Post – 2018-03-13

हमारी भाषा (2)

शुद्ध और अशुद्ध प्रयोग

डा. निखिलेश कुमार पाठक भाषाविज्ञान के पंडित हैं। उन्होंने मेरे द्वारा इंगित अशुद्ध प्रयोगों के संदर्भ लिखा है, ‘उपरोक्त’ भी ऐसा ही प्रचलित किंतु ‘अशुद्ध’ शब्द है।

मैंने पहले अपना मंतव्य टिप्पणी के रूप में देना चाहा, पर तभी लगा समस्या बहुत महत्वपूर्ण है। इस पर विस्तार से चर्चा की जानी चाहिए। मेरे विचार न तो आधिकारिक हैं, न ही इनको सही मानने की जरूरत है। मैं अपना पक्ष रखना चाहता हूं, और चाहता हूं कि दूसरे भी अपना पक्ष रखें, ताकि हम यह समझ सकें की हिंदी भाषा की शक्तियां और सीमाएं क्या हैं। भाषा, चाहे नितान्त अविकसित हो तो भी, इतनी समृद्ध होती है कि कोई मूर्ख ही यह दावा कर सकता है कि उसे उसके समग्र भंडार पर इतना अचूक अधिकार है कि कोई साधारण जानकारी रखने वाला व्यक्ति उसमें कोई वृद्धि नहीं कर सकता। मिसाल पुरानी है, फिर भी मक्खन से लबालब भरे प्याले में एक तिनके की जगह बची रहती है और ये तिनके ऐसे ऐसे कोनों-अँतरों में बिखरे और दुबके पड़े रहते हैं कि जितनी बार तलाशो, कुछ न कुछ ऐसा हाथ लग ही जाता है जो हमें चकित कर जाए। भाषा के सम्मुख विनय ही एकमात्र गर्व का विषय हो सकता है।

आधुनिक भारतीय बोलियों में दो ऐसी हैं जिनको अपनी विशेषताओं पर गर्व है। किसी दूसरे के अनुसार ढलना जरूरी नहीं मानतीं। एक है बांग्ला और दूसरी है मराठी। हिंदी के साथ आरंभ से ही समझौते का दबाव बना रहा है। पहले फारसी और उर्दू का, फिर संस्कृत और अखिल भारतीय अपेक्षाओं का, और हाल में अंग्रेजी का कि यह अपनी सही प्रकृति को पहचान ही न सकी। एक ओर यह राजभाषा होने का गर्व पालती है और दूसरी ओर इसे इस पात्रता के लिए इसे दूसरी सभी भारतीय भाषाओं के अनुसार समायोजित होने को बाध्य किया जाता रहा। मुझे याद है तकनीकी शब्दावली के निर्माण के समय ऐसे विद्वान थे जो इस बात पर जोर देते थे यदि हिन्दी को भारतीय स्वीकार्यता पानी है तो इसे दूसरी भाषाओं से तकनीकी शब्दों का भी आयात करना चाहिए।

इसी तरह का दबाव राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के माध्यम से वर्णमाला को लेकर डाला गया था। इसमें स्वर अक्षरों और मात्राओं की भिन्नता को कम करने के लिए मात्रा चिन्हों को अ के साथ लगा कर पूरी स्वरमाला तैयार की गई थी (अ, आ, अि, अी, अु, अू आदि)। इसके प्रस्तावक स्वयं गांधीजी थे। उन्हें इसकी सलाह किसने दी थी, यह हमें मालूम नहीं । हिंदी साहित्य सम्मेलन के एक अधिवेशन में निराला जी इस सवाल पर गांधीजी से झगड़ पड़े थे। गांधीजी अपने विचारों में बहुत दृढ़ थे । जो तय कर लिया उसमें आसानी से बदलाव नहीं करते थे। इस मामले में भी नहीं किया। परंतु गांधी जी का यह प्रयोग गलत था। हिंदी को एक काल्पनिक देश की राष्ट्रभाषा नहीं बनना था। उसे भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव था जिसकी सभी भाषाओं की लिपियों में स्वर अक्षर और मात्राओं में उसी तरह का अलगाव है जैसा हिंदी में । इसलिए भारतीय स्वभाव और अक्षर ज्ञान की परिधि में नागरी का परंपरागत रूप अधिक वैज्ञानिक था और गांधीजी का सुझाया रूप अव्यावहारिक। हम इसके अधिक विस्तार में नहीं जाना चाहते क्योंकि यह हमारा आज का विषय नहीं है और आज हिंदी के लिए जिस वर्णमाला का प्रयोग होता है वह गांधीजी द्वारा सुझाई गई वर्णमाला नहीं है। हम इसके द्वारा केवल यह याद दिलाना चाहते थे हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के उत्साह में इसकी प्रकृति को बहुत दूर तक ऐंठा-मरोड़ा गया। इनमें सबसे खतरनाक था यह मानकर चलना कि संस्कृत से पूरे भारत का परिचय है, इसलिए तत्सम रूप और संस्कृत के आधार पर तैयार की गई तकनीकी शब्दावली पूरे भारत के लिए अधिक सुकर होगी। उसके परिणाम से हम परिचित हैं। हम जानते हैं सरकारी हिन्दी भाषा न रहकर जार्गन में बदल गई जिसका केवल कर्मकाडीय उपयोग ही हो सकता था। मुझे ऐसा लगता है कि अंग्रेजी के वर्चस्व के लिए ऐसा योजनाबद्ध रूप में किया गया।

यह बात समझनी होगी कि हिंदी संस्कृत की तुलना में बहुत अधिक समृद्ध भाषा है। आवश्यकता पड़ने पर यह समूची संस्कृत शब्दावली का उपयोग कर सकती है और उनके तद्भव रूपों के अर्थ वैभव पर गर्व कर सकती है। सच्चाई तो यह है संस्कृत का समस्त शब्द भंडार बोलियों से निकला है जैसे मिठाई की दुकान का समस्त माल खेतों और चरागाहों से निकला और प्रसाधित होते हुए पकवानों और मिष्ठान्नों में बदला है। खेत और किसान हलवाई के ऋणी नहीं परंतु हलवाई किसान से उऋण नहीं हो सकता। प्रकृति सिद्ध चीजें नहीं पैदा करती । वह कच्चा माल पैदा करती है। बोलियों का संस्कृत से यही संबंध है। संस्कृत बोलियों की ऋणी है, बोलियां संस्कृत की ऋणी नहीं हैं। इस तथ्य को समझ लेने के बाद हम इस बात की अपेक्षा नहीं कर सकते कि हिन्दी संस्कृत की कसौटी पर अपने को सही सिद्ध करने को विकल रहे, परन्तु यह अपेक्षा अवश्य करते हैं जहां वह साधित रूपों को अपनाए वहां उनकी शुद्धता का ध्यान अवश्य रखे।हमारी आज की चर्चा इसी विभाजन रेखा के आर पार है।

पाठक ने जो उदाहरण प्रस्तुत किया था उस पर हम इसी दृष्टिकोण से विचार कर सकते हैं। अ+उ =ओ, ऊपर+उक्त = ऊपरोक्त। यह हिन्दी हुआ, क्योंकि हिन्दी का शब्द ऊपर है, उपरि नहीं जिससे उपर्युक्त शब्द बनता। जो लोग उपरोक्त को तत्सम मान कर प्रयोग करते हैं वे गलत हैं, यदि ऊपरोक्त लिखते, और यह सोच कर लिखते कि वे हिन्दी शब्द का प्रयोग कर रहे हैं तो सही होते। परन्तु हम किसी से इस बात की अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह पहले संस्कृत सीखें और फिर उसके बाद हिंदी में लिखना बोलनाआरंभ करें। भाषा में मौलिक प्रयोग वे लोग करते हैं जो पक्के विद्वान नहीं होते और जब ऐसे लोगों द्वारा कोई प्रयोग बड़े पैमाने पर होने लगता है तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। संस्कृत के व्याकरण के अनुसार बहुत से ऐसे शब्द बनते हैं जिनका हम प्रयोग ठीक उसी रूप में नहीं करते हैं संस्कृत में राष्ट्रिय लिखा जाता है जबकि हिंदी में हम राष्ट्रीय का प्रयोग करते हैं, संस्कृत में अंताराष्ट्रिय होगा, हम हिंदी में अंतरराष्ट्रीय का प्रयोग करते हैं। अतः ये तत्सम रूप नहीं हुए, हिन्दी रूप हुए और संस्कृत के आचार्य को भी हिन्दी लिखते समय इन्हीं को प्रयोग में लाना होगा।

कुछ शब्द ऐसे हैं जिनको संस्कृत में गलत लिखा जाता है और यह प्रयोग संस्कृत के कोशों तक में देखने में आता है। उदाहरण के लिए चिन्हित। शब्दकोशों में यह चिह्नित के रूप में लिखा पाया जाता है, तत्सम शब्दों का सही प्रयोग करने की चिंता करने वाले बहुत से लोग चिह्नित लिखते हैं जबकि यह गलत है। गलत होने के दो कारण हैं । पहला यह कि हिंदी में चिन्हित बोला जाता है ना कि चिह्नित। दूसरा यह कि यह चिन् धातु से बना है जिसका अर्थ होता है आग जिसे चिंगारी, चिनचिनाहट – जलन या चिनार के पेड़ में देखा जा सकता है, जो प्रकाशित, निशान या चिह्न के लिए प्रयोग में आता है, दूसरे शब्द हैं जिनका इस समय मुझे ध्यान नहीं है परंतु हम उनको बोलियों के माध्यम से समझ सकते हैं।

मैं जिस बात के लिए मराठी और बांग्ला की प्रशंसा कर रहा था वह यह कि ये संस्कृत के अनुसार सही होने की चिंता नहीं करतीं। मराठी में सबसे अधिक बेफिक्री देखी जा सकती है। बहुत से शब्द जो संस्कृत में इकारांत हैं, मराठी उनको ईकारान्त कर देती है। हिंदी में मध्यकाल तक यह छूट दी जाती रही और यह सही था, केवल वर्तमान में आकर तत्समप्रियता बढ़ी है आैर उसके साथ इसकी कृत्रिमता और दैन्य भी।

हम कह रहे थे की संस्कृत के तत्सम रूपों की तुलना में तद्भवों से बना शब्द भंडार कहीं अधिक प्रभावशाली है। यह सुनने वालों को अति कथन प्रतीत हुआ होगा । हम इसे समझने की कोशिश करें । संस्कृत की एक धातु है खाद्, जिसे खाद्य बनता है। मैं नहीं जानता कि खाद्य के अतिरिक्त संस्कृत में इससे कितने शब्द बनते हैं, परंतु हिंदी में खाना, खाद, खूराक, खादर, खदरना और मल्लिका भोजपुरी में खयका – भोजन, खब्भू, खद्धक – अपनी कद काठी को देखते हुए अधिक खाने वाला, खखाइल- किसी चीज को पाने की अभावजन्य आतुरता। और लीजिए, इसका प्रत्यय(?) वाला ऱूप (-खोर) तो छूटा ही जा रहा था जो लतखोर, गमखोर, हरामखोर से लेकर घूसखोर, रिश्वतखोर, आदमखोर, तक जानें कितने शब्दों का जनक है। अब आप तय करें कि सांचे में ढली संस्कृत में अधिक ओजस्विता है या जमीन से जुड़ी बोलियों में? कौन किसकी जननी है? मूल रूप किसके थे और बनाया बिगाड़ा (तद्भवीकरण) किसने?

