Post – 2018-02-25

मेथड इन मैडनेस

ऋग्वेद के विषय में अपना मन्तव्य प्रकट करते हुए मैक्समुलर ने कहा था, इसके कुछ सूक्त तो निन्तान्त बचकाने हैं। उनकी नजर में पुरुष सूक्त अवश्य रहा होगा। इस टिप्पणी के लिए हम उन्हें दोष नहीं दे सकते। उनका तो एक प्रयोजन ही यह सिद्ध करना था कि ऋग्वेद मानवता की शैशव अवस्था की कृति है और ईसाइयत उन्नत चेतना की देन। भारतीय विद्वानों में जिन को वेदों की जानकारी थी या हो सकती थी उन्होंने इसका अक्षरानुगामी पाठ ही किया और इस लिए यदि पुरुष सूक्त को ही प्रमाण बना कर यह मान रखा था कि वेद सृष्टि से पहले अस्तित्व में थे, या कुछ दूसरे इसे लाखों वर्ष पुराना मानते रहे, तो वे स्वयं भी, अनजाने ही, मैक्समुलर के मत का समर्थन कर रहे थे। आपत्ति उन्हें बचकाना विशेषण से अवश्य हो सकती थी, क्योंकि वे वेद को ज्ञान की परकाष्ठा मानते थे। संभवत: इसीलिए स्वामी दयानन्द, मैक्समूलर को वेदों के विषय में अज्ञानी मानते थे।

इस सूक्त के मिथकीय रूपबन्ध का ध्यान न रखें तो इसमें, असंभव और अन्तर्विरोधी कथनों का ऐसा जमाव है कि कोई इसे किसी विक्षिप्त का प्रलाप कहे तो भी गलत न लगेगा।
हम दो ऋचाओं की चर्चा कल कर आए हैं। तीसरी ऋचा में भी यज्ञपुरुष की ही महिमा बखानी गई है जिसमें वामन के तीन डग और ऋग्वेद मे अन्यत्र आए विष्णु के पराक्रम – त्रीणि पदा विचक्रमे और त्रेधा निदधे पदं को ही दुहराया गया है पर उसमें धरती, अंतरिक्ष और द्युलोक या आकाश के तीन चरण रखने की बात है जब कि इस सूक्त में इसको बलिपशु बनाया गया इसलिए चतुष्पाद् पशु के रूपक का ध्यान करते हुए धरती के समस्त प्राणियों को एक पाद में समेटने के बाद तीन पाद सीधे द्युलोक में कल्पित कर लिए गए है। धरती के सभी मनुष्यों के स्थान पर समस्त प्राणियों को रखा गया है पर है यह समूळ्हम् अस्य पांसुरे (उसके पांवों की धूल में ही समस्त लोक समाया हुआ है।)

पहली ही ऋचा में हजार शिरों, आंखों और पांवों वाले पुरुष की कल्पना और फिर पूरी धरती को सर्वत: घेरने के बावजूद अलग और ऊपर हो कर दश अंगुल के आकार चमत्कारों और अन्तर्विरोधों की झड़ी लगा देता है। हम कहते हैं हमारी व्याख्या से सन्तुष्ट न होकर इसका आलोचनात्मक पाठ करें तो कृषिकर्म के स्थान पर इतने ही औचित्य से इसे अग्नि पर घटित किया जा सकता। दावाग्नि की कल्पना करें तो ऊपर उठते असंख्य शिरों, असंख्य आंखों और विविध रूपों में बढ़ते असंख्य पांव। फिर भी अग्नि का महत्व देव समाज के लिए कृषि उत्पादन और प्रसाधन में उसकी भूमिक के कारण ही है क्योंकि ‘अग्निना रयिं अश्नवत् पोषं एव दिवे दिवे यशसं वीरवत्तमम् (१.१.३);’ अग्निदेव ‘त्वया मर्तास स्वदन्त आसुतिं त्वं गर्भो वीरुधां जज्ञिषे शुचि:, २.१.१४?)।

दूसरी ऋचा ‘पुरुष एव इदम् सर्वं यत् भूतं यत् च भव्यम्। उत अमृतत्वस्य ईशानो यत् अन्नेन अतिरोहति॥’ ‘जो था और जो होगा, सब कुछ यह पुरुष ही है, पहली नजर में बहुत विचित्र लगता है, परन्तु यदि ऋग्वेद में ही आए अग्नि की सबमें विद्यमानता पर ध्यान दें तो जो कुछ था या होगा सभी में दिगातीत और कालातीत अग्नि को ही पाएंगे। वैचित्र्य तथ्यकथन बन जाता है। इसके दूसरे अर्धर्च मे पुरुष को अमृत का ईशान या स्वामी बताया गया है और फिर भी यह कहना कि अन्न से यह और प्रबलता पा लेता है , कुछ टेढा लगेगा । पर अग्नि को अमृत का निधान ( गोपा अमृतस्य , १.१.८), अग्नि देवों को अमृत प्रदान करते है (अग्निर् हि देवान् अमृतो दुवस्यति , ३.३.१) माना गया है। इस धारणा के पीछे भी उस काल से पाचेक हजार साल के देव समाज का बाद के कालों के देवताओं पर आरोपण हो सकता है जिनको अग्नि की बदौलत ही कृषिभूमि की तैयारी और पैदा हुए अनाज को पका कर अमृतोपम मधुर बनाने का श्रेय प्राप्त है परन्तु अमरता के इस निधान में जब इनका आहार – ईंधन, आज्य आदि – डाला जाता है तो यह और अधिक प्रज्वलित होते हैं। इस सूत्र के सामने आने पर अटपटापन समाप्त हो जाता है।

तीसरी और चौथी ऋचा में पुरुष की इतनी (ऊपर लिखी) महिमा बताने के बाद पुरुष की महिमा को उससे भी बहुत अधिक बताना इसलिए चौंकाता है कि पुरुष से पुरुष की महिमा अधिक कैसे हो सकती है, परन्तु कहा जा रहा है कि जो महिमा बताई गई है उससे बहुत अधिक है इसकी महिमा। आगे विष्णु के तीन पदों में धरती से आकाश तक को नापने की वही कथा दुहराई गई है। इस तरह की पुनरावृत्तियां वैदिक साहित्य में इतनी हैं कि ब्लूमफील्ड ने वेदिक रिपीटीशन्स नाम से एक पोथा ही तैयार कर दिया।
एतावानस्य महिमा अतो ज्यायांश्च पूरुषः। पादो अस्य विश्वा भूतानि त्रिपाद्स्य अमृतं दिवि॥३॥
त्रिपा्द् ऊर्ध्वं उदैत् पुरुषः पादो अस्य इहा पुनः। ततो विष्वं वि अक्रामत् स अशनान् अशने अभि॥४

अगली ऋचा में फिर उक्तिवैचित्र्य से काम लिया गया है। उस पुरुष से विराट् पैदा हुआ और विराट से फिर पुरुष पैदा हुआ और पैदा होते ही पूर्व से पश्चिम तक फैल गया। (तस्मात् विराड् अजायत विराजो अधिपूरुषः। सह अतो अत्यरिच्यत पश्चात् भूमिं अथो पुरः॥५)

इस बात पर ध्यान दें कि अपनी तेजस्विता के कारण अग्नि को राजा कहा गया है ( राजन्तं अध्वराणां, १.१.८; त्वां राजानं सुविदत्रं ऋंजते । २.१.८ ; नि दुरोणे अमृतो मर्त्यानां राजा ससाद विदथानि साधन् । ३.१.१८)और हम कह आए हैं तेजस्विता के कारण राजा को भी अग्नि का ही रूप माना गया है (हे अग्नि, मनुष्यों में तुम नृपति के रूप में पैदा होते हो – त्वं नृणां नृपति: जायते शुचि, २.१.१)।

यदि हम इस तथ्य पर ध्यान दें कि मनु एक अन्य कथा के अनुसार पहले किसान हैं, (धरती ने सभी ओषधियों को अपने में छिपा लिया तो धेनु रूपी धरती को मनु ने बछड़ा बन कर दुहा, और इस तर्क से वह पहले किसान (वैश्य) हुए, उन्होंने पहला विघान रचा जिस तर्क से (ब्राहमण हुए) और वह पहले राजा (क्षत्रिय) तो देव समाज के सभी वर्णों की एक मूलीयता की उस कथा से भी पुष्टि होती है और पुरुष या कृषि कर्मियों में आगे चल कर एक शासक (विराट या राजा) की जरूरत और फिर उसके संरक्षण में कृषि का दूर दूर पश्चिम और पूर्व की ओर प्रसार का संकेत यहां पाया जा सकता है। यह अवस्था तब आई हो सकती है जब कृषि कर्म की ओर पहले के विरोधी या उदासीन समुदायों में से अनेक आकर्षित हुए होंगे और सुरक्षा की साझी जरूरत अनुभव हुई होगी। मनु राज्य संस्था के अनुबन्ध सिद्धान्त के पहले प्रतिपादक हैं, तुम हमें उपज का एक भाग दोगे और मैं तुम्हें आन्तरिक व्यवस्था और बाहरी उपद्रव से सुरक्षा दूगा। इस राजसंस्था के आने के बाद दूर दूर तक खेती का प्रसार हुआ यह इस ऋचा का दावा है और पुरातात्विक साक्ष्य इस दावे की पुष्टि करते हैं कि बहुत थोड़े समय में भारत से लेकर पश्चिम एशिया तक और उत्तर चीन तक खेती का प्रसार हो गया। भले ये दोनों खेती में अपनी अग्रता का दावा करें, इस परिघटना का प्राचीनतम अभिलेख और इसके क्रम में हुए अनुभवों का अंकन भारतीय अतीत में ही मिलता है।

छठीं ऋचा (यत् पुरुषेण् हविषा देवा यज्ञं अतन्वत। वसन्तो अस्य आसीत् आज्यम् ग्रीष्म इद्ध्म शरत् हवि:॥६) के पहले अर्धर्च में एक बड़ी क्रूर प्रथा का आभास होता है। आरंभिक चरण पर भूमि की उर्वरता बढ़ाने के लिए खाद की उपयोगिता से परिचित होने से पहले संभवत धरती को तुष्ट करने के लिए नरबलि देने की प्रथा थी। यह प्रथा शबरों में से कुछ में उन्नीसवीं सदी तक प्रचलित थी जिसे मरिया प्रथा कहते थे। इसके लिए वे किसी अन्य कबीले या समाज से किसी शिशु को चुरा लाते थे, प्यार से पालते थे, उसे नशे की आदत भी डालते और पियक्कड़ बना देते थे। बलि के तरीके का जिक्र न करना ही अच्छा। दूसरे स्रोतों (शतपथ ब्रा.) में भी नरबलि की प्राचीन प्रथा की और फिर पशु बलि के कई चरणों के हवाले हैं। इसमें जिन देवों द्वारा बलि यज्ञ के आयोजन का हवाला है, वे कृषि का आरंभ करने वाले देव या देउआ थे। दूसरे देव तो अभी पैदा ही नहीं हुए थे। उन्हें तो इस यज्ञ से पैदा होना था। दूसरी पंक्ति को काल्पनिक माना जा सकता है, अभी तो ऋतु ओं को भी इस यज्ञ से ही पैदा होना था।

