“एक जिद है, कभी माथे को झुकाना न पड़े.”
“बुरी जिद है, तुझे धरती नज़र आएगी नहीं.”
Post – 2018-04-02
“एक जिद है, कभी माथे को झुकाना न पड़े.”
“बुरी जिद है, तुझे धरती नज़र आएगी नहीं.”
Post – 2018-04-01
मेरी राजनीतिक समझ
एक मित्र ने मुझसे सवाल किया है कि मेरी राजनीतिक समझ क्या है? सवाल जरूरी भी है और किसी दबी आशंका से प्रेरित भी। लेखक और विचारक की राजनीति सत्ता की राजनीति नहीं हो सकती और जब राजनीति सत्ता के विकल्पों तक सिमट कर रह गई हो तो यह परिभाषित करना कठिन हो जाता है कि रचनाकार की राजनीति क्या हो सकती है? लेखक और विचार की राजनीति मानसिक दासता, मिथ्याचार, कुरूपता और हिंसा के विरोध की राजनीति है। उसका विरोध सत्ता और दासता के सभी रूपों से निरंतर बना रहता है, क्योंकि सत्ता पाने, बचाने, और अनन्तकाल तक अपने अधिकार में बनाए रखने के लिए असत्य, हिंसा, लांछना सभी का सहारा लिया जाता है और अपने विरोधी को मिटाने के लिए जिन घटिया तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है वह सत्ता की राजनीति की जरूरत हो सकती हैं, परंतु समाज की जरूरत नहीं हो सकती, जो ही रचनाकार और विचारक की दृष्टि में सर्वोपरि है और जिस तक पहुंचने, साधने और अपने सपनों के अनुसार गढ़ने के लिए वह कृतसंकल्प होता है।
परंतु यदि कोई कहे कि राजनीतिविमुखता साहित्यकार का चुनाव हो सकता है तो इससे बड़ा झूठ कुछ हो ही नहीं सकता। लेखक समाज से मुंह नहीं मोड़ सकता और सत्ता या सत्ता के लिए प्रयतनशील संगठनों की ओर ओर रुख करने पर समाज की ओर उसकी पीठ ही हो सकती है। रचनाकार और विचार की राजनीति किसी भी संस्था से जुड़ने की राजनीति नहीं हो सकती, उसके आतंक के विरुद्ध होने की राजनीति हो सकती है। धनपतियों और शासकों द्वारा समादृत साहित्यकार शक्तिशाली हो सकते हैं, परंतु प्रभावशाली नहीं हो सकते। इनकी निकटता में आने के अनुपात में ही वे जनता से दूर होते चले जाते हैं, इसलिए साहित्यकार की राजनीति साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों को, आतंक या प्रलोभन से, अनुकूलित करने वालों के विरुद्ध खड़े होने की राजनीति है।
यह बात आतंक के सभी रूपों पर लागू होती है। शास्त्र और शासन दोनों का मूल शास् धातु ही है। विचार और साहित्य दोनों के आतंक के विरुद्ध सबसे कारगर हथियार है। परंतु ऐसा हथियार जिसकी चोट शरीर पर नहीं मन पर पड़ती है। यह कोई नई बात नहीं है। इसे बार बार दोहराया गया है। कबीर के शब्दों में इसकी चोट बाहर से दीखे नहीं, भीतर चकनाचूर। रचनाकार और विचारक चेतना के रूप में बदलाव लाकर वह क्रांति करता है जो सत्ता की राजनीति करने वाले धन और शस्त्र की सहायता से करते हैं। शस्त्र बल से वशीभूत अवसर निकालकर अपने को अधीन बनाने वाले के विरुद्ध विद्रोह कर सकता है, परंतु चेतना को रूपान्तरित करने वाले के विरुद्ध इसकी संभावना नहीं। उसकी पकड़ अधिक गहरी और स्थाई होती है। उसके प्रभाव में आया व्यक्ति तद्रूप होकर स्वयं भी सत्ता के समक्ष तन कर खड़ा हो सकता है । लेखक और विचारक को यह शक्ति पाठकों तक उसकी पहुंच के कारण मिलती है और उसी अनुपात में अन्यायी शास्त्र और शासन का सबसे तीखा विरोध दबावों के समक्ष अडिग होकर सोचने वाले और रचने वाले बुद्धिजीवी से रहता है और वह सबसे पहले इन को मिटाने या रास्ते से हटाने या फुसलाकर अपने काबू में करने का प्रयत्न करते हैं ।
राजनीतिक जागरूकता अंध विरोध नहीं बन सकती। यदि वह किसी आंदोलन के साथ रहे तो उसकी विचलनों और कमियों को झेलते हुए उसके साथ समझौता नहीं कर सकता, उसके विरुद्ध भी खड़ा होना होगा । स्वयं अपनी दुर्बलताओं के विरुद्ध भी खड़ा होना होगा।
इस मामले में मेरे आदर्श रचनाकार प्रेमचंद है। जिस आंदोलन का समर्थन करते हैं उसकी विचलनों पर उंगली उठाने वाले। इसी कारण उन्होंने कहा था रचनाकार अपने कर्म से ही प्रगतिशील होता है। ऐसा वह समाज से जुड़कर ही हो सकता है। किसी आंदोलन से जुड़कर नहीं।
मैं सक्रिय राजनीति से सचेत रुप में दूर रहा हूं, क्योंकि किसी संगठन और दल से जुड़ाव के बाद विचारक और रचनाकार अपनी स्वतंत्रता खो देता है। उसे अपने संगठन के किसी भी काम की आलोचना करने की अनुमति नहीं होती, कारण इससे संगठन को क्षति पहुंचती है, वह कमजोर होता। संगठन को मजबूत करते हुए लेखक स्वयं कमजोर होता चला जाता है अपनी वाणी की ताकत खो देता है। उसे न्याय अन्याय सभी का समर्थन करना पड़ता है, वह ढोंग और पाखंड से बचने की इच्छाशक्ति तक खो देता है। कम्युनिस्ट पार्टियों से जुड़े हुए रचनाकारों की सबसे बड़ी विडंबना यही रही है। मार्क्सवादी होते हुए भी जिन्होंने कुछ काम कर लिया वे संगठन से अलग ही रहे और अक्सर संगठन की आलोचना की शिकार रहे है।
राजनीति के नाम पर मैं लोकतंत्रवादी हूं । लोकतंत्र की मर्यादाओं का सम्मान करता हूं लोकतांत्रिक प्रक्रिया को विफल करने वाले सभी हथकंडों का विरोध करता हूं, परंतु किसी राजनीति में सम्मिलित होकर नहीं । मुझे यह भ्रम है कि मैं हिन्दी का सबसे निर्भीक ऐक्टविस्ट लेखक हूं और मेरी सभी रचनाएं औपनिवेशिक मानसिकता और सत्ता के राजनीतिक से लेकर शास्त्रीय आतंक और जड़ता के विरुद्ध है।
मैं स्वयं अपने को मार्क्सवादी कहता हूं और मार्क्स की भी आलोचना करता हूं। मैंने अपने को कभी गांधीवादी नहीं कहा, परंतु मेरी भाषा, सोच और मनोबल पर जितना गांधी का प्रभाव है उतना किसी अन्य का नहीं। इसके बावजूद मैं गांधी की सीमाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकता न ही उन्हें अपने आचरण के लिए आदर्श मान सकता हूं।
राजनीति में ना होते हुए भी आपको सुलभ विकल्पों के बीच किसी का चुनाव करना पड़ता है और उसके साथ सहानुभूति रखनी होती है। मेरी यह सहानुभूति लंबे समय तक कम्युनिस्ट पार्टियों के प्रति रही है और उनसे भी हटने का कारण यह कि वे सत्ता के लिए वर्जित तरीकों को भी उचित मानती रही हैं और साधन की पवित्रता में उनका कोई विश्वास नहीं। लेखक के लिए यह वांछनीय नहीं हो सकता।
