Post – 2018-01-29

आप जानते हैं, गलती से, अपनी समझ से सिर्फ इतनी पुरानी तिथि नियत करने के बाद, जिसके विषय में मैक्समुलर का विश्वास था कि यूरोप के अड़ियल सोच के लोग इसे मानने को भी तैयार न होंगे, कहा था कि वेद का रचना काल कम से कम १२०० ख्रिष्टाब्द पूर्व से नीचे नहीं लाया जा सकता। वह बाद में लगातार सफाई देते हुए यह स्वीकार ने के कर रहे थे कि दूसरे राष्ट्रों के मामले में ऐसे ही परिवर्तनों के लिए हम जितनी अवधि रखते है, उससे यह बहुत कम है और इस तरह अपने कालनिर्धारण की आलोचना करने वालों से सहमति जताते हुए मैक्समूलर स्वयं अपने काल निर्धारण को गलत ठहराते रहे। फिर भी आक्रमण के पक्षधर उनके उस काल निर्धारण को अकाट्य मान उसे क्यों दुहराते रहे? क्योंकि संस्कृत केअधिकारी माने जाने वाले दूसरे सभी यूरोपीय विद्वान ऋग्वेद को कम से कम २००० या ढाई हजार साल ईसापूर्व मानते रहे।

आश्चर्य है कि हमारे स्वनामधन्य मार्क्सवादी इतिहासकार भी जो प्राच्यवादी विद्वानों को अविश्वसनीय मानते थे, उनकी मखौल इसलिएउड़ाते रहे क्योंकि इनका रुख जेम्स मिल जैसे रुग्ण साम्राज्यवादियों जैसा नकारात्मक नहीं था।

पर इतना ही काफी नहीं था। मैक्समूलर १२०० ईपू की लघु काल सीमा सुझाने पर लज्जित थे, भारतीय मार्क्सवादी इसे वैज्ञानिक आकलन मान कर जरूरत पड़ने पर पांच सात सौ साल पीछे एक आक्रमण हड़प्पा का ध्वंस कराने के लिए कर सकते थे और वेदों की रचना के लिए एक दूसरा और सभ्यता के प्रसार के लिए एक तीसरा आक्रमण करा सकते थे और वैदिक ऋचाओं का रचना काल सातवीं शताब्दी तक ला सकते थे। “वह (कोसंबी) १७५०, १५००, १२००, १०००, ६०० ईसापूर्व के आर्यों, आर्य प्रभावों, संपर्कों की बात करते हैं, उसके पीछे यह ध्वनि है कि पहले आक्रमणकारी जर्मन थे, दूसरे मध्येशियाई, तीसरे लघुएशियाई, जिनसे भारत का संपर्क बाद में भी बना रहा ।” (देखें, कोसंबी कल्पना से यथार्थ तक, राजकमल, पृ. २११; साथ ही देखें ‘भगवतशरण उपाध्याय’, प्राचीन भारत के इतिहासकार, सस्ता साहित्य मंडल, पृ. १०२)।इतिहास से लेकर वर्तमान तक की इतनी अधकचरी समझ अन्यत्र ढूंढ़े नहीं मिलेगी जैसी भारतीय कम्युनिस्टों और संघियों में मिलती है। अंतर केवल यह कि पहले नासमझी को वैज्ञानिक सोच कहते हैं, दूसरे उसे भारतीय संस्कृति कहते हैं। एक अन्य अन्तर यह कि कम्युनिस्टों को सेकुलरिज्म की आड़ में हुड़दंग मचाने का जितना अवसर मिला वह दूसरे को नसीब नहीं हुआ, पर जब भी जितना भी मिला है इन्होंने यह बोध कराने में संकोच नहीं किया है कि ये हर क्षेत्र में उन्हें पछाड़ सकते हैं, सिवाय वाग्मिता के।

विषय से हट कर यह तुलना इसलिए जरूरी प्रतीत हुई कि जब मैं भारतीय कम्युनिस्टों और सेकुलरिस्टों की नासमझी को उजागर करता हूं तो संघ से जुड़े मेरे मित्रों को यह बदगुमानी न हो जाय कि भारतीय समाज और इतिहास के नाम पर उनके मौलिक उद्गारों का मैं समर्थन करता हूं। किसी अन्य का गलत होना आपके सही होने का प्रमाण नहीं। सही होने के लिए किसी भी विचार या निष्कर्ष को सभी उपलब्ध स्रोतों से परखना और उसकी अन्त:संगति और संभाव्यता या औचित्य परखते हुए आश्वस्त होना पड़ता है और फिर भी किसी नए घटक के सामने आने या छूट गए घटक के उजागर होने पर गलत सिद्ध होने के लिए तैयार रहना होता है। यही विशेषता विज्ञान को विज्ञान बनाती है और इसका अभाव मिथक और विश्वास को मिथक और विश्वास।

हमने जिस बात पर बल देने के लिए यह भूमिका बांधी थी वह यह कि (१) वैदिक साहित्य का गहन अध्ययन करने वालों ने ऋग्वेद को कम से कम दो से ढाई हजार साल पुराना माना था। (२) ऋग्वेद के अनुवादक एच एच विल्सन ने वैदिक अन्त:साक्ष्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला था कि वैदिक समाज लगभग वैसा ही था जैसा यूनानियों ने सिकन्दर के आक्रमण के समय में भारत को पाया था।

(३) उससे भी पहले भाषा, संस्कृति, विज्ञान, दर्शन और देवशास्त्र की साझी विरासत के आधार पर जनक समाज सभ्य और उन्नत सिद्ध हो रहा था।

(४) आक्रमण की संभावनाओं पर विचार करते हुए पश्चिमी विद्वानों ने भी प्रदर्शनीय वस्तुपरकता दिखाते हुए कहा था कि ऋग्वेद जो ऐसे मामले में हमारा एकमात्र स्रोत है उससे किसी आक्रमण की पुष्टि नहीं होती।

(५) चरवाही संस्कृति की विशेषता है कि वे किसी एक जानवर का पालन करते हैं। हाल यह कि भेड़ चराने वाले के रेवड़ मे बकरी, या इसके विपरीत नहीं होता। गोरू चराने वाले घोड़ों के जत्थे नहीं पाल सकते इसलिए किसी समाज में इनका और साथ ही दूसरे जानवरों का बाहुल्य पशुधन के मामले में समृद्धि का द्योतक तो है पर यह समाज कृषि, उद्योग और वाणिज्य में उन्नत हो सकता है।

(६) जिस घोड़े पर सवार आक्रामकों की श्रेष्ठता को विजय का आधार बनाया गया था, वह असंभव था, क्योंकि पांचवी शताब्दी ईपू से पहले घोड़े की पीठ पर सवारी नहीं की जाती थी और ऋग्वेद में भी केवल रथों पर सवारी का जिक्र है घोड़े की पीठ पर सवारी का नहीं।

इस तरह की अनगिनत सुसंगत बातें थीं जिनको देखते हुए हड़प्पा सभ्यता का पता चलते ही, बिना किसी विवाद के इसे वैदिक सभ्यता मान लिया जाना चाहिए था। किया ठीक इससे उल्टा गया। ऐसा करने का कारण और परिणाम क्या था, इस पर कल चर्चा करेंगे।

Post – 2018-01-29

आप जानते हैं, गलती से, अपनी समझ से सिर्फ इतनी पुरानी तिथि नियत करने के बाद, जिसके विषय में मैक्समुलर का विश्वास था कि यूरोप के अड़ियल सोच के लोग इसे मानने को भी तैयार न होंगे, कहा था कि वेद का रचना काल कम से कम १२०० ख्रिष्टाब्द पूर्व से नीचे नहीं लाया जा सकता। वह बाद में लगातार सफाई देते हुए यह स्वीकार ने के कर रहे थे कि दूसरे राष्ट्रों के मामले में ऐसे ही परिवर्तनों के लिए हम जितनी अवधि रखते है, उससे यह बहुत कम है और इस तरह अपने कालनिर्धारण की आलोचना करने वालों से सहमति जताते हुए मैक्समूलर स्वयं अपने काल निर्धारण को गलत ठहराते रहे। फिर भी आक्रमण के पक्षधर उनके उस काल निर्धारण को अकाट्य मान उसे क्यों दुहराते रहे? क्योंकि संस्कृत केअधिकारी माने जाने वाले दूसरे सभी यूरोपीय विद्वान ऋग्वेद को कम से कम २००० या ढाई हजार साल ईसापूर्व मानते रहे।

आश्चर्य है कि हमारे स्वनामधन्य मार्क्सवादी इतिहासकार भी जो प्राच्यवादी विद्वानों को अविश्वसनीय मानते थे, उनकी मखौल इसलिएउड़ाते रहे क्योंकि इनका रुख जेम्स मिल जैसे रुग्ण साम्राज्यवादियों जैसा नकारात्मक नहीं था।

