Post – 2016-08-05

निदान – 12

राष्‍ट्रीय सैडोमैसोकिज्‍म का दौर

”शास्‍त्री जी, कल आपने इस भले मानस को चुप तो करा दिया, पर क्‍या अपनी बात भी मनवा सके ?”

”इसमें दुविधा कहॉं से पैदा हो गई । मैंने तो प्रमाण देते हुए अपनी बात रखी थी, यदि इसके बाद भी दुविधा बनी रह जाय तो हम जीवन पर्यन्‍त वाद-विवाद करते रहें, किसी निर्णय पर पहुंच ही नहीं पाएंगे।”

”वाद जीतना सत्‍य की प्रतिष्‍ठा नहीं होती। उन सन्‍देहों का निराकरण भी जरूरी है जो तर्कातीत होते हैं।”

”मैं समझ नहीं पाया आप क्‍या कहना चाहते हैं।”

”कहना यह चाहता था कि यह कानून लंबे समय से रहा है, परन्‍तु इसे ले कर इतनी अतिसंवेदनशीलता जो क्रूरता की सीमाएं लांघ जाय, जिससे अपना ही समाज खंडित हो जाय, मन में गहरे जख्‍म पैदा हो जायं, यह तो न समाज के हित में है न राष्‍ट्र के। हाल में ऐसी घटनाएं हुई हैं जिनमें आपके प्रतिनिधियों की संलिप्‍तता न भी रही हो तो उन्‍होंने उसका समर्थन किया है, या ऐसी चुप्‍पी साधे रहे हैं, जिससे लगे कि वे ऐसी प्रतिक्रियाओं का समर्थन करते हैं।”
”डाक्‍साब, आपकी बात अब मेरी समझ में आ गई, मैंने वाद जीता था, उन्‍हें कन्विंस नहीं कर सका था, अन्‍यथा वह डैमेज कंट्रोल जैसा कटाक्ष न करते। और समझ में यह बात इसलिए आई कि इस समय मैं भी आपकी व्‍यख्‍या और अारोप के समक्ष निरुत्‍तर हूं, इसलिए कहें वाद तो आप जीत गए, पर मैं अपनी हार स्‍वीकार नहीं कर पाता।”

”इसका कोई कारण तो होगा।”

”कारण यह कि, इस समस्‍या को जितना सरलीकृत बना दिया जाता है और फिर गणित के निर्भ्‍रान्‍त उत्‍तर जैसा उत्‍तर गढ़ लिया जाता है और उससे असहमत होने वालों से किसी को किसी भी तर्क से जोड़ कर अपराधी सिद्ध कर दिया जाता है उतना इकहरा और सरल यह प्रश्‍न है नहीं। मैं यह इसलिए कह रहा हूं कि मैंने इस प्रश्‍न पर बहुत गहराई से सोचा है। हो सकता है इसके कुछ पहलू मेरे पूर्वाग्रहों के कारण मेरी समझ में ठीक से न आ सके हों परन्‍तु मुझे यह भ्रम है कि आप लोग इस पर यान्त्रिक ढंग से सोचते हैं, हिन्‍दू समाज को एकपिंडीय और यन्‍त्रमानवों का समुदाय मान लेते है। पूरे हिन्‍दू समाज में किसी ने कुछ ऐसा किया या कहा हो जो आप को ठीक न लगे तो उसके लिए उसे हिन्‍दू मुल्‍यों की चिन्‍ता करने वाले सगठन से जोड़ कर अपनी मनमानी सिद्ध करते हैं। अापकी सोच में में हिन्‍दू समाज की संवेदनाओं और पीड़ाओं के लिए कोई स्‍थान नहीं होता, जब कि दुनिया के प्रत्‍येक दूसरे समाज की भावनाओं का आपको इतना खयाल होता है कि लगता है हमने गुलामी के मूल्यों का आभ्‍यन्‍तरीकरण कर लिया है। वे अपमान हमारी चेतना में इस तरह उतार दिए गए हैं मानो उनसे अपमानित न हुए तो सम्‍मानित रह ही नहीं सकते।”

मित्र को मौका मिला, ”क्‍या गजब का पदव्‍याघात है, अपमानित न हुए तो सम्‍मानित रह ही नहीं सकते।”

