Post – 2018-03-15

हमारी भाषा (3)

नैसर्गिक शब्द

भाषाविज्ञानियों ने एक विशेष कोटि में आने वाले शब्दों के लिए बहुत सारे शब्दों का प्रयोग किया है – इमिटेटिव, ओनोमैटोपोइक, इको, रिवरवरेटिव, आदि परंतु कोई उस पूरे वर्ग को समेट नहीं पाता जिसकी मैं बात करना चाहता हूं। इसकी एक मोटी परिभाषा मेरे सामने है।

मैं भाषा के कृत्रिम और नैसर्गिक दो स्रोतोंकी बात करना चाहता हूं। पहले इस तरह का विभाजन नहीं किया गया था, परंतु चेतना के स्तर पर यह वर्गीकरण भाषावैज्ञानिकों के विमर्श में बना हुआ था। भाषावैज्ञानिक नैसर्गिक शब्दों की बहुआयामी भूमिका को अब तक समझने में असफल रहे और इसके साथ ही मानव निर्मित या कृत्रिम शब्दों की निर्माण प्रक्रिया को भी नहीं समझ पाए। यह मेरा भ्रम हो सकता है, परंतु यदि कोई जानकार व्यक्ति मेरी भूल सुधार सके तो मेरा काम आसान हो जाएगा। मेरा ध्यान भी इस ओर इसलिए गया मैं भाषा विज्ञान की पुस्तकों और अध्यापकों से दूर रहा। अपनी समस्याओं का हल मुझे अपने ढंग से निकालना पड़ा । शास्त्रीय चर्चा से अधिक अच्छा है कि हम अपने अनुभव की बात करें ।

1968 में दक्षिण भारतीय भाषाओं को सीखने के क्रम मैं उनकी शब्दावली का तुलनात्मक अध्ययन किया करता था । इस क्रम में मुझको पता चला उन भाषाओं में ऐसे बहुत से शब्द है, जो संस्कृत से नहीं गए हैं, परंतु हमारी बोलचाल की भाषा में पाए जाते हैं । ऐसा कैसे हुआ यह मेरी समझ में नहीं आ रहा था । स्थानों में कुछ नाम में पाई जाने वाली समानता मुझे इन को समझने की प्रेरणा देती रहती थी, जैसे उत्तर भारत में सलेमपुर और दक्षिण में सलेम । स्थानों नामों में अधिकांश अटपटे लगते, जिनका अर्थ समझ में नहीं आता। लोगों से जिज्ञासा करने पर, सपाट जवाब मिलता, यही नाम है। इनका कोई अर्थ नहीं है। मुझे ऐसा उत्तर एक भाषाविज्ञानी मित्र से भी मिला । उन्होंने अपने कथन के दृष्टांत में दिल्ली के मुनीरका और उससे सटे चिन्नी मुनीरका का नाम लेकर उल्टा प्रश्न किया, क्या इनका मुनियों से या चीनी से कोई संबंध है। अंतर हमारे दृष्टिकोण में था वह अपनी ज्ञान सीमा में सभी चीजों का उत्तर पा लेना चाहते थे मैं इन चीजों को समझ नहीं पाता था उनको समझने के लिए अपनी जान सीमा का विस्तार करना चाहता था मैं यह मानता था कि निरर्थक कुछ नहीं होता। हमारी एक दूसरे मित्र को भी निधि का अर्थ समझ में आता था जिसके लिए आगरा का प्रयोग होता है अर्थ की दृष्टि से चेन्नई का चिमनी का मिठास से संबंध नहीं है अपितु चोटी की या चूरे से संबंध है चीनी का अर्थ छोटा मुनीरका का अर्थ छोटा मुनीरका। इसके लिए मध्यकाल में खुर्द (क्षुद्र) का प्रयोग किया जाता था । सिरका मुनीरका मुझे मुंडा -मुंडीर- मुंडीरका बदलते हुए मुनीरका बना प्रतीत हुआ। इसका अर्थ था कि प्राचीन काल में यहां पर मुंडा जनों का निवास था। इस क्रम में यह भी पता चला की मध्यकाल में राजस्व के अभिलेखों में जिन शब्दों का प्रयोग किया गया था वह बहुत प्राचीन भूव्यवस्था में प्रयुक्त होते आए थे। जो भी हो या कुछ बात की बात है स्थाननामों के विषय में मेरी एक धारणा बन चुकी थी।

पहली बार मैंने सोचा था कि यदि मैं भारत के स्थाननामों का अध्ययन करूं तो भारतीय जनों के संचलन की समस्या को समझने में कुछ मदद मिल सकती है। मेरी रुचि अकादमिक प्रोजेक्ट में नहीं थी। मात्र जिज्ञासावश मैं इस समस्या को समझना चाहता था। काम बड़ा था। समय और साधनों का अभाव था। मैंने बड़े परिश्रम से विविध स्रोतों (रेलवे टाइम टेबल, पोस्ट आफिस गाइड, टेलीग्राफ गाइड, सर्वे आफ इंडिया के मानचित्र, गजैटियर्स ) से पूरे भारत के स्थानों का संग्रह किया, उनको अकारादि क्रम में डाला और फिर नामों के बीच जो सर्वनिष्ठ तत्व उसको उसी तरह आधार बनाकर उनका अर्थ समझने की कोशिश करने लगा जैसे किसी समय में संस्कृत आचार्यों ने धातुओं का निर्धारण करके शब्दों का अर्थ समझने का प्रयत्न किया था। काम अधूरा ही रह गया, परंतु व्यर्थ नहीं गया । अधूरा इसलिए रह गया कि मैंने पाया सभी नामों के साथ पानी का कोई न कोई पर्याय जुड़ा हुआ है। यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी । मुझे लगा मुझसे कोई गलती हो रही है। ऐसा कैसे हो सकता है कि सभी स्थानों का नाम पानी से जुड़ा हो। मैं सर्वे आफ इंडिया मानचित्रों को लेकर उन की भौगोलिक संरचना समझने का प्रयत्न करता रहा पर कुछ पल्ले नहीं पड़ा। पहले मैंने सोचा था नाम बहुत प्राचीन हैं । उन दिनों पानी का कोई कृत्रिम स्रोत नहीं था । सभी को प्रकृति पर निर्भर करना पड़ता । इसलिए उन्होंने अपनी बस्तियां जलस्रोतों के निकट बसाई होंगी, इसलिए जलपरक शब्द उनके नाम के साथ जुड़ गया होगा। परंतु कुछ नाम ऐसे थे जो जल के स्रोत से दूर थे।

