Post – 2018-03-18

हमारी भाषा (6)
डर से डार्क डार्क से डर

हमारी भाषा बहुत जटिल और बहुआयामी है। इसकी निर्माण प्रक्रिया में विभिन्न रुचियों योग्यताओं और मानसिकताओं के लोगों का हाथ रहा है। लोक-व्यवहार गंगा का ऐसा प्रवाह है जिसमें आकर सब की मलिनताएं समाप्त हो जाती हैं। डरपोक शब्द का अगर दृश्य तैयार करें तो आपको डर से भागते हुए और इसी के साथ गोबर-विसर्जन करते हुए जानवर का चित्र उभरेगा। प्रयोग हमारी सुरुचि के अनुरूप नहीं है, परंतु निरन्तर प्रयोग में आते रहने के कारण हमारा ध्यान इस विद्रूप की ओर नहीं जाता, इसका भावसत्य और उसका तेवर संप्रेषित होता है। यही हाल उन गालियों और हमें क्षुब्ध करने वाले न प्रयोगों का है जो अपनी उजड्डता को ही अपने खरेपन का प्रमाण मानते हैं। हम जिसे अश्लील समझते हैं वह उनके परिवेश में कथन को जोरदार बनाने के लिए प्रयुक्त अलंकार होता है। अंगों गर उस परिवेश के लोगों का ध्यान नहीं जाता। ये सामाजिक स्तरभेद से जुड़ा पहलू है, पर सबसे चकित करने वाला है ध्वनि और अर्थ का परिसर।

डर शब्द तर और दर से अलग शब्द न था। तर, दर, डर, अघोषप्रेमी, घोषप्रेमी, मूर्धन्य प्रेमी समुदायों द्वारा एक ही प्राकृत ध्वनि के वाचिक उच्चार थे जिनका प्राथमिक अर्थ पानी ही रहा होगा। यही लकारान्त रूपों के विषय में कही जा सकती है। पारस्परिक संपर्क में आने और चेतना में निखार और अनुभव संसार के विस्तार के चलते इनका अर्थ विस्तार हुआ ।

पानी की संज्ञा भय के आशय में प्रयुक्त हो सकती है यह समझने में है हमें कठिनाई होती है। परंतु तड़पने का पानी से संबंध हो सकता है इसे समझने में कठिनाई नहीं होती। पानी के बिना छटपटाती हुई मछलियों का दृश्य बिंब बनता है जब हम तड़पना शब्द का प्रयोग करते हैं तो। दर से दर्द का संबंध है यह भी आसानी से हमारे गले नहीं उतरता। इसका अर्थ विकास और भी टेढ़ा है। तर से तरु, दर से दारु का संबंध सीधा है, पर दारु के कटने,चीरने के साथ उत्पन्न ध्वनि दारण, दरकने और दर्द का जनक है ।

तर जब संस्कृतीकरण के कारण तृ हो जाता है तो पानी के अभाव या तलब के लिए हम तृषा शब्द का प्रयोग करते हैं और यही जब किसी वस्तु की आकांक्षा में बदल जाती है तो उसे तृष्णा कहते हैं । तृषा न मिटे तो इसकी उग्रता त्रास में बदल जाती है, और अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचकर संत्रास बन जाती है ।
क्या आपने कभी त्राहि शब्द पर ध्यान दिया है। त्राहि का शाब्दिक अर्थ है पानी पिलाओ। यह युद्ध स्थल में मरणाासन्न व्यक्ति की कातर पुकार है, इसका भाव है कि पानी पिलाकर मेरे प्राणों की रक्षा करो और यह रक्षा करो के आशय में रूढ़ हो गया। और त्राण-रक्षा, त्राता- उद्धारक के व्यापक अर्थ में प्रयोग मेंआने लगा । यह पानी से बचाने वाला भी हो सकता है और पाप से बचाने वाला भी हो सकता है और आर्थिक दुर वस्था से बचाने वाला भी हो सकता है ।

रक्षा के आशय में एक दूसरा शब्द प्रयोग में आता है पाहि। इसमें भी पा का अर्थ पानी है और पाहि का अर्थ है पिलाओ। पाहि मां का अर्थ (पानी पिलाकर) प्राण रक्षा करो। यह शब्द इन बातों से अलग इतिहास की सच्चाई को भी प्रकट करते हैं हमारी भाषा का विकास भौगोलिक परिवेश में हुआ।
तृषा अंग्रेजी में थर्स्ट बन जाती है, और त्रास का टेरर से संबंध हो सकता है। अंग्रेजी कोशों में व्युत्पत्ति के नाम पर दिेए गए शब्दविशेष के प्रतिरूपों से इसका निर्ण करना कठिन है और मेरी अपनी सीमाओं और साधनों के अभाव के कारण निश्चयात्मक रूप में कोई दावा करना उचित न होगा।

पानी से इसका कोई संबंध यूरोपीय पंडितों को सुझाने पर भी दिखाई न देगा।
अंग्रेजी के माध्यम से डर-ड्र-अं. ड्राई और ड्रिंक से डर का पानी से नाता भले पता चल जाय, भारतीय बोलियों में भय के आशय में इसके रूढ़ हो जाने के कारण, यह तक भुला दिया गया कि जल से इसका कभी कोई नाता रहा है। मेरी समझ से अं. के डार्क, और हिन्दी डर की संकल्पना के विकास में संभवत है पानी में डूबने का हाथ रहा है। पानी से डर सभी को लगता है ओर पानी से प्रेम भी सभी को होता है, प्रश्न जल के वेग, प्रसार और गहराई का है। डूबने के बाद लुप्त वस्तु अदृश्य हो जाती है और लोप के भाव ने ही शायद अंग्रेजी के डार्क को जन्म दिया हो। इसी डार्क या डबने से डर का भी संबंध है।

Post – 2018-03-18

हमारी भाषा (6)
डर से डार्क डार्क से डर

हमारी भाषा बहुत जटिल और बहुआयामी है। इसकी निर्माण प्रक्रिया में विभिन्न रुचियों योग्यताओं और मानसिकताओं के लोगों का हाथ रहा है। लोक-व्यवहार गंगा का ऐसा प्रवाह है जिसमें आकर सब की मलिनताएं समाप्त हो जाती हैं। डरपोक शब्द का अगर दृश्य तैयार करें तो आपको डर से भागते हुए और इसी के साथ गोबर-विसर्जन करते हुए जानवर का चित्र उभरेगा। प्रयोग हमारी सुरुचि के अनुरूप नहीं है, परंतु निरन्तर प्रयोग में आते रहने के कारण हमारा ध्यान इस विद्रूप की ओर नहीं जाता, इसका भावसत्य और उसका तेवर संप्रेषित होता है। यही हाल उन गालियों और हमें क्षुब्ध करने वाले न प्रयोगों का है जो अपनी उजड्डता को ही अपने खरेपन का प्रमाण मानते हैं। हम जिसे अश्लील समझते हैं वह उनके परिवेश में कथन को जोरदार बनाने के लिए प्रयुक्त अलंकार होता है। अंगों गर उस परिवेश के लोगों का ध्यान नहीं जाता। ये सामाजिक स्तरभेद से जुड़ा पहलू है, पर सबसे चकित करने वाला है ध्वनि और अर्थ का परिसर।

डर शब्द तर और दर से अलग शब्द न था। तर, दर, डर, अघोषप्रेमी, घोषप्रेमी, मूर्धन्य प्रेमी समुदायों द्वारा एक ही प्राकृत ध्वनि के वाचिक उच्चार थे जिनका प्राथमिक अर्थ पानी ही रहा होगा। यही लकारान्त रूपों के विषय में कही जा सकती है। पारस्परिक संपर्क में आने और चेतना में निखार और अनुभव संसार के विस्तार के चलते इनका अर्थ विस्तार हुआ ।

पानी की संज्ञा भय के आशय में प्रयुक्त हो सकती है यह समझने में है हमें कठिनाई होती है। परंतु तड़पने का पानी से संबंध हो सकता है इसे समझने में कठिनाई नहीं होती। पानी के बिना छटपटाती हुई मछलियों का दृश्य बिंब बनता है जब हम तड़पना शब्द का प्रयोग करते हैं तो। दर से दर्द का संबंध है यह भी आसानी से हमारे गले नहीं उतरता। इसका अर्थ विकास और भी टेढ़ा है। तर से तरु, दर से दारु का संबंध सीधा है, पर दारु के कटने,चीरने के साथ उत्पन्न ध्वनि दारण, दरकने और दर्द का जनक है ।

तर जब संस्कृतीकरण के कारण तृ हो जाता है तो पानी के अभाव या तलब के लिए हम तृषा शब्द का प्रयोग करते हैं और यही जब किसी वस्तु की आकांक्षा में बदल जाती है तो उसे तृष्णा कहते हैं । तृषा न मिटे तो इसकी उग्रता त्रास में बदल जाती है, और अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचकर संत्रास बन जाती है ।
क्या आपने कभी त्राहि शब्द पर ध्यान दिया है। त्राहि का शाब्दिक अर्थ है पानी पिलाओ। यह युद्ध स्थल में मरणाासन्न व्यक्ति की कातर पुकार है, इसका भाव है कि पानी पिलाकर मेरे प्राणों की रक्षा करो और यह रक्षा करो के आशय में रूढ़ हो गया। और त्राण-रक्षा, त्राता- उद्धारक के व्यापक अर्थ में प्रयोग मेंआने लगा । यह पानी से बचाने वाला भी हो सकता है और पाप से बचाने वाला भी हो सकता है और आर्थिक दुर वस्था से बचाने वाला भी हो सकता है ।

