Post – 2017-01-22

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 19

मैं तुलसी की महिमा या क्रान्तिकारिता बखानने के लिए उनका जिक्र नहीं कर रहा था। प्रशंसा में ‘क्रान्तिकारी’ विशेषण लगा दिया फिर चर्चा उधर मुड़ गई । एक शब्द पूरी चर्चा हो और पेटी में उगा मामूली सा कास या कहीं टिक गया एक पत्थर नदी की धार को मोड़ देता है । दार्शनिक चर्चा में सटीक प्रयोगों और प्रयुक्त शब्दों के सटीक आशय पर और न्याय विचार में तो विराम और अर्धविराम तक पर इसीलिए इतना बल दिया जाता है।

तुलसी महाकाव्‍य लिखने के कारण ही नहीं महाकवि हैं, वह कई दृष्टियों से विशद हैं, कोपियस। उनके लेखन में अपना जीवन, समाज का जीवन, अपनी पीडा, समाज की पीड़ा बहुत कुछ है जिस पर ध्यान नहीं दिया गया, या दिया गया तो उसे सही ढंग से रेखांकित नहीं किया गया, क्योंकि हम अपने मन्तव्य को हीटर की आंच देकर सेते रहे कि इससे जल्द चूजा निकलेगा। वह जल कर आमलेट के काम का भी नहीं रह गया।

तुलसी का बहुत बारीकी से अध्ययन करें तो उससे उन गुत्थियों को भी समझा जा सकता है जिनको टालू ढंग से निपटाया गया और इसलिए बहुत सारी ग्रन्थियां और सामाजिक समस्यायें पैदा हुईं। जिन दिनों बाबरी का ध्वंस नहीं हुआ था, उस पर विवाद चल रहा था, मेरे मन में कोई संशय न था कि वहां राममंदिर था। फिर भ्‍ाी मैं बाबरी मस्जिद को गिराने का विरोधी था और उसे बचाने के लिए जो तरीके
अपनाये जा रहे थे उनका भी विरोधी था और एक साल पहले कहा था कि यदि यही तरीका अपनाया गया तो यह ढांचा गिर कर रहेगा।

इसके ब्यौरे में यहां जाना ठीक न होगा, इसे उस समय प्रकाशित अपने दो लेखों – धर्मनिरपेक्षता का उन्माद और सांप्रदायिकता की महाव्याधि – में मैंने समुचित विस्तार से दिया था। पर जिस कारण तुलसी के प्रसंग में यह याद आया वह यह कि उस समय मस्जिद कमेटी के लोंगों द्वरा तर्क दिया जा रहा था कि उस जगह पहले कोई मन्दिर नहीं था यदि रहा होता तो तुलसी ने इसका उल्लेख अवश्‍य किया होता, उस समय मुझे यह खलता था कि इस आधार पर तो बाबरी मस्जिद को बचाया ही नहीं जा सकता । सचाई यह है कि जिन कारणों से मैं इस विषय में सुनिश्चित था कि वहां पहले राम का जन्‍मस्‍थान मंदिर था उनमें एक, मेरे लिए सबसे विश्‍वसनीय, कारण तुलसीदास का एक प्रयोग ही था।

यदि मध्यकालीन जबांबन्दी के बीच दबे सुरों और संकेतों को कोई पढ़ नहीं सकता तो वह तुलसी के उस आर्तनाद को नहीं समझ सकता जिसका सही अनुमान हमें है ही नहीं! वह व्यग्र आत्मा, बेचैन, व्यक्तिगत पीड़ा से नहीं, उस सामाजिक असुरक्षा और अधोगति से जिसके निवारण के लिए वह एकल संग्राम करता है, पर विवश अनुभव करता है- कबहुं न नाथ नींद भरि सोयो!

इतने कम और इतने सादे ढंग से अपनी तड़प, अपने आजीवन संघर्ष, और अपने असन्तोष को व्यक्त करने की क्षमता बहुत कम कवियों में देखने को मिलेगी। इस भाषा को, इस वेदना को समझने के बाद ही हम समझ सकते है कि ‘‘मसीत को सोइबो’’ का अर्थ क्या है। यह कोई एक मस्जिद नही, वही मस्जिद है जिसे रामजन्मभूमि मन्दिर कहा जाता था और जिसके कारण ही बाद तक इसके दो नाम थे। एक राम से जुड़ा दूसरा बाबर से जुड़ा।

जो लोग रामचरित मानस का जाप करते हैं, उसके दोहों, चैपाइयों के चित्र खींचते और विचित्र पाठ करते हैं उनमें से कितनों ने रामचरित मानस को लिखने की प्रेरणा, व्यग्रता और दृढ़ निश्‍चय को जानते हैं। ‘मसीत को सोइबो’ और इसी कारण ‘जोलहा कहो कोऊ’ में एक स्वीकारोक्ति है, विवशता है और उसके पीछे एक दर्प और विश्‍वास है और इस अनुभव के पीछे ही वह संकल्प है कि मैं इसको बदलूंगा, इससे मुक्ति दिला कर रहूंगा। विनम्र संकल्प जो आजीवन बना रहता है, ऐसी हठ जैसे गांठ पानी परे सन की ।

इसी के बल पर तुलसी वह कह सके जिसे कहने का साहस मध्यकाल में किसी और के पास न था और वह कर सके जिसे करने का बोध और विवेक किसी अन्य में न था और इसी कारण मध्ययुग की तो न कहूंगा पर अंशतः मध्ययुग की, विशेषतः अकबर काल की हिन्दुओं की पीड़़ा के सांकेतिक चित्रण तुलसीदास में मिलते हैं, उतने किसी अन्य कवि ही में नहीं मिलते, किसी अन्य स्रोत से नहीं मिलते।

और इसी से यह भी पता चलता है कि हिन्दुओं का मध्यकाल में धर्मान्तरण किन परिस्थितियों में हुआ और क्यों वे मुसलमान बन जाने के बाद भी हिन्दू बने रहना चाहते थे, या हिन्दू मूल्यों, मानों और आदर्शों को निभाना चाहते थे। कोई समझना चाहे तो इसी से तुलसी के पूर्ववर्ती कबीर का भी निदान हो जाता है कि क्यों वह मुस्लिम परिवार में पैदा हो कर जिस नए पंथ की बात कर रहे थे वह हिन्दू आदर्शों और प्रेरणास्रोतो, वाग्विधानों से लैस है ? क्यों इस बोध ने कि हम कुछ भी कर लें, हिन्दु समाज हमें अपना नहीं सकता, अपना एक अलग समाज हम बनाना चाहें भी तो वह लचर ही रह जाता है वह विवशता पैदा की कि रहना जिस समाज में है उसकी अपेक्षाओं पर पूरा उतरने के लिए हमें वह करना होगा ि‍जिसकी मांग वे हमसे करते हैं। इसमें गोकुशी भी थी और अपने ही बन्‍धुओं से जिनसे वे भीतरी लगाव अनुभव करते थे उनके प्रति अत्‍याचार भी।

इस्लामीकरण की प्रक्रिया और धर्मान्तरित मुसलमानों की विवशता, गंगाजमुनी संस्कृति के निर्माण और नवधर्मान्तरित अभिजात हिन्दुओं की कट्टरता, इन समस्याओं को समझने में जितनी महत्वपूर्ण भूमिका तुलसीदास की है वैसी किसी काल के किसी कवि की नहीं। मध्‍ययकालीन प्रशस्तिलेख्‍ान करने वालों की भी नहीं जिसे मध्‍यकालीन इतिहास कहा जाता रहा। आज के भी किसी कवि की नहीं क्योंकि आज के लेखक वह आग बेच कर बड़ा बनने के चक्कर में पड़े रहे जिसे जिसे जिलाए रखने के और इस बात के प्रयास में जल कर राख बन जाने के कारण ही वह विभूति बनता है। वे सब कुछ पाना चाहते हैं, संभूति भी, विभूति भी
और कूडे की ढेर में बदल जाते हैं, यही त्रासदी है इस क्षण की।

हम अपनी बात पर आएं, हिन्दुओं के इस्लामीकरण की प्रक्रिया को समझने की। हमें समझाया जाता रहा कि वर्णव्यवस्था से उत्पीड़ित जनों ने इस्लाम ग्रहण किया, इसे पहले गलत सिद्ध कर चुका हूं। तलवार के जोर पर या बलप्रयोग से हिन्दुओं को मुसलमान बनाया गया यह पूरा सच नहीं है, इसको सत्ता समर्थित धार्मिक उद्दंडता से समझा जा सकता है।

यदि अकबर तक के शासनकाल में मुस्लिम उचक्के घरों के भीतर घुस कर सिल बट्टों को, चक्‍की और जांत को, कहें पत्थर के किसी उपकरण को मूर्ति मान कर तोड़ सकते थे तो पूरे मध्यकाल की सचाई को समझने में यह विवरण उपयोगी होगा। इस उचक्कापन में ऐसे पेशों के लोगों के घर में बना सामान – सूत, कपड़ा, रंगा हुआ वस्त्र लुटने लगे तो जुलाहों और रंगरेजों को तो मुसलमान बनना ही था।

अकाल इस देश में मौसमी विपर्यय के कारण आते ही रहे हैं, अब नितान्त असह्य स्थिति में अन्न के अभाव मे यदि फीरोजशाह तुगलक की तरह पूरे शहर में भूखों को मुफ़त भोजन देने के लिए जगह जगह व्यवस्था करे तो , उसमें वे जो अकाल दुकाल में अपने बेटों बेटियों को बेचने को विवश हो जाते रहे हों वे बिके हुए बच्चे और उसके बाद विवशता में मुसलमानी खाना खाने के बाद अपने ही आकलन में वे हिन्दू नहीं रह जाते थे उनकी ओर ध्‍यान नहीं दिया गया ।

फिर भी हिन्दू न रह पाने की पीड़ा उन्हें हिंदू रीतियों, पर्वों और समारोहों से तो जोड़ता ही था इस्लाम की ‘पवित्रता’ को भी नष्ट करता था! और वर्णव्यवस्था के अभिमानी हिन्दुओं के इस्लाम में किन्हीं अवांछनीय या अकथनीय कारणों से धर्मान्तरित होने के बाद या अपने घर वापसी का दरवाजा बन्द देख कर कट्टर और हिन्दूद्रोही चरित्र अपनाने के भी संकेत मिल जाएंगे। अन्तिम का उदाहरण तो स्वयं तुलसीदास हैं जिन्हें पुरातनपंथी ब्राह्मणों के हाथों जितना अपमान सहना पड़ा उससे उद्विग्न हो कर यदि वे सचमुच जोलहा हो गए होते तो ऐसे लकीर के फकीर लोगों के प्रति अपने आक्रोश में वह क्या नहीं कर सकते थे।

परन्तु तुलसी से जो एक बात प्रकट होती है वह यह कि मध्यकाल में धार्मिक टकराव था, अपनी रक्षा की चिन्ता थी, अपने प्रसार की विफलता का पराजयबोध भी रहा होगा, परन्तु समुदायों के प्रति आपसी घृणा नहीं थी। एक विचित्र बात यह कि जिस हिन्दुत्व से इस्लाम परस्तों का टकराव था उसके उन मूल्यों के प्रति उनके मन में सम्मान था, यहां तक कि सती प्रथा तक के प्रति, जिनको समझने से परहेज करके हमारे बुद्धिजीवी अपनी पवित्रता की रक्षा करते हैं।

Post – 2017-01-21

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास -१८

‘‘तुम्हारी बात कभी पूरी होने पर आती ही नहीं। इतने दिनों से तुलसी चरित बखान रहे हो! कल सोचा आज मुक्ति मिलेगी पर चलते चलते कह गए, ‘‘बाकी कल! अरे भई, जब सांस्कृतिक मोर्चे का अ‍‍द्वि‍तीय योद्धा कह दिया तो कहने को कुछ बाकी रह गया। आरती उतारने के बाद भी भजन बाकी रह गया!’’

‘‘बाकी इस बात से सावधान करना रह गया था कि आकाश को तुम फीते से नहीं नाप सकते, उसके लिए प्रकाषवर्षों की ही जरूरत नहीं होती, तुमने अब तक जितने संख्या मान कल्पित कर रखे है, कल्पित इस लिए कह रहा हूं कि हमारे अरब, खरब, पद्म, महापद्म, शंख, महाषंख, समुद्र आदि की कल्पनाओं का भौतिक जीवन में उपयोग तो था नहीं, इनकी कल्पना संभवतः खगोलीय गणना के लिए भारतीय ज्योविर्वैज्ञानिकों ने की थी। इन्हें आज के वैज्ञानिक मानों ने अपर्याप्त मान कर बौना कर दिया है, तो प्रकाश वर्ष की बात तो हम सोच ही नहीं सकते थे, हमने तो देववर्ष और अधिक से अधिक ब्रह्मा के दिवस की कल्पना की थी – देखो तो माप के लिए हमने कैसे कैसे प्रतीक बना रखे थे-

‘‘तुम साफ बताओ तुम पागलखाने में कब भर्ती होने जा रहेे हाेे ? उसके बाद तुम्‍हारा पता नहीं क्या हो, इसलिए अपने बैंक से लेकर घर के सारे राज बता जाना, बाद में काम आएंगे।’’

मैं हैरानी में उसे देखने लगा तो बोला, ‘‘तुम्हारी एक बात से दूसरी, दूसरी में से तीसरी जो निकलती जाती है, वह मुझे अपने पार्क में दंड पेलते सिरफिरे में भी केवल उन मौकों पर देखने में आती थीं जब वह अपनी रौ में बोलता और बहकता था। किसी वस्तु को सटीक पहचाना जा सके इसके लिए शब्द बने हैं, किसी विचार को सही बताया जा सके उसके लिए वाक्य बने हैं जिनके आगे विराम चिन्ह होता है, जो पहला वाक्य पूरा करने से पहले एक नया वाक्य आरंभ करते चले जाते हैं, या पहले विचार के संप्रेषित होने से पहले ही एक नए विचार और नई अवधारणा की ओर बढ़ जाते हैं उनके लिए पागलखाना बना है!

