न मैं उसको समझता हूं
न वह मुझको समझता है।
अगर उसको मिटा पाया
तो
खुद को जान पाऊंगा।।
Post – 2017-11-29
भगवान की जो मानता है
उसकी न तू मान
भगवान को
पहचानता हो
उसका पता कर ।।
Post – 2017-11-29
जो तीरगी को तीरगी
कहने से थे डरते
अब रोशनी को
रोशनी
कहने से डरे हैं।
Post – 2017-11-29
तू लूटने आया था
इरादा तो था जाहिर
तू लुट चुका है
इसका ही
अफसोस बहुत है ।
Post – 2017-11-29
Bhagwan Singh
Ghaziabad, Uttar Pradesh ·
वह बात जिससे हस्ती मिटती नहीं हमारी
दुश्मन भले रहा हो सारा जहां हमारा ।।
क्या आपने वह कहानी पढ़ी या सुनी है जिसमें एक प्यासा कौआ पानी के घड़े पर बैठता है, पर पाता है कि पानी इतना नीचे है कि उसकी चोंच पानी तक नही पहुंच सकती। वह आसपास से कंकड़ियां चुनता है और घड़े में तब तक डालता जाता है जब तक पानी ऊपर नहीं आ जाता, और फिर अपनी प्यास बुझा कर उड़ जाता है।
और वह कहानी जिसमें एक कुत्ता मुंह में रोटी का टुकड़ा दबाए चला जा रहा है। पानी में अपनी छाया देखकर सोचता है कोई दूसरा कुत्ता रोटी लिए चला जा रहा है। उससे रोटी छीनने के लिए वह भौंकता है और इसके साथ उसकी रोटी मुंह से गिर जाती है।
यह कहानी न भी सुनी हो तो भी वह उक्ति तो सुनी ही होगी, आधी तज सारी को धावै, आधी रहै न सारी पावै।
एक तीसरी कहानी। एक पेड़ पर एक कौआ चोंच में रोडी का टुकड़ा दबाए बैठा है। नीचे से एक लोमड़ी गुजरती है। रोटी देखकर लोमड़ी के मुंह में पानी भर आता है। वह पेड़ का नीचे बैठ जाती है और कौए के सुरीले कंठ की झूठी तारीफ करके उससे गाना गाने का अनुरोध करती है। वह गाने के लिए मुंह खोलता है कि रोटी नीचे गिर जाती है और लोमड़ी रोटी ले कर चंपत हो जाती है।
अब एक और कहानी ले लीजिए। एक था अंधा और एक था लंगड़ा। दोनों को एक चढ़ाई पार करनी थी। समतल मैदान में तो बेचारे टटोलते लटकते चल भी सकते थे। पर चढ़ाई पार करना तो उनके वश का था नहीं। लंगड़े ने सुझाया, यदि अंधा उसे कंधे पर चढ़ा ले तो दोनों चढ़ाई पार कर सकते हैं। और अंधे की समझ में भी यह बात आ गई। दोनों पार हो गए।
१. क्या आप जानते हैं ये कथाएं कितने हजार साल से सुनी और सुनाई जा रही हैं?
२. क्या आप जानते हैं इन कहानियों का अर्थ क्या है?
३. क्या आप जानते हैं कि इस इतिहास की खोज कोई विदेशी अध्येता नहीं कर सकता था और इस लिए जो अंग्रेजी को ज्ञान की भाषा मानते हैं और उसपर इतना भरोसा करते हैं की अंग्रेजी के ज्ञान को ही विषय के आधिकारिक ज्ञान का पर्याय मान लेते हैं वे कितने सिरफिरे हैं ?
