Post – 2018-02-16

मैने कल कृषियज्ञ पर लिखते हुए उसमें पुरुष सूक्त को शामिल किया, कुछ ऋचाओं की व्याख्या भी की, फिर लगा आपाधापी में न तो विषय के साथ न्याय हो पाएगा, न सूक्त के साथ, इसलिए इस इरादे से कि इस पर कल लिखूंगा, जो लिखा था उसे काट दिया। कटे अंश को बचाना भी भूल गया। इस समय पुणे में हूं, अपनी पुस्तकें पहुंच से बाहर। सोचा इस पर इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री पर नजर डाली जाय जिस तरह की व्याख्यायें देखने को मिलीं उनसे मन खिन्न हो गय़ा। इतने विवादास्पद और भाषा की सरलता के बाद भी, सर्वाधिक चर्चित सूक्त के विषय में भी समझ का स्तर यह है तो वैदिक अध्ययन की दुर्दशा पर रोया ही जा सकता है। इसलिए मैं अपने विचार कुछ आधिकारिक तेवर से रखने लगूं तो अन्यथा न लें। पूरा लिख भी पाऊंगा, इसका विश्वास नहीं क्योकि इसकी पृष्ठभूमि को स्पष्ट करना बहुत जरूरी है।

Post – 2018-02-16

मैने कल कृषियज्ञ पर लिखते हुए उसमें पुरुष सूक्त को शामिल किया, कुछ ऋचाओं की व्याख्या भी की, फिर लगा आपाधापी में न तो विषय के साथ न्याय हो पाएगा, न सूक्त के साथ, इसलिए इस इरादे से कि इस पर कल लिखूंगा, जो लिखा था उसे काट दिया। कटे अंश को बचाना भी भूल गया। इस समय पुणे में हूं, अपनी पुस्तकें पहुंच से बाहर। सोचा इस पर इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री पर नजर डाली जाय जिस तरह की व्याख्यायें देखने को मिलीं उनसे मन खिन्न हो गय़ा। इतने विवादास्पद और भाषा की सरलता के बाद भी, सर्वाधिक चर्चित सूक्त के विषय में भी समझ का स्तर यह है तो वैदिक अध्ययन की दुर्दशा पर रोया ही जा सकता है। इसलिए मैं अपने विचार कुछ आधिकारिक तेवर से रखने लगूं तो अन्यथा न लें। पूरा लिख भी पाऊंगा, इसका विश्वास नहीं क्योकि इसकी पृष्ठभूमि को स्पष्ट करना बहुत जरूरी है।

Post – 2018-02-16

मैने कल कृषियज्ञ पर लिखते हुए उसमें पुरुष सूक्त को शामिल किया, कुछ ऋचाओं की व्याख्या भी की, फिर लगा आपाधापी में न तो विषय के साथ न्याय हो पाएगा, न सूक्त के साथ, इसलिए इस इरादे से कि इस पर कल लिखूंगा, जो लिखा था उसे काट दिया। कटे अंश को बचाना भी भूल गया। इस समय पुणे में हूं, अपनी पुस्तकें पहुंच से बाहर। सोचा इस पर इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री पर नजर डाली जाय जिस तरह की व्याख्यायें देखने को मिलीं उनसे मन खिन्न हो गय़ा। इतने विवादास्पद और भाषा की सरलता के बाद भी, सर्वाधिक चर्चित सूक्त के विषय में भी समझ का स्तर यह है तो वैदिक अध्ययन की दुर्दशा पर रोया ही जा सकता है। इसलिए मैं अपने विचार कुछ आधिकारिक तेवर से रखने लगूं तो अन्यथा न लें। पूरा लिख भी पाऊंगा, इसका विश्वास नहीं क्योकि इसकी पृष्ठभूमि को स्पष्ट करना बहुत जरूरी है।

