फ – उसका प्रिय मुहावरा था. उसका मानना था कि महत्वकांक्षी व्यक्ति को अथक भाव से छोटी छोटी चीज़ों पर काम करते हुए उनमे पूर्ण सिद्धि प्राप्त करनी चाहिए और फिर उन अनुभवों को संयोजित करते हुए महान कृति प्रस्तुत करनी चाहिए.”
“तुमने तो पूरी तस्वीर ही उलट दी.”
“ऐसा कोई इरादा नहीं था पर एक बात जानते हो उसकी सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा माली बनने की थी. ऐसे आदमी को निराधार दुष्प्रचार के कारण कैसी अपकीर्ति से गुज़रना पड़ा.
“एक दूसरी कहानी इसमें जोड़ें: वाल्तेयर को तो जानते ही हो.
“वाल्तेयर कहाँ से आ घुसा नीत्शे में.”
“सुनो तो सही. एक आदमी के ऊपर गंभीर आरोप लगा. उसको फांसी दे दी गई. बाद में वाल्तेयर को अपनी खोज से पता चला की वह निरपराध था. वाल्तेयर ने अपने प्रमाणों के साथ मुक़दमे की फिर से सुनवाई करवाई. लोगो को अजीब लग रहा था. उसे फांसी तो बहुत पहले दी जा चुकी थी. अब मुक़दमे से कोई फायदा? वाल्तेयर ने कहाँ मैं उसके प्राण तो नहीं बचा सकता पर उसके नाम को उस अपयश से तो बचा सकता हूँ. मुक़दमा तो जीतना ही था.”
“तो यह होती है एक बौद्धिक की भूमिका. जिन पर अफवाहों और दुष्प्रचारों से प्रहार किया जा रहा हो उसके साथ खड़ा होना भी अन्याय के खिलाफ लड़ना ही है.”
“क्या इतने थोड़े से लोगों की नज़र से गुज़रने वाला यह लेख नीत्शे को उस कलंक से बचा पायेगा?” “भरोसा तो नही है पर हम अफवाहों के दबाव में न आकर प्रत्येक अभियोग और आरोप के प्रमाणों की मांग और जांच तो कर ही सकते है. नीत्शे की भविष्यवाणी ग़लत तो नहीं लगती. आखिर ये इबारतें हम तीसरी सहस्राब्दी में ही तो लिख और पढ़ रहे हैं. (THE CONSOLATIONS OF PHILOSOPHY by Alain de Botton)

Post – 2015-11-03

त्रिकालदर्शी

“तुम एक दिन कह रहे थे, ‘इतिहासकार त्रिकालदर्शी होता है. ऋषि हो जाता है’. कहा था या नही?”
“कहा तो था.”
“आज भी मानते हो?”
“न मानने का कोई कारण नहीं.”
“तो यह देखो इतिहासकार क्या कहते है?” उसने हिन्दू का सम्पादकीय और समाचार वृत्त मेरे सामने कर दिया. इसमे अनेक जाने माने, अनेक कुर्सियों को तोड़ कर अनेक संभावनाओं की तलाश में देश-विदेश भटकते लोगों का नाम बड़े आदर से लिया गया था, जो कभी इतिहास पढ़ाया करते थे, प्राइमरी स्कूल के बच्चों से लेकर विश्वविद्यालय के छात्रों तक के लिए इतिहास के रूप में पढाई जाने वाली किताबें लिखा करते थे. बच्चे उन किताबों को छोड़ कर दूसरी कोई किताब पढ़ न सकें, इसका भी इंतज़ाम कर लिया था. ये वे लोग थे, जिन्होंने आई सी एच आर को चलाया और उसके प्रोजेक्टों में काम किया था और जिनका नाम देश से लेकर विदेशों तक फैला था. इनको लग रहा था कि आज से बुरे दिन उन्होंने देखे ही नहीं. हो सकता है इतिहास की किताबों में कहीं पढ़ा भी न हो, क्योंकि देखने और पढ़ने का उनका तरीका दूसरों से कुछ अलग था.
सो उसने अख़बार मेरे सामने पटकते हुए कहा, “देखो ये इतिहासकार क्या कहते है?”
अखबार दो तीन दिन पुराना था, इसलिए लगा वह अपनी मनवाने की तैयारी के साथ आया था. मैंने पूछा ” इनमें इतिहासकार कौन है?”
वह हंसने लगा, “अब ऊँट आया पहाड़ के नीचे. मैं बताऊंगा ये कौन हैं?”
“बड़े लोग हैं, मैं भी जानता हूँ. पर इनमे इतिहासकार कौन है?” मैंने फिर दुहराया.
“तुम सीधे कहो कि ये इतिहासकार नही हैं.”
“यही तो कह रहा हूँ. और यह मैं नहीं कहता, ये बेचारे खुद कहते हैं कि ये धंधेबाज इतिहासकार हैं, प्रोफेशनल हिस्टोरियन. कहते हैं या नहीं?”
“कहते हैं. कहते इसलिए हैं कि ज़िंदगी भर इतिहास ही पढ़ाया है. प्रोफेसर रहे है हिस्ट्री के.”
“तो यह कहो कि इतिहास पढ़ाते रहे हैं. इतिहासकार क्यों कह दिया. जो आदमी ज़िन्दगी भर हिंदी साहित्य पढ़ाता रहा हो उसे साहित्यकार, आलोचक मान लोगे? जो फलसफा पढ़ाता रहा हो उसे फिलॉसफर मान लोगे. हद करते हो यार!”
“फिर तुम्ही बताओ कौन है इतिहासकार?”
“दूर-दूर तह कोई दिखाई नही देता. जो है उसे मैं खुद नहीं देख पाता. नाम लेना शिष्टाचार के विरुद्ध है, पर तुम देखना चाहो तो देख सकते हो.”
वह कयास भिड़ाने लगा, फिर छातीफाड़ हँसी से लोटपोट हो गया. संभला तो बोला, “भई, कल एक बिल्ला बनवाकर लाऊंगा. तुम छाती पर लगा लेना, उस पर लिखा होगा, “रास्ता छोडो. इतिहासकार आ रहा है.”
“निहायत अहमक आदमी हो. सोचा भी तो बिल्ले की बात. पूरा सूट नहीं बनवा सकते?”
उसने हाथ मिलाया. चलो यही सही.
मैंने समझाने का प्रयास किया, “सच कहूँ तो ये ऊँचे घरों के सुशिक्षित, परन्तु कामचलाऊ प्रतिभा के लोग हैं, जैसा कि सुविधाजीवी परिवारों के बच्चे होते हैं. पारिवारिक हैसियत का लाभ मिला है. पहुँच ऊंची है. इन्हे अंग्रेजी तो आती है पर इतिहास नही आता. इतिहास की परिभाषा तक नहीं जानते. इतिहासकार के कार्यभार तक को नहीं जानते. पढ़ रखा है. किताबों की कमी कभी हुई ही नहीं. घर में ही इतनी कि खिलौनों से ऊबे किताबों में पहुंचे. पर ज्ञान भी स्वभाव के अनुसार आत्मसात होता है. इनमे आत्मरति और द्रव्यादान-लोभ इतना प्रबल रहा है कि वर्तमान में भी केवल यह देख पाते हैं कि कहाँ-कहाँ से क्या-क्या, किस जुगत से, जोड़ा, कमाया और जुगाया जा सकता है. वैभव इनके पास प्रभूत मिलेगा. इनके व्यक्तिगत सान्निध्य में आने वाला इनके स्नेह और अनुग्रह से अभिभूत हो जाता है. ये गुण महिमा बढ़ाने में उपयोगी होते है.
“ये इतिहास के तथ्यों से अवगत हैं परन्तु उनका उपयोग ईमानदारी से नही करते. इसका असर समझ पर पड़ता है. पक्षपात से विज़न मलिन हो जाता है – भाप से धुंधलाये शीशे या चश्मे की तरह. इसके लिए अवलिप्त बुद्धि का प्रयोग किया जा सकता है. गलत सिद्ध होने से घबराते हैं. वकीलों जैसी स्थिति है. सत्य और न्याय की रक्षा नहीं, जीत एकमात्र कसौटी है. लफ़्फ़ाज़ी और आत्मविज्ञापन पर अधिक भरोसा करते हैं.
“सत्ता से जुड़े लोग, चाहे वह राजसत्ता हो या धर्मसत्ता, सफलता चाहते हैं, सत्य की प्रतिष्ठा नहीं. वे पक्षधर होते हैं, अतः समदर्शी और तत्वदर्शी नहीं हो सकते. कम्युनिस्ट विचारधारा में तो प्रतिबद्धता पर, पक्षधरता पर वैसे ही ज़ोर दिया जाता रहा है. पक्षधर लोग तत्वद्रष्टा नही हो सकते. इतिहासकार जैसा कि तुमने याद रखा ऋषि होता है. दार्शनिक होता है वह. पूरी दुनिया में ऐसे द्रष्टा लम्बे समय बाद ही मिलते हैं. हम केवल यही कर सकते हैं कि निष्पक्ष होकर विचार करें और गलतियों का आभास मिलते ही उन्हें सुधार लें. इतिहासकार कहलाने के लिए इतना भी पर्याप्त है, परन्तु ये ऐसा नहीं करते.”
वह मेरी बात सुन तो रहा था, पर कुछ अनमनेपन से. मेरी बात समझने का दिखावा करते हुए, पर छूट भागने की सुरंग तलाशते हुए, मैं तरंग में था, “इन्होने तो इतिहास को भी गाली बना कर रख दिया. उन गालियों को ही युगसत्य बताकर उसकी ऎसी आदत डालते रहे कि तुम्हारे तथाकथित बुद्धिजीवियों को गाली बनाए जा चुके इतिहास क़े बिना मज़ा ही नहीं आता. ऐसा इतिहास जो गालियों को अनुचित और अवांछित बताये, वह सच हो सकता है, इसका इन्हे भरोसा ही नहीं होता, इसलिए विरोध करने पर वे तन कर कहते हैं, ‘इसमें गलत क्या है.” दुर्भाग्य से जो कम जानता है वह अपनी जानकारी पर बड़ी दृढ़ता से जमा रहता है. हारिल की लकड़ी छूटी तो ज़मीन पर आ गिरेगा.
“रोज़ी रोटी के लिए इतिहास चुनने वाले बंधुआ पाठकों के मन में भले यह इतिहास उतार दिया गया हो, परन्तु इतिहास में जिनकी सहज रूचि है, उन्हें इनसे क्षोभ हो, उनमे से कुछ के मन में उग्र आक्रोश हो तो उसका जवाबदेह कौन है. उसे सनकी कह कर केवल उसे दोष देना समस्या का समाधान नहीं है.”
मै रुका तो उसने ज़बान खोली, “जानते हो मैं चुप क्यों था.”
“क्यों.”
“मै सोच रहा था तुम थक जाओगे तो अपने आप थक कर बैठ जाओगे.”
मै हतप्रभ नही हुआ, “तुम घबरा रहे थे न? पर इतना तो समझ में आ ही गया होगा कि जो इतिहास को गालियों में बदल सकते है वे वे हैं, और जो गालियों को इतिहास मान सकते है वह तुम और तुम जैसे लोग हैं, जिन्हे कुर्सिया दिखाई देती है, पर सचाई नही. वे शांति के माहौल में भी अपने लेखन से उत्तेजना फ़ैलाने का प्रयत्न करते रहे है, वे उत्तेजित माहौल में इतनी देर तक बैठे रहे, यही आश्चर्य की बात है.
“थोड़ा ठहर कर मैंने पूछा, “जानते हो, किसी भी अन्य शाखा का कोई विद्वान अपने को पेशेवर (पेशेवर समाजशास्त्री, पेशेवर अर्थशास्त्री आदि) नहीं कहता. पहले ये भी नही कहते थे. इन्होने अपने को पेशेवर इतिहासकार कब से और क्यों लिखना आरम्भ किया?”
वह नहीं जानता था. मैने बताया “1987 से.”
“१९८७ से क्यों? उसमे ऎसी क्या खास बात थी.”
“उस साल एक किताब प्रकाशित हुई थी. एक ऐसे आदमी की जो अपने को आज तक इतिहासकार नही कहता.”
“क्या खास बात थी उस किताब में.”
“उसमें पन्ने पन्ने पर ऐसे सवाल उठाए गए थे जो देश देशान्तर के ऐसे इतिहास लेखको के उस काल पर समस्त लेखन को कचरे की ढेर बना देते थे.”
“मैं समझा नहीं. तुम पहेलियों में बात करते हो. उदहारण देकर बात करो.”
“मैं उसके एक मुद्दे की बात करूँ. लिखा था ऋग्वेद में रथ के हवाले गोरु के हवालों से अधिक बार और अधिक निर्णायक रूप में आए हैं. परिवहन के उन सभी साधनों का हवाला है जिनका भाप के इंजिन से पहले दुनिया में उपयोग होता था. नदियों को यात्रा पथ बताया गया है, फिर यह समाज चरवाहों का समाज हुआ या उन्नत अर्थव्यवस्था और अंतर्देशीय व अंतर्राष्ट्रीय व्यापार करने वाले समाज का? यह हड़प्पा सभ्यता का नाश करने वालों का साहित्य है या हड़प्पा भ्यता का अपना साहित्य? तुम समझ रहे हो मेरा मतलब? दिल्ली से नेहरू विश्वविद्यालय तक तहलका मच गया था. उस किताब को पढ़ने वाले छात्र जब सवाल करने लगे तो इसका खंडन करने की जगह यह बताया जाने लगा की ‘किसकी बात करते हो तुम, वह तो साहित्यकार हैं. पेशेवर इतिहासकार हैं ही नही.”
“तुम किस किताब की बात कर रहे हो?”
“यह न पूछो तो ही अच्छा. पर यह बताओ ऐसे लोगों को तुम इतिहासकार कह सकते हो? ये इतिहास का पेशा करने वाले लोग हैं. इतिहासकार के पास दृष्टि होती है इनके पास कुर्सी रही है.”
“लेकिन एक बात तो मानोगे. अध्यापक बहुत अच्छे हैं”.
“वाक्कुशल हैं. अपनी बातों से मुग्ध कर देते हैं. अपनी गलत बातों को इस तरह रख लेते हैं की सुनने वाले को लगे यही सही है. पर अपने छात्रों को जान बूझ कर गलत इतिहास पढ़ाने वालों को अच्छा अध्यापक कह सकते हो? ये तो इतिहास के चार्ल्स शोभराज हैं. मशहूर वह भी कम नहीं है मगर वह अपनी सही जगह पर है, ये गलत जगह पर.
तुम कहोगे साहित्य और कला के भी चार्ल्स शोभराज होते है.
मैंने कहा, “तुम्हारे मुंह घी शक्कर!”

