Post – 2017-02-05

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 31

सर सैयद बहुत खुद्दार थे। आगरा के कलेक्टर सिंपसन ने एक नुमायश के साथ दरबार का आयोजन किया तो वह उसकी प्रबन्ध समिति में थे और बहुत उत्साह से उसके आयोजन में भाग लिया था। आयोजन खुले मैदान में था जिसमें बैठने की दो तरह की व्यवस्था थी। एक ऊंचाई पर अंग्रेजो के लिए जिस पर शामियाना लगा था, दूसरा कुछ नीचा हिन्दुस्तानियों के लिए खुले आसमान के नीचे।

प्रबन्ध समिति में होते हुए भी सर सैयद को इस व्यवस्था की खबर न थी। एक अन्य सज्जन उस ऊंचाई वाले भाग में किसी कुर्सी पर बैठ गए तो चौकसी रखने वाले ने आ कर समझाया कि यह केवल अंग्रेजों के लिए है, आप पीछे लगी किसी सीट पर बैठें। इस अपमानजनक व्यवहार की सूचना उन्होंने सर सैयद को दी तो सर सैयद स्वयं जा कर उस पंडाल की एक कुर्सी पर बैठ गए।
उनके साथ भी वही व्यवहार हुआ तो उन्होंने कलक्टर से अपनी आपत्ति प्रकट की। उसी समय थार्नहिल नामक एक दूसरा अंग्रेज अधिकारी वहां पहुंचा और उसने उनकी बात सुनकर झिड़की दी “What mischief you Indians did not perpetrate on us in the Mutiny. Now you wish to sit side by side with our women ।
सर सैयद ने पलट कर जवाब दिया, गदर आप लोगों के इसी अहंकार और भारतीयों के प्रति अपमानजक व्यवहार के कारण हुआ था और अभी तक आप लोगों ने अपना तरीका नहीं बदला।
इस पर वह और भड़क उठा। सर सैयद अपने आवास पर लौट आए। गवर्नर को पता चला तो उनका आदेश हुआ कि महिलाओं के बैठने का अलग इंतजाम होगा, बाकी जगहों पर गोरे काले, मालिक और खादिम का भेद छोड़ कर सभी के साथ बैठेंगे का प्रबन्ध हो।
इसके लिए स्थनीय अधिकारी जो, जाहिर है, अंग्रेज ही थे, और शेष गोरी बिरादरी तैयार न थी।
हार मान कर गवर्नर को अपना आदेश वापस लेना पड़ा। इससे सर सैयद इतने आहत हुए कि उन्होंने प्रबन्ध समिति से त्यागपत्र दे दिया और आगरा छोड़ कर अलीगढ़ के लिए रवाना हो गए।
इस दरबार के अवसर पर सर सैयद को विशेष सम्मान दिया जाने वाला था और भारतीय मूल के पुलिस अफसरों को कुछ सुविधाएं दी जाने वाली थीं। इसकी चिन्ता किए बिना सर सैयद अपना विरोध प्रकट करने के लिए स्वागत समिति से त्यागपत्र दिया और वहां से रवाना हो गए थे । जब यह सरकारी सूचना का अंग बना तो तहलका मच गया।
उनको मनाने के लिए कमिश्नर को वह मेडल उनको पहुंचाने को भेजा गया जो उन्‍हें उस अवसर पर दिया जाना था ! वह उनसे मिल पाता तब तक वह अलीगढ़ स्टेशन पहुंच चुके थे।
मिलने पर उसने उनसे कहा:“You know I have not the least desire to present you this medal and would not have done so were it not for the orders.”
सर अहमद ने तुर्की ब तुर्की जवाब दिया , “I too have no wish to receive it from you; I am as equally constrained in this action as you are.”
जाहिर है, उन्होंने वह तमगा वापस कर दिया। इस बेअदबी पर उनके पूरे आचरण को ले कर उनसे जवाब तलब किया गया तो उन्होंने कहा, मुझे बिना सूचना और अनुमति के आगरा से चले आने का खेद है, पर त्यागपत्र को ले कर कोई अफसोस नहीं!

परन्तु अपनी कौम के भले के लिए उनको सबसे मुश्किल काम उसे समझा कर सरकार का वफादार बनाने और अपने पुराने आग्रहों को छोड़कर आधुनिक शिक्षा,
विशेषतः अंग्रेजी सीख कर आगे बढ़ने के लिए तैयार करना था।

यह रोचक है कि एक मौके पर तीन हजार मौलवियों और मुल्लों ने सरकार को इस आश्‍ाय का एक ज्ञापन दिया था कि उन्हें अंग्रेजी भाषा और फिरंगी इल्‍म (विज्ञान) की तालीम न दी जाय।
शिक्षा और आधुनिक सोच के लिए उन्हें अपने समाज को तैयार करने में और यह समझाने में कि उनकी किसी भी गतिविधि से सरकार के मन में यह सन्देह पैदा नहीं होना चाहिए कि वे ब्रिटिश्‍ा सत्ता के अन्धभक्त नहीं है, सबसे अधिक संघर्ष करना पड़ रहा था।

किसी तरह की राजनीतिक रियायत को भी वह हिन्दुओं की शरारत बता कर एक ओर तो अपने समुदाय को इससे बचाने का प्रयत्न कर रहे थे दूसरे सरकार को यह दिखा कर कि हिन्दू आपके राजकाज में अड़ंगा डालने वाले हैं और मुसलमान ही आपके भरोसे के हो सकते हैं, हिन्दुओं को अधिक अवसर मिलने का रास्ता कठिन और मुसलमानों के लिए योग्यता होने पर अधिक उदारता में ऐसे पदों पर नियुक्त करने का रास्ता तैयार करना चाहते थे।

