Post – 2018-02-11

आर्यों ने क्या किया
(लेख लंबा होकर भी अधूरा ही रह गया)

यदि कोई पूछे आर्यों ने क्या किया तो, इसका उत्तर होगा, ‘उन्होंने खेती की, व्यापार किया और धन के दूसरे स्रोतों को अपने अधिकार में रखा, अपनी सेवा में लगाया, क्षत्रियों को अपनी और अपने माल असबाब की रक्षा के काम पर और ब्राह्मणों को यज्ञ, पूजा और कीर्तन के माध्यम से देव शक्तियों अनुकूल बनाते हुए अपने अनिष्ट के निवारण के काम पर, और शूद्रों को श्रम और दक्षता के दूसरे उपक्रमों में अपनी सहायता के काम पर लगाए रखा।‘ दूसरे शब्दों में कहें तो, उनका सारा प्रयत्न संपदा और संसाधनों को अपने अधिकार में रखने और समाज का ऐसा प्रबंधन करने तक सीमित था जिससे वे संपदा पर अपना अधिकार बनाए रख सकें।

अब इस समस्या पर एक दूसरे सिरे से विचार करें : क्या क्षत्रिय या ब्राहमण को आर्य कहा जा सकता था? यह प्रश्न कुछ ऐसा ही है जैसे यह पूछना कि क्या उन्हें आज सेठ, महाजन, साहूकार कहा जाता है? नहीं, सामुदायिक रूप से इनका प्रयोग वैश्यों के लिए भी नहीं किया जाता है। वैश्यों में भी किसी गरीब बनिये के लिए इन शब्दों का प्रयोग प्रयोग करें तो व्यंग्य जैसा लगेगा। ये शब्द हैं मात्र आदरसूचक पर इनका प्रयोग हैसियत से जुड़ा है, वह धन संपदा की आढ्यता से जुड़ा है। अन्य व्यक्तियों के सम्मानित होने पर, चाहे वह वय के कारण हो, या योग्यता के कारण हो, स्वदेश में इसका भेदक प्रयोग होता था, इसलिए श्रेष्ठता या बड़प्पन का भाव स्पष्ट था। विदेशों में बड़े साहूकारों के ही अड्डे थे इसलिए उनका परिसर और फिर उसके कार्यकलाप के क्षेत्र के लिए संभवत: इसका प्रयोग होता रहा।

देश में हों या परदेस में, ये निश्चिन्त कहीं नहीं रह पाते थे। बस्तियां तो रक्षा प्राचीर बना कर बसाते ही थे जिनमें बाहर के किसी व्यक्ति का प्रवेश बहुत सीमित और काफी जांच पड़ताल के बाद ही संभव था, कारोबार के सिलसिले में या माल-असबाब लेकर चलते समय, रास्ते में जान-माल का संकट बढ़ जाता था। सच कहें तो अपने घर में भी वे चैन की नींद नहीं सो पाते थे।

यहां हम ऋग्वेद के कुछ मंत्रों का ग्रिफिथ द्वारा किया गया अनुवाद यह समझने के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं कि खींचतान के बाद भी उनके अनुवाद में भी इस बात की चिंता पूरे ऋग्वेद में पाई जाती है कि वे सभ्य और शांति प्रेमी लोग थे जो एक ऐसे परिवेश में, जिसमें शेष जगत बर्बरता से ग्रस्त था, तरह-तरह के संकटों से घिरे हुए थे और अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते थे और सुरक्षा की समुचित व्यवस्था के बाद भी देवताओं से गुहार लगाते थे कि वे उनकी रक्षा करें:
स नः दूरात् च असात् च नि मर्दत्घात अघायोः ।
पाहि सदं इत् विश्वायुः ।।
Lord of all life, from near; from far, do thou, O Agni evermore
Protect us from the sinful man. 1-27-3

ऊर्ध्वः नः पाहि अंहसः निकेतुना विश्वं समत्रिणं दह ।
कृधी न ऊर्ध्वान् च रथाय जीवसे विदा देवेषु नः दुवः ।।
Erect, preserve us from sore trouble; with thy flame burn thou each ravening demon dead.
Raise thou us up that we may walk and live. so thou shalt find our worship mid the Gods. 1-36-14

पाहि नो अग्ने रक्षसः पाहि धूर्तेरराव्णः । पाहि रीषत उत वा जिघांसतो बृहद्भानो यविष्ठ्य ।।
Preserve us, Agni, from the fiend, preserve us from malicious wrong.
Save us from him who fain would injure us or slay, Most Youthful, thou with lofty light. 1-36-15

स शेवृधमधि धाः द्यम्नमस्मे महि क्षत्रं जनाषाट् इन्द्र तव्यम् ।
रक्षा च नो मघोनः पाहि सूरीन् राये च नः स्वपत्यै इषः धाः ।।
So give us, Indra, bliss-increasing glory give us great sway and strength that conquers people.
Preserve our wealthy patrons, save our princes; vouchsafe us wealth and food with noble offspring. 1-54-11

त्वं नः अस्या इन्द्र दुर्हणायाः पाहि वज्रिवः दुरितादभीके ।
प्र नः वाजान् रथ्यः अश्वबुध्यान् इषे यन्धि श्रवसे सूनृतायै ।।
Indra, preserve thou us from this affliction Thunder-armed, save us from the misery near us.
Vouchsafe us affluence in chariots, founded on horses, for our food and fame and gladness. 1.121.14

मैंने एक ही मंडल के कुछ सूक्तों में प्रयुक्त पाहि (प्राण रक्षा करो) को तलाश कर इन नमूनों को पेश किया है। पूरे ऋग्वेद में इसकी आवर्तिता बहुत अधिक है। रक्षा की पुकार के लिए त्राहि (त्राहिमां मां देवा निजुरो वृकस्य), अव (जहां यह क्रिया रूप में प्रयुक्त है। इन्द्र वाजेषु नो अव सहस्र प्रधनेषु च) आदि का भी प्रयोग हुआ है, पर साथ ही देवताओं से याचना की गई है कि ‘ऐसी नौबत न आने पाए’ जिसमें ‘मा’ का और ‘न’ प्रयोग हुआ है (मा नो दु:शंस ईशत – दुष्ट हमारे ऊपर हावी न हो जाय)। अन्यथा भी वे अपने भयभीत रहने की बात करते हैं (स्वप्ने भयं भीरवे मह्यं आस – मुझ भय-कातर जन को सपने में भी डर सताता रहता है)। दूसरे सन्दर्भों में भी बार बार उनकी चिन्ता प्रकट होती है – ता नो वसू सुगोपा स्यातं पातं न: वृकात् अघायो:।

जब मैं कहता हूं यह पूरा पाठ, यह गढ़ा हुआ इतिहास जालसाजी का नमूना है तो इसलिए कि इसमें जबरदस्ती, धौंस के बल पर हर कड़ी को उलट कर पेश किया गया। जो डरा हुआ था उसे हत्यारा, क्रूर, युद्धोन्मादी सिद्ध किया गया। जिस पर लुटेरों, बटमारों का हमला हो रहा था, उसे एक सभ्यता पर आक्रमणकारी सिद्ध कर दिया गया। इसका लगातार कई कोनों से, जिनमें भी इसी तरह की धांधली की गई थी, इस तरह शोर मचाया जाता रहा कि, वैदिक का ज्ञान न सही, किसी ने पाश्चात्य विद्वानों द्वारा किए गए अनुवादों तक को नहीं देखा, जिनमें सारी खींचतान के बाद भी, उन अनुवादकों तक ने स्वीकार किया था कि ऋग्वेद में आक्रमण का कोई प्रमाण नहीं मिलता।

हम आर्यों के काम काज की बात कर रहे थे, और माल-मता संभालने और उससे जुड़ी आशंकाओं के अनावश्यक विस्तार में चले गए। हम जिस प्रश्न को केन्द्र में रखना चाहते थे वह यह कि जिन कामों का श्रेय हम आर्यों को देते रहे हैं क्या वे उन्हें करते भी रहे हैं?

