Post – 2018-03-10

आसमान की तलाश

मेरे तीन आसमान हैं, एक जिसमें सूरज चांद चक्कर लगाते हैं, दो मेरी लालसाओं के जिन्हें पूरा करने की कोशिश में मैं कुछ दूर चल कर जाने कैसे भटक जाता हूं। इनमें से एक है मेरी अपनी कहानी, वह कौन सी चीज है जो मुझे किसी से भी पूरी तरह सहमत नहीं होने देती, स्वयं अपने आप से भी। लगता है सब कुछ अधूरा है, जो लिखता हूं वह भी, जो लिखा वह भी, अौर यह अधूरापन ही उसे सार्थक बनाता है। अपने बारे में लिखना अपने निजी को निर्व्याज सार्वजनिक बनाना है। यह कष्टकर काम है और इतना कठिन कि लिखना भी चाहता हूं और इस ताक में भी रहता हूं कि कोई बहाना मिले और छूट भागूं।

पर मैंने दो दिन पहले जब कहा था निगाह फिर से आसमान पर है तो यह आसमान भारोपीय भाषा का आसमान था। इसे समझने के लिए मैंने अब तक जितने प्रयत्न किए, सभी अधूरे रह गए। कुछ कमियां मेरी अपनी हैं, मैं प्रशिक्षित भाषाविज्ञानी नहीं हूं।

मैं जिस भाषाविज्ञान की बात कर रहा हूं वह भाषाविज्ञान है भी नहीं। यदि होता तो मेरे लिए इसमें विधिवत प्रशिक्षित होना अपरिहार्य होता। इसके लिए पहले से भाषाशास्त्र या फिलालोजी का प्रयोग होता रहा है। केवल कुछसमय के लिए इसे ऐतिहासिक और तुलनात्मक भाषाविज्ञान कहाने का गौरव मिला, और फिर यह पता चला कि ऐतिहासिक और तुलनात्मक होने की अपनी विशेषता के कारण ही यह विज्ञान नहीं हो सकता।

परन्तु एक दुखद सचाई यह कि यह न ऐतिहासिक बन पाया न तुलनातमक। दोनों मामलों में इतनी धौंस-पट्टी और इतनी ढकोसलेबाजी से काम लिया गया कि यह जिस सीमित भूमिका का निर्वाह कर सकता था उसे भी पूरा नहीं कर पाया। गलतियां सभी क्षेत्रों में होती हैं और यहां भी होतीं तो कोई हानि न होती। इसमें पहली नजर में ही गलत अटकलबाजियों को सही ठहराने के लिए पश्चिमी विद्वान आकाश-पाताल एक करते रहे। इसलिए वे उन बुनियादी गलतियों को भी सही नहीं कर पाए जिनको उन्होंने सवयं भांप लिया था। इसके कारण
भारतीय इतिहास और भाषाविज्ञान में असंभव को संभव और संभव को दरकिनार करने के लिए कुतर्क जुटाते हुए यह समझाया जाता रहा कि ऐसा कहीं और तो संभव नहीं पर भारत में यही नियम रहा है। सबसे बड़ी बात यह कि तुलनात्मक भाषाविज्ञान की अकाट्य बना दी गई स्थापनाएं उनकी थीं जो अपने साहसिक दावों को देखते हुए न तो सुशिक्षित थे न प्रशिक्षित। ऐसी दशा में मेरा प्रशिक्षित न होना कोई दोष नहीं रह जाता।

मेरी समस्या प्रशिक्षण से और बढ़ती है क्योंकि तुलनात्मक अध्ययन के लिए जो विधि विकसित की गई वह लंगड़ी और औंधी है। इसमें एक पूर्ण विकसित परिनिष्ठित भाषा को आदि भाषा या उसके सर्वाधिक निकट मान कर अध्ययन आरंभ किया गया था और यह जिद आज तक पालनी होती है अन्यथा सारे किए कराए काम कौड़ी मोल के भी न रह जाएं।