Post – 2015-11-02

तानाशाही के खतरे वाली जो बात तुम कर रहे थे वह तो सचमुच सम्भव लगती है. इस आदमी में तानाशाही प्रवृत्ति कूट कूट कर भरी है. उसका चेहरा नहीं देखते. बोलता है तो लगता बुलडॉग भौक रहा है पंजे मारता हुआ.”
मैंने कुछ खिन्न स्वर में कहा, “तुम्हे तुम्हारी पार्टी ने संस्कार में यही दिया? इससे आगे बढ़ने का मंत्र तक नही सिखाया?”
उसका चेहरा देखने लायक था.
मैं उसपर सवार हो गया. “देखो, तुम किसी व्यक्ति का अपमान नहीं कर रहे हो. अपने देश के प्रधान मन्त्री का अपमान कर रहे हो. उस जनता का अपमान कर रहे हो जिसने उसे सर माथे चढ़ा लिया. और अपना भी अपमान कर रहे हो क्योंकि तुम उस देश के नागरिक हो जिसका प्रधान मन्त्री वैसा है जैसा तुमने बनाना और दिखाना चाहा.”
“गलती हो गई भाई. माफ़ भी करो.
“गलती नही हुई है यह तुम्हारी आदत का हिस्सा बन गया है वरना यह बात तुम्हे कल ही समझ में आ गई होती, और इस गलती की नौबत न आती. बुरा मत मानना, साम्यवाद की लोरी सुनाते-सुनाते तुम्हे ऐसा घोल पिलाया जाता रहा की तुम आदमी से भेड़िये में तब्दील हो गए. तुम्हे अविजेय बनाने के लिए असरदार नारेबाजी और हंगमेबाज़ी की आदत डाली जाती रही. तुम्हारा सबसे प्रबुद्ध वर्ग तो मज़दूर वर्ग है. सर्वहारा. उसकी भाषा तुम्हारे सुशिक्षित प्रतिबद्ध वर्ग की आदर्श भाषा बन गई. वह समादृत संबंधों के स्वजनों परिजनों के अंग-उपांग का नाम लेकर प्रजनन प्रक्रिया से जुड़े शब्दों का प्रयोग गाली के रूप में अपने कथन को प्रभावशाली बनाने के लिए करता है, तुमने गालियों का स्तर थोड़ा ऊपर कर दिया. तुमको किसी ने बताया नही कि यह फासिस्टों और नाज़ियों की भाषा है और इसी धज में तुम्हे लम्बी ज़बान और छोटे दिमाग के साथ फासिज़्म से लड़ने को खड़ा कर दिया गया जब कि तुम्हे यह बताया तक नहीं गया कि फासिज़्म है क्या बला, किन परिस्थितियों में पैदा होता है, वह अपने भीतर से ही कितना खोखला होता है. बताया सिर्फ यह गया कि अन्य गालियों की तरह फासिज़्म भी एक गाली है. जिसकी ज़बान बंद करनी हो उसे फासिस्ट कह दो और डंका बजाओ. अब तुम्हे अपने भेड़िये से लम्बी जंग लड़नी होगी दुबारा आदमी बनने के लिए.”
वह अब फूटा तब फूटा की स्थिति में था. मैं आवेश में बोल तो गया पर ग्लानि मुझे भी थी. दोष उसका तो न था. एक ज़माने में मैं यह भाषा भले न बोलता था, पर मुझे यह बुरी क़तई नहीं लगती थी. आधा गांव के कुछ चरित्रों की भाषा आज भी गलत नहीं लगाती. प्रश्न औचित्य का है. कुछ देर तक हम चुप बैठे रहे. जब चुप्पी भारी पड़ने लगी तो बात उसे ही शुरू करनी पड़ी, “मैंने कुछ शख्त बात कह दी, उसका खेद है, लेकिन यह तो मानोगे ही की उसमें तानाशाही प्रवृत्ति है.”
“भले मानस, खेद हुआ और ज़बान संभाली तो कम से कम ‘उनमे’ तो कहा होता. चलो माफ़ किया. एक दिन में हुआ भी तो कितना सुधार होगा.
“रही बात तानाशाही प्रवृत्ति की तो यह प्रवृत्ति तो मुझमें भी है. तुम मेरे लिखने-पढने के कमरे को देखो तो बस केआस नज़र आएगा. चीज़े बिखरी हुई हैं. जो अपनी किताबें और कागज़ संभाल नही पाता वह भी सोचता है कि अगर मौका मिले तो मैं दुनिया को इस तरह चलाऊँ. तानाशाह होना सभी चाहते हैं. कम से कम वे जो अपने घर परिवार को किसी आदर्श संस्था के रूप में चलाना चाहते हैं, छोटे मोटे तानाशाह ही बने रहते हैं. तानाशाही इतनी बुरी चीज़ नही है. हाँ दुरुस्त भी नहीं है. तानाशाह तो गांधी जी भी बनना चाहते थे और सच कहो तो जब तक उनकी चली तानाशाह ही बने रहे. नेहरू ने तो अपनी तानाशाही आकांक्षाओं के बारे में एक लेख, माडर्न रिव्यू में एक लेख चाणक्य के नाम से लिखा था. बाद में किसी ने पूछा, क्या अब भी आप में वह प्रवृत्ति है, तो कहा, “मैंने पहले ही इसे भांप लिया था इसलिए बच गया.’ बचे वह भी नही पर कोशिश करते रहे. वह प्रवृत्ति उनमे बनी रही, इंद्रा जी में उभर आई पर इस प्रवृत्ति से लड़ने की कोशिश वह भी करती थीं, केवल कभी कभी. संजय में यह ज़बरदस्त थी. मूर्खता की हद तक. मेंनका में भी उतनी ही प्रबल है. जो लोग निर्माण करना चाहते हैं वे जो कुछ जिस तरह बनाना चाहते हैं उसमे बाधा न पड़े, सभी एक लय में, तालमेल से काम करें, उस सपने को साकार करने को जो महत्वाकांक्षी व्यक्ति को तानाशाह बनाती है. फिल्म का डायरेक्टर, टीम का कप्तान, ऑर्केस्ट्रा का संचालक, सेना का नायक सभी तानाशाह ही होते है. तानाशाही प्रवृत्ति का मूल यही है. और तुम को तो ऐसा सोचना भी नहीं चाहिए. तुम लोग तो स्वयं तानाशाही के पक्षधर हो.”
“अरे भई वह तानाशाही किसी व्यक्ति की नहीं होती.”
मैं हंसने लगा तो वह सकपका गया.
“पहले इस कटु सत्य को समझो कि मोदी एक विषेष ऐतिहासिक परिस्थिति की उपज है। इतिहास पुरुष है। उसे भारतीय जन समाज ने 2013 में तानाशाह के रूप में…”
“2013 में नहीं, 2014 में और तानाशाह के रूप में नहीं, भावी प्रधानमन्त्री के रूप में। तानाशाह वह खुद बनना चाहता है। जब तुम इतनी मामूली बातें भी नहीं समझ पाते तो …
मैंने उसे वाक्य पूरा करने ही नहीं दिया, “2014 में निर्वाचन हुआ और जनता पार्टी जीती। जनता ने तो 2013 में ही उपलब्ध तानाशाहों में से किसी एक को चुनना आरंभ कर दिया था – अडवानी को इतने नम्बर, राहुल को इतने, सोनिया को इतने, नीतीश को इतने और मोदी को इ-त-ने। एक बार नहीं, बार बार मोदी को इ-त-ने नम्बर मिलते रहे। जब किसी एक व्यक्ति को केन्द्र में रख कर पूरा चुनाव हो तो जीत या हार किसी दल की नहीं होती, तानाशाह की होती है।
“जनता का विश्वास कांग्रेस के कारनामों के कारण लोकतन्त्र से उठ गया था। वह तानाशाह चुन रही थी और मोदी को चुन लिया था। कर्मकांड 2014 में पूरा हुआ। कांग्रेस 2013 में मान चुकी थी कि वह हार गई और जल्दी जल्दी जो जर जमीन हथियाया जा सकता था उसे हथियाने पर जुट गई थी फिर भी एक आखिरी बाज़ी उसने लगाई, सबको भोजन का अधिकार. समाज ने समझा ‘सब कुछ खा जाने का अधिकार.’ उसने कांग्रेस को यह बता दिया कि देश-हित तुम्हारी प्राथमिकता नही. उसने उसे हराया नहीं धक्के देकर बाहर कर दिया, यह देश का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है परन्तु इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है,”
अकेली ऎसी पार्टी जिसका देशव्यापी जनाधार था, जो ही विकल्प बन सकती थी, उसने अपना नैतिक औचित्य खो दिया. वह हारी नही. लोकतंत्र में हार-जीत होती रहती है. कांग्रेस का सफाया हो गया फिर भी प्रबल शक्ति बन कर सत्ता में आई क्योंकि जिस विकल्प ने उसे सत्ता से बाहर किया था वह धँस गया. कोई दूसरा विकल्प ही न था. इस बार कांग्रेस हारी नही है, अपनी भ्रष्टता के कारण अपना नैतिक अधिकार खोकर धंस गई है और अब नेहरू परिवार से बाहर आकर भी अपने मलबे संभाल नही सकती. दुखद स्थिति है, पर है. क्या किया जा सकता है.
इसमें आशा की किरण एक ही है कि लोगों ने भले तानाशाह चुना हो, इस व्यक्ति को लोकतंत्र में इतना अडिग विश्वास है कि यह अपना विकल्प स्वयं पैदा करेगा. पर वह विकल्प या विपक्ष विकास की नीतियों से संचालित होगा, जाति और धर्म से नही.
“और जानते हो यह भी मोदी के कारण नही होगा, इतिहास के कारण होगा. पूंजीवादी विकास के कारण होगा. तानाशाही पूंजीवाद को रास नही आती. तानाशाही मध्यकालीन मनोवृत्ति है. मोदी को इसकी समझ है दूसरों को नही. वह बार बार इसकी याद दिलाते हैं कि यह लोकतंत्र की महिमा है की एक चाय बेचने वाला देश का प्रधानमंत्री बन गया. यह भारत में उभरते पूंजीवादी दबाव की भी महिमा है या नहीं?
“जनता ने भले तानाशाह चुना हो वह तानाशाह लोकतान्त्रिक बने रहने कि लिए संघर्ष कर रहा है, दुश्मनो और सगों दोनों से एक साथ लड़ता हुआ.”
11/2/2015 7:21:49 AM