मेरी अपनी समझ में जब आप अपने समुदाय के हित की चिन्ता करते हैं तो यह एक सराहनीय समाजसेवा का काम होता है, भले वह आपके समुदाय तक ही सीमित क्यों न हों। जब इसके साथ दूसरे समुदायों के हितों में अवराध पैदा करते हुए अपना हित साधना चाहते हैं, तो यह एक सांप्रदायिक सोच बन जाता है और ऐसे व्यक्ति को सेक्युलर कहना सदाश्‍ायता को मूर्खता के पाले में पहुंचाने जैसा है।
परन्तु इसमें हिन्दू द्वेष से अधिक हिन्दुओं से उनकी जातीय प्रतिस्पर्धा का हाथ था। उनके शिक्षा के सरोकार केवल मुसलमानों को आगे बढ़ाने से जुड़े थे, परन्तु उनको उत्तरप्रदेश्‍ा के हिन्दुओं से जो भी मुसलमानों की तरह ही शिक्षा में पिछड़े हुए थे, उससे प्रतिस्पर्धा नहीं थी। प्रतिस्पर्धा बंगाली हिन्दुओं से थी, क्योंकि केवल वे बहुत आगे बढ़ गए थे और उनका यह आगे बढ़ना उनके मन में दहश्‍ात पैदा करता था, इसलिए उनके विरोध के लिए वह उत्तरप्रदेश्‍ा के हिन्दुओं को भी अपने साथ लेकर बंगाली हिन्दुओं का विरोध करना चाहते थे और कांगेस को बंगाली हिन्दुओं की संस्था बता कर उनको भी उससे अलग करके एक प्रभावश्‍ााली प्रतिरोध कायम करना चाहते थे, इसलिए उनके एक ही काम को एक नजर से देखने वाले सांप्रदायिक कहेंगे, दूसरी नजर से देखने वाले सेक्युलर ।

हिन्दुओं के साथ अविरोध या अपनेपन का एक और कारण था कि वह अपने अनुभवों से जानते थे कि अंग्रेजों की नजर में भी वे हिन्दुस्तानी हैं और भारत से बाहर किसी भी देश्‍ा में जिनमें मुस्लिम देश्‍ा भी सम्मिलित थे, उनको मुसलमान बाद में और हिन्दू (हिन्दी) पहले समझा जाता है और उसी तरह बरताव किया जाता है। अंग्रेजी में अनूदित उनके ही शब्‍दों मेें :
“Remember that the words Hindu and Muslim are only meant for religious distinction: otherwise all persons who reside in this country belong to one and the same nation.”
“we may call ourselves Hindus or Muslims here in India but in foreign countries we are all known as Indian natives. This is why the insult of a Hindu is an insult of the Muslims and the humiliation of a Muslim is a matter of shame for the Hindus”

उन्होंने जिस विश्‍वविद्यालय का स्वप्न देखा था वह भी मुसलमानों के लिए था और इसकी जो योजना उनके मन में थी वह बहुत स्पष्ट थी। विश्‍वविद्यालय मुस्लिमों के लिए था, परन्तु इसमें किसी अन्य धर्म के छात्र को पढ़ने पर रोक न थी, न उसके लिए उन पाबन्दियों का निर्वाह करना जरूरी था जो मुसलमानों के लिए अनिवार्य थीं :
I may appear to be dreaming and talking like Shaikh Chilli, but we aim to turn this MAO College into a University similar to that of Oxford or Cambridge. Like the churches of Oxford and Cambridge, there will be mosques attached to each College… The College will have a dispensary with a Doctor and a compounder, besides a Unani Hakim. It will be mandatory on boys in residence to join the congregational prayers (namaz) at all the five times. Students of other religions will be exempted from this religious observance. Muslim students will have a uniform consisting of a black alpaca, half-sleeved chugha and a red Fez cap… Bad and abusive words which boys generally pick up and get used to, will be strictly prohibited. Even such a word as a “liar” will be treated as an abuse to be prohibited. They will have food either on tables of European style or on chaukis in the manner of the Arabs… Smoking of cigarette or huqqa and the chewing of betels shall be strictly prohibited. No corporal punishment or any such punishment as is likely to injure a student’s self-respect will be permissible… It will be strictly enforced that Shia and Sunni boys shall not discuss their religious differences in the College or in the boarding house. At present it is like a day dream. I pray to God that this dream may come true.”

हम यदि अपने को हिन्दू होने के नाते ही सचमुच अधिक सेक्युलर मानते हैं, तो विचारणीय है कि हम इस मामले में सर सैयद से आगे हैं या पीछे! यहां तक कि कट्टर मुस्लिम देश्‍ाों की तुलना में भी हम पिछड़े सिद्ध हो सकते हैं जिनमें केवल मुसलमानों के लिए कुछ पाबन्दियां हैं जिनसे दूसरे धर्मों के लोगों को छूट मिली है।

जिसका मजहब ही खुदा को छोड़कर किसी दूसरे की वन्दना न करने पर, किसी अन्य को वन्दनीय न मानने पर, टिका हो, उससे वन्दे मातरम् कहने की अपेक्षा करना, इसके लिए आग्रही होना, ऐसा न करने पर उसकी राष्ट्रनिष्ठा पर सवाल खड़े करना हमे अधिक उदार सिद्ध करता है या अधिक कठमुल्ला? यदि बात भारत माता को सलाम कहने का हो तो उसे, यदि उसमें समझ है तो, आपत्ति न होगी, क्योंकि सलाम क्या फरसी सलाम तक बजाने को वह शिष्टाचार का हिस्सा मानता है और किसी पोषिका को मां कहने से भी उसे आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इसके उलट राष्ट्रगान के समय किसी भी मुसलमान का खड़े होने से इन्कार करना इस बात का सबूत है कि अस्मिता के नाम पर तबलीगी मुहिम के चलते मुस्लिम समुदाय को जहालत के किस मुकाम तक पहुंचा दिया गया है कि वे इस पर गर्व कर सकें!

