Post – 2018-04-07

पानी और गणना

आज हम गणित के जलसे उद्भव की संभावना पर चर्चा करेंगे। हम यह बात जानते हैं कि अंको का उंगलियों से गहरा संबंध है परंतु यह नहीं जानते कि उंगलियों का संबंध पानी से भी हो सकता है। इस ओर मेरा ध्यान से कुछ विलंब से गया । बार बार ऋग्वेद पर सायणाचार्य के भाष्य को उलटते पलटते । फिर कुछ और टटोलने के बाद मैंने पाया कि क्षुद्रतम अंशों, जैसे अणु, कण, रेणु, पुद्गल, अंश, खंड, भाग, क्षुद्र के लिए जो शब्द प्रयोग में आते है वे भी सीधे या टेढ़े जलवाची शब्दों से जुड़ते है, अंक, संख्या, कलन, गणित, भाग, धन, ऋण, गुणन आदि भी, और विराटतम संख्याओं और विपुलता सूचक बहुवचन , बहु. विपुल, अति,अधिक, महत, पूर्ण, भूरि, अलं, बाढ, अपार, पृथुल, अपार,अकूत,,भारी, वृहत, संहति, आदि भी।

इस रहस्य को कोशग्रन्थों के सहारे नहीं समझा जा सकता। संस्कृत व्याकरण भी हमारी अधिक सहायता नहीं कर सकता, जिसमें संज्ञाओं के ही तद्धित और कृदन्त भेद किए गए हैं। कृदन्त वे शब्द है जिनको धातुज माना गया है। उनकी व्युत्पत्ति भी, जैसा हम पीछे देख आए हैं, हर माने में सन्देह से परे नहीं है। परन्तु ऐसी संज्ञाएं जिनको किसी धातु से नहीं संबद्ध किया जा सका, जिन्हें तद्धित कहा जाता है, उनकी व्युत्पत्तियां इतनी हास्यास्पद हो सकती है कि इन पर संस्कृत के पंडित ही अपनी हंसी रोक सकते हैं। इसका एक नमूना पुत्र शब्द है। ‘पुत्र’ की व्याख्या है, ‘पुं नाम इति नरक: तस्मात् त्रायते इति पुत्र: (पुन्नाम्नो नरकाद्यस्मात्त्रायते पितरं सुत:। तस्मात् पुत्र इति प्रोक्त: स्वयमेव स्वयंभुवा।) आप्टे इस व्याख्या से ही सन्तुष्ट नहीं हैं, आगे सुझाव देते हैं कि इस कारण इस शब्द को ‘पुत्त्र’ के रूप में ही खिखा जाना चाहिए लेकिन लोग हैं कि नरक की ऐसी तैसी करते हुए इसे पुत्र रूप में ही लिखते हैं और स्वयं आप्टे ने भी अपने कोश में ‘पुत्र:’ शीर्षक के अन्तर्गत ही अपने उक्त विचार प्रकट किए हैं।

कृत्रिम व्याख्याओं में इस तरह का संकट बना रहेगा ही। अनुनादी पद्धति में इस तरह के कृदन्त तद्धित का भेद नहीं रह जाता। उसमेँ एक आवयिकता है, जिसमें क्रिया, विशेषण और क्रियाविशेषण तक उसी ध्वनि की तार्किक शृंखला में जुड़े चले आते हैं।

परन्तु हमेँ उस सिद्धान्त का स्मरण दिलाना होगा कि जल की विविध गतियों के कारण गति के विविध रूपों जिनमें प्रखर से लेकर मंथर, ऋजु से लेकर वंकिम और चक्करदार, ऊर्ध्वाधर से लेकर क्षैतिज से ही सभी गतियों, रीतियों, प्रथाओं के लिए शब्द निकले हैं जो उपसर्गों का भी काम करते हैं। जल के ही पर्याय लगभग सभी खाद्य पदार्थो, सभी अनाजों, सभी वनस्पतियों, सभी रंगों, ज्ञान, प्रकाश, इनके साधन, चांद-सूरज सहित ब्रहमांड के सभी दृश्य पिंडों, सभी मनोभावो-विचारों, सभी खनिजों-धातुओं, धन संपत्ति के रूपों के साथ मिलते हैं और आगे चलकर मानवीय हस्तक्षेप से भाषा के विस्तार का दौर आता है जिसके लिए ये इकाइयों या आधारभूत घटकों का काम करते हैं।

इस दावे की परीक्षा हम आगे की चर्चाओं में करेंगे परन्तु यहां इनको एक साथ गिनाने का प्रयोजन यह है कि किसी विशेष आशय में रूढ़ हो जाने के कारण और अपने मूल अर्थ में प्रयोगच्युत हो जाने के कारण, कुछ मामलों में हम शब्द का सीधा संबंध जल से न जोड़ सकें। उस अवस्था में में हम ‘मान्य अर्थ’ या assumed sense के लिए ‘*’ चिन्ह लगाकर, यह परखने का प्रयत्न करेंगे कि ऊपर के एकाधिक आशयों में उसका प्रयोग हुआ है या नहीं। यदि हां, तो मान्यता प्रामाणिक हो जाएगी।

एक अन्य तथ्य यह कि अनुनादी उच्चारण में ह्रस्व, दीर्घ और नासिक्य का अधिक ध्यान नहीं रहता, अत: इनका अभेद बना रहेगा। तुलनात्मक साक्ष्य में ईरानी और यूरोपीय बोलियों में (हमारी सीमा में अंग्रेजी और अधिक से अधिक कोश की सहायता से लातिन और ग्रीक) स्वरों और व्यंजनों के जो सर्वमान्य परिवर्तन हैं उनका लाभ लेना स्वाभाविक है और यदि हम व्युत्पादन के संस्कृत पद्धति की चिन्ता नहीं करने जा रहे हैं तो इससे प्रेरित पश्चिमी व्युत्पादन का बंधन भी नहीं स्वाकार करेंगे, जो यूं भी सजात शब्दों के उल्लेख से आगे नहीं बढ़ पाया है। प्रोटो इंडोयूरोपियन के जो स्टेम कल्पित किए गए हैं, उनमें यूरोपीय बोलियो को अतिरिक्त प्रधानता देते हुए धातुओं के निर्धारण की ही नकल की गई है, इसलिए उनमें धातुओं वाले दोष तो हैं ही, उसके बाद भी उनकी जो सीमित उपयोगिता है वह यूरोपीय भाषाओं तक सीमित है। उस रूप में भी उन्हें आप्तता नहीं मिली है अत: मानक कोशों में उन्हे स्थान नहीं दिया गया है। हमारी तो सीमा यह भी है कि मेरे पास वैसा कोई कोश नहीं। अत: उनकी व्याख्या हमारे लिए बन्धनकारी नहीं है। इसके बाद भी कुछ गंभीर चूकें मेरी अपनी सीमाओं और विचार के समय बहाव के कारण हो सकती हैं जिनका प्रतिशत तो तय नहीं किया जा सकता पर संभावना को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