Post – 2018-03-13

हमारी भाषा (2)

शुद्ध और अशुद्ध प्रयोग

डा. निखिलेश कुमार पाठक भाषाविज्ञान के पंडित हैं। उन्होंने मेरे द्वारा इंगित अशुद्ध प्रयोगों के संदर्भ लिखा है, ‘उपरोक्त’ भी ऐसा ही प्रचलित किंतु ‘अशुद्ध’ शब्द है।

मैंने पहले अपना मंतव्य टिप्पणी के रूप में देना चाहा, पर तभी लगा समस्या बहुत महत्वपूर्ण है। इस पर विस्तार से चर्चा की जानी चाहिए। मेरे विचार न तो आधिकारिक हैं, न ही इनको सही मानने की जरूरत है। मैं अपना पक्ष रखना चाहता हूं, और चाहता हूं कि दूसरे भी अपना पक्ष रखें, ताकि हम यह समझ सकें की हिंदी भाषा की शक्तियां और सीमाएं क्या हैं। भाषा, चाहे नितान्त अविकसित हो तो भी, इतनी समृद्ध होती है कि कोई मूर्ख ही यह दावा कर सकता है कि उसे उसके समग्र भंडार पर इतना अचूक अधिकार है कि कोई साधारण जानकारी रखने वाला व्यक्ति उसमें कोई वृद्धि नहीं कर सकता। मिसाल पुरानी है, फिर भी मक्खन से लबालब भरे प्याले में एक तिनके की जगह बची रहती है और ये तिनके ऐसे ऐसे कोनों-अँतरों में बिखरे और दुबके पड़े रहते हैं कि जितनी बार तलाशो, कुछ न कुछ ऐसा हाथ लग ही जाता है जो हमें चकित कर जाए। भाषा के सम्मुख विनय ही एकमात्र गर्व का विषय हो सकता है।

आधुनिक भारतीय बोलियों में दो ऐसी हैं जिनको अपनी विशेषताओं पर गर्व है। किसी दूसरे के अनुसार ढलना जरूरी नहीं मानतीं। एक है बांग्ला और दूसरी है मराठी। हिंदी के साथ आरंभ से ही समझौते का दबाव बना रहा है। पहले फारसी और उर्दू का, फिर संस्कृत और अखिल भारतीय अपेक्षाओं का, और हाल में अंग्रेजी का कि यह अपनी सही प्रकृति को पहचान ही न सकी। एक ओर यह राजभाषा होने का गर्व पालती है और दूसरी ओर इसे इस पात्रता के लिए इसे दूसरी सभी भारतीय भाषाओं के अनुसार समायोजित होने को बाध्य किया जाता रहा। मुझे याद है तकनीकी शब्दावली के निर्माण के समय ऐसे विद्वान थे जो इस बात पर जोर देते थे यदि हिन्दी को भारतीय स्वीकार्यता पानी है तो इसे दूसरी भाषाओं से तकनीकी शब्दों का भी आयात करना चाहिए।

इसी तरह का दबाव राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के माध्यम से वर्णमाला को लेकर डाला गया था। इसमें स्वर अक्षरों और मात्राओं की भिन्नता को कम करने के लिए मात्रा चिन्हों को अ के साथ लगा कर पूरी स्वरमाला तैयार की गई थी (अ, आ, अि, अी, अु, अू आदि)। इसके प्रस्तावक स्वयं गांधीजी थे। उन्हें इसकी सलाह किसने दी थी, यह हमें मालूम नहीं । हिंदी साहित्य सम्मेलन के एक अधिवेशन में निराला जी इस सवाल पर गांधीजी से झगड़ पड़े थे। गांधीजी अपने विचारों में बहुत दृढ़ थे । जो तय कर लिया उसमें आसानी से बदलाव नहीं करते थे। इस मामले में भी नहीं किया। परंतु गांधी जी का यह प्रयोग गलत था। हिंदी को एक काल्पनिक देश की राष्ट्रभाषा नहीं बनना था। उसे भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव था जिसकी सभी भाषाओं की लिपियों में स्वर अक्षर और मात्राओं में उसी तरह का अलगाव है जैसा हिंदी में । इसलिए भारतीय स्वभाव और अक्षर ज्ञान की परिधि में नागरी का परंपरागत रूप अधिक वैज्ञानिक था और गांधीजी का सुझाया रूप अव्यावहारिक। हम इसके अधिक विस्तार में नहीं जाना चाहते क्योंकि यह हमारा आज का विषय नहीं है और आज हिंदी के लिए जिस वर्णमाला का प्रयोग होता है वह गांधीजी द्वारा सुझाई गई वर्णमाला नहीं है। हम इसके द्वारा केवल यह याद दिलाना चाहते थे हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के उत्साह में इसकी प्रकृति को बहुत दूर तक ऐंठा-मरोड़ा गया। इनमें सबसे खतरनाक था यह मानकर चलना कि संस्कृत से पूरे भारत का परिचय है, इसलिए तत्सम रूप और संस्कृत के आधार पर तैयार की गई तकनीकी शब्दावली पूरे भारत के लिए अधिक सुकर होगी। उसके परिणाम से हम परिचित हैं। हम जानते हैं सरकारी हिन्दी भाषा न रहकर जार्गन में बदल गई जिसका केवल कर्मकाडीय उपयोग ही हो सकता था। मुझे ऐसा लगता है कि अंग्रेजी के वर्चस्व के लिए ऐसा योजनाबद्ध रूप में किया गया।

यह बात समझनी होगी कि हिंदी संस्कृत की तुलना में बहुत अधिक समृद्ध भाषा है। आवश्यकता पड़ने पर यह समूची संस्कृत शब्दावली का उपयोग कर सकती है और उनके तद्भव रूपों के अर्थ वैभव पर गर्व कर सकती है। सच्चाई तो यह है संस्कृत का समस्त शब्द भंडार बोलियों से निकला है जैसे मिठाई की दुकान का समस्त माल खेतों और चरागाहों से निकला और प्रसाधित होते हुए पकवानों और मिष्ठान्नों में बदला है। खेत और किसान हलवाई के ऋणी नहीं परंतु हलवाई किसान से उऋण नहीं हो सकता। प्रकृति सिद्ध चीजें नहीं पैदा करती । वह कच्चा माल पैदा करती है। बोलियों का संस्कृत से यही संबंध है। संस्कृत बोलियों की ऋणी है, बोलियां संस्कृत की ऋणी नहीं हैं। इस तथ्य को समझ लेने के बाद हम इस बात की अपेक्षा नहीं कर सकते कि हिन्दी संस्कृत की कसौटी पर अपने को सही सिद्ध करने को विकल रहे, परन्तु यह अपेक्षा अवश्य करते हैं जहां वह साधित रूपों को अपनाए वहां उनकी शुद्धता का ध्यान अवश्य रखे।हमारी आज की चर्चा इसी विभाजन रेखा के आर पार है।

पाठक ने जो उदाहरण प्रस्तुत किया था उस पर हम इसी दृष्टिकोण से विचार कर सकते हैं। अ+उ =ओ, ऊपर+उक्त = ऊपरोक्त। यह हिन्दी हुआ, क्योंकि हिन्दी का शब्द ऊपर है, उपरि नहीं जिससे उपर्युक्त शब्द बनता। जो लोग उपरोक्त को तत्सम मान कर प्रयोग करते हैं वे गलत हैं, यदि ऊपरोक्त लिखते, और यह सोच कर लिखते कि वे हिन्दी शब्द का प्रयोग कर रहे हैं तो सही होते। परन्तु हम किसी से इस बात की अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह पहले संस्कृत सीखें और फिर उसके बाद हिंदी में लिखना बोलनाआरंभ करें। भाषा में मौलिक प्रयोग वे लोग करते हैं जो पक्के विद्वान नहीं होते और जब ऐसे लोगों द्वारा कोई प्रयोग बड़े पैमाने पर होने लगता है तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। संस्कृत के व्याकरण के अनुसार बहुत से ऐसे शब्द बनते हैं जिनका हम प्रयोग ठीक उसी रूप में नहीं करते हैं संस्कृत में राष्ट्रिय लिखा जाता है जबकि हिंदी में हम राष्ट्रीय का प्रयोग करते हैं, संस्कृत में अंताराष्ट्रिय होगा, हम हिंदी में अंतरराष्ट्रीय का प्रयोग करते हैं। अतः ये तत्सम रूप नहीं हुए, हिन्दी रूप हुए और संस्कृत के आचार्य को भी हिन्दी लिखते समय इन्हीं को प्रयोग में लाना होगा।

कुछ शब्द ऐसे हैं जिनको संस्कृत में गलत लिखा जाता है और यह प्रयोग संस्कृत के कोशों तक में देखने में आता है। उदाहरण के लिए चिन्हित। शब्दकोशों में यह चिह्नित के रूप में लिखा पाया जाता है, तत्सम शब्दों का सही प्रयोग करने की चिंता करने वाले बहुत से लोग चिह्नित लिखते हैं जबकि यह गलत है। गलत होने के दो कारण हैं । पहला यह कि हिंदी में चिन्हित बोला जाता है ना कि चिह्नित। दूसरा यह कि यह चिन् धातु से बना है जिसका अर्थ होता है आग जिसे चिंगारी, चिनचिनाहट – जलन या चिनार के पेड़ में देखा जा सकता है, जो प्रकाशित, निशान या चिह्न के लिए प्रयोग में आता है, दूसरे शब्द हैं जिनका इस समय मुझे ध्यान नहीं है परंतु हम उनको बोलियों के माध्यम से समझ सकते हैं।