आर्यों को जाली इतिहास में भी पशुपालक बताया गया है और वर्ण धर्म में भी गोरक्षा उनका कार्य भार माना गया है। कृषि और वाणिज्य तो माना ही गया है? क्या यह संभव है कि वही व्यक्ति खेती भी करे और गोरू भी चराए ? या वह खेती भी करे और वाणिज्य भी करे? यदि नहीं तो मानना होगा कि पशुपालन करने वालों और किसानी करने वालों को भी आर्य कहा जाता था। यदि ऐसा नहीं है तो मानना होगा आर्य धन दौलत का जुगाड़ करने और उसी के बल पर दूसरों से वे काम कराता था और स्वयं उनके लिए साधन जुटाता, उन की निगरानी करने का काम करता था।

ऋग्वेद में ऐसे संकेत आए हैं जिनसे प्रकट होता है कि पशुओं का मालिक कोई और है और उन्हें चराने वाला (गोप) कोई दूसरा। खेत का मालिक कोई और है और कीनाश या हलवाहा अलग से एक पेशा बन चुका था। संक्षेप में कहें तो ऋग्वेद में कार्यविभाजन हो चुका है, और ऐसा वर्ग अस्तित्व में आ चुका है जो केवल अपने श्रम और दक्षता के माधयम से अपनी जिविका अर्जित करता था, स्वामित्व दूसरे के हाथ में था जो इसके श्रम के उत्पाद को तो अपना मानता ही था, उत्पादक के काम का श्रेय भी उसे ही दिया जाता था। ऐसा आर्यों के हमले की बात करने वालों की कृतियों में खास तौर से इसलिए किया गया कि बर्बर जनों को सभ्यता का जनक सिद्ध किया जा सके।

उदाहरण के लिए उनके द्वारा दावा यह किया जाता रहा कि अश्वपालन का, वन्य अश्व को पकड़ने, पालने, प्रशिक्षित करने का काम आर्यों ने किया, परन्तु भारतीय स्रोत और परंपरा कहते हैं कि अश्व वैदिक समाज को सिन्धियों के माध्यम से प्राप्त होता था और इसलिए इसका एक पर्याय सैंधव है। दूसरी ओर हम पाते हैं कि जिस मध्य एशिया से आर्यों को भारत पर हमला कराया जाता था, उस पर सिन्धियों का दबदबा इतना था कि उसे सिन्तास्ता या सिन्धियों का देश कहा जाता रहा। ये सिन्धी सिन्धु नद के क्षेत्र से वहां जा कर बसें थे, क्योंकि उन्होंने कतिपय नदियों का नामकरण सिन्धु की सहायिकाओं के नाम पर रखा था। इसके दो सरलार्थ हुए । एक यह कि वे वैदिक आर्यों के लिए अश्व का कारोबार करते थे, इसलिए उनकी संपर्क भाषा संस्कृत हो चुकी थी। अश्व और उसके रंग आदि के नाम इसी कारण संस्कृत में है। दूसरी संभावना यह कि उनके अश्वपालन की दक्षता का उपयोग वैदिक व्यापारी कर रहे थे। कारोबार के मालिक ये थे और सहायक या असली काम में उन्होंने सिन्धी जनों को लगा रखा था।

इसकी पुष्टि पश्चिम एशिया के उन अभिलेखों और देवनामों और व्यक्तिनामों से होती है, जो सभी वैदिक हैं, पर अशवपालन पर जो पाठ था जिसकी भाषा प्राकृत या संस्कृत का अपभ्रंश है, परन्तु प्रशिक्षक का नाम किक्कुली है, जो निश्चय ही अवैदिक है। इस तरह अश्वपालन का जो श्रेय आर्यों को दिया जाता रहा वह गलत था, इसका श्रेय इतर जनों को जाता है।

यह कहना भी गलत है कि आर्यों ने पहिए का आविष्कार किया । हमने एक शोधपत्र में यह बताया था कि पहिए के आविष्कार तीन-चार भिन्न भाषाई समुदाय के लोग कर रहे थे, जिनमें एक आर्यभाषी भी थे, परन्तु अरायुक्त पहिए का आविष्कार भृगुओं ने किया था जो असुर परंपरा के थे।

प्रसंगवश यह भी जिक्र कर दें कि अश्व शब्द के परवर्ती प्रयोग के कारण पाश्चात्य विद्वान इसे घास के मैदानों (स्तेप) के घोड़ों का नाम मान कर घोड़ा लेकर आने वाले आर्यों की छवि तैयार करते रहे। अश्व कच्छ से आयात किए जाने वाले गधे के लिए प्रयोग में आ रहा था। अश्व के अनेकश: पर्यायों मे से कौन भारतीय घोड़े के लिए प्रयोग में आ रहा था इसे हम छोड़ सकते हैं, पर यह याद दिलाना जरूरी है कि स्तेप के घोड़े के लिए वे ककुहास का प्रयोग करते थे। ककुभ का अर्थ टीला या पहाड़ की चोटी भी होता है इसलिए पश्चिम एशिया की बाजार में जब उन्होंने इसे उतारा तो इसे वहां की भाषा में भी पहाड़ी गधा कहा गया।

हम अपनी पुरानी बात को पुन: दुहराते हुए अन्त करें कि भारतीय सभ्यता का औद्योगिक तथा प्रौद्योगिक विकास तथाकथित शूद्रों और अन्य जनों पर निर्भर रहा है। वैदिक आर्यों की भूमिका पहल और प्रेरणा की रह गई थी ।

Post – 2018-02-09

(2)

यदि हम पुराण कथाओं की अन्त: प्रकृति या उसकी रचना प्रक्रिया की समझ रखते हैं तो वे उस युग को समझने में उतनी ही सहायक हो सकते हैं जैसे आज तक का साहित्य अपने-अपने कालों को समझने में सहायक होता है। यह न भूलना चाहिए कि पुराण अपनी सीमा में विश्वकोश हैं, परन्तु पुराण कथाएं लेखनपूर्व चरणों की साहित्यिक रचनाएं होती थीं, जिनका चरित्र बाद की उपदेश कथाओं जैसा था। सच कहें तो उपदेश कथाएं उसी परंपरा का विस्तार हैं। इनकी सोद्देश्यता इनका प्राण है। दुर्भाग्य से हाल के दिनों में इसकी समझ राजनीतिक लाभ के लिए जान बूझ कर नष्ट की गई है, और इनका उपयोग वहशीपन पैदा करने के लिए किया जा रहा है, क्योंकि अशान्ति क्रान्ति का वहम तो पैदा कर ही लेती है।

यदि आप विविध चरणों पर देवासुर संग्राम को लें तो आहारसंचय के चरण से लेकर सभ्यता के कई चरणों का इतिहास चित्रवत सामने आ जाएगा । यहां हम केवल समुद्रमंथन की कथा की चर्चा करेंगे। इस कथा में सुदूर व्यापार को प्रतीकबद्ध किया गया है। सुदूर व्यापार में आज के दक्षिण एशियाई भूभाग से ले कर आर्यभाषा का पूरा प्रसारक्षेत्र आ जाता है । उल्लेख तो समुद्रमंथन का है, पर इसमें जलमार्ग और स्थलमार्ग दोनों से गहन सक्रियता – चरैवेति चरैवेति – आ जाती है। इसके दो तथ्यों पर ध्यान देना जरूरी है । पहला यह कि जिस वासुकी नाग को रस्सी बना समुद्र का मंथन किया गया उससे जो विषैली फुफकार छूटती थी उसे देव झेल नहीं सकते, इसलिए फन के सिरे को असुर पकड़ते हैं और पूंछ वाले सिरे को देव समाज संभालता है। यह याद दिला दें कि जिस अमृत के लिए ‘समुद्रमंथन’ किया जा रहा था वह सोना था – अमृतं हिरण्यम् ; व्यापारिक लाभ था। गाय और घोड़ा समुद्र से तो नहीं निकल सकते, पर कच्छ और गुजरात गायों घोड़ों के लिए और गीर के वन गजराज के लिए प्रसिद्ध हैं । कच्छ के एक स्थल का नाम घोड़ेवाली वाडी (मंडी) है जहां से हड़प्पाकालीन अवशेष मिलने का दावा किया गया है।