रक्षा के आशय में एक दूसरा शब्द प्रयोग में आता है पाहि। इसमें भी पा का अर्थ पानी है और पाहि का अर्थ है पिलाओ। पाहि मां का अर्थ (पानी पिलाकर) प्राण रक्षा करो। यह शब्द इन बातों से अलग इतिहास की सच्चाई को भी प्रकट करते हैं हमारी भाषा का विकास भौगोलिक परिवेश में हुआ।
तृषा अंग्रेजी में थर्स्ट बन जाती है, और त्रास का टेरर से संबंध हो सकता है। अंग्रेजी कोशों में व्युत्पत्ति के नाम पर दिेए गए शब्दविशेष के प्रतिरूपों से इसका निर्ण करना कठिन है और मेरी अपनी सीमाओं और साधनों के अभाव के कारण निश्चयात्मक रूप में कोई दावा करना उचित न होगा।

पानी से इसका कोई संबंध यूरोपीय पंडितों को सुझाने पर भी दिखाई न देगा।
अंग्रेजी के माध्यम से डर-ड्र-अं. ड्राई और ड्रिंक से डर का पानी से नाता भले पता चल जाय, भारतीय बोलियों में भय के आशय में इसके रूढ़ हो जाने के कारण, यह तक भुला दिया गया कि जल से इसका कभी कोई नाता रहा है। मेरी समझ से अं. के डार्क, और हिन्दी डर की संकल्पना के विकास में संभवत है पानी में डूबने का हाथ रहा है। पानी से डर सभी को लगता है ओर पानी से प्रेम भी सभी को होता है, प्रश्न जल के वेग, प्रसार और गहराई का है। डूबने के बाद लुप्त वस्तु अदृश्य हो जाती है और लोप के भाव ने ही शायद अंग्रेजी के डार्क को जन्म दिया हो। इसी डार्क या डबने से डर का भी संबंध है।

Post – 2018-03-17

हमारी भाषा (५)
तर से तर्पण

हमारे पास आज की व्यस्तता में रात को चांद और तारों तक को देखने का समय नहीं रह गया है। यान्त्रिक सुविधाओं के साथ हमारी अनेक नैसर्गिक वृत्तियाँ या तो नष्ष्ट हुई हैं, या इतनी मन्द पड़ चुकी हैं कि उन्हें सक्रिय करने के लिए शिक्षण और अभ्यास की जरूरत पड़ती है। हमारा अनुभव संसार सिकुड़ा है और अपनी पेशियों और दिमाग पर पड़ने वाले जोर को यन्त्रों को सौंप कर हम शारीरिक और मानसिक रूप में कमजोर होते जा रहे हैं। गाड़ी पर दौड़ने वाले को चलने में दिक्कत नहीं भी हो तो भी आलस्य लगने लगा है, और दौड़ने मे वह अक्षम हो गया है, गणनायंत्र की मदद लेने वाला मामूली जोड़ भाग तक नहीं कर पाता, और कंप्यूटर पर लिखने वाले को लिखना बोझ लगता है, और लिखावट बच्चों या नाममात्र के साक्षरों जैसी होती है। यन्त्रों के विकास क्रम में लंबे समय से चले आरहे अदृश्य पर निरन्तर ह्रास को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि आज से हजारों साल पहले के हमारे पूर्वज हमसे जानते बहुत कम थे, परन्तु मानसिक और शारीरिक रूप में हमसे बहुत सबल थे। उनके पास अपने अनुभव जगत को एकाग्र मन से निहारने का अकूत समय था, और प्रकृति दृश्यों को निहारने और सूक्ष्म से सूक्ष्म श्रव्य ध्वनियों को सुनने की अकल्पनीय क्षमता थी। वे सचमुच ऋषि थे, क्रान्तद्रष्टा थे और अपनी इन्हीं क्षमताओं के बल पर उन्होंने सभ्यता की आधारशिला रखी थी।

इस पृष्ठभूमि में ही हम भाषा के आरंभिक चरणों के विकास को समझ सकते हैं।

आपने किसी पत्ती पर पड़ी हुई एक पानी या ओस की बूंद को ढलते हुए या पसीने की बूंद को धीरे-धीरे नीचे खिसकते हुए देखा हो और उस पर ध्यान दिया हो तो आपको लगेगा कि उससे तर या टर जैसी आवाज आ रही है यह ध्वनि डर, ढर, टल, डल, ढल के रुप में भी सुनी जा सकती है । इनमें से किसी रूप में सुनना इस बात पर निर्भर करता है कि आप की भाषा में मूर्धन्य उच्चारण होता है या दंत्य। टल,ल डल, ढल के रूप में सुनना तो उस अवस्था की बात है जब वह भाषा में मूर्धन्य और दंत्य दोनों ध्वनियों का समावेश हो चुका हो जिसका अर्थ है दोनों भाषाभाषी समुदाय एक दूसरे में रच पच गए हों। परंतु हाहाकार भरी ध्वनियों के युग में जीते हुए यह कल्पना नहीं कर सकते कि एक बूंद के स्थान बदलने को बदलने से जो ध्वनि पैदा होती है उसे मनुष्य के कानों से सुना भी जा सकता है। इसके लिए जिस नीरवता की जरूरत है, उसे हमने खो दिया है । परंतु जब हम तर तर पसीना चूने की बात करते हैं तब पहला अर्थ उस ध्वनि का अनुकार होता है और सुनने की क्रिया जाहिर है केवल कल्पित ही की जा सकती है। पर जब पसीने से तर-ब-तर होने की बात करते हैं तब उसकी याद दिलाने पर भी विश्वास न होगा कि इसमें प्रयुक्त तर का किसी ध्वनि से संबंध है, यद्यपि यह स्वत: स्पष्ट हो जाएगा कि तर का अर्थ पानी है। सच यह है कि इन सभी वैकल्पिक रूपों का एक अर्थ पानी है, दूसरा कोई भी द्रव और तीसरा नीचे की ओर का बहाव, सिवाय टर, टल, डर के। इनमें पहले दो का आशय हटना हो गया, और डर जिससे अंग्रेजी के ड्रा का नाता हो सकता है, भारतीय बोलियों में पानी के अभाव और फिर भय को लिए कबसे और कैसे प्रयोग में आने लगा यह तय करना कठिन है। लीजिए, टर और डर के बीच मे आने वाले ठर की ओर तो हमारा ध्यान ही नहीं गया जो पानी के आशय में तो कभी प्रयोग में नहीं आया लगता पर ठरक = चाहत और क्रिया रूप ठरना = पाले की ठंढ।

इस क्रम को समझे बिना हम न तो ताल=जलाशय का अर्थ समझ सकते है, न तल, तले, तलवे, तालु का न ढालना, ढलवां, ढलान और ढीला का, तरना, तारना का आशय समझ में आ भी जाय, यह समझने में कठिनाई होगी कि तलना भी जल/द्रव के इसी समूह का है।

तर का अर्थ जल तो तर्पण का अर्थ पानी पिलाना, सींचना और जलवायु में पानी की आवश्यकता सर्वाधिक हो उस के अभाव में मनुष्य मर भी सकता हूं तो श्रद्धा प्रकट करने के लिए भी पानी पिलाने का अर्थात तर्पण का प्रयोग हो सकता है। वनस्पतियों और पेड़ों का नाम भी जल से ही उत्पन्न हो सकता था, क्योंकि जल आर्द्रता को और ऐसे पदार्थों को भी अपनी परिधि में समेट लेता है । इनसे स्वत: कोई ध्वनि पैदा होती नहीं इसलिए तरु (ट्री) को अपनी यह संज्ञा जल से मिली ।

समस्या वहां खड़ी होगी जब आप यह तय करने लगे की तरी को अपनी संज्ञा इसलिए मिली कि यह तरु से बनी है या इसलिए यह जलधारा को पार कराती है। कहा यह जा सकता है कि नौका वृक्ष से नहीं बनती दारु से बनती है, जिसका प्रयोग देवदारु के एक मात्र विकल्प को छोड़कर काठ के लिए होता है। पर फारसी का दरख्त का दारु से अभेद है ही। तरी का अर्थ तरु निर्मित नहीं है पर दर्वी = काठ की बड़ी कलछी और दर्विका = छोटी कलछी से अवश्य है। तैरना, तरंग, तरसना- पानी की चाह, किसी दुर्लब वस्तु की उत्कट कामना में तर का भूमिका सहज ग्राह्य है।

जल की गतिशीलता के कारण जलवाची शब्दों का ही प्रयोग गति, चलन और रास्ते के लिए भी हुआ है, इसलिए तर से तार की उत्पत्ति हुई हो सकती है। फारसी तरह, तर्ज, तरीका तर
से निकले हो सकते हैं।