मैं जिस बात के लिए मराठी और बांग्ला की प्रशंसा कर रहा था वह यह कि ये संस्कृत के अनुसार सही होने की चिंता नहीं करतीं। मराठी में सबसे अधिक बेफिक्री देखी जा सकती है। बहुत से शब्द जो संस्कृत में इकारांत हैं, मराठी उनको ईकारान्त कर देती है। हिंदी में मध्यकाल तक यह छूट दी जाती रही और यह सही था, केवल वर्तमान में आकर तत्समप्रियता बढ़ी है आैर उसके साथ इसकी कृत्रिमता और दैन्य भी।

हम कह रहे थे की संस्कृत के तत्सम रूपों की तुलना में तद्भवों से बना शब्द भंडार कहीं अधिक प्रभावशाली है। यह सुनने वालों को अति कथन प्रतीत हुआ होगा । हम इसे समझने की कोशिश करें । संस्कृत की एक धातु है खाद्, जिसे खाद्य बनता है। मैं नहीं जानता कि खाद्य के अतिरिक्त संस्कृत में इससे कितने शब्द बनते हैं, परंतु हिंदी में खाना, खाद, खूराक, खादर, खदरना और मल्लिका भोजपुरी में खयका – भोजन, खब्भू, खद्धक – अपनी कद काठी को देखते हुए अधिक खाने वाला, खखाइल- किसी चीज को पाने की अभावजन्य आतुरता। और लीजिए, इसका प्रत्यय(?) वाला ऱूप (-खोर) तो छूटा ही जा रहा था जो लतखोर, गमखोर, हरामखोर से लेकर घूसखोर, रिश्वतखोर, आदमखोर, तक जानें कितने शब्दों का जनक है। अब आप तय करें कि सांचे में ढली संस्कृत में अधिक ओजस्विता है या जमीन से जुड़ी बोलियों में? कौन किसकी जननी है? मूल रूप किसके थे और बनाया बिगाड़ा (तद्भवीकरण) किसने?

Post – 2018-03-12

हमारी भाषा
हमारे देश की भाषाएं एक दूसरे में घुलती मिलती कैसे अपने वर्तमान रूप में आई हैं इसके बारे में मेरी जानकारी बहुत साफ नहीं है, परंतु इस विषय में मेरी दृष्टि बहुत साफ है कि सभी के तत्व सभी में मिलते रहे हैं । इसका कारण यह रहा है कि सभी भाषाभाषियों के छोटे-छोटे दल उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक बहुत प्राचीन काल से फैले रहे हैं। अतः भाषा ही नहीं, सभी समुदायों की सामाजिक निर्मित में भी अनेकानेक समुदायों की भागीदारी रही है। इसका आभास मुझे स्थान नामों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन करने के क्रम में हुआ था। इसको समझने के प्रयास में मेरी जो दृष्टि बनी उससे मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि भाषा विज्ञान का ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन राजनीतिक वर्चस्व की चिंता में उल्टी दिशा में मुड़ गया।

यह बात मैं पहले भी कह चुका हूं कि समाज की रचना और भाषाओं का विकास एक दूसरे से इस सीमा तक प्रभावित रहा है कि अक्सर यह तय करना कठिन होता है कि कौन सा शब्द किस भाषा समुदाय का है। यहां मैं एक उदाहरण से अपनी बात स्पष्ट करना चाहूंगा । तीन दिन पहले की पोस्ट में अजित वडनेरकर ने हिंदी में चल रही एक प्रवृत्ति के संदर्भ में यह प्रश्न किया था कि आदर सूचक कथन में हमें आपके साथ एकवचन की क्रिया का प्रयोग करना चाहिए या बहुवचन का। लोगों ने इस पर अपना अपना विचार रखा था और अधिकांश की मान्यता यह थी की बहुवचन रूप अधिक सही है।

संभव है उनको लगा हो कि जो प्रयोग सबसे अधिक लोग करते हैं, वह सही है और दूसरा गलत। परंतु किसी प्रयोग की शुद्धता इस बात से तय नहीं की जा सकती कि अधिक लोग किस प्रयोग के पक्ष में हैं। इससे केवल इतना ही तय होता है कि कौन सा प्रयोग भाषा में अधिक लोगों की समझ में आता है या कौन सा अधिक लोकप्रिय है। सही गलत का निर्णय केवल व्याकरण से ही हो सकता है। यह दूसरी बात है कि गलत प्रयोग लंबे समय तक बहुत सारे लोगों के द्वारा चलता रहे तो उसे सही न भी माना जाय तो भी सह्य मान लिया जाता है। वह सुनने वाले को अटपटा नहीं लगता। उदाहरण के लिए आज के दिनों में मैंने भाषा के जानकार माने जाने वाले लोगों द्वारा भी आभिजात्य का गलत प्रयोग होते देखा है – वह ‘अभिजात्य वर्ग के हैं’, जबकि होना चाहिए ‘अभिजात वर्ग के है’, उनमें अभिजात्य पाया जाता है। बहुतों द्वारा प्रयुक्त होने के बाद भी गलत प्रयोग गलत ही रहता है, भले उसे सहन कर लिया जाए।

भाषा में एक ही भाव विचार या वस्तु के लिए अनेक शब्दों का प्रयोग होता है जिन्हें हम ‘पर्याय’ कहते हैं। इनमें से कोई एक अधिक लोगों की समझ में आता है, या सभी की समझ में आता है और दूसरा या तो आसानी से समझ में नहीं आता या, आता भी है तो, कुछ अटपटा लगता है, क्योंकि उसका यदाकदा ही प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए हम ‘वजन’ और ‘भार’ को ले सकते हैं। सामान्यतः हम पूछते हैं, ‘इसका वजन क्या है?’, न कि ‘इसका भार क्या है?’ परंतु अधिक लोग कहते हैं, ‘यह चीज भारी है’ न कि ‘वजनी है’। कहें व्याकरण की दृष्टि से दोनों प्रयोग सही हैं, परंतु एक का संज्ञा रूप अधिक प्रचलित है तो दूसरे का विशेषण रूप।

‘प्रचलित’ और ‘अल्प प्रचलित’ के बीच अंतर यह है कि बहुत प्रचलित का प्रयोग करने वाला उस भाषाई समुदाय का व्यक्ति प्रतीत होता है, जबकि अल्प प्रचलित का प्रयोग करने वाला बाहरी या अजनबी। यहां तक की यदि किसी भाषिक परिवेश में गलत प्रयोग प्रचलित हो तो उसमें सही प्रयोग करने वाला ही अजनबी प्रतीत होता है। उत्तर प्रदेश में सामर्थ्य का प्रयोग स्त्रीलिंग में किया जाता है जबकि मध्य प्रदेश में इसका प्रयोग पुल्लिंग में किया जाता है, जो कि सही है। उत्तर प्रदेश में सही बोलने वाला पहचान में आ जाएगा कि यह बाहरी है, मध्यप्रदेश में गलत बोलने वाला पकड़ा जाएगा और ऐसा भी लगेगा कि इसे हिंदी का सही ज्ञान नहीं है।

इसलिए कुछ भाषाविदों का विचार है कि सही गलत व्याकरण से निश्चित नहीं होता, लोक व्यवहार से होता है। यदि गलत प्रयोग स्वीकार्य है और इससे अर्थभ्रम नहीं पैदा होता तो इसे लेकर कोई आपत्ति नहीं की जा सकती। यह उदारता गैरभाषाई समुदायों में किसी भाषा की लोकप्रियता को बढ़ाती है और व्याकरण की दृष्टि से साधु न होते हुए भी इसकी ओर ध्यान नहीं दिया जाता या इसे भाषा की आंचलिक शैली मान लिया जाता है।

सरकारी तकनीकी शब्दावली में गलत कुछ नहीं है, परंतु इसमें सबसे बड़ी गलती यह थी इसमें प्रचलित शब्दों के लिए नए शब्द बनाए गए जिनकी जरूरत नहीं थी। हमारी बोलचाल की भाषा में यदि पहसे कोई आसान और प्रचलित शब्द है, तो लोग नए शब्दों की जरूरत नहीं अनुभव करते हैं। नया शब्जाद गढ़े जाने के बाद भी उसी का प्रयोग करना पसंद करते हैं। किसी भाषा में किसी भाव या वस्तु के लिए पहले से प्रचलित शब्द के लिए किसी भी कारण नया शब्द गढ़ना भाषाई हिंसा है जो भाषा तक सीमित नहीं रहती, उस भाषाई समुदाय के मन में भी क्षोभ पैदा करती है, भले यह शान्त जल में पड़ी कंकड़ी की तरह यह बहुत मामूली प्रतीत हो। सरकारी हिंदी के प्रति सामान्य जनों के क्षोभ से हम इसे समझ सकते हैं।

इसका एक कारण यह है #नैसर्गिक शब्दों को छोड़कर गढ़े हुए शब्दों का सहज अर्थ नहीं हुआ करता। अर्थ उस पर आरोपित किया जाता है, जिसमें यह जानना जरूरी होता है, इसका प्रयोग अमुक शब्द के लिए हो रहा है। अर्थात्, इसका सीधा संबंध निर्दिष्ट वस्तु या क्रिया से नहीं होता अपितु उस शब्द से होता है जिसे यह स्थानांतरित करता है। यदि यह उससे आसान हुआ तो पिछले शब्द को स्थानांतरित कर देता है, यदि कठिन हुआ तो पिछला शब्द इसके लिए चुनौती बना रहता है और लोगों को इसे सीखने के लिए बाध्य किया जाता है तो उनके मन में एक दबा प्रतिरोध बना रह जाता है।