जिस तथ्य की ओर हम ध्यान दिलाना चाहते हैं वह यह कि जोखिम भरा और कठिन श्रम, खतरों से बचाव का काम असुर करते है, पर पहल, वितरण व्यवस्था देवों के हाथ में रहती है।

सभ्यता का पूरा तंन्त्र श्रमिकों, कारीगरों, आविष्कारकों आदि पर निर्भर रहा है जब कि कतर-व्यौंत से संपत्ति संग्रह और साधनों पर अधिकार करने वाले पहल और प्रबन्धन अपने हाथ में रखते रहे हैं, और अधिकतम उत्पाद या लाभ अपने पास रख कर केवल उतना ही उत्पादकों को देते रहे हैं, जिससे उसका भरण-पोषण होता रहे और नई सूझ-बूझ वाले कारीगर/विशेषज्ञ कुछ मौज मस्ती में रह सकें, जब कि उनके मन में इस बेईमानी को लेकर असन्तोष रहा है और समय-समय पर वे इसके लिए विद्रोह भी करते रहे हैं। इसे देवासुर संग्राम, या मार्क्सवादी शब्दावली में शोषक और शोषित का टकराव कहा जा सकता है। इसी अर्थ में मार्क्स के इस कथन को समझा जा सकता है कि पहले के सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है जिसका बहुत भोंड़ा अर्थ भारत में वर्ण ही वर्ग है, कर लिया गया। दुनिया के सभी देशों में संपत्ति पर अधिकार करने वालों और संपत्ति से वंचित रह गए या कर दिए जाने वालों का और अपने श्रम और योग्यता को उनकी सेवा में लगाकर जीविका अर्जित करने वालों के दो वर्ग रहे हैं। भारत में इस व्यवस्था को अधिक अचूक बना लिया गया था।

यदि आर्य विशेषण का प्रयोग स्वामी और वैश्य के लिए होता रहा है और यदि वैश्य के अधिकार में संपत्ति के तीनों स्रोत – कृषि वाणिज्य, गोरक्षा या पशुपालन रहा है, तो वैश्य और स्वामी दोनों का अर्थ एक ही हुआ। ऐसी दशा में ब्राह्मण और क्षत्रिय भी वैश्यों के उपजीवी, रक्षा और अनिष्ट निवारण की योग्यताओं के कारण उसके आश्रित हुए जिनकी अन्य भूमिकाओं में एक हुआ, उत्पादक वर्ग को नियन्त्रित रखना। आर्य शब्द का आशय ही नहीं इस पूरे तन्त्र का जितना स्पष्ट प्रतिबिंबन ऋग्वेद में है वैसा मेरी जानकारी में किसी अन्य कृति में नहीं है । यह ध्यान रहे कि स्वामिवर्ग और समाज के नियंत्रण और प्रबन्धन में उसका सहायक या अनुषंगी वर्ग कुछ भी उत्पादित नहीं करता था।

संस्कृत भाषी आर्य यदि कहीं अन्यत्र से भारत में आए होते, परन्तु उस समाज के क्रतुविद या वैज्ञानिकों, कलाविदों और श्रमिकों की भूमिका को भी इस सुझाव में स्थान दिया गया होता, और हम बिना तोड़ मरोड़ के उन सामाजिक और आर्थिक संबंधों को समझ पाते तो उस दशा में उन्हें आदि काल से भारत का निवासी सिद्ध करने वाले मुझे दुराग्रही ही नहीं, इतिहास को समझने में बाधक और उपद्रवी भी लगते।

परन्तु यहां सारा जोर लूटने, मारने, कब्जा जमाने पर था और यह काम इतनी धूर्तता से किया गया जैसी जुआड़ियों और अपराधियों में भी देखने में नहीं आती । सभ्यता के निर्माताओं को जादू की छड़ी से गायब कर दिया गया, सभ्यता का श्रेय उसका विनाश करने वाले दुर्दान्त, बर्बर, रक्तपिपाशुओं को दे दिया गया। बाद में समय समय पर वैसे ही बर्बर और रक्तपिपाशु जत्थों को भारतीय समाज में नई ऊर्जा का संचार करने वाला सिद्ध किया जाता रहा, और सबसे बड़ी बात यह कि यह तर्क खड़ा किया जाता रहा कि भारत में सदा से आक्रमणकारी ही सत्ता पर अधिकार करके राज्य करते रहे हैं, इसलिए जो अधिकार उन्हें हासिल था वह अंग्रेजों को भी हासिल है। यह उनकी जरूरत थी यह समझ में आता है, पर यह समझ में नहीं आता कि मार्क्सवादी इतिहासकारों की कौन सी जरूरत थी कि वे उपनिवेशवादियों और मिशनरियों के साथ लामबंद होते रहे और यूरोपीय इतिहासकारों की शरारत को उजागर करने वाले भारतीय इतिहासकारों का उपहास करते और पाठ्यक्रमों से बाहर करते रहे।

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह कि वे भारतीय सभ्यता के निर्माण में आर्येतर समाज की विशेषत: असवर्ण समुदायों की भूमिका को स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए जब कि एक मार्क्सवादी के रूप में उन्हें इनकी भूमिका को केन्द्रीयता देनी चाहिए थी। हम आगे यह देखेंगे कि आर्यों को जिन भी बातों का श्रेय दिया जाता है उनमें से कोई भी उनकी खोज या आविष्कार नहीं है। उनका श्रेय असुर कहे जाने वाले जनों को है जिन्हे कोसंबी ने हैवान कह कर दरकिनार कर दिया था।

Post – 2018-02-09

(2)

यदि हम पुराण कथाओं की अन्त: प्रकृति या उसकी रचना प्रक्रिया की समझ रखते हैं तो वे उस युग को समझने में उतनी ही सहायक हो सकते हैं जैसे आज तक का साहित्य अपने-अपने कालों को समझने में सहायक होता है। यह न भूलना चाहिए कि पुराण अपनी सीमा में विश्वकोश हैं, परन्तु पुराण कथाएं लेखनपूर्व चरणों की साहित्यिक रचनाएं होती थीं, जिनका चरित्र बाद की उपदेश कथाओं जैसा था। सच कहें तो उपदेश कथाएं उसी परंपरा का विस्तार हैं। इनकी सोद्देश्यता इनका प्राण है। दुर्भाग्य से हाल के दिनों में इसकी समझ राजनीतिक लाभ के लिए जान बूझ कर नष्ट की गई है, और इनका उपयोग वहशीपन पैदा करने के लिए किया जा रहा है, क्योंकि अशान्ति क्रान्ति का वहम तो पैदा कर ही लेती है।

यदि आप विविध चरणों पर देवासुर संग्राम को लें तो आहारसंचय के चरण से लेकर सभ्यता के कई चरणों का इतिहास चित्रवत सामने आ जाएगा । यहां हम केवल समुद्रमंथन की कथा की चर्चा करेंगे। इस कथा में सुदूर व्यापार को प्रतीकबद्ध किया गया है। सुदूर व्यापार में आज के दक्षिण एशियाई भूभाग से ले कर आर्यभाषा का पूरा प्रसारक्षेत्र आ जाता है । उल्लेख तो समुद्रमंथन का है, पर इसमें जलमार्ग और स्थलमार्ग दोनों से गहन सक्रियता – चरैवेति चरैवेति – आ जाती है। इसके दो तथ्यों पर ध्यान देना जरूरी है । पहला यह कि जिस वासुकी नाग को रस्सी बना समुद्र का मंथन किया गया उससे जो विषैली फुफकार छूटती थी उसे देव झेल नहीं सकते, इसलिए फन के सिरे को असुर पकड़ते हैं और पूंछ वाले सिरे को देव समाज संभालता है। यह याद दिला दें कि जिस अमृत के लिए ‘समुद्रमंथन’ किया जा रहा था वह सोना था – अमृतं हिरण्यम् ; व्यापारिक लाभ था। गाय और घोड़ा समुद्र से तो नहीं निकल सकते, पर कच्छ और गुजरात गायों घोड़ों के लिए और गीर के वन गजराज के लिए प्रसिद्ध हैं । कच्छ के एक स्थल का नाम घोड़ेवाली वाडी (मंडी) है जहां से हड़प्पाकालीन अवशेष मिलने का दावा किया गया है।