अब हम अगली कुछ पोस्टों में गणित के क्षेत्र में प्रयुक्त शब्दों पर विचार करेंगे।

Post – 2018-04-07

छोटी सी ये दुनिया पहचाने रास्ते हैं

पर समस्या यह है कि इसे कैसे इतनी छोटी कर दिया जाय कि यह हमारी जेब में समा जाय, दूसरे सारे रास्ते मिट जायं और केवल एक ही रास्ता बचा रह जाय और वह भी इतना संकरा कि उस पर एक ही ओर से चला जा सके, कोई दूसरी ओर से आने की गलती करे तो माथाफोड़ टक्कर हो। इस योजना पर बहुत सारे लोग काम कर रहे हैं और एक तरह से हम भी शामिल हैं लेकिन पूरी तरह फिट नहीं हो पाते। हमारी कोशिश सेलफोन बनाने वालों जैसी है जो सारी दुनिया को हमारी जेब और सच कहें तो मुट्ठी में तो सीमित कर देती है पर चमत्कार यह कि दुनिया पहले से अधिक विराट और सिर चकराने वाली हो जाती है।

मेरी शिकायत यह रहती है कि सभी लोग भाषा की उत्पत्ति और विकास को समझने पर क्यों नहीं जुट जाते, जिसके साथ ही इतिहास और वर्तमान जानने की चीज नहीं रह जाते। कल मैं खीझ रहा था कि जब कह दिया कि जिन भी वस्तुओं, क्रियाओं, भावों, दशाओं से कोई ध्वनि नहीं फूटती उन सबके लिए संज्ञा पानी की अनन्त ध्वनियों में से किसी एक से मिली है, तो आगे कुछ कहने की जरूरत ही न होती, पाठक स्वयं विचार करके उनके संबंधसूत्र तलाशते और जिन विरल मामलों में वैयाकरणों, भाष्यकारों और कोशकारों से चूक हुई है उनमें सटीक अर्थ तक पहुंचते। इसे पढ़कर कितने लोग किस किस तरह का मुंह बना कर मुस्कराएंगे यह तो नहीं जानता, पर यह जानता हूं कि इसके लिए दो बातें अपेक्षित थीं। पहली एक जाग्रत, अध्यवसायी और नई दिशाएं खोजने के लिए व्यग्र समाज।

हम ऐसा समाज नहीं बना सके। यदि मन में कोई आशंका थी तो फेस बुक के विहंगावलोकन ने इसे दूर कर दिया कि आलस्य और आमोदप्रियता हमारे समाज का स्वभाव बन चुकी है। बुद्धिबली जन, दिन का दिन, साल का साल फिकरेबाजियों में बिता देते हैं। हमारे समय का सबसे मनोरंजक खेल तखतापलट खेल बन गया है। ‘जोर लगाओ हइसा ! शोर मचाओ हइसा !!’ की हुंकार और ‘तब चूके पर अबकी बार, गिर जाएगी यह सरकार’ की ध्वनियाें-प्रतिध्वनियों से आसमान गूंजने लगता है। जहां सारे के सारे लोग राजनीति को दिशा दे रहे हो, राजनीति और समाज की दुर्दशा हो यह स्वाभाविक है।

मैं उन सभी आरोपों को सही मानने को तैयार हूं जिनके कारण इस सरकार को आना ही नहीं चाहिए था, आगई तो रहना नहीं चाहिए था, अब तक रह गई पर अब चली जाय तो दिन फिरे, पर वे सभी अविश्वास का प्रस्ताव पेश करके स्वयं ही संसद से गायब रहने वाले राजनीतिक दलों के साथ कंधा मिलाकर ‘शोर मचाओ हइसा!’ करने वाले लोग हैं । जोर लगाने के लिए अपने भीतर जोर तो होना चाहिए। सभी गैर लोकतांत्रिक हथकंडों से सरकार गिराकर मिल बांट कर खाने और यदि सरकार गिर भी गई तो अपने कारनामों से भाजपा को पहले से भी अधिक शक्तिशाली और सचमुच तानाशाही तेवर से आने का रास्ता ही तैयार करेंगे, क्योंकि सभी में सत्ता की भूख तो है, देश और समाज के भविष्य का कोई खाका नहीं।

अपना अपना काम छोड़ कर देश का काम कर रहे हैं। यह मोटी बात तक भूल गए हैं कि महाव्याधियाँ और गलत प्रवृत्तियाँ एक बार समाज में प्रवेश कर गईं तो जाने का नाम नहीं लेतीं हैं।

इनसे किसी क्षेत्र में गंभीर काम की आशा तो व्यर्थ है ही, किसी ऐसे काम को समझ पाने तकी आशा व्यर्थ है। बौद्धिक संकुचन का, दूसरे सभी सरोकारों के लोप का ऐसा दौर इतिहास में महादर्भिक्षों के दौर में सुना गया है पर भरे पेट, कुछ और के लिए आतुर बुद्धिबलियों का बौद्धिक दुर्भिक्ष उससे कम कारुणिक और त्रासद नहीं है।

दूसरी स्थिति वह होती जिसमें कोई पश्चिमी विद्वान, जिस पर सोचने और पहल करने की जिम्मेदारी छोड़कर हमारा पूरा देश रसिकता में इस हद तक डूबा है कि यह रसौली का रूप ले चुकी है, ऐसा कोई प्रस्ताव रखता और उसे अपने लिए उपयोगी पाकर पश्चिमी प्रचारतंत्र उसे इतने कोनों से फोकस करती कि आंखें चौंधिया जातीं। इसलिए मुझे हर बात को प्रमाणित और उदाहृत करने के लिए स्वयं काम करना होगा।