पर इतना ही काफी नहीं था। मैक्समूलर १२०० ईपू की लघु काल सीमा सुझाने पर लज्जित थे, भारतीय मार्क्सवादी इसे वैज्ञानिक आकलन मान कर जरूरत पड़ने पर पांच सात सौ साल पीछे एक आक्रमण हड़प्पा का ध्वंस कराने के लिए कर सकते थे और वेदों की रचना के लिए एक दूसरा और सभ्यता के प्रसार के लिए एक तीसरा आक्रमण करा सकते थे और वैदिक ऋचाओं का रचना काल सातवीं शताब्दी तक ला सकते थे। “वह (कोसंबी) १७५०, १५००, १२००, १०००, ६०० ईसापूर्व के आर्यों, आर्य प्रभावों, संपर्कों की बात करते हैं, उसके पीछे यह ध्वनि है कि पहले आक्रमणकारी जर्मन थे, दूसरे मध्येशियाई, तीसरे लघुएशियाई, जिनसे भारत का संपर्क बाद में भी बना रहा ।” (देखें, कोसंबी कल्पना से यथार्थ तक, राजकमल, पृ. २११; साथ ही देखें ‘भगवतशरण उपाध्याय’, प्राचीन भारत के इतिहासकार, सस्ता साहित्य मंडल, पृ. १०२)।इतिहास से लेकर वर्तमान तक की इतनी अधकचरी समझ अन्यत्र ढूंढ़े नहीं मिलेगी जैसी भारतीय कम्युनिस्टों और संघियों में मिलती है। अंतर केवल यह कि पहले नासमझी को वैज्ञानिक सोच कहते हैं, दूसरे उसे भारतीय संस्कृति कहते हैं। एक अन्य अन्तर यह कि कम्युनिस्टों को सेकुलरिज्म की आड़ में हुड़दंग मचाने का जितना अवसर मिला वह दूसरे को नसीब नहीं हुआ, पर जब भी जितना भी मिला है इन्होंने यह बोध कराने में संकोच नहीं किया है कि ये हर क्षेत्र में उन्हें पछाड़ सकते हैं, सिवाय वाग्मिता के।

विषय से हट कर यह तुलना इसलिए जरूरी प्रतीत हुई कि जब मैं भारतीय कम्युनिस्टों और सेकुलरिस्टों की नासमझी को उजागर करता हूं तो संघ से जुड़े मेरे मित्रों को यह बदगुमानी न हो जाय कि भारतीय समाज और इतिहास के नाम पर उनके मौलिक उद्गारों का मैं समर्थन करता हूं। किसी अन्य का गलत होना आपके सही होने का प्रमाण नहीं। सही होने के लिए किसी भी विचार या निष्कर्ष को सभी उपलब्ध स्रोतों से परखना और उसकी अन्त:संगति और संभाव्यता या औचित्य परखते हुए आश्वस्त होना पड़ता है और फिर भी किसी नए घटक के सामने आने या छूट गए घटक के उजागर होने पर गलत सिद्ध होने के लिए तैयार रहना होता है। यही विशेषता विज्ञान को विज्ञान बनाती है और इसका अभाव मिथक और विश्वास को मिथक और विश्वास।

हमने जिस बात पर बल देने के लिए यह भूमिका बांधी थी वह यह कि (१) वैदिक साहित्य का गहन अध्ययन करने वालों ने ऋग्वेद को कम से कम दो से ढाई हजार साल पुराना माना था। (२) ऋग्वेद के अनुवादक एच एच विल्सन ने वैदिक अन्त:साक्ष्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला था कि वैदिक समाज लगभग वैसा ही था जैसा यूनानियों ने सिकन्दर के आक्रमण के समय में भारत को पाया था।

(३) उससे भी पहले भाषा, संस्कृति, विज्ञान, दर्शन और देवशास्त्र की साझी विरासत के आधार पर जनक समाज सभ्य और उन्नत सिद्ध हो रहा था।

(४) आक्रमण की संभावनाओं पर विचार करते हुए पश्चिमी विद्वानों ने भी प्रदर्शनीय वस्तुपरकता दिखाते हुए कहा था कि ऋग्वेद जो ऐसे मामले में हमारा एकमात्र स्रोत है उससे किसी आक्रमण की पुष्टि नहीं होती।

(५) चरवाही संस्कृति की विशेषता है कि वे किसी एक जानवर का पालन करते हैं। हाल यह कि भेड़ चराने वाले के रेवड़ मे बकरी, या इसके विपरीत नहीं होता। गोरू चराने वाले घोड़ों के जत्थे नहीं पाल सकते इसलिए किसी समाज में इनका और साथ ही दूसरे जानवरों का बाहुल्य पशुधन के मामले में समृद्धि का द्योतक तो है पर यह समाज कृषि, उद्योग और वाणिज्य में उन्नत हो सकता है।

(६) जिस घोड़े पर सवार आक्रामकों की श्रेष्ठता को विजय का आधार बनाया गया था, वह असंभव था, क्योंकि पांचवी शताब्दी ईपू से पहले घोड़े की पीठ पर सवारी नहीं की जाती थी और ऋग्वेद में भी केवल रथों पर सवारी का जिक्र है घोड़े की पीठ पर सवारी का नहीं।

इस तरह की अनगिनत सुसंगत बातें थीं जिनको देखते हुए हड़प्पा सभ्यता का पता चलते ही, बिना किसी विवाद के इसे वैदिक सभ्यता मान लिया जाना चाहिए था। किया ठीक इससे उल्टा गया। ऐसा करने का कारण और परिणाम क्या था, इस पर कल चर्चा करेंगे।

Post – 2018-01-28

मैक्समुलर का काल निर्धारण और हड़प्पा सभ्यता

हड़प्पा सभ्यता का पता चलने के बाद वे सभी अपेक्षाएं पूरी हो जाती थी जिनकी कल्पना या अनुमान जोंस ने एक पूर्ववर्ती भाषा, संस्कृति और ‘सभ्यता’ की साझी विरासत के रूप में किया था। लेकिन जिन जरूरतों से आक्रमण का ताना बाना रचा गया था उनकी राह में यही सबसे बड़ी चुनौती थी। मैं इसे कुछ स्पष्ट करना चाहूंगा:
ऋग्वेद का काल निर्धारण करते हुए मैक्समुलर ने एक यांत्रिक तरीका अपनाया था। इसमें उनका कहना था कि प्रत्येक चरण में आए परिवर्तन में कम से कम इतना समय तो लगा ही होगा। वह उन लोगों का विरोध कर रहे थे जो डूगल्ड स्टीवर्ट के प्रभाव में ऋग्वेद के लिए बहुत कम प्राचीनता की जिद पर अड़े थे। उनका वश चलता तो वह वेद को सर्वाधिक पिछड़ा धर्म सिद्ध करने के लिए किसी अन्य अध्येता द्वारा सुझाई गई प्राचीनता से भी प्राचीन कृति मानने को तैयार थे । उनका लिखा संस्कृत साहित्य का इतिहास ब्राह्मणों के साहित्य की आदिमता दिखाने तक सीमित था। वेद को वह मानव सभ्यता के शैशव की कृति मानते ही थे, और इसकी अनेक ऋचाओं को चाइल्डिश टु दि इक्स्ट्रीम भी मानते थे। १८९२ में ऋग्वेद संहिता (चौखंभा, १९६६) के प्राक्कथन में वह स्वीकार करते हैं:
To assign any definite date to the first and or the last Rishis is clearly impossible; yet looking at the numerous relics of that early age, I ventured to suggest 200 years as a minimum which few , acquainted with the early history of mankind could consider extravagant. I thus arrived at about 1200 B.C. as the latest date at which we may suggest the Vedic bards settled in northern regions of the Indian continent. I pointed out repeatedly, that beyond the frontiers of the Sutra period 600-200 B.C. our chronological measurement must necessarily be of merely a hypothetical charrector, yet I felt convinced that those who from an intimate acquaintance with the Vedic literature are most competent to form an opinion as to the time required for the growth, the maturity and its decay, would allow that the minimum duration assigned by me to the Brahmanas, mantra and Chandas period were below, rather than average duration of similar periods ln the intellectual history of other nations. ix

वह फिर दुहराते हैं,
While Prof. Wilson and Barthelemy, Saint Hillare, Prof. Whitney too, the learned editor of the Atharv Ved and Surya Siddhnt, has expressed the conviction that the chronological limits assigned by me to the four periods of Vedic literature are too narrow rather than too wide. xii

और Physical religion, 1890′ p. 14 पर पुन:
Whether the vedic hymns were composed 1000, or 1500, or 2000, or 3000 years B.C. or earlier no power on earth will ever determine.

हड़प्पा सभ्यता को अवैदिक सिद्ध करने के लिए जिस एक मात्र कुतर्क का सहारा लिया जाता रहा है वह रहा है मैक्समूलर का काल निर्धारण पर क्या वह स्वयं किसी ऐसी सीमा को मानते
थे जो इनकी अभिन्नता में बाधक बन सके?

