Post – 2015-05-20

इतने अभिभावकों के बीच
इतना अनाथ
इतने हमदर्दों के बीच
इतना विक्षिप्त
इतने चिरागों को परस्पर काटता अँधेरा
संभव है
पर ज़रूरी नहीं
यही मैं हूँ
ज़रूरी नहीं मेरा होना
फिर भी हूँ
जब तक हूँ
एक प्रश्न बना.

Post – 2015-05-20

जो कुछ नहीं कह पाते, तड़पते ही हैं अक्सर
तुम उनको कहा करते हो वे कुछ नहीं कहते
हम इतना कहा करते हैं हर सिम्त हमी हम
क्या सच नहीं हम बकते हैं और कुछ नहीं कहते.
5/20/2015 9:39:38 PM

Post – 2015-05-20

जो कुछ नहीं कह पाते, तड़पते ही हैं अक्सर
तुम उनको कहा करते हो वे कुछ नहीं कहते
हम इतना कहा करते हैं हर सिम्त हमी हम
क्या सच नहीं हम बकते हैं और कुछ नहीं कहते.
5/20/2015 9:39:38 PM

Post – 2015-05-03

A versification as usual but reported late to entertain U. Mind the date and time.
तुम्ही को मैंने चाहा है
तुम्ही पर जान भी देंगे
यह उर्दू में ही सम्भव है
कि फिर ईमान भी देंगे
मुहब्बत की कई शर्तें हैं
नामालूम थीं मुझको
जिगर को चीर कर देंगे
कलेजा काट कर देंगे
मुहब्बत बेवफा इतनी है
वह भी सिर्फ उर्दू में
कि हम सब कुछ लुटा देंगे
तो वह इलज़ाम भी देंगे
4/6/2015 9:50:49 PM
कुछ यूं की कोई चूम ले अपने कलम की नोक
लिखता हूँ मगर उसका दिखावा नहीं करता
दिखलानां भी चाहूँ तो हैं परदे हज़ार लाख
मैं उनको फाड़ने का इरादा नहीं करता
जो जान नहीं सकते, समझते है अधिक कुछ
वे मुझको भी समझें यह तकादा नहीं करता
करता हूँ एक काम और वह भी छुपाकर
आगे भी करूँगा ही, यह वादा नहीं करताA
5/3/2015 9:37:06 PM

Post – 2015-05-03

A versification as usual but reported late to entertain U. Mind the date and time.
तुम्ही को मैंने चाहा है
तुम्ही पर जान भी देंगे
यह उर्दू में ही सम्भव है
कि फिर ईमान भी देंगे
मुहब्बत की कई शर्तें हैं
नामालूम थीं मुझको
जिगर को चीर कर देंगे
कलेजा काट कर देंगे
मुहब्बत बेवफा इतनी है
वह भी सिर्फ उर्दू में
कि हम सब कुछ लुटा देंगे
तो वह इलज़ाम भी देंगे
4/6/2015 9:50:49 PM
कुछ यूं की कोई चूम ले अपने कलम की नोक
लिखता हूँ मगर उसका दिखावा नहीं करता
दिखलानां भी चाहूँ तो हैं परदे हज़ार लाख
मैं उनको फाड़ने का इरादा नहीं करता
जो जान नहीं सकते, समझते है अधिक कुछ
वे मुझको भी समझें यह तकादा नहीं करता
करता हूँ एक काम और वह भी छुपाकर
आगे भी करूँगा ही, यह वादा नहीं करताA
5/3/2015 9:37:06 PM

