Post – 2020-05-21

शब्दवेध(42)
भाषा और मूर्तिविधान
भाषा श्रुत संसार का पुनरुत्पादन या, अनुनादन नहीं है। यदि ऐसा होता तो उसकी संचार-सीमा उसके भाषा बनने में बाधक होती। चित्र लिपि में केवल उसी वस्तु का बिंब उभर सकता था जिसका वह चित्र था। यदि इसका पालन किया जाता तो संसार में जितनी भी वस्तुएं हैं उन सभी के चित्र बनाने होते और उसके बाद भी भाषा केवल संज्ञाओं का भंडार बनकर रह जाती। इतना ही नहीं, हमारा संसार सिमट कर इतना छोटा हो जाता जितने का चित्र बनाने की क्षमता हममें होती। चित्रांकन को महत्व देते हुए जिन लिपियों का विकास हुआ उनमें भी अमूर्तन से काम लिया गया और इसके बाद भी लिपि चिन्हों की संख्या इतनी अधिक थी अक्षरों की संख्या इतनी अधिक थी कि साक्षर लोग लगभग दुर्लभ थे।

यही समस्या लिपि के विकास से पहले बाह्य जगत के संकेतन के लिए बोल चाल के स्तर पर उपस्थित हुई थी। अनुकरण की सीमा के कारण मनुष्य की भाषा मैं बहुत कम ध्वनियाँ थी। उसका वस्तु बोध और भाव बोध बहुत सीमित था। इसके कारण जिन श्रुत ध्वनियों का अमूर्तन संभव नहीं था, उनका अनुकरण जहाँ संभव हो पाया, जिनका हो पाया उनकी ध्वनियाँ केवल उनकी संज्ञा बन पाईं – कौवा/ क्रो; टिटिहरी, कोकिल, झींगुर, हुँड़ार/हाउंड, डॉग , पपीहा। भाषा की शक्ति अनुनाद से आगे बढ़कर वाचिक संकेत प्रणाली विकसित करने में है परंतु उसने अपना संबंध प्राकृतिक नादों से इतनी दूर नहीं जाने दिया की ध्वनि और ध्वनित के बीच का संबंध पूरी तरह मिट जाए।

पिछड़ी से पिछड़ी भाषा में भी अनुनादी शब्दों की संख्या बहुत सीमित है। आवर्ती ध्वनियाँ अवश्य उन्नत भाषाओं की तुलना में अधिक मिलेगी। उदाहरण के लिए संताली और उसके समकक्ष भोजपुरी के कुछ प्रयोगों को लिया जा सकता है:
अकल सकल – बेचैन
अजक बुजक – बेतरतीब, टेढ़ा-मेढ़ा
अकल पकल – अकाल दुकाल
अकर कुकर – परेशान. बेहाल
अक बक । अका बका
अकबकाव – परेशान, बेहाल, भरमल
अबू-चबू = भो. अकचकाइल
अचल-गँजल – धारासार वर्षा
अचुर बिहुर – आगे-पीछे
अड़ई बड़ई – अक्खड़ भो. अड़बड़, अड़बेंड़
अढोंङ मढोङ – कम मोल पर बेचना, आधा-तिहाई पर…
अदात उदात – कम उम्र का (काम में आने लायक नहीं) – भो. उद्दत बछड़ा
अध पध – अधूरा किया हुआ
अगर डिगर – उल्लंघन – > डग, डगर, डगरल, डग्गा, डुग्गी, *डगमग/डगर, डगोरा > ढिमिलाइल,
अगोर ओडोर – ठिगना और मोटा
अकबक – झटपट (अकबका के)
अलङ फोलङ (अलोङ फोलोङ) – मटरगश्ती

आवर्ती ध्वनियाँ सभी भाषाओं में किसी न किसी अनुपात में पाई जाती हैं। ध्यान देने की बात यह है इनमें भी सीधी नकल नहीं होती और सामान्यतः दूसरे की ध्वनि को कुछ बदल दिया जाता है -फिटफाट, झटपट, टिट-टैट। मनुष्य स्वभावतः एकरसता पसंद नहीं करता, पशुओं से उसका अंतर यह है कि वह नवीनता प्रेमी है।

भाषा श्रुत ध्वनियों का अनुनादन नहीं अनुवादन है, अनुवाचन है , और इसी से यह संगीत से अलग हट कर एक संकेतन प्रणाली का रूप लेती है और इस क्रम में वाचिक ध्वनियों के मूर्ति विधान की एक प्रणाली बनकर अमूर्त भावों विचारों क्रियाओं विशेषताओं और स्थितियों को व्यक्त करने में समर्थ होती है। गीत भाव जगत की गहराइयों को समझने तक सीमित रह जाता है, विचार जगत का स्पर्श नहीं कर पाता। चित्र विधान से संकेतन प्रणाली में बदलते में पुराने अनुभव से मनुष्य जाति को दोबारा गुजरना पड़ा, क्योंकि उसे अपने पुराने अनुभव की याद तक नहीं रह गई थी इसलिए वह भाषा की उत्पत्ति और विकास के नियम को भी समझने में असमर्थ हो चुका था। अब उस वर्णमाला का विकास संभव हुआ जो किसी समुदाय की वाणी को अधिकतम शुद्धता से अंकित करने में समर्थ होती है।

हमें इस इतिहास का ध्यान आने के बाद आश्चर्य नहीं होता कि हमारे विख्यात भाषा विज्ञानियों ने भाषा की उत्पत्ति और विकास पर विचार करते हुए लेखन प्रणाली में संभव हुए विकास को आधार बनाने की कोशिश क्यों नहीं की और जैसे नादान कारीगर अपने औजार को कोसता रहता है उसी तरह वे अनुनादन की प्रक्रिया को अपर्याप्त और असंभव मानकर नैसर्गिक ध्वनियों की भूमिका को क्यों ना समझ पाए और उन्हें ही कोसते रहे।

हमारे लिए तो इतना ही बहुत है कि हम समझ सकें कि शब्दों और मुहावरों के पीछे एक इतिहास, एक दर्शन, एक विचारधारा भी हो सकती है। इसलिए शब्दों पर बात चले तो फूंक फूंक कर पांव रखना एक जरूरत और जिम्मेदारी भी बन जाती है।

इस चर्चा में हम आप को इस मुहावरे के अनुसार चलने की सलाह तो न देंगे, परंतु आप से एक एक वाक्य को घूर घूर कर देखने की अपेक्षा अवश्य करेंगे। आपको पता है लोग घूरने का काम कबसे करते आ रहे है? क्या आपने फारसी के ग़ौर को घूरने से मिला कर देखा है? अब यदि दुबारा ग़ौर करें तो इस शब्द का इतिहास कम से कम चार हजार साल पीछे चला गया। तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ।। 1.22.20 घूरने का अर्थ न जानते हो तो मरियम वेब्स्टर का कोश देख लीजिए जिसमें अंग्रेजी गेज़ का अर्थ बताते हुए लिखा हुआ है, to fix the eyes in a steady intent look often with eagerness or studious attention.

जो कुछ जीवन और व्यवहार से लुप्त हो जाता है वह भी भाषा में एक रहस्यमय तरीके से हजारों साल तक किसी कोने में दुबका बचा रहता है। इसलिए जो इतिहास की किसी पुस्तक में दर्ज नहीं है, जिस तक पुरातत्वविद तक की पहुंच नहीं हो सकती, उसको आप कई बार भाषा में प्रत्यक्ष देख सकते हैं। जो अन्यत्र मृत और अश्मीभूत मिलेगा, वह भाषा में जीवन्त मिल सकता है, वह भी इतना कि आप चाहें तो उसकी धड़कनें भी गिन लेंं, गो यह हर मामले में जरूरी नहीं, क्योंकि इससे आपके दिल की धड़कन बढ़ सकती हैं। जो कुछ साहित्य में अतिरंजित मिलेगा, वह शब्दों में कांटे की तौल मिलेगा और तब आपको पता चलेगा कि कांटे इतने तरह के होते हैं, जिनसे कांटे की बात तो की जा सकती है, कांटे से कांटा निकाला जा सकता है, जरूरत पड़े तो किसी की राह में काँटा बिछाया भी जा सकता है और डंडी को टेढ़ी करके कांटे की तौल को घाटे की तौल बनाया जा सकता है! डंडा मारने और डंडी मारने से पड़ने वाली चोट के फर्क को तभी समझा जा सकता है।

क्या क्या आपने कभी नाक के बाल मुहावरे का अर्थ समझने की कोशिश की है। नहीं की होगी। मैं समझाता हूं। आपकी पहुंच नाक ऊंची करने और नाक काटने और बचाने तक ही है। परंतु ऐसे लोग भी हो सकते हैं कि नाक का तो सवाल ही नहीं नाक के बाल को भी कोई काट नहीं सकता। और ऐसे लोगों को जिन्हें वे अपनी नाक का बाल मान लें बचा कर रखना और उनकी हर तरह से रक्षा करना उनका कर्तव्य बन जाता है। इस तरह शब्दों का मूर्तनविधान एक तरह का है और मुहावरों का मूर्तन विधान इससे कुछ अलग।

Post – 2020-05-20

#शब्दवेध(41)
थोड़ा लिखना बहुत समझना

हमारा विषय विस्तृत है। हम समस्त शब्दावली को लेकर विचार नहीं कर सकते। जिन पर विचार करते हैं उनके विषय में बहुत कुछ रह जाता है। मैं जो कुछ कहता हूं उसके छूटे पक्षों पर किसी तरह की जिज्ञासा होने पर उसके समाधान का प्रयत्न कर सकता हूँ।