Post – 2018-03-17

हमारी भाषा (५)
तर से तर्पण

हमारे पास आज की व्यस्तता में रात को चांद और तारों तक को देखने का समय नहीं रह गया है। यान्त्रिक सुविधाओं के साथ हमारी अनेक नैसर्गिक वृत्तियाँ या तो नष्ष्ट हुई हैं, या इतनी मन्द पड़ चुकी हैं कि उन्हें सक्रिय करने के लिए शिक्षण और अभ्यास की जरूरत पड़ती है। हमारा अनुभव संसार सिकुड़ा है और अपनी पेशियों और दिमाग पर पड़ने वाले जोर को यन्त्रों को सौंप कर हम शारीरिक और मानसिक रूप में कमजोर होते जा रहे हैं। गाड़ी पर दौड़ने वाले को चलने में दिक्कत नहीं भी हो तो भी आलस्य लगने लगा है, और दौड़ने मे वह अक्षम हो गया है, गणनायंत्र की मदद लेने वाला मामूली जोड़ भाग तक नहीं कर पाता, और कंप्यूटर पर लिखने वाले को लिखना बोझ लगता है, और लिखावट बच्चों या नाममात्र के साक्षरों जैसी होती है। यन्त्रों के विकास क्रम में लंबे समय से चले आरहे अदृश्य पर निरन्तर ह्रास को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि आज से हजारों साल पहले के हमारे पूर्वज हमसे जानते बहुत कम थे, परन्तु मानसिक और शारीरिक रूप में हमसे बहुत सबल थे। उनके पास अपने अनुभव जगत को एकाग्र मन से निहारने का अकूत समय था, और प्रकृति दृश्यों को निहारने और सूक्ष्म से सूक्ष्म श्रव्य ध्वनियों को सुनने की अकल्पनीय क्षमता थी। वे सचमुच ऋषि थे, क्रान्तद्रष्टा थे और अपनी इन्हीं क्षमताओं के बल पर उन्होंने सभ्यता की आधारशिला रखी थी।

इस पृष्ठभूमि में ही हम भाषा के आरंभिक चरणों के विकास को समझ सकते हैं।

आपने किसी पत्ती पर पड़ी हुई एक पानी या ओस की बूंद को ढलते हुए या पसीने की बूंद को धीरे-धीरे नीचे खिसकते हुए देखा हो और उस पर ध्यान दिया हो तो आपको लगेगा कि उससे तर या टर जैसी आवाज आ रही है यह ध्वनि डर, ढर, टल, डल, ढल के रुप में भी सुनी जा सकती है । इनमें से किसी रूप में सुनना इस बात पर निर्भर करता है कि आप की भाषा में मूर्धन्य उच्चारण होता है या दंत्य। टल,ल डल, ढल के रूप में सुनना तो उस अवस्था की बात है जब वह भाषा में मूर्धन्य और दंत्य दोनों ध्वनियों का समावेश हो चुका हो जिसका अर्थ है दोनों भाषाभाषी समुदाय एक दूसरे में रच पच गए हों। परंतु हाहाकार भरी ध्वनियों के युग में जीते हुए यह कल्पना नहीं कर सकते कि एक बूंद के स्थान बदलने को बदलने से जो ध्वनि पैदा होती है उसे मनुष्य के कानों से सुना भी जा सकता है। इसके लिए जिस नीरवता की जरूरत है, उसे हमने खो दिया है । परंतु जब हम तर तर पसीना चूने की बात करते हैं तब पहला अर्थ उस ध्वनि का अनुकार होता है और सुनने की क्रिया जाहिर है केवल कल्पित ही की जा सकती है। पर जब पसीने से तर-ब-तर होने की बात करते हैं तब उसकी याद दिलाने पर भी विश्वास न होगा कि इसमें प्रयुक्त तर का किसी ध्वनि से संबंध है, यद्यपि यह स्वत: स्पष्ट हो जाएगा कि तर का अर्थ पानी है। सच यह है कि इन सभी वैकल्पिक रूपों का एक अर्थ पानी है, दूसरा कोई भी द्रव और तीसरा नीचे की ओर का बहाव, सिवाय टर, टल, डर के। इनमें पहले दो का आशय हटना हो गया, और डर जिससे अंग्रेजी के ड्रा का नाता हो सकता है, भारतीय बोलियों में पानी के अभाव और फिर भय को लिए कबसे और कैसे प्रयोग में आने लगा यह तय करना कठिन है। लीजिए, टर और डर के बीच मे आने वाले ठर की ओर तो हमारा ध्यान ही नहीं गया जो पानी के आशय में तो कभी प्रयोग में नहीं आया लगता पर ठरक = चाहत और क्रिया रूप ठरना = पाले की ठंढ।

इस क्रम को समझे बिना हम न तो ताल=जलाशय का अर्थ समझ सकते है, न तल, तले, तलवे, तालु का न ढालना, ढलवां, ढलान और ढीला का, तरना, तारना का आशय समझ में आ भी जाय, यह समझने में कठिनाई होगी कि तलना भी जल/द्रव के इसी समूह का है।

तर का अर्थ जल तो तर्पण का अर्थ पानी पिलाना, सींचना और जलवायु में पानी की आवश्यकता सर्वाधिक हो उस के अभाव में मनुष्य मर भी सकता हूं तो श्रद्धा प्रकट करने के लिए भी पानी पिलाने का अर्थात तर्पण का प्रयोग हो सकता है। वनस्पतियों और पेड़ों का नाम भी जल से ही उत्पन्न हो सकता था, क्योंकि जल आर्द्रता को और ऐसे पदार्थों को भी अपनी परिधि में समेट लेता है । इनसे स्वत: कोई ध्वनि पैदा होती नहीं इसलिए तरु (ट्री) को अपनी यह संज्ञा जल से मिली ।

समस्या वहां खड़ी होगी जब आप यह तय करने लगे की तरी को अपनी संज्ञा इसलिए मिली कि यह तरु से बनी है या इसलिए यह जलधारा को पार कराती है। कहा यह जा सकता है कि नौका वृक्ष से नहीं बनती दारु से बनती है, जिसका प्रयोग देवदारु के एक मात्र विकल्प को छोड़कर काठ के लिए होता है। पर फारसी का दरख्त का दारु से अभेद है ही। तरी का अर्थ तरु निर्मित नहीं है पर दर्वी = काठ की बड़ी कलछी और दर्विका = छोटी कलछी से अवश्य है। तैरना, तरंग, तरसना- पानी की चाह, किसी दुर्लब वस्तु की उत्कट कामना में तर का भूमिका सहज ग्राह्य है।

जल की गतिशीलता के कारण जलवाची शब्दों का ही प्रयोग गति, चलन और रास्ते के लिए भी हुआ है, इसलिए तर से तार की उत्पत्ति हुई हो सकती है। फारसी तरह, तर्ज, तरीका तर
से निकले हो सकते हैं।

Post – 2018-03-17

हमारी भाषा (५)
तर से तर्पण

हमारे पास आज की व्यस्तता में रात को चांद और तारों तक को देखने का समय नहीं रह गया है। यान्त्रिक सुविधाओं के साथ हमारी अनेक नैसर्गिक वृत्तियाँ या तो नष्ष्ट हुई हैं, या इतनी मन्द पड़ चुकी हैं कि उन्हें सक्रिय करने के लिए शिक्षण और अभ्यास की जरूरत पड़ती है। हमारा अनुभव संसार सिकुड़ा है और अपनी पेशियों और दिमाग पर पड़ने वाले जोर को यन्त्रों को सौंप कर हम शारीरिक और मानसिक रूप में कमजोर होते जा रहे हैं। गाड़ी पर दौड़ने वाले को चलने में दिक्कत नहीं भी हो तो भी आलस्य लगने लगा है, और दौड़ने मे वह अक्षम हो गया है, गणनायंत्र की मदद लेने वाला मामूली जोड़ भाग तक नहीं कर पाता, और कंप्यूटर पर लिखने वाले को लिखना बोझ लगता है, और लिखावट बच्चों या नाममात्र के साक्षरों जैसी होती है। यन्त्रों के विकास क्रम में लंबे समय से चले आरहे अदृश्य पर निरन्तर ह्रास को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि आज से हजारों साल पहले के हमारे पूर्वज हमसे जानते बहुत कम थे, परन्तु मानसिक और शारीरिक रूप में हमसे बहुत सबल थे। उनके पास अपने अनुभव जगत को एकाग्र मन से निहारने का अकूत समय था, और प्रकृति दृश्यों को निहारने और सूक्ष्म से सूक्ष्म श्रव्य ध्वनियों को सुनने की अकल्पनीय क्षमता थी। वे सचमुच ऋषि थे, क्रान्तद्रष्टा थे और अपनी इन्हीं क्षमताओं के बल पर उन्होंने सभ्यता की आधारशिला रखी थी।

इस पृष्ठभूमि में ही हम भाषा के आरंभिक चरणों के विकास को समझ सकते हैं।

आपने किसी पत्ती पर पड़ी हुई एक पानी या ओस की बूंद को ढलते हुए या पसीने की बूंद को धीरे-धीरे नीचे खिसकते हुए देखा हो और उस पर ध्यान दिया हो तो आपको लगेगा कि उससे तर या टर जैसी आवाज आ रही है यह ध्वनि डर, ढर, टल, डल, ढल के रुप में भी सुनी जा सकती है । इनमें से किसी रूप में सुनना इस बात पर निर्भर करता है कि आप की भाषा में मूर्धन्य उच्चारण होता है या दंत्य। टल,ल डल, ढल के रूप में सुनना तो उस अवस्था की बात है जब वह भाषा में मूर्धन्य और दंत्य दोनों ध्वनियों का समावेश हो चुका हो जिसका अर्थ है दोनों भाषाभाषी समुदाय एक दूसरे में रच पच गए हों। परंतु हाहाकार भरी ध्वनियों के युग में जीते हुए यह कल्पना नहीं कर सकते कि एक बूंद के स्थान बदलने को बदलने से जो ध्वनि पैदा होती है उसे मनुष्य के कानों से सुना भी जा सकता है। इसके लिए जिस नीरवता की जरूरत है, उसे हमने खो दिया है । परंतु जब हम तर तर पसीना चूने की बात करते हैं तब पहला अर्थ उस ध्वनि का अनुकार होता है और सुनने की क्रिया जाहिर है केवल कल्पित ही की जा सकती है। पर जब पसीने से तर-ब-तर होने की बात करते हैं तब उसकी याद दिलाने पर भी विश्वास न होगा कि इसमें प्रयुक्त तर का किसी ध्वनि से संबंध है, यद्यपि यह स्वत: स्पष्ट हो जाएगा कि तर का अर्थ पानी है। सच यह है कि इन सभी वैकल्पिक रूपों का एक अर्थ पानी है, दूसरा कोई भी द्रव और तीसरा नीचे की ओर का बहाव, सिवाय टर, टल, डर के। इनमें पहले दो का आशय हटना हो गया, और डर जिससे अंग्रेजी के ड्रा का नाता हो सकता है, भारतीय बोलियों में पानी के अभाव और फिर भय को लिए कबसे और कैसे प्रयोग में आने लगा यह तय करना कठिन है। लीजिए, टर और डर के बीच मे आने वाले ठर की ओर तो हमारा ध्यान ही नहीं गया जो पानी के आशय में तो कभी प्रयोग में नहीं आया लगता पर ठरक = चाहत और क्रिया रूप ठरना = पाले की ठंढ।