”मुसीबत यह कि वहां जाने वाले लौटते नहीं हैं, बेमियाद पड़े रहते हैं! इसलिए कह रहा था कि जो अपने बच्चों से भी छिपा रखा हो उसे मुझे बता रखाेे, जरूरत पर काम आएगा।’’

बात उसकी अधिक गलत नहीं थी, इसलिए मैं उसका मजाक उड़ाता हुआ हंस भी न सका, ‘‘यार बात तो तुम्हारी ठीक है। कुछ गड़बड़ी तो मेरे साथ है ही! जिस बात को दूसरे बहुत सलीके से कल लेते हैं, मैं चक्कर काटता हुआ लंबे समय बाद उस बिन्दु पर पहुंचता हूं जिस पर सीधी रेखा में अगला कदम कहा जा सकता है। खैर, मैं फिर भी कहूंगा कि अन्तर्विरोध तो हम सभी में होते हैं, ऋजुता वक्रता से अधिक असाध्य है, परन्तु विराटता के अन्तर्विरोध भी उतने ही विराट होते हैं।

”गहरी खाइयां हिमालय में ही हो सकती हैं, किसी टीले या बांबी में नहीं। इसलिए हमें उन्हें अपने पैमाने से नहीं मापना चाहिए न निर्णय करने में जल्दबाजी करनी चाहिए। विराटता के साथ ही उनके असंख्य पक्ष हो जाते हैं, असंख्य आवर्त, जिनमें से किसी को कसौटी मान लिया तो उन्हें अपने से भी तुच्छ सिद्ध कर सकते हैं! इससे न हम अपने को समझ सकते हैं न उनको! उनको समझने के लिए धैर्य की, आस्था की जरूरत होती है और इसके साथ ही अमंद स्मृति की जरूरत होती है जो आस्था के क्षणों की भी विसंगतियों को कहीं दर्ज करती रहे जिसे आस्था के कारण हम दबा देते या उपेक्षणीय मान लेते है। यह स्मृति ही संचित हो कर इतना प्रबल दबाव डालती है कि श्रद्धा या आस्था वश जिस पर हम मंत्रमुग्ध थे उससे मोहभंग होता है और हम उसका स्वतन्त्र और वस्तुपरक मूल्यांकन कर पाते हैं। याददाश्‍त से कुछ अलग हो सकती है यह, कारण अच्छी याददाश्‍त वाले भी मुग्ध होने पर उन खटकने वाली बातों को बिसारते चले जाते हैं, इसलिए तार्किक प्रकृति के लोगों में ही आस्था और श्रद्धा के क्षणों में स्‍म़ति भी सतर्क रहती है।”

‘‘जानते हो तुम क्या कर रहे हो? तुम उसी अभियोग का प्रमाण दे रहे हो और मुझ पर यह दबाव डाल रहे हो कि मैं पहले से ही किसी पागलखाने में तुम्हारे लिए एक खाट बुक कर लूं!’’

मैं अपनी हंसी को रोक नहीं पाया ! बात वह ठीक ही कह रहा था पर ठीक इसलिए नहीं था कि जटिलता को सरलोक्तियों में नहीं बांधा जा सकता। मेरी नजर में वह मूर्ख था और उसकी नजर में मैं पागल।

मूल्यांकन का अन्तर इस मसले पर हमारे दृष्टिभेद के कारण था। कहा, ‘‘देखो, तुम गलत नहीं हो। केवल मेरी नजर में सही नहीं हो। आज ही एक मित्र ने कल की पोट पर कहा, ‘क्रान्तिकारी तुलसी के असली नारी विषयक रूप को देखना है तो वन काण्ड में सीता को अनुसूया से दिलाया उपदेश जरूर देखें ! उत्तर में मैंने कहा, ‘आप ने ध्यान नहीं दिया नाटकीयता, रणनीतिक उपयोग और निजी संवेदना के पहलुओं पर और तत्कालीन दबावों में, जिसमें सबसे अधिक शिकार महिलाएं बनती थी। इसे एक दो वाक्यों में नहीं समझा सकता। तुलसी का लेखन एक सामरिक लेखन है।

एक दूसरे मित्र ने कहा मध्यकाल के वह अकेले कवि हैं जिसमें यह साहस था कि सत्ता के आतंक के बीच अपना विरोध प्रकट कर सकें is a complete wrong statement sir.

सच कहो तो मुझे ऐसी ही आपत्तियों से रास्ता मिलता है। पहले मित्र को जो उत्तर दिया उससे मैं स्वयं संतुष्ट नहीं हूं! दूसरे ने अपनी असहमति का या मेरे कथन के गलत होने का कोई कारण बताया होता तो उससे अधिक लाभान्वित होता और सोचने समझने की दिशा बदलती। परन्तु ये दोनों प्रतिक्रियाएं मेरी उस मुहिम की सफलता को प्रकट करती हैं कि आपको किसी के प्रभाव में आकर उसकी बात या उसके निष्कर्ष मान नहीं लेने चाहिए। दुनिया का कोई प्रचंड मेधावी भी किसी विषय पर अन्तिम सत्य पर नहीं पहुंचा है और यदि ऐसा कोई आतंकवादी चिंतक दिखे तो सबसे पहले उससे मुक्ति पानी चाहिए। हमें अन्तिम भरोसा सब कुछ जानने और अपने ढंग से समझने के बाद अ पनी ही बुद्धि पर करनी है। परन्तु हम जिनसे अअसहमत होते हैं उन्हें अपनी असहमति का कारण या प्रमाण बता सकें तो दोनों का भला हो। हमारा लक्ष्य अपने विचारों की धाक जमाना नहीं, सोचने समझने की प्रक्रिया को जाग्रत करना है जिसकी ही एक कड़ी है कि जो एक सन्दर्भ में सही लगता है वह दूसरे सन्दर्भ में गलत सिद्ध हो जाय!’’

वह हंसने लगा, ‘‘जीत हर हालत में तुम्हारी ही होगी! हार गए तो भी।’’

‘‘मैं जीतने के लिए बात करता ही नहीं हूं, समझने के लिए अपना पक्ष रखता और दूसरे के पक्ष पर विचार करता हूं और दोनों स्थितियों में मुझे लाभ होता है। जो जीतना चाहे ही नहीं वह हार कैसे सकता है? पर यह अपेक्षा अवश्‍य करता हूं कि तुम अपनी बात पूरी तैयारी और समझदारी से करो! उन बातों को दुहराओ नहीं जिनको मैं प्रतीकात्मक रूप में स्वयं कह आया हूं। महिमा की अपनी शर्ते रखते हुए, उनमें निहित अन्तर्विरोधों को ह्विटमैन की पंक्तियों से उदाहृत भी कर आया, फिर भी यदि आप अपने छोटे फीते से महिमा या विराटता को नापने के बाद उसे सीमोल्लंघन का दोषी करार दे तो वह क्या कर सकता है! वह तो है, एक सत्य और सत्ता की तरह ! तुम तभी तक हो जब तक उसकी स्वायत्तता से छेड़छाड़ न करो अन्यथा तुम फलक से बाहर चले जाते हो।

‘‘मैं यह निवेदन कर चुका था कि तुलसी रामायण को कबीरपन्थ, नाथपंथ, इस्लामी अग्रधर्षिता के विरुद्ध एक हथियार के रूप में तैयार करते हैं, इसमें कथन उपकथन पात्रों और परिस्थितियों के अनुरूप हैं और तर्कयोजना के व्यापक आयाम हैं जिनकी दूरंदेशी चकित करती है! मित्र आहत स्त्रियों की पीड़ा को व्यक्त करने वाले वाक्य से थे और उन्हें अनसूया प्रकरण याद आ रहा था, यह समझ में नहीं आया कि मध्यकाल के जंगल में अपने पति के साथ राक्षसों के बीच स्त्री को अपने सम्मान की रक्षा का एक आसंग भी इससे जुड़ा है, मध्‍यकाल हिन्‍दू महिलाओं के लिए राक्षसों के बीच अपने कौल पर टिके रहने की चुनौती जैसा था अत: तत्कालीन मर्यादाओं में सहज प्रतिक्रिया का भी एक आसंग है, और कथा की अपनी नाटकीयता का भी ध्यान रखते हुए एक मूल्यदृष्टि वहां प्रतिपादित करनी है और हिन्दू समाज को आज की परिस्थितियों में सन्देश भी देना है! इनके बीच ही, और यह सोचते हुए कि इनके सफल निर्वाह में बड़े बड़ों से चूक हो सकती है कोई मूल्यांकन होना चाहिए! किताब में पढ़े सूत्रों को तेा वर्तमान पर भी घटित नहीं किया जा सकता, आज के सूत्रों को उस अतीत में ले जा कर घटित करना अपने दिमाग की परीक्षा करने की मांग करता है!

‘‘तुलसी किसी विराट की तरह विचित्र हैं ! एक जगह वह वर्णमर्यादा पर ऐसा जोर देते हैं कि ब्राह्मणवादी लगते हैं, दूसरी जगह जहां वह अपने को व्यक्त करते हैं कहते हैं अधम ते अधम पुरोहित करमा! सोचो तो इसी पौरोहित्य के बल पर वसिष्ठ की अपनी महिमा टिकी है और उसी को तुलसी अधमतम कर्म बता रहे हैं ! दूसरे मित्र ने तो असहमति का कारण भी नहीं बताया।

पर देखो, इन दोनों की असाधारण समझदारी और अधीरता के कारण आज का भी दिन व्यर्थ गया! जो कहना था, वह तो रह ही गया!’’

Post – 2017-01-21

Prakash Gothwal http://navbharattimes.indiatimes.com/…/56692603.cms…
अब देखिये, ये हम नहीं कर रहे। क्या करेंगे आप Himmat Singh ji.

Bhagwan Singh आप मेरी पुरानी पोस्‍टों पर जाएं । इसकाे मोहन भागवत के कथन और भंगी और भाजपा के अपने सदस्‍यता अभियान तथा विश्‍व हिन्‍दू परिषद आदि के लोगों की बयान बाजी का विवेचन करते हुए मैंने बहुत पहले कहा था कि मोदी सबको साथ लेकर चलना और सबका विकास चाहते हैं इसलिए उन्‍हें अपने घर के भीतर भी विरोध का सामना करना पड़ रहा है और बाहर भी। संघ, विश्‍वहिन्‍दू परिषद, कांग्रेस और कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों में इतनी निकटता पहले कभी न देखी गई । सभी सांप्रदायिकता से आगे और विकास की ओर बढ़ने वाले मोदी के विरोध में हैं और इसके बाद भी वह अपने को सार्थक सिद्ध करने में सक्षम है। पढ़ लिखे समझदारों को यह आज भी दिखाई नहीं देता जो मैंने आज से एक साल पहले देख लिया था।
ठीक उप्र चुनाव से पहले इस मुद्दे को उछाल कर भोलेपन से वापस लेना उतने भोले मन से नहीं किया गया है। पर भाजपा की अपनी मजबूरी, मोदी की अपनी।

Post – 2017-01-20

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 17

‘‘तुम फालतू बातें करके मेरा ध्यान बंटा देते हो, फिर सही मुद्दे पर आने में एक जुग लग जाता है। मैंने तुलसी को इसलिए याद किया था कि मध्यकाल के वह अकेले कवि हैं जिसमें यह साहस था कि सत्ता के आतंक के बीच अपना विरोध प्रकट कर सकें और समाज की त्रासदी को बयान कर सकें और और जन साधारण की यातनाओं को दर्ज करते हुुए सीधे टकराव से बचने के लिए एक अन्योक्ति विधान का सहारा ले सकें ।

कहते हैं, नानक जी ने दो पदों में बाबर के अत्याचारों का उल्लेख किया था, परन्तु किन्हीं कारणों या दबावों में आगे उन्होंने आलोचना का मार्ग त्याग दिया था। दूसरा कोई कवि नहीं है जो इसका साहस कर सका हो । कबीर भी आर्थिक अभाव या उत्पीड़न का कहीं कोई संकेत नहीं देते । वह मुसलमानों की आचारसंहिता की हिन्दू नजरिए से आलोचना करते है, हिन्दुओं में ब्राह्मणों की आलोचना और हिन्दू बाह्याचार की आलोचना करते हैं, परन्तु आर्थिक शोषण धार्मिक उत्पीड़न और निष्ठुर प्रश्‍ाासन का कहीं संकेत नहीं मिलता।

कहना चाहो तो कबीर बहुत तेजस्वी आन्दोलनकारी है, उनकी तर्कशैली, वेधक व्यंय, बेलौस अन्दाज सीधे मन पर असर करते हैं, लेकिन यह असर किसी को कायल कर सकता है, वर्णवादियों का या धार्मिक श्रेष्ठता का दावा करने वालों का मान भंग कर सकता है, परन्तु मनोरचना में वह परिवर्तन नहीं ला सकता जिससे वे अपना मार्ग बदल सकें। यह काम नानक अधिक सफलता से कर लेते हैं, बिना व्यंग्य के, बिना किसी को चोट पहुंचाए।’’

‘‘तुम कहते हो मैं बहका देता हूं, इस समय तुम खुद बहक रहे हो।’’

‘‘तुम ठीक कहते हो! बहकना कुछ तो मेरे स्वभाव में है ।
” तुमने कभी बच्चों को रास्ते चलते देखा है? उसी रास्ते पर सभी सीधे चल रहे हैं, वे इधर उधर दौड़ते, बहकते हुए फिर भी अपने रास्ते पर ही चलते है। मेरा बचपना गया ही नहीं । बहकते हुए बात करता हूं! कई बार अपने को घिक्कारता भी हूं इसके लिए और फिर समझाता हूं कि जो सीधी राह चलता है उसे पूरे रास्ते अपना रास्ता भी नहीं दिखाई देता, सिर्फ गन्तव्य दिखाई देता है, इसके कारण कई बार वह आगे के गड्ढे को भी नहीं देख पाता, और औंधे मुंह गिरता है। इसलिए रास्ते को तो बहकते हुए चलने वाले ही जानते हैं, सो अपने को समझा लेता हूं कि बुरी आदत यह भी नहीं है और इससे जो मिलता है वह तेज दौड़ से नहीं मिल सकता, मंजिल अवश्‍य जल्द मिल सकती है।
” तो बहकने का अपना मजा भी है यार और इसके कुछ फायदे भी हैं। जब कबीर और नानक की तुलना कर रहा था तो डेल कार्नेगी की सबसे कामयाब पुस्तक हाउ टु विन फ्रेंडस ऐंड इन्फ्लुएंस पीपुल के एक तर्क की याद आ गई । वह कहता है यदि तुम को गाहक से बहस में जीतना चाहते हो तो गाहक तो हार जाएगा, पर सौदा तुम्हारे पास छोड़ कर चला जाएगा! बहस में हार जाओ, तो सौदा उसके पास पहुंच जाएगा। ’’

वह ताली बजाने लगा।

‘‘यह समझो कि यदि कबीर बहस जीतने वाले आन्दोलनकारी हैं, नानक बहस हार कर भी अपना विचार, अपनी मान्यता दूसरों तक पहुंचाने और उन्हें बदलने वाले आन्दोलनकारी हैं तो तुलसी दोनों का समन्वय और अधिक सफल आन्‍दोलनकारी क्‍योंकि वह जानते थे अपनी टहनी से अलग हुआ पत्ता उससे जुड़ नहीं पाता। अंधड़ में वह अपनी जगह पर टिक कर खडे रहने और अपने को अपनी परिधि में बदलते हुए बदलने के हामी हैं।

”कबीर उपनिषद और योग से प्रेरित है, नानक ने उपनिषद को लिया योग की अनिर्वचनीयता से मुंह फेरे रहे। सच पूछो तो कबीर से बड़े योगी नानक थे जो योग का विरोध नहीं करते उसके तत्वों को अपनी विश्‍व दृष्टि में समाहित कर लेते हैं। तुलसी तो योगियों का विरोध करते हैं, पर मुझे वह सिद्ध लगते हैं – योगः कर्मसु कौशलम् । अपने काम को पूरी दक्षता और मनोयोग से कर लेना ही योग है और उसे सफलता तक पहुंचाना सिद्धि ।

”एक बात जिस पर लगातार पर्दा डाला गया है कि कहीं हमारे सामुदायिक संबंध इससे गड़बड़ न हों उसके तीन परिणाम हुए हैं। सामुदायिक संबध बिगड़ते चले गए है, सुधरे तो नहीं हैं ये दरहम बरहम करने वाले भी मानेंगें; दूसरे हम सचाई को समझने में असमर्थ रहे हैं, तीसरे इनके परिणाम हमारी योजना के विपरीत हुए हैं। इसकी मीमांसा में जाने पर तुम सिर पकड़ कर बैठ जाओगे । परन्तु इस सचाई को स्वीकार करो कि इस्लाम के आने के बाद पूरा भारत, और इसके सभी सामाजिक स्तरों, सभी क्षेत्रों के लोग उस मनोदशा में पहुंच गए थे जिसे तुलसी के आर्थिक विपन्नता के सन्दर्भ में प्रताड़ित (सीद्यमान) जनों की निरुपायता और व्यग्रता को मुखर करते हुए प्रयोग किया था, ‘कहां जाईं, का करीं।’’

वह कुछ कहना चाहता था, मैंने बरज दिया ।

‘‘यार, अभी इस प्रयोग के साथ याद आया, और ऐसे प्रयोग तुलसी में भरे पड़े है, इतनी सादगी से इतनी गहन वेदना को सर्वग्राह्य भाषा में व्यक्त करने वाले दुनिया के कितने कवि मिलेंगे और उनमें ऐसी उक्तियां कितनी मिलेंगी। तुलसी में यह मिलती है, क्योंकि तुलसी जनमन में रचे, उसी के मुहावरों मे गहनतम विचार प्रकट करने वाले विस्मयकारी कवि है- अणोरणीयान् महतोमहीयान् !