Post – 2015-11-01

“देखो तुम्हारी नीयत को ले कर तो मेरे मन में कभी कोई दुविधा नहीं रही, परन्तु तुम्हारी समझ पर मुझे भरोसा नहीं।” वह कल के अपने आखिरी फिकरे की तरंग में था.
“भरोसा तो मुझे भी नहीं है। समझ का विश्वास और भरोसे से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह कोई वस्तु नहीं है कि खरी मिल गई और रख लिया। यह प्रक्रिया है। यह निरन्तर जाँचते हुए अपने ज्ञान और अनुभव की सीमा में सही होने की ऐसी कोशिश है जिसमें कोई छोटा सा घटक भी जुड़ जाय तो पुरानी समझ का महल धराशायी हो जाता है। इसलिए इसमें अपनी ओर से हम इतना ही कर सकते हैं कि लगातार चौकस रहैं ।
जब मैने पूछा था कि तुम मोदी को क्या समझते हो, तो सोचा था तुम मेरे मन की बात कहोगे, ‘पूँजीपतियों का एजेंट’ या ‘अडानी और अम्बानी का दलाल।”
“तुमने गलत सोचा। मैं इस भाषा में बात नहीं करता, जिसमें अपरिभाषित आरोप मुँह खोलने से पहले ही समझ को धुँधला कर दें। सर्वहारावाद के चलते भाषा और संस्कृति का जैसा भदेसीकरण तुम लोगों ने किया है वैसा अनपढ़ गँवार भी नहीं कर सकते। रनिंग डाग आफ कैपिटलिज्म, ब्लैकशीप, सुअरेर बाड़ा, फासिस्ट, सैफ्रन ब्रिगेड, सैफ्रनइज़ेशन, शविनिस्ट, काउ बेल्ट, मौत का सौदागर। तुम्हारे एक बड़बोले कवि ने तो सूअर शीर्षक देकर कई कयिताएं भी लिख डाली हैं. यार, जब तुम नफरत से इतने भर जाओगे तो कुछ सोच भी सकते हो? ज्ञान तुम्हारा जितना भी अधिक हो, तुम जैसों की भीड़ तुम्हारे पास जितनी भी बड़ी हो, दिमाग ही सन्तुलित नहीं है तो तुम्हारी क्रियाएँ, प्रतिक्रियाएँ, विचार, निष्कर्ष किसी समझदार व्यक्ति को सही लग सकते हैं? क्या तुम नहीं मानते कि अपनी इन्हीं हरकतों से तुमने पूरे देश को एक विशाल पागलखाना बना रखा है जिसमें लोग अंट संट बोल रहे है, अंडबंड हरकतें कर रहे हैं और हद यह कि तुम इसी को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता कहते हो और इस भाषा और कारगुज़ारी पर भी कहीं कोई रोक न होने के बाद कहते हो तुम्हारी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता छीनी जा रही है. सारे बुद्धिजीवी तुम्हारे साथ हैं उनका अनुकरण करते हुए लंठ लोग! शिक्षा का क्षेत्र तुम्हारे हाथ मे ही रहा है, तुमसे यह सब सीखा है उन्होंने; कहीं अनुकरण में कहीं प्रतिक्रिया में। तुम्हारे रंगकर्मी तक कहते हैं हल्लाबोल और जब दूसरे कहते हैं मैं भी हल्ला बोलूँगा तो शोर मचाते हो देखो यह हल्ला बोल रहा है.”
“खैर, बात मैं भी वही कहता जो तुम कह रहे हो, परन्तु मैं कहता, मोदी पूँजीवादी विकास के पक्षधर हैं।”
“पूँजीवादी विकास से इस देश का उद्धार हो सकता है?” उसने हमलावर की तरह प्रश्न किया.
“नहीं हो सकता। छोटे से छोटे देश को भी पूँजीवादी व्यवस्था में सम्पन्नता के लिए ऐसा उन्नत तकनीकी स्तर हासिल करना होता है जो उसे प्रतिस्पर्धा में टिकने योग्य बना सके। उसे अपने से कई गुना बड़े देशों को अपना बाजार बनाना पड़ता है, तब देश खुशहाल होता है। भारत जैसे विशाल देश के लिए तो पूरी दुनिया का बाजार चाहिए, जब कि वह स्वयं दूसरों का बाजार बना हुआ है। जिन भी विकसित देशों की कोई दिलचस्पी भारत में है, वे इसे बाजार ही मानते हैं।”
“फिर?”
“फिर क्या? ”
“अब इसके बाद तुम क्या समझते हो मोदी को?”
“युगद्रष्टा!“
“हें, हें, क्या कहा? युगद्रष्टा! इतनी खुशामद तो मोदी के चापलूसों ने भी नहीं की होगी।
“चापलूसों के पास समझ कहाँ होती है।
“युगद्रष्टा किस अर्थ में कहा तुमने? कुछ भी तो नया नहीं किया इस आदमी ने।“
मैंने उसके प्रश्न का जवाब नहीं दिया, “उसमें असाधारण परिपक़्ता है.”
“रोज़ कोई न कोई बचकानी बात कह जाता है. हँसते हँसते लोग लोट-पोट हो जाते हैं और तुम कहते हो परिपकता है.”
उसे खिझाने में मज़ा आ रहा था, “और कितनी गहरी समझ है.”
अब हंसाने की उसकी बारी थी. परन्तु मैं अपनी पर आमादा था, “उसके सारे आलोचक खुर्दबीन लेकर उसकी गलतियाँ तलाश कर रहे हैं और गलती के नाम पर मिलता है, ‘मोदी को अमुक घटना पर बोलना चाहिए। चुप क्यों हैं?’ मोदी को मालूम है तुम मोदी का जवाब सुनना नहीं चाहते हो, उनसे चें’ बुलवाना चाहते हो। तुमने आत्मालोचन के नाम पर अपनों से भी यही कराया है. मोदी उनसे अधिक परिपक्व है. तुम्हारी चीत्कारों का उसके पास मुकम्मल जवाब हैं. मौन. जहाँ मौन बोलता हो वहाँ शब्द बर्वाद करना जरूरी नहीं।“
“मौन बोलता है। गजब है। यह कैसा मौन है भाई, जो इतना बोलता है कि किसी को समझ में आता ही नहीं कि मौन के पीछे क्या है।”
“पीछे है लोकतन्त्र”
हम कुछ देर तक चुप रहे. फिर मैंने ही शुरू किया. “बताओ, वह पहला आदमी है या नहीं जिसने सोचा कि इस देश को सामंती सोच और सामंती फसादों से, सम्प्रदायवाद और जातिवाद से बाहर आना चाहिए ?”
“अरे भाई वह दिखावा है. भेड़िये ने मेमने की खाल ओढ़ रखी है. सिक्का जम जाने के बाद असली चेहरा सामने आएगा. आरएसएस की कोख में पला हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिकता को खत्म करेगा?”
“हो सकता है तुम सही कह रहे हो. फिर भी यह बताओ वह तुम्हारे सहित सभी दलों को खत्म करना चाहता है या नहीं?”
“चाहता है, इसमें कोई शक है. पर चाहने से क्या होता है. देखो कुछ ही दिनों में सारा शीराज़ा बिखर जाएगा.”
“तुम कुछ आगे की बोल जाते हो. मैंने सिर्फ यही पूछा था कि वह तुम सबको मिटाना चाहता है “या नहीं और तुमने मान लिया मिटाना चाहता है.”
“अब यह बताओ तुम सभी के सामने सबसे बड़ा लक्ष्य क्या है?”
“सांप्रदायिक शक्तियों को परास्त करना.”
“और कोई कार्यक्रम?”
“यह क्या कोई छोटामोटा काम है?”
“देखो भाई, साम्प्रदायिकता को मिटाने के अलावा तुम्हारे पास कोई काम नहीं है. साम्प्रदायिकता मिट जाए तो तुम मिट जाओगे. इसे घेर घार कर उठाने का काम तुम कर रहे हो. तुम सभी को एक साथ साफ़ करने का सीधा तरीका है साम्प्रदायिकता को समाप्त करो. विकास का रास्ता अपनाओ. पूंजीवादी विकास सामंती कुरीतियों – जातिवाद, क्षेत्रवाद, सम्प्रदायवाद, पिछड़ापन सबका इलाज है. तुम मानते हो उसने पूंजीवादी विकास का रास्ता अपनाया है. यदि अपने लिए नहीं तो तुम्हे खत्म करने के लिए वह सम्प्रदायवाद को ख़त्म करना चाहता है और इसीलिए मैंने उसे युगद्रष्टा कहा. उसके कहने और करने में एकरूपता है. तुम्हारी किसी बात पर किसी को भरोसा नहीं. परन्तु मैं इस बात से चिंतित हूँ कि दूसरी सभी पार्टियां ख़त्म हो जांय तो कहीं यह विकल्पहीनता तानाशाही का रूप न ले ले. होगा यह सब तुम्हारे किये से ही यह जान लो. यह जो तुम लोग छोटे से छोटे बहाने से हंगामा खड़ा करते हो यह तुम्हारे विनाश का कारण बनेगा. उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा.