सातवीं ऋचा (सप्त अस्य आसन् परिधय: त्रि: सप्त समिधः कृताः। देवा यत् यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुं॥७॥) में बाद मे विकसित कर्मकांडी यज्ञ के अनुसार परिथि की सात और समिधा की इक्कीस लकड़यों के चयन की बात की गई है, क्योंकि उतने प्राचीन समय में यज्ञ या वनों की सफाई के लिए आग लगाने के क्या आयोजन किए जाते रहे होंगे, उनके निर्विघ् संपन्न होने के लिए उस काल में भी किसी तरह की रीति अपनाई जाती थी या नहीं, इस विषय में हम स्वयं भी अन्धकार में हैं। परन्तु बलिपशु के रूप में पुरुष की बलि देने की बात एक ही भूमि में बिना खाद के खेती करते रहने से उपज में आई गिरावट से प्रेरित हो सकती है और ऐसी दशा में पुरुष अग्नि, विष्णु, और कृषिकर्म या उत्पादन नहीं हो सकता, कोई मनुष्य ही हो सकता है। परन्तु हमें यह आसुरी चरण का अवशेष, या असुर समाज का प्रभाव लगता है, जिसके देवी देवता (काली, कपाली, आदि) रक्तपान और बलि के बिना तुष्ट ही नहीं होते थे।

नरबलि की प्रथा कभी वैदिक समाज में प्रवेश कर चुकी थी इसकी पुष्टि शुन:शेप की. कथा से होता है, परन्तु वह भी असुर देवता हैंजो असुरों के देव समाज के साथ सहयोगी भूमिका में आने के बाद प्रधान देवताओं में एक मान लिए गए थे।

समिधा की बात समझ में नहीं आती क्योंकि इसके कटे हुए अंगों से विविध तत्वों की सृष्टि हो जाती है। यह आनुष्ठनिक यज्ञ के रूपक के कारण जोड़ी गई है।

आठवीं ऋचा (तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन पुरुषं जातं अग्रतः। तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये॥८॥) में बलि से पहले बलिपशु के शरीर को संभवत: घृतलेप आदि करने का संकेत है जो पशुपालन के बाद ही संभव था इसलिए यह भी बाद की रीति का आरोपण हो सकता है, पर यहां इससे पुरुष के पैदा होने, देवों, साध्य देवों या जिनमें देव बनने की संभावना थी और ऋषियों के उत्पन्न होने को कृषि के बाद अदेवों या कृषि के प्रति उदासीन या विरोधी जनों की कृषि की दिशा में रुझान वाले (साध्य), नए देव समाज या कृषि अपनाने वाले समुदायों की (देवों), और चिन्तनशीलता में आई वृद्धि (ऋषय:) को मूर्त किया गया लगता है।

हम यह निवेदन करना चाहते हैं कि इस सूक्त में पुरुष की बलि से जिन चीजो के पैदा होने की बात की गई है वह उसकी उत्पत्ति से अधिक उसकी ओर ध्यान जाने, उसके संभव हो पाने का मूर्तीकरण है न कि सचमुच सृजित होने का। इसे इस रूप में समझ न पाने के कारण ही बहुत सारी गलतफहमियां पैदा हुई हैं, जिनकी ओर हम आगे ध्यान दिलाएंगे। सार केवल यह है कि कृषि उतपादन से पहले की पशुसुलभ जिन्दगी में इनकी संभावना थी ही नहीं।

अगली ऋचा पशुपालन के आरंभ की है। यह याद रखना होगा कि खेती आरंभ करने के बाद भी आखेट से देवगण विरत नहीं हुए थे बल्कि अब शाकाहारी जानवरों से अपनी खेती को बचाने के लिए पशुओं का शिकार या भागते हुए बीमार या छोटे शावकों को पकड़ना अधिक जरूरी था और जैन तथा बौद्ध मतों के प्रभाव से शाकाहार पर मनोव्याधि के स्तर तक जोर देने वाले यह सोचते हुए विचलित अनुभव करेंगे कि वन्य अवस्था में ही आमिष आहार के बिना प्राणरक्षा संभव न थी अपितु कृषि का आरंभ होने पर शाकाहारी जानवरों पर आघात किए बिना वे अपनी खेती को बचा ही नहीं सकते थे। शाकाहार मुझे भी पसन्द है, पर शाकाहारी जनों को यह न भूलना चाहिए कि मांसाहार से परहेज, कृषि उत्पाद की प्रचुरता के बाद ही संभव था, और इसके लिए दार्शनिक सूझ से अधिक भारत की उर्वरा धरती और छह ऋतुओं वाली जलवायु को श्रेय जाता है जिसमें अल्प श्रम से ही, दो और तीन फसलें उगाई जा सकती थीं। जो भी हो पहली पृषदाज्य या बकरी के दूध से बने घी के तर्पण का प्रश्न है वह बकरी को पालतू बनाए जाने अर्थात् पशुपालन से पहले संभव ही न था (तस्मात् यज्ञात् सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यं। पशून् तान् चक्रे वायव्यान आरण्यान् ग्राम्याश्च ये॥९॥।) प्रसंगवश कहदें कि जिस जानवर को सबसे पहले पालतू बनाया गया था वह बकरी ही थी और इसके बकरे का कोई दूसरा उपयोग भी न था। पालतू पशुओं से दूध पाया जा सकता है यह बाद की सूझ थी, पहला उपयोग उसकी लेड़ी से भूमि में आई उर्वरता थी। यहां आकर उनके भौतिक दृष्टिकोण में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ। धरती की भूख मिटाने के लिए नरबलि की आवश्यकता नहीं है। उसकी भूख खाद (करीष) से मिटती है।

कृषि की समृद्धि और निश्सेचिन्तता से ही साहित्य रचना, और औपचारिक यज्ञादि (तस्मात् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे। छंदांसि जज्ञिरे तस्मात् यजु: तस्मात् अजायत॥१०॥ तस्मात् अश्वा अजायंत ये के च उभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात् संजाता अजा अवयः॥११॥) का पर्यावरण तैयार हुआ। यह सूक्त गो आधारित कृषि आरंभ हो जाने के बाद रचा गया इसलिए समय का ध्यान नहीं रखा गया, अन्यथा अज पालन और ढुलाई के लिए अश्वपालन सबसे पहले किया गया। गोपालन लगभग पांच हजार साल ईसा पूर्व के आसपास आरंभ हुआ। हम कह सकते हैं कि इससे पहले देव युग था और गोपालन से मानवयुग आरंभ हुआ या देवों के वंशधर अपने को मनुष्य कहने लगे क्योंकि यह कहा गया है कि देव आज्य प्रेमी थे, और मनुष्य गव्य प्रेमी हैं। यह वह चरण है जब कृषिभूमि के स्वामित्व से उत्पन्न समृद्धि व्यापारिक पूंजी का रूप लेती है, पर कृषिभूमि पर अधिकार बना रहता है। जिसे ऐबसेंट लैंडलार्डिज्म कहा जाता है वह भारत में वैदिक काल से पहले आरंभ हो गया था ( क्षेत्रस्य पतिं प्रतिवेशं ईमहे, १०.६६.१३)।

बारहवीं ऋचा में प्रश्न किया गया है कि पुरुष को काट कर कितने टुकड़ों में बाटा गया और उसके मुंह, बाहु जांघ और पावों को क्या कहते थे (यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्। मुखं किमस्य कौ बाहू का उरू पादा उच्येते॥१२॥) और इसी का उत्तर तेरहवीं ऋचा में दिया गया है ( ब्राह्मण: अस्य मुखं आसीत् बाहू राजन्य: कृत:।ऊरू तदस्य यत् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥१३॥) जिसका अर्थ ऐसा हर एक व्यक्ति जानता है जो वेद शब्द से परिचित है। यज्ञपुरुष की बलि कृषिकर्मियों की विवशता थी। देव समाज का आंतरिक विभाजन उसकी अपनी अर्थव्यवस्था की अपरिहार्यता थी । इस पर विस्तार से हम चर्चा कर चुके हैं।

यदि वर्णों का विभाजन कटे हुए अंगों से नहीं हुआ तो चन्द्रमा और सूर्य का तो हो ही नहीं सकता (चंद्रमा मनसो जातः चक्षोः सूर्यो अजायत। मुखात इन्द्रःच अाग्निः च प्राणात् वायुः अजायत॥१४॥)। इसके विषय में हम ऋतुओं के रूठने की प्रतीक कथा का उल्लेख कर आए हैं। मौसम का सही ध्यान न रखने पर खेती की बर्वादी ने काल गणना और क्रमश: खगोल के अध्ययन को प्रेरित किया। समय के सूक्ष्म विभाजन और इसके वृहत्तम चक्र आदि के हिसाब को प्रेरित किया। यह गणना इतनी सूक्ष्मता तक पहुंची हुई थी कि अन्य संस्कृतियों के प्रबुद्धतम लोग भी इसका उपहास करते थे और सृष्टि और जो प्रलय के बीच इतने विराट अन्तराल की बात करते थे वे उन्हें सनकी तक मानने को तैयार थे, परन्तु इस काल प्रसार को सही मानने को तैयार नहीं। आधुनिक विज्ञान ने ही उनकी इन संकल्पनाओं को कुछ सुधार के साथ समर्थन दिया। इन गणनाओं के क्रम मे ही अंकमान को उस विराट संख्या तक पहुंचायागया जिसकी कल्पना तो आधुनिक विज्ञान के पास है पर अंकमान बिलियन से आगे यदि ट्रिलियन तक पहुंचता भी है तो उसकी अनिश्चितता के कारण उसका उपयोग नहीं हो पात।

हम इस तथ्य को दुहराना चाहते हैं कि यदि ये सभी विकास इतने पहले दूसरी संस्कृतियों के लिए अठारहवीं शताब्दी तक अकल्पनीय थे जिस ऊंचाई तक केवल भारत में पहुंचा तो इसलिए कि इसका जन्म कृषिक्रान्ति की अपरिहार्यता के कारण हुआ ।

आगे की दोनों ऋचाएं इस रूपकीय ताने बाने का काव्यातमक विस्तार है इसलिए उस पर चर्चा जरूरी नहीं पर यह याद दिलाया जा सकता है कि अन्तिम कृषिकर्म के आरंभ का धुंधला अनुस्मरण है।

नाभ्या आसीदंतरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्॥१५॥

यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते हि नाके महिमानं सचन्त यत्र पूर्वे साध्या सन्ति देवा।

Post – 2018-02-25

मेथड इन मैडनेस

ऋग्वेद के विषय में अपना मन्तव्य प्रकट करते हुए मैक्समुलर ने कहा था, इसके कुछ सूक्त तो निन्तान्त बचकाने हैं। उनकी नजर में पुरुष सूक्त अवश्य रहा होगा। इस टिप्पणी के लिए हम उन्हें दोष नहीं दे सकते। उनका तो एक प्रयोजन ही यह सिद्ध करना था कि ऋग्वेद मानवता की शैशव अवस्था की कृति है और ईसाइयत उन्नत चेतना की देन। भारतीय विद्वानों में जिन को वेदों की जानकारी थी या हो सकती थी उन्होंने इसका अक्षरानुगामी पाठ ही किया और इस लिए यदि पुरुष सूक्त को ही प्रमाण बना कर यह मान रखा था कि वेद सृष्टि से पहले अस्तित्व में थे, या कुछ दूसरे इसे लाखों वर्ष पुराना मानते रहे, तो वे स्वयं भी, अनजाने ही, मैक्समुलर के मत का समर्थन कर रहे थे। आपत्ति उन्हें बचकाना विशेषण से अवश्य हो सकती थी, क्योंकि वे वेद को ज्ञान की परकाष्ठा मानते थे। संभवत: इसीलिए स्वामी दयानन्द, मैक्समूलर को वेदों के विषय में अज्ञानी मानते थे।

