Post – 2018-05-03

यशो वै सः

आप ठीक कहते है, सही पाठ ‘रसो वै सः ‘ ही है। पर एक स्थल पर मैंने पढ़ा, पहले उसके सिवा और कुछ था ही नहीं । बेचारा अकेला था। उसके जी में आया वह अपना जनन करे। इसके लिए उसने श्रम किया, तप किया और फिर जब थका कर निढाल हो गया तो पसीना पसीना हो गया अर्थात् उससे जल पैदा हुआ । ‘पजापतिर्वा इदं अग्र आसीत्। एक एव सो अकामयत स्वां प्रजाय इति सो अश्राम्यत् स तपो अतप्यत तस्मात् श्रान्तः तेपानात् आपो असृज्यन्त… ।’ शतपथ ब्रा. 6.1.3.1

सः

/ ‘ > < ? * तस्माद्देवा अग्निमुखा अन्नं अदन्ति, ....तद्देवा अन्नमकुर्वत । शब.7.1.2.4 द्वयं वाचो रूपं, दैवं च मानुषं च, उच्चैश्च शनैशच तदेते द्वे । शब. 7.1.2.18 यशस्वतीः (1.79.1) अन्नवती, 0वय (1.83.4) हविर्लक्षणमन्नं, ;(1.104.7) अन्नं, (2.20.1) वयः शोभनलक्षणमन्नं, वयसः (8.48.1) अन्नस्य, वयसा (2.33.6) अन्नेन, ;(6.36.5) हविर्लक्षणेन, वयोधाः (6.75.9) अन्नस्यदातार, 0वरिवःविदं (2.41.9) अन्नस्य लम्भकं, (4.55.1) धनं, वरिवस्कृत् (8.16.6) धनस्य कर्ता, 0वर्चः (3.8.3; 3.24.1) अन्नं, वर्चसा (1.23.23) तेजसा, वाजः (2.1.12) (6.26.1) अन्नं, वाजदा (3.36.5) अन्नप्रदा, 0वाजपस्त्यः (6.58.2) अन्नानि गृहे यस्य तादृशः, वाजयन्तः (4.17.16) अन्नमिच्छन्तः, (4.25.8) वाजमन्नमिच्छन्, (4.42.5) संग्राममिच्छन्तः, (5.4.1) अन्नमिच्छन्तो वाजयन्तं (5.31.1) अन्नमिच्छन्तं, (7.90.7) बलमात्मन इच्छन्तः, वाजययन्तं (5.35.7) संग्रामं धनं वा इच्छन्तः, वाजसातमं (1.78.3) अन्नानां अतिशयं दातारं, (5.20.1) ं, वाजसातमं (1.78.3) अन्नानां अतिशयं दातारं, (5.20.1) ं, वाजी (7.1.14) वाजवान् अन्नवान्, (2.10.1) बलवान्, (5.1.4) वेजनवानग्निः, (7.34.1) वेगवान, विष्वधायसं (2.17.5) विष्वस्य धात्रीं (पृथिवीं), (5.8.1) बहुअन्नं, (7.4.5) विष्वस्य धारकं, विष्वधाया (3.55.21) सर्वान्नो, श्रवः (1.9.7) धनं, (1.9.8) कीर्ति, (3.53.15) अन्नं, श्रवसे (1.113.6) अन्नार्थ, 0श्रवस्यानि (1.100.5) अन्नानि उदकानि, 0सनानि (1.95.10) अन्नानि, सनिं (1.18.6) धनस्यदातारं, ससवान् (6.44.7) ससमिति अन्ननाम, अन्नवान, (7.87.2) अन्नवान्, स्वधा (1.144.2) अमृतोपम अपः, स्वधां (1.88.6) अन्नं; (2.35.7) वृष्टि उदकं, स्वधापते (6.44.1) अन्नस्य पालकः, स्वधाभिः (1.113.12) आत्मीयैः तेजोभिः, (7.35.3) अन्नैः, (7.104.9) बलैर्युक्ता, (8.10.4) बलहेतुभिः स्तुतिभिः, इल जीमपत ळवकीमंक स्वधावः (1.147.1) अन्नयुक्तः, (3.35.3) अत्यन्त अन्नयुक्त, (6.21.3) बलवन्, (7.86.4) तेजस्विन्, स्वधावन् (5.3.2) अन्नवन्, स्वधां (1.88.6) अन्नं; (2.35.7) वृष्टि उदकं, स्वधापते (6.44.1) अन्नस्य पालकः, स्वधाभिः (1.113.12) आत्मीयैः तेजोभिः, (7.35.3) अन्नैः, (7.104.9) बलैर्युक्ता, (8.10.4) बलहेतुभिः स्तुतिभिः, इल जीमपत ळवकीमंक स्वधावः (1.147.1) अन्नयुक्तः, (3.35.3) अत्यन्त अन्नयुक्त, (6.21.3) बलवन्, (7.86.4) तेजस्विन्, 0स्वधावन् (5.3.2) अन्नवन्, स्वावसुः (5.44.7) स्वायत्त धनं, 0अधिभोजना (6.47.23) भोजनमिति धनं अधिकं धन,