लोढ़/लोड़/रोड़ के विषय में तो हम यह स्पष्ट कर आए थे कि इनका उद्भव जल की धारा में टूटे और घिसे हुए बटों के आधार पर हुआ था और यह अन्य बातों के अलावा पत्थर, गति, लुंठन, खंडन की भी संज्ञा बने थे। यहाँ कई दिशाएँ खुलती है। पहला यह कि औजार/हथियार बनाने के लिए खेती के आरंभ से बहुत पहले सभी जत्थों को जल धाराओं के उतार क्षेत्र से वटिकाश्म अपने क्षेत्र में लाने होते। परिवहन की विधि और साधन की समस्या भी उसी चरण पर उपस्थित हो गई थी। इसका समाधान भी उसी वटिका के साथ किए गए प्रयोगों से हुआ। पहिए के लिए जो शब्द पाए जाते हैं वे अलग अलग बोलियों के हैं जिनमें उसी क्रिया से उत्पन्न ध्वनि को अपनी ध्वनि-सीमा में नाम दिया गया था पर सभी ध्वनियों का अर्थ विकास लगभग समान दिशाओं में हुआ। रेढू/लेढ़ू का विकास करने वाले को जो ध्वनि रढ़/रड़/रळ/रल; रेढ़/रेड़/रेळ/रेल; रोढ़/रोड़/रोळ/रोल) में से किसी रूप में सुनाई दिया और आंचलिक संपर्क सूत्र जुड़ने के बाद दूसरों द्वारा इतर रूपों में अपनाया गया, उनके प्रयोग के क्रम में किस किस तरह की नफासत चलती रही इसकी सही कल्पना हम नहीं कर सकते, पर हम पाते है भारत से लेकर भारोपीय प्रसार क्षेत्र में आज तक इनसे निकली शब्दावली का प्रयोग होता रहा है। रेढ़ू > rude, rode, rote, rotary, round, rod, road, load, rout, rudder, roll, rail, rally, reel, real, rut, route, rend, हि. रढ़, रेढ़, रीढ़, रेढ़ा, लढ़ा, लढ़िया, रेला, लेंढ़ा, रोड़ा, रोटी, लोढ़ा, लोड-चाह। कुछ हट कर है रेढ़ा का ठेला में बदल जाना और ठेलने का ठेघने में परिवर्तन। अं. रडर पानी के चप्पू के लिए प्रयोग में आता है यह कोई समस्या नहीं पैदा करता क्योंकि ऋ. में रथ का प्रयोग नौवहन में हुआ है (समुद्रस्य आर्द्रस्य धन्वस्य पारे त्रिभी रथैः शत् पद्भिः षडश्वैः)।

परन्तु यह एक संपर्कसूत्र से जुड़े भाषाई समुदाय का आविष्कार था। एक दूसरे ने उसे ही पह(पहु) /बह(बहु) >सं. वह के रूप में सुना या बाद में ढाला, जिसके लिए वही बटिकाश्म पाहन था, गति पहुँचना/ बहुरना था, बहना/ बहाना था। पत्थर पाहन था। त. पो (सं. पवन- चलने वाता, पोत; अं. plo, blow, flow, float, boat) बना। इसका सं. रूप वह, वहन, वह्नि, वाहन बना और यूरोप vehere-वहन, vehicle-वाहन, vein-वाहिका, नली, poem- धाराप्रवाह कथन।

एक तीसरे समुदाय को वही प्रवाही ध्वनि सर/चर, कर के रूप में सुनी गई, सरसर, चरचर, करकर नामों के बीच से एक का सर्वग्राह्य रूप सरकर/सक्कर सं. शर्करा निकला। शर्करा – बटिका, कंकड़। गोरखपुर में एक गाँव है सकरी – कंकरीली जगह। गति के आशय में सर, चर, सरकना, शर्त, सरिता, चरण, चरति, विभिन्न विभक्तियो के साथ -चार, चरित्र, चाल, चलन, चालू, (अं. शर्क shirk, चर char->चार्ज, chariot, character *कर> कार, car, cart, आकार – वर्तुल (सर्कल circle, साइकल cyle, साइक्लोन cyclone, सिकल sickle, शैकल shackle)।. चक्का, चाक, चक्की, चाकर – दौड़-भाग करने वाला. सं. चक्र, चक्री। परंतु चक्र के दो स्रोत हैं, एक का संबंध है पानी के नाद से, दूसरे का पत्थर तराशने, किसी नुकीली धार के खरोंचने आदि से उत्पन्न नाद किर/कर/चर जिसका अर्थ है करना, बनाना, जो अधिक प्रयोग में आता है। अरायुक्त पहिया बनाना असाधारण काष्ठकौशल की अपेक्षा रखता है इसलिए यह मानने वाले लोगों को गलत सिद्ध करने का साहस नहीं कर सकता जो मानते है कि पहिए के आशय वाले चक्र की उत्पत्ति बनाने से है न कि चलने से। तोड़ने के आशय मे शर्करा – शक्कर, खांड (खंडित), बूरा/रवा – चूर्ण, चीनी- बारीक इसी से प्रेरित हैं जिनका सीधे मिठास से कोई संबंध नहीं सभी में पत्थर के टूट कर रेत में बदलने का भाव ही है।

उन घिसे, टूटे गोलाकार पाषाण खंडों को जिस समुदाय ने वट >सं. वर्त-, सुनने और बोलने वाले समुदाय का चक्राकार संकल्पनाओं और गति – बाट, बटोही, सं. वर्त्म, वृत -मार्ग, चक्करदार (परिधि), (अं. wherl, whore, whorl, vert, vertex, vertigo, verve), खडन – वर्तन, वंटन, बेंट/बेत – आघात करने वाला, सं. वेतस, (अ. बैट bat, बैटर batter, बार्टर barter). परंतु यदि इसका कभी पहिए के लिए उपयोग हुआ भी रहा हो तो संकल्पनाओं के लिए इसके प्रयोग ने उसे बाहर कर दिया।

हम अभी तक कल्पित धातुआं के माध्यम से, जिनकी पहुँच, बहुनिष्ठ अक्षरों और समान अर्थ पर ध्यान देने के कारण सीमित रही है, उस बहुअर्थी मूल तक नहीं पहुँच पाते रहे हैं इसलिए एक ही आशय वाली धातु से व्युत्पन्न शब्द में अनेक और अनेक बार विरोधी अर्थ देश कर भी यह समझने से कतराते रहे हैं कि हमारे तरीके में कोई गड़बड़ी है। जैसे मनुष्य की सामाजिकता होती है वैसे ही शब्दों की भी सामूहिकता होती है और इसलिए तुलना के समय हमें उनके समूह की इतर समूह से तुलना अधिक लाभकर प्रतीत होती है।

हमने पिछली चर्चा में तार और कताई बुनाई के शब्दों की बात तो की पर विचार हम नामकरण की समस्या अर्थात् उत्पत्ति पर कर रहे हैं और यह दावा करने के बाद भी कि सामान्य संकल्पनाओं का नामकरण जल के किसी साम्य और नाद से जुड़ा है, उसे उदाहृत करने से रह गए। सू – जल, सवन, आसवन, सुत, सूत, सूत्र, स्यूत के बीच संबंध के विषय में किसी टिप्पणी की आवश्यकता नहीं। तार के विषय में संक्षेप में कुछ संकेत जरूरी हो सकते हैं।

बचपन में हम एक खेल खेला करते थे। टूटी हुई चूड़ियों के बीच में कपड़ा लपेट कर उसे आग पर जला लेते और फिर कुछ देर के बाद वह पिघलने लगता तो दोनों सिरों को बाहर खींचते तो शीशे का बहुत पतला तार निकलता। चासनी में आपने एक तार, दो तार की चासनी का नाम सुना होगा। रस इतना गाढ़ा हो जाता है कि अब वह बूँद बूँद नहीं टपकता। उसकी एक धार सी बन जाती है। यह धार या तार या सिलसिला (तार-तम्य) तर- पानी, से निकला है। तार एक तरह से धार का ही उच्चारभेद है। प्रकाश-रश्मि एक तार है और रश्मि का संबंध रस से है। आकाश के नक्षत्रों का एक नाम है तारा और पानी के प्रवाह का नाम है धारा। ऋग्वेद में रस्सी के लिए रश्मि का प्रयोग देखने में आता है और रास, रेशम रश्मि से ही निकले हैं।

तार टूटने न पाए, चाहे वह धागे का हो, या संतान परंपरा या विचार परंपरा का- ऋग्वेद का कवि प्रार्थना करता है ‘ मा तन्तुः छेदि वयतो धियं में’ । लगता है पहले धी का प्रयोग भी संतान (वंश के दीपक या धारक) के लिए भी होता था और इस पंक्ति में संतति के धागे के टूटने या परंपरा के भंग होने की चिंता प्रकट की गई है। पुत्र के लिए धी शब्द का प्रयोग साहित्य में बाद में देखने में नहीं आता परंतु लड़की के मामले में आज भी भोजपुरी (मगही, पंजाबी आदि) में धिया शब्द का प्रयोग चलता है। अटूट वाला तार केवल प्रकाश की रेखा में और जल की धारा में देखने में आता है। रश्मि शब्द के पीछे रस का हाथ तो रहेगा ही क्योंकि प्रकाश में ध्वनि नहीं होती इसलिए उसे अपनी संज्ञा जल के रस से प्राप्त करनी ही है, रसरी>रस्सी को अपना नाम जल से मिला इसे रस-जल> रसना – (1) रसेन्द्रिय, (2) रस्सी (रशनाभिर्नयन्ति – रस्सी से बाँध कर ले जाते है; शीर्षण्या रसना रज्जुः अस्य)। फारसी में दारो-रसन – फाँसी का तख्ता और रस्सी (का फंदा)।

Post – 2020-05-19

#शब्दवेध(40)
कोश पर भी भरोसा न करें

फिर करें किस पर?

सच तो यह है कि कोश तो जितनी बार मैं स्वयं देखता हूँ कि उसे मानदंड बनाएँ तो डी.एच. लॉरेंस से बडा लेखक सिद्ध हो सकता हूँ। लॉरेंस ने अपने एक पत्र में लिखा था कि यदि उन्हें इस बात की सही समझ होती कि किस वर्ण के बाद कौन सा पड़ता है तो डिक्शनरी देखने रहने में उनका जितना समय लगा उसमें जिंदगी के साल दो साल बच गए होते।

लॉरेंस को सिर्फ अंग्रेजी का कोश देखना पड़ता था, मैं जिस बवाल को सिर ले बैठा हूँ उसमें मुझे कई भाषाओं के कोश देखने होते हैं। इसके बाद भी यदि कहता हूँ कि कोश पर भरोसा न करें तो महाभारत की एक सीख, ‘अविश्वसनीय पर तो भरोसा करें ही नहीं, जो विश्वसनीय हो उस पर भी आँख मूँद कर भरोसा न करें (न विश्वसेत अविश्वस्ते विश्वस्ते नाति विश्वसेत), और अपने अनुभव के कारण। कोश में मिलेगा चिह्न जब कि सही शब्द है चिन्ह (चिन/सिन-जल>चिन-आग>चिनगारी>चीन्हा/ चिन्ह)। खास कर के जहाँ लोक व्यवहार और कोश में मतभेद दिखाई दे वहाँ लोक व्यवहार कोश से अधिक भरोसे का होता है।

