Post – 2017-02-01

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 28

सर सैयद अहमद को आज तक की घटनाओं की शृंखला से जोड़ कर देखना हो तो हम कहेंगे, हिन्दु ओं और मुसलमानों को धार्मिक अलगाव से पृथक एक अलग कौम के रूप में, जिसे उनके लेखों और व्याख्यानों के अंग्रेजी अनुवादकों ने नेशन के रूप में अनूदित किया है, पेश करने के लिए जिम्मेदार मान सकते हैं। यदि उनको अपने काल में रख कर देखना चाहें तो हम उनको अपनी कौम के लिए एक युगान्तरकारी व्यक्ति कह सकते हैं जिसे समझने में हमे तुलसीदास की अपने समय की बेचैनी से कुछ मदद मिल सकती है।

कहते हैं अपने अन्तिम दिनों में अपने कई सपनों को पूरा करने के बाद भी वह निराश हो चले थे क्योंकि उनके प्रयत्नों का इच्छित परिणाम नहीं निकला था। आजीवन अपनी कौम की बेहतरी के लिए काम करने वाले इस व्य‍क्ति की इस निराशा को भी कुछ दूर तक तुलसी की व्यग्रता – कबहुं न नाथ नींद भरि सोयो – से और अपने अनुपम कार्य की अपर्याप्तता के बोध – न कियो ही कहू, करिबो न कछू, कहिबो न कछू मरिबोई रह्यो है- से समझा जा सकता है।

अपने ही समुदाय के पुरातनवादी लोगों का कुछ वैसा ही विरोध और ऊपर से उर्दू को हिन्दी प्रदेश की मान्य भाषा बनाने में आने वाली रुकावटें ।

अंग्रेज अपने ‘न्याय’ के अनुसार कभी उर्दू को उभारते और उसे फारसी बोझिल बनाने की सांप्रदायिक दलील देते जैसे उस समय के एक आईसीएस अधिकारी और राजनीतिक जरूरत से भाषाविज्ञानी बने जान बीम्स कर रहे थे जिन्हों ने तीन खंडों में उसी महत्वाकांक्षा से comparative grammar of Indo-Aryan languages, लिखा था जिसकी पूर्ति काल्डंवेल ने comparative Grammar of Dravidian languages लिख कर की थी और उत्तर को दक्षिण से, दक्षिण के बीच दरारें डाल कर, श्रीलंका के निवासियों को द्रविड़ो के विरोध में उकसा कर किया था।

फैलन दूसरे पाले से खेलते हुए हिन्दुस्तानी या सर्वबोधगम्‍य भाषा का पक्ष ले रहे थे। हम फैलन की नीयत पर सन्देह नहीं कर सकते क्यों ‍कि यह हमें सही लगता है और फैलन ने आम जनता के बीच रहकर काम भी किया था, परन्तु यह खेल तो दोनों पालों से खेले जाने पर ही जारी रह सकता था।

उर्दू की मांग पर बिहार के गवर्नर ने यह घोषित कर दिया कि यह तो विदेशी भाषा है। अब उत्तर प्रदेश के गवर्नर को उस फैसले को बदल कर निचली अदालतों की भाषा उर्दू बनानी थी। मगर यह जान बीम्स की सुझाई हुई उर्दू थी जिसे हिन्दुस्तान का आम आदमी नहीं समझ सकता था और जिसकी भाषा मुगलकालीन अदालती भाषा रखी गई थी। अब यह भाषा जनता को ठगने वालों की भाषा बन कर स्वीकृति पा रही थी।

सर सैयद को भाषा की नहीं भाषा के माध्यम से भारत पर मुगलकालीन संस्कृति के वर्चस्व की चिन्ता थी और इसमें वह कोई समझौता नहीं चाहते थे। इसके लिए वह किसी सीमा तक जा सकते थे और इसकी चिन्ता उनके अन्तिम दिनों की प्रधान चिन्ता मानी जा सकती है क्यों कि अपने इन्तकाल से पहले या कहें बेहोशी की स्थिति में पहुंचने से पहले उन्होंने जो अपने जीवन का अन्तिम लेख लिखा था वह उर्दू को ले कर ही था।

हम आज के लोकतान्त्रिक मूल्‍यों को रख कर सोचें जिसमें सर्वजनग्राह्य या बहुजनग्राह्य भाषा लोकोपयोगी होती है, तो यह अत्या चार प्रतीत होगा। अत्याचार यह था भी क्यों कि जिस तुलसी की पीड़ा का हम हवाला दे आए हैं उनका मानना था कि सार्वज निक हित (सबकर हित) सर्वोपरि है और इसलिए हम यह भी मान सकते हैं कि सैयद अहमद तुलसी से ढाई तीन सौ साल बाद में और एक नए खरल में पिसने के बाद भी उससे अधकचरे रह जाते हैं जहां तुलसी एक सिद्धान्त कार के रूप में पहुंच चुके थे।

हमें तुलसी की समाजदृष्टि को तुलसी के जीवनानुभव से देखना चाहिए और सर सैयद की समाजदृष्टि को उनके जीवनानुभवों से।

सर सैयद का पालन मुगलकालीन दरबारी परंपरा में हुआ था और उनकी चिन्ता के केन्द्र में मुस्लिम समाज का केवल अभिजात वर्ग था। जमींदारों और रियासतदारों अर्थात् रईसों को ही वह उस कौम का हिस्सा मानते थे जिसकी दशा में निरन्तरर गिरावट आ रही थी। घटनाचक्र जिस तरह का मोड़ ले रहा था उसमें कल का बादशाह पर्दा बदलते ही भिखारी हो सकता था। शासकों के जिस समर्थन पर इन रईसों का दबदबा बना हुआ था उसके उठ जाने पर वे अरक्षणीय होते जा रहे थे इसलिए उनकी पहली चिन्ता इस गिरावट को रोकने की थी। यह अब लौ नसानी अब न नसैहों का एक भिन्न पाठ था। जो लुट गया वह लुट गया अब और न लुटेंगे।

इस मानसिकता को समझने के लिए किसी ढाल पर अज्ञात गहराई की ओर सरक रहे किसी व्यक्ति की घबराहट की कल्पना करें। उसका क्या प्रयत्न होगा? अब और नीचे नहीं, जहां पहुंच गए हो वहां खूंटे की तरह जम जाओ, गिरावट से बचो, फिर ऊपर उठने की सोचो, पर नीचे एक इंच भी नहीं।

जो समतल धरातल पर जांचने पर पश्चगमन जैसा प्रतीत होता है, वह पुनरुत्थान का एक प्रयास बन जाएगा। सामान्य मानकों पर जो अन्यायपूर्ण प्रतीत होता है और जिनकी इससे हानि होनी थी उनके लिए तो यह घोर अत्याचार था, परन्तु 1865 में जब बनारस से यह मांग उठी कि नागरी लिपि को भी स्वीकृति मिले तो सर सैयद आतंकित हो गए। क्यों ? प्रस्ताव यह तो न था कि उर्दू लिपि को हटा कर नागरी लिपि को चालू किया जाय। दोनों का चलना सर सैयद को क्यों परेशान कर गया और इस प्रतिक्रिया पर क्षुब्ध हो कर भारतेन्दु काे उर्दू का मर्सिया लिखना पड़ा था। यह शोकगीत से अधिक एक व्यथा का उद्घाटन था।

परन्तु सर सैयद की चेतना में कहीं हंटर विद्यमान था या उनका अपना अनुभव भी इसका साक्षी रहा हो, कि फारसी को राजकाज की भाषा से हटा देने के बाद हिन्दुओं को आगे बढ़ने का ऐसा अवसर मिला कि वे सारे पदों पर काबिज हो गए। जो खो चुके वह खो चुके, अब आगे एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे, यही वह जिद थी जो उनकी, हमें प्रतीत होने वाली हठधर्मिता में परिलक्षित होती है, जिसे उनकी नजर से देखें तो आत्मरक्षा का संकल्प प्रतीत होगी।

इसे अकेले वह नहीं अनुभव कर रहे थे, हाली और दूसरे भी इसी तरह अनुभव कर रहे थे जिसका सार यह था कि बन्धुता तभी तक जब तक हिन्दू यह मानने को तैयार रहें कि हम कल तक मुसलमानों के शासन में रहे हैं, कंपनी ने मुसलमानों से सत्ता प्राप्त की थी और उसे यदि ऐसी नौबत आए तो लौटाना भी मुसलमानों को होगा। यदि वे इसमें बदलाव के लिए कृतसंकल्प है तो यह रिश्ता नहीं चल सकता।

इसे हम उस लेख के एक अंश को उद्धृत करते हुए अधिक सलीके से रख सकते हैं जो उनकी वर्षगांठ पर लिखा गया था: As early as the 1870’s Hali wrote, “The erstwhile spirit of friendship which had existed between the Hindus and Muslims no longer exists and the fact can be felt throughout India.” In 1867 the Hindus began the now well known Urdu-Hindi controversy from the city of Benaras. About this period, Sir Syed says, “One day I was talking to Mr. Shakespeare, Commissioner of Benaras, about the education of Muslims when he looked towards me in astonishment and said ‘Syed this is the first time that you talk about the welfare of Muslims alone. You had always talked of the Indians as a whole.’ In reply I said that I am sure that from now on Hindus and Muslims will not participate as one in any effort with sincerity.”
Syed went on to say that with the passage of time this difference will widen because of the relative differences in the numbers of educated people in the two communities. The Hindus who did not have any ideological animosity towards Western learning had taken up officially supported education very early on. By this time, they enjoyed a clear edge over the more hostile Muslims, who still held on to a false hope, an almost romantic dream, of a magical reversal of fortunes. “Whoever lives will see the truth of my words.” In reply, Mr. Shakespeare said, ”If your prophecy is correct, I would be very sorry.” Syed replied, “I have more pain in my heart, but I am sure about my prophecy.”

सैयद अहमद की भविष्यवाणी को उनके उत्तराधिकारियों ने पूरा किया।
हमें यह ध्यान रखना होगा कि सर सैयद अभिजातवादी थे, जनतांत्रिक नहीं, इसलिए हिन्दी उन्हें गंवारों की, अर्थात सार्वजनिक भाषा प्रतीत होती थी और वह उन संस्कारों में पले थे जिसमें सार्वजनिकता छोटों को मुंह लगाने का पर्याय और कमीनों को अपनी बराबरी पर बैठाने जैसा गर्हित माना जाता था। हिन्दू अभिजाात वर्ग इन संस्कारों से मुक्त था यह कहना पक्षपात होगा, परन्तु हिन्दी आरंभ से अपने तेवर में जनतांत्रिक थी।

इसे ही आक्रामक संस्कृति और देशज संस्कृति का बुनियादी अंतर मान सकते हैं। भाषा पर हंटर कमीशन के सामने सर सैयद की इस भर्त्सना के बाद कि हिन्दी गंवारों की भाषा है, भारतेन्दु का यह पलट वार कि उर्दू कोठों और शोहदों की और तफरीह करने के लिए वहां पहुंचने वाले मनचले हिन्‍दुओ की जबान है, दो अतिवाद हैं जिनमें समझदारी की संभावना उन्नींसवीं शताब्दी में ही कम हो गई थी। हां हम कह सकते हैं कि सर सैयद का हिन्दू और हिन्दी के प्रति नफरत पहले छिपी थी, अब प्रकट हो गई थी। पर गंवारों की भाषा मुस्लिम अवाम की भी भाषा थी जिससे मुस्लिम अभिजात वर्ग कार्यसाधक संबंध रखता था।

Post – 2017-01-31

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 27

सर सैयद मुस्लिम अभिजात वर्ग की दशा को ले कर बहुत चिन्तित थे! अपनी आंखों के सामने उन्होंने अवध के नवाब और दिल्ली के बादशाह का ह्रास और हस्र देखा था। हंटर की पुस्तक के शीर्षक’Our Indian Musalmans: Are they bound in conscience to rebel against the Queen?’ से ही यह ध्वनित था कि अंग्रेज मुसलमानों को अपने शासन के लिए खुराफात की जड़ मानते थे और यह सोचते थे कि न तो ये पहले वफादार रहे हैं न महारानी के सत्ता संभालने के बाद रह सकते हैं!

