Post – 2015-12-22

अस्पृाश्यबता की जड़ें – 2

“तुमने कहा तो मान गये, चुप लगा गये, पर बात गले उतरती नहीं कि अस्पृश्यता आदिम समाज से आई है। लगता है, तुमने पुरातनपंथिता की हिमायत करने का नया तरीका अपनाया है। मैं मानता हूँ तुम खाक को खल्कप साबित कर सकते हो, और इसका सम्मा न भी करता हूँ पर विश्वापस नहीं जम पाता।
’’तुमने कभी बिरादरी पंचायतें देखी हैं, मेरा मतलब खाप से नहीं है, बारी, धोबी, नाई, कहाँर, चमार आदि की पंचायतें ?”
वह कस्बे में पैदा हुआ था इसलिए कभी पाला नहीं पड़ा था। समझाना पड़ा, ‘’उनमें बिरादरी के अपने नियम-विधान होते हैं और उनके उल्लंघन के लिए दंड का विधान होता है। ऊँची जाति के लोग जिनसे वे सामान्य व्यलवहार में काँपते हैं, यदि कोई गर्हित अपराध करते हैं तो उनको अपनी सेवा से वंचित करने का भी अधिकार होता है। ये पंचायते सवर्ण असवर्ण सभी की रही है। उसी भूस्वामी से काँपने वाले धोबी, कहाँर आदि की अपनी बिरादरी पंचायत ने उसके किसी अपराध के कारण निर्णय ले लिया कि उसे बहिष्कृरत किया जाता है, तो कोई उसे अपनी सेवा प्रदान नहीं करता था और इसका सम्माकन वह स्वामी भी करता था।‘

‘समाज का अपना न्यायांग था।‘

‘ अपना न्याय वह स्वायं करता था और सामान्यत: किसी से कुछ छिपा नहीं होता था इसलिए उस तरह की बेईमानी या गलत-बयानी की नौबत नहीं आती थी। लोग किसी बाहरी आदमी को पट्टी पढ़ा भी दें, आपस में झूठ नहीं बोलते था। यह उनके संस्कारों का हिस्सा बन चुका था ।
‘’और जिस तरह की दलितों की हत्यायें या उत्पीड़न की कथाएँ सरकारी न्याय व्यवस्था स्थापित होने के बाद सुनने को मिलती रहीं, और जिनमें कमी नहीं आ रही, वे पहले नहीं होती थीं। हत्या किसी व्यक्ति की हो या ऐसे पशु की जिसके वध की वर्जना है, वह गाय हो, या बिल्लीा, या आज के दलित कहे जाने वाले किसी जाति के व्यक्ति की, उसका साहस कोई नहीं कर सकता था। गलती से भी अपराध हो गया तो उसे ‘हत्यारी’ लग जाती थी। तब तक के लिए जाति बहिष्कार जब तक वह प्रायश्चित्त के एक इतने पीड़क दौर से नहीं गुजरता, जिसमें वह अपने पातक को विज्ञापित करने वाले प्रतीक, हरे बाँस के कंछे की छड़ी लिए और कई साल भीख माँगता हुआ नहीं बिताता और फिर लौट कर आत्म शुद्धि नहीं करा लेता जिसमें सवर्णों में ब्राह्मण को कुछ दान आदि की व्यवस्था होती थी। गलती ब्राह्मण से हुई हो तो उसे भी इसी तरह प्रायश्चित्तक करना होता। सेवक जातियों की अपने‍ बिरादरी भोज आदि का विधान होता था। हमारा कानून जो पश्चिमी मानक पर बना है, अपराध को अधिक बढ़ाता है, बनिस्बत उस पुराने बिरादरी विधान के । किसी को म़़ृत्युयदंड का अधिकार न था, इसलिए ऐसे पातक जिनकी प्रायश्चित्त से भी शुद्धि नहीं हो सकती थी, उनका दंड था, जाति बहिष्काार या टाट से बाहर कर देना । उसका हुक्का पानी बन्द । उनका स्पर्श वर्जित । यह प्राणदंड जैसा दंड नहीं था, पर निर्वासन जैसा दंड अवश्य था। इसी के सामाजिक व्य वहार के रूप थे उपेक्षा या विर्सजन या सम्पर्क काट लेना हमारे मूल्यों में आ सका। हम उदार थे, हिंसा से बचते थे, परन्तुा सर्वथा अरक्षित नहीं थे। जहाँ दूसरे समाज वध से नीचे कोई दंड नहीं सोच पाते थे वहाँ हमारे यहाँ भी कम कठोर विधान न था। परन्तु। नरहत्या से बचने का प्रयास भी था। यह हमारे संस्कारों में आ चुका था।‘’
‘’इसमें ब्राह्मण की कोई भूमिका नहीं होती थी, स्मृितियों में तो यह विधान है कि अमुक अपराध से अमुक जाति और अमुक से अमुक जाति बनी है?’’
‘’समाज बहिष्क़ृत करने के बाद इन्हें उन जातियों में स्थापित कौन करने जाता था? वे जातियाँ इनको स्वी्कार कैसे करतीं? जिन्हें हम आज या कहें परवर्ती समझ से हीन जातियाँ मान बैठते हैं वे कम स्वासभिमानी‘ नहीं थीं, परन्तु् उनमें से कुछ में वे वर्जनाएँ न थीं और कुछ समुदायों में आज भी नहीं हैं जिन्हें हम पुरुष प्रधान समाज में पाते हैं। उनमें किसी नये व्यक्तिको हर तरह की छूट मिल सकती थी और ये उनकी श्रेणी में पहुँच जाते थे। परन्तु शास्त्रकारों के विधानों के अनुसार यदि ऐसे समाज वहिष्कृत व्यक्ति आसपास कहीं अलग गुजर करने लगें तो लोग संभवत: उसी संज्ञा से उन्हें अभिहित करते रहे होंगे जैसे मध्यहकाल में किसी मुसलमान का छुआ पानी भी पी लिया तो उनके परिजनों ने उन्हें मुसलमान मान लिया और मुसलिम समाज ने उन्हें सहर्ष स्वीनकार कर लिया। तुम ठीक कह रहे थे कि इसका खमियाजा हिन्दू् समाज को भुगतना पड़ा है परन्तु शायद इसके पीछे के फरेब को तुमने न समझा हो।‘’
‘’तुम्हारा मतलब है इसे योजनाबद्ध रूप में किया जाता रहा?’’
‘’तुमने वह कौवाली तो सैकड़ों बार सुनी होगी, क्योंकि तुम्हें वह ठीक-ठीक याद थी, कि ‘छाप तिलक सब छीनी रे तोंसे नैना मिलाइके । इसका मतलब भी जानते हो?
‘’मतलब ?’’
‘’हिन्दू समाज में, यहाँ मेरा तात्पर्य उस समूचे समाज से है जो यहाँ के अरण्यजीवी समुदायों से क़ृषि की ओर अग्रसर होते वर्णसमाज में प्रविष्ट या उनकी सेवा में लगे, और वे जो वन्य़ अवस्था में ही रह गए, सभी से है। इनमें जादू-टोने, सोखा ओझा, यज्ञयाग और मन्त्र शक्ति में विश्वास बहुत प्रबल रहा है । सिद्धों के चमत्कार में जनता के विश्वास की बहुत अच्छी समझ सूफियों में थी और उन्होंने उसी तरह के हथकंडे अपना कर अपना प्रभाव जमाया। उनमें सम्मोहन आदि की शक्ति या कौशल भी रहा होगा, क्योंकि आज के जादूगरों और सम्मोंहन विशेषज्ञों को देखो तो समझ में आ जाएगा कि इसमें किसी आध्यात्मिक सिद्धि का प्रश्न ही नहीं है। यह एक पद्धति का अभ्यास और प्रयोग है ।‘’
‘’तुम्हारा मतलब है शेख सलीम चिश्तीा, निजामुद्दीन, बाबा फरीद जैसे सूफियों के पास कोई सिद्धि या साधना नहीं थी?‘’
‘’इसके बारे में कुछ भी कहना खतरे से खाली नहीं है, क्यों कि आज के समाज में पाशविक भावाकुलता का विस्तार और तार्किकता का ह्रास हुआ है और वे जो दुनिया को अपनी मुट्ठी में रखना चाहते हैं वे एशियाई देशों में भावुकता और धार्मिकता का विस्ताकर और तार्किकता का विनाश करने की शातिर योजनाओं से लैस हैं और धर्मोन्मादी एक ओर उनका ही विरोध करते हैं और दूसरी ओर उनकी योजना के अनुसार काम करके अपने को अरक्षणीय बनाते हैं। खैर यह विषयान्तर होगा, परन्तु मैं न योगियों, सिद्धों की प्रचारित सिद्धि में विश्वास कर पाता हूँ, न सूफी सन्तों की सि‍द्धि में जिन्हों ने अपना बारूदखाना बनाने में उनसे ही गुरुमन्त्र लिया था और उसी का प्रयोग इस्लाम के प्रसार के लिए किया था। परंतु इसे तो तुम समझ ही नहीं पाओगे। पीछे जाना होगा।‘’
‘’तुम मुझे अपने ही जैसा मूर्ख समझते हो?‘’
‘’नहीं, मैं अपने को तुम जैसा मानने का दुस्सा‘हस नहीं कर सकता: अपने को ज्ञान वंचित अल्पज्ञ मानता हूँ और तुम्हें ज्ञान-गुरु-गौरव-गर्वित-मूर्ख मानता हूँ। मैं कहना यह चाहता था कि सम्मोहन के कई रूप और कई स्तर होते हैं और इन सबके पीछे प्रबल शक्ति है अविवेचित विश्वास, दूसरों के कहने में आना, यह मान लेना कि इतने लोग और इतने प्रबुद्ध लोग भी ऐसा सोचते हैं तो सच तो होगा ही, और अपनी तर्कबुद्धि को विश्वास को समर्पित कर देना। इससे प्रचारित विश्वास के कारण स्वत: तर्क को समर्पित करने वाले विश्वासियों के दायरे में विस्ताार के साथ सामाजिक मुग्धता् या सम्मोहकता का पर्यावरण तैयार हो जाता है।

अब इसमें उपस्थित व्यक्तियों या व्यक्ति को मुग्ध या हतचेत हो जाने या कहो परनिर्देश पालन का उदय हो जाय तो काम पूरा हो गया। इसी को समझने और इस्लांम के प्रसार में अपना योगदान देने के कारण सूफियों को रियायत मिली थी। वे अजान से ले कर मुल्लाा मौलवी तक का मजाक उड़ा सकते थे, पर कुरान का नहीं, पैगंबर का नहीं। तुम तो मुझसे अधिक उर्दू जानते हो, उर्दूकी सर्वोत्कृीष्ट शायरी इसी से प्रेरित है।‘’
‘’तुम विषय पर बात तो कर ही नहीं रहे हो, बच रहे हो उस सवाल से जिसे तुमने ही आमन्त्रित किया था।‘’
‘’मुझे भी लगता है‍ कि भटक गए हैं, परन्तु यह समझो कि आटविक काल से चले आ रहे और भारतीय भूभाग में अपेक्षाक़त प्रबल विश्वास का योजनाबद्ध विस्तार करते हुए हिन्दूं समाज ने जिन श्रद्धालुओं का मजमा जुटाना आरम्भक किया वे अन्धभाव से, भक्तिभाव से, लगभग उसी भाव से जिससे वे आज भी गाते हैं ‘शेरां वाली माता तेरी जय हो’ और दुष्कर चढ़ाइयॉं समर्पित भाव से चढ़ते हैं उसी जैमाता दी वाली श्रद्धा से दरगाह पर जुटने वालें श्रद्धालुओं को जब वह अपने हाथ से शरबत का गिलास देता था तो वे इसे पीने से इन्कार भी नहीं कर सकते थे। यह उनके लिए प्रसाद था और हिन्दू मत की संकीर्णताओं को देखते हुए उसका एक सुनियोजित कार्यक्रम कि इतने हिन्दू मुसलमान हुए । अब यदि छाप तिलक सब छीनी का मतलब समझ में आ गया हो तो आगे की बात कल करेंगे।
22-दिसम्बर-2015