जहालत का ऐसा ही नमूना हमारे कुछ दृढ़मति मित्रों ने भी पेश्‍ा किया जिन्होंने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आमंत्रित अतिथि के द्वारा राष्ट्रगान के अवसर पर सलामी की मुद्रा न अपनाने को उनके द्वारा राष्ट्र का अपमान मान लिया गया । राष्ट्रगान के समय केवल खड़ा होना होता है। यदि उस समय सलामी गारद, जैसा कि स्वतंत्रता दिवस के परेड के अवसर पर होता है, सामने हो तो वह सलामी राष्ट्रपति को दी जाती है, उनके साथ जो भी शामिल हों उन पर रोक नहीं है, इसलिए अतिथि का व्यवहार मर्यादा के अनुरूप था, हमारे उन मित्रों का वाचिक आचार और उसमें निहित भाव हिन्दू समाज को मुसलमानों से अच्छा सिद्ध नहीं कर पाता ।

सभी लोगों को मुझसे असहमत होने का अधिकार है (यूं यदि यह अधिकार न दूं तो भी उनको असहमत होने से रोक तो सकता नहीं!) क्योंकि सभी इतने सही हैं कि आत्मनिरीक्षण से भी घबराते हैं और दूसरों को किसी बात में सही पाते ही नहीं। अपने सिवा दूसरे सभी को गलत ही नहीं मान लेते, इतना गर्हित मान लेते हैं कि उसके लिए सही संबोधन का प्रयोग तक नहीं कर पाते। गालियों से एक दूसरे का सामना एक दूसरे से आंख मिलाए बिना होता है, वार्ता ‘जा तोसें नाहिं बोलूं’ वाले अन्दाज में होता है, जिसमे साजना या बालमा जो कुछ भी लगा करता था उसकी जगह ‘जालिमां और वह भी ‘जालिमों’ वाले अन्दाज में!

भगवान ही बचाए इस देश्‍ा को अगर मेरे लिखने की और उससे जुड़े नाम की लाज रखनी है, तो। पर हम दोषदर्शन की जगह आत्मदर्शन नहीं कर सकते जिस तक पहुंचने का लक्ष्य सभी दर्शनों का होता है।

कल फिर यही बखेड़ा!

Post – 2017-02-03

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 30

आज की स्थिति में यदि हम अतीत की गलतियों को समझना चाहें तो समझ सकते हैं, परन्तु उनके आधार पर यदि उस काल में लिए गए निर्णयों के औचित्य का मूल्यांकन करने चलें तो हमसे अवष्य चूक होगी। सर सैयद के सामने तीन चिन्ताएं थीं और इनसे ही वे निर्णय किए गए जो दूसरे काल या दूसरे हितों से जुड़े लोगों को गलत लग सकते हैं, परन्तु उनके अपने सरोकारों को ध्यान में रखें तो उनसे सही निर्णय आदर्श, अर्थात् देश-काल-बाह्य वस्तुपरकता में ही हो सकता है।

उनके सामने सबसे बड़ी चिन्ता आत्माभिमान की रक्षा की थी। यह आत्माभिमान तीन तत्वों से बना था! एक दरबारी संस्कार, दूसरा समकालीन यथार्थ में अपने भविष्य का अनुमान और तीसरा इसकी रक्षा के लिए अपेक्षित उपाय। वह जानते थे कि इसमें दोष मुस्लिम समुदाय का है जो धार्मिक जुनून के कारण शिक्षा में और इसलिए उपलब्ध अवसरों का लाभ उठाने से बंचित रह गया। परन्तु यहीं से आरंभ होता है वह आत्मप्रक्षेपण जिसमें आप उनसे खार खाने, यहां तक कि घृणा करने लगते हैं जो अवसर का लाभ उठाने में सफल रहे थे जब कि आपकी विफलता आपकी अकर्मण्यता के कारण रही।

इसकी अभिव्यक्ति कई रूपों में होती है। पहली असुरक्षा की भावना के रूप में जिसमें अपना ही इतिहास अपना पीछा करता लगता है। इसके इकहरे पाठ में हमसे चूक भी हो सकती है। सबसे पहली यह आशंका कि शिक्षा में अग्रता के कारण हिन्दू जिस गति से आगे बढ़ रहे हैं, उसमें एक दिन ऐसा आ सकता है जिसमें सभी उच्चपदों पर हिन्दू विराजमान हो जाएं! आइ सी एस में भारतीयों की भी भागदारी के कारण यह संभावना बढ़ रही थी। ऐसी स्थिति में वे मुसलमानों से बदला लेने का या उनके साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार करने का प्रयत्न कर सकते हैं। ब्रिटिश सरकार जो पहले से ही मुसलमानों की राजनिष्ठा के प्रति आषंकित है, ऐसे अवसरों पर उन्हें जैसा वे करना चाहे, करने की पूरी छूट दे सकती है। प्रषासन में अधिक भागीदारी और नीतिगत मामलों में अधिक हस्तक्षेप के लिए बनी नई कांग्रेस पार्टी ने उनकी आशंकाओं को और बढ़ा दिया था। इसके चलते हिन्दुओं का अधिकार और प्रभाव बढ़ता जाएगा और उसी अनुपात में मुसलमानों की अधोगति बढ़ती जाएगी।

उनकी आशंकाओं पर ध्यान दें तो पता चलेगा कि उनमें से कुछ ब्रिटिश अधिकारियों की अपनी आशंकाओं और उनके कान भरने का परिणाम था। ब्रिटेन को 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के अनुभवों से यह आशंका बढ़ गई थी कि आगे यदि शिक्षित मध्यवर्ग और उसके सहायक बने अमलावर्ग की सहमति और पहले की विफलताओं से सबक लेते हुए नया विद्रोह हुआ तो उसके परिणाम अधिक अनिष्टकर हो सकते हैं। इस बार इसकी संभावना शिक्षित और पाश्चा त्य संस्थाओं और अधिकारों के प्रति सचेत मध्यवर्ग के नेतृत्व मे आ सकता है जिसमें मुसलमानों की कोई हैसियत ही नहीं, इसलिए यह खतरा हिन्दुओं की ओर से हा सकता है। अतः जरूरी था एक ऐसा तन्त्र जिसके माध्यम से उसकी अपनी सुगबुगाहटों का पता चलता रह सके और उससे बचाव की तैयारियां दोनों रूपों में जारी रहें! पहला, उनकी ऐसी मांगों को कुछ काट छांट के साथ स्वीकार करते हुए उनको तुष्ट रखते हुए, दूसरा आसन्न संकट हो देखते हुए उसी अनुरूप दमन की तैयारियां करते हुए। पहले प्रयोजन से ही भारतीय राष्टीय कांग्रेस की स्थापना तत्कालीन खुफिया विभाग के सर्वोपरि अधिकारी ह्यूम की पहल पर हुई थीः
Hume embarked on an endeavor to get an organization started by reaching-out to selected alumni of the University of Calcutta, writing in his 1883 letter that, “Every nation secures precisely as good a Government as it merits. If you the picked men, the most highly educated of the nation, cannot, scorning personal ease and selfish objects, make a resolute struggle to secure greater freedom for yourselves and your country, a more impartial administration, a larger share in the management of your own affairs, then we, your friends, are wrong and our adversaries right, then are Lord Ripon’s noble aspirations for your good fruitless and visionary, then, at present at any rate all hopes of progress are at an end and India truly neither desires nor deserves any better Government than she enjoys.