इस सूक्त के मिथकीय रूपबन्ध का ध्यान न रखें तो इसमें, असंभव और अन्तर्विरोधी कथनों का ऐसा जमाव है कि कोई इसे किसी विक्षिप्त का प्रलाप कहे तो भी गलत न लगेगा।
हम दो ऋचाओं की चर्चा कल कर आए हैं। तीसरी ऋचा में भी यज्ञपुरुष की ही महिमा बखानी गई है जिसमें वामन के तीन डग और ऋग्वेद मे अन्यत्र आए विष्णु के पराक्रम – त्रीणि पदा विचक्रमे और त्रेधा निदधे पदं को ही दुहराया गया है पर उसमें धरती, अंतरिक्ष और द्युलोक या आकाश के तीन चरण रखने की बात है जब कि इस सूक्त में इसको बलिपशु बनाया गया इसलिए चतुष्पाद् पशु के रूपक का ध्यान करते हुए धरती के समस्त प्राणियों को एक पाद में समेटने के बाद तीन पाद सीधे द्युलोक में कल्पित कर लिए गए है। धरती के सभी मनुष्यों के स्थान पर समस्त प्राणियों को रखा गया है पर है यह समूळ्हम् अस्य पांसुरे (उसके पांवों की धूल में ही समस्त लोक समाया हुआ है।)

पहली ही ऋचा में हजार शिरों, आंखों और पांवों वाले पुरुष की कल्पना और फिर पूरी धरती को सर्वत: घेरने के बावजूद अलग और ऊपर हो कर दश अंगुल के आकार चमत्कारों और अन्तर्विरोधों की झड़ी लगा देता है। हम कहते हैं हमारी व्याख्या से सन्तुष्ट न होकर इसका आलोचनात्मक पाठ करें तो कृषिकर्म के स्थान पर इतने ही औचित्य से इसे अग्नि पर घटित किया जा सकता। दावाग्नि की कल्पना करें तो ऊपर उठते असंख्य शिरों, असंख्य आंखों और विविध रूपों में बढ़ते असंख्य पांव। फिर भी अग्नि का महत्व देव समाज के लिए कृषि उत्पादन और प्रसाधन में उसकी भूमिक के कारण ही है क्योंकि ‘अग्निना रयिं अश्नवत् पोषं एव दिवे दिवे यशसं वीरवत्तमम् (१.१.३);’ अग्निदेव ‘त्वया मर्तास स्वदन्त आसुतिं त्वं गर्भो वीरुधां जज्ञिषे शुचि:, २.१.१४?)।

दूसरी ऋचा ‘पुरुष एव इदम् सर्वं यत् भूतं यत् च भव्यम्। उत अमृतत्वस्य ईशानो यत् अन्नेन अतिरोहति॥’ ‘जो था और जो होगा, सब कुछ यह पुरुष ही है, पहली नजर में बहुत विचित्र लगता है, परन्तु यदि ऋग्वेद में ही आए अग्नि की सबमें विद्यमानता पर ध्यान दें तो जो कुछ था या होगा सभी में दिगातीत और कालातीत अग्नि को ही पाएंगे। वैचित्र्य तथ्यकथन बन जाता है। इसके दूसरे अर्धर्च मे पुरुष को अमृत का ईशान या स्वामी बताया गया है और फिर भी यह कहना कि अन्न से यह और प्रबलता पा लेता है , कुछ टेढा लगेगा । पर अग्नि को अमृत का निधान ( गोपा अमृतस्य , १.१.८), अग्नि देवों को अमृत प्रदान करते है (अग्निर् हि देवान् अमृतो दुवस्यति , ३.३.१) माना गया है। इस धारणा के पीछे भी उस काल से पाचेक हजार साल के देव समाज का बाद के कालों के देवताओं पर आरोपण हो सकता है जिनको अग्नि की बदौलत ही कृषिभूमि की तैयारी और पैदा हुए अनाज को पका कर अमृतोपम मधुर बनाने का श्रेय प्राप्त है परन्तु अमरता के इस निधान में जब इनका आहार – ईंधन, आज्य आदि – डाला जाता है तो यह और अधिक प्रज्वलित होते हैं। इस सूत्र के सामने आने पर अटपटापन समाप्त हो जाता है।

तीसरी और चौथी ऋचा में पुरुष की इतनी (ऊपर लिखी) महिमा बताने के बाद पुरुष की महिमा को उससे भी बहुत अधिक बताना इसलिए चौंकाता है कि पुरुष से पुरुष की महिमा अधिक कैसे हो सकती है, परन्तु कहा जा रहा है कि जो महिमा बताई गई है उससे बहुत अधिक है इसकी महिमा। आगे विष्णु के तीन पदों में धरती से आकाश तक को नापने की वही कथा दुहराई गई है। इस तरह की पुनरावृत्तियां वैदिक साहित्य में इतनी हैं कि ब्लूमफील्ड ने वेदिक रिपीटीशन्स नाम से एक पोथा ही तैयार कर दिया।
एतावानस्य महिमा अतो ज्यायांश्च पूरुषः। पादो अस्य विश्वा भूतानि त्रिपाद्स्य अमृतं दिवि॥३॥
त्रिपा्द् ऊर्ध्वं उदैत् पुरुषः पादो अस्य इहा पुनः। ततो विष्वं वि अक्रामत् स अशनान् अशने अभि॥४

अगली ऋचा में फिर उक्तिवैचित्र्य से काम लिया गया है। उस पुरुष से विराट् पैदा हुआ और विराट से फिर पुरुष पैदा हुआ और पैदा होते ही पूर्व से पश्चिम तक फैल गया। (तस्मात् विराड् अजायत विराजो अधिपूरुषः। सह अतो अत्यरिच्यत पश्चात् भूमिं अथो पुरः॥५)

इस बात पर ध्यान दें कि अपनी तेजस्विता के कारण अग्नि को राजा कहा गया है ( राजन्तं अध्वराणां, १.१.८; त्वां राजानं सुविदत्रं ऋंजते । २.१.८ ; नि दुरोणे अमृतो मर्त्यानां राजा ससाद विदथानि साधन् । ३.१.१८)और हम कह आए हैं तेजस्विता के कारण राजा को भी अग्नि का ही रूप माना गया है (हे अग्नि, मनुष्यों में तुम नृपति के रूप में पैदा होते हो – त्वं नृणां नृपति: जायते शुचि, २.१.१)।

यदि हम इस तथ्य पर ध्यान दें कि मनु एक अन्य कथा के अनुसार पहले किसान हैं, (धरती ने सभी ओषधियों को अपने में छिपा लिया तो धेनु रूपी धरती को मनु ने बछड़ा बन कर दुहा, और इस तर्क से वह पहले किसान (वैश्य) हुए, उन्होंने पहला विघान रचा जिस तर्क से (ब्राहमण हुए) और वह पहले राजा (क्षत्रिय) तो देव समाज के सभी वर्णों की एक मूलीयता की उस कथा से भी पुष्टि होती है और पुरुष या कृषि कर्मियों में आगे चल कर एक शासक (विराट या राजा) की जरूरत और फिर उसके संरक्षण में कृषि का दूर दूर पश्चिम और पूर्व की ओर प्रसार का संकेत यहां पाया जा सकता है। यह अवस्था तब आई हो सकती है जब कृषि कर्म की ओर पहले के विरोधी या उदासीन समुदायों में से अनेक आकर्षित हुए होंगे और सुरक्षा की साझी जरूरत अनुभव हुई होगी। मनु राज्य संस्था के अनुबन्ध सिद्धान्त के पहले प्रतिपादक हैं, तुम हमें उपज का एक भाग दोगे और मैं तुम्हें आन्तरिक व्यवस्था और बाहरी उपद्रव से सुरक्षा दूगा। इस राजसंस्था के आने के बाद दूर दूर तक खेती का प्रसार हुआ यह इस ऋचा का दावा है और पुरातात्विक साक्ष्य इस दावे की पुष्टि करते हैं कि बहुत थोड़े समय में भारत से लेकर पश्चिम एशिया तक और उत्तर चीन तक खेती का प्रसार हो गया। भले ये दोनों खेती में अपनी अग्रता का दावा करें, इस परिघटना का प्राचीनतम अभिलेख और इसके क्रम में हुए अनुभवों का अंकन भारतीय अतीत में ही मिलता है।

छठीं ऋचा (यत् पुरुषेण् हविषा देवा यज्ञं अतन्वत। वसन्तो अस्य आसीत् आज्यम् ग्रीष्म इद्ध्म शरत् हवि:॥६) के पहले अर्धर्च में एक बड़ी क्रूर प्रथा का आभास होता है। आरंभिक चरण पर भूमि की उर्वरता बढ़ाने के लिए खाद की उपयोगिता से परिचित होने से पहले संभवत धरती को तुष्ट करने के लिए नरबलि देने की प्रथा थी। यह प्रथा शबरों में से कुछ में उन्नीसवीं सदी तक प्रचलित थी जिसे मरिया प्रथा कहते थे। इसके लिए वे किसी अन्य कबीले या समाज से किसी शिशु को चुरा लाते थे, प्यार से पालते थे, उसे नशे की आदत भी डालते और पियक्कड़ बना देते थे। बलि के तरीके का जिक्र न करना ही अच्छा। दूसरे स्रोतों (शतपथ ब्रा.) में भी नरबलि की प्राचीन प्रथा की और फिर पशु बलि के कई चरणों के हवाले हैं। इसमें जिन देवों द्वारा बलि यज्ञ के आयोजन का हवाला है, वे कृषि का आरंभ करने वाले देव या देउआ थे। दूसरे देव तो अभी पैदा ही नहीं हुए थे। उन्हें तो इस यज्ञ से पैदा होना था। दूसरी पंक्ति को काल्पनिक माना जा सकता है, अभी तो ऋतु ओं को भी इस यज्ञ से ही पैदा होना था।

सातवीं ऋचा (सप्त अस्य आसन् परिधय: त्रि: सप्त समिधः कृताः। देवा यत् यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुं॥७॥) में बाद मे विकसित कर्मकांडी यज्ञ के अनुसार परिथि की सात और समिधा की इक्कीस लकड़यों के चयन की बात की गई है, क्योंकि उतने प्राचीन समय में यज्ञ या वनों की सफाई के लिए आग लगाने के क्या आयोजन किए जाते रहे होंगे, उनके निर्विघ् संपन्न होने के लिए उस काल में भी किसी तरह की रीति अपनाई जाती थी या नहीं, इस विषय में हम स्वयं भी अन्धकार में हैं। परन्तु बलिपशु के रूप में पुरुष की बलि देने की बात एक ही भूमि में बिना खाद के खेती करते रहने से उपज में आई गिरावट से प्रेरित हो सकती है और ऐसी दशा में पुरुष अग्नि, विष्णु, और कृषिकर्म या उत्पादन नहीं हो सकता, कोई मनुष्य ही हो सकता है। परन्तु हमें यह आसुरी चरण का अवशेष, या असुर समाज का प्रभाव लगता है, जिसके देवी देवता (काली, कपाली, आदि) रक्तपान और बलि के बिना तुष्ट ही नहीं होते थे।