मैंने नागरी प्रचारिणी पत्रिका में अपने अध्ययन के एक अंश का प्रकाशन भी करा दिया था, परंतु इस आशंका के कारण कि कहीं गलती हो रही है, मैंने उस काम को स्थगित कर दिया और आर्य और द्रविड़ भाषाओं के संबंधों को समझने के लिए तैयारी करने लगा ।

आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता में मैंने पहली बार यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि हमारी भाषा के सर्वाधिक शब्द उस स्रोत से आते हैं जिसे अनुकारी कहा जाता है। अपने मत को प्रामाणिक बनाने के लिए मैंने संस्कृत धातुओं का विश्लेषण किया और यह दिखाने का प्रयत्न किया कि कुल धातुओं की एक तिहाई ध्वनि, गति और हिंसा से जुड़ी हुई है, जिसकी जरूरत नहीं थी। ऐसा इसलिए है कि बहुत सारे शब्द प्रकृत ध्वनियों के अनुकरण से पैदा हुए हैं।

कुछ उदाहरणों मैंने यह प्रमाणित किया कि एक ही ध्वनि अनेक स्रोतों से पैदा हो सकती है और इन ध्वनियों से इतने अधिक शब्द पैदा हो सकते हैं कि जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते। यह मेरी पुस्तकों में आ चुका है इसलिए यहां उसे दुहराने की आवश्यकता नहीं ।

इस काम के बाद मैं वैदिक अध्ययन की ओर मुड़ गया । अब मुझे पता चला हमारी भाषा के आधारभूत शब्द जलपरक हैं। अनेक छोटे-छोटे लेखों में मैंने इसे स्पष्ट करने की कोशिश की परंतु विधिवत विवेचन का समय नहीं निकाल सका। कई तरह की ग्रंथियां काम करती रही हैं। इनमें से एक थी भाषा विज्ञान के विधिवत अध्ययन का अभाव, हिंदी प्रदेश की उदासीनता, मेरे पिछले कामों को समझने में विद्वानों की असमर्थता और बढ़ती हुई उम्र के साथ समय का अभाव। अतः मै इस प्रयत्न में लगा रहा कि कोई ऐसा योग्य तरुण व्यक्ति इसमें रुचि ले जिसमें कार्यक्षमता हो परंतु मेरा यह प्रयत्न बेकार गया। इस काम में मेरी रुचि पागलपन की हद तक है। लगता है यदि यह काम पूरा न हो सका तो मेरा जीवन व्यर्थ गया क्योंकि मैं इसी काम के लिए महाकाल द्वारा निमित्त के रूप में चुना गया हूं। मैं इसे किसी दूसरे को समझा नहीं सकता।

Facebook पर यह उम्मीद थी मेरी मित्र मंडली में कुछ ऐसे लोग हो सकते हैं जिनकी भाषा विज्ञान मे रुचि हो और आगे चल कर वे अधूरा काम अपने हाथ में ले सके। यह अकेले व्यक्ति का काम नहीं है। मैं जितना भी प्रयत्न करूं अकेले दम पर इसे पूरा नहीं कर सकता। अकेलेपन में अपनी गलतियों तक को नहीं समझ सकता। जो भी हो, जैसा भी हो, जैसे ही बने, यह संभवत मेरा अंतिम प्रयत्न होगा।

मैंने यह कहा था कि ‘नैसर्गिक शब्दों का अर्थ सहज ग्राह्य होता है। नैसर्गिक शब्द से मेरा तात्पर्य ऐसे शब्दों से था जो गढ़े नहीं जाते, सुने जाते हैं, और जिनको अर्थ से जोड़ लिया जाता है। जोड़ना हमारे प्रयास पर निर्भर होता है और क्रिया से संबंधित होता है। क्रिया पर या इसके स्रोत पर वक्ता या श्रोता का नियंत्रण नहीं होता। वह स्रोत प्राकृतिक भी हो सकता है और मनुष्य द्वारा बनाए गए यंत्र से भी पैदा हो सकता है, मनुष्य की अपनी क्रिया से भी पैदा हो सकता है। इसके लिए हमारे मुंह से जो ध्वनि फूटती है वह स्वतः अपने अर्थ (उपादान, क्रिया या उसके गुण) से जुड़ जाती है। ध्वनि एक ही होते हुए भी अलग अलग भाषाई समुदायों के लोगों द्वारा उनकी अपनी भाषा की ध्वनिसीमा के कारण अलग अलग रूपों में सुना जा सकता है और व्यक्त किया जा सकता है। यहां तक कि एक ही भाषाई समुदाय में अलग-अलग अभिव्यक्तियां दी जा सकती हैं जो परस्पर इतनी भिन्न हो सकती हैं जिसकी सीमा नहीं फिर भी किसी को यह बताने की जरूरत नहीं होती कि यह किसके लिए प्रयोग में लाया गया है, क्योंकि अर्थ उच्चारण से सहज भाव से जुड़ जाता है ।

कृत्रिम शब्द में यह बताना या दिखाना जरूरी होता है कि अमुक शब्द का प्रयोग किसके लिए किया जा रहा है
मैं इसे एक उदाहरण से स्पष्ट करूं तो, पूने हवाई अड्डे पर लिफ्ट का संकेत देने क के लिए लिखा मिला उदवाहन। पढ़कर मुझे हंसी आई । विनोद में सोचा कि इसकी जगह यदि उत्कर्ष लिखा गया होता तो क्या कोई रोक सकता था, और क्या यह उतना ही उपयुक्त शब्द नहीं होता । हां उस दशा में नीचे आते समय इसका नाम निष्कर्ष रखना और मजेदार होता।