Post – 2015-12-21

अस्पृ श्यरता की जडें

वह बहुत गंभीर था। मैं तो जानता ही नहीं था कि हिन्दू समाज के भले बुरे की चिन्ताृ उसे भी होती है। बोला, ‘जानते हो इस अस्पृुश्यबता का हिन्दूा समाज को क्या मूल्यक चुकाना पड़ा है?’
‘क्या मूल्य‘ चुकाना पड़ा है?‘ ’यह सब इस ब्राह्मणवाद के चलते है।‘ वह स्व यं अपने नाम के साथ लगे शर्मा से अलग नहीं हुआ है, पर अपनी सोच से ब्राह्मणवाद से और इसी तरह हिन्दु त्वक के संकरे दायरे से बाहर निकल आया है, पर एक समाज के रूप में हिन्दू के हित की चिन्ता उसे भी रहती है, यह कभी कभी प्रकट हो जाता है। ’मैं तो यही सोच कर हैरान हो गया कि हिन्दून के हित की चिन्तान तुम्हें भी रहती है।‘ ’तुमसे अधिक। तुम जिसे हित कहते हो वह हिन्दुदत्वि की उस उदार चेतना का विनाश है, जिस पर हम सभी को गर्व है और जिसे हम बचाए रखना चाहते हैं। तुम्हािरा हिन्दूद हित जर्मनों से सीखा गया संकीर्ण और अन्धे राष्ट्रतवाद है। हिन्दूा हित की मेरी समझ तुम्हा्री समझ से कुछ उूपर है, तुम्हाधरी दबी रह जाती है।‘ ’मान लिया तुम्हा री समझ हवाई है, मेरी जमीनी, पर जिस अहित की बात बताने जा रहे थे उसे तो बताओ।‘ वह हंसने लगा, ‘शरारत से बाज नहीं आओगे। खैर सुनो। हो सकता है इससे ही तुम्हाारा दिमाग ठिकाने लगे। पहला यह कि इसने हिन्दूा समाज को बांट रखा है। तुम्हानरे सभी आन्दो लनकारी और समाज सुधारक इस बात के लिए चिन्तित रहे हैं कि सबको जोड़ने का कोई एक मंच होना चाहिए। ब्रह्मसमाज से लेकर आर्यसमाज तक और तुम्हा रे संघ तक, चिन्ताभ इसी की करते रहे हैं पर मन में ही खोट, जातिवाद चेतना में घुसा हुआ है इसलिए पूरे समाज को जोड़ आज तक नहीं पाए। इसी के कारण हिन्दुवओं का एक बहुत बड़ा हिस्साए मुसलमान हो गया और फिर उसी से तुम नफरत भी करने लगे। भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों से हिन्दुसओं की नफरत अपने उन भाइयों से नफरत है, जिनको तुम अपने साथ नहीं रख पाये। जो तुम्हादरी अस्प़ृहश्यरता से तंग आ कर इस्लासम कबूल करने को मजबूर हुए। कभी सोचा है इस पर?‘ ’मैं तो इस बात पर हैरान हूं कि तुम भी इन सवालों पर सोचते हो। तुमने तो बहुत टेढ़े सवाल खड़े कर दिए। इतने और इतने पेंच दरपेंच कि एक का हल निकले तो दूसरा उसे अपने फन्देो में उलझा ले। यह एक दिन में सलटने वाला मसला तो हुआ नहीं। फिर भी। यह बताओ, जब ईसाइयों ने अपने धर्मान्रलटनण अभियान में यह पाया कि ब्राह्मणों को ईसाई बनाने चले तो युग लग जाएंगे और मन मार कर दलित समाज पर ध्यानन दिया और पहली बार अस्प़ृ श्यगता के प्रश्नस को हथियार के रूप में आजमाना शुरू किया, उससे पहले इसकीप शिकायत तो जारी थी, पर इसने विक्षोभ का रूप कभी नहीं लिया। इसका कारण क्यास है? ’कारण यह है कि उनको इस तरह दबा कर रखा गया था वे चूं तक नहीं कर सकते थे। पहली बार ईसाइयों ने उन्हेंो शिक्षित किया तो उनको आत्म बोध जगा और विद्रोह की वह लहर पैदा हुई।‘
‘और धर्मान्तउरण का रास्ताि कुछ आसान हुआ। ठीक है न?‘ वह ति‍लमिलाया पर बोला कुछ नहीं। मैंने पूछा, ‘तुम जानते हो, इसका एक और कारण था।‘ वह उत्सु‍कता से मेरी ओर देखने लगा। अस्प़ृ श्यमता का ब्राह्मणों ने अपनी श्रेष्ठाता के लिए उपयोग किया, परन्तुर अस्प़ृ।श्यआता के जनक तो वे स्व्यं थे जिन्हें। अस्पृएश्यग की श्रेणी में रखा जाता था।‘ वह ऐसे उछला जैसे पांव में कुछ चुभ गया हो, ‘सताए हुए को ही सताने वाला भी बता दिया। जुल्मे की हद है।‘ ’यार यह मोटी बात तो एक दो पेशेवर इतिहासकारों की भी समझ में आ चुकी है। उन्हेंल ध्यावन से पढ़ो तो सही। यह बीमारी कबीलाई या जिसे कोसंबी ने बहुत सुन्द र नाम दिया था, आटविक समाज में भी थी और उसी से निकली है। वे अपने समुदाय के साथ तो असाधारण आदर्शवादिता का निर्वाह करते थे, परन्तुक उससे बाहर उनकी कोई नैतिकता न थी। किसी की हत्याव, अपहरण कुछ भी कर सकते थे और उनको काबू में करने के लिए नशीली चीज खिलाने से ले कर उनको विश्वा,स में ले कर किसी खाद्य पदार्थ में विष मिला कर खिलाने तक को उनके समाज में हेय नहीं माना जाता था। अपने समुदाय के बाहर चोरी, लूट कुछ भी अनैतिक न था। इनमें अनेक तो अभी हाल तक म़त्युथ व्यावसायी रहे हैं और उनकी अपनी नैतिकता में वे जघन्य कृत्य तक शामिल थे। इसलिए सावधानी के रूप में यह खान पान से आरंभ हुआ कि अपने समुदाय से बाहर के किसी व्यथक्ति के हाथ का पानी या पका भोजन नहीं करना। फल, दूध पर कोई रोक नहीं, क्यों्कि फल में नशीले वा विषैले पदार्थ का प्रवेश कराने की तरकीब तब मालूम न थी और दूध में विषैला पदार्थ मिलते ही वह या तो फट जाएगा, या उसका रंग बदल जाएगा और आसानी से पता चल जाएगा यह विषाक्त है या नहीं।‘ ’ब्राह्मणों का इसमें कोई योगदान नहीं? ‘ है क्यों नहीं, उन्हों ने इसमें शुचिता या आरोग्य‘ का एक नया पहलू जोड़ दिया और फिर इसका दंडविधान में प्रयोग करने लगे। यह समझ लो अस्प़ृ श्य ता की चेतना अस्पृकश्योंा में किसी से कम नहीं रही है और यह ब्राह्मणों के सिखाने के कारण नहीं हुआ है। यह बहुत पेचीदा समस्याअ है। इस पर हम कल बात करेंगे।

Post – 2015-12-20

मिटा दे अपनी हस्ती को अगर तू मर्तबा चाहे

बुरा तो नहीं मानोगे यदि पूछूँ सौदा कितने में पटा. हमें तो बता दो किसी दूसरे को नही बताउूँगा।
मैं उसकी चुहल का मजा लेता, मुस्कराता रहा और वह अपने जुमले की धार आजमाता रहा, ‘‘तुम ब्राह्मणों की इतनी आलोचना करते आए थे, कल तुम उनके पक्ष में भी खड़े हो गए। अब यह बताओ, अस्पृता के पातक से भी तुम उन्हें बचा सकते हो?
अस्पृश्यता को तुम पातक मानते हो?
वह एक पल को मुझे हैरान देखता रहा, फिर परेशान हो कर बोला, ‘‘मेरे सामने कह दिया, किसी और के सामने कहना मत। संज्ञेय अपराध है?
संज्ञेय अपराध तो तुमसे बात करना भी है, क्योंकि तुम हर तीसरे वाक्य में हिंसा भड़काने वाली बातें करते रहते हो, लेकिन तुमको इतना जबर्दस्त समर्थन मिला हुआ है कि कानून भी तुमको हाथ लगाने से कतराता है और प्रतीक्षा करता है, कोई कब तुम्हारे भड़कावे में आकर कुछ कर बैठे, और उसे दबोच कर यह सिद्ध करे कि देश में कानून का राज आज भी कायम है।
वह नाराज नहीं हुआ, सचमुच विस्मय में मुझे देखता रहा कि मैं कह क्या रहा हूँ और जो बात उसने मुझे छेड़ने के लिए कही थी वह सचमुच सही तो नहीं! मुझे उसकी हैरानी पर हँसी आ रही थी जिसे रोक कर उसकी इस मुद्रा को मुदित भाव से देख रहा था जिससे उसकी खीझ और बढ़ रही थी। जब लगा अनर्थ हो रहा है तो कहा, ‘‘देखो अस्पृश्य ता के दो रूप हैं। एक सार्वजनिक और दूसरा निजी। हमें अपनी निजता में कुछ भी करने से कोई रोक नहीं सकता।’’
‘‘तुम कुछ भी कर सकते हो निजता की आड़ में। अपनी पत्नी या बच्चे की हत्या तक?’’
‘‘वह तो नहीं कर सकता, पर तुम्हारी हत्या जरूर कर सकता हूँ, क्योंकि विचारों की भिन्नता के बाद भी हो तो तुम मेरे निजी मित्र। अस्पृश्यता का अर्थ नहीं समझते,चलो, छोटे दिमाग में कितना ज्ञान अटेगा, परन्तु तुम तो निजता का भी अर्थ नहीं जानते। निजता मुझ तक और केवल मुझ तक सीमित है। और मैं अपने स्व से जहाँ बाहर जाता हूँ, मेरा कोई व्यवहार जहाँ दूसरे को प्रभावित करता है, वहाँ वह सार्वजनिक हो जाता है, और यह सार्वजनिकता परिवार के भीतर तक प्रवेश पा जाती है इसलिए आप अपनी पत्नी और बच्चे के साथ भी कोई ऐसा व्यवहार नहीं कर सकते जिससे उसको आहत होना या कष्ट सहना पड़े या जिससे उसकी निजता भंग हो। फिर भी एक दायरा है जिसमें तुम उनकी निजता की भी रक्षा करते हो और उनसे हुई भूलों के लिए अपने को जिम्मेहदार भी मानते हो. मुझे तो हमारे जुवेनाइल कानून पर तरस आता है. बच्चा वयस्क नहीं है इसलिए उसे अपराधी नहीं माना जा सकता, परन्तु अपराध हुआ है और हो रहा है तो उसको रोकने के लिए दंड तो किसी को मिलना चाहिए. वह अपराध करते हुए तुम्हाारे संरक्षण में होने के कारण अपराधी नहीं है, तो तुम जिन बच्चों के वारिस हो, अपना कर्तव्य् पूरा न करने के लिए तुम्हें तो दंड मिलना चाहिए. तुम जिन संतानों की सही देख रेख नहीं कर सकते और उन्हें पैदा करके जानवर बनने के लिए जानवर की तरह छोड् देते हो, तुम्हें तो उनके अपराध के लिए दंड मिलना ही चाहिए. इस नियम को लागू करो, बच्चे को बच्चाे मान कर छोड दो पर उसके अभिभावक को उसके कुक़र्म के लिए दंडित करो तो तुम्हारी कई समस्यायें सुलझ जाएंगीण्.
तुम आदमी की आत्माा तक को मिटाकर उसे एक ऐसी बूंद बनाना चाहते हो जिसे महान योजनाओं के महासमुद्र में अपनी निजता खोने की सलाह दी जाती है और उसे भी बर्वाद कर दिया जाता है़. पहले होश में आओ फिर तुमसे बात करूंगा. हमारा कानून सार्वजनि कता से संबन्ध रखता है. तुम दोनों का भेद समझ लो फिर तुमसे बात हो पाएगी. कल सोच कर आना. और यह भी सोच कर आना कि तुम नव अध्यात्मभवादी हो या मार्क्संवादी. कल बात होगी.

