Post – 2019-04-28

धर्मदृष्टि और धर्मांधता

अर्थ का अर्थ होता है, आहार। विकासक्रम में इसका विस्तार उपभोग की वस्तुओं तक हो जाता है। अर्थव्यवस्था पर किसका अधिकार होता है, वह दुनिया को अपने इशारे पर चलाता है।

दुनिया का कोई कारोबार ऐसा नहीं जो अर्थतंत्र से प्रेरित या प्रभावित न हो। कोष पूर्वा समारंभाः। धर्म चेतना भी इससे मुक्त नहीं रह सकती।

धर्म के विषय में आज हमारा दृष्टिकोण अधिक उलझा हुआ है। इसे एक ऐसी बुराई के रूप में देखा जाता है जिससे मुक्त होकर ही मानवता शांति और सद्भाव से रह सकती है, जबकि धर्म की आवश्यकता इसलिए हुई कि मनुष्य के स्वभाव को अधिक मानवीय बनाया जा सके।

मनुष्य के आचरण को विशेष योजना के अनुसार चलाने के लिए भय और लाभ, दंड और पुरस्कार की जरूरत होती है। इसीलिए ईश्वर, स्वर्ग नरक आदि की कल्पना की गई।

मनुष्य का स्वभाव अपने प्राकृतिक परिवेश से, अर्थात् उसमें उपलब्ध जीवन निर्वाह के साधनों से प्रभावित होता है। उदार प्राकृतिक परिवेश में, आहार के मामले में निश्चिंत मनुष्य ही अहिंसा की बात सोच सकता था। खुशहाली आने के साथ अपनी क्रूरता के लिए कुख्यात पश्चिम भी जानवरोे के प्रति क्रूरता के विषय में संवेदनशील हो उठा है।

जहां उत्पादन संभव था वहीं पर उत्पादन के लिए धैर्य, श्रम, अध्यवसाय जैसे गुणों का विकास हो सकता था। यदि हम कहें कि इन गुणों का विकास कृषिकर्म के आरंभ के साथ हुआ तो गलत नहीं होगा।

आदिम अवस्था में जब औजारों का विकास नहीं हुआ था या वे कामचलाऊ किस्म के थे, बीज बोने के लिए जमीन को खरोचने, सिंचाई के लिए पानी जुटाने मैं कितना श्रम लगता था इसका अनुमान हम नहीं कर सकते। दूसरे जानवरों और जंगली जत्थों से खेती को बचाने के लिए जितनी जागरूकता, जितना साहस और आपसी सहयोग जरूरी था, इसका भी सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

बीज बोने से लेकर फसल तैयार होने तक लगातार कितने धैर्य से देखभाल करनी होती थी, इसका कुछ अनुमान अवश्य कर सकते हैं। आरंभ में उत्पाद बहुत अधिक नहीं हो सकता था। बीच में अभाव के दिनों में भी अगली फसल के लिए बचा कर रखे हुए बीजों को हाथ न लगाना, संयम और लोभ पर नियंत्रण के बिना संभव नहीं था।

इन मानवीय मूल्यों का विकास ऐसे समुदायों में नहीं हो सकता था, जिन्होंने किसी भी कारण कृषि से बचना चाहा और जो कुछ मिला पेट भरकर मौजमस्ती में समय विताते रहे, यद्यपि कलाओं के विकास में उनका योगदान नकारा नहीं जा सकता।

इन मानवीय मूल्यों का विकास ऐसे समुदायों में नहीं हो सकता था, जो ऐसे प्राकृतिक परिवेश में रहते थे जिसमें कृषि उत्पादन संभव ही नहीं था। वहां ऐसे किसी तरीके को अनुचित नहीं माना जा सकता था जिसका सहारा लिए बिना जीवन निर्वाह संभव ही नहीं था। जीववध, धोखाधड़ी, दुस्साहस, लूटपाट आदि की प्रवृत्तियों का विकास जो कृषिजीवी समाज में दुर्गुण मानी जाती हैं, उनके लिए जरूरी था।

हमें अपने नियंत्रण में रखने वालों ने, हमारे भीतर आत्म निषेध की भावना को महिमामंडित कर के दासमूल्यों का इतना आदी बना दिया कि हम अपने अतीत के सच को स्वीकार करते हुए भी घबराते हैं कि कहीं इसे आत्मरति का प्रमाण न मान लिया जाए।

