Post – 2020-06-15

#शब्दवेध(64)

मनोजगत
मन (मत) – 1. जल (मीन – मत्स्य); 2. मन/मान/मत/मंत/वान/ वत/ वंत – युक्त (श्री) मान/मती/मंत, धनवान, भगवत/भगवंत। 3. चन्द्रना (मनो वै चन्द्रमा) चन्द्रमा मन से पैदा हुआ (चन्द्रमा मनसो जातः)। यही मन E. moon ( O.E. mona, G. mond, L. mensis),- a planet,(मस/ मनस) month (मास), lunar- (मास्य), nune- anything in the shape of half moon; lunacy – insanity (देखें, मन्मथ, मदन) ; lone, alone एकाकी, mon(o) एक- >monarch एकाधिकारी, Gr. monos- single; यूरोपीय प्रतिरूपों में मनस् या E, mind (L. mens) मस्तिष्क, mend, -ment, ment- (al/or), memo-, memory, menarche – the first menstruation, mend, menstruum, mention, को किसी एक संकुल से जिसमें द्रव, प्रकाश, ज्ञान, चिंतन. आशय, अल्पता, बहुलता, मध्यता (mean/ meaning, mean – low in rank of birth, mean – intermediate, main -L. magnus (?), maintain- to observe or practice ; to keep in existence or state को किसी एक सर्वसमावेशी सूत्र से जोड़ कर समझना संभव नहीं, क्योंकि वहाँ बिखराव है, इसलिए वहाँ हारिल की लकड़ी की तरह समान ध्वनि और अर्थ का आभास कराने वाले सजात (कॉग्नेट) शब्दों खोज की जाती रही और उसे ही व्युत्पत्ति बताया जाता रहा और आज भी बताया जाता है। यह काम भारत में हो सकता था जहाँ उल्टी थी, फिर भी यहाँ धातुओं की तलाश कर ली गई थी जो ध्वनि संकुल और अर्थ संकुल के नियम का अधिक सफलता से निर्वाह कर लेता था, जिससे नियम का भ्रम पैदा तो होता था पर उसी धातु से व्युत्पन्न विरोधी अरथों के सामने चें बोल देता था। गल/ ग्ल – पानी >ग्लानि>फा. गिला, अं गल्प/ ग्लो/ ग्लॉस, की अकाट्य सजातता के बाद भी किसी धातु या मूल (स्टेम) के सहारे नहीं समझा जा सकता।

[आज दो घंटे लैपटॉप खराब रहा, किसी आग्रह पर एक लेख भी पूरा करना था। आज से हमें जल और मनोजगत पर विचार करना था। पोस्ट पूरी न हुई, ऊपर का अनुच्छेद केवल उपस्थिति दर्ज करने के लिए। ]

Post – 2020-06-14

#शब्दवेध(63)
लघुता से महिमा तक-2

क्षुद्र – क्षुद्रमिव स्रवेत्- उदकमिव स्रवेत। क्षुद्र का अर्थ ही जल है। जल के ऐसे कण हो सकते हैं जो सूक्ष्मतम हों, जैसे वाष्पकण, ओसकण। इनकी ध्वनि का अवश्य इस शब्द से कोई लेना-देना नहीं। क्षु चू, सू संकुल की ध्वनि है, जिसका अरथ जल है और द्र – तर, दर, त्र, द्र संकुल का जिनका अर्थ पानी होता है। यह यौगिक शब्द है। जैसे द्र से द्राक्षा का नामकरण हुआ उसी तरह क्षु से क्षुधा और छुहारा का। ऋग्वेद में -क्षुमतो राय ईशिषे; क्षुमन्तं वाजं स्वपत्यं रयिं दाः ; क्षुमन्तं चित्रं ग्राभं सं गृभाय; क्षुमन्तं वाजं शतिनं सहस्रिणं मक्षू गोमन्तमीमहे;

सूक्ष्म – सुक/ सुख(सुखना झील) – पानी, सूख – तृप्तिजन्य आनंद, (E. suck, succulent, succumb, succus – juice; success, succeed, such – like) शुक्र – जल (वीर्य, सार; एक चमकदार ग्रह, असाधारण ज्ञानी – शुक्राचार्य), >अ, शुक्र/शुक्रिया, शुक्रगुजार (अरबी रूपावली से अनमेल इसलिए बाहरी), शोक/ शोचिष (फा. सोज़, सूजन ) , शुचि – पवित्र (यत्ते शुक्रं तन्वो रोचते शुचि), प्रकाशित, सूचना, सूची (सूचक > विषय सूची), सूची – प्रखर, तेज (पैना/पैनी), छेदक, सिलाई का उपस्कर; सीव्यत्वपः सूच्याच्छिद्यमानया ) सूची> सूच्य >सूक्ष्म

विराट – ०वी -जल, वीति -अन्न, वीतिहोत्र – वर्षा के लिए किया जाने वाता यज्ञ (वीतिहोत्रं त्वा कवे द्युमन्तं समिधीमहि). E. weep, vapour, wend -to turn, to turn to the opposit; wel)l. वय – जल, अन्न (त्रिधातुशृङगो वृषभो वयोधाः ) वि- आकाश, शाखा, पक्षी, विराज – वि-राज< रज - पानी, प्रकाश, शुभ्रता (रजत/ रजक) > राज/राट/राड.

अधि/ अधिक – अत पर विचार करते समय हम देख चुके हैं कि अत/अद/अध/ अन्न संकुल में सभी का अर्थ जल है अध = अ-ध, यहाँ या ०वहाँ, अधि- 1. भीतर (अधि मातरि – मातृ जठरे); 2- अधिक (अधि पञ्च प्रधीँरिव); 3. पक्षपात (तेनादित्या अधि वोचता ); 4. 0- अधिदधे- धारयति, अधि – ऊपर (इन्द्र एणं प्रथमो अध्यतिष्ठत्)
अधिथा – धारयसि;

अलं – पर्याप्त, अर- जल, अर्य – पूज्य। अरंकृत – 1. तैयार , 2. मिश्रित. 3. सज्जित(अरं कृण्वन्तु वेदिं; दूतो अरंकृतः)। अरं/अलं – पर्याप्तं (सास्मा अरं प्रथमं स द्वितीयम्) ;

अल्प – अर्प – जल, अर्च/ अर्प – पानी. अर्पण/ अर्चन – पानी पिलाना, आव-भगत (उन्नो वीराँ अर्पय भेषजेभिः)र – संयोजय, जिस रेचन से अतिरेक और अतिरिक्त बना है उसी से रिक्त भी उसकी परिणति है। कुछ वैसा ही संबंध अर्पण और अल्प का दिखाई देता है।

भूरि – पू/फू/बू/भू – जल ; पू>पूरित/पूर्ण; फू> भो. फूर-सच,E. fulminate – to thunder, to flash, L. fulgere – to shine, full, fill बू >बुल्ला> हिं. बुलबुला, E. bull, bully, bullion (L. bullio, onis, a boiling), bulge, bulk, bulimia- morbid voracity,भू (भूरि त इन्द्र वीर्यं तव) ।

शब्द संकलन का काम संतोषजनक नहीं हो पाया। जो याद आए उन्हें रखा है, पर जितने शब्द और लें, सब की व्याख्या इसी से संभव है।

Post – 2020-06-13

#शब्दवेध(62)
लघुता से महिमा तक

क्या यह संभव है कि लघिमा से महिमा तक की समूची शब्दावली सीधे अथवा व्याज रूप में जल की ध्वनियों से निकली हो? यदि हमारी मान्यता, जिनकी अपनी ध्वनियाँ नहीं हैं उनको अपना अभिधान प्राकृतिक परिवेश से, उसकी सबसे कारक शक्ति वायु, हिम या जल से मिली है, भारोपीय के मामले में यह शक्ति जल था, एक अकाट्य नियम है नियम है, तो इसके अतिरिक्त कोई चारा भी नहीं है।

हम पहले लघु शब्द को ही लें। इसका पुराना रूप रघु था, क्योंकि ‘र’ को ‘ल” बोलने वाले मुख्यधारा में कुछ विलंब से सम्मिलित हुए उनका प्रभाव कुछ विलंब से बड़ा जिसके कारण ‘र’ ध्वनि का बहुत बड़े पैमाने पर ‘ल’ में परिवर्तन हुआ। इन्हीं में रघु शब्द भी था। रह का अर्थ जल है। रंहा- सुजला, रंहति – गतिशील, राह – मार्ग, रहजन – दस्यु, रोहित – लाल, रहर – अरहर, रघु – गतिशील, वेगवान (अच्छा गमेम रघवो न वाजम्; सं अर्वन्तो रघुद्रुवः), इसी की देन हैं। रहू* – मत्स्य, का नाम भी इसी पर आधारित है। इनमें से अनेक में – लंघन, लोहित, लघु, लहर- ल ने र की जगह ले ली।

महिमा – मघ/ मस/मह – जल है यह हम देख आए हैं। आखर के फेर से बने घम्/ घन्, सम, हम (जैसे फा. हमउम्र, हमराह आदि में) भी जलपरक हैं। घमंड करते हुए आप जानते ही न होंगे कि आपके पानी पानी होने की नौबत आ गई है। अभी तक मैं महाजन का अर्थ श्रेष्ठी/सेठ के तर्ज पर महिमासूचक मानता आया था, अब तो लगता है महाँ/महान भी जलवान>धनवान है और बनियों में जिन के लिए इसका प्रयोग होता है, वे आढ़ती, बैंकर या पैसे का लेन-देन करने वाले रहे हैं। बहु, विशाल और महिम्न के लिए इसका प्रयोग अर्थोत्कर्ष का परिणाम है।