इन कठिनाइयों के अतिरिक्त फेसबुक पर इस विषय की चर्चा की अपनी सीमाएं हैं। हम जानते हैं गणित और भाषा ये दो चीजें ऐसी है जिनके बिना ज्ञान संभव नहीं है इसके बाद भी किसी व्यक्ति को सबसे कम दिलचस्पी गणित और नई भाषा सीखने, भाषा का इतिहास जानने में होती है । ये दोनों जितने आसान हैं उतने ही कठिन। अपनी व्याप्ति में ये दोनों। समस्त ब्रह्मांड को अपने भीतर समेट लेते हैं इसलिए इनका गहन ज्ञान उतना ही दुष्कर भी है और जिनकी इनमें गति है उनके लिए अक्षय आनन्द के स्रोत।

सबसे पहले मैं भाषा की उत्पत्ति और विकास प्रक्रिया को समझना चाहता हूं । भाषा क्या है? यदि इस प्रश्न का उत्तर एक वाक्य में देना हो तो कहना होगा की भाषा श्रुत सार्थक ध्वनियों का पुनरुत्पादन है। मोटे तौर पर यह शर्त सभी जीवों जंतुओं की बोली पर लागू होती है और इसीलिए प्राचीन भारतीयभाषा चिंतकों ने पशु-पक्ी आदि की भाषा की कल्पना की थी और मानुषी वाणी को उसी क्रम मेंअगला विकास माना था।

हम जानते हैं कि मनुष्य जो कुछ सुनता है उसी की अनुकृति करता है। गूंगे बच्चे को कुछ सुनाई नहीं देता । कमी उसके उच्चारण तंत्र में नहीं होती, उसकी श्रवणशक्ति में होती है। वह सुन नहीं पाता इसलिए बोल नहीं पाता।

बहुत प्राचीन काल से अब तक बहुत सारे लोगों ने यह समझने की कोशिश की शिशु को यदि कोई भाषा सुनने सीखने को न मिले तो वह कौन सी भाषा बोलता है । असल में उनकी जिज्ञासा यह थी कि दुनिया की सबसे पहली भाषा कौन सी है। उनकी रुचि भाषा से अधिक अपने धर्म की श्रेष्ठता का प्रमाण ढूंढ़ने में थी। ईसाई बहुत बाद मानते थे कि आदम ने जिस भाषा में चीजों को नाम दिया होगा वह हिब्रू थी।

हमारे लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा कौन सी है बल्कि यह है की मनुष्य ने सार्थक भाषा का आविष्कार कैसे किया ? दूसरे जीव जंतुओं की एक सीमित संकेत प्रणाली है जो दृश्य सीमा में बहुत सही काम करती है। जो दूर है, अनुपस्थित है, उसे किस तरह व्यक्त किया जाए इसके लिए उनके पास कोई संकेत प्रणाली न थी।

हम कहें कि मनुष्य की भाषा अनुपस्थित का साक्षात्कार तो बहुत गलत नहीं होगा । जो दृश्य है उसके लिए भाषा की आवश्यकता नहीं थी। हम संकेतों से अभी तक काम लेते हैं और कई दृष्टियों से यह भाषा की तुलना में अधिक प्रभावशाली होती है और कम समय में कार्य करने में सक्षम होती हैं । उदाहरण के लिए ट्रैफिक संकेत को ले सकते हैं । वाचिक भाषा के साथ जितनी अनिश्चितता बनी रहती है उतनी अनिश्चितता संकेत प्रणालियों के साथ नहीं देखने में आती है। एक ही शब्द उच्चारण की भिन्नता के हिसाब इतने तरह के आशय वहन कर सकता है उसके विधि और निषेध दोनों उसी में समाहित हो जाएं ।

Post – 2018-03-09

दर्द ने थोड़ी सी फुर्सत दी है
निगाह फिर से आसमान पर है।

Post – 2018-03-09

दर्द ने थोड़ी सी फुर्सत दी है
निगाह फिर से आसमान पर है।

Post – 2018-03-09

दर्द ने थोड़ी सी फुर्सत दी है
निगाह फिर से आसमान पर है।

Post – 2018-03-08

को बड़ छोट कहत अपराधू।
निज गुन-दोष गनहिं नहिं ‘साधू’ ।।

Post – 2018-03-08

को बड़ छोट कहत अपराधू।
निज गुन-दोष गनहिं नहिं ‘साधू’ ।।

Post – 2018-03-08

को बड़ छोट कहत अपराधू।
निज गुन-दोष गनहिं नहिं ‘साधू’ ।।

Post – 2018-03-07

परिशिष्ट
()