Post – 2018-05-03

यशो वै सः

आप ठीक कहते है, सही पाठ ‘रसो वै सः ‘ ही है। पर एक स्थल पर मैंने पढ़ा, पहले उसके सिवा और कुछ था ही नहीं । बेचारा अकेला था। उसके जी में आया वह अपना जनन करे। इसके लिए उसने श्रम किया, तप किया और फिर जब थका कर निढाल हो गया तो पसीना पसीना हो गया अर्थात् उससे जल पैदा हुआ । ‘पजापतिर्वा इदं अग्र आसीत्। एक एव सो अकामयत स्वां प्रजाय इति सो अश्राम्यत् स तपो अतप्यत तस्मात् श्रान्तः तेपानात् आपो असृज्यन्त… ।’ शतपथ ब्रा. 6.1.3.1

सः

/ ‘ > < ? * तस्माद्देवा अग्निमुखा अन्नं अदन्ति, ....तद्देवा अन्नमकुर्वत । शब.7.1.2.4 द्वयं वाचो रूपं, दैवं च मानुषं च, उच्चैश्च शनैशच तदेते द्वे । शब. 7.1.2.18 यशस्वतीः (1.79.1) अन्नवती, 0वय (1.83.4) हविर्लक्षणमन्नं, ;(1.104.7) अन्नं, (2.20.1) वयः शोभनलक्षणमन्नं, वयसः (8.48.1) अन्नस्य, वयसा (2.33.6) अन्नेन, ;(6.36.5) हविर्लक्षणेन, वयोधाः (6.75.9) अन्नस्यदातार, 0वरिवःविदं (2.41.9) अन्नस्य लम्भकं, (4.55.1) धनं, वरिवस्कृत् (8.16.6) धनस्य कर्ता, 0वर्चः (3.8.3; 3.24.1) अन्नं, वर्चसा (1.23.23) तेजसा, वाजः (2.1.12) (6.26.1) अन्नं, वाजदा (3.36.5) अन्नप्रदा, 0वाजपस्त्यः (6.58.2) अन्नानि गृहे यस्य तादृशः, वाजयन्तः (4.17.16) अन्नमिच्छन्तः, (4.25.8) वाजमन्नमिच्छन्, (4.42.5) संग्राममिच्छन्तः, (5.4.1) अन्नमिच्छन्तो वाजयन्तं (5.31.1) अन्नमिच्छन्तं, (7.90.7) बलमात्मन इच्छन्तः, वाजययन्तं (5.35.7) संग्रामं धनं वा इच्छन्तः, वाजसातमं (1.78.3) अन्नानां अतिशयं दातारं, (5.20.1) ं, वाजसातमं (1.78.3) अन्नानां अतिशयं दातारं, (5.20.1) ं, वाजी (7.1.14) वाजवान् अन्नवान्, (2.10.1) बलवान्, (5.1.4) वेजनवानग्निः, (7.34.1) वेगवान, विष्वधायसं (2.17.5) विष्वस्य धात्रीं (पृथिवीं), (5.8.1) बहुअन्नं, (7.4.5) विष्वस्य धारकं, विष्वधाया (3.55.21) सर्वान्नो, श्रवः (1.9.7) धनं, (1.9.8) कीर्ति, (3.53.15) अन्नं, श्रवसे (1.113.6) अन्नार्थ, 0श्रवस्यानि (1.100.5) अन्नानि उदकानि, 0सनानि (1.95.10) अन्नानि, सनिं (1.18.6) धनस्यदातारं, ससवान् (6.44.7) ससमिति अन्ननाम, अन्नवान, (7.87.2) अन्नवान्, स्वधा (1.144.2) अमृतोपम अपः, स्वधां (1.88.6) अन्नं; (2.35.7) वृष्टि उदकं, स्वधापते (6.44.1) अन्नस्य पालकः, स्वधाभिः (1.113.12) आत्मीयैः तेजोभिः, (7.35.3) अन्नैः, (7.104.9) बलैर्युक्ता, (8.10.4) बलहेतुभिः स्तुतिभिः, इल जीमपत ळवकीमंक स्वधावः (1.147.1) अन्नयुक्तः, (3.35.3) अत्यन्त अन्नयुक्त, (6.21.3) बलवन्, (7.86.4) तेजस्विन्, स्वधावन् (5.3.2) अन्नवन्, स्वधां (1.88.6) अन्नं; (2.35.7) वृष्टि उदकं, स्वधापते (6.44.1) अन्नस्य पालकः, स्वधाभिः (1.113.12) आत्मीयैः तेजोभिः, (7.35.3) अन्नैः, (7.104.9) बलैर्युक्ता, (8.10.4) बलहेतुभिः स्तुतिभिः, इल जीमपत ळवकीमंक स्वधावः (1.147.1) अन्नयुक्तः, (3.35.3) अत्यन्त अन्नयुक्त, (6.21.3) बलवन्, (7.86.4) तेजस्विन्, 0स्वधावन् (5.3.2) अन्नवन्, स्वावसुः (5.44.7) स्वायत्त धनं, 0अधिभोजना (6.47.23) भोजनमिति धनं अधिकं धन,