अणु से मिलता -जुलता सबसे पुराना लिखित प्रयोग अण्वी के रूप में उँगलियों के लिए हुआ है – अण्वीभिस्तना पूतासः, ऋ. 1.3.4, (स्वयं अपनी उँगलियों से गारा हुआ) इसलिए लगता है कि यह अनु (किसी अंग के अनुलग्न के आशय में प्रयुक्त है। अनु को यदि हम अत/अद/अध/ अन/अन्न संकुल में रख कर समझें कि इसका अर्थ जल है तो किसी लंबी बहस की आवश्यकता न होगी, पर यदि अ+न+ऊ का यौगिक मानें जो सर्वथा तार्किक है तो एक लंबी परेड करनी होगी। संक्षेप में कहें तोा अ/आ का प्रयोग समावेश, निषेध और सीमा के लिए, न का सादृश्य, विरोध और निश्चयात्मकता के लिए हुआ है। नूनं का प्रयोग 1. सचमुच (नूनं दिवो दुहितरो विभातीः), 2. संप्रति (नूनं देवेभ्यो वि हि धाति रत्नम्); के आशय में हुआ है और नून जलवाची है यह हम पहले देख आए हैं। E. non no one से निकला है या नूनं का निषेधवाची है इस बहस से बचा जा सकता है पर नोर/ लोर – आँसू और अरबी नूर, नूरानी में जल का आशय तलाशा जा सकता है। अनु का प्रयोग – अनु – 1. पश्चात (अनु अविन्दत – उसके बाद प्राप्त किया); 2. यथा, (अनुकामं तर्पयेथा), 3. की तरह (अनु प्रत्नस्य ओकसः हुवे); 4. क्रमबद्ध – अनुष्ठा, 5. प्रति -अनुद्यून् , प्रतिदिन; 6.अनुसार -अनुपूर्व,/ अनुकूल – अनुवाति ; 7.अन या निषेध- अनुत्त – अप्रेरित; अनेद्यः – अनिन्द्यः, अनेहसः – अपापा, .8. परस्पर – अनुस्यूत, आदि अर्थों में हुआ है। अणु शब्द संभवतः कणाद से पहले सूक्ष्मतम के लिए प्रयोग में नहीं आता था। इसके नामकरण के पीछे अ और न दोनों की नकारात्मकता थी, या कण का न्यूनीकरण था, यह हम नहीं जानते।

रेणु – अणु से पहले सूक्षमतम के लिए कण (कं>कम/कन/कण – जल) का और रेणु का प्रयोग होता था जिसके सूक्ष्मतर रूपों – त्र्यसरेणु आदि की कल्पना की गई थी। रेणु सामान्य प्रकाश में दिखाई नहीं देता। किसी बंद अँधेरे कमरे में किसी पतली फाँक से आते सूर्य के प्रकाश में हवा में भारहीनता के कारण इन्हें नाचते देखा जा सकता सै पर त्र्यसरेणु इनमें दृश्यमान सबसे छोटे रेणु का तिहाई है और पुद्गल जो विद्यमान तो हैं पर किसी तरह दृश्य नहीं। ऐसे ही त्र्यसरेणुओं / पुद्गलों से जीवजगत और विश्व-ब्रह्मांड की रचना हुई है। रेणु का प्रयोग ऋग्वेद में निषेध (अरेणु – निष्कलंक के, कालिदास के अपांशुला के आशय में हुआ है, पर, रण, रण्ण, रण्य में जल का भाव स्पष्ट है। त्रस>त्र्यस- में तृ/तिर/ तृष के संकुल का अर्थ स्पष्ट है। पुद्गल के आदि पू, पुद (त. पुदिय) में जल से संबद्धता स्पष्ट है।
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* अब आप चाहें तो माछ/ मछली का अर्थ स्वयं कर सकते हैं पर यह न सोच लीजिएगा कि ये मत्स्य के अपभ्रंश हैं, मत्स्य स्वयं मच्छ का संस्कृतीकरण है। मत- जल ध्वनि परिवर्तन से मच् नहीं बना, आरंभ में यह एक समुदाय द्वारा मत का मच के रूप में अनुश्रवण था। वास्तविकता वही हो पर प्रक्रिया भेद से बोधवृत्त बदल जाता है।मच- जल से ही E. much, muck, फा. मजा, मजाक, मजेदार. मजमा, सं. का मज्जन, मंजन, मंजिष्ठा, मंजु, मंजुल, मंजर -मोती,फा. जर, जरी, जरा, सं. मंजरी, मंजीर/मँजीरा, ते. मज्जिग, भो मजिगर (अच्छा) माझ/ मझोल-मध्यम, माझी – ‘जलधारा से पार उतारने वाला’ आदि निकले हैं।

Post – 2020-06-12

#शब्दवेध(61)
इतादि
अर्थात् इत/इद/इंद/इंध/विद/विंद जो देखने में अलग होते हुए भी अलग अलग पृष्ठभूमियों से आए लोगों के एक ही शब्द के उच्चारण हैं। मैं स्वयं भोजपुरी पृष्ठभूमि से आने के कारण यह के ये और वह को वो बोलता हूँ इसका पता मुझे अपने एक व्याख्यान का टेपांकित पाठ सुनने के बाद चला। रफी अपने गानों में इ और उ का उच्चारण कैसे करते हैं इस पर उनका ध्यान शायद ही गया हो। मेरा गया था, पर अपने उच्चारण का दोष मुझे तब भी न दिखाई न दिया।

मैंने अत पर चर्चा करने हुए सुझाया था कि इससे जुड़े दूसरे संकुलों पर हमारे पाठक विचार कर लेंगे पर पाया कि जब मुझसे बहुत जरूरी पहलू ओझल रह जाते हैं तो उनका ध्यान इनकी ओर न जाए, यह अधिक स्वाभाविक है। उदाहरण के लिए संस्कृतीकरण और अर्थविचलन के चरित्र को समझने के लिए अंत के निकट, भीतर का वाचक बन जाने के बाद आँत (intestine) और फिर ‘आन्त्र’ बनना। इसलिए एक सरसरी नजर इन पर डालने के बाद ही आगे बढ़ना उचित होगा।

ई- जल, बहना ( स्तोमाँ इयर्मि अभ्रिया इव वातः) E. eel -a fish , चलना (ईयते, ‘दूत ईयसे युयुजान ऋष्व’, इयर्ति ‘इयर्ति वाचमरितेव नावम्’), उड़ना (यो अब्दिमाँ उदनिमाँ इयर्ति ), त. मक्खी (E. bee?)।

ई-त/इत- यहाँ, इधर (इत उत ताकि चला भड़िहांई); इतः- यहाँ से। ऐसी दशा में , जैसा हम पहले संकेत कर आए हैं, इति का पुराना अर्थ आरंभ था, पर इसे अति/ अंत/ ०अन्ति का पर्याय बना दिया गया। इसके बाद भी ‘अति’ और ‘अंत’ का प्रयोग समाज के किसी स्तर पर जारी रहा, फिर भी पुराने इतः के साथ अतः का चलन आरंभ हो गया। इत्र के साथ अत्र आरंभ हुआ और इसने इत्र को बाहर कर दिया। इदं यह (E. it, त. इदु. सं. इदानीं – इस समय) बना रहा, पर इदि का स्थान ०अदि>आदि ने ले लिया, फिर भी ‘अन्त’ ‘इति’ के साथ भारत में बना रहा, परंतु भारत से बाहर इति ही प्रचलित हुआ। यही फा. (इन्तकाल, इन्तहा आदि) तथा E. end, enate-going out, के आशय में प्रयोग तो हुआ पर इन, in, enter,entry, endo-/ ento/ ent/ ent, en(enbloc) en- (i.e. engage, entwine- to interlace, ensure, endure etc) में निकटता या आन्तरिकता का भाव बना रहा। केवल भारतीय बोलियाँ इस अराजकता से बची रहीं।

इसका अर्थ है, जो भी उलट-पलट होना था वह भारत में हो चुका था इसके बाद इनका प्रसार उस पूरे उलट-फेर के साथ हुआ।

भारतीय व्यापक संपर्क की भाषा में यह उलट-फेर कैसे हुआ इसे समझना जरूरी है। आर्यों के हमले के हिमायती भाषाविद भी यह मानते रहे हैं कि वैदिक भाषा पर द्रविड़ और मुंडारी को प्रभाव है। भाषा परिवारों की सीमा में बंधे होने के कारण वे उन बोलियों का सही अनुमान नहीं कर सकते थे, और उस समग्र और गहन समागम की कल्पना से भी घबराते थे जिसका परिचय पाए बिना भारोपीय के चरित्र को समझा ही नहीं जा सकता था ।

