यह आदमी भूखों मर जाएगा, पर संगीत के बिना जिन्दा रहना पसंद नहीं करेगा। कलाकार की परख यहीं होती है और उसकी दुरवस्था का यही कारण है। वह दूसरों की जरूरत पूरी करने के लिए उस आनंद का सौदा नहीं कर सकता, जो व्यक्त होने पर समाज को (श्रोताओं को) सहज सुलभ होता है। प्रगतिवाद के नाम पर राजनीतिज्ञों ने वेदना और संवेदना के इसी स्वायत्त पर समाज व्यापी साम्राज्य को नष्ट किया।
Month: May 2020
Post – 2020-05-11
#शब्दवेध(33)
बात आँखों पर आ गई
यह कम रोचक नहीं है कि जल के जिस नाद का अनुवाचन अक्षर रूप में किया गया, अक्ष का भी उसी से संबंध है। अक्षमाल जो मनके या रोजरी का सबसे पुराना रूप है, उसी मूल से संबंधित है। मनुष्य अपना हिसाब जिन आदिम विधियों से करता था, उनमें एक था किसी डंडे पर कटाव करना या निशान बनाना जो आगे चलकर लंबाई नापने के पैमाने (measuring rod) के काम आया।
दूसरा था किसी लता या रस्सी में गांठ लगाना और इसी का अगला चरण था किसी धागे में छेद बने ऐसे बीज जिनमें घुन न लग सके,(जैसे पतजीव, इमली का चिंआ, या गुंजाफल) गूँथते या कम करते जाना। बाद में इनका स्थान मूंगों, मनकों, कौड़ियों और सुगंधित काठ, कांसे, चांदी या सोने के तराशे या ढाले हुए दानों ने ले लिया। गणित का विकास इसी विधि से हुआ।
जीवन में स्थायित्व आने के बाद इसमें रोड़ियों से भी मदद ली जाने लगी। और फिर दीवारों पर चिन्ह या बार।
लेखन का आदिम संकेतन भित्ति चित्रों से या कहें चित्र कथाओं से आरंभ हुआ, जिसके प्रमाण शैलाश्रयों, गुफाओं और कंदराओं में मिलते हैं। संभवतः इन्हें अमूर्तन के बाद अक्षर कहा जाने लगा। वह जिसे मिटाया नहीं जा सकता, जिसमें अंकित होने के बाद किसी वस्तु या घटना को विस्मृत नहीं किया जा सकता। हम यहां यह निवेदन कर रहे हैं की अक्षर वाणी के चिन्हित रेखांकन के, या आंखों से देखे जा सकने वाले (अक्षिगम्य) चिन्हों के लिए प्रयोग हुआ। प्रमाण मान्य सिद्धांत नहीं; साक्ष्यों पर आधारित अनुमान मात्र है।
गणना के लिए अंक या आंक, आंकना – मूल्यांकन करना; शब्दचित्र के लिए आखर, पौधे की आंख से निकलने वाले कुछ मुड़े हुए करचे के लिए अँखुआ ><अंकुर > अंकुश/ अंकुशी और फिर पिंड या काया से अंकुर की तरह निकले भागों के लिए अंग और फिर कार्य में सहायक अंगों और उसके बाद में ज्ञानेन्द्रियों के लिए और इसके बाद किसी संरचना के घटकों के लिए इसका अर्थविस्तार होता गया। आश्चर्य तब होता है जब क्रोड >गोद (कोला>भो. कोराँ) के लिए इसका प्रयोग होते पाते हैं, परन्तु होता उन्हें ही है जो फूले हुए पेट को अंक समझ बैठें। इसकी मूल संकल्पना उदर विवर/कोटर के रूप में की गई।
बोएज भाषा संरचना के इस तर्क तक पहुँचते हैं, पर इसके मर्म तक इसलिए नहीं पहुँच पाते क्योंकि जिन अमेरिकी आदिम जनों की बोलियों को समझने के प्रयत्न में वह अपने निष्कर्ष तक पहुँचे थे, उनसे उनका आंतरिक लगाव नहीं था, जो संकल्पनाओं और संवेदनाओं की बुनावट को समझने के लिए जरूरी है। रिचर्ड्स ने (द मीनिंग ऑफ मीनिंग) में उनके द्वारा भाषा विषयक वस्तुपरक चर्चा में विचारणीय जिन तीन बिंदुओं पर ध्यान देने का सुझाव दिया गया है वे निम्न प्रकार हैं : 1. भाषा की ध्वनि संपदा: 2. उस ध्वनिसंपदा द्वारा व्यक्त विचार-संपदा; और (3) ध्वनि गुंफों को मिलाने और ढालने की युक्ति(याँ)।[1] हम किन विचारणीय पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी मानते हैं इसका उल्लेख हम कर आए हैं और वह किसी न किसी रूप में पूरी लेखमाला में उदाहृत मिलेगा।
अब हम आँख के लिए प्रयुक्त ‘कण्’ को ले सकते हैं जिसे काल्डवेल ने द्रविड़ का माना है और यह लगता भी द्रविड़ का है। परन्तु इसकी जैसी व्याप्ति सं., हिं., और भो. में देखने में आती है वह बहुत प्राचीन स्तर की साझेदारी को प्रकट करती है। सबसे बड़ी बात यह कि जिस जलवाची शब्द कन् से चमक, प्रकाश और फिर आँख की संज्ञा मिली है वह तमिल में मेरे देखने में नहीं आई। भो. कनइल, नकइल में प्रयुक्त कन् और नक का अर्थ जल है, कनई – कीचड़ है। नदी या जलाशय के किनारे बसे स्थान नामों में कन् – कनखल, कानपुर, कनौज, कन्नानूर में आया कन्- जलवाचक है। नक/ मक – का अर्थ भी जल है और नक्र कहें या मक्र (मगर) का अर्थ पानी का जंतु है। मक्कड़जाल और मगरमच्छ के आँसू मगर और बंदर की कहानी के बाद गढ़े गए शब्द हैं। कंज का अर्थ जलज है। कहें कण् का पुराना रूप कन रहा लगता है, कम से कम संस्कृत में इसको कण् कौरवी प्रभाव कह सकते हैं। मूल कन था यह कंज, कनक -1. अनाज( गेहूँ[, 2. सोना [2], कन् का आद्यक्षर जब तालव्य हो जाता है तो चन- जल, चणक – चना, और कन्+चन् दोनों के योग से कंचन – सोना, काँच>काच – शीशा, कांस्य / काँसा।
जो भी हो, यद्यपि कण आँख के अर्थ में सं- में नहीं मिलता, पर भो. में नीलाक्ष व्यक्ति के लिए कँड़जाह प्रचलित है जो या तो अपने कौरवी प्रतिरूप का अपभ्रंश है या इस क्षेत्र में छिट-फुट बसी उस बोली से आया है जिसकी तमिल से निकटता थी। देखने के लिए भी भो.हिं. या संस्कृत में कण् से कोई शब्द नहीं निकला है, पर भेंगी आँख वाले के लिए कनढेबर शब्द का चलन है। पर इसमें आए कन का आँख से नहीं कोण या तिरछेपन से संबंध है। ढेबर प्रकाश या दृष्टि के लिए आया है। एक पुराने नेता यू. एन. ढेबर के नाम में यही सुदर्शन या द्र्ष्टा वाला भाव है। अभी तक ढिबरी को उसके नाम और काम से जानते रहे हैं पर इसका अर्थ समझ में नहीं आता रहा है तो अब समझ में आ जाना चाहिए।
यही बात तमिल के लिए भी कही जा सकती है। उसमें देखने के लिए पार् और नोड का प्रयोग होता है। नोडु अं. नोट, नोटिस और नोड – गाँठ की निकटता चौंकाती है, पर हम इस पर अधिकार के साथ कुछ कह नहीं सकते, यद्यपि होने को तो कुछ दूर का नाता नॉड का भी हो सकता है। भो. हिं. में कनखी मारने का प्रयोग कण् के अधिक निकट है। कनीनिका – आँख की पुतली और काना- एकाक्ष।
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[1] Boas …formulates as the three points to be considered in the objective discussion of languages.
