Post – 2017-01-10

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास -8

कुछ लोग प्राचीन वैदिक भूभाग को ईरान से ले कर भारत तक विस्तृत मानते हैं और इसका राजनीतिक प्रयोग इस रूप में करते हैं कि ये भाग धीरे धीर हमसे कटते गए और इस विभाजन की अन्तिम कड़ी 1947 के विभाजन को मानते हैं।हम अपने साक्ष्यों से इसका खंडन होते पाते हैं।

हम दिखा आये हैं कि सिन्धु के पार का पूरा भूभाग वैदिक प्रभाव और संस्कृत भाषा से वंचित था। आज भी पंजाबी में उस बोली का प्रभाव बना रह गया है जिसमें घोष महाप्राण ध्वनियां नहीं थीं। सिंधु सौवीर के आर्यावर्त से बाहर रहने के विश्‍वास का उल्लेख हम पीछे कर आए है। गांधारों ने या कहें गन्धर्वों ने अपनी पण्यवस्तुओं के बदले में वाणी का वरण किया और उनका उस पर इतना अच्छा अधिकार हो गया कि देवों को वाणी को वापस बुलाने के लिए गा बजा कर उसे रिझाना पड़ा या मानक उच्चारण उनसे सीखने की जरूरत पड़ने लगी।

यह उन आर्थिक गतिविधियों की प्रखरता से संभव हुआ जिसका सही अनुमान केवल हड़प्पा के पुरातात्विक प्रमाणों से नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि खनिज संपदा के दोहन के स्थलों और क्षेत्रों पर पुरातात्विक पहचान संभव नहीं है, न संभव है स्थानीय जनों के विरोध, प्रतिरोध का सही अनुमान । परन्तु जब राहुल जी शालातुर निवासी पाणिनि को पठान कहते हैं तो अफगानिस्तान पर संस्कृत के प्रभाव का कुछ अनुमान हो जाता है। अफगानिस्तान के लिए आर्याना संज्ञा का प्रयोग होता था जो आज भी अफगान एयरलाइन के लिए प्रयोग में है। इसके बाद आता है आर्यों की सक्रियता का दूसरा क्षेत्र जिसे भी आर्याना कहा जा सकता है और जो ईरान बन गया आर्यों की यह संज्ञा ऐर्यानेम वैजा (Airyanem Vaejah) तक पहुंचता है ।

अफगानिस्तान के उत्तरी पूर्वी क्षेत्र जिसे काफिरिस्तान कहा जाता था उसमें सोमरस के लिए विकल्प के रूप द्राक्षा रस निकाल कर उत्सव मनाया जाता था और इसे इन्द्र कुन या इन्द्रोद्यान की संज्ञा मिली थी! आज इसे नूरिस्तान या आलोक का देश कहा जाता है इसका पुराना नाम कामदेश था। धर्मान्तरण के मामले में इस्लामपरस्तों को सबसे कठिन संघर्ष इनसे ही करना पड़ा था । 1886 तक इसमें इस्लाम का प्रवेश नहीं हो पाया था। इन जनों को काफिर और इस क्षेत्र को काफिरिस्तान की संज्ञा भी उन्होंने ही दी होगी। इनमें इस्लाम न मानने वालों की संख्या बीसवीं शताब्दी तक बनी रह गई थी।

हम कह सकते हैं कि यह सबसे निकट का स्वर्ग या इन्द्रलोक था, वसुकन्नी या दजला की एक सहायक नदी वसु के तट पर बसी नगरी सबसे दूरस्थ स्वर्ग थी जिसकी समृद्धि के कारण इसका नाम संपदा की खान या वसुकन्नी पड़ गया था! इन नगरी का उल्लेख और इस पर असुरों के आक्रमण और उससे मुक्ति का हवाला गोपथ ब्राह्मण में आया है – वसोः धाराणां ऐन्द्र नगरम् ! तं असुरा परि उपेयुः … बीच में ईरान और मध्येशिया में ऐसे बहुत सारे स्वर्ग या प्राचीररक्षित बस्तियां थीं।

आक्रामकता और नृशंसता के लिए कुख्यात जनों के बीच अपनी बस्तियां बसाना और अपनी गतिविधियों के चलते पूरे क्षे़त्र में अपनी भाषा और संस्कृति का प्रभाव डालना इनके प्रभुत्व, संगठन और शक्ति को प्रकट करता है। हो सकता है स्थानीय जन यायावरी के कारण आरंभ में बड़ी संख्या में संगठित न हो पाए हों और यह भी संभव है कि बाद में संगठन और नेतृत्व में वहीं बस गए और स्थानीय आबादी में खप गए ऐसे जनों का भी हाथ रहा हो, जो अपने स्‍वर्ग से बाहर न निकले हों, परन्तु इसे प्रमाणित करने के लिए हमारे पास बहुत अधिक जानकारी नहीं है । वह हमारी विषयसीमा में भी नहीं आता।

परन्तु स्वर्ग के सुख, उसके भोग, उसकी जीवनशैली, उसकी अप्सराओं, संगीत और नृत्य से अपना मनोरंजन करने वाले इन्द्रदेवों का स्थानीय जनों पर क्या प्रभाव पड़ता रहा होगा इसका हम अनुमान ही लगा सकते हैं, क्योंकि उनकी पुरानी कथाएं इस्लाम के प्रभाव में दुर्लभ हो चुकी हैं और लेखन का प्रचार यदि सीमित रहा भी हो तो भी ईरानी में अवेस्ता को छोड़ कर किसी का लिखित साहित्य नहीं है।

अफगानिस्तान के उत्तरी भाग बदख्शां का पुराना नाम कोकनद प्रदेश था और कोकचा नदी जिसके पार संगमर्मर की पहाड़ियों में लाजवर्द की खानें है, और जिन तक इस नदी को पार करके ही पहुंचा जा सकता है, जाहिर है कोक नद के नाम से प्रसिद्ध था और इसी क्षेत्र में बसी बस्ती काइजिल कुम थी जहां से इन गतिविधियों का संचालन होता रहा लगता है।

मेरी समझ से ऋग्‍वेद में सरमा और पणियों के संवाद में चट्टानों में दबी जिन गायों/निधियों को बृहस्पति अंगिरा जनों की मदद से तोड़कर निकालते हैं(अयं निधिः सरमेे अद्रिबुध्नो गोभि: अश्‍वेभि: वसुभि: निऋष्टो । रक्षन्ति तं पणयो ये सुगोपा रेकु पदं अलकं आ जगन्थ ।। 10.108.7) ये उन चट्टानों से चमकती हुई बाहर आती है। यह बदख्शां की उन विख्यात लाजवर्द की खानों का प्रतीकात्मक चित्रण जिसमें पणियों द्वारा छिपा कर रखी गई निधि को वैदिक खनिकर्मी उनके विरोध के बावजूद खोद कर लाते हैं। इसमें इन गायों को सूप में जैसे जव भूसी से अलग किया जाता है उस तरह अलग करते दिखाया गया है। इनका वर्णन बहुत स्पष्ट और सटीक हैः( साधु अर्या अतिथिनीः इषिराः स्पार्हाः सुवर्णा अनवद्यरूपाः । बृहस्पतिः पर्वतेभ्यो वितूर्या निर्गा ऊपे यवमिव स्थिविभ्यः ।। 10.68.3).

हमारी रुचि केवल इस बात में है कि यदि पणिगण जिनके क्षेत्र में ये खानें आती हैं अपनी संपदा केे अपदोहन का विरोध करते हैं और यह धमकाते हैं कि हम इन्द्र को देख लेंगे, पर अपनी निधि को नहीं ले जाने देंगे और फिर भी विवश अनुभव करते हैं और यह सुझाव देते हैं कि इन्‍द्र आएं हम उनके साथ सहयोग करेंगे, उन्‍हें अपना सरदार बना लेंगे तो आरंभ में उनके संबंध वैदिक जनों से तनावपूर्ण ही रहे होंगे और अपनी लाचारी में धीरे धीरे, भले वैदिक धौंस को इस हद तक स्वीकार कर लिया कि उनको संस्कृत पर द्रविड़ लक्षणों वाले पंजाब की संस्कृत से अधिक अच्छा अधिकार हो गया तो दबे आक्रोश, विवशता और घृणा की भावना और उससे इनके लिए भर्त्‍सना और निन्‍दा परक प्रयोगों का अनुमान लगाना कठिन नहीं है।

परन्तु सबसे मुखर है ईरान का दबा आक्रोश जो एक ओर तो वैदिक संस्कृति से इतनी गहराई तक प्रभावित हुआ कि यह वकालत की जाती रही कि यदि अवेस्ता की भाषा का उतना ही पुराना रूप उपलब्ध हो जितना पुराना ऋग्वेद है तो उसकी भाषा वैदिक से प्राचीन सिद्ध होगी और इस तर्क से उन्होने यह प्रचारित करने का प्रयास किया कि इंडोईरानी की बाद की शाखा इंडो आर्यन है जब कि भारत से लेकर लघु एशिया से लेकर लिथुआनिया, लैटविया और यूगोस्लाविया तक और, ईरानी के तद्भवीकरण के अपवाद को छोड़, पूरे क्षेत्र पर वैदिक का एकक्षत्र साम्राज्य दिखाई देता है।

इसी तरह अवेस्ता की प्राचीनता को एक पूर्ववर्ती संस्कृति से निकला सिद्ध करने के लिए ठीक वही तर्क काम में लाया जाता रहा जिसे विलियम जोंस ने गढ़ा थाः
the religion of the Magi is derived from the same source as that of the Indian Rishis, that is, from the religion followed by the common forefathers of the Iranians and Indians, the Indo-Iranian religion. The Mazdean belief is, therefore, composed of two different strata; the one comprises all the gods, myths, and ideas which were already in existence during the Indo-Iranian period, whatever changes they may have undergone during the actual Iranian period; the other comprises the gods, myths, and ideaswhich were only developed after the separation of the two religions.( James Darmesteter, Intro. Zend Avesta, SBES part I)

अवेस्ता के कवि जरथुस्त्र या जरदुस्त्र का मूल नाम है जरद्वस्त्र या सुनहले बाने वाला कवि है । यह सुनहला रंग केसरिया या गैरिक वस्त्र है और इनका प्रवेश
सीधे भारत से नहीं, मध्येषिया से ईरान में हुआ था जहां वह पहले से बसे और अधिकार जमाए बांधवों या आर्यभाषा भाषी सेठों के माध्यम से अपना प्रभाव जमाते है। उन्होंने अपनी प्रतिभा और प्रभाव से पूर्ववर्ती वैदिक कर्मकांड आदि के विरुद्ध पर्यावरण तैयार किया था न कि पुराने धर्म और विश्‍वास की झलक उनमें पाई जाती हैः The priests of the ancient faith were now alarmed. They attempted to dissuade the prophet from disturbing the peace of the people. They met often to argue with him on the questions he was raising, but were foiled in the controversies. They felt themselves humiliated before the people and gave up meeting the prophet. They began to work against him and tried in all possible manners to frustrate the effect he was daily producing upon his hearers. They were accustomed to fatten upon the profits of the elaborate ceremonials and rich sacrifices that people offered under their guidance. They were renowned as exorcists who cast out demons, who read dreams, prognosticated the future, warded off the effect of the evil eye and, with ingenious charlatanism, had prospered among the credulous and superstitious. Zarathushtra reproved their greed and avarice. He exhorted the people to give up these superstitious practices and warned them that they were causing great harm by following such false teachers.39 His denunciation of their practices made them furious and now they sought his ruin. They accused him of preaching doctrines that were subversive of the religion of their forefathers and the established form of worship, and of blaspheming their gods. They incited the people to oppose him and made frantic appeals to the rulers of the land to drive him out from their midst.
Zarathushtra’s heart was burning with indignation against these hypocrisies. With his holy spirit aglow with righteous wrath, he called these Pharisees and Scribes of Iran, Kavis and Karapans or seeingly blind and hearingly deaf. These terms belong to the Indo-Iranian period and were evidently used in a good sense, before the Aryan groups separated. They share the fate of the cardinal word daeva and are assigned derogatory meaning in the Gathas. The Vedic hymns use the word kavi in the sense of a sage. It is freely applied to the seers and to Soma priests. It is further used as an epithet of gods. Agni, in particular, bears this honoured title.40 In the Gathas the word is curiously used with a double meaning. It is given a bad connotation whenever it is applied to the priests of the Daeva-worshippers. But the second Iranian dynasty is known as the Kavi or Kianian [Kayanian]. Its renowned kings who lived before the coming of Zarathushtra were Kavi Kavata, Kavi Usa, and Kavi Haosrava. Even Vishtaspa, who later became the royal patron of the new religion, retains this title and Zarathushtra speaks of him as Kavi Vishtaspa.41 It is significant, however, that Vishtaspa is the last king who shares this epithet with his royal predecessors. The kings who succeed him and with whom the dynasty dies out do not share the title. To the class of the Kavi belong the Karapan, corresponding to Skt. kalpa, ‘ritual,’ and the Usij, Skt. ushijah.