हमने पीछे लोढ़ने का अर्थ फूल तोड़ना किया जो कुछ परुष लगता है। फूल के संदर्भ मे यह प्रयोग केवल स्त्रियों की भाषा और उनके ही गीतों में आता था। अब लोकगीतों का स्थान फिल्मी गीतों ने ले लिया है इसलिए संभव है आज इसका प्रयोग कहीं न हो रहा हो। पुरुषों की भाषा में लोढ़ने के लिए तोड़ना या चिनना और कभी-कभी उतारना भी चलता था। कोश में लोढ़ने का अर्थ ओटना और ‘साफ करना’ भी दिया है जिसका प्रचलित शब्द तुनना – रेशों को तानना इस क्रम में उसके बीज, धूल-गर्द हटाते हुए उनके गुंजलक को सीधा करना सभी आता है। लोढ़ना धुनाई के बाद पूनी बनाने के लिए (लुंठन, भो. लूँडी – रस्सी और सूत का गोलक बनाना जिससे उपयोग के समय तार/रस्सी उलझे न) अधिक उपयुक्त है। तुनाई में, रेशे जितनी आसानी से खिंच कर अलग हो जाते है, उसी तरह मामूली से मामूली बात पर उखड़ जाने वाले के लिए फा. तुनुकजिजाज, खींच-तान के लिए तना-तनी, जैसी निर्मितियों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए, क्योंकि व्याकरणिक लिंग भेद और घालमेल में इसकी भूमिका रही लगती है (under ‘ideas’ are included emotions and attitudes, Boas)। जो भी हो, हमें मानना होगा कि अर्थभ्रम के कारण कहीं तुनने को भी लोढ़ना कहा जाता रहा होगा। कोश का कोई आधार तो होगा ही। ज्ञानपीठ कोश में लोढ़ना का अर्थ है – ओटना, साफ करना, *फूल तोड़ना।

ओत बुनकरों का ताना या लंबाई में फैलाये जाने वाले धागों का संकुल है। संभवतः इसी के आधार पर सूत कात का उसकी लच्छी बनाने के लिए जिस पटरे पर उसे लपेटा जाता है उसे *ओतेरन (अटेरन) कहते हैं ओट (ओत) का पुराना अर्थ ताना- और उसमें किसी तरह के उतार-चढ़ाव न होने देना तारतम्य । क्या फारसी का तरमीम – नीचे ऊपर हुए धागों को सही करने से संबंध है? हमने इस पर विचार न किया। ओत के लिए ऊप/ऊह का भी प्रयोग होता था। ऊहा – कल्पना का विस्तार, भो. का बेंवत (आपूर्ति की हैसियत) और युद्ध की (वि-ऊह) व्यूह-रचना (चक्र-व्यूह) का जिसे घेरा डालना और क्रमशः इसका दायरा कम करते हुए आदमियों-जानवरों का शिकार करना मंगोलों के युद्ध कौशल की विशेषता रही है। इसका महाभारत के चक्रव्यूह से कालक्रम की दृष्टि से क्या संबंध है इसकी कभी जाँच न की, न यह जरूरी है। ऊहा-पोह में ताने और बाने का स्थान तर्क (ताना)- विचार-सूत्र और वितर्क(बाना) ने ले लिया है। पोहने का प्रयोग हिंदी मे गूँथने-पिरोने के (सप्त सप्त पुनि पोहिए) को लिए और अपोहन – निवारण, उघाड़ना, खंडन के लिए होता रहा है। (तर्क, वितर्क, कुतर्क, तर्कु, तकला>तक्र, संतति/संतान, आदि शब्द भी बुनकरी से निकले हुए शब्द का है इसलिए रुई तुनने, उसके तिनके और बीज अलग करने के लिए भी प्रयोग में आने लगा, संभव है आज से चार-पांच हजार साल पहले भी तुनने के अर्थ में प्रयोग में आता रहा हो, जब से ओत का प्रयोग होता था। ओटने में बीच की दन्त्य ध्वनि केवल मूर्धन्य हो गई है। मूर्धन्यप्रेमी समुदाय ‘ओत’ न बोल कर ‘ओट’ ही बोलता रहा होगा। ओट के साथ अर्थविकास भी हो जाता है और यह परदे, (*ओटने) ओढ़ने को भी अभिहित करता है। ऊह के रास्ते ऊँघने, भो, ओंहाने को भी इसी से नाम मिला हो तो क्या कहेंगे। बुनकरी हमारे समाज की सबसे पुरानी कला है और अंग्रेजी के वूफ (woof – thread of a weft, texture), वीभ (weave – to make by crossing threads, tp move to and fro), वार्प (warp- to twist out of shape) का तो जनक है ही, संतान की संतान – पोता का भी जनक है। यज्ञविधान के सहायकों में पोत्र का जनक भी यही है या नहीो इसपर कभी विचोर नहीं किया।

मुहावरे में ही सही – आए थे हरिभजन को (काम की बात करने) ओटन लगे कपास (फिजूल की बातों में लग गए) का प्रयोग आपने भी किया होगा पर इस बात पर ध्यान न दिया होगा कि कपास ओतने में गड़बड़ी क्या है कि इसे इतनी पब्लिसिटी दे दी गई। गड़बड़ी दो तरह की है। ओतना फैलाना और विषय से हट कर, मूलविषय से हट कर फालतू बातों में उलझ जाना। इस भाव से तो प्रयोग करते समय आप भी परिचित रहे होंगे, पर दूसरी पर आपका ध्यान शायद न गया हो। ताना या ओहन तो धागे का होता है जो कपास से धागा बनाने के बाद ही उसकाे ताना जा सकता है। आप सीधे कपास को ही तानने लगेंगे को क्या होगा? इसी आशय से उर्दू शायरों का कच्चे ( सूत तो तान लिया पर ऐंठन देना रह गया।) अर्थात जोर की जरूरत ही न पड़ेगी। इरादा भाप कर ही आदेश का पालन हो जाएगा।

असल बुनाई तो तब होती है जब तने हुए धागों को नीचे, ऊपर उठा कर धागे पिरोये जाते हैं। यही वयन है। ताने तो बया (ूमंअमत इपतक) जाने कहां कहां से उठा लाती है, बाने पिरो कर उस आश्चर्य को पैदा करती है जिससे प्रकृति का तन्मय हो कर अवलोकन करने वालों ने यह सीखा कि, छोटे छोटे खंडों को मिला जोड़ कर आवरण बनाए जा सकते हेंकर – क्योंकि बया की कला का लाभ वह चटाई, वल्कल आदि बनाने तक उठा चुका था। परंतु बुनाई को उसने पक्षियों ‘वी’ से प्रेरित मान कर, बुनकरों को वाय कह कर, अपनी कृतज्ञता तो जताई, यद्यपि इस डर से कि कहीं वाय और वया के सायुज्य से बुनकर की मर्यादा न कम हो जाए, इससे पहले वस्त्र का पर्याय लगा दिया। वासोवाय।

बाने ने बनाने, बनने ‘सजने’, बुनने, बान- बार बार एक ही काम करना, अर्थात आदत; बाना – वेश-विन्यास,, बानक – सज-धज (यहि बानक मो मन बसो ) के लिए कितने शब्द दिए हैं। बनियान का नाम लेते समय यह अक्सर नहीं सूझता कि यहाँ सीधे बुनाई से तैयार की गई होजरी उत्पाद का आशय है।

Post – 2020-05-18

#शब्दवेध (39)
मग-डग

यह उपशीर्षक अटपटा लग रहा होगा, जब कि मग और डग दोनों सार्थक शब्द हैं, क्योंकि हम सोच कर बोलते हैं तब भी जो कुछ जिस रूप में सुना और जाना है उसी रूप में, उसी क्रम से सुनने पर उनका शाब्दिक और पदीय आशय खुलता है, अन्यथा विचित्रता की छाप छोड़ कर रह जाता है।

बचपन में जब परंपरागत घरेलू उपकरणों का स्थान कारखानों में उत्पादित सामानों ने नहीं लिया था और उन पेशों से जुड़े लोग सर्वहारा बन तो गए पर सर्वहारा नहीं माने जाते क्योंकि उनको संगठित करने में श्रम और समय की जरूरत होती, जब कि कम्युनिज्म को पवित्र मुहावरे वाले जुए के खेल के रूप में कल्पित किया और अमल में लाया गया, इसलिए वे देखते देखते भिखारियों की दशा को पहुँच गए, धरिकार (बँसफोड़) का एक जरूरी पेशा होता था। वे बाँस की तीलियों और पट्टियों से बेना, छींटा, दउरा, दउरी, सुपोली, सरकंडों की सींक से सूप बनाया करते थे। इन्हीं में से दउरी/दौरी को बैठी होते हुए दौड़ की बाजी मारते, और लोगों को खेल के नियम का उल्लंंघन देख कर भी चुप लगाए देख कर कबीर साहब को इतना गुस्सा आया था कि वह पूरी दुनिया को पागल करार दे बैठे थे। उनकी नजर उस खास उपकरण पर नहीं पड़ी थी जिसे डगरा कहा जाता था। यह एक बिल्कुल समतल और गोलाकार और आकार में छींटे जैसा होता था। किनारे एक मेढ़र (रिम) लगी होती। उसका उपयोग संभवतः अनाज को डगरा कर एक किस्म के दानाो को दूसरों से अलग करने के लिए किया जाता था। लुढ़काने पर वह चक्कर खाता दूर तक चला जाता था।

सात आठ साल का होने पर एक नया खिलौना देखने को मिला। यह लोहे की पतली सरिया का बना एक गोल छल्ला था जिसे एक पतले डंडे से जिसके सिरे पर बेड़ी अंकुशी लगी होती दौड़ाया जाता था। इसे डग्गा कहते थे। खेल-कूद में भोंदू होते हुए भी मैंने उसे कई बार दूर तक दौड़ाया था, पर मैं सोचता इसे डग्गा क्यों कहा जाता है?[1] कारण मेरी समझ में नहीं आता था।

मैं डगरने, डगराने से परिचित था, चलते समय डग से, चलने से बनी रेखा या डगर से परिचित था, इसके बाद भी डग्गा का अर्थ समझने में मुझे कई साल लगे। इसलिए कबीर साहब ने, मेरी पाठ-पोथी के एक पन्ने से अपने टेढ़े अंदाज में सवाल दागा कि दौरी तो जहाँ रख दो वहीं पड़ी रहती है इसे दौरी क्यों बोलता है तो मैं भी चक्कर खा गया। यह न सूझा कि गोलाकार होने के कारण यह दौड़ सकती है, इसके आधार पर यह नाम रखा गया है।

हमारे बहुत सारे सवालों के जवाब उस क्षेत्र की हमारी जानकारी की परिधि में होते हैं पर हम उनको जोड़ कर देख नहीं पाते और ठीक मौके पर गच्चा खा जाते हैं। पर यहाँ एक समस्या भी थी। चलते तो हम पाँव उठा कर, बीच की दूरी को छोड़ते हुए हैं, दौड़ते भी इसी तरह हैं, फिर लुढ़कने, डगरने से उसका अभेद कैसे हो गया जिसमें आगे बढ़ने वाली चीज का धरती से लगातार संपर्क बना रहता है।