‘‘तुम बीच में कुछ कहने जा रहे थे, मैने बरज दिया था, अब कहो ।’’

‘‘अब क्या कहूंगा? इतनी देर तक तो मैं अपने सिर को संगसार से बचाता रहा इसमें क्या कहना चाहता था, यह याद रहेगा। अब तुम्हें जो कहना है, कहते जाओ, मैं मूक बना सुनता रहूंगा।’’

‘‘कबीर के पूर्वज, कम से कम एक पुस्त पहले के लोग मुसलमान हो गए हैं, विभिन्न तबकों के लोग हैं जो इससे पहले कभी इतने क्षुब्ध न थे, और, तुलसी तो चलो बाद में आते हैं, उनसे पहले के ब्राह्मण भी सनाका खाए हुए है, पर दूसरे जिनके विषय म यह बताया जाता रहा कि इस्लाम के प्रभाव में उनको पहली बार अपना क्षोभ प्रकट करने का अवसर मिला, उसे नकारा नहीं जा सकता, परन्तु वे उस प्रभाव से बचने के लिए छटपटाते हुए पुराने भारतीय मूल्यों को संकटग्रस्त देख कर चिन्तित है और उसको बचाना चाहते हैं। प्रभावित होते तो इस्‍लाम कबूल कर लेते । आतंंकित हैं और वे तक आतंकित हैं जिनको धर्म बदलना पड़ा है और उससे बचाव के लिए छटपटा रहे हैं।

”जिन मूल्‍यों को ले कर वे चिन्ति हैं उन मूल्यों पर कसने पर ब्राह्णवादी वर्णवाद बहुत खरा नहीं सिद्ध होता था, परन्तु वह उससे सीधे टकराता नहीं, अपितु उससे अनुकूलित हो कर अपने को स्‍वीकार्य बनाने के प्रयत्न में रहता आया था परन्तु यहां इस्लामी मूल्यों का उन जीवनमूल्यों से सीधा विरोध था जिसने पिछड़े सामाजिक स्तरों पर भी अपनी जगह बनाई थी।

”मैं जो कह रहा हूं उसे समझाने चलूं तो थक जाओगे, परन्तु एक उदाहरण से समझो कि इसमें चिड़ीमार थे, शिकारी थे, व्याध थे, परन्तु निरपराध पक्षियों की हत्या अपनी उदरपूर्ति के लिए करने के कारण निन्दनीय समझे जाते थे! पूरा समाज शाकाहारी न था, मांसाहार प्रचलित था, परन्तु कसाई भी बलि पशु का गला रेतते हुए उसकी छटपटाहट का आनन्द लेने या उसके प्रति संवेदनशून्‍य होने की जगह उसे झटके से काटने का हामी था। वध को यातनापूर्ण वध बनाना उसे उद्विग्न करता था। इसलिए यह कहना तो आधा सही है कि संत आन्दोलन इस्लाम के प्रभाव में पैदा हुआ, पूरा सच यह है कि यह इस्लाम की प्रतिक्रिया में उन मूल्यों की रक्षा से कातर जनों द्वारा पैदा हुआ जो आदिम अवस्था से इन मूल्यों से जुड़े थे।

” तुमको याह होगा, अपनी किसी पोस्ट में मैंने हिन्दुत्व को ब्राह्मणवाद और वर्णवाद से अलग किया था और कहा था कि हिन्दुत्व में ब्राह्मणवाद सहित सभी मतों के लोगों के लिए जगह थी जब कि ब्राह्मणवाद सहित दूसरे किसी में यह उदारता नहीं थी।

‘‘इस बात को समझा जा सका होता तो यह भी समझ में आ जाता, कि क्यों संत आन्दोलन अपने मूल्य सीधे उपनिषदों से या उपनिषदों तक आई और उससे ेहो कर प्रवहमान परंपरा से ग्रहण करता हैं, न कि ब्राह्मणवाद से जिसे उसका सीधा टकराव नहीं हुआ इसलिए उसे झेलता आया था।’’

‘‘बात पूरी हो गई? चला जाय?’’

‘‘नहीं यार जो कहना था वह तो रह ही गया। रास्ते में भटकने का तो यही नुकसान है कि मंजिल तक पहंचने में इतनी देर हो जाती है कि रास्ते को ही अपनी मंजिल मानना पड़ जाता है।

” मैं कहना यह चाहता था कि पूरे सन्त आन्दोलन में भी जिसमें नवधर्मान्तरित हिन्दू भी श्‍ाामिल थे, किसी का साहस ऐसी तीखी टिप्पणी करने का नहीं होताः गोड़ गंवार नृपाल महि यवन महामहिपाल और लो अगली पंक्ति तो भूल ही गई पर उसमें कहा गया है कि वे घरों में घुस कर सिल पत्थर तक तोड़ डालते हैं और इनके टीले बन गए हैं, ‘लागे अढुक पहाड़। अकेले वह है जो अभाव और अकाल की उस दारुण अवस्था का वर्णन करते हैं जिसमें न किसान किसानी करने पाता है, न बनिया राेजगार चला पाता है, न सेवक को चाकरी मिलती। क्षुधार्त लोग अपने बेटे और बेटियों तक को बेचने को विवश हो जाते हैं। अकेले वह है जो कलिकाल की आड़ में बार बार मध्यकालीन संकट की याद दिलाते हैं। वह है जो क्षुधार्तता की यातना का मूर्त करते हैं, ‘‘आगि बड़वागि तें बड़ी है आगि पेट की’।

और सुनो स्त्रियों के विषय में बहुत सारी शिकायतें तुम लोगों को हैं तुलसी से सन्दर्भ और रणनीति के अज्ञान के कारण, पर कभी फुर्सत मिले तो दुहराते रहना, ‘कत बिधि सृृृृजी नारि जगमांहीं । पराधीन सपनेहु सुन नाहीं ।’ बाकी बातें कल। मैं जब तुलसी को क्रान्तदर्शी और क्रान्तिकारी कह रहा था तो उनके इस पक्ष के कारण जिसे दबाने के प्रयत्न हेाते रहे और इसलिए तुम्हें वह प्रतिक्रियावादी लगते हैं न कि सांस्कृतिक मोर्चे के अद्वितीय योद्धा !

Post – 2017-01-19

हिन्दुत्व से घृणा का इतिहास – 16

‘’तुम बताओ, तुम तुलसी को कबीर से बड़ा कवि मानते हो ?’’

’’यह बताने से अच्छा है कि मैं तुमको यह बताऊं कि तुम्हें सवाल पूछना तक नहीं आता। पूछोगे, कमल गुलाब से बड़ा फूल होता है क्या? यदि कह दूं अपनी आंखों से देख कर समझ सकते हो तो उसके बाद कहोगे, ‘बड़ा तो कमल ही होता है, पर गोभी के फूल से दोनों छोटे होते हैं।‘

” कोई भी तुलना उसी किस्म पर लागू हो सकती है। तुम कहो, गुलाब के इन फूलों में सबसे सुन्दर कौन सा है तो माथे पर थोड़ा जोर देने के बाद यह तय करना संभव हो सकता है। पूछो दोनों में तुम्हें कौन पसन्द है तो यह भी तय किया जा सकता है। पूछो हमारे गुलदस्ते के लिए कौन सबसे उपयुक्त है तो भी कोई बात हुई। पर यह बड़ा छोटा का पैमाना सही नहीं है ।

‘’ये दो दौरों के आन्दोलनकारी हैं। अपने समय की दो समस्याओं से टकराने वाले, अपनी क्षमता के अनुसार अडिग भाव से प्राणपण से जुटे रहने वाले क्रान्तदर्शी कवि है। परन्तु हमारे समय के लिए दोनों का प्रतीकात्म क मूल्य ही रह गया है क्यों कि हम उनके समय से आगे है।

‘’इनको लेकर अपनी दूकान चलाई जा सकती है, जैसे नानक देव के नाम पर सिखों को दूकान चलाते देखा होगा। इन दोनों का समय समय पर अपने औजार के रूप में वामपंथियों ने उपयोग किया। पहले उनको तुलसी में बहुत कुछ प्रगतिशील दिखाई देता था, परन्तु फिर उन्होंने पाया कि तोड़-फोड़ की गतिविधियों के लिए अपना घर फूंक कर लुकाठा ले कर चलने वाला कवि अधिक उपयोगी हथियार है तो कबीर की ओर मुड़े ।

कुछ समय तक उनके दोनों हाथों में दो तलवारें सधी रहीं। पर दोनों को एक साथ चलाने पर तलवारें आपस में ही टकराने लगीं। यह जपमालाछापातिलक का विरोधी और अपने अनजाने ही हिन्दुओं का ‘छाप तिलक सब छीनने वाले’ सूफियों की योजना के निकट पहुंचने वाला आन्दोलनकारी और दूसरा जपमालाछापातिलक की वापसी से अपने सुरक्षा प्राचीर खड़ा करने वाला।

यह समझ में आते देर नहीं लगी कि दोनों को साथ लेकर चला नहीं जा सकता। अब दोनों के विरोध दिखाई देने लगे। फिर तो तुलसी हिन्दुओं के कवि बन गए और कबीर प्रगतिशील मानवता के। एक छोटी सी बात बताऊं, किसी को बताओगे तो नहीं ?’’

वह हंसने लगा, ‘’यदि मैं कहूं मत बताओ, या कहूं बताया तो दुनिया भर में फैला दूंगा, तो भी बताए बिना तो रहेगा नहीं। इसलिए जल्दी बता, भूमिका में समय मत बर्वाद कर।‘’

’’तुलसी में लोकधर्मिता और उनके ऐसे तत्वों का प्रगतिशील आन्दोंलन को लोकप्रिय बनाने का उपक्रम जिसका भी रहा हो इसमें प्रधान भूमिका रामविलास शर्मा की थी। परन्तु मोटी समझ सभी हिन्दू प्रगतिशीलों की यह थी कि अपने युग की सीमाओं के भीतर तुलसी की एक असाधारण प्रगतिशील भूमिका थी। तुलसी यदि लोकमंगल के साधक है और साम्यवाद का लक्ष्य लोकमंगल ही है तो उनसे अधिक उपयुक्त कोई कवि हो नहीं सकता था। परन्तु उनका लोकमंगल हिंदू समाज तक सिमटा प्रतीत होता था, अत: यह मान्यता संगठन के मुस्लिम सदस्यों को स्वीकार्य नहीं हो सकती थी। मुस्लिम सदस्यों और उनको मिलाकर रखने की चिन्ता से कातर दूसरे प्रगतिशीलों को हिन्दी भी स्वीकार्य नहीं थी, हिन्दुस्ता न भी नहीं, और कुछ कम्युनिस्ट आज भी ऐसे है जो हिन्दी का नाम आते ही हिन्दू हिन्दुस्तान की शृंखला का स्थायी धुन बनाने लगते है। हिन्दुत्व से बचने के लिए हिन्दी और हिन्दुस्तांन को भी स्वीकार नहीं कर पाते ।

रामविलास शर्मा को इनसे ही पंगा लेना पड़ा। कारण जो भी बताए गए हो, रणदिवे को भी हाशिये पर डालने का यही प्रमुख कारण रहा हो सकता ह, और रामविलास जी के विरोध में तो अभियान ही चला दिया गया जो उनके अन्त काल तक जारी रहा। सबको मिलाकर रखने की चिन्ता जरूरी भी थी, पर इस चिन्ता, में लगातार समझौते करते हुए मुस्लिम परितोष की नीति के कारण कोई मध्यमार्ग तैयार न हुआ जिसके लिए दोनों पक्षों को कुछ दुराग्रह छोड़ने पड़ते हैं, इसलिए कम्युनिस्ट पार्टी और उससे जुड़े आन्दोलन, उससे अलग हुए धड़े और इस परितोषवादी नीति के कायल दूसरे दल, मुस्लिम लीगी अपेक्षाओं की पूर्ति करने को बाध्य रहे हैं जो देश और समाज के लिए दुर्भाग्यपूर्ण सिद्ध हुआ है।‘’

’’यह बात मेरी समझ में नहीं आई । यदि सब कुछ हिन्दुओं की रुचि के अनुसार चलता रहता तो वह सौभाग्य पूर्ण होता, और यदि उसमें मुस्लिम संवेदनाओं का भी ध्यान रखा गया तो दुर्भाग्यपूर्ण हो गया?’’

‘’यहीं मुझे लगता है कि वामपन्थ अपना कफन बांध कर निकलता है और वामपन्थी अपनी आंख मूद कर दुनिया को रास्ता दिखाने का एकाधिकार ले लेता है । वामपंथ कफन की कीमत वसूल करने में लगा रहता है और वामपंथी कम्युनल गेम खेलने वालों के इशारे पर दौड़ लगाने को मजबूर हो जाता है।‘’

’’तुम्हा‍रा दिमाग खराब है। तुम कम्युानिस्ट आन्दोलन और प्रगतिशील अभियान के बारे में धेले की जानकारी नहीं रखते, और बात इतने धड़ल्ले से करते हो जैसे सारी जानकारी लेकर बैठा जज फैसला सुना रहा हो। तुम तुलसी और कबीर तक ही रहो तो तुम्हारी बेवकूफी छिपी रहेगी।‘’

’’अपने ढंग से तुम भी ठीक ही हो। जानकारी मेरी थोड़ी है इसलिए व्यवहार को ही देख पाता हूं। जहां तक कबीर का प्रश्न है वह आर्थिक स्तसर पर यथास्थितिवादी हैं, रूखा सूखा खाइके ठंडा पानी पीउ। देखि पराई चूपड़ी मत ललचावे जीउ । उनकी ब्रह्म और माया की परिभाषा में स्त्री माया है। एक बात बताऊं तुम्हें।‘’

’’बता यार, पर भूमिका से तो बचा।‘’

’’अभी अभी मुझे खयाल आया कि ब्रह्म और माया, दोनों एक से अभिन्न होते हुए भी अभिन्न नहीं, ब्रह्म की कामना ही माया बन जाती है या वह अव्‍यक्‍त रूप में उसी में रहती है और व्यक्त होती है, और पुरुष की पसली से स्त्री रची जाती है उसकी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए। वह स्वतंत्र नहीं है, पुरुष की तुष्टि ही उसका लक्ष्य है, इन दोनों में तुम्हें कोई संबंध नहीं दिखाई देता है?’’