पूरी पुस्तक इसी का दृष्टान्त प्रस्तुत करती थी परन्तु हंटर ने इसे चतुराई से यह जताते हुए कि उनकी जो दुर्गति हुई है वह हुई तो उनकी गलती के कारण है या ऐतिहासिक अपरिहार्यताओं के कारण है, यह दिखाया था कि इसके चलते मुसलमानों की दश्‍ाा बहुत खराब होती चली गई है। इसका लाभ हिन्दू उठाते रहे हैं । जब तक ऐसी परिस्थिति बनी रहेगी तब तक वे क्षुब्ध रहेंगे और प्रशासन के लिए समस्यायें खड़ी करते रहेंगे। हम उनसे वफादारी की आशा कर ही नहीं सकते। प्रजावत्सल प्रशासन के दायित्व का निर्वाह करते हुए सरकार को उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए, उनकी भलाई के लिए उचित उपाय करना चाहिए।

परन्तु इसके साथ ही मुसलमानों पर यह दबाव था कि जब तक तुम हिन्दुओं की तरह आधुनिक शिक्षा प्राप्त नहीं करते, तब तक तुम हमारे किसी काम के नहीं हो, इसलिए हम तुम्हारी मदद करना भी चाहें तो कैसे कर सकते हैं।

यह सचाई के बहुत करीब था और इस सचाई को सिरजने में अंग्रेजों का हाथ था। अपनी परंपरावादी सोच, धार्मिक जुनून के कारण मुसलमान अपना भला कम कर सके, अपने दुश्‍मनों के काम लगातार आते रहे हैं जो उनके जनून को उभार कर उनका इस्तेमाल करते रहे, फिर अपने लिए असुविधानक पाकर उनको प्रताड़ित करके उनके सामने दो ही विकल्प छोड़ते रहे हैं, या तो बन्दा बन जा, या बर्वादी के लिए तैयार हो।

कारण आवेग की प्रखरता होने पर अक्ल और सूझ-बूझ से काम लेना भी उस आवेग का अपमान प्रतीत होता है, इसलिए किसी भी आवेग की प्रखरता होने पर, घृणा नहीं, वह प्रेम के आवेग की उत्कटता हो तो भी, बुद्धि उस आवेग के नियन्त्रण में चेरी की तरह काम करती है, अध्यापिका के रूप में नहीं। ईर्ष्‍या, द्वेष, अहंकार, काम, क्रोध, लोभ, भीति, मोह सभी के प्रबल होने पर यही होता है। दिमाग है पर शैतान के कब्जे में, पर यह शैतान जिसे अक्सर भूत कहा जाता है, आवेग की इस प्रखरता में कहा जाता है कि उसके सिर पर भूत सवार है, उसमें यह भुला दिया जाता है कि भूत मन्त्र से उतारा जाता है। आवेग के अन्धे लोगों का उपयोग अपने मन और बुद्धि को संतुलित रखने वाले कर ले जाते हैं और वे इनको अपनी ओर से उत्तेजित करते हुए उनका हितैषी बन कर भी उनका सत्यानाश कर सकते हैं।

इतिहास गवाह है, लगातार ऐसा होता आया है।

अंग्रेजों ने मुसलमानों के साथ यही किया। अमेरिकी यही कर रहे हैं। यह अब तक समझ में आ जाना चाहिए। पर यह समझना जरूरी है कि उन्होंने वहाबी सैयद अहमद का उपयोग उसकी धर्मान्धता को उभार कर किया और सर सैयद अहमद का उपयोग उनमें रईसों के दिन लदने के दृष्टांत देते हुए उनके मन में आश्‍ांका और दहशत को उभार कर और उनका हमदर्द बन कर किया। शिकार तो दोनों बने, इसका कुछ अधिक दायित्व सर सैयद पर आता है, परन्तु जहां सर सैयद गलत लगते हैं वहां वे गलत हैं क्या?

परिणामों से किसी महान पुरुष का मूल्यांकन किया जा सकता है क्‍या जब कि हम जानते हैं कि अतीत में बहुविदों ने अधिक मूर्खताएं की हैं और अल्पज्ञों ने अनुकरणीय प्रबन्ध किए और शासक के रूप में अधिक सफल रहे।

यह अन्तर ज्ञान और अज्ञान का नहीं अपितु ज्ञान के भिन्न स्तरों का है। एक प्रतिभाशाली था जिसे शिक्षा का अवसर मिला, उसने किताबें पढ़ीं और किताबों के ज्ञान का अपने समय की समस्याओं का समाधान करने के लिए उपयोग किया और फेल कर गया क्योंकि वे समाधान जिस देश, काल और परिवेश के लिए थे वे उसके वर्तमान से अनमेल थे इसलिए उस पर घटित नहीं हो सकते थे।

दूसरी ओर वे प्रतिभाएं थीं जिनको शिक्षा का अवसर नहीं मिला, वे अपने ढंग से अपनी और अपने समय की समस्याओं से दो चार होते रहे । उन्हें शिक्षा भी मिली होती और ऐसी शिक्षा मिली होती जिसमें वे पुस्तकीय ज्ञान के अनुपात में अपने समय के यथार्थ से कटते न गए होते तो, सबसे कल्याणकारी समाधान सुशिक्षित और और जमीन से जुड़े लोगों के द्वारा ही मिल सकते थ।

इसे हम ज्ञानदंभ या ज्ञानान्धता के रूप में देख और समझ सकें तो हमारी समझ में यह आएगा कि अभी तो हम भारत को ही नहीं जानते हैं। दूसरों के अपने हितों और आग्रहों से प्रेरित परिभाषाओं से निर्मित भारत को जानते हैं। हम अपने आप को नहीं जानते, जब कि मनोविज्ञान और आत्मज्ञान की भारतीय उपलब्धियों के सम्मुख आधुनिक (पश्चिमी) मनोविज्ञान उतना ही पीछे है जितना पश्चिमी भाषाविज्ञान भारतीय भाषा दार्षनिकों से पीछे था। समस्या कई दृष्टियों से जटिल हो गई है इसलिए हम सर सैयद को आगे कई कोणों से समझने का प्रयत्न करेंगे।

Post – 2017-01-30

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास -26

सामुदायिक एकजुटता के लिए संगठन का होना जरूरी है। संगठित समाज या इकाइयों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अच्छा या बुरा जो भी निर्णय हो, पूरे समुदाय या कहें दायाद की ऊर्जा उसी दिशा में प्रवाहित होती है। इस तरह का संगठन कबीलाई अवशेष है और इसका विकसित समाजों या अवस्थाओं से मेल नहीं बैठता। हमारी जातियों में, उनकी बिरादरी पंचायतों में आज भी इनका नमूना देखा जा सकता है।

हिन्दू समाज के धार्मिक नेताओं में कुछ को इस बात की चिन्ता रही है कि इसका कोई ऐसा मंच नहीं है जिससे पूरे समाज को जोड़ा जा सके। उन्होंने संश्लिष्ट् संस्कृति (जिसे कंपोजिट कल्चर कहें तो कुछ लोग अधिक आसानी से समझ सकेंगे) की दुर्बलता को समझा या कहें इसकी शक्ति को दुर्बलता मान लिया, पर यह नहीं देखा कि संगठित इकाइयों की अपनी कमजोरियां अधिक खेदजनक हैं और ये उनके आगे बढ़ने में रुकावट पैदा करती हैं।

हमने बहुत पहले अपनी एक पोस्टं में यह सुझाया था कि इस इकहरेपन के कारण ही यदि किसी खूंखार से खूंखार कबीले में किसी भी तरह से बदलाव आता है तो पूरा कबीला बदल जाता है। हूणों, शकों, किरगीजों, मंगोलों जैसे आतंककारी समाजों में भी जब इस्लाम का प्रवेश हुआ तो बहुत कम समय में ही पूरा का पूरा क्षेत्र धर्मान्तरित हो गया और उनकी क्रूरताओं का भी इस्लाम में अन्तरण हो गया।

हमारे अपने देश में यदि किसी पेशे या जाति के लोगों ने धर्मान्तरण का निर्णय किया तो पूरी की पूरी जाति, उपजाति या उस पेशे से जुड़े लोग धर्मान्तरित हो गए जैसा हम जोगियों, नटो, बुनकरों, रंगरेजों आदि के मामले में देख आए हैं।

यहां इसका स्मरण इसलिए आया कि इस केन्द्रीयता के कारण ही सैयद अहमद बहुत थोड़े समय में वहाबी मत से मुसलमानों को जोड़ने में ही सफल नहीं हुआ, बल्कि उसकी उपयोगिता को पहचान कर उसके माध्यम से अंग्रेजों ने पूरे वहाबी समुदाय का अपने स्वार्थ के लिए इस्तेेमाल कर लिया। आज भी उनका वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल कर लिया जाता है, भले इससे उनके समाज का कोई भला हो या नहीं, नेतृत्व करने या समाज को प्रभावित करने वाले व्यक्ति का अपना भला तो होता ही है। ठीक इसी कारण और इसी तरह हिन्दू समाज की जातियों और उपजातियों का वोटबैंक के रूप में इस्ते माल कर लिया जाता है।

ब्रिटिश कूट विदों ने यह जानते हुए कि सैयद अहमद का प्रभाव पश्चिमी भारत में उसके नशे के जाल के चलते रहा है और रणजीत सिंह की कठोरता के कारण उसका कारोबार बन्द हो गया था, इसलिए उसके द्वारा संगठित मुस्लिम शक्ति का उपयोग रणजीत सिंह के खिलाफ किया जा सकता है। जिहाद नशे के कारोबार के आधार पर तो संभव नहीं था, परन्तु रणजीत सिंह ने अपने राज्य में गोवध पर भी रोक लगा दी थी और इसको आधार बना कर मुसलमानों को धर्मयुद्ध के लिए उकसाया जा सकता है। रणजीत सिंह से अंग्रेजों के आशंकित रहने का कारण हम पहले बता चुके हैं। यह बात कंपनी शासित क्षेत्र में मुसलमानों को धर्मयुद्ध करने लिए लोगों को लामबन्द करने, उनके लिए धन की व्यवस्था करने की जो छूट मिली थी, जिसका उल्लेेख हंटर ने सहमे हुए ढंग से किया है मानो यह सब कुछ हो रहा था और अंग्रेज इससे घबराए हुए थे और उनके सामने बेबस अनुभव कर रहे थे, उसका खुलासा सर सैयद ने अपनी समीक्षा में किया है:
Now we have seen how recruits and money were forwarded from Patna and other parts of Bengal, and India generally, during the three first periods of frontier Wahabi history; but I think it is very evident that not a man of these was intended or used for an attack on British India, nor was there the slightest grounds for supposing,
during these three periods, that there was a rebellious spirit growing up amongst the general Mohammedan public in India.