पहले तो अपने सवालों के तेवर के लिए क्षमा याचना करूं, जिनसे हो सकता है आपके अहम् को चोट पहुंची हो, फिर इन प्रश्नों का उत्तर दूँ जिससे हो सकता है आपको भी लगे कि तेवर सख्त भले हो, इसका औचित्य था।
पहले प्रश्न का उत्तर तलाशते हुए हमारा ध्यान अधिक से अधिक पंचतंत्रकार विष्णु शर्मा तक या वृहत्कथाकार गुणाढ्य तक जा सकता है, पर जानते हैं पहली तीनों कहानियां हड़प्पा के बर्तनों पर चित्रित हैं। चित्रित हैं का यह मतलब नहीं कि ये ठीक उसी समय लिखी गई थीं। मतलब सिर्फ यह कि ये आज से पांच हजार साल से पहले कभी रची जा चुकी थी। चौथी कहानी ऋग्वेद में उसी तरह दैव कृपा से प्रेरित बताई गई है जैसे तुलसीदास के जाकी कृपा पंगु गिरि लंघे में। ऋग्वेद में अंधे और लंगड़े का उल्लेख एक साथ हैः
प्रांधं श्रोणं च तारिषत् विवक्षसे।
इस कथा का ऋग्वेद में चार पांच बार हवाला आया है। एक स्थल पर स्पष्टतः प्रांधासीव का प्रयोग
जिसका मतलब जैसे अंधे ने कंधे पर बैठाया था उस तरह। एक अन्य स्थल पर , परावृजं प्रांधं श्रोणं चक्षस एतवे कृथः, अर्थात् यात्रा (प्रव्रज्या के दौरान ) लंगड़े की आंख के सहारे चलाया। साहित्य में इसका प्रयोग यह दर्शाता है कि यह ऋग्वेद की प्राचीनतम ऋचाओं के समय से भी बहुत पहले की कथा है।
दूसरे प्रश्न का एक अर्थ तो यह है कि
(क) हमारा समाज इतिहास में संस्थित और वर्तमान में व्यवस्थित रहा है। इसका एक पांव भविष्य की ओर उठा और दूसरा अतीत में धंसा रहा है। इसने इसे क्रूरतम झंझावातों मे अपने मिजाज और मूल्यों को बचाकर रखने की शक्ति दी।
(ख) इतिहास का अर्थ हमारे लिए राजाओं और सामन्तों के कारनामों का कालबद्ध अभिलेख नहीं रहा है। उनके तो नाम तक को बचाकर रखने की इसे कभी चिंता न हुई । इतिहास का अर्थ था अपनी ज्ञान संपदा और मूल्यपरंपरा की रक्षा और जातीय अनुभवों की रक्षा।
(ग) हमारी इतिहासदृष्टि और जीवनदृष्टि में गहन प्रगाढ़ता रही है । यह पुस्तकस्थ न रही, इसलिए केवल कुछ विशेषज्ञों के जानने की चीज नहीं रही है अपितु एक पर्यावरण रहीहै, बोध रही है, परन्तु मुझे विश्वास नहीं कि इतिहासबोध को इतना महत्व देने वाले लालबहादुर वर्मा ने भी कभी इस बात को समझने का प्रयास किया होगा।
(घ) हम यह नहीं कहते कि हमारी इतिहासदृष्टि पश्चिमी इतिहासदृष्टि से अच्छी है, बल्कि यह कि यह पश्चिमी इतिहासदृष्टि से भिन्न रही है, और अधिक लोकतांत्रिक रही है और किसी से हेय नही रही है।