मेरी कोई बात पूरी नहीं हो पाती इसलिए पिछली पोस्टों में भी कुछ जरूरी बातें कहने से रह गईं। पहली पुरुषसूक्त के संबंध में है। अधिकांश लेखकों ने इसे ब्राह्मणों की शरारत से बाद में जोड़ा हुआ माना है। अकेले अंबेडकर इसके अपवाद है जिन्होंने दूसरी परंपराओं में ऐसी कथा के प्रचलन को देखते हुए इसे न केवल पुराना माना है, अपितु इसकी बहुत मार्मिक व्याख्या की है।

कुछ यूरोपीय अध्येताओं ने इसकी भाषा को देखते हुए इसे नया तो माना है, पर स्कैंडिनेवियन पुराणकथाओं में भी इससे मिलती कथा के कारण अपनी समझ से इसकी कथावस्तु को प्राचीन, अपनी परिभाषा के संयुक्त भारोपीय काल का माना और जातीय स्मृति में उसके बने रह जाने के कारण बाद में रचित सिद्ध करते रहे। अांबेडकर जी ने भी उसका अवलोकन किया होगा और उसी के आधार पर यह मान लिया था कि सृष्टि कि ऐसी व्याख्यायें दूसरे आदिम समाजों में भी रही हैं। वह आर्य जाति और आर्य आक्रमण को गलत मानते थे और इसे स्वीकार करने के लिए ब्राह्मणों पर व्यंग्य भी करते थे इसलिए अधिक अच्छा रहा होता कि वह मानते यह कथा या व्याख्या पश्चिम में संस्कृत भाषा की तरह भारत से स्कैंडिनेविया तक फैली थी। पर ऐसा तभी हो सकता था जब यज्ञ की उस प्रकृति को उन्होंने समझा होता। वेद पर इतना समय लगाने के लिए उनके पास न था।

यज्ञपुरुष, यज्ञ स्वयं भी, अग्नि का मूर्तीकरण है, यह तथ्य ऋग्वेद के दसवे मंडल के ही अनेक सूक्तों में बहुत स्पष्ट है। पुरुष सूक्त का पुरुष सहस्राक्ष है । अग्नि सहस्राक्ष हैं, “सहस्र अक्षभि: विचक्षे अग्ने” (१०.७९.५); पुरुष सहस्रशीर्ष है, तो अग्नि का मुख सभी दिशाओं में है “विश्वत: प्रत्यक् असि” (वही) । लेकिन सबसे जीवन्त है “विश्वत: चक्षु: उत विश्वत:मुख: विश्वत: बाहु: उत विश्वत: पात् । सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रै: द्यावा भूमिं जनयन् देव एक: ।” (१०.८१.३) इस सूक्त में अग्नि को विश्वकर्मा कहा गया है और उनके तीनों धामों का भी उल्लेख है, “या ते धामानि परमाणि या अवमा या मध्यमा विश्वकर्मन् उत इमा।” (१०.८१.५)।

इससे अगले सूक्त का वर्ण्यविषय (देवता) ही विश्वकर्मा है और ” विश्वकर्मा विमना आत् विहाया धाता विधाता परम् उत सन्दृक्” (१०.८२.२)। कहने का तात्पर्य यह कि भौतिक उत्पादन की चिन्तारेखा कैसे विश्वब्रह्मांड की सृष्टि से जुड़ती है और इस पर निरंतर ऊहापोह चलता है, जिसकी सर्वोत्तम अभिव्यक्ति नासदीय सूक्त में देखने को मिलता है। पुरुष सूक्त इसी चिन्ताधारा की एक कड़ी है न कि प्रयत्नपूर्वक घुसाई हुई चीज।

इसका ऐतिहासिक महत्व यह कि यूरोप पर्यन्त वैदिक व्यवहार भाषा का प्रसार इसकी रचना के बाद तक होता रहा है जिसका प्रमाण स्कैंडिनेवियाई परंपरा है।