संयोग कुछ ऐसा कि मेरे मित्रों में अधिकांश मार्क्सवादी सोच के ही लोग हैं परंतु हिंदू समाज के प्रति उनकी उपेक्षा, प्राचीन इतिहास की उनकी उपनिवेशवादी समझ, भारतीय मूल्यों और मान्यताओं का अंध विरोध मुझे कभी सही नहीं लगा। इसलिए स्वयं भले अपने को मार्क्सवादी कहूं उनके आकलन में, मित्रता के बावजूद, मैं मार्क्सवादी नहीं हो सकता। विडंबना यह है कि मैं अपने आकलन में उनको, पार्टी से लगाव के बावजूद, अच्छा मार्क्सवादी नहीं मानता – भाववादी मानता हूं। वे मुझे स्वयं हिंदुत्ववादी मानते हों तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा, क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टियों ने, स्वयं कांग्रेस ने और अपने को सेकुलर कहकर अलग पहचान रखने वाले दलों ने जिनके पास दूसरा कोई सिद्धांत नहीं है, सभी ने हिंदुत्व के प्रति जिस तरह का तिरस्कारपूर्ण रवैया अपना रखा है उसका मैं घोर विरोधी हूं ।
हिंदुत्व की राजनीति करने वालों को कभी कभी लगता होगा कि मैं उनको सही मानता हूं, जब कि मैं उन्हें मात्र लीगी या क्रिस्तानी चेतना से ग्रस्त दलों से कम गलत मानता हूं। इतिहास पर मेरी पुस्तक आने के बाद उनके प्रयास से पूरे देश में दर्जनों सेमिनार हुए जिनमें चर्चा केवल इस बात तक सीमित रही कि भारत पर आर्यों का हमला नहीं हुआ था। यह मेरी दो खंडों सें प्रकाशित पुस्तक का मात्र एक अध्याय था। कई में मैने उत्साह से भाग लिया तब कहीं पता चला कि इन आयोजनों के पीछे कौन है और इतिहास में उनकी रुचि की सीमा क्या है। वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हिंदू समाज सदा से यहीं रहा है इसलिए उसका इस देश पर अधिक अधिकार है और दूसरे जो बाहर से आए हैं उनका कम। उनकी सोच में इतिहास का यह कटु सत्य तक शामिल नहीं कि नब्बे प्रतिशत मुसलमान उतने ही पुराने समय से इस देश के निवासी हैं और उनके धर्मान्तरण के लिए स्वयं वे नहीं, हम उत्तरदायी हैं।
मोदी संघ की पृष्ठभूमि के बावजूद लोकतंत्रवादी हैं और भाजपा ने अपने पूरे इतिहास में सत्ता और विपक्ष दोनों ही भूमिकाओं में लोकतांत्रिक मर्यादाओं का जितनी गरिमा से निर्वाह किया है उसके कारण उपलब्ध विकल्पों में उसे सबसे उपयुक्त पाता हं। यह मेरी समझ है, जरूरी नहीं कि वह दूसरों को भी सही लगे।
Post – 2018-04-01
मेरी राजनीतिक समझ
एक मित्र ने मुझसे सवाल किया है कि मेरी राजनीतिक समझ क्या है? सवाल जरूरी भी है और किसी दबी आशंका से प्रेरित भी। लेखक और विचारक की राजनीति सत्ता की राजनीति नहीं हो सकती और जब राजनीति सत्ता के विकल्पों तक सिमट कर रह गई हो तो यह परिभाषित करना कठिन हो जाता है कि रचनाकार की राजनीति क्या हो सकती है? लेखक और विचार की राजनीति मानसिक दासता, मिथ्याचार, कुरूपता और हिंसा के विरोध की राजनीति है। उसका विरोध सत्ता और दासता के सभी रूपों से निरंतर बना रहता है, क्योंकि सत्ता पाने, बचाने, और अनन्तकाल तक अपने अधिकार में बनाए रखने के लिए असत्य, हिंसा, लांछना सभी का सहारा लिया जाता है और अपने विरोधी को मिटाने के लिए जिन घटिया तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है वह सत्ता की राजनीति की जरूरत हो सकती हैं, परंतु समाज की जरूरत नहीं हो सकती, जो ही रचनाकार और विचारक की दृष्टि में सर्वोपरि है और जिस तक पहुंचने, साधने और अपने सपनों के अनुसार गढ़ने के लिए वह कृतसंकल्प होता है।
परंतु यदि कोई कहे कि राजनीतिविमुखता साहित्यकार का चुनाव हो सकता है तो इससे बड़ा झूठ कुछ हो ही नहीं सकता। लेखक समाज से मुंह नहीं मोड़ सकता और सत्ता या सत्ता के लिए प्रयतनशील संगठनों की ओर ओर रुख करने पर समाज की ओर उसकी पीठ ही हो सकती है। रचनाकार और विचार की राजनीति किसी भी संस्था से जुड़ने की राजनीति नहीं हो सकती, उसके आतंक के विरुद्ध होने की राजनीति हो सकती है। धनपतियों और शासकों द्वारा समादृत साहित्यकार शक्तिशाली हो सकते हैं, परंतु प्रभावशाली नहीं हो सकते। इनकी निकटता में आने के अनुपात में ही वे जनता से दूर होते चले जाते हैं, इसलिए साहित्यकार की राजनीति साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों को, आतंक या प्रलोभन से, अनुकूलित करने वालों के विरुद्ध खड़े होने की राजनीति है।
यह बात आतंक के सभी रूपों पर लागू होती है। शास्त्र और शासन दोनों का मूल शास् धातु ही है। विचार और साहित्य दोनों के आतंक के विरुद्ध सबसे कारगर हथियार है। परंतु ऐसा हथियार जिसकी चोट शरीर पर नहीं मन पर पड़ती है। यह कोई नई बात नहीं है। इसे बार बार दोहराया गया है। कबीर के शब्दों में इसकी चोट बाहर से दीखे नहीं, भीतर चकनाचूर। रचनाकार और विचारक चेतना के रूप में बदलाव लाकर वह क्रांति करता है जो सत्ता की राजनीति करने वाले धन और शस्त्र की सहायता से करते हैं। शस्त्र बल से वशीभूत अवसर निकालकर अपने को अधीन बनाने वाले के विरुद्ध विद्रोह कर सकता है, परंतु चेतना को रूपान्तरित करने वाले के विरुद्ध इसकी संभावना नहीं। उसकी पकड़ अधिक गहरी और स्थाई होती है। उसके प्रभाव में आया व्यक्ति तद्रूप होकर स्वयं भी सत्ता के समक्ष तन कर खड़ा हो सकता है । लेखक और विचारक को यह शक्ति पाठकों तक उसकी पहुंच के कारण मिलती है और उसी अनुपात में अन्यायी शास्त्र और शासन का सबसे तीखा विरोध दबावों के समक्ष अडिग होकर सोचने वाले और रचने वाले बुद्धिजीवी से रहता है और वह सबसे पहले इन को मिटाने या रास्ते से हटाने या फुसलाकर अपने काबू में करने का प्रयत्न करते हैं ।
राजनीतिक जागरूकता अंध विरोध नहीं बन सकती। यदि वह किसी आंदोलन के साथ रहे तो उसकी विचलनों और कमियों को झेलते हुए उसके साथ समझौता नहीं कर सकता, उसके विरुद्ध भी खड़ा होना होगा । स्वयं अपनी दुर्बलताओं के विरुद्ध भी खड़ा होना होगा।