कल्पना कीजिए, एक ओर तो पूरा यूरोप है, जिसके उस भाग को छोड़कर जो लघु एशिया में वर्चस्व स्थापित करने वाले भारतीय भाषाभाषियों के संपर्क में आए, शेष भाग ईसा के बाद की शताब्दियों में भी बर्बरता की अवस्था में था.। उसमें न तो किसी में मानक भाषा का विकास हुआ था, न साहित्य का। जिस छोटे से भाग में जागरूकता आई थी उसकी भाषा दर्शन, साहित्य, ज्ञान-विज्ञान सभी पर भारतीय छाप मुहर की तरह दिखाई देती है। इन्हीं में से एक रोम के साम्राज्य विस्तार से यूरोप के दूसरे भागों में में सुगबुगाहट पैदा हुई। इसके बाद भी पिछले कुछ सौ सालों की अग्रता के बल पर पश्चिमी विद्वान अपनी सांस्कृतिक पराजय को छिपाने के लिए इतिहास को उलटते हुए यह सिद्ध करने के लिए धूर्ततापूर्ण कुतर्क गढ़ते हुए दावा करते रहे कि भाषा, संस्कृति, दर्शन, देव शास्त्र सब कुछ पश्चिम से भारत को पहुंचा है। मजा यह कि साक्ष्यों के दबाव में उन्हें यह भी स्वीकार करना पड़ रहा था की वैदिक भाषा अन्य भाषाओं की तुलना में अधिक प्राचीन है, देव शास्त्र और पुराण कथा के मूल रूप भारत में पाए जाते हैं पश्चिम की दिशा में बढ़ते हुए उनमें इतनी विकृति आ जाती है कि वे अपने मूल रूप के मखौल बनकर रह जाते हैं।

इस प्रकट अंतर्विरोध के बावजूद हमारे विश्व-विख्यात विद्वान विश्व-विख्यात इसलिए हुए उन्होंने अपने दिमाग से काम ही न लिया सिर्फ मालिक की बात मानते रहे और मिल्कियत हासिल करते रहे।

अच्छे गुलाम बेअदबी नहीं करते, जबान नहीं लड़ाते, बढ़ बढ़ कर नहीं बोलते। हमांरे विद्वानों ने मोल आंकने वालों को निराश नहीं किया। उन्हीं के द्वारा तैयार किए गए अकादमिक मानकों पर सही उतरने का प्रयत्न करते हुए न वे अपने इतिहास का सामना कर सके, न वर्तमान। वे आज भी स्वतंत्र होकर सोचने की जगह पश्चिमी अकैडमी दबाव में अपनी मान्यताओं को अनुकूलित करने का निरंतर प्रयत्न करते जा रहे हैं।

हमें अपने अध्ययन और चिंतन के क्रम लगातार इस बात का ध्यान रखना होगा, कि सभ्यता में आवयविकता या अंगांगीभाव होता है, गेस्टाल्ट होता है। एक प्रक्रिया से होकर उस तक पहुंचना होता है। समृद्धि इसका आधार होती है।

ये सारी शर्तें भारत पूरा करता था, तीन फसलें साल में भारत के सिंधु गंगा के उर्वर भूभाग में उगाई जाती थी, तथाकथित उर्वर चंद्रलेखा में नहीं। कृषि क्रांति के आरंभ के साथ दो मूल्य प्राणियों का रक्तरंजित संघर्ष जिसे हम देवासुर के नाम से जानते हैं, भारतीय पुराण कथाओं का हिस्सा है। पश्चिमी जगत की पुराण कथाओं के अनुसार हुई ईडन गार्डेन या आनंद उद्यान कहीं पूरब में था। समुद्र यात्रियों ने इसे लंका में ‘पहचान’ भी लिया। अरब की कथाओं में हिंदुस्तान जन्नतनिशां के रूप में याद किया जाता रहा। कृषि क्रांति के साथ जैसा हमने ऊपर बताया पैदा होने वाली मूल्य प्रणाली भारत में मान्य है। यह है वह सांस्कृतिक आवयविकता जिससे सभ्यता के जन्म, प्रसार, विस्तार, संपर्क सूत्र और आज तक के इतिहास को समझा जा सकता है।

भूखा आदमी धर्म का पालन नहीं कर सकता। भौतिक निर्वाह में अक्षम व्यक्ति बौद्धिक और आध्यात्मिक उत्थान नहीं कर सकता। यह चेतना भारतीय मनीषा में शास्त्रों से लेकर जन विश्वास तक में फैली है। मनुष्य को मनोवैज्ञानिक तरीकों से सभ्य बनाए रखने के लिए, आचरण को मर्यादित करने के लिए जिस धर्मदृष्टि का जन्म भारत में हुआ उसका उसका चरित्र पश्चिम में पहुंचने के बाद क्यों इतना हो गया कि उसने धर्मांधता का रूप ले लिया इसे समझने के लिए उसकी अर्थ व्यवस्था को समझना होगा।

Post – 2019-04-27

आदमी वह भी खूब था साहब
कहता था मैं भी आदमी ही हूं।।

Post – 2019-04-27

हंसो, ठठा के हंसो
आसमान फट जाए
अपनी धरती का जो होगा
वह देखा जाएगा।।

Post – 2019-04-26

जो पी थी कभी वह तो खिजां में उतर गई
यह मौसमे बहार की रंगत का नशा है।

Post – 2019-04-26

संपादन के क्रम में

ईसा के जन्म से 900 साल पहले वेटिकन से मिली लिंग की प्रतिमा (पिछली पोस्टें देखें) इस विषय में किसी तरह का संदेह नहीं रहने देती कि मातृदेवी और लिंग – सृष्टि के मूल- की उपासना का, पश्चिमी जगत में, प्रसार भारत से हुआ था।