कहें, कृत्रिम शब्द एक ठप्पा होता है। उसमें व्यक्त भाव संदर्भित वस्तु या क्रिया से जुड़ा तो होता है, पर उसे ऐसे ही गुण या धर्म वाली दूसरी संज्ञाओं या क्रियाओं के साथ भी जोड़ा जा सकता है। केवल प्रयोगरूढ़ि से ही इसका अर्थ निश्चित हो पाता है। उसके स्थान पर वही काम संज्ञाओं या क्रियाओं को संख्या में बदलकर भी किया जा सकता है। परन्तु उस दशा में उसकी भूमिका संकेतक प्रणालियों जैसी हो जाएगी और वह सीमित प्रयोजनों के लिए ही व्यवहार में आ सकती है।

दोनों में एक अंतर यह भी होता है की कृत्रिम शब्दावली नई शब्दावली का जनन नहीं कर सकती जबकि नैसर्गिक शब्दावली तकनीकी विकास के क्रम में नए भावों और व्यंजनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्द भंडार का जनन करने में समर्थ हो सकती है। दूसरे शब्दों में कहें तो कृत्रिम शब्द किसी यन्त्र से बन कर निकले उत्पाद की तरह और नैसर्गिक शब्द प्राकृतिक जीवों और वनस्पतियों की तरह उत्पादनक्षम होते हैं।

Post – 2018-03-15

जो भी आय़ा, वह गया. दुख, सुख हो या इंसान हो
यह महीना फरवरी आया था जाने के लिए।।(धन्यवाद फेसबुक)
https://www.facebook.com/bhagwan.singh.92775/videos/1741568262571239/?t=5

Post – 2018-03-15

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Post – 2018-03-13

हमारी भाषा (2)

शुद्ध और अशुद्ध प्रयोग

डा. निखिलेश कुमार पाठक भाषाविज्ञान के पंडित हैं। उन्होंने मेरे द्वारा इंगित अशुद्ध प्रयोगों के संदर्भ लिखा है, ‘उपरोक्त’ भी ऐसा ही प्रचलित किंतु ‘अशुद्ध’ शब्द है।

मैंने पहले अपना मंतव्य टिप्पणी के रूप में देना चाहा, पर तभी लगा समस्या बहुत महत्वपूर्ण है। इस पर विस्तार से चर्चा की जानी चाहिए। मेरे विचार न तो आधिकारिक हैं, न ही इनको सही मानने की जरूरत है। मैं अपना पक्ष रखना चाहता हूं, और चाहता हूं कि दूसरे भी अपना पक्ष रखें, ताकि हम यह समझ सकें की हिंदी भाषा की शक्तियां और सीमाएं क्या हैं। भाषा, चाहे नितान्त अविकसित हो तो भी, इतनी समृद्ध होती है कि कोई मूर्ख ही यह दावा कर सकता है कि उसे उसके समग्र भंडार पर इतना अचूक अधिकार है कि कोई साधारण जानकारी रखने वाला व्यक्ति उसमें कोई वृद्धि नहीं कर सकता। मिसाल पुरानी है, फिर भी मक्खन से लबालब भरे प्याले में एक तिनके की जगह बची रहती है और ये तिनके ऐसे ऐसे कोनों-अँतरों में बिखरे और दुबके पड़े रहते हैं कि जितनी बार तलाशो, कुछ न कुछ ऐसा हाथ लग ही जाता है जो हमें चकित कर जाए। भाषा के सम्मुख विनय ही एकमात्र गर्व का विषय हो सकता है।

आधुनिक भारतीय बोलियों में दो ऐसी हैं जिनको अपनी विशेषताओं पर गर्व है। किसी दूसरे के अनुसार ढलना जरूरी नहीं मानतीं। एक है बांग्ला और दूसरी है मराठी। हिंदी के साथ आरंभ से ही समझौते का दबाव बना रहा है। पहले फारसी और उर्दू का, फिर संस्कृत और अखिल भारतीय अपेक्षाओं का, और हाल में अंग्रेजी का कि यह अपनी सही प्रकृति को पहचान ही न सकी। एक ओर यह राजभाषा होने का गर्व पालती है और दूसरी ओर इसे इस पात्रता के लिए इसे दूसरी सभी भारतीय भाषाओं के अनुसार समायोजित होने को बाध्य किया जाता रहा। मुझे याद है तकनीकी शब्दावली के निर्माण के समय ऐसे विद्वान थे जो इस बात पर जोर देते थे यदि हिन्दी को भारतीय स्वीकार्यता पानी है तो इसे दूसरी भाषाओं से तकनीकी शब्दों का भी आयात करना चाहिए।

इसी तरह का दबाव राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के माध्यम से वर्णमाला को लेकर डाला गया था। इसमें स्वर अक्षरों और मात्राओं की भिन्नता को कम करने के लिए मात्रा चिन्हों को अ के साथ लगा कर पूरी स्वरमाला तैयार की गई थी (अ, आ, अि, अी, अु, अू आदि)। इसके प्रस्तावक स्वयं गांधीजी थे। उन्हें इसकी सलाह किसने दी थी, यह हमें मालूम नहीं । हिंदी साहित्य सम्मेलन के एक अधिवेशन में निराला जी इस सवाल पर गांधीजी से झगड़ पड़े थे। गांधीजी अपने विचारों में बहुत दृढ़ थे । जो तय कर लिया उसमें आसानी से बदलाव नहीं करते थे। इस मामले में भी नहीं किया। परंतु गांधी जी का यह प्रयोग गलत था। हिंदी को एक काल्पनिक देश की राष्ट्रभाषा नहीं बनना था। उसे भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव था जिसकी सभी भाषाओं की लिपियों में स्वर अक्षर और मात्राओं में उसी तरह का अलगाव है जैसा हिंदी में । इसलिए भारतीय स्वभाव और अक्षर ज्ञान की परिधि में नागरी का परंपरागत रूप अधिक वैज्ञानिक था और गांधीजी का सुझाया रूप अव्यावहारिक। हम इसके अधिक विस्तार में नहीं जाना चाहते क्योंकि यह हमारा आज का विषय नहीं है और आज हिंदी के लिए जिस वर्णमाला का प्रयोग होता है वह गांधीजी द्वारा सुझाई गई वर्णमाला नहीं है। हम इसके द्वारा केवल यह याद दिलाना चाहते थे हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के उत्साह में इसकी प्रकृति को बहुत दूर तक ऐंठा-मरोड़ा गया। इनमें सबसे खतरनाक था यह मानकर चलना कि संस्कृत से पूरे भारत का परिचय है, इसलिए तत्सम रूप और संस्कृत के आधार पर तैयार की गई तकनीकी शब्दावली पूरे भारत के लिए अधिक सुकर होगी। उसके परिणाम से हम परिचित हैं। हम जानते हैं सरकारी हिन्दी भाषा न रहकर जार्गन में बदल गई जिसका केवल कर्मकाडीय उपयोग ही हो सकता था। मुझे ऐसा लगता है कि अंग्रेजी के वर्चस्व के लिए ऐसा योजनाबद्ध रूप में किया गया।