यहां हम इस विषय पर चर्चा करें तो बहक जाएंगे। संक्षेप में यह कहना ही पर्याप्त है कि वैदिक समाज के प्रति ईरानियों की घृणा इस हद तक है कि देव /दएव/शब्द ही इसमें दुष्टता का या शैतानी का पर्याय बन जाता है और इन्द्र की भी निन्दा की जाती है। सबसे रोचक है मागियों या मगों का वहां प्रभाव भी है जो भारतीय भूभाग में दलित बनने को बाध्य हुए! यहां उनकी उपस्थिति छठीं सहस्राब्दी ईपू से महगरा, मगहर आदि स्थायी बस्तियों से प्रमाणित होती है। यदि उस संघर्ष के फलस्वरूप उन्हें भारत से बाहर जाना पड़ा हो या यदि भारत की तरह ही उनके जत्थे ईरान तक पहले से बसे रहे हों और ईरानी क्षेत्र में उनका प्रभाव बढ़ा हो, तो यह हमारी ज्ञानसीमा से बाहर की बात है। इस पर गहनता से काम करने के बाद ही यह पेच सुलझ सकता है।

घृणा के ये बीज यदि शोषण दोहन और दंभ प्रदर्शन के कारण भारत से बाहर भारतीयों के विषय में बने रहे हों तो यह बात समझ में आती है, परन्तु सांस्कृतिक अग्रता, शिष्टता और न्यायप्रियता से भी घृणा पैदा हो सकती है इसकी चर्चा हम कल करेंगे।

Post – 2017-01-09

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 7

सिन्ताश्‍ता और आन्द्रोनोवो संस्कृतियों के लक्षण कुछ बाद में अपनी चरित्रगत विशिष्टताओं और वैविध्यों के साथ प्रकट हुए परन्तु एक बात पर कोई विमति नहीं दिखाई देती कि उस क्षेत्र में बहुत पहले से तीन भाषाभाषी समुदायों के लोग उपस्थित थे। ये तीन भाषाएं आज की शब्दावली में आर्य, द्रविड़ और मुंडा है! भारत में इन समुदायों की पृथक उपस्थिति है, इनके मेल से बनी भाषाएं भी मिलती हैं और इनके विभेद भी मिलते हैं। यह अलग विषय है और इस पर यहां चर्चा नहीं हो सकती।

मध्येशिया के विषय में हमारी जानकारी बहुत सीमित है और उस क्षेत्र की भाषाओं में, यहां तक कि मंगोल आदि में भी इनके कुछ तत्वों को तलाशा जा सकता है और आस्ट्रिया, उक्रेन और फिनलैंड आदि में मुंडारी तत्वों के प्रभाव अधिक गोचर हैं जिनके कारण इनको फिनोउग्रियन की संज्ञा दी गई है।

हम उस पांडित्य से बच कर अपनी बात रखना चाहते हैं जिसकी हर इबारत बार बार और कई तरीकों से दुहराए जाने के कारण सही, और जांचने के बाद गलत सिद्ध होती है। मुझे यदि अपनी समझ पर इतना भरोसा होता कि मैं मान पाता कि मैं यूरोप के असाधारण प्रतिभा और ज्ञानसंपन्न विद्वानों से अधिक प्रखर, अधिक ज्ञानी हूं, तो मुझे उनकी नीयत पर शक करने का कारण नहीं मिलता। मैं यह जानता हूं कि मैं उस ज्ञान और क्षमता का व्यक्ति हूं जिसे मीडियाकर या मध्यम समझ का व्यक्ति कहा जाता है इसलिए मुझे यह शिकायत करनी होती है कि जो बात मुझ जैसे मन्दबुद्धि की भी समझ में आती है वह उनकी समझ में क्यों न आई और यदि आई तो वे इसे छिपा क्यों ले गए!

परन्तु हम अपने प्रख्यात विद्वानों के विषय में क्या कहें। कहने को कुछ बचता है तो प्रचार शक्ति जिनके पास हो वे ऐसे असंभव काम भी कर सकते हैं जो तलवार भांजने वालों से संभव नहीं!

वे अपनी योजना के तहत बताते रहे कि उस क्षेत्र में (काला सागर के उत्‍तर दद्यनीपर और नीस्‍तर नदियों के अश्‍वबहुुल क्षेत्र) जिसे अमेरिकी पुरातत्वविद मारिजा जिंबुतास ने कुर्गान संस्कृति कहा था, उसमें आर्यभाषा भाषियों की सबसे पुरातन उपस्थिति दिखाई देती है और इसके प्रमाण उन्होंने अपने ढंग से दिए थे और यह बताया था कि ये उस क्षेत्र के अभिजात जन थे! अश्‍व पालन और अश्‍व प्रशिक्षण इन्होंने आरंभ किया । अश्‍वपालन करने वाले भी उनके सहायक थे और संभवत: उनके द्वारा संरक्षित भी। व्‍यापार पर स्‍वामित्‍व उनका था।

मैं जिंबुतास की ईमानदारी पर सन्देह नहीं करता, पर वह उस बहु प्रचारित मान्यता के प्रभाव में आ गई थीं कि आर्यजन पशुपालक थे और अश्‍वपालन का काम भी उन्होने ही आरंभ किया। यह सच है कि पशुपालन का आरंभ भारत में हुआ। परन्तु हमें यह भी समझना होगा कि पशुपालन है क्या।

जब आप पशुओं को घेर कर, उनका शिकार करते है, तात्कालिक उपयोग से अधिक पड़ने वालों काे बाद के लिए रोक कर रखते हो और उनका बाद में मांसाहार करते हैं तो यह रेवड़बन्दी है और जब आप उनको किसी अन्य स्रोत के लिए प्रयोग में लाते हों और उसमें अनुपयोगी को आहार के लिए प्रयोग में लाते हों तो यह पशुपालन है!

इसमें बकरी, भेड़, गाय और कुछ बाद में भैंस और उूंट का पालन किया गया! इस अन्य उपयोग में उनकी भारवहन क्षमता, गति आदि अनेक घटक आते हैं। जिनका कोई अन्य उपयोग नहीं हो सकता उनका मांसाहार किया जाता रहा है, जैसे हिरन, और दूध देने वाले जानवरों के नर । दूसरा कोई उपाय न था। इसलिए अन्य उपयोग में न आने वाले नर पशुओं और पक्षियों का वध होता रहा है, क्‍योंकि इसके बिना उनको जिला कर रखने का आर्थिक भार इतना अधिक होता कि इसका निर्वाह नहीं किया जा सकता था।

जिस चरण से आगे किसी प्राणी के नर का भी इतर उपयोग करने की सूझ पैैदा हुई उस चरण से आगे उसको बचाने की चिन्ता आरंभ हो हुई और अशिक्षित समाजों में इसे व्यवहार्य बनाने के लिए इसे वर्जना का रूप दिया गया । फतवा उसी का रूप है और यह इस बात की आशंका पैदा करता है कि क्या प्रचार और शिक्षा के साधनों के विकास के बाद वर्जना का सहारा लेने वाला समाज आघुनिक है या आधुनिक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है!

बर्जना के बहुत सारे रूप हैं जिनमें प्राण जाय पर प्राणी न जाये की स्थिति आ जाती है, परन्तु है यह आधुनिक चुनौतियों के प्रतिकूल ही और जिस समाज में यह बना रहता है उसे पीछे ले जाने की योजना का अंग ही।

हम निवेदन यह कर रहे थे कि प्रचारतन्त्र के बल पर आर्यों को, यदि इस शब्द का प्रयोग वैदिक समाज के लिए या उसके व्यापारियों के लिए करते हुए उन्हें गंवार, पशुचारी, उपद्रवी आदि सिद्ध किया गया, तो उसका कहीं कोई साहित्यिक या पुरातात्विक प्रमाण न था। जिस बात के प्रमाण थे परन्तु उसको नकारा जा रहा था । और इसके दबाव में हमारे ऐसे विद्वान भी जिनको आत्मगौरव से शून्य नहीं माना जा सकता, वे भी ‘लगता तो नहीं है पर जब इतने लोग कर रहे हैं तो हो सकता है ऐसा ही हो’ के दबाव में आ कर उसका प्रतिरोध नहीं कर सके।

जहां जहां आर्यभाषाभाषियों की उपस्थिति के क्षीणतम प्रमाण पाए गए थे, उनमें कहीं भी उनको पशुपालक नहीं पाया गया! कुर्गान संस्कृति हो या मध्येशिया के वे स्थल – डैश्‍ली, सपल्ली, बख्‍तर मर्गियान संकुल – या इससे बहुत पहले उस संस्कृति जिसे कुर्गान संस्कृति का नाम दिया गया था, या लघु एशिया और ईरान में, सभी में उनके पुरातात्विक अवश्‍ोष यह प्रमाणित करते है कि वे अपने परिवेश के नागर संस्करों वाले, अपनी अलग-थलग प्राचीरवेष्ठित बस्ती बसा कर रहने वाले सर्वाधिक सभ्य जन थे, परन्तु इस पुरातत्व से उनकी काल्पनिक मान्यता की पुष्टि नहीं हो रही थी, इसलिए यह घोषित कर दिया कि आर्यों का पुरातत्व है ही नहीं! आर्य शब्‍द का अर्थ भी सभी मानते हैं सभ्‍य और सुसंस्‍क़त है । वे अपने को स्‍वयं अग्रणी मानते थे – तिस्र: प्रजा आर्या ज्‍योतिरग्रा ।

ऐसे स्थल या केन्द्र जो विदेशों में बसे थे, वे अधिक नहीं थे। उनका सही हिसाब किसी के पास न था। इनको स्वर्ग कहा जाता था, हम इसमें सुधार करते हुए इन्हें स्वर्गोपम कह सकते हैं, जैसे सुमेरी दिलमुन को या बहरीन में बने अड्डे को मानते थे या अरब भारत को जन्नतनिशां कहते थे या हम कश्‍मीर को कहने के आदी रहे हैं।

जहां सम्पन्नता, सौन्दर्य और वैभव हो वह स्वर्ग है इसलिए पुराने ग्रंथों में स्वर्ग की विविध दूरियां बताते हुए उनकी संख्या सात, नौ आदि बताई जाती थी।

हम यहां केवल यह प्रश्‍न करना चाहते हैं कि यदि ये अपने को दूसरों से इतना ऊपर समझते थे तो इनका स्थानीय जनों के प्रति व्यवहार क्या रहा होगा। इनकी अग्रता से चमत्कृत स्थानीय जन उन जैसा बनने का प्रयत्न करते हुए भी उनसे कितना अपमानित अनुभव करते रहे होंगे और इनसे कितनी घृणा पालते रहे होंगे? प्रेम तो नहीं कर सकते थे, उनके अनुचर या सहायक बनने को बाध्य थे, यह दूसरी बात थी ।

इसका दूसरा पक्ष यह कि व्यापार आदि कारणों से देशान्तर में जाने वाले और वहीं लंबे समय तक बस जाने वालों को भी भारतीय मूल भूमि से चिपके रहने वाले या केवल सार्थवाह का अंग बने रहने वाले, क्या सम्मान की दृष्टि से देखते रह सकते थे! वे इनके लिए व्रात्य या व्रतच्युत और पुनः संस्कार और प्रायश्चित के बाद ही समाज में प्रतिष्ठा पाने का अधिकारी मानते थे।

स्वयं अपने ही जनों में इसकी भिन्न प्रतिक्रियाएं होती रही होंगी परन्तु आर्यो के अपने श्रेष्ठताबोध और दूसरों के प्रति अवज्ञा भाव, म्लेच्छ, मृध्रवाज, वध्रिवाच आदि कह कर उनका अपमान, उनके मन में आर्यों के प्रति सम्मान का भाव जगाता रहा होगा या भयमिश्रित अनुपालन का ओर क्षतिपूर्ति के रूप में जुगुप्सा और घृणा का ?

हम इसका अनुमान ही कर सकते हैं क्योंकि इसके लिखित प्रमाण विरल हैं परन्तु उनको न सही परिप्रेक्ष्य में रखा गया न ही समझने का प्रयत्न किया गया। इन प्रमाणों की जितनी जानकारी है उस पर कल विचार करेंगे।

Post – 2017-01-08

हिन्दुत्व से घृणा का इतिहास – 6

सिन्ताश्‍ता और अन्द्रानोवो में जा कर बसने वाले यदि भारत से वहां पहुंच तो इसका कारण क्या था और क्या वे वहां पहुंचते ही उस पूरे क्षेत्र में फैल गए ?