इसका इतिहास की व्याख्या में महत्व यह है कि हड़प्पा के जिस व्यापारिक तंत्र के माध्यम से संस्कृत भाषा, देव समाज, और ज्ञानविज्ञान का भारोपीय क्षेत्र में प्रसार हुआ था उसमें दो स्तरो के लोग सम्मिलित थे। एक व्यापारी वर्ग और दूसरा उसकी सेवा में लगे हुए लोग जो परिवहन पशुपालन, नौचालन और मालवहन का काम करते थे, घरेलू स्तर पर औद्योगिक उत्पादन में भी इन्हीं का हाथ था। ये आपस में अपनी बोलियां बोलते थे, अपनी रीति रिवाज और विश्वास का निर्वाह करते थे और व्यापक संपर्क के लिए उस भाषा का प्रयोग करते थे जिसका साहित्यिक रूप ऋग्वेद में मिलता है।

इसका ही परिणाम है कि जिस कुर्गान क्षेत्र में आर्य भाषियों की सुरक्षित बस्तियों की पहचान की गई थी उसी में द्रविड़ और मुंडारी बोलियों के प्रचलन का प्रमाण मिला। जिस लघु एशिया में आर्यभाषा बोलने वाले अभिजात वर्ग की पहचान की गई उसी के अश्वचालन पर पुस्तक लिखने वाला किक्कुली था जो मुंडारी है।

पहली नजर में हमारा ध्यान केवल संस्कृत भाषा और ऋग्वेद के देवताओं की ओर गया, जबकि जमीनी स्तर पर उर्वरता की पूजा करने वाले भी अपनी भाषा, अपने देवी देवताओं और विश्वासों के साथ उपस्थित थे।

यही कारण है की यूरोप की भाषाओं में द्रविड़ और मुंडारी के शब्दों की ओर दृष्टि जाने पर विद्वानों की समझ में नहीं आया कि वे उन भाषाओं में कैसे पहुंचे। इस समस्या के समाधान का कभी प्रयत्न नहीं किया गया।

मातृदेवियां और शिव आज भी पिछड़ी जनजातियों के विश्वास का हिस्सा हों, या हड़प्पा के नागर संदर्भ में उन के प्रमाण मिलें. अथवा भारत से लेकर इटली तक मातृ देवो की उपासना देखने में आए, इसे समझने में विद्वानों ने चूक की है, अतः सभ्यताविमर्श को सही संदर्भ में रख नहीं पाए हैं।

यूरोपीय विद्वानों की अपनी विवशता थी, भारतीय विद्वान यूरोपीय पांडित्य से निर्देशित थे।

*क्रांति करने वाले तात्कालिक सफलता में विश्वास करते हैं। उसके लिए गर्हित तरीके अपनाने के लिए तैयार रहते हैं। गर्हित तरीके यदि इच्छित परिणाम लाएं तो उन पर गर्व भी करते हैं। बंदूक की नली से निकलने वाली क्रांति की तरह। बंदूक की नली से निकलने वाली क्रांति इंसान की जबान से टपकती राल तक का सामना नहीं कर पाती, इसे आधुनिक जगत के इतिहास से परिचित लोग जानते हैं, भले वे इन दोनों के बीच के रिश्ते को न पहचानते हों।

*अंतःप्रकृति या चेतना का, महाप्रकृति – भौतिक जगत या पंचमहाभूतों के प्रपंच से, अविभाज्य संबंध है। एक में आया अंतर दूसरे को भी प्रभावित करता है। यह भारतीय चिंताधारा की लोकविदित मान्यता है, इसे ‘जैसा अन्न वैसा मन’ मुहावरे में भी देखा जा सकता है, और माया-ब्रह्म के द्वेताद्वैत में भी। पश्चिम को इसका पता उसके ‘विज्ञान-युग’ में भी बहुत बाद में मिल पाया इसलिए उसकी चिंताधारा में इसे जगह न मिल पाई।

मुहम्मद साहब और उनसे पहले के लोगों से क्या शिकायत जब कि अपनी स्थापनाओं को वैज्ञानिक बनाने के लिए सतर्क मार्क्स के लेखन में यह कमी रह ही गई जिसे सुधारने की कोशिश करने की जगह विज्ञान को ही फरेब सिद्ध करना आरंभ कर दिया गया। इसका परिणाम? अंतःप्रकृति महाप्रकृति पर भारी पड़ी। लोग कहते हैं काउ ब्वाएज जीन्स की चाहत ने क्रांति को क्रांति के लिफाफे में बदल दिया।

Post – 2019-04-25

खुदा उनका गुनाह माफ करे
मुझको जो अब भी याद करते हैं।

Post – 2019-04-25

तुकबंदी तो आखिर तुकबंदी है

खयालों से आगे खयालों की दुनिया।
मिली भी तो बस आसमानों की दुनिया।।
जमीं पांव रखने को भी मिल न पाई
मिली तोहमतों की बवालों की दुनिया।।
जिसे हम समझते थे अपनी, नहीं है
है जिनकी वे परचम हैं, इंसां नहीं हैं
छिदरते सिहरते जमानों की दुनिया
यही बच रही है बचाने को दुुनिया।।
यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
यह दुनिया अगर मिट भी जाए तो क्या है।