लंबे सोच-विचार के बाद लगा हो सकता है कि गति का कोई रूप हो जो सभी के लिए प्रयोग में आता हो और, जिसका नाता जल के प्रवाह से जुड़ जाता हो। चलने के लिए भो. का एक और शब्द है, टघरल (टघरना) जिसे कौरवी ने टहलना कर दिया है। जो भाव टहलना में नहीं आ पाया है वह यह कि किसी जमी हुई चीज (घी, मोम, राँगा, लाख) के ताप से पिघलने को भी टघरना कहा जाता है। आगे कैसे बढ़ा जा रहा है यह गौण है। डग, डग्गा, डगर। डंगर/ डाँगर- ढोर; ढंग – चलन, चलने का तरीका, किसी काम का तरीका, शऊर; बेढंगा, दौर(दौड़), दौरा, दौड़ी>दउरी सभी का संबंध एक ही कुनबे से है। पानी से इसका क्या संबंध है यह द्रव>द्रवः> द्रवर (सत्यो द्रवो द्रवरः पतंगरः ।के रूप में ऋ.4.40.2 में पाया जाता)। गोरखपुर में एक तटीय स्थान नाम है डँवरपार।

गड में डग के अक्षर का फेर (वर्णविपर्यय) है पर अर्थ की निकटता है। गड़ <गळ<गल<जल में मात्र बोलियों के अनुसार उच्चारण की मामूली भिन्नता है। गड़-चलना, गोड़-चलनेवाला, पैर। गोड़> गोळ> गोल – लुढ़कने वाला, गोली, गोला -गोलाकार; के उच्चारभेद पर ध्यान दें।

गड़>गळ>जल पर ध्यान दें तो समस्या समस्या न रह जाएगी। यह ध्वनि-नियम से ऐतिहासिक क्रम में घटित परिवर्तन नहीं हैं। भाषाई समुदायों की अपनी बोली के कारण है जिनकाे आज भी लक्ष्य किया जा सकता है। मराठी मे धवल धवळ है, राजस्थानी, हरयाणवी में रानी > राणी। गड़ पहले गोलाकार वटिका (वर्तिका- लुढ़कनेवाली) पहिए के लिए चलन में आया फिर गड़ी/गाड़ी पहिए से चलने वाली के लिए। ऋ. में गाड़ी के लिए एक शब्द है ‘गर्त’ जिसे सुन कर आप को अं. कार्ट की याद आ जाएगी। गर्त का गाड़ी से सीधा संबंध है या नहीं, इस पर विचार नहीं किया पर अर्थ उसका भी (गरति- चलति) चलने वाली ही (स्तुहि श्रुतं गर्तसदं युवानं मृगं न भीममुपहत्नुमुग्रम् (विख्यात, गर्त पर सवार, सिंह की तरह प्रचंड शत्रुदलन, युवा (इंद्र) का स्तवन करो) ; आ रोहथो वरुण मित्र गर्तम्, (वरुण और मित्र दोनों गर्त पर सवार हों )। संभव है इसका प्रयोग बड़े पहिए वाले रथ (बग्गी) के लिए होता रहा हो (बृहन्तं गर्तमाशाते )।

कुछ समय पहले तक हमें यह लगता था कि गड़- चलना खुर वाले जानवरों के खुर की आवाज का अनुकरण है, और मनुष्य के पाँव के लिए उसका प्रयोग चलने वाले अंग के साम्य पर आधारित है। तब तक हमारा ध्यान इस प्रसंग में जल की ओर न गया था।

गोलबंद होना- संगठित होना; गोल- (1) वर्तुल; (2) (दल), गोल करना- गायब करना, का अर्थ खोदना, पर गोल-दल, समूह। गढ़ – 1)पत्थर (गढ़वाल), 2) पहाड़ जैसा दृढ़, किला, 3) विशाल गर्त (रामगढ़), 4) वटिका (वर्तिका-लुढ़कनेवाली) गढ़ना- (1) छीलना, काटना, (2) बनाना; गड़ना – भीतर घुसना, धँसना; गड़हा/गड्ढा > सं. गर्त – (1) गाड़ी, (2) गड्ढा। पानी की धार ये सभी क्रियाएँ करती है, कगारों को काटने के कारण वार्त्रघ्न और ढाल पर गहरे गड्ढे, यमकातर, बनाने के स्वाभाविक नियम से। अपने प्रकोप से यह किसी चीज को नष्ट कर सकता है। आपो वै वज्र। त्सुनामी के बाद संदेह करने का कोई कारण नहीं रह जाता।
————————–
[1] यह प्रवृत्ति शैशव में अपने साथ होने वाले व्यवहार से पैदा हुआ था और आजीवन रहा और इसी ने मुझे उन प्रश्नों का उत्तर तलाशने और पाने को प्रेरित क्या जिसे अनेक क्षेत्रों के धुरंधर पंडित दरकिनार करके अनर्गल मान्यताओं को स्वीकार कर लेते हैं। संभव है सुख सुविधा में पले बच्चों में जिज्ञासा की प्रवृत्ति मन्द पड़ जाती हो।

Post – 2020-05-17

#शब्दवेध (38)
डगमगाते हुए

गाड़ी का चलन जितना भी बढ़ गया हो, इसे चलते हुए देख कर भी यह नहीं समझ पाते कि इसे गाड़ी क्यों कहा जाता है। बहकावे में आ जाते हैं कबीर के जो किताबों से डरता था कि कहीं पढ़ने पर दिमाग न उलट जाए। पूछना ही था तो मेरे पास आते, पर दुर्भाग्य से तब मैं था नहीं और अब जब हूँ तो कोई मेरी सुनता नहीं। इस बीच राजाओं नवाबों की सैकड़ों पीढ़ियों का अता-पता नही, कबीर की साहबी जस की तस कायम है। चलती को उस जमाने में भी लोग गाड़ी कहते तो कबीर को रोना आ जाता था, जब गाड़ी के नाम पर बैलगाड़ी और घोड़ागाड़ी ही थी आज तो रेलगाड़ी भी है। । कबीर गुस्से में, अपने को छोड़, पूरी दुनिया को बावला सिद्ध कर देते थे। यही एक मामला है जिसमें कबीर मेरे समानधर्मा सिद्ध होते हैं, क्योंकि अपने को छोड़ कर, पूरे जहान को मैं भी बावला समझता हूँ, कबीर आज होते तो उनको भी मान लेता। कबीर की समस्या यह कि इतनी उलटी बात हो रही है, किसी के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती, हमारी यह कि कबीर की बात मानने वालों के कान पर इतनी जूएँ रेंगने लगी हैं कि कान दिखाई ही नही पड़ते।

जैसा हम देख चुके हैं, दुनिया की सभी भाषाओं में, सभी लोग, हजारों ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जिनका अर्थ वे नहीं जानते या जिनका जो अर्थ समझ में आता है, उससे उलझन में पड़ जाते हैं कि उसके काम, रूप और नाम में कोई मेल क्यों नहीं है। आप बेफिक्री से कह सकते हैं, नाम को लेकर परेशान क्यो होना! गुलाब को किसी नाम से पुकारें, उसकी गंध वही रहेगी! परंतु उसका नाम न लें तो भी गंध में अंतर न आएगा। प्रत्यक्ष के लिए नाम की जरूरत ही नहीं। भाषा अनुपस्थित को शब्दों के माध्यम से उपस्थित करने की जादूगरी है। भाषा झूठ के माध्यम से – नाम और नामित के संबंध को मिटा कर दुनिया को बर्वाद करने का मारण पाठ भी है। जो शब्दों की सतही जानकारी रखता है वह वस्तुजगत की भी सतही जानकारी रखता है। know your words minutely to control the world confidently.

हम जितने लोगों को देखते हैं उन सभी को नहीं जानते। जिन्हें जानते हैं उनमें भी सभी का परिचय हमें प्राप्त नहीं होता। जिन्हें अच्छी तरह जानते है, उनके साथ भी सालों गुजारने के बाद भी कभी किसी एक अनुभव से इस नतीजे पर पहुंच जाते हैं कि इसे समझा ही नहीं था। शब्दों के साथ हमारा नाता भी कुछ ऐसा ही है , इसलिए यह दावा तो किया ही नहीं जा सकता कि हम सभी शब्दों की जन्म कुंडली से परिचित हैं, पर अधिकाधिक शब्दों की कीमियागरी समझना अपने विषय और परिवेश पर हमारे जादुई पकड़ को मजबूत करता है। हमारी हालत उल्टी है। हम जिन शब्दों को सबसे अधिक उपयोग करते हैं उनका या तो अर्थ नहीं जानते या किसी क्षुद्र लाभ के लिए उनके अर्थ को नष्ट करते रहते हैं।

दुनिया यदि बावरी है तो इसलिए कि वह अक्सर पदार्थ को, जिसमें पद और अर्थ दोनों संपृक्त होते हैं, भूल जाती है, नाम को वस्तु का ध्वनिप्रतीक बना देती है, यह प्रतीक चलता रहता है, और वस्तु और नाम के बीच का संबंध ओझल हो जाता है। इससे हमारे काम में किसी तरह की रुकावट नहीं आती, इसलिए हम इसे अधिक तूल भी नहीं देते। उल्टे अक्सर विषेषज्ञों को भी कहते पाया जाता है कि नाम यादृच्छिक या आर्बिट्रेरी होते हैं। हमारे पास ज्ञानसंपदा इतनी अधिक हो गई है कि लगता है जो जानने योग्य था जाना जा चुका। यह नयी बीमारी नहीं है।

इस तथ्य को दुहराना जरूरी है कि हम किसी नाद को, इतने भिन्न रूपों में सुनते हैं कि एक ही प्रकृत नाद, या अज्ञात भाषा का शब्द, विभिन्न परिस्थितियों में, विभिन्न रूपों में सुना जा सकता है, सुना जाता है और उसका वाचिक अनुकरण सभी अपनी भाषा की ध्वनिव्यवस्था के अनुसार करते हैं, अतः उसके अनगिनत नाम हो सकते हैं और किसी संज्ञा से कल्पना के सहारे प्रकृत नाद पर पहुंचना संभव भी हो तो उसे संगीत में ही व्यक्त किया जा सकता है; भाषा में नहीं।

हम केवल अपनी भाषा की ध्वनि-प्रकृति के अनुसार इस संबंध की तलाश कर सकते हैं। अतः वह ध्वनि ही उस वस्तु, क्रिया, गुण और विरोधी गुण के लिए प्रयोग में आती है। यही संज्ञा का संज्ञेय के कार्य और रूप से निसर्गजात संबंध है। उस क्रिया और नाद की उपेक्षा कर दें तो यह समझना असंभव हो जाता है कि एक ही शब्द में विरोधी अर्थ कैसे हो सकते हैं।