मेरी चिन्ता यह सोच कर बढ़ जाती है कि इस समय भी जब दर्द लगभग नहीं सा है तब भी लंबे समय तक काम करने के लिए न बैठा जाय है मुझसे न लेटा जाय है मुझसे, और किसी अनहोनी के होने पर इस दृष्टि के महत्व को समझने वाला कोई दिखाई नहीं देता। दौड़ना खुद ही पड़ है खुद को कोड़ा मारते।

Post – 2018-04-07

छोटी सी ये दुनिया पहचाने रास्ते हैं

पर समस्या यह है कि इसे कैसे इतनी छोटी कर दिया जाय कि यह हमारी जेब में समा जाय, दूसरे सारे रास्ते मिट जायं और केवल एक ही रास्ता बचा रह जाय और वह भी इतना संकरा कि उस पर एक ही ओर से चला जा सके, कोई दूसरी ओर से आने की गलती करे तो माथाफोड़ टक्कर हो। इस योजना पर बहुत सारे लोग काम कर रहे हैं और एक तरह से हम भी शामिल हैं लेकिन पूरी तरह फिट नहीं हो पाते। हमारी कोशिश सेलफोन बनाने वालों जैसी है जो सारी दुनिया को हमारी जेब और सच कहें तो मुट्ठी में तो सीमित कर देती है पर चमत्कार यह कि दुनिया पहले से अधिक विराट और सिर चकराने वाली हो जाती है।

मेरी शिकायत यह रहती है कि सभी लोग भाषा की उत्पत्ति और विकास को समझने पर क्यों नहीं जुट जाते, जिसके साथ ही इतिहास और वर्तमान जानने की चीज नहीं रह जाते। कल मैं खीझ रहा था कि जब कह दिया कि जिन भी वस्तुओं, क्रियाओं, भावों, दशाओं से कोई ध्वनि नहीं फूटती उन सबके लिए संज्ञा पानी की अनन्त ध्वनियों में से किसी एक से मिली है, तो आगे कुछ कहने की जरूरत ही न होती, पाठक स्वयं विचार करके उनके संबंधसूत्र तलाशते और जिन विरल मामलों में वैयाकरणों, भाष्यकारों और कोशकारों से चूक हुई है उनमें सटीक अर्थ तक पहुंचते। इसे पढ़कर कितने लोग किस किस तरह का मुंह बना कर मुस्कराएंगे यह तो नहीं जानता, पर यह जानता हूं कि इसके लिए दो बातें अपेक्षित थीं। पहली एक जाग्रत, अध्यवसायी और नई दिशाएं खोजने के लिए व्यग्र समाज।

हम ऐसा समाज नहीं बना सके। यदि मन में कोई आशंका थी तो फेस बुक के विहंगावलोकन ने इसे दूर कर दिया कि आलस्य और आमोदप्रियता हमारे समाज का स्वभाव बन चुकी है। बुद्धिबली जन, दिन का दिन, साल का साल फिकरेबाजियों में बिता देते हैं। हमारे समय का सबसे मनोरंजक खेल तखतापलट खेल बन गया है। ‘जोर लगाओ हइसा ! शोर मचाओ हइसा !!’ की हुंकार और ‘तब चूके पर अबकी बार, गिर जाएगी यह सरकार’ की ध्वनियाें-प्रतिध्वनियों से आसमान गूंजने लगता है। जहां सारे के सारे लोग राजनीति को दिशा दे रहे हो, राजनीति और समाज की दुर्दशा हो यह स्वाभाविक है।

मैं उन सभी आरोपों को सही मानने को तैयार हूं जिनके कारण इस सरकार को आना ही नहीं चाहिए था, आगई तो रहना नहीं चाहिए था, अब तक रह गई पर अब चली जाय तो दिन फिरे, पर वे सभी अविश्वास का प्रस्ताव पेश करके स्वयं ही संसद से गायब रहने वाले राजनीतिक दलों के साथ कंधा मिलाकर ‘शोर मचाओ हइसा!’ करने वाले लोग हैं । जोर लगाने के लिए अपने भीतर जोर तो होना चाहिए। सभी गैर लोकतांत्रिक हथकंडों से सरकार गिराकर मिल बांट कर खाने और यदि सरकार गिर भी गई तो अपने कारनामों से भाजपा को पहले से भी अधिक शक्तिशाली और सचमुच तानाशाही तेवर से आने का रास्ता ही तैयार करेंगे, क्योंकि सभी में सत्ता की भूख तो है, देश और समाज के भविष्य का कोई खाका नहीं।

अपना अपना काम छोड़ कर देश का काम कर रहे हैं। यह मोटी बात तक भूल गए हैं कि महाव्याधियाँ और गलत प्रवृत्तियाँ एक बार समाज में प्रवेश कर गईं तो जाने का नाम नहीं लेतीं हैं।

इनसे किसी क्षेत्र में गंभीर काम की आशा तो व्यर्थ है ही, किसी ऐसे काम को समझ पाने तकी आशा व्यर्थ है। बौद्धिक संकुचन का, दूसरे सभी सरोकारों के लोप का ऐसा दौर इतिहास में महादर्भिक्षों के दौर में सुना गया है पर भरे पेट, कुछ और के लिए आतुर बुद्धिबलियों का बौद्धिक दुर्भिक्ष उससे कम कारुणिक और त्रासद नहीं है।

दूसरी स्थिति वह होती जिसमें कोई पश्चिमी विद्वान, जिस पर सोचने और पहल करने की जिम्मेदारी छोड़कर हमारा पूरा देश रसिकता में इस हद तक डूबा है कि यह रसौली का रूप ले चुकी है, ऐसा कोई प्रस्ताव रखता और उसे अपने लिए उपयोगी पाकर पश्चिमी प्रचारतंत्र उसे इतने कोनों से फोकस करती कि आंखें चौंधिया जातीं। इसलिए मुझे हर बात को प्रमाणित और उदाहृत करने के लिए स्वयं काम करना होगा।