इसे गर्क होने दो, खुद को बचाओ
जलालत से शर्मिंदगी से बचाओ
यही है हमारे ठिकानों की दुनिया
यही रह गई नौनिहालों की दुनिया।
मेरे पास आओ, मेरे साथ आओ।
यही बस है अगले जमानों की दुनिया
तलाशो नया रंग कोई तलाशो
है बदरंग, रंगों की होली मचा दो
नई कल्पनाओं की ख्वाबों की दुनिया।
हर इक प्रश्न के सौ जवाबों की दुनिया।।
यह दुनिया बची है तो हम भी बचे है
जमींदोज सौ आसमानों की दुनिया।

Post – 2019-04-24

#मुस्लिम_समाज और #नेतृत्व_का_संकट- 9

अब हम विहंगम दृष्टि डालते हुए यह देखने का प्रयास करेंगे कि जिन समस्याओं से ग्रस्त और पिछड़े समाज को उबारने के लिए एक नए धर्म का प्रवर्तन मुहम्मद साहब ने किया था उसमें बदलाव तो आया परंतु उन प्रवृत्तियों को क्या रोका जा सका जिनको रोकने का संकल्प लिया गया था?

यहां हम अपने इस मंतव्य को दुहराना चाहेंगे कि क्रांतियों से विस्फोट होता है, मानव ऊर्जा का सही दिशा में उपयोग नहीं हो पाता। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण इस्लाम के इतिहास में ही मिलता है।

व्यक्तिगत रूप में मैं मानता हूं कि कुरान शरीफ के सूरे मोहम्मद साहब के इलहाम के तुरंत बाद अंकित नहीं किए गए थे, कुरान शरीफ संभवतः उनके जीवन काल में लिखा ही नहीं गया। इसे विजेताओं के दस्तावेज के रूप में वर्तमान रूप दिया गया, परंतु इस चर्चा में हम यह मानकर चलेंगे कि आगे जो कुछ भी घटित हुआ उसका सूत्रपात उनके आंदोलन से हुआ था, इसलिए लिखित रूप में जो कुछ उपलब्ध है वह प्रामाणिक है।

जाहिलिया
हम जाहिलिया का अर्थ दुर्दशा करना चाहेंगे। अरब प्रायद्वीप अपनी भौगोलिक सीमाओं के कारण सभ्यता का केंद्र भले न बन पाया हो, यह प्राचीनतम सभ्यताओं की गतिविधियों के परिमंडल के बीच में स्थित रहा है। ईस्वी सन से 3000 साल पहले आरंभ होने वाली ये गतिविधियां विभिन्न चरणों से होती हुई रोमन साम्राज्य के पतन तक चलती रहती है।

यदि इस्लामी धर्मोन्मादियों ने पहले के समस्त वाङ्मय को जाहिलिया की विरासत मानकर उसे नष्ट न कर दिया होता तो हमें उन गतिविधियों का कुछ पता चल पाता जिनमें अरब कबीलों की भागीदारी थी।

सभी धर्म अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए अपने से पहले की अवस्थाओं का ह्रदय विदारक चित्र प्रस्तुत करते हैं, जिसका अपवाद बौद्ध धर्म भी नहीं है। जाहिया शब्द के प्रयोग से हम किसी सही निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते। सच तो यह है पहले के साहित्य का विनाश कर के इस्लाम द्वारा एक नई तरह की जहिलिया का सूत्रपात किया गया, और हमारे पास इस्लामी जगत के इतिहास को जानने के लिए पुरातत्व को छोड़कर दूसरा कोई स्रोत बाकी ही नहीं बचा।

पुरातत्व गूंगा होता है और अपने समय के समस्त वैभव का क्षुद्र अंश होता है जिसकी जबान बनने वाले व्याख्याता अपनी जरूरत के अनुसार बयान तैयार करके उनके मुंह में डाल देते हैं।

समाज को समझने के लिए पुरातत्व की अपेक्षा साहित्य अधिक भरोसे का है, और भौतिक जीवन का आभास पाने के लिए पुरातत्व साहित्य से अधिक भरोसे का है। मिलावट दोनों की दूर करनी होती है तभी सच्चाई सामने आ पाती है। यूरोपीय विद्वानों के पास यूरोप का इतना पुराना साहित्य उपलब्ध नहीं था इसलिए उन्होंने एक स्रोत के रूप में साहित्य की साख ही नष्ट कर दी, परंतु एशिया की कृपा से ग्रीक साहित्य की जितनी चिंदियां मिलीं उनका अभिभूत हो कर प्रयोग करते रहे।

यह ध्यान रहे कि जब हम परिमंडल की गतिविधियों की बात करते हैं तो केवल सभ्यता के केंद्रों बात नहीं करते। उससे अधिक बड़ी भूमिका यातायात की रही है। अरब के इन यायावर कबीलों का इस गतिविधि में कितना उपयोग किया जाता था इसका पता साहित्य से ही चल सकता था।

जो भी हो जिस भाषा में कुरान शरीफ लिखी गई वह एक उन्नत, परिष्कृत समृद्ध भाषा है, और ऐसी भाषा सांस्कृतिक अन्तर्क्रिया के दौरान ही निर्मित होती है। अतः हम पाते हैं कि इस्लाम ने जाहिलिया का दौर समाप्त नहीं किया, बल्कि उसका आरंभ किया।