’’इनमें संबंध तो नहीं दिखाई देता पर तुम्हाहरे ऊंचे विचारों और बदहवासी में एक संबंध अक्‍सर दिखाई देता है।‘’

’’शक मुझे भी था। खैर, मैं कह रहा था कि इसके बाद हिन्दुंओं के तुलसीदास मुसलमानों के कबीरदास के शत्रु बनने को बाध्य होंगे ही। पर जल्द ही वह केवल ब्राह्मणों या सवर्णों के कवि बन जाते हैं, फिर केवल पुरुषों के कवि बन जाते हैं। स्त्रियों और शूद्रों को उनसे बहुत सारी शिकायतें बनी रहती है और मुझे हैरानी होती है कि नारी आन्दोलनकारियों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि सरल पाठ में कबीर में महिलाओं के बारे में अधिक गर्हित टिप्पणियां हैं।

‘’तुम कहना क्याो चाहते हो ?’’

’’यह कि ये अपने समय की सबसे विकराल प्रतीत होने वाली समस्याओं से टकराने वाले चिन्तक हैं, इनको उनके युग और परिवेश में रख कर ही समझा जाना चाहिए। अपनी जरूरतों से इनको लुकाठा बना कर आगजनी का आनन्द नहीं लेना चाहिए? कबीर को भरोसा था कि तार्किक विवेचन से, समाज की दुर्बलताओं को नंगा करके, सामाजिक बुराइयों को दूर करके एक मानवतावादी जीवन पद्धति अपनाई जा सकती है जो धार्मिक और सामाजिक भेदभाव को दूर कर सके । उन्हें स्वयं यह अन्देशा नहीं रहा होगा कि उनका सन्देाश केवल हिन्दु ओं या हिन्दु्ओं से धर्मान्तरित मुसलमानों तक ही पहुंच सकता है, मुसलमान इससे कोई सीख नहीं ले सकते क्योंकि इस्लाम में तर्क के लिए अवकाश ही नहीं है। इसलिए यह खयाली पुलाव सिद्ध होगा।

तुलसी कबीर से बहुत कुछ सीखते हैं, उनकी सीमाओं को समझते हैं, उनके परिणाम के प्रत्यशक्षदर्शी हैं और अपने गहन ऊहापोह में वह मार्ग निकालते है जिसमें अपना घर संभालने और उसकी एक भी शहतीर या तनिक भी खिसकने से बचाने की चिन्ता होती है।

ये उनके युग की समस्यायें हैं। हमारे लिए इनका सबसे बड़ा महत्व यह है कि जिस समय इस्लामी शिक्षा के मकतब और मद्रसे थे, हिन्दु ओं की पाठशालाएं थी जिनमें क्रमश: फारसी, अरबी और संस्कृत का ज्ञान कराया जाता था जिन तक एक प्रतिशत लोगों की भी पहुंच नहीं रहती होगी, वहां इन दोनों कवियों ने सामा‍जिक शिक्षा संस्थानों की भूमिका निभाई। कबीर ने पिछडेा, आज की भाषा में दलितों और अशिक्षितों को अपनी रचनाओं से इस तरह हीनताबोध से उबारा कि वे यह सोच सकें कि उनके पास जो ज्ञान है उसके सामने बडे बड़े पंडित हार जायं, और तुलसी ने नाममात्र के साक्षरों को भी ज्ञान का ऐसा विश्‍वकोश उपस्थित कर दिया कि साक्षरता का भारतीय प्रतिशत जो भी रहा हो, शिक्षा का इसका स्तर दूसरे समाजों से बहुत ऊपर था।

”लगभग सभी जन सामाजिक, सांस्कृततिक, व्यावहारिक मूल्यों से अवगत और शिष्ट । इसे आज की स्थिति में समझाना कठिन है । दोनों में बहुत कुछ ऐसा है जो हमारे समय को देखते हमारे उपयोग का नहीं है, हमें उनके उपादेय तत्वों को ही अपने समय के लिए प्रेरक मान कर ग्रहण करना चाहिए था, बाकी की उपेक्षा कर देनी चाहिए थी। इस दृष्टि से तुलसी में बहुत कुछ है जो हमें उनके समय से भी परिचित कराता है, मानव यातना के रूपों से भी और आज भी जिसका उपयोग किया जा सकता है।

”कबीर हों या नाथपंथी या सिद्ध सभी का सबसे बड़ा दोष यह है कि वे निवृत्तिमार्गी है या अन्धभोगवादी हैं, तुलसी इनमें अकेले हैं जो प्रवृत्तिमार्गी हैं और जिनमें किसी से अधिक संतुलन दिखाई देता है।

”एक बात और बताऊं ? देखो मुझे इसका आधिकारिक ज्ञान नहीं है, पर यदि यह सच है तो कम्युेनिस्टोंह को तुलसी से यह कला सीखनी चाहिए थी कि जनान्दोलन खड़ा कैसे किया जाता है और सफल कैसे किया जाता है।‘’

’’भूमिका ही बांधते रहोगे कि बताओगे भी?’’

’’तुम पता लगाना, सुनते हैं होली के अवसर पर लो अश्लील और कामोत्तेाजक गालियां देने की पुरानी परिपाटी मुक्त समाज की विरासत के रूप में चली आ रही थी, उसे कबीर और जोगीड़ा की संज्ञा देने के पीछे तुलसी का हाथ था।‘’

’’हत्ते रे की। कहां ला के पटका।‘’

Post – 2017-01-18

हिन्दुत्व से घृणा का इतिहास – 15

‘‘वह कौन सी बात थी जिसे आधे घंटे तक मेरा सिर खाने के बाद भी तुम शुरू नहीं कर सके ? बता सकते हो ?’’

‘‘तुम्हारा सिर फट न जाये, इसका खयाल करके चुप कर गया, नहीं तो कल ही बता दिया होता! एक तरह से कहो तो बता भी दिया था। महावट जिनता अपनी जड़ों पर टिका होता है उतना ही अपनी डालियों से भी जड़ें पैदा करता और उन जड़ों को ही तने में बदलता कल्पनातीत विस्तार पा लेता है। अपनी महिमा से प्रकृति के क्षुद्र नियम को उलटता हुआ, या वेतलता और महावट के भेद को मिटाता हुआ और प्रकृति के ही एक अधिक जटिल नियम को प्रतिपादित करता हुआ! गिरे हुए और तने हुए के भेद को मिटाता हुआ और यह दिखाता हुआ कि महिमा के अनेक रूप हैं जिस पर एक ही नियम लागू होता है, वह है जमीन से जुड़ते जाने की योग्यता।

”वह व्यक्ति हो या पादप या पर्वत महिमा वह अपनी जमीन से जुड़े रहने के दम पर ही उस महिमा को प्राप्त कर पाता है। तुलसी को समझने के लिए या किसी अन्य व्यक्ति को समझने के लिए इस नियम को मत भूलो, अन्यथा तुम उन्हें समझ नहीं सकते।’’

‘वह क्या लाइन है गालिब की, जिसके आगे आता है, ‘हम भी इक अपनी हवा बांधते हैं!’ हम की जगह तुम कर दूं तो मेरी बात समझ पाओगे! समझ पाओगे कि तुम जमीनी सवालों को हवा में उछाल कर महिमा को परिभाषित करते हों जो मुझ जैसे गंवार की समझ में नहीं आता। पहले स्वयं तो जमीन पर आओ।’

‘‘मैं जमीन पर ही लाने की बात कर रहा हूं। सोलहवीं सत्रहवीं शताब्दी के सामाजिक और शैक्षिक पर्यावरण को देखो। आस्थामूलक साहित्य की भाषा को देखो, तत्कालीन सांस्कृतिक चुनौतियों को देखो तो तुलसी का महत्व समझ में आ जाएगा। उससे पहले के ब्राह्मणों की सारी चिन्ता अपनी प्रतिष्ठा, अपने लाभ, और ज्ञान को अपनी निजी संपदा बना कर रखने की थी। वे जन भाषाओं को उसी तरह अपवित्र मानते थे जैसे सामाजिक स्तर भेद में शूद्रों को। तुलसी से पहले का कोई संस्कृतज्ञ मिलेगा नहीं जिसने जनभाषा में लिखने का प्रयत्न किया हो!

”इस शून्य का ही लाभ सिद्धों को, नाथपंथियों को, सूफियों और सन्तों को मिला और उन्होंने अपने विचारों को जो विचार नहीं थे, पर वैचारिक आतंक पैदा कर सकते थे, अपनी उलटबांसियों और गूढ़ोक्तियों के द्वारा अपने दैनन्दिन के ले-दे से ऊपर अपने असाधारण ज्ञान का या उसका भागी होने का आत्मगौरव दे सके!

बयल बिआइल गविया बांझ, बछा दूहिए तीनो सांझ! निसदिन सियाल सिंह सों झूझै कण्हपाद कोउ बिरला बूझे! इसे ही संस्कृतज्ञ सिद्धों ने भी अपनाया! गोमांसं भक्षयेन्नित्यं विबेत अमरवारुणीम। गो इन्द्रियां, उनका मांस या आहार कामना या लालसा, उसको ही खा जाओ, या उससे मुक्त हो जाओ और ध्यान की साधना से उत्पन्न और आह्लादित करने वाली या कभी निष्प्रभाव न होने वाली मादकता में डूबा रहे। इसमें चैकाने और असाधारण ज्ञान का आतंक जमाने के अतिरिक्त कुछ नहीं है! यह ध्यान दो तो कबीरपंथियों में कबीर के वे दोहे और कथन प्रचलित नहीं है जिनमें वह समाज व्यवस्था को, धार्मिक भेदभाव को चुनौती देते हैं, अपितु वे जिनकी गूढ़ोक्तियों का मर्म जानने के कारण अशिक्षित दलित भी अपने को एक ऐसे ज्ञान का अधिकारी होने का बोध बनाए रखते हैं जो पंडितों को भी समझ न आए।

‘‘सूफी पीरों ने पहली बार सीधे लोकभाषा, लोकभावना और लोकचेतना को सम्मान देते हुए अपना साहित्य रचा और इस्लामपरस्तों की तलवार और जोर जबरदस्ती से अलग प्रेम और सौहर्द से सीधे जन मन में उतर कर लोकप्रियता पाई !

”इन सबकी यह सीमा थी कि उनको संस्कृत का आधिकारिक ज्ञान न तो था, न ही हो सकता है। ऐसे पहले कवि तुलसीदास हैं जिन्होंने जनभाषा को ज्ञान की भाषा, पूरे समाज के लिए कल्याणकारी मानते हुए ज्ञान और आस्थामूलक साहित्य पर ब्राह्मणों के एकाधिकार को चुनौती देते हुए सर्वजन हिताय, सर्वजनग्राह्य साहित्य रचना का क्रान्तिकारी कदम उठाया । यह वैसा ही कदम था जैसा लातिन की दबोच से यूरोप की भाषाओं का बाहर निकलना जो तुलसी के समय तक भी पूरा नहीं हो सका था। न्‍यूटन ने अपना सिद्धान्‍त प्रतिपादन तुलसी से सौ सवा सौ साल बाद भी लातिन में ही किया था।

”यदि तुलसी की क्रान्तिदर्शिता को देखना हो तो उस विरोध को देखो जो उन्हें ब्राह्णों से सहना पड़ा। तब तुमको यह भी समझ आ जाएगा कि तुलसी वर्णवाद के पोषक थे या उससे क्षुब्ध। तुमने उनकी उस पीड़ा को समझने का प्रयत्न किया है जिसमें बाल्यावस्था में ही माता और पिता के द्वारा परित्यक्त बालक को क्षुधाकातर हो कर अपमानजनक अनुभवों से गुजरना पड़ा और बाद में भी जाति और वर्ण को लेकर कैसे व्यंग्य सहने पड़े। पढ़ा तो होगा, उसका महत्व रेखांकित करने में चूक हुई होगी इसलिए इस भूमिका के बाद उसे फिर पढ़ोः

सूत कहो, अवधूत कहो, रजपूत कहो, जुलहा कहो कोऊ।
काहू की बेटी सों बेटा न ब्याहबो काहू की जानि नसाय न सोऊ
तुलसी सरनाम गुलाम है राम को जाहि रुचै सो कहै किन कोऊ
मांगि के खैबो मसीत को साइबो, लैबे को एक न दैबे को दोऊ

‘‘किसी व्यक्ति को उसके वैभव से नहीं, उस पीड़ा से समझने का प्रयत्न करो जिसे वह आजीवन अनमोल धन की तरह संजो कर रखता है। तुलसी अपने उन दिनों को कभी नहीं भूलते और इन भौड़े दिनों के विपरीत कुछ समय की महन्‍थी को तिरस्‍कार पूर्वक याद करते हैं। इसका ध्‍यान रहे तभी तुम्हें वह तुलसी समझ में आएगा जिसका मर्यादापुरुषोत्तम वर्णमर्यादा को तुच्छ करता है। वह तुलसी जो एक विश्‍वास पर आधारित और इसलिए तर्क के लिए अभेद्य विश्‍वास के प्रहार को रोकने के लिए तर्क और प्रमाण काे नहीं, आस्था और विश्‍वास को हथियार के रूप में काम में लाता है। यह बात उसकी अपनी उस कृति में भी देखी जा सकती है जिसके सहारे वह इस महाज्वार को रोकने का प्रयत्न कर रहा था।’’

”अगर मैं कहूं कि अब भी तुम हवा में बात कर रहे हो तो बुरा तो लगेगा, पर तुमको उनसे भी कुछ समझने का प्रयत्न करना चाहिए जो सचमुच जमीन से जुड़े हैं और जमीनी सचाइयों का सामना कर रहे हैं! तुम अपनी चैदहवीं किश्‍त लिख तो गए पर लगता है तुमने अपनी तेरहवीं पोस्ट पर आई प्रतिक्रियाओं तक को नहीं पढ़ा। किसी का समाधान तो तुमसे हो नहीं पाया।’’

‘‘देखो, मैं अपनी किताब सबके सामने बैठ कर लिख रहा हूं और मेरी चिन्ता अपनी किताब पूरी करने की है, किताब अपने समय के सरोकारों से दो दो हाथ होने के इरादे से है, इसलिए मेरी चिन्ता केवल यह रहती है कि मैं जिस तरह, जिस भाषा या शैली में लिखता हूं वह कितने लोगों तक पहुंचने में सहायक है। कई बार कुछ विचारणीय प्रश्‍नों पर प्रतिक्रिया भी देता हूं पर उनसे इतने तरह के सवाल पैदा हो सकते हैं, होते भी हैं कि उनका उत्तर देने चलूं तो उसी कुचक्र में पड़ कर फिकरेबाजियों के स्तर पर उतर जाना होगा और मैं अपने समय के सरोकारों का सामना करने की जगह नई समस्याएं पैदा करने लगूंगा!’’