किसी भिन्न भाषाई परिवेश में पहुँचने वाला गूँगेपन से आरंभ करता है। पहले संकेत से काम लेता है। सबसे आसान होता है संज्ञाओं को सीखना। उसके संकेत के उत्तर में दूसरा, कहें, दूकानदार वस्तु का नाम आदतन ले कर पुष्टि करना चाहता है और इससे वह बहुत आसानी से दुहरा लेता है। फिर क्रिया, सर्वनाम और विशेषणों की बारी आती है। सबसे कठिन होता है कारक चिन्हों, लिंग निर्धारक चिन्हों का और इससे भी अधिक क्रियाविशेषणों का सही प्रयोग। यह इतना कठिन होता है कि आजीवन किसी भाषा क्षेत्र में रहने के बाद भी लोग इनके मामले में गलतियाँ करते है और कुछ मामलों में ये गलतियाँ पीढ़ी दर पीढ़ी गलतियाँ करते हैं और यदि इनकी संख्या या भूमिका निर्णायक रही तो इनकी गलतियों को सही और सही प्रयोगों को कुछ माने में प्रयोगबाह्य कर दिया जाता है, कुछ में साथ साथ जारी रहने दिया जाता है और इस तरह प्रयोगों में अराजकता पैदा हो जाती है। इस दृष्टि से वैदिक भाषा सबसे अराजक है पर संस्कृत में शुद्धि के घोर आग्रह के बाद भी अनियमितता किसी अन्य भारतीय भाषा की तुलना में बहुत अधिक पाई जाती है।

ईति -बाधा, प्राकृतिक उपद्रव (महाप्लावन/ सूखा), E. evil/ ill (?)। इदा( इदानीं)इतर, इदं, it,
इन्द – (त्वं न इन्द ऊतिभिः सजोषाः पाहि)> इन्दु – रस, जल (तुभ्यं पवन्त इन्दवः सुतासः ), 2. चंद्रमा, प्रकाश; बिंदु (मंहिष्ठं सिञ्च इन्दुभिः ).> इन्द्र – प्रकाश > इन्द्रिय – संज्ञान कराने वाला; इन्द्र – जल का देवता, E. index – to show; indicate – to show, in- un-(inclement/ unwanted).
इन्ध- ०जल > प्रकाश, इन्धते – प्रज्वलित करते हैं। ईंधन- ज्वलनशील।
एत-शुभ्रवर्ण – 5.81.3; गमन – अधृष्टो व एतवा अस्तु पन्था .।
एतग्व – दौड़ लगाने वाला, घोड़ा (एतग्वा चिद्य एतशा युयोजते हरी इन्द्रो युयोजते ।। 8.70.7. आदि।

Post – 2020-06-11

#शब्दवेध(60)
उच्छ्रयस्व महते सौभगाय

अत की चर्चा की और उसमें आत्म, आत्मा को ही जगह देने का ध्यान न रहा। इसका परमात्मा और अध्यात्म से संबंध तो है ही, सोचने, जीने और जीवट से भी इतना गहरा संबंध है, जिसकी पहले कल्पना न करता था। ‘जल में कुंभ, कुंभ में जल है बाहर भीतर पानी, फूटि कुंभ जल जलहिं समाना यह तत कहो गियानी’, ब्रह्ममय या परमात्ममय जगत में रहते हुए, कायाबद्ध होने के कारण, उससे अलग प्रतीत होने की अवधारणा, बूँद के समुद्र में विलीन होने की अवधारणा, आत्म के ब्रह्म से अभिन्न होने और मरने पर उसी में मिल जाने का विचार, ’खुदा था होने से पहले न होता तो खुदा होता’, ‘एक बूँद सहसा उछली’ (और जीव बन गई), ये सभी एक ही मनोभाव काे दुहराने वाली इबारतें हैं। मृत्यु से भयभीत होने की जगह सदगति को प्राप्त करने का विश्वास इसी से आता है और इसी से प्रेरित राजपूत प्राणेत्सर्ग को ब्रह्म के दूसरे प्रतिरूप (जल के स्थान पर अग्नि/सूर्य/सूर्य लोक/ )स्वर्ग में विलीन होने का पर्याय मानते रहे। सब कुछ एक दूसरे से और हमारी जातीय मनोरचना के इस तरह जुड़ा है और फिर भी मुझे इसका ध्यान नहीं आया। यह है हमारे लेखन की सीमा, इसका अधूरापन। जो कथ्य है उसका क्षुद्र अंश ही प्रकट हो पाता है मेरे लेखन में। जहाँ मेरी पोस्ट खत्म होती है वहाँ से उस मशाल को लेकर आगे और उससे आगे रिले दौड़ आरंभ हो तो यह सचमुच एक ऐसी महादौड़ और महाक्रीड़ा का रूप ले सकता है जो हमारे खोए हुए मनोबल के पुनरुद्धार में सहायक हो सकता है और उस औपनिवेशिक कूपमंडूकता से बाहर निकलने को संभव बना सकता है जिसमें हमें डाल दिया गया।

आप अपना बचाव करने के लिए पाश्चात्य शिक्षापद्धति, मनीषा और विश्वदृष्टि और कुछ हद तक धर्म दृष्टि (के जिसमें सेकुलरिज्म की उनकी समझ भी आती है) की श्रेष्ठता के कायल लोगों काे दोष देकर अपनी ग्लानि कम कर सकते हैं, परन्तु उनकी दशा फिर भी आप से, जो भारतीयता को धर्मप्रियता, धर्म को वर्णव्यवस्था और वर्णव्यवस्था को जातिवाद मानते हैं, यहाँ तक कि मुस्लिम, ईसाई और वामपंथी सोच से घृणा को राष्ट्रवादी नवोनमेष मानते हैं, आप का हीनताबोध उनसे भी प्रबल है। आप आगे नहीं बढ़े हैं, मध्यकालीन संकटबोध में वापस लौट गए हैं या शायद उससे भी बुरी स्थिति में पहुँच गए हैं। संकटबोध से ग्रस्त व्यक्ति परिरक्षणवादी हो जाता है। वह अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल नहीं कर पाता, जितनी करता है नकारात्मक दिशा में करता है, जिनसे संकट अनुभव करता या घृणा करता है उनका सामना करने के लिए उन्हीं के तरीके अपनाता है, पर इस विषय में सावधान तक नहीं रह पाता कि वह उनका अनुगमन कर रहा है, उनका अनुचर बनता जा रहा है। यदि कोई गोरा आदमी – उसका बौद्धिक स्तर और भीतरी इरादा कुछ भी क्यों न हो – हिंदुत्व के प्रति तनिक भी सदाशयता दिखाए तो विभोर हो कर उसे सनद की तरह पेश करते हैं। भक्ति भावना का वह रूप, मन्दिरवाद का वह रूप, चेतना का वह रूप जिसके प्रति इधर आकर्षण बढ़ा है वह मध्यकाल से पहले न था।

मध्यकाल से पहले यदि व्यक्ति नामों पर विचार किया जाय तो वे उस तरह देवपरक नहीं होते थे, जिस तरह मुस्लिम प्रभाव में मुसलमानों से भी अधिक उत्साह से रखे जाने लगे। मंदिर/मठ दो तरह के थे। एक व्यापारिक यात्रापथों पर जो मुख्यतः व्यापारियों के पड़ाव, बैंक और मनोरंजन का केंद्र हुआ करते थे और जिनके वैभव का पता लुटेरों की लूट के बाद चलता था। इस वैभव के कारण ही जन साधारण के लिए धार्मिक से अधिक दर्शनीय स्थल हुआ करते थे पर गहन आस्था के केन्द्र न थे। दूसरे वे जो किसी न किसी रूप में लगभग प्रत्येक गाँव में थे। तमिल की एक कहावत है, कोविल इल्लात ऊरुमिल्लै – ऐसा कोई गांव नहीं जहाँ मन्दिर न हो। इसका कारण था। मंदिर सांस्कृतिक केन्द्र थे। वे शिक्षा के, सामाजिक समारोहों के, न्याय विचार के केन्द्र थे। मंदिरों को ध्वस्त करने वालों ने पूरे सांस्कृतिक तानबाने को नष्ट किया था। उन्हें पूजा पद्धति से अधिक आपत्ति शिक्षा-पद्धति से थी। आज केवल पूजा पद्धति वाले मन्दिरवाद और देववाद के प्रति उत्साह दिखाई देता है और अन्तश्चेतना में हो या विचारों में व्यक्त हो, तुलना उनसे होती है जिनको आप उन्हीं अंधविश्वासों के कारण गर्हित मानते है।
हमारा लक्ष्य यह नहीं है कि हमें आसन्न संकटों से असावधान करें या उनके निवारण का उपाय करने की सलाह दें। मन्तव्य केवल यह है कि ऐसा उनका अनुकरण करके नहीं, अपने रास्ते पर चलकर किया जा सकता है। ईसाइयत का कारोबार जो संकट बन कर आया और जो विदेशी पैसे के बल पर ऐयाशी का तंत्र खड़ा कर चुका है और एक और तो हिंदू समाज के पिछड़े और अभावग्रस्त तबकों को हिंदू समाज से अलग करने के लिए हिंदू मूल्य व्यवस्था को गर्हित सिद्ध करने के लिए सभी स्तरों के हिंदू बुद्धिजीवियों का इस्तेमाल कर लेता है और दूसरी और उस पाखंंड- तिलक-छापा, मंत्र, टोने, देवमूर्तियों का सहारा लेता है। उसने हिंदू देवों के बाने में ईसा, मरियम सभी को पेश करते हुए धोखाधड़ी को ईसाइयत का पर्याय बना दिया है उसका सार्वजनिक प्रचार और वि्देशी चंदे पर रोक ही उसको और उसके हिमायतियों को कागजी कुत्तों का जत्था सिद्ध करने के लिए काफी है। इसकी समझ और इस दिशा में प्रयत्न का हमें ज्ञान नहीं, पर बड़बोलों ने इस दिशा में कितना काम किया है यह वे ही जानें, हम केवल यह जानते हैं कि अपनी विचार-वीथी में भौंकने से अधिक कुछ किया भी हो तो वह नगण्य है।