First, the constituent phonetic elements of the language;
Second, the groups of ideas expressed by phonetic groups;
Third, the method of combining and modifying phonetic groups.
“All speech,” says Dr Boas explicitly, ‘is intended to serve for the communication of ideas.” Ideas, however, are only remotely accessible to outside inquirers, and we need a theory which connects words with things through the ideas, if any, which they symbolize.
[2] सभी खाद्य और पेय – द्रव और आर्द्र पदार्थों को, तथा चमकदार द्रव्यों को उनका नाम जबवाची शब्दों से मिला है।
Post – 2020-05-10
#शब्दवेध(32)
बात आँखों पर आ गई अब तो
सच कहें तो हम आंखों पर बात नहीं करना चाहते। जो लोग आंखें चुराते रहे हैं, वे इसे पसंद नहीं करेंगे। हम किसी को नाराज नहीं करना चाहते। चाहते हैं वे भी अपनी झेंप मिटाकर,आमने सामने होकर कुछ कह और कुछ सुन सकें, समझना बाद की बात। रोशनी की बात करना चाहते हैं। और न चाहते हुए पानी की बात करना चाहते हैं जो आंखों में भर जाता है तो कुछ दिखाई नहीं देता, और जो मर जाए तो हम कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं रह जाते।
आँख अकेली ऐसी चीज है जिसका आना भी बुरा है, जाना भी। उठना भी बुरा है, और बैठना भी. लगना बुरा है और बदलना भी, दिखाना बुरा है और बचाना भी, तानना भी और झुकाना भी, सूखना भी बुरा है और तर होना, भर जाना, उमड़ना भी, तानना भी और झुकाना भी, और जो लोग आँख मिलाने को इसका विकल्प मानते हैं वे जानते ही नहीं कि उसके बाद क्या होता है। न चैन से रहती है न रहने देती हैं, पलकों से ढक दो तो सपने देखने लगती हैं।
आपको पता होगा कि तमिऴ में आंख को कण् कहते हैं। कन्नम् का अर्थ ‘गाल’ होता है। प्रयोग अटपटा तो है ही गंड – कनकटी के लिए सं. शब्द जिसकी चर्चा मतवाले मकुना (> मुकुंद) की चढ़ती जवानी और बहते मद के संदर्भ में ही आती है, और इसे गालों के लिए चुन लिया गया। बड़ा विचित्र लुकाछिपी है हमारी भाषाओं के बीच एक का कान दूसरे का गाल हो जाता है, कान के लिए त. कादु से काम चलाया जाता है, ऊँचा सुनने को ‘कादुमंदम्’ कहते हैं। हिन्दी में मुँह बाना – कुछ पाने की आतुरता के लिए अवज्ञापूर्ण प्रयोग है। बाना का शाब्दिक अर्थ है खोलना, परन्तु इसका प्रयोग केवल मुँह के संदर्भ में होता है, अन्यत्र कहीं नहीं। जानते हैं क्यों? तमिल में मुख के लिए ‘वाय’ प्रचलित है और यह प्रयोग उसी प्रभाव का परिणाम है।
माना यह जाता है कि कान संस्कृत के कर्ण का तद्भव है। पूरबी में न ‘ण’ था, न असवर्ण संयोग, क्या कुरुक्षेत्र में पहुँचने से पहले कान भी नहीं थे, या कान पकड़ने के लिए थे, नाम उचारने के लिए नहीं। लगता तो उल्टा है, कर्ण कान का संस्कृतीकरण हो और संभव है बोलचाल में इसका रूप ‘कन्न’ भी चलता रही हो। भो. का अकनना – मंद ध्वनि या नाद को बहुत ध्यान से कान और अनुमान दोनों के सहारे सुनना इसी की देन है। सं. में आकर्णन गढ़ लीजिए पर बात बनेगी नहीं। भो. में बरसात में पेड़ की डाल पर उगे फफूँद के सूखे चट्टे का कनचट कहते हैं।
यहाँ तक तो ठीक है पर आदमी एक आँख से विकलांग हो तो उसे काना क्याें कहते हैं, समस्या वहाँ खड़ी होती है कि सायणाचार्य जिनका संपादकमंडल दाक्षिणात्य था उन्होंने भी कण्व का एक स्थल पर काणा अर्थ किया जब कि होना विचक्षण चाहिए।
काल्डवेल ने संस्कृत से पृथकता दिखाने के लिए तमिल और संस्कृत के कुछ शब्दों की तालिका दी है. उसमें त. कण् है तो सं. का अक्षि।
आंख को संस्कृत के जानने वाले अक्षि का तद्भव मानेंगे। इसी का हड़पपाकालीन बोलचाल की भाषा में अधिक व्यवहार होता था, क्योंकि इसी का प्रसार भारोपीय भूभाग में हुआ या अधिक हुआ।
फारसी में यह अक्स – प्रतिबिंब, छाया, प्रतिरूप हो गया और संभवतः इसी के प्रभाव से नख-शिख ने नक्श का रूप लिया जो इसके अर्थ ‘रूपाकार’, ‘बनावट’ और चित्राकृति का सूचक बना और जिससे ‘नक्शा’- मानचित्र के लिए शब्द मिला है। फारसी से ही हमें पता चलता है कि अक्षि का एक प्रतिरूप ‘चक्षु’ भी प्रचलन में था, जिसका सजात फारसी का ‘चश्म’ है।
जो शुद्धतावादी लोग लोकप्रिय फारसी शब्दों तक के अटपटे सं. रूप गढ़ कर अपना काम भी मुश्किल बनाते हैं और भाषा की संचार क्षमता को भी पंगु बनाते हैं, वे यदि समझ सकें कि फारसी शब्द संस्कृत शब्दों के अपभ्रंश हैं और जिस सहज भाव से हम अपनी बोलियों में उनकी ध्वनि व्यवस्था में अनुकूलित शब्दों का प्रयोग करते हैं उसी तरह उनका भी किया जाना चाहिए, तो हिंदी की अक्कड-बक्कड़ तनावग्रस्तता को कम करके इसे अधिक प्रवाही भाषा बनाया जा सकता है। यह समझ नई भी नहीं है। विलियम जोन्स ने ही इस तथ्य को कुछ जोखम उठाते हुए भी स्वीकार कर लिया था।
परंतु हमारी व्याख्या में अर्थ का पक्ष गौण महत्व रखता है, और उसे वह अर्थ और रूप किस नाद के अनुकरण के फल-स्वरूप मिला है और वह किस उपादान या स्रोत से मिला है, यह अधिक प्रधान है। क्रिया का निर्धारण हम अधिकांश मामलों में नहीं कर सकते या अर्थ की सहायता से ही कर सकते हैं, क्योंकि उसकी यात्रा कठिन होगी पर हर मामले में लोगों के संपर्क और प्रचलन के रूप का पता नहीं चल सकता। हमारी सामान्य स्थापना (1. ऐसी सभी वस्तुओं का नामकरण जिनसे स्वतः कोई ध्वनि नहीं पैदा होती उनका नामकरण अपने से किसी रूप में संबंधित ऐसी वस्तु से मिला है जिससे नाद पैदा होता है, और इसी के अनुसार; 2. सभी पादपों और ओषधियों का नामकरण जल और उसकी ध्वनि पर आधारित है) हमारे लिए अधिक उपयोगी है। अब हम कुछ ऐसे नाम ले सकते हैं जो अर्थ निर्धारण में सहायक हों : अकवन/ आक – मदार का पौधा जिससे दूधिया रस निकलता है,; अकरा, अकरी- काफी छेटे दाने की मटर, अकोल/ अकोल्ह- एक जंगली पेड; पानी के आशय मे अक्-षर (अक्षर – जल ‘तेन क्षरति अक्षरम्) और अं. का एकुआ/ ला. (aqua – पानी)। यह रहा अक्षि का अनुनादी स्रोत जिससे जुड़ा है आर्थी आधार।
