Post – 2020-05-17

#शब्दवेध (37)
लुढ़कते हुए
लुढ़कने के साथ लढ़ा और लढ़िया – गाड़ी, का स्मरण होना स्वाभाविक है। इन्हें आप अधिकार सहित रढ़ा और रढिया भी कह सकते हैं। जिस बोली में र-कार न था, उन्होंने इसे अपनाया तो, पर ऐसे शब्दों का उच्चारण करने में कठिनाई अनुभव करते रहे जिनमें शब्द के आदि में र-कार था। इसके लिए उन्होंने दो तरीके अपनाए । एक था, रकार से पहले अ या इ जोड़ देना। तमिल में राजा से पहले अ-कार जोड़ कर अरसन बनाया गया। इसी प्रभाव में रजत अर्जंटम् बन कर यूरोप तक पहुँचा। दूसरा था, उसे इससे निकट पड़ने वाली ध्वनि में बदल देना। मागधी[1] में यह ध्वनि ‘ल’ थी और इसमें राजा को ‘लाजा’ बनाया गया जिसकी जानकारी हमें अशोक के शिलालेखों की पाली में (*राजेन> लाजिना) मिलती है।[2]

मागधी प्रभाव के कारण र-कार ल-कार में बदल गया और आद्य ‘र-’ ‘ल’ हो गया (रघु>लघु, रेखन> लेखन, रीछ >सं. ऋक्ष > लिच्छ/निच्छ> लिच्छवि/निच्छवि)) । आद्य र-कार वाले रूप बने रहे (रढ़ा, रेढ़ा, रेढ़ू, अं. रडर, रोट, रोटेशन, रोड)पर उनका प्रचलन कुछ मामलों में जहाँ कम हो गया वहाँ उनकी औकात कम हो गई।

लढ़िया को समझने के लिए हमें *रढ़िया तक लौटना होगा। रढ़ का पुराना रूप रोढ़ था, या रढ़ के उच्चारण में कठिनाई के कारण अकार ओकार में बदला, यह तय करना कठिन है, पर रोड़ में अन्त्य वर्ण के महाप्राणन का लोप देख कर लगता है रढ़, रिढ़, रेढ़ अधिक पुराने हैं।

क्या आपने कभी किसी को ‘तुमने तो मेरी रेढ़ मार दी’ मुहावरे का प्रयोग करते सुना है? यदि सुना है तो अनुमान से यह भी समझा होगा कि यहाँ भारी नुकसान पहुँचाने की बात की जा रही है। रेढ़ का अर्थ क्या है, यह पता न चला होगा। रेढ़ का सजात प्रतीत होने वाला एक ही शब्द याद होगा, रेढ़ा या ठेला। यह रेढ़ा भी आपको नरोत्तमदास की अमर रचना के ‘जातहिं दैंहै लदाइ लढ़ा भरि’ पढ़ते समय शायद ही याद आया हो। पर इनके सहारे रेढ़ का अर्थ समझने में न आया होगा। दुखी होने की बात नहीं। रेढ़ का मतलब उस आदमी की समझ में भी नहीं आया था, जो इसका प्रयोग कर बैठा था। यदि उसने रीढ़ मार दी कहा होता तो बात कहने से पहले उसके भी पल्ले पड़ गई होती कि मारना का अर्थ तोड़ना है। आशय वह ‘कमर तोड़ने’ जैसा ही है, चोट कुछ ऊपर की गई लगती है। रीढ़ का अर्थ आप जानते ही हैं, किसी की समझ में न आए तो ‘मेरु दंड’ कह कर समझा सकते हैं।

पर सचाई यह है कि आप रीढ़ का अर्थ भी नहीं जानते हैं न ही मेरु का अर्थ जानते हैं और इस सिलसिले को कमर तक ले जाएँ तो कहा जा सकता है कमर का भी मतलब नहीं जानते। केवल यह जानते हैं कि यह टैग किस चीज के साथ नत्थी है। इसके बाद भी यदि कहूँ आप हिंदी नहीं जानते और इसमें उन लोगों को भी शामिल कर लूँ जिन्होंने भाषा पर काम किया है और नाम कमाया है, भाषा और साहित्य के आचार्य रहे हैं, अच्छी हिंदी बुरी हिंदी का फर्क समझाते रहे हैं, तो इस सच को बयान करने के बाद दुश्मन बनाने की जरूरत न रहेगी, साथ खड़ा होने वाला कोई न मिलेगा।

झेंप मिटाने के लिए यह जान लेना काफी होगा कि केवल हिंदी के लोग ही नहीं दुनिया की किसी भाषा के लेखक, वक्ता, कोशों के रचयिता अपनी भाषा को नहीं जानते, क्योंकि हमें अपनी भाषाओं का ज्ञान उल्टे सिरे से कराया जाता रहा है। हमारा अपनी भाषाओं की जड़ों से वही संबंध रहने दिया गया जो किसी अंधड़ में उखड़ कर गिरे पेड़ का जिसकी उस दिशा की जिधर वह लुढ़का है, एक आध जड़ें बची रह गई हैं जिससे उसकी कुछ डालियाँ टहनियाँ फिर भी हरी रह गई हैं और उनके जीवित होने का भ्रम बनाए रही हैं। यह अंधड़ आभिजात्य का अंधड़ था जो पांडित्य बन कर आया और अपनी ही जड़ें उखाड़ बैठा। इस अंधड़ से पहले या इससे बेअसर बोलियों के लोग – खास कर महिलाएँ – भाषा की पंडितों से अधिक गहरी समझ रखते/रखती हैं।

रीढ़ का अर्थ है पत्थर। मेरु का अर्थ भी पत्थर। मेरु गिरि का – पथरीला पहाड़। बहुमूल्य खनिज, रत्न बलुए पत्थरों (सेडिमेंटरी रॉक्स) में नहीं पुरानी पथरीली चट्टानो में ही मिलता हैं। रीढ़/रेढ़ – नदियों के कटाव और धारा की रगड़ से चिकने और वर्तुल बनी बटिकाओं के लिए प्रयोग में आता था। यही रीढ़/रेढ़ > रोढ़>लोढ़ का पूर्वरूप है जिसने पहिए के आविष्कार की प्रेरणा दी। पत्थर का आशय इससे जुड़ा रहा। रोड़ा, रोड़ी इन्हीं के बदले रूप हैं, पर बजरी नहीं। वह वज्र= पत्थर से निकला है।

आपका कंकाल शब्द से परिचय है। कंक का अर्थ है पत्थर। कंकर/कंकड़ में जो -अर/-आर -अड़ (>अळ> -अल/-आल प्रत्यय=वाला आया है उसे हटाने से काम चल जाएगा। कंकाल का अर्थ था पत्थर का ढाँचा। हमारी हड्डियों की कल्पना पत्थर के रूप में की गई थी। यही रीढ़ की संज्ञा का रहस्य है।