मेरी चिन्ता यह सोच कर बढ़ जाती है कि इस समय भी जब दर्द लगभग नहीं सा है तब भी लंबे समय तक काम करने के लिए न बैठा जाय है मुझसे न लेटा जाय है मुझसे, और किसी अनहोनी के होने पर इस दृष्टि के महत्व को समझने वाला कोई दिखाई नहीं देता। दौड़ना खुद ही पड़ है खुद को कोड़ा मारते।

Post – 2018-04-07

छोटी सी ये दुनिया पहचाने रास्ते हैं

पर समस्या यह है कि इसे कैसे इतनी छोटी कर दिया जाय कि यह हमारी जेब में समा जाय, दूसरे सारे रास्ते मिट जायं और केवल एक ही रास्ता बचा रह जाय और वह भी इतना संकरा कि उस पर एक ही ओर से चला जा सके, कोई दूसरी ओर से आने की गलती करे तो माथाफोड़ टक्कर हो। इस योजना पर बहुत सारे लोग काम कर रहे हैं और एक तरह से हम भी शामिल हैं लेकिन पूरी तरह फिट नहीं हो पाते। हमारी कोशिश सेलफोन बनाने वालों जैसी है जो सारी दुनिया को हमारी जेब और सच कहें तो मुट्ठी में तो सीमित कर देती है पर चमत्कार यह कि दुनिया पहले से अधिक विराट और सिर चकराने वाली हो जाती है।

मेरी शिकायत यह रहती है कि सभी लोग भाषा की उत्पत्ति और विकास को समझने पर क्यों नहीं जुट जाते, जिसके साथ ही इतिहास और वर्तमान जानने की चीज नहीं रह जाते। कल मैं खीझ रहा था कि जब कह दिया कि जिन भी वस्तुओं, क्रियाओं, भावों, दशाओं से कोई ध्वनि नहीं फूटती उन सबके लिए संज्ञा पानी की अनन्त ध्वनियों में से किसी एक से मिली है, तो आगे कुछ कहने की जरूरत ही न होती, पाठक स्वयं विचार करके उनके संबंधसूत्र तलाशते और जिन विरल मामलों में वैयाकरणों, भाष्यकारों और कोशकारों से चूक हुई है उनमें सटीक अर्थ तक पहुंचते। इसे पढ़कर कितने लोग किस किस तरह का मुंह बना कर मुस्कराएंगे यह तो नहीं जानता, पर यह जानता हूं कि इसके लिए दो बातें अपेक्षित थीं। पहली एक जाग्रत, अध्यवसायी और नई दिशाएं खोजने के लिए व्यग्र समाज।

हम ऐसा समाज नहीं बना सके। यदि मन में कोई आशंका थी तो फेस बुक के विहंगावलोकन ने इसे दूर कर दिया कि आलस्य और आमोदप्रियता हमारे समाज का स्वभाव बन चुकी है। बुद्धिबली जन, दिन का दिन, साल का साल फिकरेबाजियों में बिता देते हैं। हमारे समय का सबसे मनोरंजक खेल तखतापलट खेल बन गया है। ‘जोर लगाओ हइसा ! शोर मचाओ हइसा !!’ की हुंकार और ‘तब चूके पर अबकी बार, गिर जाएगी यह सरकार’ की ध्वनियाें-प्रतिध्वनियों से आसमान गूंजने लगता है। जहां सारे के सारे लोग राजनीति को दिशा दे रहे हो, राजनीति और समाज की दुर्दशा हो यह स्वाभाविक है।

मैं उन सभी आरोपों को सही मानने को तैयार हूं जिनके कारण इस सरकार को आना ही नहीं चाहिए था, आगई तो रहना नहीं चाहिए था, अब तक रह गई पर अब चली जाय तो दिन फिरे, पर वे सभी अविश्वास का प्रस्ताव पेश करके स्वयं ही संसद से गायब रहने वाले राजनीतिक दलों के साथ कंधा मिलाकर ‘शोर मचाओ हइसा!’ करने वाले लोग हैं । जोर लगाने के लिए अपने भीतर जोर तो होना चाहिए। सभी गैर लोकतांत्रिक हथकंडों से सरकार गिराकर मिल बांट कर खाने और यदि सरकार गिर भी गई तो अपने कारनामों से भाजपा को पहले से भी अधिक शक्तिशाली और सचमुच तानाशाही तेवर से आने का रास्ता ही तैयार करेंगे, क्योंकि सभी में सत्ता की भूख तो है, देश और समाज के भविष्य का कोई खाका नहीं।

अपना अपना काम छोड़ कर देश का काम कर रहे हैं। यह मोटी बात तक भूल गए हैं कि महाव्याधियाँ और गलत प्रवृत्तियाँ एक बार समाज में प्रवेश कर गईं तो जाने का नाम नहीं लेतीं हैं।

इनसे किसी क्षेत्र में गंभीर काम की आशा तो व्यर्थ है ही, किसी ऐसे काम को समझ पाने तकी आशा व्यर्थ है। बौद्धिक संकुचन का, दूसरे सभी सरोकारों के लोप का ऐसा दौर इतिहास में महादर्भिक्षों के दौर में सुना गया है पर भरे पेट, कुछ और के लिए आतुर बुद्धिबलियों का बौद्धिक दुर्भिक्ष उससे कम कारुणिक और त्रासद नहीं है।

दूसरी स्थिति वह होती जिसमें कोई पश्चिमी विद्वान, जिस पर सोचने और पहल करने की जिम्मेदारी छोड़कर हमारा पूरा देश रसिकता में इस हद तक डूबा है कि यह रसौली का रूप ले चुकी है, ऐसा कोई प्रस्ताव रखता और उसे अपने लिए उपयोगी पाकर पश्चिमी प्रचारतंत्र उसे इतने कोनों से फोकस करती कि आंखें चौंधिया जातीं। इसलिए मुझे हर बात को प्रमाणित और उदाहृत करने के लिए स्वयं काम करना होगा।

मेरी चिन्ता यह सोच कर बढ़ जाती है कि इस समय भी जब दर्द लगभग नहीं सा है तब भी लंबे समय तक काम करने के लिए न बैठा जाय है मुझसे न लेटा जाय है मुझसे, और किसी अनहोनी के होने पर इस दृष्टि के महत्व को समझने वाला कोई दिखाई नहीं देता। दौड़ना खुद ही पड़ है खुद को कोड़ा मारते।