Post – 2018-02-16

आज कष्ट कुछ बढ़ गया लगता है। लिख सका तो ठीक, नहीं तो कल।

Post – 2018-02-16

आज कष्ट कुछ बढ़ गया लगता है। लिख सका तो ठीक, नहीं तो कल।

Post – 2018-02-16

आज कष्ट कुछ बढ़ गया लगता है। लिख सका तो ठीक, नहीं तो कल।

Post – 2018-02-15

कार्यविभाजन का उदय

क्या आपने प्रसाद बांटा है, या सदावर्त या लंगर का नाम सुना है? कितना बेतुका सवाल है, कम से कम भारत में! परन्तु यदि कहूं कि, किसी रहस्यमय तरीके से, यह उस आदिम चरण का अवशेष है जिस आदिम अवस्था में आज आदिम कहे जाने वाले आटविक समाज तक नहीं हैं, तो शायद आप के कान खड़े हो जायं। यह अकेला अवशेष नहीं है, जो दसियों हजार साल की दूरियां पार करके आज तक हमारे सांस्कृतिक जीवन का अंग बना हुआ है। ऐसे अनेक अवशेष हैं जिन पर उपभोक्तावादी अपसंस्कृति के कारण – जो कुछ है सब मेरे लिए, किसी अन्य के लिए कुछ भी नहीं, जिसकी तार्किक परिणति है, पास बहुत कुछ होते हुए, अपने असहाय बन चुके माता पिता तक के लिए कुछ भी नहीं, जिसके आरंभिक लक्षण प्रकट होने लगे है, सर्वमान्य या बहुमान्य अपमूल्य बन जाना बाकी है – पहली बार मारक प्रहार हो रहा है। अतिथि सत्कार, बयना वितरण, विवाह या शोक के अवसर पर स्वजनों द्वारा नेग या अंशदान आदि सभी ऐसे ही अवशेष हैं। इनके विस्तार में न जाऊंगा, पर जब मैं कहता हूं, हम अपने वर्तमान में सहस्राब्दियां जीते हैं, तो उसके पीछे यही समाजबोध होता है। इससे मिलती जुलती बात ईलियट ने ट्रैडिशन ऐंड इनडिविजुअल टैलेंट में कही थीः
The historical sense compels a man to write not merely with his own generation in his bones but with a feeling that whole of the literature of Europe from Homer and within it the whole of the literature of his own country has a simultaneous existence and composes a simultaneous order.

जब पढ़ा था तब समझ नहीं पाया था। मेरी बात संभव है जो ईलियट को समझ गए हों उनकी समझ में न आए।

पुराणों में आहार संग्रह के उस आदिम चरण को, जिसके ये अवशेष हैं, जिस रूप में चित्रित किया गया है, उससे लगता है मनुष्य का जीवन दूसरे जानवरों से भिन्न नहीं था। उसको स्वच्छता का, नैतिकता का ध्यान न था या किसी तरह का दूसरा प्रतिबन्ध न था। स्त्री पुरुष पशुवत संकोचहीन भाव से व्यवहार करते थे। उदरपूर्ति के लिए वे पूरी तरह प्रकृति के उत्पाद पर निर्भर थे, जो आरंभ में उनकी संख्या को देखते हुए पर्याप्त था। परन्तु संख्यावृद्धि के कारण प्राकृतिक साधनों का अतिदोहन आरंभ हुआ तो जिस मुख्य ओषधि (कल्पलता) पर वे निर्भर करते थे उसके तैयार होने से पहले नोच खसोट कर खाने लगे जिससे वह औषधि लुप्त हो गई। संभवत: इसके बाद वे उन वन्य अनाजों की ओर मुड़े। परन्तु यहां भी वही संकट पैदा हुआ। अब उन बीजों तक का लाला पड़ गया, जो पक कर झर जाते थे और जिनसे उपयुक्त ऋतु में वे उगते, बढ़ते, फूलते और फलते थे।

इसे प्रतीक भाषा में कहा गया है कि धरती ने ओषधियों को अपने भीतर छिपा लिया। अब धरती को गाय बना कर और मनु को बछड़ा बना कर दुहने या कृषि के आरभ की बात की गई है।

कृषि के आरंभ को कई दूसरी कथाओं में चित्रित किया गया है, जिनमें इसे यज्ञ के रूप में प्रतीकबद्ध किया गया है। यज्ञ की वेदी कृषिभूमि, या उर्वरा भूमि है। इसी पर सबका जीवन निर्भर करता है इसलिए यह जगत की नाभि है अर्थात् सारा कार्य व्यापार कृषिकर्म से जुड़ा हुआ है। कृषि के लिए धरती को तीन या चार अंगुल की गहराई तक जोतते हैं इसलिए वेदी की ऊंचाई तीन या चार अंगुल होना चाहिए। इस यज्ञ रूपक को बलि और वामन की कथा में भी चित्रत किया गया। वेदी धरती के अन्त तक, जहां तक खेती हो सकती है, फैली हुई है इसलिए यज्ञ के लिए भूमि देने के साथ ही दाता ने सारी पृथ्वी दे डाली:
पृच्छामि त्वा परमन्तं पृथिव्या: पृच्छामि यत्र भुवनस्य नाभि:।…
इयं वेदि: परो अन्त: पृथिव्या: अयं यज्ञो अस्य भुवनस्य नाभि:।। ऋ. १.१६४.३४, ३५

यही कथा ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में दुहराई गई है। ध्यान रहे, यज्ञ को ही विष्णु कहा गया है। यज्ञो वै विष्णु: । यदि बलि और बामन कथा का अब पाठ करें तो विष्णु वामन का रूप धर कर यज्ञ के लिए जगह मांगने नहीं गया था, यज्ञ स्वयं अपने लिए जगह मांगने गया था। कारण उसी कथा में आता है कि विष्णु गायब हो गया। लोग हक्काबक्का हो कर पूछने लगे, विष्णु कहां चला गया। फिर यह स मझ में आता है कि वह ओषधियों की जड़ों मे छिप गया है, और इसके बाद धरती को खोद खोद कर उसे पाया जाता है – खनन्तं खनन्तं इव अन्वीयुः।

पुरुष सूक्त में बलि कथा का विष्णु परम पुरुष बन जाता है और उसी से पूरी सृष्टि पैदा होती है। रोचक है कि बलि कथा का वामन पुरुष सूक्त में भी दशांगुल ही रहता है। यज्ञ की वेदी पृथ्वी का परम अन्त है तो ये दशांगुल जी भूमि को समग्रतः घेरे हुए हैं। इस सूक्त में पुन: वही दुहराव है। यज्ञ से सृष्टि होती है । उसी से चारों वर्णों की उत्पत्ति हुई ।