लढ़िया लढ़-इ-या के योग से बना है। लढ़-वर्तुल, लुढ़कने वाला। जैसे रढ़ से रेढ़, रोढ़, रीढ़, रेड़, रोड़ की उत्पत्ति हुई उसी तरह लेंढ़ा – कटहल का बतिया जिसमें अधिकांश कमजोर होने के कारण गिर जाते है, लोढ़ा जो वर्तुल होता था और इसे सिल (शिला) पर लुढ़काते हुए भुने धाना का चूरन (सत्तू बनाया जाता रहा, फिर सोम रस निकालने में काम आता रहा और कालांतर में मसाला पीसने से लेकर भाँग घोंटने के काम आने लगा। लोढ़ा के तीन अर्थ हैं। एक उपादान के कारण, अर्थात् पत्थर का। दूसरा बनावट पर आधारित, अर्थात् लुढ़कने वाला और तीसरा कर्म पर आधारित, अर्थात् तोड़ने वाला। भो. में फूल तोड़ने के लिए फूल लोढ़ना में यही आशय है। लढ़िया का अर्थ हुआ लुढ़कने वाला यंत्र अर्थात् पहिया लगा यंत्र। लढ़िया शब्द भी प्रयोग से बाहर जा रहा है, क्योंकि अब लढ़िया के लिए गाड़ी का ही प्रयोग हमारी बोली में भी सामान्य हो चला है, चाहे वह बैल गाड़ी हो, या मोटर गाड़ी, या रेलगाड़ी।
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[1]मागधी कहना ठीक नहीं है क्योंकि इसके विस्तार क्षेत्र में अनगिनत बोलियाँ स्वायत्त बनी रहीं पर कुछ समानताएँ जो पूरे क्षेत्र में समान हैं जिनके पीछे एक की अग्रता, जिसमें मगध की भाषा के प्रभाव का अशोककालीन पालि के प्रचार को मानना होगा, ये ऊपरी समानताएँ नीचे भी रिस कर आईं, मागधी का प्रयोग सुविधाजनक है।
[2]अब आप लाज>लज्जा की व्युत्पत्ति समझ सकते हैं जो विराजना, (विराजति) में सुरक्षित है। अपरिचित ध्वनियों के उच्चारण में यह तरीका आज तक अपनाया जाता है। ऐसी ही एक ध्वनि दंत्य स है जिसकाे कौरवी प्रभाव में आदि स्थान में (आद्य) स्वरमु्क्त (हल ) रूप में कुछ शब्दों के आदि में जोड़ा गया (भो. था (थान, थाल, थाली) > स्था (स्थान, स्थल, स्थाली), आद्य ‘स’ की ध्वनि से फारसी में जो समस्या पैदा हुई इसे हम सिंधु के हिंदु में बदलने में पाते है और आद्य ‘ह’ के कारण ग्रीक में जो समस्या पैदा हुई उस हिंद के इंद में बदलने में लक्ष्य कर सकते हैं। परहेज ‘ध’ के महाप्राणन से भी है इसकी पुष्टि दोनों से होती है। आज भी आद्य ’स्’ का हाल यह है कि अं. में स्टेट दो रूपों में लिखा जाता है – इस्टेट (estate) और स्टेट(state) – एक उच्चारण की सुविधा को देखते हुए, दूसरा शब्द की शुद्धता के लिए। यही हाल स्पेशल का है – इस्पेशल (especial), स्पेशल (special) । पंजाब मे ‘स्’ में स्वर जोड़ लेते हैं (स्टेशन> सटेशन) भो. में ‘स्’ को गोल कर जाते हैं, या इ-कार जोड़ लेते हैं(टेसन/टीसन, इस्टेसन)।

Post – 2020-05-16

तुम न मानोगे हमारी न कहोगे अपनी
खत में क्या दर्ज है, कासिद, यह खबर रखते हैं।
दिल में क्या था, जिसे लिखने को सियाही कम थी
झिझक, हिचक पर नम आँखों पर नजर रखते हैं।
जो कलमबंद हुआ वह तो दिखावा है महज।
सादे सफहे भी अधिक उससे असर रखते हैं।
पता कोई हो किसी का हो यह बेमानी है
हम अपने दिल में जमाने का बसर रखते हैं।।

Post – 2020-05-15

#शब्दवेध(36)
हमने आँख से संबंधित शब्दावली पर चर्चा अक्षि/आंख और तमिल के कण् से आरंभ की थी। आज भी उसी पर विचार करेंगे, फिर भी यह विश्वास नहीं पाल सकते कि यदि दो चार दिन और इसी पर बात बात करें तो भी इसके समूचे प्रसार को समेट सकेंगे। अब तक की चर्चा में हमने यह पाया कि जिसे हम निरा द्रविड़ या तमिल शब्द मानते हैं वह इतने आदिम चरण से हिंदी क्षेत्र की बोलियों, हिंदी और यहाँ तक कि संस्कृत मे इतने अधिकार और सक्रियता और मौलिकता के साथ जमा हुआ है जिसका स्वयं द्रविड़ भाषाओं में अभाव है। शब्द तमिल का और उसका संकल्पनात्मक आथार सूक्ष्म आशय और मुहावरे भोजपुरी और संस्कृत में। इसके कारण का संकेत हम कर आए हैं पर यह जोड़ना जरूरी है कि इसके कारण ही जिसे रामविलास जी हिंदी प्रदेश कहते रहे हैं उसमें वह सर्वसमावेशिता इसकी बुनियाद में है। यह इसमें तीर्थों, मंदिरों, इससे बाहर जाने वाले मज़दूरों या सिनेमा के कारण नहीं है, इनकाे वरीयता इसलिए मिली कि यह समावेशी पर्यावरण पहले से तैयार था।

आंख से कोई आवाज नहीं निकलती इसलिए हमने इसके प्रधान गुण चमक, प्रतिबिंबन के स्रोत जल की उपयुक्त ध्वनियों कन् और ‘अक’ की तलाश की। ‘अक’ भारतीय भाषाओं में पानी के अर्थ में प्रचलित नहीं रहा गया, यद्यपि अंग्रेजी < लातिन के aqua, में सुरक्षित है। संस्कृत में और हिंदी क्षेत्र की बोलियों में प्रयुक्त आकुल - (पानी के लिए) तड़पता हुआ, छटपटाता हुआ, अर्थात् 'व्यग्रता' इस बात का प्रमाण है कि कभी अक् पानी के आशय में चलता था। ‘अक’ विकास एक और तो अक>अक्क>अख्ख> आँख में हुआ और दूसरी ओर, कौरवी में यह अक्ष/ अक्षि हो गया। एक तीसरी दिशा संकल्पनात्मक उत्कर्ष की थी जिसमें अंक बना और कमाल यह कि जल और आँख के दूसरे उत्कर्ष गण (कण> गण> गणित) के साथ जुड़ कर अंकगणित और ज्ञान-विज्ञान की आधारशिला बना।

सामान्यतः आंख के लिए जिस संज्ञा का प्रयोग होता है उसी का प्रयोग देखने की क्रिया के लिए भी हो, ऐसा कम देखने में आता है। संभवतः एकरसता से बचने की यह मानवीय प्रवृत्ति के कारण हो। त. कण् – आँख, जब कि देखने के लिए ‘पार्’ (जो भो.हिं. में कान पारना – ध्यान से सुनना का जनक है, और भो. आँखि चियारल का ताऊ है; हिं. का ‘आँखें फाड़ कर देखना’, इनका भावानुवाद है), और नोडु> अं. note। हिं. आँख – देखना, अं. आई eye – सी (see)/ लुक(look)/ व्यू (view)/ ऑब्जर्व (observe) आदि । सं. अक्षि – दर्शन/ ईक्षण/वीक्षण।

भ्रम वहां पैदा हो सकता है जहां उच्चारण में इतना कम अंतर हो कि लगे यह ध्वनि-नियमों के कारण उत्पन्न विभेद हैं, जैसे अक्षि, ईक्षण, वीक्षण के मामले में संभव है।