कोरोना काल संकट में तबलीगी जमात के कारनामे – थूकने, पेशाब फेंकने, नर्सों के साथ अश्लील हरकते, संगसारी जिनमें उनके धर्मगुरु भी साथ खड़े रहे हैं, उनका बड़े पैमाने पर प्रचार ही स्वयं संवेदनशील मुसलमानों को इस्लाम से विमुख करने और इसे गर्हित सिद्ध करने का सबसे कारगर हथियार है।

कहें जिसे संकट मान कर असुरक्षा की भावना से कातर हैं उसे सही समझ से आनन फानन में दूर किया जा सकता है।

असली संकट, बड़ी चुनौतियों का सामना करने से कतराना है, आरामतलबी और दोजबानी है। सबसे बड़ी विफलता उस अवसर का लाभ उठाने से वंचित रहना है जिससे भारत सचमुच विश्व शक्ति बन सकता है। महिमा विश्व की सबसे दुर्लभ चीज है और उसे माँग कर, चुराकर, बल प्रयोग से हासिल नहीं किया जा सकता । उसका मोल चुकाना होता है और वह मोल है पसीना। संकल्प और अध्यवसाय। असली संकट इसके अभाव से पैदा होता है जो वाम-दक्षिण सभी में, सभी मतों में, सभी सामाजिक आर्थिक स्तरों पर व्याप्त ‘राष्ट्रधर्म’ का रूप ले चुका है। पश्चिम ने धर्मयुद्धों में मिली मात से शिक्षा लेकर इसे पूरे संकल्प के साथ अर्जित किया यद्यपि इसके लिए बुद्धि से अधिक धोखाधड़ी से काम लिया। हम माँग कर पाना और उसके बराबर होना.यहाँ तक कि उससे आगे बढ़ना चाहते हैं। ऐसे दिवास्वप्न अहंकार प्रदर्शन और बड़बोलेपन को आत्मगौरव का पर्याय बनाने में व्यक्त होते हैं। ये क्रांति की जगह उपद्रव का रूप ले लेते हैं।
अध्यवसाय दुनिया का सबसे क्रांतिकारी काम है। अध्यवसायी समाज भीतर से इतना मजबूत होता है कि उसे पाँव रखने को जगह मिल जाय तो वह पूरी धरती को अपनी उँगलियों पर उठा सकता है। उसे किसी से डर नहीं लगता। सही राष्ट्रवाद ईमानदारी और अध्यवसाय का संक्षिप्त नाम है।
इसरो ने दिखा दिया है कि हम दूसरों से अच्छा कर सकते हैं और दूसरों को रास्ता दिखा सकते हैं। यदि यह राष्ट्रव्यापी रूप ले सके को आज अपनी बात दुनिया तक पहुँचाने के लिए हमें जिनकी भाषा सीखनी पड़ती है उन्हें यह जानने के लिए कि हम क्या सोचते और जानते हैं हमारी भाषाएँ सीखनी होंगी। आज वे जानते हैं हमारे शिक्षित समाज के पास कुछ है ही नहीं, वह उनके ज्ञान को हासिल करने की कोशिश में है, इसलिए जिसे वह अपना मौलिक बताता है वह भी उनका उच्छिष्ट है। यदि इस देश में सचमुच कुछ जानने योग्य है तो वह उन कोनों में है जिन तक उनकी शिक्षा नहीं पहुँच पाई है और उसे हासिल करने के लिए वे उन तक पहुँचने के प्रयत्न में रहते हैं। उनकी बोलियाँ सीखते हैं। इसी तर्क से उन्हें तब मॉनीटर के तेवर से नहीं अन्तेवासी भाव से आप तक पहुँचना होगा।

ज्ञान के क्षेत्र में, और विज्ञान के क्षेत्र में भी, भारत में अपार संभावनाएँ हैं जिसके सामने पश्चिम को बहुत कम समय में बौना सिद्ध किया जा सकता है। कारण यह है कि मानविकी से संबंधित पश्चिम का समस्त ज्ञान वर्चस्व की स्थापना से प्रेरित और ग्रस्त रहा है इसलिए चौंध पैदा करने वाले आडंबर के होते हुए भी कुटिलतापूर्ण और अन्तर्विरोधों से ग्रस्त रहा है। इसी तरह उनका विज्ञान भी पूँजीवादी लोभ और धौंस जमाने के आग्रहों से प्रेरित रहा। हमारे अपने शास्त्रीय ज्ञान से भी यही शिकायत की जा सकती है। वस्तुपरक निस्पृहता से किया गया काम उनके महारथियों को धूल चटा सकता है पर तभी जब ऐसा काम बड़े पैमाने पर भारतीय भाषाओं में हो, क्योंकि उसी दशा में यह उनके मनोवैज्ञानिक महाजाल और खुले प्रलोभनों और दबावों से मुक्त रह सकता है।

Post – 2020-06-10

#शब्दवेध(59)
एक कदम पीछे

मैं जो कुछ लिखता हूं उससे मुझे यह असंतोष बना रहता कि जो लोग मेरे लिखे को पसंद करते हैं उनको भी पूरी बात समझ में न आती होगी। उसके लिए जितना समय और जैसी अभिरुचि चाहिए वैसी शायद ही किसी के पास हो।

फेसबुक की सीमा है कि इसमें फॉर्मेटिंग हट जाती है, इसलिए न तो इटैलिक, अधोरेखा या बोल्ड फेस का प्रयोग कर सकता हूं, न ही किसी तालिका के माध्यम से बात को पूरी स्पष्टता से रख पाता हूँ। इसलिए इस लेखमाला में बहुत कम लोग रुचि ले पाते हैं, इसकी शिकायत नहीं है। शिकायत यह है कि जो लोग पसंद जताते हैं वे कुछ तो पाते ही होंगे, पर अनेक जितनी जल्द पसंद कर लेते हैं, उसमें इन लेखों को समझना संभव नहीं है।

यह अनुसंधान या पांडित्यपूर्ण काम नहीं है जिसके लिए लेखक और पाठक दोनों को विशिष्ट प्रतिभा, विपुल ज्ञान और ऊँची खोपड़ी की जरूरत होती है। इसके विपरीत यह एक खोज है जिसके लिए जिज्ञासा और एकाग्रता की आवश्यकता होती है, जो एक बच्चे में भी हो सकती है और वह भी इसे पूरे विश्वास से प्रस्तुत कर सकता है। अपनी विशेष परिस्थितियों के कारण मुझमें यह बेचैनी बचपन से ही थी। मेरे पास प्रश्न थे। कुछ तो ऐसे जिन्हें किसी से पूछ नहीं सकता था। कुछ ऐसे जिनका उत्तर कल्पना से तैयार कर लेता था, पर उनसे संतोष न होता था, इसलिए वे प्रश्न, उत्तर के साथ, संचित होते रहे और कुछ प्रश्न डरते हुए बड़े-बूढ़ों से पूछ बैठता, क्योंकि उस समय के शिष्टाचार के अनुसार छोटों को मुँह नहीं लगाया जाता था। मेरे प्रश्न होते ही ऐसे कि र उनका उत्तर कोई न दे पाता। लोग झुँझला जाते।

मेरी ये जिज्ञासाएँ जगहों के नामों के विषय में होतीं। मेरी छावनी जहाँ थी उसका नाम गोबरैया, उससे पहले सोनबरसा, आगे झरना और पकलपूरा। इनका मतलब क्या है। क्या सोनवरसा में सोना बरसता है? झरना में कोई झरना तो है नहीं। गोवरैया की बात यूँ समझ में आती कि वहाँ हमारे जानवर रहते थे और वे गोबर भी करते थे, पर पकलपूरा में क्या पकता था?

यह अकारण नहीं कि भारतीय भाषाएँ सीखने के क्रम में जब मुझे लगा कि हमें भाषाविज्ञान के नाम पर जो शास्त्र पढ़ाया गया था उससे उन समस्याओं का समाधान नहीं होता जो इनकी आंतरिक बुनावट से सामने आती हैं, तो इसके समाधान के लिए मैंने स्थाननामोंं के भाषावैज्ञानिक अध्ययन (1968-70) का निश्चय किया और उसके परिणाम इतने आश्वस्तिकर थे कि पाश्चात्य भाषा-शास्त्रीय पोथे और विद्वान हास्यास्पद जमूरों में बदल गए (1973)।

इसलिए मुझे यह निवेदन करने में संकोच नहीं कि भाषाविज्ञान के क्षेत्र में यह एक युगांतरकारी प्रयास है और पुरातन मान्यताओं से इतना अलग है कि भाषाविज्ञान के क्षेत्र के कृती विद्वान भी इस समझने के लिए मानसिक रूप में तैयार नहीं मिलेंगे। वे यह जानते और मानते हैं कि उनकी कोई ऐसी स्थापना नहीं है जिसे अधिकारी विद्वानों ने गलत न पाया हो, फिर भी वे उन्हीं के संचित भार को विषय का आधिकारिक ज्ञान मानते हैं । उनका यह तर्कातीत ज्ञान ही इसे समझने में बाधक भी बनेगा। हमारे विश्लेषण और निष्कर्ष ही अलग नहीं है, हमारे स्रोत और आधार सामग्री तक अलग है।