पशुधन के मामले में गुजरात उस समय से ही बहुत आगे रहा है जब हड़प्पा संस्कृति के संपर्क में वह आया नहीं था। इस बात का दावा अनेक पुरातत्वविदों ने किया है और किसी ने उस तन्त्र को सही सही नहीं समझा है। पाकिस्तान के बलोचिस्तान प्रान्त में बोलन दर्रे के नीचे बोलन नदी के निकट 7000 ईस्वीपूर्व अर्थात् आज से 9000 साल पुराना मेह्रगढ़ नाम का स्थल है जो लगभग छह हजार साल तक बसा रहा और फिर उजड़ा जिस भी कारण से इसके तत्व नवसारो ( नया शरणस्थल या नया बास ?) में दिखाई देते हैं।

मेह्रगढ़ में सात हजार साल पहले से ही खेती हो रही थी, शिल्प और उद्योग भी जारी था, परन्तु इसमें पशु आधारित खेती साढ़े चार हजार साल ईपू आरंभ हुई हो सकती है। यहां गोपालन इस समय ही आरंभ हुआ। संभवतः गोपालन का यह सबसे पुराना नमूना है।

हड़प्पा की मुहरों पर जिस सांड़ का और मुद्रण पाया जाता है उसे आज भी गुजरात में देखा जा सकता है । गुजरात और सौराष्ट्र और सिंध को आज की भौगोलिक सीमाओं में रख कर देखना सही न होगा।

हमारे साहित्य में समुद्र मंथन से जिन रत्नों की प्राप्ति होती है उनमें लगभग सभी उसी के माध्यम से प्राप्त हुए, हां, उस दशा में चन्द्रमा को सोम या सोमलता मानना होगा। यह याद दिलाना प्रासंगिक होगा कि खिरसर (क्षीर सागर ) उस पुराणकथा के ऐतिहासिक पक्ष काे प्रमाणित करने के लिए बचा रह गया है। वृष्णि नाम और उससे गो प्रजाति के मामले में गुजरात की ख्याति, गुजराती गाय के रूप में पूर्वी उत्तर प्रदेश और उससे पूर्व तक रही है। इसे जमुनापारी गाय के रूप में भी जाना जाता था।

कहें हड़प्पा काल से बहुत पहले से गुजरात और सौराष्ट्र पशुपालन में अग्रणी ही नहीं रहे, पशु आधारित खेती आरंभ होने के बाद पशु व्यापार में भी तत्पर रहे हैं। जिस यदुकुल की ख्याति ब्रज से जुड़ कर द्वारका तक पहुंचती है, उसका आधिकारिक ज्ञान हमें नहीं है, पौराणिक ज्ञान कुछ छानबीन हो तभी ऐतिहासिक बन पाएगा।

ऋग्वेद में जिस अश्‍व की चर्चा गो प्रजाति के साथ साथ आती है, उसकी उत्पत्ति भी समुद्र से बताई जाती है और इसके व्यापार में अग्रणी भूमिका सिन्धियों या सैंधवों की थी। सैंधव सिन्धु का अपत्यार्थक पद है जिसका अर्थ है सिन्धप्रदेश्‍ा जात या उससे संबन्धित। अब आप चाहें तो सिन्तास्ता के सिंदोई जनो को उनकी पुरानी संज्ञा सैंधव से पहचान सकते हैं। हिन्दू का प्राचीनतम रूप सैन्धव और ईरानी प्रतिरूप हैन्दव हुआ।

सैन्धव जन अश्‍व व्यापार पर लगभग एकाधिकार रखते थे इसलिए भारत के भीतरी भागों के लोगों को लगता था कि घोड़ा भी सिन्ध में ही पैदा होता है जब कि आज की भौगालिक समझ के अनुसार यह सौराष्ट्र के तटीय और द्वीपीय क्षेत्र का नैसर्गिक जानवर था, परन्तु उस समय यह पूरा तटीय और सिन्धु नद का सेच- क्षेत्र भी सिंधु ही माना जाता रहा होगा । सैंधव का तीसरा अर्थ है खनिज लवण या सेंधा/ सैंधव नमक। यह शंभर/सांभर या जल से पैदा किए जाने वाले नमक से अलग था और अधिक संभावना यह है कि इस अर्थ में ऋग्वेदिक काल में सैन्धव का प्रयोग न होता रहा हो।

गो पालन करने वाले अन्धक जिनके आगे वृष्णि देख कर आप वृष या वृषभ पालक का अनुमान कर सकते हैं और इससे उनके आत्‍मगौरव और गर्व का भी अनुमान कर सकते हैं ! ध्‍यान रहे कि धुरन्‍धर शब्‍द असाधारण पराक्रमी योद्धा के लिए जिस की तुलना में प्रयोग में लाया जाता है वह वही ककुद्मान या ऊंचे टीले वाले सांड या बैल का प्रतीक है जिसे गड़ी के सबसे आगे एक पट्टा लगा कर बांधा जाता था। गाड़ी खीचते आजूूू बाजू के बैल थे, यह आराम से चलता रहता था परन्‍तु यदि गाड़ी कोेे तीखी चढ़ाई करनी होती या गाड़ी बालू या कीचड़ में फंस जाती तो इसके जाेर लगाने और दूसरे बैलों के योग से यह संकट से बाहर आ जाती। इ‍सलिए मेरी माने तो यह धुरन्‍धर ध्रुवन्‍धर का रूपान्‍तर है। यहां धुर पहिये की धुरी नहीं है, वह धुरा या तिकोना निकला हुआ पट्टा है जिसे झींटी या ककुद्मान वृषभ्‍ा धारण करता है और संकट से पार लगाता है। इस वृष सेे जुड़े शौर्य के आधार पर वृष्णि जनों का गर्व था और किसी भ्‍ाी पक्ष से उनके सहयोग की निर्णायक भूमिका को इसी से समझा जा सकता है।

कृष्ण अंधक वृष्णि कुल के थे, यादव थे, ऋग्वेद में एक स्थल पर याद्वानां पशुः का प्रयोग है जो भी इनके पशुपालक होने का संकेत देता है। समुद्र से प्राप्त यह अश्‍व आज भी सौराष्ट्र के निकटस्थ द्वीपों में जंगली गधे के रूप में पाया जाता है और इसी की आपूर्ति सिन्धी लोग वैदिक ग्राहकों को किया करते थे इसलिए पुराने लोग अश्‍व का प्रयोग अश्‍व प्रजाति या घोड़े और गधे दोनों के लिए किया करते थे। इसका विस्तार से विवेचन मैंने अपनी पुस्तकों में किया है अतः उसे दुहराने की आवश्‍यकता नहीं, फिर भी यह याद दिला दें कि अश्विनीकुमारों का एक नाम गर्दभीविपीत या गधी का दूख पीकर पले बढ़े प्राणी बताया गया है और वे भी गर्दभ रथ ही हांकते थे – गर्दभ रथेन अश्विना उदजयताम् !

हड़प्पा सभ्यता के विविध स्थलों से जिस गधे की अस्थियां प्रचुरता से मिली हैं, वे इन्हीं गधों या वनगर्दभों की लगती हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि घोड़ा भारत में पाया ही न जाता था, या पालतू ही न बनाया गया था, बल्कि यह कि भारतीय घोड़े की प्रजाति जिसे हम अपने टट्टुओं का पूर्वज कह सकते हैं और जिसकी पहचान सूरकोटडा से मिली अस्थियों से भी होती है, इन बनैले गधों से कमजोर थे। ओनेगर, या वनगर्दभ, को दौड़ते देख कर ही उनकी ओजस्विता को समझा जा सकता था। संभवतः यही कारण था कि गधे और घोड़े के संकरण से जो खच्चर पैदा होते थे उन्हें भारवहन क्षमता में गधों और घोड़ों से भी अच्छा माना जाता था और इसलिए उनकी संज्ञा अश्‍वतर थी। यह मात्र मेरा अनुमान है, आधिकारिक दावा नहीं। कारण कोई दूसरा इसका अर्थ अश्‍व से इतर या उससे हीन भी कर सकता है।

अंधक जन आर्यभाषी नहीं रहे लगते और यह बात कुछ दूर तक सैंधव जनों पर भी लागू हो सकती है। कारण, पहले वैदिक सभ्यता सारस्वत क्षेत्र तक सीमित थी और सरस्वती के पटाव और तज्जन्य विनाषकारी बाढ़ों से उत्पन्न समस्याओं के कारण वैदिक जनों को सिन्धु के तट पर आना और इसमें बाढ़ से बचाव के लिए ऊंचे पटाव या प्लिंथ तैयार करके सुनियोजित रूप में नगर बसाए गए। यह टेढ़ा मामला है, इसे सीधे समझे तो पहले सिन्ध और इसके निवासियों को भी वैदिक संभ्रान्त वर्ग नीची नजर से ही देखता था। संभव है ये दोनों पषुपालक समुदाय कुछ उपद्रवी भी रहे हों। ऋग्वेद में एक स्थल पर सरस्वती से प्रार्थना की गई है कि तुम्हारे प्रकोप के कारण हमें अरण्य या अप्रिय क्षेत्रों में न जाना पड़े पडे़ जो एक साथ तीन बातों की ओर संकेत करता है। पहला यह कि इस समय तक लोगों ने सारस्वत क्षेत्र से सिन्धु तट की ओर खिसकना आरंभ कर दिया था, दूसरा यह कि सिन्ध, यहां तक कि पष्चिमी पंजाब, तटीय क्षेत्र और गुजरात और सौराष्ट से सारस्वत जन परिचित तो थे परन्तु अपनी अग्रता के कारण इनको कुछ ओछी नजर से देखते थे इसलिए यह खुमार बाद में जब वैदिक सभ्यता का प्रसार अफगानिस्तान तक हो चुका था, आर्यावर्त से इन क्षेत्रों को हेय ही नहीं समझा जाता था अपितु उन्हें इतना अपवित्र माना जाता था कि वहां जाने और उनके संपर्क में रहने के बाद संस्कारित मनुष्य दूषित हो जाता है और वहां से लौटने के बाद उसे आत्मषुद्धि करनी चाहिए- सिन्धु सौवीर सौराष्ट तथा प्रत्यन्त वासिनः, अंग, वंग, कलिंगान्ध्रान गत्वा संस्कारमर्हते !
अब हम एक विचित्र उलझन में फंस गए हैं। हम तो स्वयं सैंधव जनों या हिन्दुओं से और साथ ही अपने उन प्रदेशो को तुच्छ, हीन और वहां के लोगों को भ्रष्‍ट और तुच्‍छ मानते रहे, हम किसी शब्द या उससे जुड़े मनोबन्धों की अभिव्यक्ति से कैसे शिकायत कर सकते हैं।

हिन्दू आज गैर ईसाई, गैर मुस्लिम भारतीयों के लिए प्रयोग में आता है और उससे भी कुछ समुदाय अपने को अल्पसंख्यकता का लाभ पाने के लिए अलग करने का प्रयत्न करते रहे हैं, तो हमें हिन्दू शब्द और इसके प्रति दूसरों की निजी धारणाओं को लेकर शिकायत होती है, परन्तु हमें यह समझना होगा कि हम जिन्हें तुच्‍छ समझते हैं वे भी हमसे घृणा करते हैं और इसके बीजों का उच्छेदन आसान नहीं है।

जब तक हम दूसरों को असंख्य कारणों से तुच्‍छ समझते हैं तक तक यह पता ही नहीं चलता कि हम कुछ गलत कर रहे हैं। एक मोटी समझ होती है कि उनकी जीवनशैली, मूल्यप्रणाली, उनकी भौतिक स्थिति या श्‍ुाचिता का अभाव हमें ऐसा करने को बाध्य करता है, हम इसे उलट कर देखने का प्रयत्न नहीं करते।

परन्तु आप यह न समझें कि मैं अपने समाधान से प्रसन्न हूं। इसके कुछ पेंच और खम ऐसे हैं जिनको हमारी बहस में स्थान ही नहीं मिला। दूसरे, हम यह नहीं समझा सके कि जिसे कुछ पुरातत्वविदों ने गुजरात के अपनिवेशीकरण के रूप में पेश किया है वह यदि ऋग्वेद से उसी तरह परिचित होते जिस तरह मैं एक इतिहासकार से परिचित होने की अपेक्षा करता हूं तो या तो वे सिन्ध के भी उपनिवेशीकरण की बात उसके साथ ही करते या दोनों के लिए उपनिवेशीकरण की जगह शरणागतभाव का प्रयोग करते और उससे हम उस अहंकार पर भी विजय पाते जिससे मालिक और सेवक का संबंध पैदा होता है, विजेता और विजित के संबंध बनते हैं, जिसकी परिणति व्यक्त उपेक्षा और दबी घृणा में होती है।

मैंने कल सोचा था अगली पोस्ट में सिन्तास्ता तक तो पहुंच ही जाएंगेा आरंभ भ्‍ी यह सोच कर ही किया था, पर अभी तो सारस्वत से निकल कर सैन्धव प्रदेश और सौराष्ट्र में ही उलझ कर रह गए! फिर भी अपने द्वारा दूसरों की उपेक्षा और तिरस्कार और उनके द्वारा हमारे अनुकरण और उसके बावजूद हमसे दबी घृणा के मनोविज्ञान को तो समझ ही सकते हैं और समझ सकते हैं अपने उस इतिहास को जिसको इतना तोड़ मरोड़ दिया गया कि हम अपने आप को पहचानने की क्षमता खो बैठे और कुछ लोग अपने आप से घृणा करने को गौरव की बात मानने लगे!