उनकी अपनी नजर में सिक्खों के खिलाफ वहाबियों का उपद्रव मुसलमानों के प्रति सिक्खों के अत्याचार के कारण था। अत्याचार का अन्य कोई कारण सर सैयद ने नहीं दिया है इसलिए हम मान सकते हैं कि उनकी नजर में गोवध पर प्रतिबन्ध मुसलमानों पर अत्याचार था। अफीम और तंबाकू की तस्करी तो हो नहीं सकती थी क्योंकि इसके आदी तो हिन्दू मुसलमान दोनों थे, और इसके आधार पर मुसलमानों को उत्तेजित किया नहीं जा सकता था। मुसलमानों के मतान्तरण का या उनको अपने मजहब के पालन के लिए किसी टैक्स आदि का सवाल नहीं उठता, इसलिए जब सर सैयद अहमद मुसलमानों के प्रति सिक्खों की ज्यादती की बात करते हैं तो यही एक मात्र कारण दिखाई देता है और इसका वह बिना नाम लिए समर्थन करते हैं:
We have already seen, in the oppression of Mohammedans by the Sikhs, what reason the former had for attacking the latter; but no reason has yet been shown, either by Dr Hunter or by any one else, for this sudden hatred to the British.

यहां याद दिला दें कि इससे पहले सिक्खों द्वारा मुसलमानों के दमन का कोई प्रमाण सर सैयद ने नहीं दिया है सिवाय इसके कि एक स्थल पर अपने बचाव में एक वहाबी ने किसी अंग्रेज के यह पूछने पर कि यदि विधर्मी (वस्तुत: इनफिडिल या उस धर्म में विश्वास न करने वाले) होने के कारण तुम सिक्खों के विरुद्ध विद्रोह करते हो तो हमारे प्रति क्यों नहीं, जिसके जवाब में उसने कहा था कि अंग्रेज उनको उत्पी्डित नहीं करते जिसका हवाला हम दे आए हैं। पर सिक्खों
के प्रति धर्मयुद्ध को वह जायज ठहराते लगते हैं:
(1) Wahabi jihad—represented by our author to have been one against the British—was intended solely for the conquest of the Sikhs;
(2) The summons issued by Syed Ahmad to the Mohammedans, in favour of a jihad against the Sikhs, completely refutes it (jihad against the British).

हमें ध्यान इस पर देना चाहिए कि सर सैयद को यह पता था कि मुसलमानों के अतिवादी जज्बात का उपयोग अंग्रेजों ने अपना काम साधने के लिए किया।, अर्थात् रणजीत सिंह पर सीधे हमला करने की जगह उनको परेशान करके अपने साथ समझौता करने को बाध्‍य करने के लिए उनकाे बलि का बकरा बनाया था। पर वह इसकाे कहने का साहस नहीं करते।

उन्हें यह भी पता था कि वहाबियों को धर्मयुद्ध के लिए उकसा कर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच नफरत पैदा करने की उनकी जो योजना थी उसकी कीमत हिन्दुओं, कहें, सिखों को जितनी देनी पड़ी, वहाबी जिहादियों को उससे अधिक देनी पड़ी, इसका लाभ अंग्रेजों ने उठाया, परन्तु वह इसका संकेत तक नहीं करते हैं।

हंटर अपनी पुस्तदक में पागलपन के इस उभार में वहाबियों के साथ बलूचिस्तान और अफगान कबीलों के हिन्दुओं पर किए जाने वाले आक्रमणों का खुला विवरण देते हैं जो उस कटुता को जीवन्त कर सकता है:
A fanatical war, of varying success, against the Sikhs followed. Both sides massacred without mercy, and the bitter hatred between the Muhammadan Crescenders and the Hindu Sikhs lives in a hundred local traditions. Ranjit Singh strengthened his frontier by several of the skillful generals whom the breaking up of Napolenic armies had cast loose upon the world… The Muhammadans burst down from time to time, burning and murdering wherever they went. On the other hand, bold Sikhs villagers armed en masse, beat back the hill fanatics into their mountains, and hunted them down like beasts. The fierce passions of the time left behind a land tenure of a horrible nature – a Tenure by Blood. The Hindu borders still display with pride a Grant for their village lands on payment of a hundred heads of the Hussainkhel tribes as a yearly grant.

सच कहें तो मध्य काल में ही नहीं, राजसत्ता को रास न आने वाली सचाइयों को खुल कर बयान करना उन्नीेसवीं शताब्दीा में भी सुरक्षित नहीं था, इसलिए ब्रितानी साजिश को भांपते हुए भी वह उसकी आलोचना न कर पाए होंगे । फिर भी उन दिनों ही इस पुस्तक पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बांग्ला के कुछ अखबारों ने इसे सामाजिक कलह पैदा करने के इरादे से लिखी गई पु्स्‍तक करार दिया था और उनके संपादक हिन्दू थे जिनके प्रति हंटर का रवैया सर सैयद के अनुसार भी सहानुभूतिपूर्ण था।

हम मान सकते हैं कि सर सैयद दरबारी परंपरा में पले होने के कारण तेवर साफगोई का रखते हुए भी बहुत संभल कर अपनी बात करते और अपने समुदाय के लिए रियायते पाने की फिक्र में इस समीक्षा के दहाड़ते हुए शीर्षक के बाद भी दुहाई देते हुए प्रतीत होते हैं और उनके उन अत्यायचारों को भी चालू ढंग से, बिना अभियोग लगाए पेश करते हैं।

उदाहरण के लिए रणजीत सिंह यह भांप कर कि उनके सीमान्तों से होने वाले उपद्रवों के पीछे अंग्रेजों का हाथ है, उनसे संधि करने पर विवश होते हैं, अपने राज्य का कुछ हिस्सा भी अंग्रेजों को सौंपनेेे को बाध्‍य होते हैं और इस बात पर राजी होते हैं कि वह कंपनी के इलाके की ओर किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं करेंगे। अपना मकसद पूरा हो जाने के साथ ही उन्हीं वहाबियों का समर्थन अंग्रेज छोड़ देते हैं, उन्हें मदद बंद हो जाती है। वे अब उन्‍हें अपने लिए भी खतरा मानने लगते हैं, इसी के चलते सैयद अहमद मारा जाता है, दूसरे नेताओं को सीमान्त छोड़ कर देश वापस आना पड़ता है और वहाबियों को अपने लिए संकट बनने से रोकने के लिए अंग्रेज पटना में उन्‍हें फांसी की सजा भी दे देते हैं परन्तु उसका भी जिक्र वह बड़े चालू ढंग से करते हैं:
They were the two disciples of Hazrat Syed Ahmad Shaheed. When the Jehad of 1831 was withdrawn, they retired to frontier. But the British government persuaded them to come back to India to which they agreed and came back to Patna. But the government suspected them of intriguing and the whole Patna family was involved in it. Patna was declared as a centre of anti-British activities and during 1867-70 five cases were instituted against the Patna family in which many noted preachers were sentenced to death.

इसके पीछे भावुक कौमों को उत्तेजित करके ऐसी विध्वंसक गतिविधियों में लगाना जिससे अपने शत्रुओं काे आजिज करके झुकाया जा सके और फिर उनको हिंसा का चस्का पड़ जाने के बाद अपने लिए भी खतरनाक मान कर उनको मिटाने की ठीक वही चाल अंग्रेजों ने कट्टरपंथी वहाबियों के साथ चली थी जो हमारे सामने उसी तरह की कट्टरता अरबों में उभार कर उनको तालिबानी बना कर उनका अफगानिस्ताान में इस्ते माल करके रूस को मात देने के बाद अमेरिकियों ने किया।

इस चाल की ओर न तो सैयद अहमद संकेत करते हैं न मेरी जानकारी के किसी दूसरे ने किया। परोक्ष रूप में वह स्वयं अंग्रेजी चाल के मुहरे बन जाते हैं । पर यह ध्यान दें कि सर सैयद अपने सम्मान के लिए अपनी जान जोखिम में डाल सकते थे, पर, अपनी समझ से, अपनी कौम के हित के लिए वह किसी सीमा तक झुकने के लिए तैयार थे । मुसलमानों के लिए अलग कौम का प्रयोग भी मेरी जानकारी में पहली बार उन्होंने ही किया।

Post – 2017-01-29

हिन्‍दुत्‍व के प्रति घृणा का इतिहास – 25

हम हिन्दू या मुसलमान या भारतीय या यूरोपीय रह कर बहुत सारे काम कर सकते हैं, वे काम बहुत अच्छे और सर्वजन सराहनीय भी हो सकते हैं, पर इतिहास नहीं लिख सकते। यह पूरी मानव सभ्य ता के विकास प्रक्रिया का अवलोकन है और सभी तरह के आग्रहों, दुराग्रहों से मुक्त हो कर ही देखा, परखा जा सकता है और उसके बाद ही हम किसी निर्णय पर पहुंच सकते हैं।

हमारा दुर्भाग्य यह कि अभी तक जो इतिहास लिखे गए हैं वे इसका निर्वाह नहीं कर सके हैं और इसलिए उनसे मनोमालिन्य जितना भी फैला हो, समझ का विस्तार नहीं हुआ है। एक फिकरा है, मैंने इसे आल्डहस हक्स्ले के उन कालमों पर आधारित एक पुस्तक में पढ़ा था जिसका नाम तक इस समय याद नहीं आ रहा, पर जो अखबारों में उनके कालम पर आधारित था। इतिहास पर लिखते हुए उन्हों ने लिखा था ‘’इतिहास से आदमी एक ही चीज सीखता है कि कोई इतिहास से नहीं सीखता।” अपने विरोधाभासी तेवर में यह वाक्य जहन में इस तरह अटक गया कि जिस पुस्त क में यह लेख था वह भूल गया, पर लेख का शीर्षक ‘आन हिस्ट्री’ और यह वाक्य नहीं भूला। बाद में पता चला यह बात उनसे पहले भी कोई कह चुका है। याददाश्त के भी क्या पैंतरे हैं।