इस मामले में मेरे आदर्श रचनाकार प्रेमचंद है। जिस आंदोलन का समर्थन करते हैं उसकी विचलनों पर उंगली उठाने वाले। इसी कारण उन्होंने कहा था रचनाकार अपने कर्म से ही प्रगतिशील होता है। ऐसा वह समाज से जुड़कर ही हो सकता है। किसी आंदोलन से जुड़कर नहीं।
मैं सक्रिय राजनीति से सचेत रुप में दूर रहा हूं, क्योंकि किसी संगठन और दल से जुड़ाव के बाद विचारक और रचनाकार अपनी स्वतंत्रता खो देता है। उसे अपने संगठन के किसी भी काम की आलोचना करने की अनुमति नहीं होती, कारण इससे संगठन को क्षति पहुंचती है, वह कमजोर होता। संगठन को मजबूत करते हुए लेखक स्वयं कमजोर होता चला जाता है अपनी वाणी की ताकत खो देता है। उसे न्याय अन्याय सभी का समर्थन करना पड़ता है, वह ढोंग और पाखंड से बचने की इच्छाशक्ति तक खो देता है। कम्युनिस्ट पार्टियों से जुड़े हुए रचनाकारों की सबसे बड़ी विडंबना यही रही है। मार्क्सवादी होते हुए भी जिन्होंने कुछ काम कर लिया वे संगठन से अलग ही रहे और अक्सर संगठन की आलोचना की शिकार रहे है।
राजनीति के नाम पर मैं लोकतंत्रवादी हूं । लोकतंत्र की मर्यादाओं का सम्मान करता हूं लोकतांत्रिक प्रक्रिया को विफल करने वाले सभी हथकंडों का विरोध करता हूं, परंतु किसी राजनीति में सम्मिलित होकर नहीं । मुझे यह भ्रम है कि मैं हिन्दी का सबसे निर्भीक ऐक्टविस्ट लेखक हूं और मेरी सभी रचनाएं औपनिवेशिक मानसिकता और सत्ता के राजनीतिक से लेकर शास्त्रीय आतंक और जड़ता के विरुद्ध है।
मैं स्वयं अपने को मार्क्सवादी कहता हूं और मार्क्स की भी आलोचना करता हूं। मैंने अपने को कभी गांधीवादी नहीं कहा, परंतु मेरी भाषा, सोच और मनोबल पर जितना गांधी का प्रभाव है उतना किसी अन्य का नहीं। इसके बावजूद मैं गांधी की सीमाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकता न ही उन्हें अपने आचरण के लिए आदर्श मान सकता हूं।
राजनीति में ना होते हुए भी आपको सुलभ विकल्पों के बीच किसी का चुनाव करना पड़ता है और उसके साथ सहानुभूति रखनी होती है। मेरी यह सहानुभूति लंबे समय तक कम्युनिस्ट पार्टियों के प्रति रही है और उनसे भी हटने का कारण यह कि वे सत्ता के लिए वर्जित तरीकों को भी उचित मानती रही हैं और साधन की पवित्रता में उनका कोई विश्वास नहीं। लेखक के लिए यह वांछनीय नहीं हो सकता।
संयोग कुछ ऐसा कि मेरे मित्रों में अधिकांश मार्क्सवादी सोच के ही लोग हैं परंतु हिंदू समाज के प्रति उनकी उपेक्षा, प्राचीन इतिहास की उनकी उपनिवेशवादी समझ, भारतीय मूल्यों और मान्यताओं का अंध विरोध मुझे कभी सही नहीं लगा। इसलिए स्वयं भले अपने को मार्क्सवादी कहूं उनके आकलन में, मित्रता के बावजूद, मैं मार्क्सवादी नहीं हो सकता। विडंबना यह है कि मैं अपने आकलन में उनको, पार्टी से लगाव के बावजूद, अच्छा मार्क्सवादी नहीं मानता – भाववादी मानता हूं। वे मुझे स्वयं हिंदुत्ववादी मानते हों तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा, क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टियों ने, स्वयं कांग्रेस ने और अपने को सेकुलर कहकर अलग पहचान रखने वाले दलों ने जिनके पास दूसरा कोई सिद्धांत नहीं है, सभी ने हिंदुत्व के प्रति जिस तरह का तिरस्कारपूर्ण रवैया अपना रखा है उसका मैं घोर विरोधी हूं ।
हिंदुत्व की राजनीति करने वालों को कभी कभी लगता होगा कि मैं उनको सही मानता हूं, जब कि मैं उन्हें मात्र लीगी या क्रिस्तानी चेतना से ग्रस्त दलों से कम गलत मानता हूं। इतिहास पर मेरी पुस्तक आने के बाद उनके प्रयास से पूरे देश में दर्जनों सेमिनार हुए जिनमें चर्चा केवल इस बात तक सीमित रही कि भारत पर आर्यों का हमला नहीं हुआ था। यह मेरी दो खंडों सें प्रकाशित पुस्तक का मात्र एक अध्याय था। कई में मैने उत्साह से भाग लिया तब कहीं पता चला कि इन आयोजनों के पीछे कौन है और इतिहास में उनकी रुचि की सीमा क्या है। वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हिंदू समाज सदा से यहीं रहा है इसलिए उसका इस देश पर अधिक अधिकार है और दूसरे जो बाहर से आए हैं उनका कम। उनकी सोच में इतिहास का यह कटु सत्य तक शामिल नहीं कि नब्बे प्रतिशत मुसलमान उतने ही पुराने समय से इस देश के निवासी हैं और उनके धर्मान्तरण के लिए स्वयं वे नहीं, हम उत्तरदायी हैं।
मोदी संघ की पृष्ठभूमि के बावजूद लोकतंत्रवादी हैं और भाजपा ने अपने पूरे इतिहास में सत्ता और विपक्ष दोनों ही भूमिकाओं में लोकतांत्रिक मर्यादाओं का जितनी गरिमा से निर्वाह किया है उसके कारण उपलब्ध विकल्पों में उसे सबसे उपयुक्त पाता हं। यह मेरी समझ है, जरूरी नहीं कि वह दूसरों को भी सही लगे।
Post – 2018-04-01
मेरी राजनीतिक समझ
एक मित्र ने मुझसे सवाल किया है कि मेरी राजनीतिक समझ क्या है? सवाल जरूरी भी है और किसी दबी आशंका से प्रेरित भी। लेखक और विचारक की राजनीति सत्ता की राजनीति नहीं हो सकती और जब राजनीति सत्ता के विकल्पों तक सिमट कर रह गई हो तो यह परिभाषित करना कठिन हो जाता है कि रचनाकार की राजनीति क्या हो सकती है? लेखक और विचार की राजनीति मानसिक दासता, मिथ्याचार, कुरूपता और हिंसा के विरोध की राजनीति है। उसका विरोध सत्ता और दासता के सभी रूपों से निरंतर बना रहता है, क्योंकि सत्ता पाने, बचाने, और अनन्तकाल तक अपने अधिकार में बनाए रखने के लिए असत्य, हिंसा, लांछना सभी का सहारा लिया जाता है और अपने विरोधी को मिटाने के लिए जिन घटिया तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है वह सत्ता की राजनीति की जरूरत हो सकती हैं, परंतु समाज की जरूरत नहीं हो सकती, जो ही रचनाकार और विचारक की दृष्टि में सर्वोपरि है और जिस तक पहुंचने, साधने और अपने सपनों के अनुसार गढ़ने के लिए वह कृतसंकल्प होता है।