जाहिलिया का दूसरा पक्ष समृद्धि-जनित भोग विलास, या अय्याशी से जुड़ा हुआ था। अय्याशी भूखे पेट नहीं होती। यह अरबों की आर्थिक खुशहाली का प्रमाण है। यह सच लगता है कि आपसी प्रतिस्पर्धा में वे प्रायः लड़ते झगड़ते रहते थे।

इस्लाम के माध्यम से मोहम्मद साहब ने इनके बीच आपसी भाईचारा और वैर-विरोध के परित्याग का, और इस जीवन में सादगी लाने का संदेश तो दिया ही, सादगी को उसकी पराकाष्ठा पर पहुंचते हुए कलाओं तक का निषेध कर दिया।

इस तरह का निषेधवादी दृष्टिकोण कैथोलिकों ने भी नहीं अपनाया, जिन्होंने मूर्तियां तो तोड़ीं, परंतु अन्य कलाओं के माध्यम से छवि निर्माण को संरक्षण देकर प्रोत्साहित किया। इस्लाम में छवि निर्माण को पूरी तरह समाप्त करने का प्रयत्न किया गया, और और मोहम्मद साहब की एक ऐसी छवि निर्मित हो गई जो बाद की पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ा बंधन बनी। उन्होंने कब, क्या, कैसे किया, मुसलमानों को वही करना है भले जमाना बदल जाए, जो नहीं किया वह नहीं करना है। आत्मरति का इससे बड़ा उदाहरण चिकित्सा शास्त्र के इतिहास में भी नहीं मिलेगा।

जहां तक अय्याशी का प्रश्न है, ऊपरी सादगी के दिखावे की नीचे, अय्याशी को बढ़ावा दिया गया। सृष्टि का सब कुछ मुसलमानों की मौज मस्ती के लिए बनाया गया है और उन्हें जिस चीज से आनंद मिलता है उस पर कोई रोक नहीं।

यह अजीब बात है कि इस्लाम से पहले अनेक कबीलों में निर्णय शक्ति स्त्री के पास के पास थी, समाज मातृसत्ताक था परंतु स्त्री और पुरुष दोनों एक ही मत के हुआ करते थे, इस्लाम के बाद पुरुष मुसलमान हो गया, स्त्री पुरुषों के उपभोग की की दूसरी वस्तुओं की तरह एक वस्तु बन गई।

यदि वह भी मुसलमानों होती तो मनचाही मौज मस्ती का जो विधान पुरुषों के लिए था वह उसके लिए भी होता। पुरुषों के लिए उनके नेक काम के बदले में जिस जन्नत का विधान किया गया वैसी ही जन्नत का विधान पाक दामन औरतों के लिए भी किया गया होता।

खैर जन्नत की कल्पना इस्लाम से बहुत पुरानी है और इसकी कल्रपना करने वालों ने, उनका धर्म कोई भी क्यों न हो, स्त्रियों के प्रति कभी सम्मान का भाव रखा ही नहीं।

यदि विलासिता को जाहिलिया का दोष माना जाए, तो मात्र सिक्का उल्टा, विलासिता को कई गुना बढ़ा दिया गया। यह विचित्र बात है कि इस्लाम आज भी सादगी का आदर्श कायम करने की कोशिश में जाहिलिया के दौरों से लगातार जूझता रहा है।

मुहम्मद साहब ने अरब कबीलों को उस कमजोर, फिर भी अनेक व्यापार मार्गों मे से एक मार्ग के छोटे से हिस्से पर आंशिक – क्योंकि अरबों का अधिकार या उपयोग लाल सागर से सटे पूर्वी हिस्से के लिए था, इसी में समृद्धि और पिछड़े समाजों की मौज मस्ती का दौर आया था। इसी में वह शिश्नोदर-परायणता आई थी जिसके विरुद्ध मोहम्मद साहब ने आंदोलन किया था।

सच कहें तो चिरकालिक विपन्नता के बीच दूसरे प्रततिस्पर्धियों के कमजोर पड़ने के कारण अरबों को यह नायाब अवसर मिला था, जिसके वैभव के अपव्यय को रोकते हुए, विलासिता विरोधी, कलह-विरोधी, हिंसा विरोधी पर्यावरण तैयार करने का, विलासिता की अपेक्षा संयम सादगी अपनाने का क्रांतिकारी प्रयत्न मोहम्मद साहब ने किया था, वह विफल हो गया।

हम मानते हैं यथार्थ की जटिलताओं को समझना तक किसी एक व्यक्ति के लिए असंभव है। क्रांतिकारी एक झटके में उसके चरित्र को समझे बिना बदल देना चाहता है इसलिए किसी एक मामले में उसे आश्चर्यजनक सफलता मिल जाती है इसके बाद भी यथार्थ के दूसरे पहलुओं को समझे बिना पूरे यथार्थ को बदलने वाले उसी महासमुंद्र में कलैया खाकर आ गिरते हैं।