जल के अनेक गुणों में एक है इसका मुकुर पक्ष। दर्पण के आविष्कार का प्रेरक और प्रकृति का दर्पण स्थिर निस्तरंग जल है यद्यपि तरंगित जल में भी बिगड़े शीशे जैसा प्रतिबिंब तो दिखाई देता ही है। इस चमक के कारण ही एक ओर तो आग के लिए प्रायः वे ही शब्द प्रयोग में आते दिखाई देते हैं जिनका अर्थ जल है (जल>ज्वाला; जर – ज्वर); दूसरे यह कल्पना की गई कि आग जल का नाती है – अपां नपात – जल का पुत्र बादल और बादल की संतान आग जो बादलों की कौंध में दिखाई देता है और बिजली गिरने के साथ इसका प्रत्यक्ष अनुभव भी हो ही जाता है; तीसरे आदिम चरण पर यह कल्पना की गई कि सूर्य रात को जल में सो जाता है, इसीलिए प्रातःकाल में उसमें गर्मी नहीं होती, अग्नि का निवास जल है इसलिए अँधेरे में भी जल चमकता है। इस चमक और प्रकाश के गुण के कारण जल के किसी पर्याय से आँख के लिए शब्द निकलना सर्वथा स्वाभाविक था।
अब रहा इसका रूपगत आधार । यह एक छिद्र मे रूप में माना गया जिससे प्रकाश का भीतर प्रवेश होता है इसलिए जिसमें भी छिद्राकृति हो उस तक इसका अर्थविस्तार हुआ – आखा – छानने का उपकरण जिसमें छेद बने होते है; गवाक्ष बाहर देखने के लिए गोलाकार खिड़की; जिसकी बनावट आँख के कोये जैसी हो – अक्ष- हारीतकी की गुठली जिससे जुआ खोला जाता था; रुद्राक्ष – गोलाकार पर देखने में भयंकर आदि।
Post – 2020-05-09
#शब्दवेध(31)
साँस और श्वास में कितनी दूरी है?
उतनी ही जितनी पूरबी और कौरवी में, जिसकी प्रकृति पू
श्वास और नि-श्वास में, नि-श्वास और उत्-श्वास (उछ्वास > उसाँस)/ प्र-श्वास में, श्वास और वि-श्वास में, श्वास और *आ-श्वास> आ-श्वास-न में, कितनी दूरी है?
उतनी ही जितनी प्राकृत भाषा और कृत्रिम भाषा में। कृत्रिम जीवन के साथ हमारी नैसर्गिक क्षमताएँ घटती जाती हैं, और जो सहज था वह लंबी शिक्षा के बाद भी उतना स्वाभाविक नहीं रह जाता जितना कृत्रिमता अभाव में। इसका सबसे अच्छा उदाहरण मनुष्य की तैरने की निसर्गजात क्षमता (इंस्टिंक्ट) का लोप और उसे अर्जित करने के लिए अपेक्षित अभ्यास है। हम यह तक भूल जाते हैं कि किसी प्राचीन चरण पर यह क्षमता हममें विद्यमान थी। ऊपर के शब्दों का प्रयोग करते समय हममें से कितनों को याद रहता है कि ये शब्द हमारे साँस लेने से उत्पन्न ध्वनि के अनुवाचन (वाणी से उसके उच्चार हैं।
एक और अंतर आता है। अपने (उपसर्जित) उपसर्गों की सहायता से वाले, स्व-नियंत्रित शब्दों को वह किसी आशय से जोड़ सकता है। शब्द और अर्थ की वह अभेद्यता समाप्त हो जाती हो जिसे कालिदास ने वागर्थाविव संपृक्तौ या तुलसी ने गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न कहा है। यही वह कारण है जिससे उपसर्जित शब्दों में अप्रत्याशित या अनियमित अर्थ का आरोपण हो जाता है जिसे “उपर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते” में सूत्रबद्ध किया गया है। ध्यान रहे कि ऐसा प्रत्ययों के साथ नहीं होता क्योंकि प्रत्यय का प्रयोग नैसर्गिक भाषा से आया हुआ है।
रोचक बात यह है कि आग्रहमुक्त भाव से जिसने भी भाषा पर विचार किया है वह इस सचाई के निकट पहुँचा है। उदाहरण के लिए हर्बर्ट स्पेंसर के निम्न कथन को लिया जा सकता है:
In Primitive thought the name and object named are associated in such wise thai the one is regarded as a part of the other The imperfect separation of words from things characterizes Greek peculation in general” -HERBERT SPENCER
और मिलते जुलते विचार
The omission of all separate treatment of the ways in which speech, besides conveying ideas, also expresses attitudes, desires and intentions, is another point at which the work of this active school is at present defective. Dr Boas
तथा
language is defined as “a purely human and non-instinctive method of communicating ideas, emotions and desires by means of a system of voluntarily produced symbols” ( E Sapir, Chief of the Anthropological Section, Geological Survey of Canada,Language, 1922, p 7) But so little is the emotive element considered that in a discussion of grammatical form, as shown by the great variation of word order in Latin. we find it stated that the change from ‘hominem femina videt’
ये सभी मनीषी समस्या के काफी निकट पहुँच कर उन शास्त्रीय मान्यताओं के दबाव में यह समझते समझते रह जाते हैं कि भाषाएँ अपने प्राथमिक चरण पर नैसर्गिक, यांत्रिक और सवायत्त नादों के (एकास्टिक स्पंद) या ध्वनि तरंगों के अनुश्रवण, जिसके अनगिनत रूप हो सकते हैे, को वाग्तंत्र से उच्चरित नाद व्यवस्था में ढाल कर दूसरों तक संचारित करने के विधान हैं।
Post – 2020-05-09
जमाने की नजरों में माना गलत हूँ
बताना जमाना कभी क्या सही था!