हम यहां कुछ तथ्यों को रेखांकित करना चाहेंगे:
१. आहार संचय की अवस्था और कृषि के आरंभ का पौराणिक विवरण नृतत्व की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है।

२. जिस बात का हमने जिक्र नहीं किया और जिसका बहुत स्पष्ट उल्लेख वायु पुराण में है, कि कृषि के आरंभ के बाद क्रमश: लोभ, लाभ के चक्कर में निजी संपदा में बढ़त के अनुरूप आर्थिक विषमता बढ़ती गई और इस विषमता के अनुरूप ही आदिम सतयुग का ह्रास घटित होता रहा जो कलि में अपनी ऐसी पराकाष्ठा पर पहुंच जाएगा कि विनाश की स्थिति उत्पन्न हो जाय।

३. कृषि की सूझ के साथ ही सतयुग के समरस समाज में विभाजन आरंभ होता है जिसमें कृत्रिम उत्पादन की सूझ वाले चन्द लोगों को प्रकृति से एकात्म्य रखने वाले, धरती को और वनस्पतियों को मां जैसा स्नेह और सम्मान देने वाले बहुजन के प्रकोप का भाजन बनना पड़ता है। वे जहां भी जाकर आग से झाड़ झंखाड़ जला कर खेती का उपक्रम करते हैं, उन्हें मार कर भगा दिया जाता है इसके बाद भी वे अपने प्रयोग से इतने उत्साहित हैं कि इसे छोड़ने को तैयार नहीं।

४. हम काफी पहले की पोस्टों में यह कह आए हैं कि ब्रह्म (बरम), और देव का अर्थ आग है, और कृषि कर्मियों को ब्रह्मन् या देव (आग लगाने वाले) की संज्ञा संभवत: प्रकृतिपूजक (असुर या अनुत्पादक) समाज ने दी थी, जिसकी ही इतर संज्ञाएं राक्षस (रक्षक, प्रकृति की रक्षा करने वाले), और उदार भाव से अपना जुटाया दूसरों को देने की तत्परता के कारण, दनु या दानव थीं। आर्य एकमात्र कृषिकर्म से जुड़ी संज्ञा है, पर कब या किस चरण से इसका व्यवहार आरंभ हुआ यह हम निश्चयपूर्वक कहने की स्थिति में नहीं हैं। विश कृषिकर्म के कारण घुमन्तू जीवन से हट कर स्थायी निवास अपनाने के कारण पड़ा। कहें कृषिकर्म की ओर अग्रसर होने वाले समाज के ही पर्याय देव, ब्राह्मण, विश और आर्य था ।
अब वर्णव्यवस्था और देव विश और आसुरी प्रजा पर हम अपनी बात कल कुछ स्पष्टता से रख पाएंगे।

(मैने कल लेख में पुरुषसूक्त को भी शामिल किया था। उसकी विस्तार से व्याख्या जरूरी है। वह काम आज करूंगा, इसलिए उसे हटा लिया है।)

Post – 2018-02-15

कार्यविभाजन का उदय

क्या आपने प्रसाद बांटा है, या सदावर्त या लंगर का नाम सुना है? कितना बेतुका सवाल है, कम से कम भारत में! परन्तु यदि कहूं कि, किसी रहस्यमय तरीके से, यह उस आदिम चरण का अवशेष है जिस आदिम अवस्था में आज आदिम कहे जाने वाले आटविक समाज तक नहीं हैं, तो शायद आप के कान खड़े हो जायं। यह अकेला अवशेष नहीं है, जो दसियों हजार साल की दूरियां पार करके आज तक हमारे सांस्कृतिक जीवन का अंग बना हुआ है। ऐसे अनेक अवशेष हैं जिन पर उपभोक्तावादी अपसंस्कृति के कारण – जो कुछ है सब मेरे लिए, किसी अन्य के लिए कुछ भी नहीं, जिसकी तार्किक परिणति है, पास बहुत कुछ होते हुए, अपने असहाय बन चुके माता पिता तक के लिए कुछ भी नहीं, जिसके आरंभिक लक्षण प्रकट होने लगे है, सर्वमान्य या बहुमान्य अपमूल्य बन जाना बाकी है – पहली बार मारक प्रहार हो रहा है। अतिथि सत्कार, बयना वितरण, विवाह या शोक के अवसर पर स्वजनों द्वारा नेग या अंशदान आदि सभी ऐसे ही अवशेष हैं। इनके विस्तार में न जाऊंगा, पर जब मैं कहता हूं, हम अपने वर्तमान में सहस्राब्दियां जीते हैं, तो उसके पीछे यही समाजबोध होता है। इससे मिलती जुलती बात ईलियट ने ट्रैडिशन ऐंड इनडिविजुअल टैलेंट में कही थीः
The historical sense compels a man to write not merely with his own generation in his bones but with a feeling that whole of the literature of Europe from Homer and within it the whole of the literature of his own country has a simultaneous existence and composes a simultaneous order.