Post – 2018-05-03

यशो वै सः

आप ठीक कहते है, सही पाठ ‘रसो वै सः ‘ ही है। पर एक स्थल पर मैंने पढ़ा, पहले उसके सिवा और कुछ था ही नहीं । बेचारा अकेला था। उसके जी में आया वह अपना जनन करे। इसके लिए उसने श्रम किया, तप किया और फिर जब थका कर निढाल हो गया तो पसीना पसीना हो गया अर्थात् उससे जल पैदा हुआ । ‘पजापतिर्वा इदं अग्र आसीत्। एक एव सो अकामयत स्वां प्रजाय इति सो अश्राम्यत् स तपो अतप्यत तस्मात् श्रान्तः तेपानात् आपो असृज्यन्त… ।’ शतपथ ब्रा. 6.1.3.1

सः

/ ‘ > < ? * तस्माद्देवा अग्निमुखा अन्नं अदन्ति, ....तद्देवा अन्नमकुर्वत । शब.7.1.2.4 द्वयं वाचो रूपं, दैवं च मानुषं च, उच्चैश्च शनैशच तदेते द्वे । शब. 7.1.2.18 यशस्वतीः (1.79.1) अन्नवती, 0वय (1.83.4) हविर्लक्षणमन्नं, ;(1.104.7) अन्नं, (2.20.1) वयः शोभनलक्षणमन्नं, वयसः (8.48.1) अन्नस्य, वयसा (2.33.6) अन्नेन, ;(6.36.5) हविर्लक्षणेन, वयोधाः (6.75.9) अन्नस्यदातार, 0वरिवःविदं (2.41.9) अन्नस्य लम्भकं, (4.55.1) धनं, वरिवस्कृत् (8.16.6) धनस्य कर्ता, 0वर्चः (3.8.3; 3.24.1) अन्नं, वर्चसा (1.23.23) तेजसा, वाजः (2.1.12) (6.26.1) अन्नं, वाजदा (3.36.5) अन्नप्रदा, 0वाजपस्त्यः (6.58.2) अन्नानि गृहे यस्य तादृशः, वाजयन्तः (4.17.16) अन्नमिच्छन्तः, (4.25.8) वाजमन्नमिच्छन्, (4.42.5) संग्राममिच्छन्तः, (5.4.1) अन्नमिच्छन्तो वाजयन्तं (5.31.1) अन्नमिच्छन्तं, (7.90.7) बलमात्मन इच्छन्तः, वाजययन्तं (5.35.7) संग्रामं धनं वा इच्छन्तः, वाजसातमं (1.78.3) अन्नानां अतिशयं दातारं, (5.20.1) ं, वाजसातमं (1.78.3) अन्नानां अतिशयं दातारं, (5.20.1) ं, वाजी (7.1.14) वाजवान् अन्नवान्, (2.10.1) बलवान्, (5.1.4) वेजनवानग्निः, (7.34.1) वेगवान, विष्वधायसं (2.17.5) विष्वस्य धात्रीं (पृथिवीं), (5.8.1) बहुअन्नं, (7.4.5) विष्वस्य धारकं, विष्वधाया (3.55.21) सर्वान्नो, श्रवः (1.9.7) धनं, (1.9.8) कीर्ति, (3.53.15) अन्नं, श्रवसे (1.113.6) अन्नार्थ, 0श्रवस्यानि (1.100.5) अन्नानि उदकानि, 0सनानि (1.95.10) अन्नानि, सनिं (1.18.6) धनस्यदातारं, ससवान् (6.44.7) ससमिति अन्ननाम, अन्नवान, (7.87.2) अन्नवान्, स्वधा (1.144.2) अमृतोपम अपः, स्वधां (1.88.6) अन्नं; (2.35.7) वृष्टि उदकं, स्वधापते (6.44.1) अन्नस्य पालकः, स्वधाभिः (1.113.12) आत्मीयैः तेजोभिः, (7.35.3) अन्नैः, (7.104.9) बलैर्युक्ता, (8.10.4) बलहेतुभिः स्तुतिभिः, इल जीमपत ळवकीमंक स्वधावः (1.147.1) अन्नयुक्तः, (3.35.3) अत्यन्त अन्नयुक्त, (6.21.3) बलवन्, (7.86.4) तेजस्विन्, स्वधावन् (5.3.2) अन्नवन्, स्वधां (1.88.6) अन्नं; (2.35.7) वृष्टि उदकं, स्वधापते (6.44.1) अन्नस्य पालकः, स्वधाभिः (1.113.12) आत्मीयैः तेजोभिः, (7.35.3) अन्नैः, (7.104.9) बलैर्युक्ता, (8.10.4) बलहेतुभिः स्तुतिभिः, इल जीमपत ळवकीमंक स्वधावः (1.147.1) अन्नयुक्तः, (3.35.3) अत्यन्त अन्नयुक्त, (6.21.3) बलवन्, (7.86.4) तेजस्विन्, 0स्वधावन् (5.3.2) अन्नवन्, स्वावसुः (5.44.7) स्वायत्त धनं, 0अधिभोजना (6.47.23) भोजनमिति धनं अधिकं धन,