Post – 2018-01-28

मैक्समुलर का काल निर्धारण और हड़प्पा सभ्यता

हड़प्पा सभ्यता का पता चलने के बाद वे सभी अपेक्षाएं पूरी हो जाती थी जिनकी कल्पना या अनुमान जोंस ने एक पूर्ववर्ती भाषा, संस्कृति और ‘सभ्यता’ की साझी विरासत के रूप में किया था। लेकिन जिन जरूरतों से आक्रमण का ताना बाना रचा गया था उनकी राह में यही सबसे बड़ी चुनौती थी। मैं इसे कुछ स्पष्ट करना चाहूंगा:
ऋग्वेद का काल निर्धारण करते हुए मैक्समुलर ने एक यांत्रिक तरीका अपनाया था। इसमें उनका कहना था कि प्रत्येक चरण में आए परिवर्तन में कम से कम इतना समय तो लगा ही होगा। वह उन लोगों का विरोध कर रहे थे जो डूगल्ड स्टीवर्ट के प्रभाव में ऋग्वेद के लिए बहुत कम प्राचीनता की जिद पर अड़े थे। उनका वश चलता तो वह वेद को सर्वाधिक पिछड़ा धर्म सिद्ध करने के लिए किसी अन्य अध्येता द्वारा सुझाई गई प्राचीनता से भी प्राचीन कृति मानने को तैयार थे । उनका लिखा संस्कृत साहित्य का इतिहास ब्राह्मणों के साहित्य की आदिमता दिखाने तक सीमित था। वेद को वह मानव सभ्यता के शैशव की कृति मानते ही थे, और इसकी अनेक ऋचाओं को चाइल्डिश टु दि इक्स्ट्रीम भी मानते थे। १८९२ में ऋग्वेद संहिता (चौखंभा, १९६६) के प्राक्कथन में वह स्वीकार करते हैं:
To assign any definite date to the first and or the last Rishis is clearly impossible; yet looking at the numerous relics of that early age, I ventured to suggest 200 years as a minimum which few , acquainted with the early history of mankind could consider extravagant. I thus arrived at about 1200 B.C. as the latest date at which we may suggest the Vedic bards settled in northern regions of the Indian continent. I pointed out repeatedly, that beyond the frontiers of the Sutra period 600-200 B.C. our chronological measurement must necessarily be of merely a hypothetical charrector, yet I felt convinced that those who from an intimate acquaintance with the Vedic literature are most competent to form an opinion as to the time required for the growth, the maturity and its decay, would allow that the minimum duration assigned by me to the Brahmanas, mantra and Chandas period were below, rather than average duration of similar periods ln the intellectual history of other nations. ix

वह फिर दुहराते हैं,
While Prof. Wilson and Barthelemy, Saint Hillare, Prof. Whitney too, the learned editor of the Atharv Ved and Surya Siddhnt, has expressed the conviction that the chronological limits assigned by me to the four periods of Vedic literature are too narrow rather than too wide. xii

और Physical religion, 1890′ p. 14 पर पुन:
Whether the vedic hymns were composed 1000, or 1500, or 2000, or 3000 years B.C. or earlier no power on earth will ever determine.

हड़प्पा सभ्यता को अवैदिक सिद्ध करने के लिए जिस एक मात्र कुतर्क का सहारा लिया जाता रहा है वह रहा है मैक्समूलर का काल निर्धारण पर क्या वह स्वयं किसी ऐसी सीमा को मानते
थे जो इनकी अभिन्नता में बाधक बन सके?

Post – 2018-01-28

मैक्समुलर का काल निर्धारण और हड़प्पा सभ्यता

हड़प्पा सभ्यता का पता चलने के बाद वे सभी अपेक्षाएं पूरी हो जाती थी जिनकी कल्पना या अनुमान जोंस ने एक पूर्ववर्ती भाषा, संस्कृति और ‘सभ्यता’ की साझी विरासत के रूप में किया था। लेकिन जिन जरूरतों से आक्रमण का ताना बाना रचा गया था उनकी राह में यही सबसे बड़ी चुनौती थी। मैं इसे कुछ स्पष्ट करना चाहूंगा:
ऋग्वेद का काल निर्धारण करते हुए मैक्समुलर ने एक यांत्रिक तरीका अपनाया था। इसमें उनका कहना था कि प्रत्येक चरण में आए परिवर्तन में कम से कम इतना समय तो लगा ही होगा। वह उन लोगों का विरोध कर रहे थे जो डूगल्ड स्टीवर्ट के प्रभाव में ऋग्वेद के लिए बहुत कम प्राचीनता की जिद पर अड़े थे। उनका वश चलता तो वह वेद को सर्वाधिक पिछड़ा धर्म सिद्ध करने के लिए किसी अन्य अध्येता द्वारा सुझाई गई प्राचीनता से भी प्राचीन कृति मानने को तैयार थे । उनका लिखा संस्कृत साहित्य का इतिहास ब्राह्मणों के साहित्य की आदिमता दिखाने तक सीमित था। वेद को वह मानव सभ्यता के शैशव की कृति मानते ही थे, और इसकी अनेक ऋचाओं को चाइल्डिश टु दि इक्स्ट्रीम भी मानते थे। १८९२ में ऋग्वेद संहिता (चौखंभा, १९६६) के प्राक्कथन में वह स्वीकार करते हैं:
To assign any definite date to the first and or the last Rishis is clearly impossible; yet looking at the numerous relics of that early age, I ventured to suggest 200 years as a minimum which few , acquainted with the early history of mankind could consider extravagant. I thus arrived at about 1200 B.C. as the latest date at which we may suggest the Vedic bards settled in northern regions of the Indian continent. I pointed out repeatedly, that beyond the frontiers of the Sutra period 600-200 B.C. our chronological measurement must necessarily be of merely a hypothetical charrector, yet I felt convinced that those who from an intimate acquaintance with the Vedic literature are most competent to form an opinion as to the time required for the growth, the maturity and its decay, would allow that the minimum duration assigned by me to the Brahmanas, mantra and Chandas period were below, rather than average duration of similar periods ln the intellectual history of other nations. ix

वह फिर दुहराते हैं,
While Prof. Wilson and Barthelemy, Saint Hillare, Prof. Whitney too, the learned editor of the Atharv Ved and Surya Siddhnt, has expressed the conviction that the chronological limits assigned by me to the four periods of Vedic literature are too narrow rather than too wide. xii

और Physical religion, 1890′ p. 14 पर पुन:
Whether the vedic hymns were composed 1000, or 1500, or 2000, or 3000 years B.C. or earlier no power on earth will ever determine.

हड़प्पा सभ्यता को अवैदिक सिद्ध करने के लिए जिस एक मात्र कुतर्क का सहारा लिया जाता रहा है वह रहा है मैक्समूलर का काल निर्धारण पर क्या वह स्वयं किसी ऐसी सीमा को मानते
थे जो इनकी अभिन्नता में बाधक बन सके?

Post – 2018-01-27

ब्राहणों के भारत पर क्षत्रियों का आक्रमण

मजाक की हद है पर समझदारी की कोई हद नहीं। समझदार लोग अपनी अक्ल पर अधिक भरोसा करने के कारण ऐसी विचित्र बातों को इतिहास या वर्तमान की सचाई बना और अपनी समझ पर भरोसा करने वालों को जिस तरह उनका कायल बना देते हैं उसकी तुलना केवल स्वप्नशृंखला से ही की जा सकती है। परंतु इसके लिए इतिहासकार का भारतीय मार्क्सवादी होना जरूरी है। कारण मार्क्सवाद एक वैज्ञानिक दर्शन है और इसके भारतीय संस्करण में जो जी आए देखा जा सकता है, जैसे जी आए इतिहास को गढ़ा जा सकता है, क्योंकि इतिहास का एक ही उपयोग है, उसको हथियार बना कर वर्तमान को बदलना।

हमने तुलनात्मक भाषाविज्ञान के जनक विलियम जोंस के ब्राह्मण घुसपैठियों की अनोखी सूझ पहले देख रखी है। अब भारतीय मार्क्सवादी इतिहास के जनक दामोदर धर्मान्द कोसंबी की सूझ से ब्राह्मण तो हड़प्पा सभ्यता के पुजारी थे, वे भारत में पहले से मौजूद थे। आक्रमणकारी आर्य क्षत्रिय थे। संस्कृत भाषा ब्राह्मणों की नहीं, क्षत्रियों की भाषा थी।

आपको हैरानी हो रही है? हैरान होने की जरूरत नहीं, यह याद रखने की जरूरत है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है। जोंस को अधिक से अधिक खाली पड़े या नाममात्र को आबाद भारतीय भूभाग में संस्कृत भाषी ब्राह्मणों को स्थानान्तरित करना था। कोसंबी को आर्यों से मोहेंजोदड़ो का नरसंहार कराना था। पूरी हड़प्पा सभ्यता का विनाश कराना था। विनाश भी कुछ इस तरह कोई बचने न पाए।