क्रिया के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है उनका संबंध आंख के लिए संज्ञा रूप में अल्पप्रचलित प्रयोगों से होता है, पर होता अवश्य है, जैसे दर्शन<दृष्टि <दृग<>दृक्। पर यहाँ भी उस पर्याय की संज्ञा जल की किसी ध्वनि पर आधारित मिलेगी, जैस जल के तर>तृ/दर>दृ (तर्प>(सं. तृप्) तर्पण, दर्प>(दृप्) दर्पण; दृक् > द्राक् (तत्काल)> दृग> दृश)।

उच्चारण के मामले में निकट पड़ने वाले दो शब्दों के लिए जरूरी नहीं कि वे एक ही मूल से निकले हों। उदाहरण के लिए यदि अक्षि, अक् – जल से व्युत्पन्न है तो जरूरी नहीं कि ईक्षण उसी के ध्वनि-परिवर्तन से पैदा हुआ हो। परंपरावादी वैयाकरणों के पास यही समाधान सुलभ था, परंतु ईक्षण – जल और रस की जिस ध्वनि (संज्ञा) से निकला है वह इष- जल, रस है। इससे इक्षु का संबंध बहुत गहरा है। यह उसका रस निकालते (इषं दुहंता मनुजाय दस्रा) समय तेज धार से उत्पन्न होने वाली सुनी ध्वनि का वाचिक अनुकरण है। ऋग्वेद में इसका प्रयोग जल, सोमरस, अन्न और धन के आशयों में हुआ है: जैसे नदी में बाढ़ आती है उसी तरह अपने उपासक को अन्न से भर दो ( इषं जरित्रे नद्यो न पीपेः); उषा हमे बैलों, अश्वों, रथों पर लदे माल, सभी तरह की संपदा प्रदान करती है (इषं च नो दधती विश्ववारे गोमदश्वावद्रथवच्च राधः । अग्नि हमें मैत्री के कारण हमें ऐसा धन दे जो वरणीयों में सर्वोपरि हो (अग्निर् इषं सख्ये ददातु न ईशे यो वार्याणाम् ।) गधों पर लाद कर ढोया जाने वाला माल-मता (इषं दधानो वहमानो अश्वैः)। आ विद्युता पवते धारया सुत इन्द्रं सोमो मादयन् दैव्यं जनं ।। 9.84.3

इस इष से ही इच्छा, एषणा, इष्टि (कामना, उत्पादन, यज्ञ),इक्षु, ईक्षण, वीक्षण, इस इष – बाहर निकलना से इषु – बाण। इस काम्य और कामना (एषणा) और उसकी पूर्ति के प्रयत्न – इष्ट, इष्टि और क्रिया रूप इष्यति, एषति, हे देवो, हम सोम रस से आनंदित धन धान्य से समृद्ध हों, (इषा मदन्त इषयेम देवाः)।

इष का रस, जल, गति, इच्छा, स्वामित्व आदि दिशाओं में अर्थविस्तार हुआ। अं. ईश्यू (issue- going out or flowing out, that which flows or passes out, question awaiting decision, act, deed,- निकलना, बाहर होना, संतान, विचार-विषय; विस्ट ( wist-to know), विस्टफुल wistful – longing); विज (wis- to know, believe> वाइज wise); वीक्षण > व्यू (view – range or field of sight); विजन (vision- the act of seeing; faculty of sight [L. visio, visum- to see); विजिट ( visit L.visitare/ visere- to go to see; wise) के अन्तःसंबंधों को, ज्ञात कारणों से, पूरी तरह पहचानने से बचा गया है।

गन्ने के दंड भाग से पत्ते को अलग करते हुए उसके बीच से अक्ष या गर्त में सुरक्षित आँखे का आँख से सादृश्य अचूक होता है। कन् – के घोषित होने के कारण जो तमिल में शब्द के बीच में आने पर हुआ करता है, यहाँ आदि में ही देखने में आता है। इसी से ईख (इस> इष> इख> भो. ऊखि) का नाम गन्ना हुआ। यह संज्ञा आँखे की न हो कर उस जोड़ की हो गई जिसके एक दबे बिन्दु पर यह गन् या ग्रंद होता है। इसी से गाँठ, घुमावदार बंधन के लिए, वह रस्सी में हो, धागे में हो, पेड़ में या सूखे काठ में हो, यहाँ तक कि मन में हो, संज्ञा मिली है।

हमारा गट्टा इस गँठ से निकला है, और जिस तरह का खेल हम ज्ञान की बनावट में देख आए हैं, कुछ वैसा ही (कन>क्न>ग्न> ज्न) जानु और, अंग्रेजी क्नी (( knee, नी) में देखा जा सकता है। वैदिक में जानु का एक रूप ‘ज्ञु’ भी चला था और घुटना मोड़ कर बैठने के लिए ‘ज्ञुबाध’ (उप ज्ञुबाधो नमसा सदेम ।। 6.1.6; ‘हम आपके समक्ष जानुपात पूर्वक नमस्कार करते हैं’), देखने में आता है, पर वह चला नहीं; जब कि ज्ञान, जो भी ज्ञु (अभिज्ञु) बना था, और ज्ञ- (ऋतज्ञ) बन कर टिक गया। ध्यान दें तो ‘घुटना’, घाँटी/घेंटी, गटई, कंठ, जानु( knee, L. genu, G. gony) कण्/ कन के ग्रंथ, ग्रंथि तक की यात्रा के ही विविध पड़ाव हैं, जब कि नीड ( knead) -कचरना. मांड़ना उसका भावविस्तार – संभवतः इसमें सं. कंडूयन – शरीर के एक ही स्थान को एंठ-घूम कर बार बार रगड़ने, खुजलाने, की छाया हो। ,

गन्ने की एक गाँठ से दूसरी गाँठ तक के पोर के लिए कांड का प्रयोग होता है। इसी तर्क से ईख गन्ना बन कर रह गई पर सरकंडा बाजी मार ले गया। लंबी रचना के खंड के लिए कांड और खंड दोनों का प्रयोग होता है, अं. में इसे हम गाँठ के लिए क्नाट (नाट knot- an interlacement of parts of a cord or cords( L. nodus)) और ग्रंथ के भाग के लिए कैंटो (Canto – a division of long poem, L. cantus to sing) लातिन मूल में इसे छन्द (chant) से अर्थभ्रम हुआ लगता है। मराठी सहित दक्षिण की भाषाओं में अनेक फारसी शब्दों में, जैसे राजीनामा, इस अर्थविचलन के नमूने मिलते हैं। कांड में श्लेष है, एक ओर इसमें कन् के प्रकाश वाला भाव है (प्रकांड पंडित) जिसके कारण कुछ रचनाकारो ने प्रकाश और कुछ ने अधिक उत्साह से उल्लास नाम रखा है। दूसरा है विभाग। महाभारत ने तो पर्व शब्द ही अपना लिया है। कांड के पीछे कण् है तो क्या पर्व के पीछे त. पार् (देख-) का हाथ है? कहना जल्दबाजी होगी पर हैरानी यह देख कर अवश्य होती है कि देखने के लिए तमिल का दूसरा शब्द नोड- अं. नोड, ला. नोदस (node- knot, L. nodus). कण् यदि आँख, से गाँठ तक की यात्रा कर सकता है तो नोड नाड और नोड/ नोडस तक की यात्रा तो कर ही सकता है पर अपनी ज्ञान सीमा में हमें इस पर चुप रहना ही शोभा देता है।