Post – 2015-10-31

“मैं तुमसे दो टूक बात करना चाहता हूँ. तुम मोदी को क्या समझते हो?
“कागज़ का पुतला. उससे आगे कुछ नहीं. मैं तो अपने पाठकों तक को नहीं समझ पाता जिनके लिए लिखता हूँ, जिनके निकट पहुँचना चाहता हूँ.”
“तुम्हारी दलीलों से तो लगता है तुम मोदी के पास भी पहुँचना चाहते हो. पहुँच न पाओ यह दूसरी बात है.”
“कैसे?”
“जो मोदी की आलोचना करते हैं तुम उनके पीछे पड़ जाते हो.”
“एक नितांत व्यक्तिगत बात बताऊँ.” मैंने दबी ज़बान से कहा.
“वह कुछ बोला नहीं, मेरी ओर सवालिया निगाहों से देखता रहा.
“१९७४ में मैं एक पत्रिका मतदाता नंबर ०००००१ के नाम से में एक व्यंग्य कालम लिखता था. संपादक के जगजीवन बाबू से घरेलू सम्बन्ध थे, इसलिए पत्रिका उन्हें भी दे आता था. उन दिनों मैंने इंद्रा जी के संसदीय व्यवहार और अहंकार पर कुछ किश्तें लिखी थीं. बाबूजी ने कहा इस लेखक से मैं मिलना चाहता हूँ. उसने मुझे बताया तो मैंने कहा, जो वह मुझे दे सकते हैं वह मुझे चाहिए नहीं और जो वह मुझसे चाह सकते हैं वह मैं दे नहीं सकता. यह तब की बात है जब मेरी कोई लेखकीय हैसियत भी नहीं थी. मैं जो स्वतः लिखता हूँ वही कोई दूसरा किसी प्रलोभन से लिखवाना चाहे तो मैं नहीं लिखूँगा. सताए हुए के लिए लिख भी दूँ सत्ता से जुड़े व्यक्ति के लिए नही लिख सकता. यह है सत्ता के प्रति मेरा नज़रिया.
“मैं एक मामूली से पद पर काम करता था. पर उसे आदर्श मानता था. दो कारणों से. एक यह सोचकर कि साम्यवादी व्यवस्था हो तो जितना मुझे मिलता है उससे कुछ कम ही मेरे हिस्से में आएगा. दूसरे यह सोचकर कि लेखक को कभी आर्थिक दृष्टि से निश्चिन्त नहीं होना चाहिए अन्यथा वह समाज में रहते हुए भी समाज से कट जाता है और समाज से कटे हुए आदमी का लेखन सिर्फ समाज से कटे हुए लोगों के काम का रह जाता है.
“यह मेरी अपनी समझ रही है पर इसका डंका नहीं बजाता. इन दिनों कुछ निश्चिंतता की स्थिति है तो एक लेखक के रूप में झेंप सी महसूस होती है. रूमानी मुझे आहात न किया होता तो इसका ज़िक्र भी न करता ऐसे प्रसंगो को मैं आत्मीय लोगों और अपनी संतानो तक से गोपन ही रखता आया हूँ. क्योंकि अपने आत्मीयों तक के सामने अपने मुँह से अपने आन की बातें व्यक्ति को छोटा बनाती है और अपनी दुर्बलताओं की स्वीकृति से क़द ऊँचा होता है. खुदफरोशों को यह मामूली नियम भी पता नहीं होता. वे जितना अपने लिखे को बेंचते है, उससे अधिक अपने को बेंचते है.”
“खुदफरोश तो उन्हें तुम अपनी तिलमिलाहट में कह रहे हो. ज़िन्दगी आगे बढ़ने का नाम है, ऊपर चढ़ने का नाम है. लिखने का लक्ष्य है अधिक से अधिक लोगों के साथ अपनी अनुभूति, ज्ञान, विचार और विचारदृष्टि को बाँटना. यदि ऐसा कोई करता है तो इसमें बुराई क्या है.”
” बुराई है” मैंने कहा तो, परन्तु उसने मेरी बात पर ध्यान ही नहीं दिया. अपनी रौ में बोलता रहा, “तुम्हें पता है जिसे आज किताबों में प्रस्तावना लिखा जाता है, वह इंट्रोडक्शन का अनुवाद है? और जानते हो इसके लिए उससे पहले, किस शब्द का प्रयोग किया जाता था.” उसने मेरे उत्तर की प्रतीक्षा नहीं की. वह जानता था कि मुझ जैसे तीन अक्षर के बादशाह को यह रहस्य पता नहीं होगा. उसका सोचना गलत भी नहीं था. कुछ ज़ोर देकर बोला, ‘ ऐड्वरटिज़्मेंट. विज्ञापन.’ तुम्हें पता है तुम आत्मविज्ञापन को आत्मविक्रय और खुदफरोशी कह कर अपनी कबीलाई मानसिकता पर पर्दा डालना चाहते हो?
उसने अपनी टिप्पणी का उपसंहार करते हुए जड़ा, “जो अल्प से संतुष्ट होता है वह अधोगति को जाता है. जो बहु की दिशा में अग्रसर होता है, भूमा के महत्व को जानता है वही आधुनिक है.”
“तुम क्यों मान लेते हो कि मैं अपने को सही मानता हूँ. मैं अपने पक्ष को पूरी दृढ़ता से गलत सिद्ध किये जाने के आमन्त्रण के साथ, प्रस्तुत करता हूँ कि अकेले सोचने पर मुझे ऐसा लगता है. तुम मुझे गलत सिद्ध करो तो उसे भी लाभ हो जो अपने विचार और मंतव्य को रखते हुए तुम्हें गलत सिद्ध कर रहा है और तुम्हें सोचने को विवश कर रहा है. मेरा लक्ष्य अपने को सही सिद्ध करना नहीं है, मित्रों के सुन्न पड़े स्नायमण्डलो को उत्तेजित करना है जिनमें जान आने पर आदमी सोचना आरम्भ करता है.. यदि तुमने मुझे गलत सिद्ध कर दिया तो मेरा लक्ष्य पूरा हो गया.”
“अब तो मान लिया न की तुम गलत आरोप लगा रहे थे?”
“नहीं इतनी आसानी से कैसे मान लूँगा. जब अल्प से संतोष को तुम कबीलाई मानसिकता कह रहे थे तो मेरा उससे कोई विरोध नही था. पर जानते हो वह अल्प पैदा करने से बेचने तक का सारा काम उसी को करना पड़ता है क्योंकि वहाँ कार्य विभाजन नही है. कार्य बिभाजित समाज में हम अपना काम करें और विज्ञापन और वितरण का काम उसे सौंप दें जिसे उस का भार सौपा है तो वह अधिक अच्छा हो. जो श्रम आत्मविज्ञापन पर बर्वाद करते हैं वह अपने काम पर लगायें, उत्पादन पर लगायें तो अधिक अच्छा हो.”
“ठीक है. यह बात समझ में आती है, परन्तु यदि कोई आत्मविज्ञापन का काम भी संभाल लेता है तो तुम्हें इस पर आपत्ति क्यों हो.”
“क्योंकि इससे एक गलत प्रवृत्ति पैदा होती है. जुआड़ियों वाली, बाज़ी मार ले जाने वाली. बौद्धिक गरिमा की कीमत पर, शालीनता की कीमत पर. इससे बौद्धिक पर्यावरण दूषित होता है. छिछोरेपन का प्रसार होता है. इससे कुछ तात्कालिक लाभ हो भी जाय तो साख को बट्टा लगता है. दूरगामी परिणाम कुफलदायक होते हैं.”
बात तो सत्ता से शुरू हुई थी. तुम मानते हो बौद्धिक को सत्ता से नहीं जुड़ना चाहिए?
“मैं ऐसा नही मानता. साहित्य, कला और संस्कृति के ऐसे संस्थान हैं जिनसे जुड़ना भी सत्ता से जुड़ना ही होता है और इनका भार बौद्धिक ही संभालें तो अच्छा रहेगा. मैं यह अवश्य मानता हूँ कि इनसे जुड़ने वालों की अपनी सर्जनात्मकता अवरुद्ध होती है और इसलिए यदि कोई अपनी सर्जनात्मक क्षमता पर भरोसा करता है तो उसे इनसे जुड़ने से बचना चाहिए. यह सर्वोत्तम मेधा की जगह नही है. महत्वकांक्षी रचनाकार को सत्ता से बचना और अपनी समस्त ऊर्जा को अपने चुने हुए क्षेत्र को अर्पित करना चाहिए. अपनी पूर्णतम सम्भावना पर पहुँचने का प्रयत्न करना चाहिए. इसलिए संस्थानों से जुड़ने के लिए आतुर रहने वाले साहित्यकारों को या तो दोयम दर्ज़े का मानता हूँ या आत्महंता. परन्तु यदि सर्जनात्मकता चुक गई है, कोई मजे से दिन काटने के लिए सत्ता प्रतिष्ठानों से जुड़ना चाहता है तो किसी को उससे क्या आपत्ति हो सकती है? हाँ सत्ता में ऊंची पहुँच के कारण वह ऊँचा साहित्यकार या विचारक भी है यह मैं नहीं मानता. कुछ लोग इनसे इसलिए जुड़ते हैं कि इनके बिना उनकी लेखकीय हैसियत रह ही नही जायेगी. इन्हे मैं मज़माबाज़ लेखक मानता हूँ यह छिपाऊँगा नहीं.”
मोटी बात यह कि जो सत्ता में होता है उससे तुम्हे चिढ है.
“चिढ नही, चिढ नहीं होती. चिढ़ने का मतलब है तुम स्वयं हीनता से ग्रस्त हो. मैं उनका आदर करता हूँ.”
“फिर परहेज़ किस बात किस बात का?”
“जो सत्ता में होता है उससे मेरी दूरी बढ़ जाती है. पहले से जान पहचान हुई तो भी कम हो जाती है.”
“क्यों झेंप के कारण?”
“मेरा एक छोटा सा तर्क है. वही व्यक्ति जब सत्ता में होता है तो वह वही नही रह जाता, वह सत्ता प्लस वह आदमी हो जाता है. उससे मिलता था तो बराबरी के स्तर पर. अब जो कुछ वह पहले था उससे कुछ बड़ा और इसलिए मुझसे भी बड़ा होगया. उससे मिलना उससे छोटा बनकर ही हो सकता है. यह मेरे स्वाभाव में नहीं है. दैन्य नहीं साम्य. उम्र, ज्ञान, पद, अनुभव में छोटे लोगों से भी बराबरी के स्तर पर ही मिलता हूँ. तुम थोड़ा बहुत जानते भी हो. तुमने बात मोदी से आरम्भ की थी इसलिए इतना जान लो मैं उस प्रधान मंत्री से जिसका नाम मोदी है न तो निकटता रख सकता हूँ न उसे समझ सकता हूँ न समझना चाहता हूँ, न समझने की योग्यता रखता हूँ. यदि कुछ समझना चाहता हूँ तो केवल इतना कि वह अपने पद और दाइत्व का कितनी ईमानदारी से निर्वाह कर रहा है.”
“पर तुम्हारी बातें सुनकर तो मुझे बार बार यह अंदेशा होता है कि तुम उसका समर्थन कर रहे हो.”
“समर्थन के लिए व्यक्ति को समझना ज़रूरी नहीं. इतना ही पर्याप्त है कि उसका काम सही है या गलत.”
चलो यही सही. तो तुम मोदी को सही समझते हो. यही तो तुमसे उगलवाना चाहता था.”
उसने मेरे कंधे पर हाथ मारा और उठ कर खड़ा हो गया.

