Post – 2015-11-19

आ बैल मुझे मार!

“आ बैल मुझे मार! मुहावरा सुना है कभी?” आज उसके हाथ में अखबार नहीं एक पतली सी किताब थी।
“बैल लगते तो नहीं तुम। सींग की जगह हाथ में किताब है।“
“तुमने कहा था न पहले परिभाषित करो फिर बात करो, तो यह रहा फासिज्म का मतलब। देखो इसे।“
“देख लिया, अब बताओ।“
“तुम जानते हो संघ का मतलब क्या होता है?”
“जो मतलब तुम लगाते हो, वह मैं कैसे जान सकता हूँ?”
“संघ का मतलब ही है फासिज्म।“
“मैंने सोचा तुम संघ का मतलब संहार लगा रहे हो।“
“वह भी यार। देखो फासिज्म जिस लातिन शब्द फासिओ से बना है, उसका मतलब है लट्ठों का ऐसा गट्ठर जिनके बीच एक कुल्हाड़ा भी छिपा है। अर्थ है संगठितशक्ति और आक्रामकता तो हुआ न संघ का मतलब फासिज्म। जानते हो इसका सबसे पहले मुसोलिनी ने फ्रांस की क्रान्ति से उपजे बराबरी, स्वतंत्रता और भाईचारा के नारों के विरोध में, ‘राजनिष्ठा, आज्ञाकारिता, नागरिकों के भी सैन्यीकरण और युद्ध से शक्ति विस्तार के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए किया था।“
“तुमने ताजा-ताजा ज्ञान प्राप्त किया है, और बताओ।“
“इसके कुछ तत्व हैं। चरम दक्षिण पन्थ, राष्ट्रवादिता, नस्लवाद, लोकतन्त्र में अविश्वास, तानाशाही, देशभक्ति, और सांस्कृतिक अस्मिता की खोज। इसमें भी वे सारे तत्व पाये जाते हैं।“
मैंने कहा, “सुनते हैं इसका दौर 1919 से 1944 तक ही रहा। अब वह दफ्न हो गया। जहाँ पैदा हुआ था वहाँ भी । जहाँ जहाँ फैला वहाँ वहाँ भी इसका रूप बदलता गया। और अब तो दुनिया में कहीं नहीं रह गया।“
देख सको तो पाओगे कि वह इस देश में भी है और न देखना चाहो तो देखने वालों की आँखें फोड़ दो। वह तो तुम करोगे ही।“
“मैं नहीं करूँगा पर अपने को सही साबित करने के लिए तुम अपनी आँखें फोड़ लोगे और चिल्लाओगे भी कि देखो इसने मेरी आँखें फोड़ दी, अब तो इसे फासिस्ट कहो।“
वह हँसने लगा, “सच कहो तो तुम्हें मिटाने के लिए मैं यह भी कर सकता हूँ।“
“कोई फर्क नहीं पड़ेगा। देखने का काम आँखों से आज भी नहीं ले रहे हो तब लेने की झंझट ही न रह जाएगी। मैंने कुछ बातें गाँठ बाँधने के लिए कही थी, उनमें एक यह था कि किसी भी परिघटना की ऐतिहासिक परिस्थितियाँ होती हैं जिनके निर्माण में केवल उसका हाथ नहीं होता। दूसरा कालक्रम में सभी के चरित्र में बदलाव आता है।“
“यह बात कभी नहीं कही।“
“चलो इन्हीं शब्दों में नहीं कह पाया होउूँगा। फिर कहा था यदि पहले घटित के बहुत से घटक अन्यत्र मौजूद हो, एक दो ही घट-बढ़ जायँ तो नतीजा इतना बदल जाएगा कि कहने को वह भले वही रहे, आचरण या प्रतिफलन बदल जाएगा। यदि तुमको केमिस्ट्री का थोड़ा भी ज्ञान हो तो इसे आसानी से समझ सकते हो। ताप में, माप में, घटक में, अनुपात में मामूली भिन्नता उसको वही नहीं रहने देती जिसे हम बनाना चाहते थे। समाज की भी एक केमिस्ट्री होती है। घटनाओं की भी।
“तुम दुनिया भर की बातें सुनते जुटाते रहे पर उन तथ्यों पर ध्यान नहीं दिया जो इसकी कोशिश के बावजूद इसके चरित्र को बदल रही थी। तुम जानते हो जिन दिनों लीग और अभिजात मुस्लिम परिवार एक अलग मुस्लिम देश निकालने की बात कर रहे थे, और यह शोर बहुत तेज हो गया था उन्हीं दिनों वह किताब आई थी जिसमें हिन्दू देश और उसमें रहने वाले अहिन्दुओं को उसी तर्ज पर दूसरी कोटि का नागरिक मानने या नागरिकता से वंचित करने आदि की बातें आई थीं। लेकिन उसी पुस्तक का एक दूसरा संस्करण भी उसी साल उसी संस्था से आया था जिसमें एम एस अणे की भूमिका थी जिसमें उन संकीर्णताओं की, संकुचित राष्ट्रवाद की अव्यावहारिकता विश्व सन्दर्भ में इनको रखते हुए सिद्ध की गई थी। उस पर तुम कभी घ्यान नहीं देते कि स्वयं उसी विचारधारा में उसकी सीमाओं को लक्ष्य किया जाने लगा था, क्योंकि उससे तुम आग लगाने का वह काम नहीं कर पाओगे, जो करते आ रहे हो। उसके दो टुकड़े इस प्रकार हैं
10 – He seeks to define “nation.” From the Latin word “Natio’ meaning birth or race and signified a tribe or social group with a same language. Later in the mediaval universities it was used to establish voting rights. 11 – But there is no scholarly work on the subject in any language. Of those who he notes as having written on it, one is Israel Zangwill.
25 – People thinking about the problem of Muslims often forget to distinguish between nation and state. “No modern State has denied the resident minorities of different nationalities rights of citizenship of the State.” Foreword by Lokanayak M.S.Ane
अब मैं बार-बार इसी विषय पर नहीं लौटूँगा। कहना यह है कि सब कुछ जितना इकहरा बना कर दिखाया जाता है उतना होता नहीं है। हम अपने बच्चों तक को अपनी इच्छानुसार नहीं ढाल पाते। हम अपने आग्रह में जितना ही कठोर होंगे, उतने ही उल्टे स्वभाव या दृष्टिकोण की संभावना होगी। एक आदमी हिन्दू नाम से अखबार निकालेगा, उसी की औलाद को उसी हिन्दू से हिन्दू नाम से इतनी चिढ़ हो जाएगी कि उसकी हर चीज की भर्त्सना उसी अखबार से करने की नीति अपना लेगा। निर्मल चंद्र चटर्जी का पुत्र सोमनाथ चटर्जी हिन्दू महासभा का कट्टर आलोचक कम्युनिस्ट बन जायेगा हो। नाम कम्युनिस्ट पार्टी रहेगा, आत्मा में लीग का एजेंडा घुस जाएगा।“
“इसी तरह मैं कहूँ कि तुम अपने को सच्चा मार्क्सवादी कहोगे और तुम्हारी आत्मा में आरएसएस घुस आएगा, तो क्या गलत होगा?”
“ऐसा लगे तो मैं अपने को ही दोष दूँगा। कहा था न कि यदि श्रोता नहीं समझ पाता, या गलत समझ लेता है तो दोष वक्ता का ही है। यही बात समग्र व्यवहार के विषय में भी कही जा सकती है जिसमें बोलना, लिखना, जीवनशैली सभी आते हैं। इसलिए यदि कोई व्यक्ति घबराहट में ऐसा कहे, उससे जवाब न देते बने तब कहे, तो मैं उसके साथ सहानुभूति रख सकता हूँ। यदि वह कोई उदाहरण देते हुए बताए तो मैं उसका उपकार मानूँगा और अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाऊँगा।
“खैर, मेरी समझ से, फासिज्म एक ऐसी चीज है जो पूँजीवादी विकास के बाद, उसी से उत्पन्न समस्याओं के बीच से कोई सही रास्ता निकालने की अनेक कोशिशों के बीच एक दार्शनिक चिन्तन की परिणति थी जिसमें फिक्टे और हीगेल जैसे प्रकांड विद्वानों के दर्शन का भी हाथ था, और जिसकी जड़ें मैकिआवेली से होते हुए ग्रीस तक उतरी मिलेंगी। इसके एक रूप सिंडिकेटवाद का जो राज की सत्ता को ही नकारता था, और जिसने अराजकतावाद को जन्म दिया था और जिसके प्रवक्ता प्रूधों थे, उनका प्रभाव मार्क्स पर भी पड़ा था गो मार्क्स उससे बाहर आ गए थे। पर कम्यून की स्वायत्तता और राज्य के खात्मे की बात कम्युनिज्म में भी आई। यह प्रूधों ही था जिसने धन के एकत्रीभवन को चोरी की संज्ञा दी थी। विचारों की एक खलबली के बीच पैदा हुआ था फासीवाद और नाजीवाद इसलिए इसके भिन्न रूपों में कम्युनिस्ट समग्रतावाद को भी गिना जाता है। मेरी योग्यता इस पर अकादमिक बहस करने की नहीं है, न ही उसकी जरूरत समझता।
“मैं केवल यह कह सकता हूँ कि जैसे फलों, फूलों, यहाँ तक कि जीव प्रजातियों का एक अनुकूल प्राकृतिक और भौतिक परिवेश होता है उसी तरह कुछ विचारों, आन्दोलनों के साथ भी है। यूरोप में जो हुआ वह दूसरी जगह नहीं हो सकता, परन्तु किताबी ज्ञान रखने वाले अपनी सामाजिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को समझे बिना उन्हें झपटने की कोशिश कर सकते हैं और इस तरह की कोशिश में खासा सत्यानाश कर सकते हैं। जरूरत उन लक्षणों को पहचानने और उनसे बचने की है।
“संघ ने अपने चरित्र में बहुत बदलाव किया है। दबाव के चलते किया है। भारत की सामाजिक बहुलता में फासीवाद पनप ही नहीं सकता, परन्तु इसके कुछ लक्षणों को पाकिस्तान ने अपनाया और उसका फल भोग रहा है।
“फासिज्म के अन्तिम गठजोड़ वाले नाजीवाद का एक दुर्गुण था झूठ को सच बनाने की कला। संचार माध्यमों पर नियन्त्रण। विचार माध्यमों का नियन्त्रण। अपने झूठ को प्रचारित करने के लिए प्रगल्भ वक्तृता या ओरेटरी का सहारा। इसके लिए प्रशिक्षण केन्द्र खोलना। भिन्न विचारों के प्रति घृणा का प्रसार, लगातार एक ही झूठ को दुहराते हुए उसे एक खौफनाक औजार बना देना। इन सबका सहारा आपात काल के समय से सत्ता में पैठ बना कर तुम करते रहे हो। फासिस्ट तो तुम हो भाई। वे तो फासिज्म का धोखा है, जो खेतों में चिड़ियों और जानवरों को डराने के लिए खड़ा कर दिया जाता है। उनकी हालत में तो इतना बदलाव आ गया है कि एक समय में उनका रणनीतिकार कहता था कि उसके हिन्दू देश में इतर जनों के लिए जगह नहीं होगी, फिर सुधार किया कि उन्हें इसे ही अपनी जन्म भूमि, कर्मभूमि और धर्मभूमि मानना होगा। फिर लगा कुछ ज्यादती हो गई, तो नारा लगाने लगे कम से कम इस भूमि की बन्दना तो करनी ही होगी, बन्दे मातरम् तो कहना ही होगा। अन्त में वह भी दब गई और अब पुकारते हैं भाई हमे मुसलमानों इसाइयों की बराबरी का दर्जा तो दो, सबके लिए समान कानून तो बनाओ, वे कानून जो रीति से नहीं मानव अधिकारों से जुड़े हुए हैं और इस बराबरी की माँग को भी तुम सांप्रदायिकता करार दे बैठते हो। जितनी भर्त्सना उनकी तुम करते आए हो उतनी तो नाजियों ने भी यहूदियों की नहीं की होगी। मौका मिले तो तुम इनके साथ क्या कर सकते हो, पता नहीं ।
“देखो फासिज्म का सबसे प्रधान लक्षण है लोकतन्त्र का विरोध। इसी से अराजकतावाद, फासिज्म, कम्युनिज्म सभी का जन्म हुआ है। आज जो तुम्हारा गुस्सा है वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने हुए व्यक्ति को, वह कुछ अच्छा भी करना चाहे तो, हम करने नहीं देंगे। उसे बदनाम करके गिरा कर दम लेगे। भई बदनाम करने की ताकत, घृणा का प्रसार करने की ताकत तुम्हारे पास और फासिस्ट वह! बात गले नहीं उतरती यार!”