हम जिस अवस्था से अपने आंकड़े जुटाते और उनको निखारते हैं, वह तुलनात्मक अध्ययनों की पहुँच से बाहर था। उसे न तो आद्य भारोपीय के कल्पित रूपों में पाया जा सकता है न मानक कोशों में, पर एक बार उनके प्रस्तुत किए जाने के बाद, उन सभी की वे गुत्थियाँ सुलझ जाती हैं, जिनके कारण उनकी आलोचना होती रही है। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारी स्थापना में कोई भी चीज न तो काल्पनिक है, न खींच-तान से काम लिया गया है। केवल सिरा बदल दिया गया है या कहें सत्ता और प्रचार साधनों के सहारे सिर के बल खड़ा किए गए विज्ञान को उसके पाँवों के बल खड़ा कर दिया गया है। जो सूत्र लिखित रूप में उपलब्ध होने के कारण मानक भाषाओं के साहित्य से जुटाए जाते थे उन्हें बोलियों से प्राप्त ही नहीं किया गया है अपितु यह भी दिखाया गया है कि वे लिखित साहित्य में उपलब्ध प्रतिरूपों से अधिक सही और कम विकृत हैं और ये भाषा-परिवारों की सीमाओं का उल्लंघन करते हैं और इस सुझाव को भी गलत ठहराते हैं कि भाषाओं में कालक्रम में स्वतः परिवर्तन होते हैे, उनका कोई अन्य कारण नहीं होता।

अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, पर अकेली खोज दुनिया को उलट सकती है। यह विश्वास न होता तो हिंदी जगत की विरक्ति और उपेक्षा के बाद भी यह विश्वास न बनाए रख पाता कि इस काम को जो भाषा, इतिहास, पुरातत्व, समाजशास्त्र, नृतत्व और कलादृष्टि सभी में परिवर्ततित करता है,अपने जीवनकाल में पूरा अवश्य करना होगा। मेरा इन अनुशासनों के मूर्धन्य विद्वानों से जब भी सामना हुआ, आरंभ में मेरी मान्यताओं को तिरस्कार पूर्वक रफा दफा करने की कोशिश के बाद उन्हें मेमनों की तरह टकटकी बाँध कर देखते और कुछ को अपने पहले के काम को धता बताते हुए नई दिशा अपनाते और आत्मविश्वास के साथ अपने मंतब्य रखते पाया। उन्होंने दृष्टि-परिवर्तन से नया जीवन पाया, जो चुप साध गए, वे अपने प्रभुत्वकाल में ही दरकिनार किए जाने लगे।

किंचित् अशोभन लगने वाला यह कथन इसलिए कि मुझे अपने आत्मविश्वास के लिए किसी पसन्द की, खास कर मैत्री निभाने के लिए पसंद की जरूरत नहीं है। फिर भी कोई भी विचारक इस इरादे से ही लिखता और बोलता है कि उसके विचार अधिकतम लोगों तक पहुँच सकें और वह आकांक्षा मुझमें भी है, इसलिए मैं चाहता हूँ कि जो कोई भी इन्हें पढ़े वह दत्तचित्त हो कर पढ़े, इस बात की खोज करते हुए पढ़े कि प्रस्तुत सामग्री में त्रुटि या अस्पष्टता कहाँ दिखाई देती है और यदि प्रश्न करे तो वे पाठ की सीमा में ही हों। लिखने की सार्थकता इसी में है। साक्ष्य और तर्क शास्त्रीय सीमाओं से इतने अलग हैं कि इसमें दखल देने के लिए विषय का ज्ञाता होने की आवश्यकता नहीं, उल्टे शास्त्रीय अनभिज्ञता और किसी बोली का ज्ञान और जरूरत होने पर कोश आदि देखने की तत्परता ही पर्याप्त है।

नियमित लेखन इसलिए जरूरी है कि इसी से काम हो पाता है, जिन साधकों और कृतिकारों को हम जानते हैं उनकी आदत का हिस्सा बन जाने के कारण वे एक दिन भी शिथिल नहीं रह सकते थे। पर फेसबुक की सीमाओं और इस शृंखला के बढ़ते चले जाने के कारण, जिसके साथ थकान और समय का अभाव भी जुड़ जाता है मैं अपेक्षा कर बैठता हूँ कि सुझाए तर्ज पर आप स्वयं दूसरे शब्दों की मीमांसा कर लेंगे जब कि हम स्वयं अपने साक्ष्यों को संतोषजनक रूप में नहीं रख पाते हैं।

उदाहरण के लिए हमने कल एक बहुत महत्वपूर्ण समस्या उठाई थी पर उसका सही प्रतिपादन पोस्ट में संभव न हो पाया। इसे वाक्य बदलकर प्रस्तुत करें तो
1. लिखित भाषाएँ और बोलियाँ सामाजिक संरचना में बदलाव आने के कारण हजारों साल के भीतर बदली हैं। बोलियों ने लिखित साहित्य से जितना प्रभाव ग्रहण किया है उतना साहित्यिक भाषाओं ने इस दौरान ग्रहण किया है परंतु उनकी सारी पूँजी बोलियों से आई है। नई शब्दावली वे और प्रत्यय और उपसर्ग के जोड़-तो़ड़ से करती रही हैं, परंतु इनके घटक भी बोलियों से आए हैं। नए अनुसंधान और विकास में शिक्षितों की भूमिका प्रधान रही है इसलिए बोलियों में नई अपेक्षाओं की पूर्ति साहित्यिक भाषाओं के शब्दों को अपने ध्वनि विन्यास के अनुसार ढालकर कर ली जाती रही है। इसी से इस दुष्प्रचार को बल मिला कि बोलियां लिखित भाषाओं की विकृति से पैदा हुई हैं।
2. इसके बावजूद बोलियां उसी ऐतिहासिक दौर में भाषाओं की तुलना में कम विकृत हुई हैं। कारण भाषाओं में विकृतियां या परिवर्तन दूसरे भाषा समुदाय के मिलने खपने से होते हैं और नए अवसर की तलाश में ऐसे समुदाय उन्नत सामाजिक संरचना के भीतर अपनी जगह बनाने का प्रयत्न करते हैं और इसलिए उन भाषाओं में परिवर्तन अपेक्षाकृत तेजी से होते हैं।
3. संस्कृत और दूसरी लिखित भाषाएं बोलियों के इतिहास की तुलना में उन्हीं की गोद में पली बच्चियाँ है, इसलिए भाषा के इतिहास, इसके उद्भव और विकास को समझने के लिए वे लिखित भाषाओं की तुलना में अधिक भरोसे की हैं।

परंतु हम जानते हैं कि इन्हें हम सही-सही प्रस्तुत नहीं कर सके, क्योंकि हमारा ध्यान इस जटिल समस्या के एक दूसरे पक्ष की ओर था, जिसको भी बहुत सलीके से प्रस्तुत नहीं कर सके और जिस रूप में प्रस्तुत किया उससे पाठकों की उलझन और बढ़ी होगी। ई का स्थान अ ने ले लिया, अ का स्थान त ने ले लिया, यह भाषा उड़ती नजर डालने वालों की समझ में नहीं आ सकती।

यदि फेसबुक की पोस्ट में तालिका बनाने की गुंजाइश होती तो यह दिखाना आइने की तरह साफ होता कि निकटस्थ के लिए सभी बोलियों में इकार का प्रयोग मिलता है, भो. ई , इहाँ/इहवाँ, ई>ए एकर, एही बदे, एइसन आदि। कहें परिवर्तन भो. में भी हुआ, पर अपने मूल चरित्र के अनुरूप और उस तरह का उलट फेर न हुआ जो संस्कृत में हुआ।

भो. का रूप अधिक पुराना है, क्योंकि आर्य द्रविड़ सभी बोलियों में आसन्न का यह रूप मिलता है (त. इदु -यह (अमहत्), इवन/ इवर – यह (महत्), इवळ – यह (महिला)। संस्कृत में भी इसके अवशेष बने हुए हैं। ऋग्वेद में आता है य ईं चकार सो न अस्य वेद, ‘जिसने इसे बनाया वह इसे न जान सका।’ यह उस संक्रमण को दर्शाता है जिसमें , ईंम का स्थान अस्य ले रहा है, फिर भी इदं -यह, अं. it -यह नपुंषक में बना रहा, अन्यत्र इसका लोप हो गया और इसका स्थान अ ने ले लिया – असौ, अं. this, पर बहुवचन में नपुं और पुं. सभी के मामले मे ‘त/द’ these, those और दूरस्थ में सं. में, (पु. सः, स्त्री. सा,नपुं. एक व. मे त (तत) आता है , पर आगे ‘त’ हावी हो जाता है – सः तौ ते, सा, ते ता), अं. में भी इसका निर्वाह एक व. में होता है (he, she, his her) पर बहु.व. में और आगे की रूपावली मे ‘त’ that, these, those, their,) हावी हो जाता है।

जाहिर है कि संस्कृत बोलियों की तुलना में अधिक विकृत हुई और देशांतर में ऐसे समुदायों के भारोपाय भाषियों की जमात में घुसने और मिलने की छूट न थी इसलिए उन्हें अपनी ध्वनि सीमाओं में इसका अनुकरण करना और मूल के यथासंभव अनुरूप बने रहने का प्रयत्न करना पड़ा।

Post – 2020-06-09

#शब्दवेध(58)
अत

होने को तो अत में आए ‘अ’ और ‘त’ दो शब्द हैं – अ – दूर, (जिसे सं. अदस्, अं. अदर में पाया जाता है) और ‘त’ – स्थान > अत – वह स्थान। पर इसमें आए ‘त’ को हम ‘तर (त्र)’ का घिसा रूप कह सकते हैं।