Post – 2015-12-19

मनोरंजन के लिए ही सही

“हम वर्ण व्यवस्था को नहीं समझते से तुम्हारा क्या मतलब था? क्या सोलह वेदों की तरह सोलह वर्ण भी बनाने का इरादा है?”
“नहीं समझते ही नही समझना तक नहीं चाहते क्योंकि राजनीत के लिए नासमझी अधिक जरूरी है। समझ बाधक है। समझ से जोश ठंडा पड़ जाता है। समस्या के समाधान के लिए समझ की ज़रूरत होती है। इसलिए कोई राजनीतिक दल या आंदोलन हो वह समस्याओं को बनाए रखना और नई समस्याएं खड़ी करते रहना चाहता है। और जहाँ तक सोलह वर्णों की बात है। यदि तुम घूम धूम कर एक ही सवाल पर आओगे तो बनाना ही पड़ेगा। देखो तो चार वेदों के चार वर्ण वेदांगों के वर्णांग और उपवेदों उपवर्ण बन जायेंगे। बने ही हैं एक ही वर्ण में कितने तो उपवर्ण हैं। संख्या बहुत ऊपर जाएगी।“
“तुम्हारा मतलब है शूद्रों को भी वेद का अधिकार था? उनका भी कोई वेद है?”
“होना तो चाहिए। ऋग्वेद वैश्यो का वेद है या कहो वैश्य वर्ण की उत्पत्ति ऋग्वेद से हुई – ऋग्भ्यः जातं वैश्य वर्णं आहुः। ब्राह्मणों का सामवेद है – सामवेदो ब्राह्मणानां प्रसूतिः । यजुर्वेद क्षत्रियों का वेद है – यजुर्वेदं क्षत्रियस्याहुः योनिम्। तो फिर अथर्ववेद जो बच रहा वह किसका वेद हुआ?
‘बहुत मजेदार है यह तो। तभी स्मृतिकार लोग वेद के नाम पर केवल त्रयी की बात करते रहे हैं, अथर्ववेद को वेद मानने से इन्कार करते रहे। कारण अब समझ में आया। “
‘‘और जानते हो धरती आकाश का भी ऐसा ही बँटवारा है । द्युलोक सामवेद का अर्थात् ब्राह्मण का, अन्तरिक्ष यजुर्वेद अर्थात् क्षत्रिय का – अन्तरिक्षं वै यजुषामायतनम्, भूलोक ऋग्वेद का अर्थात वैश्य का – ऋगयं भूलोकः। अब बचा पाताल वही अथर्ववेद का या शूद्र का लोक हो सकता है। सूर्यात् सामवेदः, वायु से यजुर्वेद, जल से वैश्य – विड्भिः वर्षा:। ऋतुओं में वसन्त ब्राह्मण के हिस्से, ग्रीष्म क्षत्रिय के, शरद ऋतु वैश्य के हिस्से में तो शिशिर या हेमंत में से कोई एक ही बचता है शूद्र के लिए। सोम पेर कर उसकी पहली घानी का रस अग्नि को, अर्थात् उसी को पका कर उसका गुड़ आदि बनाया जाता था। पर उसे पीने का अधिकारी ब्राह्मण, पानी के छींट दे कर दूसरी पेराई का रस इन्द्र को और फिर उसमें पानी से भिगो कर जो रस निकला वह मरुतों वैश्यों के हिस्से, अब कहा तो नहीं है हम मान लें जो खोइया बच रहता था उसे शूद्र का हिस्सा माना जा सकता है।’’
“बड़ा पक्का इन्तजाम है यार!”
“पक्का, वर्णवाद को बनाए रखने और अपनी श्रेष्ठता कायम रखने के ये प्रयत्न तो ब्राह्मण ही करता रहा। परन्तु आज ये सूचनाएँ मनोरंजन के लिए ही रह गई हैं। पालन कभी पहले भी नहीं हुआ। इसे यदि इस रूप में पढ़ें कि ब्राह्मण को अपनी सामाजिक स्थिति को बनाए रखने के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ा है, क्योंकि आर्थिक रूप मे वह परनिर्भर था और स्वतन्त्रता आर्थिक आत्मनिर्भरता के बिना संभव नहीं। उसे वैश्य या क्षत्रिय से स्पर्धा नहीं हो सकती थी, असली स्पर्धा शूद्र से थी, जो अपने कौशल और श्रम के कारण उसकी तुलना में अधिक आत्मनिर्भर था तो विरल अपवादों को छोड़ कर अधिक सही होगा।
“परन्तु वर्णवाद को बचाए रखना आज ब्राह्मण की समस्या नहीं है। शिक्षा में अग्रणी होने के कारण मध्यवर्ग के उदय के साथ सबसे अधिक लाभान्वित वही हुआ। स्वतंत्रता आन्दोलन या कोई अन्य आन्दोलन, सबमें दूसरों की अपेक्षा अधिक भागीदारी भी उसी की रही, इसलिए उसे इसका लाभ मिला। नये अवसरों के साथ वह पुरोहिती और पूजा पाठ के पुराने अवसर छोड़ना आज भी नहीं चाहेगा, पर यह मामला रोजगार से जुड़ा है जिसमें जातीय श्रेष्ठता का पुराना दावा छोड़ना न चाहेगा जैसे दूसरे समुदाय अपने अवसर नहीं छोड़ेना चाहेंगे। उसे आज अंग्रेजी से जितना लगाव है उतना संस्कृत से नही। आज वह जन्मगत नहीं शैक्षिक और कूटनीतिक कारणों से सबसे अधिक शक्तिशाली है। वर्णवाद को जिलाए रखना आज दलितों की जरूरत बन गई है जिन्हें आरक्षण आदि के माध्यम से नये अवसर मिले हैं। इतिहास में कभी ब्राह्मण ने उस तरह के अत्याचार शूद्रों पर किए हों जिनको उदाहृत करते हुए उसकी भर्त्सना की जाती है तो उसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है।’’
‘‘ठोस प्रमाण क्यों नहीं है। एकलब्य का अंगूठा काट लेना, शम्बूक का वध, और वह विधान तो उससे भी पुराना है जिसमें शूद्र के कान में वेद पड़ जाय तो उसके कान में पिघला हुआ सीसा डाल देना चाहिए।श्
‘‘यह सब कोरी कल्पनाएँ हैं।“
किताबों का, चाहे वे पश्चिम के विद्वानों की लिखी हों या अपने पंडितों द्वारा, आलोचनात्मक पाठ किया जाना चाहिए। अक्षरपाठ निरक्षरपाठ से भी गड़बड़ है। किताब पढ़ो तो मनु शूद्र की छाया से भी बचने की सलाह देंगे, परन्तु उनके लिए पानी कौन भर कर लाता था, उनके बाल कौन छाँटता था, उसके यज्ञ की बेदी आदि बनाने का काम कौन करता था, शूद्र ही न? अब फिर उसी मनुस्मृति को पढ़ो तब पता चलेगा मनु कुछ और भी कहते हैं, ब्राह्मण जब तक वेद का अध्ययन नहीं करता तब तक शूद्र है और मैं इसे सही मानता हूँ और निन्यानबे प्रतिशत ब्राह्मणों को शूद्र मानने में मुझे होई आपत्ति नहीं। उनमें तुम भी आते हो, देख लो।“
“हम तो कमकरों और शूद्रों के चिर सखा हैं। हमने ही तो उन्हें अपनी बेड़ियाँ तोड़ने को ललकारा है।“
“ललकार तो है पांवों की बढियां तोड़ दो गले का फंदा लगा लो! क्यों, गलत कहा? बेड़िया तोड़वाकर बेचारों को बेरोजगार बना दिया अब बेड़ियाँ तोड़वाने के काम से भी फुर्सत मिल गई – अब तो बस आराम ही आराम है। खैर मैं तुम्हे यह याद दिलाना चाहता था कि हमारे समाज का विभाजन नस्लवादी नहीं है। देव और असुर दोनों एक ही पिता की सौतेली पत्नियों की सन्तान माने जाते रहे हैं जिसका अर्थ नए सिरे से करें तो उन्हें याद था कि हम स्वयं भी उसी आहारसंग्रही और आखेटजीवी पृष्ठभूमि से आए है जिसमें दूसरे जन ठहरे रह गए हैं। यह ठहराव भी लगातार टूटता रहा और अपनी सोच में बदलाव और प्रयत्न के साथ आटविक जन वर्ण समाज में सभी वर्णों में प्रवेश करते और जगह पाते रहे। जो रोचक पक्ष है, वह यह कि ब्राह्मणों में हाशिए पर रखे जाने वाले नये ब्राह्मणों ने ब्राह्मणवाद का अधिक उत्साह से समर्थन किया। यह मत भूलना कि मनुस्मृति हो या महाभारत या गीता या पुराण सभी व्यासों और भार्गवों की रचनाएँ हैं। वेदों का उद्धार करने वाले भी तो व्यास ही थे।
“और दूसरी बात यह कि वही मनुस्मृति यह विधान करती है कि यदि किसी व्यक्ति के शरीर में कोई विकार हो, वह बीमार हो, वह गरीब हो, वह छोटी जाति का हो, कुरूप् हो, अनपढ़, उम्र अधिक हो तो इसके लिए उस पर कटाक्ष नहीं किया जाना चाहिए। इसे सीखने समझने में दूसरों को आधुनिक युग तक की यात्रा करनी पड़ी और बहुतेरे आज भी नहीं सीख पाए हैं – हीनांगान् अतिरिक्तांगान् विद्याहीनान् वयोधिकान् । रूपद्रव्यविहीनां च जातिहीनांश्च नाक्षिपेत । और साथ ही यह भी कहते हैं कि यदि अपनी पुत्री या दास कोई कटु बात भी कहे तो उस क्लेशकर वचन को सहन कर लेना चाहिए क्योंकि ये आप की छाया हैं या कहो, ये तुम्हें आईने के सामने खड़ा कर देते हैं – छाया स्वो दासवर्गश्च दुहिता कृपणं परम्। तस्मादेतैरधिक्षिप्तः सहेत संज्चरः सदा। तो राजनीतिक कारणों से इसके दुर्बल पक्ष को बहुत बढ़ा चढ़ा दिया गया, और ब्राह्मणों के साथ भी उससे अधिक अन्याय हुआ जिसके वे पात्र थे। इसे समझने के लिए दूसरे समाजों में आज से दो हजार साल पहले की सामाजिक अवस्थाओं और उत्पीड़नों को रख कर देखना चाहिए। अनेक शूद्र तो राजा भी हुए जिनके पुरोहित आदि ब्राह्मण ही रहे होगे। इसे दलित भी आन्दोलन के लिए मानते हैं और फिर भूल जाते हैं। समस्या इतिहास में नहीं वर्तमान में है और इसमें आज अवरोध कहाँ से पैदा हो रहा है इसे समझना होगा। दलितों का सबसे अधिक उत्पीड़न आज पिछड़े आरक्षणप्राप्त लोगों द्वारा हो रहा है यह मत भूलो।“
“इसे दूर किया जा सकता है?”
किया तो जा सकता है लेकिन जिनको इसकी सबसे अधिक जरूरत है वे ही इसमें बाधा डालेंगे। उनका आन्दोलन ही गलत है। समस्या योग्यता सिद्ध करने और ऊपर उठने की है। अंग्रेजी जानने वाला तबका नस्लवाद पैदा करने वाला तबका है यह सामाजिक अलगाव को बढ़ा कर ही अपने को आगे रख सकता है। अंग्रेजी की समाप्ति, बौद्धिक उत्थान में भाषा की रुकावट को दूर करना सामाजिक न्याय की सबसे बड़ी जरूरत है, इसे अकेले धर्मवीर ने समझा था पर यह भी एक चीख बन कर रह गई।
12/19/2015 4:51:43 PM