Post – 2020-05-08
#शब्दवेध(30)
जब तक साँस तब तक आस। हमारा सुख सौभाग्य, जीवन और मृत्यु या विनाश से जुड़ गया हमारी साँस का चलना या बंद हो जाना। श्वास ही प्राण है, साँस का जाना प्राण चला जाना, इक्सपायर (expire) प्राणान्त। यह इंस्पायर (inspire)- प्राण भरना, प्रोत्साहित करना, का विलोम है ।
भो. में एक शब्द है सांसति जिसके लिए हिं. में ‘नाकों दम होना/करना’ प्रयोग में आता है पर सांसति में कष्ट का भाव प्रधान है जब कि नाकों दम में आजिजी का। सांसति का संबंध साँस से (साँस निकलने निकलने को होना) है, इस ओर पहले ध्यान नहीं गया था।
स्वस्ति इसके ठीक विपरीत कुशल और कल्याण का द्योतक है, और इसकी कामना प्रस्थान करने वाले के लिए निरापद मार्ग – पंथा स्वस्ति – से और इसके लिए सभी देवों की अनुकंपा और मार्ग में पड़ने वाले सभी तत्वों के कल्याणकारी होने का कामना से आरंभ हुआ।
स्वस्तिक के साथ शुभ-लाभ लिखा इसलिए मिलता है कि अज्ञात या अल्पज्ञात क्षेत्रों की ये यात्राएँ व्यापारिक गतिविधियों के चलते होती थीं। स्वस्तिक का चिन्ह पहिए का प्रतीकांकन है जिसमें पहले सीधी रेखा में मुड़ी रेखा किंचित् वर्तुल होती थी न कि बाहर की ओर तनी हुई। हड़प्पा सभ्यता के संदर्भ में पिराक, मोहेंजोदड़ो, हड़प्पा, कोटदीजी से मिले स्वस्तिकों में विशेषतः कोटदीजी से प्राप्त मुद्राएँ (जोनाथन मार्क केनोयर, इंडस सील्स, ऐंश्येंट सिंध, ऐनुअल जर्नल ऑफ रिसर्च, खंड 9, 2006-7, 7-30) इस विकास रेखा को समझने में सहायक हो सकती हैं, यद्यपि यह दावा हमारा है, केनोयर का नहीं। वह भारत पर ‘आक्रमण’ करने वालों के साथ पहिए के हिमायती हो सकते हैं, यद्यपि इस विषय पर वह कूटनीतिक दूरी बना कर बात करते हैं।
स्वस्ति की व्याख्या संस्कृतज्ञ सु-अस्ति के रूप में करेंगे जो अर्थ के अनुकूल ही है, पर वे श्वसन की ध्वनि की उपेक्षा करके सु-असन करने से पहले रुक कर सोचेंगे । श्वसन साँस (सस/संस) का संस्कृतीकरण है जिसके तीन रूप हो जाते हैं, 1. शंस (शंसा, प्रशंसा, प्रशस्ति), 3. शस् -काटना, मारना, (शसति – वध करता है, काटता है; विस्तृत करता है -प्रशस्त), शसन – घायल करना, आहत करना और 3. श्वसन, श्वास, विश्वास। शस् के खंडित करने, विच्छिन्न करना से एक ओर शस्त्र निकलता है तो दूसरी ओर शास्त्र। और यह अलग से याद दिलाने की जरूरत नहीं कि शास्ता भी इसी से निकला है।
मैं जिस पद्धति से भाषा के स्वभाव को समझना चाहता हूँ वह परंपरागत व्युत्पत्ति से अलग है, उसके कोशों में दिए गए अर्थ को अकाट्य मानता हूँ, क्योंकि ये अर्थ उन्हें लोक-व्यवहार से मिले हैं इसलिए उन्होंने वहाँ भी उसकी रक्षा की है, जहाँ उनके द्वारा अपनाई गई पद्धति से उनका अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता या अर्थ का अनर्थ (पूत- 1. पवित्र, 2, सड़ा हुआ) हो जाता है।
विद्वान इसकी अनदेखी कर जाते हैं जब कि नियम में अपवाद के लिए स्थान नहीं। गुरुत्व का नियम है तो वह सभी पर समान रूप से लागू होगा। यदि विकल्प का विधान है तो वह नियम नहीं हुआ, प्रवृत्ति हुई जो कुछ दूर तक साथ देगा और फिर बेकार हो जाएगा। अनर्थ प्रवृत्ति को नियम मान बैठने और उसी से संतोष कर लेने के कारण होता है। अपवाद इस बात का प्रमाण है कि नियम की तलाश नही हो सकी है। इसलिए कोशगत अर्थ का सम्मान करते हुए हम उनकी व्युत्पत्ति को लंगड़ा और वास्तविकता से दूर पाते हुए वैयाकरणों द्वारा पूरे तामझाम – एक आद्यभाषा, उसके विघटन या उसमें कालक्रम में आए विकारों से शाखाओं, प्रशाखाओं से एक विशद भाषा-परिवार के सिद्धान्त, मूलभाषा की धातुमाला और उससे पैदा हुए शब्द और अर्थ – को खारिज करके, विकास के सिद्धांत के अनुरूप और वैदिक भाषाविमर्श के भी अनुरूप पाकर हम इतने विश्वास से वाचिक अनुकार के अनुसार अपनी व्याख्या करते हैं कि श्रुतिलब्ध नाद का वाचिक प्रतिनाद ही भाषा है। कहें, हम पहली बार भाषा के उस नियम के अनुसार व्याख्या का भरोसा रख कर यह विवेचन कर रहे हैं। इसे दुहराने की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि लातिन या गाथिक या केल्टिक मूल से सजात शब्दों की या कल्पित पीआइई प्रतिरूपों को भी जहाँ गलत पाते हैं वहाँ उसे नकारने का दुस्साहस करते हैं और इसलिए हमारे प्रस्तावों को इनकी अंतःसंगित के आधार पर परखने का प्रयत्न करें।
सामान्य विश्राम या निद्रा के समय को छोड़ दें तो सक्रियता और श्रम के अनुरूप हमारे साँस की गति और ध्वनि में भी अंतर आता है और इसी तरह हमारे नासारंध्रों की बनावट, उनकी अवरुद्धता आदि के अनुरूप ध्वनि में अंतर आता है जिनके सभी प्रभेदों को लक्ष्य तक नहीं किया जा सकता और जिनको लक्ष्य करके उनके अनुवाचन किए गए हैं उनके कारण, उनकी अपनी भाषा की ध्वनि सीमा के कारण अनुवाचन होने के बाद भी उनमें पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है फिर भी यह पहचान बनी रहती है कि यह नासिका से उत्पन्न ध्वनि का अनुवाचन है और यही बिना किसी व्याख्या के इसकी लोकप्रियता और अर्थसंचार में सहायक होता है। जिसे एक बोली में ससन (>श्वसन) कहा जाता है उसे दूसरी में ब्रीदिंग, एक में सन/सुन कहा जाता है वहाँ द्सरी में साउंड और सोनम् । इनके स्रोत और इसलिए भाव आसानी से पहचान में आ जाते हैं और अंतिम सुन>सोनम् किसी एक से दूसरे में प्रवेश का सूचक भी।
हम यह पाते हैं कि श्वसन के लिए समान सजात शब्द शृंखला में संस/ संस अधिक पुराना है इसका आधार यह नहीं कि बोलियों से लेकर हिंदी तक में साँस प्रचलित है, बल्कि संस्कृत में भी हिंसक आशय के दोनों शस और शंस में भी यही रूप बना रह गया है। केवल साँस लेने के मामले में इसका रूप श्वसन हो गया। परंतु अंग्रेजी में भी श्वसन में हृदयाघात की स्थिति में श्वासरोध पैदा होने पर इसे तत्काल कुछ उपायों से जारी करने के लिए अं. में रि-ससि-टेट (resuscitate) में भी यह झलकता है। सस्पायर – आह भरना, साँस लेना (Suspire [L. suspirare]- to sigh, to breath). सस का लातिन में सामान्यतः ,सब्स subs> sub अवर-, अध- सूचक उपसर्ग माना गया है, पर sublime- aloft, lifted on high, suscitate – to exite, to rouse पर अर्थ बदल जाता है, रिससिटेट में सस प्राणवायु का पुनः संचार अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।
भोजपुरी में विशेषतः महिलाओं की भाषा में एक प्रयोग चलता है संसि देना या न देना। यह प्रयोग बहुत रोचक है, सामग्री वही है और यदि वह अपेक्षा से कम उतरती है तो संसि नहीं देती और उससे अधिक की पूर्ति करती है तो संसि देती है। यहाँ संसि – जीवट, बृद्धि, का सूचक है। संस का अंग्रेजी के सेंस (sense- faculty of receiving sensation, inward feeling> – सेंसेट( sensate) , सेंसेशन sensation, सेंसिबल sensible, सेन्सर ( sensor) आदि से संबंध लक्ष्य किया जा सकता है, अंतर केवल प्राणन का संवेदन और संज्ञान की दिशा में अर्थविस्तार का लगता है। सुन – (तु. श्वन – श्वान> शून- कुत्ता), अंग्रेजी के सोन- और इससे जुड़ी शब्दावली – सोनोरस, सोनेंट, सोनेट (गीत), सोनोग्राफी आदि । सुनना ऐसी दशा में श्रवण का तद्भव नहीं उससे पुराना श्ब्द सिद्ध होता है।
साँस लेना/पाना – अब जाकर तनिक साँस मिली है, ब्रीदिग ( breathing space), साँस फूलना, साँस चढ़ना, साँस लेने की फुरसत न होना, नीचे की साँस नीचे ऊपर की साँस ऊपर रह जाना जैसे मुहावरे बोलियों में ही चलते हैं। इन्हें संस्कृत में स्थान नहीं मिला। हिंदी तक अपने प्रसार क्षेत्र के मुहावरों और लोकोक्तियों को अपनाने में संकोच करती और संस्कृतापेक्षी बनी रहती है जिसका एस कारण यह भी हो सकता है कि कौरवी ही संस्कृत की जन्मभूमि रही है।
साँस और श्वास में कितनी दूरी है?