Post – 2015-11-18

इतिहास पुरुष की वापसी

‘‘तुम्हारे इतिहास पुरुष की तो वापसी की गिनती शुरू हो गई। मैं तो उस दिन को सोच कर डर जाता हूँ, जब इतिहास उसे हा शिए पर डाल देगा और उसके साथ तुम भी हा शिए पर चले जाओगे।’’ वह खासे उत्साह में था।
‘‘तुम्हारी महिमा में कुछ विरुदावलियाँ बहुत पुराने जमाने से लिखी जाती रही हैं, कभी पढ़ा है तुमने?’’
वह उत्सुकता से मेरी ओर देखने लगा।
‘‘वैसे विरुदावली तो मेरी भी लिखी गई है, पर मैं उसका पाठ स्वयं कर लेता हूँ, दूसरे किसी को इतने छोटे काम के लिए कष्ट क्या देना!’’
‘‘बताओगे भी क्या लिखा है या पहेलियाँ ही बुझाते रहोगे।’’
‘‘तुम्हारी महिमा का गान तो अनन्त है, पर दो ही पर्याप्त होंगे। एक हिन्दी में दूसरी देवभाषा में। हिन्दी में है, ‘मूरख हृदय न चेत जो गुरु मिलहिं विरंचि सम।’ गरज कि मैं कितना भी समझाउूँ कोई बात तुम्हारे भेजे में घुस ही नहीं सकती, और संस्कृत में है, ‘तावदेव शोभते मूर्खः यावत् किंचिन्नभाषते।’ अर्थात् जब तक तुम मेरी बात चुपचाप सुनते रहते हो तब तक भरम बना रहता है और मुँह खोलते ही असलियत जाहिर हो जाती है।’’
मेरी बात सुनते हुए वह मुस्कराता रहा, ‘‘और तुम्हारी महिमा में क्या लिखा है?’’
‘‘‘वक्तुरेव हि तज्जाढ्यं यत्र श्रोता न बुझ्यते।’ कि अगर मेरी बात तुम्हारी समझ में नहीं आती है, तो यह मेरी जड़ता है।’’
‘‘चलो हिसाब बराबर!’’
‘‘बराबर कैसे होगा। मैं समझाता हूँ तुम समझ जाते हो, फिर अगले दिन सारे किए कराए पर पानी फिर जाता है। फिर वहीं से शुरू करते हो, इसे कम्बलबुद्धि मूर्ख कहा जाता है।“
‘‘मुझे यह सोच कर मजा आ रहा है कि तुम असलियत भाँप कर अभी से सदमे में आ गए हो। अन्तिम चोट तो तुम सँभाल ही नहीं पाओग। मुझे उसकी नहीं, तुम्हारी फिक्र हो रही है!’’ सच। उसने चिन्ता जताते हुए चिन्तित होने का अभिनय भी करना चाहा।
मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा तो उसने आगे जोड़ा, ‘एक आदमी एक चुनाव जीत गया तो तुमने उसे इतिहास पुरुष बना दिया। तो बिहार के चुनाव ने यह दिखा दिया कि इतिहास तुम्हें ठुकरा चुका है। अब देखो तो तुम्हारा इतिहास पुरुष न विकास कर पा रहा है, न महँगाई रोक पा रहा है, न विदेशों में जमा पैसे वापस ला पा रहा है, न अपने साथियों और सहयोगियों की नकेल कस पा रहा है। जिसे एक छोटी सी सफलता पर तुमने इतिहास पुरुष बना दिया था और कहने लगे थे उसे जो वह चाहे करने दो उसे इतिहास ने धक्के देना शुरू कर दिया न। कमाल की समझ है। इसी पापुलिज्म से फासिज्म पैदा होता है, भाई। इसी पापुलिज्म से हिटलर और उसका राष्ट्रवाद पैदा हुआ था, नाजीवाद। हम इसे आने नहीं दे सकते। हम अपनी जान देकर भी इसे रोकेंगे।’’
मैं तो सचमुच घबरा गया। जान दे बैठा तो बात किससे करूँगा। समझाया, देखो, तुम्हें जान देने की जरूरत नहीं है। सिर्फ अक्ल से काम लेने से काम चल जाएगा। पहली बात तो यह समझो कि जब मैं इतिहास पुरुष कहता हूँ तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इतिहास बदल सकता है। कालदेव के सामने तो मैं पहले ही बता चुका हूँ कि एक व्यक्ति तो क्या पूरे पूरे आन्दोलन और दल तक एक तुच्छ खिलौने से अधिक कुछ नहीं। मेरा मतलब सिर्फ यह था कि वह इतिहास के एक खास बिन्दु पर पैदा प्रशासनिक शून्य को भरने के लिए कालदेव द्वारा सबसे उपयुक्त व्यक्ति उसे ही पाया गया था। चुनाव से एक साल पहले ही यह घाषित हो गया था कि हमारे मनमोहन सिंह उस कागज के टुकड़े से भी गए बीते हैं जिसे राहुल ने सार्वजनिक रूप से फाड़ कर फेंक दिया था। जो बात राहुल और उसकी अभिभाविका को पता नहीं थी, वह यह कि आर्थिक अपराधों में सीधी और खुलेआम संलिप्तता के कारण इतिहास ने उन्हें भी फाड़ कर फेंक दिया है। उसके बाद ही जनमत संग्रहों में इस शून्य को भरने वाले व्यक्ति के रूप में मोदी का चुनाव हो गया था। यह कालदेव का चुनाव था। जनता के सहज मन की अभिव्यक्ति जिस पर चुनावी प्रचार की कीचड़ और कालिख का निशान न था। इसके बाद चुनाव एक औपचारिकता थी। यदि मोदी कुछ नहीं करते एक वाक्य का भाषण देते कि आप यदि चाहते हैं कि मैं इस देश का नेतृत्व करूँ तो केवल मुझे नहीं, जिसे जिसे मैं कहूँ उसे भी चुन कर भेजिए कि मैं पूरे श्रम और सहयोग से काम कर सकूँ तो भी नतीजा वही होता जो बेकार की डंकेबाजी से हुई। ढोल नगारे से बहुत कम लाभ होता है और अक्सर तो नुकसान होता है।
‘‘यदि मनमोहन सिंह उतने बेअसर, हो कर भी अनुपस्थित, न होते और कांग्रेस का आलाकमान यह सोच कर कि अपने दिन लद गए जो हाथ लगे समेट लो की हड़बड़ी में न आ गया होता तो चुनाव दलों के बीच होता, व्यक्तियों के बीच नहीं। परन्तु यह जो ताबड़तोड़ हुआ वह वह भी कालदेव के इशारे पर ही, विनाशकाले विपरीत बुद्धि के तर्क से ही, या जैसा कहते हैं देवता लाठी डंडे से नहीं मारते हैं, मति ही फेर देते हैं, और तुम खुद अपने विनाश की प्रक्रिया तेज कर देते हो, इसे कालदेव का इशारा और इतिहास पुरुष का चयन कह सकते हो। इससे पहले ऐसी नौबत कभी नहीं आई थी। इतनी बात समझ में आई या कुछ कमी रह गई है।’’
‘‘मैं तो उस पर बहस ही नहीं कर रहा था। मैं तो कह रहा था उसे उसी इतिहास ने वापस लौटाना शुरू कर दिया है और उसका सदमा तुम्हें झेलना पड़ेगा।’’
‘‘तुम्हें यह भूल गया कि मैंने विचारक और संस्कृतिकर्मी और यहाँ तक कि छात्रों और अध्यापको तक को व्यावहारिक राजनीति से अलग रहने की बात कही थी। इससे उनका अपना काम प्रभावित होता है। राजनीति की समझ तक प्रभावित होती है। अच्छे बुरे का फर्क नहीं रह जाता। जिस राजनीति से जुड़े हो, सिर्फ उसे सही मानने की आदत पड़ जाती है। निर्णय क्षमता खत्म हो जाती है। इसलिए मेरे विचार को चुनाव परिणाम प्रभावित नहीं कर सकते। और अगर चुनावी हार से ही वापसी शुरू होनी थी तो यह बात तो इससे भी अधिक सशक्त रूप में दिल्ली के चुनाव ने घोषित किया था। बिहार की स्थिति तो फिर भी अच्छी है।’’
‘‘तुम कहना चाहते हो, बिहार के चुनाव परिणामों से तुम्हें निराशा नहीं हुई?’’
‘‘निराशा हुई, पर उन कारणों से नहीं, जिन्हें तुम गिना रहे हो, या अखबार लट्ठ ले कर पीट रहे हैं। निराशा हुई इतिहास पुरुष की हार से।’’
वह उछल पड़ा, ‘‘भई यही तो मैं कह रहा था।’’
‘‘तुम तो यह भी नहीं जानते कि बिहार के सन्दर्भ में इतिहासपुरुष कौन था? उसी प्रशासनिक शून्य से जो दूसरा संभावित विकल्प उभरा था वह नीतीश कुमार थे। उनसे आशा थी कि यदि विविध कारणों से मोदी को अवसर नहीं मिलता है तो स्वच्छ प्रशासन और विकासोन्मुखी दिशा नीतीश दे सकते हैं।“
‘‘नीतीश तो जीत ही गए। कल शपथ ग्रहण करेंगे।“
‘‘देखो, बिहार में मोदी बनाब नीतीश चुनाव नहीं था, सुशील बनाम नीतीश था। बिहार के लिए नरेन्द्र मोदी उपलब्ध नहीं थे। हर हालत में नीतीश को जीतना था। नरेन्द्र मोदी इतिहास के संकेत के विरुद्ध अपनी शक्ति आजमा रहे थे। मैं यह भी कह आया हूँ अपार शक्ति भी कालदेव के रास्ते में धूल गर्द साबित होती है। निष्प्रभाव। शक्ति अधिक लगी तो परिणाम अधिक विपरीत होंगे। इसलिए नीतीश अकेले दम पर उसी तरह जीत सकते थे जिस तरह केन्द्र के लिए मोदी जीते थे। वह चुनाव से पहले ही हार गए और हारते चले गए। तुम एक हारे हुए मुख्यमन्त्री को कल शपथ लेते देखोगे।“
‘‘अजीब आदमी हो। मुँह छिपाने को यही बहाना मिला था। कहते तो मैं अपना रूमाल निकाल कर दे देता।“
‘‘ पहली हार गठबन्धन के रूप में आई। जिस भ्रष्टाचार के विरुद्ध उन्हें इतिहास पुरुष के रूप में चुना गया था, उसके लिए विख्यात दल के साथ गठबन्धन। दूसरी नरवसनेस के रूप में आई, तान्त्रिक के पास भागने लगे। तीसरा, विकास का स्थान जातिवादी समीकरण ने ले लिया और जातिवाद को उभारतने के लिए उस विज्ञापन एजेंसी की मदद लेनी पड़ी जिसे यह भ्रम था कि मोदी का प्रचारतन्त्र उसके हाथ में था इसलिए वह जीते थे। और अन्तिम परिणाम इसके अनुरूप होना ही था, जातिवादी समीकरण में आगे पढ़ने वाला सहयोगी आगे पहुँच गया, निर्णयशक्ति उसके पास आ गई, नीतीश को मुख्यमंत्री बनाने से ले कर बाद के सभी निर्णय, जैसे मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने से ले कर बाद के निर्णय पीछे से लिए जाते थे। सकल लब्धि यह कि विकास पीछे चला गया जातिवाद की वापसी हो गई। इतिहास आगे चला गया वर्तमान पीछे लौट गया। मैं इतिहासपुरुष की इस त्रासदी से दुखी हूँ। भाजपा की हार से नहीं।“
उसे काटो तो खून नहीं। मैंने अन्त में जोड़ा, ‘‘और वह जो फासिज्म वासिज्म की बात है न उसका एक जवाब इतिहासपुरुष ने अन्तर्राष्ट्रीय मंच से दिया है। ध्यान दिया तुमने?”
उसकी समझ में नहीं आया, मैं कह क्या रहा हूँ। मैंने कहा, ‘‘उसने कहा, जिन शब्दों और प्रवृत्तियों से खतरा है उनका अवसरवादी उपयोग न करो, डिफाइन करो। परिभाषित करो और फिर बात करो। जो बात उसने टेररिज्म के विषय में यूएनओ में कही, वही वह तुमसे कहता आया है। पहले सम्प्रदायवाद, भगवावाद, फासिज्म को परिभाषिात करो फिर बात करो। बताओ जो सबका साथ सबका विकास का सपना ले कर चलता है वह क्या है और जो जाति, धर्म समुदाय के नाम पर बाँट कर रखना चाहता है वह क्या है।“