Post – 2018-04-06

मैं जो कुछ लिखता हूं, सब सही नहीं होता। उसमें गलतियां निकालें। यह पसन्द करने से अधिक अच्छा है।

Post – 2018-04-06

मैं जो कुछ लिखता हूं, सब सही नहीं होता। उसमें गलतियां निकालें। यह पसन्द करने से अधिक अच्छा है।

Post – 2018-04-06

मैं जो कुछ लिखता हूं, सब सही नहीं होता। उसमें गलतियां निकालें। यह पसन्द करने से अधिक अच्छा है।

Post – 2018-04-05

कोश तक भरोसे के नहीं

कल हमने अपनी बात दो प्रश्नों से समाप्त की थी: पहला यह कि जिन धातुओं से हम किसी शब्द का व्युत्पादन करते हैं उनमें यदि वे आशय क्यों नहीं होते जिन्हें हम खींच तान कर निकाल लेते हैं, और जो अर्थ होते हैं वे बेमेल क्यों होते हैं? इसके विषय में हमने यह सुझाव रखा था कि भाषा व्याकरण से पैदा नहीं होती। व्याकरण किसी दूरस्थ, अपरिचित या मिलावटी भाषा को समझने का प्रयत्न है जिसके चलते कुछ ऐसी प्रवृत्तियों की पहचान कर सकें जिनके सहारे दूसरे ऐसे शब्दों के उस घटक का अर्थ समझा जा सके जिनमें वह पाया जा सकता है और इन्हें सुविधा के लिए नियम कह लिया जाता है। यह नियम एक सीमा के बाद काम नहीं करते, इसलिए नियमों के अपवाद भी होते हैं। इन नियमों की सहायता से हम उन्हीं बहुनिष्ठ इकाइयों या धातुओं से नई परिस्थितियों में नए शब्द भी गढ़ सकते हैं, जिनको अर्थ बताने पर ही यह मालूम हो सकता है कि इनका किस आशय में प्रयोग किया जाना है। यह अर्थ आसानी से भूल सकता है क्योंकि जिस धातु से ये निर्मित हैं उनके एकाधिक आशय कल्पित करने पड़े हैं, और इसके बाद भी ये उन सभी शब्दों के आशय को समेट नहीं पाते। उदाहरण के लिए ऋष् धातु में यदि गति और हिंसा है तो पवित्रता कहां से आ गई? वीतरागता कहों से आ गई । ऋष् से तीन अन्य शब्द बने हैं, ऋषभ = १. सांड़, २. श्रेष्ठतम और ऋषु = आभा, लपट और ऋष्व, ऊंचाई पर स्थित। इनके आशय ऋष् धातु में नहीं अट पाए हैं। कहें धातुएं अर्थनिर्धारण के लिए अपर्याप्त प्रतीत होती हैं।

दूसरा प्रश्न यह था कि रि, ऋ, ऋृ तीनों का अर्थ गमन है, ऋष्टि और रिष्टि दोनों का अर्थ तलवार या हथियार है। ऋ का सही उच्चारण क्या है, इसे लेकर मतभेद है। इसका सही उच्चारण कोई नहीं करता, ऋृ से कोई शब्द नहीं बनता। यह अक्षर भी है और शब्द भी जिसका अर्थ वही है जो ऋ का। अत: यह वैयाकरणों की उद्भावना की देन प्रतीत होता है। पर ऋ के विषय में भी यही बात कही जा सकती है। हम पहले यह सुझा आए हैं कि संस्कृत के निर्माण में उन बोलियों की भी भूमिका है जिन्हें द्रविड और आग्नेय परिवारों में रखा जाता है, द्रविड़ भाषाओं में दो रकार पाए जाते हैं। एक का उच्चारण कंपित घर्षी रूप में किया जाता है जिसका व्यवहार तमिल में इतना अनिश्चित है कि इसका सावर्ण्य होने या एक साथ दुबारा प्रयुक्त होने पर यह ट्ट के रूप में उच्चरित होता है। ऋ इसी रकार का संस्कृत में प्रवेश है। यही बात लृ के विषय में कही जा सकती है ।

अब हम ऋष् धातु से उत्पन्न उलझनों के निराकरण के लिए अनुनादी स्रोत की ओर लौटने पर बहते पानी के उस नाद पर जाएं जिसे रस्, रुस्/रुष्, रिस् के रूपों में वाचिक पहचान मिली है। रिस से रिसना= रसाव बना है। जल वाची शब्दों का प्रयोग गति, प्रकाश, तेज, पवित्रता, उर्वरता या रेत:सेक आदि के लिए होता है और साथ ही हिंसा के लिए भी। जल में संहार की प्रलयंकारी शक्ति है जिसके कारण जल को वज्र कहा गया है – आपो वै वज्र। परन्तु हिंसा में जो सायासता है वह जलवाची रिष् की ध्वनि नहीं हो सकती। प्रवाही जल की ध्वनि पैने हथियार की जननी नहीं हो सकती। अत: यह खरोंचने की ध्वनि है जिसके लिए संस्कृत में रिख्/लिख् का प्रयोग किया जाता है और एक धातु रिष् कल्पित की गई है (रिष् >रेषति, रिष्ट 1. to injure, hurt, harm; 2. To kill or destroy, V.S. Apte)

इसका अर्थ है, कोशकार ने ऋष् में जिन दो अर्थों की कल्पना की वह दो अलग समनादी (homophonic) शब्द हैं, एक रिष् (रिस्) और दूसरी ऱिष् (ऱिस्) । यहां मुझे स्वयं कुछ दुविधा है कि इस मामले में ष का पुराना रूप स था या ख। दुविधा का कारण यह कि संस्कृत ध्वनिमाला मे तालव्य और मूर्धन्य ध्वनियों का प्रवेश बाद में हुआ। मूल भाषा की ऊष्म ध्वनियां स और ह थीं। मूर्धन्यप्रेमी समुदाय के प्रवेश के बाद सकार का षकार अन्य मूर्धन्य ध्वनियों के समीप होने पर होने लगा। यह समस्या कुछ टेढ़ी है और इसे लक्ष्य करते हुए रामविलास शर्मा ने चेतावनी दी है कि वर्गीय धवनियों की सभी धवनियां किसी भाषा में न तो अनुपस्थित थीं न वर्ग की समस्त ध्वनियाो एक साथ किसा भाषा में ली गईं। र को मूर्धन्य माना जाता है पर यह ध्वनि मूल बोली में थी। इसके सानिध्य में सकार का षकार कुरु अंचल में पहुंचने पर हुआ। मूल बोली के उद्गम क्षेत्र में आज तक ऋ को रि और ष को ख में बदलने की प्रवृत्ति है ओर संस्कृत के पंडित भी ऋषि को रिखि बोलते हैं।