उतनी ही जितनी पूरबी और कौरवी में, जिसकी प्रकृति पू
श्वास और नि-श्वास में, नि-श्वास और उत्-श्वास (उछ्वास > उसाँस)/ प्र-श्वास में, श्वास और वि-श्वास में, श्वास और *आ-श्वास> आ-श्वास-न में, कितनी दूरी है?
उतनी ही जितनी प्राकृत भाषा और कृत्रिम भाषा में। कृत्रिम जीवन के साथ हमारी नैसर्गिक क्षमताएँ घटती जाती हैं, और जो सहज था वह लंबी शिक्षा के बाद भी उतना स्वाभाविक नहीं रह जाता जितना कृत्रिमता अभाव में। इसका सबसे अच्छा उदाहरण मनुष्य की तैरने की निसर्गजात क्षमता (इंस्टिंक्ट) का लोप और उसे अर्जित करने के लिए अपेक्षित अभ्यास है। हम यह तक भूल जाते हैं कि किसी प्राचीन चरण पर यह क्षमता हममें विद्यमान थी। ऊपर के शब्दों का प्रयोग करते समय हममें से कितनों को याद रहता है कि ये शब्द हमारे साँस लेने से उत्पन्न ध्वनि के अनुवाचन (वाणी से उसके उच्चार का ) है ।
एक और अंतर आता है। अपने (उपसर्जित) उपसर्गों की सहायता से वाले, स्व-नियंत्रित शब्दों को वह किसी आशय से जोड़ सकता है। शब्द और अर्थ की वह अभेद्यता समाप्त हो जाती हो जिसे कालिदास ने वागर्थाविव संपृक्तौ या तुलसी ने गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न कहा है। यही वह कारण है जिससे उपसर्जित शब्दों में अप्रत्याशित या अनियमित अर्थ का आरोपण हो जाता है जिसे “उपर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते” में सूत्रबद्ध किया गया है। ध्यान रहे कि ऐसा प्रत्ययों के साथ नहीं होता क्योंकि प्रत्यय का प्रयोग नैसर्गिक भाषा से आया हुआ है।
Post – 2020-05-07
शब्दवेध(29)
मनुष्य का दूसरा अंग जिससे ध्वनि उत्पन्न होती है, नासिका है। इससे सोते जागते और श्वास नली की अवस्था के अनुसार कई तरह की ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं। सस, सन, नस, नक सामान्य श्वसन के पुराने वाचिक अनुकार प्रतीत होते हैं जिनसे नासा, नासिका, नाक O.E.nosu, E. nose, Swedish nos, L.nāsus, Lith. nosis, और दूसरी यूरोपीय भाषाओं के इनसे मिलते-जुलते naso, nes, nase, आदि शब्द निकले हैं। साँस लेने की सामान्य क्रिया के लिए शब्द कुछ बाद में गढ़े गए साँस <>श्वास, साँस लेने की क्रिया ससन> श्वसन। स्वन – ध्वनि, आवाज. E. sono-, sone- unit of sound, sound, sonic, sonorous आदि की व्युत्पत्ति इसी से हुई है। सं. श्वान – आवाज करने वाला जानवर । अंग्रेजी में श्वन का प्रतिरूप sound हुआ तो कुत्ते का, विशेषतः शिकारी कुत्ते का इसी के अनुरूप हाउंड hound हो गया। इसका हाउंड <>हुंड भोजपुरी में भेड़िये के लिए प्रयुक्त हुँड़ार की याद दिलाता है। क्या आवाज या ऊँची आवाज के लिए कभी हुंड का प्रयोग होता था जिससे हुंडकार> ‘हुंकार’, हूयते>हवन, (आ-)ह्वान आदि निकले हैं?
हुंकार वन्य अवस्था में किसी व्यक्ति के भटक जाने पर उसे दिशा और स्थिति का अनुमान कराने के लिए पुकार का अवशेष है जिसमें ऊँचाई के कारण गर्जना का भाव था इसलिए इसने आक्रमण से पहले समवेत रणनाद का रूप ले लिया, पर प्राथमिक आशय अदृश्य और अनुपस्थित को बुलाने का था और यही आशय हुंड > हवन, ह्वान, और इसके प्रतिरूप *पुंड-कार – पुकार का भी रहा हो सकता है जिससे सबसे ऊँची आवाज करने वाले शंख को पौंड्र (पौंड्रं दध्मौ प्रतापवान) संज्ञा हुई।
हुंडकार> हुंकार के दो पक्ष थे। एक आह्वान करने वाले का और दूसरा यदि भटके हुआ व्यक्ति श्रव्य दायरे में हुआ और उसने उसे सुन लिया तो उसे भी प्रतिनाद से उसकी पुष्टि करनी होती थी।
मैं नहीं जानता कितने देशों में साहित्यानुराग के वे रूप पाए जाते हैं, मेरी जानकारी के नृतत्वविदों ने इस पर प्रकाश नहीं डाला है, जिनमें कालयापन के लिए पुरातन घटनाओं के जैसे भी विवरण उन तक पहुँचे होते थे उनके कथन, गायन, और सोने से पहले कहानी सुनने-सुनाने का चलन रहा हो, पर भारत में यह था। कहानी सुनाने वाले के प्रत्युत्तर में सुनने वाले को हुँकारी भरनी होती थी। यह इस बात को सुनिश्चित करता था कि कहानी सुनने वाला ध्यान से सुन रहा है। अभी जगा हुआ है। यह हुँकारी ही हाँ की जननी है। इस हाँ के विरोधी अर्थ थे। एक से हम परिचित हैं, दूसरा किसी संभावित दुर्घटना को रोकने के लिए वर्जनापरक आशय था। बोलियों में आज भी इसका प्रयोग होता है, ‘हाँ हाँ, ऐसा मत करो।’ पक्ष और विपक्ष दोनों का भाव उसी शब्द में आने का यही कारण लगता है। जो भी हो हुंड, हुंकार, हुँकारी और हाँ सजात शब्द हैं यह मानना निरापद है।
हुंड में वही दोहरा भाव है, सुदूर स्थित अदृश्य स्वजन का आह्वान और उसे सुनने का सत्यापन। प्राचीन भारतीय बैंक प्रणाली में प्रचलित हुंडी का हमें दूसरा कोई स्रोत दिखाई नहीं देता। इतना ही नहीं, यदि स्वर-व्यंजन-विन्यास पर ध्यान दें तो हुंड, गुंड, घुंड, रुंड, सुंड, भुंड और इनके अवर आशय के हुंडी, गुंडी, घुंडी, *रुंडी, सुंडी, भुंडी, तथा हंड गंड, घंड, रंड, संड, भंड -एक ही भाषाई स्तर से आए हुए शब्द हैं जिनमें से कुछ को ही संस्कृत में स्थान मिल पाया था। कारण संस्कृत को एक स्वल्पजनसाध्य या कूट भाषा में बदल कर उस खुलेपन का निषेध कर दिया गया जो सामान्य व्यवहार की भाषा में होता है। इन दो कारणों से – एक तो जैसा हम पीछे (25) में स्पष्ट कर आए हैं भाषा की समग्र संपदा बहुत विशद होती है और उसके समूचे साहित्य में उसका एक क्षुद्र अंश ही आ पाता है, और दूसरे पाणिनीय संस्कृत के बाद ब्राह्मणों तक सीमित, क्लिष्ट और संहित पदों से अधिकाधिक कठिन बनते जाने के कारण संकुचित संचार की भाषा बन कर अपनी उस बोली से भी अधिक विपन्न भाषा बन कर रह गई जिससे इसका विकास हुआ था और इस विपन्नता को वह पुरानी पूंजी के बीच जोड़-तोड़ करके यांत्रिक रीति से पूरी करती रही।