Post – 2015-11-17

हम भी रहते थे उस जमाने में जिसको बर्वाद कर दिया तूने

“तुम को कभी कभी पीटने का मन करता है।“
“इसमें बुराई क्या है। जिसके पास जो औजार है उसी का इसतेमाल तो करेगा। अक्ल होती तो अक्ल की बात करते नहीं है तो लाठी डंडे से ही बात करो। खाली हाथ क्यों चले आए, लाठी- डंडा ले कर आना चाहिए था। खाली हाथ क्यों चले आए।
मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूँ। मुझे अपनी बात रखने का मौका दिए बिना ही उठ जाते हो, ‘चलो, अब चलें! के अन्दाज में। यह बात करने का कोई तरीका है?
“तो अब कह लो, जो कल न कह पाए।“
“तुम पढ़ते लिखते हो भी या जो जी में आया बकते चले जाते हो?”
“सोचता हूँ जब पढ़ने वाले आसपास हैं तो उनको सुन कर जान लूँगा, देखने वाले कम हैं, जितना देख सकूँ देखूँ। तुम बताओ क्या पढ़ना रह गया मुझसे?”
“तुमने कहा, सारे दंगे कांग्रेस ने कराए हैं। उस शोध कार्य का पता है जिसमें बताया गया है कि दंगे इसलिए भड़कते रहे कि पुलिस बल का सांप्रदायीकरण हो गया था। और जानते हो, यह ऐसी पाये की बात है, जिसके लिए अंग्रेजी में एक मुहावरा है, ‘फ्राम हार्सेज माउथ।“
“मुहावरे कई बार समझ में नहीं आते। तुम कह रहे हो वह सांप्रदायिक हो चुका था, और बता रहा था कि वह कैसे सांप्रदायिक हुआ?”
“नहीं, वह सांप्रदायिक हो चुका होता तो यह बताता क्यों। वह अकेला बच रहा था और दूसरे सभी सांप्रदायिक हो चुके थे।“
“क्या उसमें यह भी है कि कब तक सांप्रदायिक नहीं थे और कब और किन कारणों से सांप्रदायिक होने लगे और सांप्रदायीकरण की व्याधि कयों इस कदर फैलती चली गई कि उसके सिवा कोई बचा ही नहीं।“
“वह अचकचाया।“
“फिर तुमने मुहावरा भी गलत चुना। घोडे के मुँह से नहीं, तुम्हें कहना चाहिए था साईस के मुँह से। वह जिसे घोड़ों को साधने और सही खूराक देने, सही हालत में रखने की जिम्मेदारी दी गई थी, वह अपना काम करना तो जानता ही नहीं था, दोष उनको दे रहा था जो उसकी लापरवाही या बेवकूफी से सांप्रदायिक होते चले गए थे। इसके लिए भी अंग्रेजी में और हिन्दी में भी और सच कहो तो दूसरी भाषाओं में भी मुहावरा मिल जाएगा । अंग्रेजी का मुहावरा है अनाड़ी कारीगर अपने औजार को दोष देता है। ए बैड वर्कमैन ब्लेम्स हिज़ टूल्स। इसका हिन्दी रूप हैं नाच न आए आँगन टेढ़ा। और मैंने दूसरी भाषाओं में भी इसलिए कह दिया कि इसी बीच तमिल मुहावरा ‘नाट्ट माट्टादु तेवळियाळुक्कु कूलम् कोणम्” याद आ गया अर्थात नाच न जानने वाली देवदासी आँगन को टेढ़ा लगता है। खैर, तुम उस आदमी से कभी मिले हो?”
“मिलने न मिलने से क्या होता है?”
“मिलते तो पता चलता कि वह नजदीक की चीजों को देख पाता है या नही?”
“तुम्हें बातों को विचित्र बनाने का रोग है।“
“भई ये लोग जो सर्विसेज की तैयारी करते हैं न, उन्हें बहुत दूर की चीजें देखने की ऐसी आदत पड़ जाती है कि नजदीक की चीजें देख नहीं पाते। वे चर्मचक्षु से नहीं लोभचक्षु से देखने लगते हैं। वह दोहा, बिहारी का है, शायद, ‘दिये लोभ चसमा चखनु लघु पुनि बड़ो दिखाय।’ तो उन्हें थोड़ी भी चीज बहुत बड़ी और बहुगुणित दिखाई देने लगती है। उसे जब अपने विभाग को, कम से कम अपने अधीनस्थ बल को अपने नियन्त्रण में रखना चाहिए था, निर्देशों- आदेशों का सही पालन करना सिखाना था तब उस जरूरी काम को छोड़ कर वह शोध कार्य करने लग गया। शोध की प्रेरणा और सूझ या तो कहीं से मिली होगी या उसने खुद ही भाँप लिया होगा कि कहाँ से किस तरह क्या हासिल किया जा सकता है। यह बताओ इतने निकम्मे साईस को सिपहसालार का ओहदा मिला या नहीं?”
“सिपहसालार तो वह पहले से था। उसे और क्या चाहिए था?”
“कुछ उससे भी बड़ा। वह जिसे मैंने कहा था, छोटा मोटा उपराज्य!”
वह थोड़ी देर सोचता सा लगा और फिर जोर की धौल मेरी जाँघ पर मारते हुए हँसा, ‘‘अब समझा, अब समझा, हाँ भाई मिला तो, मिला तो, वह वाइस चान्सलर हो गया था।“
‘‘तुम पता यह भी लगाना कि वह अलीगढ़ पावर सेंटर से तो नहीं जुड़ा। मैंने सुना जुड़ा था। वहाँ से जुड़ने के बाद लोग अपना काम भूल जाते हैं और इतिहासकार बन जाते हैं, इतिहास में हिन्दुओं को शास्त्रीय गालियाँ देने की योग्यता अर्जित कर लेते हैं। कोसंबी जैसा विलक्षण प्रतिभा का आदमी अलीगढ़ पावर सेंटर से जुड़ने के बाद अपनी डगर भूल गया था।
मैंने सुना इसने भी रास्ता उधर ही मोड़ लिया था। उस पावर सेंटर का प्रताप ऐसा है कि उसे इतिहास का निर्माता कहा जाता है। उसके कंट्रोलर की महिमा में जो प्रशस्ति ग्रन्थ प्रकाशित हुआ था और जिसमें साम्प्रदायिक पैंतरेबाजी में माहिर सारे इतिहासकारों के लेख थे उसका शीर्षक कुछ ऐसा ही था। इतिहास निर्माता जैसा। इतिहास में केवल यह तलाश कर के कोई ला दे कि हिन्दू इतिहास, हिन्दू समाज, हिन्दू मूल्य कितने गर्हित है, हिन्दू समाज कितना सांप्रदायिक है, हिन्दी और हिन्दुस्तान सांप्रदायिकता से जुड़े हुए पद है, हिन्दी में लिखते हुए भी हिन्दी लेखकों को हिन्दीवाला कहने की आदत पड़ जाय तो उसे बाँस लगाकर उूपर चढ़ा दिया जाता है। उूपर वह चढ़ भी गया, अपना पुलिस का महकमा सँभाल न पाने वाले को उठा कर सर्वाधिकार संपन्न कुलपति बना दिया गया।’’
‘‘तुम विषय से भाग रहे हो और व्यक्तिगत आरोप लगा रहे हो जिसे तुम स्वयं भी अच्छा नहीं मानते।“
‘‘मेरा तो इस ओर ध्यान भी उसी ने दिलाया। उसने अपने ही पत्र के संपादकीय में साहित्य अकादमी के अध्यक्ष को सांप्रदायिक करार दे दिया और बताया कि वह इस पद के योग्य नहीं थे और इसे जोड़ तोड़ से हासिल किया है। तब मुझे सचमुच वह जोड़-तोड़ दिखाई दिया जो इस व्यक्ति ने किया था। अरे भई जोड़ तोड़ की भी अपनी साधना होती है। ये साधक लोग है सिद्धि प्राप्त भी।
”लगातार दस साल तक या कम से कम सौ अंकों तक एक पत्रिका अपने पैसे से निकाल कर वह ऐसे तैसे को भेजता रहा और इस तरह संपर्कसूत्र जोड़ते हुए उन भाषाओं के प्रतिनिधियों तक को पटा लिया जिनको हिन्दी साहित्यकारों से चिढ़ थी। अज्ञेय तक जिसे न पा सके उसे उसने पहली बार पाया। योग्यता इतनी बुरी नहीं। वक्ता अच्छा है, एक विश्वविद्यालय में अध्यक्ष रह चुका है और जैसा मैं पहले कह चुका हूँ संस्थाओं के शीर्ष पदो पर दोयम दर्जे के साहित्यकारों और विद्वानों को या चुके हुए लोगों को ही जाना चाहिए, क्योंकि वहाँ प्रतिभा की नहीं प्रबन्धन की आवश्यकता होती है।
“परन्तु इस आत्मप्रक्षेपण में ही तुम्हारे शोधकर्ता का अपना रहस्य और अपना जोड़तोड़ भी उजागर हो गया। तभी तो कहता हूँ हम जो लिखते या बोलते हैं उसे लोग अपने ढंग से पढ़ते और सुनते हैं और अपने को परदे से ढकने की को शिश में भी लोग अपने को नंगा कर देते हैं।”
‘‘तुम जिसके पीछे पड़ जाते हो…’’
‘‘पीछे मैं नहीं पड़ा। मोर्चे पर तुमने सिपाही को खड़ा कर दिया । इसे तो यह भी पता नहीं कि वह जो नतीजा निकाल रहा था उसका मतलब क्या है?
‘‘मतलब भी तुम्हीं बता दो।’’
‘‘मतलब यह है कि जिस नतीजे पर पहुँच कर भी वह उसका सारा दोष अपनों पर मढ़ देता है, वे सीधे एक नरसंहार के अपराधी हैं जिसके लिए अर्धसैन्य बल को उकसाया गया था। वे यदि स्वतः ऐसा कर बैठे तो उनके विरुद्ध शीघ्र और कठोर कार्रवाई सरकार को करनी थी, उसने उन्हें संरक्षण दिया। उन्हें बचाने का काम किया। अर्थात् पुलिस बल को कांग्रेसी दौर में योजनाबद्ध रूप में सांप्रदायिकत बनाया जाता रहा जिससे सांप्रदायिक समस्या बनी रहे और इसका चुनावी लाभ उठाया जा सके। असहिष्णुता कांग्रेस पैदा करती है और आज भी कर रही है।’’
‘‘बात तो हैरान करने वाली है पर, यार, नतीजा तो यही निकलता है।’’
‘‘देखो, पुलिस बल को अपनी ट्रेनिंग के दौरान कोई ऐसा पाठ नहीं पढ़ाया जाता जिससे उसे सांप्रदायिक बनाया जा सके। यदि पुलिस बल का सांप्रदायीकरण हो गया है तो इसके दो ही कारण हो सकते हैं। उस समाज का सांप्रदायीकरण हो चुका है, जिसमें से पुलिस बल के लोग आते हैं, और अलीगढ़ पावर सेंटर के लिए इतना ही काफी है।
“परन्तु यह सही होता तो उस समय से ही सत्ता दक्षिणपन्थी हाथों में होती जो नहीं थी। वह कांग्रेस को ही वोट दे रही थी। अतः हिन्दु समाज का सांप्रदायीकरण नहीं हुआ था न हुआ है।
“अब दूसरा विकल्प बच जाता है, कि पुलिस बल को सत्ताधारी राजनीति योजनाबद्ध रूप में सांप्रदायिक बना रही थी। उससे कहा तुर्कमान गेट तोड़ दो तो तोड़ने वालों के साथ खड़ी हो गई, मेरठ महियाना या हाशिमपुरा कांड करा दो तो कराने को तैयार हो गई। वह तो हुक्म का इतना ताबेदार है कि सत्ता में बैठा आदमी कहे भैंस खोजने पर जुट जाओ तो भैंस खोजने चल देती है। पकड़े हुए अपराधी को छोड़ने को कहो तो छोड़ कर हाथ साबुन से धोने लगती है कि कहीं अपराधी की गन्ध उसके हाथ न लगी रह गई हो।
“वास्तविक अपराधी का बचाव करने के कारण तुम्हारे शोधार्थी की भी मुरादें पूरी हुईं और अलीगढ़ पावर सेंटर की भी पूरी हुईं, नहीं तो आइ एस की तर्ज पर पहला जघन्य अपराध तो कांग्रेस के प्रशासन में हुआ था और उस समय अलीगढ़ केन्द्र में खामोशी थी और आज वही किसी का ठीकरा किसी के सिर फोड़ता हुआ चीत्कार कर रहा है।
11/17/2015 1:10:54 PM