दूसरी कड़ी का संबंध पहल के अभाव से है। विशेषज्ञता के क्षेत्रों में कमाल हासिल करके जीविका उपार्जन करने वाले उस दशा में कैसे संतुष्ट रह सकते थे जब कि उनको मात्र जीवन यापन के ही साधन उपलब्ध थे जब कि उन्ही के उत्पादों से व्यापार वाणिज्य करने वाले मालदार हो जाते थे। ऐसा नहीं है कि संपत्तिसंग्रह और संपदा के स्रोतों पर अधिकार में चूक जाने के बाद अपने उत्पाद का उचित मूल्य पाने की भी उनमें इच्छा का अभाव था। उन्होंने समय समय पर अपने गिल्ड बनाए, विपणन का काम भी संभाला परन्तु वे पैसे के लिए उस आनन्द को छोड़ नहीं सकते थे जो उन्हें अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र से मिलता था। अपनी अल्पतम जरूरत पूरी हो जाने के बाद धन दौलत के पीछे भागने की प्रवृत्ति का उनमें अभाव था । यह कुछ वैसा ही है जैसे किसी कवि,कलाकार, संगीतकार से कोई कहे कि वह अपनी रुचि के क्षेत्र को छोड़कर दूकान कर ले तो जितना कमाता है उससे कई गुना कमा सकता है। पहल और विषज्ञता, डकार और आह्लाद के इस अन्तर को, प्रतिभा और पहल के इस द्ववन्द्वात्मक संबंध को समझना जरूरी है। व्यापारिक श्रेणियों की विफलता का भी यही कारण रहा होगा।

Post – 2018-03-07

परिशिष्ट
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मेरी कोई बात पूरी नहीं हो पाती इसलिए पिछली पोस्टों में भी कुछ जरूरी बातें कहने से रह गईं। पहली पुरुषसूक्त के संबंध में है। अधिकांश लेखकों ने इसे ब्राह्मणों की शरारत से बाद में जोड़ा हुआ माना है। अकेले अंबेडकर इसके अपवाद है जिन्होंने दूसरी परंपराओं में ऐसी कथा के प्रचलन को देखते हुए इसे न केवल पुराना माना है, अपितु इसकी बहुत मार्मिक व्याख्या की है।

कुछ यूरोपीय अध्येताओं ने इसकी भाषा को देखते हुए इसे नया तो माना है, पर स्कैंडिनेवियन पुराणकथाओं में भी इससे मिलती कथा के कारण अपनी समझ से इसकी कथावस्तु को प्राचीन, अपनी परिभाषा के संयुक्त भारोपीय काल का माना और जातीय स्मृति में उसके बने रह जाने के कारण बाद में रचित सिद्ध करते रहे। अांबेडकर जी ने भी उसका अवलोकन किया होगा और उसी के आधार पर यह मान लिया था कि सृष्टि कि ऐसी व्याख्यायें दूसरे आदिम समाजों में भी रही हैं। वह आर्य जाति और आर्य आक्रमण को गलत मानते थे और इसे स्वीकार करने के लिए ब्राह्मणों पर व्यंग्य भी करते थे इसलिए अधिक अच्छा रहा होता कि वह मानते यह कथा या व्याख्या पश्चिम में संस्कृत भाषा की तरह भारत से स्कैंडिनेविया तक फैली थी। पर ऐसा तभी हो सकता था जब यज्ञ की उस प्रकृति को उन्होंने समझा होता। वेद पर इतना समय लगाने के लिए उनके पास न था।

यज्ञपुरुष, यज्ञ स्वयं भी, अग्नि का मूर्तीकरण है, यह तथ्य ऋग्वेद के दसवे मंडल के ही अनेक सूक्तों में बहुत स्पष्ट है। पुरुष सूक्त का पुरुष सहस्राक्ष है । अग्नि सहस्राक्ष हैं, “सहस्र अक्षभि: विचक्षे अग्ने” (१०.७९.५); पुरुष सहस्रशीर्ष है, तो अग्नि का मुख सभी दिशाओं में है “विश्वत: प्रत्यक् असि” (वही) । लेकिन सबसे जीवन्त है “विश्वत: चक्षु: उत विश्वत:मुख: विश्वत: बाहु: उत विश्वत: पात् । सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रै: द्यावा भूमिं जनयन् देव एक: ।” (१०.८१.३) इस सूक्त में अग्नि को विश्वकर्मा कहा गया है और उनके तीनों धामों का भी उल्लेख है, “या ते धामानि परमाणि या अवमा या मध्यमा विश्वकर्मन् उत इमा।” (१०.८१.५)।