इस्लाम में आई गिरावट को दूर करने के लिए जो प्रयत्न किया गया था, उसका एक रूप वहाबी आंदोलन हैं। मैं वहाबी आंदोलन का एक संक्षिप्त परिचय विलियम विल्सन हंटर के शब्दों में रखना चाहूंगा। इसका व्यंग्य यह है कि सुना वहाब अल्लाह के नामों में से एक है। जिस व्यक्ति ने यह आंदोलन चलाया उसका नाम भी मोहम्मद था और उसके पिता का नाम वहाब था । जिन परिस्थितियों में यह आंदोलन शुरू हुआ उसका परिचय इन इबारतों में मिल सकता है जिनको कुछ सोच समझ कर पढ़ना होगाः
About a hundred and fifty years ago, a young Arab pilgrim, by name Abd-ul-Wahhab, the son of a petty Nezd chief, was deeply struck with the profilgacy of his fellow-pilgrims, and with the endless mummeries which profaned the Holy Cities. For three years he pondered over the corruptions of Mohammadanism in Damascus, and then stepped forth as their denouncer. He rendered himself peculiarly hateful to thr creatures of Constantinople court, accusing the Turkish Doctors of making the written word of no effect by their traditions (Sunnat), and Turkish people of being worse than the infields by reason of their vices. Driven from city to city, he at least took refuge with the chief of Deraiyeh, Muhammad Ibn Saud, into whom he instilled his religious views and a sense of his great wrongs. ….With the aid of his new convert, who married his daughter, he formed a small Arab leagu ee and raised the standard of revolt against the Government of CONSTANTINOPLE, and of protest against her corrupted creed. Victory crowded upon victory. The Bedouins, who had never adored Muhammad as quite a divine person, nor accepted Kuran, as an altogether inspired book, flocked to the army of reformation…W.W.Hunter, Indian Mussalamaan, 57-58

मोहम्मद साहब के समय में यथार्थ और उसके चित्रण का रूप क्या था यह निश्चय करना हमारे बस का नहीं है, परंतु वहाबी आंदोलन जिससे सऊदी अरब का प्राधान्य स्थापित हुआ उसका इतिहास हमारे सामने है और दुर्भाग्य से उसका वर्तमान भी हमारे सामने है जिसने पेट्रो डॉलर से उत्पन्न अपार समृद्धि को जाहिलिया का नया अध्याय लिखने पर बर्वाद कर दिया। इस्लाम ने जाहिलिया को दूर नहीं किया, रूपांतरित किया और नेतृत्व की कमी, इतिहास के नकार, उससे उत्पन्न नासमझी को विश्वास और अंधविश्वास का सहारा लेते हुए दूर करने के प्रयास में आज तक यह दूसरों के उपयोग मैं आता रहा और अपने पांव पर खड़ा होने में असमर्थ रहा।
शिशनोदरपरायणता का सबसे आधुनिक रूप सऊदी अमीरों के आचार में, और जिहादी मानव बम बनकर हूरों और गिल्मों और कामवासना के सभी साधनों से संपन्न जन्नत में जाने की बेताबी मैं देखने में आती है। मुझे पुलवामा के बाद की खबरों से यह जानकारी मिलने पर हैरानी हुई कि मानव बम बनने के लिए तत्पर एक व्यक्ति की कामनाएं अधूरी रह गई, क्योंकि उसको इसके लिए अभी और इंतजार करना था।

मैं जानता हूं मैं जो कुछ लिख रहा हूं उसे कोई मुसलमान नहीं पढ़ेगा । यदि पढ़ें तो यह इतना दरबाबंद समाज है, कि बाहर का कुछ भी ग्रहण करने में असमर्थ हो चुका है, कि बाहर का ज्ञान ही नहीं अपनी मान्यताओं पर पुनर्विचार भी आघात जैसा प्रतीत होता है। फिर भी हम जिनके साथ रहते हैं, उनके चरित्र को समझना और यथासंभव राग द्वेष से मुक्त होकर समझना हमारे दूरगामी हित में

Post – 2019-04-24

अब क्या बचा है जिंदगी में देखिए साहब!
बस आप हैं, और मैं हूं, और कोई नहीं है।

Post – 2019-04-23

#मुस्लिम_समाज में नेतृत्व का संकट
(समाहार)

दुनिया का कोई व्यक्ति अपने वस्तुगत यथार्थ की जटिलता के कारण उसका बहुत सही आकलन नहीं कर पाता। चिकित्सक की तरह वह सबसे उग्र व्याधि को ही एकमात्र व्याधि समझकर उसको निर्मूल करना चाहता है, जबकि उसी के साथ हमारे शरीर में उससे भी अधिक खतरनाक दूसरे रोग हो सकते हैं। जिस एक को निर्मूल करना चाहता है उसका भी पूरा उपचार प्रायः नहीं हो पाता। कई बार, अधिक प्रभावकारी दवा के दुष्परिणाम उस व्याधि से भी अधिक कष्टकर होते है। अदूरदर्शी झटपट नीरोग होना चाहते हैं, उग्र तरीके अपनाते हैं, पहली व्याधि को दबाते हुए, दूसरी अनेक व्याधियां पैदा कर लेते हैं। अधिक दूरदर्शी व्यक्ति आरोग्य पर ध्यान देता है, दवा के परहेज करता है। उपचार भी यथासंभव प्रकृति के अनुरूप करता है। पेशीयबल की अपेक्षा आत्मबल पर भरोसा करता है। उसकी दृष्टि किसी एक बिंदु पर केंद्रित नहीं होती, समग्र पर ध्यान देती है।