Post – 2015-11-16

सूच्याग्रा हि अनर्थकाः

“तुम तो गुजरात में जो हुआ उसका भी जिम्मा कांग्रेस पर डाल सकते हो।“
डाल सकता हूँ, पर डालूँगा नहीं।
वह हँसने लगा। डाल सकते हो जरा सुनूँ तो कैसे।
तुम्हे मालूम है बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद अयोध्या में इस बाबरी मस्जिद गिराए जाने के विरोध में साहित्यकारों, पत्रकारों, कलाकारों एक प्रदर्शन हुआ था। उसमें मुझसे भी चलने को कहा गया तो तैयार हो गया। पूछा, ‘टिकट का पैसा किसके पास भेज दूँ।‘ जबाब मिला, ‘उसका इन्तजाम हो गया है।‘ मैंने कहा, ‘उस हालत में मैं नहीं जा सकता, क्योंकि जिस भी ऐजेंसी ने भाड़े की व्यवस्था की है, वह मेरा इस्तेमाल कर रही है।‘ यह आयोजन सहमत ने किया था। स्पे शल ट्रेन का पैसा और उूपर से एक मोटी रकम उसी कांग्रेस ने दिया था जिसके विरुद्ध नुक्कड़ नाटक करते हुए सफदर हाशमी शहीद हुए थे। इसे चिता पर रोटी सेंकना भी कह सकते हो। तुम जानते हो उसके बाद सफदर हाशमी की पत्नी, क्या नाम है उसका, माला हाशमी या जो कुछ भी हो, उसने सहमत से नाता तोड़ लिया था। मुमकिन है बाद में उससे जुड़ भी गई हो। अब सहमत नुक्कड़ नाटकों के लिए नहीं धन्धेबाजी और शगल के लिए जाना जाता है।“
“मैं पूछ रहा हूँ कुछ और तुम बहक गए सहमत की ओर।“
“तो अयोध्या में जो प्रदर्शन हुआ था उसमें रामकथा से सम्बन्धित बहुत सारी सामग्री थी। मेरी अपनी पुस्तक ‘अपने अपने राम’ भी थी। अनर्गल बहुत कुछ था। जोर अनर्गल पर ही था। असल में इसमें प्रतिशोध का भाव था न कि समझ पैदा करने का प्रयत्न । प्रदर्शन का ठीक ठीक रूप क्या था यह मैं नहीं जानता, परन्तु संघ से जुड़े कुछ तत्वों ने वहाँ भारी बखेड़ा किया था। मानबहादुर सिंह ने मुझे बाद में बताया कि यदि मैं वहाँ होता तो मेरी जान भी जा सकती थी। अगर वह आयोजन उसमें भाग लेने वालों के अपने पैसे से हुआ होता और मुझे यह कोई अग्रिम सूचना देता कि वहाँ मुझ पर हमला होगा तो मैं उसके बाद भी उसमें शामिल हुआ होता और यदि मारपीट से पहले कहा-सुनी का मौका मिलता तो उन्हें समझाने का प्रयत्न भी करता कि राम की जो महिमा अपने अपने राम में है वैसा इससे पहले की किसी कृति में नहीं।“
“तुम फिर भटक गए।“
“भटका नहीं हूँ। मैं कह रहा हूँ कि यदि उस प्रदर्शन की प्रतिक्रिया ऐसी उग्रता ले लेती जैसी गोधरा में देखने में आई और उसके बाद इसने भयानक आयाम लिया होता तो उसकी जितनी जिम्मेदारी अर्जुन सिंह पर आती उतनी ही जिम्मेदारी मैं गुजरात के दंगों के लिए मोदी की मानता हूँ।“
बाबरी कांड के दस साल पूरे होने पर स्पेशल ट्रेन में स्वयं सेवक भर कर भेजने की व्यवस्था उन्होंने की थी और वह भीड़ उस तरह की सुशिक्षित भी नहीं थी जो सहमत वाले प्रदर्शन थी। वे जिस तरह के उत्तेजक नारे लगाते हुए घूम रहे थे उसे टीवी पर देख कर मेरा खून खौल रहा था और मैं मैं घबरा रहा था कि इसके परिणाम बहुत अनिष्टकर हो सकते हैं।
“अनियन्त्रित भीड़ संचित उूर्जा का ऐसा भंडार होता है जिसका यदि किसी रूप में उन्मोचन हो वह ध्वंसकारी ही होगा। प्राकृतिक प्रकोप की तरह। यदि किसी तरह की छेड़छाड़ हो जाती तो यह अयोध्या में ही बहुत विकट रूप ले सकता था। गोधरा में इस भीड़ का चरित्र, नारेबाजी या कृत्य क्या था यह पता नहीं, परन्तु गोधरा सांप्रदायिक दृष्टि से संवेदन शील क्षेत्र है।
“एक दुर्घटना हो गई और तुमने पूरे क्षेत्र को संवेदन शील ठहरा दिया।“
“गोधरा में 1947 के बाद1952, 1959, 1961, 1965, 1967, 1972, 1974, 1980, 1983, 1989 और 1990 में दंगे भड़क चुके थे। और यह संभव है कि पेट्रोल आदि पहले से ही जुटा लिया गया हो कि आने पर खबर लेंगे। गोधरा के बाद गुजरात घटित होना ही था।“
चाणक्य का एक सूत्र है, ‘सूच्याग्रा हि अनर्थकाः भवन्ति’ । सुई की नोक जैसी चूक भी बहुत बड़े अनर्थ का कारण बन जाती है। इस बोध को हमारे यहाँ कई रूपों में दुहराया जाता रहा है। जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को अपने किसी भी कथन या कार्य में कितनी सावधानी बरतनी चाहिए यह तो इस सूत्र में है ही। उस चूक के बाद नियन्त्रण आपके हाथ से निकल जाता है, कालदेव आगे के चक्र को सँभाल लेते हैं।“
“फिर आग ए कालदेव पर।“
“कालदेव से मेरा मतलब उन अज्ञात, दृश्य-अदृश्य अनन्त तत्वों से है जिनको चिन्हित या परिभाषित नहीं किया जा सकता।
“तो मैं उस पहली चूक के लिए, जो ही अपने निर्णय और विवेक और नियन्त्रण की सीमा में थी, मोदी को जिम्मेदार मानता रहा हूँ। गुजरात को नियन्त्रित करने में कुछ प्रमाद भी हो सकता है और कुछ सबक सिखाने का भाव भी। यह स्वाभाविक है। लेकिन इसकी तुलना उन दंगों से नहीं की जा सकती जो सोच समझ कर कांग्रेस द्वारा कराए जाते रहे और जिसमें पुलिस या अर्धसैनिक बल किसी की भी मदद ली जाती रही है।“
“तुम तो हद कर देते हो।“
“देखो मध्यकाल में शासकों ने, उनके अमलों ने हिन्दुओं पर बहुत अत्याचार किए, परन्तु कभी सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए। ब्रितानी काल में सारे दंगे अंगे्रजों की खुली या दबी शह पर किए जाते रहे और इसी के बल पर उन्होंने मुसलमानों को यह भी समझा लिया था कि वे तभी तक सुरक्षित हैं जब तक अंग्रेजी शासन है। तुम्हें याद है न सर सैयद ने क्या कहा था।“
“कभी इतने विस्तार से सैयद अहमद को पढ़ा नहीं।“
“उनका मानना था कि यदि भारत को स्वतन्त्रता मिल भी जाय तो यूरोप का कोई दूसरा देश इस पर आक्रमण करके इसे अपने अधीन कर लेगा और किसी अन्य यूरोपीय देश का प्रशासन अंग्रेजी प्र शासन से बहुत कठोर और बुरा है इसलिए अंग्रेजों के अधीन रह कर ही हम प्रगति कर सकते हैं, इसलिए ब्रिटिश सरकार को यहाँ अनन्त काल तक रहना चाहिए।
और कुछ ऐसा ही विश्वास हिन्दूफोबिया पैदा करके कांग्रेस ने मुस्लिम वोट सुनिश्चित करने के लिए पैदा किया और इसको बनाए रखने के लिए दंगे भी कराती रही और यह डर दिखा कर कि हिन्दूशासन से तो यह हर हालत में अच्छा है, इसका जितना लाभ उठा सकती थी, उठाती रही। हम केवल यह जानते हैं 1950 से 1990 के बीच 2500 दंगे हुए थे और उस दौर में शासन कांग्रेस का ही था।
“तुम बातें तो अच्छी गढ़ लेते हो यह जानता था, अब लगता है आँकड़े भी गढ़ लेते हो। कहाँ से मिला यह आँकड़ा।“
“17.12.1990 को टाइम्स आफ इंडिया में संसद में विजय कुमार मल्होत्रा के बयान की रपट में यह दावा था।“
“और तुमने मान लिया?”
“तब तक मानना पड़ेगा जब तक कोई दूसरा अधिक भरोसे का स्रोत नहीं मिल जाता क्योंकि संसद में किसी ने इसका खंडन नहीं किया था।“
“किया भी हो तो टाइम्स आफ इंडिया का उस दौर का संपादक उसे छापता ही नहीं।“
“तुम जानते हो वोटबैंक की राजनीति कौन करता आया है? बाँट कर रखने के हथकंडे कौन अपनाता आया है? दहशतगर्दी करते हुए भी हिन्दू फोबिया उभार कर रक्षक की भूमिका में कौन आता रहा है? नहीं जानते हो तो पता लगाओ। तब पता लगेगा कि अंग्रेजों से बाँटो और राज करो की नीति विरासत में किसने ली, फिर खुद इस नतीजे पर पहुँच जाओगे कि जब तक उसका शासन रहेगा दंगों से, घृणा और दंगे-फसाद से और असुरक्षा के हथकंडों से मुक्ति नहीं मिल सकती।“
“हिन्दू संगठनों का जो चरित्र पहले था उसमें सचमुच इनका चेहरा डरावना बना दिया गया था, परन्तु अब पहली बार एक व्यक्ति ऐसा आया है जो आपसी लड़ाई से आगे विकास की दि शा में ले जाने की बात करता है और उस पहली चूक के बाद उसने आज तक कथनी या करनी के स्तर पर ऐसा कुछ नहीं किया है जिससे उसका यह दावा ढोंग लगे। वही सैयद अहमद के उस सपने को भी पूरा कर सकता है जिसकी ओर तुम्हारा ध्यान न गया होगा।
वह मेरी ओर देखने लगा ।
“उनका मानना था कि हिन्दू और मुसलमान आपसी मेल&जोल से ही अपना अधिकतम विकास कर सकते हैं। वह इसी दिशा में भीतरी और बाहरी दबावों के बीच काम कर रहा है। उसे काम करने दो। आलोचना करो, फतवेबाजी बन्द करो।“

