Post – 2018-04-06

मैं जो कुछ लिखता हूं, सब सही नहीं होता। उसमें गलतियां निकालें। यह पसन्द करने से अधिक अच्छा है।

Post – 2018-04-06

मैं जो कुछ लिखता हूं, सब सही नहीं होता। उसमें गलतियां निकालें। यह पसन्द करने से अधिक अच्छा है।

Post – 2018-04-05

कोश तक भरोसे के नहीं

कल हमने अपनी बात दो प्रश्नों से समाप्त की थी: पहला यह कि जिन धातुओं से हम किसी शब्द का व्युत्पादन करते हैं उनमें यदि वे आशय क्यों नहीं होते जिन्हें हम खींच तान कर निकाल लेते हैं, और जो अर्थ होते हैं वे बेमेल क्यों होते हैं? इसके विषय में हमने यह सुझाव रखा था कि भाषा व्याकरण से पैदा नहीं होती। व्याकरण किसी दूरस्थ, अपरिचित या मिलावटी भाषा को समझने का प्रयत्न है जिसके चलते कुछ ऐसी प्रवृत्तियों की पहचान कर सकें जिनके सहारे दूसरे ऐसे शब्दों के उस घटक का अर्थ समझा जा सके जिनमें वह पाया जा सकता है और इन्हें सुविधा के लिए नियम कह लिया जाता है। यह नियम एक सीमा के बाद काम नहीं करते, इसलिए नियमों के अपवाद भी होते हैं। इन नियमों की सहायता से हम उन्हीं बहुनिष्ठ इकाइयों या धातुओं से नई परिस्थितियों में नए शब्द भी गढ़ सकते हैं, जिनको अर्थ बताने पर ही यह मालूम हो सकता है कि इनका किस आशय में प्रयोग किया जाना है। यह अर्थ आसानी से भूल सकता है क्योंकि जिस धातु से ये निर्मित हैं उनके एकाधिक आशय कल्पित करने पड़े हैं, और इसके बाद भी ये उन सभी शब्दों के आशय को समेट नहीं पाते। उदाहरण के लिए ऋष् धातु में यदि गति और हिंसा है तो पवित्रता कहां से आ गई? वीतरागता कहों से आ गई । ऋष् से तीन अन्य शब्द बने हैं, ऋषभ = १. सांड़, २. श्रेष्ठतम और ऋषु = आभा, लपट और ऋष्व, ऊंचाई पर स्थित। इनके आशय ऋष् धातु में नहीं अट पाए हैं। कहें धातुएं अर्थनिर्धारण के लिए अपर्याप्त प्रतीत होती हैं।

दूसरा प्रश्न यह था कि रि, ऋ, ऋृ तीनों का अर्थ गमन है, ऋष्टि और रिष्टि दोनों का अर्थ तलवार या हथियार है। ऋ का सही उच्चारण क्या है, इसे लेकर मतभेद है। इसका सही उच्चारण कोई नहीं करता, ऋृ से कोई शब्द नहीं बनता। यह अक्षर भी है और शब्द भी जिसका अर्थ वही है जो ऋ का। अत: यह वैयाकरणों की उद्भावना की देन प्रतीत होता है। पर ऋ के विषय में भी यही बात कही जा सकती है। हम पहले यह सुझा आए हैं कि संस्कृत के निर्माण में उन बोलियों की भी भूमिका है जिन्हें द्रविड और आग्नेय परिवारों में रखा जाता है, द्रविड़ भाषाओं में दो रकार पाए जाते हैं। एक का उच्चारण कंपित घर्षी रूप में किया जाता है जिसका व्यवहार तमिल में इतना अनिश्चित है कि इसका सावर्ण्य होने या एक साथ दुबारा प्रयुक्त होने पर यह ट्ट के रूप में उच्चरित होता है। ऋ इसी रकार का संस्कृत में प्रवेश है। यही बात लृ के विषय में कही जा सकती है ।

अब हम ऋष् धातु से उत्पन्न उलझनों के निराकरण के लिए अनुनादी स्रोत की ओर लौटने पर बहते पानी के उस नाद पर जाएं जिसे रस्, रुस्/रुष्, रिस् के रूपों में वाचिक पहचान मिली है। रिस से रिसना= रसाव बना है। जल वाची शब्दों का प्रयोग गति, प्रकाश, तेज, पवित्रता, उर्वरता या रेत:सेक आदि के लिए होता है और साथ ही हिंसा के लिए भी। जल में संहार की प्रलयंकारी शक्ति है जिसके कारण जल को वज्र कहा गया है – आपो वै वज्र। परन्तु हिंसा में जो सायासता है वह जलवाची रिष् की ध्वनि नहीं हो सकती। प्रवाही जल की ध्वनि पैने हथियार की जननी नहीं हो सकती। अत: यह खरोंचने की ध्वनि है जिसके लिए संस्कृत में रिख्/लिख् का प्रयोग किया जाता है और एक धातु रिष् कल्पित की गई है (रिष् >रेषति, रिष्ट 1. to injure, hurt, harm; 2. To kill or destroy, V.S. Apte)

इसका अर्थ है, कोशकार ने ऋष् में जिन दो अर्थों की कल्पना की वह दो अलग समनादी (homophonic) शब्द हैं, एक रिष् (रिस्) और दूसरी ऱिष् (ऱिस्) । यहां मुझे स्वयं कुछ दुविधा है कि इस मामले में ष का पुराना रूप स था या ख। दुविधा का कारण यह कि संस्कृत ध्वनिमाला मे तालव्य और मूर्धन्य ध्वनियों का प्रवेश बाद में हुआ। मूल भाषा की ऊष्म ध्वनियां स और ह थीं। मूर्धन्यप्रेमी समुदाय के प्रवेश के बाद सकार का षकार अन्य मूर्धन्य ध्वनियों के समीप होने पर होने लगा। यह समस्या कुछ टेढ़ी है और इसे लक्ष्य करते हुए रामविलास शर्मा ने चेतावनी दी है कि वर्गीय धवनियों की सभी धवनियां किसी भाषा में न तो अनुपस्थित थीं न वर्ग की समस्त ध्वनियाो एक साथ किसा भाषा में ली गईं। र को मूर्धन्य माना जाता है पर यह ध्वनि मूल बोली में थी। इसके सानिध्य में सकार का षकार कुरु अंचल में पहुंचने पर हुआ। मूल बोली के उद्गम क्षेत्र में आज तक ऋ को रि और ष को ख में बदलने की प्रवृत्ति है ओर संस्कृत के पंडित भी ऋषि को रिखि बोलते हैं।

जो हो, जैसा हम कह आए हैं, धातुओं से आरंभ करके न तो हम संस्कृत को पूरी तरह समझ सकते हैं, न बोलियों को, न ही संस्कृत भाषा के उद्भव और विकास को।