परंतु यदि कोई कहे कि राजनीतिविमुखता साहित्यकार का चुनाव हो सकता है तो इससे बड़ा झूठ कुछ हो ही नहीं सकता। लेखक समाज से मुंह नहीं मोड़ सकता और सत्ता या सत्ता के लिए प्रयतनशील संगठनों की ओर ओर रुख करने पर समाज की ओर उसकी पीठ ही हो सकती है। रचनाकार और विचार की राजनीति किसी भी संस्था से जुड़ने की राजनीति नहीं हो सकती, उसके आतंक के विरुद्ध होने की राजनीति हो सकती है। धनपतियों और शासकों द्वारा समादृत साहित्यकार शक्तिशाली हो सकते हैं, परंतु प्रभावशाली नहीं हो सकते। इनकी निकटता में आने के अनुपात में ही वे जनता से दूर होते चले जाते हैं, इसलिए साहित्यकार की राजनीति साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों को, आतंक या प्रलोभन से, अनुकूलित करने वालों के विरुद्ध खड़े होने की राजनीति है।
यह बात आतंक के सभी रूपों पर लागू होती है। शास्त्र और शासन दोनों का मूल शास् धातु ही है। विचार और साहित्य दोनों के आतंक के विरुद्ध सबसे कारगर हथियार है। परंतु ऐसा हथियार जिसकी चोट शरीर पर नहीं मन पर पड़ती है। यह कोई नई बात नहीं है। इसे बार बार दोहराया गया है। कबीर के शब्दों में इसकी चोट बाहर से दीखे नहीं, भीतर चकनाचूर। रचनाकार और विचारक चेतना के रूप में बदलाव लाकर वह क्रांति करता है जो सत्ता की राजनीति करने वाले धन और शस्त्र की सहायता से करते हैं। शस्त्र बल से वशीभूत अवसर निकालकर अपने को अधीन बनाने वाले के विरुद्ध विद्रोह कर सकता है, परंतु चेतना को रूपान्तरित करने वाले के विरुद्ध इसकी संभावना नहीं। उसकी पकड़ अधिक गहरी और स्थाई होती है। उसके प्रभाव में आया व्यक्ति तद्रूप होकर स्वयं भी सत्ता के समक्ष तन कर खड़ा हो सकता है । लेखक और विचारक को यह शक्ति पाठकों तक उसकी पहुंच के कारण मिलती है और उसी अनुपात में अन्यायी शास्त्र और शासन का सबसे तीखा विरोध दबावों के समक्ष अडिग होकर सोचने वाले और रचने वाले बुद्धिजीवी से रहता है और वह सबसे पहले इन को मिटाने या रास्ते से हटाने या फुसलाकर अपने काबू में करने का प्रयत्न करते हैं ।
राजनीतिक जागरूकता अंध विरोध नहीं बन सकती। यदि वह किसी आंदोलन के साथ रहे तो उसकी विचलनों और कमियों को झेलते हुए उसके साथ समझौता नहीं कर सकता, उसके विरुद्ध भी खड़ा होना होगा । स्वयं अपनी दुर्बलताओं के विरुद्ध भी खड़ा होना होगा।
इस मामले में मेरे आदर्श रचनाकार प्रेमचंद है। जिस आंदोलन का समर्थन करते हैं उसकी विचलनों पर उंगली उठाने वाले। इसी कारण उन्होंने कहा था रचनाकार अपने कर्म से ही प्रगतिशील होता है। ऐसा वह समाज से जुड़कर ही हो सकता है। किसी आंदोलन से जुड़कर नहीं।
मैं सक्रिय राजनीति से सचेत रुप में दूर रहा हूं, क्योंकि किसी संगठन और दल से जुड़ाव के बाद विचारक और रचनाकार अपनी स्वतंत्रता खो देता है। उसे अपने संगठन के किसी भी काम की आलोचना करने की अनुमति नहीं होती, कारण इससे संगठन को क्षति पहुंचती है, वह कमजोर होता। संगठन को मजबूत करते हुए लेखक स्वयं कमजोर होता चला जाता है अपनी वाणी की ताकत खो देता है। उसे न्याय अन्याय सभी का समर्थन करना पड़ता है, वह ढोंग और पाखंड से बचने की इच्छाशक्ति तक खो देता है। कम्युनिस्ट पार्टियों से जुड़े हुए रचनाकारों की सबसे बड़ी विडंबना यही रही है। मार्क्सवादी होते हुए भी जिन्होंने कुछ काम कर लिया वे संगठन से अलग ही रहे और अक्सर संगठन की आलोचना की शिकार रहे है।
राजनीति के नाम पर मैं लोकतंत्रवादी हूं । लोकतंत्र की मर्यादाओं का सम्मान करता हूं लोकतांत्रिक प्रक्रिया को विफल करने वाले सभी हथकंडों का विरोध करता हूं, परंतु किसी राजनीति में सम्मिलित होकर नहीं । मुझे यह भ्रम है कि मैं हिन्दी का सबसे निर्भीक ऐक्टविस्ट लेखक हूं और मेरी सभी रचनाएं औपनिवेशिक मानसिकता और सत्ता के राजनीतिक से लेकर शास्त्रीय आतंक और जड़ता के विरुद्ध है।
मैं स्वयं अपने को मार्क्सवादी कहता हूं और मार्क्स की भी आलोचना करता हूं। मैंने अपने को कभी गांधीवादी नहीं कहा, परंतु मेरी भाषा, सोच और मनोबल पर जितना गांधी का प्रभाव है उतना किसी अन्य का नहीं। इसके बावजूद मैं गांधी की सीमाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकता न ही उन्हें अपने आचरण के लिए आदर्श मान सकता हूं।
राजनीति में ना होते हुए भी आपको सुलभ विकल्पों के बीच किसी का चुनाव करना पड़ता है और उसके साथ सहानुभूति रखनी होती है। मेरी यह सहानुभूति लंबे समय तक कम्युनिस्ट पार्टियों के प्रति रही है और उनसे भी हटने का कारण यह कि वे सत्ता के लिए वर्जित तरीकों को भी उचित मानती रही हैं और साधन की पवित्रता में उनका कोई विश्वास नहीं। लेखक के लिए यह वांछनीय नहीं हो सकता।
संयोग कुछ ऐसा कि मेरे मित्रों में अधिकांश मार्क्सवादी सोच के ही लोग हैं परंतु हिंदू समाज के प्रति उनकी उपेक्षा, प्राचीन इतिहास की उनकी उपनिवेशवादी समझ, भारतीय मूल्यों और मान्यताओं का अंध विरोध मुझे कभी सही नहीं लगा। इसलिए स्वयं भले अपने को मार्क्सवादी कहूं उनके आकलन में, मित्रता के बावजूद, मैं मार्क्सवादी नहीं हो सकता। विडंबना यह है कि मैं अपने आकलन में उनको, पार्टी से लगाव के बावजूद, अच्छा मार्क्सवादी नहीं मानता – भाववादी मानता हूं। वे मुझे स्वयं हिंदुत्ववादी मानते हों तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा, क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टियों ने, स्वयं कांग्रेस ने और अपने को सेकुलर कहकर अलग पहचान रखने वाले दलों ने जिनके पास दूसरा कोई सिद्धांत नहीं है, सभी ने हिंदुत्व के प्रति जिस तरह का तिरस्कारपूर्ण रवैया अपना रखा है उसका मैं घोर विरोधी हूं ।