नरबलि की प्रथा कभी वैदिक समाज में प्रवेश कर चुकी थी इसकी पुष्टि शुन:शेप की. कथा से होता है, परन्तु वह भी असुर देवता हैंजो असुरों के देव समाज के साथ सहयोगी भूमिका में आने के बाद प्रधान देवताओं में एक मान लिए गए थे।

समिधा की बात समझ में नहीं आती क्योंकि इसके कटे हुए अंगों से विविध तत्वों की सृष्टि हो जाती है। यह आनुष्ठनिक यज्ञ के रूपक के कारण जोड़ी गई है।

आठवीं ऋचा (तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन पुरुषं जातं अग्रतः। तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये॥८॥) में बलि से पहले बलिपशु के शरीर को संभवत: घृतलेप आदि करने का संकेत है जो पशुपालन के बाद ही संभव था इसलिए यह भी बाद की रीति का आरोपण हो सकता है, पर यहां इससे पुरुष के पैदा होने, देवों, साध्य देवों या जिनमें देव बनने की संभावना थी और ऋषियों के उत्पन्न होने को कृषि के बाद अदेवों या कृषि के प्रति उदासीन या विरोधी जनों की कृषि की दिशा में रुझान वाले (साध्य), नए देव समाज या कृषि अपनाने वाले समुदायों की (देवों), और चिन्तनशीलता में आई वृद्धि (ऋषय:) को मूर्त किया गया लगता है।

हम यह निवेदन करना चाहते हैं कि इस सूक्त में पुरुष की बलि से जिन चीजो के पैदा होने की बात की गई है वह उसकी उत्पत्ति से अधिक उसकी ओर ध्यान जाने, उसके संभव हो पाने का मूर्तीकरण है न कि सचमुच सृजित होने का। इसे इस रूप में समझ न पाने के कारण ही बहुत सारी गलतफहमियां पैदा हुई हैं, जिनकी ओर हम आगे ध्यान दिलाएंगे। सार केवल यह है कि कृषि उतपादन से पहले की पशुसुलभ जिन्दगी में इनकी संभावना थी ही नहीं।

अगली ऋचा पशुपालन के आरंभ की है। यह याद रखना होगा कि खेती आरंभ करने के बाद भी आखेट से देवगण विरत नहीं हुए थे बल्कि अब शाकाहारी जानवरों से अपनी खेती को बचाने के लिए पशुओं का शिकार या भागते हुए बीमार या छोटे शावकों को पकड़ना अधिक जरूरी था और जैन तथा बौद्ध मतों के प्रभाव से शाकाहार पर मनोव्याधि के स्तर तक जोर देने वाले यह सोचते हुए विचलित अनुभव करेंगे कि वन्य अवस्था में ही आमिष आहार के बिना प्राणरक्षा संभव न थी अपितु कृषि का आरंभ होने पर शाकाहारी जानवरों पर आघात किए बिना वे अपनी खेती को बचा ही नहीं सकते थे। शाकाहार मुझे भी पसन्द है, पर शाकाहारी जनों को यह न भूलना चाहिए कि मांसाहार से परहेज, कृषि उत्पाद की प्रचुरता के बाद ही संभव था, और इसके लिए दार्शनिक सूझ से अधिक भारत की उर्वरा धरती और छह ऋतुओं वाली जलवायु को श्रेय जाता है जिसमें अल्प श्रम से ही, दो और तीन फसलें उगाई जा सकती थीं। जो भी हो पहली पृषदाज्य या बकरी के दूध से बने घी के तर्पण का प्रश्न है वह बकरी को पालतू बनाए जाने अर्थात् पशुपालन से पहले संभव ही न था (तस्मात् यज्ञात् सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यं। पशून् तान् चक्रे वायव्यान आरण्यान् ग्राम्याश्च ये॥९॥।) प्रसंगवश कहदें कि जिस जानवर को सबसे पहले पालतू बनाया गया था वह बकरी ही थी और इसके बकरे का कोई दूसरा उपयोग भी न था। पालतू पशुओं से दूध पाया जा सकता है यह बाद की सूझ थी, पहला उपयोग उसकी लेड़ी से भूमि में आई उर्वरता थी। यहां आकर उनके भौतिक दृष्टिकोण में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ। धरती की भूख मिटाने के लिए नरबलि की आवश्यकता नहीं है। उसकी भूख खाद (करीष) से मिटती है।

कृषि की समृद्धि और निश्सेचिन्तता से ही साहित्य रचना, और औपचारिक यज्ञादि (तस्मात् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे। छंदांसि जज्ञिरे तस्मात् यजु: तस्मात् अजायत॥१०॥ तस्मात् अश्वा अजायंत ये के च उभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात् संजाता अजा अवयः॥११॥) का पर्यावरण तैयार हुआ। यह सूक्त गो आधारित कृषि आरंभ हो जाने के बाद रचा गया इसलिए समय का ध्यान नहीं रखा गया, अन्यथा अज पालन और ढुलाई के लिए अश्वपालन सबसे पहले किया गया। गोपालन लगभग पांच हजार साल ईसा पूर्व के आसपास आरंभ हुआ। हम कह सकते हैं कि इससे पहले देव युग था और गोपालन से मानवयुग आरंभ हुआ या देवों के वंशधर अपने को मनुष्य कहने लगे क्योंकि यह कहा गया है कि देव आज्य प्रेमी थे, और मनुष्य गव्य प्रेमी हैं। यह वह चरण है जब कृषिभूमि के स्वामित्व से उत्पन्न समृद्धि व्यापारिक पूंजी का रूप लेती है, पर कृषिभूमि पर अधिकार बना रहता है। जिसे ऐबसेंट लैंडलार्डिज्म कहा जाता है वह भारत में वैदिक काल से पहले आरंभ हो गया था ( क्षेत्रस्य पतिं प्रतिवेशं ईमहे, १०.६६.१३)।

बारहवीं ऋचा में प्रश्न किया गया है कि पुरुष को काट कर कितने टुकड़ों में बाटा गया और उसके मुंह, बाहु जांघ और पावों को क्या कहते थे (यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्। मुखं किमस्य कौ बाहू का उरू पादा उच्येते॥१२॥) और इसी का उत्तर तेरहवीं ऋचा में दिया गया है ( ब्राह्मण: अस्य मुखं आसीत् बाहू राजन्य: कृत:।ऊरू तदस्य यत् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥१३॥) जिसका अर्थ ऐसा हर एक व्यक्ति जानता है जो वेद शब्द से परिचित है। यज्ञपुरुष की बलि कृषिकर्मियों की विवशता थी। देव समाज का आंतरिक विभाजन उसकी अपनी अर्थव्यवस्था की अपरिहार्यता थी । इस पर विस्तार से हम चर्चा कर चुके हैं।

यदि वर्णों का विभाजन कटे हुए अंगों से नहीं हुआ तो चन्द्रमा और सूर्य का तो हो ही नहीं सकता (चंद्रमा मनसो जातः चक्षोः सूर्यो अजायत। मुखात इन्द्रःच अाग्निः च प्राणात् वायुः अजायत॥१४॥)। इसके विषय में हम ऋतुओं के रूठने की प्रतीक कथा का उल्लेख कर आए हैं। मौसम का सही ध्यान न रखने पर खेती की बर्वादी ने काल गणना और क्रमश: खगोल के अध्ययन को प्रेरित किया। समय के सूक्ष्म विभाजन और इसके वृहत्तम चक्र आदि के हिसाब को प्रेरित किया। यह गणना इतनी सूक्ष्मता तक पहुंची हुई थी कि अन्य संस्कृतियों के प्रबुद्धतम लोग भी इसका उपहास करते थे और सृष्टि और जो प्रलय के बीच इतने विराट अन्तराल की बात करते थे वे उन्हें सनकी तक मानने को तैयार थे, परन्तु इस काल प्रसार को सही मानने को तैयार नहीं। आधुनिक विज्ञान ने ही उनकी इन संकल्पनाओं को कुछ सुधार के साथ समर्थन दिया। इन गणनाओं के क्रम मे ही अंकमान को उस विराट संख्या तक पहुंचायागया जिसकी कल्पना तो आधुनिक विज्ञान के पास है पर अंकमान बिलियन से आगे यदि ट्रिलियन तक पहुंचता भी है तो उसकी अनिश्चितता के कारण उसका उपयोग नहीं हो पात।

हम इस तथ्य को दुहराना चाहते हैं कि यदि ये सभी विकास इतने पहले दूसरी संस्कृतियों के लिए अठारहवीं शताब्दी तक अकल्पनीय थे जिस ऊंचाई तक केवल भारत में पहुंचा तो इसलिए कि इसका जन्म कृषिक्रान्ति की अपरिहार्यता के कारण हुआ ।

आगे की दोनों ऋचाएं इस रूपकीय ताने बाने का काव्यातमक विस्तार है इसलिए उस पर चर्चा जरूरी नहीं पर यह याद दिलाया जा सकता है कि अन्तिम कृषिकर्म के आरंभ का धुंधला अनुस्मरण है।

नाभ्या आसीदंतरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्॥१५॥

यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते हि नाके महिमानं सचन्त यत्र पूर्वे साध्या सन्ति देवा।

Post – 2018-02-24

पारिवारिकता और मित्रता में एक बात समान है। कोई दूसरे के प्रति सम्मान प्रदर्शित नहीं करता। आत्मीयता हो तो प्रदर्शन की जरूरत नहीं होती। कई बार सम्मान जताने वाले अनजाने ही हमारा अपमान कर बैठते हैं। ऐसा तब होता है जब वे हमारा गलत परिचय देते हैं, हम जो नहीं हैं वह बता बैठते हैं। इस अपमान से मुझे अक्सर गुजरना पड़ता है। फेसबुक पर मेरे परिचय में साफ लिखा है, मैं हिन्दी से एम.ए. हूं अर्थात् संस्कृत का विद्वान नहीं हूं। डाक्टर नहीं हूं। जो अनलिखा रह गया वह यह कि मेरी उत्कट इच्छा के होते हुए भी, अध्यापन का अवसर नहीं मिला अतः प्रोफेसर या आचार्य नहीं रहा। सरकारी चाकरी की। अपने गुरुओं, अग्रजों और अधिकारियों सम्कोमान होते हुए भी कभी सर नहीं कहा।
गरज कि मेरे लिए मेरा सीधा नाम मेरा सबसे बड़ा सम्मान है और जो नही हूं
उस रूप में संबोधित होना अपमान, जिसे लाचारी में झेला जा सकता है, पर प्रसन्न नहीं हुआ जा सकता।
मैंने बड़े श्रम और संकल्प के साथ अपनी जानकारी अनेक क्षेत्रों में बढ़ाई है, पर किसी विषय का विद्वान नहीं। विद्वान मान लिया जाना भी एक तरह का दंड भोग है, आप डरे रहते हैं कि मेरी गलतियों को भी लोग सही न मान बैठें।