‘‘क्या उन प्रश्‍नों को देखा भी है । देखा है तो उनसे तुम भागने का सुरक्षित तरीका तो नहीं निकाल रहे हो ?’’

‘‘पहली बात यह कि सभी प्रश्‍नों का जवाब नहीं दिया जा सकता। यह प्रश्‍नकर्ता के ज्ञान, व्यथा, दृष्टि, पर तो निर्भर करता ही है, इस प्रश्‍न से भी संबंधित है कि तुम किसी परिदृष्य को कहां खड़े हो कर कब और क्यो देख रहे हो। कुछ लोगों को चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह का रास्ता सही लग सकता है, परन्तु जैसा कि गांधी ने कभी कहा था, यह व्यावहारिक नहीं था, क्योंकि अंग्रेजों ने हमसे हथियार छीन कर हमें नामर्द बना दिया है। इसमें जोखिम उठाने और इक्के दुक्के रक्तपात करने की संभावना तो थी, इसके बल पर निर्णयकारी युद्ध नहीं लड़ा जा सकता था। गुप्त संगठनों की गतिविधियों से सामाजिक जागरूकता भी नहीं पैदा की जा सकती थी। आपने दो चार को गोली या बम से भून दिया, पर उसके बदले संभावित दमन की कार्रवाइयों में जितने निरीह लोगों को प्राणों से हाथ धोना पड़ता इसका न आपको अपने गुस्से में ध्यान था न अनुमान। यह ब्रितानी शासन को कोई क्षति पहुंचा सकता था या नहीं यह विवादास्पद हो सकता है, पर इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि इसका समर्थन गाधी के असहयोग और अहिंसा के आन्दोलन को खत्म कर सकता था।

इस तरह की जुगत ब्रितानी ताकतें भिड़ातीं तो समझ में आता है, अपने देश के सबसे प्रभावशाली आन्दोलन पर कुठाराघात किया जाय यह गांधी के सारे किए कराए पर ही पानी फेरने जैसा नहीं है, जनजागृति का जो अभियान गांधी ने छेड़ा था वह भी कुंठित हो जाता। गाधी की अहिंसा को बच्चों का खेल न समझो, यह एक हथियार है जिसकी धार तभी तक पैनी रह सकती है जब तक वह प्रत्यक्षतः या परोक्षतः हिंसात्मक रास्ते के साथ खड़े दिखाई न दें। तुम गांधी के समय में, उनके आन्दोलन की त्वरा पर कुठाराघात करने वाले इन उपक्रमों को जिनमें पहले, चैाराचैारी कांड के बाद उन्हें अपना आन्दोलन वापस लना पड़ा था और दूसरी बार भगत सिंह के मामले में एक भिन्न तरीका अपनाना पड़ा था, रख कर समझने का प्रयत्न करो तो तुम्हें शिकायत नहीं रह जाएगी! इसे मैंने इसलिए उठा लिया कि किसी ने इस पर गांधी की भर्त्‍सना की थी ।

‘‘एक दूसरा सवाल समग्रता को देखने की अक्षमता से पैदा होता है! अग्रेजों के कारण ही सबको शिक्षा का अवसर मिला, उनको कोसना ठीक नहीं! यह अंग्रेज और ईसाइयत में फर्क ही नहीं कर पाते। यह फर्क भी नहीं कि शत्रु अपनने हित के लिए जो काम करता है वही जिनके विरुद्ध उनको तैयार करता है, उनके भी हथियार बन जाते हैं। हर त्रासदी का एक सुखान्‍त पक्ष होता है।

परम पुरुष के मुंह से ब्राह्मण पैदा हुआ जैसे विश्‍वास स कैसे पाले जा सकते हैं। ऐसा प्रश्‍न उस सीमा से पैदा होता है जिसमें अपनी अल्पज्ञता के बाद भी कुछ रटी रटाई बातों को सन्दर्भ निरपेक्ष हो कर लोग आग्रहपूर्वक दुहराते हैं! यह नहीं देखते कि उतने पुराने कालों में दूसरे समाजों में कितने जघन्य विश्‍वास और मानवद्रोही दर्शन पनपते रहे हैं, यहां तो मात्र सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल था।

परन्तु सबसे बड़ी बात यह कि वे यह भी नहीं समझ सकते कि वर्णवाद और पुरानी आस्था को इस्लाम से लड़ने के लिए औजार बनाते हुए भी ब्राह्मणवादी वर्चस्व पर सबसे प्रभावशाली प्रहार तुलसी करते हैं! भक्त के समक्ष जाति नहीं भक्ति भावना प्रधान होती है और वही सभी में वह साम्य देख सकता है जिसमे वह पूरे जगत को सियाराममय मान कर उसके समक्ष विनम्र हो सकता है।

” कहा न तुलसी प्रतीयमान अन्तर्विरोधों और गहन तत्वदर्शिता से संपन्न कवि हैं। समर में उतरने के लिए उन्होंने रामकथा को चुना जिससे इससे पहले की वैचारिक लड़ाइयां लड़ी जाती रहीं, समस्त सुलभ ग्रन्थों का मर्म ग्रहण किया, वेद, पुराण ही नहीं दूसरी भाषाओं में सुलभ ज्ञानभंडार का अध्ययन करने के बाद अपनी सामरिक आवश्‍यकता के अनुसार वह कथानक, चरित्र और भाषा, विचार संपदा का चयन करते हैं। तुलसी विचलन के सभी रूपों का विरोध करते हैं, उस सधुक्कड़ी का भी जो आज की व्याधि है। गृहस्थ का जीवन उनके लिए आदर्श है। मुनिवृन्द की आन्तरिक भोगलिप्सा पर भी बड़े मीठे ढंग से प्रहार करते हैं दूसरे निग्रहवादी मतो पर भी !

‘‘प्रश्‍न यह है कि तुम कहां से अपने समय की समस्याओं को देखते हो और स्वयं क्या हो! वह कविता याद है कि मोची की नजर में हर आदमी एक जोड़ी जूता है। एक रोगी के लिए दुनिया के सारे काम रुक जाय पर उसकी पीड़ा से मुक्ति मिले इससे बड़ी कोई समस्या नहीं हो सकती। उसकी समस्या का उपहास नहीं किया जा सकता पर उसकी इच्छा के अनुसार दूसरे सभी कामों को स्थगित नहीं किया जा सकता। सामाजिक स्तर पर यह समस्या दूसरे रूप में प्रकट होती है। सामाजिक न्याय मांगने वालों के लिए समस्त गतिविधियां उनके दुखनिवारण पर केन्द्रित होनी चाहिए जिनमें उन्हें कुछ करना न हो, पाना ही पाना हो। यह उनके और देश के हित में नहीं है, न उनमें स्वयं अपनी चुनौतियों का सामना करने की क्षमता पैदा होगी न उन्हें जो मिलेगा उससे उनकी तृप्ति होगी, न वे सुविधाएं उनके ही समाज के अधिक उत्पीडित जनों तक पहुंचने पाएंगी।’’

‘‘आज तो सचमुच थका दिया तुमने ! पछता रहा हूं इस पहलू को छेंडा ही क्यो!’’

अब क्या कहता !

Post – 2017-01-17

हिन्दुत्व से घृणा का इतिहास – 14

‘‘सच बताना, कल तुम मेरे सवालों का अनुमान करके घबड़ाकर भाग खड़े हुए थे या नहीं ?’’

‘‘मैंने दो बातें कही थीं, पहली यह कि ‘‘तुलसी तर्कवाद के आघात से बचने के लिए आस्थावाद का सहारा लेते हैं और उनका आन्दोलन अधिक सफल रहा यह तुम परिणामों से समझ सकते हो । दूसरे वर्णवाद हिन्दू समाज का सबसे अरक्षणीय पक्ष था यह गलत है। सबसे दलित और दुर्गति में जीने वाली जातियों में से किसी ने धर्म परिवर्तन नहीं किया। यह बात तुम्हारे भेजे में आई या नहीं? इसके बिना तुमसे बात ही नहीं हो सकती।’’

‘‘देखो, सफलता सही होने का प्रमाण नहीं है। मैं मानता हूं तार्किक सन्तों, जिसके कारण ही उन्हें ज्ञानमार्गी भी कहा जाता रहा है, को निष्प्रभाव करने में तुलसी को असाधारण सफलता मिली, परन्तु समाज को ज्ञानविमुख या बौद्धिकता से शून्य, पोंगापन्थी बना कर उन्होंने सिद्धों और सन्तों के किए कराए पर पानी फेर दिया और उनके कारण कबीरपन्थ केवल कबीरपंथियों तक सीमित रह गया जो आज दलित कहने में अधिक आश्वस्ति अनुभव करते हैं। यदि तुलसी न होते तो सिख मत की तरह इनके पन्थ में भी ऊंची जातियों के लोग मिले होते और वह सामाजिक विषमता दूर हो गई होती फिर दलित, पिछड़े या सवर्ण का भेद मिट गया होता। तुलसी ने हिन्दू समाज को उस अगले पड़ाव से लौटा कर हजारों साल पीछे के उस चरण पर पहुंचा दिया जब वेद की ऋचा का उच्चारण करने पर शूद्रों की जबान काट ली जाती थी, और किसी के कान में वेदवाक्य सुनाई पड़ गया तो उसके कान में पिघला सीसा डाल दिया जाता था! गलत कह रहा हूं ?’’

‘‘तुम गलत कह ही नहीं सकते। गलतियां भी वे ही करते हैं जिनके पास समझ होती है और सही गलत का फर्क समझते हैं। तुम अक्ल बेंच कर खानेवाले लोग हो, खरीदार कोई मिल जाय, उसका काम पूरी ईमानदारी से करोगे, जैसे वकील करता है या सुपारी किलर करता है। तुम जब कहते हो आज से साढ़े तीन हजार साल पहले, अर्थात् ईसाइयत और इस्लाम की पूरी अवधि को जोड़ लो उससे पहले किसी ने किसी किताब में पता नहीं किस बात से खीझ या अपमानित अनुभव करके यह कामना की थी। यह कभी अमल में आया इसका प्रमाण नहीं! अमल में आ ही नहीं सकता था इसका प्रमाण है क्योंकि यज्ञ के लिए जिसमें वेदमंत्रों का पाठ होता था, उनमें नाई आदि भी भाग लेते थे। यज्ञ सच पूछो तो एक समारोह होता था जिसमें बहुत सारी मातृप्रधान अवस्थाओं की रीतियां भी चलती थीं। यह संभव ही न था शूद्र के कान में वेदमंत्र न पड़े। हां, मंत्रों का सही उच्चारण वे नहीं कर सकते थे! वह तो ब्राह्मणों में भी बहुत कम कर पाते थे। सभी ब्राह्मण सुशिक्षित होते थे यह भी गलत है। पर इस बखेड़े में हम नहीं जाते।

‘‘तुलसी की असली लड़ाई इन सुधारवादियों से नहीं थी, या थी तो इस कारण थी कि ये जिसे बचाना चाहते थे उसे ही दांव पर लगा रहे थे।’’

‘‘क्या थी वह चीज जिसे तुलसी बचाना चाहते थे ? जरा मैं भी तो सुनूं ।’’

‘‘उदारता, सहृदयता, विचारों की स्वतन्त्रता, बहुदेववाद, अद्वैतवाद ।’’

उसने इतने जोर का ठहाका लगाया कि रसोई के बर्तन भी झनझना उठे । हंसते ही हुए बोला, ‘‘वर्णवाद और जातिवाद का तो नाम लेने का भी साहस नहीं हुआ तुम्हें ।’’

‘‘वह भी, वह भी । यह जानते हो गांधी भी वर्णधर्म को मानते थे और उसे बदलने के लिए कृतसंकल्प थे। इसी आधार पर उन्होंने अपने पुत्र का विवाह राजाजी की पुत्री से करने का विरोध किया था कि वह ब्राह्मण थे यह बनिया और स्वयं दूसरों का मल मूत्र उठाने और अपने मल का स्वयं निस्तारण करने को भी तैयार रहते थे। तुम्हें वाल्ट ह्विटमैन की सांग आफ माइसेल्फ की वह पंक्ति याद है जिसे मैंने पीछे की एक पोस्ट में कभी उद्धृत किया था
The past and present wilt—I have fill’d them, emptied them.
And proceed to fill my next fold of the future.

Listener up there! what have you to confide to me?
Look in my face while I snuff the sidle of evening,
(Talk honestly, no one else hears you, and I stay only a minute longer.)

Do I contradict myself?
Very well then I contradict myself,
(I am large, I contain multitudes.)

ये पंक्तियां जितनी गांधी पर लागू होती हैं उससे भी अधिक सटीकता से तुलसीदास पर लागू होती हैं । उन्होंने अतीत और वर्तमान को अपने ढंग से भरा था और अपने ढंग से खाली कर दिया था और भविष्य को उस नष्ट हो रही और उत्साहपूर्वक नष्ट की जा रही संपदा से भरने जा रहे थे। चालबाजी मत करो, मैं ह्टिमैन के ही शब्दों को दुहराता हुआ पूछता हूं, मेरे और तुम्हारे बीच कोई तीसरा नहीं है, कोई सुन नहीं रहा है, इस छोटे से लमहे में ईमानदारी से कहो क्या तुम तुलसी को वही समझते हो जो आज के कुछ भी बेच कर कुछ भी कमा लेने की हड़बड़ी में बच्चे अपने पिता और पितामह का वह अनमोल शहनाई बेच आते हैं जब कि वह कलासाधक आठ गुणा दश के कमरे में अपनी महिमा को संभाले रहा, झुका नहीं और इस बच्चे के पास रहने को नया मकान भी है।

‘‘तुम ह्टिमैन की व्यग्रता को समझ सकते हो क्योंकि वह अद्वैत के नये ज्ञान से प्रेरित और उसे अपना बना कर पेश करने की बेचैनी से और अपने को सौ प्रतिशत अमेरिकन सिद्ध करने की और मुक्त छन्द में अपनी बात कहने की व्यग्रता थी, पर गांधी और उनसे भी पहले तुलसी की व्यग्रता को तो समझा ही नहीं जा सकता।

‘‘विचित्र बात है यार, गांधी से पहले वर्णव्यवस्था को तोड़ने के कई आन्दोलन चल चुके थे ! ब्रह्मसमाज, आर्यसमाज, प्रार्थनासभा, थियोसोफी, इसके बाद भी गांधी उस परंपरागत ढांचे को मानते हैं, लगेगा पीछे जा रहे हैं, पर वह इसे भीतर से तोड़ते हैं। कठिन चुनौती है, स्वयं वह काम करो, अपने लिए ही सही तो वह परहेज दूर हो जाएगा जो तुम मलिन पेशों से जुड़े लोगों के साथ बरतते हो। दूसरे लोग ढांचे को नकार रहे थे, गांधी चेतना के रूप को बदलना चाहते थे।