आप को शंका हो रही होगी कि फिर हड़प्पा के ये चालाक पुरोहित कैसे बच गए? इतनी पेचीदा बात भारतीय मार्क्सवादियों को छोड़ कर किसी दूसरे की समझ में नहीं आएगी, इसलिए समझा दें कि जब ढोर डंगर चराने वाले क्षत्रिय आर्यों का आक्रमण हुआ तो वे भाग कर जंगलों में छिप गए। जब कुछ समय बीत गया तो वे जँगलों से बाहर आए और क्षत्रिय आर्यों को अपने तंत्र-मंत्र और और कर्मकांड की जादुई शक्ति का विश्वास दिला कर उनके पुरोधा बन गए। लेकिन इन क्षत्रियों ने उस सभ्यता का विनाश किया था जिसके ये पुरोहित हो कर पुष्करणियों में नग्न स्नान करने वाली भक्तिनों से रतिलीला किया करते थे, इसलिए इनसे उनके मन में इतनी खुन्नस थी कि वे इन को मिटा कर रख देना चाहते थे। सच कहें तो उनसे बदला लेने के लिए ही वे जंगलों से बाहर आए थे।

कोसंबी ने अपने ये विचार वैज्ञानिक जाच पड़ताल के बाद प्रकट किए थे। उन्होंने इसके लिए ब्राह्मणों के रूप रंग और मुखाकृति का अध्ययन किया था, उनके गोत्र नामों पर खोज की थी (On the origin of Brahman Gotras), जिन दृष्टियों से आटविक जनों से उनमें काफी समानताएं थीं, साथ ही उनकी आर्थिक दुर्दशा पर ध्यान दिया था। क्षत्रियों से उनकी शत्रुता का प्रमाण देखना हो तो विश्वामित्र और वसिष्ठ की शत्रुता पर ध्यान दें। इस बात पर ध्यान दें कि ब्राह्मणों के यज्ञ और कर्मकांड और वेद के विरुद्ध क्षत्रियों ने जैनमत और बौद्ध धर्म के द्वारा विद्रोह जारी रखा।

पर फिर भी कुछ बातें आप की समझ में नहीं आई होंगी। मिसाल के लिए यह समझ में न आया होगा कि जब क्षत्रिय आर्य चरवाहे थे और उस प्राचीन चरण पर परती पड़ी भूमि प्रचुर थी तो उनको हड़प्पा के नगरों पर आक्रमण करने की क्या जरूरत थी। दोनें के हितों में कोई टकराव तो था ही नहीं। क्या हड़प्पा के नगरों में अधिक घास पैदा होती थी?

या कुछ और पीछे लौटें और उनके एक साथ गोपालक और अशवारोही होने पर ध्यान दें तो यह समझने में कुछ कठिनाई होगी कि वे घोड़े पर चढ़ कर गोरू चराते थे, या गोरू चरा लेने के बाद घुड़सवारी करते थे। ऐसे एक दो नहीं दसियों सवाल हैं जिनको छोड़ा जा सकता है। पर एक सवाल आपके मन में जरूर पैदा हुआ होगा कि जब ब्राह्मण हड़प्पा सभ्यता के पुजारी थे तो उन नगरों पर हमला ब्राह्मणों पर हमला कैसे हो गया? सच यह है कि नगर बसाने वाले व्यापारी तो कहीं और से आए थे, देश के असली मालिक ये पुजारी ही थे और सुमेरिया के पुजारी शासकों की तरह जनता से चढ़ौती वसूल करते थे।

लेकिन इससे भी कठिन एक अन्य सवाल। जब आक्रमणकारी क्षत्रिय थे, वही संस्कृत बोलते थे तो, यह कमाल कैसे हो गया कि उनकी भाषा ब्राहमणों ने ले ली और क्षत्रिय आर्य अपनी भाषा से ही हाथ धो बैठे। इसे समझने के लिए आपको डूगल्ड स्टीवर्ट का सुमिरन करना पड़ेगा जिसने उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में यह दावा किया था कि भारत के धूर्त ब्राहमणों ने सिकन्दर के आक्रमण के बाद यूनानियों के संपर्क में आने के बाद ग्रीक की नकल पर जालसाजी से संस्कृत भाषा गढ़ ली। धूर्त ब्राह्मण क्या नहीं कर सकते! फिर भी जवाब अधूरा ही रह जाएगा, क्योंकि इससे यह बात तो आप की समझ में आ जाएगी कि हड़प्पा सभ्यता के पुजारियों ने संस्कृत कैसे सीखी, पर यह समझ में नहीं आएगा कि उनके संस्कृत सीखते ही असल आर्य क्षत्रियों को अपनी भाषा भूल कैसे गई। इतने दूर की तो स्टीवर्ट ने भी न सोची थी।

मुसीबत एक और है। ऋग्वेद में एक स्थल पर नार्मणी पुर का उल्लेख आया है। नार्मणी पुर का शाब्दिक अर्थ हुआ समृद्ध नगर। कोसंबी ने पहचान लिया कि यह उस नगर का नाम है जिसे हम मोहेंदोदड़ो कहते हैं। वहां नरसंहार हुआ था इसे ह्वीलर के कहने के बाद कोसंबी सहित सभी मार्क्सवादी मानते आए हैं। मुश्किल यह कि यह नाम संस्कृत का है। यदि इसका यही नाम था तब तो यह आर्यों का नगर हुआ। ऐसी ही मुसीबत हरियूपीया के साथ देखने में आती है जिसका शासक चयमान था और जिस पर वरशिख के पुत्र वृचीवान ने हमला किया था। हरियूपीया को कुछ लोगों ने हड़प्पा का असल नाम मान लिया था। हरियूपीया संस्कृत नाम। उसका राजा चयमान संस्कृत नाम, वरशिख संस्कृत नाम, वृचीवान संस्कृत नाम। ये बातें कोसंबी की निगाह में आई थी, इनको लेकर वह चकराये भी थे, पर आवश्यकता आविष्कार की जननी ही नहीं है, आवश्यकता, ‘छोड़ो यार, इससे क्या होता है?’ की भी जननी है। आक्रमण की आवश्यकता गोरों को किसी अन्य कारण से थी, भारतीय मार्क्सवादियों को किसी और कारण थी। यदि यह सिद्ध कर दिया जाय कि मध्य कालीन आक्रमणकारियों की तरह संस्कृत भाषी भी आक्रमणकारी के रूप में आए थे और उन्होंने भयंकर रक्तपात किए थे तो मध्यकालीन आक्रान्ताओं की बर्बरता क्षम्य हो जाएगी इसलिए यह आक्रमण वर्तमान समाज में सामाजिक सौहार्द का आधार बन जाएगा। दोनों को दरिंदा बना देने के बाद एक दूसरे को दोष नहीं दे सकेगा। इस इतिहास ने जैसा सामाजिक सद्भाव पैदा किया वह हमारे सामने है । ये मात्र बानगियां है, भारतीय मार्क्सवादी इतिहास के वंडरलैड के नजारे एलिसेज’ ऐडवेंचर्स इन टु वंडरलैंड से भी अधिक वंडरफुल हैं।

Post – 2018-01-27

ब्राहणों के भारत पर क्षत्रियों का आक्रमण

मजाक की हद है पर समझदारी की कोई हद नहीं। समझदार लोग अपनी अक्ल पर अधिक भरोसा करने के कारण ऐसी विचित्र बातों को इतिहास या वर्तमान की सचाई बना और अपनी समझ पर भरोसा करने वालों को जिस तरह उनका कायल बना देते हैं उसकी तुलना केवल स्वप्नशृंखला से ही की जा सकती है। परंतु इसके लिए इतिहासकार का भारतीय मार्क्सवादी होना जरूरी है। कारण मार्क्सवाद एक वैज्ञानिक दर्शन है और इसके भारतीय संस्करण में जो जी आए देखा जा सकता है, जैसे जी आए इतिहास को गढ़ा जा सकता है, क्योंकि इतिहास का एक ही उपयोग है, उसको हथियार बना कर वर्तमान को बदलना।

हमने तुलनात्मक भाषाविज्ञान के जनक विलियम जोंस के ब्राह्मण घुसपैठियों की अनोखी सूझ पहले देख रखी है। अब भारतीय मार्क्सवादी इतिहास के जनक दामोदर धर्मान्द कोसंबी की सूझ से ब्राह्मण तो हड़प्पा सभ्यता के पुजारी थे, वे भारत में पहले से मौजूद थे। आक्रमणकारी आर्य क्षत्रिय थे। संस्कृत भाषा ब्राह्मणों की नहीं, क्षत्रियों की भाषा थी।

आपको हैरानी हो रही है? हैरान होने की जरूरत नहीं, यह याद रखने की जरूरत है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है। जोंस को अधिक से अधिक खाली पड़े या नाममात्र को आबाद भारतीय भूभाग में संस्कृत भाषी ब्राह्मणों को स्थानान्तरित करना था। कोसंबी को आर्यों से मोहेंजोदड़ो का नरसंहार कराना था। पूरी हड़प्पा सभ्यता का विनाश कराना था। विनाश भी कुछ इस तरह कोई बचने न पाए।