उदाहरण के लिए हम ‘दफ्तर’ के लिए ‘ऑफिस’ का प्रयोग करने लगे और फिर दफ्तर और ऑफिस दोनों को छोड़कर कार्यालय शब्द गढ़ा गया। परंतु कार्यालय का अर्थ कारखाना भी हो सकता है, अर्थ की दृष्टि से दोनों में कोई अंतर नहीं है। ‘कार्यालय‘, ‘दफ्तर‘ और ‘ऑफिस‘ दोनों की तुलना में उच्चारण में दुष्कर है और आकार में दोनों से लंबा भी है, बोलने, सुनने और लिखने में उनकी अपेक्षा अधिक समय लेता है। इससे एक विचित्र स्थिति पैदा होती है – लिखते समय हम कार्यालय लिखते हैं परंतु बोलते समय ऑफिस या दफ्तर बोलते हैं । हिंदी में लिखित भाषा और बोलचाल की भाषा का यह अंतर बहुत उलझन पैदा करता है। इससे अहिंदी भाषियों की हिंदी सीखने की कठिनाई बढ़ जाती है। आप कह सकते हैं जिस तर्क से दफ्तर के होते हुए ऑफिस का प्रचलन हुआ उसी तरह इन दोनों के स्थान पर हिंदी के लिए कार्यालय शब्द क्यों नहीं रखा जा सकता। यहां हमसे एक भूल होती है । दफ्तर की जगह आफिस शब्द नहीं आया, एक भाषा की जगह है दूसरी भाषा आई, जिसमें यह शब्द पहले से प्रचलित था और व्यवहार से यह हिंदी का भी शब्द बन गया, क्योंकि हिंदी में पहले से इस संस्था के लिए कोई शब्द नहीं था और अब इसकी जरूरत नहीं थी, क्योंकि हिंदी में इसके लिए पहले से शब्द अपनाए जा चुके थे। कार्यालय भाषा की जरूरत नहीं थी, शुद्धतावादियों की जरूरत थी, जबकि भाषा शुद्धतावादी नहीं होती, व्यावहारिक होती है।

यहां प्रश्न सम्मान सूचक क्रियापद का था। प्रश्न यह था कि पत्रकारों में यह नई प्रवृत्ति देखी गई है कि वे बहुवचन क्रियापद का प्रयोग नहीं करते या कुछ लोगों ने यह नई प्रवृत्ति आरंभ की है। प्रश्न यह नहीं है कि यह सही है या गलत, अपितु यह प्रशंसनीय है या नहीं। कोई भाषा का किस रूप में प्रयोग करता है इस पर हमारा अधिकार नहीं लोगों को गाली देने से रोक नहीं सकते केवल उनके बारे में बना सकते हैं। मेरा अनुमान है कि यह पश्चिम की नकल है जिसमें आदर सूचक संबोधनों को पिछड़ेपन का सूचक माना जाने लगा हैऔर सीधे नाम से संबोधन को अधिक लोकतांत्रिक और आधुनिक समझा जाता है। हमें इसकी आदत नहीं है या अधिकांश लोग अभी सामंती मानसिकता से बाहर नहीं आए हैं, इसलिए उनको यह और अशोभन प्रतीत होता है। यहां टकराव सांस्कृतिक प्रक्रिया का है स्वतंत्रता के बाद हमारे समाज में सामंतवादी मूल्यों की वापसी हुई है और लोग अपने बच्चों के लिए भी आदर सूचक संबोधन का प्रयोग करते हैं, यह उच्चतर जीवन की आकांक्षा के साथ जुड़ा हुआ है। ऐसा पहले नहीं था, कम से कम स्वतंत्रता के आंदोलन के दौर में नहीं था। हमारे गांव देहात में भी यह नहीं था। हमारे विपरीत पश्चिमी जगत में यह मनोवृत्ति पहले थी लोकतांत्रिक चेतना के विकास के साथ इसमें लगातार कमी आई है।

‘आप जाते हो‘, या ‘आप जाते हैं‘, यहां दो बातों पर ध्यान देना होगा। यह कि ‘आप‘ कहने के बाद क्या बहुवचन की क्रिया लगाना जरूरी है। संस्कृत में प्रचलित है सम्मान प्रकट करने के लिए बहुवचन का प्रयोग किया जाना चाहिए, सम्मानित व्यक्ति अकेला होते हुए भी बहुत सारे लोगों के बराबर है, आदरे बहुवचनं। यह कब आरंभ हुआ यह हम नहीं जानते। कम से कम वैदिक भाषा में इसकी जरूरत नहीं समझी गई है । उसमें आदर के लिए बहुवचन का प्रयोग नहीं मिलता। ऋग्वेद में भवान् शब्द का भी प्रयोग नहीं हुआ है। विचारणीय यह है संस्कृत में आदर सूचक सर्वनाम कहां से आया ? मैं जिस बोली को भारोपीय भाषा की आदि जननी मान्यता हूं उसमें आदर सूचक संबोधन कम से कम मेरी जानकारी में नहीं था अब पाया जाता है। जैसे हिंदी में ‘तू‘‘, ‘तुम‘ और ‘आप‘ का प्रयोग करते हैं ठीक इसी तरह तमिल में ‘नी‘, ‘नींगल‘ और ‘तांगल‘ का प्रयोग होता है। संस्कृत में तू के लिए कोई शब्द नहीं पाया जाता । सामान्य स्थितियों में भवान् का प्रयोग नहीं किया जाता। सम्मान जताने के लिए अलग से,‘देव‘. ‘देवि‘, ‘राजन्‘, आदि का प्रचलन रहा है। इसका सीधा अर्थ है कि हमारी बोलियों में सामाजिक स्तरभेद संस्कृत की अपेक्षा अधिक गहरा है। इसका मतलब है आदर सूचक सर्वनाम और क्रियारूपों का बहुवचन प्रयोग बोलियों में और आधुनिक भारतीय भाषाओं में संस्कृत से नहीं आए, आदरे बहुवचनं संस्कृत पर बोलियों का प्रभाव है।

अब तमिल आदि में आदरार्थक प्रयोग को देखते हुए हम यह कह सकते हैं की आधुनिक बोलियों में आदरार्थक बहुवचन और क्रियारूप द्रविड़ बोलियों में से किसी के प्रभाव के कारण आया है। ऐसा सोचना इसलिए भी सही लगता है कि आधुनिक बोलियों में नी के स्थान पर तू, नींगल के स्थान पर तुम और तांगल के स्थान पर आप समानांतर पाया ही जाता है, क्रिया रूप में भी दोनों में बहुवचन के प्रयोग में आते हैं । द्रविड़ भाषाओं में यह अधिक नियमित है और इस का तार्किक आधार भी अधिक मजबूत है वहां अमहत और महत का भेद चलता है। इसी के अनुसार उसका लिंग विधान भी है। संस्कृत में और आधुनिक बेोलियों में लिंग व्यवस्था द्रविड़ से आई लगती है । संभव है इसकी जड़ें और पीछे जाती हों परंतु वह वहां तक मेरी गति नहीं है। कोरियाई और जापानी भाषा में तो आदरार्थक काइतना अधिक प्रयोग होता है एक स्थिति में आदर सूचक दूसरी परिस्थितियों में अनादर सूचक हो जाता है इसलिए शिक्षक सलाह देते हैं कि जब तक भाषा पर बहुत अधिकार न हो जाए तब तक आदरसूचक संबोधनों का प्रयोग न किया जाए।

Post – 2018-03-12

हमारी भाषा
हमारे देश की भाषाएं एक दूसरे में घुलती मिलती कैसे अपने वर्तमान रूप में आई हैं इसके बारे में मेरी जानकारी बहुत साफ नहीं है, परंतु इस विषय में मेरी दृष्टि बहुत साफ है कि सभी के तत्व सभी में मिलते रहे हैं । इसका कारण यह रहा है कि सभी भाषाभाषियों के छोटे-छोटे दल उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक बहुत प्राचीन काल से फैले रहे हैं। अतः भाषा ही नहीं, सभी समुदायों की सामाजिक निर्मित में भी अनेकानेक समुदायों की भागीदारी रही है। इसका आभास मुझे स्थान नामों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन करने के क्रम में हुआ था। इसको समझने के प्रयास में मेरी जो दृष्टि बनी उससे मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि भाषा विज्ञान का ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन राजनीतिक वर्चस्व की चिंता में उल्टी दिशा में मुड़ गया।

यह बात मैं पहले भी कह चुका हूं कि समाज की रचना और भाषाओं का विकास एक दूसरे से इस सीमा तक प्रभावित रहा है कि अक्सर यह तय करना कठिन होता है कि कौन सा शब्द किस भाषा समुदाय का है। यहां मैं एक उदाहरण से अपनी बात स्पष्ट करना चाहूंगा । तीन दिन पहले की पोस्ट में अजित वडनेरकर ने हिंदी में चल रही एक प्रवृत्ति के संदर्भ में यह प्रश्न किया था कि आदर सूचक कथन में हमें आपके साथ एकवचन की क्रिया का प्रयोग करना चाहिए या बहुवचन का। लोगों ने इस पर अपना अपना विचार रखा था और अधिकांश की मान्यता यह थी की बहुवचन रूप अधिक सही है।

संभव है उनको लगा हो कि जो प्रयोग सबसे अधिक लोग करते हैं, वह सही है और दूसरा गलत। परंतु किसी प्रयोग की शुद्धता इस बात से तय नहीं की जा सकती कि अधिक लोग किस प्रयोग के पक्ष में हैं। इससे केवल इतना ही तय होता है कि कौन सा प्रयोग भाषा में अधिक लोगों की समझ में आता है या कौन सा अधिक लोकप्रिय है। सही गलत का निर्णय केवल व्याकरण से ही हो सकता है। यह दूसरी बात है कि गलत प्रयोग लंबे समय तक बहुत सारे लोगों के द्वारा चलता रहे तो उसे सही न भी माना जाय तो भी सह्य मान लिया जाता है। वह सुनने वाले को अटपटा नहीं लगता। उदाहरण के लिए आज के दिनों में मैंने भाषा के जानकार माने जाने वाले लोगों द्वारा भी आभिजात्य का गलत प्रयोग होते देखा है – वह ‘अभिजात्य वर्ग के हैं’, जबकि होना चाहिए ‘अभिजात वर्ग के है’, उनमें अभिजात्य पाया जाता है। बहुतों द्वारा प्रयुक्त होने के बाद भी गलत प्रयोग गलत ही रहता है, भले उसे सहन कर लिया जाए।