पर मैं एक दूसरा विरोधाभासी कथन यह करना चाहता हूं कि इतिहास से हम इसलिए कुछ नहीं सीखते कि इतिहास की समझ और उसका लेखन जिस बौद्धिक सन्तुलन और उत्त रदायित्वं की मांग करते हैं, वह अपनी चमड़ी से उछल कर बाहर हो जाने और फिर भी पूरे वजूद में खड़े होने जैसा कठिन है। हम जब अपनी सीमाओं पर नियंत्रण करना चाहते हैं तो भी, हमारे प्रयत्न के बाद भी, कुछ राग-विराग हमारी वस्तुपरकता में भी बना रह ही जाता है। इससे बचने का उपाय है, हम अपने आलोचकों के विचारों को, जिस सीमा में वे राग-विराग-मुक्त हों, उन पर ध्यान दें और किसी भी कृति को पढ़ते समय उसका आलोचनात्मक पाठ करें, यहां तक कि उसकी स्रोत सामग्री का भी आलोचनात्मक पाठ करें क्योंकि अवलेप उन पाठों और उनके स्रोतों तक में पाया जा सकता है। साथ ही यह भी जरूरी है कि हम एक ही पाठ के अन्तेर्विरोधों को भी लक्ष्य करते चलें और जहां उनमें असंगतियां है, उनके निवारण के लिए प्रयत्नशील हों, भले हमें इसके लिए पठित से विपरीत दावा करना पड़। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि दूसरे लोग अपने को अपने धर्म, विचारधारा, विश्वासधारा या अन्ये मनोबन्धों से बाहर निकल कर अपनी प्रतिक्रियायें निडर हो कर व्यक्त करें और इस दहशत में न रहें कि मैं अमुक दायरे में आता हूं इसलिए मेरे विचार को उससे प्रेरित मान लिया जाएगा। यह एक कोशिश है जिसके लिए हमें प्रयत्न करना है और किसी अवलेप से मुक्त बने रहने के लिए उन स्थलों और तथ्यों को इंगित करते हुए उनकी कमी और वास्तविक सूचना को प्रस्तुकत करने का प्रयत्‍न करना है।

मुझे इस बात की याद इसलिए आई कि मैंने यह तो पिछली पोस्ट में कह दिया कि सर सैयद हंटर के दबाव में आ गए और उसी से सचेत या अचेत रूप में परिचालित होते रहे जो गलत नहीं था, फिर भी इससे यह भ्रम पैदा होता है कि उनकी हंटर से सहमति थी या वह उससे सीधे परिचालित थे, जब कि सर सैयद उन व्यक्तियों में थे जिन्हों ने हंटर की तीखी आलोचना करते हुए ‘हंटर के हंटर’ शीर्षक एक समीक्षा लेख लिखा था और हंटर पर दुरुक्ति का आरोप लगाया था।

हंटर की पुस्तक को समझने के लिए सैयद अहमद की यह समीक्षा बहुत उपयोगी है और उपयोगी है उस कुटिलता को समझने के लिए भी कि हंटर जो खुफिया विभाग का सर्वेसर्वा था, उसने तथ्यों को छोड़ते और मरोड़ते हुए अपने उन कारनामों को छिपाने का प्रयत्न किया था जो बहुत पहले से कंपनी के प्रशासक हिन्दुंओ और मुसलमानों के बीच विरोध पैदा करने के लिए करते आए थे।

सैयद अहमद की समीक्षा उनके उस अन्तर्मन में झांकने का भी अवसर देती है जिस पर उन्होंने हिन्दू और मुसलमान दोनों भारत माता की दो आंखें हैं कह कर और दूसरी दलीलें देते हुए आपसी भाईचारे की बात करते हुए परदा डाला था और जिसके कारण कई लोग अपने को सेक्युलर सिद्ध करने के लिए सर सैयद को भी सेक्युलर करार देते हुए उनसे असहमत होने वालों को संप्रदायवादी सिद्ध करते आए हैं जिसमें सेक्युलर बराबर मुसलमान और कम्युनल बराबर हिन्दू हो जाता है । यहां मेरा तात्‍पर्य यह नहीं है कि हिन्दुओं में अपने समुदाय के हित की चिन्ता नहीं थी, न ही अपने समुदाय की चिन्ता के कारण मैं सर सैयद को संप्रदायवादी कहने जा रहा हूं। ये घटिया श्रेणियां है जिनसे उन महापुरुषों का सही मूल्यांकन संभव नहीं है जिन पर हमारे उत्साही विद्वान किन्हीं प्रलोभनों में एक को उतार कर, अपने को उन सीमाओं से ही ऊपर नहीं सिद्ध करते रहे हैं, कई और तरह की ऊपरी यात्राओं के पाथेय के रूप में काम में लाते रहे हैं ।

रोचक यह तथ्य है कि हंटर और सर सैयद के द्वारा लिखित उनकी आलोचना से उन आशंकाओं की पुष्टि ही नहीं होती, अपितु प्रमाण भी मिलते हैं जिनको मैं हंटर की पुस्तंक के अन्तं:पाठ से उसकी असंगतियों और असंभाव्यताओं को लक्ष्य करते हुए अपने मन में पाले हुआ था और इसे उनकी पुस्तक में सचेत घालमेल कह कर आगे कोई जोखिम मोल लेने से बचता था। अब हम हंटर के एक दावे को लें :
The Bengal Muhammadans are again in a strange state. For years a Rebel colony has threatened our frontier; from time to time sending forth fanatic swarms, who have attacked our camps, burned our villages, murdered our subjects, and involved our troops in three costly wars…. They disclose an organization which systematically levies money and men in the Delta, and forwards them by regular stages along our high-roads to the Rebel Camp two thousand miles off. Men of keen intelligence and ample fortune have embarked in the plot and a skilfil system of remittances has reduced one of the most perilous enterprises of treason to a safe operating of bankibg.
While the more fanatical of the Musalmans have thus engeged in overt sedition, the whole Muhammadan cimmunity had been openly deliberating on their obligation to rebel. During the past nine months, the leading newspapers in Bengal have filled their columns with discussions as to the duty of Muhammadans to wage war against the queen. The collective wisdom of the Musalman Law Doctors of North India was first promulgated in a formal Decision (Fatwa).

हंटर का निष्कrर्ष यह था कि : The Musalmans of India are, and have been for many years, a source of chronic danger to the British Power in India. For some reason or the other they hold aloof from our system, and the changes in which the more flexible Hindus have cheerfully acquiesced, are treated by them as deep personal wrongs.

इसकी पृष्ठmभूमि में वह सिखो पर सीमान्त में अफगानों और कबीलाइयों के नृशंसतापूर्ण कारनामों का और उनके जवाब में सिखों के उतने ही क्रूर दमन और हत्याकांड का उल्लेख कर आए थे । इसके लिए हंटर ने वहाबी आंदोलन के भारतीय प्रवर्तक सैयद अहमद को जिम्मेदार ठहराया था जो पहले अफीम की तस्करी के धन्धे में पंजाब में सक्रिय था परन्तु रणजीत सिंह के शासन के बाद नशाखोरी पर पूर्ण प्रतिबन्ध लग जाने के बाद बेसहारा हो कर बरेली में आकर दो साल तक धर्मग्रन्थों का अध्ययन किया और फिर उसके बाद हज पर गया जहां से वह वहाबी मत का मंत्र ले कर आया और धार्मिक जुनून उभार कर मुसलमानों को अंग्रेजों के विरुद्ध भड़काता रहा और फिर
In 1824 he (sayed Ahmad) made his appearance in the wild mountaineers of Peshawar fronteirs preachin war against the rich Sikh towns of Punjab.
The Pathan Tribes responded with frantic enthusiasm to his appeal. These most turbulent and most superstitions of the Mohammaden people were only too delighted to get a chance of plundering their Hindu neighbour under the sanction of religion. … He traveled through Kandhar and Cabul, raising the country as he went consolidation his influence through skillful coalition of the tribes. Their avarice was enlisted trough splendid promises of plunder, …

इस पूरे विवरण में जो बात मेरी समझ से परे थी वह यह कि इन वहाबियों का ऐसा आतंक कैसे छा गया था कि वे बेखौफ अंगरेजी कचहरी के पास भी आ कर और वह भी बहुत बड़ी संख्या में नहीं, अंग्रेजों के खिलाफ लोगों को भड़काने वाले भाषण देते थे और उन पर आंच तक नहीं आती थी। दूसरी बात जो समझ से परे थी कि यह अदना सा आदमी इतना प्रभावशाली कैसे हो गया कि उसका दबदबा पूरे उत्तर भारत में फैलता गया और कोई रोकटोक नहीं हुर्इ यहां तक कि उसका प्रभाव पश्चिमोत्तर तक फैल गया और कंपनी जिसने शेरों का शिकार किया था मेमने से डर कर सहम गई। इन दोनों कारणों से मुझे यह सन्देह था कि रणजीत सिंह की दूरदर्शिता, शक्ति और कौशल के साथ ही अपनी सेना को आधुनिक बनाने के लिए उनके द्वारा फ्रांसी‍सी सैन्य विशेषज्ञों की सहायता लेने, अपना तोपखाना तैयार करने की सूचनाओं के कारण आतंकित कंपनी ने इस धर्मान्ध को जिसकी जड़ें पहले से पश्चिमोत्तर में उसके नशे के कारोबार के कारण थी , उकसा कर उसकी शक्ति का संवर्धन किया और फिर उसे सिखों के विरुद्ध उपद्रव के लिए लगा दिया और इसे हिन्दू मुसलिम का या मुसलिम सिख का रंग दे कर प्रचारित करती रही या कम से कम हंटर ने उसे इसी रूप में रखा। मेरी आशंका को प्रमाणित करती है सर सैयद की समीक्षा। सर सैयद को हंटर की उसस्था पना से ही शिकायत है जिसमें वह Wahabism and rebellion against the British Government as synonymous के रूप में पेश करते हैं।

सचाई यह है कि:
Throughout the whole of his career, not a word was uttered by this preacher calculated to incite the feelings of his co-religionists against the English. Once at Calcutta, whilst preaching the jihad against the Sikhs, he was interrogated as to his reasons for not proclaiming a religious war against the British, who were also infidels. In reply he said, that under the English rule Mohammedans were not persecuted, and as they were the subjects of that Government, they were bound by their religion not to join in a jihad against it At this time thousands pf armed men and large stores of munitions of war were collected in India for the jihad against the Sikhs. Commissioners and magistrates were aware of this, and they reported the facts to Government. They were directed not to interfere, as the Government was of opinion that their object was not inimical to the British. In 1824 these jihadis against the Sikhs reached the frontier, and they were afterwards continually strengthened by recruits and money from India. This was well known to Government, and in proof of this I will cite the following case: A Hindu banker of Delhi, entrusted with money for the Wahabi cause on the frontier, embezzled the same, and a suit was brought against him before Mr William Fraser, later Commissioner of Delhi. The suit was decided in favour of the plaintiff, Moulvi Ishak, and the money paid in by the defendant was forwarded to the frontier by other means. The case was afterwards appealed to the Sudder Court at Allahabad, but the decision of the Lower Court was upheld.
इससे आगे की चर्चा कल ।

Post – 2017-01-28

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 24

हंटर की जिस पुस्तक के अंश मैंने पिछली पोस्ट में विस्तार से दिए हैं उस पुस्तक का प्रयोजन था अंग्रेजों के प्रति मुसलमानों के आक्रोश और घृणा को हिन्दुओं की ओर मोड़ने के लिए एक ओर हिन्दुओं को यह समझाना कि यह न समझो कि मध्यकाल में मुस्लिम शासकों ने महत्वपूर्ण पदों पर हिन्दुओ को भी नियुक्त किया इसलिए मुसलमान तुमसे प्यार करते थे। ऐसी नियुक्तियों का वे विरोध करते थे, उदाहरण दो ।
टोडरमल को जब अकबर ने अपना राजस्व मंत्री नियुक्त किया तो उसका विरोध हुआ, राणाप्रताप के विरुद्ध मुसलमान सिपहसालारों ने मानसिंह के अधीन युद्ध करने से इन्कार कर दिया : In the two best known cases, that of Raja Todar Mall the Financier, and Raja Man Singh the Greneral, formal deputations of remonstrance were sent to Court. In the case of Man Smgh, some of the Muhammadan Generals refused to serve under him in the Expedition against Rana Pratap. I have already given the statistics of the Hindus who rose to conspicuous offices under the least bigoted of the Musalman monarchs.