अनेक समुदायों के सभ्य समाज में आकर सेवा के अवसर तलाशने के लिए अपनी बोलियों के साथ मिलने और मानक भाषा सीखने तक अपनी बोली और संकेत से काम चलाने का परिणाम था कि व्यक्तिवाचक सर्वनामाें तथा स्थानवाची क्रियाविशेषणों में खासा हेर-फेर हुआ।

यह बदलाव नियमित होता तो इस घालमेल का पता भी न चलता, परंतु कहीं तो बदलाव हुआ कहींं छूट गया । अहं में (०इघं/इहं>हम) का ‘इ’ ‘अ’ बन गया पर अंग्रेजी आइ इगो (I, ego) में इकार और अन्य तथा अदर other में दूरी वाला भाव बना रहा, इतर/इत्र में इ का स्थान अ ने ले लिया और ०अतर/अत्र के ‘अ’ का स्थान ‘त’ ने ले लिया – तत, तत्र > अं. दैट, दे( that, they) पर साथ ही दिस,दीज (this, these) जब कि ०इयर/ हियर (here) को ध्यान में रखते ०इस /इज is (his) होना चाहिए था। पर इज (is) ने अस्ति का स्थान लिया और हिज (his) ०अस्य.(तस्य) का, परंतु हम यहाँ इन सामुदायिक घालमेल से हुए भाषागत घालमेल पर विचार नहीं कर रहे हैं।

हम जलवाची शब्दों के प्रसंग में अत्यादि अर्थात्
अत/अद/अंद/अंध/अन्न,
इत/इद/इंद/विद/विंद,
उद/उंद/उद्र, ओत, ओद
पर विचार कर रहे हैं, जो सभी जलपरक हैं। यह दूसरी बात है कि हम अनचाहे ही यहां हम एक आश्चर्यजनक सचाई के सामने हैं जिसकी अन्यथा कल्पना भी नहीं की जा सकती, और वह है, हमारे स्थान वाचकों, सर्वनामों और जैसा हम आगे देखेंगे, उपसर्गों का भी नामकरण जल की ध्वनियों और जलपरक शब्दों पर हुआ है। हम अभी सत और तत पर विचार नहीं कर रहे हैं, फिर भी यहाँ यह संकेत किया जा सकता है कि वे भी जलपरक ही हैं।

०अत- जल (पर हम अंध और अँधेरे के प्रसंग में विचार कर चुके हैं। अत/अद (अत्ति) – E. eat, eddible (L.edibilis – edere – to eat), अत+इ=अति/इति, अतीत -बीता हुआ > अंत> इन्त(हा) , इंद E. end, (O.E., Ger. and Dan. ende, Goth. andels); अन्त/ – भीतर, फा.अन्दर E. in, अध -नीचे ((यो अस्मान् अभिदासति अधरं गमया तमः); E. under; अधि- ऊपर; बीच में; अन्ति/अन्तिके- पास, E. ante-(L. ante, anti) anticipate, anterior,
आदर – ०जल प्रस्तुत करना (तु. अर्घ पाद्य, अर्चना) – सम्मान;
आतुर – ०प्यास से विकल, अर्धविक्षिप्त;
भो. अधातुर – अधिक से अधिक खाने को लालायित;
अत्य – प्रतिस्पर्धा में सबसे आगे/ बढ़ कर, अश्व।
हम इन सभी शब्दों को जानते हैं, इनका सही प्रयोग करते हैं, पर यह नहीं जानते कि इनको यह अर्थ मिला कैसे। यह कुछ वैसा ही है जैसे आप किसी संपदा का उपभोग करते हैं, पर यह नहीं जानते कि उसका स्वामित्व आपको मिला कैसे है, क्योंकि संपदा के स्वामित्व के कागजों को सँभालने की चिंता ही न की। उनके अभाव में आपको संपदा के उपभोग में किसी तरह की कोई असुविधा नहीं हुई इसलिए आप ने उन कागजों के सँभालने को बेकार की झंझट समझा। समस्या तब आती है जब कोई फर्जी गवाहों के साथ आकर यह दावा करे कि यह तो उसकी संपदा है, इसका उसे अधिकार ही नहीं। उल्टे इतने समय तक इसका मुफ्त में उपभोग किया है, इसलिए उस पर देनदारी भी बनती है। हमने जो दृष्टांत चुना है वह यथार्थ का प्रतिनिधित्व नहीं करता, इसलिए भ्रामक भी है। ज्ञान विज्ञान की कोई शाखा नहीं जिसका हमारे जीवन से गहरा संबंध न हो, परंतु उनका ज्ञान सभी को न तो हो सकता है न होने की चिंता होनी चाहिए, फिर भी समाज में कुछ लोग होने चाहिए जो विशेष क्षेत्रों की जानकारी रखते हैं। उस क्षेत्र के कारोबार से जुड़े लोगों में यह जानकारी तो होनी ही चाहिए और उसका अभाव, यहां तक कि उसके प्रति अवज्ञा से चिंता पैदा होती है।

मैंने ऊपर समानार्थी संकुल से संबंधित जिस शब्द संकुल को प्रस्तुत किया हैं, उसके विस्तृत विवेचन में जाना मेरे लिए कष्टदायक और पाठकों के लिए उबाऊ होगा, इसलिए हम उस विस्तार में न जाना चाहेंगे, उनके विषय में इसी तर्क रेखा पर चल कर आप स्वयं शब्द संकुलों की खोज कर सकते हैं और यदि इस प्रेरणा का विस्तार हो सके तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी।

फिर भी हम एक शब्द, जो इस संकुल में आता है, उसकी चर्चा जरूरी समझते है क्योंकि हमें लगता है कि उसका अर्थ संभव है आप समझ न पाएँ यद्यपि इसका प्रयोग करते हुए कोई चूक नहीं करते।

यह है ‘ओतप्रोत’। इसमें आया ओत ताने और प्रोत बाने के लिए प्रयोग में आता था जिसमें शब्द वही था पर इसमें पूरक के आशय में प्र उपसर्ग जुड़ गया था । यह वैदिक कालीन पर्याय है जो बाद में चलन में न रहा यदि आर्द्र के लिए भोजपुरी ओद पर ध्यान दें तो यह समझ में आएगा कि ओद उद से नहीं इसी संकुल के ओत से निकला है। जैसे रस से रसरी/रस्सी > रश्मि, फा. रसन, रास और रेशम; रज से रज्जु , वारि से वरत्र, बरही/ बरहा निकले हैं, उसी तरह ओद- गीला, ओत -जल से धागे के लिए संज्ञा मिली जिसका प्रयोग ताने के लिए होता था औरे जिसमें प्र उपसर्ग के साथ बाने की संज्ञा तैयार की गई। ओत के जल वाले आशय से ऊत – निःसंतान, मूर्ख निकला लगता है। तानेबाने के आवरण वाले भाव से ओट- परदा, आड़ और ओढ़ना तथा ओढ़ाना क्रिया को संज्ञा मिली। क्या औधा (औधे मुँह गिरना) भी इसी से निकला है?

Post – 2020-06-08

#शब्दवेध(57)
भावजगत
इष
उपनिषद का वाक्य है, अन्न ही ब्रह्म है। यह किसी एक व्यक्ति की सूझ नहीं, एक दीर्घ परंपरा से अर्जित अनुभव और ज्ञान है जिसे पहले से अलग अलग मुहावरों में दुहराया जाता रहा है । इष जल। इष अन्न। इष इच्छा, एषणा। इस इच्छा या एषणा की पूर्ति के लिए किया जाना बजाने वाला आयोजन इष्टि या यज्ञ है। यह अन्न और धन के लिए भी हो सकता है, भूमि विस्तार के लिए भी हो सकता है, राज्य विस्तार (राजसूय) के लिए भी हो सकता है। हम जानते है बीती चार शताब्दियों के दौरान पूरा यूरोप राजसूय यज्ञ में लगा रहा। यह यज्ञ विविध रूपों में आज भी चल रहा है और एक ओर अपार शक्ति और समृद्धि का संचय हो रहा है तो दूसरी ओर शेष मानवता के लिए संकट का कारण भी बन रहा है। फिर भी यह सतत चलने वाला, अनन्त रूपों में चलने वाला यज्ञ है। यहाँ हम कर्मयज्ञ की बात कर रहे हैं, उसकी मखौल कर्मकांडी यज्ञ की नहीं। इसका बोध सदा रहा है, प्रस्तुति का रूप अवश्य भिन्न हो सकता है:
यो यज्ञो विश्वत: तन्तुभिः तत एकशतं देवकर्मेभिः आयतः ।
इमे वयन्ति पितरो य आययुः प्र वय अप वय इति आसते तते ।। 10.130.1
पुमाँ एनं तनुत उत्कृणत्ति पुमान्वि तत्ने अधि नाके अस्मिन् ।…10.130.2
(इस यज्ञ के तार सर्वत्र फैले हुए हैं, सैकड़ों देव-(देवों ने ही कृषि का आरंभ किया था) या श्रेष्ठ कर्मो के रूप में विस्तीर्ण है। इस महायज्ञ के वितान और बुनाई में हमारे अमर पितर भी (प्रेरक के रूप में) सहयोगी हैं, वे कहते हैं इस ताने को भरने के लिए धागे को आगे की ओर ले आओ, पीछे को ले जाओ। पुरुषार्थी व्यक्ति ही इन्हे तानता और उधारता और स्वर्गोपम अवस्था को पहुँच जाता है….।