Post – 2015-11-14

इतिहास की गति – 2

“जब तुम कह रहे थे कि किसी परिघटना के असंख्य घटक होते हैं जिनमें से कोई एक न होता तो या तो वह घटित ही नहीं होती या किसी दूसरे रूप में घटित होती तो क्या तुम कुछ लोगों को जिम्मेदारी से बचाने के लिए कह रहे थे?”
“देखो इतिहास को हम पूरी तरह नहीं समझ सकते। मार्क्स जब कहते हैं कि व्यक्ति अपने आप में कुछ नहीं होता वह अपने युग की अभिव्यक्ति होता है या ऐसा ही कुछ तो वह व्यक्ति की भूमिका को नकारते नहीं हैं। यह रेखांकित करते हैं कि वह जो कुछ करता या करने का प्रयत्न करते हुए नहीं कर पाता वह अकेले उसके कारण नहीं होता। इसलिए वह इतिहास की समझ पर जोर देते हैं परन्तु कितने मार्क्सवादी हैं जो इसको समझते या इसका ध्यान रखते हैं। तुम देखो तो अधिकांश तो इतिहास से ही नहीं, उन स्रोतों तक से नफरत करते हैं जिनसे इतिहास को समझा जा सकता है और दूसरे हैं जो उन स्रोतों में ही जहर घोलते हैं कि इतिहास की समझ पैदा ही न होने पाए। तुम्हारे पेशेवर इतिहासकार तो लगातार यही करते आ रहे हैं।“
“तुम अपनी बात कहो, फिर हवाई सफर पर मत निकलो।“
“मैं हवाई सफर नहीं कर रह था न भाग रहा था। कह मात्र इतना रहा था कि मैं जहां से आरंभ कररूंगा उसके पीछे भी बहुत कुछ अदृश्य रह जाएगा।“
“फिर भी।“
“देखो पुरातत्व की एक नियमावली है, एक आचारसंहिता है और उसके संरक्षण के लिए कुछ कानून कायदे हैं, जैसे यही कि 1947 में में पुरातात्विक स्थल जिस भी हालत में था उससे किसी तरह की छेड़ छाड़ नहीं की जाएगी।“
“यह तो मैं भी जानता हूं।“
“इसके अनुसार ही जो मन्दिर, मस्जिद, पहले से पुरातत्व की संपदा है, उसमें पूजा-नमाज़ आदि नहीं होता उसमें पूजा वगैरह नहीं की जाएगी, उसमें कोई सजावट जोड़ तोड़ नहीं की जाएगी, यहां तक कि मरम्मत करते समय भी इस बात कर ध्यान रखा जाएगा कि यह लक्ष्य किया जा सके कि यहां पहले कुछ टूट गया था।“
“यह भी जानता हूं।“
“अब यह बताओ कि किसी देश का राष्ट्रपति ही इसका उल्लंघन करे तो क्या कहोगे?”
“किसकी बात कर रहे हो तुम?”
“फखरुद्दीन अली अहमद की। उन्होंने कहा कि पहले जवानी में मैंने एक बार कुदसिया मस्जिद में नमाज पढ़ा था इसलिए एक बार पढूंगा।“
“यह शुरुआत थी और उसके बाद दिल्ली के ही नहीं दूसरी जगहों पर भी धीरे धीरे दखल बढ़ने लगा और उनमें ढांचागत बदलाव भी किए जाने लगे। पुरातत्व विभाग शिकायत करता तो पुलिस से कोई मदद नहीं मिलती। समस्या को सांप्रदायिक नुक्ते से देखा जाने लगता और वह पीछे हट जाती। यह प्रवृत्ति जिसे धार्मिक मुखौटे वाला अतिक्रमण कह सकते हो बेरोक टोक बढ़ता रहा है यह तुम जानते हो, उसी का यह दूसरा रूप था लेकिन इसकी जिम्मेदारी पुरातत्व विभाग पर नहीं थी।
“जिन दिनों भारतीय पुरातत्व के महानिदेशक पद पर मुनीश जोशी थे उन दिनों यह प्रवृत्ति रोकने के एक कोशिश उन्होंने ने की थी पर कोई नतीजा नहीं निकला। यह बात सबको मालूम थी कि जिसे बाबरी मस्जिद के नाम से उछाला गया उसका नाम मस्जिदे जन्मस्थान था। वह राम मन्दिर तोड़ कर ही बनाई गई थी भले यह सुल्तानी दबदबे का सिक्का जमाने के लिए किया गया हो या मजहबी जुनून में या दोनों इरादों से। उसकी पुरानी तस्वीर पर नज़र डालो तो भी पता चल जाएगा कि यह एक भव्य ढांचे को तोड़ कर उसके मलमे के उूपर बनाई गई थी। तुलसी दास जब ‘मसीत को सोइबो’ की बात करते हैं तो वह यही मसीत है। इसके बाद दहशत का माहौल जारी रहा और लोगों ने घरों के अन्दर पूजापाठ के कोने या अपने अपने मन्दिर बना कर पूजा पाठ शुरू किए जिसका अन्देशा होने पर भी कुछ सिरफिरे घरों में घुस कर उन्हें तोड़ देते थे जिसमा दुखड़ा तुलसी दास रोते दिखाई देते हैं। यह स्थिति अकबर के समय तक बनी हुई थी क्योंकि अकबर स्वयं उदार हो सकते थे उनके अधीनस्थ अधिकारी और सिपहसालार उनके समय में भी अपनी ही करते थे।“
“तुमने उनका वह दोहा पढ़ा है न ‘गोंड़ गंवार नृपाल कलि जवन महामहिपाल’’ कि सिलबट्टे तक को यह कह कर तोड़ देते थे कि इसकी भी पूना की जाती होगी। अयोध्या में रामभक्ति ऐसी कि घर-घर में मन्दिर थे पर कोई सार्वजनिक मन्दिर नहीं। तुलसी तो कलिकाल को दोष देकर सब्र कर लेते थे पर यह बात आम जानकारी में थी कि यह रामजन्मभूमि पर बनी मस्जिद है।
खीझे हुए मुनीश जोशी ने स्वराज्यप्रकाश गुप्त को जो संघ से जुड़े थे और शाखा में भी जाते थे, कहा कि वह राममन्दिर के सवाल को क्यों नहीं उठाते।
“अब फिर क्या था। स्वराज्य प्रकाश गुप्त की पहल थी जिसमें साधुओं संन्तों का वह जमघट और प्रदर्शन लालकिले के सामने हुआ था और इसी के साथ हुआ था विश्वहिन्दू परिषद और का गठन। इसके साथ ही भाजपा पर लद गया था मन्रि का कार्यक्रम, साधुओं का जमघट और राजनीतीकरण और विश्व हिन्दूपरिषद का अभियान
पेशेवर इतिहासकारों ने सर्वविदित और सर्वमानय को सन्दिग्ध बनाने के लिए अपना पूरा जोर लगा दिया। वे ठोस प्रमाण की मांग करने लगे। राम की ऐतिहासिकता का सवाल उठाते रहे। गरज की राम ऐतिहासिक हों तो ही उनका मन्दिर बन सकता है अन्यथा नहीं। ये इतने चालाक लोग हैं कि इन्हें हर मसले को उलझाना आता है और अच्छे अच्छों को मूर्ख बनाना आता है, पर किसी परिघटना को समझते केवल इसक कोण से हैं कि इससे उनको क्या मिलेगा। सवाल पेशे का ठहरा। वे लोगों को मूर्ख बनाते रहे। इसके बाद जरूररत हुई ठोस प्रमाणों की तो
मुनीश ने ब्रजबासी लाल को जो रामकथा से जुड़े स्थलों की खुदाई कर चुके थे इसके सटे पड़ोस में खुदाई का कार्यभार दिया और वहां पुरातात्विक प्रमाण भी निकल आए।
ये उनको भी झुठलाने का प्रयत्न करते रहे। खैर अब तो मामला कोर्ट कचहरी का बन चुका है और उससे हमें मोई लेना देना नहीं।
मैं केवल यह कहना चाहता हूं कि अप्रिय से अप्रिय सत्य को झुठलाने या छिपाने से इतिहास विषाक्त होता है और इतनी समझ जिनमें नहीं है वे चाकरी-पेशा भले करते हों, इतिहासकार नहीं हैं।
“स्वराज्य प्रकाश गुप्त की हैसियत क्या थी? विद्वान थे वह। बहुत अच्छे पुरातत्वविद थे। परन्तु अपनी चाकरी से अलग थे मात्र संघ के स्वयंसेवक। अकेले उनका निर्णय। भाजपा से उनको नफरत के हद तक चिढ़ थी क्योंकि उनका मानना था कि ये लोग राजनीतिक लाभ के लिए कोई समझौता कर सकते हैं। उनके हस्तक्षेप के कारण सन्तसमाज का राजनीतीकरण और विश्व हिन्दू परिषद दोनों का भाजपा के उपर लद जाना कितनी छोटी सी घटना और कितना बड़ा मोड़.
“तुम जानते हो भाजपा की मन्दिर की लड़ाई अकादमिक स्तर पर स्वराज्यप्रकाश गुप्त लड़ते रहे। कम से कम प्रधानता उनकी ही थी।
“अरे भाई वह तो तुम्हारे भी दोस्त थे, रोका क्यों नहीं।“
“मैं तो उनकी शाखा का मजाक उड़ाता था और निकर कल्ट का भी। पर जब तुम्हें कुछ सिखा नहीं पाता तो उन्हें कैसे सिखा पाता।
“यह सब सबाल्टर्न मामला है। कहने में कुछ इधर उधर भी हो जैसा याद रह गया है बता दिया। सकता है। दरयाफ्त करते ठीक कर लेना। अब तुम स्वयं देखो, यदि इनमें से कोई भी कड़ी गुम होती तो घटनाक्रम क्या दिशा लेता। इसलिए इतिहास में किसी को अपराधी सिद्ध कर ना आसान है उसे और अकेले उसे जिम्मेदार मानना गलत है। जब तुम इस तरह व्याख्या करना सीख जाते हो तो जो विषाक्त था उसका विष समाप्त हो जाता है और वह अपराधी स्ख्यं एक निमित्त बन कर रह जाता है।
तोल्स्तोय युद्ध और शान्ति के उपसंहार में यही तो करते हैं जिसमें नैपोलियन महानायक से एक तुच्छ खिलौने में बदल जाता है। मात्र एक निमित्त।
“और ठीक यही बात जो तोल्सतोय कहते हैं गीताकार कहता है जिसमें वह काल प्रवाह में कर्ता को मात्र एक निमित्त मानता और बनने की सलाह देता है। कालोस्मि लोकान्द्वायकृत प्रवृद्ध: लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। भारत में इतिहास भी था और एक गहरा इतिहासबोध भी था, मानोगे?”
“तुम तो निरे भाग्यवादी हो भाई। भाग्यवाद ने इस देश का बेड़ा कितना डुबोया है इसका पता है?”
“मैं नहीं जानता भाग्यवाद की तुम्हारी व्याख्या क्या है, पर मेरी समझ से जो मानता है उसके बस का कुछ नहीं, जो भाग्य में लिखा होगा वही होगा और इस सोच के कारण जिसकी कर्मठता घट जाती है वह भाग्यवादी है। जो मानता है भले हमारे वश में सब कुछ न हो परन्तु हमारे किए ही जो होना है उसके बिना तो उतना भी नहीं बदलेगा जो मैं बदल सकता हूं या बदलने का प्रयत्न करता हूं और इसलिए अधिक तत्परता से, अविचलित भाव से काम करता है, वह कर्मयोगी है। और जो सोचता है मैं जो चाहूं कर सकता हूं, वह जितना भी विद्वान या शक्ति-साधन-सम्पन्न हो, वह उसी अनुपात में प्रचंड मूर्ख है और सत्यानाश की जड़ भी। मैं अपने को दूसरी श्रेणी में गिनता हूं और तुम चाहो भी तो अपने को तीसरी श्रेणी में आने से बचा नहीं सकते।“
11/14/2015 3:42:02 PM