On Todar Mall’s appointment as Chancellor of the Empire, the Musalman princes sent a deputation to remonstrate. ‘ Who manages your properties and grants of land ? ‘ replied the Emperor. ‘ Our Hindu agents,’ they answered. ‘ Very good,’ said Akbar ; allow me also to appoint a Hindu to manage my estates.

इतना ही नहीं उसने अकबर के शासनकाल में, जिसे सबसे उदार माना जाता है, एक तालिका देकर यह दिखाया कि तुलनात्मक दृष्टि से हिन्दुओं को कितने कम पद मिले थे:
As haughty and careless conquerors of India, they managed the subordinate administration by Hindus, but they kept all the higher appointments in their own hands. For example, even after the enlightened reforms of Akbar, the distribution of the great oflSces of State stood thus: —Among the twelve highest appointments, with the title of Commander of more than Five Thousand Horse, not one was a Hindu. In the succeeding grades, with the title of Commander of from Five Thousand to Five Hundred Horse, out of 252 officers, only 31 were Hindus under Akbar. In the second next reign, out of 609 Commanders of these grades, only 110 were

और फिर उसने एक साथ दो निशाने साधे । हिन्दुओं के लिए कि मुसलमानों ने तुम्हारे साथ न्याय नहीं किया वह पहली बार ब्रिटिश शासन में हुआ। मुसलमानों के लिए कि इनको तुमने लगातार दबा कर रखा था और आज भी इन्हें नाचीज समझते हो, और उनके साथ उन्हीं स्कूलों में बैठ कर, बराबरी पर रहते हुए, पढ़ना भी तुम्हारी शान के खिलाफ है इसलिए तुम शिक्षा में पिछड़ गए और तुम्हारे आगे बढ़ने का एक ही उपाय है तुम्हारे स्कूल कालेज हिन्दु ओं से अलग हों और वे सरकारी स्कूल हों (अत: महारानी को मुसलमानों की वफादारी पाने के लिए ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए ।) यदि मुसलमानों में थोड़ी भी अक्लं हो तो उन्हें इस बदलाव के लिए तैयार होना चाहिए:
Had the Musalmans been wise, they would have perceived the change, and accepted their fate. But an ancient conquering race cannot easily divest itself of the traditions of its nobler days. ! The Bengal Muhammadans refused a system which gave them no advantages over the people whom they had so long ruled, a people whom they hated as idolaters and despised as a servile race. Religion came to the support of the popular feeling against the innovation, and for long it remained doubtful whether a Musalman boy could attend our State Schools without perdition to his soul. Had we introduced our system by means of English masters, or boldly changed the language of public business to our own tongue, their religious difficulty would in one important respect have been less. For the Muhammadans admit that the Christian Faith, however short of the full truth as finally revealed by their Prophet, is nevertheless one of the inspired religions which have been vouchsafed to mankind. But Hinduism is to them the mystery of abominations, a system of devil-worship and idolatry unbroken by a single gleam of the knowledge of the One God.^ The language of our Government Schools in Lower Bengal is Hindu, and the masters are Hindus. The higher sort of Musalmans spurned the instructions of idolaters through the medium of the language of idolatry.

इन कथनों में बहुत सारी अत्‍युक्तियां, दुरुक्तियां और घालमेल है। कारण अंगेजों ने स्‍वयं पहली बार वारेन हंस्टिंग्‍स की सूझ से हिन्‍दुओं के लिए अलग संस्‍कृत कालेज और मुसलमानों के लिए मुस्लिम कालेज खोला था जिसमें अरबी, फारसी के साथ कुछ अंग्रेजी का भी प्रबन्‍ध था परन्‍तु उसमें पढ़ने वाले न थे। वह जब तक चला उसके अजीब किस्‍से आते रहे जिसमें मारपीट, बहसबाजी, नशाखोरी और तवायफों को भी हास्‍टल में बुला लेने जैसे विचित्र कारनामें देखने में आए और अंत में कालेज बन्‍द करना पड़ा । पर यह भी सच है कि मदरसों की जिस शिक्षा में कुरान, रटंत अरबी, पढंत फारसी और वदन्‍त स्‍थानीय भाषा हो वह प्रकृति से ही भिन्‍न था संस्‍कृत पाठशालाओं की तरह । दोनों का मेल नहीं था। पर यह रंग पहली बार दिया जा रहा था।

पुस्तक रूप देने और उसे प्रकाशित करने से पहले इसे लेखों के रूप में लिखा और अंग्रेजी के अखबार में प्रकाशित कराया था और फिर उनका फारसी में अनुवाद करा कर मुसलमानों के लिए उपलब्ध कराया था या कहें, जिनको सन्देश पहुंचाना था उनको पहुंचाया गया था।
Two years ago I put forth a series of articles, showing how completely the Judicial and Revenue Services in Bengal, in which the appointments are greatly coveted, and the distribution of patronage closely watched, had been denuded of Musalmans. These articles were immediately translated into Persian, and copied into or discussed by many of the Anglo-Indian and vernacular papers.
और फिर जब लगा तीर निशाने पर लग रहा था तब उसको संवारते और संपादित करते हुए पुुस्‍तक के रूप में प्रकाशित किया गया।

यह उस समय मुसलमानों से अधिक ब्रिटिश राज की लाचारी थी कि वह अपनी बला को किसी पर टाले इसे समझने के लिए इस पुस्तक के पहले पन्ने पर नजर डालना ही पर्याप्त होगा । इसमें उसने स्वीकारा था कि कैसे आज भी बंगाल में मुसलमानों का उपद्रव जारी है और उनके हौसले कितने बुलन्द हैं। यदि कोई कहे कि वंगभंग के बाद बंगाल में विप्लवी गतिविधियों को प्रेरणा उनसे मिली थी जो इस्लामी अस्मि‍ता की लड़ाई लड़ रहे थे तो मैं तात्कालिक रूप में इसका प्रतिवाद न कर पाऊंगा क्योंकि मेरी जानकारी में ऐसा काई प्रमाण नहीं है जिससे इसका खंडन किया जा सके, जब कि इसकी संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

मुयलमानों में व्‍याप्‍त असंतोष का एक पहलू यह था कि मुगल कालीन व्यवस्था को समाप्त करके अंग्रेज सभी नौकरियों को मुसलमानों से छीन कर हिन्दुओं को दे रहे है:
The Calcutta Persian paper some time ago wrote thus : — ‘ All sorts of employment, great and small, are being gradually snatched away from the Muhammadans, and bestowed on men of other races, particularly the Hindus.

ऐसी सूचनाओं को हम सन्दिग्ध नहीं मानते परन्तु या तो यह एक संयोग या दुर्योग था कि हंटर की पुस्तक की प्रतियां बंगाल में पहुंची नहीं कि कुछ दिनों के भीतर एक अंग्रेज न्या‍याधीश की अदालत में ही हत्या कर दी गई। पुस्तक के दूसरे संस्करण में उसने ऐसी किसी अनहोनी की पुन: आशंका जताई तो माना जा सकता है कि उसकी व्याख्‍या से मुसलमानों को भी ठेस पहुंची थी और वे उसे छलावा मान रहे थे ।

सर सैयद अहमद की चिन्ता बहुत सही थी। अपने धर्मबन्धुनओं को अधोगति में देखना, या पिछड़ते जाते देखना, किसी के लिए क्लेशकर हो सकता है, इसे समझना कठिन नहीं है। परन्तु उनकी सोच को हम हंटर के सुझावों के इतने करीब पाते हैं कि लगता है अंग्रेजों ने उनका इस्तमाल कर लिया।

यह जानना रोचक हो सकता है कि सैयद अहमद को सर की उपाधि नहीं मिली थी, परन्तु उनको इंग्लैं ड में जो सम्मान मिला था या उनको उपयोगी मान कर महारानी ने उनको जो व्यक्तिगत आदर दिया था और वहां के संभ्रान्त जगत में उनकी जैसी पूछ हुई थी, वह नाइट की उपाधि पाने वाले किसी अन्य व्यक्ति के लिए दुर्लभ थी, परन्तु इससे ही यह भी सिद्ध होता है कि सर सैयद अहमद की महिमा कुछ तो उनकी अपनी सूझ और दूरदृष्टि पर आधारित है और कुछ आरोपित। कुछ लोगों पर महानता थोप दी जाती है वाला मुहावरा उन पर पूरी तरह नहीं परन्तुू काफी दूर तक लागू होता है।

उन्होंने इस अहसान के बदले अंग्रेजों की सोच और समझ के समक्ष दासवत समर्पण कर दिया था जब कि उनकी अग्रता को स्वीकार करते हुए भी अपनी अस्मिता की रक्षा करना अधिक श्रेयस्कर रहा होता। उनका अंग्रेजी में उपलब्ध यह कथन उनकी गरिमा के अनुरूप नहीं लगता:
Without flattering the English, I can truly say that the natives of India, high and low, merchants and petty shopkeepers, educated and illiterate, when contrasted with the English in education, manners, and uprightness, are as like them as a dirty animal is to an able and handsome man. The English have reason for believing us in India to be imbecile brutes. Although my countrymen will consider this opinion of mine an extremely harsh one, and will wonder what they are deficient in, and in what the English excel, to cause me to write as I do, I maintain that they have no cause for wonder, as they are ignorant of everything here, which is really beyond imagination and conception …. I am not thinking about those things in which, owing to the specialties of our respective countries, we and the English differ. I only remark on politeness; knowledge, good faith, cleanliness, skilled workmanship, accomplishments, and thoroughness, which are the results of education and civilisation. All good things, spiritual and worldly, which should be found in man, have been bestowed by the Almighty on Europe, and especially on England.