इससे अगले सूक्त का वर्ण्यविषय (देवता) ही विश्वकर्मा है और ” विश्वकर्मा विमना आत् विहाया धाता विधाता परम् उत सन्दृक्” (१०.८२.२)। कहने का तात्पर्य यह कि भौतिक उत्पादन की चिन्तारेखा कैसे विश्वब्रह्मांड की सृष्टि से जुड़ती है और इस पर निरंतर ऊहापोह चलता है, जिसकी सर्वोत्तम अभिव्यक्ति नासदीय सूक्त में देखने को मिलता है। पुरुष सूक्त इसी चिन्ताधारा की एक कड़ी है न कि प्रयत्नपूर्वक घुसाई हुई चीज।

इसका ऐतिहासिक महत्व यह कि यूरोप पर्यन्त वैदिक व्यवहार भाषा का प्रसार इसकी रचना के बाद तक होता रहा है जिसका प्रमाण स्कैंडिनेवियाई परंपरा है।

दूसरी कड़ी का संबंध पहल के अभाव से है। विशेषज्ञता के क्षेत्रों में कमाल हासिल करके जीविका उपार्जन करने वाले उस दशा में कैसे संतुष्ट रह सकते थे जब कि उनको मात्र जीवन यापन के ही साधन उपलब्ध थे जब कि उन्ही के उत्पादों से व्यापार वाणिज्य करने वाले मालदार हो जाते थे। ऐसा नहीं है कि संपत्तिसंग्रह और संपदा के स्रोतों पर अधिकार में चूक जाने के बाद अपने उत्पाद का उचित मूल्य पाने की भी उनमें इच्छा का अभाव था। उन्होंने समय समय पर अपने गिल्ड बनाए, विपणन का काम भी संभाला परन्तु वे पैसे के लिए उस आनन्द को छोड़ नहीं सकते थे जो उन्हें अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र से मिलता था। अपनी अल्पतम जरूरत पूरी हो जाने के बाद धन दौलत के पीछे भागने की प्रवृत्ति का उनमें अभाव था । यह कुछ वैसा ही है जैसे किसी कवि,कलाकार, संगीतकार से कोई कहे कि वह अपनी रुचि के क्षेत्र को छोड़कर दूकान कर ले तो जितना कमाता है उससे कई गुना कमा सकता है। पहल और विषज्ञता, डकार और आह्लाद के इस अन्तर को, प्रतिभा और पहल के इस द्ववन्द्वात्मक संबंध को समझना जरूरी है। व्यापारिक श्रेणियों की विफलता का भी यही कारण रहा होगा।

Post – 2018-03-07

परिशिष्ट
()

मेरी कोई बात पूरी नहीं हो पाती इसलिए पिछली पोस्टों में भी कुछ जरूरी बातें कहने से रह गईं। पहली पुरुषसूक्त के संबंध में है। अधिकांश लेखकों ने इसे ब्राह्मणों की शरारत से बाद में जोड़ा हुआ माना है। अकेले अंबेडकर इसके अपवाद है जिन्होंने दूसरी परंपराओं में ऐसी कथा के प्रचलन को देखते हुए इसे न केवल पुराना माना है, अपितु इसकी बहुत मार्मिक व्याख्या की है।

कुछ यूरोपीय अध्येताओं ने इसकी भाषा को देखते हुए इसे नया तो माना है, पर स्कैंडिनेवियन पुराणकथाओं में भी इससे मिलती कथा के कारण अपनी समझ से इसकी कथावस्तु को प्राचीन, अपनी परिभाषा के संयुक्त भारोपीय काल का माना और जातीय स्मृति में उसके बने रह जाने के कारण बाद में रचित सिद्ध करते रहे। अांबेडकर जी ने भी उसका अवलोकन किया होगा और उसी के आधार पर यह मान लिया था कि सृष्टि कि ऐसी व्याख्यायें दूसरे आदिम समाजों में भी रही हैं। वह आर्य जाति और आर्य आक्रमण को गलत मानते थे और इसे स्वीकार करने के लिए ब्राह्मणों पर व्यंग्य भी करते थे इसलिए अधिक अच्छा रहा होता कि वह मानते यह कथा या व्याख्या पश्चिम में संस्कृत भाषा की तरह भारत से स्कैंडिनेविया तक फैली थी। पर ऐसा तभी हो सकता था जब यज्ञ की उस प्रकृति को उन्होंने समझा होता। वेद पर इतना समय लगाने के लिए उनके पास न था।