अनुनादी पद्धति से ही धातुओं की सीमाओं को भी समझ सकते हैं क्योंकि वे काल्पनिक हैे, जब कि अनुनादी शब्द यथार्थ का हिस्सा। हम यहां केवल जल से उत्पन्न ध्वनि को लेंगे जिसे रस्, रिस् रुस में अनुकृत किया गया। जल की गति, चमक अतः ज्ञान, पवित्रता, रेतसेचकता, आग के लिए जल के पर्यायों के उपयोग आदि को ध्यान में रखे तो पाएंगे कि इससे न केवल संस्कृत अपितु बोलियों से लेकर भारोपीय की दूसरी शाखाओं के अनगिनत शब्दों का अर्थविकास उजागर हो जाएगाः
रस- रास, रसिकता, रसना, रसरी, रस्सी, रश्मि, रेशम, राशि, रस्ता/रास्ता/राह, रहगुजर, रेस, रश, रैश, रास- घोड़ा, आदि।
रिस/ऋष – ऋषभ, ऋषि, ऋषू, ऋष्य, रिष- हिंसा, भो. रीस-क्रोध, रिसना- पानी का आदि।
रुस/रुष/ऋष – रोष/रुष्ट , रुशद्, रोशनी, रोशनाई, रुज, रोज -दिन, रोज-गुलाब।
यहां नाद, अनुनादन, शब्द, अर्थ, औचित्य सब कुछ पारदर्शी हो जाता है। यदि इस तथ्य पर ध्यान दें कि इन शब्दों का व्याख्या के लिए हमें कितनी धातुओं का सहारा लेना पड़ता है तो सर पीटने लगेंगे।

Post – 2018-04-05

कोश तक भरोसे के नहीं

कल हमने अपनी बात दो प्रश्नों से समाप्त की थी: पहला यह कि जिन धातुओं से हम किसी शब्द का व्युत्पादन करते हैं उनमें यदि वे आशय क्यों नहीं होते जिन्हें हम खींच तान कर निकाल लेते हैं, और जो अर्थ होते हैं वे बेमेल क्यों होते हैं? इसके विषय में हमने यह सुझाव रखा था कि भाषा व्याकरण से पैदा नहीं होती। व्याकरण किसी दूरस्थ, अपरिचित या मिलावटी भाषा को समझने का प्रयत्न है जिसके चलते कुछ ऐसी प्रवृत्तियों की पहचान कर सकें जिनके सहारे दूसरे ऐसे शब्दों के उस घटक का अर्थ समझा जा सके जिनमें वह पाया जा सकता है और इन्हें सुविधा के लिए नियम कह लिया जाता है। यह नियम एक सीमा के बाद काम नहीं करते, इसलिए नियमों के अपवाद भी होते हैं। इन नियमों की सहायता से हम उन्हीं बहुनिष्ठ इकाइयों या धातुओं से नई परिस्थितियों में नए शब्द भी गढ़ सकते हैं, जिनको अर्थ बताने पर ही यह मालूम हो सकता है कि इनका किस आशय में प्रयोग किया जाना है। यह अर्थ आसानी से भूल सकता है क्योंकि जिस धातु से ये निर्मित हैं उनके एकाधिक आशय कल्पित करने पड़े हैं, और इसके बाद भी ये उन सभी शब्दों के आशय को समेट नहीं पाते। उदाहरण के लिए ऋष् धातु में यदि गति और हिंसा है तो पवित्रता कहां से आ गई? वीतरागता कहों से आ गई । ऋष् से तीन अन्य शब्द बने हैं, ऋषभ = १. सांड़, २. श्रेष्ठतम और ऋषु = आभा, लपट और ऋष्व, ऊंचाई पर स्थित। इनके आशय ऋष् धातु में नहीं अट पाए हैं। कहें धातुएं अर्थनिर्धारण के लिए अपर्याप्त प्रतीत होती हैं।

दूसरा प्रश्न यह था कि रि, ऋ, ऋृ तीनों का अर्थ गमन है, ऋष्टि और रिष्टि दोनों का अर्थ तलवार या हथियार है। ऋ का सही उच्चारण क्या है, इसे लेकर मतभेद है। इसका सही उच्चारण कोई नहीं करता, ऋृ से कोई शब्द नहीं बनता। यह अक्षर भी है और शब्द भी जिसका अर्थ वही है जो ऋ का। अत: यह वैयाकरणों की उद्भावना की देन प्रतीत होता है। पर ऋ के विषय में भी यही बात कही जा सकती है। हम पहले यह सुझा आए हैं कि संस्कृत के निर्माण में उन बोलियों की भी भूमिका है जिन्हें द्रविड और आग्नेय परिवारों में रखा जाता है, द्रविड़ भाषाओं में दो रकार पाए जाते हैं। एक का उच्चारण कंपित घर्षी रूप में किया जाता है जिसका व्यवहार तमिल में इतना अनिश्चित है कि इसका सावर्ण्य होने या एक साथ दुबारा प्रयुक्त होने पर यह ट्ट के रूप में उच्चरित होता है। ऋ इसी रकार का संस्कृत में प्रवेश है। यही बात लृ के विषय में कही जा सकती है ।

अब हम ऋष् धातु से उत्पन्न उलझनों के निराकरण के लिए अनुनादी स्रोत की ओर लौटने पर बहते पानी के उस नाद पर जाएं जिसे रस्, रुस्/रुष्, रिस् के रूपों में वाचिक पहचान मिली है। रिस से रिसना= रसाव बना है। जल वाची शब्दों का प्रयोग गति, प्रकाश, तेज, पवित्रता, उर्वरता या रेत:सेक आदि के लिए होता है और साथ ही हिंसा के लिए भी। जल में संहार की प्रलयंकारी शक्ति है जिसके कारण जल को वज्र कहा गया है – आपो वै वज्र। परन्तु हिंसा में जो सायासता है वह जलवाची रिष् की ध्वनि नहीं हो सकती। प्रवाही जल की ध्वनि पैने हथियार की जननी नहीं हो सकती। अत: यह खरोंचने की ध्वनि है जिसके लिए संस्कृत में रिख्/लिख् का प्रयोग किया जाता है और एक धातु रिष् कल्पित की गई है (रिष् >रेषति, रिष्ट 1. to injure, hurt, harm; 2. To kill or destroy, V.S. Apte)