सैयद अहमद गलत नहीं थे, वह अनुपात का ध्यान नहीं रख सके। उन्हें जो सम्मान, संपर्क, स्वीकारभाव मिला वह उनके लिए अकल्पनीय था। अंग्रेजों की उदारता का कारण यह था कि उन्हे जिस माध्यम की तलाश थी वह उनके रूप में मिल गया था। सैयद अहमद अपने लिए कल्पनातीत को उपस्थित पा कर अभिभूत थे और यह समर्पण भाव उन संकेतों पर उन्हें मुग्धभाव से चलने को प्रेरित करता रहा जिनको हंटर ने दर्ज किया था। अलग स्कूल, अलग कालेज, प़ृथक अस्मिता और फिर भी वह दयानत या उसका प्रदर्शन जो बड़े लोगों में पाया जाता है। सैयद अहमद पर हम पहले कुछ लिख चुके है, कुछ विचार आगे करेंगे ।

Post – 2017-01-28

जोगी ने हिन्‍दू युवा वाहिनी नाम की या ऐसी ही कोई नई पार्टी बना ली हैै जो भाजपा को मात देने के लिए पूरे उत्‍तर प्रदेश में अपने उम्‍मीदवार खड़ा करेगी । कटियार से ले कर संघ के कुंठित साेेच वालों के ऐसे बयान जिनसे उन्‍हें पता है वे विकास और सबके साथ के दावे के विपरीत हैं इसलिए चुनाव में इससे भाजपा को नुकसान होगा सोच समझ कर दे रहे है क्‍योंकि सांप्रदायिक सोच वालों को भाव नहीं दिया गया। इसके बाद भ्‍ाी यदि किसी को सन्‍देह है कि मोदी के सबको साथ लेकर चलने और पूरे देश को विकसित करने के लिए प्रयत्‍नशील नहीं है, तो वे राजनीति के मामले में ”मोतें अधिक ते जड़ मतिमन्‍दा।’ मोदी अकेला ऐसा व्‍यक्ति है जो देश को सांप्रदायिक और जातिवादी सोेच के मध्‍यकालीन दायरे से बाहर लाना चाहता है । कम से कम इस साहस के लिए बुद्धिजीवियों को उनका समर्थन करना चाहिए यह प्रमाणित करने के लिए कि वे सचमुच सांप्रदायिकता और जातिवाद के विरोधी हैं।

Post – 2017-01-27

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 23

हमारा जिस ऐतिहासिक चरण पर ब्रिटेन से सामना हुआ, वह हमसे कई शताब्दी आगे था। उन्होंने जिस चतुराई से अपनी कोठी कायम करने की अनुमति प्राप्त, की, अपने माल को चुंगी से मुक्त करा कर अपने प्रतिस्पर्धियों की तुलना में सस्ता रखा, अपनी कोठियों की किलबन्दी की, सुरक्षा के लिए सेना रखना आरंभ किया और फिर स्थानीय नवाबो के साथ छेड़छाड़ करते हुए, अपनी धौंस कायम की, दूसरे प्रतिस्पर्धियों को रास्ते से हटाकर और बक्सर की लड़ाई में नवाब और मुगल बादशाह की साझी सेना को मात दे कर वैध तरीके से बिहार, बंगाल और आेडिसा की दीवानी हासिल की उससे किसानों पर क्‍या बीती, कैसे मालामाल जमींदारों का एक नया वर्ग शक्तिशाली बना, वह इतिहासकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है, परन्तु इसी अवधि में मुसलमानों के विरोध को कुचलने के लिए उन्हों ने बंगाल के पुराने मुस्लिम जमीदारों को तबाह किया और इससे एक ओर तो उनके मनोबल को तोड़ा दूसरी ओर हिन्दुओं के प्रति, जो उनकी कीमत पर आगे बढ़ते जा रहे थे, सामाजिक स्तर पर कटुता का आधार भी तैयार किया।

मुसलमान स्वयं उनकी भाषा सीख कर उनके दफतरों में काम करने को तैयार नहीं थे और किसी अन्य रूप में उन्होंने उनको पनपने नहीं दिया। अदालती कारोबार जो पहले उनके हाथ में था उसे बदल कर उस पर उनके एकाधिकार को खत्म कर दिया। इससे मुसलमानों के मन में कंपनी राज के प्रति प्रबल घृणा थी, यह वे जानते थे क्योंकि इसकी परिस्थितियां उन्होंने पैदा की थीं। परन्तुे उन्हों्ने अपने से घृणा करने वालों को अपना पालतू कैसे बना लिया और उनकी घृणा को हिन्दुओं की ओर मोड़ने में सफलता पाई इसके लिए हम उनकी कूटनीतिक दक्षता को दाद दिए बिना नहीं रह सकते।

इस विषय में किसी ने एक काल्पोनिक कथा स्ताहलिन के नाम से गढ़ कर फेसबुक पर पोस्ट की थी कि एक बार वह एक मीटिंग में एक मुर्गे को टांगों से पकड़े हुए ले आया, सबके सामने उसके पंखों को बहुत निर्ममता से नोच कर फर्श पर फेंक दिया और फिर जब वह असहाय सा रेंगने लगा तो उसे चारा चुगाया और फिर दिखाया की पूरी तरह अशक्त हो जाने के बाद जीने के दूसरे सहारे छिन जाने या छिनते जाने की संभावना पैदा करने बाद वही व्यक्ति या समुदाय सभी दृष्टियों से अपनी यह दुर्गति करने वाले की कृपा पर जीवित रह जाने के बाद वह उसका इतना आज्ञाकारी बन जाता है कि उसके किसी आदेश की अवहेलना नहीं करता। इसको अंग्रेजों ने मुसलमानों पर घोषित रूप में लागू किया था इसे समझने के लिए हम हंटर की उस पुस्तक के कुछ अंश का हवाला देंगे जिसका जिक्र पहले भी कर आए हैं:

Many such families. I have personally known several. Their ruined mansions swarm with grown-up sons and daughters, with grandchildren and nephews and nieces, and not one of the hungry crowd has a chance of doing anything for himself in life* They drag on a listless existence in patched-up verandahs or leaky outhouses, sinking deeper and deeper into a hopeless abyss of hell, till the neighbouring Hindu money-lender fixes a quarrel on them, and then in a moment a host of mortgages foreclose, and the ancient Musalman family is suddenly swallowed up and disappears for ever…

If ever a people stood in need of a career, it is the Musalman aristocracy of Lower Bengal. Their old sources, of wealth have run dry. They can no longer sack the stronghold of a neighbouring Hindu nobleman; send out a score of troopers to pillage the peasantry; levy tolls upon travelling merchants ; purchase exemption through a friend at Court from their land-tax; raise a revenue by local cesses on manages, births, harvest-homes, and every other incident of rural life; collect the excise on their
own behoof, with further gratifications for winking at the sale of forbidden liquors during the sacred month of Ramazan. The administration of the Imperial Taxes was the first great source of income in Bengal, and the Musalman aristocracy monopolized it….

The Police was another great source of income, and the Police was officered by Muhammadans. The Courts of Law were a third great source of income, and the Musalmans monopolized them. Above all, there was the army, an army not officered by gentlemen who make little more than bank interest on the price of their commissions, but a great confederation of conquerors who enrolled their peasantry into troops, and drew pay from the State for them as soldiers. A hundred and seventy years ago it was almost impossible for a well-bom Musalman in Bengal to become poor; at present it is almost impossible for him to continue rich…

The Muhammadan aristocracy, in short, were conquerors, and claimed as such the monopoly of Government. Occasionally a Hindu financier, and more seldom a Hindu general, came to the surface; but the conspicuousness of such instances is the best proof of their rarity. Three distinct streams of wealth ran perennially into the coffers of a noble Musalman House- Military Command, the Collection of the Revenue, and Judicial or Political Employ, These were its legitimate sources of greatness, and besides them were Court Services, and a hundred nameless avenues to fortune. The latter I have indicated at the beginning of the last paragraph, and of them I shall not further speak ; but, confining myself to the three fair and ostensible monopolies of official life, I shall examine what remains of them to the Musalman families of Lower Bengal under British Rule….

The first of them, the Army, is now completely closed. No Muhammadan gentleman of birth can enter our Regiments ; and even if a place could be found for him in our military system, that place would no longer be a source of wealth. Personally, I believe that, sooner or later, the native aristocracy of India must, under certain restrictions, be admitted as Commissioned Officers in the
British Army. The supreme command of any regiment must always be vested in an Englishman. Indeed, great care would be required before the experiment can be entered upon at all ; but the warlike peoples of Northern India could turn out under their own hereditary leaders, a light cavalry second to none in the world. Such employment would be eagerly sought after. No commissioned officer now-a-days expects to make a fortune by serving the Queen, and the Muhammadans are perfectly aware of this. But they covet the honours and decent emoluments of a military career, and bitterly feel that their hereditary occupation is gone…

… we usurped the functions of those higher Musalman officers who had formerly subsisted between the actual Collector and the Government, and whose dragoons were the recognised machinery for enforcing the Land-Tax. Instead of the Musalman Revenue- farmers with their troopers and spearmen, we placed an English Collector in each District, with an unarmed fiscal police attached like common bailiffs to his Court. The Muhammadan nobility either lost their former connection with the Land-Tax, or became mere landholders, with an inelastic title to a part of the profits of the soil….

It was in another respect that it most seriously damaged the position of the great Muhammadan Houses. For the whole tendency of the Settlement was to acknowledge as the landholders the subordinate Hindu officers who dealt directly with the husbandmen….

We can prove from the records of every District, that Revenue was the sole object of the Musalman Government. * Almost all the functions of Administration were heaped upon the Collectors of the Land-Tax, and they might do pretty much as they pleased so long as they discharged their revenue. The people were oppressed in order that the landholder might have his rent, and were plundered in order that the landholder’s servants might become rich. Complaint against wrong was useless….

The truth is, that under the Muhammadans, government was an engine for enriching the few, not for protecting the many….

With regard, therefore, to the first two great sources of Muhammadan wealth, viz. the Army and the higher administration of the Revenues, we had good reasons for what we did, but our action has brought ruin upon Muhammadan Houses of Bengal. We shut the Musalman aristocracy out of the Army, because we believed that their exclusion was necessary to our own safety. We deprived them of their monopoly of the most lucrative functions in the administration, because their deprivation was essential to the welfare and just government of the people….

During its second half century of power the tide turned, at first slowly, but with a constantly accelerating pace, as the imperative duty of conducting public business in the vernacular of the people, and not in the foreign patois of its former Muhammadan conquerors, became recognised. Then the Hindus poured into, and have since completely filled, every grade of official life. Even in the District Collectorates of Lower Bengal, where it is still possible to give appointments in the old-fashioned friendly way, there are very few young Musalman officials. The Muhammadans who yet remain in them are white-bearded men, and they have no successors. The staff of Clerks attached to the various offices, the responsible posts in the Courts, and even the higher offices in the Police, are recruited from the pushing Hindu youth of the Government School….

यह वह भौतिक और प्रशासनिक पर्यावरण है जिसमें सर सैयद अहमद अपनी प्रतिभा, प्रभुत्व के साथ अपनी जमात के लिए फिररंगी शरणं गच्छाम: की सूझ और समग्र समर्पणभाव के साथ भारतीय मंच पर उपस्थित होते हैं।

Post – 2017-01-25

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास -22
औरंगजेब वह अन्तिम शासक है जो मन्दिरों को तोड़ने, अपवित्र करने और हिन्दुओं के दमन के लिए जाना जाता है। परन्तु अपने अंन्तिम दिनों में ऐसा लगता है कि उसे अपनी नीति से मोहभंग सा हो चला था। अपना अंतकाल निकट आने पर उसने अपने दो पुत्रों को जो पत्र लिखा था उससे इसका कुछ आभास होता है। जोनाथन स्काट जो वारेन हेस्टिंग्स का फारसी विशेषज्ञ था औरंगजेब ने निजी जिन्दगी के बहुत सारे वाकये दर्ज किए थे! उनका अनुवाद उसने किया पर कहते हैं इरादत खां के कागजों में नहीं मिलते! स्थिति जो भी हो इनमें कोई राजनीतिक चाल नहीं दिखाई देती इसलिए इन पर भरोसा किया जा सकता है। इसकी कुछ पंक्तियों पर हम नजर डाल सकते हैं।

अजीम शाह को लिखे अपने पत्र में वह लिखता हैः
The instant which passed in power, hath Left only sorrow behind it. I have not been the guardian and protector of the empire. My valuable time has been passed vainly …. My son (Kaum Buksh),though gone towards Beejapore, is still near; and thou, my son, are yet nearer. …The .camp and followers, helpless and alarmed, are like myself, full of affliction, restless as the quicksilver. Separated from their lord, they know not if they have a master or not. I brought nothing into this world, and, except the infirmities of man, carry nothing out. I have a dread for my salvation, and with what torments I may be punished. Though I have strong reliance on the mercies and bounty of God, yet, regarding my actions, fear will not quit me …. Though Providence Will protect the camp, yet, regarding appearances, the endeavours of my sons
are indispensably incumbent.”