इस क्रम को समझे बिना हम न तो ताल=जलाशय का अर्थ समझ सकते है, न तल, तले, तलवे, तालु का न ढालना, ढलवां, ढलान और ढीला का, तरना, तारना का आशय समझ में आ भी जाय, यह समझने में कठिनाई होगी कि तलना भी जल/द्रव के इसी समूह का है।

तर का अर्थ जल तो तर्पण का अर्थ पानी पिलाना, सींचना और जलवायु में पानी की आवश्यकता सर्वाधिक हो उस के अभाव में मनुष्य मर भी सकता हूं तो श्रद्धा प्रकट करने के लिए भी पानी पिलाने का अर्थात तर्पण का प्रयोग हो सकता है। वनस्पतियों और पेड़ों का नाम भी जल से ही उत्पन्न हो सकता था, क्योंकि जल आर्द्रता को और ऐसे पदार्थों को भी अपनी परिधि में समेट लेता है । इनसे स्वत: कोई ध्वनि पैदा होती नहीं इसलिए तरु (ट्री) को अपनी यह संज्ञा जल से मिली ।

समस्या वहां खड़ी होगी जब आप यह तय करने लगे की तरी को अपनी संज्ञा इसलिए मिली कि यह तरु से बनी है या इसलिए यह जलधारा को पार कराती है। कहा यह जा सकता है कि नौका वृक्ष से नहीं बनती दारु से बनती है, जिसका प्रयोग देवदारु के एक मात्र विकल्प को छोड़कर काठ के लिए होता है। पर फारसी का दरख्त का दारु से अभेद है ही। तरी का अर्थ तरु निर्मित नहीं है पर दर्वी = काठ की बड़ी कलछी और दर्विका = छोटी कलछी से अवश्य है। तैरना, तरंग, तरसना- पानी की चाह, किसी दुर्लब वस्तु की उत्कट कामना में तर का भूमिका सहज ग्राह्य है।

जल की गतिशीलता के कारण जलवाची शब्दों का ही प्रयोग गति, चलन और रास्ते के लिए भी हुआ है, इसलिए तर से तार की उत्पत्ति हुई हो सकती है। फारसी तरह, तर्ज, तरीका तर
से निकले हो सकते हैं।

Post – 2018-03-16

हमारी भाषा(4)
सूनृता वाक् और भाषा,
जैसा हम पहले कह आए हैं, सायणाचार्य ने सूनृता वाक् की परिभाषा करते हुए इसे पशुओं, पक्षियों और दूसरे जानवरों की भाषा – पशुपक्षिमृगादीणां भाषा – कहा है। ‘मृगादीणां’ में आए ‘आदि’ में हम अन्य प्राकृत ध्वनियों को समेट सकते हैं।

हमारा भौतिक जगत जड़ और चेतन, सजीव और निर्जीव तत्वों से निर्मित है। सजीवों में कुछ हैं जो बोल और चल सकते हैं और कुछ ऐसे जो बोल नहीं सकते, चल नहीं सकते, जैसे पेड़-पौधे। गति का वाणी से अनन्य संबंध है। गति के बिना ध्वनि पैदा नहीं हो सकती। क्षिप्रगति (आक्रमण, धावा) और ध्वनि (हल्ला, दंगा, दंगल, डाक-डाकू-डाका, ऋ. आरव, आहव) का हिंसा से भी गहरा संबंध है। संस्कृत धातुओं का वर्गीकरण करते हुए मुझे इस बात पर आश्चर्य हो रहा था कि हजार बारह सौ सक्रिय धातुओं में एक तिहाई से अधिक धातुओं का अर्थ गति या हिंसा क्यों है और उनका एक अर्थ नाद का कोई रूप क्यों है। यह मोटी बात भी कुछ विलंब से समझ आई कि क्रिया के जितने भी रूप हैं सभी गति से और ध्वनि से अनिवार्य रूप से जुड़े हैं अत: कोई ध्वनि उस वस्तु और उस क्रिया के साथ ही क्रिया की उस विशेषता को भी प्रकट करती है जिससे वह ध्वनि उत्पन्न हो रही है। कहें अनुकारी ध्वनि संज्ञा, क्रिया और क्रियाविशेषण तीनों को व्यक्त कर सकती है।

इससे पहले इस। पक्ष की ओर समुचित ध्यान नहीं दिया गया इसलिए भाषा की उत्पत्ति के विषय में एक आपत्ति यह थी कि भाषा का इतना जटिल ढांचा अनुकारी ध्वनियों से निर्मित नहीं हो सकता। यह मान लिया जाता था कि अनुकारी ध्वनियाें से केवल संज्ञाओं का ही नाता हो सकता है।

यह दुहराने की जरूरत नहीं है कि भाषा सुनी हुई ध्वनियों का अनुकरण है। हम जैसा सुनते हैं वैसा ही बोलते हैं। आदिम अवस्था में जब भाषा का जन्म हुआ तब तक मनुष्य को पशु पक्षियों की बोली और, स्वयं अपने हर्ष विषाद की ध्वनियां ही सुलभ थीं । परंतु इनकी एक सीमा थी, इनमे अमूर्तन का अभाव था। अत: इनका प्रयोग केवल उन जीवों-जंतुओं की संज्ञा के लिए ही किया गया । इन्हीं के कारण भाषा वैज्ञानिकों में यह भ्रम भी पैदा हुआ कि अनुकारी ध्वनियों से केवल संज्ञाएं पैदा हो सकती हैं, पूरी भाषा नहीं।

परंतु हमारे ध्वनि परिवेश में दो और तत्वों की भूमिका थी – एक जल और दूसरा वायु। इनकी गतियों से और उनमें पड़ने वाले अवरोधों के कारण, इनके परिमाण और निकास मार्ग की सीमा के कारण, इनसे भयानक गर्जना से ले कर मधुर संगीत के बीच की अनंत धनिया पैदा हो सकती थीं, और इसलिए भाषा के विकास में इन्हीं की सबसे प्रबल भूमिका हो सकती थी।

कहें जिनमें गति थी, जो बोलते थे उनकी गति या बोली का प्रयोग उनकी संज्ञा के लिए किया जा सकता था, परन्तु जो स्थावर थे, जिनसे स्वत: कोई आवाज नहीं निकलती थी, उनका नामकरण जल या वायु से उत्पन्न असंख्य ध्वनियों में से किसी एक के द्वारा ही संभव था। प्रश्न यह है कि क्या ऐसा हुआ और यदि हुआ तो उसके पीछे कोई औचित्य भी था ?

हम इसका उत्तर सकारात्मक में ही दे सकते हैं। यह जानना सबसे रोचक हो सकता है कि विष्णु के जिन हजार नामों की बात की जाती है, वे जल के नाम हैं। शिव के पर्यायों का साम्य अग्नि के पर्यायों से है’ परन्तु इस तथ्य की ओर किसी का ध्यान नहीं गया कि आग केपर्याय जल के पर्याय हो सकते हैं। यहा तक कि वायु जिससे उत्पन्न ध्वनिया जल से अभिन्न हैं, उसके कुछ पर्याय जल से निकले है।

पानी नैसर्गिक दर्पण इस पर सभी रंगों की छाया पड़ सकती है उसके अनुसार इसका रंग बदल सकता है इसलिए सभी रंगों और उनसे जुड़े मनोभावों के लिए संज्ञा जल की देन है। जितने भी खाद्य और पेय पदार्थ हैं जितनी ओषधिया और वनस्पतियां हैं, उनका नामकरण पानी से संबंधित है । सभी गतिशील पदार्थों का नामकरण पानी से जुड़ा है। अमृत से लेकर विष तक, पवित्रता से लेकर मलिनता तक, पुण्य से ले कर पाप तक, स्वर्ग से नरक तक, हमारे समस्त मनोभावों के लिए, समस्त अमूर्त आशयों या भाववाचक संज्ञाओं के, बालू से ले कर पत्थर तक के लिए, धन के संभी रूपों और सभी धातुओं के लिए अभिधान जल ने ही प्रदान किए हैं। इसकी पड़ताल हम आगे करेंगे।

Post – 2018-03-16

हमारी भाषा(4)
सूनृता वाक् और भाषा,
जैसा हम पहले कह आए हैं, सायणाचार्य ने सूनृता वाक् की परिभाषा करते हुए इसे पशुओं, पक्षियों और दूसरे जानवरों की भाषा – पशुपक्षिमृगादीणां भाषा – कहा है। ‘मृगादीणां’ में आए ‘आदि’ में हम अन्य प्राकृत ध्वनियों को समेट सकते हैं।