यदि मनुष्य के अपने वश में होता तो वह ऐसी भूल नहीं कर सकता था। यह शब्द की स्यायत्तता को प्रकट करता है और यह स्वायत्तता नाद की अपनी स्वयत्तता से पैदा होती है। मनुष्य केवल उसका चुनाव करता है। कहा जा सकता है कि एक सीमित अर्थ में संस्कृत की धातुएँ उस नाद से वाचिक सन्निकटन का प्रयास है, परंतु धातुओं की सबसे बड़ी सीमा यह है कि उनमें इस तथ्य को खुल कर स्वीकारा नहीं गया है और उनकी व्याप्ति केवल संस्कृत शब्द-भंडार तक है इसलिए उनसे देशज शब्दों की व्याख्या नहीं हो पाती। इसलिए हेमचंद्र ने देसी नाममाला का एक अलग संग्रह किया था जिनकी व्याख्या धातुओं से नहीं हो पाती जब कि प्राकृत नाद के अनुवाचन से देसी, संस्कृत, भारोपीय, और अन्य भाषा परिवारों में, रूप और अर्थ में सदृश और भिन्नतर सभी प्रकार के शब्दों, प्रत्ययो, निपातों और उपसर्गों की व्याख्या संभव है।

अभी तक किसी भाषा का व्युत्पत्तिकोश बना ही नहीं। जिसे व्युत्पत्ति कहा जाता है वह सजात (cognate) शब्दों और रूपों की तलाश से आगे बढ़ नहीं पाता। प्रोटो इंडोयूरोपियन के जिन शब्दमूलों (stem) की तलाश की गई है, उनमें भाषा के प्रसार की उल्टी दिशा चुनने और यूरोपीय बोलियों के हाल के प्रतिरूपों पर अधिक ध्यान देने के कारण पूरी तरह व्यर्थ न होते हुए भी यह सं. धातुओं से भी कम उपयोगी है।

गड़, गढ़, कड़, कढ़ घड़, हड़ (तु, करें हाड़> हड्डी) में लगभग एक ही स्रोत – पत्थर के पत्थर से टकराने, रगड़ खाने से उत्पन्न नाद का हाथ है। रगड़ के आद्यक्षर को हटा दें तो इस उपादान से इस क्रिया के टकराते, घिसते हुुए जलधारा मे आगे बढ़ने से उत्पन्न ध्वनि (र)गड़ सुनाई देगी। अपनी जरूरत से हम दो बटिकाओं को रगड़ कर इच्छित शक्ल देना चाहें तो भी वही ध्वनि निकलेगी। यहाँ तक कि यदि एक बटिका को दूसरी से तोड़ें तो इस क्रिया से उत्पन्न नाद को इसी रूप में सुना और बोला जा सकता है।

अब इन ध्वनियों का अर्थ – (1) उपादान की दृष्टि से – पत्थर, (2) कारक की दृष्टि से जल, (3) क्रिया की दृष्टि से बनाना, तोड़ना, गहराई में जाना, (क्रिया विशेषण की दृष्टि से इन ध्वनियों की आवर्तिता।) ; 4. भावी व्यंजनाओं की दृष्टि से इनके आद्य-अक्षर या मूल का धातुओं के रुप में उपयोग और इनकी सीमा में कुछ मामूली परिवर्तन जिनके विषय में हम सचेत नहीं होते पर जो स्वर-व्यंजन-विन्यास बन कर वह घटक बनाते हैं जिनकी सीमाओं का उल्लंघन सहन नहीं। आगे की चर्चा कल के लिए रखी जा सकती है। आज के लिए इतना ही कि (र)गड़, (र)गड़ा, गढ़, गढ़(ना), गहन, गाड़ना के लिए गढ़ा > घड़ा, गढ़ – पहाड़, गड़हा (गढ़ा), गड्ढा, की विरादरी के कारनामों पर आप भी विचार करें कि इन सभी को समझने में हमारी जानकारी में हमारा ज्ञान-विस्तार हो रहा है या ह्रास।

Post – 2020-05-17

#शब्दवेध (37)
लुढ़कते हुए
लुढ़कने के साथ लढ़ा और लढ़िया – गाड़ी, का स्मरण होना स्वाभाविक है। इन्हें आप अधिकार सहित रढ़ा और रढिया भी कह सकते हैं। जिस बोली में र-कार न था, उन्होंने इसे अपनाया तो, पर ऐसे शब्दों का उच्चारण करने में कठिनाई अनुभव करते रहे जिनमें शब्द के आदि में र-कार था। इसके लिए उन्होंने दो तरीके अपनाए । एक था, रकार से पहले अ या इ जोड़ देना। तमिल में राजा से पहले अ-कार जोड़ कर अरसन बनाया गया। इसी प्रभाव में रजत अर्जंटम् बन कर यूरोप तक पहुँचा। दूसरा था, उसे इससे निकट पड़ने वाली ध्वनि में बदल देना। मागधी[1] में यह ध्वनि ‘ल’ थी और इसमें राजा को ‘लाजा’ बनाया गया जिसकी जानकारी हमें अशोक के शिलालेखों की पाली में (*राजेन> लाजिना) मिलती है।[2]

मागधी प्रभाव के कारण र-कार ल-कार में बदल गया और आद्य ‘र-’ ‘ल’ हो गया (रघु>लघु, रेखन> लेखन, रीछ >सं. ऋक्ष > लिच्छ/निच्छ> लिच्छवि/निच्छवि)) । आद्य र-कार वाले रूप बने रहे (रढ़ा, रेढ़ा, रेढ़ू, अं. रडर, रोट, रोटेशन, रोड)पर उनका प्रचलन कुछ मामलों में जहाँ कम हो गया वहाँ उनकी औकात कम हो गई।

लढ़िया को समझने के लिए हमें *रढ़िया तक लौटना होगा। रढ़ का पुराना रूप रोढ़ था, या रढ़ के उच्चारण में कठिनाई के कारण अकार ओकार में बदला, यह तय करना कठिन है, पर रोड़ में अन्त्य वर्ण के महाप्राणन का लोप देख कर लगता है रढ़, रिढ़, रेढ़ अधिक पुराने हैं।

क्या आपने कभी किसी को ‘तुमने तो मेरी रेढ़ मार दी’ मुहावरे का प्रयोग करते सुना है? यदि सुना है तो अनुमान से यह भी समझा होगा कि यहाँ भारी नुकसान पहुँचाने की बात की जा रही है। रेढ़ का अर्थ क्या है, यह पता न चला होगा। रेढ़ का सजात प्रतीत होने वाला एक ही शब्द याद होगा, रेढ़ा या ठेला। यह रेढ़ा भी आपको नरोत्तमदास की अमर रचना के ‘जातहिं दैंहै लदाइ लढ़ा भरि’ पढ़ते समय शायद ही याद आया हो। पर इनके सहारे रेढ़ का अर्थ समझने में न आया होगा। दुखी होने की बात नहीं। रेढ़ का मतलब उस आदमी की समझ में भी नहीं आया था, जो इसका प्रयोग कर बैठा था। यदि उसने रीढ़ मार दी कहा होता तो बात कहने से पहले उसके भी पल्ले पड़ गई होती कि मारना का अर्थ तोड़ना है। आशय वह ‘कमर तोड़ने’ जैसा ही है, चोट कुछ ऊपर की गई लगती है। रीढ़ का अर्थ आप जानते ही हैं, किसी की समझ में न आए तो ‘मेरु दंड’ कह कर समझा सकते हैं।

पर सचाई यह है कि आप रीढ़ का अर्थ भी नहीं जानते हैं न ही मेरु का अर्थ जानते हैं और इस सिलसिले को कमर तक ले जाएँ तो कहा जा सकता है कमर का भी मतलब नहीं जानते। केवल यह जानते हैं कि यह टैग किस चीज के साथ नत्थी है। इसके बाद भी यदि कहूँ आप हिंदी नहीं जानते और इसमें उन लोगों को भी शामिल कर लूँ जिन्होंने भाषा पर काम किया है और नाम कमाया है, भाषा और साहित्य के आचार्य रहे हैं, अच्छी हिंदी बुरी हिंदी का फर्क समझाते रहे हैं, तो इस सच को बयान करने के बाद दुश्मन बनाने की जरूरत न रहेगी, साथ खड़ा होने वाला कोई न मिलेगा।

झेंप मिटाने के लिए यह जान लेना काफी होगा कि केवल हिंदी के लोग ही नहीं दुनिया की किसी भाषा के लेखक, वक्ता, कोशों के रचयिता अपनी भाषा को नहीं जानते, क्योंकि हमें अपनी भाषाओं का ज्ञान उल्टे सिरे से कराया जाता रहा है। हमारा अपनी भाषाओं की जड़ों से वही संबंध रहने दिया गया जो किसी अंधड़ में उखड़ कर गिरे पेड़ का जिसकी उस दिशा की जिधर वह लुढ़का है, एक आध जड़ें बची रह गई हैं जिससे उसकी कुछ डालियाँ टहनियाँ फिर भी हरी रह गई हैं और उनके जीवित होने का भ्रम बनाए रही हैं। यह अंधड़ आभिजात्य का अंधड़ था जो पांडित्य बन कर आया और अपनी ही जड़ें उखाड़ बैठा। इस अंधड़ से पहले या इससे बेअसर बोलियों के लोग – खास कर महिलाएँ – भाषा की पंडितों से अधिक गहरी समझ रखते/रखती हैं।

रीढ़ का अर्थ है पत्थर। मेरु का अर्थ भी पत्थर। मेरु गिरि का – पथरीला पहाड़। बहुमूल्य खनिज, रत्न बलुए पत्थरों (सेडिमेंटरी रॉक्स) में नहीं पुरानी पथरीली चट्टानो में ही मिलता हैं। रीढ़/रेढ़ – नदियों के कटाव और धारा की रगड़ से चिकने और वर्तुल बनी बटिकाओं के लिए प्रयोग में आता था। यही रीढ़/रेढ़ > रोढ़>लोढ़ का पूर्वरूप है जिसने पहिए के आविष्कार की प्रेरणा दी। पत्थर का आशय इससे जुड़ा रहा। रोड़ा, रोड़ी इन्हीं के बदले रूप हैं, पर बजरी नहीं। वह वज्र= पत्थर से निकला है।