काैम बख्‍श को लिखे पत्र में :
“My son, nearest to my heart. Though in the height of my power, and by God’s permission, I gave you advice, and took with you the greatest pains, yet, as it was not the divine will, you did not attend with the ears of compliance. Now I depart a stranger, and lament my own insignificance, what do’s it profit me? … My fears for the camp and followers are great; but alas! I know not myself. My back is bent with weakness, and my feet have lost the power of motion …. I have committed numerous crimes, and know not with what punishments I may be seized …. When I was alive no care was taken; and now I am gone, the consequence may be guessed. The guardianship of a people is the trust by God committed to my’ sons …The domestics and courtiers, however deceitful, yet must not be ill-treated…. The complaints of the unpaid troops are as before. Dara Shekoh, though of much judgment and good understanding, settled large pensions on his people, but paid them ill, and they were ever discontented. I am going. Whatever good or evil I have done, it was for you.”

यह दूसरी बात है कि उसके तीसरे बेटे बहादुरशाह ने इन दोनों बेटों को पराजित करके तख्‍त पर कब्‍जा कर लिया और बूढ़ा होने के कारण 1712 में, औरंगजेब की मौत से पांच साल बाद भी चल बसा और उसके बार राजनीतिक घटनाचक्र तेजी से बदलने लगा। इनका ब्‍यौंरा देना जरूरी नहीं है।

सल्तनत की ताकत में गिरावट के साथ मुस्लिम समुदाय में सांस्कृतिक अस्मिता की चिन्ता प्रखर हुई और इसका इस्तेमाल कंपनी शासन ने बहुत दक्षता से किया क्योंकि उसे पता था कि अब उसकी सत्ता को ऐसी चुनौती देने वाला कोई नहीं, इसलिए अब वे मुसलमानों को हिन्दुओं से टकराव की स्थिति में रख कर ही सुरक्षित रह सकते हैं। उनकी गूढ़ योजनाओं, उनको अमल में लाने के तरीके जानकारी हमारे जैसे सतही जानकारी रखने वाले को नहीं हो सकती, परन्तु उनकी पहली जरूरत थी मुसलमानों को अपना विश्‍वसपात्र बनाना क्योंकि संख्याबल को देखते हुए अब उनको अधिक खतरा हिन्दुओं से था जो उनके सेवक और सहायक बनने के लिए तैयार थे और इसके लिए अपेक्षित योग्यताएं अर्जित करने के लिए प्रयत्नशील थे।

इंश्‍ाा अल्ला खां अपनी रानी केतकी की कहानी के लिए खड़ी बोली हिन्दी और उर्दू के पहले कहानीकार माने जाते हैं । वह दिल्ली के दुखद अनुभवों के बाद लखनऊ पहुंचे थे और अपने अन्तिम दिन पस्ती और निराशा में काटेते हुए 1817 में स्‍वर्गवासी हुए थे।

अपने व्याकरण की पुस्तक दरियाए लताफत में दो विभेदकारी टिप्पणियां करते हैं। सलीके की उर्दू के लिए वह हिन्दुओं के द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले शब्दों को आधिकारिक नहीं मानते हैं और इसका कारण बताते हुए यह कहते हैं कि हमने उनकों बोलने का अन्दाज सिखाया, खाने-पहनने का शऊर सिखाया, फिर हम उनके द्वारा प्रयुक्‍त शब्दों को साधु प्रयोग कैसे कह सकते हैं!

मैंने दरियाये लताफत देखी नहीं, अब्दुल हक़ साहब जो उर्दू के पितामह, बाबा-ए-उर्दू माने जाते हैं, उन्होंने उनके विचारों का समर्थन किया इसलिए हम उस पर कुछ कहने के अधिकारी नहीं। हमारी जानकारी फैसलावबाद विवि के भाषाविज्ञान के प्रो तारिक अ

यहां मैं यह नहीं कह रहा हूं कि इंषा अल्ला खान का कथन गलत था। नियम पुराना है जैसा राजा वैसी प्रजा, या यत् यत् आचरति श्रेष्ठः तदेव इतरे जनाः। मनुष्य की स्वाभाविक आकांक्षा है अपने से ऊपर उठने की, ऊंची हैसियत पाने की और इसलिए वह अपने समय के समृद्ध और प्रतिष्ठित जनों की नकल करता है और इसका दबाव ही था कि परंपरावादी ब्राह्मण तक मिरजई पहनने लगे थे, पगड़ी या साफा बांधने लगे थे, महिलाएं सलूका पहनने लगी थीं। कुर्ता, कमीज, शमीज ही नहीं बहुत कुछ हिन्दुओं ने मुसलमानों से लिया था। इसे हिन्दुओं ने मुसलमानों से लिया था कहने से अधिक सही होगा कि छोटी हैसियत के लोगों ने अपने समय की ऊंची हैसियत के लोगों से लिया था।

हम यहां इसकी गुणवत्ता में नहीं जाएंगे, न यह दावा करेंगे कि यह कथन गलत था जैसे आज भी वकीलों और बैरिस्टरों को गर्मी और बरसात में भी टाई लगाए, चोंगा पहने देख कर यह नहीं कह सकते कि वे नक्काल है, न न्याय दे सकते हैं न न्याय कर सकते हैं, क्योंकि उनमें इतनी भी अक्ल नहीं कि वे यह तय कर सकें कि उन्हें कब क्या पहनना चाहिए। ये स्वतन्त्र भारत पर गुलामी को थोपते रहने वाले सड़ंे दिमाग के पुरातनपंथी हैं और इसलिए न्याय को सर्वजन सुलभ, सर्वजनग्राह्य भाषा में किया जाना चाहिए इसका विरोध करने के भी तरीके निकाल लेते हैं। सामान्य जनों की तो बात ही अलग है। गो सुविधाकांक्षी सबसे अधिक बिकाऊ और सुविधाजीवी सबसे अधिक बिका हुआ प्राणी होता है।

अपने व्याकरण की पुस्तक दरियाए लताफत में उन्‍होने दो बहुत निर्णायक टिप्पणियां की हैं। सलीके की उर्दू के लिए वह हिन्दुओं के द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले शब्दों को आधिकारिक नहीं मानते हैं और इसका कारण बताते हुए यह कहते हैं कि हमने उनकों बोलने का तरीका सिखाया, खाने-पहनने का शऊर सिखाया, फिर हम उनके शब्दों को साधु प्रयोग कैसे कर सकते हैं!

मैंने दरियाये लताफत देखी नहीं, अब्दुल हक़ साहब जो उर्दू के पितामह, बाबा-ए-उर्दू माने जाते हैं, उन्होंने उनके विचारों का समर्थन किया इसलिए हम उस पर कुछ कहने के अधिकारी नहीं। मेरी अपनी जानकारी तारिक रहमान पर आधारित है जाे जाफरावाद में भाषाविज्ञान के प्रोफेसर हैं।

यहां मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि इंशा अल्ला खान का कथन गलत था। नियम पुराना है जैसा राजा वैसी प्रजा, या यत् यत् आचरति श्रेष्ठः तदेव इतरे जनाः।
मनुष्य की स्वाभाविक आकांक्षा है अपने से ऊपर उठने की, ऊंची हैसियत पाने की और इसलिए वह अपने समय के समृद्ध और प्रतिष्ठित जनों की नकल करता है और इसका दबाव ही था कि परंपरावादी ब्राह्मण तक मिरजई पहनने लगे थे, पगड़ी या साफा बांधने लगे थे, महिलाएं सलूका पहनने लगी थीं। कुर्ता, कमीज, शमीज ही नहीं बहुत कुछ हिन्दुओं ने मुसलमानों से लिया था। इसे हिन्दुओं ने मुसलमानों से लिया था कहने से अधिक सही होगा कि कहें छोटी हैसियत के लोगों ने अपने समय की ऊंची हैसियत के लोगों से लिया था।

हम यहां इसकी गुणवत्ता में नहीं जाएंगे, न यह दावा करेंगे कि यह कथन गलत था जैसे आज भी वकीलों और बैरिस्टरों को गर्मी और बरसात में भी टाई लगाए, चोंगा पहने देख कर यह नहीं कह सकते कि वे नक्काल है, न न्याय दे सकते हैं न न्याय कर सकते हैं, क्योंकि उनमें इतनी भी अक्ल नहीं कि वे यह तय कर सकें कि उन्हें कब क्या पहनना चाहिए। रुतबे के लिए आदमी नरक वास भी कर सकता है।
हमारा सबसे सीघा सवाल है कि इस तरह के प्रश्‍न या इस तरह की दर्पोक्ति उस पूरे दौर में किसी ने क्यों नहीं की जब सचमुच उनका अनुकरण किया जा रहा था और इस खास मोड़ पर जब गौरव चुक रहा था, इसका तीखा बोध इंशा अल्ला खां को स्‍वयं था, उन्होंने प्रसंग से हट कर अवांछित उदाहरण देते हुए इसका दावा क्यों किया। यह एक बहुत निर्णायक मोड़ है। मरता क्या न करता वाली स्थिति का आर्तनाद जो अहंकार बन कर प्रकट होता है ठीक उस अवसर पर जब अहंकार या आत्माभिमान का आधार समाप्त हो चुका है।

मुझे ऐसा लगता है कि इससे पहले अभिजात मुस्लिम समाज में भारतीय समाज से जुड़ने की आकांक्षा प्रबल थी क्योंकि वे समझते थे यह देश तो अपना है, या इस पर अधिकार करना है, इसे अपना बनाना है परन्‍तु इस बिन्दु पर यह बोध पैदा होता है कि अपना तो सब कुछ लुट रहा है! इसे इस्लाम से जोडना ठीक न होगा, परन्तु इसे विदेशी मूल पर गर्व करने वाले और अपने पारिवारिक दायरे में फारसी मिश्रित भाषा बोलने वाले तब भी अपने को दूसरों से अलग समझने या अपनी पहचान बनाए रखने के लिए चिन्तित रहे होंग। कारण अपने उसी लेख में इंशा अल्ला खां ने उर्दू का आदर्श बताते हुए केवल दिल्ली और लखनऊ के अमीर घरानों की भाषा को अनुकरणीय माना था और इसके बाद के उर्दू कवि उस आदर्श भाषा में लिखने और सोचने और अपने को विशेष और समाज से अलग समझने के लिए प्रयत्नशी ल होते हैं। यहां से एक आत्मग्लानि, आत्मदर्प, आत्मरक्षा की चिन्ता का मिला जुला मनोवैज्ञानिक पर्यावरण तैयार होता है जिसका उपयोग कंपनी के कूटविदों ने अपने ढंग से और खासी सफलता से किया।