इसका विस्तार मंत्र पाठ से नहीं, पुरुषार्थ से होता है। यह यज्ञ अनवरत चलता रहा, परन्तु इसका संपादन करने वालों को यज्ञ (कर्म) को कर्मकांड बनाने वालों ने यश, धन और सम्मान से वंचित करके यज्ञ ध्वंस का आयोजन स्वयं किया, जिसकी सीमाओं को समझने और पिछली गलतियों को सुधारने का समय आ गया।

कर्मकांड वाले यज्ञ के पुरोधा प्रचारशक्ति के बल पर निरर्थक प्रपंच करते हुए हमारी जातीय चेता में इस तरह उतार चुके हैं कि हम यज्ञ के इसी रूप से परिचित हो पाते हैं।

पुरुषार्थ के यज्ञ से पहले ईश या स्वामिवर्ग पैदा होता है जो संपदा पर अधिकार और शक्ति विस्तार करते हुए अधिकाधिक समृद्ध होता है। उत्पादन निर्विघ्न चले इसके लिए खेती को क्षति पहुंचाने वाले हिंस्र पशुओं और कृषिद्रोही वनचरों के आक्रमण से रक्षा के लिए, साहसी, युवा दस्ता तैयार होता है और कुछ समय के बाद वृद्ध और बीमार लोगों और कम उम्र के बच्चों को श्रम से मुक्ति मिल जाती है और इस तरह समाज का इन वर्गों में आंतरिक विभाजन होता है – तिस्रः प्रजा आर्या ज्योतिरग्रा। कहें वर्ण व्यवस्था का आरंभ भी कृषि यज्ञ से होता है। इसी से ईश्वर पैदा होता है। ब्रह्म पैदा होता है। श्रमविरत ब्राह्मण पैदा होता है, ब्रह्मा की अवधारणा पैदा होती है। इसके जुझारू वर्ण के प्रतिनिधि के रूप में विष्णु की उद्भावना होती है और प्रतिरोधी और प्रलयंकारी रुद्र का चरित्र विकसित होता है।

पुरुषार्थ से ही भौतिक उत्थान और उससे आत्मिक और आध्यात्मिक उत्थान संभव होता है। इनमें विरोध नहीं है, सहयोग है। पुरुषार्थ और कर्मठता से शून्य व्यक्ति, समुदाय और समाज पाखंडी हो सकता है पर आध्यात्मिक नहीं। भारत कृषि प्रधान देश है, अध्यात्मवादी देश है, यह औपनिवेशिक षड्यन्त्र और प्रचारतंत्र की देन है जो पाखंड (पूजा, मंदिर, चढ़ावा) को श्रेष्ठता का मानदंड बनाने वालों को रास आता था, इसलिए पिछले दो तीन सौ साल के भीतर हमारी मानसिकता का हिस्सा बन गया, अन्यथा, यह उद्योग में भी इतना आगे था कि ब्रिटेन के कारखाने का उत्पाद भी प्रतिस्पर्धा में इसके सामने टिक नहीं पाता था, इसलिए भारतीय उद्योगों को क्रूरता पूर्वक बन्द कराकर इसे कृषि प्रधान बनने को बाध्य किया गया और इन काम धंधों से जुड़े लोगों, आज के दलितों को दलित बनने को बाध्य ही नहीं किया गया उनका उद्धारक बनने का ऐसा स्वांग रचा गया जिसका जादू आज तक नहीं टूटा है।

इस इष – इच्छा से जो लुप्त है या खो गया है, उसकी खोज- अन्वेषण, गवेषणा/ गविष्टि आरंभ होती है। इसी से हमारे ज्ञान का विस्तार होता है, विज्ञान का विकास होता है, नए मूल्यों और व्यवस्थाओं की खोज आरंभ होती है और अधिक से अधिक पाने और उस पर अधिकार जमाने की लालसा पैदा होती है, ऐश्वर्य की भूख पैदा होती। जो इसे नहीं समझता वह भौतिक प्रगति का विरोधी और धूर्तता से भौतिक संपदा के अर्जन के लिए प्रयत्नशील होता है, अध्यात्म आधिभौतिक की देन है और भौतिक समृद्धि से पैदा हुआ है जैसे विज्ञान। बाहर की खोज ने ही अपने भीतर की खोज का भी रूप लिया, परंतु जो लोग अध्यात्म और कर्मकांड, युक्ति और धूर्तता में फर्क नहीं कर पाते, वे अकिंचनता को अध्यात्म बना देते हैं और भौतिक तथा आध्यात्मिक के बीच में एक नकली विरोध पैदा करते हैं। जब कोई कहता है भारतीय परंपरा अध्यात्मवादी है, भौतिकवादी नहीं वह अपनी परंपरा को भी नहीं जानता और वर्तमान समस्याओं की समझ भी नहीं रखता।
“Those who have seen the unspeakable poverty and physiological weakness of the Hindus to-day will hardly believe that it was the wealth of eighteenth century India which attracted commercial pirates of England and France. This wealth, says Sunderland, was created by the Hindus’ wast and varied industries
“ Nearly every kind of Manufacture or product known to the civilized world, Nearly every kind of creation of man’s brain and hand, existing anywhere, prized either for its utility or beauty, had been produced long long been produced in India. India was or greater Industrial and manufacturing nation then any in Europe or than any other in Asia…..” (Will Durant, The Case for India, Mumbai, 2007, p. 7).

भारत यदि आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत उन्नत था तो इसलिए कि वह औद्योगिक और व्यावसायिक दृष्टि से भी विश्व का सबसे अग्रणी देश था। पूंजीवादी अमानुषिकता को दरकिनार कर दें तो आज का पश्चिमी समाज भौतिक दृष्टि से ही भारतीय समाज से अधिक समृद्ध नहीं है आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी बहुत उन्नत है और इसी अनुपात में वह धार्मिक पाखंड से भी अधिक मुक्त हुआ है।

कर्मकांडी यज्ञ का चरित्र उस ऋत और आचार के विपरीत जिससे भारत ने सभ्यता का आरंभ किया था। वैदिक कवियों में कुछ को इसकी चेतना है –
यज्ञं पृच्छामि अवमं स तद् दूतो विवोचति ।
क्व ऋतं पूर्व्यं गतं कस्तद् बिभर्ति नूतनो वित्तं मे अस्य रोदसी ।। 1.105.4
प्राचीन यज्ञ, प्राचीन विधान से च्युत हो जाने पर यह नया यज्ञ टिका किस पर है यह पता नहीं चलता। यज्ञ चल रहा है, उसका संपादन वे कर रहे हैं जिनका गुणगान तो आश्चर्य मिश्रित श्रद्धा से किया जाता है, जिन्हें दक्षक्रतु माना भी जाता है, कवि उन जैसा कौशल कविता में कर दिखाना चाहते हैं, ऐसा करने पर गर्व करते हैं, परन्तु उनको अपनी समकक्षता पर नहीं रखना चाहते हैं, जब कि उनके पास इष्टि के नाम पर पुत्रेष्टि और अंत्येष्टि और भयदोहन बच रहा है।

जो भी हो इष्टि और एषणा का वह पुराना रूप जो दृष्टि को प्रखर बनाता है, ज्ञान, विज्ञान, अनुसंधान, उद्योग, व्यवसाय, उत्पादन और समृद्धि का मूल मंत्र है,और ऐश्वर्य को संभव बनाता है, जिसकी दबी छिपी समझ हमारी परंपरा में लगातार बनी रही है उसे पहचानना और उसके लिए समर्पित होना परंपरा की रक्षा और समय की माँग तो है ही हिंदू समाज पर पर मड़रा रहे संकट के निवारण के लिए भी जरूरी है। पहले प्रचारतंत्र ब्राह्मण के हाथ में था, आज समीकरण बदल गए हैं और देशज स्वार्थ का टकराव अंतर-राष्ट्रीय स्वार्थों के शक्तिशाली गठजोड़ से हैं। कुछ कटु सचाइयाँ संकटकाल में ही समझ में आती हैं और यदि तब भी समझ में न आए तो इतिहास अपने फैसले अमल में लाता है।

इष का ऐशानी दिशा के नामकरण में हाथ है, अरबी के ऐश और ऐयाशी में भी हाथ है क्योंकि इनका रूप परिवर्तन अरबी नियम से नहीं है और अरबी में संस्कृत के बहुत से शब्द पहुँचे हुए हैं जिनका अपना इतिहास है। अं. आइस, ईस्ट, विश का इष से संबंध दिखाई देता है, पर सबसे राेचक है इसका भविष्यत (भू-इष्यत/ इष्यति) का सूचक बनना। इसे समझने में अंग्रेजी की सहायक क्रिया ‘विल’ चाहना सहायक हो सकती है। भावी काम हम कर नहीं रहे होते है, करना चाहते हैं और इष्यति/ इच्छति इसी को प्रकट करता है।