आपका कंकाल शब्द से परिचय है। कंक का अर्थ है पत्थर। कंकर/कंकड़ में जो -अर/-आर -अड़ (>अळ> -अल/-आल प्रत्यय=वाला आया है उसे हटाने से काम चल जाएगा। कंकाल का अर्थ था पत्थर का ढाँचा। हमारी हड्डियों की कल्पना पत्थर के रूप में की गई थी। यही रीढ़ की संज्ञा का रहस्य है।

लढ़िया लढ़-इ-या के योग से बना है। लढ़-वर्तुल, लुढ़कने वाला। जैसे रढ़ से रेढ़, रोढ़, रीढ़, रेड़, रोड़ की उत्पत्ति हुई उसी तरह लेंढ़ा – कटहल का बतिया जिसमें अधिकांश कमजोर होने के कारण गिर जाते है, लोढ़ा जो वर्तुल होता था और इसे सिल (शिला) पर लुढ़काते हुए भुने धाना का चूरन (सत्तू बनाया जाता रहा, फिर सोम रस निकालने में काम आता रहा और कालांतर में मसाला पीसने से लेकर भाँग घोंटने के काम आने लगा। लोढ़ा के तीन अर्थ हैं। एक उपादान के कारण, अर्थात् पत्थर का। दूसरा बनावट पर आधारित, अर्थात् लुढ़कने वाला और तीसरा कर्म पर आधारित, अर्थात् तोड़ने वाला। भो. में फूल तोड़ने के लिए फूल लोढ़ना में यही आशय है। लढ़िया का अर्थ हुआ लुढ़कने वाला यंत्र अर्थात् पहिया लगा यंत्र। लढ़िया शब्द भी प्रयोग से बाहर जा रहा है, क्योंकि अब लढ़िया के लिए गाड़ी का ही प्रयोग हमारी बोली में भी सामान्य हो चला है, चाहे वह बैल गाड़ी हो, या मोटर गाड़ी, या रेलगाड़ी।
————————————–

[1]मागधी कहना ठीक नहीं है क्योंकि इसके विस्तार क्षेत्र में अनगिनत बोलियाँ स्वायत्त बनी रहीं पर कुछ समानताएँ जो पूरे क्षेत्र में समान हैं जिनके पीछे एक की अग्रता, जिसमें मगध की भाषा के प्रभाव का अशोककालीन पालि के प्रचार को मानना होगा, ये ऊपरी समानताएँ नीचे भी रिस कर आईं, मागधी का प्रयोग सुविधाजनक है।
[2]अब आप लाज>लज्जा की व्युत्पत्ति समझ सकते हैं जो विराजना, (विराजति) में सुरक्षित है। अपरिचित ध्वनियों के उच्चारण में यह तरीका आज तक अपनाया जाता है। ऐसी ही एक ध्वनि दंत्य स है जिसकाे कौरवी प्रभाव में आदि स्थान में (आद्य) स्वरमु्क्त (हल ) रूप में कुछ शब्दों के आदि में जोड़ा गया (भो. था (थान, थाल, थाली) > स्था (स्थान, स्थल, स्थाली), आद्य ‘स’ की ध्वनि से फारसी में जो समस्या पैदा हुई इसे हम सिंधु के हिंदु में बदलने में पाते है और आद्य ‘ह’ के कारण ग्रीक में जो समस्या पैदा हुई उस हिंद के इंद में बदलने में लक्ष्य कर सकते हैं। परहेज ‘ध’ के महाप्राणन से भी है इसकी पुष्टि दोनों से होती है। आज भी आद्य ’स्’ का हाल यह है कि अं. में स्टेट दो रूपों में लिखा जाता है – इस्टेट (estate) और स्टेट(state) – एक उच्चारण की सुविधा को देखते हुए, दूसरा शब्द की शुद्धता के लिए। यही हाल स्पेशल का है – इस्पेशल (especial), स्पेशल (special) । पंजाब मे ‘स्’ में स्वर जोड़ लेते हैं (स्टेशन> सटेशन) भो. में ‘स्’ को गोल कर जाते हैं, या इ-कार जोड़ लेते हैं(टेसन/टीसन, इस्टेसन)।

Post – 2020-05-16

तुम न मानोगे हमारी न कहोगे अपनी
खत में क्या दर्ज है, कासिद, यह खबर रखते हैं।
दिल में क्या था, जिसे लिखने को सियाही कम थी
झिझक, हिचक पर नम आँखों पर नजर रखते हैं।
जो कलमबंद हुआ वह तो दिखावा है महज।
सादे सफहे भी अधिक उससे असर रखते हैं।
पता कोई हो किसी का हो यह बेमानी है
हम अपने दिल में जमाने का बसर रखते हैं।।

Post – 2020-05-15

#शब्दवेध(36)
हमने आँख से संबंधित शब्दावली पर चर्चा अक्षि/आंख और तमिल के कण् से आरंभ की थी। आज भी उसी पर विचार करेंगे, फिर भी यह विश्वास नहीं पाल सकते कि यदि दो चार दिन और इसी पर बात बात करें तो भी इसके समूचे प्रसार को समेट सकेंगे। अब तक की चर्चा में हमने यह पाया कि जिसे हम निरा द्रविड़ या तमिल शब्द मानते हैं वह इतने आदिम चरण से हिंदी क्षेत्र की बोलियों, हिंदी और यहाँ तक कि संस्कृत मे इतने अधिकार और सक्रियता और मौलिकता के साथ जमा हुआ है जिसका स्वयं द्रविड़ भाषाओं में अभाव है। शब्द तमिल का और उसका संकल्पनात्मक आथार सूक्ष्म आशय और मुहावरे भोजपुरी और संस्कृत में। इसके कारण का संकेत हम कर आए हैं पर यह जोड़ना जरूरी है कि इसके कारण ही जिसे रामविलास जी हिंदी प्रदेश कहते रहे हैं उसमें वह सर्वसमावेशिता इसकी बुनियाद में है। यह इसमें तीर्थों, मंदिरों, इससे बाहर जाने वाले मज़दूरों या सिनेमा के कारण नहीं है, इनकाे वरीयता इसलिए मिली कि यह समावेशी पर्यावरण पहले से तैयार था।

आंख से कोई आवाज नहीं निकलती इसलिए हमने इसके प्रधान गुण चमक, प्रतिबिंबन के स्रोत जल की उपयुक्त ध्वनियों कन् और ‘अक’ की तलाश की। ‘अक’ भारतीय भाषाओं में पानी के अर्थ में प्रचलित नहीं रहा गया, यद्यपि अंग्रेजी < लातिन के aqua, में सुरक्षित है। संस्कृत में और हिंदी क्षेत्र की बोलियों में प्रयुक्त आकुल - (पानी के लिए) तड़पता हुआ, छटपटाता हुआ, अर्थात् 'व्यग्रता' इस बात का प्रमाण है कि कभी अक् पानी के आशय में चलता था। ‘अक’ विकास एक और तो अक>अक्क>अख्ख> आँख में हुआ और दूसरी ओर, कौरवी में यह अक्ष/ अक्षि हो गया। एक तीसरी दिशा संकल्पनात्मक उत्कर्ष की थी जिसमें अंक बना और कमाल यह कि जल और आँख के दूसरे उत्कर्ष गण (कण> गण> गणित) के साथ जुड़ कर अंकगणित और ज्ञान-विज्ञान की आधारशिला बना।

सामान्यतः आंख के लिए जिस संज्ञा का प्रयोग होता है उसी का प्रयोग देखने की क्रिया के लिए भी हो, ऐसा कम देखने में आता है। संभवतः एकरसता से बचने की यह मानवीय प्रवृत्ति के कारण हो। त. कण् – आँख, जब कि देखने के लिए ‘पार्’ (जो भो.हिं. में कान पारना – ध्यान से सुनना का जनक है, और भो. आँखि चियारल का ताऊ है; हिं. का ‘आँखें फाड़ कर देखना’, इनका भावानुवाद है), और नोडु> अं. note। हिं. आँख – देखना, अं. आई eye – सी (see)/ लुक(look)/ व्यू (view)/ ऑब्जर्व (observe) आदि । सं. अक्षि – दर्शन/ ईक्षण/वीक्षण।

भ्रम वहां पैदा हो सकता है जहां उच्चारण में इतना कम अंतर हो कि लगे यह ध्वनि-नियमों के कारण उत्पन्न विभेद हैं, जैसे अक्षि, ईक्षण, वीक्षण के मामले में संभव है।

क्रिया के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है उनका संबंध आंख के लिए संज्ञा रूप में अल्पप्रचलित प्रयोगों से होता है, पर होता अवश्य है, जैसे दर्शन<दृष्टि <दृग<>दृक्। पर यहाँ भी उस पर्याय की संज्ञा जल की किसी ध्वनि पर आधारित मिलेगी, जैस जल के तर>तृ/दर>दृ (तर्प>(सं. तृप्) तर्पण, दर्प>(दृप्) दर्पण; दृक् > द्राक् (तत्काल)> दृग> दृश)।

उच्चारण के मामले में निकट पड़ने वाले दो शब्दों के लिए जरूरी नहीं कि वे एक ही मूल से निकले हों। उदाहरण के लिए यदि अक्षि, अक् – जल से व्युत्पन्न है तो जरूरी नहीं कि ईक्षण उसी के ध्वनि-परिवर्तन से पैदा हुआ हो। परंपरावादी वैयाकरणों के पास यही समाधान सुलभ था, परंतु ईक्षण – जल और रस की जिस ध्वनि (संज्ञा) से निकला है वह इष- जल, रस है। इससे इक्षु का संबंध बहुत गहरा है। यह उसका रस निकालते (इषं दुहंता मनुजाय दस्रा) समय तेज धार से उत्पन्न होने वाली सुनी ध्वनि का वाचिक अनुकरण है। ऋग्वेद में इसका प्रयोग जल, सोमरस, अन्न और धन के आशयों में हुआ है: जैसे नदी में बाढ़ आती है उसी तरह अपने उपासक को अन्न से भर दो ( इषं जरित्रे नद्यो न पीपेः); उषा हमे बैलों, अश्वों, रथों पर लदे माल, सभी तरह की संपदा प्रदान करती है (इषं च नो दधती विश्ववारे गोमदश्वावद्रथवच्च राधः । अग्नि हमें मैत्री के कारण हमें ऐसा धन दे जो वरणीयों में सर्वोपरि हो (अग्निर् इषं सख्ये ददातु न ईशे यो वार्याणाम् ।) गधों पर लाद कर ढोया जाने वाला माल-मता (इषं दधानो वहमानो अश्वैः)। आ विद्युता पवते धारया सुत इन्द्रं सोमो मादयन् दैव्यं जनं ।। 9.84.3