Post – 2018-05-02

अजीतकुमार ने विशवसनीयता पर मेरी तीन दिन पहले की पोस्ट पर अपनी लंबी टिप्पणी अभी अभी भेजी है। इससे अन्य पाठक लाभान्वित हो सकें इसलिए उसे यहां पेस्ट कर रहा हूँ:

Ajeet Kumar मोदी सरकार ने सचमुच कुछ अच्छे फैसले लिए हैं जिसके दूरगामी लाभ दिखने तय हैं। लेकिन राजनीति के वर्तमान तौर-तरीकों में से कुछ अपवित्र तरीके अपनाने और फैलाने में भाजपा भी पीछे नहीं है।
1.जब अमित शाह बिहार के सीवान, छपड़ा में जाकर मंच से नारा देते हैं कि – यहाँ भाजपा हारी तो पाकिस्तान में दीवाली मनेगी और इसपर उन्हें निर्वाचन आयोग की नोटिस भी मिल जाती है, इसे क्या कहा जायेगा?
2.राजनैतिक तरीके से व्यवस्थित विरोध के बदले मोदी जी का “कांग्रेस मुक्त भारत” वाला नारा किसी फतवे से कम है क्या?
3.आये दिन भाजपाई मुख्यमंत्री तथा उप मुख्यमंत्री जब चिल्लाते हैं कि- “कोई माई का लाल आरक्षण नहीं खत्म कर सकता।” तो यहाँ पर मैं कह रहा हूँ कि संवैधानिक पदों पर बैठे भाजपाईयों का यह नैतिक पतन की पराकाष्ठा है।
4.जब तथाकथित “मोदी युग” में भी मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला बदस्तूर जारी है,गवाहों के लाश भी नहीं मिलते,तो फिर मुक्त कंठ से प्रशंसा किस बात हेतु?
5.हजारों करोड़ के घोटालेबाज जो कुछ दिनों पहले तक सभाओं में मोदी जी के गिर्द मंडराते दिखें और पर्दाफाश होने पर वे लंदन में मिले,तो फिर स्वघोषित चौकीदारी कहाँ चली गयी थी?
6.”अभी से जिनके पास काले धन हैं(अर्थजगत के धाँसू विशेषज्ञों के अनुसार उस समय भारत में प्रचलित मुद्रा के करीब-करीब 40% समानांतर अर्थवयवस्था के रूप में मौजूद रहे थे,और उसी को निष्क्रिय करने हेतु ही नोटबंदी भी की गई थी) वे कागज के रद्दी टुकड़े हो जायेंगे।” फिर 99% खड़े सोने जैसे 99% कागजी नोट भारतीय रिजर्व बैंक के पास विपक्षी दलों ने पहुंचा दिए क्या?यह समानांतर अर्थवयवस्था मूल अर्थवयवस्था में कैसे समायोजित हो गयी……काला धन कहाँ फुर्र हो गया?