जब पढ़ा था तब समझ नहीं पाया था। मेरी बात संभव है जो ईलियट को समझ गए हों उनकी समझ में न आए।

पुराणों में आहार संग्रह के उस आदिम चरण को, जिसके ये अवशेष हैं, जिस रूप में चित्रित किया गया है, उससे लगता है मनुष्य का जीवन दूसरे जानवरों से भिन्न नहीं था। उसको स्वच्छता का, नैतिकता का ध्यान न था या किसी तरह का दूसरा प्रतिबन्ध न था। स्त्री पुरुष पशुवत संकोचहीन भाव से व्यवहार करते थे। उदरपूर्ति के लिए वे पूरी तरह प्रकृति के उत्पाद पर निर्भर थे, जो आरंभ में उनकी संख्या को देखते हुए पर्याप्त था। परन्तु संख्यावृद्धि के कारण प्राकृतिक साधनों का अतिदोहन आरंभ हुआ तो जिस मुख्य ओषधि (कल्पलता) पर वे निर्भर करते थे उसके तैयार होने से पहले नोच खसोट कर खाने लगे जिससे वह औषधि लुप्त हो गई। संभवत: इसके बाद वे उन वन्य अनाजों की ओर मुड़े। परन्तु यहां भी वही संकट पैदा हुआ। अब उन बीजों तक का लाला पड़ गया, जो पक कर झर जाते थे और जिनसे उपयुक्त ऋतु में वे उगते, बढ़ते, फूलते और फलते थे।

इसे प्रतीक भाषा में कहा गया है कि धरती ने ओषधियों को अपने भीतर छिपा लिया। अब धरती को गाय बना कर और मनु को बछड़ा बना कर दुहने या कृषि के आरभ की बात की गई है।

कृषि के आरंभ को कई दूसरी कथाओं में चित्रित किया गया है, जिनमें इसे यज्ञ के रूप में प्रतीकबद्ध किया गया है। यज्ञ की वेदी कृषिभूमि, या उर्वरा भूमि है। इसी पर सबका जीवन निर्भर करता है इसलिए यह जगत की नाभि है अर्थात् सारा कार्य व्यापार कृषिकर्म से जुड़ा हुआ है। कृषि के लिए धरती को तीन या चार अंगुल की गहराई तक जोतते हैं इसलिए वेदी की ऊंचाई तीन या चार अंगुल होना चाहिए। इस यज्ञ रूपक को बलि और वामन की कथा में भी चित्रत किया गया। वेदी धरती के अन्त तक, जहां तक खेती हो सकती है, फैली हुई है इसलिए यज्ञ के लिए भूमि देने के साथ ही दाता ने सारी पृथ्वी दे डाली:
पृच्छामि त्वा परमन्तं पृथिव्या: पृच्छामि यत्र भुवनस्य नाभि:।…
इयं वेदि: परो अन्त: पृथिव्या: अयं यज्ञो अस्य भुवनस्य नाभि:।। ऋ. १.१६४.३४, ३५

यही कथा ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में दुहराई गई है। ध्यान रहे, यज्ञ को ही विष्णु कहा गया है। यज्ञो वै विष्णु: । यदि बलि और बामन कथा का अब पाठ करें तो विष्णु वामन का रूप धर कर यज्ञ के लिए जगह मांगने नहीं गया था, यज्ञ स्वयं अपने लिए जगह मांगने गया था। कारण उसी कथा में आता है कि विष्णु गायब हो गया। लोग हक्काबक्का हो कर पूछने लगे, विष्णु कहां चला गया। फिर यह स मझ में आता है कि वह ओषधियों की जड़ों मे छिप गया है, और इसके बाद धरती को खोद खोद कर उसे पाया जाता है – खनन्तं खनन्तं इव अन्वीयुः।

पुरुष सूक्त में बलि कथा का विष्णु परम पुरुष बन जाता है और उसी से पूरी सृष्टि पैदा होती है। रोचक है कि बलि कथा का वामन पुरुष सूक्त में भी दशांगुल ही रहता है। यज्ञ की वेदी पृथ्वी का परम अन्त है तो ये दशांगुल जी भूमि को समग्रतः घेरे हुए हैं। इस सूक्त में पुन: वही दुहराव है। यज्ञ से सृष्टि होती है । उसी से चारों वर्णों की उत्पत्ति हुई ।

हम यहां कुछ तथ्यों को रेखांकित करना चाहेंगे:
१. आहार संचय की अवस्था और कृषि के आरंभ का पौराणिक विवरण नृतत्व की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है।

२. जिस बात का हमने जिक्र नहीं किया और जिसका बहुत स्पष्ट उल्लेख वायु पुराण में है, कि कृषि के आरंभ के बाद क्रमश: लोभ, लाभ के चक्कर में निजी संपदा में बढ़त के अनुरूप आर्थिक विषमता बढ़ती गई और इस विषमता के अनुरूप ही आदिम सतयुग का ह्रास घटित होता रहा जो कलि में अपनी ऐसी पराकाष्ठा पर पहुंच जाएगा कि विनाश की स्थिति उत्पन्न हो जाय।