Post – 2015-11-14

इतिहास की गति

“तुम वकील बहुत अच्छे हो सकते थे। सही पेशे का चुनाव करना चाहिए था। मालामाल हो जाते।“
“पेशा करता तो मालामाल तो हो जाता, पर यह क्यों सोच लिया कि सबसे अच्छी चीज पेशा करना और मालामाल होना है।“
उसे छकाने में मुझे बहुत मजा आता है। फतह करने को एक ही चीज है, एक दूसरे का दिल जो जिद के कारण न उसका मेरे हाथ आएगा न मेरा उसके, फिर भी खेल जारी रहेगा। मुझे ही पूछना पड़ा, ‘‘तुमको वकालत वाली बात क्यों सूझी?”
‘‘तुम्हीं ने तो कहा था, मैं जालिम के पक्ष में खड़ा हो रहा हूँ और उसे मजलूम सिद्ध करके रहूँगा और सिद्ध भी कर दिया । मैं खुद कायल हो गया, फिर याद आया तुमने बाबरी के ध्वंस को किस तरह आँखों से ओझल कर दिया। कमाल है न?”
‘‘अगर मैं कहता कि बाबरी मस्जिद कांग्रेस ने गिरवाई, उनको तो मुफत का बदनाम कर दिया, तो तुम्हारी समझ में आता? नादान लोगों को वे ही बातें बताई जाती हैं जो उनकी समझ में आ सकें।“
‘‘तुम कुछ भी कह दोगे मैं मान लूँगा?’’
‘‘नहीं मानोगे, यह पहले से जानता हूँ। सही बात को मानने के लिए भी समझ, यानी सही गलत में फर्क करने की तमीज, चाहिए। हाँ इसमें थोड़ा हाथ तुम लोगों का भी था।’’
‘‘और तुम्हारा?’’
‘‘मैंने बचाने की एक छोटी सी कोशिश की थी, कामयाब नहीं हुआ। गो मैं यह मानता था कि वहाँ पहले कोई मन्दिर था।’’
‘‘और फिर भी तुम चाहते थे, मस्जिद गिराई न जाय?”
‘‘इसलिए कि प्राचीन भारतीय न्यायविचार के अनुसार उसे नहीं गिराया जाना चाहिए था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नियमों के अनुसार उसकी रक्षा की जिम्मेदारी भारत सरकार की था और उसको किसी तरह की क्षति कानून का उल्लंघन था। और हिन्दू रीति के अनुसार उसे गिरा कर मन्दिर बनाने का औचित्य नहीं था। और इस मस्जिद में उस प्राचीन भारतीय वास्तुशिल्प का एक अघ्याय बचा हुआ था जिसका पता इसे ध्वस्त करने वालों को नहीं था। होता भी तो उसका सम्मान नहीं करते।’’
‘‘वह जो तुम पुरानी न्याय विचार की बात कर रहे थे और हिन्दू रीति वगैरह, की बात?’’
‘‘मुझे अधिकारी मान कर मत चलो। जानकारी की बात कर सकता हूँ। हमारे शास्त्रों में क्षेत्राधिकार के विषय में यह विधान रहा है कि अमुक अमुक स्थलों पर किसी व्यक्ति का अधिकार कितने समय तक रहता है। यदि दूसरा ज़बरदस्ती उस पर कब्जा करले तो इतने समय के भीतर उस पर अपने अधिकार का दावा ठोंका जा सकता है। यदि उसके भीतर ऐसा नहीं हो सका तो वह स्थान उसका हो जाएगा, जिसने कब्जा जमा लिया है। यह पंचतन्त्र की एक कहानी में आया है और यह हमारे समय में प्रचलित कालातीत मामलों या टाइम बार्ड मामलों जैसा है। रहा रीति का तो टूटी हुई प्रतिमा या टूटा हुआ देवालय पूजा के योग्य नहीं रख जाता। प्रतिमा बनने से पहले पत्थर था, पत्थर तराश कर प्रतिमा बनने तक भी वह एक कृति था, उसमें जब देव की कल्पना करते हुए उसकी प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है तब वह देवता हो जाता । यही बात देवालय का है। एक बार जो भग्न हो गया उस मन्दिर को बनाना तो संभव नही।’’
‘‘इसमें प्राचीन वास्तुशिल्प के सुरक्षित रहने की बात?”
‘‘कानेरी की गुफाएँ तुमने देखी हों तो उनमें एक पुराना प्रेक्षागृह या नाट्यशाला है। उसकी सबसे बड़ी वि शेषता है उसकी ध्वनि व्यवस्था जिसमें एक कोने की मामूली फुसफुसाहट भी दूसरे कोने तक साफ सुनी जा सकती है। ध्वनिप्रसार की यही व्यवस्था बाबरी मस्जिद में काम में लाई गई थी। इस दृष्टि से यह एक असाधारण विरासत थी जिसकी क्षतिपूर्ति वहाँ कुछ भी बना कर नहीं की जा सकती। परन्तु न तो मस्जिद को बचाने वालों ने कभी इन पहलुओं को उठाया न उस स्थान को वापस माँगने वालों को इसका ज्ञान था। दोनों के आग्रह धार्मिक थे और इसकी ओट में धर्मभावना नहीं शुद्ध राजनीतिक लाभ था।’’
‘‘राजनीतिक लाभ के लिए धर्म का इस्तेमाल धर्म का अपमान है, धर्म को भुनाने या बेच खाने का रूप।’’
मै उससे सहमत था, पर साथ ही जोड़ा, ‘‘पर भाजपा को तो उसमें झोंक दिया गया। यह आग तो कांग्रेस ने लगाई थी और वि श्वास नहीं करोगे, स्वतन्त्र भारत में सबसे पहले इसे नेहरू ने शुरू किया था और वह भी आचार्य नरेन्द्र देव जैसे आदमी को हराने के लिए जिनका वह व्यक्तिगत रूप में आदर भी करते थे, परन्तु वह समाजवादी थे और समाजवादियों से उन दिनों कुछ भय बना हुआ था, इसलिए नेहरू ने इसको इस्तेमाल किया।“
‘‘आचार्य जी हार गए थे?’’
‘‘हारना ही था। और फिर राजीव गांधी ने हिन्दू जनमत को अपनी ओर करने के लिए जो कुछ किया वह तो सबकी जारकारी में है। ऐसी हालत में, एक ऐसा दल जिसका एक मात्र आधार हिन्दू संस्कृति और सम्मान की रक्षा था, यदि सचेत हुआ कि यह तो हमें ही अपने घर से बेदखल किया जा रहा है और अयो ध्या के साथ काशी मथुरा को भी समेट लिया तो यह तो उसकी विवशता थी। आत्मरक्षात्मक कदम। उनकी अपनी योजना इसे गिराने की नही थी, इस मुद्दे को लम्बे समय तक उठाते हुए, मुस्लिम समुदाय को अनुदार सिद्ध करते हुए हिन्दुओं का समर्थन जुटाने की थी. इसे गिराकर स्वयं को उग्र और अनुदार सिद्ध करने की नही थी. इस दुर्घटना से उनका पासा पलट गया। वे धमकी नहीं दे रहे थे, मुस्लिम समुदाय से याचना कर रहे थे। याचना का सम्मान करते हुए यदि इन तीनों स्थलों को सौंप दिया जाता तो मन्दिर की राजनीति खत्म हो जाती। इसमें मुस्लिम समुदाय की छवि उज्ज्वल होती। इस्लाम में बुतपरस्ती निषिद्ध है इसलिए कुरान की पुस्तक या मस्जिद की पूजा नहीं की जाती, नमाज कहीं भी अदा की जा सकती है। कुरान की आयतों का, न कि पोथी का महत्व है, इसलिए जो कट्टर मुस्लिम दे श हैं उनमें भी लोकनिर्माण के कार्यों में अवरोध पैदा करने वाली मस्जिदों को कई बार गिराया गया है। मुस्लिम समुदाय इस पर सहमत होता भी नजर आ रहा था. बाबरी को तो उन्होंने पहले से ही छोड़ दिया था। समुदाय के रूप में वे वे इतने संवेदनहीन भी नहीं थे कि हिन्दू भावना का आदर न करते, परन्तु उकसावे की जो भूमिका पहले ब्रितानी हुक्मरान की थी उसे उत्तराधिकार में तुमने ले लिया था। इस बार उकसाने भड़काने का काम तुमने किया. तुमने धार्मिक भावना को भावना को इतना उग्र कर दिया और इसे मुस्लिम अस्मिता से जोड़ दिया, कयोंकि सांम्प्रदायिक आग भड़काने और बुझाने के अलावा तुम्हारे पास कोई मुद्दा बच ही नही गया है। उनको लाचार हो कर तुम्हारा साथ देना पडा और जब मस्जिद का पतन हुआ तो आहत धर्म-भावना नहीं जातीय अस्मिता हुई, जिसे लेकर मुसलिम समुदाय में गहरा मलाल था, और अब भी है । यह नौबत तुम्हारी वजह से आई थी। भीड़ वि श्व हिन्दू परिषद की थी। आज तक मेरे लिए यह रहस्य है कि गिराने की योजना और उसकी जैसी-तैसी तैयारी किसकी थी। पर यह उस दौर के दृश्य माध्यमों से प्रकट था कि इस सूचना से स्वयं आडवा नी हैरान हो गए थे और फिर ‘चलो छुट्टी हुई वाली मुस्कराहट उनके होठों पर उसी भावभंगिमा के साथ आई थी।
मैंने जो कहा वह सब कहानी है। सबाल्टर्न या इतरेतर इतिहास मान लो। कुछ गलत लगे तो सुधार भी लेना। इसके परिणामो को तो जानते ही हो। कहने का मतलब तोड़-फोड़ उनकी योजना में नहीं थी। भीड़ और भावना का लाभ उठाना चाहते थे। कांग्रेस सरकार ने इसे किसी भी हस्तक्षेप के बिना हो जाने दिया। अब सही अपराधी तय करने चलो तो मुश्किल में पड़ जाओगे।
परन्तु यह जो गोचर है वह उन असंख्य शक्तियों का क्षुद्र अंश है जिनकी दृश्य अदृश्य सक्रियता और संपुंजन से कोई परिघटना मंचित होती है। इस महानाट्य का सूत्रधार इतिहास या कालदेव की अदृश्य योजना है। यदि तुम जानना चाहोगे तो कभी बताउूंगा कि उनमें से कोई भी एक कम हो जाता तो यह घटना घटती ही नहीं या किसी अन्य रूप में घटती। जैसे हमारे म स्तिष्क के क्षुद्र अंश को ही हम जानते हैं जब कि हम जो कुछ करते हैं उसमें उस अवचेतन की भी भूमिका होती है जिसने हमारे मस्तिष्क के अधिकतम क्षेत्र को घेर रखा है पर हम उनकी भूमिका को सही सही जान नहीं सकते, उसी तरह कुछ इतिहास की घटनाओं के साथ भी होता है। हमारे निर्णय और योजनाए धरी की धरी रह जाती हैं और जो घटित होता है वह अक्सर अप्रत्याशित होता है। इसे इतिहास की गति कहो या नियति।
11/13/2015 3:52:35 PM

Post – 2015-11-12

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फिर बीता ज़माना याद आया

“तुम एक बार कहते हो इतिहास को समझे बिना वर्तमान को जाना ही नहीं जा सकता, दूसरी बार कहते हो, इतिहास को वर्तमान में खींच कर मत लाओ। क्या यह उल्टी बात नहीं है?”
“उल्टी इसलिए लगती है कि तुम्हारी खोपड़ी उल्टी है। मैं कहता हूँ इतिहास को जानो, इतिहास को जिओ मत। जीने के लिए वर्तमान ही काफी है। इतिहास सीख लेने के लिए है, वर्तमान जीने के लिए है। भविष्य इन दोनों की सामग्री जोड़ कर सपने देखने के लिए है और तुम जैसे लोग जो इनके बीच-घाल मेल करते हैं, या इन तीनों में से किसी एक से भागते-बचते हैं, वे भाड़ में जाने के लिए हैं।”
“मैं भी इतिहास से सीख लेकर ही कह रहा हूँ, क्या तुम एक ऐसे दल को जिसने बाबरी का ध्वंस किया हो, गुजरात का नरसंहार किया हो, जिसके पास स्वयंसेवकों की इतनी बड़ी फ़ौज़ हो और जिसे रोज कवायद कराकर लड़ने के लिए तैयार रखा जाता हो, उसे तुम शान्तिप्रेमी मान सकते हो? छोड़ दो उस किताब को जो १९३९ में लिखी गई थी, मगर क्या तुम्हें नहीं मालूम कि हिट्लर की जीवनी सबसे अधिक वे ही पढ़ते हैं। उनका गणवेष, सलाम करने का तरीका सब नाजियों से लिया हुआ है। और उनकी मूँछ, खैर सबकी नहीं, पर आडवानी जी की तितली कट मूछ तो सीधे हिटलर से ली गई है यार!”
“तुमने तो इतनी चीजों का घोल बर्तमान में भी बना दिया कि समझ में नहीं आता कहाँ से शुरू करूँ। फिर भी मेरी कद-काठी देख रहे हो न। स्वभाव भी देख रहे हो। यदि मैं तन कर कहूँ मैं शेर हूँ, मुझे मामूली मत समझना, तो डरावना मान लोगे?”
वह हँसने लगा, ‘‘मानूँगा क्यों नहीं, सिंह तो तुम्हारे नाम के साथ ही लगा हुआ है।’’
हँसी में मैं भी शामिल हो गया, ‘‘अब तो कहने को कुछ बाकी रहा ही नहीं। मैं अपनी जबान में बोलूँगा तो तुम्हारी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाएगी।’’
‘‘वह तो तुम आदमी की जबान में बोलते हो तब भी गुम हो जाती है। यह तो उन विरल मौकों में से एक है जब मैंने तुम्हारी सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी है, और बगलें झाँक रहे हो।’’
मैंने पैंतरा बदल दिया, “तुमने इतने सारे सवाल एक साथ उछाल दिए कि मैं सचमुच चक्कर में पड़ गया, इसलिए अब तुमसे ही पूछता हूँ, ‘‘संघ को समर्थन देने वाले कौन हैं? मतलब उसका सपोर्ट बेस क्या है?”
‘‘बनिया-व्यापारी।”
‘‘जब दंगे-फसाद होते हैं तो किसकी दूकानें और असबाब लूटे और जलाए जाते हैं?’’
‘‘जाहिर है जिसकी दूकानें और माल असबाब होंगे उन्हीं के ।’’
‘‘कर्फ्यू लगता है तो किसका कारोबार सबसे अधिक प्रभावित होता है?”
अब वह चौंका, ‘‘तुम साबित क्या करना चाहते हो?’’
‘‘साबित करना यह चाहता हूँ कि यह हाथ जितना भी भाँजे, दंगे फसाद नहीं चाहेगा। इससे पहले भी जैन मत हो या बौद्धमत इनको सबसे जबर्दस्त समर्थन व्यापारियों से ही मिला, क्योंकि वे चाहते थे कि यदि सभी लोग शान्ति का मन्त्र सीख लें तो लूट पाट बन्द हो जाय, वे अपना कारोबार शान्ति से कर सकें और इसलिए कई बार तो उन्होंने अपनी समस्त संपदा इन मतों को दान दे कर स्वयं भी वैराग्य ले लिया और इन मतों में दीक्षित हो गए। इतिहास से इतिहास की आत्मा को ग्रहण करो, उसकी स्पिरिट को ग्रहण करो, उसका चोंगा लबादा नहीं। उसमें तो बार-बार बदलाव होते रहते हैं और जहां कोई किसी दूसरे जैसा होना चाहता है वह उसकी भँड़ैती तो कर सकता है, हो नहीं पाता. शेर की खाल ओढ़ कर शेर दिखने वाले गधे की कहानी तक नहीं पढ़ी तुमने तो। धन्य हो। मार्क्स ने इतिहास की पुनरावृत्ति पर जो कुछ कहा है वह तो याद रखते.’’
लगा बात उसकी समझ में कुछ-कुछ आ रही है।
मैंने वातावरण को कुछ और हल्का बनाने के लिए कहा, ‘‘बुद्ध के बाद यह पहला तो संघ बना यार और तुम इसे भी कोसते रहते हो।’’ और फिर अपनी बात पर आ गया, ‘‘देखो जब बनिया-व्यापारी दंगा फसाद पसन्द नहीं करता तो उसकी पार्टी कैसे चाहेगी। तुमने सुना नही पंजाब में उग्रवादी उभार के दौर में उग्रवदियों ने कई बार संघ की शाखाओं को ही निशाना बना लिया। चलती बसों से सवारियों को उतार कर हिन्दुओं को अलग करके उन्हें गोलियों से भूनते रहे, शादी व्याह में लोग जुटे हुए हैं, एके फार्टीसेवन से निरीह लोगों पर गोलियाँ बरसने लगीं। इतने सारे उकसावों के बाद भी उन्होंने कभी सिक्खों को निशाना बनाया? कम से कम जहाँ हिन्दू बहुमत था, वहाँ तो बना सकते थे। ऐसा नहीं किया, क्योंकि उन्होंने यह होश-हवास कभी नहीं खोया कि कुछ बिगड़े दिमाग के लोगों के लिए पूरी जाति या समुदाय को न तो दोषी माना जा सकता है न ही उपद्रव से हमारा भला होना है, जब कि जैसे-को-तैसा के मुहावरे में इस तरह की प्रतिक्रिया भी किसी उत्तेजक क्षण में पहली क्रिया की तार्किक परिणति ही होती। उल्टे इन्होंने 1984 के दंगों में सिक्खों को जहाँ बचा सकते थे बचाया। बाद में अपराधियों को दंडित करने की माँग में अकाली दल के साथ खड़े हुए। और जानते हो जिस अकाली दल को हाशिये पर डालने के लिए राजीव गांधी ने उग्रवाद को सहारा दिया था, भिंडरांवाले को संत बताया था वही सिक्खों का सही प्रतिनिधि और हितैषी है इसे उन्होंने उस भयानक दौर में भी समझा था, उनकी घ्राणशक्ति तुमसे अच्छी है।“
‘‘तब फिर…” वह एक भूलभुलैया में फँस गया था।
‘‘देखो, संघ का जन्म उस दौर में आत्मरक्षा के लिए हुआ था जब आये दिन साम्प्रदायिक दंगे हो जाते थे। सरकारी तन्त्र दंगों को उकसाता था, दंगाइयों को छूट देता था, इसलिए जान माल का सबसे अधिक नुकसान हिन्दुओं को ही झेलना पड़ता था। इस किंकर्तव्यता की स्थिति में जब कुछ नहीं सूझ रहा था तब हेडगेवार ने इस संगठन की परिकल्पना की थी और नाना जी ने जो संभवतः इसके प्राथमिक सदस्यों में थे, एक बार गर्व करते हुए कहा था, कि संघ की स्थापना के बाद जब मुसलमानों ने हमला बोला तो हम डट कर खड़े हो गए और उन्हें भाग जाना पड़ा। उनको भगा देना इनकी सबसे बड़ी सफलता थी।”
‘‘तुम तो हर चीज को उलट-पलट देते हो। कहीं कोई बात छूट रही है, नहीं तो आज तक तो ऐसा किसी ने कहा ही नहीं।“
‘‘उलटता-पलटता कुछ नहीं हूँ। दूसरे इतिहास के घटकों को राजनीति के ईधन के रूप में देखते हैं और मैं ठहरा मार्क्सवादी इतिहासकार, अकेला मार्क्सवादी यह भी दुहरा दूँ, समय की नब्ज पर हाथ रखने वाला, इसलिए मैं किसी परिघटना के आर्थिक आधार पर पहले नजर डालता हूँ।
‘‘अब तुम्हें यह भी समझ में आ जाना चाहिए कि बात-बात पर उत्तेजित हो जाने वाली जमातें व्यापारिक कारोबार में पिछड़ी भी होती हैं, और न हों तो भी पिछड़ जाएँगी। इसलिए किसी मुसलमान दूकानदार के पास बैठो या हिन्दू बनिये के पास, जबान दोनों की बड़ी सलीस मिलेगी। मीठी, दिल जीतने वाली।
“और अब इसी से यह भी समझ सकते हो कि संघियों का आइ क्यू भले तेज हो, उनमें पढ़े लिखों के लिए न तो आदर है न पढ़ाई लिखाई पर जोर। बल्कि इसे हतोत्साहित किया जाता है।”
‘‘यह क्यों?”
“क्योंकि छोटा बनिया जानता है कि दूकान सँभालने के लिए ज्यादा पढ़ना-लिखना ठीक नहीं। उसके बाद लड़के का दिमाग दूकान-व्यापार में लगेगा नहीं, नौकरी चाकरी पसन्द करने लगेगा और जितना कमाएगा उससे दस गुना वह अपनी कामचलाऊ पढ़ाई से अपने कारोबार से कमा लेगा। पैसा हो तो एक क्या चार पढ़े लिखों को उनकी फीस देकर अपनी सेवा में लगा सकता है।
“लेकिन….” मैं एक मिनट के लिए उसे ताड़ने के लिए रुका. वह सुन रहा था.
“लेकिन छोटी से छोटी बात पर जब वह किसी पढ़े लिखे के सामने दीन भाव से खड़ा होता है तो उसको जो हीनता अनुभव होती है वही संघ से जुड़े बुद्धिजीवियों को विद्वानों के सामने अनुभव होती है।
“उनकी दुर्दशा का रहस्य यही है कि जहाँ वे बेकसूर रहते हैं वहाँ भी तुम उनकी लानत-मलामत करने लगते हो और वे बेचारे अपमान झेलते हुए भी मीठा बोलते रहते हैं कि कभी तो तुम भी यह बात समझ ही जाओगे.”
“तुम विचारों की असहमति पर जान मारने की धमकियाँ देने वालों को, यहाँ तक कि जान मारने वालों को मीठा बोलने वाला कहोग?’’
‘‘पहले यह पड़ताल तो करो कि उनमें से कितने संघ से संबन्ध रखते हैं और कितने छुट्टा संगठनों से या चुटकी बजाते एक संगठन बना कर उनके मुखिया बन जाते हैं।”
‘‘अच्छा यह बताओ, साफ-साफ बताना, तुम्हीं कह रहे थे कि छोटे बनियों की पार्टी है, वे पढ़े लिखे होते नहीं, छोटा बनिया सोचता है फीस दे कर पढ़े लिखों से काम करा लेंगे। और तुमने यह भी कहा था तुम उनके पक्ष में खड़े हो रहे हो, साफ साफ बताना, इसके लिए फीस कितनी मिली है?’’
‘‘चोरों उचक्कों को यह राज नहीं बताया जाता।” मैंने कहा, और दोनों ने एक साथ ठहाका लगाया।