Post – 2015-12-18

सच तो ये है कि कुछ पता ही नहीं
तुमसे असहमत होना इसलिए कठिन है कि असमति जताते ही तुम उस पर एक घंटा बोर करोगे। फिर भी यह बताओ मैंने जो पढ़ा है उसमें तो यह बताया गया है कि खेती का आरंभ स्त्रियों ने किया।“
‘‘यह जरा टेढ़ा सवाल है। लगता है तुमने डी.पी. चट्टोपाध्याय की पोथी पढ़ रखी है और उन्होंने एक ओर तो अपनी मातृदेवी प्रधान क्षेत्रीय संस्कृति से प्रेरणा ग्रहण ही और दूसरी ओर मार्गन आदि से। नृतत्व का जो अध्ययन हमारे पास था वह अधूरा था। लेकिन वह आधा सच भी सच तो है ही। ऐसे समाज आज भी हैं जो मातृप्रधान हैं और जिनमें पुरुष लगभग उतने ही दबाव में या वशवर्ती हो कर रहता है जैसे हमारे समाज में स्त्रियाँ। प्रकृति नरप्रधान रही है। पशुओं में भी चाहे हमारा अग्रज बन्दर हो या गोनर्द या दूसरे नरप्रधान हैं।“
‘‘मनुष्य में यह उलट कैसे गया। और उलटा तो समग्रतः उलटा या इसके अपवाद थे?”
‘‘इसीलिए अर्थव्यवस्था को सामने रखें तो कुहासा छँट जाता है। जोखिम और दुस्साहस के काम पुरुष के जिम्मे और घर परिवार का कुशल क्षेम स्त्री के जिम्मे। बान्तू जनों में साग, कन्द, बेरी और फल जुटाना, अर्थात् आहार संचय, स्त्री का काम और शिकार का जिम्मा पुरुषों का। जिस समय तक की जानकारी हमें उपलब्ध है उस समय तक वे जत्था बना कर निकलते रहे हैं और कभी-कभी कई-कई दिनों के बाद एक शिकार लादे चले आ रहे हैं। इस बीच वे भी कन्द फल जुटा कर ही पेट भरते रहे होंगे। पर यह माडलों वाला अध्ययन कि एक या कुछ समाजों में कुछ देखा और उसे सब पर लागू कर दिया, यान्त्रिक है, और बौद्धिक आलस्य को भी प्रकट करता है। यदि पुरुष को किसी भी कारण से लंबे समय तक किसी प्रयोजन से अनुपस्थित रहना होगा तो घर परिवार स्त्री के चलाए ही चलेगा। समाज मातृप्रधान रहेगा। केरल के नायर बड़े बहादुर होते है। भाड़े पर उन्हें साहसिक कामों के लिए दूसरे नौचालक भी ले जाते रहे। समाज मातृप्रधान बना रहा। यहाँ तक कि पशुचारी समाजों में भी स्त्री अधिक स्वतंत्र रही है यह तो गोपियों और कृष्ण की लीलाओं में भी देखा जा सकता है। यदि किन्हीं परिस्थितियों में पुरुष उसी परिधि में रहने लगा जिनमें स्त्री रहती है तो आदिम अर्थव्यवस्था में दोनों संभावनाएँ रहेंगी।
‘‘तुम्हारी समझ से, हमारे समाज की स्थिति क्या थी?”
‘‘हमारा समाज जिन समुदायों से बना है उनमें दोनों प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। एक ओर तो शाकंभरी देवी है, और दूसरी ओर यह कथा कि देवों ने शाकमेध से वृत्र का वध किया, महिषासुर अर्थात् खेती को क्षति पहुँचाने वाले भैंसो आदि को भगाने का, काम जिसमें आदिम कृषि भी आती है, नारी ने सँभाल रखा है। और दूसरी ओर उसका एक रूप वह है जिसमें शिव को परास्त करके उसके शव की छाती पर पाँव रख कर खड़ी कलकत्ते की काली है। अर्थात् पुरुष प्रधानता पर नारी प्रधानता की विजय। एक ओर दिवस प्रधान विवस्वान, यमराज और कालदेव की कल्पना, दूसरी ओर रात्रिप्रधान काली के रूप में उसी कालदेव की कल्पना। एक ओर मातृ नाम से व्यक्ति का परिचय कौन्तेय, कौशल्यानंदन, जाबालि, सुवर्णाक्षीपुत्र, गार्ग्य आदि और दूसरी ओर पांडव, रघुनाथ राघव, मानव। सच तो यह है मेरा अपना अध्ययन टोहपरक या एक्सल्पोरेटरी ही रहा है। उसके एक एक पहलू को गहनता से अध्ययन करने के लिए कई अध्येता अपना पूरा जीवन लगाएँ तब हम अपनी निजी ज्ञानव्यवस्था का निर्माण कर सकते हैं। पश्चिमी ज्ञानव्यवस्था साम्राज्यवादी है। सब कुछ मेरे अधीन हो जाय, जो अधीन नहीं होता उसे सीधे या उपेक्षा से या बदनाम करके नष्ट कर दिया जाय। यह धर्म और विश्वास से आरंभ हो कर ज्ञान विज्ञान तक पहुँचा है।“
“तुम्हारा वश चले तो तुम फिर शिक्षा प्रणाली को गुरुकुल आधारित बना दो और वेद पाठ से अक्षरज्ञान कराना आरंभ करो।“
“तुम बेवकूफ के बेवकूफ इसलिए रह गए कि ध्यान से न किसी बात को सुनते हो न समझते हो, डरे रहते हो कि यदि समझ में बात आ गई तो अपनी विचारधारा बदलनी पड़ जाएगी। ध्यान देते तो याद आता कि मैं कई बार कह चुका हूँ पश्चिम ने हमसे जो कुछ सीखना था, चुपचाप सीखा और इस तरह आत्मसात् कर लिया मानो यह उसी की परंपरा का अंग हो। उसने नकल किसी चीज की नहीं की। तुमने पश्चिम से सीखा कुछ नहीं केवल नकल की और उसके छायापुरुष और मरीचिका बनने के प्रयत्न में अपनी सत्ता तक मिटा दी।“
‘‘हम कृषि पर बात कर रहे थे। उस पर ध्यान दो। यह मेरी समझ है, गलत भी हो सकती है। आरंभिक चरण पर विविध कारणों से जिनमें से एक शिशु-पालन भी हो सकता है, गर्भ का भार भी हो सकता है, बंधे दायरे का काम, कहो शाकाहार का प्रबन्ध, स्त्री के जिम्मे था और शिकार आदि का पुरुष के, इसलिए यह सूझ स्त्री की हो सकती है कि जिन अनाजों को हम झड़ जाने के बाद यथालभ्य जुटा कर लाते हैं और जिनको भून और कूट कर खाने से अधिक शक्ति मिलती है उनको स्वयं उगा कर और दूसरे जानवरों से बचा कर क्यों न रखा आय। झूम खेती तक उसकी भूमिका प्रधान रही हो सकती है, परन्तु वहाँ भी रक्षा का भार पुरुष पर या वह जो शिकार पर निकला करता था उसकी ही रही होगी। परन्तु जहाँ से स्थायी खेती आरंभ हुई, जमीन को खरोंचने के यन्त्रों की बाध्यता हुई, औजारों की जरूरत हुई वहाँ से पुरुष की भूमिका बढ़ने लगी। और फिर जब एक नुकीले डंडे या अर/अल को खींचते हुए आसानी से अधिक खरोंच संभव हुआ। पुरुष उस डंडे से बँधी रस्सी खींच रहा है जिसका आगे चल कर हरीस के रूप में विकास हुआ और स्त्री उस नुकीले डंडे को दबाए हुई है। इस अर या अल जो विकसित हो कर हल/हैरो बना, को ही आर्य या कृषिकर्मी की संज्ञा का भी जनक कहा जा सकता है।
तस्वीर बहुत साफ नहीं है। काम ही नहीं हुआ। दूसरे उस गहनता में उतर कर काम करते तो उनकी वे मान्यताएँ खंडित होतीं जिनको बड़े श्रम से उन्होंने हमें गुमराह करने को तैयार किया था और हो सकता है उनसे उनकी समझ भी प्रभावित हुई हो। इन विचारों के पश्चिमी ज्ञानव्यस्था में घुन की तरह बने रहने के कारण, पश्चिम का आज का चिन्तन भी अन्तर्विरोधों से भरा मिलेगा और पश्चिम के भी पूरे काम का नहीं है, हमारे काम का तो हो ही नहीं सकता।
तुम्हें कोई दूसरा जान तो सकता है परन्तु उसकी पहुँच उस विशाल भंडार तक नहीं हो सकती जो अव्यक्त रह गया है फिर भी तुम्हारे विचारों और कार्यों को प्रभावित करता है। इसे तुम्हे जानना होगा। आत्मानं विद्धि का सूत्र एक व्यक्ति के रूप में उतना ही सार्थक है जितना एक समाज के रूप में। हमने किसी क्षेत्र में कोई ऐसा काम नहीं किया जिसके नियम और पाले पश्चिमी वर्चस्ववादी तकाजे से न तैयार किए गए हों जब कि कच्चे माल का विशाल भंडार हमारे पास है, परन्तु उसे इस पाले में रहकर या नियमावली में बँध कर नहीं समझा जा सकता।
“खैर जिस वर्णव्यवस्था की बुनियाद की बात मैं कर रहा था वह स्थायी कृषि के संस्थित या पूरी तरह स्थापित हो जाने से आरंभ होती है जहाँ कृषि कर्मियों की शक्ति इतनी तो बढ़ ही गई थी कि वे असुरों का जमकर प्रतिरोध कर सकें न कि जान बचा कर किसी अन्य क्षेत्र में पलायन करें। परन्तु क्या हम वर्णव्यवस्था को भी समझते हैं। जातिव्यवस्था तो इससे बिल्कुल भिन्न है और अस्पृश्यता का उदय और भी जटिल है और इसका एक पहलू उससे जुड़ा है जिसे क्वारैंटाइन कह सकते हो। इन पर अधिकारी लोगों को समय लगा कर काम करना चाहिए। पर वे काम करने की जगह राजनीति करते रहे। झगड़ा लगाने के लिए जितना काम जरूरी था वह वे कर गए। मिल कर रहने के लिए जिस गहरी समझ की जरूरत है उसे तुम्हें करना चाहिए था। वाचालों की तुम्हारी पूरी लश्कर में कोई एक भी विद्वान हो जिसने इन सवालों को गहराई से समझने का प्रयत्न तक किया हो तो उसका नाम पता लगा कर बताना। उसका दर्शन करना चाहूँगा।“
12/18/2015 10:09 AM