जिस तथ्य की ओर हम ध्यान दिलाना चाहते हैं वह यह कि जोखिम भरा और कठिन श्रम, खतरों से बचाव का काम असुर करते है, पर पहल, वितरण व्यवस्था देवों के हाथ में रहती है।

सभ्यता का पूरा तंन्त्र श्रमिकों, कारीगरों, आविष्कारकों आदि पर निर्भर रहा है जब कि कतर-व्यौंत से संपत्ति संग्रह और साधनों पर अधिकार करने वाले पहल और प्रबन्धन अपने हाथ में रखते रहे हैं, और अधिकतम उत्पाद या लाभ अपने पास रख कर केवल उतना ही उत्पादकों को देते रहे हैं, जिससे उसका भरण-पोषण होता रहे और नई सूझ-बूझ वाले कारीगर/विशेषज्ञ कुछ मौज मस्ती में रह सकें, जब कि उनके मन में इस बेईमानी को लेकर असन्तोष रहा है और समय-समय पर वे इसके लिए विद्रोह भी करते रहे हैं। इसे देवासुर संग्राम, या मार्क्सवादी शब्दावली में शोषक और शोषित का टकराव कहा जा सकता है। इसी अर्थ में मार्क्स के इस कथन को समझा जा सकता है कि पहले के सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है जिसका बहुत भोंड़ा अर्थ भारत में वर्ण ही वर्ग है, कर लिया गया। दुनिया के सभी देशों में संपत्ति पर अधिकार करने वालों और संपत्ति से वंचित रह गए या कर दिए जाने वालों का और अपने श्रम और योग्यता को उनकी सेवा में लगाकर जीविका अर्जित करने वालों के दो वर्ग रहे हैं। भारत में इस व्यवस्था को अधिक अचूक बना लिया गया था।

यदि आर्य विशेषण का प्रयोग स्वामी और वैश्य के लिए होता रहा है और यदि वैश्य के अधिकार में संपत्ति के तीनों स्रोत – कृषि वाणिज्य, गोरक्षा या पशुपालन रहा है, तो वैश्य और स्वामी दोनों का अर्थ एक ही हुआ। ऐसी दशा में ब्राह्मण और क्षत्रिय भी वैश्यों के उपजीवी, रक्षा और अनिष्ट निवारण की योग्यताओं के कारण उसके आश्रित हुए जिनकी अन्य भूमिकाओं में एक हुआ, उत्पादक वर्ग को नियन्त्रित रखना। आर्य शब्द का आशय ही नहीं इस पूरे तन्त्र का जितना स्पष्ट प्रतिबिंबन ऋग्वेद में है वैसा मेरी जानकारी में किसी अन्य कृति में नहीं है । यह ध्यान रहे कि स्वामिवर्ग और समाज के नियंत्रण और प्रबन्धन में उसका सहायक या अनुषंगी वर्ग कुछ भी उत्पादित नहीं करता था।

संस्कृत भाषी आर्य यदि कहीं अन्यत्र से भारत में आए होते, परन्तु उस समाज के क्रतुविद या वैज्ञानिकों, कलाविदों और श्रमिकों की भूमिका को भी इस सुझाव में स्थान दिया गया होता, और हम बिना तोड़ मरोड़ के उन सामाजिक और आर्थिक संबंधों को समझ पाते तो उस दशा में उन्हें आदि काल से भारत का निवासी सिद्ध करने वाले मुझे दुराग्रही ही नहीं, इतिहास को समझने में बाधक और उपद्रवी भी लगते।

परन्तु यहां सारा जोर लूटने, मारने, कब्जा जमाने पर था और यह काम इतनी धूर्तता से किया गया जैसी जुआड़ियों और अपराधियों में भी देखने में नहीं आती । सभ्यता के निर्माताओं को जादू की छड़ी से गायब कर दिया गया, सभ्यता का श्रेय उसका विनाश करने वाले दुर्दान्त, बर्बर, रक्तपिपाशुओं को दे दिया गया। बाद में समय समय पर वैसे ही बर्बर और रक्तपिपाशु जत्थों को भारतीय समाज में नई ऊर्जा का संचार करने वाला सिद्ध किया जाता रहा, और सबसे बड़ी बात यह कि यह तर्क खड़ा किया जाता रहा कि भारत में सदा से आक्रमणकारी ही सत्ता पर अधिकार करके राज्य करते रहे हैं, इसलिए जो अधिकार उन्हें हासिल था वह अंग्रेजों को भी हासिल है। यह उनकी जरूरत थी यह समझ में आता है, पर यह समझ में नहीं आता कि मार्क्सवादी इतिहासकारों की कौन सी जरूरत थी कि वे उपनिवेशवादियों और मिशनरियों के साथ लामबंद होते रहे और यूरोपीय इतिहासकारों की शरारत को उजागर करने वाले भारतीय इतिहासकारों का उपहास करते और पाठ्यक्रमों से बाहर करते रहे।

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह कि वे भारतीय सभ्यता के निर्माण में आर्येतर समाज की विशेषत: असवर्ण समुदायों की भूमिका को स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए जब कि एक मार्क्सवादी के रूप में उन्हें इनकी भूमिका को केन्द्रीयता देनी चाहिए थी। हम आगे यह देखेंगे कि आर्यों को जिन भी बातों का श्रेय दिया जाता है उनमें से कोई भी उनकी खोज या आविष्कार नहीं है। उनका श्रेय असुर कहे जाने वाले जनों को है जिन्हे कोसंबी ने हैवान कह कर दरकिनार कर दिया था।

Post – 2018-02-09

(2)

यदि हम पुराण कथाओं की अन्त: प्रकृति या उसकी रचना प्रक्रिया की समझ रखते हैं तो वे उस युग को समझने में उतनी ही सहायक हो सकते हैं जैसे आज तक का साहित्य अपने-अपने कालों को समझने में सहायक होता है। यह न भूलना चाहिए कि पुराण अपनी सीमा में विश्वकोश हैं, परन्तु पुराण कथाएं लेखनपूर्व चरणों की साहित्यिक रचनाएं होती थीं, जिनका चरित्र बाद की उपदेश कथाओं जैसा था। सच कहें तो उपदेश कथाएं उसी परंपरा का विस्तार हैं। इनकी सोद्देश्यता इनका प्राण है। दुर्भाग्य से हाल के दिनों में इसकी समझ राजनीतिक लाभ के लिए जान बूझ कर नष्ट की गई है, और इनका उपयोग वहशीपन पैदा करने के लिए किया जा रहा है, क्योंकि अशान्ति क्रान्ति का वहम तो पैदा कर ही लेती है।

यदि आप विविध चरणों पर देवासुर संग्राम को लें तो आहारसंचय के चरण से लेकर सभ्यता के कई चरणों का इतिहास चित्रवत सामने आ जाएगा । यहां हम केवल समुद्रमंथन की कथा की चर्चा करेंगे। इस कथा में सुदूर व्यापार को प्रतीकबद्ध किया गया है। सुदूर व्यापार में आज के दक्षिण एशियाई भूभाग से ले कर आर्यभाषा का पूरा प्रसारक्षेत्र आ जाता है । उल्लेख तो समुद्रमंथन का है, पर इसमें जलमार्ग और स्थलमार्ग दोनों से गहन सक्रियता – चरैवेति चरैवेति – आ जाती है। इसके दो तथ्यों पर ध्यान देना जरूरी है । पहला यह कि जिस वासुकी नाग को रस्सी बना समुद्र का मंथन किया गया उससे जो विषैली फुफकार छूटती थी उसे देव झेल नहीं सकते, इसलिए फन के सिरे को असुर पकड़ते हैं और पूंछ वाले सिरे को देव समाज संभालता है। यह याद दिला दें कि जिस अमृत के लिए ‘समुद्रमंथन’ किया जा रहा था वह सोना था – अमृतं हिरण्यम् ; व्यापारिक लाभ था। गाय और घोड़ा समुद्र से तो नहीं निकल सकते, पर कच्छ और गुजरात गायों घोड़ों के लिए और गीर के वन गजराज के लिए प्रसिद्ध हैं । कच्छ के एक स्थल का नाम घोड़ेवाली वाडी (मंडी) है जहां से हड़प्पाकालीन अवशेष मिलने का दावा किया गया है।