जो हो, जैसा हम कह आए हैं, धातुओं से आरंभ करके न तो हम संस्कृत को पूरी तरह समझ सकते हैं, न बोलियों को, न ही संस्कृत भाषा के उद्भव और विकास को।

अनुनादी पद्धति से ही धातुओं की सीमाओं को भी समझ सकते हैं क्योंकि वे काल्पनिक हैे, जब कि अनुनादी शब्द यथार्थ का हिस्सा। हम यहां केवल जल से उत्पन्न ध्वनि को लेंगे जिसे रस्, रिस् रुस में अनुकृत किया गया। जल की गति, चमक अतः ज्ञान, पवित्रता, रेतसेचकता, आग के लिए जल के पर्यायों के उपयोग आदि को ध्यान में रखे तो पाएंगे कि इससे न केवल संस्कृत अपितु बोलियों से लेकर भारोपीय की दूसरी शाखाओं के अनगिनत शब्दों का अर्थविकास उजागर हो जाएगाः
रस- रास, रसिकता, रसना, रसरी, रस्सी, रश्मि, रेशम, राशि, रस्ता/रास्ता/राह, रहगुजर, रेस, रश, रैश, रास- घोड़ा, आदि।
रिस/ऋष – ऋषभ, ऋषि, ऋषू, ऋष्य, रिष- हिंसा, भो. रीस-क्रोध, रिसना- पानी का आदि।
रुस/रुष/ऋष – रोष/रुष्ट , रुशद्, रोशनी, रोशनाई, रुज, रोज -दिन, रोज-गुलाब।
यहां नाद, अनुनादन, शब्द, अर्थ, औचित्य सब कुछ पारदर्शी हो जाता है। यदि इस तथ्य पर ध्यान दें कि इन शब्दों का व्याख्या के लिए हमें कितनी धातुओं का सहारा लेना पड़ता है तो सर पीटने लगेंगे।

Post – 2018-04-05

कोश तक भरोसे के नहीं

कल हमने अपनी बात दो प्रश्नों से समाप्त की थी: पहला यह कि जिन धातुओं से हम किसी शब्द का व्युत्पादन करते हैं उनमें यदि वे आशय क्यों नहीं होते जिन्हें हम खींच तान कर निकाल लेते हैं, और जो अर्थ होते हैं वे बेमेल क्यों होते हैं? इसके विषय में हमने यह सुझाव रखा था कि भाषा व्याकरण से पैदा नहीं होती। व्याकरण किसी दूरस्थ, अपरिचित या मिलावटी भाषा को समझने का प्रयत्न है जिसके चलते कुछ ऐसी प्रवृत्तियों की पहचान कर सकें जिनके सहारे दूसरे ऐसे शब्दों के उस घटक का अर्थ समझा जा सके जिनमें वह पाया जा सकता है और इन्हें सुविधा के लिए नियम कह लिया जाता है। यह नियम एक सीमा के बाद काम नहीं करते, इसलिए नियमों के अपवाद भी होते हैं। इन नियमों की सहायता से हम उन्हीं बहुनिष्ठ इकाइयों या धातुओं से नई परिस्थितियों में नए शब्द भी गढ़ सकते हैं, जिनको अर्थ बताने पर ही यह मालूम हो सकता है कि इनका किस आशय में प्रयोग किया जाना है। यह अर्थ आसानी से भूल सकता है क्योंकि जिस धातु से ये निर्मित हैं उनके एकाधिक आशय कल्पित करने पड़े हैं, और इसके बाद भी ये उन सभी शब्दों के आशय को समेट नहीं पाते। उदाहरण के लिए ऋष् धातु में यदि गति और हिंसा है तो पवित्रता कहां से आ गई? वीतरागता कहों से आ गई । ऋष् से तीन अन्य शब्द बने हैं, ऋषभ = १. सांड़, २. श्रेष्ठतम और ऋषु = आभा, लपट और ऋष्व, ऊंचाई पर स्थित। इनके आशय ऋष् धातु में नहीं अट पाए हैं। कहें धातुएं अर्थनिर्धारण के लिए अपर्याप्त प्रतीत होती हैं।

दूसरा प्रश्न यह था कि रि, ऋ, ऋृ तीनों का अर्थ गमन है, ऋष्टि और रिष्टि दोनों का अर्थ तलवार या हथियार है। ऋ का सही उच्चारण क्या है, इसे लेकर मतभेद है। इसका सही उच्चारण कोई नहीं करता, ऋृ से कोई शब्द नहीं बनता। यह अक्षर भी है और शब्द भी जिसका अर्थ वही है जो ऋ का। अत: यह वैयाकरणों की उद्भावना की देन प्रतीत होता है। पर ऋ के विषय में भी यही बात कही जा सकती है। हम पहले यह सुझा आए हैं कि संस्कृत के निर्माण में उन बोलियों की भी भूमिका है जिन्हें द्रविड और आग्नेय परिवारों में रखा जाता है, द्रविड़ भाषाओं में दो रकार पाए जाते हैं। एक का उच्चारण कंपित घर्षी रूप में किया जाता है जिसका व्यवहार तमिल में इतना अनिश्चित है कि इसका सावर्ण्य होने या एक साथ दुबारा प्रयुक्त होने पर यह ट्ट के रूप में उच्चरित होता है। ऋ इसी रकार का संस्कृत में प्रवेश है। यही बात लृ के विषय में कही जा सकती है ।

