Post – 2019-03-03

आज भी तुकबंदियों का दिन रहा।
कह सके तो कल कहेंगे अपनी बात।।

Post – 2019-03-03

जो सूझता है वह भी है उल्टा ही सूझता
कहते हैं अक्से नक्श निगेटिव में बयां है।

Post – 2019-03-03

आप थे, हम थे, सटे पास मगर
दूर इतने कि सरहदों को सलाम।

Post – 2019-03-03

ऐ मेरे अजीजों क्या तुमने भी वही देखा?
सच झंस था वजन में कुछ, पर झूठ जियादा था।

Post – 2019-03-02

शायरों ( बुद्धिजीवियों) पर भरोसा करने वाले मारे जाएंगे

पूछें क्यों? तो जवाब है, क्योंकि वे हकीकत को खयालों में बदलकर देखते हैं और खयालों को हकीकत पर लाद कर उसे बदलना चाहते हैं। अंदाज़ तो अच्छा है अंजाम आप जानें।

कवियों, सूक्तियों और मुहावरों पर भरोसा करने वाले फायदे में रहते हैं। फायदा यह कि बिना सोचे विचारे बड़ी आसानी से वे ऐसे निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं जिसके सामने दूसरे अवाक हो जाते हैं और अपने मन के ऊहापोह को दबाकर उनकी बात मान लेते हैं।

रचनाकार को अपने तुक और ताल का जितना ध्यान रहता है उतना सत्य, समाज या मानवता के हित का नहीं। उसकी महिमा इसी में है, उसका लाभ इसी में है। अपने समय की गुलामी से समाज को बाहर निकालने का महामंत्र उसके पास है, अपने समय का मुकाबला करने का हथियार और औजार उसके पास नहीं है।

उसकी सलाह के फायदे जो भी हों, उसके नुकसान उनको उठाना पड़ता है जो उन निष्कर्षों को सही मान लेते हैं। मैं अपने कवि मित्रों से भी कहता रहता हूं कि विचार के मामले में आप पर भरोसा नहीं किया जा सकता, और स्वयं भी यही मानता हूं और आवेग या भावना की सघनता के क्षणों में जो कुछ लिख बैठता हूं उस पर विश्वास नहीं करता। अक्सर उसे काट कर अलग कर देता हूँ।

इसका एक नमूना पेश करना चाहता हूं। मुझे आज के हंगामे के बीच सोचते हुए लगा इमरान खान सचमुच पाकिस्तान की पिछली गलतियों को सुधारते हुए भारत-पाक संबंधों में सुधार करना चाहता है, और भारत सरकार (मोदी) से उसकी यह अपील कि उसे एक मौका दिया जाए, बहुत निश्छल और खेल भावना में पले हुए एक महान खिलाड़ी के अनुरूप है।

फिर यह ध्यान आया कि यह अपील उसने एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद जिस के सूत्र पाकिस्तान से जुड़े हुए थे और जिसका ऐलान पाकिस्तान में स्थित उसके आकाओं ने स्वयं ली थी, उसी समय पर क्यों की? भारत ने इसका प्रमाण दिया था, परंतु वह पाकिस्तानी परंपरा के अनुसार उसे पर्याप्त नहीं लगा था।

पक्का प्रमाण देने के लिए भारत को जैस के ठिकानों को मिटाने का निर्णय लेना पड़ा। पाकिस्तान के नागरिक या सामरिक ठिकानों को कोई क्षति न पहुंचे, इसका उसने पूरा ध्यान रखा। केवल पाक संरक्षित जैस के ठिकानों को मिटाकर निर्णायक प्रमाण देने का प्रयत्न किया।