Post – 2015-12-17

तदेकं वद निश्चित्य
तुम कुछ चीजों में घालमेल करते हो। पहले कहा, देव और ब्रह्म का अर्थ आग होता है फिर कह कहा देव, ब्राह्मण और सुर का मोटा अर्थ किसान था।
समय बचाने के लिए ऐसा करना पड़ता है। सुर का अर्थ तो उत्पादक है। सू जिसका पुराना रूप् चू रहा, जो च्यवन में बचा रह गया है, का अर्थ मूलतः जल था। ब्रह्म का पुराना रूप बरम् था। और उसका उससे पुराना परम् अर्थात् जल। देव जिस ‘दी’ से निकला प्रतीत होता है उसका पुराना रूप ती था, और अन्य बोलियों में यह दी, धी, टी आदि में बदला। इसका भी मूल अर्थ जल था, बाद में आग हुआ और फिर तो प्रकाश, ज्ञान, रूप आदि। इसके मूल जलर्थक भाव से तेलुगु का तिय्यन और भोज. तेवना या स्वादुकर जुड़ा है।
“आग की संज्ञा जल से क्यों जुड़ी है। इसका काम चलाऊ समाधान यह कि जल से वृष्टि प्रधान क्षेत्र की भाषाएँ निकली हैं। वातप्रधान शुष्क देशों की भाषाएँ वायु की ध्वनियों से प्रभावित रही है। तो यदि इस जातक की ओर लौटता तो कहानी लंबी हो जाती। इसलिए कहा मोटे तौर पर इनका अर्थ था किसान। राक्षसों अर्थात् प्राकृतिक संपदा और पर्यावरण के रक्षकों से इनका दार्शनिक विरोध था। वे उस प्रकृति को जो सब कुछ स्वतः माँ की तरह देती है, फल, कन्द, मछलियाँ, उसे जलाने र या उसके साथ हिंसक व्यवहार के विरोधी और अल्पसंतोषी थे। हमारे आतिथ्य, उदारता, अहिंसा, संतोष, अपरिग्रह, सत्य, त्याग, बलिदान आदि के मूल्य इन राक्षसों की देन है।“
“तुम कहते हो राक्षसों की मूल्य व्यवस्था का ही दूसरा नाम हिंदुत्व है और इसका ब्राह्मणवाद से सदा से विरोध रहा है?”
“तुमने ठीक समझा. पूंजीवाद ही नहीं प्रगति अपने प्राचीनतम चरण से सर्जनात्मक ध्वंश रहा है. कृत्रिम उत्पादन प्रकृति पर विजय. अब इस नज़रिये से देखो तो जो ब्राह्मणवाद प्रतिक्रियावादी प्रतीत होगा और हिंदुत्व या सामाजिक समरसता की मांग यथास्थितिवादी.”
उसने सर पीट लिया.
ये झाड़ झंखाड़ जला कर खेती करने वाले, धरती खोद कर पानी निकालने वाले फरेबी, मक्कार, धोखेबाज थे और इसी के कारण देवताओं को हमारे साहित्य में भी कपटी कुचाली आदि कहा जाता रहा है और दूसरी ओर उन्हें ही अपना आदर्श माना जाता रहा – अनु देवानां पन्थाम चरेम।
“ बहुत छल कपट करते हुए ही देवों को अपना कृषियज्ञ चलाना पड़ता था फिर पता लगते ही इनको भगा दिया जाता था। इसी भागम भाग में ये उत्तर दक्खिन पच्छिम की ओर भागते फिरे। पहाड़ी क्षेत्रों को खेती के लिए सुरक्षित मानने का निर्णय भी इनका ही था। इसलिए ही पहाड़ी क्षेत्र देवभूमि बना। इसी पलायन में इनकी कोई एक शाखा पश्चिम एशिया के उस क्षेत्र में पहुँची जिसे उर्वर अर्धचन्द्र कहा जाता है परन्तु जिसकी जातीय स्मृति में यह बना रहा कि देवताआओं का स्वर्ग कहीं पूरब में था और उसी समृद्धि लोग या ईदन गार्डन से निर्वासित होने के कारण आदम वहाँ पहुँचे थे।
अब देखो, तुम्हारे पुरातत्ववेत्ता बताते रहे कि खेती का आरंभ जर्मो जेरिको, नातूफ आदि में हुआ और वहाँ से कृषि के प्रसार के साथ भाषा का भी प्रसार हुआ और इस तरह भारतीय आर्य भाषा भारत पधारी। कारण, हमारे यहाँ पुराने स्थलों का पता तब नहीं था और एक बार प्रचारित हो जाने के बाद जब यहाँ के स्थलों का पता चला तब तक शिक्षित समाज की चेतना में यह बात घर कर गई थी। परन्तु भारत में ये स्थल लगभग पूरे भारत में विखरे रहे हैं। और दुनिया का सबसे विशाल उर्वर क्षेत्र तो सिन्ध-सरस्वती-गंगा का मैदान ही रहा है। सुविधाओं और तकनीकी पिछडेपन के कारण उसकी तुलनात्मक प्रति एकड़ उपज भले दूसरे देशों से कम हो।
“खैर मेहरगढ़ की खुदाई करने वाले जैरिज को लहुरादेवा के पता चलने के बाद अन्ततः स्वीकार करना पड़ा कि पहला किसान भारत में पैदा हुआ। अब यदि कृषि विद्या के साथ भाषा और संस्कृति का प्रसार हुआ तो उसकी भी दिषा समझ में आ सकती है। परन्तु यह काम एक बार या एक झटके में नहीं हुआ, कई चरणों में हुआ।
‘‘मैंने भी मान लिया यार भारत देश महान्। कहो तो नमस्त सदावत्सले मातृभूमे भी गा दूँ।
‘‘तुम जिस उपहास से गाने की बात कर रहे हो, गाओगे भी तो गाली जैसा लगेगा। उसके लिए वह समर्पण भाव चाहिए जो हम तक उस राक्षसी अवस्था या आसुरी अवस्था चे प्रवाहित होती आई है – धरती माँ, सब कुछ स्वतः देने वाली माँ, नदी माँ जल स ेले कर मछली आदि प्रदान करने वाली माँ , पर्वत पिता ओशधियों और फलों से लदा हुआ प्रदेश, देवलोक। इनको न तुम समझ सकते हो न इनका सम्मान कर सकते हो। बिना समझे बूझे लट्ठ जरूर चला सकते हो। और तुम्हारे लट्ठ को लोग न्यायसंगत भी मान लेंगे, क्योंकि जिनमें यह भाव बचा रह गया है या जो इसकी राजनीति करते हैं वे तो खासे जाहिल हैं। उूपेर से तुमने बदनाम भी कर रखा है।श्
‘लट्ठ चलाने से पहले समझने का प्रयास तो करो। और माक्र्सवाद जिन्दाबाद सिद्ध करने के लिए नहीं क्योंकि तुम उसके जैकारे के साथ उसका भी सर्वनाश करते हो। हमारे सामाजिक रचाव को तो देखो। ती का अर्थ आग है। पर आग क मूल जल। जानते हो आग को पानी के गर्भ से उत्पन्न कहा गया है – ‘अपांगर्भः’। ‘समुद्रो अस्य योनिः’। तो ती/ति का उसी का जल अर्थ रस की तरह मीठे जल के लिए प्रयोग में आने लगा जिसे अग्रेजों ने चाय के लिए ग्रहण कर लिया और तुम्हारा टी बना।
इसका उच्चारण दी, धी, टी आदि रूपों में होता रहा उन समुदायों में जिनकी ध्वनिमाला भिन्न थी। किसी में मूर्धन्य वर्ग की आदि ध्वनि जिसे अघोश अल्पप्राण ध्वनिं थी, तो उसका घोश अल्पप्राण रूप् नहीं था यानी त था पर थ, द, ध नदारद जैसा कि तमिल में आज भी है। हमारे प्राचीन मानवयूथा का संसार भी छोटा था उसे व्यक्त करने के लिए सीमित ध्वनियाँ पर्याप्त थी। सबकी ध्वनिमाला बहुत सीमित थी। आज भी पूरी वर्णमाला का प्रयोग कोई नहीं करता। संस्कृत के विद्वान भी भाषा को भाखा बोलते थे। आग वाला शब्द प्रकाश, ज्ञान, बुद्धि वगैेरह का अर्थ वहन करने लगा।
अब बस भी करोगे।
मैं जानता था तुम उूब जाओगे। मैं अपनी बात ठीक से रख भी नहीं पाता। पर जरा इस बात पर तो ध्यान दो कि बहुत पहले से जब हमारे मानव समुदायों के पास बहुत थोड़ी सी ध्वनियाँ थी, उसी समय से उनका परस्पर भिन्न भाषा बोलने वालों के साथ मेलजोल आरंभ हो गया था और एक ही शब्द लगभग एक ही अर्थ में अपनी अपनी ध्वनिसीमा में वे बोलने और समझने लगे थे। उसके कई हजार साल बाद उस वर्णमाला का विकास हुआ जिसे हम प्राचीनतम भारोपीय कह सकते हैं और फिर उसका भी बहुत बाद में भारत से यूरोप तक प्रसार हुआ। और हमें इस सचाई को उलट कर पढ़ाया जाता रहा। हम उस उलटी विद्या को जितना ही अधिक जानते हैं उतने ही बेवकूफ बनते जाते हैं।
यह बखेड़ा लेकर क्यों बैठ गए, यार।
इसलिए कि हम उस कारा से मुक्त हो कर सोचने लगें। किसी के ज्ञान से आतंकित न हो कर अपनी समझ पर भरोसा करना आरंभ करें तभी उस मानसिक गुलामी से मुक्त हो सकेंगे जिसे ज्ञान और सूचना के स्रोतों पर अधिकार करके वे हमें बौद्धिक रूप् में अपने उूपर निर्भर बनाते आए हैं। जितना अथक प्रयत्न उन्होंने हमारे बौद्धिक कार्यभार को स्वयं उठा कर हमें अपना मानसिक गुलाम बनाने के लिए किया है उतना ही हम अपने को उनकी बौद्धिक कारा से मुक्त होने के लिए करें तो हमारी अस्सी प्रतिशत समस्यायें सुलझ जाएँ।’’
‘‘यह तो हमेशा होता रहा है। ब्राह्मणों ने शिक्षा, ज्ञान और सूचना संग्रह का सारा कार्यभार स्वयं ले कर और दूसरों को इससे वंचित करके, पहले भी तो यही किया।’’
‘‘इसी के बल पर तो वे हमारे पूरे समाज को नियन्त्रित करते रहे। परन्तु जब भी किसी ने ठान लिया कि हम इनके किताबी ज्ञान की धौंस में नहीं आएँगे, जो हमें दिखाई देता है उस पर भरोसा करेंगे तो वह अशिक्षित रहा तो भी उसके विचारों के सामने बड़ा से बड़ा पंडित झुकने को बाध्य हुआ। कबीर, रैदास, नानक की शिक्षा क्या थी? रैदास कहते हैं वेद पढ़ने वाले ब्राह्मण भी उन्हें ‘दंडौत’ करते हैं। सिखों में वेदी उपाधि तो आज तक चलती है। परन्तु जब इनको देवता बना दिया गया, इनको लेकर किंबदन्तियाँ गढ़ी जाने लगीं उसके बाद उनके विचारों की धार कुन्द हो गई।
‘‘लोग शिक्षित होने के उपाय करते हैं, तुम अशिक्षा का महत्व समझा रहे हो।’’
‘‘नहीं, मैं कह रहा हूँ जानते समय किसी के ज्ञान से आतंकित हो कर उसकी बात मान मत लो, जितना भी ज्ञान और समझ है उसमें ही उसकी विवेचना करते हुए पढ़ो और सुनो। यह मत सोचो कि पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाएगा तभी अपनी बात कहूँगा या किसी का प्रतिवाद करूँगा। वह दिन कभी आएगा ही नहीं। किसी का ज्ञान दो प्रतिशत या दस प्रतिशत नहीं होता। ज्ञान जितना भी है पूर्ण होता है। उसके चतुर्दिक ज्ञेय का अनन्त विस्तार है। मत सोचो कि जब सारा अन्धकार मिट जायेगा तब आँखों से काम लोगे। रोशनी अधिक तेज हो तो आँखें चैंधिया भी सकती हैं। जितना भी प्रकाश है उसमें जो कुछ दीखता है उससे काम लो और प्रकाश अधिक होता चले इसका प्रयत्न करो। तुम्हारे पास भरोसा करने के लिए सिर्फ अपना दिमाग है, खड़ा होने के लिए सिर्फ अपना ही पाँव है – दूसरों के दबावों से जितना मुक्त है उतना ही विश्वसनीय। दूसरों के दबाव या बहाव में वह भी नहीं रह जाता। वह विचारों का रेला होता है जिसमें किसी के पाँव ठिकाने नही पड़ते और किसी का दिमाग काम नहीं करता। परन्तु विरोध में नम्रतायुक्त दृढ़ता हो तो ही पता चलेगा कि होश-हवास में हो।’’
‘‘तुमको उपदेशक होना चाहिए। किसी चैनल पर जगह मिल जाए तो दूकानदारी खूब चलेगी।’’
12/17/2015 4:51:38 PM

Post – 2015-12-16

please edit and read.
समझ का फेर

“तुमने कल मुझे चुनौती दी थी गलती निकालने की तो, गलती तो मेरी पकड़ में आ गई।“

मैंने उत्सुकता प्रकट की तो उसने कहा जो तुम अग्नि को सखा, बन्धु, पिता आदि कह रहे थे वह तो गीता का श्लोक है और इसमें विष्णु भगवान के साथ यह संबन्ध दिखाया गया है। तुमने उसे अग्नि पर विष्णु विष्णु से उठा अग्नि पर आरोपित कर दिया।“

^^देखो, मैंने कहा है, सोचना अकेले में किया जाता है, पर यदि वह अपने तक सीमित रह जाय तो उसमें बहुत सारी कमियाँ रह जाती हैं। जब हमारे विचार दूसरों से टकराते हैं तो हमें अपनी कमियाँ समझ में आती हैं। मुझे कई कारणों से अपने एकान्त में ही काम करना पड़ा। मैं जानता हूँ मेरी तर्क श्रृंखला जितनी भी सुथरी लगे, किन्हीं पहलुओं की ओर ध्यान न जाने के कारण गलतियाँ हो रही होंगी। जब तुमने कहा तुमने गलती पकड़ी तो मुझे खुशी हुई और जब तुमने बताया, वह गलती क्या है तो निराशा हुई क्योंकि इसे तो मैं पहले से जानता था, परन्तु उस रूप में नहीं बल्कि दूसरे रूप में।“

“तुम किसी न किसी तरह अपने को सही साबित करोगे, यह मैं पहले से जानता था।“

“यह मेरा दुर्भाग्य है कि मुझे बात करने को तुम्हारे सिवा कोई मिलता नहीं और तुम्हें सिखाया गया है कि तुम कभी अपनी गलती मानना नहीं। मैं यह अपनी किसी किताब में लिख आया हूँ कि अग्नि तत्व को ही विष्णु नाम दिया गया। विष्णु का अर्थ है जो फैलता है, ईंधन उपस्थित हो तो एक जगह आग लगा दो तो वह स्वयं फैलता जाएगा। अग्नि ही सर्वत्र विद्यमान है, पानी में भी अन्यथा बड़वाग्नि की कल्पना और समझ क्यों होती, पानी बरसाने वाले बादलों में बिजली कैसे पैदा होती। काठ में अव्यक्त है, स्पर्श मात्र से आग में बदलता चला जाता है। पत्थर पर कहीं भी चोट करो, उससे चिनगारियाँ निकलतीं हैं। इस तरह की अनेक उूहापोहों के बाद विष्णु की, उनके वामनावतार की अर्थात् आग की एक चिनगारी के रूप में कल्पना की जा सकी। इसका संबन्ध भी कृषिकर्म के आरंभ से है। मेरी जानकारी की जिस सबसे पुरानी कहानी में इसका चित्रण है उसमें बलि और उनसे जुड़ी कथा का प्रवेश नहीं हुआ है।