Post – 2015-10-30

“तुमसे बात करता हूँ घबराहट होती है.” लीजिये. यह बात भी वह हंसकर कह रहा था.
“क्यों?” मैंने भी हँसते हुए ही पूछा.
“तुम बहुत निराशाजनक चित्र खींचते हो.”
“मुझे तुम भूल जाओ. मान लो मैंने जो कुछ कहा वह बकवास है. क्या इससे तुंम्हारी घबराहट दूर हो जायेगी?”
“दूर तो नहीं होगी, क्योंकि हालत अच्छे नहीं हैं. परन्तु क्या हर चीज़ के लिए हम ज़िम्मेदार हैं?”
“हमारा जो बुरा हाल है, वह बुरे समाज के कारण है या बुरे नेतृत्व के कारण?”
“ज़ाहिर है बुरे नेतृत्व के कारण.” वह तपाक से बोला.
इस देश का बौद्धिक नेतृत्व वामपंथियों के हाथ में रहा है या दक्षिण पंथियों के हाथ में?
वह सकपकाया फिर संभल कर बोला, “तुम कहना क्या चाहते हो?”
“मैं कुछ कहना चाहता ही नहीं. मैं तो तुमसे जानना चाह रहा हूँ. बताना तो तुम्हे है.”
“सवालों के माध्यम से भी बहुत कुछ कह दिया जाता है.”
“कहा तो जाता है. इसे भी मैं सवाल के रूप में ही पूछूँगा, क्या ये सवाल पहले तुम्हारे मन में कभी उठे? उठे तो उनका उत्तर क्या मिला? क्या सवाल उठे और उनसे तुम घबरा गए और उन्हें टाल गए? मुझे भी बताओ. नही उठे तो इनसे कतराते क्यों रहे? और अब जब मैं इन्हे उठा रहा हूँ तो इनसे घबरा कर मुझे ही दोष क्यों देना चाह रहे हो? घबराहट और निराशा से बाहर आने का रास्ता तो इनका जवाब तलाशने से ही मिलेगा.”
“तुम मेरी खिंचाई कर रहे हो.”
“खिंचाई ही मान लो. तुम जिस गड्ढे में पड़ गए हो उसमें से तुम्हें खींच कर ही बाहर लाया जा सकता है. मैं उतना पढ़ा-लिखा नहीं हूँ जितने तुम हो. समझने का समय भी तुम पढ़ने-लिखने पर ही लगाते रहे हो. लेकिन सवालों का जवाब न वहाँ से मिलता है, न तुम दे पाते हो, क्योंकि न तो सवाल करते हुए पढ़ा, न सवाल करते हुए सुना और न बाद में सवालों की ओर रुख किया. और अब पूछ रहा हूँ तो कहते हो खिंचाई कर रहा हूँ.”
वह अकुंठ भाव से हंसा.
“अच्छा अब एक दूसरे पहलू पर नज़र डालो. यदि हालात ख़राब हैं तो पहले ख़राब थे और अब अधिक खराब होते जा रहे है या पहले अच्छे थे और अब खराब होने लगे है या पहले जैसे थे उससे अच्छे हो रहे हैं परन्तु उस गति से अच्छे नही हो रहे हैं जिस गति से करने का आश्वासन दिया था?”
वह इधर उधर देखने लगा. उसके चहरे पर तनाव था. एक क्षण के मौन के बाद बोला, “मैं अपनी बात क्यों करूँ. तुम देख नहीं रहे हो इतने सारे लेखक, बुद्धिजीवी, कलाकार, वैज्ञानिक कितने क्षुब्ध हैं?
“क्या तुम मानते हो कि लम्बे अरसे से इन सभी को यह सिखाया जाता रहा है कि हर चीज़ की राजनीति होती है. हर चीअ के पीछे राजनीति होती है, राजनीति से बचने वालों की भी अपनी राजनीति होती है परन्तु वह इतनी गर्हित होती है कि वे उसका नाम तक नही ले सकते, इसलिए राजनीतिकरण का विरोध करते हैं, इसलिए सभी को अपना काम छोड़कर राजनीति करनी चाहिए. पार्टीजन होना चाहिए. प्रतिबद्ध होना चाहिए. और ये सभी अपने विषय के अधिकारी कम और राजनितिक दलों के बँधुआ अधिक रहे हैं.”
वह चुप रहा.
मैंने अपनी बात जारी रखी, “कुछ दिन पहले उन सभी राजनीतिक दलों ने एक साथ मिलकर जिस को पराजित करने की कोशिश की उनका सफाया होगया. कारण तुम्हे तलाशना है पर उनके नेता चीख कर कोसते हैं, अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए कोसते हैं, पर उनकी आवाज़ कहीं पहुंचती ही नही. उनसे लगे बंधे बुद्धिजीवी भी उनके पिस जाने के दिन से ही बौखलाए हुए अट पट बकते और एक दूसरे को दाद देते रहे हैं. इसका कोई असर ही नही होता था फिर एक को सूझा क्यों न इनाम पर खेल कर दिखा दे और उसने एक गलत आरोप लगाकर वह इनाम लौटा दिया जो उसने खासा जतन कर के जुटाया था.”
“तुम इतनी दुर्भाग्यपूर्ण घटना को ग़लत आरोप कह रहे हो?”
“करुणा उपजाने की कला ब्लैकमेल करने वाले ही जानते है. प्रसंग जितना ही दारुण होगा, भावुकता जगाने में उतना ही प्रभावकारी होगा.”
वह भड़क उठा. “तुम इसे ब्लैकमेल कह रहे हो? ये इतने सारे लोग ब्लैकमेलर हैं?”
“ब्लैकमेलर नही रुग्ण. भ्रष्टाचार के सहभागी.”
“बताओगे इसमें भ्रष्टाचार कहाँ है?”
“देखो चाणक्य ने कर के मामले में भ्रष्टाचार के चालीस तरीके गिनाये हैं. उनमे से एक है
पूर्वसिद्धम् पश्चादवतारितम् , इसका भावानुवाद हुआ ‘पहले की घटना को बाद में दिखाना. प्रसंग दाभोलकर.
दूसरा है, अल्प सिद्धम बहुकृतम्, “अर्थात तिल का ताड बना देना. प्रसंग वाल्मीकीय रामायण पर आधारित लेखमाला का विरोध.
तीसरा बहुसिद्धम् अल्पक्रितम् ताड़ का तिल बना देना. अर्थात सीता की रसोई में रामलला के प्रवेश कराने के लिए ताला खोलने से लेकर, अकाली दल को रस्ते से हटाने के लिए भिंडरवाले के उदय और संतीकरण, तलवार लिए संसद में प्रवेश,, उग्रवाद के सुनियोजित विस्तार, हिन्दुओं के निर्मम संहार, कश्मीरी हिन्दुओं के निर्वासन,, हरमिंदर साहिब में रक्तपात, १९८४ के नरसंहार, हिन्दू वोट बैंक के लिए मेरठ मलियाना, कासिमपुरा, से लेकर भागलपुर, रांची तक पूर्वनियोजित और सरकारी पहल से रक्तपात, भोपाल गैस के अपराधियों की सुरक्षा और उसपर नीरो को मात देनेवाला बाँसुरीवदन. तब इस पर चुप इसलिए नही न थे की तब सोये हुए थे, इसलिए जब जागो तभी सवेरा, सोए लोग बांसुरी नहीं बजाते. बाँसुरी इस लिए बजा रहे थे कि किसी का ध्यान इन अपराधों की और न जाय. वे खिदमतगार अपराधियों की कोटि में थे. अब मर्मान्तक चीत्कार इसलिए कि उनकी अधोगति के साथ इनके सुनहले दिन चले गए. कहते हैं, ‘अपने अच्छे दिनों की जगह हमें बुरे दिन ही लौटा दो क्योंकि वे देश के लिए बुरे दिन रहे हों हमारी तो चांदी थी.’.
चौथा ‘अन्यत सिद्धम अन्यत कृतं, अर्थात इधर का उधर दिखा देना, एक अपराध हुआ कांग्रेस के काल में, दूसरा घटा कांग्रेस के राज में, समाजवादी दल के राज में, उनका कूड़ा भी टीमहारे सर छींटे आ रहे हैं दिल्ली पर. दिल्ली पर भी नही प्रधान मंत्री पर. उस बेचारे के पास इतनी समझ नही कि वह आपकी मनोकामना पूरी करते हुए उन राज्यों में इमरजेंसी लगा दे. आप सोचते है तो यही सुझा देते कि जिन राज्यों में ऐसा हो रहा है उनको बर्खास्त करो हम तुम्हारे साथ है.
“तुमने उस पैटर्न पर गौर किया जिस पर यह बीमारी फ़ैल रही है?”
“तुम इसे बीमारी कहते हो? प्रतिरोध को बीमारी मानते हो?
“प्रतिरोध होता तो उसमे आतुरता नही होती, न इस तरह धीरे धीरे फैलता. यह बौद्धिक स्वाइन फ्लू है. इससे बचो. परहेज़ करो तो बच गए नही तो गए.”
वह चुप रहा पर संतुष्ट नही दीख रहा था.
खिन्नता में चुप मैं भी था. फिर दुखी स्वर में कहा, “बौद्धिकों का चिंतक से गुर्राने वाले गिरोह में बदलते जाना कितना दुर्भायपूर्ण है. तुम चुप रह कर भी सुरक्षित नहीं हो. लेखकों का, अध्यापकों का, कलाकारों का सम्मान समाज में पहले ही घट चुका है. विश्वास भी घाट रहा है. मैं भी हूँ तो एक लेखक ही. यदि समाज का विश्वास घटेगा तो मैं बचा रहूँगा क्या. किसी देश या समाज के एक या कुछ लोगों के आचरण से देखने वालों पर जो प्रभाव पड़ता है उससे दूसरे भी बच तो नहीं पाते. ये स्थितियों का विश्लेषण करते, जो ही एक बौद्धिक का काम है तो समझ बढ़ती. ये तो सिर्फ गुर्रा रहे हैं.”
तो तुम चाहते हो जो हो रहा है होने दें. चुप बैठ जाएँ.
“नही मैं कहता हूँ अन्याय और झूठ के खिलाफ लड़ो. पर अपने हथियार से. विश्लेषण से. विश्लेषण का मतलब तो जानते हो न. चीर फाड़. चीज़ों को सही सन्दर्भ, सही अनुपात, कार्य, कारण और परिणाम को दिखाते हुए रखना. बौद्धिक का मोर्चा यही है. यदि वह इसे भूल कर घालमेल करने लगे तो वह स्वयं अत्याचारियों में शामिल हो जाएगा.”
“यदि दूसरे ऐसा नहीं कर रहे हैं तो तुम क्यों नहीं करते.”
“वही तो कर रहा हूँ.”