यज्ञपुरुष, यज्ञ स्वयं भी, अग्नि का मूर्तीकरण है, यह तथ्य ऋग्वेद के दसवे मंडल के ही अनेक सूक्तों में बहुत स्पष्ट है। पुरुष सूक्त का पुरुष सहस्राक्ष है । अग्नि सहस्राक्ष हैं, “सहस्र अक्षभि: विचक्षे अग्ने” (१०.७९.५); पुरुष सहस्रशीर्ष है, तो अग्नि का मुख सभी दिशाओं में है “विश्वत: प्रत्यक् असि” (वही) । लेकिन सबसे जीवन्त है “विश्वत: चक्षु: उत विश्वत:मुख: विश्वत: बाहु: उत विश्वत: पात् । सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रै: द्यावा भूमिं जनयन् देव एक: ।” (१०.८१.३) इस सूक्त में अग्नि को विश्वकर्मा कहा गया है और उनके तीनों धामों का भी उल्लेख है, “या ते धामानि परमाणि या अवमा या मध्यमा विश्वकर्मन् उत इमा।” (१०.८१.५)।

इससे अगले सूक्त का वर्ण्यविषय (देवता) ही विश्वकर्मा है और ” विश्वकर्मा विमना आत् विहाया धाता विधाता परम् उत सन्दृक्” (१०.८२.२)। कहने का तात्पर्य यह कि भौतिक उत्पादन की चिन्तारेखा कैसे विश्वब्रह्मांड की सृष्टि से जुड़ती है और इस पर निरंतर ऊहापोह चलता है, जिसकी सर्वोत्तम अभिव्यक्ति नासदीय सूक्त में देखने को मिलता है। पुरुष सूक्त इसी चिन्ताधारा की एक कड़ी है न कि प्रयत्नपूर्वक घुसाई हुई चीज।

इसका ऐतिहासिक महत्व यह कि यूरोप पर्यन्त वैदिक व्यवहार भाषा का प्रसार इसकी रचना के बाद तक होता रहा है जिसका प्रमाण स्कैंडिनेवियाई परंपरा है।

दूसरी कड़ी का संबंध पहल के अभाव से है। विशेषज्ञता के क्षेत्रों में कमाल हासिल करके जीविका उपार्जन करने वाले उस दशा में कैसे संतुष्ट रह सकते थे जब कि उनको मात्र जीवन यापन के ही साधन उपलब्ध थे जब कि उन्ही के उत्पादों से व्यापार वाणिज्य करने वाले मालदार हो जाते थे। ऐसा नहीं है कि संपत्तिसंग्रह और संपदा के स्रोतों पर अधिकार में चूक जाने के बाद अपने उत्पाद का उचित मूल्य पाने की भी उनमें इच्छा का अभाव था। उन्होंने समय समय पर अपने गिल्ड बनाए, विपणन का काम भी संभाला परन्तु वे पैसे के लिए उस आनन्द को छोड़ नहीं सकते थे जो उन्हें अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र से मिलता था। अपनी अल्पतम जरूरत पूरी हो जाने के बाद धन दौलत के पीछे भागने की प्रवृत्ति का उनमें अभाव था । यह कुछ वैसा ही है जैसे किसी कवि,कलाकार, संगीतकार से कोई कहे कि वह अपनी रुचि के क्षेत्र को छोड़कर दूकान कर ले तो जितना कमाता है उससे कई गुना कमा सकता है। पहल और विषज्ञता, डकार और आह्लाद के इस अन्तर को, प्रतिभा और पहल के इस द्ववन्द्वात्मक संबंध को समझना जरूरी है। व्यापारिक श्रेणियों की विफलता का भी यही कारण रहा होगा।