हम अर्थ विकास के साथ सांस्कृतिक विकास को भी लेना चाहें तो विवेचन संगत होते हुए भी सँभाल से बाहर चला जाएगा, इसलिए उससे बच कर चलना एक बाध्यता है। परंतु कभीकदा इसका प्रलोभन भारी पड़ता है। भटक कर दूर चले गए जत्थे के सदस्य को बुलाने के लिए किए जाने वाले हुंडकार/ हुंकार या पुकार को वह सुन लेता था तो प्रतिनाद करता था, परन्तु यदि वह भटक कर श्रव्य सीमा से दूर चला गया हो और उसका जवाब न मिले तब संकेत के लिए आग जला कर धुँआ पैदा किया जाता था जिसे देख कर वह सही दिशा और दूरी का अनुमान कर सकता था। बाद में कृषिकर्म से विरत होने पर भी भू संपदा पर अधिकार जताने वाले उसके कर्मकांडीय आयोजन यज्ञ में देवों को बुलाने के लिए हवन या आह्वान के लिए उच्चस्वर से पाठ के साथ अग्नि से अधिकाधिक धूम पैदा करके उन्हें बुलाने के विधान में इसी की प्रतीकात्मक पुनरावृत्ति थी –
आदिन्वसि वनिनो धूमकेतुनाऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव ।। 1.94.10
घृतेन त्वा अवर्धयन् अग्न आहुत धूमस्ते केतुः अभवद् दिवि श्रितः ।। 5.11.3
विकास की दृष्टि से इन दोनों चरणों में हजारों साल का अंतर है परंतु ज्ञान परंपरा में ये दूरियाँ मिट जाती हैं। इतना ही नहीं इनका विस्तार भी होता है। समुद्र में स्थल से दूर और दिशाबोध खो बैठने की दशा में भारतीय नाविकों ने निकटतम स्थल का पता लगाने के लिए कौवे को छोड़ने और उसके किसी दिशा में उड़ जाने को नौवहन में मार्गदर्शक के रूप में प्रयोग किया। कौवा पालतू होने के कारण अपने स्वामी के घर पर आ बैठता और उछल कूद करता था जिससे दूर गए प्रियजनों की वापसी का सूचक सगुन विचार का संबंध है। इसका बहुत जीवंत चित्रण ऋग्वेद के दो सूक्तों में है
कनिक्रदज्जनुषं प्रब्रुवाण इयर्ति वाचमरितेव नावम् ।
सुमंगलश्च शकुने भवासि मा त्वा का चिदभिभा विश्व्या विदत् ।। 2.42.1
अव क्रन्द दक्षिणतो गृहाणां सुमंगलो भद्रवादी शकुन्ते । …
आवदन्स्त्वं शकुने भद्रमा वद तूष्णीमासीनः सुमतिं चिकिद्धि नः ।
यदुत्पतन् वदसि कर्करिर्यथा बृहद्वदेम विदथे सुवीरा ।। 2.43.3
परंतु यदि कौए को चक्कर लगाने के बाद किसी दिशा में किनारा दिखाई नहीं देता था, वह जहाज पर वापस लौट आता था, तो स्वजनों को अपने संकट की सूचना देने के लिए वे कबूतर को छोड़ते, क्योंकि इसकी उड़ान बहुत लंबी होती है। कबूतर के पहुँचने और आवाज करने को इसीलिए आपदा का सूचक माना जाता था। इसका भी ऐसा ही हवाला ऋग्वेद में आया है:
देवाः कपोत इषितो यदिच्छन्दूतो निऋर्त्या इदमाजगाम ।
तस्मा अर्चाम कृणवाम निष्कृतिं शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे ।। 10.165.1
संभवतः इसके पीछे यह भावना भी रही हो कि कुछ प्रतीक्षा के बाद यदि वे न लौटें तो उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाय।
जिस ध्वनि शब्द का हम लगातार प्रयोग करते आ रहे हैं उसका संबंध भी श्वन से ही है साथ ही स्वर का भी जनक यही है।
एक विचित्र बात यह कि तमिऴ में मूक्कु का अर्थ नाक है और नाक्कु का अर्थ जिह्ना, कुत्ते के लिए नाय् का प्रयोग होता है।
Post – 2020-05-06
#शब्दवेध(28)
पहले यह निवेदन कर आए हैं भाषा के विकास में जल की भूमिका सबसे प्रधान है। यह अधूरा कथन है। पूरा सच यह है कि जल से कम भूमिका वायु की नहीं है। यह प्राकृतिक परिवेश पर निर्भर करता है। जिन भूभागों में वर्षा नहीं होती अथवा नाम मात्र होती है नैसर्गिक ध्वनियों का परिवेश जल की विविध क्रियाओं से उत्पन्न नाद की भूमिका नगण्य होगी, वहाँ तो वायु की विविध गतियों से उत्पन्न ध्वनियों का बाहुल्य होगा और इसके विपरीत जहां केवल हिमपात होगा वहां हिम और वायु की विविध गतियों से गिरने या प्रवाहित होने से उत्पन्न ध्वनियों की भूमिका प्रधान होगी।
इसलिए जब हम जल को वाणी की जन्मस्थली ( (मम योनिः अस्ति अन्तः समुद्रे) की बात करते हैं तो यह केवल उन्हीं बोलियों और भाषाओं पर लागू होता है जिनका उद्भव और विकास आर्द्रता बहुल भूभाग में हुआ है।
बोली के लिए प्रयोग में आने वाले ऐसे शब्दों की कमी नहीं है जो जल की क्रियाओं से उत्पन्न ध्वनि के अनुकरण पर निर्भर हैं। बदबदाना, बुदबुदाना, भदभदाना उबलते हुए पानी, यी तरल खाद्य के उबलने से अधिक स्पष्ट रूप में सुना जाता है, और अस्फुट ओष्ठ चालन से उत्पन्न ध्वनि से इसका काल्पनिक साम्य मान कर अस्पष्ट भाषण और फिर स्पष्ट कथन – वदति (1. बजता है, (>वाद्य यंत्र), 2. कहता है, (वाद, वादी, विवाद, संवाद), वंदति (गाते या बजाते हुए कीर्तिगान, स्तुति) , वदंत/ वदन्ती > भदंत, भंते)। इसकी तुलना बंध> से करने पर हम पाते हैं कि पहली शृंखला इसकी तुलना मे कमजोर है और इसलिए त्याज्य हो सकती है, परन्तु भाषा में अनेक वार दो शब्दोंं के उच्चारण की समीपता के कारण अर्थ की छाया भी क्रियाशील होती है, इसका भी ध्यान रखना होगा ।