आप को शंका हो रही होगी कि फिर हड़प्पा के ये चालाक पुरोहित कैसे बच गए? इतनी पेचीदा बात भारतीय मार्क्सवादियों को छोड़ कर किसी दूसरे की समझ में नहीं आएगी, इसलिए समझा दें कि जब ढोर डंगर चराने वाले क्षत्रिय आर्यों का आक्रमण हुआ तो वे भाग कर जंगलों में छिप गए। जब कुछ समय बीत गया तो वे जँगलों से बाहर आए और क्षत्रिय आर्यों को अपने तंत्र-मंत्र और और कर्मकांड की जादुई शक्ति का विश्वास दिला कर उनके पुरोधा बन गए। लेकिन इन क्षत्रियों ने उस सभ्यता का विनाश किया था जिसके ये पुरोहित हो कर पुष्करणियों में नग्न स्नान करने वाली भक्तिनों से रतिलीला किया करते थे, इसलिए इनसे उनके मन में इतनी खुन्नस थी कि वे इन को मिटा कर रख देना चाहते थे। सच कहें तो उनसे बदला लेने के लिए ही वे जंगलों से बाहर आए थे।

कोसंबी ने अपने ये विचार वैज्ञानिक जाच पड़ताल के बाद प्रकट किए थे। उन्होंने इसके लिए ब्राह्मणों के रूप रंग और मुखाकृति का अध्ययन किया था, उनके गोत्र नामों पर खोज की थी (On the origin of Brahman Gotras), जिन दृष्टियों से आटविक जनों से उनमें काफी समानताएं थीं, साथ ही उनकी आर्थिक दुर्दशा पर ध्यान दिया था। क्षत्रियों से उनकी शत्रुता का प्रमाण देखना हो तो विश्वामित्र और वसिष्ठ की शत्रुता पर ध्यान दें। इस बात पर ध्यान दें कि ब्राह्मणों के यज्ञ और कर्मकांड और वेद के विरुद्ध क्षत्रियों ने जैनमत और बौद्ध धर्म के द्वारा विद्रोह जारी रखा।

पर फिर भी कुछ बातें आप की समझ में नहीं आई होंगी। मिसाल के लिए यह समझ में न आया होगा कि जब क्षत्रिय आर्य चरवाहे थे और उस प्राचीन चरण पर परती पड़ी भूमि प्रचुर थी तो उनको हड़प्पा के नगरों पर आक्रमण करने की क्या जरूरत थी। दोनें के हितों में कोई टकराव तो था ही नहीं। क्या हड़प्पा के नगरों में अधिक घास पैदा होती थी?

या कुछ और पीछे लौटें और उनके एक साथ गोपालक और अशवारोही होने पर ध्यान दें तो यह समझने में कुछ कठिनाई होगी कि वे घोड़े पर चढ़ कर गोरू चराते थे, या गोरू चरा लेने के बाद घुड़सवारी करते थे। ऐसे एक दो नहीं दसियों सवाल हैं जिनको छोड़ा जा सकता है। पर एक सवाल आपके मन में जरूर पैदा हुआ होगा कि जब ब्राह्मण हड़प्पा सभ्यता के पुजारी थे तो उन नगरों पर हमला ब्राह्मणों पर हमला कैसे हो गया? सच यह है कि नगर बसाने वाले व्यापारी तो कहीं और से आए थे, देश के असली मालिक ये पुजारी ही थे और सुमेरिया के पुजारी शासकों की तरह जनता से चढ़ौती वसूल करते थे।

लेकिन इससे भी कठिन एक अन्य सवाल। जब आक्रमणकारी क्षत्रिय थे, वही संस्कृत बोलते थे तो, यह कमाल कैसे हो गया कि उनकी भाषा ब्राहमणों ने ले ली और क्षत्रिय आर्य अपनी भाषा से ही हाथ धो बैठे। इसे समझने के लिए आपको डूगल्ड स्टीवर्ट का सुमिरन करना पड़ेगा जिसने उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में यह दावा किया था कि भारत के धूर्त ब्राहमणों ने सिकन्दर के आक्रमण के बाद यूनानियों के संपर्क में आने के बाद ग्रीक की नकल पर जालसाजी से संस्कृत भाषा गढ़ ली। धूर्त ब्राह्मण क्या नहीं कर सकते! फिर भी जवाब अधूरा ही रह जाएगा, क्योंकि इससे यह बात तो आप की समझ में आ जाएगी कि हड़प्पा सभ्यता के पुजारियों ने संस्कृत कैसे सीखी, पर यह समझ में नहीं आएगा कि उनके संस्कृत सीखते ही असल आर्य क्षत्रियों को अपनी भाषा भूल कैसे गई। इतने दूर की तो स्टीवर्ट ने भी न सोची थी।

मुसीबत एक और है। ऋग्वेद में एक स्थल पर नार्मणी पुर का उल्लेख आया है। नार्मणी पुर का शाब्दिक अर्थ हुआ समृद्ध नगर। कोसंबी ने पहचान लिया कि यह उस नगर का नाम है जिसे हम मोहेंदोदड़ो कहते हैं। वहां नरसंहार हुआ था इसे ह्वीलर के कहने के बाद कोसंबी सहित सभी मार्क्सवादी मानते आए हैं। मुश्किल यह कि यह नाम संस्कृत का है। यदि इसका यही नाम था तब तो यह आर्यों का नगर हुआ। ऐसी ही मुसीबत हरियूपीया के साथ देखने में आती है जिसका शासक चयमान था और जिस पर वरशिख के पुत्र वृचीवान ने हमला किया था। हरियूपीया को कुछ लोगों ने हड़प्पा का असल नाम मान लिया था। हरियूपीया संस्कृत नाम। उसका राजा चयमान संस्कृत नाम, वरशिख संस्कृत नाम, वृचीवान संस्कृत नाम। ये बातें कोसंबी की निगाह में आई थी, इनको लेकर वह चकराये भी थे, पर आवश्यकता आविष्कार की जननी ही नहीं है, आवश्यकता, ‘छोड़ो यार, इससे क्या होता है?’ की भी जननी है। आक्रमण की आवश्यकता गोरों को किसी अन्य कारण से थी, भारतीय मार्क्सवादियों को किसी और कारण थी। यदि यह सिद्ध कर दिया जाय कि मध्य कालीन आक्रमणकारियों की तरह संस्कृत भाषी भी आक्रमणकारी के रूप में आए थे और उन्होंने भयंकर रक्तपात किए थे तो मध्यकालीन आक्रान्ताओं की बर्बरता क्षम्य हो जाएगी इसलिए यह आक्रमण वर्तमान समाज में सामाजिक सौहार्द का आधार बन जाएगा। दोनों को दरिंदा बना देने के बाद एक दूसरे को दोष नहीं दे सकेगा। इस इतिहास ने जैसा सामाजिक सद्भाव पैदा किया वह हमारे सामने है । ये मात्र बानगियां है, भारतीय मार्क्सवादी इतिहास के वंडरलैड के नजारे एलिसेज’ ऐडवेंचर्स इन टु वंडरलैंड से भी अधिक वंडरफुल हैं।

Post – 2018-01-27

ब्राहणों के भारत पर क्षत्रियों का आक्रमण

मजाक की हद है पर समझदारी की कोई हद नहीं। समझदार लोग अपनी अक्ल पर अधिक भरोसा करने के कारण ऐसी विचित्र बातों को इतिहास या वर्तमान की सचाई बना और अपनी समझ पर भरोसा करने वालों को जिस तरह उनका कायल बना देते हैं उसकी तुलना केवल स्वप्नशृंखला से ही की जा सकती है। परंतु इसके लिए इतिहासकार का भारतीय मार्क्सवादी होना जरूरी है। कारण मार्क्सवाद एक वैज्ञानिक दर्शन है और इसके भारतीय संस्करण में जो जी आए देखा जा सकता है, जैसे जी आए इतिहास को गढ़ा जा सकता है, क्योंकि इतिहास का एक ही उपयोग है, उसको हथियार बना कर वर्तमान को बदलना।

हमने तुलनात्मक भाषाविज्ञान के जनक विलियम जोंस के ब्राह्मण घुसपैठियों की अनोखी सूझ पहले देख रखी है। अब भारतीय मार्क्सवादी इतिहास के जनक दामोदर धर्मान्द कोसंबी की सूझ से ब्राह्मण तो हड़प्पा सभ्यता के पुजारी थे, वे भारत में पहले से मौजूद थे। आक्रमणकारी आर्य क्षत्रिय थे। संस्कृत भाषा ब्राह्मणों की नहीं, क्षत्रियों की भाषा थी।

आपको हैरानी हो रही है? हैरान होने की जरूरत नहीं, यह याद रखने की जरूरत है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है। जोंस को अधिक से अधिक खाली पड़े या नाममात्र को आबाद भारतीय भूभाग में संस्कृत भाषी ब्राह्मणों को स्थानान्तरित करना था। कोसंबी को आर्यों से मोहेंजोदड़ो का नरसंहार कराना था। पूरी हड़प्पा सभ्यता का विनाश कराना था। विनाश भी कुछ इस तरह कोई बचने न पाए।