इसका अर्थ है, कोशकार ने ऋष् में जिन दो अर्थों की कल्पना की वह दो अलग समनादी (homophonic) शब्द हैं, एक रिष् (रिस्) और दूसरी ऱिष् (ऱिस्) । यहां मुझे स्वयं कुछ दुविधा है कि इस मामले में ष का पुराना रूप स था या ख। दुविधा का कारण यह कि संस्कृत ध्वनिमाला मे तालव्य और मूर्धन्य ध्वनियों का प्रवेश बाद में हुआ। मूल भाषा की ऊष्म ध्वनियां स और ह थीं। मूर्धन्यप्रेमी समुदाय के प्रवेश के बाद सकार का षकार अन्य मूर्धन्य ध्वनियों के समीप होने पर होने लगा। यह समस्या कुछ टेढ़ी है और इसे लक्ष्य करते हुए रामविलास शर्मा ने चेतावनी दी है कि वर्गीय धवनियों की सभी धवनियां किसी भाषा में न तो अनुपस्थित थीं न वर्ग की समस्त ध्वनियाो एक साथ किसा भाषा में ली गईं। र को मूर्धन्य माना जाता है पर यह ध्वनि मूल बोली में थी। इसके सानिध्य में सकार का षकार कुरु अंचल में पहुंचने पर हुआ। मूल बोली के उद्गम क्षेत्र में आज तक ऋ को रि और ष को ख में बदलने की प्रवृत्ति है ओर संस्कृत के पंडित भी ऋषि को रिखि बोलते हैं।

जो हो, जैसा हम कह आए हैं, धातुओं से आरंभ करके न तो हम संस्कृत को पूरी तरह समझ सकते हैं, न बोलियों को, न ही संस्कृत भाषा के उद्भव और विकास को।

अनुनादी पद्धति से ही धातुओं की सीमाओं को भी समझ सकते हैं क्योंकि वे काल्पनिक हैे, जब कि अनुनादी शब्द यथार्थ का हिस्सा। हम यहां केवल जल से उत्पन्न ध्वनि को लेंगे जिसे रस्, रिस् रुस में अनुकृत किया गया। जल की गति, चमक अतः ज्ञान, पवित्रता, रेतसेचकता, आग के लिए जल के पर्यायों के उपयोग आदि को ध्यान में रखे तो पाएंगे कि इससे न केवल संस्कृत अपितु बोलियों से लेकर भारोपीय की दूसरी शाखाओं के अनगिनत शब्दों का अर्थविकास उजागर हो जाएगाः
रस- रास, रसिकता, रसना, रसरी, रस्सी, रश्मि, रेशम, राशि, रस्ता/रास्ता/राह, रहगुजर, रेस, रश, रैश, रास- घोड़ा, आदि।
रिस/ऋष – ऋषभ, ऋषि, ऋषू, ऋष्य, रिष- हिंसा, भो. रीस-क्रोध, रिसना- पानी का आदि।
रुस/रुष/ऋष – रोष/रुष्ट , रुशद्, रोशनी, रोशनाई, रुज, रोज -दिन, रोज-गुलाब।
यहां नाद, अनुनादन, शब्द, अर्थ, औचित्य सब कुछ पारदर्शी हो जाता है। यदि इस तथ्य पर ध्यान दें कि इन शब्दों का व्याख्या के लिए हमें कितनी धातुओं का सहारा लेना पड़ता है तो सर पीटने लगेंगे।

Post – 2018-04-05

कोश तक भरोसे के नहीं

कल हमने अपनी बात दो प्रश्नों से समाप्त की थी: पहला यह कि जिन धातुओं से हम किसी शब्द का व्युत्पादन करते हैं उनमें यदि वे आशय क्यों नहीं होते जिन्हें हम खींच तान कर निकाल लेते हैं, और जो अर्थ होते हैं वे बेमेल क्यों होते हैं? इसके विषय में हमने यह सुझाव रखा था कि भाषा व्याकरण से पैदा नहीं होती। व्याकरण किसी दूरस्थ, अपरिचित या मिलावटी भाषा को समझने का प्रयत्न है जिसके चलते कुछ ऐसी प्रवृत्तियों की पहचान कर सकें जिनके सहारे दूसरे ऐसे शब्दों के उस घटक का अर्थ समझा जा सके जिनमें वह पाया जा सकता है और इन्हें सुविधा के लिए नियम कह लिया जाता है। यह नियम एक सीमा के बाद काम नहीं करते, इसलिए नियमों के अपवाद भी होते हैं। इन नियमों की सहायता से हम उन्हीं बहुनिष्ठ इकाइयों या धातुओं से नई परिस्थितियों में नए शब्द भी गढ़ सकते हैं, जिनको अर्थ बताने पर ही यह मालूम हो सकता है कि इनका किस आशय में प्रयोग किया जाना है। यह अर्थ आसानी से भूल सकता है क्योंकि जिस धातु से ये निर्मित हैं उनके एकाधिक आशय कल्पित करने पड़े हैं, और इसके बाद भी ये उन सभी शब्दों के आशय को समेट नहीं पाते। उदाहरण के लिए ऋष् धातु में यदि गति और हिंसा है तो पवित्रता कहां से आ गई? वीतरागता कहों से आ गई । ऋष् से तीन अन्य शब्द बने हैं, ऋषभ = १. सांड़, २. श्रेष्ठतम और ऋषु = आभा, लपट और ऋष्व, ऊंचाई पर स्थित। इनके आशय ऋष् धातु में नहीं अट पाए हैं। कहें धातुएं अर्थनिर्धारण के लिए अपर्याप्त प्रतीत होती हैं।

दूसरा प्रश्न यह था कि रि, ऋ, ऋृ तीनों का अर्थ गमन है, ऋष्टि और रिष्टि दोनों का अर्थ तलवार या हथियार है। ऋ का सही उच्चारण क्या है, इसे लेकर मतभेद है। इसका सही उच्चारण कोई नहीं करता, ऋृ से कोई शब्द नहीं बनता। यह अक्षर भी है और शब्द भी जिसका अर्थ वही है जो ऋ का। अत: यह वैयाकरणों की उद्भावना की देन प्रतीत होता है। पर ऋ के विषय में भी यही बात कही जा सकती है। हम पहले यह सुझा आए हैं कि संस्कृत के निर्माण में उन बोलियों की भी भूमिका है जिन्हें द्रविड और आग्नेय परिवारों में रखा जाता है, द्रविड़ भाषाओं में दो रकार पाए जाते हैं। एक का उच्चारण कंपित घर्षी रूप में किया जाता है जिसका व्यवहार तमिल में इतना अनिश्चित है कि इसका सावर्ण्य होने या एक साथ दुबारा प्रयुक्त होने पर यह ट्ट के रूप में उच्चरित होता है। ऋ इसी रकार का संस्कृत में प्रवेश है। यही बात लृ के विषय में कही जा सकती है ।