भाषा में एक ही भाव विचार या वस्तु के लिए अनेक शब्दों का प्रयोग होता है जिन्हें हम ‘पर्याय’ कहते हैं। इनमें से कोई एक अधिक लोगों की समझ में आता है, या सभी की समझ में आता है और दूसरा या तो आसानी से समझ में नहीं आता या, आता भी है तो, कुछ अटपटा लगता है, क्योंकि उसका यदाकदा ही प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए हम ‘वजन’ और ‘भार’ को ले सकते हैं। सामान्यतः हम पूछते हैं, ‘इसका वजन क्या है?’, न कि ‘इसका भार क्या है?’ परंतु अधिक लोग कहते हैं, ‘यह चीज भारी है’ न कि ‘वजनी है’। कहें व्याकरण की दृष्टि से दोनों प्रयोग सही हैं, परंतु एक का संज्ञा रूप अधिक प्रचलित है तो दूसरे का विशेषण रूप।

‘प्रचलित’ और ‘अल्प प्रचलित’ के बीच अंतर यह है कि बहुत प्रचलित का प्रयोग करने वाला उस भाषाई समुदाय का व्यक्ति प्रतीत होता है, जबकि अल्प प्रचलित का प्रयोग करने वाला बाहरी या अजनबी। यहां तक की यदि किसी भाषिक परिवेश में गलत प्रयोग प्रचलित हो तो उसमें सही प्रयोग करने वाला ही अजनबी प्रतीत होता है। उत्तर प्रदेश में सामर्थ्य का प्रयोग स्त्रीलिंग में किया जाता है जबकि मध्य प्रदेश में इसका प्रयोग पुल्लिंग में किया जाता है, जो कि सही है। उत्तर प्रदेश में सही बोलने वाला पहचान में आ जाएगा कि यह बाहरी है, मध्यप्रदेश में गलत बोलने वाला पकड़ा जाएगा और ऐसा भी लगेगा कि इसे हिंदी का सही ज्ञान नहीं है।

इसलिए कुछ भाषाविदों का विचार है कि सही गलत व्याकरण से निश्चित नहीं होता, लोक व्यवहार से होता है। यदि गलत प्रयोग स्वीकार्य है और इससे अर्थभ्रम नहीं पैदा होता तो इसे लेकर कोई आपत्ति नहीं की जा सकती। यह उदारता गैरभाषाई समुदायों में किसी भाषा की लोकप्रियता को बढ़ाती है और व्याकरण की दृष्टि से साधु न होते हुए भी इसकी ओर ध्यान नहीं दिया जाता या इसे भाषा की आंचलिक शैली मान लिया जाता है।

सरकारी तकनीकी शब्दावली में गलत कुछ नहीं है, परंतु इसमें सबसे बड़ी गलती यह थी इसमें प्रचलित शब्दों के लिए नए शब्द बनाए गए जिनकी जरूरत नहीं थी। हमारी बोलचाल की भाषा में यदि पहसे कोई आसान और प्रचलित शब्द है, तो लोग नए शब्दों की जरूरत नहीं अनुभव करते हैं। नया शब्जाद गढ़े जाने के बाद भी उसी का प्रयोग करना पसंद करते हैं। किसी भाषा में किसी भाव या वस्तु के लिए पहले से प्रचलित शब्द के लिए किसी भी कारण नया शब्द गढ़ना भाषाई हिंसा है जो भाषा तक सीमित नहीं रहती, उस भाषाई समुदाय के मन में भी क्षोभ पैदा करती है, भले यह शान्त जल में पड़ी कंकड़ी की तरह यह बहुत मामूली प्रतीत हो। सरकारी हिंदी के प्रति सामान्य जनों के क्षोभ से हम इसे समझ सकते हैं।

इसका एक कारण यह है #नैसर्गिक शब्दों को छोड़कर गढ़े हुए शब्दों का सहज अर्थ नहीं हुआ करता। अर्थ उस पर आरोपित किया जाता है, जिसमें यह जानना जरूरी होता है, इसका प्रयोग अमुक शब्द के लिए हो रहा है। अर्थात्, इसका सीधा संबंध निर्दिष्ट वस्तु या क्रिया से नहीं होता अपितु उस शब्द से होता है जिसे यह स्थानांतरित करता है। यदि यह उससे आसान हुआ तो पिछले शब्द को स्थानांतरित कर देता है, यदि कठिन हुआ तो पिछला शब्द इसके लिए चुनौती बना रहता है और लोगों को इसे सीखने के लिए बाध्य किया जाता है तो उनके मन में एक दबा प्रतिरोध बना रह जाता है।

उदाहरण के लिए हम ‘दफ्तर’ के लिए ‘ऑफिस’ का प्रयोग करने लगे और फिर दफ्तर और ऑफिस दोनों को छोड़कर कार्यालय शब्द गढ़ा गया। परंतु कार्यालय का अर्थ कारखाना भी हो सकता है, अर्थ की दृष्टि से दोनों में कोई अंतर नहीं है। ‘कार्यालय‘, ‘दफ्तर‘ और ‘ऑफिस‘ दोनों की तुलना में उच्चारण में दुष्कर है और आकार में दोनों से लंबा भी है, बोलने, सुनने और लिखने में उनकी अपेक्षा अधिक समय लेता है। इससे एक विचित्र स्थिति पैदा होती है – लिखते समय हम कार्यालय लिखते हैं परंतु बोलते समय ऑफिस या दफ्तर बोलते हैं । हिंदी में लिखित भाषा और बोलचाल की भाषा का यह अंतर बहुत उलझन पैदा करता है। इससे अहिंदी भाषियों की हिंदी सीखने की कठिनाई बढ़ जाती है। आप कह सकते हैं जिस तर्क से दफ्तर के होते हुए ऑफिस का प्रचलन हुआ उसी तरह इन दोनों के स्थान पर हिंदी के लिए कार्यालय शब्द क्यों नहीं रखा जा सकता। यहां हमसे एक भूल होती है । दफ्तर की जगह आफिस शब्द नहीं आया, एक भाषा की जगह है दूसरी भाषा आई, जिसमें यह शब्द पहले से प्रचलित था और व्यवहार से यह हिंदी का भी शब्द बन गया, क्योंकि हिंदी में पहले से इस संस्था के लिए कोई शब्द नहीं था और अब इसकी जरूरत नहीं थी, क्योंकि हिंदी में इसके लिए पहले से शब्द अपनाए जा चुके थे। कार्यालय भाषा की जरूरत नहीं थी, शुद्धतावादियों की जरूरत थी, जबकि भाषा शुद्धतावादी नहीं होती, व्यावहारिक होती है।

यहां प्रश्न सम्मान सूचक क्रियापद का था। प्रश्न यह था कि पत्रकारों में यह नई प्रवृत्ति देखी गई है कि वे बहुवचन क्रियापद का प्रयोग नहीं करते या कुछ लोगों ने यह नई प्रवृत्ति आरंभ की है। प्रश्न यह नहीं है कि यह सही है या गलत, अपितु यह प्रशंसनीय है या नहीं। कोई भाषा का किस रूप में प्रयोग करता है इस पर हमारा अधिकार नहीं लोगों को गाली देने से रोक नहीं सकते केवल उनके बारे में बना सकते हैं। मेरा अनुमान है कि यह पश्चिम की नकल है जिसमें आदर सूचक संबोधनों को पिछड़ेपन का सूचक माना जाने लगा हैऔर सीधे नाम से संबोधन को अधिक लोकतांत्रिक और आधुनिक समझा जाता है। हमें इसकी आदत नहीं है या अधिकांश लोग अभी सामंती मानसिकता से बाहर नहीं आए हैं, इसलिए उनको यह और अशोभन प्रतीत होता है। यहां टकराव सांस्कृतिक प्रक्रिया का है स्वतंत्रता के बाद हमारे समाज में सामंतवादी मूल्यों की वापसी हुई है और लोग अपने बच्चों के लिए भी आदर सूचक संबोधन का प्रयोग करते हैं, यह उच्चतर जीवन की आकांक्षा के साथ जुड़ा हुआ है। ऐसा पहले नहीं था, कम से कम स्वतंत्रता के आंदोलन के दौर में नहीं था। हमारे गांव देहात में भी यह नहीं था। हमारे विपरीत पश्चिमी जगत में यह मनोवृत्ति पहले थी लोकतांत्रिक चेतना के विकास के साथ इसमें लगातार कमी आई है।

‘आप जाते हो‘, या ‘आप जाते हैं‘, यहां दो बातों पर ध्यान देना होगा। यह कि ‘आप‘ कहने के बाद क्या बहुवचन की क्रिया लगाना जरूरी है। संस्कृत में प्रचलित है सम्मान प्रकट करने के लिए बहुवचन का प्रयोग किया जाना चाहिए, सम्मानित व्यक्ति अकेला होते हुए भी बहुत सारे लोगों के बराबर है, आदरे बहुवचनं। यह कब आरंभ हुआ यह हम नहीं जानते। कम से कम वैदिक भाषा में इसकी जरूरत नहीं समझी गई है । उसमें आदर के लिए बहुवचन का प्रयोग नहीं मिलता। ऋग्वेद में भवान् शब्द का भी प्रयोग नहीं हुआ है। विचारणीय यह है संस्कृत में आदर सूचक सर्वनाम कहां से आया ? मैं जिस बोली को भारोपीय भाषा की आदि जननी मान्यता हूं उसमें आदर सूचक संबोधन कम से कम मेरी जानकारी में नहीं था अब पाया जाता है। जैसे हिंदी में ‘तू‘‘, ‘तुम‘ और ‘आप‘ का प्रयोग करते हैं ठीक इसी तरह तमिल में ‘नी‘, ‘नींगल‘ और ‘तांगल‘ का प्रयोग होता है। संस्कृत में तू के लिए कोई शब्द नहीं पाया जाता । सामान्य स्थितियों में भवान् का प्रयोग नहीं किया जाता। सम्मान जताने के लिए अलग से,‘देव‘. ‘देवि‘, ‘राजन्‘, आदि का प्रचलन रहा है। इसका सीधा अर्थ है कि हमारी बोलियों में सामाजिक स्तरभेद संस्कृत की अपेक्षा अधिक गहरा है। इसका मतलब है आदर सूचक सर्वनाम और क्रियारूपों का बहुवचन प्रयोग बोलियों में और आधुनिक भारतीय भाषाओं में संस्कृत से नहीं आए, आदरे बहुवचनं संस्कृत पर बोलियों का प्रभाव है।