Post – 2018-02-24

पारिवारिकता और मित्रता में एक बात समान है। कोई दूसरे के प्रति सम्मान प्रदर्शित नहीं करता। आत्मीयता हो तो प्रदर्शन की जरूरत नहीं होती। कई बार सम्मान जताने वाले अनजाने ही हमारा अपमान कर बैठते हैं। ऐसा तब होता है जब वे हमारा गलत परिचय देते हैं, हम जो नहीं हैं वह बता बैठते हैं। इस अपमान से मुझे अक्सर गुजरना पड़ता है। फेसबुक पर मेरे परिचय में साफ लिखा है, मैं हिन्दी से एम.ए. हूं अर्थात् संस्कृत का विद्वान नहीं हूं। डाक्टर नहीं हूं। जो अनलिखा रह गया वह यह कि मेरी उत्कट इच्छा के होते हुए भी, अध्यापन का अवसर नहीं मिला अतः प्रोफेसर या आचार्य नहीं रहा। सरकारी चाकरी की। अपने गुरुओं, अग्रजों और अधिकारियों सम्कोमान होते हुए भी कभी सर नहीं कहा।
गरज कि मेरे लिए मेरा सीधा नाम मेरा सबसे बड़ा सम्मान है और जो नही हूं
उस रूप में संबोधित होना अपमान, जिसे लाचारी में झेला जा सकता है, पर प्रसन्न नहीं हुआ जा सकता।
मैंने बड़े श्रम और संकल्प के साथ अपनी जानकारी अनेक क्षेत्रों में बढ़ाई है, पर किसी विषय का विद्वान नहीं। विद्वान मान लिया जाना भी एक तरह का दंड भोग है, आप डरे रहते हैं कि मेरी गलतियों को भी लोग सही न मान बैठें।

Post – 2018-02-24

पारिवारिकता और मित्रता में एक बात समान है। कोई दूसरे के प्रति सम्मान प्रदर्शित नहीं करता। आत्मीयता हो तो प्रदर्शन की जरूरत नहीं होती। कई बार सम्मान जताने वाले अनजाने ही हमारा अपमान कर बैठते हैं। ऐसा तब होता है जब वे हमारा गलत परिचय देते हैं, हम जो नहीं हैं वह बता बैठते हैं। इस अपमान से मुझे अक्सर गुजरना पड़ता है। फेसबुक पर मेरे परिचय में साफ लिखा है, मैं हिन्दी से एम.ए. हूं अर्थात् संस्कृत का विद्वान नहीं हूं। डाक्टर नहीं हूं। जो अनलिखा रह गया वह यह कि मेरी उत्कट इच्छा के होते हुए भी, अध्यापन का अवसर नहीं मिला अतः प्रोफेसर या आचार्य नहीं रहा। सरकारी चाकरी की। अपने गुरुओं, अग्रजों और अधिकारियों सम्कोमान होते हुए भी कभी सर नहीं कहा।
गरज कि मेरे लिए मेरा सीधा नाम मेरा सबसे बड़ा सम्मान है और जो नही हूं
उस रूप में संबोधित होना अपमान, जिसे लाचारी में झेला जा सकता है, पर प्रसन्न नहीं हुआ जा सकता।
मैंने बड़े श्रम और संकल्प के साथ अपनी जानकारी अनेक क्षेत्रों में बढ़ाई है, पर किसी विषय का विद्वान नहीं। विद्वान मान लिया जाना भी एक तरह का दंड भोग है, आप डरे रहते हैं कि मेरी गलतियों को भी लोग सही न मान बैठें।

Post – 2018-02-22

पुरुष सूक्त

भारत सभ्यता का बीजारोपण ही कृषि उत्पादन के रूप में नहीं हुआ था, इसके साथ सामाजिक अनुभवों और कार्यों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने और बाद की पीढ़ियों को हस्तान्तरित करने की एक विधि का भी विकास हुआ था, परिघटनाओं का मानवीकरण या सजीवीकरण करने की विधि। इससे उनमें रोचकता आ जाती थी। सुनने सुनाने की रुचि पैदा हो जाती थी, इनके रूपकीय कलेवर को तोड़ सत्य तक पहुंचने के लिए तरह तरह से व्याख्या करने की प्रवृत्ति पैदा होती थी जिसने आगे चलकर साहित्य के रसास्वादन का रूप लिया और उस चरण पर मिथकों के वास्तविक और कल्पित कथाओं का साहित्यभंडार तैयार किया।

मानवीकरण – घटनाओं, कार्यों, प्राणियों, प्राकृतिक सत्ताओं तक का मानवी- या जैवीकरण – के पीछे सर्वात्मवादी सोच का भी हाथ था या नहीं, यह हम नहीं जानते। पर यह जानते हैं बादलों के विविध रूपों का मानवीकरण – वृत्र, शंबर, चुमुरि, धुनी, अराव्ण, कुयव किए गए, तो पवन की गतियों के अनुसार ग्यारह रुद्रियों की कल्पना कर ली गई, साल के बारह महीनों के सूर्यों के लिए बारह आदित्य कल्पित हो गए, तब तक ज्ञात खनिज द्रव्यों (वसु) के लिए आठ वसु कल्पित हो गए। इस सोच में छन्द भी पशु बन जाते हैं, वाहन बन जाते हैं, रक्षक बन जाते हैं, और गायत्री छन्द को पक्षी (श्येन) का रूप धारण कर सोम को चुरा कर लाने को उड़ जाती है और वापसी में सोमरक्षक गंधर्वों का तीर लगता है तो बेचारी का एक पंख ही कट कर गिर जाता और पर्णवृक्ष बन जाता है। जो भी हो, यदि यह मनोग्राही कलेवर न होता तो बिना कहीं दर्ज किए सुदूर अतीत में घटित घटनाओं को पांच सात हजार साल तक संजोया नहीं जा सकता था। यह काम जितने बड़े पैमाने पर इस देश में हुआ उतने बड़े पैमाने पर अन्त्र कहीे नहीं।

मिथकीय कलेवर में लिपटे इतिहास का नाभिकीय सत्य जानने के लिए इल कलाविधान को, इसके इस अनूठे व्याकरण को समझना जरूरी है । इसी के चलते कृषिकर्म को यज्ञ कहा गया और फिर यज्ञ का मानवीकरण किया गया। वामन और बलि की एक पुरान कथा में हमने बताय था कि विष्णु वनस्पतियों की जड़ों में छिप जाते हैं, और उन्हें भूमि को खोद खोद कर निकाला जाता है। एक अन्य कथा में यज्ञ का सिर काटने का हवाला है, कटे सिर का जो रस (ध्यान रहे कि इसमें रक्त की बात नहीं की गई है) था वह झट पानी में प्रवेश कर गया और उसी से रासभ पैदा हुआ। जिस अधभूले रूप में याद आ रहा है: यो यज्ञस्य शिरो अच्छिद्त, तस्य रस: द्रुत्वाप: प्रविवेश, सो रासभो अभवत।

जब हम पुरुष सूक्त को कृषिक्रान्ति का आख्यान कहते हैं तो साथ में यह भी जोड़ना चाहते हैं क्रान्ति के चरित्र को समझने में भी हम से गलती होती रही है। मेरी समझ से क्रान्तियां सत्ता का परिवर्तन नहीं है जिन्हें एक झटके में पूरा किया जा सके। ये व्यवस्था परिवर्तन हैं, जिनके लिए सत्ता का समर्थन या सहयोग जरूरी नहीं होता। सत्ता को बदलने के लिए भी शक्ति का प्रयोग जरूरी नहीं होता। क्रान्तियां एक झटके में पूरी नहीं हो पातीं, पर इनके प्रभाव से वे भी बचे नहीँ रह पाते जो किसी कारण यह ठान लेते हैं कि वे इनका विरोध करेंगे।

एेसा न होता तो कृषिक्रान्ति के हजारों साल बाद अनेक समाज आहारसंग्रह की अवस्था में न रह जाते। क्रान्तियों के भीतर कई तरह की उपक्रान्तियां अपरिहार्य बन कर आती है और उसे सुदृढ़ करती हैं। आज की औद्योगिक क्रान्ति का पहला चरण यान्त्रिक था, दूसरा इल्क्ट्रिकल और तीसरा इल्क्ट्रॉनिक चौथा रोबोटिक होने के कगार पर है। इन चरणों के पूरा होने में बहुत कम समय लगा है क्योंकि गति तेज होती चली गई है। यन्त्रयुग से पहले उपकरण या औजारयुग था जिसमें उत्पादन में व्यक्ति की अपनी प्रतिभा, कौशल और अध्यवसाय की सक्रिय भूमिका थी इसलिए काम के साथ सर्जनातमक आनन्द जुड़ा हुआ था जिसे यन्त्र ने नष्ट कर दिया। अब यह खोज, आविष्कार और यन्त्रनिर्माण (टूलमेकिंग) तक सीमित रह गया है। शेष लोग यन्त्र के सजीव पुर्जे बन जाते हैं।

पुरुष सूक्त कृषिक्रान्ति (जिसे नवपाषाण क्रान्ति भी कह लिया जाता है पर उसमें अव्याप्ति दोष है जो इसकी उपक्रान्तियों को नहीं समेट पाता) पूर्णता के चरण की रचना है। हम प्रयत्न करेंगे कि इसकी प्रत्येक ऋचा के उस भाव तक पहुंचें जिसको बहुगम्य बनाने के लिए मिथकीय रूपविधान का सहारा लिया गया है और फिर अन्त में समाहार करते हुए उन आन्तरिक क्रान्तियों का संकेत करें जिन्हें इसकी देन कहा जा सकता है।

इसकी पहली ऋचा है
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलम्॥१
इसमें सहस्र का अर्थ असंख्य है। असंख्य लोग, असंख्य हाथ, असंख्य पांव इस यज्ञ में जुटे हुए है, इसका प्रसार पूरी धरती पर हो चुका, इतना सब होने के बाद भी यह दश अंगुल में सिमटा हुआ है।
इसमें दशांगुलता को समझने के लिए तीन समीकरणों पर ध्यान देना होगा:
१. विष्णु का वामन रूप
२. यज्ञो वै विष्णु:
३. अग्नि: वै विष्णु: ।
त्वमग्न इन्द्रो वृषभ: सतां असि त्वं विष्णु: उरुगायो नमस्य:।
त्वं ब्रहमा रयिविद ब्रहमणस्पते त्वं विधर्त: सचसे पुरन्ध्या ।। २.१.३
यदि मैं कहूं वह अग्नि ही जिससे झाड़ झंखाड़ को जला कर कृषि के लिए जमीन की सफाई की जाती था विष्णु है, वही यज्ञ भी है। आग से आग लगाने का आयोजन (यज्ञेन यज्ञं अयजन्त देवा: तानि धर्माणि प्रथमानि आसन) एक बार लग जाने के बाद इसका तेजी से फैलना विष्णु का लंबे डग भरना है, और आग लगाकर आगे चलकर अग्नि के ही धरती पर उसके अाग के रूप में, तेजस्वी/प्रतिभाशाली व्यक्ति में, प्रतापी व्यक्ति में, ओषाधियों मे, काठ में, पत्थर में अव्यक्त रूप (ऋं.२.१.१), और अन्तरिक्ष में इन्द्र के रूप में और आकाश में सूर्य के रूप में विद्यमान होने के कारण, इसे विष्णु के तीन कदमों में तीनों लोकों को नापने के रूपक में ढाला गया।

उरुगाय का अर्थ है लंबे डग भरने वाला। वह विष्णु जिसके विषय में कहा गया है समूल्हं अस्य पांसुरे, सारा जगत उस विष्णु के पांवों की धूल पर निर्भर है, वह आग बुझन् के बाद की वह राख है जो अग्निदेव या विष्णु के धरती पर बढ़े चरणों से पैदा हुई है। आरंभ में इसी में बीज बोए जाते थे जो झूम खेती में हाल के दिनों तक चलता रहा ।

इस दशांगुलता में विष्णु के वामन रूप की आवृत्ति है मानें या सूर्य के धरती से दृश्य आकार को यह निर्णय आप स्वयं करें । सूर्य ही है जो धरती की परिक्रमा करता है और फिर भी इससे दूर अलग, छोटा सा दिखाई देता है – व्यस्तभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः ।। 7.99.3