तीसरे प्रश्न के संबंध मे यह कि यह एक तरह का तथ्यकथन है। पाश्चात्य अध्येता सत्यान्वेषण के लिए भारतीय साहित्य, समाज, इतिहास का अध्ययन नहीं कर रहे थे। सचाई का पता उन्हें पहली ही मुठभेड़ में चल गया था जैसे बलाबल का ज्ञान पंजा लड़ाते ही हो जाता है। वे धोखाधड़ी के लिए, सचाई पर परदा डालने के लिए, तरीके निकाल रहे थे, जिसके लिए उन्होंने असाधारण अध्यवसाय किया, रटन्त ज्ञान के स्थान पर विश्लेषणात्मक पद्धति से संस्कृत पर अधिकार किया, जितना अधिकार किया उससे अधिक का दावा करते रहे और इस कमी को पूरा करने के लिए संस्कृत के उन्हीं परंपरावादी विद्वानों की सहायता लेते रहे और अपने उन सहायकों की तुलना में अधिक प्रकांड पर उनके विचारों से असहमत विद्वानों का उपहास, उपेक्षा और तिरस्कार करते रहे, संस्कृत के अध्ययन केंद्रों को अपने संरक्षण या अधिकार में लेकर अपने हितों के अनुरूप ढालते रहे।
प्रसंगवश याद दिला दें कि ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के प्रति पूरे सम्मान के बाद भी यह सोचा जा सकता है कि यदि उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन न किया होता तो वह विद्यातड़ाग की भी ख्याति अर्जित न कर पाते। यही बात डरते डरते राजा राममोहन राय के विषय में भी कही जा सकती है कि उनकी ख्याति में चार चांद लगाने में अंग्रेजी अखवारों की जो भूमिका थी, उससे वंचित होने पर वह अपने कद से कुछ छोटे रह जाते।
मैं यह नहीं कहता कि अंग्रेजी शिक्षा का उनका अनुमोदन गलत था। लगता यह है कि वह तत्कालीन भाषाई परिस्थितियों में सही विचार था। पर यह शासकों के अधिक अनुरूप था।
विलियम जोंस से लेकर टामस बरो और बैशम तक यही प्रवृत्ति निरपवाद काम करती रही है।
(ख) नई पीढ़यों के प्रतिभाशाली, अत: महत्वाकांक्षी युवकों को संरक्षण, प्रोत्साहन, पुरस्कार इतने ननु नच के बाद देते हुए कि खरीद-बिक्री का अंदेशा न पैदा हो, वे अपने अनुरूप ढालते रहे। इसे मैं उनकी संभावनाओं का वेदनाहारी (एनेस्थीसिया) इंजेक्देशन देकर उनका बौद्धिक बधियाकरण कहना समीचीन समझता हूं।
(ग) जो काम अंग्रेज अपने औपनिवेशिक हितों के लिए कर रहे थे, वही यूरोप के दूसरे देशों के लोग यूरोप और गोरे रंग की श्रेष्ठता की चिंता से कर रहे थे, जब कि उनमें से कौन सच्चा आर्य है और उन सच्चे आर्यों को अपने देश से प्रवसित सिद्ध करने की होड़ मची थी।
(घ) मैंने अपने अब तक के अध्ययनों में जो चौंकाने वाले दावे किये हैं, उनमें अस्सी प्रतिशत का ज्ञान यूरोप के लगभग सभी अध्येताओं को ज्ञात था इसके बाद भी वे सामूहिक सहमति से इसे छिपाते और अखाड़े के बाहर पैंतरेबाजी करते हुए अपनी असहमतियां जताते हुए वस्तुपरक और वैज्ञानिक सोच का दावा करते रहे हैं।
(ड) पश्चिम ने आज भी वर्चस्व और दबंगई की पुरानी नीति नहीं बदली है। जो वहां प्रतिष्ठा की कामना करता है, वह उनके काम का होना चाहता है। जो पा चुका है वह हमारा नहीं, उनका काम कर रहा है। जो इस बात पर गर्व करते हैं कि उन को इतने देशों के इतने ज्ञान केन्द्रों में अध्यापन का अवसर मिला है, इसलिए वे अपने विषय के भी अधिकारी विद्वान हैं, उनका बौद्धिक वधियाकरण हो चुका है, यह कहते हुए संकोच होता है, पर सचाई से पलायन भी तो नहीं किया जा सकता ।