इस प्रमाण से ही बौखला कर पाकिस्तान ने दोबारा ऐसी गलती की जिस से युद्ध छिड़ सकता था। पहले ही आघात में मुंह की खानी पड़ी। फिर भी एक सही कदम उठाते हुए उसने जेनेवा संधि के अनुरूप व्यवहार किया जिसकी सामान्यतः पाकिस्तान से अपेक्षा नहीं की जाती, यद्यपि कुछ समय पहले पाकिस्तानी रेंजर्स के दो सैनिकों को भारतीय सीमा में दाखिल होने के बाद यह जानकर कि वे अज्ञान वश भारतीय क्षेत्र में प्रवेश कर गए थे, भारत ने सम्मान सहित उनको वापस लौटा दिया था।

पाकिस्तान जब ऐसा ही व्यवहार करता है तो वह आश्चर्यजनक, अभूतपूर्व जैसा क्यों लगता है? दिमाग ने पलटा खाया तो सरहदों पर चल रही लगातार गोलाबारी के बीच सोच का रुख बदल गया। यह भूमिका मैंने उस भावभूमि को उजागर करने के लिए लिखी है जिसमें विचार में तल्खी भी आ गई और वह तुकबंदी में ढल गई:

वहशत ही सही
हँसने हँसाने के लिए आ।
उलेमा* को उसका पट्ठा बनाने के लिए आ।
वहशत ही सही।।
(*बुद्धिजीवी)

कहने को तो इस्लाम की ख्वाहिश है सलामत।
कायल नहीं जो उनको मिटाने के लिए आ ।
वहशत ही सही।।

लब इतने हैं शीरीं कि उलट जाता है मानी
यह राजे-हुनर हमको बताने के लिए आ।
वहशत ही सही।।

बन्दों का है मालिक तो क्यों बन्दे रहें आजाद।
खुद्दार को खुद-बीं को सताने के लिए आ।
वहशत ही सही।।

बेचैनियों से दुनिया के मिलता है तुझे चैन।
मेरा अमन सुकून मिटाने के लिए आ ।
वहशत ही सही।।

गोलों के बीच मीठी गोलियों की पेशकश।
शक्कर के मरीजों को लुभाने के लिए आ।
वहशत ही सही।।

आजाद नहीं तू है जमाने को है मालूम।
आजाद हो सके तो बताने के लिए आ।
वहशत ही सही।।

तोपों के रुख को देख और मेयार उनका देख
दुनिया के रुख से होश में आने के लिए आ।
दहशत ही सही।।

(तुकबन्दियों को देख मजा ले मेरे महबूब।
जो लिख दिया तू उसको मिटाने के लिए आ।
तोहमत ही सही।।)
निष्कर्ष यह कि यदि इमरान सचमुच शांति प्रक्रिया आरंभ करने के प्रति गंभीर हैं तो उन्हें अपनी सेना से मोहलत मांगनी चाहिए कि गोला-तोप बंद करो जिससे मैं शांतिवार्ता आरंभ कर सकूं और पाकिस्तान की आर्थिक दुर्दशा दूर कर सकूं, न कि भारत (मोदी) से, जो लगातार कहता आ रहा है कि जबान की आवाज तोपों की आवाज के बीच सुनाई नहीं पड़ती। पहले इसे बंद करो और याद करो कि यह तनाव और टकराव हमारे विकास में बाधक है। भारत को इमरान से नसीहत लेने की जरूरत नहीं है, इमरान को भारत की इस नसीहत पर ध्यान देने की और अपनी सेना को समझाने की जरूरत है।

Post – 2019-03-02

मर गया, मुद्दत हुई, पर देखिए जिन्दा है वह।
और हम जिन्दा हैं, फिर भी मानता कोई नहीं।।

Post – 2019-03-01

वहशत ही सही
हँसने हँसाने के लिए आ।
उल्मा को उसका पट्ठा बनाने के लिए आ।
वहशत ही सही।।

कहने को तो इस्लाम की ख्वाहिश है सलामत।
कायल नहीं जो उनको मिटाने के लिए आ ।
वहशत ही सही।।

लब इतने हैं शीरीं कि उलट जाता है मानी
तू क्या है, क्यों ऐसा है बताने के लिए आ।
वहशत ही सही।।