Post – 2020-05-14

#शब्दवेध(35)
“Know exactly what you know.” Hardayal

आज हम ज्ञान की चर्चा करेंगे, जो हमारे पास इतना अधिक है कि जितना है उससे अधिक कुछ पाना ही नहीं चाहते। समस्त ज्ञान की कसौटी अपनी ज्ञान सीमा को बनाना चाहते हैं। यदि वह हमारे उपयोग का सिद्ध हुआ तो उसे सही, नहीं हुआ तो मूर्खता और यदि मूर्खता सिद्ध न की जा सके तो उसे नीयत की खोट सिद्ध करके अपनी ज्ञान सीमा की पवित्रता बनाए रखना चाहते हैं। आगे बढ़ने से पहले ज्ञान शब्द की व्याख्या दो कारणों से जरूरी लगी। एक तो इसलिए कि हम भाषा की विकास प्रक्रिया में जिस बिंदु पर पहुँचे थे उसमें आँख के पर्याय ‘कण्’ पर चर्चा चल रही थी, जिससे इस शब्द की उत्पत्ति हुई है; दूसरे जो अपने को ज्ञानी मानते हैं वे यह भी नहीं जानते कि इसका मूल अर्थ क्या है।

ज्ञान का अर्थ है आँख। विश्वसनीय का अर्थ, आँखों देखा। अविश्वसनीय का, कानों सुना, या ‘सुना-सुनाया’। ज्ञान की ये दो ही इंद्रियाँ है। शेष तीन अवर्णनीय हैे, इसलिए वेदन की इन्द्रियाँ हैं, यद्यपि वेद में ज्ञात और अनुभूत और कल्पनीय सभी का समावेश है। आँख की यह महिमा सभी समाजों और भाषाओं में दुहराई गई है। आंखें खोलो, मतलब, 1- नींद से जागो, 2. होश में आओ, 3. सोचो। इससे उल्टा मुहावरा है, आंखें मूंदे रहो और आँखें बंद हो जाना तो मौत का पर्याय है। तमिल की एक कहावत है, एण्णुम् एऴुत्तुम् कण्णं नत्तगुम् – गणना और अक्षरज्ञान दोनों हमारी दो आंखें है।

ज्ञान शब्द आँख के जिस पर्याय से निकला है, वह है कण>< कन। अंग्रेजी का एक शब्द है ken, जिसका मतलब है समस्त ज्ञान और बोध व्यवस्था, one's range of knowledge or understanding.अंग्रेजी का एक दूसरा शब्द है जिससे हम बहुत अच्छी तरह परिचित हैं know, जिसे कहने को तो लातिन ‘ग्नॉस’ जो ऐग्नॉस्टिक - संशयवादी में मिलेगा, पर है यह भी ‘क्न’ का परवर्ती। हमारी भाषाओं का अ-कार अंग्रेजी में प्रायः ए-कार में बदल जाता है (बनारस > Benaras), कभी-कभी उ-कार/ इ-कार/ओ-कार में, पद (foot), बन्ध (bind/ bond). इसी तरीके से कण् एक ओर तो ken बना है तो दूसरी ओर स्वरलोप से क्न ( know, knowledge)। यह स्वरलोप यूरोप में नहीं हुआ, कौरवी प्रभाव से भारत में ही संपन्न हो चुका था। संभवतः कन पूर्वी से कौरवी भाषा में पहुंचा तो इसके दो रूप हुए, एक स्वरलोप से कन् का क्न, दूसरा क्न के न-कार का र-कार में बदलना- क्र, और तीसरा क्न के दंत्य वर्ण का तालव्य हो जाना और सावर्ण्य के नियम से न का ञ मेे बदल कर ‘ज्ञ’ हो जाना (कन>क्नान>ज्ञान)। एक अन्य परिवर्तन कण् की अघोष ध्वनि का घोषित होना था जो संभवत बहुत पहले पूर्वी में घटित हो चुका था (कन- गन, गनल)।

आज तक इन परिवर्तनों को जिस तर्क से समझा जाता रहा है, उससे हमारी समझ आरंभ से ही अलग है अतः हम इन परिवर्तनों को संस्कृत की विकास-प्रक्रिया में योगदान करने वाली भारतीय बोलियों की भूमिका का हाथ मानते हैं, जिनकी ध्वनि संपदा परस्पर कुछ भिन्न थी। तमिल की इस समस्या को समझने में सबसे बड़ी भूमिका हम यह मानते हैं कि उसको सामने रखकर ही हम यह समझ सकते हैं अधिकांश दूसरी बोलियों की ध्वनि संख्या उससे मिलती-जुलती थी। यदि एक सिरे पर तमिल थी, दूसरे सिरे पर भोजपुरी जिसमें सघोष महाप्राण ध्वनियों के लिए विशेष आग्रह देखने में आता है। अनेक ऐसी बोलियाँ थीं जो इन दोनों अतियों के बीच पड़ती थीं और उन्हीं शब्दों को ग्रहण करते हुए अपनी ध्वनि सीमा में ढाल लिया करती थीं। काल-क्रम में इन बोलियों का मेल हो गया। इस सामाजिक और भाषिक रचाव को नस्लवादी आग्रहों के कारण समझने से इन्कार करते हुए जिन परिवर्तनों को ध्वनि नियमों के अनुसार, अथवा ऐतिहासिक क्रम में घटित परिवर्तन माना जाता रहा। परंपरावादी भारतीय और आधुनिक पाश्चात्य भाषाविद दोनों नस्लवादी आग्रहोंं से ग्रस्त थे। सज कहें तो ऐतिहासिक कारणों से होने वाले परिवर्तन भी सामाजिक भागीदारी में आए परिवर्तन के परिणाम हैं इसे हम पहले भी स्पष्ट कर आए हैं। भाषा में घटित बदलाव में कुछ हाथ मनुष्य की कौतुकी प्रकृति का रहा है, जिसमें वह जानता भी नहीं कि प्रचलित शब्द का अपने आत्मीय के लिए परिवर्तित करने के साथ जो प्रयोग कर रहा है, वह अर्थ को संवेद्य बनाते हुए भाषा की प्रकृति को भी प्रभावित कर रहा है।[1]

हम पाते हैं कि ज्ञानी के लिए सं. में क्न/क्नु प्रचलित था जो वचक्नु = वाग्विद, वाचक्नवी – वाग्विदा (गार्गी) में बचा रह गया है। हिं. का जाना सं. की गम् धातु से और जानना ज्ञा धातु से नहीं निकले हैं जाना अधिक पुराना रूप है जिसे समेटने के लिए गम् के कौरवी रूप ग्म का प्रयोग हुआ पर चल नहीं पाया, तो ज्म रूप कल्पित किया गया पर जम/यम – यमति/ जमति, याति/जाति रूप चलन में रहे। इसी तरह जानना ज्ञान से अधिक पुराना है जो रूपावली में, जानाति, जानन्ति, जानतां साफ दिखाई देता है। ऋ. में ज्ञ का उत्पादन, जनन जिसने सर्वकल्याणी धरती और आकाश को पैदा किया) (यो जजान रोदसी विश्वशंभुवा; जिसने पत्थर के भीतर आग पैदा की, यो अश्मनोरन्तरग्निं जजान..; जिसने सूर्य को और उषाओं को पैदा किया (यो सूर्यं यो उषसः जजान; अपनी महिमा से श्वेत और अरुणाभ रंगों को पैदा किया (श्वेतं जज्ञानमरुषं महित्वा ।
और कभी कभी जाति और परिवार जन, कुनबे के सभी लोग सो जाएँ (ससन्तु सर्वे ज्ञातयः) आशयों में हुआ है। ज्ञान के आशय में दो तीन बार ही प्रयोग हुआ है, अज्ञात, अपरिचित दुराग्रही और निकृष्ट शत्रु हमें परास्त न करें (मा नो अज्ञाता वृजना दुराध्यो माशिवासो अव क्रमुः); वे अपने निवास को जानते हैं, ( ते जानत स्वमोक्यं), स्वर्गोपम प्रथम ऋत को जानते हुए (जानन्नृतं प्रथमं यत्स्वर्णरं प्रशस्तये कमवृणीत सुक्रतुः)।
हमारे लिए रोचक बात यह है कि कन् जल, उत्पादन, और दर्शन तीनों भाव लिए हुए प्रयोग में आता रहा ओर यह भी केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। अंग्रेजी के कीन (keen – eager, acute of mind), किन( kin- a person of the same family, relatives); किथ (knowledge, native land) शब्दों के कोश में दिए अर्थ से भी इसका आभास होता है, पर केंडल (candle. L. candela from candere ‘to glow’) candour – whiteness purity, from L. candere – to shine) के विषय में कोई दुविधा नहीं रह जाती कि ‘कन’ से इनका सीधा संबंध है।
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[1]कृष्ण कान्ह, कन्नन, कन्न, कनु बनने के बाद भी कृष्ण ही रहता है परंतु इस कौतुक में कान्हा या कन्हैया बन कर कनवाह या कर्णधार से अभिन्न हो जाने के कारण संसार को भवसागर के रूप में बीच में लाकर उससे पार लगाने की भूमिका में भी पहुँचा देता है जो दुलार से बदली गई ध्वनि में कल्पना में भी नहीं था।