कुछ लोगों को इससे परेशानी हो सकती है कि क्या वैदिक समाज को यह पता था कि धरती गोल है और सूर्य इसकी परिक्रमा करता है। ऐसे लोगों से निवेदन है कि वैदिक समाज में कई स्तरों के लोग और उनके विश्वास प्रचलित थे पर एक स्तर ऐसा भी था जिसके लोगों को यह भी पता था कि धरती और आकाश दोनों विविध गतियों से घूमते हैं – विवर्तेते अहनी चक्रिया इव – भले उनका ध्यान इस ओर ग्रहों का निरीक्षण और साल दिनों के छोटा बड़ा होने पर ध्यान देने के कारण आया हो।

अन्न ही सबका पालन करता है, वही समस्त (जीव) जगत को संभाले हुए है इसलिए जो पहले था आगे होगा सब इसी में समाए हुए है, यही अन्न पर पलने वाले सभी प्राणयों की दीर्घजीविता का कारण है:
पुरुष एव इदम् सर्यवं यत् भूतं यत च भव्यम्। उत अमृतत्वस्य ईशानो यत अन्नेन अतिरोहति॥। २

यदि दूसरे मंडल के पहले सूक्त में वर्णित अग्नि की सर्वव्यापकता पर ध्यान दें इस ऋचा की
पहली अर्धाली का आशय अधिक स्पष्ट हो जाएगा।
आज तो इतना ही।

Post – 2018-02-22

पुरुष सूक्त

भारत सभ्यता का बीजारोपण ही कृषि उत्पादन के रूप में नहीं हुआ था, इसके साथ सामाजिक अनुभवों और कार्यों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने और बाद की पीढ़ियों को हस्तान्तरित करने की एक विधि का भी विकास हुआ था, परिघटनाओं का मानवीकरण या सजीवीकरण करने की विधि। इससे उनमें रोचकता आ जाती थी। सुनने सुनाने की रुचि पैदा हो जाती थी, इनके रूपकीय कलेवर को तोड़ सत्य तक पहुंचने के लिए तरह तरह से व्याख्या करने की प्रवृत्ति पैदा होती थी जिसने आगे चलकर साहित्य के रसास्वादन का रूप लिया और उस चरण पर मिथकों के वास्तविक और कल्पित कथाओं का साहित्यभंडार तैयार किया।

मानवीकरण – घटनाओं, कार्यों, प्राणियों, प्राकृतिक सत्ताओं तक का मानवी- या जैवीकरण – के पीछे सर्वात्मवादी सोच का भी हाथ था या नहीं, यह हम नहीं जानते। पर यह जानते हैं बादलों के विविध रूपों का मानवीकरण – वृत्र, शंबर, चुमुरि, धुनी, अराव्ण, कुयव किए गए, तो पवन की गतियों के अनुसार ग्यारह रुद्रियों की कल्पना कर ली गई, साल के बारह महीनों के सूर्यों के लिए बारह आदित्य कल्पित हो गए, तब तक ज्ञात खनिज द्रव्यों (वसु) के लिए आठ वसु कल्पित हो गए। इस सोच में छन्द भी पशु बन जाते हैं, वाहन बन जाते हैं, रक्षक बन जाते हैं, और गायत्री छन्द को पक्षी (श्येन) का रूप धारण कर सोम को चुरा कर लाने को उड़ जाती है और वापसी में सोमरक्षक गंधर्वों का तीर लगता है तो बेचारी का एक पंख ही कट कर गिर जाता और पर्णवृक्ष बन जाता है। जो भी हो, यदि यह मनोग्राही कलेवर न होता तो बिना कहीं दर्ज किए सुदूर अतीत में घटित घटनाओं को पांच सात हजार साल तक संजोया नहीं जा सकता था। यह काम जितने बड़े पैमाने पर इस देश में हुआ उतने बड़े पैमाने पर अन्त्र कहीे नहीं।

मिथकीय कलेवर में लिपटे इतिहास का नाभिकीय सत्य जानने के लिए इल कलाविधान को, इसके इस अनूठे व्याकरण को समझना जरूरी है । इसी के चलते कृषिकर्म को यज्ञ कहा गया और फिर यज्ञ का मानवीकरण किया गया। वामन और बलि की एक पुरान कथा में हमने बताय था कि विष्णु वनस्पतियों की जड़ों में छिप जाते हैं, और उन्हें भूमि को खोद खोद कर निकाला जाता है। एक अन्य कथा में यज्ञ का सिर काटने का हवाला है, कटे सिर का जो रस (ध्यान रहे कि इसमें रक्त की बात नहीं की गई है) था वह झट पानी में प्रवेश कर गया और उसी से रासभ पैदा हुआ। जिस अधभूले रूप में याद आ रहा है: यो यज्ञस्य शिरो अच्छिद्त, तस्य रस: द्रुत्वाप: प्रविवेश, सो रासभो अभवत।

जब हम पुरुष सूक्त को कृषिक्रान्ति का आख्यान कहते हैं तो साथ में यह भी जोड़ना चाहते हैं क्रान्ति के चरित्र को समझने में भी हम से गलती होती रही है। मेरी समझ से क्रान्तियां सत्ता का परिवर्तन नहीं है जिन्हें एक झटके में पूरा किया जा सके। ये व्यवस्था परिवर्तन हैं, जिनके लिए सत्ता का समर्थन या सहयोग जरूरी नहीं होता। सत्ता को बदलने के लिए भी शक्ति का प्रयोग जरूरी नहीं होता। क्रान्तियां एक झटके में पूरी नहीं हो पातीं, पर इनके प्रभाव से वे भी बचे नहीँ रह पाते जो किसी कारण यह ठान लेते हैं कि वे इनका विरोध करेंगे।

एेसा न होता तो कृषिक्रान्ति के हजारों साल बाद अनेक समाज आहारसंग्रह की अवस्था में न रह जाते। क्रान्तियों के भीतर कई तरह की उपक्रान्तियां अपरिहार्य बन कर आती है और उसे सुदृढ़ करती हैं। आज की औद्योगिक क्रान्ति का पहला चरण यान्त्रिक था, दूसरा इल्क्ट्रिकल और तीसरा इल्क्ट्रॉनिक चौथा रोबोटिक होने के कगार पर है। इन चरणों के पूरा होने में बहुत कम समय लगा है क्योंकि गति तेज होती चली गई है। यन्त्रयुग से पहले उपकरण या औजारयुग था जिसमें उत्पादन में व्यक्ति की अपनी प्रतिभा, कौशल और अध्यवसाय की सक्रिय भूमिका थी इसलिए काम के साथ सर्जनातमक आनन्द जुड़ा हुआ था जिसे यन्त्र ने नष्ट कर दिया। अब यह खोज, आविष्कार और यन्त्रनिर्माण (टूलमेकिंग) तक सीमित रह गया है। शेष लोग यन्त्र के सजीव पुर्जे बन जाते हैं।

पुरुष सूक्त कृषिक्रान्ति (जिसे नवपाषाण क्रान्ति भी कह लिया जाता है पर उसमें अव्याप्ति दोष है जो इसकी उपक्रान्तियों को नहीं समेट पाता) पूर्णता के चरण की रचना है। हम प्रयत्न करेंगे कि इसकी प्रत्येक ऋचा के उस भाव तक पहुंचें जिसको बहुगम्य बनाने के लिए मिथकीय रूपविधान का सहारा लिया गया है और फिर अन्त में समाहार करते हुए उन आन्तरिक क्रान्तियों का संकेत करें जिन्हें इसकी देन कहा जा सकता है।

इसकी पहली ऋचा है
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलम्॥१
इसमें सहस्र का अर्थ असंख्य है। असंख्य लोग, असंख्य हाथ, असंख्य पांव इस यज्ञ में जुटे हुए है, इसका प्रसार पूरी धरती पर हो चुका, इतना सब होने के बाद भी यह दश अंगुल में सिमटा हुआ है।
इसमें दशांगुलता को समझने के लिए तीन समीकरणों पर ध्यान देना होगा:
१. विष्णु का वामन रूप
२. यज्ञो वै विष्णु:
३. अग्नि: वै विष्णु: ।
त्वमग्न इन्द्रो वृषभ: सतां असि त्वं विष्णु: उरुगायो नमस्य:।
त्वं ब्रहमा रयिविद ब्रहमणस्पते त्वं विधर्त: सचसे पुरन्ध्या ।। २.१.३
यदि मैं कहूं वह अग्नि ही जिससे झाड़ झंखाड़ को जला कर कृषि के लिए जमीन की सफाई की जाती था विष्णु है, वही यज्ञ भी है। आग से आग लगाने का आयोजन (यज्ञेन यज्ञं अयजन्त देवा: तानि धर्माणि प्रथमानि आसन) एक बार लग जाने के बाद इसका तेजी से फैलना विष्णु का लंबे डग भरना है, और आग लगाकर आगे चलकर अग्नि के ही धरती पर उसके अाग के रूप में, तेजस्वी/प्रतिभाशाली व्यक्ति में, प्रतापी व्यक्ति में, ओषाधियों मे, काठ में, पत्थर में अव्यक्त रूप (ऋं.२.१.१), और अन्तरिक्ष में इन्द्र के रूप में और आकाश में सूर्य के रूप में विद्यमान होने के कारण, इसे विष्णु के तीन कदमों में तीनों लोकों को नापने के रूपक में ढाला गया।

उरुगाय का अर्थ है लंबे डग भरने वाला। वह विष्णु जिसके विषय में कहा गया है समूल्हं अस्य पांसुरे, सारा जगत उस विष्णु के पांवों की धूल पर निर्भर है, वह आग बुझन् के बाद की वह राख है जो अग्निदेव या विष्णु के धरती पर बढ़े चरणों से पैदा हुई है। आरंभ में इसी में बीज बोए जाते थे जो झूम खेती में हाल के दिनों तक चलता रहा ।

इस दशांगुलता में विष्णु के वामन रूप की आवृत्ति है मानें या सूर्य के धरती से दृश्य आकार को यह निर्णय आप स्वयं करें । सूर्य ही है जो धरती की परिक्रमा करता है और फिर भी इससे दूर अलग, छोटा सा दिखाई देता है – व्यस्तभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः ।। 7.99.3

कुछ लोगों को इससे परेशानी हो सकती है कि क्या वैदिक समाज को यह पता था कि धरती गोल है और सूर्य इसकी परिक्रमा करता है। ऐसे लोगों से निवेदन है कि वैदिक समाज में कई स्तरों के लोग और उनके विश्वास प्रचलित थे पर एक स्तर ऐसा भी था जिसके लोगों को यह भी पता था कि धरती और आकाश दोनों विविध गतियों से घूमते हैं – विवर्तेते अहनी चक्रिया इव – भले उनका ध्यान इस ओर ग्रहों का निरीक्षण और साल दिनों के छोटा बड़ा होने पर ध्यान देने के कारण आया हो।

अन्न ही सबका पालन करता है, वही समस्त (जीव) जगत को संभाले हुए है इसलिए जो पहले था आगे होगा सब इसी में समाए हुए है, यही अन्न पर पलने वाले सभी प्राणयों की दीर्घजीविता का कारण है:
पुरुष एव इदम् सर्यवं यत् भूतं यत च भव्यम्। उत अमृतत्वस्य ईशानो यत अन्नेन अतिरोहति॥। २