Post – 2015-04-22

राजनितिक अधोगति और संवेदन-शून्यता इस पराकाष्ठा पर पहुँच सकती है यह सोचकर घबराहट होती है. यह योजनाबद्ध रूप में घटित हुआ. यह मैं नहीं कहता आप का विश्वास कह रहा है. यह पुरानी भाषा में स्खलक्षर न्याय और फ्रायड के विश्लेषण में साइकोलॉजी ऑफ़ errors में आता है. उसका लिखा नोट लिखवाया हुआ है और उसका फन्दा लगाने से पहले का इंतज़ार और चारों ओर देखना और फिर यह देखकर की जिनको उसे बचने के लिए शोर मचाना था, उसकी और बचने के लिए दौड़ना था वे नज़र फेर ले रहे हैं, झाड़ू लहराते हुए चीखना जिसे रिकॉर्ड नहीं किया जा सका वास्तविकता का ऐलान. मंडल विरोध में जो विश्वासघात आत्मदाह के लिए तैयार होने वाले युवक के साथ हुआ था, कुछ वैसा ही यहाँ दीखता है.
वह प्राकृतिक आपदा के लिए ज़िम्मेदार नहीं था, इसलिए उसका पिता उसे अपने घर से इस कारण निकाल नहीं सकता था. प्रकृति के प्रकोप के बाद भी उसके घर में शादी थी. ऐसे में किसी को घर से निकाला नहीं जाता. वह किसान नहीं था किसान का बेटा था. आप का समर्थक था. तैयार किया गया था और तैयार हो कर आया था. उस रैली में जिसे केजरीवाल ने मोदी को कठघरे में खड़ा करने के लिए आयोजित किया था . उसकी चीख पर ध्यान नहीं दिया गया. एक्ट पूरा होने तक. फिर मंच से पुलिस पर दोषारोपण और पुलिस अपने अधीन न होने की राजनीति शुरू गई. फिर भी आप मानेगे यह किसान की आत्महत्या थी?

Post – 2015-04-22

राजनितिक अधोगति और संवेदन-शून्यता इस पराकाष्ठा पर पहुँच सकती है यह सोचकर घबराहट होती है. यह योजनाबद्ध रूप में घटित हुआ. यह मैं नहीं कहता आप का विश्वास कह रहा है. यह पुरानी भाषा में स्खलक्षर न्याय और फ्रायड के विश्लेषण में साइकोलॉजी ऑफ़ errors में आता है. उसका लिखा नोट लिखवाया हुआ है और उसका फन्दा लगाने से पहले का इंतज़ार और चारों ओर देखना और फिर यह देखकर की जिनको उसे बचने के लिए शोर मचाना था, उसकी और बचने के लिए दौड़ना था वे नज़र फेर ले रहे हैं, झाड़ू लहराते हुए चीखना जिसे रिकॉर्ड नहीं किया जा सका वास्तविकता का ऐलान. मंडल विरोध में जो विश्वासघात आत्मदाह के लिए तैयार होने वाले युवक के साथ हुआ था, कुछ वैसा ही यहाँ दीखता है.
वह प्राकृतिक आपदा के लिए ज़िम्मेदार नहीं था, इसलिए उसका पिता उसे अपने घर से इस कारण निकाल नहीं सकता था. प्रकृति के प्रकोप के बाद भी उसके घर में शादी थी. ऐसे में किसी को घर से निकाला नहीं जाता. वह किसान नहीं था किसान का बेटा था. आप का समर्थक था. तैयार किया गया था और तैयार हो कर आया था. उस रैली में जिसे केजरीवाल ने मोदी को कठघरे में खड़ा करने के लिए आयोजित किया था . उसकी चीख पर ध्यान नहीं दिया गया. एक्ट पूरा होने तक. फिर मंच से पुलिस पर दोषारोपण और पुलिस अपने अधीन न होने की राजनीति शुरू गई. फिर भी आप मानेगे यह किसान की आत्महत्या थी?

Post – 2015-04-20

जनसत्ता ने संस्कृति को राजनीति के समकक्ष रखा है यह देखकर बड़ी रहत मिलती है. कम से कम साहित्यकार के दिन पुरे होने और साँस लेते हुए उसने कुछ किया भी था इसका पता चल जाता है. विजयमोहन सिंह बहुत मनस्वी आलोचक थे यह बात उनके निकट और अभिन्न आलोचकों को भी शोक और स्मरण के क्षणों में ही याद आया. पहले नहीं. अपने आप को लेकर हम सब इतने व्यस्त हैं कि देश दुनिया की खबर ही नहीं. खबर के नाम पर भी देश दुनिया गायब है. ढोल की आवाज़ ही बच रही है.