‘‘तुमने तो साढ़े तीन हजार साल पीछे जा कर एक अकल्पनीय दंड विधान का सहारा लिया हिन्दू समाज और वर्णव्यवस्था को गर्हित सिद्ध करने के लिए! कुछ लोग इसके लिए शंबूक और एकलव्य के पौराणिक चरित्रों को इतिहास का सत्य मान कर यही करते हैं, परन्तु हिन्दू समाज के इतिहास में जा कर खोज करते हुए इन उदाहरणों के सहारे हिन्दू समाज की भर्त्‍सना करने और उन्हें ईसाइयत अपनाने के लिए प्रेरित करने वालों के केवल पांच सौ साल पहले के इतिहास केा, तीन सौ साल पहले के इतिहास को, उससे पीछे के इतिहास को तो देखा होता जिसमें उन व्यक्तियों को महापुरुष बना दिया गया जिन्होंने नृशंसता की मिसालें पेश कीं, जिन्होंने अंधविश्‍वास पैदा करने और प्रलय का भय दिखाने के लिए आगजनी की, अपने ही समाज के चिंतकों का यातनावध किया और सुन्दरियों को जिन्दा जलाते रहे, धार्मिक मतभेद के कारण कैथरों की पूरी बस्ती को आग के हवाले करते रहे और अपने इस कुकर्म के लिए इन्नोसेंट कहे जाते रहे ।

‘‘तुम तो इतिहास की बुराइयों की बात करते हो, हमारे वर्तमान समाज में बुराइयां हैं जिन्हें दूर करना है। मैडम मेयो ने इनको ही दर्ज करते हुए ‘मदर इंडिया’ लिखा था और गांधी जी ने उसे सैनिटरी इंस्पेक्टर की रपट कहा था। इसे मैं आसानी से समझा नहीं सकता कि गांधी एक ओर भारतीय समाज को चेतना के स्तर पर बदलना भी चाहते थे और जब तक वह बदलाव नहीं आ जाता तब तक बाहरी ढांचे को तोड़ना नहीं चाहते थे। उनकी परिभाषा में यह हिंसा थी। इससे बनने वाला समाज एक भिन्न तरह की कट्टरता का शिकार हो जाता है। यह कट्टरता तुम्हें आर्यसमाज में भी मिलेगी। अन्तिम सत्य तक पहुंचने और उससे भिन्न को सहन न करने या दूसरों को बदलने पर स्‍वयं को न बदलने का आग्रह।

”तुमने कभी गौर किया कि गुरुकुलों में कठोर आदर्शो के लिए जिनमें कुछ अपालनीय थे, जैसे ब्रह्मचर्य, जगह थी, पर कला, संगीत, साहित्य, विनोद के लिए स्थान नहीं था जिनके बिना मनुष्य पुच्छविषाणहीन पशु बन जाता है। वे उसकी संवेदनशलीता को नष्‍ट करके कट्टर बना देते हैं। वही कट्टरता जिसके लिए हम इस्लाम को दोष देते हैं वह आर्यसमाज में भी रही है, सभी एकेश्‍वररवादी मतों में होती है क्योंकि वे अपनी समझ से अन्तिम सत्य पर पहुंचे हुए लोग होते हैं। पता नहीं गांधी इसे इस रूप में देखते या सोचते थे या नहीं तुलसी इसी तरह सोचते दिखाई देते हैं।’’

वह कुछ कहना चाहता था, मैंने रोक दिया, ‘‘तुम यह मत देखो कि वह वर्णव्यवस्था का समर्थन करते हैं या नहीं। यह देखो कि उनके मर्यादा पुरुषोत्तम क्या करते हैं। यह देखो कि वाल्मीकि रामायण के किस अंश का उपयोग वह करते हैं और किनको किनारे डाल देते हैं।

राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं और उनका आचरण एक नयी मर्यादा, एक नई सामाजिक संहिता का निर्माण करता है। देखो निषाद के साथ उनके बन्धुत्व को, आदिवासियों के साथ उनके मैत्रीभाव को, शबरी के जूठे बेर को खा रहा है मर्यादा पुरुषोत्तम । सन्‍यासियों और तपस्वियों की मनोग्रन्थि के उनके चित्रण को वाल्मीकि रामायण में प्रक्षेप करके उसमें उत्तरकांड जोड़ने वालों की विवशता जो भी रही हो, तुलसी के यहां शंबूक नहीं मिलेगा, सीता का निर्वासन नहीं मिलेगा, महिलाओं के प्रति पात्रों और परिस्थितियों का निर्वाह करते हुए वे नाटकीयता के तकाजे से जो कुछ कहते हैं उसे तुलसी का विचार मत मान लो, इस पर ध्यान दो कि वह समस्त जगत को सियाराममय मानते हैं। बहुत सारे पोथे तुलसी पर लिखे गए हैं, मुझे उनकी चेतना में उतर कर उनका और उनकी कृतियों का विष्लेषण करने वाला कोई ग्रन्‍थ्‍ा देखने मे नहीं आया ।’’

‘‘तुम बोलने पर आते हो तो थकते भी नहीं । अक्ल की बात न सही, थकान के कारण अपनी बेवकूफी से तो बच सकते हो !’’

बोलते बोलते मैं नहीं थका पर सुनते सुनते तुम थक जरूर चुके हो, पर अभी तो मैं विषय पर आया ही नहीं था। जैसी तुम्हारी किस्मत। एक तो तुम्हारी झोली छोटी, दूसरे नीचे से फटी हुई, कुछ ठहरता ही नहीं !

Post – 2017-01-16

हिन्दुत्व से घृणा का इतिहास – 13

‘‘तुमसे शगल के लिए तो बात की जा सकती है, समझ के लिए नहीं। तुम इतने दुराग्रही हो कि तुमको यह भी समझाया नहीं जा सकता कि हिन्दुत्व के प्रति घृणा का प्रधान कारण वर्णवाद रहा है जिसके प्रतीक तुम्हारे तुलसी बाबा हैं जिनको तुम क्रान्तिकारी सिद्ध करने की जिद पर अड़े हो। सिद्ध, नाथपंथी, कबीर और दूसरे सन्त, रैदास, ये सभी वर्णवाद पर प्रहार करते हैं, समाज को इसकी अतार्किकता का कायल बना कर उसकी चेतना को बदलते हुए उसका नया संस्कार करना चाहते हैं, और तुलसी इनसे ही पंगा लेते हुए समाज को पीछे ले जाने की कोशिश करते हैं। तुम कहते हो वह इस्लाम के प्रसार को रोकने के लिए हिन्दुत्व की रक्षा के लिए इनका विरोध करते हैं, मैं कहूंगा हिन्दुत्व की सही समझ उनके पास थी और इस्लाम के प्रसार को रोकने के लिए आत्मालोचन और बचाव की चिन्ता सन्‍तों को थी। वे जानते थे हिन्दुत्व वर्णवाद नहीं है, एक मूल्य व्यवस्था है जिसकी रक्षा करते हुए वे हिन्दुत्व को इस्लाम के दबाव से बचाना चाहते थे। तुम्हारे क्रान्तिकारी तुलसीदास उस दुर्बलता को बचाने के लिए प्रयत्नशील हैं जिसके कारण हिन्दू समाज अरक्षणीय बना हुआ था और इस तरह हिन्दुत्व के लिए स्वयं संकट पैदा कर रहे थे।’’

इस हमले के लिए तो मैं तैयार ही नहीं था, तुरत कोई जवाब सूझ नहीं रहा था, हकलाते हुए कहा, ‘‘वर्णव्यवस्था सच कहो तो अर्थतन्त्र की उपज है, धर्म से इसका कोई संबंध नहीं।’’

वह कुछ विचलित लगा तो मेरा आत्मविश्‍वास लौट आया, ‘‘तुम जानते हो, सभ्यता की पश्चिम की समझ कि जहां से नगर बसने आरंभ हुए वहां से सभ्यता आरंभ हुई और जहां से लेखन आरंभ हुआ वहां से इतिहास गलत है। सभ्यता उस समय आरंभ हुई जब कार्यविभाजन आरंभ हुआ, वर्णविभाजन कार्यविभाजन का ही रूप है! बर्बर समाजों में सभी काम सभी कर लेते थे और एक औसत दक्षता सभी के पास थी जिससे जीवन यापन हो जाता था, कार्यविभाजन के साथ दक्षता का स्तर और प्रतिस्पर्धा का वह पर्यावरण तैयार हुआ जिसे सभ्यता की नींव का पत्थर कहा जा सकता है।

”यह कार्यविभाजन स्थायी कृषि के साथ आरंभ हुआ। यदि तुम इसे धर्म से जोड़ना चाहो तो कहना होगा कार्यविभाजन या वर्णविभाजन के बिना समाज का उन्नयन नहीं हो सकता था, यह उसकी अपरिहार्य आवश्‍यकता थी इसलिए वर्णविभाजन धर्म का हिस्सा बना। तुम्हारे अधकचरे दिमाग के मार्कवादी वर्ण को वर्ग बताते रहे। पढ़ा है न, ‘भारतीय समाज में वर्ण ही वर्ग है’ और इस समझ से पिछड़े और दलित जनों को एक वर्ग में रखते रहे, और वह उनके लिए सर्वहारा बन जाता रहा है और ऊंची जातियों को दूसरे में , एक संपन्न या हैव्स का वर्गत्; दूसरा सर्वहारा या हैवनाट्स का। दोनों के बीच केवल टकराव का ही संबंध हो सकता है और यह तब तक जारी रहेगा जब तक ऊंची जातियों को मिटा नहीं दिया जाता और वर्णहीन समाज जो तुम्हारी समझ से क्लासलेस साम्यवादी समाज है, वह स्थापित नहीं हो जाता।

”यह मूर्खतापूर्ण समझ है और भारतीय समाज, भाषा संस्कृति और इतिहास की उपेक्षा से पैदा समझ है और इसे ही तुम इतिहास में लौटा कर वर्णभेद को चुनौती देने वालों को क्रान्तिकारी और उसकी रक्षा करने वाले को प्रतिक्रान्तिकारी या पुनरुत्थानवादी मान लेते हो और तुलसी पर हमला बोल देते हो।’’

‘‘इसमें गलत क्या है, यह तो बताओ।’’

‘‘मूर्खतापूर्ण कहने के बाद भी क्‍या गलत है यह बताने को रह जाता है ? पहली बात कि यदि वर्ण वर्ग है तो भारत में चार वर्ग होने चाहिए जब कि इसमें शिक्षा थी पर शिक्षित मध्यमवर्ग तक नहीं था। इसका उदय अंग्रेजी राज के साथ हुआ।

दूसरे यदि सवर्ण हैव्स की कोटि में आते हैं और शूद्र हैवनाट्स के, तो वर्णव्यवस्था में सबसे ऊपर गिना जाने वाला ब्राह्मण तो निपट सर्वहारा था – रहने को कुटिया और जीविका के लिए भीख, वह पुरोहिती से आए या दान और भोज से या सीधे मधूकरी से । तुम आर्थिक श्रेणियों में रख कर भारतीय समाज को समझ ही नहीं सकते और कम्युनिस्टों के देसी होते हुए भी अपने नजरिये के कारण अपने ही देश और समाज के लिए विदेशी और अजनबी बन जाने का प्रधान कारण यह टकावादी सोच है।

जिसके पास टका था वे वर्णविभाजन में शूद्र के ठीक ऊपर हुआ करता था और कई मानों में उसकी तुलना शूद्रों से की जाती थी, क्योंकि समाज के निर्वाह का सारा भार, सारी अर्थव्यवस्था इनके ही उद्योग पर टिकी हुई थी। ब्राह्मण और क्षत्रिय तो परजीवी वर्ण थे, स्वयं कोई काम ही नहीं करते थे। क्षत्रियों ने बहुत बाद में भूसंपदा पर अधिकार करके अपनी आय का एक स्रोत सुनिश्चित कर लिया था, ब्राह्मण के पास पुस्तकीय ज्ञान था और शूद्र के पास परंपरागत कौशल, इस माने में दोनों एक दूसरे के सबसे निकट पड़ते थे। संपदा से वंचित और योग्यता के बल पर जो कुछ मिल सकता था उसे पाने को चिन्तित इसलिए दोनों मे तनाव भी अधिक था।

आय की दृष्टि से शूद्र की स्थिति ब्राह्मणों से अधिक अच्छी थी। हमारे समाज के आन्तरिक तनाव को भुनाने की कोशिश की गई पर समझने का प्रयत्न नहीं किया गया। मध्यकाल तक, कंपनी के प्रवेश से पहले तक शूद्रों के पास ही वे रोजगार धन्धे थे जिनसे भारतीयों को वंचित कर दिया गया, यहां तक कि नमक बनाने के अधिकार तक से, और उसके बाद वे जो किसानी में किसी न किसी तरह सहायक हो सकते थे, अर्धबेकारी भोगते हुए उस दशा को पहुंच गए जिसके लिए तुम ब्राह्मणों को दोष देते नहीं थकते और शिक्षा का लाभ उठाने के कारण जो नौकरियों से ले कर संभ्रान्त पेशों तक, यहां तक आन्दोलनों और संगठनों तक में इतने महत्वपूर्ण हो गए कि लगता है उनकी आर्थिक स्थिति सदा से ऐसी ही रही है।’’

मैं सांस लेने के लिए रुका तो वह लगभग चीखते हुए टूट पड़ा, ‘‘तुम पूरी बात न तो सुनते हो न समझते।’’

मैं चकित हो कर उसे देखने लगा, मेरे इतने प्रभावशाली विवेचन का उस पर कोई प्रभाव ही नहीं पड़ा था।

‘‘तुममें बोलने का इतना नशा है कि तुम दूसरे किसी की बात सुनने या समझने की जरूरत ही नहीं समझते। मैं वर्णव्यवस्था की बात नहीं कर रहा था, वर्णवाद की निन्दा कर रहा था। वर्णव्यवस्था यदि कार्यविभाजन है तो किसी कार्य में सबसे दक्ष व्यक्ति को उस कार्य या उन कार्यों पर लगाया जाय जिनमें उसकी दक्षता है। आरंभ इसी रूप में हुआ था। यही सभ्यता की पहली पहचान है और प्रगति और विकास की अनिवार्य शर्त। वर्णवाद का मतलब है वर्ण का योग्यता पर आधारित न हो कर जन्म पर आधारित हो जाना, योग्यता के अभाव में भी उसका उन कामों पर नियुक्त किया जाना और उसी काम के लिए उससे योग्य व्यक्तियों की इसलिए उपेक्षा कि यह उनके आनुवंशिक कार्यभार में नहीं आता था।

”वर्ण के जाति में बदलने की कीमियागीरी को मैं नहीं समझता, पर इतना समझता हूं कि यह प्रगति में बाधक है, समाज को पीछे ले जाने वाला है और इससे मुक्ति पाए बिना समाज अपनी चुनौतियों का सामना नहीं कर सकता। जिस समय के नाथों, सन्तों और समतावादी चिन्तकों की बात कर रहा हूं उस समय तक वर्ण जाति में बदल चुका था और वे इसी को समाप्त करने की बात कर रहे थे, इसलिए उन्हें क्रान्तिकारी कहा जाएगा। तुलसी उनका विरोध कर रहे थे, कर ही नहीं रहे थे, उन्होंने उस धारा को उलट दिया और इसलिए मैं उन्हें प्रतिक्रियावादी मानता हूं और यह मोटी बात तुम्हारी समझ में नहीं आती, इसलिए कभी इतिहास में इतना पीछे चले जाते हो जिसके विषय में हमें पक्की जानकारियां नहीं है इसलिए कुछ भी कयास भिड़ाया जा सकता है, नहीं तो उस चरण को छोड़ कर सीधे आज के समय पर छलांग लगा लेते हो। गोरखनाथ और गोरखपंथी योगी, कबीर और कबीरपन्थी, रैदास और रविदास के अनुयायी हिन्दुत्व को बचाने के लिए उस बुराई को दूर करना चाहते थे जिसके कारण हिन्दू समाज समतावादी इस्लाम के सामने अरक्षणीय सिद्ध होता था। इतनी सी बात तुम्हारी समझ में नहीं आती ।’’