इसकी स्थापना ह्यूम के सुझाव पर लार्ड डफरिन की सहमति के बाद कुछ ऐंग्लो इंडियनों, पारसियों और भारतीय हितों के प्रति सहानुभूति दिखाने वाले अंग्रेजो को ले कर की गई थी। इसकी पहली बैठक बंबई में 28 दिसंबर 1885 को गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कालेज में हुई थी जिसमें व्योमेष चन्द्र बनर्जी को अध्यक्ष चुना गया था। अतः कांग्रेस को पहली नजर में बंगाली हिन्दुओं का संगठन कहना काल्पनिक लगता है, और सर सैयद की आशंका अतिरंजित लगती है, परन्तु यदि हम इसकी गहरी छानबीन करें तो पता चलेगा, जिनसे ब्रिटिष शासन को अन्देषा बना हुआ था और जिसे दूर करने के लिए यह उपाय किया गया था वह बंगाली हिन्दू ही थे जिनमें एक साथ सहयोग और आत्मगौरव की चेतना का विकास हो रहा था और जो ही आगे चल कर खतरा पैदा कर सकता था।

ऐसी स्थिति में ब्रिटिश प्रशासन की जरूरत एक ओर तो उस युक्ति का सहारा लेने की थी जिसे भाप इंजिन में स्टीम रिलीज काक कहते हैं, अर्थात यदि दबाव अधिक बढ़ जाय जिसके बाद बायलर के फटने की नौबत आ जाय, उससे पहल ही अवांछित दबाव को कम करने के लिए भाप को कम कर दिया जाय। कांग्रेस की स्थापना ऐसी ही एक युक्ति थी। उसकी दूसरी आवश्‍यकता थी एक प्रतिरोधी शक्ति को उभारना जो इस तरह के संगठन से हितों के टकराव की स्थिति में रहे और इसके लिए कांग्रेस की स्थापना से पहले से ही सर सैयद के माध्यम से तैयारी की जा रही थी। यह प्रतिरोधी शक्ति टकराव की स्थिति में बनी रहे इसके लिए प्रयत्न यह होना था कि वह कांग्रेस के साथ न मिल पाए। इस काम के लिए सर सैयद के माध्यम से मुसलमानों को अलग थलग रखने और अपने भाग्योदय के लिए पूरी तरह ब्रिटेन की अनुकंपा पर निर्भर रहने के लिए लामबन्द करना था।

कुछ स्थितियां ऐसी होती है जिनमें दो अलग अलग हितों से जुड़े व्यक्ति एक दूसरे से मेल बैठाते हुए, मैत्री दिखाते हुए परस्पर अपने हितों के लिए उपयोग करना चाहते है और इसके लिए दोनों ओर से कुछ रियायतें दी जाती है या कुछ निजी हितों का साझा किया जाता है जिसमें दोनों को लगता है कि वे दूसरे का अपने लिए उपयोग कर रहे हैं। शत्रु देषों के जासूसों के बीच यह अक्सर देखने में आता है। इसका फैसला अन्तिम परिणाम से होता है जिसमें एक देश का जासूस दूसरे के पंजे में इस तरह आ जाता है कि वह अपने सारे रहस्य उसे उगल देता है और दूसरा उसे सुरक्षा देने के लिए अपने देश में शरण की व्यवस्था करा देता है। शीतयुद्ध के दौरान सीआइए और केजीबी के जासूसों के मामले में यह कई बार देखने में आया!

ठीक यही स्थिति सर सैयद, उनके नेतृत्व में लामबन्द मुस्लिम समाज और ब्रिटिश हितों के बीच की खैंचतान में देखने में आती है जिसमे सर सैयद ब्रिटिश कूटनीति के हाथों में किस सीमा तक खेल रहे थे इसका अनुमान हम उनके मेरठ में दिए गए भाषण के कुछ अंषों से कर सकते हैं। वह बताते हैं कि हम अंग्रेज जितने एक दूसरे के निकट हैं उतनी निकटता हमारी हिन्दुओं से नहीं हो सकती, क्योंकि हम दोनों किताबों वाले मजहबों के लोग हैं, जिनमें अल्लाह की कृपा कभी एक पर होगी कभी दूसरे पर। आज अगर यह ईसाइयों के पक्ष में है तो हमे इसे खुदा की मरजी मान कर स्वीकार करना चाहिएः
I do not think the Bengali politics useful for my brother Mussalmans. Our Hindu brothers of these provinces are leaving us and are joining the Bengalis. Then we ought to unite with that nation with whom we can unite. No Mahomedan can say that the English are not “People of the Book.” No Mahomedan can deny this: that God has said that no people of other religions can be friends of Mahomedans except the Christians. He who had read the Koran and believes it, he can know that our nation cannot expect friendship and affection from any other people.