गांधी और दूसरे नेताओं में यह बुनियादी अंतर है। गांधी किसी तरह के बल प्रयोग पर, भले उसके परिणाम अच्छे हों, विश्वास नहीं करते। खिलाफत के बदले में जब मुसलमानों के एक समुदाय ने प्रस्ताव रखा कि वे गो वध नहीं करेंगे, तो उन्होंने इससे इंकार कर दिया। यदि आप हमारे सहयोग के बदले में ऐसा करना चाहते हैं तो न करें, स्वयं ऐसा अनुभव करें तो करें।

यह मामूली सी बात इतनी मुश्किल है कि हममें से अधिकांश की समझ में नहीं आती, पर यही गांधी को गांधी बनाती है। बाहरी बल प्रयोग से लाए जाने वाले परिवर्तन पर वह विश्वास नहीं करते। वह सफलता में विश्वास नहीं करते अपनी सर्वोत्तम बुद्धि के अनुसार सही रास्ते पर चलते रहना उनकी दृष्टि में सबसे बड़ी उपलब्धि है। हमारे पैमाने से अक्सर विफल होने के बाद भी अकेले गांधी हैं जो विफल होकर भी गलत नहीं होते और पूरी मानवता के लिए दीपस्तंभ बने रहते हैं।

क्रांति करने वाले तात्कालिक सफलता में विश्वास करते हैं। उसके लिए गर्हित तरीके अपनाने के लिए तैयार रहते हैं।

सामान्यतः लोग मुकदमा जीतने के लिए झूठ बोलने, झूठे गवाह खड़े करने के लिए तैयार रहते हैं। गांधी नहीं। वह अपने मुवक्किल को भारी नुकसान का खतरा उठाते हुए भी सच बोलने के लिए तैयार कर लेते हैं, और इसके बाद भी उसे जीत का आनंद अनुभव होता है वह इसके लिए कृतज्ञ अनुभव करता है।

पोप इनोसेंट प्रथम, मोहम्मद साहब, कार्ल मार्क्स क्रांति करते हैं क्रांति का दर्शन देते हैं और और मानवता का जितना कल्याण करते हैं या करना चाहते हैं उससे अधिक क्षति पहुंचाते हैं। वे सत्ता का चरित्र बदलते हैं समाज का चरित्र पहले से अधिक विकृत कर देते हैं परंतु तात्कालिक सफलता की चकाचौंध में उनकी विफलता आंखों से ओझल रह जाती है।

जब हम मोहम्मद साहब की, एक नेता के रूप में, विफलता की बात करते हैं, तो चेतना की पृष्ठभूमि में गांधीजी रहते हैं। यही कारण है कि मोहम्मद साहब पर बात करते हुए मुझे गांधी की याद आ गई थी।

हमने जिन तीन नेताओं को क्रांतिकारी बताया है उन सभी पर एक साथ चर्चा करना संभव नहीं है। संक्षेप में या अवश्य बता सकते हैं की क्रांतियों से लाभ की अपेक्षा हानि इसलिए अधिक होती है कि इतने बड़े पैमाने पर ऊर्जा के उन्मोचन को नियंत्रित करने का हमारे पास कोई तंत्र नहीं होता। क्रांति की कामना के साथ मनुष्य का स्वभाव नहीं बदल जाता।

पोप इनोसेंट ने पुराने विचारों, विश्वासों, संस्थानों, आराधना स्थलों, साधना और उपासना पद्धतियों, कलाकृतियों, ग्रंथागारों, विद्यालयों, और विद्वानों को नष्ट करने का, मनुष्य जाति के हजारों साल की संचित संपदा को नष्ट करने का और ज्ञान विज्ञान को निर्मूल करते हुए विश्वास और अंधविश्वास की जो पृष्ठभूमि तैयार की उस पर कुछ कहने को नहीं रह जाता।

इस्लाम में यदि पोपतांत्रिक ईसाइयत की इन सभी बुराइयों का प्रवेश हुआ, उसमें मोहम्मद साहब की कितनी भूमिका थी यह तय करना हमारे लिए कठिन है, परंतु इतना तो तय है ही कि यूरोप इनोसेंट की धार्मिक क्रांति के साथ अंधकार युग में चला गया, जिसमें साहित्य, कला, आदर्श सभी धार्मिक अंधविश्वास की परिधि में काम कर सकते थे।

मोहम्मद साहब द्वारा लाई गई कांति से अरब जगत का अंधकार युग में प्रवेश हुआ, उसके बाद, इस्लाम जहां-जहां फैला वहां वहां उसी अनुपात में प्राचीन ज्ञान संपदा और कलाकृतियों को नष्ट करते हुए अंधकार युग का प्रवेश हुआ, जिस अनुपात में वहां की सत्ता पर हावी होने वाले सच्चा मुसलमान सिद्ध होने के लिए सभ्यता द्रोहियों की तरह काम करते रहे।