यह बात समझनी होगी कि हिंदी संस्कृत की तुलना में बहुत अधिक समृद्ध भाषा है। आवश्यकता पड़ने पर यह समूची संस्कृत शब्दावली का उपयोग कर सकती है और उनके तद्भव रूपों के अर्थ वैभव पर गर्व कर सकती है। सच्चाई तो यह है संस्कृत का समस्त शब्द भंडार बोलियों से निकला है जैसे मिठाई की दुकान का समस्त माल खेतों और चरागाहों से निकला और प्रसाधित होते हुए पकवानों और मिष्ठान्नों में बदला है। खेत और किसान हलवाई के ऋणी नहीं परंतु हलवाई किसान से उऋण नहीं हो सकता। प्रकृति सिद्ध चीजें नहीं पैदा करती । वह कच्चा माल पैदा करती है। बोलियों का संस्कृत से यही संबंध है। संस्कृत बोलियों की ऋणी है, बोलियां संस्कृत की ऋणी नहीं हैं। इस तथ्य को समझ लेने के बाद हम इस बात की अपेक्षा नहीं कर सकते कि हिन्दी संस्कृत की कसौटी पर अपने को सही सिद्ध करने को विकल रहे, परन्तु यह अपेक्षा अवश्य करते हैं जहां वह साधित रूपों को अपनाए वहां उनकी शुद्धता का ध्यान अवश्य रखे।हमारी आज की चर्चा इसी विभाजन रेखा के आर पार है।

पाठक ने जो उदाहरण प्रस्तुत किया था उस पर हम इसी दृष्टिकोण से विचार कर सकते हैं। अ+उ =ओ, ऊपर+उक्त = ऊपरोक्त। यह हिन्दी हुआ, क्योंकि हिन्दी का शब्द ऊपर है, उपरि नहीं जिससे उपर्युक्त शब्द बनता। जो लोग उपरोक्त को तत्सम मान कर प्रयोग करते हैं वे गलत हैं, यदि ऊपरोक्त लिखते, और यह सोच कर लिखते कि वे हिन्दी शब्द का प्रयोग कर रहे हैं तो सही होते। परन्तु हम किसी से इस बात की अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह पहले संस्कृत सीखें और फिर उसके बाद हिंदी में लिखना बोलनाआरंभ करें। भाषा में मौलिक प्रयोग वे लोग करते हैं जो पक्के विद्वान नहीं होते और जब ऐसे लोगों द्वारा कोई प्रयोग बड़े पैमाने पर होने लगता है तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। संस्कृत के व्याकरण के अनुसार बहुत से ऐसे शब्द बनते हैं जिनका हम प्रयोग ठीक उसी रूप में नहीं करते हैं संस्कृत में राष्ट्रिय लिखा जाता है जबकि हिंदी में हम राष्ट्रीय का प्रयोग करते हैं, संस्कृत में अंताराष्ट्रिय होगा, हम हिंदी में अंतरराष्ट्रीय का प्रयोग करते हैं। अतः ये तत्सम रूप नहीं हुए, हिन्दी रूप हुए और संस्कृत के आचार्य को भी हिन्दी लिखते समय इन्हीं को प्रयोग में लाना होगा।

कुछ शब्द ऐसे हैं जिनको संस्कृत में गलत लिखा जाता है और यह प्रयोग संस्कृत के कोशों तक में देखने में आता है। उदाहरण के लिए चिन्हित। शब्दकोशों में यह चिह्नित के रूप में लिखा पाया जाता है, तत्सम शब्दों का सही प्रयोग करने की चिंता करने वाले बहुत से लोग चिह्नित लिखते हैं जबकि यह गलत है। गलत होने के दो कारण हैं । पहला यह कि हिंदी में चिन्हित बोला जाता है ना कि चिह्नित। दूसरा यह कि यह चिन् धातु से बना है जिसका अर्थ होता है आग जिसे चिंगारी, चिनचिनाहट – जलन या चिनार के पेड़ में देखा जा सकता है, जो प्रकाशित, निशान या चिह्न के लिए प्रयोग में आता है, दूसरे शब्द हैं जिनका इस समय मुझे ध्यान नहीं है परंतु हम उनको बोलियों के माध्यम से समझ सकते हैं।

मैं जिस बात के लिए मराठी और बांग्ला की प्रशंसा कर रहा था वह यह कि ये संस्कृत के अनुसार सही होने की चिंता नहीं करतीं। मराठी में सबसे अधिक बेफिक्री देखी जा सकती है। बहुत से शब्द जो संस्कृत में इकारांत हैं, मराठी उनको ईकारान्त कर देती है। हिंदी में मध्यकाल तक यह छूट दी जाती रही और यह सही था, केवल वर्तमान में आकर तत्समप्रियता बढ़ी है आैर उसके साथ इसकी कृत्रिमता और दैन्य भी।