इतना ही नहीं, वह मध्यकालीन शासन की मिसाल देते हुए यह सिद्ध कर रहे थे कि अंग्रेज जो भी कर लगाते हैं, जैसे भी खर्च करते हैं, जिन भी युद्धों की तैयारी करते हुए भारतीय राजस्व से अपना साम्राज्य विस्तार करते हुए करते हैं वह सब जायज है। कांग्रेस वाले इसका हिसाब कैसे मांग सकते हैं। इसकी हद तो यह कि वह मानते थे कि वे जितनी रियायत और लिहाज से कर लगाते हैं, वह मूर्खता है, उन्हें अधिक बेरहमी से कर लगाना चाहिएः
When after the Mutiny, the Hon’ble Mr. Wilson was Financial Minister, he brought forward a law for imposing a tax, and said in his speech that this tax would remain for five years only. An honourable English friend of mine showed me the speech and asked me if I liked it. I read it and said that I had never seen so foolish a Financial Minister as the Hon’ble Mr. Wilson. He was surprised. I said that it was wrong to restrict it to five years.
It is necessary for Government to strengthen the frontier. If in England there had been any need for strengthening a frontier, then the people would themselves have doubled or trebled their taxes to meet the necessity. In Burma there are expenses to be borne, although we hope that in the future it will be a source of income. If under such circumstances, Government increase the salt-tax by eight annas per maund, is this thing such that we ought to make complaints? If this increase of tax be spread over everybody, it will not amount to half or quarter of a pice. On this to raise an uproar, to oppose Government, to accuse it of oppression — what utter nonsense and injustice! And in spite of this they claim the right to decide matters about the Budget.
(आगे का कल)

Post – 2017-02-03

मैं इन दिनों अपनी पुस्‍तक के पांचवें खंड की प्रेस कापी तैयार कर रहा हूं । संपादन के क्रम में अपनी 16.11.16 की पोस्‍ट पर पहुंंचा तो निम्‍न पंक्तियों पर ध्‍यान गया और कुछ दिनों से चल रहे प‍द्मिनी प्रसंग पर चल रहे हंगामे के प्रसंग में लगा इनकी कुछ सार्थकता हो सकती है इसलिए यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं:

..अब आप देखें तो जिन्ना ने जो कहा था उसे वाम ने सेक्युलरिज्म की आड़ में पूरा किया और आज भी हिन्दू संस्कृति, विश्‍वासों और रीतियों पर लगातार अपमानजनक ढंग से प्रहार किए ही नहीं जाते रहे हैं, इन्हें पाठ्यक्रमों में डाल कर सामान्य चेतना और विश्‍वास का हिस्सा बनाया जाता रहा है। इसके विपरीत मुस्लिम या ईसाई समाज की गर्हित, नारीद्रोही रीतियों पर इस सेक्युलरिज्म में सुहानुभूति या समर्थन का एक सुझाव या उस पीड़ा का किसी कृति में चित्रण तक नहीं मिलता। हिन्दू संगठनों के प्रति इसमें बिना सटीक कारण या प्रमाण दिए इतनी घृणा का प्रसार किया गया कि उनका नाम आते ही घृणा का वह ज्वार उभर कर चेतना को इतना विकृत कर देता है कि उसके सद्प्रयास भी दुष्प्रयास या शठतन्‍त्र प्रतीत हाता है। अपनी शिक्षा पर आत्मस्फीति का हाल यह कि यह अपने अज्ञान को भी ज्ञान से श्रेेष्ठतर मानता है। भारतीय परंपरा, इतिहास, संस्कृति से अनभिज्ञ रह गया तो तेजस्विता बढ़ गई। इस अनभिज्ञता के कारण वह अपने समाज को भी नहीं समझ सकता, क्योंकि सारा समाज उन्हीं पुरातन दायों को अपनी पूंजी मान कर जीता और व्यवहार करता है।

समाज को न समझने के बाद भी यह इस विषय में दृढ़ संकल्प है कि वह इसे बदल कर दम लेगा। समाज से नासमझ होते हुए भी यह अधिकार और जिम्मेदारी अपने ऊपर लेता ही नहीं है, इस पर सामरिक तैयारी के साथ प्रहार करता है।

Post – 2017-02-02

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 29

मनुष्‍य हो या जाति, उसका सबसे बड़ा शत्रु या मित्र उसका अपना अतीत होता है – वे कारनामे जो उसने किए हैं। जहां कोई दूसरा नहीं होता वहां भी ये भय या आश्‍वस्ति बन कर उसके साथ रहते हैं! दुर्दान्त समझे जाने वाले व्यक्ति, जिनका नाम सुन कर लोग थर्राते हैं, अकेले चलने में घबरातेे हैंं और अपने रक्षकों के बीच भी आशंकित रहतेे हैंं। जिसने किसी का अपकार नहीं किया उसके साथ कोई अशोभन व्यवहार हो जाय तब भी उसे यह मानने में समय लगता है कि किसी ने उसे क्षति पहुंचाने के लिए ऐसा किया है। उसकी पहली प्रतिक्रिया यह होती है कि शायद किसी से कोई चूक हुई है। यदि पता चले चूक नहीं हुई, उसे ही निशाना बनाया गया था, तो भी कुछ समय तक वह विस्मय में रहता है कि उसने कभी किसी का बुरा नहीं चेता, फिर उससे किसी की दुश्‍मनी कैसे हो सकती है।

अपराधी रात के सन्नाटे में चल रहा हो, तो भी उसके ही पांवों की आवाज तक उसके मन में भय जगा देती है कि कोई उसका पीछा कर रहा है और वह मुड़ मुड़ कर देखता है फिर भी आश्‍वस्‍त नहीं हो पाता ।

भारतीय मुसलमानों का सबसे बड़ा शत्रु उनका अपना ही इतिहास रहा है जो उनका पीछा करता हुआ उन्हें लगातार आश्‍ांका और दहशत में रखता रहा है और वे अपने कार्य, व्यवहार, और वचन से उस अतीत को नकारने की जगह उसे छिपाने का प्रयत्न करते रहे हैं। हिन्दुओं का इतिहास अपने रंग में रंग कर यह दिखाने का प्रयत्न करते रहे हैं कि ऐसा तो उन्होंने भी किया है, ऐसे तो वे भी हैं, जिसकी जरूरत नहीं होनी चाहिए !