यदि दूसरे मंडल के पहले सूक्त में वर्णित अग्नि की सर्वव्यापकता पर ध्यान दें इस ऋचा की
पहली अर्धाली का आशय अधिक स्पष्ट हो जाएगा।
आज तो इतना ही।

Post – 2018-02-22

पुरुष सूक्त

भारत सभ्यता का बीजारोपण ही कृषि उत्पादन के रूप में नहीं हुआ था, इसके साथ सामाजिक अनुभवों और कार्यों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने और बाद की पीढ़ियों को हस्तान्तरित करने की एक विधि का भी विकास हुआ था, परिघटनाओं का मानवीकरण या सजीवीकरण करने की विधि। इससे उनमें रोचकता आ जाती थी। सुनने सुनाने की रुचि पैदा हो जाती थी, इनके रूपकीय कलेवर को तोड़ सत्य तक पहुंचने के लिए तरह तरह से व्याख्या करने की प्रवृत्ति पैदा होती थी जिसने आगे चलकर साहित्य के रसास्वादन का रूप लिया और उस चरण पर मिथकों के वास्तविक और कल्पित कथाओं का साहित्यभंडार तैयार किया।

मानवीकरण – घटनाओं, कार्यों, प्राणियों, प्राकृतिक सत्ताओं तक का मानवी- या जैवीकरण – के पीछे सर्वात्मवादी सोच का भी हाथ था या नहीं, यह हम नहीं जानते। पर यह जानते हैं बादलों के विविध रूपों का मानवीकरण – वृत्र, शंबर, चुमुरि, धुनी, अराव्ण, कुयव किए गए, तो पवन की गतियों के अनुसार ग्यारह रुद्रियों की कल्पना कर ली गई, साल के बारह महीनों के सूर्यों के लिए बारह आदित्य कल्पित हो गए, तब तक ज्ञात खनिज द्रव्यों (वसु) के लिए आठ वसु कल्पित हो गए। इस सोच में छन्द भी पशु बन जाते हैं, वाहन बन जाते हैं, रक्षक बन जाते हैं, और गायत्री छन्द को पक्षी (श्येन) का रूप धारण कर सोम को चुरा कर लाने को उड़ जाती है और वापसी में सोमरक्षक गंधर्वों का तीर लगता है तो बेचारी का एक पंख ही कट कर गिर जाता और पर्णवृक्ष बन जाता है। जो भी हो, यदि यह मनोग्राही कलेवर न होता तो बिना कहीं दर्ज किए सुदूर अतीत में घटित घटनाओं को पांच सात हजार साल तक संजोया नहीं जा सकता था। यह काम जितने बड़े पैमाने पर इस देश में हुआ उतने बड़े पैमाने पर अन्त्र कहीे नहीं।

मिथकीय कलेवर में लिपटे इतिहास का नाभिकीय सत्य जानने के लिए इल कलाविधान को, इसके इस अनूठे व्याकरण को समझना जरूरी है । इसी के चलते कृषिकर्म को यज्ञ कहा गया और फिर यज्ञ का मानवीकरण किया गया। वामन और बलि की एक पुरान कथा में हमने बताय था कि विष्णु वनस्पतियों की जड़ों में छिप जाते हैं, और उन्हें भूमि को खोद खोद कर निकाला जाता है। एक अन्य कथा में यज्ञ का सिर काटने का हवाला है, कटे सिर का जो रस (ध्यान रहे कि इसमें रक्त की बात नहीं की गई है) था वह झट पानी में प्रवेश कर गया और उसी से रासभ पैदा हुआ। जिस अधभूले रूप में याद आ रहा है: यो यज्ञस्य शिरो अच्छिद्त, तस्य रस: द्रुत्वाप: प्रविवेश, सो रासभो अभवत।

जब हम पुरुष सूक्त को कृषिक्रान्ति का आख्यान कहते हैं तो साथ में यह भी जोड़ना चाहते हैं क्रान्ति के चरित्र को समझने में भी हम से गलती होती रही है। मेरी समझ से क्रान्तियां सत्ता का परिवर्तन नहीं है जिन्हें एक झटके में पूरा किया जा सके। ये व्यवस्था परिवर्तन हैं, जिनके लिए सत्ता का समर्थन या सहयोग जरूरी नहीं होता। सत्ता को बदलने के लिए भी शक्ति का प्रयोग जरूरी नहीं होता। क्रान्तियां एक झटके में पूरी नहीं हो पातीं, पर इनके प्रभाव से वे भी बचे नहीँ रह पाते जो किसी कारण यह ठान लेते हैं कि वे इनका विरोध करेंगे।

एेसा न होता तो कृषिक्रान्ति के हजारों साल बाद अनेक समाज आहारसंग्रह की अवस्था में न रह जाते। क्रान्तियों के भीतर कई तरह की उपक्रान्तियां अपरिहार्य बन कर आती है और उसे सुदृढ़ करती हैं। आज की औद्योगिक क्रान्ति का पहला चरण यान्त्रिक था, दूसरा इल्क्ट्रिकल और तीसरा इल्क्ट्रॉनिक चौथा रोबोटिक होने के कगार पर है। इन चरणों के पूरा होने में बहुत कम समय लगा है क्योंकि गति तेज होती चली गई है। यन्त्रयुग से पहले उपकरण या औजारयुग था जिसमें उत्पादन में व्यक्ति की अपनी प्रतिभा, कौशल और अध्यवसाय की सक्रिय भूमिका थी इसलिए काम के साथ सर्जनातमक आनन्द जुड़ा हुआ था जिसे यन्त्र ने नष्ट कर दिया। अब यह खोज, आविष्कार और यन्त्रनिर्माण (टूलमेकिंग) तक सीमित रह गया है। शेष लोग यन्त्र के सजीव पुर्जे बन जाते हैं।

पुरुष सूक्त कृषिक्रान्ति (जिसे नवपाषाण क्रान्ति भी कह लिया जाता है पर उसमें अव्याप्ति दोष है जो इसकी उपक्रान्तियों को नहीं समेट पाता) पूर्णता के चरण की रचना है। हम प्रयत्न करेंगे कि इसकी प्रत्येक ऋचा के उस भाव तक पहुंचें जिसको बहुगम्य बनाने के लिए मिथकीय रूपविधान का सहारा लिया गया है और फिर अन्त में समाहार करते हुए उन आन्तरिक क्रान्तियों का संकेत करें जिन्हें इसकी देन कहा जा सकता है।

इसकी पहली ऋचा है
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलम्॥१
इसमें सहस्र का अर्थ असंख्य है। असंख्य लोग, असंख्य हाथ, असंख्य पांव इस यज्ञ में जुटे हुए है, इसका प्रसार पूरी धरती पर हो चुका, इतना सब होने के बाद भी यह दश अंगुल में सिमटा हुआ है।
इसमें दशांगुलता को समझने के लिए तीन समीकरणों पर ध्यान देना होगा:
१. विष्णु का वामन रूप
२. यज्ञो वै विष्णु:
३. अग्नि: वै विष्णु: ।
त्वमग्न इन्द्रो वृषभ: सतां असि त्वं विष्णु: उरुगायो नमस्य:।
त्वं ब्रहमा रयिविद ब्रहमणस्पते त्वं विधर्त: सचसे पुरन्ध्या ।। २.१.३
यदि मैं कहूं वह अग्नि ही जिससे झाड़ झंखाड़ को जला कर कृषि के लिए जमीन की सफाई की जाती था विष्णु है, वही यज्ञ भी है। आग से आग लगाने का आयोजन (यज्ञेन यज्ञं अयजन्त देवा: तानि धर्माणि प्रथमानि आसन) एक बार लग जाने के बाद इसका तेजी से फैलना विष्णु का लंबे डग भरना है, और आग लगाकर आगे चलकर अग्नि के ही धरती पर उसके अाग के रूप में, तेजस्वी/प्रतिभाशाली व्यक्ति में, प्रतापी व्यक्ति में, ओषाधियों मे, काठ में, पत्थर में अव्यक्त रूप (ऋं.२.१.१), और अन्तरिक्ष में इन्द्र के रूप में और आकाश में सूर्य के रूप में विद्यमान होने के कारण, इसे विष्णु के तीन कदमों में तीनों लोकों को नापने के रूपक में ढाला गया।

उरुगाय का अर्थ है लंबे डग भरने वाला। वह विष्णु जिसके विषय में कहा गया है समूल्हं अस्य पांसुरे, सारा जगत उस विष्णु के पांवों की धूल पर निर्भर है, वह आग बुझन् के बाद की वह राख है जो अग्निदेव या विष्णु के धरती पर बढ़े चरणों से पैदा हुई है। आरंभ में इसी में बीज बोए जाते थे जो झूम खेती में हाल के दिनों तक चलता रहा ।

इस दशांगुलता में विष्णु के वामन रूप की आवृत्ति है मानें या सूर्य के धरती से दृश्य आकार को यह निर्णय आप स्वयं करें । सूर्य ही है जो धरती की परिक्रमा करता है और फिर भी इससे दूर अलग, छोटा सा दिखाई देता है – व्यस्तभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः ।। 7.99.3

कुछ लोगों को इससे परेशानी हो सकती है कि क्या वैदिक समाज को यह पता था कि धरती गोल है और सूर्य इसकी परिक्रमा करता है। ऐसे लोगों से निवेदन है कि वैदिक समाज में कई स्तरों के लोग और उनके विश्वास प्रचलित थे पर एक स्तर ऐसा भी था जिसके लोगों को यह भी पता था कि धरती और आकाश दोनों विविध गतियों से घूमते हैं – विवर्तेते अहनी चक्रिया इव – भले उनका ध्यान इस ओर ग्रहों का निरीक्षण और साल दिनों के छोटा बड़ा होने पर ध्यान देने के कारण आया हो।

अन्न ही सबका पालन करता है, वही समस्त (जीव) जगत को संभाले हुए है इसलिए जो पहले था आगे होगा सब इसी में समाए हुए है, यही अन्न पर पलने वाले सभी प्राणयों की दीर्घजीविता का कारण है:
पुरुष एव इदम् सर्यवं यत् भूतं यत च भव्यम्। उत अमृतत्वस्य ईशानो यत अन्नेन अतिरोहति॥। २

यदि दूसरे मंडल के पहले सूक्त में वर्णित अग्नि की सर्वव्यापकता पर ध्यान दें इस ऋचा की
पहली अर्धाली का आशय अधिक स्पष्ट हो जाएगा।
आज तो इतना ही।

Post – 2018-02-22

क्रान्तियां सत्ता का परिवर्तन नहीं है जिन्हें एक झटके में पूरा किया जा सके। ये व्यवस्था परिवर्तन हैं, जिनके लिए सत्ता का समर्थन या सहयोग जरूरी नहीं होता। न ही सत्ता बदलने से क्रान्ति की जा सकती है। बलप्रयोग से समाज का दिमाग नहीं बदला जा सकता। इनकी एकमात्र शक्ति अपरिहार्यता है। इन्हें रोका नहीं जा सकता। ये कभी पूरी नहीं हो पातीं, पर इनके प्रभाव से वे भी बचे नहीँ रह पाते जो किसी कारण यह ठान लेते हैं कि वे इनका विरोध करेंगे।एेसा न होता तो कृषिक्रान्ति के हजारों साल बाद दुनिया के बहुत सारे समाज आहारसंग्रह की अवस्था में न रह जाते। क्रान्तियों के भीतर कई तरह की उपक्रान्तियां अपरिहार्य बन कर आती है और उसे सुदृढ़ करती हैं। आज की औद्योगिक क्रान्ति का पहला चरण यान्त्रिक था, दूसरा इल्क्ट्रिकल और तीसरा इल्क्ट्रॉनिक चौथा रोबोटिक होने के कगार पर है। इन चरणों के पूरा होने में बहुत कम समय लगा है क्योंकि गति तेज होती चली गई है। यन्त्रयुग से पहले उपकरण या औजारयुग था जिसमें उत्पादन में व्यक्ति की अपनी प्रतिभा, कौशल, अध्यवसाय और लगन की सक्रिय भूमिका थी इसलिए काम के साथ सर्जनात्मक आनन्द जुड़ा हुआ था जिसे यन्त्र ने नष्ट कर दिया। अब यह खोज, आविष्कार और यन्त्रनिर्माण (टूलमेकिंग) तक सीमित रह गया है ।