Post – 2015-10-29

रितु आए फल होय

“आजकल तुम कम्युनिस्ट पार्टी के पीछे हाथ धोकर पड़े हो. सांडों के बारे में सुना था वे लाल कपड़ा देखकर भड़कते हैं, पर तुम तो लाल सलाम सुन कर भी भड़क जाते हो.
“मैं भडकता नही, अपनी व्यथा उजागर करता हू.”
“बात वही हुई. अपने पर काबू नही रख पाते. मेरी सलाह मानोगे?
मैं कुछ बोले बिना ही उसकी और देखने लगा.
“मेरे साथ शाहदरा तक चलोगे?”
“तुम्हारे साथ तो नरक में भी जाने को तैयार हूँ, कब चलना है.”
“जब भी तुम्हे फुर्सत हो. वहाँ मेरे एक अच्छे दोस्त रहते हैं. वह तुम्हारी मदद कर सकते हैं?”
“मुझे किसकी मदद की ज़रूरत? मैं अकेला ही एक अक्षौहिणी के लिए काफी हूँ.”
“तुम नही समझोगे. मानोगे भी नहीं. अकेले तो पड़ ही जाते हैं ऐसे में लोग. हालत थोड़ी और बिगड़ती है तो जिस तिस पर पत्थर भी मारने लगते हैं.”
अब मैं समझा, “तो तुम कल का बदला ले रहे थे? थोड़ी गलती मुझसे हुई भी थी. मुझे सही विशेषण का प्रयोग नही करना चाहिए था. सही नाम ले भी नही सकता था. लेकिन देखो तो भेड़ें भी गडरिये के मोड़ने पर मुड़ने में कुछ समय लेती हैं. पर तुम्हारी पार्टी में तो एक बोल पर ही सब के सब मुड़ जाते हैं. भेड़ों का झुण्ड कहता तो तुम और आहत हुए होते और पागलखाने की जगह कत्लगाह में खींच ले जाते. है न?
” मानता हूं कुछ कमियां होती हैं कम्यनिस्ट पार्टियों में भी, मगर कमियां ही देखोगे या अच्छाइयों पर भी ध्यान दोगे?”
“अच्छाई तो हो ही नहीं सकती. लेढ़ा. जानते हो इसका मतलब. नहीं जानते हो. कटहल के फल का जो बतिया होता है वह टूट कर गिर जाता है उसे लेढ़ा कहते हैं. उसी तरह जैसे आम की अमौरी टूट कर गिर जाती है…
उसने टोका, “हमारे यहाँ उसे अमिया कहते हैं.”
“अमिया को हमारे यहां टिकोरा कहते है. उसका तो फिर भी कुछ उपयोग है, मैं उस अवस्था से पहले की बात कर रहा हूँ, अमौरी की. मैंने आज तक न तो किसी को इनमे कोई गुण तलाशते देखा न इनका उपयोग करते देखा. जानवर भी इन्हे सूंघ कर छोड देते है. वैसा ही है तुम्हारा यह कम्युनिस्ट आंदोलन. इसमें न तो कोई अच्छाई पैदा हो सकती थी, न ही पैदा हो सकती है. सड़ने से थोड़ी बदबू भले फैल जाय और उसे खुशबू का जनवादीकरण कह कर भले अच्छे अच्छों को लम्बे समय तक भरमा लिया जाय. पर हुई तो वह भी बर्वादी ही. असमय भ्रूणपात से किस बात की उम्मीद करते हो. यह एक दुर्घटना है. दुर्भाग्यपूर्ण है. इसने असंख्य अनमोल रत्नों को भ्रमित कर दिया पर जो कुछ हुआ वह या तो विनाशकारी रहा या व्यवधानकारी. कल्याणकारी तो कुछ दीखता ही नहीं.”
वह चुप सुनता रहा.
“देखो. तुम लोगों ने बिदेसी पढ़ाई कुछ ज़्यादा की है जो हमारे खास काम की नही है. देसी ज्ञान भी बटोरा होता तो उस इबारत पर भी ध्यान गया होता जो अनपढ़ों की भी ज़बान पर रहता है.
“धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय. माली सींचे सौ घड़ा रितु आए फल होय.”
तुम जनबल से, पूरी ताक़त झोंक कर जो चाहते हो कर जाने का सपना देखते हो. भविष्य को भुजबल से खींच कर आगे लाना चाहते हो. इतने सारे लोग सक्रिय होंगे तो कुछ न कुछ तो होगा ही पर वह इच्छित फल देगा यह सम्भव ही नही. जब बहुत अधिक ऊर्जा का उन्मोचन होगा, इतनी कि जिसको नियंत्रित करने का तंत्र हमारे हाथ में न हो, तो वह अनिवार्यतः विनाशकारी होगा, चाहे वह उन्मोचन प्राकृतिक हो या मानवकृत. वह भूचाल हो, महा प्लावन हो, सुनामी हो, अंधड़ हो, एटम बम हो या पलीता. उससे होगा उत्पात या उपद्रव ही.”
“कहते जाओ. रुक क्यों गए? मैं सुन रहा हूँ.” उसने अनुत्तप्त स्वर में कहा.
“रुक गया इन शब्दों के मूल आशय पर ध्यान चला गया था इसलिए. उत्पात, छलांग लगा कर ऊपर आ जाना. उपद्रव फूटकर ऊपर उछल जाना. तो मैं सोचने लगा जिसे क्रांति कहा जाता रहा है वह है तो उत्पात या उपद्रव ही. तुम्हारा क्या ख़याल है?”
मैंने प्रश्न तो किया था पर उत्तर पाने के लिए नही, उसकीं खीझ का मज़ा लेने के लिए, इसलिए बिना रुके आगे बढ़ गया, “और देखो, अनियंत्रित भावावेश का भी उन्मोचन होता है तो उससे भी उपद्रव ही होता है भले उसे मानववादी तेवर अपना कर उचित ठहराने का नाटक किया जय. खैर, तुम खुद देखो, हड़ताल, प्रदर्शन गांधी ने भी किये थे परन्तु उसमे उतना ही धैर्य और अनुशाशन भी था. गांधी की हड़ताल को तुमने कहाँ पहुँचा दिया. पहली बार कलकत्ते में इस हड़ताल का रूप देखा तो मेरे होश उड़ गए. लोग उन्हीं बसों को आग लगा रहे हैं जिनमें उन्हें चलना है. उन्ही ट्रामों के शीसे तोड़ रहे हैं जिनसे उन्हें चलना है. जाड़े के दिन थे और कलकत्ते में भी जाड़ा तो पड़ता ही है. बिलवा मंगल की कहानी याद आई जो उसी डाल को काट रहा था जिस पर वह बैठा था. तुमलोगों को वह कहानी याद नही आती होगी, इसलिए तुम बिल्वमंगल ही बने रहे, कालिदास बन ही नही सके. कितने कल कारखाने नष्ट किये, कितनों को बेकार किया, कभी हिसाब लगाया? भारत को अपनी ज़रूरत के सामान खुद बनाने लायक नही रखा, बाजार उपनिवेशवादियों ने अपने लिए बनाया था. तुमने बाजार से आगे बढ़ने ही नही दिया. घड़ी से लेकर कर टक्सी-तमंचा तक बाहर से आरहा है. आयात हो रहा है. हमारे पैसे से दूसरों का घर भर रहा है, दूसरों को रोज़गार मिल रहा है और तुम मर्दुमशुमारी करते हो इतने किसानों ने आत्महत्या कर ली. यह तुम्हारी समझ की दें है. अंग्रेज़ी राज में भी नहीं सूना था किसानों को आत्महया करते. तुम्हारे बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहेहोंगे पर जहां हमारे बच्च जाते हैं वहां पढ़ाई नहीं होती. तुमने उन्हें यूनियनबाज़ी सीखा दी….” मैं सचमुच उत्तेजित हो रहा था. अपने को नियंत्रित करने के लिए चुप हो गया.
कुछ संभला तो स्वर को धीमा करते हुए कहा, “अंग्रेज़ों ने हमारे उद्योग धंधों को नष्ट करके इसे बाजार बनाया था. तुमने अपनी सनक में उद्योग धंधों को नष्ट करके उससे भी बदतर बाजार बना दिया. हमारी गुलामी आर्थिक थी – ‘पर धन बिदेस चलि जात यहै अति ख्वारी.’ तुम्हारी कृपा से आर्थिक गुलामी बढ़ी है. पहले गरीबी थी पर क़र्ज़ का बोझ नही था. अब क़र्ज़ का बोझ भी है और जानते हो मॉनेटरी फण्ड का जो पैसा क़र्ज़ के रूप मंस लिया जाता है वह उन देशों का है जिनका पूंजीवादी विकास हुआ. तुम हम जिन उपकरणों और सुविधाओं का भोग कर रहे हैं वह उनके यहाँ से आयात हो रहा है.”
बहुत देर बाद उसने ज़बान खोली, “यह बताओ, हिस्ट्री-विस्ट्री पर काम करते हो यह तो सुना था, लेकिन तुम अर्थशास्त्री कब से हो गये.
हिस्ट्री विस्ट्री पर काम नही करता रहा हूँ इतिहास पर काम करता हूँ जिसे तुम तब तक नही पढ़ पाते जब तक वह हिस्ट्री न बने, अंग्रेज़ी में न आजाय. इसलिए तुमने पढ़ा नही है, सुना है. पूरा सुना भी नहीं होगा नहीं तो कथाएं और अंतर्कथाएँ सुननी पडती. रही अर्थशास्त्री बनाने की बात तो यह जानने के लिए अर्थशास्त्री होने की ज़रूरत नही पडती कि लाखों किसानों ने आत्महत्या की और तुम्हारे पास उसकी कोई समझ थी न सही व्याख्या. तुम्हारी कृपा से हमने ज्ञान का भी ऐसा सत्यानाश किया है कि अब कोई विदेशी इस पर शोध करेगा तो हमें पता चलेगा किसान आत्महत्या करने के शौकीन कैसे हो गए. तुम्हारे अध्यापक तो अपने विषय को छोड़कर राजनीति करते रहे.
तुम्हारी पार्टियों को जहां भी मौक़ा मिला है यही किया है.
“एक बात और सुन लो. जानता हूँ सुन कर भी मानोगे नही. अभी कुछ दिन पहले एक दुधमुंहे मित्र ने पूछ दिया ‘इतनी बड़ी-बड़ी बातें करते हो, तुम्हारे साथ कितने लोग हैं. हैसियत क्या है तुम्हारी?’ तो लगा बात तो ठीक ही है. किसी बात के प्रभावशाली होने के लिए वक्ता का प्रभावशाली होना एक ज़रूरी शर्त तो है ही, इसलिए उसके माध्यम से इसे कहना चाहूँगा जिसे तुमने तो ज़रूर पढ़ा होगा. पढ़ा होगा पर समझा नही होगा.”
वह हंसने लगा.
“तुम लोग पढ़ते इतना अधिक हो कि समझने की फुर्सत ही नही होती यह सोच कर तो कहा ही, इसलिए भी कहा कि इससे न रूसियों ने सबक सीखा न तुमने. जिसकी बात कर रहा हूँ उसका नाम है टॉलस्टॉय.
युद्ध और शांति पढ़ा है न. पढ़ा है तो उसके अंतिम पन्नों में, वह उपन्यास का हिस्सा भी नही है. उसका उत्तरकाण्ड है. एपिलोग. टॉलस्टॉय का वह दार्शनिक विवेचन याद करो जिसमें वह नैपोलियन को महाकाल के हाथ का एक क्षुद्र खिलौना सिद्ध करते है.
मैंने कहा पास ही तो चलना है . चलो दिखाता हूं. मैंने ‘वॉर एंड पीस’ का एपिलोग उसके सामने रख दिया और उसमें से एक ख़ास पन्ने के कुछ वाक्यों को जिन्हे अंडरलाइन कर रखा था ध्यान से देखने को कहा और पूछा क्या तुम्हे पता था की लेनिन टॉलस्टॉय की कृतियों से क्यों डरते थे. कई लोग कई कारण गिनाएंगे, पर मुझे लगता है युद्ध और शांति के उत्तरकाण्ड के कारण.” एक वाक्य अंग्रेज़ी तर्जुमे में इस तरह है:
Power is the collective will of the masses, vested by expressed or tacit consent in their chosen leader.
और मैं कहना चाहूँगा कि तानाशाह सबसे कमज़ोर और डरा हुआ प्राणी होता है. उसे अपने अंगरक्षकों तक से डर लगता है, आईने से भी डर लगता है.
और दूसरा वाक्य:
Through his reason man observes himself, but only through consciousness does he know himself.
“आत्मनिरीक्षण करो. अपने को जानो. अपनी पार्टी को भी. अभी तो तुम्हे यह भी पता नहीं कि तुम खड़े कहाँ हो.. चाय चलेगी.”