परन्तु हम इस पर बाद में आएंगे। अभी तो इतना ही कि सर सैयद का पीछा, जितना उनका इतिहास करता रहा, उतना उतना कोई दूसरा कर नहीं सकता था। इस पीछा करने वाले वाले को हिन्दुओं पर आरोपित करके वह आरंभ से ही, हिन्दुओं से आशंकित रहे। उनके द्वारा अपने प्रति किए गए किसी अपकार के बिना भी हिन्दुओं से गहरी आश्‍ांंका थी। इसे वह असावधानी के क्षणों में खुल कर कह जाते थे; सावधानी के क्षणों में इस पर परदा डालने के लिए ऐसी मनोज्ञ बातें करते थे जिससे हिन्दुओं को विश्‍वास हो जाय कि मुसलमान भी इस देश को अपना देश मानते हैं। वे भी मानते हैं कि वे इसी की औलाद हैं। बाहर से आने वाले मुसलमान तो मुट्ठी भर थे और शेेष तो इस देश केे ही थे, जो मुसलमान बने। जो बाहर से आए मुसलमान थे, कई पीढ़ियों के दौरान शादी ब्याह के चलते उनके रक्त में भी हिन्दुस्तानी खून बहता है! हिन्‍दू मुसलमान दोनों इसी जमीन का अन्न खाते हैं, यहांंकी नदियाेें का पानी पीते हैं। हिन्‍दू और मुसलमान एक दूल्‍हन की दो आंखें हैं। अंंग्रेजी में अनूदित उनके शब्‍दों में कहें तो :
We both breathe the air of India and take the water of the holy Ganges and the Jamuna. We both consume the products of the Indian soil. We are living and dying together. By living so long in India, the blood of both have changed.The colour of both have become similar. The faces of both, having changed,have become similar. The Muslims have acquired hundreds of customs from
the Hindus and the Hindus have also learned hundreds of things from the Mussulmans. We mixed with each other so much that we produced a new language-Urdu, which was neither our language nor theirs …. My friends, I have repeatedly said and say it again that India is like a bride which has got two beautiful and lustrous eyes-Hindus and Mussulmans.

इनके आधार पर न उनके इरादों को आंका जा सकता है, न उनको श्‍ाब्‍दश: मान कर उनका मूल्यांकन किया जा सकता है। उनकी नजर में उर्दू हिन्‍दुओं और मुसलमानों की साझी भाषा थी, और इसलिए हिन्‍दी और नागरी लिपि की मांग सांप्रदायिक मांग थी।

अपने तई वह बहुत बड़े इन्सान थे, अपने समुदाय के नेता के रूप में बहुत समर्पित नेता थे, वह रईसों को ही सम्मान का पात्र मानते थे जो उन्नीसवीं क्या बीसवीं शताब्दी तक का ऐसा मान्य सिद्धान्त था कि इस पर सन्देह करने वाले को सिरफिरा माना जा सकता था, इसलिए वह हिन्दू रईसों के साथ जिस तरह का अपनापन दिखा सकते थे, वह मुस्लिम अवाम के लिए अकल्पनीय था। कई बार लगता है कि उनका हिन्दू मुस्लिम एकता का राग भी रईसों के स्तर की एकता का ही राग था। हिन्दू रईसों में सभी उर्दू और फारसी से परिचित थे, क्योंकि वही राजकाज की भाषा थी, अतः उनका नागरी लिपि और हिन्दी को भी मान्यता दिये जाने का प्रस्ताव भी उन्हें विश्‍वासघात जैसा लगा होगा।

यह न भूलना चाहिए कि जिस भारतेन्दु ने उनसे भाषा के प्रश्‍न पर टकराव मोल लिया था उनका भी एक मुकदमे के दौरान सर सैयद ने अपनी मुंसफी के दौरान पक्ष लिया था! मामला एक रईस के सम्मान का था! और भारतेन्दु उस रियासत को नफरत करते हुए, उसकी होली जलाते हुए हिन्दी भाषी समाज के उत्थान के लिए विह्वल रहे।

शहादत के असंख्य रूप होते हैं जिसे वे, जिनको खून के रंग से अधिक प्यार है देख नहीं पाते। सर सैयद को उठा कर अपनी रोजी कमाने वालों ने भारतेन्दु का अपमान न करते हुए, सर सैयद का महत्व आंका होता तो अच्‍छी बात होती, क्योंकि चोटियों के ऊपर सिर्फ आसमान होता है, उनसे ऊपर कुछ नहीं होता!

इस विशेष मामले में मैं दोनो व्यक्तियों की तुलना कर ही नहीं सकता, क्योंकि व्यक्तित्व की ऊंचाइयों को मापने का कोई पैमाना मेरे पास नहीं है। अच्छा हो हम उनकी तुलना करने से बचें। अपना सर्वस्व उत्सर्ग करने वाले जीवित रहते हुए भी शहीद ही होते हैं।

ब्रितानी कूटविदों को बता तो मैकाले ने ही दिया था कि इतनी लंबी दूरी से, इतने कम लोगों के बल पर, इतने विशाल क्षेत्र और और इतनी बड़ी और विविधतापूर्ण जनसंख्या पर सफलतापूर्वक शासन करना आश्‍चर्यजनक है अत: शासन को लंबे समय तक जारी रखने के लिए भारतीयों की भागीदारी जरूरी है, परन्तु सर सैयद अहमद के साथ यहीं से समस्या पैदा हो जाती थी।

मुसलमानों ने अंग्रेजी सीखी नहीं थी। हिन्दुओं ने किसी तरह का प्रतिरोध दिखाया नहीं, इसलिए अंग्रेजों के लिए स्थानीय उपयोग के लिए हिन्दू सुलभ थे, जब कि मुसलमानों के सामने समस्या यह थी कि राज्य गया, पुरानी शान गई, अब क्या हराने वालों की जबान सीख कर उनके हुक्म का गुलाम बनना होगा !