इस इष से ही इच्छा, एषणा, इष्टि (कामना, उत्पादन, यज्ञ),इक्षु, ईक्षण, वीक्षण, इस इष – बाहर निकलना से इषु – बाण। इस काम्य और कामना (एषणा) और उसकी पूर्ति के प्रयत्न – इष्ट, इष्टि और क्रिया रूप इष्यति, एषति, हे देवो, हम सोम रस से आनंदित धन धान्य से समृद्ध हों, (इषा मदन्त इषयेम देवाः)।

इष का रस, जल, गति, इच्छा, स्वामित्व आदि दिशाओं में अर्थविस्तार हुआ। अं. ईश्यू (issue- going out or flowing out, that which flows or passes out, question awaiting decision, act, deed,- निकलना, बाहर होना, संतान, विचार-विषय; विस्ट ( wist-to know), विस्टफुल wistful – longing); विज (wis- to know, believe> वाइज wise); वीक्षण > व्यू (view – range or field of sight); विजन (vision- the act of seeing; faculty of sight [L. visio, visum- to see); विजिट ( visit L.visitare/ visere- to go to see; wise) के अन्तःसंबंधों को, ज्ञात कारणों से, पूरी तरह पहचानने से बचा गया है।

गन्ने के दंड भाग से पत्ते को अलग करते हुए उसके बीच से अक्ष या गर्त में सुरक्षित आँखे का आँख से सादृश्य अचूक होता है। कन् – के घोषित होने के कारण जो तमिल में शब्द के बीच में आने पर हुआ करता है, यहाँ आदि में ही देखने में आता है। इसी से ईख (इस> इष> इख> भो. ऊखि) का नाम गन्ना हुआ। यह संज्ञा आँखे की न हो कर उस जोड़ की हो गई जिसके एक दबे बिन्दु पर यह गन् या ग्रंद होता है। इसी से गाँठ, घुमावदार बंधन के लिए, वह रस्सी में हो, धागे में हो, पेड़ में या सूखे काठ में हो, यहाँ तक कि मन में हो, संज्ञा मिली है।

हमारा गट्टा इस गँठ से निकला है, और जिस तरह का खेल हम ज्ञान की बनावट में देख आए हैं, कुछ वैसा ही (कन>क्न>ग्न> ज्न) जानु और, अंग्रेजी क्नी (( knee, नी) में देखा जा सकता है। वैदिक में जानु का एक रूप ‘ज्ञु’ भी चला था और घुटना मोड़ कर बैठने के लिए ‘ज्ञुबाध’ (उप ज्ञुबाधो नमसा सदेम ।। 6.1.6; ‘हम आपके समक्ष जानुपात पूर्वक नमस्कार करते हैं’), देखने में आता है, पर वह चला नहीं; जब कि ज्ञान, जो भी ज्ञु (अभिज्ञु) बना था, और ज्ञ- (ऋतज्ञ) बन कर टिक गया। ध्यान दें तो ‘घुटना’, घाँटी/घेंटी, गटई, कंठ, जानु( knee, L. genu, G. gony) कण्/ कन के ग्रंथ, ग्रंथि तक की यात्रा के ही विविध पड़ाव हैं, जब कि नीड ( knead) -कचरना. मांड़ना उसका भावविस्तार – संभवतः इसमें सं. कंडूयन – शरीर के एक ही स्थान को एंठ-घूम कर बार बार रगड़ने, खुजलाने, की छाया हो। ,

गन्ने की एक गाँठ से दूसरी गाँठ तक के पोर के लिए कांड का प्रयोग होता है। इसी तर्क से ईख गन्ना बन कर रह गई पर सरकंडा बाजी मार ले गया। लंबी रचना के खंड के लिए कांड और खंड दोनों का प्रयोग होता है, अं. में इसे हम गाँठ के लिए क्नाट (नाट knot- an interlacement of parts of a cord or cords( L. nodus)) और ग्रंथ के भाग के लिए कैंटो (Canto – a division of long poem, L. cantus to sing) लातिन मूल में इसे छन्द (chant) से अर्थभ्रम हुआ लगता है। मराठी सहित दक्षिण की भाषाओं में अनेक फारसी शब्दों में, जैसे राजीनामा, इस अर्थविचलन के नमूने मिलते हैं। कांड में श्लेष है, एक ओर इसमें कन् के प्रकाश वाला भाव है (प्रकांड पंडित) जिसके कारण कुछ रचनाकारो ने प्रकाश और कुछ ने अधिक उत्साह से उल्लास नाम रखा है। दूसरा है विभाग। महाभारत ने तो पर्व शब्द ही अपना लिया है। कांड के पीछे कण् है तो क्या पर्व के पीछे त. पार् (देख-) का हाथ है? कहना जल्दबाजी होगी पर हैरानी यह देख कर अवश्य होती है कि देखने के लिए तमिल का दूसरा शब्द नोड- अं. नोड, ला. नोदस (node- knot, L. nodus). कण् यदि आँख, से गाँठ तक की यात्रा कर सकता है तो नोड नाड और नोड/ नोडस तक की यात्रा तो कर ही सकता है पर अपनी ज्ञान सीमा में हमें इस पर चुप रहना ही शोभा देता है।

Post – 2020-05-14

#शब्दवेध(35)
“Know exactly what you know.” Hardayal

आज हम ज्ञान की चर्चा करेंगे, जो हमारे पास इतना अधिक है कि जितना है उससे अधिक कुछ पाना ही नहीं चाहते। समस्त ज्ञान की कसौटी अपनी ज्ञान सीमा को बनाना चाहते हैं। यदि वह हमारे उपयोग का सिद्ध हुआ तो उसे सही, नहीं हुआ तो मूर्खता और यदि मूर्खता सिद्ध न की जा सके तो उसे नीयत की खोट सिद्ध करके अपनी ज्ञान सीमा की पवित्रता बनाए रखना चाहते हैं। आगे बढ़ने से पहले ज्ञान शब्द की व्याख्या दो कारणों से जरूरी लगी। एक तो इसलिए कि हम भाषा की विकास प्रक्रिया में जिस बिंदु पर पहुँचे थे उसमें आँख के पर्याय ‘कण्’ पर चर्चा चल रही थी, जिससे इस शब्द की उत्पत्ति हुई है; दूसरे जो अपने को ज्ञानी मानते हैं वे यह भी नहीं जानते कि इसका मूल अर्थ क्या है।

ज्ञान का अर्थ है आँख। विश्वसनीय का अर्थ, आँखों देखा। अविश्वसनीय का, कानों सुना, या ‘सुना-सुनाया’। ज्ञान की ये दो ही इंद्रियाँ है। शेष तीन अवर्णनीय हैे, इसलिए वेदन की इन्द्रियाँ हैं, यद्यपि वेद में ज्ञात और अनुभूत और कल्पनीय सभी का समावेश है। आँख की यह महिमा सभी समाजों और भाषाओं में दुहराई गई है। आंखें खोलो, मतलब, 1- नींद से जागो, 2. होश में आओ, 3. सोचो। इससे उल्टा मुहावरा है, आंखें मूंदे रहो और आँखें बंद हो जाना तो मौत का पर्याय है। तमिल की एक कहावत है, एण्णुम् एऴुत्तुम् कण्णं नत्तगुम् – गणना और अक्षरज्ञान दोनों हमारी दो आंखें है।

ज्ञान शब्द आँख के जिस पर्याय से निकला है, वह है कण>< कन। अंग्रेजी का एक शब्द है ken, जिसका मतलब है समस्त ज्ञान और बोध व्यवस्था, one's range of knowledge or understanding.अंग्रेजी का एक दूसरा शब्द है जिससे हम बहुत अच्छी तरह परिचित हैं know, जिसे कहने को तो लातिन ‘ग्नॉस’ जो ऐग्नॉस्टिक - संशयवादी में मिलेगा, पर है यह भी ‘क्न’ का परवर्ती। हमारी भाषाओं का अ-कार अंग्रेजी में प्रायः ए-कार में बदल जाता है (बनारस > Benaras), कभी-कभी उ-कार/ इ-कार/ओ-कार में, पद (foot), बन्ध (bind/ bond). इसी तरीके से कण् एक ओर तो ken बना है तो दूसरी ओर स्वरलोप से क्न ( know, knowledge)। यह स्वरलोप यूरोप में नहीं हुआ, कौरवी प्रभाव से भारत में ही संपन्न हो चुका था। संभवतः कन पूर्वी से कौरवी भाषा में पहुंचा तो इसके दो रूप हुए, एक स्वरलोप से कन् का क्न, दूसरा क्न के न-कार का र-कार में बदलना- क्र, और तीसरा क्न के दंत्य वर्ण का तालव्य हो जाना और सावर्ण्य के नियम से न का ञ मेे बदल कर ‘ज्ञ’ हो जाना (कन>क्नान>ज्ञान)। एक अन्य परिवर्तन कण् की अघोष ध्वनि का घोषित होना था जो संभवत बहुत पहले पूर्वी में घटित हो चुका था (कन- गन, गनल)।

आज तक इन परिवर्तनों को जिस तर्क से समझा जाता रहा है, उससे हमारी समझ आरंभ से ही अलग है अतः हम इन परिवर्तनों को संस्कृत की विकास-प्रक्रिया में योगदान करने वाली भारतीय बोलियों की भूमिका का हाथ मानते हैं, जिनकी ध्वनि संपदा परस्पर कुछ भिन्न थी। तमिल की इस समस्या को समझने में सबसे बड़ी भूमिका हम यह मानते हैं कि उसको सामने रखकर ही हम यह समझ सकते हैं अधिकांश दूसरी बोलियों की ध्वनि संख्या उससे मिलती-जुलती थी। यदि एक सिरे पर तमिल थी, दूसरे सिरे पर भोजपुरी जिसमें सघोष महाप्राण ध्वनियों के लिए विशेष आग्रह देखने में आता है। अनेक ऐसी बोलियाँ थीं जो इन दोनों अतियों के बीच पड़ती थीं और उन्हीं शब्दों को ग्रहण करते हुए अपनी ध्वनि सीमा में ढाल लिया करती थीं। काल-क्रम में इन बोलियों का मेल हो गया। इस सामाजिक और भाषिक रचाव को नस्लवादी आग्रहों के कारण समझने से इन्कार करते हुए जिन परिवर्तनों को ध्वनि नियमों के अनुसार, अथवा ऐतिहासिक क्रम में घटित परिवर्तन माना जाता रहा। परंपरावादी भारतीय और आधुनिक पाश्चात्य भाषाविद दोनों नस्लवादी आग्रहोंं से ग्रस्त थे। सज कहें तो ऐतिहासिक कारणों से होने वाले परिवर्तन भी सामाजिक भागीदारी में आए परिवर्तन के परिणाम हैं इसे हम पहले भी स्पष्ट कर आए हैं। भाषा में घटित बदलाव में कुछ हाथ मनुष्य की कौतुकी प्रकृति का रहा है, जिसमें वह जानता भी नहीं कि प्रचलित शब्द का अपने आत्मीय के लिए परिवर्तित करने के साथ जो प्रयोग कर रहा है, वह अर्थ को संवेद्य बनाते हुए भाषा की प्रकृति को भी प्रभावित कर रहा है।[1]