(च) कोई यूरोपीय विद्वान अपनी मानसिक जकड़बंदी के कारण यह समझ और स्वीकार नहीं कर सकता कि भारत में जब साक्षरता भी न थी, शिक्षाशास्त्र के ऐसे प्रयोग पांच हजार साल से पहले किए गए थे जिनमें शिक्षा को गधे की लादी बनाने की जगह विनोद और लोकरंजन की विधा में बदला गया था और इसके कारण विश्व में शिक्षा का स्तर तब भी व्यापक था जब साक्षरता का स्तर अपेक्षा के अनुरूप न था।
(नीचे जो चित्रावली है वह हड़प्पा के पुरावशेषों से संकलिलत प्रो. ब्रजवासी लाल की पुस्तकं हाउ डीप आर द रूट्स आफ दि इंडियन सिविलाइजेशन से एकत्र किए गए हैं। सभी नमूने हड़प्पा सभ्यता की पुरासंपदा के हैे । वही पटरी, वही कंघा, वही बहुत कुछ, पर इनमे वे कहानियां भी हैं।)
Post – 2017-11-28
Bhagwan Singh
Ghaziabad, Uttar Pradesh ·
वह बात जिससे हस्ती मिटती नहीं हमारी
दुश्मन भले रहा हो सारा जहां हमारा ।।
क्या आपने वह कहानी पढ़ी या सुनी है जिसमें एक प्यासा कौआ पानी के घड़े पर बैठता है, पर पाता है कि पानी इतना नीचे है कि उसकी चोंच पानी तक नही पहुंच सकती। वह आसपास से कंकड़ियां चुनता है और घड़े में तब तक डालता जाता है जब तक पानी ऊपर नहीं आ जाता, और फिर अपनी प्यास बुझा कर उड़ जाता है।
और वह कहानी जिसमें एक कुत्ता मुंह में रोटी का टुकड़ा दबाए चला जा रहा है। पानी में अपनी छाया देखकर सोचता है कोई दूसरा कुत्ता रोटी लिए चला जा रहा है। उससे रोटी छीनने के लिए वह भौंकता है और इसके साथ उसकी रोटी मुंह से गिर जाती है।
यह कहानी न भी सुनी हो तो भी वह उक्ति तो सुनी ही होगी, आधी तज सारी को धावै, आधी रहै न सारी पावै।
एक तीसरी कहानी। एक पेड़ पर एक कौआ चोंच में रोडी का टुकड़ा दबाए बैठा है। नीचे से एक लोमड़ी गुजरती है। रोटी देखकर लोमड़ी के मुंह में पानी भर आता है। वह पेड़ का नीचे बैठ जाती है और कौए के सुरीले कंठ की झूठी तारीफ करके उससे गाना गाने का अनुरोध करती है। वह गाने के लिए मुंह खोलता है कि रोटी नीचे गिर जाती है और लोमड़ी रोटी ले कर चंपत हो जाती है।
अब एक और कहानी ले लीजिए। एक था अंधा और एक था लंगड़ा। दोनों को एक चढ़ाई पार करनी थी। समतल मैदान में तो बेचारे टटोलते लटकते चल भी सकते थे। पर चढ़ाई पार करना तो उनके वश का था नहीं। लंगड़े ने सुझाया, यदि अंधा उसे कंधे पर चढ़ा ले तो दोनों चढ़ाई पार कर सकते हैं। और अंधे की समझ में भी यह बात आ गई। दोनों पार हो गए।
१. क्या आप जानते हैं ये कथाएं कितने हजार साल से सुनी और सुनाई जा रही हैं?
२. क्या आप जानते हैं इन कहानियों का अर्थ क्या है?
३. क्या आप जानते हैं कि इस इतिहास की खोज कोई विदेशी अध्येता नहीं कर सकता था और इस लिए जो अंग्रेजी को ज्ञान की भाषा मानते हैं और उसपर इतना भरोसा करते हैं की अंग्रेजी के ज्ञान को ही विषय के आधिकारिक ज्ञान का पर्याय मान लेते हैं वे कितने सिरफिरे हैं ?