अब तमिल आदि में आदरार्थक प्रयोग को देखते हुए हम यह कह सकते हैं की आधुनिक बोलियों में आदरार्थक बहुवचन और क्रियारूप द्रविड़ बोलियों में से किसी के प्रभाव के कारण आया है। ऐसा सोचना इसलिए भी सही लगता है कि आधुनिक बोलियों में नी के स्थान पर तू, नींगल के स्थान पर तुम और तांगल के स्थान पर आप समानांतर पाया ही जाता है, क्रिया रूप में भी दोनों में बहुवचन के प्रयोग में आते हैं । द्रविड़ भाषाओं में यह अधिक नियमित है और इस का तार्किक आधार भी अधिक मजबूत है वहां अमहत और महत का भेद चलता है। इसी के अनुसार उसका लिंग विधान भी है। संस्कृत में और आधुनिक बेोलियों में लिंग व्यवस्था द्रविड़ से आई लगती है । संभव है इसकी जड़ें और पीछे जाती हों परंतु वह वहां तक मेरी गति नहीं है। कोरियाई और जापानी भाषा में तो आदरार्थक काइतना अधिक प्रयोग होता है एक स्थिति में आदर सूचक दूसरी परिस्थितियों में अनादर सूचक हो जाता है इसलिए शिक्षक सलाह देते हैं कि जब तक भाषा पर बहुत अधिकार न हो जाए तब तक आदरसूचक संबोधनों का प्रयोग न किया जाए।

Post – 2018-03-12

हमारी भाषा
हमारे देश की भाषाएं एक दूसरे में घुलती मिलती कैसे अपने वर्तमान रूप में आई हैं इसके बारे में मेरी जानकारी बहुत साफ नहीं है, परंतु इस विषय में मेरी दृष्टि बहुत साफ है कि सभी के तत्व सभी में मिलते रहे हैं । इसका कारण यह रहा है कि सभी भाषाभाषियों के छोटे-छोटे दल उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक बहुत प्राचीन काल से फैले रहे हैं। अतः भाषा ही नहीं, सभी समुदायों की सामाजिक निर्मित में भी अनेकानेक समुदायों की भागीदारी रही है। इसका आभास मुझे स्थान नामों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन करने के क्रम में हुआ था। इसको समझने के प्रयास में मेरी जो दृष्टि बनी उससे मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि भाषा विज्ञान का ऐतिहासिक और तुलनात्मक अध्ययन राजनीतिक वर्चस्व की चिंता में उल्टी दिशा में मुड़ गया।

यह बात मैं पहले भी कह चुका हूं कि समाज की रचना और भाषाओं का विकास एक दूसरे से इस सीमा तक प्रभावित रहा है कि अक्सर यह तय करना कठिन होता है कि कौन सा शब्द किस भाषा समुदाय का है। यहां मैं एक उदाहरण से अपनी बात स्पष्ट करना चाहूंगा । तीन दिन पहले की पोस्ट में अजित वडनेरकर ने हिंदी में चल रही एक प्रवृत्ति के संदर्भ में यह प्रश्न किया था कि आदर सूचक कथन में हमें आपके साथ एकवचन की क्रिया का प्रयोग करना चाहिए या बहुवचन का। लोगों ने इस पर अपना अपना विचार रखा था और अधिकांश की मान्यता यह थी की बहुवचन रूप अधिक सही है।

संभव है उनको लगा हो कि जो प्रयोग सबसे अधिक लोग करते हैं, वह सही है और दूसरा गलत। परंतु किसी प्रयोग की शुद्धता इस बात से तय नहीं की जा सकती कि अधिक लोग किस प्रयोग के पक्ष में हैं। इससे केवल इतना ही तय होता है कि कौन सा प्रयोग भाषा में अधिक लोगों की समझ में आता है या कौन सा अधिक लोकप्रिय है। सही गलत का निर्णय केवल व्याकरण से ही हो सकता है। यह दूसरी बात है कि गलत प्रयोग लंबे समय तक बहुत सारे लोगों के द्वारा चलता रहे तो उसे सही न भी माना जाय तो भी सह्य मान लिया जाता है। वह सुनने वाले को अटपटा नहीं लगता। उदाहरण के लिए आज के दिनों में मैंने भाषा के जानकार माने जाने वाले लोगों द्वारा भी आभिजात्य का गलत प्रयोग होते देखा है – वह ‘अभिजात्य वर्ग के हैं’, जबकि होना चाहिए ‘अभिजात वर्ग के है’, उनमें अभिजात्य पाया जाता है। बहुतों द्वारा प्रयुक्त होने के बाद भी गलत प्रयोग गलत ही रहता है, भले उसे सहन कर लिया जाए।

भाषा में एक ही भाव विचार या वस्तु के लिए अनेक शब्दों का प्रयोग होता है जिन्हें हम ‘पर्याय’ कहते हैं। इनमें से कोई एक अधिक लोगों की समझ में आता है, या सभी की समझ में आता है और दूसरा या तो आसानी से समझ में नहीं आता या, आता भी है तो, कुछ अटपटा लगता है, क्योंकि उसका यदाकदा ही प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए हम ‘वजन’ और ‘भार’ को ले सकते हैं। सामान्यतः हम पूछते हैं, ‘इसका वजन क्या है?’, न कि ‘इसका भार क्या है?’ परंतु अधिक लोग कहते हैं, ‘यह चीज भारी है’ न कि ‘वजनी है’। कहें व्याकरण की दृष्टि से दोनों प्रयोग सही हैं, परंतु एक का संज्ञा रूप अधिक प्रचलित है तो दूसरे का विशेषण रूप।

‘प्रचलित’ और ‘अल्प प्रचलित’ के बीच अंतर यह है कि बहुत प्रचलित का प्रयोग करने वाला उस भाषाई समुदाय का व्यक्ति प्रतीत होता है, जबकि अल्प प्रचलित का प्रयोग करने वाला बाहरी या अजनबी। यहां तक की यदि किसी भाषिक परिवेश में गलत प्रयोग प्रचलित हो तो उसमें सही प्रयोग करने वाला ही अजनबी प्रतीत होता है। उत्तर प्रदेश में सामर्थ्य का प्रयोग स्त्रीलिंग में किया जाता है जबकि मध्य प्रदेश में इसका प्रयोग पुल्लिंग में किया जाता है, जो कि सही है। उत्तर प्रदेश में सही बोलने वाला पहचान में आ जाएगा कि यह बाहरी है, मध्यप्रदेश में गलत बोलने वाला पकड़ा जाएगा और ऐसा भी लगेगा कि इसे हिंदी का सही ज्ञान नहीं है।

इसलिए कुछ भाषाविदों का विचार है कि सही गलत व्याकरण से निश्चित नहीं होता, लोक व्यवहार से होता है। यदि गलत प्रयोग स्वीकार्य है और इससे अर्थभ्रम नहीं पैदा होता तो इसे लेकर कोई आपत्ति नहीं की जा सकती। यह उदारता गैरभाषाई समुदायों में किसी भाषा की लोकप्रियता को बढ़ाती है और व्याकरण की दृष्टि से साधु न होते हुए भी इसकी ओर ध्यान नहीं दिया जाता या इसे भाषा की आंचलिक शैली मान लिया जाता है।

सरकारी तकनीकी शब्दावली में गलत कुछ नहीं है, परंतु इसमें सबसे बड़ी गलती यह थी इसमें प्रचलित शब्दों के लिए नए शब्द बनाए गए जिनकी जरूरत नहीं थी। हमारी बोलचाल की भाषा में यदि पहसे कोई आसान और प्रचलित शब्द है, तो लोग नए शब्दों की जरूरत नहीं अनुभव करते हैं। नया शब्जाद गढ़े जाने के बाद भी उसी का प्रयोग करना पसंद करते हैं। किसी भाषा में किसी भाव या वस्तु के लिए पहले से प्रचलित शब्द के लिए किसी भी कारण नया शब्द गढ़ना भाषाई हिंसा है जो भाषा तक सीमित नहीं रहती, उस भाषाई समुदाय के मन में भी क्षोभ पैदा करती है, भले यह शान्त जल में पड़ी कंकड़ी की तरह यह बहुत मामूली प्रतीत हो। सरकारी हिंदी के प्रति सामान्य जनों के क्षोभ से हम इसे समझ सकते हैं।

इसका एक कारण यह है #नैसर्गिक शब्दों को छोड़कर गढ़े हुए शब्दों का सहज अर्थ नहीं हुआ करता। अर्थ उस पर आरोपित किया जाता है, जिसमें यह जानना जरूरी होता है, इसका प्रयोग अमुक शब्द के लिए हो रहा है। अर्थात्, इसका सीधा संबंध निर्दिष्ट वस्तु या क्रिया से नहीं होता अपितु उस शब्द से होता है जिसे यह स्थानांतरित करता है। यदि यह उससे आसान हुआ तो पिछले शब्द को स्थानांतरित कर देता है, यदि कठिन हुआ तो पिछला शब्द इसके लिए चुनौती बना रहता है और लोगों को इसे सीखने के लिए बाध्य किया जाता है तो उनके मन में एक दबा प्रतिरोध बना रह जाता है।

उदाहरण के लिए हम ‘दफ्तर’ के लिए ‘ऑफिस’ का प्रयोग करने लगे और फिर दफ्तर और ऑफिस दोनों को छोड़कर कार्यालय शब्द गढ़ा गया। परंतु कार्यालय का अर्थ कारखाना भी हो सकता है, अर्थ की दृष्टि से दोनों में कोई अंतर नहीं है। ‘कार्यालय‘, ‘दफ्तर‘ और ‘ऑफिस‘ दोनों की तुलना में उच्चारण में दुष्कर है और आकार में दोनों से लंबा भी है, बोलने, सुनने और लिखने में उनकी अपेक्षा अधिक समय लेता है। इससे एक विचित्र स्थिति पैदा होती है – लिखते समय हम कार्यालय लिखते हैं परंतु बोलते समय ऑफिस या दफ्तर बोलते हैं । हिंदी में लिखित भाषा और बोलचाल की भाषा का यह अंतर बहुत उलझन पैदा करता है। इससे अहिंदी भाषियों की हिंदी सीखने की कठिनाई बढ़ जाती है। आप कह सकते हैं जिस तर्क से दफ्तर के होते हुए ऑफिस का प्रचलन हुआ उसी तरह इन दोनों के स्थान पर हिंदी के लिए कार्यालय शब्द क्यों नहीं रखा जा सकता। यहां हमसे एक भूल होती है । दफ्तर की जगह आफिस शब्द नहीं आया, एक भाषा की जगह है दूसरी भाषा आई, जिसमें यह शब्द पहले से प्रचलित था और व्यवहार से यह हिंदी का भी शब्द बन गया, क्योंकि हिंदी में पहले से इस संस्था के लिए कोई शब्द नहीं था और अब इसकी जरूरत नहीं थी, क्योंकि हिंदी में इसके लिए पहले से शब्द अपनाए जा चुके थे। कार्यालय भाषा की जरूरत नहीं थी, शुद्धतावादियों की जरूरत थी, जबकि भाषा शुद्धतावादी नहीं होती, व्यावहारिक होती है।