Post – 2015-11-12

फिर बीता ज़माना याद आया

“तुम एक बार कहते हो इतिहास को समझे बिना वर्तमान को जाना ही नहीं जा सकता, दूसरी बार कहते हो, इतिहास को वर्तमान में खींच कर मत लाओ। क्या यह उल्टी बात नहीं है?”
“उल्टी इसलिए लगती है कि तुम्हारी खोपड़ी उल्टी है। मैं कहता हूँ इतिहास को जानो, इतिहास को जिओ मत। जीने के लिए वर्तमान ही काफी है। इतिहास सीख लेने के लिए है, वर्तमान जीने के लिए है। भविष्य इन दोनों की सामग्री जोड़ कर सपने देखने के लिए है और तुम जैसे लोग जो इनके बीच घाल मेल करते हैं, या इन तीनों में से किसी एक से भागते-बचते हैं, वे भाड़ में जाने के लिए हैं।”
“मैं भी इतिहास से सीख लेकर ही कह रहा हूँ, क्या तुम एक ऐसे दल को जिसने बाबरी का ध्वंस किया हो, गुजरात का नरसंहार किया हो, जिसके पास स्वयंसेवकों की इतनी बड़ी फ़ौज़ हो और जिसे रोज कवायद कराकर लड़ने के लिए तैयार रखा जाता हो, उसे तुम शान्तिप्रेमी कैसे मान सकते हो? छोड़ दो उस किताब को जो १९३९ में लिखी गई थी, मगर क्या तुम्हें नहीं मालूम कि हिट्लर की जीवनी सबसे अधिक वे ही पढ़ते हैं। उनका गणवेष, सलाम करने का तरीका सब नाजियों से लिया हुआ है। और उनकी मूँछ, खैर सबकी नहीं, पर आडवानी जी की तितली कट मूछ तो सीधे हिटलर से ली गई है यार!”
“तुमने तो इतनी चीजों का घोल बर्तमान में भी बना दिया कि समझ में नहीं आता कहाँ से शुरू करूँ। फिर भी मेरी कद-काठी देख रहे हो न। स्वभाव भी देख रहे हो। यदि मैं तन कर कहूँ मैं शेर हूँ, मुझे मामूली मत समझना, तो डरावना मान लोगे?”
वह हँसने लगा, ‘‘मानूँगा क्यों नहीं, सिंह तो तुम्हारे नाम के साथ ही लगा हुआ है।’’
हँसी में मैं भी शामिल हो गया, ‘‘अब तो कहने को कुछ बाकी रहा ही नहीं। मैं अपनी जबान में बोलूँगा तो तुम्हारी सिट्टी पिट्टी गुम हो जाएगी।’’
‘‘वह तो तुम आदमी की जबान में बोलते हो तब भी गुम हो जाती है। यह तो उन विरल मौकों में से एक है जब मैंने तुम्हारी सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी है और बगलें झाँक रहे हो।’’
मैंने पैंतरा बदल दिया, तुमने इतने सारे सवाल एक साथ उछाल दिए कि मैं सचमुच चक्कर में पड़ गया, इसलिए अब तुमसे ही पूछता हूँ, ‘‘संघ को समर्थन देने वाले कौन हैं? मतलब उसका सपोर्ट बेस क्या है?”
‘‘बनिया-व्यापारी।”
‘‘जब दंगे-फसाद होते हैं तो किसकी दूकानें और असबाब लूटे और जलाए जाते हैं?’’
‘‘जाहिर है जिसकी दूकानेे और माल असबाब होंगे उन्हीं के ।’’
‘‘कर्फ्यू लगता है तो किसका कारोबार सबसे अधिक प्रभावित होता है?”
अब वह चौंका, ‘‘तुम साबित क्या करना चाहते हो?’’
‘‘साबित करना यह चाहता हूँ कि यह हाथ जितना भी भाँजे, दंगे फसाद नहीं चाहेगा। इससे पहले भी जैन मत हो या बौद्धमत इनको सबसे जबर्दस्त समर्थन व्यापारियों से ही मिला, क्योंकि वे चाहते थे कि यदि सभी लोग शान्ति का मन्त्र सीख लें तो लूट पाट बन्द हो जाय, वे अपना कारोबार शान्ति से कर सकें और इसलिए कई बार तो उन्होंने अपनी समस्त संपदा इन मतों को दान दे कर स्वयं भी वैराग्य ले लिया और इन मतों में दीक्षित हो गए। इतिहास से इतिहास की आत्मा को ग्रहण करो, उसकी स्पिरिट को ग्रहण करो, उसका चोंगा लबादा नहीं। उसमें तो बार बार बदलाव होते रहते हैं और जहां कोई किसी दूसरे जैसा होना चाहता है वह उसकी भँड़ैती तो कर सकता है, हो नहीं पाटा. शेर की खेल ओढ़ कर शेर दिखने वाले गधे की कहानी तक नहीं पढ़ी तुमने तो। धन्य हो। मार्क्स ने इतिहास की पुनरावृत्ती पर जो कुछ कहा है वह तो याद रखते.’’
लगा बात उसकी समझ में कुछ कुछ आ रही है।
मैंने वातावरण को कुछ और हल्का बनाने के लिए कहा, ‘‘बुद्ध के बाद यह पहला तो संघ बना यार और तुम इसे भी कोसते रहते हो।’’ और फिर अपनी बात पर आ गया, ‘‘देखो जब बनिया-व्यापारी दंगा फसाद पसन्द नहीं करता तो उसकी पार्टी कैसे चाहेगी। तुमने सुना नही पंजाब में उग्रवादी उभार के दौर में उग्रवदियों ने कई बार संघ की शाखाओं को ही निशाना बना लिया। चलती बसों से सवारियों को उतार कर हिन्दुओं को अलग करके उन्हें गोलियों से भूनते रहे, शादी व्याह में लोग जुटे हुए हैं, एके फाॅर्टीसेवन से निरीह लोगों पर गोलियाँ बरसने लगीं। इतने सारे उकसावों के बाद भी उन्होंने कभी सिक्खों को निशाना बनाया। कम से कम जहाँ हिन्दू बहुमत था वहाँ तो बना सकते थे। ऐसा नहीं किया, क्योंकि उन्होंने यह होश-हवास कभी नहीं खोया कि कुछ बिगड़े दिमाग के लोगों के लिए पूरी जाति या समुदाय को न तो दोषी माना जा सकता है न ही उपद्रव से हमारा भला होना है, जब कि जैसे को तैसा के मुहावरे में इस तरह की प्रतिक्रिया भी किसी उत्तेजक क्षण में पहली क्रिया की तार्किक परिणति ही होती। उल्टे इन्होंने 1984 के दंगों में सिक्खों को जहाँ बचा सकते थे बचाया। बाद में अपराधियों को दंडित करने की माँग में अकाली दल के साथ खड़े हुए। और जानते हो जिस अकाली दल को हाशिये पर डालने के लिए राजीव गांधी ने उग्रवाद को सहारा दिया था, भिंडरांवाले को संत बताया था वही सिक्खों का सही प्रतिनिधि और हितैषी है इसे उन्होंने उस भयानक दौर में भी समझा था, उनकी घ्राणशक्ति तुमसे अच्छी है।“
‘‘तब फिर…” वह एक भूलभुलैया में फँस गया था।
‘‘देखो, संघ का जन्म उस दौर में आत्मरक्षा के लिए हुआ था जब आये दिन साम्प्रदायिक दंगे हो जाते थे। सरकारी तन्त्र दंगों को उकसाता था, दंगाइयों को छूट देता था, इसलिए जान माल का सबसे अधिक नुकसान हिन्दुओं को ही झेलना पड़ता था। इस किंकर्तव्यता की स्थिति में जब कुछ नहीं सूझ रहा था तब हेडगेवार ने इस संगठन की परिकल्पना की थी और नाना जी ने जो संभवतः इसके प्राथमिक सदस्यों में थे, एक बार गर्व करते हुए कहा था, कि संघ की स्थापना के बाद जब मुसलमानों ने हमला बोला तो हम डट कर खड़े हो गए और उन्हें भाग जाना पड़ा। उनको भगा देना इनकी सबसे बड़ी सफलता थी।”
‘‘तुम तो हर चीज को उलट पलट देते हो। कहीं कोई बात छूट रही है, नहीं तो आज तक तो ऐसा किसी ने कहा ही नहीं।
‘‘उलटता-पलटता कुछ नहीं हूँ। दूसरे इतिहास के घटकों को राजनीति के ईधन के रूप में देखते हैं और मैं ठहरा मार्क्सवादी इतिहासकार, अकेला मार्क्सवादी यह भी दुहरा दूँ, समय की नब्ज पर हाथ रखने वाला, इसलिए मैं किसी परिघटना के आर्थिक आधार पर पहले नजर डालता हूँ।
‘‘अब तुम्हें यह भी समझ में आ जाना चाहिए कि बात बात पर उत्तेजित हो जाने वाली जमातें व्यापारिक कारोबार में पिछड़ी भी होती हैं, और न हों तो भी पिछड़ जाएँगी। इसलिए किसी मुसलमान दूकानदार के पास बैठो या हिन्दू बनिये के पास, जबान दोनों की बड़ी सलीस मिलेगी। मीठी, दिल जीतने वाली।
“और अब इसी से यह भी समझ सकते हो कि संघियों का आइ क्यू भले तेज हो, उनमें पढ़े लिखों के लिए न तो आदर है न पढ़ाई लिखाई पर जोर। बल्कि इसे हतोत्साहित किया जाता है।”
‘‘यह क्यों?”
“क्योंकि छोटा बनिया जानता है कि दूकान सँभालने के लिए ज्यादा पढ़ना-लिखना ठीक नहीं। उसके बाद लड़के का दिमाग दूकान-व्यापार में लगेगा नहीं, नौकरी चाकरी पसन्द करने लगेगा और जितना कमाएगा उससे दस गुना वह अपनी कामचलाऊ पढ़ाई से अपने कारोबार से कमा लेगा। पैसा हो तो एक क्या चार पढ़े लिखों को उसकी फीस देकर अपनी सेवा में लगा सकता है।
“लेकिन।
“लेकिन छोटी से छोटी बात पर जब वह किसी पढ़े लिखे के सामने दीन भाव से खड़ा होता है तो उसको जो हीनता अनुभव होती है वही संघ से जुड़े बुद्धिजीवियों को विद्वानों के सामने अनुभव होती है।
“उनकी दुर्दशा का रहस्य यही है कि जहाँ वे बेकसूर रहते हैं वहाँ भी तुम उनकी लानत मलामत करने लगते हो और वे बेचारे अपमान झेलते हुए भी मीठा बोलते रहते हैं कि कभी तो तुम भी यह बात समझ ही जाओगे.”
“तुमने विचारों की असहमति पर जान मारने की धमकियाँ देने वालों को, यहाँ तक कि जान मारने वालों को मीठा बोलने वाला कहोग?’’
‘‘पहले यह पड़ताल तो करो कि उनमें से कितने संघ से संबन्ध रखते हैं और कितने छुट्टा संगठनों से या चुटकी बजाते एक संगठन बना कर उनके मुखिया बन जाते हैं।”
‘‘अच्छा यह बताओ, साफ-साफ बताना, तुम्हीं कह रहे थे कि छोटे बनियों की पार्टी है, वे पढ़े लिखे होते नहीं, छोटा बनिया सोचता है फीस दे कर पढ़े लिखों से काम करा लेंगे। और तुमने यह भी कहा था तुम उनके पक्ष में खड़े हो रहे हो, साफ साफ बताना, इसके लिए फीस कितनी मिली है?’’
‘‘चोरों उचक्कों को यह राज नहीं बताया जाता।” मैंने कहा, और दोनों ने एक साथ ठहाका लगाया।