३. कृषि की सूझ के साथ ही सतयुग के समरस समाज में विभाजन आरंभ होता है जिसमें कृत्रिम उत्पादन की सूझ वाले चन्द लोगों को प्रकृति से एकात्म्य रखने वाले, धरती को और वनस्पतियों को मां जैसा स्नेह और सम्मान देने वाले बहुजन के प्रकोप का भाजन बनना पड़ता है। वे जहां भी जाकर आग से झाड़ झंखाड़ जला कर खेती का उपक्रम करते हैं, उन्हें मार कर भगा दिया जाता है इसके बाद भी वे अपने प्रयोग से इतने उत्साहित हैं कि इसे छोड़ने को तैयार नहीं।

४. हम काफी पहले की पोस्टों में यह कह आए हैं कि ब्रह्म (बरम), और देव का अर्थ आग है, और कृषि कर्मियों को ब्रह्मन् या देव (आग लगाने वाले) की संज्ञा संभवत: प्रकृतिपूजक (असुर या अनुत्पादक) समाज ने दी थी, जिसकी ही इतर संज्ञाएं राक्षस (रक्षक, प्रकृति की रक्षा करने वाले), और उदार भाव से अपना जुटाया दूसरों को देने की तत्परता के कारण, दनु या दानव थीं। आर्य एकमात्र कृषिकर्म से जुड़ी संज्ञा है, पर कब या किस चरण से इसका व्यवहार आरंभ हुआ यह हम निश्चयपूर्वक कहने की स्थिति में नहीं हैं। विश कृषिकर्म के कारण घुमन्तू जीवन से हट कर स्थायी निवास अपनाने के कारण पड़ा। कहें कृषिकर्म की ओर अग्रसर होने वाले समाज के ही पर्याय देव, ब्राह्मण, विश और आर्य था ।
अब वर्णव्यवस्था और देव विश और आसुरी प्रजा पर हम अपनी बात कल कुछ स्पष्टता से रख पाएंगे।

(मैने कल लेख में पुरुषसूक्त को भी शामिल किया था। उसकी विस्तार से व्याख्या जरूरी है। वह काम आज करूंगा, इसलिए उसे हटा लिया है।)

Post – 2018-02-15

कार्यविभाजन का उदय

क्या आपने प्रसाद बांटा है, या सदावर्त या लंगर का नाम सुना है? कितना बेतुका सवाल है, कम से कम भारत में! परन्तु यदि कहूं कि, किसी रहस्यमय तरीके से, यह उस आदिम चरण का अवशेष है जिस आदिम अवस्था में आज आदिम कहे जाने वाले आटविक समाज तक नहीं हैं, तो शायद आप के कान खड़े हो जायं। यह अकेला अवशेष नहीं है, जो दसियों हजार साल की दूरियां पार करके आज तक हमारे सांस्कृतिक जीवन का अंग बना हुआ है। ऐसे अनेक अवशेष हैं जिन पर उपभोक्तावादी अपसंस्कृति के कारण – जो कुछ है सब मेरे लिए, किसी अन्य के लिए कुछ भी नहीं, जिसकी तार्किक परिणति है, पास बहुत कुछ होते हुए, अपने असहाय बन चुके माता पिता तक के लिए कुछ भी नहीं, जिसके आरंभिक लक्षण प्रकट होने लगे है, सर्वमान्य या बहुमान्य अपमूल्य बन जाना बाकी है – पहली बार मारक प्रहार हो रहा है। अतिथि सत्कार, बयना वितरण, विवाह या शोक के अवसर पर स्वजनों द्वारा नेग या अंशदान आदि सभी ऐसे ही अवशेष हैं। इनके विस्तार में न जाऊंगा, पर जब मैं कहता हूं, हम अपने वर्तमान में सहस्राब्दियां जीते हैं, तो उसके पीछे यही समाजबोध होता है। इससे मिलती जुलती बात ईलियट ने ट्रैडिशन ऐंड इनडिविजुअल टैलेंट में कही थीः
The historical sense compels a man to write not merely with his own generation in his bones but with a feeling that whole of the literature of Europe from Homer and within it the whole of the literature of his own country has a simultaneous existence and composes a simultaneous order.

जब पढ़ा था तब समझ नहीं पाया था। मेरी बात संभव है जो ईलियट को समझ गए हों उनकी समझ में न आए।

पुराणों में आहार संग्रह के उस आदिम चरण को, जिसके ये अवशेष हैं, जिस रूप में चित्रित किया गया है, उससे लगता है मनुष्य का जीवन दूसरे जानवरों से भिन्न नहीं था। उसको स्वच्छता का, नैतिकता का ध्यान न था या किसी तरह का दूसरा प्रतिबन्ध न था। स्त्री पुरुष पशुवत संकोचहीन भाव से व्यवहार करते थे। उदरपूर्ति के लिए वे पूरी तरह प्रकृति के उत्पाद पर निर्भर थे, जो आरंभ में उनकी संख्या को देखते हुए पर्याप्त था। परन्तु संख्यावृद्धि के कारण प्राकृतिक साधनों का अतिदोहन आरंभ हुआ तो जिस मुख्य ओषधि (कल्पलता) पर वे निर्भर करते थे उसके तैयार होने से पहले नोच खसोट कर खाने लगे जिससे वह औषधि लुप्त हो गई। संभवत: इसके बाद वे उन वन्य अनाजों की ओर मुड़े। परन्तु यहां भी वही संकट पैदा हुआ। अब उन बीजों तक का लाला पड़ गया, जो पक कर झर जाते थे और जिनसे उपयुक्त ऋतु में वे उगते, बढ़ते, फूलते और फलते थे।