Post – 2017-01-07

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 5

इस पोस्‍ट में हम कुछ अवधारणाओं को स्‍पष्‍ट करते हुए अपनी बात पर आएंगे। इससे आप को थकान हो सकती है पर इनका स्‍पष्‍ट होना जरूरी है।

आप ने सुना होगा, एक संगीतकार को धोखे से कोई ऐसा द्रव्य पिला दिया गया कि उसका गला बैठ जाय, या उसकी हत्या कर दी कि वह प्रतिस्पर्धा से हट जाय तो उसके लिए सबसे अच्छा गायक बनने का अवसर मिल जाय। दो प्रतिभाशाली और आपस में मित्र छात्रों में से एक ने दूसरे की हत्या कर दी इस ईर्ष्‍या से कि वह उससे अच्छा क्यों है ! अपनी महत्वाकांक्षा और उसके पूरा होने में बाधक दूसरे की श्रेष्ठता प्रेम को घृणा में बदल देती है और यह भर्त्‍सना का रूप ले लेती है । घृणा के दूसरे भी कारण हैं, परन्तु एक कारण यह कि यह प्रायः हीनभावना की क्षतिपूर्ति होती है और इसकी परिणति वाचिक भर्त्‍सना में होती है!

यदि अग्रणी समाज स्वयं भी अपने श्रेष्ठताबोध के कारण दमित या प्रभावित समाज के लिए अपने व्यवहार या भाषा में तिरस्कार प्रकट करता है तो इस तिरस्कार की प्रतिक्रिया में असहाय समाज दबे होने के कारण अपने प्रकट व्यवहार में आदर प्रकट करता है और निजी जीवन में क्षतिपूर्ति के रूप में उससे घृणा भी करता है और उस जैसा बनने का प्रयत्न भी करता है । घृणा गालियों, भर्त्‍सनाओं या निन्दा की दूसरी संकेत प्रणालियों का रूप लेती है और हीनताबोध उसकी नकल के प्रयत्न में परिणत होता है।

इसे अपने आसन्न इतिहास में अंग्रेजों के भारतीयों के प्रति व्यवहार और भारतीयों के मन में उनके प्रति कटुता और घृणा को और उसके साथ ही उन जैसा बनने की चेष्टा में देखा जा सकता है। वे हमें काला और नेटिव कह कर गाली देते थे और भारत का अवाम उन्हें सफेद बंदर के रंग का मान कर उन्हें बन्दर, फिरंगी आदि कह कर अपना बदला लेता था। इस समय एक लोकगीत की याद आती है जिसमें अपने समाज में जागरूकता पैदा करने का आग्रह भी है और उस हीनभाव की क्षतिपूर्ति भी:
नैया बीचे नदिया डूबल जाय हे मन अइसा देखा ।
एक अचरज हम ऐसा देखा बानर दूहे गाय
दूध दूहि के पियत जात बा , घिउआ भेजे चलान। हे मन अइसा देखा।

इसमें अपनी विवशता का बोध भी है, एक छोटा सा देश, इतने बड़े देश को अपने काबू में किये हुए है यह विस्मय की बात है। सामान्य नियम यह कि नौका डूबती है तो नदी में, यहां नदी ही नौका में डूब रही है । वे यहां के शासक बन कर ऊंचे वेतन लेते हुए दोहन तो करते ही हैं, यहां की संपदा और धन को विदेश भी ले जाते हैं !

परन्तु इसमें रोचक है अंग्रेजों की तुलना बानर से करना और भारत को गाय के रूप में प्रस्तुत करना।

ये दोनों शर्ते प्राचीनतम भारत से पूरी होती हैं, जिसके लिए उसी तरह भारत का प्रयोग उतना ही गलत है जितना भारतवासियों के लिए हिन्दू का और फिर भी इसका संबंध हिन्द और हिन्दू से बहुत दूर भी नहीं है।

यहां मैं आपको एक ऐसा इतिहास बताने जा रहा हूं जिसे इससे पहले किसी ने नहीं लिखा, परन्तु इसके साक्ष्य इतने प्रबल हैं कि इसे देखा और समझा जा सकता है । इसका एक सिरा उस सेमिनार से भी जुड़ता है जिसमें मैंने खास तौर से अपने पश्चिमी अध्येताओं को लानत भरे स्वर में यह सन्देश दिया था कि इतिहास को तुमने इतिहास नहीं रहने दिया है जिस रूप में ही यह हमारी वर्तमान व्याधियों के निदान और इन व्याधियों के उपचार में समर्थ हो सकता था । तुमने इतिहास में ही मिलावट करके, इसके तथ्यों को जानते हुए भी कूटनीतिक जरूरतों के कारण छिपा कर, व्याधियों को अधिक उग्र बनाया है। समग्र मानवता के विकास की दृष्टि से देखें तो सभ्यता से बर्बरता पैदा की है जिसके भुक्तभोगी तुम भी होने जा रहे हो। इसलिए इसे सदा सदा के लिए बन्‍द किया जाना चाहिए और निजी जानकारी और सार्वजनिक प्रचार का भेद मिटना चाहिए। उसकी प्रतिक्रिया में जो वाक्‍य निकला वह यह कि यह तो खेल का हिस्सा है, इससे हमें कोई परेशानी नहीं, यह तो चलता रहेगा ।

हमारे पास न तो अच्छे पुस्तकालय हैं, न उन पुस्तकालयों का सही उपयोग है, और हमारे भूगोल, भूसंपदा, समाज, इतिहास, संस्कृति, भाषा, कला, साहित्य, नृतत्व, पुरातत्व सभी क्षेत्रों में अनुसंधान, काल निर्धारण, भौगोलिक विवेचन और व्यस्था का काम उन्होंने ही किया। इंडिया पहले से था इसके सर्वे का काम उन्‍होंने किया। किया हमारे हित के लिए नहीं, अपने लाभ, नियंत्रण और वर्चस्व के लिए। भारतीय अध्येता जब उन विषयों का अध्ययन करने का प्रयत्न करते थे और उनसे भिन्न नतीजों पर पहुंचते थे जो उन्होंने अपने इन्द्रजाल में हमें समझाने के लिए तय कर दिया था, तो उसको देश भक्ति या राष्ट्रप्रेम से प्रेरित कह कर नकारते भी थे। ये ही गालियां उनके उत्‍तराधिकारियों के द्वारा आज भी दुहराई जाती हैं। और कुछ सोचने की चिन्‍ता न थी तो गालियां तो नई गढ़ लेते । खैर।

वे अपनी मान्यताओं से असहमति को हतोत्साहित भी करते थे, और यह दबाव भी बनाते थे कि भारतीय अध्येता उनकी मान्यताओं के भीतर रह कर ही जोड़तोड़ करें और इस प्रतिबन्‍ध का निर्वाह करने पर ही वे प्रतिभाशाली लोगों को स्वीकृति, समर्थन और पद प्रदान करते थे।

अतः हमारे पास ज्ञान के स्रोत के रूप में या तो उनका लिखा उपलब्ध है अथवा उनकी योजना के अनुरूप या उससे मामूली कतर ब्यौंत करने वाली भारतीय विद्वानों की स्थापनाएं उपलब्ध हैं जो तथ्यों से शून्य तो हो ही नहीं सकतीं, परन्तु जिनकी योजना अलग है। तथ्य वे ही हों, और उनका संयोजन बदल दिया जाय तो निष्कर्ष किस हद तक बदल जाते हैं इसे हम गणित के अंकों की योजना से समझ सकते हैं । तथ्य के रूप में हमारे पास 1 और 2 हैं परन्तु इनका संयोजन बदलते हुए इनके मान 12, 21, 1/2, 2/1, 1.2, 2.1 आदि हो सकते हैं। आंकड़ों के घालमेल किए जाने पर या किन्हीं कारणों से हो जाने पर निष्कर्ष इतने भिन्न हो सकते हैं कि हम बावले हो जायं !

कहें, किसी समाज को उसके ही इतिहास या वर्तमान के आप्त आंकड़ों या अकाट्य तथ्यों का संयोजन गलत ढंग से करके उसे बावला बनाया जा सकता है, गुलाम बनाया जा सकता है, विक्षोभ पैदा किया जा सकता है अथवा सौहार्द का वातावरण तैयार किया जा सकता है।

राजनीतिज्ञ या कूटविद के लिए यह जोड़ तोड़ ही जानना जरूरी होता है और इसको ही वह जानने समझने का प्रयत्न करता है कि उन तथ्‍यों से क्या क्या बनाया या क्या पैदा किया जा सकता है और कब, किस तरह संयोजन बदल कर क्या समझाया जा सकता है । कहें, आपका, अपने लिए उपयोग करने वाले के लिए उन्‍हीं तथ्‍यों का क्‍या क्या किया जा सकता है, यह अधिक महत्वपूर्ण है।

इसके ठीक विपरीत जिसको अपना लेखा जोखा समझना है, घर संभालना है, अपनी बीमारी से मुक्ति पानी है उसके लिए जिस क्रम में वे आंकड़े थे ठीक उसका और केवल उसका ज्ञान चाहिए। यह इतिहास है, यही निदान है, यही समाधान में सहायक है।

प्रश्‍न यह है कि जहां जानबूझ कर आंकड़ों को इधर से उधर करके मनमाने नतीजे निकाले गए हैं, और जरूरत पड़ने पर उन्हें ही नए ढंग से संयोजित या कुयोजित करके पहले नतीजे में फेर बदल करते हुए नये दावे किए जाते हैं, उनसे बचते हुए उन्हीं घालमेलित आंकड़ों को क्या उस रूप में संयोजित किया जा सकता है कि वे वास्तविकता का परिचय दे सकें ।

कहें, क्या राजनीतिक कारणों से तोड़-मरोड़, छोड़ और गढ़ कर विकृत प्रस्तुति को जो इतिहास नहीं है अपितु ऐतिहासिक तथ्यों का कूटनीतिक उपयोग है उनके नये संयोजन से हम सही इतिहास तक पहुंच सकते हैं?

उत्तर है हां । इसे आप जिगसा पजल या जोड़ो-मिलाओ पहेली से समझ सकते हैं । इसमें बहुत से संयोजन काफी दूर तक सही लगते हैं, परन्तु एक दो ब्लाक ठीक बैठ नहीं पाते । बार बार बहुत कुछ सही लगने का भ्रम पैदा करते हुए अन्त में कुछ बेमेल मिलता है। ये सभी अधूरे समाधान हैं जिनमें कुछ खानों को छोड़ कर सही होने का भ्रम पैदा करते हुए तरह तरह के दावे किए जाते और अपने प्रयोजन से इतिहास के तथ्यों का उपयोग तो किया ही जाता है, हमारी व्याधि को ऐसा करने वालों की योजना के अनुसार सह्य और उग्र बनाया जाता है ।

झूठ के असंख्य संस्करण होते हैं, जिसमें सभी खंडों के विभिन्न कुयोजन होते हैं, सत्य केवल एक होता है आैर उस तक एक ही संयोजन से पहुंचा जाता है। उस पर पहुंच कर विसंगतियां समाप्त हो जाती है।

सत्य तक, अपने वास्तविक इतिहास तक, पहुंचने का यही उपाय है । इस बात पर ध्यान देना कि क्या क्या छोड़ कर यह नतीजा निकाला गया है, और जो कुछ चुना गया है वह भी एक दूसरे से मेल खाता है या अनमेल है । अनमेल है तो जितने भी बड़े विद्वान द्वारा प्रस्तुत किया गया है, वह गलत है, एक षड्यन्त्र का हिस्सा है और इस पर भरोसा करने पर हमारी समस्यायें अधिक जटिल होती चली जाएंगी!