खौलना, क्षोभ, भो. खभिलाना – आकुल होकर शोक निवेदन या एकान्त आत्मविलाप का पारस्परिक संबंध अधिक स्पष्ट है। परंतु ऐसे दुखी व्यक्ति के प्रति स्नेह प्रदर्शन के लिए छोहाइल (छोहाना) के पीछे शोभन+खभिलाना की साझी भूमिका हो सकती है।
ओटो श्रेडर (Otto Schrader 1883, [Language comparison and ancient history. Linguistic-historical contributions to the investigation of Indo-European antiquity.] (1st ed. Jena: Costenoble), पहली बार उस परिवेश का निर्धारण करने से लिए विविध भारोपीय भाषाओं की सांस्कृतिक शब्दावली का संग्रह किया था और उसमें वह जिन निष्कर्षों पर पहुँचे थे उनमें से कुछ निम्न प्रकार हैं :
मूल निवास में साल के कुछ महीनों में बहुत अधिक बरसात होती थी;
साल के कुछ महीनों में प्रचंड गर्मी पड़ती थी;
वे नौचालन से पूरी तरह परिचित थे;
वे करघे से सूती (लिनन) और ऊनी वस्त्र बुनना जानते थे। ऊनी वस्त्र करघे से नहीं गूँथ और कूट कर बनाते थे।
हम उनके द्वारा गिनाई गई दूसरी विशेषताओं को छोड़ सकते हैं परन्तु पूरे भारोपीय क्षेत्र में भारत को छोड़ कर दूसरा कोई भूभाग नहीं था जो इन अपेक्षाओं की पूर्ति कर सके। इसके बाद भी उन्होंने संभावित क्षेत्र बाल्टिक प्रदेश को माना क्योंकि जर्मन विद्वान कितना भी बड़ा धुरन्धर हो वह जर्मन पूर्वाग्रहों से बाहर निकल ही नहीं सकता था।
हम यहाँ मूल-निवास की चर्चा नहीं कर रहे हैं। उसका समाधान हो चुका है। इसकी याद इस लिए आई कि प्राणघाती लू और तृषार्तता का भी हमारी शब्द रचना में प्रभावी भूमिका है, इसकी अनद्खी नहीं की जानी चाहिए।
Post – 2020-05-05
#शब्दवेध(27)
श्रुति
भाषा के लिए भारोपीय भाषाओं में कितने शब्द प्रयोग में आते हैं उसका हमें पता नही। भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों का भी पता नही। यहाँ तक कि संस्कृत की क्षत्रछाया में आने वाली बोलियों में प्रचलित शब्दों का भी ज्ञान नहीं। तथ्य संकलन किसी भी क्षेत्र से संबंधित हो, यह अपने आप में बहुत बड़ा काम है और इस दिशा में जिन साधनों, जितने समय और जैसी एकाग्रता की अपेक्षा है उसका मुझमें अभाव भी रहा है।
जिन तथ्यों की जानकारी मुझे है उसका भी पूरा उपयोग नहीं कर पाता। समय की सीमा के अतिरिक्त पाठकों के सिर दर्द की भी चिंता रहती है। संख्या बढ़ने से बोझ बढ़ता है; परिणाम में अंतर नही आता। परन्तु इस परिधि में भी, शब्दों के आपसी संबंध को समझना कम टेढ़ा और साहसिक काम नही है।
उदाहरण के लिए हम तमिऴ के चोल्/शोल् – बोलना; शोल् मोऴि – मुहावरा, लोकोक्ति, को लें। हमारी आज की जानकारी के अनुसार यह उन बोलियों में से किसी का शब्द है, जिसका विलय सं. और त. आदि में हुआ था। क्या शोल का हिं. शोर – ऊँची आवाज में बहुत से लोगों का एक साथ बोलना से; शोर का श्रव =बहुत से लोगों द्वारा कहे जाने (तु. नाम> नामी, सरनाम या नामवर आदि ) से, श्रवण – सुनना, सुनने की इन्द्रिय,, श्रुति, श्रव्य, श्रुत, अल्प- /बहु– श्रुत- वान/ -ज्ञ, श्रुधी से कोई संबंध है या नहीं और यदि है तो इसका इतिहास कितना पीछे जाता है।
यहाँ हम भाषा के अनुनादी सिद्धान्त के एक नियम की याद दिला दें कि जिन वस्तुओं और स्रोतों से कोई ध्वनि नहीं निकलती उनकी संज्ञा उनसे किसी भी दृष्टि निकटता, संबंध या विरोध प्रदर्शित करने वाले ऐसे स्रोतों से मिलती है जिनसे ध्वनि पैदा होती है, इसलिए कान और सुनने के समस्त कार्य व्यापार से लिए मौखिक उच्चार से संज्ञा मिलना स्वाभाविक ही था।
परन्तु क्या यह मुख से उत्पन्न किसी ध्वनि से व्युत्पन्न शब्द है? फिर बोलने के लिए इसका प्रयोग क्यों नहीं होता? सुनने के लिए ही क्याें। हम खींच तान से कुछ भी सिद्ध करने क्यों न लगें, सामान्यतः मुख से उच्चरित किसी ध्वनि को इसके निकट नहीं पाते।
जिस स्रोत से इससे मिलती जुलती ध्वनि निकलती प्रतीत होती है वह जल है जिससे चर/सर स्र/श्र/श्ल की ध्वनि निकलती कल्पित की गई है। सं. के आचार्य किसी भी स्रोत से उत्पन्न ध्वनि को, विशेषतः जिसका वाचिक आशय में प्रयोग हुआ हो, शब्दन/भाषण या कथन मानते रहे हैं यह अर्थपाठ से ऐसी धातुओं की विशाल संख्या से ही समझा जा सकता है। अतः शोर, शोल्, श्रव, श्रुत, श्रव, श्रवण, श्रावक सभी केे नाद का स्रोत जल – स्राव, स्रोत, सोता, श्रावण – बरसात का मौसम सभी का अनुनादी स्रोत जल है न कि मुख।
Post – 2020-05-04
#शब्दवेध(26)
भाषा के लिए प्रयोग में आने वाले दूसरे अनेक शब्द हैं- वाक् (>*वचन, बाँचल, वाशी (voce, voice, >vocal/ vocabulary, vocation> cf. calling- पेशा) – भाषा, कथ, कत्थ, कथनी/ कहनी (> कथन/कहन; कथा, कहानी) और आर्तभाव के कुछ कहना – भो. कहँरल,(*कद/खद/गद> (कदराना, कातर क्रदन/ क्रंदन, भो. *कलप/ सं. कल्प – आवाज>कलाप, कलापी, कलपल आदि।
इनमें से प्रत्येक पद ऐसा है जिसके एकाधिक उच्चारभेद थे और उनमें कौन सा सबसे पुराना है और किस बोली ने किससे इसे ग्रहण किया और अपनी ध्वनि-व्यवस्था में ढाल लिया और फिर सबके एक बृहद समाज का अंग बन जाने और सभी रूपों के साथ प्रचलित होने के बाद इनमें से कुछ नई व्यंजनाओं के लिए प्रयोग होने लगे, यह ध्यान देने योग्य है। जिन कालों में ये विकास हुए उनसे बहुत दूर होने के कारण पूरी सावधानी के बाद भी हमारे कुछ समीकरण गलत हो सकते हैं, यह मानने के लिए भी हमें तैयार रहना चाहिए।