जिस तथ्य की ओर हम ध्यान दिलाना चाहते हैं वह यह कि जोखिम भरा और कठिन श्रम, खतरों से बचाव का काम असुर करते है, पर पहल, वितरण व्यवस्था देवों के हाथ में रहती है।

सभ्यता का पूरा तंन्त्र श्रमिकों, कारीगरों, आविष्कारकों आदि पर निर्भर रहा है जब कि कतर-व्यौंत से संपत्ति संग्रह और साधनों पर अधिकार करने वाले पहल और प्रबन्धन अपने हाथ में रखते रहे हैं, और अधिकतम उत्पाद या लाभ अपने पास रख कर केवल उतना ही उत्पादकों को देते रहे हैं, जिससे उसका भरण-पोषण होता रहे और नई सूझ-बूझ वाले कारीगर/विशेषज्ञ कुछ मौज मस्ती में रह सकें, जब कि उनके मन में इस बेईमानी को लेकर असन्तोष रहा है और समय-समय पर वे इसके लिए विद्रोह भी करते रहे हैं। इसे देवासुर संग्राम, या मार्क्सवादी शब्दावली में शोषक और शोषित का टकराव कहा जा सकता है। इसी अर्थ में मार्क्स के इस कथन को समझा जा सकता है कि पहले के सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है जिसका बहुत भोंड़ा अर्थ भारत में वर्ण ही वर्ग है, कर लिया गया। दुनिया के सभी देशों में संपत्ति पर अधिकार करने वालों और संपत्ति से वंचित रह गए या कर दिए जाने वालों का और अपने श्रम और योग्यता को उनकी सेवा में लगाकर जीविका अर्जित करने वालों के दो वर्ग रहे हैं। भारत में इस व्यवस्था को अधिक अचूक बना लिया गया था।

यदि आर्य विशेषण का प्रयोग स्वामी और वैश्य के लिए होता रहा है और यदि वैश्य के अधिकार में संपत्ति के तीनों स्रोत – कृषि वाणिज्य, गोरक्षा या पशुपालन रहा है, तो वैश्य और स्वामी दोनों का अर्थ एक ही हुआ। ऐसी दशा में ब्राह्मण और क्षत्रिय भी वैश्यों के उपजीवी, रक्षा और अनिष्ट निवारण की योग्यताओं के कारण उसके आश्रित हुए जिनकी अन्य भूमिकाओं में एक हुआ, उत्पादक वर्ग को नियन्त्रित रखना। आर्य शब्द का आशय ही नहीं इस पूरे तन्त्र का जितना स्पष्ट प्रतिबिंबन ऋग्वेद में है वैसा मेरी जानकारी में किसी अन्य कृति में नहीं है । यह ध्यान रहे कि स्वामिवर्ग और समाज के नियंत्रण और प्रबन्धन में उसका सहायक या अनुषंगी वर्ग कुछ भी उत्पादित नहीं करता था।

संस्कृत भाषी आर्य यदि कहीं अन्यत्र से भारत में आए होते, परन्तु उस समाज के क्रतुविद या वैज्ञानिकों, कलाविदों और श्रमिकों की भूमिका को भी इस सुझाव में स्थान दिया गया होता, और हम बिना तोड़ मरोड़ के उन सामाजिक और आर्थिक संबंधों को समझ पाते तो उस दशा में उन्हें आदि काल से भारत का निवासी सिद्ध करने वाले मुझे दुराग्रही ही नहीं, इतिहास को समझने में बाधक और उपद्रवी भी लगते।

परन्तु यहां सारा जोर लूटने, मारने, कब्जा जमाने पर था और यह काम इतनी धूर्तता से किया गया जैसी जुआड़ियों और अपराधियों में भी देखने में नहीं आती । सभ्यता के निर्माताओं को जादू की छड़ी से गायब कर दिया गया, सभ्यता का श्रेय उसका विनाश करने वाले दुर्दान्त, बर्बर, रक्तपिपाशुओं को दे दिया गया। बाद में समय समय पर वैसे ही बर्बर और रक्तपिपाशु जत्थों को भारतीय समाज में नई ऊर्जा का संचार करने वाला सिद्ध किया जाता रहा, और सबसे बड़ी बात यह कि यह तर्क खड़ा किया जाता रहा कि भारत में सदा से आक्रमणकारी ही सत्ता पर अधिकार करके राज्य करते रहे हैं, इसलिए जो अधिकार उन्हें हासिल था वह अंग्रेजों को भी हासिल है। यह उनकी जरूरत थी यह समझ में आता है, पर यह समझ में नहीं आता कि मार्क्सवादी इतिहासकारों की कौन सी जरूरत थी कि वे उपनिवेशवादियों और मिशनरियों के साथ लामबंद होते रहे और यूरोपीय इतिहासकारों की शरारत को उजागर करने वाले भारतीय इतिहासकारों का उपहास करते और पाठ्यक्रमों से बाहर करते रहे।

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह कि वे भारतीय सभ्यता के निर्माण में आर्येतर समाज की विशेषत: असवर्ण समुदायों की भूमिका को स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए जब कि एक मार्क्सवादी के रूप में उन्हें इनकी भूमिका को केन्द्रीयता देनी चाहिए थी। हम आगे यह देखेंगे कि आर्यों को जिन भी बातों का श्रेय दिया जाता है उनमें से कोई भी उनकी खोज या आविष्कार नहीं है। उनका श्रेय असुर कहे जाने वाले जनों को है जिन्हे कोसंबी ने हैवान कह कर दरकिनार कर दिया था।

Post – 2018-02-08

इतिहास का ध्वंस

हमने उन आततायियों के बारे में सुन रखा है जिन्होंने धार्मिक उन्माद में अनुपम कलाकृतियों को नष्ट किया, उन को रौंद कर, अपवित्र करके पैशाचिक आनन्द लेते रहे, आराधना स्थलों को मटियामेट करते हुए पुरातन वास्तुकृतियों की स्मृति तक मिटा दी, शिक्षाकेन्द्रों को ध्वस्त किया और ग्रन्थागारों को जलाकर खाक किया कि दुनिया से ज्ञान-विज्ञान समाप्त हो जाये, और लोग उनके धर्मग्रन्थ में क्या लिखा, केवल उस पर विश्वास करने को बाध्य हो जायं, किसी तरह का तर्क-वितर्क तक न करें और यदि करें तो इसे धर्मद्रोह करार दे कर उनकी हत्या कर दी जाए।

हमें यह सबसे जघन्य कार्य प्रतीत होता है, यद्यपि ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जो भावी निर्माण की कोई स्पष्ट कल्पना के बिना भी हर तरह की तोड़फोड़ को एक श्लाघ्य काम मानते हों, क्योंकि यदि पुराना नष्ट हो गया तो कुछ तो नया बनेगा ही। अत: मूर्तिभंजक उनके कोश में श्लाघा का अर्थ रखता है। यदि नई कृति परंपरा से हट कर और अधिक प्रभावशाली हो तो ऐसे रचनाकार को भी चौंकाने के लिए मूर्तिभंजक कह दिया जाता है। (परन्तु क्या युगान्तरकारी सर्जना को ध्वंस का पर्याय बनाया जा सकता है? यदि बनाया गया तो यह किस मानसिकता का सूचक है? गाली को अपनी संज्ञा बनाने वाले, गाली को अपनी बनाने वाले, उसी को अपने प्रतिरोध और सर्जनात्मकता का घोष बनाने वाले, और विद्रोह के तेवर के बावजूद युगों के अपमान से दहकने वाले और इसके बावजूद अपमान बोध से न उबर पाने वाले समाजों की पीड़ा का अध्ययन अभी तक हुआ नहीं है)।