पुरुष सूक्त कृषिक्रान्ति (जिसे नवपाषाण क्रान्ति भी कह लिया जाता है पर उसमें अव्याप्ति दोष है जो इसकी उपक्रान्तियों को नहीं समेट पाता) पूर्णता के चरण की रचना है। हम प्रयत्न करेंगे कि इसकी प्रत्येक ऋचा के उस भाव तक पहुंचें जिसको बहुगम्य बनाने के लिए मिथकीय रूपविधान का सहारा लिया गया है और फिर अन्त में समाहार करते हुए उन आन्तरिक क्रान्तियों का संकेत करें जिन्हें इसकी देन कहा जा सकता है।

इसकी पहली ऋचा है
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलम्॥१
इसमें सहस्र का अर्थ असंख्य है। असंख्य लोग, असंख्य हाथ, असंख्य पांव इस यज्ञ में जुटे हुए है, इसका प्रसार पूरी धरती पर हो चुका, इतना सब होने के बाद भी यह दश अंगुल में सिमटा हुआ है।
इसमें दशांगुलता को समझने के लिए तीन समीकरणों पर ध्यान देना होगा:
१. विष्णु का वामन रूप
२. यज्ञो वै विष्णु:
३. अग्नि: वै विष्णु: ।
त्वमग्न इन्द्रो वृषभ: सतां असि त्वं विष्णु: उरुगायो नमस्य:।
त्वं ब्रहमा रयिविद ब्रहमणस्पते त्वं विधर्त: सचसे पुरन्ध्या ।। २.१.३
यदि मैं कहूं वह अग्नि ही जिससे झाड़ झंखाड़ को जला कर कृषि के लिए जमीन की सफाई की जाती था विष्णु है, वही यज्ञ भी है। आग से आग लगाने का आयोजन (यज्ञेन यज्ञं अयजन्त देवा: तानि धर्माणि प्रथमानि आसन) एक बार लग जाने के बाद इसका तेजी से फैलना विष्णु का लंबे डग भरना है, और आग लगाकर आगे चलकर अग्नि के ही धरती पर उसके अाग के रूप में, तेजस्वी/प्रतिभाशाली व्यक्ति में, प्रतापी व्यक्ति में, ओषाधियों मे, काठ में, पत्थर में अव्यक्त रूप (ऋं.२.१.१), और अन्तरिक्ष में इन्द्र के रूप में और आकाश में सूर्य के रूप में विद्यमान होने के कारण, इसे विष्णु के तीन कदमों में तीनों लोकों को नापने के रूपक में ढाला गया।

उरुगाय का अर्थ है लंबे डग भरने वाला। वह विष्णु जिसके विषय में कहा गया है समूल्हं अस्य पांसुरे, सारा जगत उस विष्णु के पांवों की धूल पर निर्भर है, वह आग बुझन् के बाद की वह राख है जो अग्निदेव या विष्णु के धरती पर बढ़े चरणों से बैदा हुई है। आरंभ में इसी में बीज बोए जाते थे जो झूम खेती में हाल के दिनों तक चलता रहा ।

इस दशांगुलता में विष्णु के वामन रूप की आवृत्ति है मानें या सूर्य के धरती से दृश्य आकार को यह निर्णय आप स्वयं करें । सूर्य ही है जो धरती की परिक्रमा करता है और फिर भी इससे दूर अलग, छोटा सा दिखाई देता है – व्यस्तभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः ।। 7.99.3
अन्न ही सबका पालन करता है, वही समस्त (जीव) जगत को संभाले हुए है इसलिए जो पहले था आगे होगा सब इसी में समाए हुए है, यही अन्न पर पलने वाले सभी प्राणयों की दीर्घजीविता का कारण है:
पुरुष एव इदम् सर्यवं यत् भूतं यत च भव्यम्। उत अमृतत्वस्य ईशानो यत अन्नेन अतिरोहति॥। २
इसकी महिमा अपार है, और यह यज्ञ पुरुष या अग्नि उससे भी बड़ा है। इसके एक पाव में संसार के समस्त जीव हैं, और इसका तीन चौथाई ऊर्ध्व आकाश में है। इस ऋचा में और अगली ऋचा में विष्णु के विषय में अन्यत्र जो कुछ कहा गया है उसकी छाया है, (त्रीणिपदा वि चक्रमे विष्णु: गोपा अदाभ्य: । अतो धर्माणि धारयन्।

Post – 2018-02-22

क्रान्तियां सत्ता का परिवर्तन नहीं है जिन्हें एक झटके में पूरा किया जा सके। ये व्यवस्था परिवर्तन हैं, जिनके लिए सत्ता का समर्थन या सहयोग जरूरी नहीं होता। न ही सत्ता बदलने से क्रान्ति की जा सकती है। बलप्रयोग से समाज का दिमाग नहीं बदला जा सकता। इनकी एकमात्र शक्ति अपरिहार्यता है। इन्हें रोका नहीं जा सकता। ये कभी पूरी नहीं हो पातीं, पर इनके प्रभाव से वे भी बचे नहीँ रह पाते जो किसी कारण यह ठान लेते हैं कि वे इनका विरोध करेंगे।एेसा न होता तो कृषिक्रान्ति के हजारों साल बाद दुनिया के बहुत सारे समाज आहारसंग्रह की अवस्था में न रह जाते। क्रान्तियों के भीतर कई तरह की उपक्रान्तियां अपरिहार्य बन कर आती है और उसे सुदृढ़ करती हैं। आज की औद्योगिक क्रान्ति का पहला चरण यान्त्रिक था, दूसरा इल्क्ट्रिकल और तीसरा इल्क्ट्रॉनिक चौथा रोबोटिक होने के कगार पर है। इन चरणों के पूरा होने में बहुत कम समय लगा है क्योंकि गति तेज होती चली गई है। यन्त्रयुग से पहले उपकरण या औजारयुग था जिसमें उत्पादन में व्यक्ति की अपनी प्रतिभा, कौशल, अध्यवसाय और लगन की सक्रिय भूमिका थी इसलिए काम के साथ सर्जनात्मक आनन्द जुड़ा हुआ था जिसे यन्त्र ने नष्ट कर दिया। अब यह खोज, आविष्कार और यन्त्रनिर्माण (टूलमेकिंग) तक सीमित रह गया है ।

पुरुष सूक्त कृषिक्रान्ति (जिसे नवपाषाण क्रान्ति भी कह लिया जाता है पर उसमें अव्याप्ति दोष है जो इसकी उपक्रान्तियों को नहीं समेट पाता) पूर्णता के चरण की रचना है। हम प्रयत्न करेंगे कि इसकी प्रत्येक ऋचा के उस भाव तक पहुंचें जिसको बहुगम्य बनाने के लिए मिथकीय रूपविधान का सहारा लिया गया है और फिर अन्त में समाहार करते हुए उन आन्तरिक क्रान्तियों का संकेत करें जिन्हें इसकी देन कहा जा सकता है।

इसकी पहली ऋचा है
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलम्॥१
इसमें सहस्र का अर्थ असंख्य है। असंख्य लोग, असंख्य हाथ, असंख्य पांव इस यज्ञ में जुटे हुए है, इसका प्रसार पूरी धरती पर हो चुका, इतना सब होने के बाद भी यह दश अंगुल में सिमटा हुआ है।
इसमें दशांगुलता को समझने के लिए तीन समीकरणों पर ध्यान देना होगा:
१. विष्णु का वामन रूप
२. यज्ञो वै विष्णु:
३. अग्नि: वै विष्णु: ।
त्वमग्न इन्द्रो वृषभ: सतां असि त्वं विष्णु: उरुगायो नमस्य:।
त्वं ब्रहमा रयिविद ब्रहमणस्पते त्वं विधर्त: सचसे पुरन्ध्या ।। २.१.३
यदि मैं कहूं वह अग्नि ही जिससे झाड़ झंखाड़ को जला कर कृषि के लिए जमीन की सफाई की जाती था विष्णु है, वही यज्ञ भी है। आग से आग लगाने का आयोजन (यज्ञेन यज्ञं अयजन्त देवा: तानि धर्माणि प्रथमानि आसन) एक बार लग जाने के बाद इसका तेजी से फैलना विष्णु का लंबे डग भरना है, और आग लगाकर आगे चलकर अग्नि के ही धरती पर उसके अाग के रूप में, तेजस्वी/प्रतिभाशाली व्यक्ति में, प्रतापी व्यक्ति में, ओषाधियों मे, काठ में, पत्थर में अव्यक्त रूप (ऋं.२.१.१), और अन्तरिक्ष में इन्द्र के रूप में और आकाश में सूर्य के रूप में विद्यमान होने के कारण, इसे विष्णु के तीन कदमों में तीनों लोकों को नापने के रूपक में ढाला गया।

उरुगाय का अर्थ है लंबे डग भरने वाला। वह विष्णु जिसके विषय में कहा गया है समूल्हं अस्य पांसुरे, सारा जगत उस विष्णु के पांवों की धूल पर निर्भर है, वह आग बुझन् के बाद की वह राख है जो अग्निदेव या विष्णु के धरती पर बढ़े चरणों से बैदा हुई है। आरंभ में इसी में बीज बोए जाते थे जो झूम खेती में हाल के दिनों तक चलता रहा ।

इस दशांगुलता में विष्णु के वामन रूप की आवृत्ति है मानें या सूर्य के धरती से दृश्य आकार को यह निर्णय आप स्वयं करें । सूर्य ही है जो धरती की परिक्रमा करता है और फिर भी इससे दूर अलग, छोटा सा दिखाई देता है – व्यस्तभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः ।। 7.99.3
अन्न ही सबका पालन करता है, वही समस्त (जीव) जगत को संभाले हुए है इसलिए जो पहले था आगे होगा सब इसी में समाए हुए है, यही अन्न पर पलने वाले सभी प्राणयों की दीर्घजीविता का कारण है:
पुरुष एव इदम् सर्यवं यत् भूतं यत च भव्यम्। उत अमृतत्वस्य ईशानो यत अन्नेन अतिरोहति॥। २
इसकी महिमा अपार है, और यह यज्ञ पुरुष या अग्नि उससे भी बड़ा है। इसके एक पाव में संसार के समस्त जीव हैं, और इसका तीन चौथाई ऊर्ध्व आकाश में है। इस ऋचा में और अगली ऋचा में विष्णु के विषय में अन्यत्र जो कुछ कहा गया है उसकी छाया है, (त्रीणिपदा वि चक्रमे विष्णु: गोपा अदाभ्य: । अतो धर्माणि धारयन्।