हम कह रहे थे की संस्कृत के तत्सम रूपों की तुलना में तद्भवों से बना शब्द भंडार कहीं अधिक प्रभावशाली है। यह सुनने वालों को अति कथन प्रतीत हुआ होगा । हम इसे समझने की कोशिश करें । संस्कृत की एक धातु है खाद्, जिसे खाद्य बनता है। मैं नहीं जानता कि खाद्य के अतिरिक्त संस्कृत में इससे कितने शब्द बनते हैं, परंतु हिंदी में खाना, खाद, खूराक, खादर, खदरना और मल्लिका भोजपुरी में खयका – भोजन, खब्भू, खद्धक – अपनी कद काठी को देखते हुए अधिक खाने वाला, खखाइल- किसी चीज को पाने की अभावजन्य आतुरता। और लीजिए, इसका प्रत्यय(?) वाला ऱूप (-खोर) तो छूटा ही जा रहा था जो लतखोर, गमखोर, हरामखोर से लेकर घूसखोर, रिश्वतखोर, आदमखोर, तक जानें कितने शब्दों का जनक है। अब आप तय करें कि सांचे में ढली संस्कृत में अधिक ओजस्विता है या जमीन से जुड़ी बोलियों में? कौन किसकी जननी है? मूल रूप किसके थे और बनाया बिगाड़ा (तद्भवीकरण) किसने?

Post – 2018-03-13

हमारी भाषा (2)

शुद्ध और अशुद्ध प्रयोग

डा. निखिलेश कुमार पाठक भाषाविज्ञान के पंडित हैं। उन्होंने मेरे द्वारा इंगित अशुद्ध प्रयोगों के संदर्भ लिखा है, ‘उपरोक्त’ भी ऐसा ही प्रचलित किंतु ‘अशुद्ध’ शब्द है।

मैंने पहले अपना मंतव्य टिप्पणी के रूप में देना चाहा, पर तभी लगा समस्या बहुत महत्वपूर्ण है। इस पर विस्तार से चर्चा की जानी चाहिए। मेरे विचार न तो आधिकारिक हैं, न ही इनको सही मानने की जरूरत है। मैं अपना पक्ष रखना चाहता हूं, और चाहता हूं कि दूसरे भी अपना पक्ष रखें, ताकि हम यह समझ सकें की हिंदी भाषा की शक्तियां और सीमाएं क्या हैं। भाषा, चाहे नितान्त अविकसित हो तो भी, इतनी समृद्ध होती है कि कोई मूर्ख ही यह दावा कर सकता है कि उसे उसके समग्र भंडार पर इतना अचूक अधिकार है कि कोई साधारण जानकारी रखने वाला व्यक्ति उसमें कोई वृद्धि नहीं कर सकता। मिसाल पुरानी है, फिर भी मक्खन से लबालब भरे प्याले में एक तिनके की जगह बची रहती है और ये तिनके ऐसे ऐसे कोनों-अँतरों में बिखरे और दुबके पड़े रहते हैं कि जितनी बार तलाशो, कुछ न कुछ ऐसा हाथ लग ही जाता है जो हमें चकित कर जाए। भाषा के सम्मुख विनय ही एकमात्र गर्व का विषय हो सकता है।

आधुनिक भारतीय बोलियों में दो ऐसी हैं जिनको अपनी विशेषताओं पर गर्व है। किसी दूसरे के अनुसार ढलना जरूरी नहीं मानतीं। एक है बांग्ला और दूसरी है मराठी। हिंदी के साथ आरंभ से ही समझौते का दबाव बना रहा है। पहले फारसी और उर्दू का, फिर संस्कृत और अखिल भारतीय अपेक्षाओं का, और हाल में अंग्रेजी का कि यह अपनी सही प्रकृति को पहचान ही न सकी। एक ओर यह राजभाषा होने का गर्व पालती है और दूसरी ओर इसे इस पात्रता के लिए इसे दूसरी सभी भारतीय भाषाओं के अनुसार समायोजित होने को बाध्य किया जाता रहा। मुझे याद है तकनीकी शब्दावली के निर्माण के समय ऐसे विद्वान थे जो इस बात पर जोर देते थे यदि हिन्दी को भारतीय स्वीकार्यता पानी है तो इसे दूसरी भाषाओं से तकनीकी शब्दों का भी आयात करना चाहिए।

इसी तरह का दबाव राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के माध्यम से वर्णमाला को लेकर डाला गया था। इसमें स्वर अक्षरों और मात्राओं की भिन्नता को कम करने के लिए मात्रा चिन्हों को अ के साथ लगा कर पूरी स्वरमाला तैयार की गई थी (अ, आ, अि, अी, अु, अू आदि)। इसके प्रस्तावक स्वयं गांधीजी थे। उन्हें इसकी सलाह किसने दी थी, यह हमें मालूम नहीं । हिंदी साहित्य सम्मेलन के एक अधिवेशन में निराला जी इस सवाल पर गांधीजी से झगड़ पड़े थे। गांधीजी अपने विचारों में बहुत दृढ़ थे । जो तय कर लिया उसमें आसानी से बदलाव नहीं करते थे। इस मामले में भी नहीं किया। परंतु गांधी जी का यह प्रयोग गलत था। हिंदी को एक काल्पनिक देश की राष्ट्रभाषा नहीं बनना था। उसे भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव था जिसकी सभी भाषाओं की लिपियों में स्वर अक्षर और मात्राओं में उसी तरह का अलगाव है जैसा हिंदी में । इसलिए भारतीय स्वभाव और अक्षर ज्ञान की परिधि में नागरी का परंपरागत रूप अधिक वैज्ञानिक था और गांधीजी का सुझाया रूप अव्यावहारिक। हम इसके अधिक विस्तार में नहीं जाना चाहते क्योंकि यह हमारा आज का विषय नहीं है और आज हिंदी के लिए जिस वर्णमाला का प्रयोग होता है वह गांधीजी द्वारा सुझाई गई वर्णमाला नहीं है। हम इसके द्वारा केवल यह याद दिलाना चाहते थे हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के उत्साह में इसकी प्रकृति को बहुत दूर तक ऐंठा-मरोड़ा गया। इनमें सबसे खतरनाक था यह मानकर चलना कि संस्कृत से पूरे भारत का परिचय है, इसलिए तत्सम रूप और संस्कृत के आधार पर तैयार की गई तकनीकी शब्दावली पूरे भारत के लिए अधिक सुकर होगी। उसके परिणाम से हम परिचित हैं। हम जानते हैं सरकारी हिन्दी भाषा न रहकर जार्गन में बदल गई जिसका केवल कर्मकाडीय उपयोग ही हो सकता था। मुझे ऐसा लगता है कि अंग्रेजी के वर्चस्व के लिए ऐसा योजनाबद्ध रूप में किया गया।