यह शर्त उन्हें कबूल नहीं थी। हिन्दुओं के लिए फारसी और अंग्रेजी दोनो पराई भाषाएं थीं जिनमें से एक को छोड़ कर दूसरे को अपनाने में उनके सामने कोई मनोबाधा न थी, इसका उन्हें लाभ मिला। मनोबाधा मुसलमानों या कहें अभिजात या रईस मुसलमानों के मन में थी। उनको न भारतीय मूल के धमान्तरित मुसलमानों पर विश्‍वास था न हिन्दुओं पर। जब वे पूरे हिन्दुस्तान को अपनाने की बात करते थे तो अपना दायरा बढ़ाने के लिए धर्मान्तरित मुसलमानों के साथ एकता कायम करने की व्यग्रता प्रकट करते थे। जब अरबी लिपि और अरबी बोझिल उर्दू और नागरी में लिखी हिन्दी का प्रश्‍न आता था तो उनको यह डर रहता था कि धर्मान्तरित मुसलमान भी नागरी लिपि और हिन्दी भाषा को सुगम पा कर उसके पक्ष में चले जाएंगे। उनको अपने से जोड़ने का एक ही रास्ता धार्मिक कट्टरता को उभार कर अपनी कार्यसाधक जमात में शरीक करने का था।

हम उदाहरणों के साथ बात करने को कल तक के लिए स्थगित कर सकते हैं।

Post – 2017-02-01

हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास – 28

सर सैयद अहमद को आज तक की घटनाओं की शृंखला से जोड़ कर देखना हो तो हम कहेंगे, हिन्दु ओं और मुसलमानों को धार्मिक अलगाव से पृथक एक अलग कौम के रूप में, जिसे उनके लेखों और व्याख्यानों के अंग्रेजी अनुवादकों ने नेशन के रूप में अनूदित किया है, पेश करने के लिए जिम्मेदार मान सकते हैं। यदि उनको अपने काल में रख कर देखना चाहें तो हम उनको अपनी कौम के लिए एक युगान्तरकारी व्यक्ति कह सकते हैं जिसे समझने में हमे तुलसीदास की अपने समय की बेचैनी से कुछ मदद मिल सकती है।

कहते हैं अपने अन्तिम दिनों में अपने कई सपनों को पूरा करने के बाद भी वह निराश हो चले थे क्योंकि उनके प्रयत्नों का इच्छित परिणाम नहीं निकला था। आजीवन अपनी कौम की बेहतरी के लिए काम करने वाले इस व्य‍क्ति की इस निराशा को भी कुछ दूर तक तुलसी की व्यग्रता – कबहुं न नाथ नींद भरि सोयो – से और अपने अनुपम कार्य की अपर्याप्तता के बोध – न कियो ही कहू, करिबो न कछू, कहिबो न कछू मरिबोई रह्यो है- से समझा जा सकता है।

अपने ही समुदाय के पुरातनवादी लोगों का कुछ वैसा ही विरोध और ऊपर से उर्दू को हिन्दी प्रदेश की मान्य भाषा बनाने में आने वाली रुकावटें ।

अंग्रेज अपने ‘न्याय’ के अनुसार कभी उर्दू को उभारते और उसे फारसी बोझिल बनाने की सांप्रदायिक दलील देते जैसे उस समय के एक आईसीएस अधिकारी और राजनीतिक जरूरत से भाषाविज्ञानी बने जान बीम्स कर रहे थे जिन्हों ने तीन खंडों में उसी महत्वाकांक्षा से comparative grammar of Indo-Aryan languages, लिखा था जिसकी पूर्ति काल्डंवेल ने comparative Grammar of Dravidian languages लिख कर की थी और उत्तर को दक्षिण से, दक्षिण के बीच दरारें डाल कर, श्रीलंका के निवासियों को द्रविड़ो के विरोध में उकसा कर किया था।

फैलन दूसरे पाले से खेलते हुए हिन्दुस्तानी या सर्वबोधगम्‍य भाषा का पक्ष ले रहे थे। हम फैलन की नीयत पर सन्देह नहीं कर सकते क्यों ‍कि यह हमें सही लगता है और फैलन ने आम जनता के बीच रहकर काम भी किया था, परन्तु यह खेल तो दोनों पालों से खेले जाने पर ही जारी रह सकता था।

उर्दू की मांग पर बिहार के गवर्नर ने यह घोषित कर दिया कि यह तो विदेशी भाषा है। अब उत्तर प्रदेश के गवर्नर को उस फैसले को बदल कर निचली अदालतों की भाषा उर्दू बनानी थी। मगर यह जान बीम्स की सुझाई हुई उर्दू थी जिसे हिन्दुस्तान का आम आदमी नहीं समझ सकता था और जिसकी भाषा मुगलकालीन अदालती भाषा रखी गई थी। अब यह भाषा जनता को ठगने वालों की भाषा बन कर स्वीकृति पा रही थी।

सर सैयद को भाषा की नहीं भाषा के माध्यम से भारत पर मुगलकालीन संस्कृति के वर्चस्व की चिन्ता थी और इसमें वह कोई समझौता नहीं चाहते थे। इसके लिए वह किसी सीमा तक जा सकते थे और इसकी चिन्ता उनके अन्तिम दिनों की प्रधान चिन्ता मानी जा सकती है क्यों कि अपने इन्तकाल से पहले या कहें बेहोशी की स्थिति में पहुंचने से पहले उन्होंने जो अपने जीवन का अन्तिम लेख लिखा था वह उर्दू को ले कर ही था।

हम आज के लोकतान्त्रिक मूल्‍यों को रख कर सोचें जिसमें सर्वजनग्राह्य या बहुजनग्राह्य भाषा लोकोपयोगी होती है, तो यह अत्या चार प्रतीत होगा। अत्याचार यह था भी क्यों कि जिस तुलसी की पीड़ा का हम हवाला दे आए हैं उनका मानना था कि सार्वज निक हित (सबकर हित) सर्वोपरि है और इसलिए हम यह भी मान सकते हैं कि सैयद अहमद तुलसी से ढाई तीन सौ साल बाद में और एक नए खरल में पिसने के बाद भी उससे अधकचरे रह जाते हैं जहां तुलसी एक सिद्धान्त कार के रूप में पहुंच चुके थे।

हमें तुलसी की समाजदृष्टि को तुलसी के जीवनानुभव से देखना चाहिए और सर सैयद की समाजदृष्टि को उनके जीवनानुभवों से।