पहले तो अपने सवालों के तेवर के लिए क्षमा याचना करूं, जिनसे हो सकता है आपके अहम् को चोट पहुंची हो, फिर इन प्रश्नों का उत्तर दूँ जिससे हो सकता है आपको भी लगे कि तेवर सख्त भले हो, इसका औचित्य था।
पहले प्रश्न का उत्तर तलाशते हुए हमारा ध्यान अधिक से अधिक पंचतंत्रकार विष्णु शर्मा तक या वृहत्कथाकार गुणाढ्य तक जा सकता है, पर जानते हैं पहली तीनों कहानियां हड़प्पा के बर्तनों पर चित्रित हैं। चित्रित हैं का यह मतलब नहीं कि ये ठीक उसी समय लिखी गई थीं। मतलब सिर्फ यह कि ये आज से पांच हजार साल से पहले कभी रची जा चुकी थी। चौथी कहानी ऋग्वेद में उसी तरह दैव कृपा से प्रेरित बताई गई है जैसे तुलसीदास के जाकी कृपा पंगु गिरि लंघे में। ऋग्वेद में अंधे और लंगड़े का उल्लेख एक साथ हैः
प्रांधं श्रोणं च तारिषत् विवक्षसे।
इस कथा का ऋग्वेद में चार पांच बार हवाला आया है। एक स्थल पर स्पष्टतः प्रांधासीव का प्रयोग
जिसका मतलब जैसे अंधे ने कंधे पर बैठाया था उस तरह। एक अन्य स्थल पर , परावृजं प्रांधं श्रोणं चक्षस एतवे कृथः, अर्थात् यात्रा (प्रव्रज्या के दौरान ) लंगड़े की आंख के सहारे चलाया। साहित्य में इसका प्रयोग यह दर्शाता है कि यह ऋग्वेद की प्राचीनतम ऋचाओं के समय से भी बहुत पहले की कथा है।
दूसरे प्रश्न का एक अर्थ तो यह है कि
(क) हमारा समाज इतिहास में संस्थित और वर्तमान में व्यवस्थित रहा है। इसका एक पांव भविष्य की ओर उठा और दूसरा अतीत में धंसा रहा है। इसने इसे क्रूरतम झंझावातों मे अपने मिजाज और मूल्यों को बचाकर रखने की शक्ति दी।
(ख) इतिहास का अर्थ हमारे लिए राजाओं और सामन्तों के कारनामों का कालबद्ध अभिलेख नहीं रहा है। उनके तो नाम तक को बचाकर रखने की इसे कभी चिंता न हुई । इतिहास का अर्थ था अपनी ज्ञान संपदा और मूल्यपरंपरा की रक्षा और जातीय अनुभवों की रक्षा।
(ग) हमारी इतिहासदृष्टि और जीवनदृष्टि में गहन प्रगाढ़ता रही है । यह पुस्तकस्थ न रही, इसलिए केवल कुछ विशेषज्ञों के जानने की चीज नहीं रही है अपितु एक पर्यावरण रहीहै, बोध रही है, परन्तु मुझे विश्वास नहीं कि इतिहासबोध को इतना महत्व देने वाले लालबहादुर वर्मा ने भी कभी इस बात को समझने का प्रयास किया होगा।
(घ) हम यह नहीं कहते कि हमारी इतिहासदृष्टि पश्चिमी इतिहासदृष्टि से अच्छी है, बल्कि यह कि यह पश्चिमी इतिहासदृष्टि से भिन्न रही है, और अधिक लोकतांत्रिक रही है और किसी से हेय नही रही है।
तीसरे प्रश्न के संबंध मे यह कि यह एक तरह का तथ्यकथन है। पाश्चात्य अध्येता सत्यान्वेषण के लिए भारतीय साहित्य, समाज, इतिहास का अध्ययन नहीं कर रहे थे। सचाई का पता उन्हें पहली ही मुठभेड़ में चल गया था जैसे बलाबल का ज्ञान पंजा लड़ाते ही हो जाता है। वे धोखाधड़ी के लिए, सचाई पर परदा डालने के लिए, तरीके निकाल रहे थे, जिसके लिए उन्होंने असाधारण अध्यवसाय किया, रटन्त ज्ञान के स्थान पर विश्लेषणात्मक पद्धति से संस्कृत पर अधिकार किया, जितना अधिकार किया उससे अधिक का दावा करते रहे और इस कमी को पूरा करने के लिए संस्कृत के उन्हीं परंपरावादी विद्वानों की सहायता लेते रहे और अपने उन सहायकों की तुलना में अधिक प्रकांड पर उनके विचारों से असहमत विद्वानों का उपहास, उपेक्षा और तिरस्कार करते रहे, संस्कृत के अध्ययन केंद्रों को अपने संरक्षण या अधिकार में लेकर अपने हितों के अनुरूप ढालते रहे।