हमने अब तक यही किया या होने दिया है, क्योंकि गुलाम मानसिकता का एक लक्षण आलस्य है और दूसरा अल्पतम से अधिकतम की साधना और ऐयाशी है जिसमें हमारा बौद्धिकवर्ग लिप्त रहा है ।

अब मैं उस सूत्र की चर्चा करूंगा जिसका हवाला देते हुए मैंने यह आरोप लगाया था कि आप जानते सब कुछ हो, आपस में आप एक दूसरे से अपने विचार साझा भी कर लेते हो, परन्तु हमें एक दूसरा पाठ पढ़ाते हो और इसे जानने वाले और हमारे हमदर्द बनने वाले भी इसे हमसे छिपाए रहना चाहते हैं ! फिर वे हमारे सच्‍चे हमदर्द हैं, या हमसे विश्‍वासघात करने वाले? जिन तथ्यों की ओर मैं यहां संकेत कर रहा हूं वे माइकेल विट्जेल की उस किताब से है जिसे उन्होंने आर्य आक्रमण की मान्यता के खंडन के बाद उसे पुनः प्रतिपादित करने के लिए लिखा था और जिसके तथ्य निम्न प्रकार हैंः
1. भारत पर आक्रमण करने वाले आर्य मध्येशिया के सिन्तास्‍ता से आए थे। वहां आज भी सिन्दोइ नाम से जाने जाते हैं। उन्होंने वहां की नदियों के नाम सिंध की सहायिकाओं के नाम पर रखे थे। एक वोल्गा की सहायक नदी का नाम कुभा रखा था ।
2. इससे सटा अन्द्रानोवो का क्षेत्र है, जो उसका अंगभूत भी है । एक अन्य विद्वाना ऐस्को पार्पोला आर्यों को इस क्षेत्र से भारत मे आते हुए चित्रित करते रहे हैं।
3. आन्द्रोनोवो का मेरी समझ से अर्थ हुआ नव आन्ध्र या अन्ध्र ( सिन्तास्‍ता का सिन्ध देश, सिन्त – सिन्ध, स्ता – स्तान/स्थान)।
4. अब भारत पर/में आर्यों का आक्रमण या आव्रजन हुआ था, या आन्ध्रों का, या सिन्धियों का और जिस प्राचीनतम कृति को आधार बना कर यह कहानी रची गई है उस ऋग्वेद में आन्‍ध्र या सिन्‍धी जनों का नाम क्यों नहीं मिलता?
5. जाहिर है यह पूरी मान्यता प्रस्तुत आंकड़ों के बेमेल होने के कारण गलत है, परन्तु इसके तथ्य सही हैं।

इतिहास क्या है, वास्तविक स्थिति क्या है इस पर हम कल विचार करेंगे । परन्तु जिस सिन्दोइ या सिन्धी या हिन्दी/ हिन्दू के इतिहास पर हम विचार कर रहे हैं वह आज से कम से कम पांच हजार साल पीछे जाता है, और विदेश में सिन्तास्‍ता बसाने वाले सिन्धदेश या ईरानी उच्चारण में हिन्द के और मध्येशिया से आगे के देश्‍ाों के लिए इंद के निवासी थे, यह अनुमान से हम कह सकते हैं ।

Post – 2017-01-07

मैं अपने आप से पूछता रहा कि जिस तल्‍लीनता से ओमपुरी और नसीरुद्दीन शाह अभिनय करते हैं, क्‍या उस तल्‍लीनता से मैं अपने कथानक और चरित्र गढ़ पाता हूं । उत्‍तर ‘न’ मेें मिला और उपन्‍यास लिखना छोड़ दिया ।

Post – 2017-01-06

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 4

मैं अपनी बात फिर कल की अन्तिम कड़ी से आरंभ करूंगा कि हमें अपनी समस्याओं को अपनी नजर से देखना और समझना होगा, न उन्हें इतिहास में जाकर समझा जा सकता है न इतिहास से बाहर आकर, परन्तु किसी ऐसे व्यक्ति या स्रोत पर भरोसा करके, यहां तक की सही बात को उसके बताने पर सही मान कर चलना उसके फरेब का हिस्सा बनना है क्योंकि जहां बात सही भी हो वहां उसकी प्रासंगिकता, अथवा अनुपात आदि की भिन्नता से आपको आपके ही हितो के विरुद्ध इस्तेमाल किया जा सकता है।

पश्चिमी देश दूसरे महायुद्ध से पहले जब अपने उपनिवेशों के विस्तार की प्रतिस्पर्धा में थे, तब उन सबके विद्वान उन देशों के समाज, भाषा, इतिहास और सत्ता के चरित्र का अध्ययन करने में जुटे रहते थे, इसलिए आप को भारतीय अध्ययन के लिए इतालवी, जर्मन, फ्रेंच, रूसी, अमेरिकी और ब्रितानी अधिकारी माने जाने वाले विद्वान परस्पर प्रतिस्पर्धा करते दिखाई देते थे। एक दूसरे से आगे जाने के प्रयत्न में बहुत परिश्रम से उन्होंने ऐसे काम किये जिनकी गुणवत्ता के समक्ष नतशिर होना पड़ता है। उनके काम की लगन और काम की गुणवत्ता को देखते हुए इस ओर ध्यान ही न जाता था कि उसके पीछे राजनीति भी है।

राजनीति थी यह तो अब आप लौट कर देखें तो इस बात से ही समझ में आ जाएगी कि उपनिवेशों की प्रतिस्पर्धा समाप्त होते ही सभी देशों की दिलचस्पी उन देशों और समाजों और उनके इतिहास में समाप्त हो गई या दिखावे भर की रह गई, जिनका अध्‍ययन करने के लिए उनके विद्वान जुटे हुए थे। यदि किसी की दिलचस्पी बनी हुई है तो अकेला अमेरिका है जिसके साधनों और प्रोत्साहनों से अनेकानेक देशों के विद्वान, स्वयं उसके विद्वान वही काम कर रहे हैं क्योंकि अमेरिका अकेला ऐसा देश है जो विश्‍व को अपनी धौंस में रख कर नवउपनिवेशवादी हथकंडे से उन देशों को हांकना और उनकी संपदा का दोहन करना चाहता है! (नव उपनिवेशवाद उपनिवेशवाद का गर्हित रूप है क्‍योंकि उपनिवेशवाद में उपनिवेशों के भले बुरे का उत्‍तरदायित्‍व भी शासकों पर आता है, नव उपनिवेशवाद में उनको बर्वाद करके भी उनके संसाधनों का दोहन किया जाता है।

इसके साथ ईसाइयत के वैसे ही मंसूबे युद्ध से पहले भी थे और आज भी हैं और इनकी आड़ में भी काफी दूर तक, यदि पूरी तरह न भी कहें तो, अमेरिका है। सच कहें तो मुझे मिशनरी योजनाओं, उनके पीछे के आर्थिक संबल, पश्चिमी देशों के आम ईसाई का धर्मनिष्ठा से इसमें सहयोग और पोप की ओर से दिए जाने वाले समर्थन आदि का गणित मालूम नहीं है। मात्र एक अनुमान है कि यदि एक अकिंचन व्यक्ति को धर्मान्तरण के लिए दो लाख दिया और उसके लिए दूसरी अनेक सुविधाएं जुटाई जा सकती हैं तो इसके लिए पूरी दुनिया में बहुत भारी रकम खर्च हो रही है । यह संभव है कि अमेरिकी प्रशासन इसमें स्वयं धन की व्यवस्था न करता हो, मात्र सुविधाओं और अवसरों का प्रबन्ध करता हो जो समर इंस्टीट्यूट आफ लिंग्विस्टिक्स जैसी संस्थाओं के माध्यम से सीआइए करता है, परन्तु इसका नैतिक समर्थन और कूटनीतिक उपयोग अमेरिकी प्रशासन भी करता है। इसी के भरोसे किलपैट्रिक ने भारत के विखंडीकरण – बाल्कनाइजेशन – की धमकी दी थी और अमेरिका इस पर चुपचाप काम करता रहा है, और इसी के कारण संघ को बिना किसी आपराधिक घटना के आतंकवादी संगठन के रूप में चिन्हित किया गया था और मोदी के वीजा में दखल दिया गया था, क्योंकि संघ अकेला ऐसा संगठन है जो इस धर्मान्तरण का विरोध करता आया है।

जिन दिनों दूसरे देशों के विद्वान भारतविद्या या प्राच्यविद्या में प्रतिस्पर्धारत थे, उन दिनों भी उनके बीच एक छिपी सहमति थी कि ऐसे तथ्यों को जो यूरोपीय अग्रता और गोरी नस्ल की श्रेष्ठताबोध से जुड़े हैं और फरेब के तहत सिद्धान्त के रूप में प्रतिपादित किए गए हैं उनका सम्मान करते हुए ही वे अपने शोध और अध्ययन करेंगे, बल्कि अपने अध्ययनों के माध्यम से उनको अटल सत्य बनाने का प्रयत्न करेंगे।

इतिहास का राजनीतिक और कूटनीतिक उपयोग ही हमारी आज की दुनिया की मानव त्रासदी का सबसे बड़ा कारण है और यदि हम सोचें कि आइएसआइ के जिन कुकृत्यों को संचार माध्यमों से सबसे जघन्य बना कर प्रचारित किया जा रहा है और यह बताया जा रहा है कि ऐसा विश्‍व इतिहास में पहले हुआ ही नहीं था और इसलिए पश्चिमी जगत इससे बहुत भयभीत और चिन्तित है तो यह हमारी नासमझी है। वे स्वयं इससे भी जघन्य कृत्यों में शामिल रहे हैं, और इतिहास की असंख्य ऐसी घटनाओं से परिचित हैं।

हम अपनी जगह बैठे, उनके प्रचार के आधार पर यह मान लेते हैं कि यूरोप और अमेरिका इस्लामी आतंकवाद से दहशत में हैं, परन्तु यह निरी नाटकबाजी है और कुछ दूर तक उनकी योजना का हिस्सा ।

इसे भी आप मेरा अनुमान मान सकते हैं, परन्तु आज से तीन साल पहले ‘हाउ डीप आर दि रूट्स आफ इंडियन सिविलाइजेशन’ पर आयोजित एक अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में जिसमें केवल वे तीन पश्चिमी विद्वान सम्मिलित थे, जिनके नामों से हम इसलिए परिचित है कि वे भारतीय या कहें हिन्दू संवेदनाओं के अनुरूप लेखन करते रहे हैं।

मैने अपने निबन्ध का आरंभ ही इस बात से किया कि पश्चिम के अध्येताओं की एक निजी जानकारी है जिससे वे सभी परिचित हैं परन्तु दूसरों से उसका साझा नहीं करते, और एक दूसरी परोसी या निर्यात की जाने वाली जानकारी है जिसमें उस सचाई को छिपाया और विकृत करके परन्तु अन्तिम सत्य बना कर दिखाया जाता है। राजनीतिक और कूटनीतिक तकाजों से इतिहास का उपयोग अब बन्द होना चाहिए। इसी के चलते हमने सभ्यता से हैवानियत पैदा कर दी है। The dichotomy between private knowledge and public discourse must end as we have produced savagery out of civilization. उस समय वे तीनों विद्वान जिन्होंने आर्यों के आक्रमण की कहानी गलत है का नाद करते हुए ‘दक्षिणपंथी’ सोच के लोगों के बीच अपनी पैठ बनाई थी, मंच पर ही थे और एक के मुंह ये हठात निकल गया, यह तो होता ही रहेगा इसे कैसे रोका जा सकता है और शेष दोनों ने तत्काल सहमति में सिर हिलाया । इसे स्खलक्षर न्याय कहते हैं। असावधानी में सचाई को उगल देना। बाद में वे पछताए भी होंगे क्योंकि मेरा इशारा उनकी तरफ भी था और उन्होंने स्वयं सार्वजनिक रूप से मेरे आरोप की पुष्टि कर दी थी।

मेरे पास अपने आरोप के पुष्ट प्रमाण थे जिनका हवाला अपने निबन्ध में दिया था परन्तु यहां इतना ही कि हमारे सामने दो चुनौतियां हैं जिनका सामना हमें करना होगा पर किया नहीं क्योंकि बुद्धिजीवियों ने सत्ता में अपना टुकड़ा तलाशने में अपनी सारी शक्ति लगाई जब कि उनके सामने पश्चिमी मनोबन्धों से मुक्ति का संग्राम छेड़ने और अपनी ज्ञानसंपदा तैयार करनेे की, कहें भौतिक स्वाधीनता प्राप्त करने के बाद मानसिक स्वतन्त्रता प्राप्त करने की अधिक गंभीर और लंबी लड़ाई पड़ी थी।