यहां प्रश्न सम्मान सूचक क्रियापद का था। प्रश्न यह था कि पत्रकारों में यह नई प्रवृत्ति देखी गई है कि वे बहुवचन क्रियापद का प्रयोग नहीं करते या कुछ लोगों ने यह नई प्रवृत्ति आरंभ की है। प्रश्न यह नहीं है कि यह सही है या गलत, अपितु यह प्रशंसनीय है या नहीं। कोई भाषा का किस रूप में प्रयोग करता है इस पर हमारा अधिकार नहीं लोगों को गाली देने से रोक नहीं सकते केवल उनके बारे में बना सकते हैं। मेरा अनुमान है कि यह पश्चिम की नकल है जिसमें आदर सूचक संबोधनों को पिछड़ेपन का सूचक माना जाने लगा हैऔर सीधे नाम से संबोधन को अधिक लोकतांत्रिक और आधुनिक समझा जाता है। हमें इसकी आदत नहीं है या अधिकांश लोग अभी सामंती मानसिकता से बाहर नहीं आए हैं, इसलिए उनको यह और अशोभन प्रतीत होता है। यहां टकराव सांस्कृतिक प्रक्रिया का है स्वतंत्रता के बाद हमारे समाज में सामंतवादी मूल्यों की वापसी हुई है और लोग अपने बच्चों के लिए भी आदर सूचक संबोधन का प्रयोग करते हैं, यह उच्चतर जीवन की आकांक्षा के साथ जुड़ा हुआ है। ऐसा पहले नहीं था, कम से कम स्वतंत्रता के आंदोलन के दौर में नहीं था। हमारे गांव देहात में भी यह नहीं था। हमारे विपरीत पश्चिमी जगत में यह मनोवृत्ति पहले थी लोकतांत्रिक चेतना के विकास के साथ इसमें लगातार कमी आई है।

‘आप जाते हो‘, या ‘आप जाते हैं‘, यहां दो बातों पर ध्यान देना होगा। यह कि ‘आप‘ कहने के बाद क्या बहुवचन की क्रिया लगाना जरूरी है। संस्कृत में प्रचलित है सम्मान प्रकट करने के लिए बहुवचन का प्रयोग किया जाना चाहिए, सम्मानित व्यक्ति अकेला होते हुए भी बहुत सारे लोगों के बराबर है, आदरे बहुवचनं। यह कब आरंभ हुआ यह हम नहीं जानते। कम से कम वैदिक भाषा में इसकी जरूरत नहीं समझी गई है । उसमें आदर के लिए बहुवचन का प्रयोग नहीं मिलता। ऋग्वेद में भवान् शब्द का भी प्रयोग नहीं हुआ है। विचारणीय यह है संस्कृत में आदर सूचक सर्वनाम कहां से आया ? मैं जिस बोली को भारोपीय भाषा की आदि जननी मान्यता हूं उसमें आदर सूचक संबोधन कम से कम मेरी जानकारी में नहीं था अब पाया जाता है। जैसे हिंदी में ‘तू‘‘, ‘तुम‘ और ‘आप‘ का प्रयोग करते हैं ठीक इसी तरह तमिल में ‘नी‘, ‘नींगल‘ और ‘तांगल‘ का प्रयोग होता है। संस्कृत में तू के लिए कोई शब्द नहीं पाया जाता । सामान्य स्थितियों में भवान् का प्रयोग नहीं किया जाता। सम्मान जताने के लिए अलग से,‘देव‘. ‘देवि‘, ‘राजन्‘, आदि का प्रचलन रहा है। इसका सीधा अर्थ है कि हमारी बोलियों में सामाजिक स्तरभेद संस्कृत की अपेक्षा अधिक गहरा है। इसका मतलब है आदर सूचक सर्वनाम और क्रियारूपों का बहुवचन प्रयोग बोलियों में और आधुनिक भारतीय भाषाओं में संस्कृत से नहीं आए, आदरे बहुवचनं संस्कृत पर बोलियों का प्रभाव है।

अब तमिल आदि में आदरार्थक प्रयोग को देखते हुए हम यह कह सकते हैं की आधुनिक बोलियों में आदरार्थक बहुवचन और क्रियारूप द्रविड़ बोलियों में से किसी के प्रभाव के कारण आया है। ऐसा सोचना इसलिए भी सही लगता है कि आधुनिक बोलियों में नी के स्थान पर तू, नींगल के स्थान पर तुम और तांगल के स्थान पर आप समानांतर पाया ही जाता है, क्रिया रूप में भी दोनों में बहुवचन के प्रयोग में आते हैं । द्रविड़ भाषाओं में यह अधिक नियमित है और इस का तार्किक आधार भी अधिक मजबूत है वहां अमहत और महत का भेद चलता है। इसी के अनुसार उसका लिंग विधान भी है। संस्कृत में और आधुनिक बेोलियों में लिंग व्यवस्था द्रविड़ से आई लगती है । संभव है इसकी जड़ें और पीछे जाती हों परंतु वह वहां तक मेरी गति नहीं है। कोरियाई और जापानी भाषा में तो आदरार्थक काइतना अधिक प्रयोग होता है एक स्थिति में आदर सूचक दूसरी परिस्थितियों में अनादर सूचक हो जाता है इसलिए शिक्षक सलाह देते हैं कि जब तक भाषा पर बहुत अधिकार न हो जाए तब तक आदरसूचक संबोधनों का प्रयोग न किया जाए।

Post – 2018-03-10

आसमान की तलाश

मेरे तीन आसमान हैं, एक जिसमें सूरज चांद चक्कर लगाते हैं, दो मेरी लालसाओं के जिन्हें पूरा करने की कोशिश में मैं कुछ दूर चल कर जाने कैसे भटक जाता हूं। इनमें से एक है मेरी अपनी कहानी, वह कौन सी चीज है जो मुझे किसी से भी पूरी तरह सहमत नहीं होने देती, स्वयं अपने आप से भी। लगता है सब कुछ अधूरा है, जो लिखता हूं वह भी, जो लिखा वह भी, अौर यह अधूरापन ही उसे सार्थक बनाता है। अपने बारे में लिखना अपने निजी को निर्व्याज सार्वजनिक बनाना है। यह कष्टकर काम है और इतना कठिन कि लिखना भी चाहता हूं और इस ताक में भी रहता हूं कि कोई बहाना मिले और छूट भागूं।

पर मैंने दो दिन पहले जब कहा था निगाह फिर से आसमान पर है तो यह आसमान भारोपीय भाषा का आसमान था। इसे समझने के लिए मैंने अब तक जितने प्रयत्न किए, सभी अधूरे रह गए। कुछ कमियां मेरी अपनी हैं, मैं प्रशिक्षित भाषाविज्ञानी नहीं हूं।

मैं जिस भाषाविज्ञान की बात कर रहा हूं वह भाषाविज्ञान है भी नहीं। यदि होता तो मेरे लिए इसमें विधिवत प्रशिक्षित होना अपरिहार्य होता। इसके लिए पहले से भाषाशास्त्र या फिलालोजी का प्रयोग होता रहा है। केवल कुछसमय के लिए इसे ऐतिहासिक और तुलनात्मक भाषाविज्ञान कहाने का गौरव मिला, और फिर यह पता चला कि ऐतिहासिक और तुलनात्मक होने की अपनी विशेषता के कारण ही यह विज्ञान नहीं हो सकता।

परन्तु एक दुखद सचाई यह कि यह न ऐतिहासिक बन पाया न तुलनातमक। दोनों मामलों में इतनी धौंस-पट्टी और इतनी ढकोसलेबाजी से काम लिया गया कि यह जिस सीमित भूमिका का निर्वाह कर सकता था उसे भी पूरा नहीं कर पाया। गलतियां सभी क्षेत्रों में होती हैं और यहां भी होतीं तो कोई हानि न होती। इसमें पहली नजर में ही गलत अटकलबाजियों को सही ठहराने के लिए पश्चिमी विद्वान आकाश-पाताल एक करते रहे। इसलिए वे उन बुनियादी गलतियों को भी सही नहीं कर पाए जिनको उन्होंने सवयं भांप लिया था। इसके कारण
भारतीय इतिहास और भाषाविज्ञान में असंभव को संभव और संभव को दरकिनार करने के लिए कुतर्क जुटाते हुए यह समझाया जाता रहा कि ऐसा कहीं और तो संभव नहीं पर भारत में यही नियम रहा है। सबसे बड़ी बात यह कि तुलनात्मक भाषाविज्ञान की अकाट्य बना दी गई स्थापनाएं उनकी थीं जो अपने साहसिक दावों को देखते हुए न तो सुशिक्षित थे न प्रशिक्षित। ऐसी दशा में मेरा प्रशिक्षित न होना कोई दोष नहीं रह जाता।

मेरी समस्या प्रशिक्षण से और बढ़ती है क्योंकि तुलनात्मक अध्ययन के लिए जो विधि विकसित की गई वह लंगड़ी और औंधी है। इसमें एक पूर्ण विकसित परिनिष्ठित भाषा को आदि भाषा या उसके सर्वाधिक निकट मान कर अध्ययन आरंभ किया गया था और यह जिद आज तक पालनी होती है अन्यथा सारे किए कराए काम कौड़ी मोल के भी न रह जाएं।

इन कठिनाइयों के अतिरिक्त फेसबुक पर इस विषय की चर्चा की अपनी सीमाएं हैं। हम जानते हैं गणित और भाषा ये दो चीजें ऐसी है जिनके बिना ज्ञान संभव नहीं है इसके बाद भी किसी व्यक्ति को सबसे कम दिलचस्पी गणित और नई भाषा सीखने, भाषा का इतिहास जानने में होती है । ये दोनों जितने आसान हैं उतने ही कठिन। अपनी व्याप्ति में ये दोनों। समस्त ब्रह्मांड को अपने भीतर समेट लेते हैं इसलिए इनका गहन ज्ञान उतना ही दुष्कर भी है और जिनकी इनमें गति है उनके लिए अक्षय आनन्द के स्रोत।