और जहाँ तक बात बुद्धिजीवी वर्ग को कोसने की है तो लीजिये भाजपा के एक प्रतिष्ठित संवैधानिक पद पर गत परसों ही बैठे असली नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण ‘पवित्र विचारों वाले’ एक खास बुद्धिजीवी का संबोधन – “कठुआ कांड मामूली घटना है।यह एक छोटी घटना है, जिसे बहुत ज्यादा तूल नहीं देना चाहिए।”- कवीन्द्र गुप्ता (डिप्टी सीएम, जम्मू-कश्मीर)

इसमें इससे दूनी शिकायतें मै अपनी ओर से जोड़ सकता हूं, पर सवाल फिर भी वही है कि इतनी कमियों के होते हुए भी:
1. विपक्ष सीधी लड़ाई क्यों नहीं लड़ पाता?
2. यह क्यों मान बैठा है कि कोई विपक्षी दल अभी मोदी नीत भाजपा को नहीं हरा सकता?
3. कि सभी गठजोड़ के बाद भी सीधी चुनौती नहीं दे सकते, गर्हित त तरीके अपनाने ही होंगे?
4. इसके बाद भी वह अपनी विजय के प्रति शंकित कयों है?
5. मोदी का अन्त करने के लिए नित उठ लोढ़ा लुढ़काने और उन दलों से जुड़ाव या सहानुभूति रखने वाले बुद्धिबली इस कारुणिक स्थिति का मार्मिक विशलेषण क्यों नहीं कर पाते, यहां तक कि इसका साहस तक क्यों नहीं जुटा पाते,?और अन्ततः
6. यदि बिल्लियों के भाग से छीका टूट ही गया तो अपनी अपनी बोटी की लालसा को नियंक्त्रित करके हड़िया को संभाल भी पाएंगे?

Post – 2018-05-02

अजीतकुमार ने विशवसनीयता पर मेरी तीन दिन पहले की पोस्ट पर अपनी लंबी टिप्पणी अभी अभी भेजी है। इससे अन्य पाठक लाभान्वित हो सकें इसलिए उसे यहां पेस्ट कर रहा हूँ:

Ajeet Kumar मोदी सरकार ने सचमुच कुछ अच्छे फैसले लिए हैं जिसके दूरगामी लाभ दिखने तय हैं। लेकिन राजनीति के वर्तमान तौर-तरीकों में से कुछ अपवित्र तरीके अपनाने और फैलाने में भाजपा भी पीछे नहीं है।
1.जब अमित शाह बिहार के सीवान, छपड़ा में जाकर मंच से नारा देते हैं कि – यहाँ भाजपा हारी तो पाकिस्तान में दीवाली मनेगी और इसपर उन्हें निर्वाचन आयोग की नोटिस भी मिल जाती है, इसे क्या कहा जायेगा?
2.राजनैतिक तरीके से व्यवस्थित विरोध के बदले मोदी जी का “कांग्रेस मुक्त भारत” वाला नारा किसी फतवे से कम है क्या?
3.आये दिन भाजपाई मुख्यमंत्री तथा उप मुख्यमंत्री जब चिल्लाते हैं कि- “कोई माई का लाल आरक्षण नहीं खत्म कर सकता।” तो यहाँ पर मैं कह रहा हूँ कि संवैधानिक पदों पर बैठे भाजपाईयों का यह नैतिक पतन की पराकाष्ठा है।
4.जब तथाकथित “मोदी युग” में भी मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला बदस्तूर जारी है,गवाहों के लाश भी नहीं मिलते,तो फिर मुक्त कंठ से प्रशंसा किस बात हेतु?
5.हजारों करोड़ के घोटालेबाज जो कुछ दिनों पहले तक सभाओं में मोदी जी के गिर्द मंडराते दिखें और पर्दाफाश होने पर वे लंदन में मिले,तो फिर स्वघोषित चौकीदारी कहाँ चली गयी थी?
6.”अभी से जिनके पास काले धन हैं(अर्थजगत के धाँसू विशेषज्ञों के अनुसार उस समय भारत में प्रचलित मुद्रा के करीब-करीब 40% समानांतर अर्थवयवस्था के रूप में मौजूद रहे थे,और उसी को निष्क्रिय करने हेतु ही नोटबंदी भी की गई थी) वे कागज के रद्दी टुकड़े हो जायेंगे।” फिर 99% खड़े सोने जैसे 99% कागजी नोट भारतीय रिजर्व बैंक के पास विपक्षी दलों ने पहुंचा दिए क्या?यह समानांतर अर्थवयवस्था मूल अर्थवयवस्था में कैसे समायोजित हो गयी……काला धन कहाँ फुर्र हो गया?