अपनी महिमा से बेसुध, वे जघन्य तरीकों से सत्ता में आए या सत्ता में विराजमान टुच्चों के कृपापात्र बने और बिना अधिक कुछ किए अधिक से अधिक पाने खाने की चिन्‍ता में प्राणवायु को अपानवायु बनाने में व्यस्त रहे। शायद उनकी सारी शक्ति भारत को सांप्रदायिक ताकतों के हाथों में जाने से बचाने में लगी रही और उनकी इस ताकत के बल पर ही उन्हें जिससे डर था वह सत्ता में आ गई। अब वे देश को तानाशाही से बचाने की चिन्ता में लगे हुए हैं और यदि उनकी सोच यही रही जो ‘भारत की बर्वादी तक जंग रहेगी, जंग रहेगी’ में प्रतिध्वनित था, तो असंभव कुछ नहीं है, वे बुरे दिन भी देखने पड़ सकते हैं परन्तु उनका योगदान या कुयोगदान ऐसा है जिस पर वह अंजाम को जाने बिना या जानते हुए गर्व करते हैं।
दो

यह लंबी भूमिका जो इतनी खिंचती चली गई, जरूरी थी यह बताने के लिए कि हमें जो इतिहास पढ़ने को मिला है उसे दुबारा जांचते हुए पढ़ना होगा और जिन भी समस्याओं का समाधान हम चाहते हैं, वह हमें अपनी सीमित और दूसरों से मिली परन्तु परीक्षित जानकारी के आधार पर ही करना होगा।

हम उसी इतिहास को दूसरे के कहने से याद करके उसकी साजिश के शिकार हो सकते हैं, और उसे ही अपने ढंग से समझते हुए उस तरह की साजिशों के चक्रव्यूह से बाहर निकल सकते हैं ।

इतिहास की भूमिका चिकित्सा में केस हिस्ट़री जैसी है और इसमें न दूसरी की चाल से घालमेल होना चाहिए न ही अपने राग, विराग, क्षोभ या द्रोह के कारण किसी तरह की मिलावट होनी चाहिए । अच्छा हो या बुरा, तथ्य तथ्य है और उसके किसी अंश को नकारने के बाद हम न तो सही निदान कर सकते हैं न ही उस व्याधि का सही उपचार कर सकते हैं।

हमने पीछे जापान, इजराइल, वियतनाम, ईराक आदि के दृष्टान्त दिए । उन पर जाे बीती, वह बीत गई और इतिहास की चीज हो गई, परन्तु यदि इतिहास वर्तमान का हिस्सा बन जाय और हमारे न चाहते हुए भी दूसरों की मध्यकालीन सोच के कारण बना रह जाय तो क्या हम उतनी आसानी से उसको भुला सकते हैं?

हमारा दुर्भाग्य है कि दूसरों का इतिहास इतिहास बन जाता है और वे उससे शिक्षा मात्र लेते हैं, उन्‍हें उससे उलझना नहीं पड़ता, हमारा इतिहास इतिहास नहीं बन पाता और वर्तमान पर भारी पड़ता है और हमारी आधी से अधिक शक्ति उस इतिहास से लड़ने में खर्च हो जाती है। अपनी वर्तमान समस्याओं का सामना करने के लिए ऊर्जा तक नहीं बची रहती! ऐसा न होता तो पिछले चालीस साल से भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद, मिलावट, जमाखोरी, वंशवाद, निकम्मापन, रिश्‍वतखोरी, बेरोजगारी, बढ़ती हुई आर्थिक विषमता, किसानों की आत्महत्या, देश के बाजारीकरण की प्रक्रिया और आत्मनिर्भरता के ह्रास, शिक्षा की जड़ों में ही नव अभिजातवाद के प्रवेश और उसके उच्छेदन में अरुचि, चिकित्सा के निजीकरण और अधिसंख्य जनों को चिकित्सा सुविधाओं से वंचित किए जाने जैसी समस्याओं को छोड़ कर या उनसे समझौता करते हुए हम केवल सांप्रदायिकता के विरोध पर इतने टूटे हथियारों से जुटे न रहते कि उसी की बदौलत वह आ धमकती और तब पता चलता कि सांप्रदायिकता को मिटाने को वह स्वयं चिन्तित है जिसे सांप्रदायिकता का जनक बताया जा रहा था और उसे जिलाए रखने के तरीके वे निकाल रहे हैं जो कागजी तलवार से इसका विरोध करते रहे हैं, पर जानते हैं कि इसके अतिरिक्त उनको जीवित रखने का कोई मुद्दा बचा ही नहीं है।

बौद्धिक मसखरे अपनी रोजी के लिए अपना खेल दिखा रहे हैं, हम समझ बैठते हैं कि वे देश और समाज के लिए चिन्तित हैं। हम इतिहास को छोड़ने को तैयार रहे हैं, प्रत्येक नये विचार, आन्दोलन, नैतिक तकाजे का समर्थन किया है, परन्तु दूसरों का इतिहास आपके गले पड़ जाय तो क्या उपाय है!

हम हिन्दुत्व के प्रति घृणा के इतिहास की पड़ताल करने को निकले थे और यह इतिहास उस पुरातन अवस्था तक जाता है जब हिन्दू शब्द का प्रयोग नहीं होता था और कोई दूसरा शब्द भी उस अवधारणा का स्थान नहीं ले सकता जिसे हिन्दू शब्द व्यंजित करता है, क्याेकि इसका एक सिरा भौगोलिक क्षेत्र या देश्‍ा से जुड़ता है और दूसरा संस्कृति से कहें, राष्ट्रीय संस्कृति से। विषय बहुत जटिल और बहुआयामी है! ऐसा कि इसकी भूमिका में ही इतना समय लग गया। फिर आज तो खत्म होने से रहा !

Post – 2017-01-05

हिन्‍दुत्‍व के प्रति घृृणा का इतिहास – 3

इतिहास में बहुत कुछ ऐसा है जो मनुष्य को पशुओं से भी गर्हित सिद्ध करता है । वर्तमान में भी ऐसा बहुत कुछ होता रहता है जो इतिहास से प्रेरित भी होता है, और उतना ही जघन्य होता है। मनुष्य बने रहने के लिए जिस सन्तुलन की अपेक्षा है उसे मनुष्य आज तक हासिल नहीं कर सका । इतिहास का अध्ययन करते समय दो बातों पर ध्यान रखना जरूरी है । जिन देशों या समाजों को अमानवीय यातनाओं से गुजरना पड़ा है वे बाद में उनका सामना किन रूपों में करते रहे हैं ।

उदाहरण के लिए यहूदियों को पूरे यूरोप में भेदभाव का शिकार होना पड़ा, एक व्यक्ति की घृणा के चरम पर पहुंंच जाने के कारण उन्हें उस त्रासदी का शिकार होना पड़ा जिसको लगातार याद दिलाया जाता है। उनके मन में जर्मन समाज या गोरी जातियों के प्रति बदले की आग नहीं है, पर साथ ही उन्हें वह इतिहास भूला नहीं है। पता होते हुए भी, प्रतिशोध वर्तमान व्यवहार का हिस्सा नहीं है । वर्तमान में उनके द्वारा कू्रताएं तो हुईं हैं परन्तु, वर्तमान दबावों में, दूसरो के प्रति, जिनका चरित्र हमें अच्छी तरह मालूम नहीं है।

जिस रूप में वह हमें समझाया जाता है उसमें मुस्लिम देशों के साथ हमारे संबन्ध आड़े आते हैं । मुस्लिम देशों के साथ हमारे संबंध का एक पहलू यह है कि हमारी आन्तरिक समस्याओं के चलते हमारी राष्ट्रीय सोच समन्‍वयवादी रही है और इसका अन्‍तर्राष्‍ट्रीय पक्ष आर्थिक सरोकारों से प्रभावित रहा है, अत: तेल के देशों की ओर हमारा झुकाव किसी ऐसे देश की अपेक्षा अधिक रहा है, जिसके पास हमें देने को कुछ नहीं था।

हमारे सामने दो बातें साफ हैं। एक यह कि यहूदी चाहें भी तो हिटलर का कुछ बिगाड़ नहीं सकते, न ही जर्मन नागरिकों के प्रति अपने रोष को, यदि वह मन में दबा हो तो भी, अमल में ला सकते हैं। दूसरा यह कि इस तरह का कोई प्रयास उनको उसी नस्लद्वेषी छवि में उतारेगा जिसके कारण यहूदीद्वेष को हम गर्हित मानते हैं।

इससे मिलता जुलता उदाहरण जापान का है । वह अपनी विवशता में विजेता से बदला ले नहीं सकता था, उसे उसने अमेरिकी जनों के प्रति द्वेष का रूप न दिया और अपनी सीमाओं का उपयोग अपने आर्थिक उन्नयन में किया, परन्तु अपने उस इतिहास को वह न तो मिटा सकता है न मिटाने की चेष्टा की है। वियतनाम को, ईराक को जिन यातनाओं से गुजरना पड़ा उसके गवाह तो हममें से अधिकांश लोग हैं, परन्तु इस इतिहास को जानना जितना जरूरी है उतना ही उसकी आंच से बाहर आना जरूरी है। अन्यंथा कोई समाज अपने वर्तमान का सामना नहीं कर सकता।

परन्तु कुछ शक्तियां हैं जो अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए इस प्रयत्न में रहती हैं कि पिछड़े समाजों को उनके इतिहास से बाहर आने में बाधा पहुंचाई जाय! न वे आधुनिक बन सकें, न आधुनिक समस्याओं का सही उपचार कर सकें, न ही आधुनिक समाजों के शस्त्रों , अभिलेखागारों और सूचनातन्त्राे के सामने ठहर सकेंं।

हमने जिस लेख का हवाला दिया वह उसी प्रचारतन्त्र का हिस्सा है। हिन्दू हित से कातर यूरोपीय और अमेरिकी विद्वानों का यदि एक धड़ा अपने काम पर लगा हुआ है। उनकी जानकारी मेरे देश और समाज के बारे में कुछ माने में मुझसे अच्छी है, क्योंकि साधन, स्रोतों और पर्यटन की सुविधा उसी अनुपात में अधिक है, परन्‍तु उनका लक्ष्य हमारे इतिहास की या हिन्दूे समाज की महिमा की प्रतिष्ठा नहीं है, अपितु हमारे समाज में पैठ बना कर, समाज को भीतर से उत्तेेजित करते हुए, आन्तरिक उपद्रव पैदा करना है।

इसलिए इस बात को आंखो से ओझल नहीं होने देना चाहिए कि किसी उपक्रम से जुड़े व्यक्ति को उस काम के लिए साधन कौन सुलभ करा रहा है । वह व्यक्ति अपने समाज का हो या विदेशी, उसको आर्थिक संबल देने वाला उसका उपयोग अपने लिए कर रहा है न कि हमारे लिए ।

यदि उसका काम कर रहा है तो उन्हीं सवालों और संवेदनाओं के प्रति नफरत फैलाने वाले किसका काम कर रहे हैं और किससे संरक्षण पा रहे हैं । नफरत फैलाने वालों का चेहर उजागर हो जाता है। उनके पास समर्थन उसी के अनुरूप बहुत अधिक होता है, परन्तु जो आपके समाज में पुरानी यादों से उत्तेजना पैदा करते हुए कुछ ऐसा कराना चाहते हैं जिससे संघ को आतंकवादी संगठन बताया जा सके, वे हिन्दुओं के हित का काम कर रहे हैं, या जड़ों में मट्ठा डाल रहे हैं ।

काटने और उखाड़ने वाले की पहचान आसानी से हो जाती है कि यह जिसे काट या उखाड़ रहा है उसका अनिष्ट चाहता था और वही कर रहा है, परन्तु जड़ों में मट्ठा डालने वाले को देख कर यह भ्रम बना रहता है कि संभवत: वह पौधे को सींच रहा है । यह रहस्य मट्ठा डालने वाला ही जानता है कि काटने पर जड़ों से शक्ति पा कर उसी मूल या अनकटे तने से पौधा हरा हो सकता है, परन्तु जड़ों में उनका उच्छेद करने वाले कीटाणुओं का प्रवेश कराने के बाद उसे कोई बचा नहीं सकता।