इसे प्रतीक भाषा में कहा गया है कि धरती ने ओषधियों को अपने भीतर छिपा लिया। अब धरती को गाय बना कर और मनु को बछड़ा बना कर दुहने या कृषि के आरभ की बात की गई है।

कृषि के आरंभ को कई दूसरी कथाओं में चित्रित किया गया है, जिनमें इसे यज्ञ के रूप में प्रतीकबद्ध किया गया है। यज्ञ की वेदी कृषिभूमि, या उर्वरा भूमि है। इसी पर सबका जीवन निर्भर करता है इसलिए यह जगत की नाभि है अर्थात् सारा कार्य व्यापार कृषिकर्म से जुड़ा हुआ है। कृषि के लिए धरती को तीन या चार अंगुल की गहराई तक जोतते हैं इसलिए वेदी की ऊंचाई तीन या चार अंगुल होना चाहिए। इस यज्ञ रूपक को बलि और वामन की कथा में भी चित्रत किया गया। वेदी धरती के अन्त तक, जहां तक खेती हो सकती है, फैली हुई है इसलिए यज्ञ के लिए भूमि देने के साथ ही दाता ने सारी पृथ्वी दे डाली:
पृच्छामि त्वा परमन्तं पृथिव्या: पृच्छामि यत्र भुवनस्य नाभि:।…
इयं वेदि: परो अन्त: पृथिव्या: अयं यज्ञो अस्य भुवनस्य नाभि:।। ऋ. १.१६४.३४, ३५

यही कथा ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में दुहराई गई है। ध्यान रहे, यज्ञ को ही विष्णु कहा गया है। यज्ञो वै विष्णु: । यदि बलि और बामन कथा का अब पाठ करें तो विष्णु वामन का रूप धर कर यज्ञ के लिए जगह मांगने नहीं गया था, यज्ञ स्वयं अपने लिए जगह मांगने गया था। कारण उसी कथा में आता है कि विष्णु गायब हो गया। लोग हक्काबक्का हो कर पूछने लगे, विष्णु कहां चला गया। फिर यह स मझ में आता है कि वह ओषधियों की जड़ों मे छिप गया है, और इसके बाद धरती को खोद खोद कर उसे पाया जाता है – खनन्तं खनन्तं इव अन्वीयुः।

पुरुष सूक्त में बलि कथा का विष्णु परम पुरुष बन जाता है और उसी से पूरी सृष्टि पैदा होती है। रोचक है कि बलि कथा का वामन पुरुष सूक्त में भी दशांगुल ही रहता है। यज्ञ की वेदी पृथ्वी का परम अन्त है तो ये दशांगुल जी भूमि को समग्रतः घेरे हुए हैं। इस सूक्त में पुन: वही दुहराव है। यज्ञ से सृष्टि होती है । उसी से चारों वर्णों की उत्पत्ति हुई ।

हम यहां कुछ तथ्यों को रेखांकित करना चाहेंगे:
१. आहार संचय की अवस्था और कृषि के आरंभ का पौराणिक विवरण नृतत्व की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है।

२. जिस बात का हमने जिक्र नहीं किया और जिसका बहुत स्पष्ट उल्लेख वायु पुराण में है, कि कृषि के आरंभ के बाद क्रमश: लोभ, लाभ के चक्कर में निजी संपदा में बढ़त के अनुरूप आर्थिक विषमता बढ़ती गई और इस विषमता के अनुरूप ही आदिम सतयुग का ह्रास घटित होता रहा जो कलि में अपनी ऐसी पराकाष्ठा पर पहुंच जाएगा कि विनाश की स्थिति उत्पन्न हो जाय।

३. कृषि की सूझ के साथ ही सतयुग के समरस समाज में विभाजन आरंभ होता है जिसमें कृत्रिम उत्पादन की सूझ वाले चन्द लोगों को प्रकृति से एकात्म्य रखने वाले, धरती को और वनस्पतियों को मां जैसा स्नेह और सम्मान देने वाले बहुजन के प्रकोप का भाजन बनना पड़ता है। वे जहां भी जाकर आग से झाड़ झंखाड़ जला कर खेती का उपक्रम करते हैं, उन्हें मार कर भगा दिया जाता है इसके बाद भी वे अपने प्रयोग से इतने उत्साहित हैं कि इसे छोड़ने को तैयार नहीं।