हिंदुत्व की राजनीति करने वालों को कभी कभी लगता होगा कि मैं उनको सही मानता हूं, जब कि मैं उन्हें मात्र लीगी या क्रिस्तानी चेतना से ग्रस्त दलों से कम गलत मानता हूं। इतिहास पर मेरी पुस्तक आने के बाद उनके प्रयास से पूरे देश में दर्जनों सेमिनार हुए जिनमें चर्चा केवल इस बात तक सीमित रही कि भारत पर आर्यों का हमला नहीं हुआ था। यह मेरी दो खंडों सें प्रकाशित पुस्तक का मात्र एक अध्याय था। कई में मैने उत्साह से भाग लिया तब कहीं पता चला कि इन आयोजनों के पीछे कौन है और इतिहास में उनकी रुचि की सीमा क्या है। वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हिंदू समाज सदा से यहीं रहा है इसलिए उसका इस देश पर अधिक अधिकार है और दूसरे जो बाहर से आए हैं उनका कम। उनकी सोच में इतिहास का यह कटु सत्य तक शामिल नहीं कि नब्बे प्रतिशत मुसलमान उतने ही पुराने समय से इस देश के निवासी हैं और उनके धर्मान्तरण के लिए स्वयं वे नहीं, हम उत्तरदायी हैं।
मोदी संघ की पृष्ठभूमि के बावजूद लोकतंत्रवादी हैं और भाजपा ने अपने पूरे इतिहास में सत्ता और विपक्ष दोनों ही भूमिकाओं में लोकतांत्रिक मर्यादाओं का जितनी गरिमा से निर्वाह किया है उसके कारण उपलब्ध विकल्पों में उसे सबसे उपयुक्त पाता हं। यह मेरी समझ है, जरूरी नहीं कि वह दूसरों को भी सही लगे।
Post – 2018-03-31
संवाद, विवाद और विचार
एक मित्र ने यह पूछा, आप तो किसी भी समस्या पर निष्पक्ष होकर, पूरी गंभीरता से लिखते हैं, फिर भी जब कुछ लोग उल्टे-सीधे प्रश्न करते हैं तो आपको कैसा लगता है ? उनके प्रश्न का उत्तर तो मैंने यथास्थान दे दिया पर लगा इस पर दूसरों के लिए भी अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने की जरूरत है।
समाज की पहली शर्त है कि आप किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए बहस करें न कि अपनी विद्वत्ता या भाषा का कमाल या विदग्धता के प्रदर्शन के लिए। Facebook को मैं बहुत महत्वपूर्ण मंच मांगता हूं । ऐसा मंच इससे पहले न था, न इसकी मैंने कल्पना की थी । किसी बड़ी से बड़ी गोष्ठी में सभी को अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिलता। समय की सीमा होती है। पाठक भी ऊबने के बाद भी फंसे रहते हैं।
Facebook के साथ इन दोनों में से कोई सीमा नहीं होती। किसी भी समय पर, किसी भी विषय पर, एक साथ कितने भी लोग अपने विचार प्रकट कर सकते हैं और इस बात की चिंता किए बिना प्रकट कर सकते हैं कि उनके पाठक उसे ग्रहण करते हैं या नहीं। यदि विचारों में कोई सार है, यह समस्या सार्थक है तो, कुछ लोग पसंद करने वाले मिल ही जाते हैं.। परंतु Facebook की एक सीमा यह है इसमें श्रोता नहीं होते, मित्रों की एक मंडली होती है जिनकी संख्या रूचि और रुझान के अनुसार बढ़ती जाती है और यदि किन्ही कारणों से Facebook मंच पर मान्यताओं के शिविर बन जाते हैं तो सहमति और असहमति के दायरे पहले से ही निर्धारित हो जाते हैं, विचार अपना सारतत्व खो देता हैऔर मत विभाजन की स्थिति आ जाती है ।
मुझे लगता है इसके कारण इतने महत्वपूर्ण और दुर्लभ मंच का भी हम सही उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। लोग लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए चुटकुले बाजियां, हल्की टिप्पणियां, अनुचित आरोप, सचेत रूप में तथ्यों की लीपापोती करते रहते हैं जिससे उनका भले मनोरंजन होता हो, पाठकों का बहुत समय व्यर्थ चला जाता है . यदि इसे राष्ट्रीय बौद्धिक ऊर्जा के सदुपयोग या दुरुपयोग के रूप में देखा जाए तो दुरुपयोग का पलड़ा भारी रहेगा।
मुझे Facebook उन विषयों को उठाने और उन पर कुछ कहने का अवसर मिला है जिन के विषय में मैं सोचता था अपने जीवनकाल में उनको उठा भी पाऊंगा या नहीं। इतिहास, भाषा, समाज, संस्कृति, धर्म से जुड़े हुए सवालों के विषय में मुझे असंतोष रहा है कि इनकी बुनियादी जानकारी तक उन लोगों के पास नहीं है जो इस के अधिकारी विद्वान होने का दावा करते हैं। रुचि की विविधता और मेरी अपनी अपेक्षा के अनुसार तैयारी का जो स्तर होना चाहिए उस पर अपने को पूरा न पा कर पाकर लगातार दुविधा की स्थिति बनी रही। परंतु यह विश्वास अधिकारी कहे जाने वाले लोगों से मेरी समझ अधिक अच्छी है, मैं बिना किसी आशंका और दुविधा के अपने मंतव्य, मेरी ज्ञान सीमा में आने वाली जानकारी और प्रमाण और औचित्य के साथ रखने का साहस फेसबुक के कारण ही जुटा सका हूं और अपेक्षा करता हूं कि मेरी कमियां दूसरों की आलोचना के द्वारा दूर हों, जिससे मेरी मान्यता भले गलत हो जाए पर उस विषय पर सामाजिक समझ अवश्य पहले से ही अधिक अच्छी होती चले।
इस बुनियादी समझ के कारण मुझे असहमतियों की प्रतीक्षा रहती है। यदि किसी ने किसी कमी की ओर ध्यान दिलाया या कोई ऐसा पहलू विचारार्थ प्रस्तुत किया जो मुझसे छूट गया था तो मैं उसका उपकार मानता हूं और इसे स्वीकार भी करता हूं। ।समय-समय पर मैं इसके लिए आग्रह करता हूं । इसके दो कारण हैं पहला यह कि मेरी सोच अपने समय के दूसरे सभी विद्वानों से अलग है और यह उन सभी विषयों में है जिनमें मैं कभी कभी हस्तक्षेप करता हूं।
अकेला आदमी अपने को कितना भी सही समझे कुछ चीजों को छोड़ ही जाता है । वह किन्हीं न किन्हीं अंतर्विरोधों का शिकार हो सकता है और इसका उसे आभास तक नहीं हो सकता। यदि मेरी चिंता अपने को सही सिद्ध करने की होती तो संभव है मुझे ऐसी आलोचनाओं से असुविधा अवश्य होती ।
कभी-कभी मैं विनोद में कहता हूं, मैं कभी पराजित नहीं हो सकता। मुझे पराजित करने की कोशिश करने वाले स्वयं पराजित हो जाते हैं। जिसे जीतना न हो वह पराजित कैसे हो सकता है। मैं उसकी सही बातों को सम्मान के साथ स्वीकार कर लेता हूं। अपने पहले के विचार को उसके अनुसार सुधार या बदल लेता हूं।इसमें यदि जीत जैसी कोई वस्तु है तो आलोचना करने वाले के साथ मेरी अपनी भी जीत होती है। यह कोई नई सोच नहीं है। इसे मैंने आज से 50 साल पहले बहुत स्पष्ट रूप में महाभिषग में लिखा थाः
“पराजित तुम कभी नहीं हुए अश्वघोष! बंधु, तुमने जीवन में सर्वत्र विजय ही पाई और जिसे तुम पराजय कह रहे हो वही तो तुम्हारी परम विजय है, मित्र। सत्य के सन्मुख, धर्म के सन्मुख, विनय के सम्मुख विजय से बड़ी पराजय और समर्पण से बड़ी विजय क्या होगी? जहां समर्पण ही परम विजय है वहां समर्पित होकर तुम पराजित कैसे हो सकते हो ?”