आप को शंका हो रही होगी कि फिर हड़प्पा के ये चालाक पुरोहित कैसे बच गए? इतनी पेचीदा बात भारतीय मार्क्सवादियों को छोड़ कर किसी दूसरे की समझ में नहीं आएगी, इसलिए समझा दें कि जब ढोर डंगर चराने वाले क्षत्रिय आर्यों का आक्रमण हुआ तो वे भाग कर जंगलों में छिप गए। जब कुछ समय बीत गया तो वे जँगलों से बाहर आए और क्षत्रिय आर्यों को अपने तंत्र-मंत्र और और कर्मकांड की जादुई शक्ति का विश्वास दिला कर उनके पुरोधा बन गए। लेकिन इन क्षत्रियों ने उस सभ्यता का विनाश किया था जिसके ये पुरोहित हो कर पुष्करणियों में नग्न स्नान करने वाली भक्तिनों से रतिलीला किया करते थे, इसलिए इनसे उनके मन में इतनी खुन्नस थी कि वे इन को मिटा कर रख देना चाहते थे। सच कहें तो उनसे बदला लेने के लिए ही वे जंगलों से बाहर आए थे।

कोसंबी ने अपने ये विचार वैज्ञानिक जाच पड़ताल के बाद प्रकट किए थे। उन्होंने इसके लिए ब्राह्मणों के रूप रंग और मुखाकृति का अध्ययन किया था, उनके गोत्र नामों पर खोज की थी (On the origin of Brahman Gotras), जिन दृष्टियों से आटविक जनों से उनमें काफी समानताएं थीं, साथ ही उनकी आर्थिक दुर्दशा पर ध्यान दिया था। क्षत्रियों से उनकी शत्रुता का प्रमाण देखना हो तो विश्वामित्र और वसिष्ठ की शत्रुता पर ध्यान दें। इस बात पर ध्यान दें कि ब्राह्मणों के यज्ञ और कर्मकांड और वेद के विरुद्ध क्षत्रियों ने जैनमत और बौद्ध धर्म के द्वारा विद्रोह जारी रखा।

पर फिर भी कुछ बातें आप की समझ में नहीं आई होंगी। मिसाल के लिए यह समझ में न आया होगा कि जब क्षत्रिय आर्य चरवाहे थे और उस प्राचीन चरण पर परती पड़ी भूमि प्रचुर थी तो उनको हड़प्पा के नगरों पर आक्रमण करने की क्या जरूरत थी। दोनें के हितों में कोई टकराव तो था ही नहीं। क्या हड़प्पा के नगरों में अधिक घास पैदा होती थी?

या कुछ और पीछे लौटें और उनके एक साथ गोपालक और अशवारोही होने पर ध्यान दें तो यह समझने में कुछ कठिनाई होगी कि वे घोड़े पर चढ़ कर गोरू चराते थे, या गोरू चरा लेने के बाद घुड़सवारी करते थे। ऐसे एक दो नहीं दसियों सवाल हैं जिनको छोड़ा जा सकता है। पर एक सवाल आपके मन में जरूर पैदा हुआ होगा कि जब ब्राह्मण हड़प्पा सभ्यता के पुजारी थे तो उन नगरों पर हमला ब्राह्मणों पर हमला कैसे हो गया? सच यह है कि नगर बसाने वाले व्यापारी तो कहीं और से आए थे, देश के असली मालिक ये पुजारी ही थे और सुमेरिया के पुजारी शासकों की तरह जनता से चढ़ौती वसूल करते थे।

लेकिन इससे भी कठिन एक अन्य सवाल। जब आक्रमणकारी क्षत्रिय थे, वही संस्कृत बोलते थे तो, यह कमाल कैसे हो गया कि उनकी भाषा ब्राहमणों ने ले ली और क्षत्रिय आर्य अपनी भाषा से ही हाथ धो बैठे। इसे समझने के लिए आपको डूगल्ड स्टीवर्ट का सुमिरन करना पड़ेगा जिसने उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में यह दावा किया था कि भारत के धूर्त ब्राहमणों ने सिकन्दर के आक्रमण के बाद यूनानियों के संपर्क में आने के बाद ग्रीक की नकल पर जालसाजी से संस्कृत भाषा गढ़ ली। धूर्त ब्राह्मण क्या नहीं कर सकते! फिर भी जवाब अधूरा ही रह जाएगा, क्योंकि इससे यह बात तो आप की समझ में आ जाएगी कि हड़प्पा सभ्यता के पुजारियों ने संस्कृत कैसे सीखी, पर यह समझ में नहीं आएगा कि उनके संस्कृत सीखते ही असल आर्य क्षत्रियों को अपनी भाषा भूल कैसे गई। इतने दूर की तो स्टीवर्ट ने भी न सोची थी।

मुसीबत एक और है। ऋग्वेद में एक स्थल पर नार्मणी पुर का उल्लेख आया है। नार्मणी पुर का शाब्दिक अर्थ हुआ समृद्ध नगर। कोसंबी ने पहचान लिया कि यह उस नगर का नाम है जिसे हम मोहेंदोदड़ो कहते हैं। वहां नरसंहार हुआ था इसे ह्वीलर के कहने के बाद कोसंबी सहित सभी मार्क्सवादी मानते आए हैं। मुश्किल यह कि यह नाम संस्कृत का है। यदि इसका यही नाम था तब तो यह आर्यों का नगर हुआ। ऐसी ही मुसीबत हरियूपीया के साथ देखने में आती है जिसका शासक चयमान था और जिस पर वरशिख के पुत्र वृचीवान ने हमला किया था। हरियूपीया को कुछ लोगों ने हड़प्पा का असल नाम मान लिया था। हरियूपीया संस्कृत नाम। उसका राजा चयमान संस्कृत नाम, वरशिख संस्कृत नाम, वृचीवान संस्कृत नाम। ये बातें कोसंबी की निगाह में आई थी, इनको लेकर वह चकराये भी थे, पर आवश्यकता आविष्कार की जननी ही नहीं है, आवश्यकता, ‘छोड़ो यार, इससे क्या होता है?’ की भी जननी है। आक्रमण की आवश्यकता गोरों को किसी अन्य कारण से थी, भारतीय मार्क्सवादियों को किसी और कारण थी। यदि यह सिद्ध कर दिया जाय कि मध्य कालीन आक्रमणकारियों की तरह संस्कृत भाषी भी आक्रमणकारी के रूप में आए थे और उन्होंने भयंकर रक्तपात किए थे तो मध्यकालीन आक्रान्ताओं की बर्बरता क्षम्य हो जाएगी इसलिए यह आक्रमण वर्तमान समाज में सामाजिक सौहार्द का आधार बन जाएगा। दोनों को दरिंदा बना देने के बाद एक दूसरे को दोष नहीं दे सकेगा। इस इतिहास ने जैसा सामाजिक सद्भाव पैदा किया वह हमारे सामने है । ये मात्र बानगियां है, भारतीय मार्क्सवादी इतिहास के वंडरलैड के नजारे एलिसेज’ ऐडवेंचर्स इन टु वंडरलैंड से भी अधिक वंडरफुल हैं।

Post – 2018-01-26

भारोपीय का मिथक

मिथक सचाई का भ्रम खड़ा करके धूर्तों द्वारा अपनी मनमानी के लिए गढ़ा गया ऐसा हथियार है जिसे खंडित कर दिया जाय तो भी वे आसानी से हार नहीं मानते। वे उसके खंडित टुकड़ों को भी हथियार बना कर तब तब तक लड़ते रहते हैं, जब तक वे टुकड़े भी टूटते टूटते रेत में नहीं बदल जाते । इसके बाद, उनकी एक ही गति बची रहती है, अपने ही हथियार के चूरे के नीचे दफन हो जाना।

आर्यों की, उनके आक्रमण की कहानियां दुहराने वालों के साथ कुछ ऐसा ही है। यह मिथक से अधिक तिलिस्म था। यह तिलिस्म केवल उनको सच लगता था जो पश्चिमी शिक्षाप्राप्त थे। अशिक्षतों और अल्पशिक्षितों के अपने पौराणक तिलिस्म थे, जिनके पाये अधिक मजबूत थे और जिसमें वे अधिक सुरक्षित अनुभव करते थे। यह समझना मुश्किल नहीं है कि कहने को उन्नत और उच्च शिक्षा-प्राप्त लोगों को ही आर्य और अनार्य के कच्चे रेत-गारे से तैयार किये गए इस तिलिस्म ने इतना आत्ममुग्ध कर दिया कि वे इसे चिनाई के हर कदम पर डांवाडोल देख कर भी इसके इन्द्रजाल को नहीं समझ सके।

गुलामी में उन्नति के दरवाजे कमीनेपन के उस अनुपात में खुलते हैं जिस अनुपात में वह अपने मालिक की आकांक्षा को अपनी चेतना का हिस्सा बना कर उसके आदेश या संकेत के अभाव में भी उसकी सेवा के लिए अपने ही स्वजनों के साथ दुर्व्यवहार करने लगता है। सच कहें तो राजनीतिक रूप में पराधीन बनाए जा चुके लोग पराधीन तो होते हैं पर गुलाम नहीं होते। प्रभुओं से धन, पद और सम्मान चाहने वाले ही उनके सच्चे गुलाम हो सकते हैं। गुलाम बनने को बाध्य किये गए और उस गुलामी से मुक्त होने के लिए बार बार संघर्ष करने वालों को कोड़े मारने वाला गुलाम उनकी नजर में अधिक सम्मानित और अपनी नजर में उनका मालिक हुआ करता है, जब कि वास्तव में न तो उसके पास अपनी आत्मा होती है न अपना दिमाग।