Post – 2020-05-12

शब्दवेध(34)
मुड़ मुड़ कर भी देख

हम पहले की एक छोटी कड़ी से बात आरंभ करना चाहते हैं। भारतीय भाषाओं में भाषा के लिए कोई ऐसा शब्द नहीं है जो सीधे जिह्वा से जुड़ा हो, जबकि पश्चिमी भाषाओं में, लगभग सभी में, सबसे प्रचलित नाम जिह्वा पर आधारित है – टंग, लैंग्वेज। मेरी जानकारी की भारतीय भाषाओं में भाषा के लिए जो शब्द हैं वे इतने अलग-अलग स्रोतों से आए हुए हैं कि अनेक तो जिह्वा और होंठ ही नहीं, मुख तक से भी संबंधित नहीं किए जा सकते। हम उनके अर्थ से उनकी संज्ञा पर पहुंचते हैं, अधिकांश का भाव प्रकाशन, विश्लेषण, आघात, और ज्ञान है। यहां हम इनकी विस्तृत व्याख्या में नहीं जा सकते।

ध्यान दो तथ्यों की ओर दिलाना चाहते हैं, पहला यह कि मनुष्य दसियों हजार साल से बोलता चला आया था परंतु बोलने की क्रिया और भाव को भी कोई नाम दिया जा सकता है इसकी ओर उसका ध्यान बहुत विलंब से ही गया – तब, जब उसे अभिव्यक्ति की भूमिका का पता चल चुका था और वही नामकरण के समय चेतना में सर्वोपरि था।

इसके बाद भी जैसा कि हम देख आए हैं भाषा के लिए कुछ शब्द हमारे उच्चारण तंत्रों पर आधारित हैं। संभव है भारोपीय भाषा [1] ईरान में पहुंची उससे पहले से वहां भाषा के लिए जिह्वा की सक्रियता और निर्णयकारी भूमिका को देखते हुए जबान का प्रयोग चलन में आ चुका रहा हो। जिह्वा की जिस भूमिका की और ध्यान प्रमुख रूप में हमारे विचार-केंद्र था, वह था इसका स्वादग्राही पक्ष – रसना, यद्यपि उच्चारण में इसकी भूमिका के विषय में जितनी बारीक जानकारी भारतीय वैयाकरणों को थी वह दूसरे देशों से बहुत आगे थी। परंतु यह जानकारी उच्चारण स्थानों के जिह्वा द्वारा स्पर्श तक सीमित थी, उच्चारण उन स्थानों की भूमिका से संभव हो पाता था।,

इसके जिस दूसरे गुण की ओर उनका ध्यान गया वह थी इसकी वक्रता, या मुड़ने की क्षमता जो उच्चारण में ‘जिह्वा’ के सबसे निकट पड़ने वाले ‘जिह्म’ शब्द से ध्वनित होता है। और रिह, लिह, लेलिह्यमान से जो प्रकट है, वह भी चखने, चाटने, निगलने से संबंध रखता है। अजीब बात है, चखना, चक्षण- देखना, (स्वाद) जानना का ओर ध्यान गया, तो भी बोलने की तरफ नहीं। तमिल में जिह्वा का जो पर्याय हैं वह भी स्वाद लेने से ही संबंधित है। यह सभी बनावटी नाम है, और शब्द गढने वालों की अपनी सीमाओं को प्रकट करते हैं। जो भी हो आर्थी स्रोत पर ध्यान देने पर हम पाते हैं कि उर्दू का जबान शब्द यूरोप तक भाषा के लिए प्रयुक्त हुआ।

यही स्थिति शब्दों के अर्थ के मामले में पाई जाती है। भारतीय भाषाओं में अर्थ के लिए मन से जुड़ा कोई शब्द नहीं है, निचोड़ने (अर्थ, निष्कर्ष,आशय ) सार तत्व (सारांश), हृदय को प्रभावित करने वाला भाव (मर्म) से जुड़े शब्द हैं, और धारणा या स्थापना (मान्यता, मन्तव्य) अवश्य देखने में आते हैं। ईरानी क्षेत्र में ‘मानी’, या मान्यता को ही अर्थ का द्योतक माना गया। यही यूरोप तक पहुंचा जिसमें हम अंग्रेजी में मीनिंग शब्द को प्रयोग में आते देखते हैं।

शब्दों का एक विशेष दिशा में प्रभाव और उसके पीछे के हिस्से में उसका अभाव किस बात का द्योतक है ? मैक्समुलर ने ऐसे शब्दों का संकलन किया था जो भारत में नहीं पाए जाते परंतु आगे यूरोप तक पाए जाते हैं। इन्हीं के आधार पर उसने यह दावा किया था मेरे पास इस बात के निर्णायक प्रमाण हैं कि भाषा भारत से ईरान में पहुंची थी न कि इसके विपरीत। उनके अपने ही ठोस प्रमाण के आधार पर यह सिद्ध होता था भारोपीय भाषा भारत से निकलकर यूरोप तक फैली है।

मैक्स मूलर ने भारोपीय के स्थान पर, शब्द की संक्षिप्तता को देखते हुए इस भाषा के लिए “ आर्य भाषा” के प्रयोग का सुझाव दिया था, और उसमें भी यह दिखाया था की आर्य शब्द का प्रसार आयरलैंड तक है, परंतु ज्यों ज्यों हम पश्चिम की ओर बढ़ते जाते हैं, प्रयोग विरल होता जाता है।

सत्य किसी अंग में नहीं होता, अपने पूरे पिंड में समाया होता है, और पाश्चात्य अध्येताओं ने जब भी इसके किसी को्ण को ईमानदारी से परखने का प्रयत्न किया तो उनके नतीजे ठीक वही आते थे जो मैंक्स मुलर के ऊपर के कथन में मूर्त है। परंतु बेईमानी की हद यह कि स्वयं मैक्स मूलर अपने खोए हुए सच का सामना नहीं कर सके। उपनिवेशिक तकाजों और नस्लवादी पूर्वाग्रहों से उन्हें लीपापोती करते हुए मूल निवास को मध्य एशिया में स्थापित करने की, और यूरोप के अलग-अलग जत्थों को अलग अलग होकर वहीं से भेजने की कवायद करनी पड़ी।