इसे मैंने मात्र एक कृति में दर्ज नहीं किया था अपितु अपितु अपने जीवन में उतारा था । यह मेरी अपनी जीवनदृष्टि है इसलिए मैं विरोधी विचारों को अनुद्विग्न भाव से सुनता और जहां वे सार्थक लगें उन्हें अपनाता रहा हूँ। अतः विरोध से मुझे कभी खिन्नता नहीं हो सकती।
परंतु राजनीतिक प्रश्नों पर प्रबुद्ध लोगों, यहां तक कि समाज का मार्गदर्शक होने का दम भरने वालों की भी दलगत राजनीति इतनी स्पष्ट है कि वे व्यावहारिक राजनीति करने वालों के स्तर पर उतर आते हैं। उनमें कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो केवल असमत नहीं होते, बौखला जाते हैं । कभी कभी अशिष्ट हो जाते हैं। उनका हस्तक्षेप अरुचिकर तो लगता है परंतु उत्साहवर्धक भी लगता है। इसका अर्थ है, हमारे विचारों और तर्कों का विरोधियों के पास कोई उत्तर नहीं है। उत्तेजना इसका प्रमाण है न कि मात्र गर्हित उक्ति। इससे जितना क्षोभ होता है उससे अधिक यह आश्वस्ति कर लगता है। गाली वैचारिक दृष्टि से कमजोर और पराजित लोगों का अंतिम ब्रह्मास्त्र है।
Post – 2018-03-31
संवाद, विवाद और विचार
एक मित्र ने यह पूछा, आप तो किसी भी समस्या पर निष्पक्ष होकर, पूरी गंभीरता से लिखते हैं, फिर भी जब कुछ लोग उल्टे-सीधे प्रश्न करते हैं तो आपको कैसा लगता है ? उनके प्रश्न का उत्तर तो मैंने यथास्थान दे दिया पर लगा इस पर दूसरों के लिए भी अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने की जरूरत है।
समाज की पहली शर्त है कि आप किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए बहस करें न कि अपनी विद्वत्ता या भाषा का कमाल या विदग्धता के प्रदर्शन के लिए। Facebook को मैं बहुत महत्वपूर्ण मंच मांगता हूं । ऐसा मंच इससे पहले न था, न इसकी मैंने कल्पना की थी । किसी बड़ी से बड़ी गोष्ठी में सभी को अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिलता। समय की सीमा होती है। पाठक भी ऊबने के बाद भी फंसे रहते हैं।
Facebook के साथ इन दोनों में से कोई सीमा नहीं होती। किसी भी समय पर, किसी भी विषय पर, एक साथ कितने भी लोग अपने विचार प्रकट कर सकते हैं और इस बात की चिंता किए बिना प्रकट कर सकते हैं कि उनके पाठक उसे ग्रहण करते हैं या नहीं। यदि विचारों में कोई सार है, यह समस्या सार्थक है तो, कुछ लोग पसंद करने वाले मिल ही जाते हैं.। परंतु Facebook की एक सीमा यह है इसमें श्रोता नहीं होते, मित्रों की एक मंडली होती है जिनकी संख्या रूचि और रुझान के अनुसार बढ़ती जाती है और यदि किन्ही कारणों से Facebook मंच पर मान्यताओं के शिविर बन जाते हैं तो सहमति और असहमति के दायरे पहले से ही निर्धारित हो जाते हैं, विचार अपना सारतत्व खो देता हैऔर मत विभाजन की स्थिति आ जाती है ।
मुझे लगता है इसके कारण इतने महत्वपूर्ण और दुर्लभ मंच का भी हम सही उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। लोग लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए चुटकुले बाजियां, हल्की टिप्पणियां, अनुचित आरोप, सचेत रूप में तथ्यों की लीपापोती करते रहते हैं जिससे उनका भले मनोरंजन होता हो, पाठकों का बहुत समय व्यर्थ चला जाता है . यदि इसे राष्ट्रीय बौद्धिक ऊर्जा के सदुपयोग या दुरुपयोग के रूप में देखा जाए तो दुरुपयोग का पलड़ा भारी रहेगा।
मुझे Facebook उन विषयों को उठाने और उन पर कुछ कहने का अवसर मिला है जिन के विषय में मैं सोचता था अपने जीवनकाल में उनको उठा भी पाऊंगा या नहीं। इतिहास, भाषा, समाज, संस्कृति, धर्म से जुड़े हुए सवालों के विषय में मुझे असंतोष रहा है कि इनकी बुनियादी जानकारी तक उन लोगों के पास नहीं है जो इस के अधिकारी विद्वान होने का दावा करते हैं। रुचि की विविधता और मेरी अपनी अपेक्षा के अनुसार तैयारी का जो स्तर होना चाहिए उस पर अपने को पूरा न पा कर पाकर लगातार दुविधा की स्थिति बनी रही। परंतु यह विश्वास अधिकारी कहे जाने वाले लोगों से मेरी समझ अधिक अच्छी है, मैं बिना किसी आशंका और दुविधा के अपने मंतव्य, मेरी ज्ञान सीमा में आने वाली जानकारी और प्रमाण और औचित्य के साथ रखने का साहस फेसबुक के कारण ही जुटा सका हूं और अपेक्षा करता हूं कि मेरी कमियां दूसरों की आलोचना के द्वारा दूर हों, जिससे मेरी मान्यता भले गलत हो जाए पर उस विषय पर सामाजिक समझ अवश्य पहले से ही अधिक अच्छी होती चले।
इस बुनियादी समझ के कारण मुझे असहमतियों की प्रतीक्षा रहती है। यदि किसी ने किसी कमी की ओर ध्यान दिलाया या कोई ऐसा पहलू विचारार्थ प्रस्तुत किया जो मुझसे छूट गया था तो मैं उसका उपकार मानता हूं और इसे स्वीकार भी करता हूं। ।समय-समय पर मैं इसके लिए आग्रह करता हूं । इसके दो कारण हैं पहला यह कि मेरी सोच अपने समय के दूसरे सभी विद्वानों से अलग है और यह उन सभी विषयों में है जिनमें मैं कभी कभी हस्तक्षेप करता हूं।
अकेला आदमी अपने को कितना भी सही समझे कुछ चीजों को छोड़ ही जाता है । वह किन्हीं न किन्हीं अंतर्विरोधों का शिकार हो सकता है और इसका उसे आभास तक नहीं हो सकता। यदि मेरी चिंता अपने को सही सिद्ध करने की होती तो संभव है मुझे ऐसी आलोचनाओं से असुविधा अवश्य होती ।
कभी-कभी मैं विनोद में कहता हूं, मैं कभी पराजित नहीं हो सकता। मुझे पराजित करने की कोशिश करने वाले स्वयं पराजित हो जाते हैं। जिसे जीतना न हो वह पराजित कैसे हो सकता है। मैं उसकी सही बातों को सम्मान के साथ स्वीकार कर लेता हूं। अपने पहले के विचार को उसके अनुसार सुधार या बदल लेता हूं।इसमें यदि जीत जैसी कोई वस्तु है तो आलोचना करने वाले के साथ मेरी अपनी भी जीत होती है। यह कोई नई सोच नहीं है। इसे मैंने आज से 50 साल पहले बहुत स्पष्ट रूप में महाभिषग में लिखा थाः
“पराजित तुम कभी नहीं हुए अश्वघोष! बंधु, तुमने जीवन में सर्वत्र विजय ही पाई और जिसे तुम पराजय कह रहे हो वही तो तुम्हारी परम विजय है, मित्र। सत्य के सन्मुख, धर्म के सन्मुख, विनय के सम्मुख विजय से बड़ी पराजय और समर्पण से बड़ी विजय क्या होगी? जहां समर्पण ही परम विजय है वहां समर्पित होकर तुम पराजित कैसे हो सकते हो ?”