परंतु हमने जिन पैशाचिक और सभ्यताद्रोही कृत्यों का हवाला दिया वे उतने ध्वंसकारी नहीं हैं जितना कुतर्क और अपव्याख्या से इतिहास को नष्ट करना। कारण भौतिक ध्वंस के बाद भी भग्न प्रतिमाएं और वास्तुकृतियां इस कुकृत्य की याद दिलाती रहती है, ज्ञानसंपदा का बहुत कुछ नष्ट होने बाद इतना कुछ बचा रहता, या जुटा लिया जाता है कि इसे हानि तो कहा जा सकता है सर्वनाश नहीं। मनोबल पर इसका असर नहीं पड़ता। अपव्याख्या से सांस्कृतिक विनाश ही नहीं किया जाता, अपितु इसके मलबे को इस हद तक शिरोधार्य बना दिया जाता है, कुतर्कों का खंडन करते हुए सांस्कृतिक पुनरुद्धार का प्रयत्न डरावना प्रतीत होने लगता है सबसे प्रबुद्ध माना जाने वाला तबका, जिसे यह काम करना चाहि, वह किसी न किसी बहाने सांस्कृतिक विनाश करने वालों के साथ लामबन्द हो जाता है । कम से कम हमारा जातीय अनुभव यही रहा है।

सभ्यताएं जहां देशज प्रतीत होती हैं वहां भी देशज नहीं होती हैं। उनके निर्माण में इतने सुदूर ज्ञात और अज्ञात देशों और इतने युगों के ईंट गारे लगे होते हैं कि उनका चरित्र सार्वभौम और बहुकालिक होता है और हम इस विषय में सावधान हों या नहीं, अपने वर्तमान में भी हम एक साथ कई कालों को जीते हैं। यह बात सभ्यता के उत्थान से लेकर आज तक के सभी चरणों पर लागू होती है। अत: किसी भी कारण से किसी भी सभ्यता या संस्कृति की अपव्याख्या मानव सभ्यता के प्रतिअपघात है। यह उन प्रधान कारणों में से एक है कि ज्ञान विज्ञान में आकाश के तारे तोड़ने के मुहावरे साकार करने वाले अपनी ही धरती को उस नरक में बदलते जा रहे हैं जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।

बात केवल इतिहास की नहीं है, यदि आप किसी वस्तु, क्रिया या विचार को समझना चाहते हैं तो उसे जहां, जिस रूप में पाते हैं उसी रूप में, अपनी ओर से किसी तरह का घालमेल किए बिना ही समझ सकते हैं। समझने के बाद यह तय कर सकते हैं कि इसका हम क्या उपयोग कर सकते हैं, या इससे क्या सीख सकते हैं।

परन्तु यदि आप किसी पर हावी होना चाहते हैं, और पहली ही पहचान में आपको लगे यदि इससे टकराया तो यह हमें नष्ट कर देगा तो आप के पास दो विकल्प बच रहते हैं। या तो आप उससे बच कर, दूरी बना कर रहें या उसे मिटाने का प्रयत्न करें।

इस बात की याद दिलाना जरूरी है कि हिंदू मूल्य-व्यवस्था, संस्कृत भाषा और संस्कृत साहित्य में उपलब्ध वांग्मय – साहित्य, पुराण, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान, धर्म-विश्वास – से यूरोपियनों का जब भी, जितना परिचय हुआ, इसने या तो उन्हें अभिभूत किया अथवा आतंकित किया। पहले का परिणाम मैक्नाटन जैसे लोग थेईसाई प्रचारकों को गालियां देते हुए उन्हें जाहिल और धर्मान्ध कहते थे और कहते थे धर्म और दर्शन के मामले में हिन्दुओं को वे कुछ सिखा नहीं सकते और जिनकी रुझान को देखते हुए मिशनरी शोर मचाने लगे थे कि यदि यही हाल रहा तो कंपनी का शासन और इसके शेयरधारकों की चांदी तो रहेगी, पर सारे अंग्रेज हिन्दू हो जाएंगे, इसलिए कंपनी को इस बात के लिए बाध्य किया जाना चाहिए कि वह राजशक्ति का प्रयोग करते हुए हिन्दुओं के धर्मान्तरण में सहायक हो।

अत: संस्कृत साहित्य का अध्ययन इसमें रचित कृतियों को समझने के लिए नहीं अपितु कुतर्क से इनको नष्ट करने के लिए आरंभ हुआ, इसके लिए धनबल और जनबल का प्रबन्ध किया गया, और कंपनी सरकार कितना आगे बढ़ कर इसके लिए सत्ता का प्रयोग कर रही थी इसे इस बात से ही समझा जा सकता हैं कि वह अपने ही सिपाहियों की धार्मिक संवेदना और आर्थिक विवशता को जानते हुए उनके ईसाई बनने का रास्ता तैयार करना चाह रही थी जिसके विरुद्ध आक्रोश स्वतंत्रता संग्राम के नियत तिथि से पहले आरंभ होने का कारण बना था।

रोचक बात यह है कि हिन्दुत्व के किले पर गोलाबारी करने की बात वे खुल कर करते थे, इसलिए आश्चर्य होता है कि इस पर हमारे अपने विद्वानों ने उस समय ध्यान क्यों नहीं दिया । इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि जैसे वे कुछ पुस्तकों और पत्रिकाओं के अंकों मे प्रकाशित सामग्री के कारण वे उन्हें प्रतिबन्धित कर देते थे, प्रतियां जब्त कर लेते थे, प्रेस ऐक्ट के दबाव से ऐसी सामग्री छपने नहीं देते थे, उसी तरह कुछ सामग्री ऐसी रही हो सकती है जिसे केवल यूरोपीय विद्वानों के लिए ही सुलभ कराते रहे हों। हमें इस बात पर आश्चर्य अवश्य होता है कि जब वे भारतीय लेखकों के, अपने लिए असुविधाजनक व्याख्याओं और निष्कर्षों को खारिज करने के लिए उन्हें देशप्रेम से प्रेरित बताते थे, तो किसी ने खुले रूप में स्वीकार किए जाने वाले हमलों को धर्मांधता से प्रेरित कह कर उनकी आलोचना क्यों नहीं की।

Post – 2018-02-08

इतिहास का ध्वंस

हमने उन आततायियों के बारे में सुन रखा है जिन्होंने धार्मिक उन्माद में अनुपम कलाकृतियों को नष्ट किया, उन को रौंद कर, अपवित्र करके पैशाचिक आनन्द लेते रहे, आराधना स्थलों को मटियामेट करते हुए पुरातन वास्तुकृतियों की स्मृति तक मिटा दी, शिक्षाकेन्द्रों को ध्वस्त किया और ग्रन्थागारों को जलाकर खाक किया कि दुनिया से ज्ञान-विज्ञान समाप्त हो जाये, और लोग उनके धर्मग्रन्थ में क्या लिखा, केवल उस पर विश्वास करने को बाध्य हो जायं, किसी तरह का तर्क-वितर्क तक न करें और यदि करें तो इसे धर्मद्रोह करार दे कर उनकी हत्या कर दी जाए।