प्रसंगवश याद दिला दें कि ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के प्रति पूरे सम्मान के बाद भी यह सोचा जा सकता है कि यदि उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन न किया होता तो वह विद्यातड़ाग की भी ख्याति अर्जित न कर पाते। यही बात डरते डरते राजा राममोहन राय के विषय में भी कही जा सकती है कि उनकी ख्याति में चार चांद लगाने में अंग्रेजी अखवारों की जो भूमिका थी, उससे वंचित होने पर वह अपने कद से कुछ छोटे रह जाते।
मैं यह नहीं कहता कि अंग्रेजी शिक्षा का उनका अनुमोदन गलत था। लगता यह है कि वह तत्कालीन भाषाई परिस्थितियों में सही विचार था। पर यह शासकों के अधिक अनुरूप था।
विलियम जोंस से लेकर टामस बरो और बैशम तक यही प्रवृत्ति निरपवाद काम करती रही है।
(ख) नई पीढ़यों के प्रतिभाशाली, अत: महत्वाकांक्षी युवकों को संरक्षण, प्रोत्साहन, पुरस्कार इतने ननु नच के बाद देते हुए कि खरीद-बिक्री का अंदेशा न पैदा हो, वे अपने अनुरूप ढालते रहे। इसे मैं उनकी संभावनाओं का वेदनाहारी (एनेस्थीसिया) इंजेक्देशन देकर उनका बौद्धिक बधियाकरण कहना समीचीन समझता हूं।
(ग) जो काम अंग्रेज अपने औपनिवेशिक हितों के लिए कर रहे थे, वही यूरोप के दूसरे देशों के लोग यूरोप और गोरे रंग की श्रेष्ठता की चिंता से कर रहे थे, जब कि उनमें से कौन सच्चा आर्य है और उन सच्चे आर्यों को अपने देश से प्रवसित सिद्ध करने की होड़ मची थी।
(घ) मैंने अपने अब तक के अध्ययनों में जो चौंकाने वाले दावे किये हैं, उनमें अस्सी प्रतिशत का ज्ञान यूरोप के लगभग सभी अध्येताओं को ज्ञात था इसके बाद भी वे सामूहिक सहमति से इसे छिपाते और अखाड़े के बाहर पैंतरेबाजी करते हुए अपनी असहमतियां जताते हुए वस्तुपरक और वैज्ञानिक सोच का दावा करते रहे हैं।
(ड) पश्चिम ने आज भी वर्चस्व और दबंगई की पुरानी नीति नहीं बदली है। जो वहां प्रतिष्ठा की कामना करता है, वह उनके काम का होना चाहता है। जो पा चुका है वह हमारा नहीं, उनका काम कर रहा है। जो इस बात पर गर्व करते हैं कि उन को इतने देशों के इतने ज्ञान केन्द्रों में अध्यापन का अवसर मिला है, इसलिए वे अपने विषय के भी अधिकारी विद्वान हैं, उनका बौद्धिक वधियाकरण हो चुका है, यह कहते हुए संकोच होता है, पर सचाई से पलायन भी तो नहीं किया जा सकता ।
(च) कोई यूरोपीय विद्वान अपनी मानसिक जकड़बंदी के कारण यह समझ और स्वीकार नहीं कर सकता कि भारत में जब साक्षरता भी न थी, शिक्षाशास्त्र के ऐसे प्रयोग पांच हजार साल से पहले किए गए थे जिनमें शिक्षा को गधे की लादी बनाने की जगह विनोद और लोकरंजन की विधा में बदला गया था और इसके कारण विश्व में शिक्षा का स्तर तब भी व्यापक था जब साक्षरता का स्तर अपेक्षा के अनुरूप न था।
(नीचे जो चित्रावली है वह हड़प्पा के पुरावशेषों से संकलिलत प्रो. ब्रजवासी लाल की पुस्तकं हाउ डीप आर द रूट्स आफ दि इंडियन सिविलाइजेशन से एकत्र किए गए हैं। सभी नमूने हड़प्पा सभ्यता की पुरासंपदा के हैे । वही पटरी, वही कंघा, वही बहुत कुछ, पर इनमे वे कहानियां भी हैं।)
Post – 2017-11-27
क्या इसको कहा जाता है बरसात का मौसम
जब आंख नम हुई तो संभाली नहीं जाती।।
Post – 2017-11-27
हम भी मगरूर नहीं हैं फिर भी
सच कहेंगे तो बुरा मानोगे ।।
सुना आपबीती रहा था, फिर उसमें इतिहास और इतिहासकारों पर चर्चा कहां से आ गई?