और जहाँ तक बात बुद्धिजीवी वर्ग को कोसने की है तो लीजिये भाजपा के एक प्रतिष्ठित संवैधानिक पद पर गत परसों ही बैठे असली नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण ‘पवित्र विचारों वाले’ एक खास बुद्धिजीवी का संबोधन – “कठुआ कांड मामूली घटना है।यह एक छोटी घटना है, जिसे बहुत ज्यादा तूल नहीं देना चाहिए।”- कवीन्द्र गुप्ता (डिप्टी सीएम, जम्मू-कश्मीर)

इसमें इससे दूनी शिकायतें मै अपनी ओर से जोड़ सकता हूं, पर सवाल फिर भी वही है कि इतनी कमियों के होते हुए भी:
1. विपक्ष सीधी लड़ाई क्यों नहीं लड़ पाता?
2. यह क्यों मान बैठा है कि कोई विपक्षी दल अभी मोदी नीत भाजपा को नहीं हरा सकता?
3. कि सभी गठजोड़ के बाद भी सीधी चुनौती नहीं दे सकते, गर्हित त तरीके अपनाने ही होंगे?
4. इसके बाद भी वह अपनी विजय के प्रति शंकित कयों है?
5. मोदी का अन्त करने के लिए नित उठ लोढ़ा लुढ़काने और उन दलों से जुड़ाव या सहानुभूति रखने वाले बुद्धिबली इस कारुणिक स्थिति का मार्मिक विशलेषण क्यों नहीं कर पाते, यहां तक कि इसका साहस तक क्यों नहीं जुटा पाते,?और अन्ततः
6. यदि बिल्लियों के भाग से छीका टूट ही गया तो अपनी अपनी बोटी की लालसा को नियंक्त्रित करके हड़िया को संभाल भी पाएंगे?

Post – 2018-05-02

अजीतकुमार ने विशवसनीयता पर मेरी तीन दिन पहले की पोस्ट पर अपनी लंबी टिप्पणी अभी अभी भेजी है। इससे अन्य पाठक लाभान्वित हो सकें इसलिए उसे यहां पेस्ट कर रहा हूँ:

Ajeet Kumar मोदी सरकार ने सचमुच कुछ अच्छे फैसले लिए हैं जिसके दूरगामी लाभ दिखने तय हैं। लेकिन राजनीति के वर्तमान तौर-तरीकों में से कुछ अपवित्र तरीके अपनाने और फैलाने में भाजपा भी पीछे नहीं है।
1.जब अमित शाह बिहार के सीवान, छपड़ा में जाकर मंच से नारा देते हैं कि – यहाँ भाजपा हारी तो पाकिस्तान में दीवाली मनेगी और इसपर उन्हें निर्वाचन आयोग की नोटिस भी मिल जाती है, इसे क्या कहा जायेगा?
2.राजनैतिक तरीके से व्यवस्थित विरोध के बदले मोदी जी का “कांग्रेस मुक्त भारत” वाला नारा किसी फतवे से कम है क्या?
3.आये दिन भाजपाई मुख्यमंत्री तथा उप मुख्यमंत्री जब चिल्लाते हैं कि- “कोई माई का लाल आरक्षण नहीं खत्म कर सकता।” तो यहाँ पर मैं कह रहा हूँ कि संवैधानिक पदों पर बैठे भाजपाईयों का यह नैतिक पतन की पराकाष्ठा है।
4.जब तथाकथित “मोदी युग” में भी मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला बदस्तूर जारी है,गवाहों के लाश भी नहीं मिलते,तो फिर मुक्त कंठ से प्रशंसा किस बात हेतु?
5.हजारों करोड़ के घोटालेबाज जो कुछ दिनों पहले तक सभाओं में मोदी जी के गिर्द मंडराते दिखें और पर्दाफाश होने पर वे लंदन में मिले,तो फिर स्वघोषित चौकीदारी कहाँ चली गयी थी?
6.”अभी से जिनके पास काले धन हैं(अर्थजगत के धाँसू विशेषज्ञों के अनुसार उस समय भारत में प्रचलित मुद्रा के करीब-करीब 40% समानांतर अर्थवयवस्था के रूप में मौजूद रहे थे,और उसी को निष्क्रिय करने हेतु ही नोटबंदी भी की गई थी) वे कागज के रद्दी टुकड़े हो जायेंगे।” फिर 99% खड़े सोने जैसे 99% कागजी नोट भारतीय रिजर्व बैंक के पास विपक्षी दलों ने पहुंचा दिए क्या?यह समानांतर अर्थवयवस्था मूल अर्थवयवस्था में कैसे समायोजित हो गयी……काला धन कहाँ फुर्र हो गया?