अब हम ऋष् धातु से उत्पन्न उलझनों के निराकरण के लिए अनुनादी स्रोत की ओर लौटने पर बहते पानी के उस नाद पर जाएं जिसे रस्, रुस्/रुष्, रिस् के रूपों में वाचिक पहचान मिली है। रिस से रिसना= रसाव बना है। जल वाची शब्दों का प्रयोग गति, प्रकाश, तेज, पवित्रता, उर्वरता या रेत:सेक आदि के लिए होता है और साथ ही हिंसा के लिए भी। जल में संहार की प्रलयंकारी शक्ति है जिसके कारण जल को वज्र कहा गया है – आपो वै वज्र। परन्तु हिंसा में जो सायासता है वह जलवाची रिष् की ध्वनि नहीं हो सकती। प्रवाही जल की ध्वनि पैने हथियार की जननी नहीं हो सकती। अत: यह खरोंचने की ध्वनि है जिसके लिए संस्कृत में रिख्/लिख् का प्रयोग किया जाता है और एक धातु रिष् कल्पित की गई है (रिष् >रेषति, रिष्ट 1. to injure, hurt, harm; 2. To kill or destroy, V.S. Apte)

इसका अर्थ है, कोशकार ने ऋष् में जिन दो अर्थों की कल्पना की वह दो अलग समनादी (homophonic) शब्द हैं, एक रिष् (रिस्) और दूसरी ऱिष् (ऱिस्) । यहां मुझे स्वयं कुछ दुविधा है कि इस मामले में ष का पुराना रूप स था या ख। दुविधा का कारण यह कि संस्कृत ध्वनिमाला मे तालव्य और मूर्धन्य ध्वनियों का प्रवेश बाद में हुआ। मूल भाषा की ऊष्म ध्वनियां स और ह थीं। मूर्धन्यप्रेमी समुदाय के प्रवेश के बाद सकार का षकार अन्य मूर्धन्य ध्वनियों के समीप होने पर होने लगा। यह समस्या कुछ टेढ़ी है और इसे लक्ष्य करते हुए रामविलास शर्मा ने चेतावनी दी है कि वर्गीय धवनियों की सभी धवनियां किसी भाषा में न तो अनुपस्थित थीं न वर्ग की समस्त ध्वनियाो एक साथ किसा भाषा में ली गईं। र को मूर्धन्य माना जाता है पर यह ध्वनि मूल बोली में थी। इसके सानिध्य में सकार का षकार कुरु अंचल में पहुंचने पर हुआ। मूल बोली के उद्गम क्षेत्र में आज तक ऋ को रि और ष को ख में बदलने की प्रवृत्ति है ओर संस्कृत के पंडित भी ऋषि को रिखि बोलते हैं।

जो हो, जैसा हम कह आए हैं, धातुओं से आरंभ करके न तो हम संस्कृत को पूरी तरह समझ सकते हैं, न बोलियों को, न ही संस्कृत भाषा के उद्भव और विकास को।

अनुनादी पद्धति से ही धातुओं की सीमाओं को भी समझ सकते हैं क्योंकि वे काल्पनिक हैे, जब कि अनुनादी शब्द यथार्थ का हिस्सा। हम यहां केवल जल से उत्पन्न ध्वनि को लेंगे जिसे रस्, रिस् रुस में अनुकृत किया गया। जल की गति, चमक अतः ज्ञान, पवित्रता, रेतसेचकता, आग के लिए जल के पर्यायों के उपयोग आदि को ध्यान में रखे तो पाएंगे कि इससे न केवल संस्कृत अपितु बोलियों से लेकर भारोपीय की दूसरी शाखाओं के अनगिनत शब्दों का अर्थविकास उजागर हो जाएगाः
रस- रास, रसिकता, रसना, रसरी, रस्सी, रश्मि, रेशम, राशि, रस्ता/रास्ता/राह, रहगुजर, रेस, रश, रैश, रास- घोड़ा, आदि।
रिस/ऋष – ऋषभ, ऋषि, ऋषू, ऋष्य, रिष- हिंसा, भो. रीस-क्रोध, रिसना- पानी का आदि।
रुस/रुष/ऋष – रोष/रुष्ट , रुशद्, रोशनी, रोशनाई, रुज, रोज -दिन, रोज-गुलाब।
यहां नाद, अनुनादन, शब्द, अर्थ, औचित्य सब कुछ पारदर्शी हो जाता है। यदि इस तथ्य पर ध्यान दें कि इन शब्दों का व्याख्या के लिए हमें कितनी धातुओं का सहारा लेना पड़ता है तो सर पीटने लगेंगे।

Post – 2018-04-04

भाषा और व्याकरण

व्याकरण से भाषा नहीं बनती, भाषा होती है और उसे बोलते हैं। अक्सर हम यह भी नहीं जानते कि हमारी भाषा का नाम क्या है। भाषा का व्याकरण होता है इसे अनपढ़ आदमी नहीं जानता। कुछ नियम होते हैं जिनको सीखने के बाद सही भाषा बोली जाती है उसके लिए इससे बड़ा मनोरंजन कोई हो ही नहीं सकता। कारण हम जिस सहजता से अपनी बोली के शब्द सीखते है, उसी तरह बिना किसी आयास के उन नियमों को आत्मसात करते चलते है। पहली बार किसी चीज से पाला पड़ने पर यह अवश्य पूछा जाता है, ‘इसे क्या कहते हैं’, पर यह कभी नहीं पूछा जाता कि इस बात को कैसे कहते है।

परन्तु किसी नई भाषा को सीखते समय हर चीज के साथ ‘इसे क्या कहते हैं, और बात के साथ, इसे कैसे कहते हैं, का सवाल खड़ा होता है। कहें, शब्दभंडार और व्याकरण दोनों की समस्या पराई भाषा के साथ या किसी भिन्न भाषा के प्रभाव के अनुपात में पैदा होती है। व्याकरण की प्रधानता भाषा के पराएपन की पहचान है।

भाषा की जाति नहीं होती, धर्म नहीं होता, उसका अपना क्षेत्र या प्रदेश होता है। यदि किसी कारण किसी क्षेत्र की भाषा में धर्म या जाति का दखल होता है तो उस दखल के अनुपात में ही, भाषा के भीतर एक ‘कूट’ भाषा का जन्म होता है जो उस समूह के भीतर समझी जाती है। इसी तर्क से संस्कृत को ब्राह्मणों की कूट भाषा और फारसी को विदेशी मूल के मुसलमानों की कूट भाषा बनी रही। सामान्य कामकाज स्थानीय जनों की भाषा के बिना चल नहीं सकता, इसलिए इनको भी जन भाषा सीखने की जरूरत पड़ती थी जब कि जन साधारण का काम अपनी बोली से चल जाता है और उसे इन भाषाओं को सीखने की बाध्यता नहीं होती। भाषा वह है जिसके बिना आप गूंगे हो जाते हैं और किसी क्षेत्र की भाषा वह है जिसे जाने बिना आप उस क्षेत्र में गूंगे बने रहते हैं। इस गूंगेपन से बचने की कोशिश में आक्रान्ताओं को भी विजितों की भाषा सीखनी पड़ती है और इसी न्याय से दिल्ली के आसपास की बोली को आधार बनाकर खड़ीबोली का विकास हुआ था जिसे हिन्दी, हिन्दवी, या रेख्ता कहा गया। अपनी बोली से कटने और दूसरे बोली क्षेत्रो के लिए भी व्यवहार्य होने के कारण और उसी अनुपात में इसके व्याकरण की आवश्यकता बढ़ती गई जब कि कौरवी के वयाकरण की उस क्षेत्र के लिए कोई आवश्यकता नहीं।