शास्‍त्री जी इससे उत्‍तेजित नहीं हुए, उल्‍टे अधिक शालीन हो गए, ”आप ने ठीक समझा । और यही पदव्‍याघात मुझे आहत भी करता है। आप अपने को हिन्‍दू भी कहते हैं, हिन्‍दुओं का, पूरे हिन्‍दू समाज का, इसके मूल्‍यों, मान्‍यताओं, विश्‍वासों सभी का उपहास भी करते हैं और इससे गौरवान्वित भी अनुभव करते हैं और कभी यह सोचने का कष्‍ट भी नहीं करते कि अापके आचरण में यह अन्‍तर्विरोध आया कैसे ? और आया तो अबतक विद्यमान क्‍यों है ? अपने को बुद्धिमान का आत्‍मप्रमाण देने वाली पूरी पीढ़ी की पीढ़ी इससे मुक्‍त क्‍यों नहीं हो पाती ?”
”यदि हमारी समझ में नहीं आता तो आप ही समझाइये।” मित्र से चुप न रहा गया।
”समझा तो सकता हूं, पर पहली बात तो यह कि डाक्‍साब से प्रश्‍न करना अच्‍छा लगता है, अपना पक्ष रखना भी आश्‍वस्तिकर होता है, परन्‍तु इनके सामने खुल कर बोलते हुए थोडी झिझक बनी रहती है कि पता नहीं कौन सी बात इन्‍हें अटपटी लगे और मन ही मन उसका आनन्‍द लेने लगे।”

”मुझे आनन्‍द भी नहीं लेने देना चाहते आप ?” मैंने हंस कर कहा ।

शास्‍त्री जी ने भी हंसते हुए ही जवाब दिया, ”मैं अपने संकोच की बात कर रहा था। हां, एक शर्त है, हम इसे जीत-हार का प्रश्‍न बना कर बात न करें। ए‍क गंभीर समस्‍या समझ कर इसको सुलझाने का प्रयत्‍न करें। मैं कुछ ऐसी बातें अपने मन्‍तव्‍य को स्‍पष्‍ट करने के लिए कह सकता हूं जो संभव है सुनने में कठोर लगें पर मेरा आशय व्‍यक्तिगत नहीं, समस्‍यागत ही होगा। समस्‍या के जिन जटिल पहलुओं की मैं बात कर रहा था उसे लें। किसी समाज के बुद्धिजीवी या कहिए ऐसे अवसरवादी तत्‍वों को लें जो अपनी मंजिलें तय करने के लिए अनुचित या अापत्तिजनक विचारों को भी आत्‍मसात् कर लेते हैं और इस दिशा में असावधान होने के कारण उसी पर गर्व करने लगते हैं। यह तो डाक्‍साब का ही सुझाव था जिसे मैंने स्‍वयं भी समझने का प्रयत्‍न किया। इसे सैडिज्‍म और मैसोकिज्‍म कहा जाता है और इसकी ओर यौन व्‍यवहार का अध्‍ययन करते समय मनोवैज्ञानिकों का ध्‍यान गया इसलिए उसी तक इस पक्ष को रख कर ही बात की जाती रही। ये दोनों प्रवृत्तियां विपरीत हैं जिनमें लगातार अपमान और यंत्रणा सहते हुए एक व्‍यक्ति विशेषत: जिसे हम नारी से जोड़ते हैं, इसे अपने यौन व्‍यवहार से इस तरह जोड़ लेता है कि यह रिफ्लेक्‍स ऐक्‍शन जैसा हो जाय। पीड़ा सहते हुए तड़पना और फिर उसका आदी हो कर उसमें आनन्‍द लेने लगना या उसके बिना अतृप्‍त अनुभव करना। ठीक इसके विपरीत पीडि़त करने में ही आनन्‍दानुभूति। दोनों का कई बार एक ही व्‍यक्ति में लक्षण पाया जाने लगता है जिसे सैडोमैसोकिज्‍म कहते हैं। परन्‍तु इसे काम क्षेत्र से बाहर ले जा कर कामनापूर्ति के व्‍यापक क्षेत्र में भी देखा जाना चाहिए जिसमें अपमानजनक शर्तों को सहर्ष स्‍वीकार कर लेने पर सम्मान और पुरस्‍कार आदि का लाभ होने के कारण व्‍यक्ति उस पर गर्व अनुभव करने लगता है और उन लोगों से घृणा करने लगता है जो अपने सम्‍मान या आत्‍मगौरव के लिए कष्‍ट झेलना, उपेक्षित रहना, अवसरों और सुविधाओं से वंचित रहना तो स्‍वीकार कर लेते हैं परन्‍तु झुकते नहीं। न परपीड़न में सुख पाते हैं न आत्‍मपीड़न के लिए तैयार होते हैं। सर, आप लोग जो सेक्‍युलरिज्‍म की आड़ में कहते और करते हैं, उस पर इस दृष्टिकोण से विचार कीजिएगा और किसी निष्‍कर्ष पर पहुंचे तो मुझे भी समझाइयेगा।”

”आपने तो बड़े तर्कपूर्ण ढंग से अपनी बात रखी शास्‍त्री जी। मुझे तो इसकी उम्‍मीद ही न थी।” मैंने कहा तो शास्‍त्री जी गदगद हो गए। मेरे मित्र ने भी तत्‍काल कोई प्रतिक्रिया नहीं की।