मार्क्सवाद एक ऐसे युग का क्रांतिदर्शन है जिसमें सीधे बल प्रयोग के द्वारा ऊपर की किसी चीज को मिटाया नहीं जा सकता था, परंतु केवल मार्क्सवादी कलाकारों, दार्शनिकों, साहित्यकारों को श्लाघ्य बनाना, प्राचीन ज्ञान, विश्वास, इतिहास, सब की अवहेलना क्या उसी विनाश लीला का नया संस्करण नहीं है। जाे हमारे साथ नहीं है वह हमारा शत्रु है, क्या ईसाइयत के उसी विश्वास का अनुवाद नहीं है कि जो ‘सद्धर्म’ नहीं अपना सके हैं, वे जहालत में हैं? क्या यह इस्लाम के, ‘जो मुसलमान नहीं है वह शैतान की जद में है, काफिर हैं’, से मेल नहीं खाता? केवल एक दर्शन मार्क्सवाद। दूसरे दर्शन कुफ्र हैं।

जिस तथ्य पर इन तीनों को एक ही कोटि में रखते हुए बल देना चाहता हूं वह यह कि इनोसेंट प्रथम ने जीसस को सूली पर लटकाया था, रोमनों ने नहीं। उन्होंने ईशा के संदेश को उलट दिया, और एक नया धर्म ईसा के नाम का इस्तेमाल करते हुए चलाया जो ईसा-द्रोही, मानव-द्रोही, ज्ञान-विज्ञान द्रोही, पाशविक है, धर्म की आड़ में अधर्म का तंत्र है।

ठीक इसी नतीजे पर मार्क्स और एंगेल्स को पढ़ने और उनके दर्शन के नाम पर सत्ता हासिल करने वालों के आचरण को देखने पर पहुंचते हैं।

लेनिन बहुत बड़े थे। उनकी सत्ता की भूख उससे भी बड़ी। उनके द्वारा अपनाया तरीका और दी गई छूट तो उससे भी बड़ी थी। आप जानते हैं यह कैसे पैदा हुआ?

यह मध्य एशिया की बर्बर जातियों के स्वभाव से पैदा हुई थी इसके भुक्तभोगी दुनिया के सर्वाधिक सभ्य देश – भारत और चीन – रहे हैं। जारशाही जिसकी अपराध कथाओं को सुनते हुए हम सोवियत सोवियत क्रांति से जुड़ी अपराध कथाओं को भूल जाते हैं, उसी जमीन से पैदा हुई थी, और उसी में साम्यवाद का सबसे पहला प्रयोग हुआ था। दोष लेनिन का नहीं था, उस प्राकृतिक परिवेश का था, जिसमें जीवन निर्वाह मानवतावादी अपेक्षाओं का निर्वाह करते हुए हो ही नहीं सकता था।

यदि आपको यह कथन याद न हो कि क्रांति डॉल्फिन के उस छलांग जैसी है जिसमें एक क्षण को हमें विस्मय में डालती हुई वह हवा में रहती है पानी की सतह से ऊपर दिखती है और फिर उसी में आ गिरती है।

इन दोनों उदाहरणों से, और मोहम्मद साहब के विषय में जो कुछ सुनने को मिलता है उसके आधार पर यह मानने का प्रलोभन होता है कि मोहम्मद साहब ने जो वैचारिक क्रांति की थी वह सत्ता पर हावी होने वालों के प्रभाव में आकर उनके अपने उद्देश्यों के विपरीत चली गई। तभी याद आता है कि कुरान शरीफ मोहम्मद साहब के विचारों का सही प्रतिनिधित्व नहीं करता। वह सचमुच शांति के देवदूत थे। कुरान को उल्टा पल्टा, पर हदीस पढ़ने का अवसर ही नहीं मिला। सुनी सुनाई बातें उस व्यवहार से मेल नहीं खाती जिनको इस्लाम का अचार दर्शन बना लिया गया।

इसलिए इन तीनों दर्शनों के मामले में, उनका सैद्धांतिक पक्ष सत्ता पर अधिकार करने वालों के आचार व्यवहार से उल्टा दिखाई देता है। कामचलाऊ जानकारी का लाभ उठाते हुए मैं केवल यही अपेक्षा करूंगा कि इस्लाम के पंडितों द्वारा इस्लाम का इतिहास खोजने और लिखने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। मेरी योग्यता आशंकाएं प्रस्तुत करने की है, समाधान करने की नहीं।

एक छोटे से अंतर को रेखांकित करना चाहूंगा। इन तीनों महर्षियों ने प्रकृति की कृपणता के कारण, या व्यवस्थाजन्य अपमानवीकरण से अपने और अपनी दृष्टि से मानव समाज का उद्धार करना चाहा और सत्तालोलुप नेताओं ने उस परिस्थितिजन्य गिरावट को औजार बना कर अपने दार्शनिक अग्रदूतों की हत्या कर दी। ईसा पहले और अन्तिम ईसाई थे। मुहम्मद पहले और अंतिम मुसलमान थे। मार्क्स पहले मार्क्सवादी भी नहीं थे, और अंतिम मार्क्सवादी भी नहीं हैं। गांधी ने अपने सारे औजार पहले के विचारकों से लिये थे। उनसे अधिक मौलिक तो भारतेंदु और दयानंद सरस्वती सिद्ध होते हैं, परंतु गांधी में अपनी परंपरा का सारसत्य है, इसलिए गांधी विफल होने पर भी पूरी मानवता ही नहीं सृष्टि की रक्षा के लिए भी सबसे प्रासंगिक है और गोली खाकर ढेर हो जाने के बाद भी नहीं मरता। वह विफल होता है, निष्फल नहीं होता।