इस बार मैं पूरी तरह तैयार था, ‘‘देखो, किसी समाज का सबसे परिरक्षणवादी तबका वह होता है जिसको हम सबसे पिछड़ा समझते हैं। सबसे ढुलमुल और सुविधाभोगी वह होता है जिसे हम शिक्षित वर्ग समझते हैं। नये विचार और तर्क की पहुंच इसी तक होती है और किसी बात का कायल हो जाने के बाद पाला बदलने वालों में सबसे आगे यही होता है। सन्तों और योगियों का औजार तर्क और औचित्य था, जिसका असर समाज के ‘समझदार’ समझे जाने वाले तबके पर होता है, और एक बार यह डगमगाया तो पीछे का सारा समाज उसी के अनुसार ढल जाता है।

”यहां मैं तुमको एक अन्य संदर्भ में चर्चित अपनी एक पोस्ट की याद दिलाऊं, जिसमें ट्वायन्बी के हवाले से मैंने दो सभ्यताओं के टकराव की परिणति बताई थी। इसे संक्षेप में दुहराऊं तो जब दो सभ्यताओं का टकराव होता है तो दबंग सभ्यता दबाव झेल रही सभ्यता पर हावी होना चाहती है । दूसरी अपनी रक्षा के लिए अधिक रूढ़िवादी हो जाती है । पर फिर यह सोच कर कि इसके अमुक तत्व को स्वीकार करने से तो कुछ फर्क पड़ता नहीं, निरापद और मामूली प्रतीत होने वाले तत्व को ग्रहण कर लेती है, परन्तु चूंकि सभ्यता की अपनी आवयविकता होती है इसलिए उसमें प्रवेश करने वाला वह तत्व विजातीय तत्व के प्रवेश की तरह उसे भीतर से तोड़ना आरंभ कर देता है और फिर वह पूरी तरह असहाय और अरक्षणीय हो जाती है। तुलसी की समझ वही थी जिसे हम ट्वायन्बी में चार सौ साल बाद पाते हैं। उनका अन्देशा गलत नहीं था। हिन्दुत्व की रक्षा के लिए वर्णवाद को तोड़ कर अपनी धुरी से विचलित होने वाले आन्दोलनों का परिणाम देख कर तुम इसे समझ सकते हो।

‘‘तुलसी तर्कवाद के आघात से बचने के लिए आस्थावाद का सहारा लेते हैं और उनका आन्दोलन अधिक सफल रहा यह तुम परिणामों से समझ सकते हो । और वह जो तुम्हारा खयाली पुलाव था कि वर्णवाद हिन्दू समाज का सबसे अरक्षणीय पक्ष था और इसके सताए हुए लोग इस्लाम की शरण जा सकते थे यह हवाई है, इसे हम उदाहरणों से देख चुके हैं कि सबसे दलित और दुर्गति में जीने वाली जातियों में से किसी ने धर्म परिवर्तन नहीं किया। यदि यह बात तुम्हारे भेजे में आ गई तो बाकी बातें कल समझ पाओगे ।’’ बात मैंने ही खत्म कर दी ।

Post – 2017-01-16

हिन्दुत्व से घृणा का इतिहास – 13 (असंपादित )

‘‘तुमसे शगल के लिए तो बात की जा सकती है, समझ के लिए नहीं। तुम इतने दुराग्रही हो कि तुमको यह भी समझाया नहीं जा सकता कि हिन्दुत्व के प्रति घृणा का प्रधान कारण वर्णवाद रहा है जिसके प्रतीक तुम्हारे तुलसी बाबा हैं जिनको तुम क्रान्तिकारी सिद्ध करने की जिद पर अड़े हो। सिद्ध, नाथपंथी, कबीर और दूसरे सन्त, रैदास, ये सभी वर्णवाद पर प्रहार करते हैं, समाज को इसकी अतार्किकता का कायल बना कर उसकी चेतना को बदलते हुए उसका नया संस्कार करना चाहते हैं, और तुलसी इनसे ही पंगा लेते हुए समाज को पीछे ले जाने की कोषिष करते हैं। तुम कहते हो वह इस्लाम के प्रसार को रोकने के लिए हिन्दुत्व की रक्षा के लिए इनका विरोध करते हैं, मैं कहूंगा हिन्दुत्व की सही समझ उनके पास थी और इस्लाम के प्रसार को रोकने के लिए आत्मालोचन और बचाव की चिन्ता उन्हें थी। वे जानते थे हिन्दुत्व वर्णवाद नहीं है, एक मूल्य व्यवस्था की रक्षा करते हुए हिन्दुत्व को इस्लाम के दबाव से बचाना चाहते थे। तुम्हारे क्रान्तिकारी तुलसीदास उस दुर्बलता को बचाने के लिए प्रयत्नषील हैं जिसके कारण हिन्दू समाज अरक्षणीय बना हुआ था और इस तरह हिन्दुत्व के लिए स्वयं संकट पैदा कर रहे थे।’’
इस हमले के लिए तो मैं तैयार ही नहीं था, तुरत कोई जवाब सूझ नहीं रहा था, हकलाते हुए कहा, ‘‘वर्णव्यवस्था सच कहो तो अर्थतन्त्र की उपज है, धर्म से इसका कोई संबंध नहीं।’’ वह कुछ विचलित लगा तो मेरा आत्मविष्वास लौट आया, ‘‘तुम जानते हो, सभ्यता की पष्चिम की समझ कि जहां से नगर बसने आरंभ हुए वहां से सभ्यता आरंभ हुई और जहां से लेखन आरंभ हुआ वहां से इतिहास गलत है। सभ्यता उस समय आरंभ हुई जब कार्यविभाजन आरंभ हुआ, वर्णविभाजन कार्यविभाजन का ही रूप है! बर्बर समाजों में सभी काम सभी कर लेते थे और एक औसत दक्षता सभी के पास थी जिससे जीवन यापन हो जाता था, कार्यविभाजन के दास दक्षता का स्तर और प्रतिस्पर्धा का वह पर्यावरण तैयार हुआ जिसे सभ्यता की नींव का पत्थर कहा जा सकता है। और यह कार्यविभाजन स्थायी कृषि के साथ आरंभ हुआ। यदि तुम इसे धर्म से जोड़ना चाहो तो कहना होगा कार्यविभाजन या वर्णविभाजन के बिना समाज का उन्नयन नहीं हो सकता था, यह उसकी अपरिहार्य आवष्यकता थी इसलिए वर्णविभाजन धर्म का हिस्सा बना। तुम्हारे अधकचरे दिमाग के माक्र्सवादी वर्ण को वर्ग बताते रहे। पढ़ा है न, ‘भारतीय समाज में वर्ण ही वर्ग है और इस समझ से पिछड़ और दलित जनों को एक वर्ग में रखते रहे, और वह उनके लिए सर्वहारा बन जाता रहा है और ऊंची जातियों को दूसरे में , एक संपन्न या हैव्स का वर्ग दूसरा सर्वहारा या हैवनाट्स का और दोनों के बीच केवल टकराव का ही संबंध हो सकता है और यह तब तक जारी रहेगा जब तक ऊंची जातियों को मिटा नहीं दिया जाता और वर्णहीन समाज जो तुम्हारी समझ से क्लासलेस साम्यवादी समाज है, वह स्थापित नहीं हो जाता। यह मूर्खतापूर्ण समझ है और भारतीय समाज, भाषा संस्कृति की उपेक्षा से पैदा समझ है और इसे ही तुम इतिहास में लौटा कर वर्णभेद को चुनौती देने वालों को क्रान्तिकारी और उसकी रक्षा करने वाले को प्रतिक्रान्तिकारी या पुनरुत्थानवादी मान लेते हो और तुलसी पर हमला बोल देते हो।’’
‘‘इसमें गलत क्या है, यह तो बताओ।’’
‘‘मूर्खतापूर्ण कहने के बाद भी कुछ बताने को रह जाता है ? पहली बात कि यदि वर्ण वर्ग है तो भारत में चार वर्ग होने चाहिए जब कि इसमें षिक्षा थी पर षिक्षित मध्यमवर्ग तक नहीं था। इसका उदय अंग्रेजी राज के साथ हुआ। दूसरे यदि सवर्ण हैव्स की कोटि में आते हैं और षूद्र हैवनाट्स के, तो वर्णव्यवस्था में सबसे ऊपर गिना जाने वाला ब्राह्मण तो निपट सर्वहारा था – रहने को कुटिया और जीविका के लिए भीख, वह पुरोहिती से आए या दान और भोज से या सीधे मधूकरी से । तुम आथर््िाक श्रेणियों में रख कर भारतीय समाज को समझ ही नहीं सकते और कम्युनिस्टों के देसी होते हुए भी अपने नजरिये के कारण अपने ही देष और समाज के लिए विदेषी और अजनबी बन जाने का प्रधान कारण यह टकावादी सोच है। जिनके पास टका था वे वर्णविभाजन में शूद्रों के ठीक ऊपर हुआ करता था और कई मानों में उसकी तुलना शूद्रों से की जाती थी, क्योंकि समाज के निर्वाह का सारा भार, सारी अर्थव्यवस्था इनके ही उद्योग पर टिकी हुई थी। ब्राह्मण और क्षत्रिय तो परजीवी वर्ण थे, स्वयं कोई काम ही नहीं करते थे। क्षत्रियों ने बहुत बाद में भूसंपदा पर अधिकार करके अपनी आय का एक स्रोत सुनिष्चित कर लिया था, ब्राह्मण के पास पुस्तकीय ज्ञान था और शूद्र के पास परंपरागत कौषल, इस माने में दोनों एक दूसरे के सबसे निकट पड़ते थे। संपदा से वंचित और योग्यता के बल पर जो कुछ मिल सकता था उसे पाने को चिन्तित इसलिए दोनों मे तनाव भी अधिक था। आय की दृष्टि से षूद्र की स्थिति ब्राह्मणों से अधिक अच्छी थी। हमारे समाज के आन्तरिक तनाव को भुनाने की कोषिष की गई पर समझने का प्रयत्न नहीं किया गया। मध्यकाल तक, कंपनी के प्रवेष से पहले तक शूद्रों के पास ही वे रोजगार धन्धे थे जिनसे भारतीयों को वंचित कर दिया गया, यहां तक कि नमक बनाने के अधिकार तक से, और उसके बाद वे जो किसानी में किसी न किसी तरह सहायक हो सकते थे, अर्धबेकारी भोगते हुए उस दषा को पहुंच गए जिसके लिए तुम ब्राह्मणों को दोष देते नहीं थकते और षिक्षा का लाभ उठाने के कारण जो नौकरियों से ले कर संभ्रान्त पेषों तक, यहां तक आन्दोलनों और संगठनों तक में इतने महत्वपूर्ण हो गए कि लगता है उनकी आर्थिक स्थिति सदा से ऐसी ही रही है ।’’
मैं सांस लेने के लिए रुका तो वह लगभग चीखते हुए टूट पड़ा, ‘‘तुम पूरी बात न तो सुनते हो न समझते।’’
मैं चकित हो कर उसे देखने लगा, मेरे इतने प्रभावषाली विवेचन का उस पर कोई प्रभाव ही नहीं पड़ा था
‘‘तुममें बोलने का इतना नषा है कि तुम दूसरे किसी की बात सुनने या समझने की जरूरत ही नहीं समझते। मैं वर्णव्यवस्था की बात नहीं कर रहा था, वर्णवाद की निन्दा कर रहा था। वर्णव्यवस्था यदि कार्यविभाजन है तो किसी कार्य में सबसे दक्ष व्यक्ति को उस कार्य या उन कार्यों पर लगाया जाय जिनमें उसकी दक्षता है। आरंभ इसी रूप में हुआ था। यही सभ्यता की पहली पहचान है और प्रगति और विकास की अनिवार्य शर्त। वर्णवाद का मतलब है वर्ण का योग्यता पर आधारित न हो कर जन्म पर आधारित हो जाना, योग्यता के अभाव में भी उसका उन कामों पर नियुक्त किया जाना और उसी काम के लिए उससे योग्य व्यक्तियों की इसलिए उपेक्षा कि यह उनके आनुवंषिक कार्यभार में नहीं आता था। वर्ण के जाति में बदलने की कीमियागीरी को मैं नहीं समझता, पर इतना समझता हूं कि यह प्रगति में बाधक है, समाज को पीछे ले जाने वाला है और इससे मुक्ति पाए बिना समाज अपनी चुनौतियों का सामना नहीं कर सकता। जिस समय के नाथों, सन्तों और समतावादी चिन्तकों की बात कर रहा हूं उस समय तक वर्ण जाति में बदल चुका था और वे इसी को समाप्त करने की बात कर रहे थे, इसलिए उन्हें क्रान्तिकारी कहा जाएगा। तुलसी उनका विरोध कर रहे थे, कर ही नहीं रहे थे, उन्होंने उस धारा को उलट दिया और इसलिए मैं उन्हें प्रतिक्रियावादी मानता हूं और यह मोटी बात तुम्हारी समझ में नहीं आती इसलिए कभी इतिहास में इतना पीछे चले जाते हो जिसके विषय में हमें पक्की जानकारियां नहीं है इसलिए कुछ भी कयास भिड़ाया जा सकता है, नही ंतो उस चरण को छोड़ कर सीधे आज के समय पर छलांग लगा लेते हो। गोरखनाथ और गोरखपंथी योगी, कबीर और कबीरपन्थी, रैदास और रविदास के अनुयायी हिन्दुत्व को बचाने के लिए उस बुराई को दूर करना चाहते थे जिसके कारण हिन्दू समाज समतावादी इस्लाम के सामने अरक्षणीय सिद्ध होता था। इतनी सी बात तुम्हारी समझ में नहीं आती ।’’
इस बार मैं पूरी तरह तैयार था, ‘‘देखो, किसी समाज का सबसे परिरक्षणवादी तबका वह होता है जिसको हम सबसे पिछड़ा समझते हैं। सबसे ढुलमुल और सुविधाभोगी वह होता है जिसे हम षिक्षित वर्ग समझते हैं। नये विचार और तर्क की पहुंच इसी तक होती है और किसी बात का कायल हो जाने के बाद पाला बदलने वालों में सबसे आगे यही होता है। सन्तों और योगियों का औजार तर्क और औचित्य था, जिसका असर समाज के ‘समझदार’ समझे जाने वाले तबके पर होता है, और एक बार यह डगमगाया तो पीछे का सारा समाज उसी के अनुसार ढल जाता है। यहां मैं तुमको एक अन्य संदर्भ में चर्चित अपनी एक पोस्ट की याद दिलाऊं, जिसमें ट्वयन्बी के हवाले से मैंने दो सभ्यताओं के टकराव की परिणति बताई थी। इसे संक्षेप में दुहराऊं तो जब दो सभ्यताओं का टकराव होता है तो दबंग सभ्यता दबाव झेल रही सभ्यता पर हावी होना चाहती है । दूसरी अपनी रक्षा के लिए अधिक रूढ़िवादी हो जाती है । पर फिर यह सोच कर कि इसके अमुक तत्व को स्वीकार करने से तो कुछ फर्क पड़ता नहीं, निरापद और मामूली प्रतीत होने वाले तत्व को ग्रहण कर लेती है, परन्तु चूंकि सभ्यता की अपनी आवयविकता होती है इसलिए उसमें प्रवेष करने वाला वह तत्व विजातीय तत्व के प्रवेष की तरह उसे भीतर से तोड़ना आरंभ कर देता है और फिर वह पूरी तरह असहाय और अरक्षणीय हो जाती है इसलिए तुलसी की समझ वही थी जिसे हम ट्वायन्बी में चार सौ साल बाद पाते हैं। उनका अन्देषा गलत नहीं था। हिन्दुत्व की रक्षा के लिए वर्णवाद को तोड़ कर अपनी धुरी से विचलित होने वाले आन्दोलनों का परिणाम तुम देख कर समझ सकते हो।
‘‘तुलसी तर्कवाद के आघात से बचने के लिए आस्थावाद का सहारा लेते हैं और उनका आन्दोलन अधिक सफल रहा यह तुम परिणामों से समझ सकते हो । और वह जो तुम्हारा खयाली पुलाव था कि वर्णवाद हिन्दू समाज का सबसे अरक्षणीय पक्ष था और इसके सताए हुए लोग इस्लाम की शरण जा सकते थे यह हवाई है, इसे हम उदाहरणों से देख चुके हैं कि सबसे दलित और दुर्गति में जीने वाली जातियों में से किसी ने धर्म परिवर्तन नहीं किया। यदि यह बात तुम्हारे भेजे में आ गई तो बाकी बातें कल समझ पाओगे ।’’ बात मैंने ही खत्म कर दी ।