सर सैयद का पालन मुगलकालीन दरबारी परंपरा में हुआ था और उनकी चिन्ता के केन्द्र में मुस्लिम समाज का केवल अभिजात वर्ग था। जमींदारों और रियासतदारों अर्थात् रईसों को ही वह उस कौम का हिस्सा मानते थे जिसकी दशा में निरन्तरर गिरावट आ रही थी। घटनाचक्र जिस तरह का मोड़ ले रहा था उसमें कल का बादशाह पर्दा बदलते ही भिखारी हो सकता था। शासकों के जिस समर्थन पर इन रईसों का दबदबा बना हुआ था उसके उठ जाने पर वे अरक्षणीय होते जा रहे थे इसलिए उनकी पहली चिन्ता इस गिरावट को रोकने की थी। यह अब लौ नसानी अब न नसैहों का एक भिन्न पाठ था। जो लुट गया वह लुट गया अब और न लुटेंगे।

इस मानसिकता को समझने के लिए किसी ढाल पर अज्ञात गहराई की ओर सरक रहे किसी व्यक्ति की घबराहट की कल्पना करें। उसका क्या प्रयत्न होगा? अब और नीचे नहीं, जहां पहुंच गए हो वहां खूंटे की तरह जम जाओ, गिरावट से बचो, फिर ऊपर उठने की सोचो, पर नीचे एक इंच भी नहीं।

जो समतल धरातल पर जांचने पर पश्चगमन जैसा प्रतीत होता है, वह पुनरुत्थान का एक प्रयास बन जाएगा। सामान्य मानकों पर जो अन्यायपूर्ण प्रतीत होता है और जिनकी इससे हानि होनी थी उनके लिए तो यह घोर अत्याचार था, परन्तु 1865 में जब बनारस से यह मांग उठी कि नागरी लिपि को भी स्वीकृति मिले तो सर सैयद आतंकित हो गए। क्यों ? प्रस्ताव यह तो न था कि उर्दू लिपि को हटा कर नागरी लिपि को चालू किया जाय। दोनों का चलना सर सैयद को क्यों परेशान कर गया और इस प्रतिक्रिया पर क्षुब्ध हो कर भारतेन्दु काे उर्दू का मर्सिया लिखना पड़ा था। यह शोकगीत से अधिक एक व्यथा का उद्घाटन था।

परन्तु सर सैयद की चेतना में कहीं हंटर विद्यमान था या उनका अपना अनुभव भी इसका साक्षी रहा हो, कि फारसी को राजकाज की भाषा से हटा देने के बाद हिन्दुओं को आगे बढ़ने का ऐसा अवसर मिला कि वे सारे पदों पर काबिज हो गए। जो खो चुके वह खो चुके, अब आगे एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे, यही वह जिद थी जो उनकी, हमें प्रतीत होने वाली हठधर्मिता में परिलक्षित होती है, जिसे उनकी नजर से देखें तो आत्मरक्षा का संकल्प प्रतीत होगी।

इसे अकेले वह नहीं अनुभव कर रहे थे, हाली और दूसरे भी इसी तरह अनुभव कर रहे थे जिसका सार यह था कि बन्धुता तभी तक जब तक हिन्दू यह मानने को तैयार रहें कि हम कल तक मुसलमानों के शासन में रहे हैं, कंपनी ने मुसलमानों से सत्ता प्राप्त की थी और उसे यदि ऐसी नौबत आए तो लौटाना भी मुसलमानों को होगा। यदि वे इसमें बदलाव के लिए कृतसंकल्प है तो यह रिश्ता नहीं चल सकता।

इसे हम उस लेख के एक अंश को उद्धृत करते हुए अधिक सलीके से रख सकते हैं जो उनकी वर्षगांठ पर लिखा गया था: As early as the 1870’s Hali wrote, “The erstwhile spirit of friendship which had existed between the Hindus and Muslims no longer exists and the fact can be felt throughout India.” In 1867 the Hindus began the now well known Urdu-Hindi controversy from the city of Benaras. About this period, Sir Syed says, “One day I was talking to Mr. Shakespeare, Commissioner of Benaras, about the education of Muslims when he looked towards me in astonishment and said ‘Syed this is the first time that you talk about the welfare of Muslims alone. You had always talked of the Indians as a whole.’ In reply I said that I am sure that from now on Hindus and Muslims will not participate as one in any effort with sincerity.”
Syed went on to say that with the passage of time this difference will widen because of the relative differences in the numbers of educated people in the two communities. The Hindus who did not have any ideological animosity towards Western learning had taken up officially supported education very early on. By this time, they enjoyed a clear edge over the more hostile Muslims, who still held on to a false hope, an almost romantic dream, of a magical reversal of fortunes. “Whoever lives will see the truth of my words.” In reply, Mr. Shakespeare said, ”If your prophecy is correct, I would be very sorry.” Syed replied, “I have more pain in my heart, but I am sure about my prophecy.”

सैयद अहमद की भविष्यवाणी को उनके उत्तराधिकारियों ने पूरा किया।
हमें यह ध्यान रखना होगा कि सर सैयद अभिजातवादी थे, जनतांत्रिक नहीं, इसलिए हिन्दी उन्हें गंवारों की, अर्थात सार्वजनिक भाषा प्रतीत होती थी और वह उन संस्कारों में पले थे जिसमें सार्वजनिकता छोटों को मुंह लगाने का पर्याय और कमीनों को अपनी बराबरी पर बैठाने जैसा गर्हित माना जाता था। हिन्दू अभिजाात वर्ग इन संस्कारों से मुक्त था यह कहना पक्षपात होगा, परन्तु हिन्दी आरंभ से अपने तेवर में जनतांत्रिक थी।

इसे ही आक्रामक संस्कृति और देशज संस्कृति का बुनियादी अंतर मान सकते हैं। भाषा पर हंटर कमीशन के सामने सर सैयद की इस भर्त्सना के बाद कि हिन्दी गंवारों की भाषा है, भारतेन्दु का यह पलट वार कि उर्दू कोठों और शोहदों की और तफरीह करने के लिए वहां पहुंचने वाले मनचले हिन्‍दुओ की जबान है, दो अतिवाद हैं जिनमें समझदारी की संभावना उन्नींसवीं शताब्दी में ही कम हो गई थी। हां हम कह सकते हैं कि सर सैयद का हिन्दू और हिन्दी के प्रति नफरत पहले छिपी थी, अब प्रकट हो गई थी। पर गंवारों की भाषा मुस्लिम अवाम की भी भाषा थी जिससे मुस्लिम अभिजात वर्ग कार्यसाधक संबंध रखता था।