यहां हम भाषा के दो भेद करें । एक स्वाभाविक भाषा जिसका सर्वोत्तम रूप बोलियों में मिलता है जिनमें स्थानीयता का इतना गहरा पुट होता है कि एक बोली क्षेत्र के भीतर इनके अनेकानेक रूप पाए जाते हैं, जिनसे इनकी प्राचीनता पर सन्देह होता है जब कि कोई भी बोली किसी शेक्ष भाषा से बहुत पुरानी होती है। पूरे बोली क्षेत्र के लिए यदि शिक्षा की जरूरतों से इनमें से किसी का चुनाव करना हो तो उसका भी व्याकरण तैयार करना होगा। इसलिए बृहत्तर संचार के लिए इन बोली क्षेत्रों के बीच अलपतम आयास से समझी जा सकने वाली भाषाओं का प्राधान्य हो जाता है । हिन्दी प्रदेश इनमें सबसे विचित्र है जिसका निर्माण कौरवी पर आधारित खड़ीबोली के उत्थान से बहुत पहले ब्रज, डिंगल, अवधी और मैथिली के माध्यम से हो गया था । इसलिए
इसके उन्नयन में सबसे प्रधान भूमिका भोजपुरी की थी।

यहां मैं एक तथ्य पर बल देना चाहूंगा। किताबी या शैक्ष भाषाओं का प्राण बोलियों में बसता है। उनसे दूरी बनाने के क्रम में वे बेजान और इकहरी होती जाती हैं। व्याकरण की आवश्यकता इनको समझने के लिए होती है। कोई व्याकरण इनकी सभी असंगतियों को
संभाल नहीं पाता। बोलियां ऊपरी तौर पर अपार भिन्नताओं के बाद भी एक दूसरी से अधिक निकट होती हैं और इनकी पारस्परिक निकटता तथाकथित भाषा परिवारों की सीमाओं को पार कर जाती है, क्योंकि इन सभी की जड़ें आदिम स्रोतों तक जाती हैं। अत: अनुनादी स्रोत इनमें अधिक स्पषट होते है। शैक्ष भाषाओं में मानव हस्तक्षेप बढ़ जाता है, और इसके कारण उनकी व्याख्या का कोई नियम अधूरा और भ्रामक होता है।

संस्कृत को समझने के लिए जिन धातुओं को बहुनिष्ठता के आधार पर निकाला गया वे जैसा कि हम पहले शिकायत कर आए हैं न तो यह सझने में हमारी मदद करती हैं कि उनको वह अर्थ कैसे मिला, न मूल ध्वनि के समग्र फैलाव को समेट पाती है। कई बार एक ही शब्द को समझने के लिए अवसर के अनुसार एकाधिक धातुओं का सहारा लाना पड़ता है फर भी अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता। उदाहरण के लिए ऋषि शब्द को लें। इसे ऋष् और रि धातुओं से समझाने का प्र्रयत्न किया जाता है। ऋष् का अर्थ है चलना। ऋष् गतौ। रि का भी वही अर्थ। पर ऋष् का एक और अर्थ है, मारना, आहत करना। मेरे सामने आप्टे का कोश है, इसमे ऋषि का अर्थ दिया है – ‘अन्तःप्रेरणा सपन्न’ , an inspired person, ‘तपःपूत साधु, वीतराग’ a sanctified sage, an ascetic. ये आशय उस धातु में नहीो हैं। मारने और आहत करने का आशय उसी धातु में कैसे आ गया यह समझ में न आएगा। कारण इसका यह है कि कुछ और शब्द हैं जो ऋष् से आरंभ होते हैं – ऋष्टि – दोधारी तलवार, ऋष्य – एक मृग, और ऋषभ। इनके कारण यह खींज तान करके ये अर्बेथ मूल धातु पर आरोपित करने पड़े फिर भी पवित्रता, वीतरागता उसमें न अठ सकी।

रि में केवल गति है और रिष् में केवल हिंसा। रोचक यह है कि संस्कृत ही ऋष्टि के साथ रिष्टि भी उसी तलवार के आशय में प्रयुक्त है। अब एक नया प्रश्न उठ खड़ा होता है कि क्या ऋ ध्वनि भी वैयाकरणों की रचना है. अब हम कल इसी समस्या को अनुनादी कोण से देखने का प्रयत्न करेंगे।

Post – 2018-04-04

भाषा और व्याकरण

व्याकरण से भाषा नहीं बनती, भाषा होती है और उसे बोलते हैं। अक्सर हम यह भी नहीं जानते कि हमारी भाषा का नाम क्या है। भाषा का व्याकरण होता है इसे अनपढ़ आदमी नहीं जानता। कुछ नियम होते हैं जिनको सीखने के बाद सही भाषा बोली जाती है उसके लिए इससे बड़ा मनोरंजन कोई हो ही नहीं सकता। कारण हम जिस सहजता से अपनी बोली के शब्द सीखते है, उसी तरह बिना किसी आयास के उन नियमों को आत्मसात करते चलते है। पहली बार किसी चीज से पाला पड़ने पर यह अवश्य पूछा जाता है, ‘इसे क्या कहते हैं’, पर यह कभी नहीं पूछा जाता कि इस बात को कैसे कहते है।

परन्तु किसी नई भाषा को सीखते समय हर चीज के साथ ‘इसे क्या कहते हैं, और बात के साथ, इसे कैसे कहते हैं, का सवाल खड़ा होता है। कहें, शब्दभंडार और व्याकरण दोनों की समस्या पराई भाषा के साथ या किसी भिन्न भाषा के प्रभाव के अनुपात में पैदा होती है। व्याकरण की प्रधानता भाषा के पराएपन की पहचान है।