अत: किसी समाज के प्रति घृणा के दो उपागम हैं । एक जो वह है उसकी विकृतियों को ही उसकी समग्र उपलब्धि और उपलब्धियों को विकृत या नजरअन्दाज करके या गर्हित रूप में चित्रित करते हुए उसे दूसरों की नजर में गिराता और अरक्षणीय बनाता है और दूसरा जो उसे ऐसे बयानों या कार्यों के लिए‍ मित्र बन कर प्रेरित करता है।

इनकी पहचान कठिन होती है यद्यपि इनके लिए भेड़ों के बीच काली भेंड़ का मुहावरा बहुत पहले से चलता है । इन दोनों धड़ों के यूरोपीय विद्वानों से, जिन्हें विद्वान न कह कर कारकुन या एजेंट कहना अधिक सही होगा, मेरा साबका पड़ता रहा है और यह कहना कुछ अटपटा लगेगा, परन्तु सच यही है कि उन्हें मुझसे असुविधा अनुभव होती रही है।

मैं इसे दो उदाहरणों से स्पष्ट करना चाहूंगा । पहला यह दिखाने के लिए कि विद्वान या विशेषज्ञ के रूप में हमें बहुत प्रीतिकर लगने वाले दुहरी भूमिका पेश करते हैं। विशेषज्ञता मुखौटा होती है, खुफियागीरी मुख्य काम होता है। इससे मैं दूसरों को सहमत नहीं कर सकता, ये मेरे विचार हैं और ये इस विचित्र संयोग पर आधारित हैं कि ईराक युद्ध से पहले अमेरिकी पुरातत्वविदों का दल ओमान के तेल एल जुनैज में, काम कर रहा था, अफगानिस्तान की गतिविधियों में तेजी आने से पहले पाकिस्तान में मोहेंजोदड़ो की ड्रि‍लिंग कर रहा था और फिर भारत पाक संबंधों में कुछ संभावनाएं देख कर वह भारत की ओर मुड़ा। इसे आप कयास मान कर खारिज कर सकते हैं, परन्‍तु समर इंस्टीट्यूट आफ लिंग्विस्टिक्स तो प्रमाणित रूप में सीआइए से चालित है। उसका लक्ष्य ईसाइयत का प्रसार है और फिर भी हमारे असंख्य विद्वान उसके कोर्स और डिस्को्र्स पर फिदा मिलेंगे और कोई आलोचना सुनने को तैयार न होंगे, क्योंकि उनका वर्तमान, अतीत या भविष्य उससे लाभान्वित रहा है।

दूसरा उदाहरण इस बात को स्पष्ट करने के लिए कि पश्चिमी विद्वान हमसे अपनी जानकारी साझा नहीं करते । उनके मुखौटों के पीछे का चेहरा हमें ही नहीं, उनके समाज के आम लोगों को भी दिखाई नहीं देता। उनकी नीयत पर शक करने का मेरा प्रधान कारण यह रहा है कि वे केवल उस सीमा तक किसी सचाई को स्वीकार करते हैं जिसका निषेध नहीं किया जा सकता, परन्तु उसी स्वक़ृति की अनिवार्य परिणति को स्वीकारने को तैयार नहीं होते।

व्यक्तिगत सन्दर्भ को अपने अनुभव का हिस्सा मान कर समझें तो गलतफहमी पैदा नहीं होगी। मेरी पुस्तक हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य 1987 में प्रकाश में आई, दि वेदिक हड़प्‍पन्‍स की पांडुलिपि 1993 में तैयार हो गई थी और ऐसे प्रकाशक के पास थी जिसने एक बार आपसी बातचीत में झटके में स्वीकार कर लिया था कि उसका संबंध सीआईए से रह चुका है और मैने सुन कर अनसुना कर दिया, क्योंकि केजीबी से संबंध रखने वालों के भी इस पक्ष को नजरअन्दाज करता आया था। उसके यहां उन ‘विद्वानों’ की पहुंच ही न थी, ठहरने का प्रबन्ध भी था जिनको पांडुलिपि के स्तर पर ही उसने इसे पढ़ने को दे दिया था। मुझे प्रकाशन से ठीक पहले यह खब्त सवार हुई कि क्यों न सभ्यता के चरित्र को परिभाषित करने वाले शब्दों का संकलन प्रत्येक अध्याय में जोड़ दिया जाय।

इसकी तैयारी में और इसके कारण हुए विलंब के कारण दि वेदिक हड़प्पन्स का प्रकाशन 1995 में हो पाया पर उसी प्रकाशक के यहां से 1994 में कुछ नये तेवर के साथ एक पुस्तक यह मानते हुए कि आर्य आक्रमण गलत था, आ गई । प्रकाशक की रुचि मेरी पुस्‍तक से अधिक इस स्‍थापना में थी और वह पुस्‍तक भी उसी ने प्रकाशित की थी। फिर कुछ और पुस्त‍कें भी आईं। सबमें आर्य आक्रमण की धज्जियां उड़ाई गईं परन्तु उससे आगे का कुछ नहीं । आप जानना चाहेंगे आगे का क्या।

आगे का यह कि यदि आर्य आक्रमण की मान्यता ध्वस्त है और वेद के रचयिता भारत के निवासी थे, तो उनकी भाषा और संस्कृति का प्रसार भारत से यूरोप तक हुआ, यह इस स्वीकारोक्ति की तार्किक परिणति है। परन्तु यहां वे खामोश रहेंगे । उल्टे यह दलील देंगे कि भाषा विशेषज्ञता का क्षेत्र है और उसमें हम दखल नहीं दे सकते। उसके निर्णय वैज्ञानिक हैं, अर्थात् वे यह दिखाते हुए कि हम भी मानते हैं तथाकथित आर्य जाति का सिद्धान्त और आर्यों के आक्रमण का सिद्धान्त गलत है, पर इससे आगे के सवाल विशेषज्ञता के क्षेत्र में आते हैं। वे इस विकल्प को चुपचाप बचाए रखते हैं कि बाद में इसका इस रूप में उपयोग किया जा सके कि अमुक ने आक्रमण की मान्यता को गलत कहा था, यह तो नहीं कहा था कि किसी और तरीके से, जैसे शरणार्थी या घुसपैठिये के रूप में बाहर से इस संस्कृति के वाहक नहीं आए होंगे।

हिन्दूवादी सोच को सब कुछ मिल गया, यह सोचे बिना कि इसके कुछ चोर दरवाजे बचा रखे गए हैं, आगे सोचने को कुछ बचता ही नहीं । विदेशी समर्थन से विह्वल हो कर एक ऐसे कारकुन को वाजपेयी सरकार के समय ही, पद्म परंपरा का उल्लंघन करते हुए पद्मपुरस्कार ही न दे दिया, नई सरकार में आइसीएचआर के सदस्य के रूप में भी मान्याता दे दी – धन्य धन्य गुरु आप ने डूबत लिया उबार ।

यह उन कारणों में से एक है मैं, संघ और भाजपा से जुड़े लोगों को अनपढ़ तो मानता ही हूं, दूर्भाग्यवश पढ़े लिखों को भी पढ़ा लिखा नहीं मान पाता, क्योंं‍कि वे पढ़ने के साथ मानते भी चलते है़।

आप कहेंगे, ‘होश में आइये जनाब। अपने शीर्षक की लाज तो रखते।‘ मैं कहूंगा, इतिहास वर्तमान से जुडा होता है और इतिहास की समझ वर्तमान की समझ से पैदा होती है और इसी तरह वर्तमान की समझ इतिहास की समझ से। इस पर हम कल बात जारी रखेंगे ।

Post – 2017-01-04

हिन्‍दुत्‍व के प्रति घृृणा का इतिहास – 2

मैंने आज दो बार अपने आलेख लिखे और दोनों बार वे मिट या धुुल गए । दिन अपनी प्रकाश्‍य पुस्‍तक के अंतिम प्रू फ देख्‍ाने में गुजारे थे। तिहरी मार। पर फिर भी मैं आज के दिन को खाली नहीं जाने देना चाहता इसलिए कुछ सूत्रवाक्‍य ही सही:

1. हम कहांं है, क्‍या जानते हैं, हमारे ज्ञान का स्रोत क्‍या है, हम उसके पीछे भी कुछ देख पाते हैं या नहीं, देखते हैं तो अपनी ज्ञानव्‍यवस्‍था को पुन: दुरुस्‍त करते हैं या नहीं, ये कुछ सवाल हैंं जिनसे बच कर हम निकलना चाहें तो एक नई जहालत में ही दाखिल होंगे, हमें अपने आप से पूछते हुए और इसलिए जो पढ़ते हैं उससे जिरह करते हुए पढ़ना चाहिए ।

2. हमने कल कुछ उद्धरण एक लेख से प्रस्‍तु त करते हुए कहा हम इस पर कल विचार करेंगे । विचार तो इरेज हो गया, फिर भी यह याद दिलाना जरूरी है कि इनमें से कोई भी ऐसी सचाई नहीं है, जिसे हम पहले सेे जानते न रहे हों, या जिनसेे क्षुब्‍ध अनुभव न किया हो, परन्‍तु फिर भी हमें यह पता न था, न ही इस क्रूर सत्‍य का पता था कि हिन्‍दुओं को इस्‍लामी धर्मद्र्रोहियों के हाथों जितनी यातनाएं भोगनी वे विश्‍व इतिहास में किसी को न भुगतनी पड़ी। परन्‍तु वह आठ सौ साल मे घटित घटनाआं को एक बिन्‍दु पर पहुंचा कर इसका आकलन करता है और हो सकता है परेाक्ष रूप में इस बात के लिए उकसाता भी रहा हो कि कायराेे, कब तक चुप रहोगेे।

3. लेख ठीक उस वर्ष में प्रकाशित हुआ था जब भाजपा सरकार भारी बहुमत से सत्‍ता में आई थी अौर प्रकाशित एक ऐसी पत्रिका में हुआ था जिसे मुस्लिम द्रोही कहा जा सकता है। अााप उसे अपना मित्र भी मान सकते हैं क्‍योंकि शत्रु का शत्रु अपना मित्र होता है और यह भूल भी सकते हैं कि इसके फरेब में हमने मुहम्‍मद गोरी और बाबर को अाामन्त्रित किया था और अपनी गुलामी की बेडि़यांं पहनी और फिर मजबूत की थीं।
इस‍लिए समझ यह होनाी चाहिए कि शत्रु के शत्रुअों में अधिक चालाक कौन है और कौन किनका उपयोग कर रहा है। इस मामले में क्षोभ दोनों का बराबर रहा हो पर जयचन्‍द्र अाौर राणा सांंगा की भूमिका अधिक भिन्‍न न थी और इन दोनों का हमारे ऊपर विदेशी शासन लागू करने या हमारी दासता का विस्‍तार करने में भी कुछ योगदान है।

4. भारतीय और विश्‍व यथार्थ एक दुर्भाग्‍यपूर्ण नतीजे पर पहुंचने को बाध्‍य करता है। मुसलमान जहां भी रहेगा, चैन से नहीं रह सकता और उससे लल्‍लो-चप्‍पो के आधार पर भाववादी संबन्‍ध बनाना, उसके खतरे उठाना मूर्खता है और सदाशयता का विस्‍तार इतना न हो जाय कि आप नई दासता को आमन्त्रित करते मिलें।

5. हमें उकसाने वाला उन्‍हीं सूचनाओं को हमारी चेतना मे, जो पर्याप्‍त कारणों से पहले से ही विक्षुब्‍ध है, उकेरने वाला अपना कौन सा व्‍यक्तिगत अथवा सामुदायिक स्‍वार्थ साध्‍ा रहा है कि हमारे आंसू तो रूमाल तक नहीं भिगो पाते पर उसके आंसू जलप्‍लावन लाने पर उतारू हैं।

इस समय इन प्रश्‍नों पर विचार करते हुए कल की पोस्‍ट दुबारा पढ़े, कल हम पूरी तैयारी के साथ उस पर बात कर सकेंगे।