यह बात समझनी होगी कि हिंदी संस्कृत की तुलना में बहुत अधिक समृद्ध भाषा है। आवश्यकता पड़ने पर यह समूची संस्कृत शब्दावली का उपयोग कर सकती है और उनके तद्भव रूपों के अर्थ वैभव पर गर्व कर सकती है। सच्चाई तो यह है संस्कृत का समस्त शब्द भंडार बोलियों से निकला है जैसे मिठाई की दुकान का समस्त माल खेतों और चरागाहों से निकला और प्रसाधित होते हुए पकवानों और मिष्ठान्नों में बदला है। खेत और किसान हलवाई के ऋणी नहीं परंतु हलवाई किसान से उऋण नहीं हो सकता। प्रकृति सिद्ध चीजें नहीं पैदा करती । वह कच्चा माल पैदा करती है। बोलियों का संस्कृत से यही संबंध है। संस्कृत बोलियों की ऋणी है, बोलियां संस्कृत की ऋणी नहीं हैं। इस तथ्य को समझ लेने के बाद हम इस बात की अपेक्षा नहीं कर सकते कि हिन्दी संस्कृत की कसौटी पर अपने को सही सिद्ध करने को विकल रहे, परन्तु यह अपेक्षा अवश्य करते हैं जहां वह साधित रूपों को अपनाए वहां उनकी शुद्धता का ध्यान अवश्य रखे।हमारी आज की चर्चा इसी विभाजन रेखा के आर पार है।

पाठक ने जो उदाहरण प्रस्तुत किया था उस पर हम इसी दृष्टिकोण से विचार कर सकते हैं। अ+उ =ओ, ऊपर+उक्त = ऊपरोक्त। यह हिन्दी हुआ, क्योंकि हिन्दी का शब्द ऊपर है, उपरि नहीं जिससे उपर्युक्त शब्द बनता। जो लोग उपरोक्त को तत्सम मान कर प्रयोग करते हैं वे गलत हैं, यदि ऊपरोक्त लिखते, और यह सोच कर लिखते कि वे हिन्दी शब्द का प्रयोग कर रहे हैं तो सही होते। परन्तु हम किसी से इस बात की अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह पहले संस्कृत सीखें और फिर उसके बाद हिंदी में लिखना बोलनाआरंभ करें। भाषा में मौलिक प्रयोग वे लोग करते हैं जो पक्के विद्वान नहीं होते और जब ऐसे लोगों द्वारा कोई प्रयोग बड़े पैमाने पर होने लगता है तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। संस्कृत के व्याकरण के अनुसार बहुत से ऐसे शब्द बनते हैं जिनका हम प्रयोग ठीक उसी रूप में नहीं करते हैं संस्कृत में राष्ट्रिय लिखा जाता है जबकि हिंदी में हम राष्ट्रीय का प्रयोग करते हैं, संस्कृत में अंताराष्ट्रिय होगा, हम हिंदी में अंतरराष्ट्रीय का प्रयोग करते हैं। अतः ये तत्सम रूप नहीं हुए, हिन्दी रूप हुए और संस्कृत के आचार्य को भी हिन्दी लिखते समय इन्हीं को प्रयोग में लाना होगा।

कुछ शब्द ऐसे हैं जिनको संस्कृत में गलत लिखा जाता है और यह प्रयोग संस्कृत के कोशों तक में देखने में आता है। उदाहरण के लिए चिन्हित। शब्दकोशों में यह चिह्नित के रूप में लिखा पाया जाता है, तत्सम शब्दों का सही प्रयोग करने की चिंता करने वाले बहुत से लोग चिह्नित लिखते हैं जबकि यह गलत है। गलत होने के दो कारण हैं । पहला यह कि हिंदी में चिन्हित बोला जाता है ना कि चिह्नित। दूसरा यह कि यह चिन् धातु से बना है जिसका अर्थ होता है आग जिसे चिंगारी, चिनचिनाहट – जलन या चिनार के पेड़ में देखा जा सकता है, जो प्रकाशित, निशान या चिह्न के लिए प्रयोग में आता है, दूसरे शब्द हैं जिनका इस समय मुझे ध्यान नहीं है परंतु हम उनको बोलियों के माध्यम से समझ सकते हैं।

मैं जिस बात के लिए मराठी और बांग्ला की प्रशंसा कर रहा था वह यह कि ये संस्कृत के अनुसार सही होने की चिंता नहीं करतीं। मराठी में सबसे अधिक बेफिक्री देखी जा सकती है। बहुत से शब्द जो संस्कृत में इकारांत हैं, मराठी उनको ईकारान्त कर देती है। हिंदी में मध्यकाल तक यह छूट दी जाती रही और यह सही था, केवल वर्तमान में आकर तत्समप्रियता बढ़ी है आैर उसके साथ इसकी कृत्रिमता और दैन्य भी।

हम कह रहे थे की संस्कृत के तत्सम रूपों की तुलना में तद्भवों से बना शब्द भंडार कहीं अधिक प्रभावशाली है। यह सुनने वालों को अति कथन प्रतीत हुआ होगा । हम इसे समझने की कोशिश करें । संस्कृत की एक धातु है खाद्, जिसे खाद्य बनता है। मैं नहीं जानता कि खाद्य के अतिरिक्त संस्कृत में इससे कितने शब्द बनते हैं, परंतु हिंदी में खाना, खाद, खूराक, खादर, खदरना और मल्लिका भोजपुरी में खयका – भोजन, खब्भू, खद्धक – अपनी कद काठी को देखते हुए अधिक खाने वाला, खखाइल- किसी चीज को पाने की अभावजन्य आतुरता। और लीजिए, इसका प्रत्यय(?) वाला ऱूप (-खोर) तो छूटा ही जा रहा था जो लतखोर, गमखोर, हरामखोर से लेकर घूसखोर, रिश्वतखोर, आदमखोर, तक जानें कितने शब्दों का जनक है। अब आप तय करें कि सांचे में ढली संस्कृत में अधिक ओजस्विता है या जमीन से जुड़ी बोलियों में? कौन किसकी जननी है? मूल रूप किसके थे और बनाया बिगाड़ा (तद्भवीकरण) किसने?