Post – 2015-10-28

तरस खाते हुए

“तुमने मुझे कल बहुत विचलित कर दिया.” यह कहते हुए भी वह परेशान लग रहा था.
“मैं जानता हूँ. जो कुछ मैंने कहा उसे सोचते हुए मैं भी परेशान हो जाता हूँ. परन्तु आत्मनिरीक्षण तो करना ही होगा.”
“”आत्म आत्मनिरीक्षण या आत्मालोचन ?”
“नही, आत्मालोचन नहीं, वह अपमानजनक काम है. इसका कायानुवाद है, ‘कमीने अपने दिमाग से काम लेता है? सबके सामने कान पकड़ और कबूल कर कि तुझसे गलती हुई है.’ पार्टी का आकर्षण इसके घोषित लक्ष्यों के कारण इतना प्रबल था कि लोग सोचते चलो बाहर निकाले जाने से अच्छा है कान पकड़ लो.
“कान अपना है, पकड़ेंगे भी तो उमेठ कर तो नही. जिसका शब्दानुवाद होगा, ‘थोड़ी गलती हुई लगती है.’
‘थोड़ी! फिर और गहराई से आत्मालोचन करो’, जिसका कायानुवाद करें तो होगा, ‘कान भी पकड़ा तो इतने धीरे से. अब सिर्फ कान पकड़ने से काम नहीं चलेगा. अब कान पकड़ कर नाक भी रगड़नी पड़ेगी.’
समग्र मानवता को मानवीय गरिमा प्रदान करने के सत्कार्य में सहयोगी बने रहने के लिए स्वाभिमानी और ज्ञानी सदस्यों को भी यह शर्त स्वीकार्य हो जाती थी. जॉर्ज लुकाच जैसे व्यक्ति, राहुल सांकृत्यायन जैसे व्यक्ति, रणदिवे जैसे व्यक्ति, पूरन चन्द्र जोशी जैसे व्यक्ति. मैं सबको तो जानता भी नही. पी.सी. जोशी की तो जान बची पर सम्मान नही. सुना उन्हें मछुआ बाजार के पेशे से एक कुजड़ा कामरेड को सौंप दिया गया था जो उन्हें गालियां देकर जनभाषा सिखाया करता था. ये वही जोशी है जिनके चुम्बकीय आकर्षण से कवियों, कलाकारों, नाटककारों और फिल्मी हस्तियों का इप्टा से जुड़ाव हुआ था जिसके गुन गाते हुए अनेक कलाप्रेमी छोह में आत्म मुग्ध हो जाते हैं. कला और साहित्य के लिए पार्टी में कितनी इज़्ज़त थी इसका एक पैमाना यह तो हो ही सकता है.”
“तुम पार्टी से कब जुड़े थे?”
“पार्टी से कभी जुड़ा भी नहीं न कभी जुड़ने की इच्छा हुई. डर लगता था.”
“डर किस बात का?”
“भेजा निकाल लिये जाने का.”
“कभी तो तुक की बात तो किया करो.”
“तुमने दंड स्वरूप हाथ काटने, आँख निकालने, ज़बान काटने के वहशी तरीकों की बात तो सुनी होगी परन्तु सम्मान स्वरूप भेजा निकाल लिये जाने और उसकी जगह ठीक उसी आकार का प्रतिनादी यन्त्र फिट किए जाने के बारे में शायद ही सुना हो. यह इतने कुशल तरीके से किया जाता है कि आदमी को पता ही नहीं चलता. तुम्हे भी पता नहीं चला होगा. लेकिन र्काड होल्डर बनाने के साथ ही यह क्रिया संपन्न कर दी जाती है। सुनने में तुम्हे विचित्र लगेगा, विश्वास भी न होगा, लेकिन जब मैने इसका नमूना देखा तो सन्न रह गया.”
वह खीझभरी मुस्कराहट बिखेरता रहा.
“इसका पहली बार दर्शन स्टालिन के मरने और ख्रुश्चेव के सत्ता संभालने के साथ हुआ था. अभी कल तक स्टालिन मानव देवता की तरह पूजा जाता था, उसका एक एक शब्द अकाट्य प्रमाण, कहीं कोई मतभेद नही और एक दिन में ही वह पूरी तरह खारिज. मैं कम्युनिस्ट नहीं था पर दोस्त तो वे ही थे. इतने सारे समझदार, सुपठित, वाक्कुशल लोग एक झटके में एक सिरे से दूसरे सिरे तक बदल गए और उतने ही कौशल से अपने तर्क गढ़ने लगे जिससे कल तक स्टालिन के विचारों को लेकर गढ़ लेते थे. दूसरा मौक़ा आपात काल के समय कामरेड डांगे के हटते और राजेश्वर राव के सत्ता संभालने के साथ देखा. मैं दहशत में मगर कामरेड लोग कल तक जितने वाचाल थे उतने ही वाचाल आज भी लेकिन पलटी मार कर. समझ में नहीं आता था, माज़रा क्या है फिर यह अदृश्य शल्य चिकित्सा की बात सूझी. पार्टी से सहमता तो पहले से था. इसके बाद डर लगाने लगा. और जानते हो लोग किस बात से डर कर आत्मालोचन के लिए तैयार हो जाते हैं?”
“जब इतना बता दिया तो वह भी बता दो.”
“लोग सोचते हैं यदि लाइन से तनिक भी इधर उधर हुए तो कहा जाएगा, कार्ड वापस करो और अपना भेजा ले जाओ.’ लोग जानते हैं अब इतने अरसे तक फ्रीज़ रहने के बाद वह किसी काम का रह नहीं गया होगा, इसलिए प्रतिनादी यन्त्र से सोचने का भरम पैदा करते और बोलने का काम लेते हैं. इसीलिए कहता हूँ एक मार्क्सवादी के लिए आत्मनिरीक्षण ही पर्याप्त है. आत्मालोचन की नौबत नहीं आनी चाहिए.”
तुम्हारे मन में कम्युनिस्टों के प्रति इतनी घृणा है, यह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था.
“घृणा उनका औज़ार है जिनके पास जवाब नहीं होता. जो सोचते है वे घृणा नही करते. वे पता लगाते हैं कि ऐसा क्यों हुआ, मैं कम्युनिस्टों से घृणा नहीं कर सकता. कम्युनिस्ट पार्टी के मानव गरिमा और समानता के सम्मोहक नारे से आकर्षित होकर इतनी महान, निष्काम, विभूतियाँ इससे जुड़ती रही हैं कि उनके त्याग को देखते उनके चरण चूमने का मन हो और उनकी व्यर्थता की कल्पना करके उनसे बच कर रहने का संकल्प पैदा हो. मैं तो प्रेरणा के लिए भी उधर ही देखता रहा हूँ और विडम्बना के लिए भी उधर ही देखता हूँ.
“तुम्हारे मन में कम्युनिस्ट पार्टी से एलर्जी कब पैदा हुई, यह बताओगे.”
“कम्युनिस्ट पार्टी से नही, हिंसा से एलर्जी है मुझे. शैशव से ही हिंसा, उत्पीड़न और त्रास झेलता रहा. अपमान इतना झेलना पड़ा कि अपमानित होने का डर भी समाप्त हो गया. उस पीड़ा ने ही मुझे दृष्टि दी और उसी ने मुझे तपाया. उसी ने मुझे दूसरों से अलग बनाया क्योंकि एक ही कारण होने पर भी पीड़ा का रूप एक जैसा नही होता. उसी ने मुझमे वह जिज्ञासा पैदा की, कि ऐसा क्यों होरहा है. मेरी चूक क्या है. मैं अकेले कोने में छिप कर घंटों रोता रहता था कि कोई मुझे रोता देख कर मुझ पर तरस न खा बैठे. दूसरा कोई पूछता तुम्हारी मैभा तुम से कैसा व्यवहार करती है तो उसकी तारीफ़ इस तरह करता कि जानने वाले उपमा देते मैभा हो तो ऎसी. मैं दुःख सह सकता हूँ दैन्य नही. स्वाभिमान इतना और अपमान का भय नहीं. अपमान करने वालों को भी क्षमा कर देता हूँ, बदले में अपमानित करने का विचार तक नही आता.”
मेरी कहानी सुनते हुए वह भी भावुक हो गया था फिर भी उसने याद दिलाया, “मैं पार्टी के बारे में जानना चाहता था.”
“मैं हिंसा को अन्याय का प्रमाण मानता हूँ. मैं किसी भी बहाने की जाने वाली हिंसा को त्याज्य मानता हूँ. हिंसा करने वालों को भी. पर घृणा उनसे भी नही करता.”
“हिंसा को रोकने के लिए हिंसा को सही नही मानते.”
हिंसा से हिंसा को रोका नहीं जा सकता. उसका विस्तार किया जा सकता है. हिंसा के प्रति वितृष्णा को कम किया जा सकता है. हिंसा की आदत डाली जा सकती है. और वही किया गया है.
“तुम कहते हो हिंसा को सहन करते हुए अपने को अपमानित किया जाना चाहिए.”
“मैं जो कहा रहा हूँ उसे समझने की योग्यता का तुममे अभाव है क्योंकि तुम स्वयं हिंसा की आदत डाल चुके हो. मैं पहले कह चुलका हूँ की हथियार से अधिक ताक़तवर है विचार. विचार की पुरानी सीमाओं को संचार की उन्नत प्रणाली ने तोड़ दिया हैं. आज के युग में भी विचार की शक्ति का उपयोग न किया जाय, विचार को नष्ट करके अन्याय को जारी रखने वालों के हाथ संचार और सूचना के साधनों को छोड़ दिया जाय तो इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण क्या होगा.”
“तुम यह नहीं मानोगे कि हथियार के बल पर ही अपने ही देश के सत्तर प्रतिशत लोगों को दबा कर, यहां तक कि अस्पृश्य बनाकर रखा गया.”
“हथियार के बल पर नही, उसके लिए एक विचारतंत्र विकसित किया गया, उसका एक प्रसारतंत्र विकसित किया गया. उस विचारतंत्र और प्रचारतंत्र को नियंत्रित करने वालों ने लोगों को अपने पाँवों पर नाक रगड़ने के लिए बाध्य ही नही कर दिया उस पर गर्व करना तक सिखा दिया. उनको भी जिनके हाथ में हथियार था. उसके पास छड़ी तक न थी. पर वाचाल और उद्दंड मूर्खो की संगठित सेनाओं का नाम है कम्यूनिस्ट पार्टियां. उनको समझाने की योग्यता तो मुझमें भी नहीं है. वे बोलते भी हैं तो हल्ला बोलते है. बोलना तक नहीं आता.”
अब आगे वह न कुछ सुन सकता था, न मैं कहने की स्थिति में था. दोनों साथ उठा खड़े हुए.