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[1] हम पीछे कह आए हैं कि संस्कृत अथवा वैदिक भाषा की तुलना में भारोपीय शब्द आज का गढ़ा हुआ होने के बाद भी, इस दृष्टि से अधिक उपयुक्त है कि यह संस्कृत नहीं थी, वैदिक कालीन बोलचाल की भाषा थी जो संस्कृत के निकट थी परंतु इसके चरित्र को निर्धारित करने वाले वे सभी लोग थे जो विदेश व्यापार में किसी ना किसी भूमिका में सक्रिय थे।और जो अपने दायरे में घर से लेकर बाहर तक अपनी बोली नहीं बात करते थे। भारोपीय संकल्पना में यह तथ्य सम्मिलित नहीं है परंतु उसका चरित्र ही निर्धारित नहीं है इसलिए उसमें इन सभी को शामिल किया जा सकता है और उसे नए सिरे से परिभाषित किया जा सकता है।

Post – 2020-05-12

यह आदमी भूखों मर जाएगा, पर संगीत के बिना जिन्दा रहना पसंद नहीं करेगा। कलाकार की परख यहीं होती है और उसकी दुरवस्था का यही कारण है। वह दूसरों की जरूरत पूरी करने के लिए उस आनंद का सौदा नहीं कर सकता, जो व्यक्त होने पर समाज को (श्रोताओं को) सहज सुलभ होता है। प्रगतिवाद के नाम पर राजनीतिज्ञों ने वेदना और संवेदना के इसी स्वायत्त पर समाज व्यापी साम्राज्य को नष्ट किया।

Post – 2020-05-11

#शब्दवेध(33)
बात आँखों पर आ गई

यह कम रोचक नहीं है कि जल के जिस नाद का अनुवाचन अक्षर रूप में किया गया, अक्ष का भी उसी से संबंध है। अक्षमाल जो मनके या रोजरी का सबसे पुराना रूप है, उसी मूल से संबंधित है। मनुष्य अपना हिसाब जिन आदिम विधियों से करता था, उनमें एक था किसी डंडे पर कटाव करना या निशान बनाना जो आगे चलकर लंबाई नापने के पैमाने (measuring rod) के काम आया।

दूसरा था किसी लता या रस्सी में गांठ लगाना और इसी का अगला चरण था किसी धागे में छेद बने ऐसे बीज जिनमें घुन न लग सके,(जैसे पतजीव, इमली का चिंआ, या गुंजाफल) गूँथते या कम करते जाना। बाद में इनका स्थान मूंगों, मनकों, कौड़ियों और सुगंधित काठ, कांसे, चांदी या सोने के तराशे या ढाले हुए दानों ने ले लिया। गणित का विकास इसी विधि से हुआ।
जीवन में स्थायित्व आने के बाद इसमें रोड़ियों से भी मदद ली जाने लगी। और फिर दीवारों पर चिन्ह या बार।

लेखन का आदिम संकेतन भित्ति चित्रों से या कहें चित्र कथाओं से आरंभ हुआ, जिसके प्रमाण शैलाश्रयों, गुफाओं और कंदराओं में मिलते हैं। संभवतः इन्हें अमूर्तन के बाद अक्षर कहा जाने लगा। वह जिसे मिटाया नहीं जा सकता, जिसमें अंकित होने के बाद किसी वस्तु या घटना को विस्मृत नहीं किया जा सकता। हम यहां यह निवेदन कर रहे हैं की अक्षर वाणी के चिन्हित रेखांकन के, या आंखों से देखे जा सकने वाले (अक्षिगम्य) चिन्हों के लिए प्रयोग हुआ। प्रमाण मान्य सिद्धांत नहीं; साक्ष्यों पर आधारित अनुमान मात्र है।

गणना के लिए अंक या आंक, आंकना – मूल्यांकन करना; शब्दचित्र के लिए आखर, पौधे की आंख से निकलने वाले कुछ मुड़े हुए करचे के लिए अँखुआ ><अंकुर > अंकुश/ अंकुशी और फिर पिंड या काया से अंकुर की तरह निकले भागों के लिए अंग और फिर कार्य में सहायक अंगों और उसके बाद में ज्ञानेन्द्रियों के लिए और इसके बाद किसी संरचना के घटकों के लिए इसका अर्थविस्तार होता गया। आश्चर्य तब होता है जब क्रोड >गोद (कोला>भो. कोराँ) के लिए इसका प्रयोग होते पाते हैं, परन्तु होता उन्हें ही है जो फूले हुए पेट को अंक समझ बैठें। इसकी मूल संकल्पना उदर विवर/कोटर के रूप में की गई।

बोएज भाषा संरचना के इस तर्क तक पहुँचते हैं, पर इसके मर्म तक इसलिए नहीं पहुँच पाते क्योंकि जिन अमेरिकी आदिम जनों की बोलियों को समझने के प्रयत्न में वह अपने निष्कर्ष तक पहुँचे थे, उनसे उनका आंतरिक लगाव नहीं था, जो संकल्पनाओं और संवेदनाओं की बुनावट को समझने के लिए जरूरी है। रिचर्ड्स ने (द मीनिंग ऑफ मीनिंग) में उनके द्वारा भाषा विषयक वस्तुपरक चर्चा में विचारणीय जिन तीन बिंदुओं पर ध्यान देने का सुझाव दिया गया है वे निम्न प्रकार हैं : 1. भाषा की ध्वनि संपदा: 2. उस ध्वनिसंपदा द्वारा व्यक्त विचार-संपदा; और (3) ध्वनि गुंफों को मिलाने और ढालने की युक्ति(याँ)।[1] हम किन विचारणीय पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी मानते हैं इसका उल्लेख हम कर आए हैं और वह किसी न किसी रूप में पूरी लेखमाला में उदाहृत मिलेगा।

अब हम आँख के लिए प्रयुक्त ‘कण्’ को ले सकते हैं जिसे काल्डवेल ने द्रविड़ का माना है और यह लगता भी द्रविड़ का है। परन्तु इसकी जैसी व्याप्ति सं., हिं., और भो. में देखने में आती है वह बहुत प्राचीन स्तर की साझेदारी को प्रकट करती है। सबसे बड़ी बात यह कि जिस जलवाची शब्द कन् से चमक, प्रकाश और फिर आँख की संज्ञा मिली है वह तमिल में मेरे देखने में नहीं आई। भो. कनइल, नकइल में प्रयुक्त कन् और नक का अर्थ जल है, कनई – कीचड़ है। नदी या जलाशय के किनारे बसे स्थान नामों में कन् – कनखल, कानपुर, कनौज, कन्नानूर में आया कन्- जलवाचक है। नक/ मक – का अर्थ भी जल है और नक्र कहें या मक्र (मगर) का अर्थ पानी का जंतु है। मक्कड़जाल और मगरमच्छ के आँसू मगर और बंदर की कहानी के बाद गढ़े गए शब्द हैं। कंज का अर्थ जलज है। कहें कण् का पुराना रूप कन रहा लगता है, कम से कम संस्कृत में इसको कण् कौरवी प्रभाव कह सकते हैं। मूल कन था यह कंज, कनक -1. अनाज( गेहूँ[, 2. सोना [2], कन् का आद्यक्षर जब तालव्य हो जाता है तो चन- जल, चणक – चना, और कन्+चन् दोनों के योग से कंचन – सोना, काँच>काच – शीशा, कांस्य / काँसा।