हम पाते हैं कि ज्ञानी के लिए सं. में क्न/क्नु प्रचलित था जो वचक्नु = वाग्विद, वाचक्नवी – वाग्विदा (गार्गी) में बचा रह गया है। हिं. का जाना सं. की गम् धातु से और जानना ज्ञा धातु से नहीं निकले हैं जाना अधिक पुराना रूप है जिसे समेटने के लिए गम् के कौरवी रूप ग्म का प्रयोग हुआ पर चल नहीं पाया, तो ज्म रूप कल्पित किया गया पर जम/यम – यमति/ जमति, याति/जाति रूप चलन में रहे। इसी तरह जानना ज्ञान से अधिक पुराना है जो रूपावली में, जानाति, जानन्ति, जानतां साफ दिखाई देता है। ऋ. में ज्ञ का उत्पादन, जनन जिसने सर्वकल्याणी धरती और आकाश को पैदा किया) (यो जजान रोदसी विश्वशंभुवा; जिसने पत्थर के भीतर आग पैदा की, यो अश्मनोरन्तरग्निं जजान..; जिसने सूर्य को और उषाओं को पैदा किया (यो सूर्यं यो उषसः जजान; अपनी महिमा से श्वेत और अरुणाभ रंगों को पैदा किया (श्वेतं जज्ञानमरुषं महित्वा ।
और कभी कभी जाति और परिवार जन, कुनबे के सभी लोग सो जाएँ (ससन्तु सर्वे ज्ञातयः) आशयों में हुआ है। ज्ञान के आशय में दो तीन बार ही प्रयोग हुआ है, अज्ञात, अपरिचित दुराग्रही और निकृष्ट शत्रु हमें परास्त न करें (मा नो अज्ञाता वृजना दुराध्यो माशिवासो अव क्रमुः); वे अपने निवास को जानते हैं, ( ते जानत स्वमोक्यं), स्वर्गोपम प्रथम ऋत को जानते हुए (जानन्नृतं प्रथमं यत्स्वर्णरं प्रशस्तये कमवृणीत सुक्रतुः)।
हमारे लिए रोचक बात यह है कि कन् जल, उत्पादन, और दर्शन तीनों भाव लिए हुए प्रयोग में आता रहा ओर यह भी केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। अंग्रेजी के कीन (keen – eager, acute of mind), किन( kin- a person of the same family, relatives); किथ (knowledge, native land) शब्दों के कोश में दिए अर्थ से भी इसका आभास होता है, पर केंडल (candle. L. candela from candere ‘to glow’) candour – whiteness purity, from L. candere – to shine) के विषय में कोई दुविधा नहीं रह जाती कि ‘कन’ से इनका सीधा संबंध है।
————————————
[1]कृष्ण कान्ह, कन्नन, कन्न, कनु बनने के बाद भी कृष्ण ही रहता है परंतु इस कौतुक में कान्हा या कन्हैया बन कर कनवाह या कर्णधार से अभिन्न हो जाने के कारण संसार को भवसागर के रूप में बीच में लाकर उससे पार लगाने की भूमिका में भी पहुँचा देता है जो दुलार से बदली गई ध्वनि में कल्पना में भी नहीं था।

Post – 2020-05-12

शब्दवेध(34)
मुड़ मुड़ कर भी देख

हम पहले की एक छोटी कड़ी से बात आरंभ करना चाहते हैं। भारतीय भाषाओं में भाषा के लिए कोई ऐसा शब्द नहीं है जो सीधे जिह्वा से जुड़ा हो, जबकि पश्चिमी भाषाओं में, लगभग सभी में, सबसे प्रचलित नाम जिह्वा पर आधारित है – टंग, लैंग्वेज। मेरी जानकारी की भारतीय भाषाओं में भाषा के लिए जो शब्द हैं वे इतने अलग-अलग स्रोतों से आए हुए हैं कि अनेक तो जिह्वा और होंठ ही नहीं, मुख तक से भी संबंधित नहीं किए जा सकते। हम उनके अर्थ से उनकी संज्ञा पर पहुंचते हैं, अधिकांश का भाव प्रकाशन, विश्लेषण, आघात, और ज्ञान है। यहां हम इनकी विस्तृत व्याख्या में नहीं जा सकते।

ध्यान दो तथ्यों की ओर दिलाना चाहते हैं, पहला यह कि मनुष्य दसियों हजार साल से बोलता चला आया था परंतु बोलने की क्रिया और भाव को भी कोई नाम दिया जा सकता है इसकी ओर उसका ध्यान बहुत विलंब से ही गया – तब, जब उसे अभिव्यक्ति की भूमिका का पता चल चुका था और वही नामकरण के समय चेतना में सर्वोपरि था।

इसके बाद भी जैसा कि हम देख आए हैं भाषा के लिए कुछ शब्द हमारे उच्चारण तंत्रों पर आधारित हैं। संभव है भारोपीय भाषा [1] ईरान में पहुंची उससे पहले से वहां भाषा के लिए जिह्वा की सक्रियता और निर्णयकारी भूमिका को देखते हुए जबान का प्रयोग चलन में आ चुका रहा हो। जिह्वा की जिस भूमिका की और ध्यान प्रमुख रूप में हमारे विचार-केंद्र था, वह था इसका स्वादग्राही पक्ष – रसना, यद्यपि उच्चारण में इसकी भूमिका के विषय में जितनी बारीक जानकारी भारतीय वैयाकरणों को थी वह दूसरे देशों से बहुत आगे थी। परंतु यह जानकारी उच्चारण स्थानों के जिह्वा द्वारा स्पर्श तक सीमित थी, उच्चारण उन स्थानों की भूमिका से संभव हो पाता था।,

इसके जिस दूसरे गुण की ओर उनका ध्यान गया वह थी इसकी वक्रता, या मुड़ने की क्षमता जो उच्चारण में ‘जिह्वा’ के सबसे निकट पड़ने वाले ‘जिह्म’ शब्द से ध्वनित होता है। और रिह, लिह, लेलिह्यमान से जो प्रकट है, वह भी चखने, चाटने, निगलने से संबंध रखता है। अजीब बात है, चखना, चक्षण- देखना, (स्वाद) जानना का ओर ध्यान गया, तो भी बोलने की तरफ नहीं। तमिल में जिह्वा का जो पर्याय हैं वह भी स्वाद लेने से ही संबंधित है। यह सभी बनावटी नाम है, और शब्द गढने वालों की अपनी सीमाओं को प्रकट करते हैं। जो भी हो आर्थी स्रोत पर ध्यान देने पर हम पाते हैं कि उर्दू का जबान शब्द यूरोप तक भाषा के लिए प्रयुक्त हुआ।

यही स्थिति शब्दों के अर्थ के मामले में पाई जाती है। भारतीय भाषाओं में अर्थ के लिए मन से जुड़ा कोई शब्द नहीं है, निचोड़ने (अर्थ, निष्कर्ष,आशय ) सार तत्व (सारांश), हृदय को प्रभावित करने वाला भाव (मर्म) से जुड़े शब्द हैं, और धारणा या स्थापना (मान्यता, मन्तव्य) अवश्य देखने में आते हैं। ईरानी क्षेत्र में ‘मानी’, या मान्यता को ही अर्थ का द्योतक माना गया। यही यूरोप तक पहुंचा जिसमें हम अंग्रेजी में मीनिंग शब्द को प्रयोग में आते देखते हैं।

शब्दों का एक विशेष दिशा में प्रभाव और उसके पीछे के हिस्से में उसका अभाव किस बात का द्योतक है ? मैक्समुलर ने ऐसे शब्दों का संकलन किया था जो भारत में नहीं पाए जाते परंतु आगे यूरोप तक पाए जाते हैं। इन्हीं के आधार पर उसने यह दावा किया था मेरे पास इस बात के निर्णायक प्रमाण हैं कि भाषा भारत से ईरान में पहुंची थी न कि इसके विपरीत। उनके अपने ही ठोस प्रमाण के आधार पर यह सिद्ध होता था भारोपीय भाषा भारत से निकलकर यूरोप तक फैली है।

मैक्स मूलर ने भारोपीय के स्थान पर, शब्द की संक्षिप्तता को देखते हुए इस भाषा के लिए “ आर्य भाषा” के प्रयोग का सुझाव दिया था, और उसमें भी यह दिखाया था की आर्य शब्द का प्रसार आयरलैंड तक है, परंतु ज्यों ज्यों हम पश्चिम की ओर बढ़ते जाते हैं, प्रयोग विरल होता जाता है।

सत्य किसी अंग में नहीं होता, अपने पूरे पिंड में समाया होता है, और पाश्चात्य अध्येताओं ने जब भी इसके किसी को्ण को ईमानदारी से परखने का प्रयत्न किया तो उनके नतीजे ठीक वही आते थे जो मैंक्स मुलर के ऊपर के कथन में मूर्त है। परंतु बेईमानी की हद यह कि स्वयं मैक्स मूलर अपने खोए हुए सच का सामना नहीं कर सके। उपनिवेशिक तकाजों और नस्लवादी पूर्वाग्रहों से उन्हें लीपापोती करते हुए मूल निवास को मध्य एशिया में स्थापित करने की, और यूरोप के अलग-अलग जत्थों को अलग अलग होकर वहीं से भेजने की कवायद करनी पड़ी।

——————————-
[1] हम पीछे कह आए हैं कि संस्कृत अथवा वैदिक भाषा की तुलना में भारोपीय शब्द आज का गढ़ा हुआ होने के बाद भी, इस दृष्टि से अधिक उपयुक्त है कि यह संस्कृत नहीं थी, वैदिक कालीन बोलचाल की भाषा थी जो संस्कृत के निकट थी परंतु इसके चरित्र को निर्धारित करने वाले वे सभी लोग थे जो विदेश व्यापार में किसी ना किसी भूमिका में सक्रिय थे।और जो अपने दायरे में घर से लेकर बाहर तक अपनी बोली नहीं बात करते थे। भारोपीय संकल्पना में यह तथ्य सम्मिलित नहीं है परंतु उसका चरित्र ही निर्धारित नहीं है इसलिए उसमें इन सभी को शामिल किया जा सकता है और उसे नए सिरे से परिभाषित किया जा सकता है।