बन्दों का है मालिक तो क्यों बन्दे रहें आजाद।
खुद्दार को खुद-बीं को सताने के लिए आ।
वहशत ही सही।।

बेचैनियों से दुनिया के मिलता है तुझे चैन।
मेरा अमन सुकून मिटाने के लिए आ ।
वहशत ही सही।।

गोलों के बीच मीठी गोलियों की पेशकश।
शक्कर के मरीजों को पटाने के लिए आ।
वहशत ही सही।।

आजाद नहीं तू है जमाने को है मालूम।
आजाद हो सके है दिखाने के लिए आ।
वहशत ही सही।।

तोपों के रुख को देख और मेयार उनका देख
दुनिया के रुख को देख, दिखाने के लिए आ।
वहशत ही सही।।

Post – 2019-03-01

वह मर गया और देखिए फिर भी है वह जिन्दा।
जिन्दा तो मैं हूँ, फिर भी कोई मानता नहीं।।

Post – 2019-03-01

पाकिस्तान ने अभिनन्दन की वापसी के लिए स्व-निर्धारित समय का निर्वाह न करके यह प्रमाणित किया है कि हमारे वादे पर भरोसा मत करो।

Post – 2019-02-28

आ बैल मुझे मार

राजनीति पर कुछ लिखने की योग्यता मुझमें नहीं है। सर्वज्ञ होने को मितज्ञ होने से बड़ी उपलब्धि नहीं मानता। मन में इस बात की ग्लानि बनी रहती है कि मैं साहित्य, भाषाविज्ञान, वैदिक मीमांसा, पुरातत्व, इतिहास, सभी में अड़ंगाबाजी क्यों करता हूं। क्यों नहीं इनमें से किसी एक तक अपने को सीमित रखकर अंति गहराई तक पहुंचने का संयम बरत सका।

आधुनिक विषयों पर भी समय-समय पर टिप्पणी करने के लिए लाचार हुआ। संभवतः इस दबाव में कि यह बता सकूं जगत गति मुझे भी व्यापती है, परंतु मन में इस आकांक्षा के साथ मेरी सोच में यदि कोई चूक है तो इसे सुधारने में मित्रगण सहायक होंगे।

मैं जो कुछ लिखता हूं, वह प्रशंसा के लिए नहीं होता। यह काम मैं स्वयं कर लेता हूं। यदि आपने कभी मेरी गर्वोक्तियों पर ध्यान दिया हो तो आप मानेंगे, कि मैं झूठ नहीं बोल रहा हूं। इसके बाद ऐसा कुछ बचता ही नहीं है जो मेरे विषय में कोई दूसरा कह सके, इसलिए मैं हमेशा उन लोगों का अधिक आदर करता हूं जो मेरी कमियां बताते हैं। जो बहुत फैला होता है उसमें छिद्र बहुत अधिक होते हैं, और यदि उसके पाठक उन्हें जानने में उसकी सहायता कर सकें तो यह उपकार करने के समान है। प्रशंसा तो कोई वैसी कर नहीं सकता जितनी मैं खुद अपने आप कर लेता हूं। प्रशंसकों से मुझे कुछ नहीं मिलता, जो कुछ मिलता है, वह आलोचकों से ही मिलता है। आज भी वहीं खतरा उठाना चाहता हूं और चाहता हूं आप मुझसे सहमत हों, परंतु स्नेहवश दूसरों से सहमत होने की आदत से भी बचने का प्रयास करें, और विरोध के लिए विरोध नहीं, गंभीरता से सोच कर मुझसे असहमति प्रकट करें जिससे मैं अपनी गलतियां सुधार सकूं।