हमें यह सबसे जघन्य कार्य प्रतीत होता है, यद्यपि ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जो भावी निर्माण की कोई स्पष्ट कल्पना के बिना भी हर तरह की तोड़फोड़ को एक श्लाघ्य काम मानते हों, क्योंकि यदि पुराना नष्ट हो गया तो कुछ तो नया बनेगा ही। अत: मूर्तिभंजक उनके कोश में श्लाघा का अर्थ रखता है। यदि नई कृति परंपरा से हट कर और अधिक प्रभावशाली हो तो ऐसे रचनाकार को भी चौंकाने के लिए मूर्तिभंजक कह दिया जाता है। (परन्तु क्या युगान्तरकारी सर्जना को ध्वंस का पर्याय बनाया जा सकता है? यदि बनाया गया तो यह किस मानसिकता का सूचक है? गाली को अपनी संज्ञा बनाने वाले, गाली को अपनी बनाने वाले, उसी को अपने प्रतिरोध और सर्जनात्मकता का घोष बनाने वाले, और विद्रोह के तेवर के बावजूद युगों के अपमान से दहकने वाले और इसके बावजूद अपमान बोध से न उबर पाने वाले समाजों की पीड़ा का अध्ययन अभी तक हुआ नहीं है)।

परंतु हमने जिन पैशाचिक और सभ्यताद्रोही कृत्यों का हवाला दिया वे उतने ध्वंसकारी नहीं हैं जितना कुतर्क और अपव्याख्या से इतिहास को नष्ट करना। कारण भौतिक ध्वंस के बाद भी भग्न प्रतिमाएं और वास्तुकृतियां इस कुकृत्य की याद दिलाती रहती है, ज्ञानसंपदा का बहुत कुछ नष्ट होने बाद इतना कुछ बचा रहता, या जुटा लिया जाता है कि इसे हानि तो कहा जा सकता है सर्वनाश नहीं। मनोबल पर इसका असर नहीं पड़ता। अपव्याख्या से सांस्कृतिक विनाश ही नहीं किया जाता, अपितु इसके मलबे को इस हद तक शिरोधार्य बना दिया जाता है, कुतर्कों का खंडन करते हुए सांस्कृतिक पुनरुद्धार का प्रयत्न डरावना प्रतीत होने लगता है सबसे प्रबुद्ध माना जाने वाला तबका, जिसे यह काम करना चाहि, वह किसी न किसी बहाने सांस्कृतिक विनाश करने वालों के साथ लामबन्द हो जाता है । कम से कम हमारा जातीय अनुभव यही रहा है।

सभ्यताएं जहां देशज प्रतीत होती हैं वहां भी देशज नहीं होती हैं। उनके निर्माण में इतने सुदूर ज्ञात और अज्ञात देशों और इतने युगों के ईंट गारे लगे होते हैं कि उनका चरित्र सार्वभौम और बहुकालिक होता है और हम इस विषय में सावधान हों या नहीं, अपने वर्तमान में भी हम एक साथ कई कालों को जीते हैं। यह बात सभ्यता के उत्थान से लेकर आज तक के सभी चरणों पर लागू होती है। अत: किसी भी कारण से किसी भी सभ्यता या संस्कृति की अपव्याख्या मानव सभ्यता के प्रतिअपघात है। यह उन प्रधान कारणों में से एक है कि ज्ञान विज्ञान में आकाश के तारे तोड़ने के मुहावरे साकार करने वाले अपनी ही धरती को उस नरक में बदलते जा रहे हैं जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।

बात केवल इतिहास की नहीं है, यदि आप किसी वस्तु, क्रिया या विचार को समझना चाहते हैं तो उसे जहां, जिस रूप में पाते हैं उसी रूप में, अपनी ओर से किसी तरह का घालमेल किए बिना ही समझ सकते हैं। समझने के बाद यह तय कर सकते हैं कि इसका हम क्या उपयोग कर सकते हैं, या इससे क्या सीख सकते हैं।

परन्तु यदि आप किसी पर हावी होना चाहते हैं, और पहली ही पहचान में आपको लगे यदि इससे टकराया तो यह हमें नष्ट कर देगा तो आप के पास दो विकल्प बच रहते हैं। या तो आप उससे बच कर, दूरी बना कर रहें या उसे मिटाने का प्रयत्न करें।

इस बात की याद दिलाना जरूरी है कि हिंदू मूल्य-व्यवस्था, संस्कृत भाषा और संस्कृत साहित्य में उपलब्ध वांग्मय – साहित्य, पुराण, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान, धर्म-विश्वास – से यूरोपियनों का जब भी, जितना परिचय हुआ, इसने या तो उन्हें अभिभूत किया अथवा आतंकित किया। पहले का परिणाम मैक्नाटन जैसे लोग थेईसाई प्रचारकों को गालियां देते हुए उन्हें जाहिल और धर्मान्ध कहते थे और कहते थे धर्म और दर्शन के मामले में हिन्दुओं को वे कुछ सिखा नहीं सकते और जिनकी रुझान को देखते हुए मिशनरी शोर मचाने लगे थे कि यदि यही हाल रहा तो कंपनी का शासन और इसके शेयरधारकों की चांदी तो रहेगी, पर सारे अंग्रेज हिन्दू हो जाएंगे, इसलिए कंपनी को इस बात के लिए बाध्य किया जाना चाहिए कि वह राजशक्ति का प्रयोग करते हुए हिन्दुओं के धर्मान्तरण में सहायक हो।

अत: संस्कृत साहित्य का अध्ययन इसमें रचित कृतियों को समझने के लिए नहीं अपितु कुतर्क से इनको नष्ट करने के लिए आरंभ हुआ, इसके लिए धनबल और जनबल का प्रबन्ध किया गया, और कंपनी सरकार कितना आगे बढ़ कर इसके लिए सत्ता का प्रयोग कर रही थी इसे इस बात से ही समझा जा सकता हैं कि वह अपने ही सिपाहियों की धार्मिक संवेदना और आर्थिक विवशता को जानते हुए उनके ईसाई बनने का रास्ता तैयार करना चाह रही थी जिसके विरुद्ध आक्रोश स्वतंत्रता संग्राम के नियत तिथि से पहले आरंभ होने का कारण बना था।

रोचक बात यह है कि हिन्दुत्व के किले पर गोलाबारी करने की बात वे खुल कर करते थे, इसलिए आश्चर्य होता है कि इस पर हमारे अपने विद्वानों ने उस समय ध्यान क्यों नहीं दिया । इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि जैसे वे कुछ पुस्तकों और पत्रिकाओं के अंकों मे प्रकाशित सामग्री के कारण वे उन्हें प्रतिबन्धित कर देते थे, प्रतियां जब्त कर लेते थे, प्रेस ऐक्ट के दबाव से ऐसी सामग्री छपने नहीं देते थे, उसी तरह कुछ सामग्री ऐसी रही हो सकती है जिसे केवल यूरोपीय विद्वानों के लिए ही सुलभ कराते रहे हों। हमें इस बात पर आश्चर्य अवश्य होता है कि जब वे भारतीय लेखकों के, अपने लिए असुविधाजनक व्याख्याओं और निष्कर्षों को खारिज करने के लिए उन्हें देशप्रेम से प्रेरित बताते थे, तो किसी ने खुले रूप में स्वीकार किए जाने वाले हमलों को धर्मांधता से प्रेरित कह कर उनकी आलोचना क्यों नहीं की।

Post – 2018-02-08

इतिहास का ध्वंस

हमने उन आततायियों के बारे में सुन रखा है जिन्होंने धार्मिक उन्माद में अनुपम कलाकृतियों को नष्ट किया, उन को रौंद कर, अपवित्र करके पैशाचिक आनन्द लेते रहे, आराधना स्थलों को मटियामेट करते हुए पुरातन वास्तुकृतियों की स्मृति तक मिटा दी, शिक्षाकेन्द्रों को ध्वस्त किया और ग्रन्थागारों को जलाकर खाक किया कि दुनिया से ज्ञान-विज्ञान समाप्त हो जाये, और लोग उनके धर्मग्रन्थ में क्या लिखा, केवल उस पर विश्वास करने को बाध्य हो जायं, किसी तरह का तर्क-वितर्क तक न करें और यदि करें तो इसे धर्मद्रोह करार दे कर उनकी हत्या कर दी जाए।