और जहाँ तक बात बुद्धिजीवी वर्ग को कोसने की है तो लीजिये भाजपा के एक प्रतिष्ठित संवैधानिक पद पर गत परसों ही बैठे असली नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण ‘पवित्र विचारों वाले’ एक खास बुद्धिजीवी का संबोधन – “कठुआ कांड मामूली घटना है।यह एक छोटी घटना है, जिसे बहुत ज्यादा तूल नहीं देना चाहिए।”- कवीन्द्र गुप्ता (डिप्टी सीएम, जम्मू-कश्मीर)

इसमें इससे दूनी शिकायतें मै अपनी ओर से जोड़ सकता हूं, पर सवाल फिर भी वही है कि इतनी कमियों के होते हुए भी:
1. विपक्ष सीधी लड़ाई क्यों नहीं लड़ पाता?
2. यह क्यों मान बैठा है कि कोई विपक्षी दल अभी मोदी नीत भाजपा को नहीं हरा सकता?
3. कि सभी गठजोड़ के बाद भी सीधी चुनौती नहीं दे सकते, गर्हित त तरीके अपनाने ही होंगे?
4. इसके बाद भी वह अपनी विजय के प्रति शंकित कयों है?
5. मोदी का अन्त करने के लिए नित उठ लोढ़ा लुढ़काने और उन दलों से जुड़ाव या सहानुभूति रखने वाले बुद्धिबली इस कारुणिक स्थिति का मार्मिक विशलेषण क्यों नहीं कर पाते, यहां तक कि इसका साहस तक क्यों नहीं जुटा पाते,?और अन्ततः
6. यदि बिल्लियों के भाग से छीका टूट ही गया तो अपनी अपनी बोटी की लालसा को नियंक्त्रित करके हड़िया को संभाल भी पाएंगे?

Post – 2018-05-02

धन के द्योतक कतिपय और शब्द (1)

संतोष तो शब्दों की पूरी विकास यात्रा को रखने से ही होता है परंतु अब तक के अनुभव से हमने पाया कि विस्तार के मोह में चर्चा दो तीन शब्दों की व्याख्या तक सिमट कर रह जाती है, इसलिए आज की पोस्ट में हम अल्पतम हस्तक्षेप करते हुए ऋग्वेद में आए हुए उन शब्दों को रखने का प्रयास करेंगे जिन का अर्थ खाद्य पदार्थ है जो धन का प्राचीनतम रूप था. सभी की उत्पत्ति जल के किसी पर्याय से हुई है इसका हम संकेत मात्र करेंगेः

अज्म
अज का अर्थ जल है इसका आभास आज्य से मिला जाएगा। जल की गति से, चलने वाले प्राणियों का नाम जुड़ा हुआ है जिसमें सबसे पहला स्थान अज का है। जल की गति के कारण अज्म का अर्थ प्रवाह, शक्ति और गति है। रुद्रों के प्रयाण से धरा डर से उसी तरह कांपने लगती है जैसे शत्रु को देखकर बूढ़ा विश्पति कांपने लगे (येषामज्मेषु पृथिवी जुजुर्वां इव विश्पतिः । भिया यामेषु रेजते । 1.37.8) । परंतु खाद्य पदार्थ के रूप में भी इसका प्रयोग हुआ है (अज्मं अन्नं, 8.46.28 )।

अद्म
अद् जल है इस विषय में कोई दुविधा नहीं है । सायणाचार्य ने एक स्थान पर या तो संदर्भ विशेष के कारण, या सहज भाव से, इसे बरसात से मिलने वाला पानी (अद्भ्यः – वृष्टिउदकेभ्यो, 2.1.11), और दूसरे स्थल पर इसे अंतरिक्ष से उपलब्ध होने वाला बताया है, (अन्तरिक्षलोकात्, 2.38.11)। अज्म की तरह ही अद्म का खाद्य पदार्थ के लिए प्रयोग होना सर्वथा उचित ही था,पर इसकी व्याप्ति केवल मनुष्य के खाद्य पदार्थों तक सीमित नहीं है अपितु पशु प्राणियों के खाद्य पदार्थों को भी इसमें समाहित किया गया है (अद्मं अदनीयं तृणगुल्मादिकं, 1.58.2).

अंध
वास्तव में अद, उद, अन्न और अंध एक ही ध्वनि के अनुकारभेद हैं और इन सब का प्रयोग जल के लिए होता रहा है (अन्धसः -अन्नस्य, 1.80.6); परंतु इसका प्रयोग सोम रस के लिए विशेष रुप से हुआ है (अन्धसा – सारेण, 5.54.8),

अन्न
अन्न का प्रयोग आज भले हम केवल मनुष्य द्वारा खाए जाने वाले अनाजों के लिए करते हैं परंतु इसका प्रयोग अन्य जीवों द्वारा खाए जाने वाले पदार्थों के लिए भी किया जा सकता था (अन्नं -घासं, 2.24.12)