इसे मैंने मात्र एक कृति में दर्ज नहीं किया था अपितु अपितु अपने जीवन में उतारा था । यह मेरी अपनी जीवनदृष्टि है इसलिए मैं विरोधी विचारों को अनुद्विग्न भाव से सुनता और जहां वे सार्थक लगें उन्हें अपनाता रहा हूँ। अतः विरोध से मुझे कभी खिन्नता नहीं हो सकती।
परंतु राजनीतिक प्रश्नों पर प्रबुद्ध लोगों, यहां तक कि समाज का मार्गदर्शक होने का दम भरने वालों की भी दलगत राजनीति इतनी स्पष्ट है कि वे व्यावहारिक राजनीति करने वालों के स्तर पर उतर आते हैं। उनमें कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो केवल असमत नहीं होते, बौखला जाते हैं । कभी कभी अशिष्ट हो जाते हैं। उनका हस्तक्षेप अरुचिकर तो लगता है परंतु उत्साहवर्धक भी लगता है। इसका अर्थ है, हमारे विचारों और तर्कों का विरोधियों के पास कोई उत्तर नहीं है। उत्तेजना इसका प्रमाण है न कि मात्र गर्हित उक्ति। इससे जितना क्षोभ होता है उससे अधिक यह आश्वस्ति कर लगता है। गाली वैचारिक दृष्टि से कमजोर और पराजित लोगों का अंतिम ब्रह्मास्त्र है।
Post – 2018-03-31
संवाद, विवाद और विचार
एक मित्र ने यह पूछा, आप तो किसी भी समस्या पर निष्पक्ष होकर, पूरी गंभीरता से लिखते हैं, फिर भी जब कुछ लोग उल्टे-सीधे प्रश्न करते हैं तो आपको कैसा लगता है ? उनके प्रश्न का उत्तर तो मैंने यथास्थान दे दिया पर लगा इस पर दूसरों के लिए भी अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने की जरूरत है।
समाज की पहली शर्त है कि आप किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए बहस करें न कि अपनी विद्वत्ता या भाषा का कमाल या विदग्धता के प्रदर्शन के लिए। Facebook को मैं बहुत महत्वपूर्ण मंच मांगता हूं । ऐसा मंच इससे पहले न था, न इसकी मैंने कल्पना की थी । किसी बड़ी से बड़ी गोष्ठी में सभी को अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिलता। समय की सीमा होती है। पाठक भी ऊबने के बाद भी फंसे रहते हैं।
Facebook के साथ इन दोनों में से कोई सीमा नहीं होती। किसी भी समय पर, किसी भी विषय पर, एक साथ कितने भी लोग अपने विचार प्रकट कर सकते हैं और इस बात की चिंता किए बिना प्रकट कर सकते हैं कि उनके पाठक उसे ग्रहण करते हैं या नहीं। यदि विचारों में कोई सार है, यह समस्या सार्थक है तो, कुछ लोग पसंद करने वाले मिल ही जाते हैं.। परंतु Facebook की एक सीमा यह है इसमें श्रोता नहीं होते, मित्रों की एक मंडली होती है जिनकी संख्या रूचि और रुझान के अनुसार बढ़ती जाती है और यदि किन्ही कारणों से Facebook मंच पर मान्यताओं के शिविर बन जाते हैं तो सहमति और असहमति के दायरे पहले से ही निर्धारित हो जाते हैं, विचार अपना सारतत्व खो देता हैऔर मत विभाजन की स्थिति आ जाती है ।
मुझे लगता है इसके कारण इतने महत्वपूर्ण और दुर्लभ मंच का भी हम सही उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। लोग लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए चुटकुले बाजियां, हल्की टिप्पणियां, अनुचित आरोप, सचेत रूप में तथ्यों की लीपापोती करते रहते हैं जिससे उनका भले मनोरंजन होता हो, पाठकों का बहुत समय व्यर्थ चला जाता है . यदि इसे राष्ट्रीय बौद्धिक ऊर्जा के सदुपयोग या दुरुपयोग के रूप में देखा जाए तो दुरुपयोग का पलड़ा भारी रहेगा।
मुझे Facebook उन विषयों को उठाने और उन पर कुछ कहने का अवसर मिला है जिन के विषय में मैं सोचता था अपने जीवनकाल में उनको उठा भी पाऊंगा या नहीं। इतिहास, भाषा, समाज, संस्कृति, धर्म से जुड़े हुए सवालों के विषय में मुझे असंतोष रहा है कि इनकी बुनियादी जानकारी तक उन लोगों के पास नहीं है जो इस के अधिकारी विद्वान होने का दावा करते हैं। रुचि की विविधता और मेरी अपनी अपेक्षा के अनुसार तैयारी का जो स्तर होना चाहिए उस पर अपने को पूरा न पा कर पाकर लगातार दुविधा की स्थिति बनी रही। परंतु यह विश्वास अधिकारी कहे जाने वाले लोगों से मेरी समझ अधिक अच्छी है, मैं बिना किसी आशंका और दुविधा के अपने मंतव्य, मेरी ज्ञान सीमा में आने वाली जानकारी और प्रमाण और औचित्य के साथ रखने का साहस फेसबुक के कारण ही जुटा सका हूं और अपेक्षा करता हूं कि मेरी कमियां दूसरों की आलोचना के द्वारा दूर हों, जिससे मेरी मान्यता भले गलत हो जाए पर उस विषय पर सामाजिक समझ अवश्य पहले से ही अधिक अच्छी होती चले।
इस बुनियादी समझ के कारण मुझे असहमतियों की प्रतीक्षा रहती है। यदि किसी ने किसी कमी की ओर ध्यान दिलाया या कोई ऐसा पहलू विचारार्थ प्रस्तुत किया जो मुझसे छूट गया था तो मैं उसका उपकार मानता हूं और इसे स्वीकार भी करता हूं। ।समय-समय पर मैं इसके लिए आग्रह करता हूं । इसके दो कारण हैं पहला यह कि मेरी सोच अपने समय के दूसरे सभी विद्वानों से अलग है और यह उन सभी विषयों में है जिनमें मैं कभी कभी हस्तक्षेप करता हूं।
अकेला आदमी अपने को कितना भी सही समझे कुछ चीजों को छोड़ ही जाता है । वह किन्हीं न किन्हीं अंतर्विरोधों का शिकार हो सकता है और इसका उसे आभास तक नहीं हो सकता। यदि मेरी चिंता अपने को सही सिद्ध करने की होती तो संभव है मुझे ऐसी आलोचनाओं से असुविधा अवश्य होती ।
कभी-कभी मैं विनोद में कहता हूं, मैं कभी पराजित नहीं हो सकता। मुझे पराजित करने की कोशिश करने वाले स्वयं पराजित हो जाते हैं। जिसे जीतना न हो वह पराजित कैसे हो सकता है। मैं उसकी सही बातों को सम्मान के साथ स्वीकार कर लेता हूं। अपने पहले के विचार को उसके अनुसार सुधार या बदल लेता हूं।इसमें यदि जीत जैसी कोई वस्तु है तो आलोचना करने वाले के साथ मेरी अपनी भी जीत होती है। यह कोई नई सोच नहीं है। इसे मैंने आज से 50 साल पहले बहुत स्पष्ट रूप में महाभिषग में लिखा थाः
“पराजित तुम कभी नहीं हुए अश्वघोष! बंधु, तुमने जीवन में सर्वत्र विजय ही पाई और जिसे तुम पराजय कह रहे हो वही तो तुम्हारी परम विजय है, मित्र। सत्य के सन्मुख, धर्म के सन्मुख, विनय के सम्मुख विजय से बड़ी पराजय और समर्पण से बड़ी विजय क्या होगी? जहां समर्पण ही परम विजय है वहां समर्पित होकर तुम पराजित कैसे हो सकते हो ?”
इसे मैंने मात्र एक कृति में दर्ज नहीं किया था अपितु अपितु अपने जीवन में उतारा था । यह मेरी अपनी जीवनदृष्टि है इसलिए मैं विरोधी विचारों को अनुद्विग्न भाव से सुनता और जहां वे सार्थक लगें उन्हें अपनाता रहा हूँ। अतः विरोध से मुझे कभी खिन्नता नहीं हो सकती।
परंतु राजनीतिक प्रश्नों पर प्रबुद्ध लोगों, यहां तक कि समाज का मार्गदर्शक होने का दम भरने वालों की भी दलगत राजनीति इतनी स्पष्ट है कि वे व्यावहारिक राजनीति करने वालों के स्तर पर उतर आते हैं। उनमें कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो केवल असमत नहीं होते, बौखला जाते हैं । कभी कभी अशिष्ट हो जाते हैं। उनका हस्तक्षेप अरुचिकर तो लगता है परंतु उत्साहवर्धक भी लगता है। इसका अर्थ है, हमारे विचारों और तर्कों का विरोधियों के पास कोई उत्तर नहीं है। उत्तेजना इसका प्रमाण है न कि मात्र गर्हित उक्ति। इससे जितना क्षोभ होता है उससे अधिक यह आश्वस्ति कर लगता है। गाली वैचारिक दृष्टि से कमजोर और पराजित लोगों का अंतिम ब्रह्मास्त्र है।