हम जितना भी प्रयत्न करें, कुछ बातें संकेत रूप में या संक्षेप में ही समझाई जा सकती हैं। कुछ बहुप्रचारित और निराधार या क्षीणाधार या सत्याभासी मान्यताओं का खंडन भी इसी तरह करना होगा। इनमें से कुछ से आप पहले से परिचित भी होंगे, और शेष की मैंने अपनी कृतियों में अपेक्षित विस्तार से चर्चा की है इसलिए पुनरावृत्ति से बचना भी जरूरी है :

आर्य और अनार्य का सवाल बाद में उठा, पहली समझ यह थी कि संस्कृत केवल ब्राहमणों की भाषा है। समस्या ब्राहमणों और गैर ब्राहमणों की थी। भारत के वे हो नहीं सकते थे, क्योंकि उस दशा में वे काले होते और गोरे जिन पर शासन कर रहे थे, किसी सुदूर अतीत में वे गोरों पर शासन करते सिद्ध हो रहे थे। इसलिए संस्कृत को और ब्राहमणों को भारत से भिन्न किसी ऐसे भूभाग की भाषा और निवासी सिद्ध करना था जहां के निवासी काले नहीं होते। इसके लिए जोंस ने ईरान को चुना था यह हम विलियम जोंस की चर्चा में कुछ विस्तार से समझा आए हैं।

यूरोप की क्लासिकी भाषाएं और संस्कृत से गहरी समानताएं रखने वाली अन्य भाषाएं संस्कृत की संतान नहीं हैं, इसके लिए जोंस को एक आद्य जननी भाषा की कल्पना करनी पड़ी। जोंस का , अवेस्ता, अरबी आदि का ज्ञान नाममात्र को था फिर भी उनकी दृष्टि असाधारण रूप में मर्मभेदी थी। सचाई यह है कि भाषा का प्रसार पाणिनीय संस्कृत के जन्म से हजारों साल पहले हुआ था, पर अभी तक वेदों का नाम भलें जोंस के कान में पड़ा हो, उसकी भाषा की विशेषताओं से वह परिचित नहीं थे। भारत में एक उन्नत नागर सभ्यता के उतने प्राचीन चरण पर होने की तो उस समय तक कल्पना तक नहीं की जा सकती थी, उसकी देशान्तर की गतिविधियों का अनुमान तो उसके बाद की चीज थी।

इस अन्तिम स्थिति में ही यह सोचा जा सकता था कि प्रसार बोलचाल की भाषा का हुआ होगा, साहित्यिक या लिखित भाषा का नहीं।

समानताएं भाषागत ही न थीं, देवशास्त्र, रीतिनीति में भी थी। उदाहरण के लिए ग्रीक समाज में शव के चिता पर जलाए जाने के अवशेष थे, ग्रीक स्त्री-पुरुष भारतीय पुरुषों और महिलाओं से मिलते जुलते अनसिले वस्त्र पहनते थे। इसलिए जोंस का मानना था कि भाषा, विचार, रीति, पुराण संबंधी जो भी समानताएं हैं वे सभी उस आद्य समाज की उपलब्धियां थीं, जिसका उत्तराधिकार इन्हें मिला था।

यह रोचक है कि संस्कृत ब्राहमणों की भाषा थी, इसलिए विलियम जोंस को भारत की ओर ईरान से निर्वासित करके भारत में पहुंचाना पड़ा था। हमला कर के वे पहुंच नहीं सकते थे, क्योंकि ब्राह्मण हथियार नहीं चलाते थे, शाप अवश्य देते थे। वे भारत में पहुंच कर भी आपस में संस्कृत बोलते रहे और किसी दूसरे को अपनी भाषा तक पहुंचने नहीं देते थे।

विलियम जोंस के बाद कुछ नई जरूरतें पैदा हो गईं । इनमें से एक थी किसी उस मूल भाषा का नामकरण जिसकी सन्तान ये सभी भाषाएं थीं? कई नाम सुझाए गए – इंडोजर्मनिक, आर्य, इंडो-यूरोपियन पर कोई संतोषजनक नहीं पया गया, क्योंकि पहला नाम जर्मन पंडितों ने सुझाया था, इससे उनकी हैसियत ऊंची हो जाती, आर्य शब्द का प्रयोग मुख्यत: अवेस्ता में, और सबसे अधिक संस्कृत और भारतीय परंपरा में वेद से लेकर लोक तक मिलता है, इसलिए इस नाम को स्वीकारते ही मूल भूमि खिसक कर फिर भारत में आ जाती और सारे किए कराए पर पानी फिर जाती। यदि सभी को सोस्कृत अन्य भाषाओं से अधिक समृद्ध लगती रही तो नए नकली नाम गढ़ने की जगह उसे आद्य संस्कृत कहते तो अधिक सही होता पर इसी से बचने के लिए तो सारा तामझाम खड़ा किया गया था।

कोशिश इस बात की हो रही थी कि किसी न किसी जुगत से ग्रीक और लातिन को ही संस्कृत से प्राचीन सिद्ध किया जाय। इसके लिए केंतम् और सतेम की शाखाओं की और इनसे जुड़ी कठदलीलों का जो जाल रचा गया उससे आप में से अधिकांश लोग परिचित होंगे।

अगली समस्या रूप रंग को ले कर थी। अंग्रेजों को नोर्डिक रूप रंग पसन्द था क्योंकि उनकी अपनी आबादी मे एक घटक नार्वेजियन रहा है। समस्या यह थी कि सभी अपना अभिन्न संबंध उनसे जोड़ना चाहते और इसने रस्साकशी का रूप ले रखा था इसलिए गोर्डन चाइल्ड ने इस झगड़े के निपटारे के लिए यह सुझाव रखा कि इसे एशिया और यूरोप की सीमा पर कहीं मान लिया जाय।

कुछ दूसरे पहलू भी थे पर यहां एक संक्षिप्त सूचना देकर हम इस जालसाजी की जड़ों पर प्रहार करना चाहते हैं। जिस ग्रीक को संस्कृत से अधिक प्राचीन सिद्ध करने के प्रयास किए गए, उनके पुरखों के लिए पेलास्जियन का प्रयोग होता था। इस तथ्य की ओर एक तर्क के रूप में सबसे पहले हेरास ने संकेत किया था, पर असुविधाजनक प्रमाणों को लगातार दरकिनार किया जाता रहा है। पेलास्जियनों के बारे में विकीपीडिया मे लिखा हैः The name Pelasgians (/pəˈlæzdʒiənz, -dʒənz, -ɡiənz/; Ancient Greek: Πελασγοί, Pelasgoí, singular: Πελασγός, Pelasgós) was used by classical Greek writers to either refer to populations that were the ancestors/forerunners of the Greeks, or to signify all pre-classical indigenes of Greece.
अब इसमें इतना जोड़ना बाकी रह जाता है कि पेलास्जियन का शाब्दिक अर्थ है काले लोग। परंतु इस अर्थ से बचने के लिए पिछले 200 साल में पंद्रह तरह के कयास भिड़ाए गए हैं परन्तु प्राचीन चित्रों का क्या करें जिनमें उन्हें बार बार काले रंग का दिखाया गया है।
The Pelasgians were undoubtedly members of this Hamitic race. Five of the main Greek city-states were said to be founded by descendants of Ham: Corinth (Phoenicians); Thebes (Cadmus from Phoenicia); Laconia (i.e. Sparta and Lacedemonia) by Lelex, an Egyptian; Athens by Cecrops of Egypt; and Argos was founded by the Phoenician Inachus. The Greeks own mythology states that these cities were founded by Hamites. According to Plutarch, the Pelasgians founded Athens, which equates the Pelasgians as colonizers from Egypt. The Pelasgians were made of of various tribes including the Carians, Leleges, Cadmeans, and the Garamantes.(The Pelasgians: The Black Original inhabitants of Ancient Greece)

Post – 2018-01-26

भारोपीय का मिथक

मिथक सचाई का भ्रम खड़ा करके धूर्तों द्वारा अपनी मनमानी के लिए गढ़ा गया ऐसा हथियार है जिसे खंडित कर दिया जाय तो भी वे आसानी से हार नहीं मानते। वे उसके खंडित टुकड़ों को भी हथियार बना कर तब तब तक लड़ते रहते हैं, जब तक वे टुकड़े भी टूटते टूटते रेत में नहीं बदल जाते । इसके बाद, उनकी एक ही गति बची रहती है, अपने ही हथियार के चूरे के नीचे दफन हो जाना।

आर्यों की, उनके आक्रमण की कहानियां दुहराने वालों के साथ कुछ ऐसा ही है। यह मिथक से अधिक तिलिस्म था। यह तिलिस्म केवल उनको सच लगता था जो पश्चिमी शिक्षाप्राप्त थे। अशिक्षतों और अल्पशिक्षितों के अपने पौराणक तिलिस्म थे, जिनके पाये अधिक मजबूत थे और जिसमें वे अधिक सुरक्षित अनुभव करते थे। यह समझना मुश्किल नहीं है कि कहने को उन्नत और उच्च शिक्षा-प्राप्त लोगों को ही आर्य और अनार्य के कच्चे रेत-गारे से तैयार किये गए इस तिलिस्म ने इतना आत्ममुग्ध कर दिया कि वे इसे चिनाई के हर कदम पर डांवाडोल देख कर भी इसके इन्द्रजाल को नहीं समझ सके।