“विष्णु का एक नाम उपेन्द्र है, अर्थात् इन्द्र से कुछ छोटा । विष्णु कृषि कर्म के साथ पैदा हुए, झाड़- झंखाड़ की सफाई के लिए प्रयुक्त अग्नि के स्फुल्लिंग के रूप में। परन्तु अग्नि तो स्वयं देवों तक उनका भाग पहुँचाने वाली सत्ता है। बम्बई के डिब्बावालों का आदिम रूप। इस सेवा कार्य में लगा कोई भी व्यक्ति या सत्ता सर्वोपरि तो हो नहीं सकती थी। जमीन की सफाई के बाद, खेती के लिए सबसे प्रधान समस्या सिंचाई की थी, इसलिए पानी का देव, जलाने और फैलने वाले देव या खेती की जमीन तैयार करने वाले देव पर भारी पड़ गया। आर्थिक उन्नयन के साथ यह पानी का देवता धन, वैभव और मस्ती का देवता भी बन गया। उसका यह रूप ही नागर सभ्यता के ह्रास और पुनः कृषि के एकमात्र आधार रह जाने के कारण उपेन्द्र के सर्वोपरि बनने और इन्द्र के पराभव का जिम्मेदार माना जा सकता है। यह मेरा विचार है।

^^जब मैं कहता हूँ यह गलत भी हो सकता है तो आपसे दो निवेदन करता हूँ, पहला यह कि मेरे कहे को मत मानो, स्वयं जाँचो और सोचो। दूसरा यह कि सही तो कोई हो ही नहीं सकता। कारण, यथार्थ., या वस्तुस्थिति इतनी जटिल होती है कि उसके अंशमात्र को ही हम देखने, समझने और बदलने और अपनी इच्छानुसार चलाने का स्वप्न देख सकते हैं। मैं जब कई बहानों से अपनी आलोचना करने को तुमको उकसाता हूँ तो इसलिए नहीं कि मैं अपने को सर्वथा सही मानता हूँ। सही जैसा कुछ होता ही नहीं। सही कोई होता ही नहीं। हम सही होने का प्रयत्न कर सकते हैं परन्तु पूरी तरह सही कभी हो ही न पाएँगे। हो गए तो प्रलय आ जाएगी। मौत उपस्थित होगी और मौत से पहले इन सवालों का कोई दूसरा समाधान नहीं है इसलिए पूर्णता होती नहीं। हम उसे हासिल करने की मंजिलें तय करते रहते हैं।“

“तुम कह रहे हो मैं कल तुम्हारी बातें सुनते सुनते जँभाइयाँ लेने लगा था। मुझे तो अभी से जँभाई आने लगी। तुम किसी की सुनते नहीं हो अपनी ही हाँके जाते हो।“

“मैं यही चाहता हूँ । तुम मेरी सुनो पर मानो नहीं, अपनी समझ से काम लो और मुझे उस दिशा में एक चरण आगे बढ़ने में मदद करो और अपना फर्ज पूरा करो। जो तुम्हें अधिक समझदार बनाना चाहता है, उसे तुम भी कुछ समझदार बनाओ। उससे सीखो भी और उसे सिखाओ भी। तुमने अभी शुरुआत की है, कल से और गलतियाँ तलाशना।“

“मैं नहीं समझ पाता कि तुम कब कोई बात व्यंग्य में कह रहे हो और कब सच बोल रहे हो।“

“देखो जो सच को जानना चाहता है वह सोचते समय व्यंग्य से भी बचेगा और विनोद से भी बचेगा। मैं अपनी समझ की सीमाएँ दिखावे के लिए, अपने को विनम्र सिद्ध करने के लिए नहीं बताता हूँ । जो सच है उसे जानता हूँ और स्वीकार करता हूँ। पर मानता हूँ कि हम ज्ञान के अगले चरणों पर अपनी कतिपय पिछली सीमाओं को समझ पाएँगे और पहले से अधिक जान पाएँगे पर सब कुछ तब भी न जान पाएँगे। इस सवाल को ले कर अस्तित्ववादियों ने एक बार गहरी पड़ताल आरंभ की थी, पर उनको समझने में चूक हुई।

“मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि मैं जो कुछ जानता हूँ ठीक वही तुम नहीं जानते और कुछ बातें तुम जानते हो जिनका मुझे पता नहीं। उस अगली जानकारी के कारण तुमको मैं गलत लग सकता हूँ। तुम यह मान कर चुप रह जाओ कि मैं कुछ अधिक जानता हूँ तो मुझसे जो चूक होती आ रही है उसे मैं समझ नहीं पाऊँगा। इसलिए तुम मुझे गलत बता कर मुझे अपनी गलतियों को सुधार कर पहले से अधिक समझदार बनाने में मदद कर रहे हो। यह काम छोटे बच्चे भी कर सकते हैं। ज्ञान से अधिक जरूरी है अपने विचार को बिना किसी आवेग के या सादर पर निडर हो कर प्रस्तुत करना। ज्ञान के उत्कर्ष की यात्रा यहाँ से शुरू होती है। यह मेरी समझ है पर जरूरी नहीं कि यह सही हो।

Post – 2015-12-15

ऋते ज्ञानात् न मुक्तिः
‘‘अब बोलो क्या कहना चाहते थे।“
‘‘कहना कुछ नही चाहता था, याद दिलाना चाहता था एक पुराना सूत्र, ‘ऋते ज्ञानात् न मुक्तिः’। ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं। कहा तो गया है भव बन्धनों आदि के बारे में, लेकिन यदि तुम अपनी जटिल समस्याओं को भी भवबन्धन ही मान लो तो यह सूत्र इन पर भी लागू होता है। जिस भी समस्या या प्रवृत्ति या व्याधि से मुक्ति चाहते हो, तो यह पता लगाओ कि इनकी जड़ें कहाँ तक पहुँची हैं। इनको शक्ति कहाँ से मिलती है, उनकी गहराई तक तुम लौट नहीं सकते, परन्तु उनको उजागर करके उनको अशक्त बना सकते हो। उजाड़ना का अर्थ जानते हो?
‘‘जानता तो हूँ, पर जब तुम पूछ रहे हो तो जरूर कोई पेंच होगा। तुम्हीं बताओ।“
‘‘निर्मूल करना। जड़ों को उखाड़ देना। प्रयोग तो इसका बस्ती या घर उजाड़ने आदि के अर्थ में होता है, परन्तु वहाँ भी नींव से उखाड़ फेंकने का भाव है। यह उखाड़ना या उजाड़ना तभी संभव है जब पता हो कि इसकी जड़ें कहाँ तक पहुँची हैं अन्यथा ऊपर से काट कर गिरा दो तो भी बरगद या पीपल की जड़ों की तरह इन समस्याओं की जड़ें बची रह गईं तो उन्हीं से कई जगह से वे कई दरारों से फूट पड़ेंगी।“
‘‘सो तो है।“
‘‘और एक और सूत्र है, ‘आत्मानं विद्धि’, तो अपने को जानने का अर्थ भी अपने को जड़-मूल और शाखा पत्ती सबके साथ जानना है। जड़-मूल की तलाशा इतिहास की जड़ों तक जाती है और शाखा-पत्ती की समाज और पूरे विश्व तक – इसका जितना भी जानने वश का है। बौद्धिक जब सामाजिक हस्तक्षेप करता है तो इन्ही की व्याख्या करके जागरूकता पैदा करने के माध्यम से करता है।
^^अब यह हमारा जातिवाद ही है। हमारी आधी ताकत इससे ही लड़ने में चुक जाती है। यह जातिवाद भारतीय समाज को समाज तक बनने में बाधक रहा है। इससे लड़ाई कितनी पुरानी है जानते हो, इसकी जड़ों को समझने की कभी कोशिश की गई?”
‘‘मेरी जानकारी में की तो गई है। घुरये ने की है, श्रीनिवास ने की है। मेरी जानकारी अधिक नहीं है, पर, हाँ, कुँवर सुरेश सिंह ने की है। उन्होंने ही तो पहली बार सुझाया कि हम कुछ जातियों या धर्मों या भाषाओं में बँटे लोग नहीं है, पाँच हजार से अधिक समुदायों में बँटे लोग हैं। बँटे भी, एक दूसरे से तने भी, एक दूसरे से परहेज करने वाले, चिढ़ने और झगड़ने और खींचतान करने वाले लोग भी और इसके बाद भी किसी रहस्यमय सूत्र से एक दूसरे से इस तरह जुड़े हुए भी कि कहीं कोई खँरोच बाहर से आए तो सारे विभेद भूल कर एक सत्ता के रूप में खड़े हो जाते हैं। खैर यह बात तो बहुत पहले अंग्रेजों ने भी, मिसाल के लिए रिजले ने भी कही थी। इसी रहस्यमय एका को, इसकी दरारों को पहचान कर, विभेद को टकराव की ऐसी स्थिति में लाने की वे इतनी चालाकी से कोशिश करते रहे कि दिल तो फिरें, दिमाग ख़राब तो हो, पर किसी को शक तक न हो कि जहर बोया जा रहा है। उल्टे जहर पीने वालों को इसकी ऐसी लत लग जाय कि वे इसकी खूराक बढ़ाते चले जाएँ।“
‘‘यार, यही तो बात है। तुमने तो मेरी समस्या ही आसान कर दी। परन्तु घुरये हों या श्रीनिवास या सुरेश कुमार, इन्होंने जो है उसे देखा, यह पैदा कैसे हुआ? इसे ताकत कहाँ से मिलती है? इसकी ओर उनका ध्यान नहीं गया। जा नहीं सकता था, क्योंकि वे उस पाले में, खेल के उन नियमों को मानते हुए, जिसे हमें गुलाम बना कर रखने वालों ने तैयार किया था, अपने दाव पेच दिखाते रहे। यह ध्यान न रहा कि यह पाला ही फरेब है। घुरये या श्रीनिवास से तो कभी मिलने की सोच ही नहीं सकता था। कुँवर साहब से भी उदयप्रकाश के कारण मुलाकात हो सकी। वह रिश्ते में उदयप्रकाश के फूफा लगते थे। उदयप्रकाश साथ न होते और समय माँग कर मिलने गया होता तो वह पहले ही दुस्साहस पर मुझे घर से निकाल देते। खैर जब मैंने कहा कि यह आर्य-द्रविड़ वाला विभाजन ही गलत है और आर्य नाम की न कोई जाति थी, न वे कहीं बाहर से आए थे, तो उनका गुस्सा देखने लायक था। उनके गुस्से पर मैं मुसकराता रहा तो उनको लगा मेरे पास भी कुछ कहने लायक है। और इसके बाद आधे घंटे तक मैं अपनी बात समझाता रहा और वह चुप सुनते रहे। एक बार भी मुँह तक न बनाया और अन्त में उनसे कुछ कहते न बने। यह सीधे नहीं माना कि वह गलत थे या मैं सही। ज़िंदगी भर काम करने, अपने विश्वकोशीय काम के कारण विश्वविख्यात व्यक्ति को अपने अंतिम दिनों में लगे कि उसके पाँव के नीचे से ज़मीन ही खिसक गयी है, वह अवाक् ! कारण, एक छोटा सा फर्क। वह उस मजबूत दीवार को न तो तोड़ सके न उसके पीछे देख सके जो मैं भाषा और अपने ढंग की सामाजिक समझ के कारण देख रहा था, और उसी का आभास उन्हें हुआ। उदयप्रकाश को तो पता ही न चला कि इस बीच हुआ क्या है। वह अलग अपनी बुआ जी से बातें करने में मगन थे.“
‘‘तब तो तुम इन सबसे बड़े विद्वान हुए यार! कल मैं एक सर्टिफिकेट बनवा कर लाऊँगा और तुम्हें अर्पित करूँगा जिस पर लिखा होगा, दुनिया का सबसे बड़ा सब-कुछ जानने वाला इंसान! चलेगा?” हँसने का ऐसा मौका वह क्यों छोड़ता।
‘‘यदि छेड़खानी करते रहे तो विषय पर आज भी नहीं पहुँच पाएँगे, दोष मत देना।“ मैंने हँसते हुए ही याद दिलाया तो वह सँभल गया। मैंने कहा, ‘‘देखो बड़ा या छोटा का नहीं होता। दिशा का होता है। तुम प्रकांड विद्वान हो, तुम्हारे हाथ में दूरबीन भी हो, घूर&घूर कर किसी एक ही दिशा में देख रहे हो और जिस चीज की तलाश हो वह ठीक तुम्हारे पीछे पड़ी हो जिस पर एक अनपढ़ की भी नजर पड़ जाए और वह कहे, जनाब जिसे तलाश रहे हो वह उधर है ही नहीं, वह तो यह रही। आपके सटे पीछे। मैं उस अनपढ़ जैसा हूँ जिसके हाथ में न दूरबीन है, न चश्मा, न वह किसी की बताई हुई दिशा में ही घूरता हुआ जो हाथ लग जाए उसे तलाश रहा हो, पर जिसकी आँखें खुली हों और चारों ओर नजर डालने की आदत से लाचार हो। खैर, अब बीच में टोकना मत नहीं तो हरिकथा अनन्त हो जाएगी।
“हमारी वर्णव्यवस्था का संबन्ध कृषि के आरंभ से है। इसका अपना आर्थिक आधार है जिसके स्तरीभूत होने के कई कारण और कई चरण हैं। इसे ब्राह्मण ने नहीं बनाया या चाहो तो एक तरह से कह सकते हो ब्राह्मणों ने ही बनाया पर ढोग और पाखंड के चलते नहीं। किसी को धोखा देने के लिए नहीं, न अपने को सबसे ऊपर रखने के लिए। इसकी अनिवार्यता थी। ऐतिहासिक जरूरत। कृषि युग की अपरिहार्यता!
इसका इतिहास आठ दस हजार साल पुराना है।
“यह बताओ, तुमने प्रेमचन्द की कहानी पूस की रात पढ़ी है?”
“पढ़ी तो है पर उसकी जरूरत यहाँ क्या आन पड़ी?”
“किसानी की मुसीबत समझाने के लिए। खेत की रखवाली के लिए बेचारे ने झोंपड़ा डाला। कड़ाके की ठंड । उसे लगता है कि नीलगायों का झुंड खेत में घुस आया है। उठ कर भगाने की सोचता है पर ठरन ऐसी कि बार बार कोशिश करने के बाद पड़ा ही रह जाता है। खेत जाय भाड़ में। कुछ ऐसी ही है कहानी न?”
“तुम कहना क्या चाहते हो?”
“देखो यह मुसीबत तो आज की है जब जंगल कट चुके है। वनवासी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं है? जंगली जानवरों की रक्षा के लिए अभयारण्य बनाए जा रहे हैं। अब उस आरम्भिक चरण की समस्या पर ध्यान दो जब एक छोटे से भूखंड को झाड़ झंखाड़ जला कर साफ किया गया है। उसमें फसल उगाई गई है। उसको घेरे चारों ओर जंगल ही जंगल, उनमें विचरते कबीले, जिनकी नजर भी इस फसल पर। लेकिन सबसे बड़ा खतरा अरना भैंसे, हिरन, नीलगाय, घड़रोज, गैंड़े । उनके प्रकोप से खेती को बचाना कितनी बड़ी समस्या थी। इनसे निबटना कितने साहस और पराक्रम का काम था। फिर हिंस्र जानवर थे । भेड़िये, लकड़बग्घे, तेंदुए, बाघ और शेर जिनसे अपने लोगों की और पालतू पशुओं की रक्षा का भी प्रश्न। यह केवल रात की समस्या नहीं थी। यदि सुरक्षा के लिए एक प्रभावशाली बल नहीं तैयार होता, खेती-बारी का काम धरा रह जाता। यह एक जटिल कार्यभार था और इसलिए कृषिकर्मी और रक्षाकर्मी में उसी समाज का आन्तरिक विभाजन जो अपने को देव या ब्राह्मण या सुर कहता था, अपरिहार्य था। देव, ब्राह्मण, सुर सभी आरम्भ में पर्याय थे जिसका मोटा अर्थ था खेती करने वाला। इसका सबसे भरोसे का हथियार था अग्नि। अग्नि का उपयोग जमीन की सफाई के लिए, सूखे अनाज को भूनने के लिए, सर्दी से बचाने के लिए और जानवरों से ही नहीं, जंगली लुंचनकारियों से भी अपनी खेती को बचाने के लिए। अग्नि ही विष्णु है, वही रूद्र है, वही पूषन है, वही माता, पिता, भाई, बंधु, सखा, सहायक सब कुछ है।
“तो पहला विभाजन हुआ रक्षाबल, कृषीबल या किसान और इनके कार्यविरत बूढ़े बुजुर्ग पितर जिनको बच्चों को सँभालने, सिखाने, और अपने अनुभव के अनुसार सलाह देने आदि का काम करते हुए अपना समय बिताना था – (तिस्रः प्रजा आर्या ज्योतिरग्रा:)। इन बुजुर्गो का ही सम्मान और नाम – बाबा, आर्य, आर्या संज्ञा भी इन्हीं की थी जो बाद में भी ब्राह्मणों के लिए जारी रही। इस विभाजन के बिना कृषियज्ञ संस्थित नहीं हो सकता था। आरंभ में इनका प्रयास था अधिक से अधिक लोगों को खेती के लिए प्रोत्साहित करके अपनी संख्या, सुरक्षा बढ़ाना। स्वयं भी अधिक से अधिक संतानें पैदा करता। खेती के संस्थित हो जाने के बाद अन्न के प्रलोभन से कृषि कि दिशा में स्वयं पहल न करने वाले धीरे धीरे अपनी सेवाएँ इन्हें देने को तैयार हुए और श्रमभार क्रमश: उन पर लदता गया और पहले के कृषिकर्मी दूसरे साधनों से भी अपनी आय बढ़ाने लगे। ये ही वैश्य बने जिनके ही पास कृषि, पशुधन, और वाणिज्य – कृषिवाणिज्यगोरक्षा – बना रहा। गीता में गुणकर्म आधारित जिस वर्णव्यवस्था की पुरानी याद बनी रह गई है, वह इसी अवस्था की याद है। और दूसरी ओर उसी ब्रह्म या परम पुरुष ने अपने को खंडित कर चारों वर्णों में परिणत कर दिया, यह भी उसी की प्रतीकात्मक स्मृति थी जिससे जन्मजात वर्णों की मान्यता को बल मिला। भैये, जब तक कृषि प्रधानता बनी रहेगी, वर्ण-व्यवस्था मजबूत रहेगी! “
“यह कहाँ पढ़ा है, तुमने।“
“यह कई तरह के तिनकों को मिला कर मेरे द्वारा तैयार किया गया खाका है जो गलत भी सिद्ध किया जा सकता है। यह काम तुम्हें करना है। कर सको तो, क्योंकि किताबों का ज्ञान तो तुम्हें ही अधिक है।“
12/15/2015 4:27:44 PM