भारतीय भाषाओं के विषय में दो विरोधाभासी विचार मिलते हैं। पहला यह कि इसमें अन्विता ऐबी द्वारा उद्धृत यूनेस्को के आकलन के अनुसार1600 बौलियाँ बोली जाती हैं, जब कि भारत सरकार के अनुसार यह 200 से कुछ ऊपर और सिल (समर स्कूल ऑफ लिंग्विस्टिक्स) के अनुसार 300 से कुछ अधिक बैठती है। हमारे लिए इनमें से कोई भी संख्या आश्चर्यजनक है। परन्तु इसका दूसरा पक्ष यह कि इनका विभेद पूर्वोत्तर के कबीलाई क्षेत्र में सर्वाधिक है जिसमें कबीलाई अभिमान और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन तथा प्रशासनिक एकाधिकार के अभाव के कारण बृहद सामाजिक संरचना और उसके कारण स्वाभाविक रूप में बोलियों के क्रमिक विलय से उन्नत भाषाओं का विकास नहीं हो सका, जब कि शेष भारत में उसके विपरीत कारणों से विविधताओं का क्रमिक लोप होने के कारण इनकी संख्या कम होती गई, इसके बाद भी इनकी संख्या काफी अधिक है।
परन्तु यहाँ भी यह नियम काम करता दिखाई देता है कि पिछड़ेपन के अनुपात में भिन्नता अधिक है और सामाजिक आर्थिक प्रगति के अनुपात में पारस्परिक संपर्क के लिए एकरूपता के समानान्तर स्थानीय रागात्मकता के कारण “ कोस कोस पर पानी बदले चार/आठ कोस पर बानी” मुहावरे का चलन है। संभवतः इसी के आधार पर युनेस्को के 2012 से पहले के किसी सर्वेक्षण में इनकी संख्या 1600 से अधिक पहुँचा दी गई थी – ज्ञान, विज्ञान और कूटनीति का विकास पश्चिम में साथ साथ हुआ है।
हमारे लिए महत्वपूर्ण यह है कि प्राचीनतर अवस्थाओं में बोलियों की संख्या अधिक रही है और सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक (जिसमें कला, साहित्य और मतवाद को भी लिया जा सकता है) के कारण वह निकटता आई है जिसके कारण बोलियों और भाषाओं के बीच पारिवारिकता का भ्रम पैदा होता है। इसकी त्वरा (डाइनैमिक्स) को न समझ पाने के कारण ‘प्रचंड’ भाषा विज्ञानियों ने सत्ता और प्रचार-साधनों पर एकाधिकार के बल पर वास्तविकता को उलट कर एक आद्य भाषा के विभेदन या ह्रास से पारस्परिक समानता रखने वाली बोलियों और मानक भाषाओं का जन्म लगातार दिखाया और भाषा शास्त्र के शिक्षित और प्रशिक्षित विद्वान और संस्थान (सिल और यूनेस्को भी) आज तक जिसे दुहराते आ रहे हैं ।
वे आदम की बोली या नोआ और उसकी संतानों की बोली को वास्तविकता मान कर अटकलबाजियाँ करते रहे। जिस संस्कृत के वर्चस्व को कम करने के लिए भाषाविज्ञान और भाषा-परिवार की उद्भावना की गई थी उसमें भी संस्कृत से सभी भाषाओं की उत्पत्ति का सिद्धांत प्रचलित था सो एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा।
तथ्य और अटकलबाजी के इस द्वन्द्व में आज तक अटकलबाजी की जीत होती आई है और वह भी विज्ञान के नाम पर। हमने 1973 में ही, (आज से लगभग पाँच दशक पहले) इसका खंडन किया था, पर हिंदी में ही नहीं, किसी गैर-यूरोपीय भाषा में प्रतिपादित किसी नई स्थापना को उस भाषा के लोग तक नहीं मानते, पूरी दुनिया यूरोप की किसी भाषा में प्रस्तुत नए लचर विचारों को, उनके प्रचार-कौशल और जमी हुई धाक के कारण, युगान्तरकारी मान कर स्वयं, अपने को अद्यतन जानकारी से लैस सिद्ध करने के लिए, उनका वितरक बन जाती है। आज भी हिंदी में लिखते समय यह अंदेशा तो बना ही रहता है कि इसे समझेंगे कितने और मानेगा कौन।
दूसरा तथ्य यह कि अपनी निजता की रक्षा के लिए प्रयत्नशील बोलियों के साथ ही, आहार की तलाश में, भिन्न बोलियों के परिवेश या पड़ोस में होने और उनके बृहत्तर घटकों मे समायोजित होने के कारण और अलग बनी रह गई भाषाएँ बोलने वालों के प्रत्यक्ष या परोक्ष संपर्क के कारण सभी के तत्व सभी में तलाशे जा सकते हैं जिसे आर्य-अनार्य आदि नकली पहचानों के आर-पार देखा जा सकता है और जिसकी नितांत सतही समझ के बल पर इमेनों ने तब के भारत को एक भाषाई क्षेत्र के रूप में पहचाना था और जिसके भुलावे में आकर माधव देशपांडे सिंधु-सरस्वती सभ्यता के समय एक प्रोटो इंडियन भाषा की कल्पना कर बैठे जिसका हवाला हम पहले दे आए हैं।
इस पृष्ठभूमि के बाद हम यह भी स्वीकार करें कि शब्दों का विवेचन करते समय इस उत्साह में कि फिर बात शब्द से ही क्यों न आरंभ की जाए, हमने भाषा की उत्पत्ति और विकास पर बात करने की दृष्टि से गलत आरंभ किया। मनुष्य विविध वस्तुओं, क्रियाओं, विशेषताओं, आदि लिए शब्दों का प्रयोग करते हुए भी चिंतन की उस ऊँचाई पर दसियों हजार साल बाद पहुँचा जब वह यह सोच सका कि जिस माध्यम से वह वह काम करता है उसका भी कोई नाम होना चाहिए और उसके विषय में भी जानकारी रखी जानी चाहिए और उसके भी बहुत बाद यह सोच सका कि इस जानकारी का भी अपना नाम होना चाहिए। भाषा का नाम आज भी प्रायः अंचलों के और अंचलों का नाम उनमें अधिक संख्या में बसने वाले जनों और भौगोलिक लक्षणों के आधार पर रखा जाता है और जनों को उनकी संज्ञा या तो उनके अभिमान को प्रकट करने वाले शब्दों से (होर- मनुष्य, बिरहोर – जंगल का मनुष्य, मुंडा- सर्वोपरि और आर्य- श्रेष्ठ) या उनके पड़ोसियों और शत्रुओं से मिला है।
जो भी हो भाषा के जिन पर्यायों को हम ऊपर गिना आए हैं उनके विषय में यह सोचना सरलीकरण होगा कि इन सभी का नामकरण मुख से निकलने वाली ध्वनियों में से किसी एक से हुआ होगा। उनमें से बहुत कम शब्द हैं जिनकी उत्पत्ति मुख की निसर्गजात ध्वनियों से हुआ है और कुछ का नादस्रोत एक ही नहीं दो कदम पीछे मिलेगा। उसके विवेचन को कल के लिए स्थगित रख सकते हैं।