अब हम ऋष् धातु से उत्पन्न उलझनों के निराकरण के लिए अनुनादी स्रोत की ओर लौटने पर बहते पानी के उस नाद पर जाएं जिसे रस्, रुस्/रुष्, रिस् के रूपों में वाचिक पहचान मिली है। रिस से रिसना= रसाव बना है। जल वाची शब्दों का प्रयोग गति, प्रकाश, तेज, पवित्रता, उर्वरता या रेत:सेक आदि के लिए होता है और साथ ही हिंसा के लिए भी। जल में संहार की प्रलयंकारी शक्ति है जिसके कारण जल को वज्र कहा गया है – आपो वै वज्र। परन्तु हिंसा में जो सायासता है वह जलवाची रिष् की ध्वनि नहीं हो सकती। प्रवाही जल की ध्वनि पैने हथियार की जननी नहीं हो सकती। अत: यह खरोंचने की ध्वनि है जिसके लिए संस्कृत में रिख्/लिख् का प्रयोग किया जाता है और एक धातु रिष् कल्पित की गई है (रिष् >रेषति, रिष्ट 1. to injure, hurt, harm; 2. To kill or destroy, V.S. Apte)

इसका अर्थ है, कोशकार ने ऋष् में जिन दो अर्थों की कल्पना की वह दो अलग समनादी (homophonic) शब्द हैं, एक रिष् (रिस्) और दूसरी ऱिष् (ऱिस्) । यहां मुझे स्वयं कुछ दुविधा है कि इस मामले में ष का पुराना रूप स था या ख। दुविधा का कारण यह कि संस्कृत ध्वनिमाला मे तालव्य और मूर्धन्य ध्वनियों का प्रवेश बाद में हुआ। मूल भाषा की ऊष्म ध्वनियां स और ह थीं। मूर्धन्यप्रेमी समुदाय के प्रवेश के बाद सकार का षकार अन्य मूर्धन्य ध्वनियों के समीप होने पर होने लगा। यह समस्या कुछ टेढ़ी है और इसे लक्ष्य करते हुए रामविलास शर्मा ने चेतावनी दी है कि वर्गीय धवनियों की सभी धवनियां किसी भाषा में न तो अनुपस्थित थीं न वर्ग की समस्त ध्वनियाो एक साथ किसा भाषा में ली गईं। र को मूर्धन्य माना जाता है पर यह ध्वनि मूल बोली में थी। इसके सानिध्य में सकार का षकार कुरु अंचल में पहुंचने पर हुआ। मूल बोली के उद्गम क्षेत्र में आज तक ऋ को रि और ष को ख में बदलने की प्रवृत्ति है ओर संस्कृत के पंडित भी ऋषि को रिखि बोलते हैं।

जो हो, जैसा हम कह आए हैं, धातुओं से आरंभ करके न तो हम संस्कृत को पूरी तरह समझ सकते हैं, न बोलियों को, न ही संस्कृत भाषा के उद्भव और विकास को।

अनुनादी पद्धति से ही धातुओं की सीमाओं को भी समझ सकते हैं क्योंकि वे काल्पनिक हैे, जब कि अनुनादी शब्द यथार्थ का हिस्सा। हम यहां केवल जल से उत्पन्न ध्वनि को लेंगे जिसे रस्, रिस् रुस में अनुकृत किया गया। जल की गति, चमक अतः ज्ञान, पवित्रता, रेतसेचकता, आग के लिए जल के पर्यायों के उपयोग आदि को ध्यान में रखे तो पाएंगे कि इससे न केवल संस्कृत अपितु बोलियों से लेकर भारोपीय की दूसरी शाखाओं के अनगिनत शब्दों का अर्थविकास उजागर हो जाएगाः
रस- रास, रसिकता, रसना, रसरी, रस्सी, रश्मि, रेशम, राशि, रस्ता/रास्ता/राह, रहगुजर, रेस, रश, रैश, रास- घोड़ा, आदि।
रिस/ऋष – ऋषभ, ऋषि, ऋषू, ऋष्य, रिष- हिंसा, भो. रीस-क्रोध, रिसना- पानी का आदि।
रुस/रुष/ऋष – रोष/रुष्ट , रुशद्, रोशनी, रोशनाई, रुज, रोज -दिन, रोज-गुलाब।
यहां नाद, अनुनादन, शब्द, अर्थ, औचित्य सब कुछ पारदर्शी हो जाता है। यदि इस तथ्य पर ध्यान दें कि इन शब्दों का व्याख्या के लिए हमें कितनी धातुओं का सहारा लेना पड़ता है तो सर पीटने लगेंगे।

Post – 2018-04-05

कोश तक भरोसे के नहीं

कल हमने अपनी बात दो प्रश्नों से समाप्त की थी: पहला यह कि जिन धातुओं से हम किसी शब्द का व्युत्पादन करते हैं उनमें यदि वे आशय क्यों नहीं होते जिन्हें हम खींच तान कर निकाल लेते हैं, और जो अर्थ होते हैं वे बेमेल क्यों होते हैं? इसके विषय में हमने यह सुझाव रखा था कि भाषा व्याकरण से पैदा नहीं होती। व्याकरण किसी दूरस्थ, अपरिचित या मिलावटी भाषा को समझने का प्रयत्न है जिसके चलते कुछ ऐसी प्रवृत्तियों की पहचान कर सकें जिनके सहारे दूसरे ऐसे शब्दों के उस घटक का अर्थ समझा जा सके जिनमें वह पाया जा सकता है और इन्हें सुविधा के लिए नियम कह लिया जाता है। यह नियम एक सीमा के बाद काम नहीं करते, इसलिए नियमों के अपवाद भी होते हैं। इन नियमों की सहायता से हम उन्हीं बहुनिष्ठ इकाइयों या धातुओं से नई परिस्थितियों में नए शब्द भी गढ़ सकते हैं, जिनको अर्थ बताने पर ही यह मालूम हो सकता है कि इनका किस आशय में प्रयोग किया जाना है। यह अर्थ आसानी से भूल सकता है क्योंकि जिस धातु से ये निर्मित हैं उनके एकाधिक आशय कल्पित करने पड़े हैं, और इसके बाद भी ये उन सभी शब्दों के आशय को समेट नहीं पाते। उदाहरण के लिए ऋष् धातु में यदि गति और हिंसा है तो पवित्रता कहां से आ गई? वीतरागता कहों से आ गई । ऋष् से तीन अन्य शब्द बने हैं, ऋषभ = १. सांड़, २. श्रेष्ठतम और ऋषु = आभा, लपट और ऋष्व, ऊंचाई पर स्थित। इनके आशय ऋष् धातु में नहीं अट पाए हैं। कहें धातुएं अर्थनिर्धारण के लिए अपर्याप्त प्रतीत होती हैं।