यह मेरी मोटी समझ है, जिसमें मैं समझता हूं, उन्‍हेंं एक नई जमीन मिली जिसमें नए गुल खिलाए जा सकते थे जो आगे चल कर नफरत या घृणा का रूप ही क्यों न ले लें ।

Post – 2017-01-24

हिन्‍दुत्‍व के प्रति घृणा का इतिहास -21

”मध्‍यकाल हिन्‍दू समाज के लिए अपमान, यातना और उत्‍पीड़न का काल था, इसके असंख्‍य उदाहरण दिए जा सकते हैं। सबसे अधिक दुर्दशा किसानों की थी जिनसे वसूली में कई तरह की निर्ममता बरती जाती थी। अकाल पड़ने पर पहले हिन्‍दू राजाओं की ओर से जो राहत दी जाती थी उसका तो प्रश्‍न ही नहीं था, उल्‍टे इस काल में भी लगान की वसूली की जाती थी। यदि किसान विद्रोह कर बैठते या खेती करने से इन्‍कार कर देते तो भी उन पर अत्‍याचार होता ओर खेती करने को विवश किया जाता । किसानों की दशा गुलामों जैसी हो चली थीा शासन केवल आतंक पर कायम था इसलिए कुछ मामलों में दंड इतने कठोर होते कि उनकी कहानियां सुन कर ही किसी का सर उठाने का साहस न ह । इनका उल्‍लेख करने का तो किसी कवि को साहस नहीं हुआ । कुछ सिक्‍ख गुरुओं के साथ जिस तरह की निर्ममता बरती गई उनको उन्‍होंने अपने इतिहास में अविस्‍मरणीय बना कर रखा ।

” इन यातनाओं का एक पक्ष यह भी था कि लगान वसूल करने वाले स्‍थानीय कारिंदों में अधिकांश हिन्‍दू थे और उनकी संख्‍या कम नहीं थी। जितना दिल्‍ली सरकार की पावती थी उससे ऊपर अपने लिए वे उगाही करते थे। हजारी, पांचहजारी आदि अमले स्‍थानीय जनों पर किसी तरह का अत्‍याचार करें, कोई पूछने वाला न था।

”संयोगवश तुलसी ने इस प्रणाली से उत्‍पन्‍न वेदना को भी अकाल के समान पीड़क मानते हुए उसे साथ ही दर्ज किया – दुसह दुराज दुकाल दुख । या नृप या कर उगाही करने वाले स्‍थानीय राजाओं और महामहिपाल के दुहरे शासन के रूप में।

”उन उत्‍पीड़नों के किसी भी तकाजे से राहत के रूप में प्रस्‍तुत करना या यह कहना कि मध्‍यकाल में हिन्‍दुओं को कोई दुख था ही नहीं, उत्‍पीडि़तों के प्रति क्रूरता है। उत्‍पीडि़त जनों का आर्तभाव से भगवान से रक्षा के लिए दबे सुर में घिघियाना, या अपने करम को कोसना या कलिकाल का प्रभाव बता कर राहत पाने का प्रयत्‍न करना, मध्‍यकालीन ‘कहां जार्इं का करीं’ की व्‍यग्रता को प्रकट करता है जिससे भक्ति आन्‍दोलन का जन्‍म होता है यह गलत नहीं लगता। ऐसी व्‍याख्‍या करने वालों को हमने अपने राष्‍ट्रीय एकजुटता के अभियान के कारण दरकिनार किया पर मार्क्‍सवादी सोच में इनको संप्रदायवादी करार देकर उनका अपमान करना निष्‍ठुरता की पराकाष्‍ठा थी।

”मध्‍यकालीन पीड़ा़ की अवहैलना करना गलत है। हिन्‍दुओं के मन में अंग्रेजी राज से राहत अनुभव हुई यह सही है। यह राहत हिन्‍दू मध्‍यवर्ग को, जो तकनीकी अर्थ में तब तक अस्तित्‍व में ही न था, इसलिए इसे मझोला तबका कह सकते हैं, अधिक अनुभव हुई क्‍योंकि किसान और छोटे भूस्‍वामी इसी कोटि में अाते थे। हस्‍तशिल्‍प से जुड़े समाज की, उनकी भी जिनको इस्‍लाम कबूल करने की विवशता न पैदा हुई थी, मध्‍यकाल में वह दुर्दशा नहीं झेलनी पड़ी थी जो कंपनी राज के साथ झेलनी पड़ी और वे कुशल कामगारों से खेतिहर मजदूरों में बदल गए ।

”इसलिए यह एक ऐसी जटिल समस्‍या थी जिसका बहुत बारीकी ओर ईमानदारी से अध्‍ययन किया जाना चाहिए था, जो उस राष्‍ट्रीय एकजुटता की कोशिशों के कारण और बाद में वामपंथी सोच के कारण उपेक्षित रह गया और इतिहास की व्‍याख्‍या का स्‍थान राजनीतिक नारेबाजियों ने ले लिया।

”परन्‍तु इन दोनों आंदालनों में एक समझ साफ थी कि हम अतीत के जहर से वर्तमान को निर्विष नहीं बना सकते और सदभाववादियों का यह सोचना कि यदि हम उस इतिहास को भुला दें तो उसके वे प्रभाव भी नष्‍ट हो जाएंगे जो हमारी चेतना के अंग बन चुके है, गलत था।

”हम इस पर आगे चल कर विचार करेंगे। अभी तो इतना ही कि इन कटु अनुभवों और स्‍मृतियों के बाद भी मध्‍यकाल में वह सामुदायिक घृणा नहीं थी, जो उन्‍नीसवीं शताब्‍दी में पैदा हुई।”

”अजीब घोंचू हो यार। इतनी त्रासदियां, इतनी यातनाएं और इतने तरह के उत्‍पीड़न गिना दिए, अभी तो तुमने जजिया को लिया ही नहीं और फिर भी कहते हो मध्‍यकाल में सांप्रदायिक घृणा नहीं थी ।”

मध्‍यकालीन पीड़ा के तर्क थे, कारण थे, अत्‍याचार को सही मानने का एक बहाना था, वह ग्रन्थि जो किसी निरपराध के प्रति अत्‍याचार या अन्‍याय के कारण अपनी नैतिक चेतना द्वारा अपने को अपराधी ठहराने के बाद उसे चेतना से ओझल करने के लिए उस व्‍यक्ति, समुदाय या वस्‍तु, क्रिया के प्रति अन्‍धप्रतिक्रिया को पैदा करती है, जिस पर हमारा नियन्‍त्रण नहीं रह जाता और‍ जिसे हम घृणा के रूप में व्‍यक्‍त करते हैं वह मध्‍यकाल के उन तत्‍वों में भी नदारद थी जिनको हम विदेशी मूल का या अपनी विदेशी पहचान पर गर्व करने वाला मानते हैं। वे यदि अत्‍याचार करते थे, तो इसकी उनके मन में ग्‍लानि न होती थी, इस पर गर्व करते थे, इसलिए यह ग्रन्थि का रूप नहीं ले पाती थी।

किन्‍हीं परिस्थितियों में धर्मान्‍तरित हिन्‍दू विरल अपवादों को छोड़ कर जिनमें वे अपने व्‍यक्तिगत लाभ के लिए अपने को सच्‍चा मुसलमान सिद्ध करने के लिए किसी सीमा तक जा सकते थे, उनको छोड़ कर, किसी में यह घृणा का रूप नहीं ले सकती थी और यह कहने की आवश्‍यकता नहीं कि घृणा का रूप ले लेने के बाद अनर्थ की कोई सीमा नहीं रह जाती।”

”तुम्‍हारी बातें समझ में नहीं आतींं यार। जहां तक मैं समझ पाया हूं, तुम धर्मान्‍तरित हिन्‍दुओं में से अभिजात और महत्‍वाकांक्षी हिन्‍दुओं को ही हिन्‍दुओं से घृणा करने वाला मान रहे हो और आक्रमणकारियों को, उनकी औलादों को अभियोग से बरी कर दे रहे हो।”

”इसलिए कि उनके मन में कोई ग्‍लानि न थी, धार्मिक आवेश था जिसमें वे अपने जघन्‍यतम अत्‍याचार पर उसकी जघन्‍यता के अनुपात में ही गर्व भी अनुभव करते थे। इसे समझने के लिए धैर्य और आत्‍मसंयम की, विवेक की आवश्‍यकता है।

पहली बात तो यह कि मैं जो कुछ कहता हूं उसे सही माना जाय यह गलत है, किसी अन्य कारण से गलत माना जाय यह उससे भी अधिक गलत है, इसके बाद ही यह निवेदन करना चाहता हूं कि अत्याचार, दमन, उपेक्षा, तिरस्कार और घृणा में फर्क किया जाना चाहिए।

दूसरी भौतिक कारणों से उत्पन्‍न मनोवृत्तियां या विकृतियां हैं और घृणा अपने कमीनेपन केे बोध के ग्रंथि में बदल जाने की वह प्रक्रिया है जिससे घृणा करने वाला भी अवगत नहीं रहता और वह उन्हीं कृत्यों की पुनरावृत्ति करता जाता है जिनके कारण उसके मन में अपने प्रति घृणा पैदा हुई और इसके दाह से अपने को बचाने के लिए उसने इसे उन पर स्थानान्तरित कर दिया जिनके प्रति उसने स्‍वयं अन्याय किया था।

मात्र इस सीमा में मैं कहना चाहता था कि मध्यकाल में धर्मान्तिरित अभिजात हिन्दु्ओं में से अपने निजी उत्थान के लिए लालायित हिन्दुओं ने हिन्दुओं से भले घृणा की, मुसलमानों में धर्मान्तरित हिन्दुओं ने अपनी विवशता में जो हिन्दू समाज में लौटने के दरवाजे बन्द हो जाने के कारण द्विगुणित हो जाती थी, हिन्दू मूल्यों मानों, सांस्कृतिक प्रतीकों को यथासंभव अपनी चेतना और जीवन में स्थान दिया, अत: हिन्दुओं से उनका अपनेपन का नाता था। अधिक बड़ी संख्या ऐसे मुसलमानों की ही थी इसलिए यह कह सकते हैं कि उस समय की परिस्थितियों में दोनों धर्मों के सबंध धर्म से अधिक हैसियत और आकांक्षा और महत्वा कांक्षा से निर्धारित थे और उसमें विदेशी मूल का दावा करने वालों के भी हिन्दुओं के साथ जटिल और बहुरूप रिश्ते थे, जिनमें दमन और धौंस भी सम्मिलित थी, परन्तु घृणा नहीं । इसलिए हमें इस समस्या को कुछ धैर्य से, अनुत्तेजित रह कर समझना होगा। यह काम आज तो नहीं, कल किया जा सकता है।