”अब रही बात इस बीफ की । कब से क्‍या रहा है यह मेरे लिए उतना महत्‍व नहीं रखता। वेद में या उससे पहले के दिनों में क्‍या प्रचलित रहा कैसे उसके निषेध के प्रयत्‍न होते रहे इसे ले कर लोग कई तरह की बातें करते हैं, पर वेद में गाय के लिए अघ्‍न्‍या का प्रयोग है इसलिए मैं तो यही मानता हूं कि इसका निषेध था।
मैंने बीच में हस्‍तक्षेप किया, ”हम समझने का प्रयत्‍न कर रहे हैं इसलिए थोड़ा अपने को इससे अलग करके देखें। वैदिक समाज में शायद चिन्‍ता गाय को लेकर अधिक थी इसलिए वेद में भी और अवेस्‍ता में भी गाय को अघ्‍न्‍या / अग्‍न्‍या ही कहा गया, पूरे गो प्रजाति के साथ यह निषेध न था। अवेस्‍ता में जहां गाय को अग्‍न्‍या कहा गया है वहीं, सांड की बलि का स्‍पष्‍ट उल्लेख है, यही स्थिति भारत की भी थी। इसलिए आठवें मंडल में यह बताते हुए कि गाय रुद्रों की माता है, वसुओं की पुत्री है, आदित्‍यों की बहन है, अमृत स्‍वरूप दूध देती है, इसलिए इसका वध न किया जाय, केवल गाय पर जोर है, गोप्रजाति पर नहीं। यह पहली बार शतपथ ब्राह्मण में आता है।”

”क्षमा करें डाक्‍साब, मैं उस इतिहास में जाना ही नहीं चाहता। मैं कहना यह चाहता हूं कि इस्‍लाम और ईसाई मतों का जन्‍म भी नहीं हुआ था, उस समय से ही हमारी संवेदनाए गाय और गो प्रजाति से बहुत गहराई से जुड़ी हैं। यह बहुत लंबा समय है। आप इसको खाद्य या अखाद्य के कोण से ही न देखिए। यह देखिए कि हमारी भावनाओं को आहत करने के लिए लगातार इसका प्रयोग किया जाता रहा है। यही काम आपके सैडोमैसोकिस्‍ट इतिहासकार भी करते रहे अन्‍यथा ये भावनाएं इतनी प्रखर न होतीें। भावनाएं बहुत सारी बातों से जुड़ी रहती हैं और उनकी रक्षा के लिए हम उन प्रसंगों की ओर ध्‍यान नहीं देते। यह अकारण इतिहास का सत्‍य बता कर इसे उभारा जाता रहा, केवल हिन्‍दू भावनाओं को आहत करने के लिए।”

मित्र ने संयत स्‍वर में ही कहा, ”यह आपकी कल्‍पना भी ताे हो सकती है।”

”होती, यदि इसे सन्‍दर्भ, अनुपात और औचित्‍य का ध्‍यान रखते हुए किसी प्रसंग में कहा गया होता। इसका उसी तरह विज्ञापित और गर्वित भाव से संचार माध्‍यमों से प्रचार किया जाता रहा जिस तरह बीफ की दावत वगैरह आयोजित और विज्ञापित करके। वहां खाने से अधिक अपमान करने का प्रयत्‍न था और अपमानित समाज में कुछ लोग तो अनुपात से अधिक उग्र प्रतिक्रिया दिखाएंगे ही । अपराधी क्रिया करने वाला, फसाद को शुरू करने वाला, उसे ढोल बजा कर उत्‍तेजित करने वाला हुआ, या उत्‍तेजित होने वाला, या दोनों और या अाप तथा आपके प्रेस, अपने को बुद्धिजीवी कह कर खुद ही अपनी बुद्धि के दिवालेपन का प्रमाण देने वाले। यदि देश में शान्ति और सद्भाव चाहिए तो क्‍या इसमें सबका सहयोग आवश्‍यक नहीं है ?”

बात शास्‍त्री की सही लगी, मैंने मित्र से कुछ कहा नहीं, पर यह इशारा किया कि अब बोलो। मित्र दूसरी ओर देखने लगा तो बोलना पड़ा, ”यदि यह योजनापूर्वक हो रहा है तो यह योजना किसकी थी, इसकी तैयारी कितनी लंबी थी, इसका इनाम क्‍या था कि जिस बात को कोसंबी और काणे बहुत पहले लिख चुके थे उसी को दूहराने वाला एक इतिहासकार कह रहा था कि यह उसकी खोज है और उसी को लेकर नाचना गाना बजाना जारी रखे था। यह तो योजनाकारों को पता ही था कि इसकी यह प्रतिक्रिया हो सकती है। जवाब तो देना पड़ेगा किसी को।”

मेरा मित्र उठा और बिना कुछ बोले, बिना किसी उद्विग्‍नता के, विचारो में डूबा सा आगे बढ़ गया।