हमारा भौतिक जगत जड़ और चेतन, सजीव और निर्जीव तत्वों से निर्मित है। सजीवों में कुछ हैं जो बोल और चल सकते हैं और कुछ ऐसे जो बोल नहीं सकते, चल नहीं सकते, जैसे पेड़-पौधे। गति का वाणी से अनन्य संबंध है। गति के बिना ध्वनि पैदा नहीं हो सकती। क्षिप्रगति (आक्रमण, धावा) और ध्वनि (हल्ला, दंगा, दंगल, डाक-डाकू-डाका, ऋ. आरव, आहव) का हिंसा से भी गहरा संबंध है। संस्कृत धातुओं का वर्गीकरण करते हुए मुझे इस बात पर आश्चर्य हो रहा था कि हजार बारह सौ सक्रिय धातुओं में एक तिहाई से अधिक धातुओं का अर्थ गति या हिंसा क्यों है और उनका एक अर्थ नाद का कोई रूप क्यों है। यह मोटी बात भी कुछ विलंब से समझ आई कि क्रिया के जितने भी रूप हैं सभी गति से और ध्वनि से अनिवार्य रूप से जुड़े हैं अत: कोई ध्वनि उस वस्तु और उस क्रिया के साथ ही क्रिया की उस विशेषता को भी प्रकट करती है जिससे वह ध्वनि उत्पन्न हो रही है। कहें अनुकारी ध्वनि संज्ञा, क्रिया और क्रियाविशेषण तीनों को व्यक्त कर सकती है।

इससे पहले इस। पक्ष की ओर समुचित ध्यान नहीं दिया गया इसलिए भाषा की उत्पत्ति के विषय में एक आपत्ति यह थी कि भाषा का इतना जटिल ढांचा अनुकारी ध्वनियों से निर्मित नहीं हो सकता। यह मान लिया जाता था कि अनुकारी ध्वनियाें से केवल संज्ञाओं का ही नाता हो सकता है।

यह दुहराने की जरूरत नहीं है कि भाषा सुनी हुई ध्वनियों का अनुकरण है। हम जैसा सुनते हैं वैसा ही बोलते हैं। आदिम अवस्था में जब भाषा का जन्म हुआ तब तक मनुष्य को पशु पक्षियों की बोली और, स्वयं अपने हर्ष विषाद की ध्वनियां ही सुलभ थीं । परंतु इनकी एक सीमा थी, इनमे अमूर्तन का अभाव था। अत: इनका प्रयोग केवल उन जीवों-जंतुओं की संज्ञा के लिए ही किया गया । इन्हीं के कारण भाषा वैज्ञानिकों में यह भ्रम भी पैदा हुआ कि अनुकारी ध्वनियों से केवल संज्ञाएं पैदा हो सकती हैं, पूरी भाषा नहीं।

परंतु हमारे ध्वनि परिवेश में दो और तत्वों की भूमिका थी – एक जल और दूसरा वायु। इनकी गतियों से और उनमें पड़ने वाले अवरोधों के कारण, इनके परिमाण और निकास मार्ग की सीमा के कारण, इनसे भयानक गर्जना से ले कर मधुर संगीत के बीच की अनंत धनिया पैदा हो सकती थीं, और इसलिए भाषा के विकास में इन्हीं की सबसे प्रबल भूमिका हो सकती थी।

कहें जिनमें गति थी, जो बोलते थे उनकी गति या बोली का प्रयोग उनकी संज्ञा के लिए किया जा सकता था, परन्तु जो स्थावर थे, जिनसे स्वत: कोई आवाज नहीं निकलती थी, उनका नामकरण जल या वायु से उत्पन्न असंख्य ध्वनियों में से किसी एक के द्वारा ही संभव था। प्रश्न यह है कि क्या ऐसा हुआ और यदि हुआ तो उसके पीछे कोई औचित्य भी था ?

हम इसका उत्तर सकारात्मक में ही दे सकते हैं। यह जानना सबसे रोचक हो सकता है कि विष्णु के जिन हजार नामों की बात की जाती है, वे जल के नाम हैं। शिव के पर्यायों का साम्य अग्नि के पर्यायों से है’ परन्तु इस तथ्य की ओर किसी का ध्यान नहीं गया कि आग केपर्याय जल के पर्याय हो सकते हैं। यहा तक कि वायु जिससे उत्पन्न ध्वनिया जल से अभिन्न हैं, उसके कुछ पर्याय जल से निकले है।

पानी नैसर्गिक दर्पण इस पर सभी रंगों की छाया पड़ सकती है उसके अनुसार इसका रंग बदल सकता है इसलिए सभी रंगों और उनसे जुड़े मनोभावों के लिए संज्ञा जल की देन है। जितने भी खाद्य और पेय पदार्थ हैं जितनी ओषधिया और वनस्पतियां हैं, उनका नामकरण पानी से संबंधित है । सभी गतिशील पदार्थों का नामकरण पानी से जुड़ा है। अमृत से लेकर विष तक, पवित्रता से लेकर मलिनता तक, पुण्य से ले कर पाप तक, स्वर्ग से नरक तक, हमारे समस्त मनोभावों के लिए, समस्त अमूर्त आशयों या भाववाचक संज्ञाओं के, बालू से ले कर पत्थर तक के लिए, धन के संभी रूपों और सभी धातुओं के लिए अभिधान जल ने ही प्रदान किए हैं। इसकी पड़ताल हम आगे करेंगे।

Post – 2018-03-16

हमारी भाषा(4)
सूनृता वाक् और भाषा,
जैसा हम पहले कह आए हैं, सायणाचार्य ने सूनृता वाक् की परिभाषा करते हुए इसे पशुओं, पक्षियों और दूसरे जानवरों की भाषा – पशुपक्षिमृगादीणां भाषा – कहा है। ‘मृगादीणां’ में आए ‘आदि’ में हम अन्य प्राकृत ध्वनियों को समेट सकते हैं।

हमारा भौतिक जगत जड़ और चेतन, सजीव और निर्जीव तत्वों से निर्मित है। सजीवों में कुछ हैं जो बोल और चल सकते हैं और कुछ ऐसे जो बोल नहीं सकते, चल नहीं सकते, जैसे पेड़-पौधे। गति का वाणी से अनन्य संबंध है। गति के बिना ध्वनि पैदा नहीं हो सकती। क्षिप्रगति (आक्रमण, धावा) और ध्वनि (हल्ला, दंगा, दंगल, डाक-डाकू-डाका, ऋ. आरव, आहव) का हिंसा से भी गहरा संबंध है। संस्कृत धातुओं का वर्गीकरण करते हुए मुझे इस बात पर आश्चर्य हो रहा था कि हजार बारह सौ सक्रिय धातुओं में एक तिहाई से अधिक धातुओं का अर्थ गति या हिंसा क्यों है और उनका एक अर्थ नाद का कोई रूप क्यों है। यह मोटी बात भी कुछ विलंब से समझ आई कि क्रिया के जितने भी रूप हैं सभी गति से और ध्वनि से अनिवार्य रूप से जुड़े हैं अत: कोई ध्वनि उस वस्तु और उस क्रिया के साथ ही क्रिया की उस विशेषता को भी प्रकट करती है जिससे वह ध्वनि उत्पन्न हो रही है। कहें अनुकारी ध्वनि संज्ञा, क्रिया और क्रियाविशेषण तीनों को व्यक्त कर सकती है।

इससे पहले इस। पक्ष की ओर समुचित ध्यान नहीं दिया गया इसलिए भाषा की उत्पत्ति के विषय में एक आपत्ति यह थी कि भाषा का इतना जटिल ढांचा अनुकारी ध्वनियों से निर्मित नहीं हो सकता। यह मान लिया जाता था कि अनुकारी ध्वनियाें से केवल संज्ञाओं का ही नाता हो सकता है।

यह दुहराने की जरूरत नहीं है कि भाषा सुनी हुई ध्वनियों का अनुकरण है। हम जैसा सुनते हैं वैसा ही बोलते हैं। आदिम अवस्था में जब भाषा का जन्म हुआ तब तक मनुष्य को पशु पक्षियों की बोली और, स्वयं अपने हर्ष विषाद की ध्वनियां ही सुलभ थीं । परंतु इनकी एक सीमा थी, इनमे अमूर्तन का अभाव था। अत: इनका प्रयोग केवल उन जीवों-जंतुओं की संज्ञा के लिए ही किया गया । इन्हीं के कारण भाषा वैज्ञानिकों में यह भ्रम भी पैदा हुआ कि अनुकारी ध्वनियों से केवल संज्ञाएं पैदा हो सकती हैं, पूरी भाषा नहीं।

परंतु हमारे ध्वनि परिवेश में दो और तत्वों की भूमिका थी – एक जल और दूसरा वायु। इनकी गतियों से और उनमें पड़ने वाले अवरोधों के कारण, इनके परिमाण और निकास मार्ग की सीमा के कारण, इनसे भयानक गर्जना से ले कर मधुर संगीत के बीच की अनंत धनिया पैदा हो सकती थीं, और इसलिए भाषा के विकास में इन्हीं की सबसे प्रबल भूमिका हो सकती थी।

कहें जिनमें गति थी, जो बोलते थे उनकी गति या बोली का प्रयोग उनकी संज्ञा के लिए किया जा सकता था, परन्तु जो स्थावर थे, जिनसे स्वत: कोई आवाज नहीं निकलती थी, उनका नामकरण जल या वायु से उत्पन्न असंख्य ध्वनियों में से किसी एक के द्वारा ही संभव था। प्रश्न यह है कि क्या ऐसा हुआ और यदि हुआ तो उसके पीछे कोई औचित्य भी था ?