४. हम काफी पहले की पोस्टों में यह कह आए हैं कि ब्रह्म (बरम), और देव का अर्थ आग है, और कृषि कर्मियों को ब्रह्मन् या देव (आग लगाने वाले) की संज्ञा संभवत: प्रकृतिपूजक (असुर या अनुत्पादक) समाज ने दी थी, जिसकी ही इतर संज्ञाएं राक्षस (रक्षक, प्रकृति की रक्षा करने वाले), और उदार भाव से अपना जुटाया दूसरों को देने की तत्परता के कारण, दनु या दानव थीं। आर्य एकमात्र कृषिकर्म से जुड़ी संज्ञा है, पर कब या किस चरण से इसका व्यवहार आरंभ हुआ यह हम निश्चयपूर्वक कहने की स्थिति में नहीं हैं। विश कृषिकर्म के कारण घुमन्तू जीवन से हट कर स्थायी निवास अपनाने के कारण पड़ा। कहें कृषिकर्म की ओर अग्रसर होने वाले समाज के ही पर्याय देव, ब्राह्मण, विश और आर्य था ।
अब वर्णव्यवस्था और देव विश और आसुरी प्रजा पर हम अपनी बात कल कुछ स्पष्टता से रख पाएंगे।

(मैने कल लेख में पुरुषसूक्त को भी शामिल किया था। उसकी विस्तार से व्याख्या जरूरी है। वह काम आज करूंगा, इसलिए उसे हटा लिया है।)

Post – 2018-02-14

भारतीय समाज

हमारी समस्याओं का जवाब किसी किताब में नहीं लिखा है, उनसे कुछ दृष्टियों से मिलती-जुलती समस्याओं के जवाब अवश्य किताबों में मिल जाएंगे। जरूरी नहीं कि वे सही हों या पूरे हों। हमारी समस्याएं, दूसरों से भिन्न होती हैं, और इनका समाधान हमें ही ढूंढ़ना होता है। जरूरी नहीं कि जो समाधान हम तलाशें वे सही हों, या उनके परिणाम हमारी अपेक्षा के अनुरूप हों।

इतिहास में समाधान केवल समझ के स्तर पर होता है। गुत्थियों के सलझने के रूप में। अंधेरे में रौशनी पड़ने की तरह। इसका आरंभ छूटी हुई कड़ियों की तलाश या उपलब्ध समाधानों के बेतुकेपन की पहचान और इस जिज्ञासा से होता है कि क्या ऐसा हुआ हो सकता है? यदि नहीं तो क्या रहा हो सकता है? या जो बेतुका लगते हुए भी वास्तविकता है वह किन परिस्थितियों में संभव हुआ हो सकता है?

हमारा प्रश्न यह है कि यदि आर्य विरुद वाला समुदाय इतना डरा हुआ था, तो सभी प्रकार की संपदाओं पर उन्होंने ऐसा अधिकार कैसे कर लिया कि अपने से ताकतवर वर्ण को भी अपना उपजीवी बना कर रख सकें, या अपने से अधिक चालाक लोगों को अपना आश्रित बना कर रख सकें? इससे भी रोचक यह कि जो उसके आश्रित या उपजीवी हैं, वे सामाजिक हैसियत में उसे अपने से नीचा समझें और उसे स्वयं भी इस पर आपत्ति न हो । इन प्रश्नों से गुजरे बिना हम भारतीय समाज-रचना की जटिलता को नहीं समझ सकते, न वर्ण व्यवस्था कि उस अतिजीविता को समझ सकते हैं जो धर्म बदलने के बाद भी चेतना में बनी रहती है।

इस विषय में हमें सबसे महत्वपूर्ण सूचना पुरावृत्तों से मिलती है जो पुराणों के अतिरिक्त दूसरे प्राचीन ग्रन्थों में मिलते हैं। यह दुखद है कि पाश्चात्य इतिहासकारों द्वारा इतिहास के नाम पर किए जा रहे अनर्थ को सबसे कड़ी चुनौता इन पुरावृत्तों से मिलती है इसलिए इनकी विश्वसनीयता को नष्ट करके इन्हें निष्प्रभाव कर दिया गया।

पर पौराणिक इतिवृत्त को मैं यदि पाश्चात्य इतिहासकारों द्वारा लिखे या उनके अनुकरण में लिखे गए भारतीय इतिहास से अधिक भरोसे का मानता हूं तो इसलिए नहीं कि कालांकित और तथ्यपरक इतिहास से मुझे चिढ़ है, बल्कि इसलिए कि इसकी आड़ में कुत्सित राजनीति की जाती रही है और ध्यान शासकों पर अधिक रहा, समाज को ओझल कर दिया गया और ऊपर से एक और सीमा यह भी कि इसकी परिधि में हमारे अतीत का एक लघु काल-प्रसार ही आ पाता है।

पुराण इतिहास नहीं हैं परंतु उसका प्रसार इतना लंबा हि यह अपनी कल्पना में प्रथम मानव तक पहुंच जाता है, मोटे तौर पर यह वहां तक के जातीय अनुभव का एकमात्र स्रोत है जहां से लेखन का उपयोग सामान्य कामकाज में होने लगता है, और लिखित सामग्री इतिहास लेखन का स्रोत बन जाती है।

यह सच है कि इनमें अतिरंजना और मुक्त कल्पनाशीलता से अधिक काम लिया गया है, फिर भी वह बिना किसी आयास के पकड़ में आ जाती है, इसलिए उससे कोई हानि नहीं होती। इसका यथालिखित पाठ भटकानेवाला जरूर है, पर कथा का नाभिकीय सत्य अकाट्य है। उससे किसी राजा महाराजा के जीवन और कृतित्व पर प्रकाश नहीं पड़ता, अपितु समाज किन अनुभवों हे गुजरा है, इस पर प्रकाश पड़ता है।