भाषा की जाति नहीं होती, धर्म नहीं होता, उसका अपना क्षेत्र या प्रदेश होता है। यदि किसी कारण किसी क्षेत्र की भाषा में धर्म या जाति का दखल होता है तो उस दखल के अनुपात में ही, भाषा के भीतर एक ‘कूट’ भाषा का जन्म होता है जो उस समूह के भीतर समझी जाती है। इसी तर्क से संस्कृत को ब्राह्मणों की कूट भाषा और फारसी को विदेशी मूल के मुसलमानों की कूट भाषा बनी रही। सामान्य कामकाज स्थानीय जनों की भाषा के बिना चल नहीं सकता, इसलिए इनको भी जन भाषा सीखने की जरूरत पड़ती थी जब कि जन साधारण का काम अपनी बोली से चल जाता है और उसे इन भाषाओं को सीखने की बाध्यता नहीं होती। भाषा वह है जिसके बिना आप गूंगे हो जाते हैं और किसी क्षेत्र की भाषा वह है जिसे जाने बिना आप उस क्षेत्र में गूंगे बने रहते हैं। इस गूंगेपन से बचने की कोशिश में आक्रान्ताओं को भी विजितों की भाषा सीखनी पड़ती है और इसी न्याय से दिल्ली के आसपास की बोली को आधार बनाकर खड़ीबोली का विकास हुआ था जिसे हिन्दी, हिन्दवी, या रेख्ता कहा गया। अपनी बोली से कटने और दूसरे बोली क्षेत्रो के लिए भी व्यवहार्य होने के कारण और उसी अनुपात में इसके व्याकरण की आवश्यकता बढ़ती गई जब कि कौरवी के वयाकरण की उस क्षेत्र के लिए कोई आवश्यकता नहीं।

यहां हम भाषा के दो भेद करें । एक स्वाभाविक भाषा जिसका सर्वोत्तम रूप बोलियों में मिलता है जिनमें स्थानीयता का इतना गहरा पुट होता है कि एक बोली क्षेत्र के भीतर इनके अनेकानेक रूप पाए जाते हैं, जिनसे इनकी प्राचीनता पर सन्देह होता है जब कि कोई भी बोली किसी शेक्ष भाषा से बहुत पुरानी होती है। पूरे बोली क्षेत्र के लिए यदि शिक्षा की जरूरतों से इनमें से किसी का चुनाव करना हो तो उसका भी व्याकरण तैयार करना होगा। इसलिए बृहत्तर संचार के लिए इन बोली क्षेत्रों के बीच अलपतम आयास से समझी जा सकने वाली भाषाओं का प्राधान्य हो जाता है । हिन्दी प्रदेश इनमें सबसे विचित्र है जिसका निर्माण कौरवी पर आधारित खड़ीबोली के उत्थान से बहुत पहले ब्रज, डिंगल, अवधी और मैथिली के माध्यम से हो गया था । इसलिए
इसके उन्नयन में सबसे प्रधान भूमिका भोजपुरी की थी।

यहां मैं एक तथ्य पर बल देना चाहूंगा। किताबी या शैक्ष भाषाओं का प्राण बोलियों में बसता है। उनसे दूरी बनाने के क्रम में वे बेजान और इकहरी होती जाती हैं। व्याकरण की आवश्यकता इनको समझने के लिए होती है। कोई व्याकरण इनकी सभी असंगतियों को
संभाल नहीं पाता। बोलियां ऊपरी तौर पर अपार भिन्नताओं के बाद भी एक दूसरी से अधिक निकट होती हैं और इनकी पारस्परिक निकटता तथाकथित भाषा परिवारों की सीमाओं को पार कर जाती है, क्योंकि इन सभी की जड़ें आदिम स्रोतों तक जाती हैं। अत: अनुनादी स्रोत इनमें अधिक स्पषट होते है। शैक्ष भाषाओं में मानव हस्तक्षेप बढ़ जाता है, और इसके कारण उनकी व्याख्या का कोई नियम अधूरा और भ्रामक होता है।

संस्कृत को समझने के लिए जिन धातुओं को बहुनिष्ठता के आधार पर निकाला गया वे जैसा कि हम पहले शिकायत कर आए हैं न तो यह सझने में हमारी मदद करती हैं कि उनको वह अर्थ कैसे मिला, न मूल ध्वनि के समग्र फैलाव को समेट पाती है। कई बार एक ही शब्द को समझने के लिए अवसर के अनुसार एकाधिक धातुओं का सहारा लाना पड़ता है फर भी अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता। उदाहरण के लिए ऋषि शब्द को लें। इसे ऋष् और रि धातुओं से समझाने का प्र्रयत्न किया जाता है। ऋष् का अर्थ है चलना। ऋष् गतौ। रि का भी वही अर्थ। पर ऋष् का एक और अर्थ है, मारना, आहत करना। मेरे सामने आप्टे का कोश है, इसमे ऋषि का अर्थ दिया है – ‘अन्तःप्रेरणा सपन्न’ , an inspired person, ‘तपःपूत साधु, वीतराग’ a sanctified sage, an ascetic. ये आशय उस धातु में नहीो हैं। मारने और आहत करने का आशय उसी धातु में कैसे आ गया यह समझ में न आएगा। कारण इसका यह है कि कुछ और शब्द हैं जो ऋष् से आरंभ होते हैं – ऋष्टि – दोधारी तलवार, ऋष्य – एक मृग, और ऋषभ। इनके कारण यह खींज तान करके ये अर्बेथ मूल धातु पर आरोपित करने पड़े फिर भी पवित्रता, वीतरागता उसमें न अठ सकी।

रि में केवल गति है और रिष् में केवल हिंसा। रोचक यह है कि संस्कृत ही ऋष्टि के साथ रिष्टि भी उसी तलवार के आशय में प्रयुक्त है। अब एक नया प्रश्न उठ खड़ा होता है कि क्या ऋ ध्वनि भी वैयाकरणों की रचना है. अब हम कल इसी समस्या को अनुनादी कोण से देखने का प्रयत्न करेंगे।

Post – 2018-04-04

भाषा और व्याकरण

व्याकरण से भाषा नहीं बनती, भाषा होती है और उसे बोलते हैं। अक्सर हम यह भी नहीं जानते कि हमारी भाषा का नाम क्या है। भाषा का व्याकरण होता है इसे अनपढ़ आदमी नहीं जानता। कुछ नियम होते हैं जिनको सीखने के बाद सही भाषा बोली जाती है उसके लिए इससे बड़ा मनोरंजन कोई हो ही नहीं सकता। कारण हम जिस सहजता से अपनी बोली के शब्द सीखते है, उसी तरह बिना किसी आयास के उन नियमों को आत्मसात करते चलते है। पहली बार किसी चीज से पाला पड़ने पर यह अवश्य पूछा जाता है, ‘इसे क्या कहते हैं’, पर यह कभी नहीं पूछा जाता कि इस बात को कैसे कहते है।

परन्तु किसी नई भाषा को सीखते समय हर चीज के साथ ‘इसे क्या कहते हैं, और बात के साथ, इसे कैसे कहते हैं, का सवाल खड़ा होता है। कहें, शब्दभंडार और व्याकरण दोनों की समस्या पराई भाषा के साथ या किसी भिन्न भाषा के प्रभाव के अनुपात में पैदा होती है। व्याकरण की प्रधानता भाषा के पराएपन की पहचान है।