Post – 2015-12-14

गालियाँ खा के भी बेमजा न हुआ

“कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब तुम मुझे मूर्ख और नासमझ नहीं कहते और फिर भी शिकायत करते हो कि गालियाँ हम देते हैं। हम तो उनमें से हैं जो गालियाँ खा के भी बेमजा नहीं होते।“
“देखो, बिना कारण और प्रमाण के यदि किसी को आहत करने वाले शब्द, संकेत या भंगी से काम लिया जाय तो उसे गाली कहते हैं। जैसा बात-बेबात भर्त्सना करते हुए करते हो। जब पूरे विस्तार से समझाने के बाद तुम समझ नहीं पाते, और तुमसे जवाब भी देते नहीं बनता, तो तुम्हारी औकात बताना, तुम्हे सही राह पर लाने की कोशिश जैसा होता है। यदि इसे तुम बुद्धिमानी कहते हो तो कल से बुद्धिमान कहने लगूँगा, लेकिन तुम्हारी करनी वही रही तो कोशों के नये संस्करणों में बुद्धिमान का अर्थ बदला हुआ मिलेगा। मर्जी तुम्हारी!”
‘‘मुझे आपत्ति तुम्हारी उस नादानी से थी, जिसमें तुम पुराकथाओं को पुरातत्व से अधिक विश्वसनीय मान रहे थे।’’
‘‘मैं पुराकथाओं को तो झूठ का पुलिंदा मानता हूँ। परन्तु नजर हो तो झूठ की पर्त दर पर्त में सत्य का एक अद्भुत योग मिलेगा।
देखो, पुरातत्व से भी अधिक विश्वसनीय इसलिए कहना पड़ा कि पुरातत्व के पास हड्डी है, ठीकरे हैं, बेजान चीजें हैं। पुराकथाओं के पास जबान है, कल्पना है, दिमाग है, और एक चुनौती भरी रहस्यमयता जिसके भीतर से इतिहास की वे सचाइयाँ खुलती हैं जिन तक पहुँचने का कोई दूसरा उपाय नहीं है। साथ हो तो ठीकरों से संगीत फूटने लगे और पुराकथाओं के चरित्रों को पाँव टिकाने को नई जमीन मिल जाए। इतिहास मूर्त हो कर उपस्थित हो जाए।“
‘‘और तुम ढोल मजीरा ले कर उसकी पूजा करने लगो।’’
मैं खीझ गया ‘‘सोच नहीं पाते तो धैर्य से सुनने की आदत तो डालो।’’ और फिर समझाना शुरू किया, “देखो हमारे वर्तमान की सबसे जटिल और दुराग्रही समस्याओं का हल न तो वर्तमान में है, न ही इतिहास में। उनका हल पुरकथाओं में है, परन्तु उनकी व्याख्या के लिए जो धैर्य, समझ और सम्मान होना चाहिए उसके बिना वे तुम्हारे सम्मुख खुलेंगी ही नहीं। तुम्हारे पेशेवर इतिहासकार तो उनके साथ गली-मुहल्ले के छेड़खानी करने वाले बददिमाग छोकरों की तरह पेश आते हैं। वे इनसे छेड़छाड़ करके इन समस्याओं को और विषाक्त बनाते हैं।“
“तो तुम्हारी सलाह है कि हमें अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पौराणिक युग की ओर लौटना चाहिए।“
“लौट सकते हो क्या? उस समय ये समस्यायें नहीं थीं क्या? तुम लोगों की समझ इतनी उथली क्यों है। बिना सोची समझी बोल कर दूसरों से आगे बढ़ने की होड़ में तुम लोगों ने जो अनिष्ट किए हैं उसका तो बोध नहीं, टाँग अड़ाने से बाज नहीं आते। पहले भविष्य में छलांग लगा कर, पूंजीवाद को धक्का मार कर किनारे करके समाजवाद लाने चले और पिट गए, अब अगर पुराण युग में खड़े हो कर समाज को पीछे लौटने से रोकने का गुमान पालोगे, पाल तो रहे ही हो, तो कामा में चले जाओगे। यात्रा शुरू हो गई है। कल तक पुराण का नाम लेते ही पारा चढ़ जाता था, अब पता चला कि पुराण में तो गालियों का खजाना मिल सकता है तो उसमें से छांट कर वही निकालने पर जुटे हो। आज चारों ओर असुरक्षा ही असुरक्षा दिखाई दे रही है न? तुममें तो इतना भी धैर्य नहीं कि पूछते, मैं किन सबसे जटिल समस्याओं की बात कर रहा हूं।“
उसने झेंपते हुए प्रश्न किया, ‘‘किन समस्याओं की बात कर रहे हो?’’
“सामाजिक स्तरभेद की, अस्पृश्यता की, धार्मिक विद्वेष की, राष्ट्रीय मनोबल और आत्मविश्वास की, धार्मिक टकराव की और हाँ, इतिहास की सही समझ की भी।“
वह मुझे ऐसी बुझी आँखों से देखने लगा जैसे उसकी आँखें नकली हों। बुझे स्वर में बोला, ‘‘बोलो।’’
मैंने कहा, ‘‘देखो, जिस कथा से इतिहास को समझने का हमने प्रयत्न किया उसके दावे अधिक अकाट्य हैं, परन्तु इनको न तो हम जानते थे न ही जानने की कोशिश की गई। जब पूरब सभ्य था तब पश्चिम उजड्ड था। वैसा जैसा उन्होंने यूरोप से चल कर बरास्ता मध्येशिया भारत पहुचने वाले आर्यो को चित्रित किया – बर्बर, चरवाहे, लुटेरे, सभ्यता द्रोही आदि। यदि उन्होंने यह आत्मप्रक्षेपण न किया होता तो हम समझ ही नहीं सकते थे कि उनका समाज तब कैसा था। यूरोप अपने इतिहास का सामना हमारे इतिहास को जानने के बाद नहीं कर सकता था, इसलिए उसने हमारे इतिहास को नष्ट करना, विरूपित करना, हमारे बोधवृत्त से हटाने और इस खिसकाव से मिटाने का प्रयत्न किया। अपनी आज की उपलब्धियों को हमारे दो चार हजार साल पहले की उपलब्धियों से श्रेष्ठ सिद्ध करते हुए अपने और हमारे वर्तमान को सनातन बनाने का प्रयास किया। विश्व सभ्यता के अध्येता के रूप में स्वयं भी बेवकूफियाँ कीं और हमारे प्रबुद्ध जनों को अपने तर्कजाल में फाँस कर पूरे समाज को मूर्ख बनाने का प्रयत्न किया।’’
उसने मुँह बिचकाया पर बोलने का साहस न जुटा पाया।
मैंने कहा, ‘‘क्या तुम बता सकते हो, कोई विजेता सैन्यबल में अधिक शक्तिशाली होने के कारण या अपनी चातुरी के कारण, जब किसी देश को अपने अधिकार में ले लेता है, उसे दिखाई देता है कि पराजितों में विद्रोह की क्षमता नहीं है। वह आतंकित है। इस पूर्ण विजय के बाद वह क्यों हमारे अतीत को पढ़ना और उसे नष्ट करना आरंभ कर देता है?”
वह चुप रहा। मैंने मदद की, ‘‘क्योंकि राष्ट्रीय मनोबल की जड़ें इतिहास और पुराख्यान में होती हैं। अपने स्वामित्व को बनाए रखने के लिए, विद्रोह की संभावना और मनोबल को तोड़ने की प्रबल आकांक्षा उनमें होती है जो तुम्हें गुलाम बना कर रखना चाहते है और इसलिए जो राष्ट्रीय मनोबल के उस श्रोत को ही अपनी अपव्याख्या द्वारा नष्ट करना चाहते हैं. उस अतीत में जाने से डर उनको लगता है जो दासता के मूल्यों को अपनी महिमा के साथ जोड़ चुके हैं और जो अपनी सुविधाओं को बनाए रखने के लिए संभावित विद्रोहों को दबाने में गुलाम बनाने वालों के सहयोगी बन चुके होते हैं और अपने ही समाज के शत्रु बन चुके होते हैं परन्तु हितैषी का नाटक करते हैं। इसलिए वर्तमान में सुविधाओं की तलाश करने वाले गुलाम बनाने वालों और उनकी मान्यताओं के साथ खड़े होते हैं और मुक्ति चाहने वाले नए सिरे से अपने इतिहास और पुराकथाओं से अपने हथियार तैयार करना चाहते हैं। जहां तक राष्ट्रीय मनोबल का प्रश्न है, पुराण की भूमिका इतिहास से अधिक महत्वपूर्ण होती है। परन्तु यह भी एक खतरनाक और दुधारा खेल है।“
“यार तुम भूमिका में ही इतना फैल जाते हो कि मैं थक जाता हूँ। लगता नहीं आज भी बात पूरी हो पायेगी।“
“ठीक है। गंभीर चर्चा से वैसे भी तुम परहेज़ करते हो। चलो कल ही सही!“
12/14/2015 9:50:31 PM