जो भी हो, यद्यपि कण आँख के अर्थ में सं- में नहीं मिलता, पर भो. में नीलाक्ष व्यक्ति के लिए कँड़जाह प्रचलित है जो या तो अपने कौरवी प्रतिरूप का अपभ्रंश है या इस क्षेत्र में छिट-फुट बसी उस बोली से आया है जिसकी तमिल से निकटता थी। देखने के लिए भी भो.हिं. या संस्कृत में कण् से कोई शब्द नहीं निकला है, पर भेंगी आँख वाले के लिए कनढेबर शब्द का चलन है। पर इसमें आए कन का आँख से नहीं कोण या तिरछेपन से संबंध है। ढेबर प्रकाश या दृष्टि के लिए आया है। एक पुराने नेता यू. एन. ढेबर के नाम में यही सुदर्शन या द्र्ष्टा वाला भाव है। अभी तक ढिबरी को उसके नाम और काम से जानते रहे हैं पर इसका अर्थ समझ में नहीं आता रहा है तो अब समझ में आ जाना चाहिए।

यही बात तमिल के लिए भी कही जा सकती है। उसमें देखने के लिए पार् और नोड का प्रयोग होता है। नोडु अं. नोट, नोटिस और नोड – गाँठ की निकटता चौंकाती है, पर हम इस पर अधिकार के साथ कुछ कह नहीं सकते, यद्यपि होने को तो कुछ दूर का नाता नॉड का भी हो सकता है। भो. हिं. में कनखी मारने का प्रयोग कण् के अधिक निकट है। कनीनिका – आँख की पुतली और काना- एकाक्ष।
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[1] Boas …formulates as the three points to be considered in the objective discussion of languages.
First, the constituent phonetic elements of the language;
Second, the groups of ideas expressed by phonetic groups;
Third, the method of combining and modifying phonetic groups.
“All speech,” says Dr Boas explicitly, ‘is intended to serve for the communication of ideas.” Ideas, however, are only remotely accessible to outside inquirers, and we need a theory which connects words with things through the ideas, if any, which they symbolize.
[2] सभी खाद्य और पेय – द्रव और आर्द्र पदार्थों को, तथा चमकदार द्रव्यों को उनका नाम जबवाची शब्दों से मिला है।

Post – 2020-05-10

#शब्दवेध(32)
बात आँखों पर आ गई अब तो

सच कहें तो हम आंखों पर बात नहीं करना चाहते। जो लोग आंखें चुराते रहे हैं, वे इसे पसंद नहीं करेंगे। हम किसी को नाराज नहीं करना चाहते। चाहते हैं वे भी अपनी झेंप मिटाकर,आमने सामने होकर कुछ कह और कुछ सुन सकें, समझना बाद की बात। रोशनी की बात करना चाहते हैं। और न चाहते हुए पानी की बात करना चाहते हैं जो आंखों में भर जाता है तो कुछ दिखाई नहीं देता, और जो मर जाए तो हम कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं रह जाते।

आँख अकेली ऐसी चीज है जिसका आना भी बुरा है, जाना भी। उठना भी बुरा है, और बैठना भी. लगना बुरा है और बदलना भी, दिखाना बुरा है और बचाना भी, तानना भी और झुकाना भी, सूखना भी बुरा है और तर होना, भर जाना, उमड़ना भी, तानना भी और झुकाना भी, और जो लोग आँख मिलाने को इसका विकल्प मानते हैं वे जानते ही नहीं कि उसके बाद क्या होता है। न चैन से रहती है न रहने देती हैं, पलकों से ढक दो तो सपने देखने लगती हैं।

आपको पता होगा कि तमिऴ में आंख को कण् कहते हैं। कन्नम् का अर्थ ‘गाल’ होता है। प्रयोग अटपटा तो है ही गंड – कनकटी के लिए सं. शब्द जिसकी चर्चा मतवाले मकुना (> मुकुंद) की चढ़ती जवानी और बहते मद के संदर्भ में ही आती है, और इसे गालों के लिए चुन लिया गया। बड़ा विचित्र लुकाछिपी है हमारी भाषाओं के बीच एक का कान दूसरे का गाल हो जाता है, कान के लिए त. कादु से काम चलाया जाता है, ऊँचा सुनने को ‘कादुमंदम्’ कहते हैं। हिन्दी में मुँह बाना – कुछ पाने की आतुरता के लिए अवज्ञापूर्ण प्रयोग है। बाना का शाब्दिक अर्थ है खोलना, परन्तु इसका प्रयोग केवल मुँह के संदर्भ में होता है, अन्यत्र कहीं नहीं। जानते हैं क्यों? तमिल में मुख के लिए ‘वाय’ प्रचलित है और यह प्रयोग उसी प्रभाव का परिणाम है।

माना यह जाता है कि कान संस्कृत के कर्ण का तद्भव है। पूरबी में न ‘ण’ था, न असवर्ण संयोग, क्या कुरुक्षेत्र में पहुँचने से पहले कान भी नहीं थे, या कान पकड़ने के लिए थे, नाम उचारने के लिए नहीं। लगता तो उल्टा है, कर्ण कान का संस्कृतीकरण हो और संभव है बोलचाल में इसका रूप ‘कन्न’ भी चलता रही हो। भो. का अकनना – मंद ध्वनि या नाद को बहुत ध्यान से कान और अनुमान दोनों के सहारे सुनना इसी की देन है। सं. में आकर्णन गढ़ लीजिए पर बात बनेगी नहीं। भो. में बरसात में पेड़ की डाल पर उगे फफूँद के सूखे चट्टे का कनचट कहते हैं।

यहाँ तक तो ठीक है पर आदमी एक आँख से विकलांग हो तो उसे काना क्याें कहते हैं, समस्या वहाँ खड़ी होती है कि सायणाचार्य जिनका संपादकमंडल दाक्षिणात्य था उन्होंने भी कण्व का एक स्थल पर काणा अर्थ किया जब कि होना विचक्षण चाहिए।

काल्डवेल ने संस्कृत से पृथकता दिखाने के लिए तमिल और संस्कृत के कुछ शब्दों की तालिका दी है. उसमें त. कण् है तो सं. का अक्षि।

आंख को संस्कृत के जानने वाले अक्षि का तद्भव मानेंगे। इसी का हड़पपाकालीन बोलचाल की भाषा में अधिक व्यवहार होता था, क्योंकि इसी का प्रसार भारोपीय भूभाग में हुआ या अधिक हुआ।

फारसी में यह अक्स – प्रतिबिंब, छाया, प्रतिरूप हो गया और संभवतः इसी के प्रभाव से नख-शिख ने नक्श का रूप लिया जो इसके अर्थ ‘रूपाकार’, ‘बनावट’ और चित्राकृति का सूचक बना और जिससे ‘नक्शा’- मानचित्र के लिए शब्द मिला है। फारसी से ही हमें पता चलता है कि अक्षि का एक प्रतिरूप ‘चक्षु’ भी प्रचलन में था, जिसका सजात फारसी का ‘चश्म’ है।

जो शुद्धतावादी लोग लोकप्रिय फारसी शब्दों तक के अटपटे सं. रूप गढ़ कर अपना काम भी मुश्किल बनाते हैं और भाषा की संचार क्षमता को भी पंगु बनाते हैं, वे यदि समझ सकें कि फारसी शब्द संस्कृत शब्दों के अपभ्रंश हैं और जिस सहज भाव से हम अपनी बोलियों में उनकी ध्वनि व्यवस्था में अनुकूलित शब्दों का प्रयोग करते हैं उसी तरह उनका भी किया जाना चाहिए, तो हिंदी की अक्कड-बक्कड़ तनावग्रस्तता को कम करके इसे अधिक प्रवाही भाषा बनाया जा सकता है। यह समझ नई भी नहीं है। विलियम जोन्स ने ही इस तथ्य को कुछ जोखम उठाते हुए भी स्वीकार कर लिया था।