यह शुभ है कि युद्धोन्माद का पारा कुछ नीचे आया है। परमाणविक आयुधों के के बाद दुनिया का कोई परमाणु-आयुध-संपन्न देश किसी दूसरे परमाणु-आयुध-संपन्न देश से अपनी छेड़छाड़ को उस सीमा तक नहीं पहुंचा सकता जिसमें अंतिम विकल्प परमाणु शक्ति का प्रयोग ही रह जाता है। प्रश्न यह नहीं है कि किसके पास कितने आयुध हैं। प्रश्न यह है कि आपको परमाणु शक्ति संपन्न होने की धौंस के कारण, कोई ब्लैकमेल कर रहा है, और आप उससे बचने के लिए लगातार पीछे हट रहे हैं या अंतिम जोखम का निर्णय करके उस की दबंगई को कम करते हैं और शांति का माहौल तैयार करने में अपनी भूमिका निभाते हैं।

पहली स्थिति का लाभ अपनी दबंगई के बल पर सोवियत संघ के विरुद्ध अमेरिका ने उठाया, और शांति प्रेम मे सोवियत संघ झुकने को विवश होता रहा। सामरिक तैयारी में उपभोक्ता वस्तुओं की कमी ने उसे जमीन पर ला दिया और इस दुहरी चिंता में गोर्बाचेव ने अमेरिका के सामने समर्पण कर दिया। अपने मानवतावादी सरोकारों के कारण परमाणु युद्ध को टालने का काम सोवियत संघ ने न ले लिया होता, तो अमेरिका को अपनी धमकी से पीछे हटना ही होता। कारण, परमाणु आयुधों के बाद उनके तुलनात्मक भंडार था प्रश्न ही बेमानी हो गया था। किसी के पास इतने कम परमाणु बम नहीं है कि दूसरे की भारी तबाही न कर सके, शर्त एक ही है कि उसे अपने सर्वनाश की कीमत पर ही यह जोखम उठाना होगा। जिस देश पर वह आक्रमण करता है वह देश जवाबी आक्रमण तो करेगा ही, दुनिया के दूसरे परमाणु शक्ति संपन्न देश भी ऐसे उन्मादी देश को धरती से मिटाने के लिए अपने बल का प्रयोग करेंगे। परमाणविक युद्ध अकेला ऐसा है, जिसमें युद्ध दो देशों के बीच सीमित रह ही नहीं सकता। यह अकेला युद्ध है जिसमें आक्रांता का सर्वनाश होना निश्चित है। आक्रांत उसके विनाश के बाद भी बचा रह सकता है। इसलिए परमाणविक युद्ध छेड़ना विश्वहित में तो है ही नहीं, छेड़ने वाले के सर्वनाश चुनाव है।

परमाणु-आयुध-संपन्नता कूटनीतिक दबाव का अंग बन चुका है। इसका लाभ लगातार पाकिस्तान लेता रहा, क्योंकि उसने अपने को एक गुंडा राज्य के रूप में पेश करने का तरीका अपनाया था। इसके सामने अधिक जिम्मेदार होने के कारण, भारत को लगातार पाकिस्तान के सम्मुख दीन हीन पॉलिसी अपनाने को विवश कर दिया था, जिसमें पाकिस्तान का समर्थन करने वाले भारतीय सिरफिरों को रिश्वत दी जाती थी कि वे कुछ कम उग्र रहें।

पहली बार नरेंद्र मोदी ने केवल पाकिस्तान के साथ दोस्ती का ही हर संभव प्रयास नहीं किया, कश्मीर का भी विकास करते हुए उससे सैन्य नियंत्रण को कम करने का आश्वासन दिया परंतु वह रिश्वत न दी जो पहले दी जाती थी। मोदी ने यह जानते हुए कि पीडीपी अलगाववादी मानसिकता से ग्रस्त है, लोकतंत्र को अपना करिश्मा करने का एक अवसर दिया । यह एक बहुत बड़ा प्रयोग था और इसकी क्रमिक विफलताओं के बाद भी अधिकतम अवसर दिया कि यह अपनी ग़लतियों से कुछ सीखें, और जब लगा गलतियां तक उसे अपनी उपलब्धियों प्रतीत हो रही हैं, तो नाता भंग करने पर बाध्य हुआ।