इसे समझना कई दृष्टियों से रोचक हो सकता है। इनमें एक है मेरी चेतना और विचार प्रक्रिया जिससे मुझे बहुत असंतोष रहा है, परंतु जिसे समझने की इससे पहले मैंने कोशिश नहीं की। जो दोष मुझे सबसे अधिक खलता रहा है वह है एकाग्रता का अभाव और किसी एक काम को करते हुए थकान की जगह किसी दूसरे काम का आकर्षण। उस काम को छोड़ कर दूसरे पर जुट जाना और इसके बाद भी पहले को पूरा करने की चिन्ता का कहीं अनतर्मन में बने रहना, जिसके कारण इस दूसरे काम को भी पूरा करने से पहले इसकी ओर लौट पड़ना और कुछ विलंब से यह समझ पाना कि ये अलग नहीं हैं। इनके बीच गहरा संबंध है। एक का सतही ज्ञान भी दूसरे को अधिक गहराई से जानने में सहायक है। एक तक सीमित रह कर उसका सारा ज्ञान बटोर कर भी मैं उसे इतनी स्पष्टता से नहीं जान सकता था।
जो धुरीण विद्वानों के लिए जानकारी होती है और वे उनके बीच के अन्तर्विरोधों को भी नगण्य मान कर उनकी अवज्ञा कर जाते हैं और जब उनसे सामना कराया जाय तो वे हक्का बक्का रह जाते हैं वह मेरे लिए एक चित्र या चित्रमाला में बदल जाता है और इसमें मेरे अपने जीवन के अनुभव आधार फलक का काम करतें है ।
इसका दोष यह कि जहां दूसरे लोग अपने ज्ञान और कौशल के अनुसार किसी विषय पर सुथरे रूप में अपनी बात रख लेते है वहां उसके चित्र को शब्दबद्ध करना इतना कठिन होता है कि उसके एक पक्ष को बयान करने में इतना समय लग जाता है कि मैं दूसरे पहलुओं को भूल कर मान लेता हूं कि इससे समस्या का समाधान हो गया।
यदि कोई मेरे कथन पर सवाल उठाए तो उसका जवाब देने की जरूरत नहीं समझता। ऐसे प्रश्न समझने के लिए नहीं किए जाते, दोषदर्शन के लिए किए जाते हैं। जिज्ञासावश किए जायं तो समझाने में आनन्द भी आता है।
एक दूसरी बात जिसे समझने में इससे मदद मिल सकती है वह यह कि छोटी से छोटी विसंगति या असंगति जिसकी हम उपेक्षा कर जाते हैं, या जो हमारी जानकारी में पहले नहीं रही होती है या जिसका हम ध्यान नहीं रख पाते उसके जुड़ते ही पूरा आकलन बदल या उलट सकता है इसलिए छोटा से छोटा घटक सत्यान्वेषण में छोटा नहीं होता और तब तो बिल्कुल नहीं जब वह अनमेल पड़ रहा हो। उसकी निर्णायक भूमिका हो सकती है। वह पुराने नतीजे को बदल सकता है। सच तो यह है कि धूर्त लोग तर्काडंबर और वागाडंर से इन पर परदा डालते हुए अर्धसत्यों के सहारे झूठ को सच और सच को झूठ सिद्ध कर देते है। यह अदालतों में भी होता है और समाजशास्त्रीय विवेचन में भी।
अब मैं उस स्मृति लोक और विचार प्रवाह पर बात कर सकता हूं जिससे निजी पीड़ा सामाजिक में, सामाजिक ऐतिहासिक में, ऐतिहासिक इसी चिंतन क्रम में एक नई सूचना के कारण ऐसी ऐतिहासिक बहस में बदल गई कि निजी और सामाजिक कुछ समय के लिए तिरोहित हो गया। कहें क्षुद्र पर सघन निजी पीड़ा माइक्रो से महत् आकार लेकर वैश्विक और कालातीत हो गई।