हम इसका उत्तर सकारात्मक में ही दे सकते हैं। यह जानना सबसे रोचक हो सकता है कि विष्णु के जिन हजार नामों की बात की जाती है, वे जल के नाम हैं। शिव के पर्यायों का साम्य अग्नि के पर्यायों से है’ परन्तु इस तथ्य की ओर किसी का ध्यान नहीं गया कि आग केपर्याय जल के पर्याय हो सकते हैं। यहा तक कि वायु जिससे उत्पन्न ध्वनिया जल से अभिन्न हैं, उसके कुछ पर्याय जल से निकले है।

पानी नैसर्गिक दर्पण इस पर सभी रंगों की छाया पड़ सकती है उसके अनुसार इसका रंग बदल सकता है इसलिए सभी रंगों और उनसे जुड़े मनोभावों के लिए संज्ञा जल की देन है। जितने भी खाद्य और पेय पदार्थ हैं जितनी ओषधिया और वनस्पतियां हैं, उनका नामकरण पानी से संबंधित है । सभी गतिशील पदार्थों का नामकरण पानी से जुड़ा है। अमृत से लेकर विष तक, पवित्रता से लेकर मलिनता तक, पुण्य से ले कर पाप तक, स्वर्ग से नरक तक, हमारे समस्त मनोभावों के लिए, समस्त अमूर्त आशयों या भाववाचक संज्ञाओं के, बालू से ले कर पत्थर तक के लिए, धन के संभी रूपों और सभी धातुओं के लिए अभिधान जल ने ही प्रदान किए हैं। इसकी पड़ताल हम आगे करेंगे।

Post – 2018-03-15

हमारी भाषा (3)

नैसर्गिक शब्द

भाषाविज्ञानियों ने एक विशेष कोटि में आने वाले शब्दों के लिए बहुत सारे शब्दों का प्रयोग किया है – इमिटेटिव, ओनोमैटोपोइक, इको, रिवरवरेटिव, आदि परंतु कोई उस पूरे वर्ग को समेट नहीं पाता जिसकी मैं बात करना चाहता हूं। इसकी एक मोटी परिभाषा मेरे सामने है।

मैं भाषा के कृत्रिम और नैसर्गिक दो स्रोतोंकी बात करना चाहता हूं। पहले इस तरह का विभाजन नहीं किया गया था, परंतु चेतना के स्तर पर यह वर्गीकरण भाषावैज्ञानिकों के विमर्श में बना हुआ था। भाषावैज्ञानिक नैसर्गिक शब्दों की बहुआयामी भूमिका को अब तक समझने में असफल रहे और इसके साथ ही मानव निर्मित या कृत्रिम शब्दों की निर्माण प्रक्रिया को भी नहीं समझ पाए। यह मेरा भ्रम हो सकता है, परंतु यदि कोई जानकार व्यक्ति मेरी भूल सुधार सके तो मेरा काम आसान हो जाएगा। मेरा ध्यान भी इस ओर इसलिए गया मैं भाषा विज्ञान की पुस्तकों और अध्यापकों से दूर रहा। अपनी समस्याओं का हल मुझे अपने ढंग से निकालना पड़ा । शास्त्रीय चर्चा से अधिक अच्छा है कि हम अपने अनुभव की बात करें ।

1968 में दक्षिण भारतीय भाषाओं को सीखने के क्रम मैं उनकी शब्दावली का तुलनात्मक अध्ययन किया करता था । इस क्रम में मुझको पता चला उन भाषाओं में ऐसे बहुत से शब्द है, जो संस्कृत से नहीं गए हैं, परंतु हमारी बोलचाल की भाषा में पाए जाते हैं । ऐसा कैसे हुआ यह मेरी समझ में नहीं आ रहा था । स्थानों में कुछ नाम में पाई जाने वाली समानता मुझे इन को समझने की प्रेरणा देती रहती थी, जैसे उत्तर भारत में सलेमपुर और दक्षिण में सलेम । स्थानों नामों में अधिकांश अटपटे लगते, जिनका अर्थ समझ में नहीं आता। लोगों से जिज्ञासा करने पर, सपाट जवाब मिलता, यही नाम है। इनका कोई अर्थ नहीं है। मुझे ऐसा उत्तर एक भाषाविज्ञानी मित्र से भी मिला । उन्होंने अपने कथन के दृष्टांत में दिल्ली के मुनीरका और उससे सटे चिन्नी मुनीरका का नाम लेकर उल्टा प्रश्न किया, क्या इनका मुनियों से या चीनी से कोई संबंध है। अंतर हमारे दृष्टिकोण में था वह अपनी ज्ञान सीमा में सभी चीजों का उत्तर पा लेना चाहते थे मैं इन चीजों को समझ नहीं पाता था उनको समझने के लिए अपनी जान सीमा का विस्तार करना चाहता था मैं यह मानता था कि निरर्थक कुछ नहीं होता। हमारी एक दूसरे मित्र को भी निधि का अर्थ समझ में आता था जिसके लिए आगरा का प्रयोग होता है अर्थ की दृष्टि से चेन्नई का चिमनी का मिठास से संबंध नहीं है अपितु चोटी की या चूरे से संबंध है चीनी का अर्थ छोटा मुनीरका का अर्थ छोटा मुनीरका। इसके लिए मध्यकाल में खुर्द (क्षुद्र) का प्रयोग किया जाता था । सिरका मुनीरका मुझे मुंडा -मुंडीर- मुंडीरका बदलते हुए मुनीरका बना प्रतीत हुआ। इसका अर्थ था कि प्राचीन काल में यहां पर मुंडा जनों का निवास था। इस क्रम में यह भी पता चला की मध्यकाल में राजस्व के अभिलेखों में जिन शब्दों का प्रयोग किया गया था वह बहुत प्राचीन भूव्यवस्था में प्रयुक्त होते आए थे। जो भी हो या कुछ बात की बात है स्थाननामों के विषय में मेरी एक धारणा बन चुकी थी।

पहली बार मैंने सोचा था कि यदि मैं भारत के स्थाननामों का अध्ययन करूं तो भारतीय जनों के संचलन की समस्या को समझने में कुछ मदद मिल सकती है। मेरी रुचि अकादमिक प्रोजेक्ट में नहीं थी। मात्र जिज्ञासावश मैं इस समस्या को समझना चाहता था। काम बड़ा था। समय और साधनों का अभाव था। मैंने बड़े परिश्रम से विविध स्रोतों (रेलवे टाइम टेबल, पोस्ट आफिस गाइड, टेलीग्राफ गाइड, सर्वे आफ इंडिया के मानचित्र, गजैटियर्स ) से पूरे भारत के स्थानों का संग्रह किया, उनको अकारादि क्रम में डाला और फिर नामों के बीच जो सर्वनिष्ठ तत्व उसको उसी तरह आधार बनाकर उनका अर्थ समझने की कोशिश करने लगा जैसे किसी समय में संस्कृत आचार्यों ने धातुओं का निर्धारण करके शब्दों का अर्थ समझने का प्रयत्न किया था। काम अधूरा ही रह गया, परंतु व्यर्थ नहीं गया । अधूरा इसलिए रह गया कि मैंने पाया सभी नामों के साथ पानी का कोई न कोई पर्याय जुड़ा हुआ है। यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी । मुझे लगा मुझसे कोई गलती हो रही है। ऐसा कैसे हो सकता है कि सभी स्थानों का नाम पानी से जुड़ा हो। मैं सर्वे आफ इंडिया मानचित्रों को लेकर उन की भौगोलिक संरचना समझने का प्रयत्न करता रहा पर कुछ पल्ले नहीं पड़ा। पहले मैंने सोचा था नाम बहुत प्राचीन हैं । उन दिनों पानी का कोई कृत्रिम स्रोत नहीं था । सभी को प्रकृति पर निर्भर करना पड़ता । इसलिए उन्होंने अपनी बस्तियां जलस्रोतों के निकट बसाई होंगी, इसलिए जलपरक शब्द उनके नाम के साथ जुड़ गया होगा। परंतु कुछ नाम ऐसे थे जो जल के स्रोत से दूर थे।

मैंने नागरी प्रचारिणी पत्रिका में अपने अध्ययन के एक अंश का प्रकाशन भी करा दिया था, परंतु इस आशंका के कारण कि कहीं गलती हो रही है, मैंने उस काम को स्थगित कर दिया और आर्य और द्रविड़ भाषाओं के संबंधों को समझने के लिए तैयारी करने लगा ।

आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता में मैंने पहली बार यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि हमारी भाषा के सर्वाधिक शब्द उस स्रोत से आते हैं जिसे अनुकारी कहा जाता है। अपने मत को प्रामाणिक बनाने के लिए मैंने संस्कृत धातुओं का विश्लेषण किया और यह दिखाने का प्रयत्न किया कि कुल धातुओं की एक तिहाई ध्वनि, गति और हिंसा से जुड़ी हुई है, जिसकी जरूरत नहीं थी। ऐसा इसलिए है कि बहुत सारे शब्द प्रकृत ध्वनियों के अनुकरण से पैदा हुए हैं।

कुछ उदाहरणों मैंने यह प्रमाणित किया कि एक ही ध्वनि अनेक स्रोतों से पैदा हो सकती है और इन ध्वनियों से इतने अधिक शब्द पैदा हो सकते हैं कि जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते। यह मेरी पुस्तकों में आ चुका है इसलिए यहां उसे दुहराने की आवश्यकता नहीं ।