ठीक यही नीति उसने दूसरे अलगाववादियों और नौजवानों के साथ अपनाई। आगे का इतिहास मुझसे अधिक इस इलाके में ऊधम मचाने वाले हमारे मित्र जानते हैं, इसलिए हाल में घटित हुई घटनाओं को दुहराने का कोई अर्थ नहीं है।

संक्षेप में मेरी धारणाएं निम्न प्रकार हैं:
इस परिघटना के काल और भावी चुनाव को देखते हुए इसके कई तरह के अर्थ निकाले जा सकते हैं। ये अर्थ वस्तुस्थिति से अधिक हमारे पूर्वाग्रहों पर निर्भर करते हैं। कई की नजर में इसके कई लाभ होंगे इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, परंतु सुरक्षित यही है कि इन्हें विवाद से अलग रखा जाए।

इस घटना क्रम में जो कुछ हुआ है उसका एक लाभ तो यह है कि कि जो लोग भारत में बैठकर अलगाव की बातें करते थे और जिन पर अंकुश लगाना अभी तक संभव नहीं था अब पहली बार उनको दबाव मैं लिया जा सका है। उनकी आवाज और तेवर में अंतर आएगा।

पाकिस्तान जो अपने को किसी भी नैतिक प्रतिबंध से बाहर मानता था, और यह दावा करता था कि वह बिना कोई सूचना दिए परमाणु आयुधों का विकल्प अपना सकता है, उसे पहली बार यह बोध हुआ है, कि यह बच्चों का खेल नहीं है और खिलौना मान कर मनमानी करना शत्रु देश पर जितना भारी पड़ेगा उससे अधिक उसी पर भारी पड़ सकता है।

इमरान खान को मैं एक क्रिकेट खिलाड़ी के रूप में जानता था, जो बाल के साथ छेड़छाड़ करके भी विजय पाने के लिए कृत संकल्प रहा करता था। एक राजनीतिज्ञ के रूप में इमरान खान से मुझे अधिक उम्मीद नहीं थी। बल्कि मैं उसे राजनीति के लिए अवांछित व्यक्ति समझता था। मेरी समझ में बदलाव आया है। पाकिस्तान इमरान खान की मुट्ठी में नहीं है। वह सेना से चलता है, परंतु इमरान खान अब तक के पाकिस्तानी जनप्रतिनिधियों की तुलना में बहुत ऊंचा स्थान रखता है । उसे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ कि सेना ने पहली बार यह अनुभव किया कि अब भारत को ब्लैकमेल नहीं किया जा सकता, और कोई खतरा उठाना आत्महत्या के समान होगा। संभव है अब सेना नागरिक शासन को अधिक सम्मान की दृष्टि से देख सके।

नरेंद्र मोदी की भाषा मुझे पसंद नहीं है, उनकी भाव भंगिमा भी मुझे पसंद नहीं है, परंतु उनके कारनामे अभी तक के भारतीय इतिहास में अलग दिखाई देते हैं। सारी चर्चा या तो मोदी के विरोध में होती है या मोदी के पक्ष में। मोदी भारतीय चिंतन के केंद्र में हैं, और जब तक हैं तब तक शायद ही कोई उन्हें पराजित कर सके। वह अपने विरोधियों के अधिक शुक्रगुजार हैं, बनिस्बत अपने समर्थकों के जो आए दिन अपना असंतोष जाहिर करते हुए उटपटांग बातें करते रहते हैं।

मुझे अपनी सीमित समझ के भीतर किसी को उपदेश देने का अधिकार नहीं है, परंतु यह निवेदन करने का अधिकार तो है कि जैसे परमाणु युग में युद्ध के परिणामों को समझा जाना चाहिए, उसी तरह युद्ध उन्मादी भाषा, रिटोरिक, और आवेश से भी बचा जाना चाहिए।

सलाह तो मुझे भी आप ही देंगे।