Post – 2015-12-13

भूले से उसने सैकड़ों वादे वफा किए

‘‘मैं तो यही समझता था कि स्वर्ग के देवता भी आदमी बनने को तरसते हैं, और तुमने तो आदमी को जानरों से भी नादान बता दिया।’’
‘‘आदमी बनने को तरसते तो आदम को स्वर्ग से निकाल देते?’’
‘‘क्योंकि वह शैतान के कहने में आ गया था।’’
‘‘जानते हो शैतान किसे कहते हैं? जानते हो शैतान को सर्प के रूप में क्यों कल्पित किया गया।’’
वह चुप रहा।
‘‘जानते हो वह स्वर्ग कहाँ था।’’
‘‘कहीं पूरब में।’’
‘‘जानते हो पश्चिम एशिया के पूरब में किस देश में देवताओं का निवास था?’’
वह कुछ सोचने लगा, ‘‘शायद बहरीन में या कुवैत में या कुछ ऐसा ही है जिसे सुमेरियाई दिलमुन या तेलमुन कहा करते थे।’’
“वह तो बहुत बाद का स्वर्ग है, यद्यपि स्वर्ग की तस्वीर खींचने में उसका भी हाथ था। वहाँ वे नदियाँ नहीं मिलेंगी जिनको स्वर्ग में बहता बताया जाता है। इसलिए जिस स्वर्ग का बाइबिल में संकेत है वह कृषि के आविष्कार और प्रसार के चरण का स्वर्ग है। सुमेरियाई स्वर्ग व्यापारिक युग का स्वर्ग है जो सुमेरिया से तो पूरब में हैं, पर उस स्वर्ग से अलग है। हमारे स्वर्ग हिमालय की शृंखला के पार उत्तर में कहीं थे। ठीक उत्तर में या पश्चिम उत्तर में कहना कठिन है लेकिन हैं ये भी नागर चरण के स्वर्ग क्योंकि इन्द्र की अलकापुरी या आमोद-प्रमोद से भरी नगरी की कल्पना की गई है, स्वर्ग के रास्तों की रखवाली करने वाले, आदमी जैसी चैकन्नी नजर से रखवाली करने वाले, और जाहिर है, किसी सन्दिग्ध को देख कर भौकने वाले कुत्तो ‘‘उदुम्बलौ सारमेयौ नृचक्षसः’ की कल्पना की गई है जो तत्कालीन शान्ति-व्यवस्था पर प्रकाश डालती है। और तनिक भी प्रमाद होने पर इन्द्र के द्वारा दंडित हो कर निकाले जाने वाले यक्षों की भी कल्पना है ही। और जानते हो यह जो ईरान का सूसा नगर है उसका पुराना नाम क्या था, कम से कम संस्कृत का नाम, सुखा नगरी था। वही इन्द्र के आनन्द वाली नगरी। यह अकेली ऐसी नगरी नहीं थी। ईराक के धुर उत्तर में मित्र पूजकों या मितन्नियों का वसु नाम की दजला की सहायक नदी के किनारे वसुकनि या वसु की खान नाम की नगरी के बारे में कहा है, ‘वसोर्धाराणां एन्द्र नगरम्’। तो हमारे स्वर्ग उन सम्यताओं के भीतर तक धँसे थे। यार अब याददाश्त धोखा दे जाती है। हो सकता है जिसे मितन्नी कहा वह कस्सी या कस्साइट निकले, पर थे वे आर्य भाषी ही।“
वह माथा खुजलाने लगा।
‘‘अच्छा यह बताओ, साँप को एक मानव समुदाय, कहो उपद्रवी मानव समुदाय के रूप में कहाँ के प्राचीन साहित्य में दिखाया गया है और नाग उपाधि वाले जन आज भी कहाँ पाए जाते हैं?’’
‘‘मुझे डर है कि तुम, जैसी कि तुम्हारी आदत है, यहाँ भी कह दोगे, भारत में ।’’
‘‘तुम्हारा डर सही है। यार, तुम जब डरते हो तो बिल्कुल सही नतीजे पर पहुँचते हो; जब आत्मविश्वास का स्तर ऊपर चला जाता है तो केवल मूर्खता की बातें और मूर्खता के काम करते हो। हमारी जानकारी में पूरब में अकेला एक ही भूभाग है जिसकी जातीय स्मृति में देवयुग की कल्पना है और उसको कृषि कर्म से जोड़ा गया है।“
‘‘कृषि कर्म से? तुम तो अभी कह रहे थे, वे आमोद-प्रमोद के नगर हैं।“
‘‘मैंने यह भी तो कहा कि विकास के विविध चरणों के स्वर्ग रहे हैं, जैसे आज मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों का स्वर्ग अमेरिका बना हुआ है, कल तक सोवियत संघ था, कुछ के लिए चीन हो गया था। मैं जिस देवयुग की बात कर रहा हूँ उसका दावा था कि उसने खेती का आरंभ किया। अपना स्वर्ग बनाया। जानते हो, जानते तो होगे, एक बार मैंने बताया था तुम्हें कि देवता का मतलब होता है आग लगाने वाला, देव का मतलब आग होता है, और देवन का आगजनी। ब्राह्मण का भी यही अर्थ होता है। तो जिन लोगों ने खेती के लिए झाड़ झंखाड़ जला कर जमीन को साफ किया वे अपने को देव या ब्राह्मण कहते थे। ये आग लगाने में बहुत तेज होते हैं, जानते हो न। बोलें तो भी आग लग जाती है, झगड़ा लगाने के लिए आग लगाना मुहावरे में चलता है न? और ब्राह्मणों ने तो खुद ही अपने बारे में लिख रखा है कि अग्नि मुखो वै ब्राह्मणः।’’
“तुम ब्राह्मणों को गाली देने के लिए इतनी लम्बी पैंतरेबाजी कर रहे थे?”
‘‘नहीं, जो ब्राह्मणों को बिना सोचे समझे गाली देते रहते हैं उनको गाली देने के लिए। यह बताने के लिए जब हमारे पास लेखन के साधन नहीं थे तब हजारों साल के इतिहास को किस तरह मिथको, प्रतीकों, विरूपित और बकवास प्रतीत होने वाले दावों के रूप में बचाये रखा गया था।
‘‘यह बताने के लिए कि तुम लोग जो तर्कवाद के नाम पर अंडबंड करते रहते हो, पुराना जो दीख गया उसे मिटाने को पिल पड़ते हो, तुम कुतर्कवादी हो। मूर्ख। उपद्रवकारी। तुम्हें पहले बहुत धैर्य से अपने प्राचीन साहित्य का अध्ययन करना चाहिए।
‘‘यह बताने के लिए कि इन अटपटे विवरणों में इतिहास के इतने निर्णायक प्रमाण छिपे पड़े हैं जो कभी कभी पुरातत्व के साक्ष्यों से भी अधिक विश्वसनीय और आश्चर्यजनक सचाइयों को उजागर कर सकते हैं। इसे समझे बिना तुम कैसे समझ सकते थे कि ब्राह्मण को भूदेव क्यों कहा जाता रहा और मार्क्सवादी होने का दावा करने के बाद भी इसके आर्थिक आधार को समझे बिना इसे ब्राह्मण की धूर्तता मान लोगे.

उससे रहा न गया, ‘‘यार मान लिया कि ब्राह्मण का अर्थ आग होता है, देव का अर्थ भी आग होता है। इतने ही पर तुम इतना उछलने लगे कि माइथालोजी को पुरातत्व से अधिक विश्वसनीय बना बैठे। तुम लोगों के साथ यही दिक्कत है। कहीं से कुछ निकाल कर उससे इतिहास बनाओगे और उस बनावटी इतिहास को प्रामाणिक इतिहास से अधिक महत्व देकर इतिहास की हत्या करने लगोगे। हँसी आती है तुम्हारी बातें सुन कर।’’
‘‘और मुझे तुम्हारी हँसी पर रोना आता है। जानते हो उस मूर्ख की कहानी जो तीन बार हँसा था?’’
वह नहीं जानता था इसलिए कहानी भी मुझे ही सुनानी पड़ी।
एक गोष्ठी में कुछ लोग बैठे थे। संयोग से उसमें एक मूर्ख भी बैठा था। बातचीत के बीच एक ने कोई विनोद भरी बात की तो सभी हँस पड़े। फिर हँसी तो रुकनी ही थी। रुकी। कुछ देर बाद वह फिर हँसा। लोग हैरान कि बिना किसी कारण के हँस क्यों रहा है। शालीनता के तकाजे से झेल गए। कुछ देर बाद वह फिर हँसा। अब तो लोगों को चिन्ता होनी ही थी कि इस आदमी को क्या हो गया है जो बात-बेबात हँसे जा रहा है। पूछा, ‘भाई साहब, आप बार-बार हँस क्यों रहे हैं।‘ उसने बताया, ‘पहली बार जब इन्होंने यह फिकरा कसा था तो मेरी समझ में नहीं आया था। आप लोगों को हँसते देख कर हँस पड़ा, पर सोचता रहा कि आप लोग हँसे क्यों थे, फिर फिकरे का मतलब समझ आया तो हँसना पड़ा। अब यह ग्लानि पैदा हुई कि जब फिकरा मेरी समझ में आया ही नहीं था तो मैं आप लोगों के साथ क्यों हँस पड़ा, तो अपनी बेवकूफी पर हँस पड़ा।‘ देखो, तुम्हारी तरह वह भी हँसता अधिक था, पर वह ईमानदार था, इसलिए उसने सत्य की खोज कर ली कि वह मूर्ख है। तुम लोगों में ईमानदारी नहीं है इसलिए यह कभी समझ ही न पाओगे कि तुम हो क्या!’’