Post – 2018-03-13

हमारी भाषा (2)

शुद्ध और अशुद्ध प्रयोग

डा. निखिलेश कुमार पाठक भाषाविज्ञान के पंडित हैं। उन्होंने मेरे द्वारा इंगित अशुद्ध प्रयोगों के संदर्भ लिखा है, ‘उपरोक्त’ भी ऐसा ही प्रचलित किंतु ‘अशुद्ध’ शब्द है।

मैंने पहले अपना मंतव्य टिप्पणी के रूप में देना चाहा, पर तभी लगा समस्या बहुत महत्वपूर्ण है। इस पर विस्तार से चर्चा की जानी चाहिए। मेरे विचार न तो आधिकारिक हैं, न ही इनको सही मानने की जरूरत है। मैं अपना पक्ष रखना चाहता हूं, और चाहता हूं कि दूसरे भी अपना पक्ष रखें, ताकि हम यह समझ सकें की हिंदी भाषा की शक्तियां और सीमाएं क्या हैं। भाषा, चाहे नितान्त अविकसित हो तो भी, इतनी समृद्ध होती है कि कोई मूर्ख ही यह दावा कर सकता है कि उसे उसके समग्र भंडार पर इतना अचूक अधिकार है कि कोई साधारण जानकारी रखने वाला व्यक्ति उसमें कोई वृद्धि नहीं कर सकता। मिसाल पुरानी है, फिर भी मक्खन से लबालब भरे प्याले में एक तिनके की जगह बची रहती है और ये तिनके ऐसे ऐसे कोनों-अँतरों में बिखरे और दुबके पड़े रहते हैं कि जितनी बार तलाशो, कुछ न कुछ ऐसा हाथ लग ही जाता है जो हमें चकित कर जाए। भाषा के सम्मुख विनय ही एकमात्र गर्व का विषय हो सकता है।

आधुनिक भारतीय बोलियों में दो ऐसी हैं जिनको अपनी विशेषताओं पर गर्व है। किसी दूसरे के अनुसार ढलना जरूरी नहीं मानतीं। एक है बांग्ला और दूसरी है मराठी। हिंदी के साथ आरंभ से ही समझौते का दबाव बना रहा है। पहले फारसी और उर्दू का, फिर संस्कृत और अखिल भारतीय अपेक्षाओं का, और हाल में अंग्रेजी का कि यह अपनी सही प्रकृति को पहचान ही न सकी। एक ओर यह राजभाषा होने का गर्व पालती है और दूसरी ओर इसे इस पात्रता के लिए इसे दूसरी सभी भारतीय भाषाओं के अनुसार समायोजित होने को बाध्य किया जाता रहा। मुझे याद है तकनीकी शब्दावली के निर्माण के समय ऐसे विद्वान थे जो इस बात पर जोर देते थे यदि हिन्दी को भारतीय स्वीकार्यता पानी है तो इसे दूसरी भाषाओं से तकनीकी शब्दों का भी आयात करना चाहिए।

इसी तरह का दबाव राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के माध्यम से वर्णमाला को लेकर डाला गया था। इसमें स्वर अक्षरों और मात्राओं की भिन्नता को कम करने के लिए मात्रा चिन्हों को अ के साथ लगा कर पूरी स्वरमाला तैयार की गई थी (अ, आ, अि, अी, अु, अू आदि)। इसके प्रस्तावक स्वयं गांधीजी थे। उन्हें इसकी सलाह किसने दी थी, यह हमें मालूम नहीं । हिंदी साहित्य सम्मेलन के एक अधिवेशन में निराला जी इस सवाल पर गांधीजी से झगड़ पड़े थे। गांधीजी अपने विचारों में बहुत दृढ़ थे । जो तय कर लिया उसमें आसानी से बदलाव नहीं करते थे। इस मामले में भी नहीं किया। परंतु गांधी जी का यह प्रयोग गलत था। हिंदी को एक काल्पनिक देश की राष्ट्रभाषा नहीं बनना था। उसे भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव था जिसकी सभी भाषाओं की लिपियों में स्वर अक्षर और मात्राओं में उसी तरह का अलगाव है जैसा हिंदी में । इसलिए भारतीय स्वभाव और अक्षर ज्ञान की परिधि में नागरी का परंपरागत रूप अधिक वैज्ञानिक था और गांधीजी का सुझाया रूप अव्यावहारिक। हम इसके अधिक विस्तार में नहीं जाना चाहते क्योंकि यह हमारा आज का विषय नहीं है और आज हिंदी के लिए जिस वर्णमाला का प्रयोग होता है वह गांधीजी द्वारा सुझाई गई वर्णमाला नहीं है। हम इसके द्वारा केवल यह याद दिलाना चाहते थे हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के उत्साह में इसकी प्रकृति को बहुत दूर तक ऐंठा-मरोड़ा गया। इनमें सबसे खतरनाक था यह मानकर चलना कि संस्कृत से पूरे भारत का परिचय है, इसलिए तत्सम रूप और संस्कृत के आधार पर तैयार की गई तकनीकी शब्दावली पूरे भारत के लिए अधिक सुकर होगी। उसके परिणाम से हम परिचित हैं। हम जानते हैं सरकारी हिन्दी भाषा न रहकर जार्गन में बदल गई जिसका केवल कर्मकाडीय उपयोग ही हो सकता था। मुझे ऐसा लगता है कि अंग्रेजी के वर्चस्व के लिए ऐसा योजनाबद्ध रूप में किया गया।