सबसे पहले मैं भाषा की उत्पत्ति और विकास प्रक्रिया को समझना चाहता हूं । भाषा क्या है? यदि इस प्रश्न का उत्तर एक वाक्य में देना हो तो कहना होगा की भाषा श्रुत सार्थक ध्वनियों का पुनरुत्पादन है। मोटे तौर पर यह शर्त सभी जीवों जंतुओं की बोली पर लागू होती है और इसीलिए प्राचीन भारतीयभाषा चिंतकों ने पशु-पक्ी आदि की भाषा की कल्पना की थी और मानुषी वाणी को उसी क्रम मेंअगला विकास माना था।

हम जानते हैं कि मनुष्य जो कुछ सुनता है उसी की अनुकृति करता है। गूंगे बच्चे को कुछ सुनाई नहीं देता । कमी उसके उच्चारण तंत्र में नहीं होती, उसकी श्रवणशक्ति में होती है। वह सुन नहीं पाता इसलिए बोल नहीं पाता।

बहुत प्राचीन काल से अब तक बहुत सारे लोगों ने यह समझने की कोशिश की शिशु को यदि कोई भाषा सुनने सीखने को न मिले तो वह कौन सी भाषा बोलता है । असल में उनकी जिज्ञासा यह थी कि दुनिया की सबसे पहली भाषा कौन सी है। उनकी रुचि भाषा से अधिक अपने धर्म की श्रेष्ठता का प्रमाण ढूंढ़ने में थी। ईसाई बहुत बाद मानते थे कि आदम ने जिस भाषा में चीजों को नाम दिया होगा वह हिब्रू थी।

हमारे लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा कौन सी है बल्कि यह है की मनुष्य ने सार्थक भाषा का आविष्कार कैसे किया ? दूसरे जीव जंतुओं की एक सीमित संकेत प्रणाली है जो दृश्य सीमा में बहुत सही काम करती है। जो दूर है, अनुपस्थित है, उसे किस तरह व्यक्त किया जाए इसके लिए उनके पास कोई संकेत प्रणाली न थी।

हम कहें कि मनुष्य की भाषा अनुपस्थित का साक्षात्कार तो बहुत गलत नहीं होगा । जो दृश्य है उसके लिए भाषा की आवश्यकता नहीं थी। हम संकेतों से अभी तक काम लेते हैं और कई दृष्टियों से यह भाषा की तुलना में अधिक प्रभावशाली होती है और कम समय में कार्य करने में सक्षम होती हैं । उदाहरण के लिए ट्रैफिक संकेत को ले सकते हैं । वाचिक भाषा के साथ जितनी अनिश्चितता बनी रहती है उतनी अनिश्चितता संकेत प्रणालियों के साथ नहीं देखने में आती है। एक ही शब्द उच्चारण की भिन्नता के हिसाब इतने तरह के आशय वहन कर सकता है उसके विधि और निषेध दोनों उसी में समाहित हो जाएं ।

Post – 2018-03-10

आसमान की तलाश

मेरे तीन आसमान हैं, एक जिसमें सूरज चांद चक्कर लगाते हैं, दो मेरी लालसाओं के जिन्हें पूरा करने की कोशिश में मैं कुछ दूर चल कर जाने कैसे भटक जाता हूं। इनमें से एक है मेरी अपनी कहानी, वह कौन सी चीज है जो मुझे किसी से भी पूरी तरह सहमत नहीं होने देती, स्वयं अपने आप से भी। लगता है सब कुछ अधूरा है, जो लिखता हूं वह भी, जो लिखा वह भी, अौर यह अधूरापन ही उसे सार्थक बनाता है। अपने बारे में लिखना अपने निजी को निर्व्याज सार्वजनिक बनाना है। यह कष्टकर काम है और इतना कठिन कि लिखना भी चाहता हूं और इस ताक में भी रहता हूं कि कोई बहाना मिले और छूट भागूं।

पर मैंने दो दिन पहले जब कहा था निगाह फिर से आसमान पर है तो यह आसमान भारोपीय भाषा का आसमान था। इसे समझने के लिए मैंने अब तक जितने प्रयत्न किए, सभी अधूरे रह गए। कुछ कमियां मेरी अपनी हैं, मैं प्रशिक्षित भाषाविज्ञानी नहीं हूं।

मैं जिस भाषाविज्ञान की बात कर रहा हूं वह भाषाविज्ञान है भी नहीं। यदि होता तो मेरे लिए इसमें विधिवत प्रशिक्षित होना अपरिहार्य होता। इसके लिए पहले से भाषाशास्त्र या फिलालोजी का प्रयोग होता रहा है। केवल कुछसमय के लिए इसे ऐतिहासिक और तुलनात्मक भाषाविज्ञान कहाने का गौरव मिला, और फिर यह पता चला कि ऐतिहासिक और तुलनात्मक होने की अपनी विशेषता के कारण ही यह विज्ञान नहीं हो सकता।

परन्तु एक दुखद सचाई यह कि यह न ऐतिहासिक बन पाया न तुलनातमक। दोनों मामलों में इतनी धौंस-पट्टी और इतनी ढकोसलेबाजी से काम लिया गया कि यह जिस सीमित भूमिका का निर्वाह कर सकता था उसे भी पूरा नहीं कर पाया। गलतियां सभी क्षेत्रों में होती हैं और यहां भी होतीं तो कोई हानि न होती। इसमें पहली नजर में ही गलत अटकलबाजियों को सही ठहराने के लिए पश्चिमी विद्वान आकाश-पाताल एक करते रहे। इसलिए वे उन बुनियादी गलतियों को भी सही नहीं कर पाए जिनको उन्होंने सवयं भांप लिया था। इसके कारण
भारतीय इतिहास और भाषाविज्ञान में असंभव को संभव और संभव को दरकिनार करने के लिए कुतर्क जुटाते हुए यह समझाया जाता रहा कि ऐसा कहीं और तो संभव नहीं पर भारत में यही नियम रहा है। सबसे बड़ी बात यह कि तुलनात्मक भाषाविज्ञान की अकाट्य बना दी गई स्थापनाएं उनकी थीं जो अपने साहसिक दावों को देखते हुए न तो सुशिक्षित थे न प्रशिक्षित। ऐसी दशा में मेरा प्रशिक्षित न होना कोई दोष नहीं रह जाता।

मेरी समस्या प्रशिक्षण से और बढ़ती है क्योंकि तुलनात्मक अध्ययन के लिए जो विधि विकसित की गई वह लंगड़ी और औंधी है। इसमें एक पूर्ण विकसित परिनिष्ठित भाषा को आदि भाषा या उसके सर्वाधिक निकट मान कर अध्ययन आरंभ किया गया था और यह जिद आज तक पालनी होती है अन्यथा सारे किए कराए काम कौड़ी मोल के भी न रह जाएं।

इन कठिनाइयों के अतिरिक्त फेसबुक पर इस विषय की चर्चा की अपनी सीमाएं हैं। हम जानते हैं गणित और भाषा ये दो चीजें ऐसी है जिनके बिना ज्ञान संभव नहीं है इसके बाद भी किसी व्यक्ति को सबसे कम दिलचस्पी गणित और नई भाषा सीखने, भाषा का इतिहास जानने में होती है । ये दोनों जितने आसान हैं उतने ही कठिन। अपनी व्याप्ति में ये दोनों। समस्त ब्रह्मांड को अपने भीतर समेट लेते हैं इसलिए इनका गहन ज्ञान उतना ही दुष्कर भी है और जिनकी इनमें गति है उनके लिए अक्षय आनन्द के स्रोत।

सबसे पहले मैं भाषा की उत्पत्ति और विकास प्रक्रिया को समझना चाहता हूं । भाषा क्या है? यदि इस प्रश्न का उत्तर एक वाक्य में देना हो तो कहना होगा की भाषा श्रुत सार्थक ध्वनियों का पुनरुत्पादन है। मोटे तौर पर यह शर्त सभी जीवों जंतुओं की बोली पर लागू होती है और इसीलिए प्राचीन भारतीयभाषा चिंतकों ने पशु-पक्ी आदि की भाषा की कल्पना की थी और मानुषी वाणी को उसी क्रम मेंअगला विकास माना था।

हम जानते हैं कि मनुष्य जो कुछ सुनता है उसी की अनुकृति करता है। गूंगे बच्चे को कुछ सुनाई नहीं देता । कमी उसके उच्चारण तंत्र में नहीं होती, उसकी श्रवणशक्ति में होती है। वह सुन नहीं पाता इसलिए बोल नहीं पाता।

बहुत प्राचीन काल से अब तक बहुत सारे लोगों ने यह समझने की कोशिश की शिशु को यदि कोई भाषा सुनने सीखने को न मिले तो वह कौन सी भाषा बोलता है । असल में उनकी जिज्ञासा यह थी कि दुनिया की सबसे पहली भाषा कौन सी है। उनकी रुचि भाषा से अधिक अपने धर्म की श्रेष्ठता का प्रमाण ढूंढ़ने में थी। ईसाई बहुत बाद मानते थे कि आदम ने जिस भाषा में चीजों को नाम दिया होगा वह हिब्रू थी।

हमारे लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा कौन सी है बल्कि यह है की मनुष्य ने सार्थक भाषा का आविष्कार कैसे किया ? दूसरे जीव जंतुओं की एक सीमित संकेत प्रणाली है जो दृश्य सीमा में बहुत सही काम करती है। जो दूर है, अनुपस्थित है, उसे किस तरह व्यक्त किया जाए इसके लिए उनके पास कोई संकेत प्रणाली न थी।

हम कहें कि मनुष्य की भाषा अनुपस्थित का साक्षात्कार तो बहुत गलत नहीं होगा । जो दृश्य है उसके लिए भाषा की आवश्यकता नहीं थी। हम संकेतों से अभी तक काम लेते हैं और कई दृष्टियों से यह भाषा की तुलना में अधिक प्रभावशाली होती है और कम समय में कार्य करने में सक्षम होती हैं । उदाहरण के लिए ट्रैफिक संकेत को ले सकते हैं । वाचिक भाषा के साथ जितनी अनिश्चितता बनी रहती है उतनी अनिश्चितता संकेत प्रणालियों के साथ नहीं देखने में आती है। एक ही शब्द उच्चारण की भिन्नता के हिसाब इतने तरह के आशय वहन कर सकता है उसके विधि और निषेध दोनों उसी में समाहित हो जाएं ।