Post – 2015-10-27

Dynamics of history
“तुम क्या सचमुच मानते हो कि पूँजीवाद के बाद साम्यवाद का दौर आएगा?”
“आना तो चाहिए.”
“यह चाहिए कहाँ से घुस आया. कल तो तुम बहुत आश्वस्त लग रहे थे.”
“बात यह है की पूंजीवाद के उठान के बीच ही साम्यवाद के प्रयोग ने वह विकृति पैदा पर दी जो कच्चे फोड़े को चीरा देने से पैदा होती है. इसने विषाक्तता को बढ़ा दिया. हमारे प्रतिरोध-तंत्र को उन विषाणुओं से लड़ने का अवसर देना चाहिए था. इस बीच भी अदृश्य खून-खराबा होता. असंख्य श्वेत कोशिकाएं शहीद होतीं. उनकी बलि मवाद बन कर फोड़े को विस्फोटक बना देती उन्हें युद्धभूमि से बाहर निकाल लेते. नए योद्धाओं को मोर्चा संभालने को खुला मैदान मिल जाता तो हमें कुछ खास करना ही नहीं पड़ता. विजय हासिल हो जाती. सूखते समय थोड़ा मरहम ही काफी होता. असमय हस्तक्षेप अतिरिक्त आयास की मांग करता है और यही इस बात की पूर्वसूचना भी है कि परिणाम भी सुखद न होंगे.
“तुम अगर सोशियोलॉजी को पैथोलॉजी में घोल कर समझाना चाहोगे तो मैं तो समझने से रहा,”
“देखो, उपमाएँ और दृष्टान्त विचार को मूर्त कर देते हैं; ये वास्तविकता को समझने में मदद तो करते है परन्तु वास्तविकता के स्थानापन्न नही होते हैं. वे वास्तविकता के किसी एक लक्षण या पक्ष पर प्रकाश डालते हैं, उनका भी स्थान नहीं ले सकते. विचार और विचार-प्रक्रिया में इतने वक्र हैं कि किसी एक से छूटे तो किसी और में बंध गए. यदि तुम पूँजीवाद को व्याधि मानते हो तो इसके चरित्र को समझ नहीं पाओगे.”
“खुद उलटी बातें करते हो और पकड़ में आने पर पैंतरा बदलने लगते हो. पूंजीवाद व्याधि नही है तो क्या है? सारे समाज की दौलत चन्द लुटेरों के हाथ में सिमट आना, क्या तुम इसे समाज के हित में मानते हो?”
“देखो मैं खुद उलझन में हूँ. समझ में नही आ रहा की अपनी बात कैसे रखूँ. मैं पहले उस तथ्य को रखूँ जिस पर कोई मतभेद नहीं. अर्थात पूंजीवाद सामंती व्यवस्था का अगला चरण है और इसलिए एक प्रगतिशील चरण है.”
“ठीक है.”
“अगर प्रगतिशील चरण है तो उतनी प्रगति तो हो लेने दो जितनी उसके बूते की है. उससे पहले ही उसपर हमला करोगे तो उस प्रगति में भी बाधा डालोगे. तुम्हारी अधिकतम शक्ति बाधा पहुँचाने पर व्यय होगी। एक ही छलांग में दो छलांगों की दूरी पार करना चाहोगे तो या तो अपनी टाँग तोड़ लोगे या मुँह के बल गिरोगे। सही चरण पर उसी ऊर्जा को लगाने पर जो कुछ तुम्हें हासिल हो सकता था उससे बहुत कम हासिल होगा और जिस रूप में हासिल होगा वह अकालकावलित हो जाएगा।
“एक बात और, यदि तुम मानते हो पूँजीवाद की प्रगतिशील भूमिका है और उसमे तुम व्यवधान डालते हो तो तुम प्रगतिवादी हुए या प्रतिक्रियावादी?
“यदि तुम मानते हो कि उसका चरण है तो उसे चलने देते. तुम्हारे पास तो न चरण थे न यह तुम्हारा चरण था.”
“इतना बड़ा काडर है हमारा, इतने सारे साहित्यकार पत्रकार और फिर भी कहते हो हमारे पास चरण नहीं.”
“चरण तब होते जब जनमानस में तुम्हारी पैठ होती. तुम्हारी पूरी पैठ तो उन मज़दूरों तक में नहीं हो पाई. तुम्हारा चरण तब होता जब तुम्हारे भीतर सर्जनात्मकता होती. तुमने केवल विघटनकारी की भूमिका निभाई है.”
“तुम लोगों से तुम्हारा मतलब किससे है? मार्क्सिस्टों से?”
“नहीं, कम्युनिस्टों से. मार्क्सिस्ट तो जैसा कहा अकेला मैं हूँ. तुम तो दूसरे की बारात में अपना दूल्हा लेकर पहुँच गए थे कि दुल्हन हमें चाहिए. तुम लोगों में तो वक़्त की नाज़ुकी तक की पहचान नही. वक़्त की नाज़ुकी का मतलब इतिहासबोध, कालबोध. मतलब वह चीज़ जिसके कारण मार्क्सवाद में द्वंद्वात्मक के पहले ऐतिहासिक विशेषण लगा है. यार तुम लोग उतावली में अपना नाम तक भूल गए.”
“क्रांति ऐसे ही कर के दिखा दी.”
“क्रांति तुमने नही की थी, तुमने क्रांति पर डाका डाला था. धोखाधड़ी से हथिया लिया था इसे. रूसी क्रांति का इतिहास फिर से पढ़ो. एक बात सुन लो। कालबोध कम्युनिष्टों का बहुत गड़बड़ है। जिसे तुम फरवरी क्रान्ति कहते हो वह मार्च में हुई थी और जिसे अक्तूबर क्रान्ति कहते हो वह नवम्बर में। तुम लोग इतने पिछड़े दिमाग के हो कि उन्नीसवीं सदी में भी पुराने जूलियन कैलेंडर से कालगणना कर रहे थे फिर समय के साथ कैसे चल सकते हो।“
“देखो, यह पता तुम्हे भी है कि पूंजीवाद जितना विकराल रूप धारण करता जा रहा था, उसमे उसे तबाही का अधिक समय देना भी समझदारी नही थी.”
“विकराल रूप धारण करता जा रहा था, अर्थात उसमें बहुत ऊर्जा बची हुई थी.
“खैर मैं केवल यह कह रहा था कि यदि पूंजीवाद अपने प्रचंड रूप में आचुका था तो पूंजीवादी प्रतिस्पर्धा में एक दूसरे को लड़ कट कर कमज़ोर होने या मिटने देना चाहिए था.”
“इतिहास के घटित हो जाने के बाद एक बच्चा भी ज्ञानी बन कर बड़े बड़ों की गलतियां निकाल सकता है तुम तो फिर भी कुछ पढ़े लिखे हो. साम्यवाद की वापसी के नाम पर तुम उसे कोसने का बहाना तलाश कर रहे थे.”
“नहीं यह याद दिला रहा था कि तुम पर सत्ता का भूत सवार था और इसलिए जिसे सिद्धांत के रूप में जान रहे थे उसकी भी अनदेखी कर रहे थे.
तुम्हारा मतलब?
“मतलब यह है कि सैद्धांतिकी के रूप में तुम जानते और दूसरों को समझाते आ रहे थे की कोई सभ्यता अपनी तकनीकी पराकाष्ठा पर पहुँच कर ठहर जाती है. उसके बाद उसकी सर्जनात्मकता चुक जाती है और उसका पतन होने लगता है. यही वह समय है जिस पर कोई दूसरी सभ्यता उस पर हावी हो जाती है. तुम्हे देखना था कि पूँजीवाद अपनी तकनीकी दक्षता भी बढ़ाता जा रहा है और तकनीक में सुधर भी कर रहा है और उसमें इतनी सृजनात्मकता बची हुई है की प्रतिक्षण असंख्य नए अविष्कार हो रहे है. यह दुनिया को बहुत कुछ देने, बहुत कुछ हासिल करने और अकूत उचाइयां छूने की स्थिति में है इसलिएन इसके साथ छेड़छाड़ नही की जा सकती. की गई तो संकट में हम स्वयं पड़ जाएंगे. इसके बाद भी, इस सच्चाई को जानते हुए भी यह खतरनाक दखलंदाज़ी की गई जिसका परिणाम था …”
यार छोड़ो तुमने मेरा मूड खराब कर दिया. इस पर कल बात करेंगे.