इस काम के बाद मैं वैदिक अध्ययन की ओर मुड़ गया । अब मुझे पता चला हमारी भाषा के आधारभूत शब्द जलपरक हैं। अनेक छोटे-छोटे लेखों में मैंने इसे स्पष्ट करने की कोशिश की परंतु विधिवत विवेचन का समय नहीं निकाल सका। कई तरह की ग्रंथियां काम करती रही हैं। इनमें से एक थी भाषा विज्ञान के विधिवत अध्ययन का अभाव, हिंदी प्रदेश की उदासीनता, मेरे पिछले कामों को समझने में विद्वानों की असमर्थता और बढ़ती हुई उम्र के साथ समय का अभाव। अतः मै इस प्रयत्न में लगा रहा कि कोई ऐसा योग्य तरुण व्यक्ति इसमें रुचि ले जिसमें कार्यक्षमता हो परंतु मेरा यह प्रयत्न बेकार गया। इस काम में मेरी रुचि पागलपन की हद तक है। लगता है यदि यह काम पूरा न हो सका तो मेरा जीवन व्यर्थ गया क्योंकि मैं इसी काम के लिए महाकाल द्वारा निमित्त के रूप में चुना गया हूं। मैं इसे किसी दूसरे को समझा नहीं सकता।

Facebook पर यह उम्मीद थी मेरी मित्र मंडली में कुछ ऐसे लोग हो सकते हैं जिनकी भाषा विज्ञान मे रुचि हो और आगे चल कर वे अधूरा काम अपने हाथ में ले सके। यह अकेले व्यक्ति का काम नहीं है। मैं जितना भी प्रयत्न करूं अकेले दम पर इसे पूरा नहीं कर सकता। अकेलेपन में अपनी गलतियों तक को नहीं समझ सकता। जो भी हो, जैसा भी हो, जैसे ही बने, यह संभवत मेरा अंतिम प्रयत्न होगा।

मैंने यह कहा था कि ‘नैसर्गिक शब्दों का अर्थ सहज ग्राह्य होता है। नैसर्गिक शब्द से मेरा तात्पर्य ऐसे शब्दों से था जो गढ़े नहीं जाते, सुने जाते हैं, और जिनको अर्थ से जोड़ लिया जाता है। जोड़ना हमारे प्रयास पर निर्भर होता है और क्रिया से संबंधित होता है। क्रिया पर या इसके स्रोत पर वक्ता या श्रोता का नियंत्रण नहीं होता। वह स्रोत प्राकृतिक भी हो सकता है और मनुष्य द्वारा बनाए गए यंत्र से भी पैदा हो सकता है, मनुष्य की अपनी क्रिया से भी पैदा हो सकता है। इसके लिए हमारे मुंह से जो ध्वनि फूटती है वह स्वतः अपने अर्थ (उपादान, क्रिया या उसके गुण) से जुड़ जाती है। ध्वनि एक ही होते हुए भी अलग अलग भाषाई समुदायों के लोगों द्वारा उनकी अपनी भाषा की ध्वनिसीमा के कारण अलग अलग रूपों में सुना जा सकता है और व्यक्त किया जा सकता है। यहां तक कि एक ही भाषाई समुदाय में अलग-अलग अभिव्यक्तियां दी जा सकती हैं जो परस्पर इतनी भिन्न हो सकती हैं जिसकी सीमा नहीं फिर भी किसी को यह बताने की जरूरत नहीं होती कि यह किसके लिए प्रयोग में लाया गया है, क्योंकि अर्थ उच्चारण से सहज भाव से जुड़ जाता है ।

कृत्रिम शब्द में यह बताना या दिखाना जरूरी होता है कि अमुक शब्द का प्रयोग किसके लिए किया जा रहा है
मैं इसे एक उदाहरण से स्पष्ट करूं तो, पूने हवाई अड्डे पर लिफ्ट का संकेत देने क के लिए लिखा मिला उदवाहन। पढ़कर मुझे हंसी आई । विनोद में सोचा कि इसकी जगह यदि उत्कर्ष लिखा गया होता तो क्या कोई रोक सकता था, और क्या यह उतना ही उपयुक्त शब्द नहीं होता । हां उस दशा में नीचे आते समय इसका नाम निष्कर्ष रखना और मजेदार होता।

कहें, कृत्रिम शब्द एक ठप्पा होता है। उसमें व्यक्त भाव संदर्भित वस्तु या क्रिया से जुड़ा तो होता है, पर उसे ऐसे ही गुण या धर्म वाली दूसरी संज्ञाओं या क्रियाओं के साथ भी जोड़ा जा सकता है। केवल प्रयोगरूढ़ि से ही इसका अर्थ निश्चित हो पाता है। उसके स्थान पर वही काम संज्ञाओं या क्रियाओं को संख्या में बदलकर भी किया जा सकता है। परन्तु उस दशा में उसकी भूमिका संकेतक प्रणालियों जैसी हो जाएगी और वह सीमित प्रयोजनों के लिए ही व्यवहार में आ सकती है।

दोनों में एक अंतर यह भी होता है की कृत्रिम शब्दावली नई शब्दावली का जनन नहीं कर सकती जबकि नैसर्गिक शब्दावली तकनीकी विकास के क्रम में नए भावों और व्यंजनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्द भंडार का जनन करने में समर्थ हो सकती है। दूसरे शब्दों में कहें तो कृत्रिम शब्द किसी यन्त्र से बन कर निकले उत्पाद की तरह और नैसर्गिक शब्द प्राकृतिक जीवों और वनस्पतियों की तरह उत्पादनक्षम होते हैं।

Post – 2018-03-15

हमारी भाषा (3)

नैसर्गिक शब्द

भाषाविज्ञानियों ने एक विशेष कोटि में आने वाले शब्दों के लिए बहुत सारे शब्दों का प्रयोग किया है – इमिटेटिव, ओनोमैटोपोइक, इको, रिवरवरेटिव, आदि परंतु कोई उस पूरे वर्ग को समेट नहीं पाता जिसकी मैं बात करना चाहता हूं। इसकी एक मोटी परिभाषा मेरे सामने है।

मैं भाषा के कृत्रिम और नैसर्गिक दो स्रोतोंकी बात करना चाहता हूं। पहले इस तरह का विभाजन नहीं किया गया था, परंतु चेतना के स्तर पर यह वर्गीकरण भाषावैज्ञानिकों के विमर्श में बना हुआ था। भाषावैज्ञानिक नैसर्गिक शब्दों की बहुआयामी भूमिका को अब तक समझने में असफल रहे और इसके साथ ही मानव निर्मित या कृत्रिम शब्दों की निर्माण प्रक्रिया को भी नहीं समझ पाए। यह मेरा भ्रम हो सकता है, परंतु यदि कोई जानकार व्यक्ति मेरी भूल सुधार सके तो मेरा काम आसान हो जाएगा। मेरा ध्यान भी इस ओर इसलिए गया मैं भाषा विज्ञान की पुस्तकों और अध्यापकों से दूर रहा। अपनी समस्याओं का हल मुझे अपने ढंग से निकालना पड़ा । शास्त्रीय चर्चा से अधिक अच्छा है कि हम अपने अनुभव की बात करें ।

1968 में दक्षिण भारतीय भाषाओं को सीखने के क्रम मैं उनकी शब्दावली का तुलनात्मक अध्ययन किया करता था । इस क्रम में मुझको पता चला उन भाषाओं में ऐसे बहुत से शब्द है, जो संस्कृत से नहीं गए हैं, परंतु हमारी बोलचाल की भाषा में पाए जाते हैं । ऐसा कैसे हुआ यह मेरी समझ में नहीं आ रहा था । स्थानों में कुछ नाम में पाई जाने वाली समानता मुझे इन को समझने की प्रेरणा देती रहती थी, जैसे उत्तर भारत में सलेमपुर और दक्षिण में सलेम । स्थानों नामों में अधिकांश अटपटे लगते, जिनका अर्थ समझ में नहीं आता। लोगों से जिज्ञासा करने पर, सपाट जवाब मिलता, यही नाम है। इनका कोई अर्थ नहीं है। मुझे ऐसा उत्तर एक भाषाविज्ञानी मित्र से भी मिला । उन्होंने अपने कथन के दृष्टांत में दिल्ली के मुनीरका और उससे सटे चिन्नी मुनीरका का नाम लेकर उल्टा प्रश्न किया, क्या इनका मुनियों से या चीनी से कोई संबंध है। अंतर हमारे दृष्टिकोण में था वह अपनी ज्ञान सीमा में सभी चीजों का उत्तर पा लेना चाहते थे मैं इन चीजों को समझ नहीं पाता था उनको समझने के लिए अपनी जान सीमा का विस्तार करना चाहता था मैं यह मानता था कि निरर्थक कुछ नहीं होता। हमारी एक दूसरे मित्र को भी निधि का अर्थ समझ में आता था जिसके लिए आगरा का प्रयोग होता है अर्थ की दृष्टि से चेन्नई का चिमनी का मिठास से संबंध नहीं है अपितु चोटी की या चूरे से संबंध है चीनी का अर्थ छोटा मुनीरका का अर्थ छोटा मुनीरका। इसके लिए मध्यकाल में खुर्द (क्षुद्र) का प्रयोग किया जाता था । सिरका मुनीरका मुझे मुंडा -मुंडीर- मुंडीरका बदलते हुए मुनीरका बना प्रतीत हुआ। इसका अर्थ था कि प्राचीन काल में यहां पर मुंडा जनों का निवास था। इस क्रम में यह भी पता चला की मध्यकाल में राजस्व के अभिलेखों में जिन शब्दों का प्रयोग किया गया था वह बहुत प्राचीन भूव्यवस्था में प्रयुक्त होते आए थे। जो भी हो या कुछ बात की बात है स्थाननामों के विषय में मेरी एक धारणा बन चुकी थी।