Post – 2018-03-30
जल की पवित्रता और मलिनता
आज जब विज्ञान के सामी मजहबों से टकराव के बाद विज्ञान ने यह घोषित कर दिया कि ईश्वर नहीं है या उसके साहित्य प्रेमियों ने अपने शब्दों में कहा कि ईश्वर मर चुका है, तब भी हिंदुओं के ईश्वर पर कोई आंच नहीं आई, क्योंकि इन्होंने बहुत पहले से यह तय कर रखा था परम सत्ता इंद्रियातीत है, ज्ञानातीत है। विज्ञान ने उसे ध्यानातीत तो माना नहीं। योग की सिद्धियों की तरह की तरह ब्रह्म की भारतीय अवधारणा तक विज्ञान की पहुंच न हो सकती थी ना हो पाई और नहीं वह उसका खंडन कर सकता है जो भारतीय तत्व चिंतक बहुत प्राचीन काल से कहते और मानते आए हैं।
अपने अनुभव के आधार पर मैं ईश्वर में विश्वास करता हूं परंतु मानता हूं ब्रह्म और माया के द्वन्द्व मैं ब्रह्मा माया के सम्मुख लगभग असहाय अनुभव करता है, भूत और चित के बीच भूत ही प्रधान है और चित उसके वशीभूत।
मेरा भौतिकवाद चित के निषेध पर नहीं, भूत के प्राधान्य पर आधारित है। यह मेरा निजी विचार है और न तो किसी अन्य के प्रमाण पर आधारित है, न ही मैं दूसरों को इसका कायल बनाना चाहता हूं। इसीलिए मैंने एक बार विनोद में कहा था की पश्चिम में ईश्वर की मौत हो भी जाए तो भारत में उसकी मौत नहीं हो सकती क्योंकि यहां ब्रह्मांड में जो कुछ है उसी को को ब्रह्म मान लिया जाता है. इसीलिए अलग और दूर बैठी किसी सत्ता की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। या पड़ती है ऐसी सत्ता से जिसे विज्ञान भी नकार नहीं सकता, जैसे जल। आपो वै सः। जो हुआ और होने वाला है सब वही है, पुरुष एव इदं सर्वं यत् भूतं यत च भव्यम्। ऐसे ब्रह्म का अंत तो सृष्टि के अंत के साथ ही हो सकता है और उसके बाद भी वह जब शून्य में संकुचित हो जाएगी, शून्य भी तब तक ब्रह्म बना रहेगा जब तक अगली सृष्टि आरंभ नहीं हो जाती ।
परंतु यहां यह तत्ववादी मीमांसा इसलिए ध्यान में आ गई कि भाषा की उत्पत्ति पर विचार करते हुए मुझे लगा मनुष्य महाप्रकृति के समक्ष इतना लाचार प्रतीत होता है है कि अपनी भावनाओं क्रियाओं और भौतिक उपादानों के लिए सही और अर्थ विच्छेदक शब्दों का निर्माण तक नहीं कर सका। भले नादजगत प्रकृति का था, परंतु उसमें से चुनाव तो मनुष्य को ही करना था। नहीं कर सका।
यदि उसका वश चलता है तो उसने कम से कम नितांत प्रिय और अप्रिय, पवित्र और अपवित्र, मित्र और शत्रु, परस्पर विरोधी गुणों और क्रियाओं के लिए एक ही संज्ञा का चुनाव न किया होता। भाषा का आविष्कार संकेत प्रणाली की सीमाओं के कारण निश्चित अर्थ संचार करने के लिए गया था। यदि कथन का सही अर्थ ही पता ही न चले, उसका उल्टा अर्थ भी लगाया जा सके, तो वह अपनी भूमिका का निर्वाह नहीं कर पाती। अब इसी संदर्भ में शब्दों की पड़ताल करेंगे यथासंभव का समाधान करने का भी प्रयत्न करेंगे।
इन शब्दों पर ध्यान देंः पा = जल, पी =जल, पान कर, पेय = जल, पीतु= जल, और दूसरी ओर पित्त, एक ओर पुरीष जिसका अर्थ मल होता है और दूसरी तरफ पुरीषिणी – सुजला। पय = जल, पूय= पीब, मवाद, पू= जल, पुड़ि – सुराही, मशक, पुट = पानी, पानी का छींटा, पुटक = कमल, पुटिया = छोटी मछली, पुटकी= मोटरी, पुण्य – जल पिला कर प्यासे को तृप्त करना, लोकहित, पुत> पूत>पुत्त> पुत्र = संतान, पुताई = लिपाई, पुत्ती – कंद से फूटने वाला अंकुर ,
(निरन्तर व्यवधान के कारण अपूर्ण)
Post – 2018-03-30
जल की पवित्रता और मलिनता
आज जब विज्ञान के सामी मजहबों से टकराव के बाद विज्ञान ने यह घोषित कर दिया कि ईश्वर नहीं है या उसके साहित्य प्रेमियों ने अपने शब्दों में कहा कि ईश्वर मर चुका है, तब भी हिंदुओं के ईश्वर पर कोई आंच नहीं आई, क्योंकि इन्होंने बहुत पहले से यह तय कर रखा था परम सत्ता इंद्रियातीत है, ज्ञानातीत है। विज्ञान ने उसे ध्यानातीत तो माना नहीं। योग की सिद्धियों की तरह की तरह ब्रह्म की भारतीय अवधारणा तक विज्ञान की पहुंच न हो सकती थी ना हो पाई और नहीं वह उसका खंडन कर सकता है जो भारतीय तत्व चिंतक बहुत प्राचीन काल से कहते और मानते आए हैं।
अपने अनुभव के आधार पर मैं ईश्वर में विश्वास करता हूं परंतु मानता हूं ब्रह्म और माया के द्वन्द्व मैं ब्रह्मा माया के सम्मुख लगभग असहाय अनुभव करता है, भूत और चित के बीच भूत ही प्रधान है और चित उसके वशीभूत।
मेरा भौतिकवाद चित के निषेध पर नहीं, भूत के प्राधान्य पर आधारित है। यह मेरा निजी विचार है और न तो किसी अन्य के प्रमाण पर आधारित है, न ही मैं दूसरों को इसका कायल बनाना चाहता हूं। इसीलिए मैंने एक बार विनोद में कहा था की पश्चिम में ईश्वर की मौत हो भी जाए तो भारत में उसकी मौत नहीं हो सकती क्योंकि यहां ब्रह्मांड में जो कुछ है उसी को को ब्रह्म मान लिया जाता है. इसीलिए अलग और दूर बैठी किसी सत्ता की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। या पड़ती है ऐसी सत्ता से जिसे विज्ञान भी नकार नहीं सकता, जैसे जल। आपो वै सः। जो हुआ और होने वाला है सब वही है, पुरुष एव इदं सर्वं यत् भूतं यत च भव्यम्। ऐसे ब्रह्म का अंत तो सृष्टि के अंत के साथ ही हो सकता है और उसके बाद भी वह जब शून्य में संकुचित हो जाएगी, शून्य भी तब तक ब्रह्म बना रहेगा जब तक अगली सृष्टि आरंभ नहीं हो जाती ।
परंतु यहां यह तत्ववादी मीमांसा इसलिए ध्यान में आ गई कि भाषा की उत्पत्ति पर विचार करते हुए मुझे लगा मनुष्य महाप्रकृति के समक्ष इतना लाचार प्रतीत होता है है कि अपनी भावनाओं क्रियाओं और भौतिक उपादानों के लिए सही और अर्थ विच्छेदक शब्दों का निर्माण तक नहीं कर सका। भले नादजगत प्रकृति का था, परंतु उसमें से चुनाव तो मनुष्य को ही करना था। नहीं कर सका।
यदि उसका वश चलता है तो उसने कम से कम नितांत प्रिय और अप्रिय, पवित्र और अपवित्र, मित्र और शत्रु, परस्पर विरोधी गुणों और क्रियाओं के लिए एक ही संज्ञा का चुनाव न किया होता। भाषा का आविष्कार संकेत प्रणाली की सीमाओं के कारण निश्चित अर्थ संचार करने के लिए गया था। यदि कथन का सही अर्थ ही पता ही न चले, उसका उल्टा अर्थ भी लगाया जा सके, तो वह अपनी भूमिका का निर्वाह नहीं कर पाती। अब इसी संदर्भ में शब्दों की पड़ताल करेंगे यथासंभव का समाधान करने का भी प्रयत्न करेंगे।
इन शब्दों पर ध्यान देंः पा = जल, पी =जल, पान कर, पेय = जल, पीतु= जल, और दूसरी ओर पित्त, एक ओर पुरीष जिसका अर्थ मल होता है और दूसरी तरफ पुरीषिणी – सुजला। पय = जल, पूय= पीब, मवाद, पू= जल, पुड़ि – सुराही, मशक, पुट = पानी, पानी का छींटा, पुटक = कमल, पुटिया = छोटी मछली, पुटकी= मोटरी, पुण्य – जल पिला कर प्यासे को तृप्त करना, लोकहित, पुत> पूत>पुत्त> पुत्र = संतान, पुताई = लिपाई, पुत्ती – कंद से फूटने वाला अंकुर ,
(निरन्तर व्यवधान के कारण अपूर्ण)