Post – 2015-11-11

काश पूछो की मुद्दआ क्या है

देश का हमने क्या अहित किया है इसका हिसाब तो कल लूँगा, परन्तु तुम करना क्या चाहते हो?
उस दहशत को, उस हिन्दू फोबिया को दूर करना जिसे अंग्रेजों ने मुस्लिम असुरक्षा की चिंता दिखाते हुए धार्मिक अलगाव को साम्प्रदायिक घृणा में बदल कर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित की और हमें लड़ाते हुए अपने हित साधते रहे और हुआ यह उसी देश में जिसमें बिल्ली और बन्दरबांट की कहानी हजार डेढ़ हजार साल पहले से अनपढ़ों तक की जबान पर थी। तुमने अपने चुनावी हितों के लिए हिन्दू फोबिया लगातार उभारते हुए जिन्दा रखा जो ही उन सामाजिक समस्याओं की जड़ है जिन्हें लेकर इतनी छटपटाहट दिखाई दे रही है। तुम किसी व्याधि को उकसाओगे भी और उसी से चिंतित भी रहोगे दोनों एक साथ तो नहीं हो सकता। इस दहशत को जितनी बेशर्मी से तुमने उभारा है उतनी बेशर्मी से अंग्रेजों ने भी नहीं किया था, क्योंकि उनमें प्रशासनिक परिपक्वता थी। मैं उस दहशत की जड़ों की पड़ताल करते हुए उसे दूर करने का प्रयत्न कर रहा हूँ । कर पाऊँगा या नहीं यह नहीं जानता।“
“तुम्हें आरएसएस दूध की धुली संस्था लगती है।“
“यार दूध की धुली चीज़ में तो बदबू आने लगेगी, अपने को भी मत धोना दूध से। पानी ही काफी है। धोने पखारने की नही, उसकी सीमाओं और संभावनाओं को नए सिरे से समझने की कोशिश करो। तुम मेरी बात सुनोगे भी या नहीं, नहीं जानता, क्योंकि यह एक दुष्चक्र का, एक विशस सर्कल का रूप ले चुका है जिसमें कोई अवलेप से मुक्त नहीं है।”
“उससे सावधान रहने, डरने की कोई आवष्यकता नहीं।“
“मैं जानता हूँ तुम और ऐसे करोड़ों लोग उस अवस्था में हैं जिसे पुराने लोग वशीकरण और उच्चाटन मन्त्रों का प्रभाव कहते थे. ये किसी एक के विविध रूपों में निरंतर निंदा अथवा प्रशंसा से उत्पन्न अवस्थाएँ हैं जिनमे जो कण में लगातार भरा गया है और उसे ग्रहण करने की अनुकूल परिस्थितियां भर्त्सना, उपेक्षा, तिरस्कार अथवा अनुमोदन, प्रशंसा और पुरष्कार द्वारा तैयार की जाती हैं उनमे कुछ बातों को सुनना तक सम्भव नहीं हो पता, समझना तो दूर की बात है, वही कुछ को उस नाम से जुड़ जाने के कारण हम मुग्ध भाव से स्वीकार कर लेते हैं. मुग्ध का अर्थ मूर्ख होता है यह तो जानते हो न।”
“नहीं जानता हूँ तो तुम्हे देख कर जान लूँगा।” उसने चुटकी ली।
“नहीं जान पाओगे. मैं आईना दिखाता भर हूँ पर आईना तो हूँ नहीं।” मैंने कुछ चिंतित दीखते हुए कहा, ”तुम धुले हुए मस्तिष्क के आदमी जो ठहरे।”
वह इसे अपनी प्रशंसा मान कर प्रसन्न हो गया, पर जब आगे कहा, “तुम्हारी ब्रैनवॉशिंग पूरी हो चुकी है। हमारी शिक्षा-प्रणाली जिनके हाथों में रही है, उन्होंने लम्बे समय से यही किया है।” तो उसकी हालत देखने लायक हो गई।
मैंने विषय को मोड़ दिया, “मैं जब अपने बच्चों के पास अमेरिका में था तो फुर्सत रहती थी इसलिए टीवी भी देखता था। वहाँ कुछ शिक्षा के बड़े रोचक कार्यक्रम देखने को मिले। एक था डर और घृणा से लड़ने पर। जिन जानवरो, कीड़ों मकोड़ों से हम डरते हैं या देख कर ही भन्ना उठते हैं उनको वे छोटे बच्चों की हथेली पर ही रख देते थे। वे कुछ नहीं करते। इससे ही साहस पैदा होने पर तुमने कई बार हिंस्र जानवरों को या साँपों को भी पालने, उनको अपने शरीर पर रेंगने देने के घरेलू दृश्य देखे होंगे।
“हाँ देखे तो हैं। परन्तु क्या वहाँ जानवरों को पिजड़े में रखने पर रोक नहीं हैं?”
“नहीं, उस तरह की मूर्खतापूर्ण रोक नहीं है जिस तरह की रोक उनकी ही नक़ल पर जानवरों के प्रति क्रूरता की नकली समझ के कारण हमारे यहाँ लगा दी गयी। जीव-जंतुओं के प्रति जिज्ञासा बढ़ती, प्रेम बढ़ता है, और उनसे दूर रहने पर निष्ठुरता न भी आये, उदासीनता और असुरक्षा का भाव तो पैदा होता ही है। अन्य सामानों की तरह जानवर भी बिकते हैं। जब चाहो खरीद कर ला सकते हो। पर उसके बाद उनकी देखभाल में असावधानी बरती गई तो उसकी जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है। शिकायत मिलने पर सजा भी मिलेगी। निकट परिचय से भय दूर हो जाता है। अपरिचय एक तरह का अन्धकार है और जैसे अँधेरे से डर लगता है कि पता नहीं उसके भीतर कहाँ क्या छिपा बैठा हो, उसी तरह अपरिचय की स्थिति में लगता है कि अगला पता नहीं कब धोखा देदे और क्या कर बैठे।“
वह सहमत हुआ, “हाँ यह बात तो है”
मैंने अपनी बात जारी रखी, “हम शत्रु देशों से भी अच्छे सम्बन्ध बनाने के लिए लगातार उनके साथ बात करते हैं, उनके दृष्टिकोण को समझने का प्रयत्न करते हैं और वही काम हम अपने ही समाज के भीतर नहीं कर सकते इससे दुर्भाग्यपूण बात क्या हो सकती है।“
“बात तो अपनी जगह सही लगती है।“ उसने अनमने ढंग से हामी भरी.
मैंने उसकी खबर लेते हुए जड़ा, “और इस अस्पृश्यता के जनक तुम हो। तुम से मतलब वह शिक्षा प्रणाली जिसने वैचारिक असहिष्णुता और अस्पृश्यता को पैदा किया, बढ़ावा दिया और खुद ही रोना रो रही है कि वैचारिक असहिष्णुता बढ़ रही है और दोष दूसरों के मत्थे डाल रही है। ‘कर के खुद क़त्ल अब वह खुद हमीं से पूछते हैं, ये काम किसने किया है, ये काम किसका है?”
वह अपनी से बाज तो आ नहीं सकता, “तुमने ‘वी आर अवर नेशनहुड डिफाइन्ड’ पढी है।”
“तुमने अपनी आँखों से कुछ देखा है?
“मैंने जो पूछा उसका जवाब तो दिया नहीं।”
“मैंने अभी हाल ही में पढ़ी है। तुम उसे पढ़ नहीं सकते क्योंकि तुम्हे पढ़ने भी नहीं आता. तुम फ़िक़रे तलाशते हो जो रोड़े पत्थर की जगह ज़बानी जंग में काम आ सकें।”
वह उत्सुकता से देखने लगा तो अपने स्वर को कुछ संयत करते हुए कहा, “देखो कोई लिखित या कथित बात हवा में नहीं होती। उसका एक सन्दर्भ होता है। उसका अर्थ और प्रभाव उस सन्दर्भ से ही निर्धारित होता है। तुमने शब्दों को देखा होगा, सन्दर्भ का ध्यान न रखा होगा। यह पुस्तक १९३९ में लिखी गई थी। उस समय बहुत काम लोग थे जो होश हवास में बातीं कर रहे थे। यह सिलसिला बहुत पहले शुरू हो गया था. १९२1 में ही जब खिलाफत आंदोलन के बाद पुस्कार में, अंग्रज़ों की कूटनीतिक चातुरी से मोपला विद्रोह का नज़राना मिला था, जिसमे हिन्दुओं को इतने बड़े पैमाने पर मारा गया था की गांधी जी तक ने कहा था उन्हें भी मारना चाहिए था। जब १९२३ में उसी मुहम्मद अली ने जिन्हे गांधी जी ने मुसलामानों का नेता माना था, कांग्रेस के मंच से कहा था, एक गिरा से गिरा हुआ मुसलमान गांधी से अच्छा होता है। जब इक़बाल जैसा शायर कहा रहा था, “न सँभलोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तान वालो, तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दस्तानों में’, इतना ही नहीं, ऎसी खून खौलाने वाली पंक्तियाँ तक कि “मुहब्बत का जुनूँ बाक़ी नहीं है, मुसलामानों में खूँ बाक़ी नहीं है।’ जब चौधरी रहमत अली का पाकिस्तान का खाका मुस्लिम लीग के ज़हन में उतर आया था और उत्तर प्रदेश की पहली सरकार को मुस्लिम लीग के अड़ंगों के कारण भंग होना पड़ा था और मुस्लिम लीग दंगे भडकाने वाले मुहावरों में धमकियां देने लगी थी और यह ऐलान करने लगी थी कि हिन्दुओं के साथ मिलकर मुसलमान रह ही नही सकते और कम्युनिस्ट पार्टी के मुस्लिम नेता दबे सुर में लीग के मुहावरे अपनाने लगे थे और उन्हें साथ रखने के लिए दूसरे भी रंग बदलने लगे थे। इतिहास को इतिहास में जाकर समझा जाता है, वर्तमान में घसीट कर नहीं। मैं इनमे से किसी को दोष नहीं देता, परन्तु तुम से भी यह चाहता हूँ कि कोई बात पूरे सन्दर्भ को सामने रख कर समझो और आज जब मैं इस समस्या के हल के लिए आज के सन्दर्भ में सवाल खड़े कर रहा हूँ तो जड़बुद्धि की तरह १९३९ के सन्दर्भ को मत रखो। वर्तमान से इतिहास में तुम लोग भागते हो, क्योंकि तुम वर्तमान का सामना नही कर सकते. बहुत अनर्थ किये हैं तुमने। अब उनसे बाहर निकलने के रास्ते तलाशने में मदद करो।