Post – 2020-06-08

यूँ तो कुछ वक्त लगेगा इसमें
फिर यह समझोगे
कुछ किया ही नहीं।

Post – 2020-06-07

शब्दवेध(56)
भावजगत

इष
इष – जल, रस, सोम रस।
सोम जल तत्व का प्रतिनिधि है, इसलिए इसे धरती का जनक, द्युलोक का जनक, देवों का जन्मदाता , प्रतिभा का जनक, और साथ ही अग्नि, सूर्य, इन्द्र और विष्णु का भी जन्मदाता है।[1] ऐसी दशा में यदि
ईश और
ईसा
का भी जनक हो तो हैरानी क्या। ‘ईश’ का अर्थ आप जानते है, पर अधिकस्य अधिकं फलं के नियम से, उन्होंने उससे बडे़ मालिक की तलाश कर ली गई
ईश्वर (ईश-वर)
और
महेश (महा-ईश) । पर
वर का मूल आशय पानी है। जल के पुराने देवता जिनकी जल के नए देवता इन्द्र से इसी कारण प्रतिस्पर्धा बनी रही फिर मेल-मिलाप हो गया, वरुण और वरुणा नदी के मूल में संभवतः यही वर है। इसका ऋग्वेद के समय तक
इच्छा या कामना – वरं ब्रूहि
कृपा दान या प्रसाद – वरदान
सत्य – ver, very, verify, verily, L. verus- true; E. virtue – exellence, valour; verdict (L. vere-truly आदि में अर्थान्तरण हो गया । E. virulent – highly poisonous < L. virulentus, virus में अवश्य गरल का भाव बना रह गया लगता है। जो भी हो इष से निकले ईश पर वर से उपजा -वर के जुड़ने से इसमें श्रेष्ठता का भाव जुड़ गया जिस पर हम ध्यान नहीं देते। महेश का महा भी पहले जलवाची था, इसे मघ>मह मेघ>मेह (मेहत्नु-मिह सेचने),फा. मेहरबान – कृपालु से समझा जा सकता है ।
पर ईश्वर ईश से कुछ ऊपर जाकर भी संतुष्ट न था। महेश ने बराबरी पर रुतबा कम कर दिया था। हैसियत ऊँची करके ही कोई सबसे ऊपर हो सकता था इसलिए
परमेश्वर (परम-ईश-वर) ।
विष्णु तक का ठिकाना सभी को पता है पर परमेश्वर का ठिकाना किसी को पता नहीं।
त्रिदेव
हमारी त्रिदेवों की कल्पना भी कम रोचक नहीं । ऋग्वेद विश्व का प्राचीनतम लिखित साहित्य भले हो उसमें उपलब्ध सूचनाएं हमारे दीर्घ अतीत के मध्यकाल की कुछ उलझी सुलझी सूचनाएं मात्र हैं। दूसरे शब्दों में कहें ऋग्वेद आज से 5000 साल से कुछ पहले से आरंभ करके 4000 साल पहले तक की घटनाओं की जानकारी सुलभ कराता है। कृषि का आरंभ वेद के आरंभ से कम से कम 5000 साल पीछे जाता है। उस दीर्घ अतीत की सुनी सुनाई कहानियों का उपयोग वैदिक कवियों द्वारा किया गया है, परंतु इस दौर में समाज इतना बदल चुका है अर्थव्यवस्था इतनी आगे बढ़ चुकी है जिसका सही अनुमान लगभग असंभव है। आरंभ में जो समुदाय अपने श्रम, उद्यम, और अध्यवसाय के लिए जाना जाता था वह इस समय तक लगभग निकम्मा हो चुका था और दूसरों के श्रम और कौशल पर पल रहा था। यज्ञ जो पहले उत्पादन कार्य था अर्थात् कृषि उत्पादन था, वह कर्मकांड के दबाव में अपनी स्मृति तक हो चुका था। आडंबर ने यथार्थ को ओझल कर दिया था। इस पृष्ठभूमि से अवगत होने के बाद ही हम इन तीनों देवों की उद्भावना को समझ सकते हैं फिर भी यह तय नहीं कर सकते कि इस मिथकीकरण का काल क्या है।

ऋग्वेद के समय तक अग्नि का तीन रूपों में उपयोग हो रहा था। एक था झाड़ झंखाड़ की सफाई का, दूसरा कर्मकांडीय यज्ञ मे हव्यवाहन का, तीसरा उद्याेग और खनन से लेकर धातुशोधन। पहला किसानों की जरूरत थी और इसलिए इसके हवाले विरल हैं , दूसरा कर्मकांडियों की जिनके बीच से ही अधिकांश कवि आते थे इसलिए इसका बाहुल्य है,,। तीसरी उद्योग और कौशल से जुड़े जनों की जो सभी आसुरी या उस पृष्ठभूमि से आए थे जिनसे पहले वैदिक स्वामिवर्ग का विरोध था जो अब सैद्धांतिक विरोध तक सीमित रह गया था, अन्यथा वे विवश हो कर सहयोगी और सेवक की भूमिका में आ चुके थे।

ब्रह्मा
ऋग्वेद में ब्रह्म और ब्रह्मा का प्रयोग 1. अग्नि के लिए (ब्रह्मा च असि गृहपतिः च नो दमे), 2. यज्ञ के लिए (ब्रह्माणं ब्रह्मवाहसं); 3. पौरेहित्य करने वाले पदाधिकारियों में से उसके लिए जो पाठ की शुद्धता और पुरावृत्त का ज्ञान रखता था (ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां; यत्र ब्रह्मा पवमान छन्दस्यां वाचं वदन् ; ब्रह्मा च गिरो दधिरे समस्मिन् ); 4. स्तुति या प्रशस्तिगान के लिए (तुभ्यं ब्रह्माणि गिर इन्द्र.. ); 5. ब्राह्मण के लिए (तस्मै विशः स्वमेवा नमन्ते यस्मिन् ब्रह्मा राजनि पूर्व एति); 6. सिद्ध मंत्र के लिए जो सभी विपत्तियों से रक्षा कर सकता था और संकट से सकुशल पार करा सकता था, (ब्रह्माकर्म भृगवो न रथम् ; विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनम्); और 7. देवों में सर्वोपरि देव के लिए (ब्रह्मा देवानां पदवीः कवीनां ऋषिर्विप्राणां महिषो मृगणाम्, श्येनो गृध्राणां स्वधितिर्वनानां सोमः पवित्रं अत्येति रेभन्)[2].

इसका अर्थ है इस समय तक तीनों एक दूसरे से बड़े देवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश या महेन्द्र) की सत्ता कायम हो चुकी है, परन्तु ऋग्वेद से उस आदिम यथार्थ का परिचय नहीं मिल सकता, क्योंकि इस समय तक कर्मकांड का आडंबर पुरातन यथार्थ को समझने में बाधक था।

यज्ञ का शाब्दिक अर्थ है उत्पादन। यह वह यज्ञ है जिसे कुशल कर्म (कर्मसु कौशलम्) या श्रेष्ठतम कर्म (यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म) कहा गया है। यज्ञ से प्रजनन होता है (यज्ञात् वै प्रजप्रजायन्ते। इसमें कहीं विनाशकारी भूमिका के लिए छूट नहीं है, इसलिए यह दावा कि अग्नि ही यज्ञ है कर्मकांड की महिमा का परिणाम है। ब्रह्मा आदिम यज्ञ है, सृजन और उत्पादन है। परन्तु इसके लिए तृण-गुल्म-रहित भूभाग चाहिए। कृषि-धान्यों को भयावने जानवरों, हिरनोे से और लुंचक वनचरों से जिनका प्रकोप अँधेरा होते ही बढ़ जाता था, सुरक्षा चाहिए और इनको भगाने के लिए आग के लुकाठों और दहकते क्षेप्यास्त्रों की भूमिका स्पष्ट है इसलिए यज्ञ तो विष्णु न थे, पर अग्नि और उसके सभी रूप विष्णु थे। उनके इस कर्म पर ही पूरा संसार टिका था (व्यस्तभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीं अभितो मयूखैः)।

आदिम आहारसंग्रही समाज का उत्पादन से, ब्रह्मा से कोई विरोध नहीं। उनका विरोध कंद, मूल, फल, शाक और आखेट पर निर्भरता के कारण इनको जलाने वालों से था। उनके देवता रुद्र थे जो इसी कारण अग्नि के इस पर्यावरण विनाशी देवों, इसमें प्रवृत्त जनों और, उनके पालतू पशुओं का संहार करने वाले (गोघ्न, पूरुषघ्न) और यज्ञ के इस रूप के उच्छेदक (मखनाशन) हैं। उनकेउपासकों के इसी उपद्रव का शमन उनके निर्मम संहार से करने के लिए विष्णु को अवतार लेना पड़ता है। ब्रह्मा को यह कष्ट नहीं उठाना पड़ता यद्यपि सलाह देने के लिए वह सदा तैयार रहते हैं। संहारकारी प्रलय ज्वाला रुद्र के पास ही है जिसे दक्षक्रतु वैदिक धातुकर्मियों के चट्टानों को गलाने वाली आग का प्रतिरूप कहा जा सकता है। ऋग्वेद के समय तक रुद्र पशुपति बन जाते हैं, शंकर बन जाते हैं, उनके गण इन्द्र के सहायक बन जाते हैं यद्यपि इस लाचारी के समायोजन के बाद भी तनाव और टकराव बना रह जाता है और आज तक कायम है।
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[1] जनिता दिवो जनिता पृथिव्याः, ऋ. 8.36.4; पिता देवानां जनिता सुदक्षो विष्टम्भो दिवो धरुणः पृथिव्याः, 9.87.2; सोमः पवते जनिता मतीनां जनिता दिवो जनिता पृथिव्याः, जनिता अग्नेः ज निता सूर्यस्य जनिता इन्द्रस्य जनित उत विष्णोः, 9.96.5।
[2] ऋग्वेद का कितना गहरा असर गीता पर है इसे समझने के लिए इसे ध्यान से पढ़ना चाहिए।