हम अतीत को जीते नहीं हैं, जीना भी नहीं चाहिए अन्यथा जीते जी सड़ जाएंगे। पर अतीत का बहुत कुछ वर्तमान होता है, इसलिए यदि हठपूर्वक अतीत को वर्तमान से बाहर करने की जिद ठान लें तो हम विक्षिप्त हो जाएंगे। अपने को तर्कवादी कहते हुए मुंहजोरी करने वाले इस सीधी सी बात को समझ नहीं पाते। पर कभी कभी कभी वह अतीत जो वर्तमान का हिस्सा नहीं है, दंश के रूप में उभर आता है, व्यथित करता है, पर यह किसी गहन स्तर पर हमें समृद्ध और सचेत भी करता है। यह स्मृतिदंश व्यक्तिगत भी हो सकता है, जातीय भी, राष्ट्रीय भी। जिन्हें यह दंश नहीं होता, वे या तो कालजयी हैं, या अपना आपा खो चुके हैं, या पाखंडी हैं।
सामान्यत: मैं अपने वर्तमान में ही रहता हूं, पर कभी कभी बचपन का दंश पीड़ामिश्रित गुदगुदी के रूप में उभरता है तो विगलित होने का, उन आंसुओं को जो तब न बहाए जा सके या बहने से रह गए बहाने का भी जी होता है। यह रेचन की प्रक्रिया है। जब आपबीती लिखने चला तब तो इससे बच ही नहीं सकता।
फिर
मैं थक जाता था। छोटी बहन का वजन जिस गति से बढ़ रहा था उस गति से मेरी क्षमता नहीं बढ़ रही थी। इसलिए उसका बड़ा होना मेरी यातना में वृद्धि का पर्याय था। इसी क्रम में याद आया कि यदि मेरे घर में एक पालना होता तो उसे गोद में संभाले, रोने से बचाने के लिए हिलाने डुलाने की जगह उसमें रख कर झुलाते हुए उस यातना से बच सकता था। बाबा जो दूसरे बहुत से खर्चे करते रहते थे, जो मेरी यातना के द्रष्टा भी थे, कम से कम इतना तो कर सकते थे कि एक पालना बनवा दें। निष्कर्ष, उस समय पहले पुत्र या पुत्री को छोड़ कर शेष संतानों को अवांछित संतान समझा जाता था।
यह याद आया कि पालना तो उन संतानों के लिए भी न था जिनको इतना प्यार किया जाता था कि वह दिखाई भी देता था। गौर किया तो पाया कि जिन घरों से मैं परिचित था उनमें किसी घर में पालना दिखाई ही नहीं दिया। मैने बचपन में भोगा था पर याद आज अपनी अद्यतन सूचनाओं से लैस हो कर कर रहा था इसलिए मुझे भारतीय ग्राम समाज के विषय में मार्क्स के विचार भी याद आए और कोसंबी ने उनकी आलोचना में जो कुछ कहा है वह भी याद आया पर लगा मार्क्स उसके बाद भी सही हैं। वे ही खिलौने, वे ही दस्तूर, वही शिक्षा प्रणाली, वही पटरी, वही कंघा, वही सिंदूर, वही खेल, वही टुंइया, वही कूंड़ा जो हड़प्पा काल में प्रचललित था मेरे अपने ग्रामसमाज में भी प्रचलित था। पांच हजार सालों में कुछ बदला ही नहीं।
पर इस पर टिकता उससे पहले ही यह प्रश्न मुंह बा कर खड़ा हो गया कि जब हमारे ग्राम समाज तक हड़प्पा कालीन आवास व्यवस्था, उपकरणों और मानों के साथ जीवित हैं तो फिर आर्य कौन थे? क्या थे? क्यों थे? और इसी बीच एक मित्र ने एक लिंक भेज दिया और जो निजी था उसे एक पुराने शेर को पिंजड़े से निकाल कर असली शेर बनाने जैसी कवायद से गुजरना पड़ा –
सिकुड़ो तो आप ही हैं
फैलो तो जमाना है ।।
Post – 2017-11-26
इतनी फुर्सत नहीें है ऐ नासेह
वर्ना मैं खुद खुदा को समझाता।।
Post – 2017-11-26
मैं याद तुझे आऊंगा उस वक्त ऐ अजीज
जब याद भी आती थी कभी, याद न होगा।।