पुराणों में लिंग और वर्ण के पूर्वाग्रह उस तरह काम नहीं करते जैसे स्मृतियों में और अपर पक्ष के सद्गुणों का उल्लेख तो किया ही गया है अपनी कमियों पर भी उंगली उठाई गई है, इसलिए इनमें अपेक्षाकृत अधिक वस्तुपरकता पाई जाती है।

भारतीय समाज की निर्मिति में कितनी जातीयताओं का योगदान है, इसका ठीक ठीक अनुमान हम नहीं लगा सकते। स्पष्ट कर दें कि यहां मैं जातीयता का प्रयोग भाषाई समुदाय के लिए कर रहा हूं। जिस चरण पर इनका जमाव उस भौगोलिक क्षेत्र के किसी न किसी अंचल में हुआ जिसके लिए आज दक्षिण एशिया का प्रयोग होता है, इनकी संख्या क्या थी, यह हम नहीं तय कर सकते, परन्तु इतना निश्चय के साथ कह सकते हैं कि यह संख्या तीन या चार नहीं थी, न ही भारत में आज व्यवहार में आने वाली बोलियों के कोई आद्य रूप थे जिनके ह्रास से वे बोलियां पैदा हुईं, जिनको विशेष परिवारों में बांट कर रखा गया है।

तुलनात्मक भाषाविज्ञान राजनीति का रौरव नरक और प्रकांड पंडितों की नासमझी का अखाड़ा है जिन्हें केवल एक जिद ने कि वे अपने अध्यवसाय और बुद्धिबल से यह सिद्ध करके दिखा देंगे कि समस्त ज्ञान विज्ञान यूरोप से पूरे एशिया में फैला है, उन्हे कूड़े की देदीप्यमान ढेरियों में बदल दिया। अमूल्य सूचनाओं के भंडार, पर व्यर्थ।

इतने प्रकांड विद्वानों के प्रति जिनका शिष्य होना तक मुझ जैसे अगण्य के लिए सौभाग्य की बात हो, इतनी कठोर टिप्पणी करने का दुस्साहस मैं इसलिए कर बैठा क्योंकि वे अपने ही प्रतिपादित सिद्धांत से उल्टा काम कर रहे थे कि मानक भाषाएं अनेकानेक बोलियों में से किसी एक के किन्हीं कारणों से प्रमुखता पाने के कारण क्रमिक उत्थान से अस्तित्व में आती हैं, न कि बोलियां किसी मानक भाषा के क्षरण से पैदा होती हैं।

अब यदि हम तथाकथित आर्य भाषाओं/ बोलियों में किसी एक ही वस्तु के लिए, मिसाल के लिए पांव के लिए प्रयुक्त – पांव/पद/पैर, गोड़/गड/डग, लात, *लग/लंग (हिं लंगी लगाना, लंगड़ा, अं. लेग) – पर्यायों पर ध्यान दें तो ही समझ सकते हैं कि प्रत्येक बोली के गठन में कितनी जातीयताओं का हाथ है। इसमें एक ही शब्द के जो रूपभेद हैं उनके पीछे भी इतर भाषाई प्रभाव है।

आहार संग्रह के चरण पर इनके जत्थे जगह जगह अपने से भिन्न भाषाई समुदाय के बीच पहुंच चुके थे और इस तरह सबमें बहुतेरे मिले हुए थे, इसकी क्षीण चेतना हमारी परंपरा में मिलती है। यहां नस्ली भेद की जगह सभी एक ही प्रजापति की संतानें हैं। प्रजापति के अनेकानेक अर्थ लिए गए हैं जिसके अनुसार प्राकृतिक परिवेश भी प्रजापति है – जो प्रजा का पालन करता है वह प्रजापति। जिनसे दुश्मनी है वे भी अपने ही सौतेले भाई या सपत्न हैं। पिता एक, माताएं भिन्न। अन्तर मान्यताओं का, न कि रक्त का। एक देव, तो दूसरा दनुज/दानव। दनुज क्यों, क्योंकि इनका धर्म था आदिम अवस्था का मिल बांट कर खाना, जो अपने पास है दूसरे के मांगने या उसके पास न होने की दशा में मुक्त भाव से देना।

दानवों की कहानियां दानशीलता की कहानियां हैं, देवों की कहानियां छल क्षद्म से अपहरण और विश्वासघात की कहानियां। इस सवाल को लेकर जो कथाएं रची गई हैं उनके झमेले पड़े बिना हम कह सकते हैं कि पौराणिक इतिहास की सही समझ हमारे सामाजिक सौहार्द की नींव बन सकती है। यहां देव परंपरा या जिसे कुछ लोग हड़बड़ी और दिमाग की गड़बड़ी में ब्राह्मणवादी परंपरा कह सकते हैं, उसमें ज्ञान के मामले में देवगुरु बृहस्पति से कम सम्मान असुरगुरु शुक्राचार्य का नहीं है।

अब इस सर्वविदित पृष्ठभूमि को समझ लेने के बाद हमारे लिए आगे के विकास और टकराव को समझने में आसानी होगी।