परंतु हमारी व्याख्या में अर्थ का पक्ष गौण महत्व रखता है, और उसे वह अर्थ और रूप किस नाद के अनुकरण के फल-स्वरूप मिला है और वह किस उपादान या स्रोत से मिला है, यह अधिक प्रधान है। क्रिया का निर्धारण हम अधिकांश मामलों में नहीं कर सकते या अर्थ की सहायता से ही कर सकते हैं, क्योंकि उसकी यात्रा कठिन होगी पर हर मामले में लोगों के संपर्क और प्रचलन के रूप का पता नहीं चल सकता। हमारी सामान्य स्थापना (1. ऐसी सभी वस्तुओं का नामकरण जिनसे स्वतः कोई ध्वनि नहीं पैदा होती उनका नामकरण अपने से किसी रूप में संबंधित ऐसी वस्तु से मिला है जिससे नाद पैदा होता है, और इसी के अनुसार; 2. सभी पादपों और ओषधियों का नामकरण जल और उसकी ध्वनि पर आधारित है) हमारे लिए अधिक उपयोगी है। अब हम कुछ ऐसे नाम ले सकते हैं जो अर्थ निर्धारण में सहायक हों : अकवन/ आक – मदार का पौधा जिससे दूधिया रस निकलता है,; अकरा, अकरी- काफी छेटे दाने की मटर, अकोल/ अकोल्ह- एक जंगली पेड; पानी के आशय मे अक्-षर (अक्षर – जल ‘तेन क्षरति अक्षरम्) और अं. का एकुआ/ ला. (aqua – पानी)। यह रहा अक्षि का अनुनादी स्रोत जिससे जुड़ा है आर्थी आधार।

जल के अनेक गुणों में एक है इसका मुकुर पक्ष। दर्पण के आविष्कार का प्रेरक और प्रकृति का दर्पण स्थिर निस्तरंग जल है यद्यपि तरंगित जल में भी बिगड़े शीशे जैसा प्रतिबिंब तो दिखाई देता ही है। इस चमक के कारण ही एक ओर तो आग के लिए प्रायः वे ही शब्द प्रयोग में आते दिखाई देते हैं जिनका अर्थ जल है (जल>ज्वाला; जर – ज्वर); दूसरे यह कल्पना की गई कि आग जल का नाती है – अपां नपात – जल का पुत्र बादल और बादल की संतान आग जो बादलों की कौंध में दिखाई देता है और बिजली गिरने के साथ इसका प्रत्यक्ष अनुभव भी हो ही जाता है; तीसरे आदिम चरण पर यह कल्पना की गई कि सूर्य रात को जल में सो जाता है, इसीलिए प्रातःकाल में उसमें गर्मी नहीं होती, अग्नि का निवास जल है इसलिए अँधेरे में भी जल चमकता है। इस चमक और प्रकाश के गुण के कारण जल के किसी पर्याय से आँख के लिए शब्द निकलना सर्वथा स्वाभाविक था।

अब रहा इसका रूपगत आधार । यह एक छिद्र मे रूप में माना गया जिससे प्रकाश का भीतर प्रवेश होता है इसलिए जिसमें भी छिद्राकृति हो उस तक इसका अर्थविस्तार हुआ – आखा – छानने का उपकरण जिसमें छेद बने होते है; गवाक्ष बाहर देखने के लिए गोलाकार खिड़की; जिसकी बनावट आँख के कोये जैसी हो – अक्ष- हारीतकी की गुठली जिससे जुआ खोला जाता था; रुद्राक्ष – गोलाकार पर देखने में भयंकर आदि।

Post – 2020-05-09

#शब्दवेध(31)

साँस और श्वास में कितनी दूरी है?
उतनी ही जितनी पूरबी और कौरवी में, जिसकी प्रकृति पू
श्वास और नि-श्वास में, नि-श्वास और उत्-श्वास (उछ्वास > उसाँस)/ प्र-श्वास में, श्वास और वि-श्वास में, श्वास और *आ-श्वास> आ-श्वास-न में, कितनी दूरी है?
उतनी ही जितनी प्राकृत भाषा और कृत्रिम भाषा में। कृत्रिम जीवन के साथ हमारी नैसर्गिक क्षमताएँ घटती जाती हैं, और जो सहज था वह लंबी शिक्षा के बाद भी उतना स्वाभाविक नहीं रह जाता जितना कृत्रिमता अभाव में। इसका सबसे अच्छा उदाहरण मनुष्य की तैरने की निसर्गजात क्षमता (इंस्टिंक्ट) का लोप और उसे अर्जित करने के लिए अपेक्षित अभ्यास है। हम यह तक भूल जाते हैं कि किसी प्राचीन चरण पर यह क्षमता हममें विद्यमान थी। ऊपर के शब्दों का प्रयोग करते समय हममें से कितनों को याद रहता है कि ये शब्द हमारे साँस लेने से उत्पन्न ध्वनि के अनुवाचन (वाणी से उसके उच्चार हैं।
एक और अंतर आता है। अपने (उपसर्जित) उपसर्गों की सहायता से वाले, स्व-नियंत्रित शब्दों को वह किसी आशय से जोड़ सकता है। शब्द और अर्थ की वह अभेद्यता समाप्त हो जाती हो जिसे कालिदास ने वागर्थाविव संपृक्तौ या तुलसी ने गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न कहा है। यही वह कारण है जिससे उपसर्जित शब्दों में अप्रत्याशित या अनियमित अर्थ का आरोपण हो जाता है जिसे “उपर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते” में सूत्रबद्ध किया गया है। ध्यान रहे कि ऐसा प्रत्ययों के साथ नहीं होता क्योंकि प्रत्यय का प्रयोग नैसर्गिक भाषा से आया हुआ है।
रोचक बात यह है कि आग्रहमुक्त भाव से जिसने भी भाषा पर विचार किया है वह इस सचाई के निकट पहुँचा है। उदाहरण के लिए हर्बर्ट स्पेंसर के निम्न कथन को लिया जा सकता है:
In Primitive thought the name and object named are associated in such wise thai the one is regarded as a part of the other The imperfect separation of words from things characterizes Greek peculation in general” -HERBERT SPENCER
और मिलते जुलते विचार
The omission of all separate treatment of the ways in which speech, besides conveying ideas, also expresses attitudes, desires and intentions, is another point at which the work of this active school is at present defective. Dr Boas
तथा
language is defined as “a purely human and non-instinctive method of communicating ideas, emotions and desires by means of a system of voluntarily produced symbols” ( E Sapir, Chief of the Anthropological Section, Geological Survey of Canada,Language, 1922, p 7) But so little is the emotive element considered that in a discussion of grammatical form, as shown by the great variation of word order in Latin. we find it stated that the change from ‘hominem femina videt’

ये सभी मनीषी समस्या के काफी निकट पहुँच कर उन शास्त्रीय मान्यताओं के दबाव में यह समझते समझते रह जाते हैं कि भाषाएँ अपने प्राथमिक चरण पर नैसर्गिक, यांत्रिक और सवायत्त नादों के (एकास्टिक स्पंद) या ध्वनि तरंगों के अनुश्रवण, जिसके अनगिनत रूप हो सकते हैे, को वाग्तंत्र से उच्चरित नाद व्यवस्था में ढाल कर दूसरों तक संचारित करने के विधान हैं।

Post – 2020-05-09

जमाने की नजरों में माना गलत हूँ
बताना जमाना कभी क्या सही था!