दूसरा प्रश्न यह था कि रि, ऋ, ऋृ तीनों का अर्थ गमन है, ऋष्टि और रिष्टि दोनों का अर्थ तलवार या हथियार है। ऋ का सही उच्चारण क्या है, इसे लेकर मतभेद है। इसका सही उच्चारण कोई नहीं करता, ऋृ से कोई शब्द नहीं बनता। यह अक्षर भी है और शब्द भी जिसका अर्थ वही है जो ऋ का। अत: यह वैयाकरणों की उद्भावना की देन प्रतीत होता है। पर ऋ के विषय में भी यही बात कही जा सकती है। हम पहले यह सुझा आए हैं कि संस्कृत के निर्माण में उन बोलियों की भी भूमिका है जिन्हें द्रविड और आग्नेय परिवारों में रखा जाता है, द्रविड़ भाषाओं में दो रकार पाए जाते हैं। एक का उच्चारण कंपित घर्षी रूप में किया जाता है जिसका व्यवहार तमिल में इतना अनिश्चित है कि इसका सावर्ण्य होने या एक साथ दुबारा प्रयुक्त होने पर यह ट्ट के रूप में उच्चरित होता है। ऋ इसी रकार का संस्कृत में प्रवेश है। यही बात लृ के विषय में कही जा सकती है ।

अब हम ऋष् धातु से उत्पन्न उलझनों के निराकरण के लिए अनुनादी स्रोत की ओर लौटने पर बहते पानी के उस नाद पर जाएं जिसे रस्, रुस्/रुष्, रिस् के रूपों में वाचिक पहचान मिली है। रिस से रिसना= रसाव बना है। जल वाची शब्दों का प्रयोग गति, प्रकाश, तेज, पवित्रता, उर्वरता या रेत:सेक आदि के लिए होता है और साथ ही हिंसा के लिए भी। जल में संहार की प्रलयंकारी शक्ति है जिसके कारण जल को वज्र कहा गया है – आपो वै वज्र। परन्तु हिंसा में जो सायासता है वह जलवाची रिष् की ध्वनि नहीं हो सकती। प्रवाही जल की ध्वनि पैने हथियार की जननी नहीं हो सकती। अत: यह खरोंचने की ध्वनि है जिसके लिए संस्कृत में रिख्/लिख् का प्रयोग किया जाता है और एक धातु रिष् कल्पित की गई है (रिष् >रेषति, रिष्ट 1. to injure, hurt, harm; 2. To kill or destroy, V.S. Apte)

इसका अर्थ है, कोशकार ने ऋष् में जिन दो अर्थों की कल्पना की वह दो अलग समनादी (homophonic) शब्द हैं, एक रिष् (रिस्) और दूसरी ऱिष् (ऱिस्) । यहां मुझे स्वयं कुछ दुविधा है कि इस मामले में ष का पुराना रूप स था या ख। दुविधा का कारण यह कि संस्कृत ध्वनिमाला मे तालव्य और मूर्धन्य ध्वनियों का प्रवेश बाद में हुआ। मूल भाषा की ऊष्म ध्वनियां स और ह थीं। मूर्धन्यप्रेमी समुदाय के प्रवेश के बाद सकार का षकार अन्य मूर्धन्य ध्वनियों के समीप होने पर होने लगा। यह समस्या कुछ टेढ़ी है और इसे लक्ष्य करते हुए रामविलास शर्मा ने चेतावनी दी है कि वर्गीय धवनियों की सभी धवनियां किसी भाषा में न तो अनुपस्थित थीं न वर्ग की समस्त ध्वनियाो एक साथ किसा भाषा में ली गईं। र को मूर्धन्य माना जाता है पर यह ध्वनि मूल बोली में थी। इसके सानिध्य में सकार का षकार कुरु अंचल में पहुंचने पर हुआ। मूल बोली के उद्गम क्षेत्र में आज तक ऋ को रि और ष को ख में बदलने की प्रवृत्ति है ओर संस्कृत के पंडित भी ऋषि को रिखि बोलते हैं।

जो हो, जैसा हम कह आए हैं, धातुओं से आरंभ करके न तो हम संस्कृत को पूरी तरह समझ सकते हैं, न बोलियों को, न ही संस्कृत भाषा के उद्भव और विकास को।

अनुनादी पद्धति से ही धातुओं की सीमाओं को भी समझ सकते हैं क्योंकि वे काल्पनिक हैे, जब कि अनुनादी शब्द यथार्थ का हिस्सा। हम यहां केवल जल से उत्पन्न ध्वनि को लेंगे जिसे रस्, रिस् रुस में अनुकृत किया गया। जल की गति, चमक अतः ज्ञान, पवित्रता, रेतसेचकता, आग के लिए जल के पर्यायों के उपयोग आदि को ध्यान में रखे तो पाएंगे कि इससे न केवल संस्कृत अपितु बोलियों से लेकर भारोपीय की दूसरी शाखाओं के अनगिनत शब्दों का अर्थविकास उजागर हो जाएगाः
रस- रास, रसिकता, रसना, रसरी, रस्सी, रश्मि, रेशम, राशि, रस्ता/रास्ता/राह, रहगुजर, रेस, रश, रैश, रास- घोड़ा, आदि।
रिस/ऋष – ऋषभ, ऋषि, ऋषू, ऋष्य, रिष- हिंसा, भो. रीस-क्रोध, रिसना- पानी का आदि।
रुस/रुष/ऋष – रोष/रुष्ट , रुशद्, रोशनी, रोशनाई, रुज, रोज -दिन, रोज-गुलाब।
यहां नाद, अनुनादन, शब्द, अर्थ, औचित्य सब कुछ पारदर्शी हो जाता है। यदि इस तथ्य पर ध्यान दें कि इन शब्दों का व्याख्या के लिए हमें कितनी धातुओं का सहारा लेना पड़ता है तो सर पीटने लगेंगे।