भाषा की जाति नहीं होती, धर्म नहीं होता, उसका अपना क्षेत्र या प्रदेश होता है। यदि किसी कारण किसी क्षेत्र की भाषा में धर्म या जाति का दखल होता है तो उस दखल के अनुपात में ही, भाषा के भीतर एक ‘कूट’ भाषा का जन्म होता है जो उस समूह के भीतर समझी जाती है। इसी तर्क से संस्कृत को ब्राह्मणों की कूट भाषा और फारसी को विदेशी मूल के मुसलमानों की कूट भाषा बनी रही। सामान्य कामकाज स्थानीय जनों की भाषा के बिना चल नहीं सकता, इसलिए इनको भी जन भाषा सीखने की जरूरत पड़ती थी जब कि जन साधारण का काम अपनी बोली से चल जाता है और उसे इन भाषाओं को सीखने की बाध्यता नहीं होती। भाषा वह है जिसके बिना आप गूंगे हो जाते हैं और किसी क्षेत्र की भाषा वह है जिसे जाने बिना आप उस क्षेत्र में गूंगे बने रहते हैं। इस गूंगेपन से बचने की कोशिश में आक्रान्ताओं को भी विजितों की भाषा सीखनी पड़ती है और इसी न्याय से दिल्ली के आसपास की बोली को आधार बनाकर खड़ीबोली का विकास हुआ था जिसे हिन्दी, हिन्दवी, या रेख्ता कहा गया। अपनी बोली से कटने और दूसरे बोली क्षेत्रो के लिए भी व्यवहार्य होने के कारण और उसी अनुपात में इसके व्याकरण की आवश्यकता बढ़ती गई जब कि कौरवी के वयाकरण की उस क्षेत्र के लिए कोई आवश्यकता नहीं।

यहां हम भाषा के दो भेद करें । एक स्वाभाविक भाषा जिसका सर्वोत्तम रूप बोलियों में मिलता है जिनमें स्थानीयता का इतना गहरा पुट होता है कि एक बोली क्षेत्र के भीतर इनके अनेकानेक रूप पाए जाते हैं, जिनसे इनकी प्राचीनता पर सन्देह होता है जब कि कोई भी बोली किसी शेक्ष भाषा से बहुत पुरानी होती है। पूरे बोली क्षेत्र के लिए यदि शिक्षा की जरूरतों से इनमें से किसी का चुनाव करना हो तो उसका भी व्याकरण तैयार करना होगा। इसलिए बृहत्तर संचार के लिए इन बोली क्षेत्रों के बीच अलपतम आयास से समझी जा सकने वाली भाषाओं का प्राधान्य हो जाता है । हिन्दी प्रदेश इनमें सबसे विचित्र है जिसका निर्माण कौरवी पर आधारित खड़ीबोली के उत्थान से बहुत पहले ब्रज, डिंगल, अवधी और मैथिली के माध्यम से हो गया था । इसलिए
इसके उन्नयन में सबसे प्रधान भूमिका भोजपुरी की थी।

यहां मैं एक तथ्य पर बल देना चाहूंगा। किताबी या शैक्ष भाषाओं का प्राण बोलियों में बसता है। उनसे दूरी बनाने के क्रम में वे बेजान और इकहरी होती जाती हैं। व्याकरण की आवश्यकता इनको समझने के लिए होती है। कोई व्याकरण इनकी सभी असंगतियों को
संभाल नहीं पाता। बोलियां ऊपरी तौर पर अपार भिन्नताओं के बाद भी एक दूसरी से अधिक निकट होती हैं और इनकी पारस्परिक निकटता तथाकथित भाषा परिवारों की सीमाओं को पार कर जाती है, क्योंकि इन सभी की जड़ें आदिम स्रोतों तक जाती हैं। अत: अनुनादी स्रोत इनमें अधिक स्पषट होते है। शैक्ष भाषाओं में मानव हस्तक्षेप बढ़ जाता है, और इसके कारण उनकी व्याख्या का कोई नियम अधूरा और भ्रामक होता है।

संस्कृत को समझने के लिए जिन धातुओं को बहुनिष्ठता के आधार पर निकाला गया वे जैसा कि हम पहले शिकायत कर आए हैं न तो यह सझने में हमारी मदद करती हैं कि उनको वह अर्थ कैसे मिला, न मूल ध्वनि के समग्र फैलाव को समेट पाती है। कई बार एक ही शब्द को समझने के लिए अवसर के अनुसार एकाधिक धातुओं का सहारा लाना पड़ता है फर भी अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता। उदाहरण के लिए ऋषि शब्द को लें। इसे ऋष् और रि धातुओं से समझाने का प्र्रयत्न किया जाता है। ऋष् का अर्थ है चलना। ऋष् गतौ। रि का भी वही अर्थ। पर ऋष् का एक और अर्थ है, मारना, आहत करना। मेरे सामने आप्टे का कोश है, इसमे ऋषि का अर्थ दिया है – ‘अन्तःप्रेरणा सपन्न’ , an inspired person, ‘तपःपूत साधु, वीतराग’ a sanctified sage, an ascetic. ये आशय उस धातु में नहीो हैं। मारने और आहत करने का आशय उसी धातु में कैसे आ गया यह समझ में न आएगा। कारण इसका यह है कि कुछ और शब्द हैं जो ऋष् से आरंभ होते हैं – ऋष्टि – दोधारी तलवार, ऋष्य – एक मृग, और ऋषभ। इनके कारण यह खींज तान करके ये अर्बेथ मूल धातु पर आरोपित करने पड़े फिर भी पवित्रता, वीतरागता उसमें न अठ सकी।

रि में केवल गति है और रिष् में केवल हिंसा। रोचक यह है कि संस्कृत ही ऋष्टि के साथ रिष्टि भी उसी तलवार के आशय में प्रयुक्त है। अब एक नया प्रश्न उठ खड़ा होता है कि क्या ऋ ध्वनि भी वैयाकरणों की रचना है. अब हम कल इसी समस्या को अनुनादी कोण से देखने का प्रयत्न करेंगे।

Post – 2018-04-04

भाषा पर चर्चा की भाषा या प्रस्तुति का रूप यदि ऐसा हो कि सुनने या पढ़ने वालों को उसे समझने में कठिनाई हो तो इस पर दुबारा सोचने की जरूरत है। जिन लोगों ने इसकी शिकायत की है उनका आभारी हूं। पर यह भी सच है कि फेस बुक पर स्थान की सीमा और विषय विस्तार से पाठकों की चिन्ता के अतिरिक्त मेरे साथ एक और भी चिन्ता है जिसे बड़ी खूबसूरती से मीर ने पेश किया है:
फुर्सते बूदो बाश यां कम है।
काम जो कुछ करो शिताब करो ।