Post – 2017-01-15

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास- 12

”देखो इतिहास के भी कई रूप होते हैं और पुराणों के भी कई रूप होते हैं। हम जिस आधुनिक पुराण को इतिहास के नाम पर पढ़ते हैं उसमें सद्भावनावश तथ्‍यों को तोड़ मरोड़ और छोड़ कर यह विश्‍वास दिलाने का प्रयास किया जाता रहा है कि भारत में धर्मान्‍तरित होने वाले जनों में अधिकांश वे थे जिन्‍होंने वर्ण व्यवस्था के अपमान से तंग आकर इस्‍लाम कबूल कर लिया था।

”वर्णव्‍यवस्‍था की अपनी कमियां हैं जिनका समर्थन नहींं किया जा सकता। हाल के दिनों में इसकी इतनी भर्त्‍सना की गई है, और योजनाबद्ध रूप में ईसाइयत के प्रचार और प्रसार के उद्देश्‍य से की गई है, कि हम इसका उल्‍लेख आते ही शर्म से डूब मरने के लिए पानी की तलाश करने लगते हैं – चुल्‍लू भर ही सही, मिले तो कहीं। परन्‍तु उससे मुक्ति की चेतना और यह मूल्‍यांकन कि दूसरा मत समानता प्रदान करेगा चेतना और ज्ञान के जिस स्‍तर की अपेक्षा रखता है, वह दलित समाजों में था, यह सोचने में अच्‍छा लगता है, पड़ताल में निराशा हाथ लगती है।

”सामाजिति न्‍याय के उत्‍साह में इसका ध्‍यान नहीं रखा गया और मैं स्‍वयं भी इसी सोच का कायल था कि ऐसा हुआ हो सकता है।

”परन्‍तु दो बातों ने मुझे इस पर पुनर्विचार के लिए बाध्‍य किया । पहली यह कि जो सचमुच दलित जातियां थीं, जैसे डोम, चमार, पासी, निषाद, धोबी, धरिकार आदि उनमें कोई धर्मान्‍तरित नहीं हुआ। दूसरी यह कि मेरे परिचित क्षेेत्र में हीन कर्म से जुड़ा कोई मुसलमान मिला तो वह था हेल्‍ला जिसका नाम ही इसकाे यूनानियों से ईरानियों में प्रचलित और उनसे भारत में आया हुआ हो सकता है, बाकी चुडि़हार, मनिहार, जुलाहे या बुनकर और दरजी थे अन्‍यथा कुछ दूरी पर नटों की जमात जो अपनी मातृसत्‍ताक कबीलाई जीवनशैली में रहता, पहलवानी और बाजीगरी करता और आल्‍हा गायन करता और उनकी पत्नियां गोदना गोदने का काम करतीं। इनसे अलग थे पीलवान या हस्तिप। भिखारियों में जोगी थे जो अपना लंबा गुदडे का कंधे से पांव तक लटकता धोकरा ले कर आते और सारंगी बजाते भरथरी का गीत गाते हुए भीख मांगते। उनके गेरुआ वस्‍त्र से उनकी पहचान अलग हो जाती। उनके विषय में दबी अफवाह यह थी कि वे एकांत में किसी छोटे बच्‍चे को पा लें तो उसे जड़ी सुंघाकर धोकरे में डाल लेते हैं और ले जा कर जोगी बना देते हैं। बच्‍चों को डराने के लिए माताएं धोकरहा पकड़ लेगा कह कर डरातीं । पास का गांव था जिसका आधा क्षत्रिय आधा खान, सभी भूस्‍वामी अत: उन‍का वर्ण व्यवस्था से सताए हुओं से कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता !

”मुसलमानों के नाम पर मैं इन्हें जानता था और वयस्क होने पर गोरखपुर में अवध से आकर बसे भोजपुरी क्षेत्र के बीच अवधी बोलने वाले परिवारों को जान सका जो अवध के नवाब के गोरखपुर में इमामबाड़े की स्थापना, अवध के साथ आए इमाम, और उनके परिवार से सीधा नाता रखने का दावा करने वाले मध्यवित परिवार थे जिनमें से इमाम अपनी अभारतीय पैतृकता का दावा कर सकते थे। इन मुसलमानों में कुछ छोटी हैसियत के रिक्‍शा चलाने वाले या हेल्ला कहे जाने वाले मुसलमान हिन्दू डोमों और मुसलमान भंगियों को जो युद्धबन्‍दी राजपूतों को अमानवीय यातना और अभाव में रख्‍ा कर और गम गलत करने के लिए सस्‍ते नशे का आदी बना कर जघन्‍य कार्यो के लिए विवश किए गए थे ।

”उस समय की गोरखपुर कमिश्‍नरी में अकेले आजमगढ़ था जहां कुछ मुसलमान जमींदार थे अन्यथा बलिया, देवरिया, पुराने गोरखपुर के बंटने से बने चार जिलों में से किसी में जमींदार मुसलमान न थे । आजमगढ़ में मऊ जो अब अलग जिला है, और बस्ती में खलीलाबाद जुलाहों की बस्तियां थी जिनमें कुछ सूत और बुने कपड़े के व्यापार में लगे होने के कारण काफी समृद्ध थे। यह था वह परिदृश्‍य और इनसे प्राप्त थी वह आधार सामग्री या आंकड़ा जिसमें मुझे हिन्दुओं के इस्लामीकरण की प्रक्रिया को नए सिर से समझना पड़ा।”

वह सुनता रहा हुआ मुस्कराता रहा, जैसे इससे उसका मनोविनोद हो रहा हो !
‘‘इसकी बहुत सारी स्थापनाएं मैं पहले भी एक पोस्ट में दे आया हूं फिर भी यहां इसे दुहराना जरूरी समझता हूं! इस प्रक्रिया को समझने में हमे सबसे अधिक मदद मध्यकाल के विद्रोही कवि तुलसीदास से मिलती है जो दो अन्य विद्रोही स्वरों के तीखे विरोध में खड़े दिखाई देते हैं।’’

मैं आगे कुछ कहता कि उसने ठहाका लगाया, ‘‘तुलसीदास और विद्रोही ! जपमाला छापा तिलक, तीर्थ, व्रत, सबका समर्थन करने वाला, वर्णव्यवस्था का समर्थन करने वाला पुरातनपन्थी तुम्हें विद्रोही दिखाई देता है तो आंख के किसी डाक्टर की सलाह क्यों नहीं लेते?’’

मैं विचलित नहीं हुआ, ‘‘तुम्हारे रहते उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। मैं यह भी नहीं कहूंगा कि तुम अपने दिमाग को सही रखने के लिए सुबह शाम शीर्षासन किया करो । मैं तुम्हें अपनी ही एक पुरानी पोस्ट की याद दिलाऊं जिसमें ईसाइयत पर विचार करते हुए दकियानूसी ईसाइयों की भूमिका को प्रगतिशील और पोपतन्त्र के कारिंदा कैथोलिकों को प्रतिक्रियावादी बताया था और यह याद दिलाया था कि दास प्रथा का विरोध हो या लातिन अमेरिका में सैनिक तानाशाही का विरोध इन दकियानूस ईसाइयों की भूमिका प्रगतिशील और किंचित क्रान्तिकारी रही है। उस समय मुझे यह ध्‍यान भी नहीं था कि कभी इस तर्क का उपयोग मुझे तुलसी के लिए भी करना पड़ेगा।’’

‘‘बात किसी तन्त्र से जुड़े प्रचारकों की नहीं एक नई सोच से जुड़े और खतरा उठाने वाले आन्दोलनकारियों की है। ‘तुमने जाग मछन्दर गोरख आया’ यह पद कभी सुना है?’’

क्या जवाब देता ऐसे सवाल का? हंसने लगा, और हंसते हुए ही कहा, ‘‘सुना है भाई, सुना है !’’

‘‘इसका अर्थ भी जानते हो ? नहीं जानते होगे, यह मैं कहता हूं! तुम्हारी सोच के दायरे में यह बात आ ही नहीं सकती। मैं बताता हूं इसका अर्थ! बौद्ध मत तंत्र का हिस्सा बन कर पंचमकार तक सिमट गया था। मत्येन्द्रनाथ, उसी के प्रतीक हैं। यह गोरखनाथ है जो उसे वर्णव्यवस्था और कर्मकांड के विरुद्ध नये सिद्ध आन्दोलन में बदलते हैं। जाग मछन्दर गोरख आया इसी का सूत्र रूप है! और कबीर के बारे में तो कुछ कहना नहीं। तुलसी गोरखपन्थ का भी विरोध करते हैं, कबीर पन्थ का भी विरोध करते हैं, और सच कहो तो रैदास की वर्ण व्‍यवस्‍था की आलोचना का भी विरोध करते हैं। नितान्त प्रतिक्रियावादी है यह कवि, प्रतिभा का जवाब नहीं, पर बाभन का बाभन रहा, दूजा भया न कुच्छ ! यह मोटी बात तुम्हारी समझ में नहीं आती। लोग यह जान कर कि तुमसे मेरी दोस्ती है, लोग मेरे बारे में क्या सोचते होंगे यह सोचता हूं तो शर्म से डूब मरने का जी होता है !’’

‘‘तुम्हारे मन में जिन्दगी में पहली बार एक सही विचार पैदा हुआ । डूब मरने का। देर नहीं हुई है, मुहावरे में डूबने के लिए चुल्लूभर पानी ही जरूरी होता है, उसका प्रबन्ध मैं कर सकता हूं, पर मेरे भी तो मित्र हैं, वे मेरे बारे में इसी तर्क से क्या सोचते होंगे, यह भी तो सोचा होता ।

”तुलसी सामाजिक क्षरण और गिरावट के उस दौर का वह क्रान्तदर्शी कवि है जो पूरे मध्ययुग में अपने समय के प्रमुख द्वन्द्व को देखता, उसे समझता और उसका ऐसा निदान निकालता है जिसे अपने को क्रान्तिवीर समझने वाले कबीरपन्थी, नाथपंथी तो समझ ही नहीं सकते थे, इतनी शताब्दियों के बाद तुम लोग भी नहीं समझ सके।’’

उसने कोई उत्तर नहीं दिया, ऐसी मुस्कराहट बिखेरता रहा जिसमें व्यंग्य भी था और परेशानी भी थी, कुछ घबराहट भी ! यह मेरे स्वर की दृढ़ता के कारण रहा होगा, तर्क तो मैंने दिया ही नहीं था।

‘‘मैं तुम्हें मार्क्‍सवादी मीमांसा के सहारे समझाता हूं। प्रत्येक युग का एक प्रधान अन्तर्विरोध होता है, मेन कांट्रैडिक्‍शन, उसे जो समझ पाता है वह युगद्रष्टा होता है, बाकी तो छोटे मोटे उत्तेजक सवाल होते हैं। जो इनमें उलझ गया वह अपने युग की समस्याओं का सामना नहीं कर सकता।’’

‘‘तुम समझते हो वर्णभेद, धर्मभेद से उत्पन्न सामाजिक विभेद मध्यकाल की मुख्य समस्या नहीं थी और जपमालाछापातिलक संकट मे पड़ गया है, इसकी रक्षा करना सबसे जरूरी कार्यभार है, यह सही समझ थी ?’’

‘‘तुम ठीक समझते हो। तुलसी अकेले ऐसे क्रान्तदर्शी चिन्तक थे जो समझते थे कि असंख्य समस्याओं के बीच सबसे विकट समस्या क्या है और उससे निपटने का क्या उपाय है। वर्णव्यवस्था एक बहुत पेचीदा समस्या थी, लंबी लड़ाई पहले से चल रही थी। तुलसी समझते थे कि आज की प्रधान समस्या हिन्दुत्व की सीमारेखाओं की सुरक्षा की है अन्‍यथा पूरे देश का इस्‍लामीकरण हो जाएगा और उसी तरह की अमानवीयता और स्‍वच्‍छन्‍दता और इकहरी समझ विवेक पर हावी हाे जाएगी जो इस्‍लाम की पहचान बन चुकी है।”

”समझा नहीं तुम्‍हारी पहेली को ।”

”गौण समस्याओं को केन्द्रीय समस्या बना देने का परिणाम होगा पूरे देश का हिन्दुत्व से उच्चाटन, विचलन और देर या सवेर या तो इस्लामीकरण अथवा इस्लामी मूल्यों को अपनाते हुए सबका भिन्न नामों से इस्लाम का अनुसरण। उनका अनुमान गलत नहीं था, योगियों के साथ तो यही हुआ, कबीरपन्थियों में भी अधिकांश इस्लाम में दाखिल हो गए और उन्हें पता भी नहीं चला।’’

‘‘हो गई बात पूरी या कुछ और कहना है ?’’

‘‘पूरी कैसे होगी यार, मैं बताने तो यह चला था कि इस्‍लाम कबूल करने वाले विभिन्न समुदायों के इस्लामीकरण की प्रक्रिया क्या है और बहक गया एक ऐसे टेढ़े सवाल की ओर जिसके निहितार्थ को ग्रहण करने के लिए बुद्धि की जो परिपक्वता होनी चाहिए वह तुममे है ही नहीं।’’

उसने महफिल बर्खाश्‍त वाले स्वर में कहा, ‘‘जब तक ऐसी समझ नहीं पैदा हुई है तभी तक बचा हूं, नहीं तो तुम मुझे भी ले कर डूब मरोगे!