प्रय/अभिप्रय

हम आज प्राय: और अभिप्राय का प्रयोग जिस अर्थ में करते हैं उस अर्थ में इनका प्रयोग होता भी रहा हो तो भी इनका दायरा संभवत- अधिक व्यापक था। प्रय का जल केअर्थ में प्रयोग पहले हुआ करता था और फिर अन्न के लिए होने लगा (प्रयः – अन्नं, 1.31.7;1.132.3; अभिप्रयः – अन्नं अभिलक्ष्य,1.45.8; हविर्लक्षणमन्न, 1.118.4)

अर्क

अर्क का प्रयोगजल अर्चना से आगे बढ़ते हुए, अन्न, प्रकाश, उद्गार और स्तोत्रों तक अनेक अर्थों में देखने में आता है। (अर्कं – मंत्ररूप स्तोत्रं, 1.62.1; अर्चनीयं अन्नं,1.अर्चनीयं इन्द्रं, 184.4 ;(1.164.24) अर्कसाधनं मन्त्रं, अन्नं, 7.97.5), अर्कैः- अर्चनीयैः स्तोत्रैः(3.31.9, स्तोतृभिः, 6.69.2), अर्कसातौ -अर्चनीयस्यान्नस्य लाभे निमित्तभूते सति,

अव
अव का प्रयोग हम उपसर्ग के रूप में ही करते हैं, यह प्रयोग प्राचीन है (अवः -अवस्तात्,1.83.2, अवस्तात् अवाङ्मंु1.133.6) ) परंतु कुछ स्थलों पर इसका अर्थ अन्न किया है (अवः – अन्नः,3.59.6), अवसा -अन्नेन, 1.185.4)

आय, आयु , वय और वर्चस
आय और आयु के एक ही अर्थ से हम परिचित हैं, इसलिए यह सोच भी नहीं सकते कि कभी इनका प्रयोग अन्न के लिए भी होता था, परंतु हम खाते तो दोनों को हैं, (आयुः – अन्नं, 1.113.16; 3.1.5; आयूंषि – अन्नानि, 2.41.17; जीवनमन्नं, 3.53.7; आयुषि – अन्ने सर्वप्राण्याहारत्वेन, 4.58.11) परन्तु इसका एक अर्थ वायु भी था (आयुः – सततं गता वायुः, 1.162.1) (5.41.2) सततगतिवायुरुच्यते आयुभिः -आयुष्मद्भिः, 5.60.8). इन सबके पीछे जल और उसकी निरंतर प्रवहमानता की अवधारणा है।
हद तो यह कि वय का भी पुराना अर्थ जल और अन्न ही था (वयसः – अन्नस्य, 8.48.1, वयसा- अन्नेन, 2.33.6 ; वयोधाः – अन्नस्यदातारः, 6.75.9 ; वरिवःविदं – अन्नस्य लम्भकं, (4.55.1) धनं, वरिवस्कृत्- धनस्य कर्ता, 8.16.60
और यही हाल वर्चस्व का था। यहां भी जल, प्रकाश, अन्न, तेजस्विता की दिशा में विकासरेखा बहुत स्पस्ट है (वर्चः – अन्नं, 3.8.3; 3.24.1; वर्चसा – तेजसा, 1.23.23).

इळा, इला, इरा

इळा, इला, इरा, का विकास बहुत रोचक है क्योंकि इसमें हमारे इतिहास की महायात्रा में पुरातन स्मृतियों को संजोने के क्रम में एक ही तथ्य को रूपकीय कलेवर देते हुए बाद की पीढ़ियों को स्थांतरित करने के क्रम में जो विचलनें हुईं हैं उनको समझने में यह बहुत सहायक होता है परंतु हम यहां पर उसके विस्तार में न जाकर उन शब्दों के जो अर्थ ऋग्वेद में किए गए हैं केवल उनका उल्लेख करके संतोष करना चाहेंगे (इळया- हविर्लक्षणेनान्नेन, 3.54.20; अन्नेन, 3.59.3; इळस्पतिः – इलाया अन्नस्यपतिः, 6.58.4; इळस्पदे – मनोपुत्र्या गोरूपायाः पदे, 1.128.1; इळा – मनोः पुत्री, 1.40.4; भूमि, 4.50.8) ; गोदेवता, 8.31.4; इळां -अन्नं, 6.10.7; 6.52.16) ; इरस्या- अन्नेच्छया, 5.40.7; इरावती – अन्नवती 7.99.3); इलयत – ईरयत गच्छत, 1.191.6). इलां – एतन्नामधेयां पुत्रीं, 1.31.11; इलाभिः – बहुविधैरन्नै, 5.53.2).
(आगे जारी )