Post – 2017-01-03

हिन्‍दुत्‍व के प्रति घृणा का इतिहास -1
इस बहस मेें जाने का कोई लाभ नहीं कि तुर्को के प्रतिलोम अर्थात विदेशी के विलोम के रूप में हिन्‍द के स्‍थानीय लोगों के लिए कब हिन्‍दू शब्‍द का प्रयोग होने लगा और फिर कब यह स्‍थानीय जनों में भी भेद करता हुआ केवल वर्णविभाजित समाज के लिए प्रयोग में आने लगा और इसमें से पहले सिख, फिर जैन और बौद्ध अपने को हिन्‍दू मानने से कतराने लगे या व्‍याख्‍याकारों ने उन्‍हें अहिन्‍दू बताना आरंभ कर दिया और इसके बाद रामकृष्‍ण मिशन से जुड़े लोगों ने भी हिन्‍दू न रहने में कुछ फायदे देखे और यह दलील देने लगे कि हम हिन्‍दू नहीं हैं। हाल के दिनों में दलितों को भी यह समझाया जा रहा है और यह बात उनमें से कुछ क समझ में भी आती जा रही है कि हिन्‍दू न रहना अधिक लाभकर है।
जहां तक हमारी समझ है हिन्‍दू वर्णव्‍यववस्‍था के सताए हुए लोगों को ही परिगणित जातियों में और पंंचम वर्ण माने जाने चाले अन्‍त्‍यजों और वन्‍य गणाें को अनुसूचित जनजाति में रखा गया था और इसलिए मुसलमानों और ईसाइयों, पारसियों और यहूदियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता था क्‍योंकि वे वर्णव्‍यवस्‍था से अपने को मुक्‍त मानते और वर्णव्‍यवस्‍था में बंधे रह जाने के कारण हिन्‍दू समाज की भर्त्‍सना करते रहे हैं और जनजातियों और दलितों को सामाजिक न्‍याय और बराबरी के आश्‍वासन से धर्मान्‍तरण के लिए फुसलाते रहे हैं (जानकार लोग इसमें चूक का संकेत कर सकते हैं)।
फिर भी यह याद दिलाना जरूरी है कि वर्णव्‍यवस्‍था की जटिलता को समझने के लिए जितने गहन अध्‍ययनों की अपेक्षा थी वह नहीं की गई क्‍योंकि बुद्धिजीवी को राजनीति से ही फुर्सत नहीं मिलती क्‍योंकि यह बिना किसी गहन आयास के लगे हाथ की जा सकती है। इसके लिए झोला उठाने की योग्‍यता ही पर्याप्त है। अपने को गिरा कर उठाने के आसान विकल्‍प मिल जाते हैंं। इस सतही पन में यह मान लिया गया कि किसी शास्‍त्रकार के विधान के कारण, या कम से कम ब्राह्मणों की कुटिलता के कारण वर्णविभाजन पैदा हो गया और हिन्‍दू धर्म से बाहर चले जाने पर इससे मुक्ति मिल जाती है जब कि अपने को वर्णमुक्‍त कहनेवाले मतों में कोई भी ऐसा नहीं है जिसमें खुले या छिपे रूप में अस्‍पृश्‍यता के निकट पहुंचने वाले विभेद देखने में आते हैं । इस माने में भी सभी हिन्‍दू ही बने रह जाते हैं।
दूसरे यह कि विदेशियों की नजर में समस्‍त भारत वासी, संभवत: सभी बांग्‍लादेशी, नेपाली और पाकिस्‍तानी भी हिन्‍दी हैं और यह संज्ञा मुस्लिम देशों में भी भाारतीय मुसलमानों और हिन्‍दुओं दोनों के लिए प्रचलित है। हिन्‍दू और हिन्‍दी का मतलब एक ही है, हिन्‍द या और भी सटीक होने का प्रयत्‍न करें तो सिन्‍ध नद प्रदेश और उससे आगे का भाग हिन्‍द है और इसकी बोली, संस्‍कृति और निवासी हिन्‍दी है उसका मजहब केई भी क्‍यों न हो।
तीसरी बात जो याद रखने की हैै वह यह कि तुर्क के प्रतिलोम के रूप में हिन्‍दू का प्रयोग तो कबीर में भी – हिन्‍दुन की हिन्‍दुआई देखी तुरुकन की तुरुकाई – देखने में आता है, परन्‍तु भाषा के लिए हिन्‍दी प्रयोग उर्दू के लेखक भी करते रहे हैं। मोटे तौर पर धर्म या समाज के रूप में बिलगाववादी या एक्‍सक्‍लूसिव पद के रूप में हिन्‍दू या हिन्‍दी का प्रयोग और इसकाे संकुचित करते जाने की प्रक्रिया ब्रितानी बांटों और राज करो की नीति के तहत आरंभ हुई और उसी नीति को आगे जारी रखते हुए स्‍वतन्‍त्र भारत के प्रभुओं ने इसे उस परिणति पर पहुंचाने की कुटिलता को अपनी शासकीय नीति का हिस्‍सा बनाए रखा है।
अत: सबको जोडने मिलाने और भारत की एकता और संघीयता की चिन्‍ता तक करने वालों की संख्‍या घटती चली गई है और इसका भार केवल उन हिन्‍दुओं पर रह गया है जिन्‍हें हिन्‍दू कहने के वैकल्पिकक रूप में सांप्रदायिक भी कहा जा रहा है इसलिए आप कह सकते हैं कि भारत को जोड़ मिला कर रखने के दायित्‍व का दूसरा नाम सांप्रदायिकता है। यह हमारे लिए दुर्भाग्‍यपूर्ण स्थिति हो सकती है परन्‍तु एेसे लोगों की संख्‍या शिक्षित समाज में बढ़ी है जो देश प्रेम को भक्तिभाव और देशद्रोह को आजादी के रूप में परिभाषित करना चाहते हैं। इससे उनकाे स्‍वयं क्षति भी उठानी पड़ी है जो तोडफोड करते हुए अपनी ऊर्जा का अपव्‍यय करने वालों को उठानी पड़ती है, परन्‍तु एक लत के रूप में वे इसके इतने आदी हो चुके हैं कि वे अपनी आदत सुधार नहीं सकते । परन्‍तु अपने कार्यभार के अनुरूप सदाशयता का निर्वाह हिन्‍दूपन या भारतीयता की रक्षा के लिए चिन्तित दीखने वाले लोग कर पा रहे हैं, इस पर मुझे सन्‍देह है। भले ऐसा प्रतिक्रिया के कारण
हो रहा हा।
भारतीय समाज कबीलाई सममुदायों की तरह कभी एकाश्‍म नहीं रहा। इसमें वर्चस्‍व और हितों का टकराव आदि काल से रहा है परन्‍तु इसने एक ऐसे तन्‍त्र का विकास आज से चार पांच हजार साल पहले कर लिया था जिसमें सामाजिक स्‍तर पर विचार और परहेज ने हिंसा को अव्‍यवहार्य बना दिया था और किसी व्‍यक्ति या अवध्‍य प्राणियों की हत्‍या हो जाने पर व्‍यक्ति को हत्‍यारी लग जाती थी और वह मृत्‍युदंड से भी अधिक यातनापूर्ण प्रायश्चित करना होता था। हिंसा केवल सत्‍ता या सामरिक स्थितियों तक सीमित थी जो जमीन जायजाद को लेकर छोटे पैमाने पर भी हुआ करती थी और इन स्थितियों में किसी के हाथों प्राण जाने पर प्रायश्ति का विधान कुछ सह्य या आर्थिक हो जाता था। राजा युद्ध के बाद यज्ञ आदि के द्वारा पापमुक्‍त होते थे और साधारण लोग भोज और दान आदि दे कर । परन्‍तु इस विधान के कारण समाज में सौमनस्‍य स्‍थापित हो जाता था, जब कि इस्‍लाम के प्रवेश के बाद स्थिति बदल गई।
पहली नजर में ऐसा लगता है कि भारत में हिन्‍दू मुसलिम संबंध कभी अच्‍छे नहीं रहे परन्‍तु कुछ और ध्‍यान देने पर पता चलता है कि अहम प्रश्‍न का अध्‍ययन भी उतने ही सतहीपन से किया गया जैसे वर्ण्‍व्‍यवस्‍था का। इसमें कोई सन्‍देह नहीं कि विश्‍व इतिहास में क्रूरता और पाश्‍वविकता की हदों को पार करने वाली संवेदनशून्‍यता का जैसा उदाहरण भारतीय इतिहास में देखने में आता है वह न इससे पहले कभी देखने में आया था न कहीं अन्‍यत्र इतने लंबे समय तक देखने में आया था। उनका आचरण इतना गर्हित था जिसकी कल्‍पना कभी भारती पुराधकथाओंमें राक्षसों के विषय में भी नहीं की गई थी।
परन्‍तु कामचलाऊ रुख के कारण इतिहासकारों ने इसे बहुत सलीके से पेश नहीं किया। इसमें शक नहीं कि जितनी भारी कीमत भारत को चुकानी पड़ी जितना रक्‍तपात इस्‍लाम के नाम पर भारत में हुआ, जितनी क्रूरता और घृणा से इसे अंजाम दिया गया उसके सामने हिटलर ही नहीं आज के बहुप्रचारित आइएसआई की क्रूरताएं भी तुच्‍छ लगेंगी। इसे सभी इतिहासकारों ने स्‍वीकार किया है सिवाय उन इतिहासकारों के जिनको ठेके पर इतिहास की पाठ्यपुस्‍तकें लिखने के काम पर लगाया गया था, और जिन्‍होंने उस क्रूरता की हिमायत में, उधर से ध्‍यान हटाने के लिए वैदिक जनों को आक्रमणकारी आर्यों की पहचान दे कर उसी रंग में रंग कर उन पाठ्पुस्‍तकों में भी दिखाने का प्रयास किया। इतिहासकारों में से कुछ के विचार अभी हाल में मैं एक यहूदी सरोकारों से निकाले गए एक पत्र में प्रकाशित लेख में देख रहा था । लेख का शीर्षक था Islamic India: The biggest holocaust in World History… whitewashed from history books और यह 31, 2014 BY ADMININ MIDDLE EAST & WORLD में प्रकाशित था। इसके कुछ अंशों को हम पहले बिना किसी टिप्‍पणी के रखना चाहेंगे:
The genocide suffered by the Hindus of India at the hands of Arab, Turkish, Mughal and Afghan occupying forces for a period of 800 years is as yet formally unrecognised by the World.
….
The only similar genocide in the recent past was that of the Jewish people at the hands of the Nazis.
The holocaust of the Hindus in India was of even greater proportions, the only difference was that it continued for 800 years, till the brutal regimes were effectively overpowered in a life and death struggle by the Sikhs in the Panjab and the Hindu Maratha armies in other parts of India in the late 1700’s.
Will Durant argued in his 1935 book “The Story of Civilisation: Our Oriental Heritage” (page 459):
“The Mohammedan conquest of India is probably the bloodiest story in history. The Islamic historians and scholars have recorded with great glee and pride the slaughters of Hindus, forced conversions, abduction of Hindu women and children to slave markets and the destruction of temples carried out by the warriors of Islam during 800 AD to 1700 AD. Millions of Hindus were converted to Islam by sword during this period.”
Francois Gautier in his book ‘Rewriting Indian History’ (1996) wrote:
“The massacres perpetuated by Muslims in India are unparalleled in history, bigger than the Holocaust of the Jews by the Nazis; or the massacre of the Armenians by the Turks; more extensive even than the slaughter of the South American native populations by the invading Spanish and Portuguese.”
Writer Fernand Braudel wrote in A History of Civilisations (1995), that Islamic rule in India as a
“colonial experiment” was “extremely violent”, and “the Muslims could not rule the country except by systematic terror. Cruelty was the norm – burnings, summary executions, crucifixions or impalements, inventive tortures. Hindu temples were destroyed to make way for mosques. On occasion there were forced conversions. If ever there were an uprising, it was instantly and savagely repressed: houses were burned, the countryside was laid waste, men were slaughtered and women were taken as slaves.”
Alain Danielou in his book, Histoire de l’ Inde writes:
“From the time Muslims started arriving, around 632 AD, the history of India becomes a long, monotonous series of murders, massacres, spoliations, and destructions. It is, as usual, in the name of ‘a holy war’ of their faith, of their sole God, that the barbarians have destroyed civilizations, wiped out entire races.”
Irfan Husain in his article “Demons from the Past” observes:
“While historical events should be judged in the context of their times, it cannot be denied that even in that bloody period of history, no mercy was shown to the Hindus unfortunate enough to be in the path of either the Arab conquerors of Sindh and south Punjab, or the Central Asians who swept in from Afghanistan…The Muslim heroes who figure larger than life in our history books committed some dreadful crimes. Mahmud of Ghazni, Qutb-ud-Din Aibak, Balban, Mohammed bin Qasim, and Sultan Mohammad Tughlak, all have blood-stained hands that the passage of years has not cleansed..Seen through Hindu eyes, the Muslim invasion of their homeland was an unmitigated disaster.
इस पर अपनी समझ और योग्‍यता के अनुसार कल समझेंगे।

Post – 2017-01-03

इतिहास का वर्तमान खंड चार का समर्पण वाक्‍य

मैंने गांधी जी को नहीं देखा
पर
अनुपम मिश्र को देखा था