यह बात समझनी होगी कि हिंदी संस्कृत की तुलना में बहुत अधिक समृद्ध भाषा है। आवश्यकता पड़ने पर यह समूची संस्कृत शब्दावली का उपयोग कर सकती है और उनके तद्भव रूपों के अर्थ वैभव पर गर्व कर सकती है। सच्चाई तो यह है संस्कृत का समस्त शब्द भंडार बोलियों से निकला है जैसे मिठाई की दुकान का समस्त माल खेतों और चरागाहों से निकला और प्रसाधित होते हुए पकवानों और मिष्ठान्नों में बदला है। खेत और किसान हलवाई के ऋणी नहीं परंतु हलवाई किसान से उऋण नहीं हो सकता। प्रकृति सिद्ध चीजें नहीं पैदा करती । वह कच्चा माल पैदा करती है। बोलियों का संस्कृत से यही संबंध है। संस्कृत बोलियों की ऋणी है, बोलियां संस्कृत की ऋणी नहीं हैं। इस तथ्य को समझ लेने के बाद हम इस बात की अपेक्षा नहीं कर सकते कि हिन्दी संस्कृत की कसौटी पर अपने को सही सिद्ध करने को विकल रहे, परन्तु यह अपेक्षा अवश्य करते हैं जहां वह साधित रूपों को अपनाए वहां उनकी शुद्धता का ध्यान अवश्य रखे।हमारी आज की चर्चा इसी विभाजन रेखा के आर पार है।

पाठक ने जो उदाहरण प्रस्तुत किया था उस पर हम इसी दृष्टिकोण से विचार कर सकते हैं। अ+उ =ओ, ऊपर+उक्त = ऊपरोक्त। यह हिन्दी हुआ, क्योंकि हिन्दी का शब्द ऊपर है, उपरि नहीं जिससे उपर्युक्त शब्द बनता। जो लोग उपरोक्त को तत्सम मान कर प्रयोग करते हैं वे गलत हैं, यदि ऊपरोक्त लिखते, और यह सोच कर लिखते कि वे हिन्दी शब्द का प्रयोग कर रहे हैं तो सही होते। परन्तु हम किसी से इस बात की अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह पहले संस्कृत सीखें और फिर उसके बाद हिंदी में लिखना बोलनाआरंभ करें। भाषा में मौलिक प्रयोग वे लोग करते हैं जो पक्के विद्वान नहीं होते और जब ऐसे लोगों द्वारा कोई प्रयोग बड़े पैमाने पर होने लगता है तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। संस्कृत के व्याकरण के अनुसार बहुत से ऐसे शब्द बनते हैं जिनका हम प्रयोग ठीक उसी रूप में नहीं करते हैं संस्कृत में राष्ट्रिय लिखा जाता है जबकि हिंदी में हम राष्ट्रीय का प्रयोग करते हैं, संस्कृत में अंताराष्ट्रिय होगा, हम हिंदी में अंतरराष्ट्रीय का प्रयोग करते हैं। अतः ये तत्सम रूप नहीं हुए, हिन्दी रूप हुए और संस्कृत के आचार्य को भी हिन्दी लिखते समय इन्हीं को प्रयोग में लाना होगा।

कुछ शब्द ऐसे हैं जिनको संस्कृत में गलत लिखा जाता है और यह प्रयोग संस्कृत के कोशों तक में देखने में आता है। उदाहरण के लिए चिन्हित। शब्दकोशों में यह चिह्नित के रूप में लिखा पाया जाता है, तत्सम शब्दों का सही प्रयोग करने की चिंता करने वाले बहुत से लोग चिह्नित लिखते हैं जबकि यह गलत है। गलत होने के दो कारण हैं । पहला यह कि हिंदी में चिन्हित बोला जाता है ना कि चिह्नित। दूसरा यह कि यह चिन् धातु से बना है जिसका अर्थ होता है आग जिसे चिंगारी, चिनचिनाहट – जलन या चिनार के पेड़ में देखा जा सकता है, जो प्रकाशित, निशान या चिह्न के लिए प्रयोग में आता है, दूसरे शब्द हैं जिनका इस समय मुझे ध्यान नहीं है परंतु हम उनको बोलियों के माध्यम से समझ सकते हैं।

मैं जिस बात के लिए मराठी और बांग्ला की प्रशंसा कर रहा था वह यह कि ये संस्कृत के अनुसार सही होने की चिंता नहीं करतीं। मराठी में सबसे अधिक बेफिक्री देखी जा सकती है। बहुत से शब्द जो संस्कृत में इकारांत हैं, मराठी उनको ईकारान्त कर देती है। हिंदी में मध्यकाल तक यह छूट दी जाती रही और यह सही था, केवल वर्तमान में आकर तत्समप्रियता बढ़ी है आैर उसके साथ इसकी कृत्रिमता और दैन्य भी।

हम कह रहे थे की संस्कृत के तत्सम रूपों की तुलना में तद्भवों से बना शब्द भंडार कहीं अधिक प्रभावशाली है। यह सुनने वालों को अति कथन प्रतीत हुआ होगा । हम इसे समझने की कोशिश करें । संस्कृत की एक धातु है खाद्, जिसे खाद्य बनता है। मैं नहीं जानता कि खाद्य के अतिरिक्त संस्कृत में इससे कितने शब्द बनते हैं, परंतु हिंदी में खाना, खाद, खूराक, खादर, खदरना और मल्लिका भोजपुरी में खयका – भोजन, खब्भू, खद्धक – अपनी कद काठी को देखते हुए अधिक खाने वाला, खखाइल- किसी चीज को पाने की अभावजन्य आतुरता। और लीजिए, इसका प्रत्यय(?) वाला ऱूप (-खोर) तो छूटा ही जा रहा था जो लतखोर, गमखोर, हरामखोर से लेकर घूसखोर, रिश्वतखोर, आदमखोर, तक जानें कितने शब्दों का जनक है। अब आप तय करें कि सांचे में ढली संस्कृत में अधिक ओजस्विता है या जमीन से जुड़ी बोलियों में? कौन किसकी जननी है? मूल रूप किसके थे और बनाया बिगाड़ा (तद्भवीकरण) किसने?