८७ के पड़ाव पर अस्तित्व और दुनिया में टिके रहने की फुर्सत के कम होने और जितना अब तक किया लगभग उतना ही करने को बाकी रह जाने के कारण हाथ आए काम को जल्दी निपटाने की चिन्ता में भी बहुत सी बातें उतने विस्तार से नहीं रख पाता जो विषय से पूरी तरह अनभिज्ञ लोगों की समझ में आने के लिए जरूरी है। मेरा प्रयत्न होगा कि इस दूरी को कम कर सकूं। पर मेरा सुझाव है कि ऐसे लोगों को भी कुछ प्रयत्न करना चाहिए। मेरे द्वारा प्रयुक्त कोई शब्द समझ में न आए तो मुझसे उसका अर्थ न पूछें, शब्दकोश देखें। अब तो आन लाइन भी शब्दों का अर्थ जाना जा सकता है।

भाषा पर प्रस्तुत चर्चा, पसन्द की संख्या बढाने के लिए नहीं है । इसकी किश्तों को तब तक न पढ़ें जब तक ‘असंपादित’ लिखा है। बिना पूरा पढ़े आनन फानन में लाइक करने वालों के साथ मेरी मैत्री समाप्त भी हो सकती है, इसका ध्यान रखें।

मैं चाहता हूं मेरे वे मित्र जो विश्व विद्यालयों में रहे तो हिन्दी के प्रोफसर हैं पर अपनी उसी योग्यता के दम पर आए दिन देश की राजनीतिक दिशा सुधारने के लिए जुमलेबाजी से ले कर, छिद्रान्वेषी प्रवचन करते रहते हैं वे इस लेख माला में कमियां निकालें जो उनके अधिकार क्षेत्र में भी आता है, जिससे इसकी गुणवत्ता बढे और यदि ऐसा करने की योग्यता नहीं तो शर्म से डूब मरें कि वे अपने विषय को तो जानते नहीं, जिस विषय को जानते नहीं उसमें दखल दे कर लोगों को भ्रमित करते और अपनी साख को दांव पर लगाते हैं। यदि वे सचमुच इस विषय में बहुत कम जानते हैं तो प्रायश्चित्त स्वरूप पूरे मनोयोग से इनको पढ़ें और अपने प्रभाव क्षेत्र में इसका प्रसार करें जिससे उनके छात्र और उन छात्रों के छात्र उन की तरह मूर्ख न रह जायं।

अन्तत: कल की पोस्ट के पहले वाक्य का कुछ खुलासा कर दूं। मेरा आशय था कि तुलनात्मक और ऐतिहासिक भाषाविज्ञान भाषाशास्त्रीय सरोकारों से नहीं आरम्भ किया गया था अपितु राजनीतिक और नस्लवादी सरोकारों से आरंभ किया गया था इसलिए आरंभ से ही इसमें फरेब और अर्ध सत्यों का सहारा लिया गया, इसे अकादमिक जालसाजी का मनमोहक नमूना माना जा सकता है। इसकी पड़ताल आगे के लेखों में होनी है।

Post – 2018-04-04

भाषा पर चर्चा की भाषा या प्रस्तुति का रूप यदि ऐसा हो कि सुनने या पढ़ने वालों को उसे समझने में कठिनाई हो तो इस पर दुबारा सोचने की जरूरत है। जिन लोगों ने इसकी शिकायत की है उनका आभारी हूं। पर यह भी सच है कि फेस बुक पर स्थान की सीमा और विषय विस्तार से पाठकों की चिन्ता के अतिरिक्त मेरे साथ एक और भी चिन्ता है जिसे बड़ी खूबसूरती से मीर ने पेश किया है:
फुर्सते बूदो बाश यां कम है।
काम जो कुछ करो शिताब करो ।

८७ के पड़ाव पर अस्तित्व और दुनिया में टिके रहने की फुर्सत के कम होने और जितना अब तक किया लगभग उतना ही करने को बाकी रह जाने के कारण हाथ आए काम को जल्दी निपटाने की चिन्ता में भी बहुत सी बातें उतने विस्तार से नहीं रख पाता जो विषय से पूरी तरह अनभिज्ञ लोगों की समझ में आने के लिए जरूरी है। मेरा प्रयत्न होगा कि इस दूरी को कम कर सकूं। पर मेरा सुझाव है कि ऐसे लोगों को भी कुछ प्रयत्न करना चाहिए। मेरे द्वारा प्रयुक्त कोई शब्द समझ में न आए तो मुझसे उसका अर्थ न पूछें, शब्दकोश देखें। अब तो आन लाइन भी शब्दों का अर्थ जाना जा सकता है।

भाषा पर प्रस्तुत चर्चा, पसन्द की संख्या बढाने के लिए नहीं है । इसकी किश्तों को तब तक न पढ़ें जब तक ‘असंपादित’ लिखा है। बिना पूरा पढ़े आनन फानन में लाइक करने वालों के साथ मेरी मैत्री समाप्त भी हो सकती है, इसका ध्यान रखें।

मैं चाहता हूं मेरे वे मित्र जो विश्व विद्यालयों में रहे तो हिन्दी के प्रोफसर हैं पर अपनी उसी योग्यता के दम पर आए दिन देश की राजनीतिक दिशा सुधारने के लिए जुमलेबाजी से ले कर, छिद्रान्वेषी प्रवचन करते रहते हैं वे इस लेख माला में कमियां निकालें जो उनके अधिकार क्षेत्र में भी आता है, जिससे इसकी गुणवत्ता बढे और यदि ऐसा करने की योग्यता नहीं तो शर्म से डूब मरें कि वे अपने विषय को तो जानते नहीं, जिस विषय को जानते नहीं उसमें दखल दे कर लोगों को भ्रमित करते और अपनी साख को दांव पर लगाते हैं। यदि वे सचमुच इस विषय में बहुत कम जानते हैं तो प्रायश्चित्त स्वरूप पूरे मनोयोग से इनको पढ़ें और अपने प्रभाव क्षेत्र में इसका प्रसार करें जिससे उनके छात्र और उन छात्रों के छात्र उन की तरह मूर्ख न रह जायं।

अन्तत: कल की पोस्ट के पहले वाक्य का कुछ खुलासा कर दूं। मेरा आशय था कि तुलनात्मक और ऐतिहासिक भाषाविज्ञान भाषाशास्त्रीय सरोकारों से नहीं आरम्भ किया गया था अपितु राजनीतिक और नस्लवादी सरोकारों से आरंभ किया गया था इसलिए आरंभ से ही इसमें फरेब और अर्ध सत्यों का सहारा लिया गया, इसे अकादमिक जालसाजी का मनमोहक नमूना माना जा सकता है। इसकी पड़ताल आगे के लेखों में होनी है।