गुलामी में उन्नति के दरवाजे कमीनेपन के उस अनुपात में खुलते हैं जिस अनुपात में वह अपने मालिक की आकांक्षा को अपनी चेतना का हिस्सा बना कर उसके आदेश या संकेत के अभाव में भी उसकी सेवा के लिए अपने ही स्वजनों के साथ दुर्व्यवहार करने लगता है। सच कहें तो राजनीतिक रूप में पराधीन बनाए जा चुके लोग पराधीन तो होते हैं पर गुलाम नहीं होते। प्रभुओं से धन, पद और सम्मान चाहने वाले ही उनके सच्चे गुलाम हो सकते हैं। गुलाम बनने को बाध्य किये गए और उस गुलामी से मुक्त होने के लिए बार बार संघर्ष करने वालों को कोड़े मारने वाला गुलाम उनकी नजर में अधिक सम्मानित और अपनी नजर में उनका मालिक हुआ करता है, जब कि वास्तव में न तो उसके पास अपनी आत्मा होती है न अपना दिमाग।

हम जितना भी प्रयत्न करें, कुछ बातें संकेत रूप में या संक्षेप में ही समझाई जा सकती हैं। कुछ बहुप्रचारित और निराधार या क्षीणाधार या सत्याभासी मान्यताओं का खंडन भी इसी तरह करना होगा। इनमें से कुछ से आप पहले से परिचित भी होंगे, और शेष की मैंने अपनी कृतियों में अपेक्षित विस्तार से चर्चा की है इसलिए पुनरावृत्ति से बचना भी जरूरी है :

आर्य और अनार्य का सवाल बाद में उठा, पहली समझ यह थी कि संस्कृत केवल ब्राहमणों की भाषा है। समस्या ब्राहमणों और गैर ब्राहमणों की थी। भारत के वे हो नहीं सकते थे, क्योंकि उस दशा में वे काले होते और गोरे जिन पर शासन कर रहे थे, किसी सुदूर अतीत में वे गोरों पर शासन करते सिद्ध हो रहे थे। इसलिए संस्कृत को और ब्राहमणों को भारत से भिन्न किसी ऐसे भूभाग की भाषा और निवासी सिद्ध करना था जहां के निवासी काले नहीं होते। इसके लिए जोंस ने ईरान को चुना था यह हम विलियम जोंस की चर्चा में कुछ विस्तार से समझा आए हैं।

यूरोप की क्लासिकी भाषाएं और संस्कृत से गहरी समानताएं रखने वाली अन्य भाषाएं संस्कृत की संतान नहीं हैं, इसके लिए जोंस को एक आद्य जननी भाषा की कल्पना करनी पड़ी। जोंस का , अवेस्ता, अरबी आदि का ज्ञान नाममात्र को था फिर भी उनकी दृष्टि असाधारण रूप में मर्मभेदी थी। सचाई यह है कि भाषा का प्रसार पाणिनीय संस्कृत के जन्म से हजारों साल पहले हुआ था, पर अभी तक वेदों का नाम भलें जोंस के कान में पड़ा हो, उसकी भाषा की विशेषताओं से वह परिचित नहीं थे। भारत में एक उन्नत नागर सभ्यता के उतने प्राचीन चरण पर होने की तो उस समय तक कल्पना तक नहीं की जा सकती थी, उसकी देशान्तर की गतिविधियों का अनुमान तो उसके बाद की चीज थी।

इस अन्तिम स्थिति में ही यह सोचा जा सकता था कि प्रसार बोलचाल की भाषा का हुआ होगा, साहित्यिक या लिखित भाषा का नहीं।

समानताएं भाषागत ही न थीं, देवशास्त्र, रीतिनीति में भी थी। उदाहरण के लिए ग्रीक समाज में शव के चिता पर जलाए जाने के अवशेष थे, ग्रीक स्त्री-पुरुष भारतीय पुरुषों और महिलाओं से मिलते जुलते अनसिले वस्त्र पहनते थे। इसलिए जोंस का मानना था कि भाषा, विचार, रीति, पुराण संबंधी जो भी समानताएं हैं वे सभी उस आद्य समाज की उपलब्धियां थीं, जिसका उत्तराधिकार इन्हें मिला था।

यह रोचक है कि संस्कृत ब्राहमणों की भाषा थी, इसलिए विलियम जोंस को भारत की ओर ईरान से निर्वासित करके भारत में पहुंचाना पड़ा था। हमला कर के वे पहुंच नहीं सकते थे, क्योंकि ब्राह्मण हथियार नहीं चलाते थे, शाप अवश्य देते थे। वे भारत में पहुंच कर भी आपस में संस्कृत बोलते रहे और किसी दूसरे को अपनी भाषा तक पहुंचने नहीं देते थे।

विलियम जोंस के बाद कुछ नई जरूरतें पैदा हो गईं । इनमें से एक थी किसी उस मूल भाषा का नामकरण जिसकी सन्तान ये सभी भाषाएं थीं? कई नाम सुझाए गए – इंडोजर्मनिक, आर्य, इंडो-यूरोपियन पर कोई संतोषजनक नहीं पया गया, क्योंकि पहला नाम जर्मन पंडितों ने सुझाया था, इससे उनकी हैसियत ऊंची हो जाती, आर्य शब्द का प्रयोग मुख्यत: अवेस्ता में, और सबसे अधिक संस्कृत और भारतीय परंपरा में वेद से लेकर लोक तक मिलता है, इसलिए इस नाम को स्वीकारते ही मूल भूमि खिसक कर फिर भारत में आ जाती और सारे किए कराए पर पानी फिर जाती। यदि सभी को सोस्कृत अन्य भाषाओं से अधिक समृद्ध लगती रही तो नए नकली नाम गढ़ने की जगह उसे आद्य संस्कृत कहते तो अधिक सही होता पर इसी से बचने के लिए तो सारा तामझाम खड़ा किया गया था।

कोशिश इस बात की हो रही थी कि किसी न किसी जुगत से ग्रीक और लातिन को ही संस्कृत से प्राचीन सिद्ध किया जाय। इसके लिए केंतम् और सतेम की शाखाओं की और इनसे जुड़ी कठदलीलों का जो जाल रचा गया उससे आप में से अधिकांश लोग परिचित होंगे।

अगली समस्या रूप रंग को ले कर थी। अंग्रेजों को नोर्डिक रूप रंग पसन्द था क्योंकि उनकी अपनी आबादी मे एक घटक नार्वेजियन रहा है। समस्या यह थी कि सभी अपना अभिन्न संबंध उनसे जोड़ना चाहते और इसने रस्साकशी का रूप ले रखा था इसलिए गोर्डन चाइल्ड ने इस झगड़े के निपटारे के लिए यह सुझाव रखा कि इसे एशिया और यूरोप की सीमा पर कहीं मान लिया जाय।

कुछ दूसरे पहलू भी थे पर यहां एक संक्षिप्त सूचना देकर हम इस जालसाजी की जड़ों पर प्रहार करना चाहते हैं। जिस ग्रीक को संस्कृत से अधिक प्राचीन सिद्ध करने के प्रयास किए गए, उनके पुरखों के लिए पेलास्जियन का प्रयोग होता था। इस तथ्य की ओर एक तर्क के रूप में सबसे पहले हेरास ने संकेत किया था, पर असुविधाजनक प्रमाणों को लगातार दरकिनार किया जाता रहा है। पेलास्जियनों के बारे में विकीपीडिया मे लिखा हैः The name Pelasgians (/pəˈlæzdʒiənz, -dʒənz, -ɡiənz/; Ancient Greek: Πελασγοί, Pelasgoí, singular: Πελασγός, Pelasgós) was used by classical Greek writers to either refer to populations that were the ancestors/forerunners of the Greeks, or to signify all pre-classical indigenes of Greece.
अब इसमें इतना जोड़ना बाकी रह जाता है कि पेलास्जियन का शाब्दिक अर्थ है काले लोग। परंतु इस अर्थ से बचने के लिए पिछले 200 साल में पंद्रह तरह के कयास भिड़ाए गए हैं परन्तु प्राचीन चित्रों का क्या करें जिनमें उन्हें बार बार काले रंग का दिखाया गया है।
The Pelasgians were undoubtedly members of this Hamitic race. Five of the main Greek city-states were said to be founded by descendants of Ham: Corinth (Phoenicians); Thebes (Cadmus from Phoenicia); Laconia (i.e. Sparta and Lacedemonia) by Lelex, an Egyptian; Athens by Cecrops of Egypt; and Argos was founded by the Phoenician Inachus. The Greeks own mythology states that these cities were founded by Hamites. According to Plutarch, the Pelasgians founded Athens, which equates the Pelasgians as colonizers from Egypt. The Pelasgians were made of of various tribes including the Carians, Leleges, Cadmeans, and the Garamantes.(The Pelasgians: The Black Original inhabitants of Ancient Greece)