हमें यह सबसे जघन्य कार्य प्रतीत होता है, यद्यपि ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जो भावी निर्माण की कोई स्पष्ट कल्पना के बिना भी हर तरह की तोड़फोड़ को एक श्लाघ्य काम मानते हों, क्योंकि यदि पुराना नष्ट हो गया तो कुछ तो नया बनेगा ही। अत: मूर्तिभंजक उनके कोश में श्लाघा का अर्थ रखता है। यदि नई कृति परंपरा से हट कर और अधिक प्रभावशाली हो तो ऐसे रचनाकार को भी चौंकाने के लिए मूर्तिभंजक कह दिया जाता है। (परन्तु क्या युगान्तरकारी सर्जना को ध्वंस का पर्याय बनाया जा सकता है? यदि बनाया गया तो यह किस मानसिकता का सूचक है? गाली को अपनी संज्ञा बनाने वाले, गाली को अपनी बनाने वाले, उसी को अपने प्रतिरोध और सर्जनात्मकता का घोष बनाने वाले, और विद्रोह के तेवर के बावजूद युगों के अपमान से दहकने वाले और इसके बावजूद अपमान बोध से न उबर पाने वाले समाजों की पीड़ा का अध्ययन अभी तक हुआ नहीं है)।

परंतु हमने जिन पैशाचिक और सभ्यताद्रोही कृत्यों का हवाला दिया वे उतने ध्वंसकारी नहीं हैं जितना कुतर्क और अपव्याख्या से इतिहास को नष्ट करना। कारण भौतिक ध्वंस के बाद भी भग्न प्रतिमाएं और वास्तुकृतियां इस कुकृत्य की याद दिलाती रहती है, ज्ञानसंपदा का बहुत कुछ नष्ट होने बाद इतना कुछ बचा रहता, या जुटा लिया जाता है कि इसे हानि तो कहा जा सकता है सर्वनाश नहीं। मनोबल पर इसका असर नहीं पड़ता। अपव्याख्या से सांस्कृतिक विनाश ही नहीं किया जाता, अपितु इसके मलबे को इस हद तक शिरोधार्य बना दिया जाता है, कुतर्कों का खंडन करते हुए सांस्कृतिक पुनरुद्धार का प्रयत्न डरावना प्रतीत होने लगता है सबसे प्रबुद्ध माना जाने वाला तबका, जिसे यह काम करना चाहि, वह किसी न किसी बहाने सांस्कृतिक विनाश करने वालों के साथ लामबन्द हो जाता है । कम से कम हमारा जातीय अनुभव यही रहा है।

सभ्यताएं जहां देशज प्रतीत होती हैं वहां भी देशज नहीं होती हैं। उनके निर्माण में इतने सुदूर ज्ञात और अज्ञात देशों और इतने युगों के ईंट गारे लगे होते हैं कि उनका चरित्र सार्वभौम और बहुकालिक होता है और हम इस विषय में सावधान हों या नहीं, अपने वर्तमान में भी हम एक साथ कई कालों को जीते हैं। यह बात सभ्यता के उत्थान से लेकर आज तक के सभी चरणों पर लागू होती है। अत: किसी भी कारण से किसी भी सभ्यता या संस्कृति की अपव्याख्या मानव सभ्यता के प्रतिअपघात है। यह उन प्रधान कारणों में से एक है कि ज्ञान विज्ञान में आकाश के तारे तोड़ने के मुहावरे साकार करने वाले अपनी ही धरती को उस नरक में बदलते जा रहे हैं जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।

बात केवल इतिहास की नहीं है, यदि आप किसी वस्तु, क्रिया या विचार को समझना चाहते हैं तो उसे जहां, जिस रूप में पाते हैं उसी रूप में, अपनी ओर से किसी तरह का घालमेल किए बिना ही समझ सकते हैं। समझने के बाद यह तय कर सकते हैं कि इसका हम क्या उपयोग कर सकते हैं, या इससे क्या सीख सकते हैं।

परन्तु यदि आप किसी पर हावी होना चाहते हैं, और पहली ही पहचान में आपको लगे यदि इससे टकराया तो यह हमें नष्ट कर देगा तो आप के पास दो विकल्प बच रहते हैं। या तो आप उससे बच कर, दूरी बना कर रहें या उसे मिटाने का प्रयत्न करें।

इस बात की याद दिलाना जरूरी है कि हिंदू मूल्य-व्यवस्था, संस्कृत भाषा और संस्कृत साहित्य में उपलब्ध वांग्मय – साहित्य, पुराण, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान, धर्म-विश्वास – से यूरोपियनों का जब भी, जितना परिचय हुआ, इसने या तो उन्हें अभिभूत किया अथवा आतंकित किया। पहले का परिणाम मैक्नाटन जैसे लोग थेईसाई प्रचारकों को गालियां देते हुए उन्हें जाहिल और धर्मान्ध कहते थे और कहते थे धर्म और दर्शन के मामले में हिन्दुओं को वे कुछ सिखा नहीं सकते और जिनकी रुझान को देखते हुए मिशनरी शोर मचाने लगे थे कि यदि यही हाल रहा तो कंपनी का शासन और इसके शेयरधारकों की चांदी तो रहेगी, पर सारे अंग्रेज हिन्दू हो जाएंगे, इसलिए कंपनी को इस बात के लिए बाध्य किया जाना चाहिए कि वह राजशक्ति का प्रयोग करते हुए हिन्दुओं के धर्मान्तरण में सहायक हो।

अत: संस्कृत साहित्य का अध्ययन इसमें रचित कृतियों को समझने के लिए नहीं अपितु कुतर्क से इनको नष्ट करने के लिए आरंभ हुआ, इसके लिए धनबल और जनबल का प्रबन्ध किया गया, और कंपनी सरकार कितना आगे बढ़ कर इसके लिए सत्ता का प्रयोग कर रही थी इसे इस बात से ही समझा जा सकता हैं कि वह अपने ही सिपाहियों की धार्मिक संवेदना और आर्थिक विवशता को जानते हुए उनके ईसाई बनने का रास्ता तैयार करना चाह रही थी जिसके विरुद्ध आक्रोश स्वतंत्रता संग्राम के नियत तिथि से पहले आरंभ होने का कारण बना था।

रोचक बात यह है कि हिन्दुत्व के किले पर गोलाबारी करने की बात वे खुल कर करते थे, इसलिए आश्चर्य होता है कि इस पर हमारे अपने विद्वानों ने उस समय ध्यान क्यों नहीं दिया । इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि जैसे वे कुछ पुस्तकों और पत्रिकाओं के अंकों मे प्रकाशित सामग्री के कारण वे उन्हें प्रतिबन्धित कर देते थे, प्रतियां जब्त कर लेते थे, प्रेस ऐक्ट के दबाव से ऐसी सामग्री छपने नहीं देते थे, उसी तरह कुछ सामग्री ऐसी रही हो सकती है जिसे केवल यूरोपीय विद्वानों के लिए ही सुलभ कराते रहे हों। हमें इस बात पर आश्चर्य अवश्य होता है कि जब वे भारतीय लेखकों के, अपने लिए असुविधाजनक व्याख्याओं और निष्कर्षों को खारिज करने के लिए उन्हें देशप्रेम से प्रेरित बताते थे, तो किसी ने खुले रूप में स्वीकार किए जाने वाले हमलों को धर्मांधता से प्रेरित कह कर उनकी आलोचना क्यों नहीं की।

Post – 2018-02-06

कोई व्यक्ति मेरे ही लिखे को मेरे पेज पर अपने नाम के साथ टैग करता है तो क्या मुझे उसे अमित्र करना चाहिए या नहीं? कृपया शेयर करें, टैग नहीं। शेयर भी कुछ विलंब से, संपादन के बाद। मैं प्रशंसा के लिए नहीं, संवाद के लिए फेसबुक पर पोस्ट करता हूं जिससे दूसरा पक्ष भी सामने आए और मुझे भी अपनी त्रुटियां पता चलें। टिप्पणी में निर्मम रहें।

Post – 2018-02-06

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Post – 2018-02-06

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