पहली बार मैंने सोचा था कि यदि मैं भारत के स्थाननामों का अध्ययन करूं तो भारतीय जनों के संचलन की समस्या को समझने में कुछ मदद मिल सकती है। मेरी रुचि अकादमिक प्रोजेक्ट में नहीं थी। मात्र जिज्ञासावश मैं इस समस्या को समझना चाहता था। काम बड़ा था। समय और साधनों का अभाव था। मैंने बड़े परिश्रम से विविध स्रोतों (रेलवे टाइम टेबल, पोस्ट आफिस गाइड, टेलीग्राफ गाइड, सर्वे आफ इंडिया के मानचित्र, गजैटियर्स ) से पूरे भारत के स्थानों का संग्रह किया, उनको अकारादि क्रम में डाला और फिर नामों के बीच जो सर्वनिष्ठ तत्व उसको उसी तरह आधार बनाकर उनका अर्थ समझने की कोशिश करने लगा जैसे किसी समय में संस्कृत आचार्यों ने धातुओं का निर्धारण करके शब्दों का अर्थ समझने का प्रयत्न किया था। काम अधूरा ही रह गया, परंतु व्यर्थ नहीं गया । अधूरा इसलिए रह गया कि मैंने पाया सभी नामों के साथ पानी का कोई न कोई पर्याय जुड़ा हुआ है। यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी । मुझे लगा मुझसे कोई गलती हो रही है। ऐसा कैसे हो सकता है कि सभी स्थानों का नाम पानी से जुड़ा हो। मैं सर्वे आफ इंडिया मानचित्रों को लेकर उन की भौगोलिक संरचना समझने का प्रयत्न करता रहा पर कुछ पल्ले नहीं पड़ा। पहले मैंने सोचा था नाम बहुत प्राचीन हैं । उन दिनों पानी का कोई कृत्रिम स्रोत नहीं था । सभी को प्रकृति पर निर्भर करना पड़ता । इसलिए उन्होंने अपनी बस्तियां जलस्रोतों के निकट बसाई होंगी, इसलिए जलपरक शब्द उनके नाम के साथ जुड़ गया होगा। परंतु कुछ नाम ऐसे थे जो जल के स्रोत से दूर थे।

मैंने नागरी प्रचारिणी पत्रिका में अपने अध्ययन के एक अंश का प्रकाशन भी करा दिया था, परंतु इस आशंका के कारण कि कहीं गलती हो रही है, मैंने उस काम को स्थगित कर दिया और आर्य और द्रविड़ भाषाओं के संबंधों को समझने के लिए तैयारी करने लगा ।

आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता में मैंने पहली बार यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि हमारी भाषा के सर्वाधिक शब्द उस स्रोत से आते हैं जिसे अनुकारी कहा जाता है। अपने मत को प्रामाणिक बनाने के लिए मैंने संस्कृत धातुओं का विश्लेषण किया और यह दिखाने का प्रयत्न किया कि कुल धातुओं की एक तिहाई ध्वनि, गति और हिंसा से जुड़ी हुई है, जिसकी जरूरत नहीं थी। ऐसा इसलिए है कि बहुत सारे शब्द प्रकृत ध्वनियों के अनुकरण से पैदा हुए हैं।

कुछ उदाहरणों मैंने यह प्रमाणित किया कि एक ही ध्वनि अनेक स्रोतों से पैदा हो सकती है और इन ध्वनियों से इतने अधिक शब्द पैदा हो सकते हैं कि जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते। यह मेरी पुस्तकों में आ चुका है इसलिए यहां उसे दुहराने की आवश्यकता नहीं ।

इस काम के बाद मैं वैदिक अध्ययन की ओर मुड़ गया । अब मुझे पता चला हमारी भाषा के आधारभूत शब्द जलपरक हैं। अनेक छोटे-छोटे लेखों में मैंने इसे स्पष्ट करने की कोशिश की परंतु विधिवत विवेचन का समय नहीं निकाल सका। कई तरह की ग्रंथियां काम करती रही हैं। इनमें से एक थी भाषा विज्ञान के विधिवत अध्ययन का अभाव, हिंदी प्रदेश की उदासीनता, मेरे पिछले कामों को समझने में विद्वानों की असमर्थता और बढ़ती हुई उम्र के साथ समय का अभाव। अतः मै इस प्रयत्न में लगा रहा कि कोई ऐसा योग्य तरुण व्यक्ति इसमें रुचि ले जिसमें कार्यक्षमता हो परंतु मेरा यह प्रयत्न बेकार गया। इस काम में मेरी रुचि पागलपन की हद तक है। लगता है यदि यह काम पूरा न हो सका तो मेरा जीवन व्यर्थ गया क्योंकि मैं इसी काम के लिए महाकाल द्वारा निमित्त के रूप में चुना गया हूं। मैं इसे किसी दूसरे को समझा नहीं सकता।

Facebook पर यह उम्मीद थी मेरी मित्र मंडली में कुछ ऐसे लोग हो सकते हैं जिनकी भाषा विज्ञान मे रुचि हो और आगे चल कर वे अधूरा काम अपने हाथ में ले सके। यह अकेले व्यक्ति का काम नहीं है। मैं जितना भी प्रयत्न करूं अकेले दम पर इसे पूरा नहीं कर सकता। अकेलेपन में अपनी गलतियों तक को नहीं समझ सकता। जो भी हो, जैसा भी हो, जैसे ही बने, यह संभवत मेरा अंतिम प्रयत्न होगा।

मैंने यह कहा था कि ‘नैसर्गिक शब्दों का अर्थ सहज ग्राह्य होता है। नैसर्गिक शब्द से मेरा तात्पर्य ऐसे शब्दों से था जो गढ़े नहीं जाते, सुने जाते हैं, और जिनको अर्थ से जोड़ लिया जाता है। जोड़ना हमारे प्रयास पर निर्भर होता है और क्रिया से संबंधित होता है। क्रिया पर या इसके स्रोत पर वक्ता या श्रोता का नियंत्रण नहीं होता। वह स्रोत प्राकृतिक भी हो सकता है और मनुष्य द्वारा बनाए गए यंत्र से भी पैदा हो सकता है, मनुष्य की अपनी क्रिया से भी पैदा हो सकता है। इसके लिए हमारे मुंह से जो ध्वनि फूटती है वह स्वतः अपने अर्थ (उपादान, क्रिया या उसके गुण) से जुड़ जाती है। ध्वनि एक ही होते हुए भी अलग अलग भाषाई समुदायों के लोगों द्वारा उनकी अपनी भाषा की ध्वनिसीमा के कारण अलग अलग रूपों में सुना जा सकता है और व्यक्त किया जा सकता है। यहां तक कि एक ही भाषाई समुदाय में अलग-अलग अभिव्यक्तियां दी जा सकती हैं जो परस्पर इतनी भिन्न हो सकती हैं जिसकी सीमा नहीं फिर भी किसी को यह बताने की जरूरत नहीं होती कि यह किसके लिए प्रयोग में लाया गया है, क्योंकि अर्थ उच्चारण से सहज भाव से जुड़ जाता है ।

कृत्रिम शब्द में यह बताना या दिखाना जरूरी होता है कि अमुक शब्द का प्रयोग किसके लिए किया जा रहा है
मैं इसे एक उदाहरण से स्पष्ट करूं तो, पूने हवाई अड्डे पर लिफ्ट का संकेत देने क के लिए लिखा मिला उदवाहन। पढ़कर मुझे हंसी आई । विनोद में सोचा कि इसकी जगह यदि उत्कर्ष लिखा गया होता तो क्या कोई रोक सकता था, और क्या यह उतना ही उपयुक्त शब्द नहीं होता । हां उस दशा में नीचे आते समय इसका नाम निष्कर्ष रखना और मजेदार होता।

कहें, कृत्रिम शब्द एक ठप्पा होता है। उसमें व्यक्त भाव संदर्भित वस्तु या क्रिया से जुड़ा तो होता है, पर उसे ऐसे ही गुण या धर्म वाली दूसरी संज्ञाओं या क्रियाओं के साथ भी जोड़ा जा सकता है। केवल प्रयोगरूढ़ि से ही इसका अर्थ निश्चित हो पाता है। उसके स्थान पर वही काम संज्ञाओं या क्रियाओं को संख्या में बदलकर भी किया जा सकता है। परन्तु उस दशा में उसकी भूमिका संकेतक प्रणालियों जैसी हो जाएगी और वह सीमित प्रयोजनों के लिए ही व्यवहार में आ सकती है।

दोनों में एक अंतर यह भी होता है की कृत्रिम शब्दावली नई शब्दावली का जनन नहीं कर सकती जबकि नैसर्गिक शब्दावली तकनीकी विकास के क्रम में नए भावों और व्यंजनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्द भंडार का जनन करने में समर्थ हो सकती है। दूसरे शब्दों में कहें तो कृत्रिम शब्द किसी यन्त्र से बन कर निकले उत्पाद की तरह और नैसर्गिक शब्द प्राकृतिक जीवों और वनस्पतियों की तरह उत्पादनक्षम होते हैं।